Lok Sabha Debates
Further Discussion On The Drought Situation In Various Parts Of The Countrty ... on 10 December, 2015
Sixteenth Loksabha an> Title: Further discussion on the drought situation in various parts of the countrty raised by Shri Jyotiradiya M. Scindia on the 7th December, 2015 (Discussion not concluded).
श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर): माननीय उपाध्यक्ष जी, सूखे पर चर्चा के लिए हमारे पास बहुत नाम आये हैं, इसलिए मैं चाह रहा हूं कि आज सूखे पर पूरी चर्चा हो जाए और शाम को मंत्री जी का रिप्लाई हो जाए। इसलिए मेरा आपसे निवेदन है कि सूखे का आइटम पहले ले लिया जाए।
HON. DEPUTY-SPEAKER: Now, we will take up discussion under Rule 193 on drought, Shri Tariq Anwar.
श्री तारिक अनवर (कटिहार): उपाध्यक्ष महोदय, सबसे पहले मैं आपसे कहना चाहूंगा कि सूखे से उत्पन्न स्थिति पर बहस में हिस्सा लेने के लिए आपने मुझे जो मौका दिया है, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। यह वर्ष किसानों के लिए शुभ नहीं है, यह हम सब जानते हैं। इस वर्ष भी मानसून की बेरुखी रही है और देश के आधे से ज्यादा राज्य सूखे की चपेट में गंभीर रूप से है। अब तक सरकार द्वारा जो इस दिशा में कदम उठाया गया, ऐसा लगता है कि वह पर्याप्त नहीं है। सूखे पर चर्चा एक औपचारिकता होकर रह गई है।
बहुत वर्षों से मैं देख रहा हूं कि कोई वर्ष ऐसा नहीं होता है जब सूखे को लेकर या बाढ़ या राष्ट्रीय आपदा के कारण या ओलेवृष्टि के कारण हम लोग इस सदन में चर्चा नहीं करते हैं और जो किसानों की समस्या है, किसानों की जो पीढ़ा है, उस पर चर्चा नहीं होती हो, ऐसा नहीं है। लगभग हर वर्ष हम इस पर चर्चा करते हैं, लेकिन जो उसका निष्कर्ष निकलना चाहिए, वह निकल नहीं पा रहा है। एक तरह से यह हमारे सदन का एक रिचुअल बन गया है कि हर वर्ष हम लोग इस पर मात्र चर्चा करें। हम सब इस बात का दावा भी करते हैं कि हमारा देश कृषि प्रधान देश है। 60 प्रतिशत से ज्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है। इस सदन में भी मैं ऐसा मानता हूं कि लगभग 70 फीसदी हमारे माननीय संसद सदस्य ऐसे हैं जो या तो स्वयं किसानी करते हैं या किसान परिवार से आते हैं। इसलिए वे किसान परिवार की पृष्ठभूमि से आने के कारण किसानों की क्या समस्या है, वह भी वे अच्छी तरह से समझते हैं। लेकिन इन सबके बावजूद किसानों की जो समस्या है, वह लगभग उसी तरह से मुंह बाए खड़ी है।
इस वर्ष सूखे के कारण एक अनुमान के अनुसार खरीफ की पैदावार में 38 लाख टन की कमी हो सकती है। कृषि मंत्रालय के द्वारा भी जो जारी किया गया है, जो अग्रिम रिपोर्ट आई है, उसके मुताबिक पौने दो फीसदी से अधिक पैदावार की कमी हो सकती है। इससे चावल, दलहन और मोटे अनाज वाली फसलों को खासा नुकसान हुआ है। एक तो किसानों की हालत पहले से खराब है, फसलों का नुकसान होता है तो किसानों की मुसीबत आती है और आप सभी को यह जानकर आश्चर्य होगा कि जब पैदावार अच्छी होती है तब भी किसानों की मुसीबत आती है। उसका कारण यह है कि किसानों को अपनी उपज का जो सही मूल्य मिलना चाहिए, वह उनको नहीं मिल पाता है और जो बिचौलिए होते हैं, वे उनके खून-पसीने की कमीई का लाभ उठा लेते हैं। चूंकि किसानों को इस बात की जल्दी होती है कि उनकी फसल जल्दी बिक जाए क्योंकि उनके ऊपर कर्ज का जो बोझ होता है, वे जल्द से जल्द उससे निजात हासिल करना चाहते हैं। ऐसी हालत में किसान को सस्ती कीमत पर अपना अनाज बेचना पड़ता है। उन्हें इस तरह से दोहरी मार झेलनी पड़ती है जैसे कि सूखा पड़ा तो उनकी पूरी फसल खराब हो जाती है और ज्यादा अनाज पैदा हुआ तो बिचौलिए उसका लाभ उठा लेते हैं। जब मार्केट में अनाज की कीमत बढ़ती है तो बिचौलिए उसे बेचने के लिए मार्केट में ले जाते हैं और अनाज की ऊंची कीमत हमारे उपभोक्ताओं को चुकानी पड़ती है।
मैं मंत्री जी से और वर्तमान मोदी सरकार से इतना ही निवेदन करना चाहूंगा कि आप अगर किसानों को ज्यादा नहीं दे सकते हैं, ठीक है यह आपकी मजबूरी हो सकती है लेकिन इतना जरूर चाहते हैं कि आपने लोक सभा के चुनाव में, भारतीय जनता पार्टी ने अपने मेनीफेस्टो में इस बात का वायदा किया था कि चुनाव जीतने के बाद स्वीमीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करेंगे, इसे पूरा करें। किसानों को भी ऐसी अपेक्षा थी कि नई सरकार आई है तो उन्हें उनकी लागत कीमत से ज्यादा कीमत फसल की मिले और उनके घरों में भी खुशहाली आएगी, ऐसा उन्होंने सोचा था। लेकिन अब ऐसा लगता है कि जिस तरह अच्छे दिन और काले धन की वापिसी के वायदे थे, इसी तरह ये वायदा भी चुनावी जुमला बनकर रह गया है और सरकार की तरफ से आशा की कोई किरण नहीं दिख रही है जिसमें स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को मानने का कोई कदम उठाने की योजना हो।
महोदय, कृषि मंत्री जी अक्सर ये दलील देते हैं कि राज्य सरकारों द्वारा सूखा प्रभावित क्षेत्र की सर्वेक्षण रिपोर्ट समय पर नहीं भेजी जाती है जिसकी वजह से समय पर केंद्र से टीम नहीं भेजी जाती है और किसानों के नुकसान का सर्वेक्षण समय पर नहीं हो पाता है। इस वजह से केंद्र सरकार की तरफ से जो राहत दी जानी चाहिए, उसमें काफी विलम्ब होता है। जब तक केंद्र सरकार उस रिपोर्ट की औपचारिकताओं को पूरा करती है, तब तक काफी विलम्ब हो जाता है और राहत समय पर नहीं मिलने के कारण किसानों के ऊपर परिवार का और समाज का जो दबाव बनता है, वही किसान को आत्महत्या करने पर मजबूर करता है। यह हम सभी के लिए चिंता का विषय है कि आज 21वीं शताब्दी में भी हमारे किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। मैं मंत्री जी से चाहता हूं कि किसानों को इस दुर्दशा से बचाने के लिए जो उपाय किए जाने चाहिए, वे सरकार की तरफ से जल्दी से उठाने चाहिए। जो परम्परागत तरीके चले आ रहे हैं कि जब तक राज्य सरकार रिपोर्ट नहीं देगी या राज्य सरकार की तरफ से कोई आवेदन नहीं आएगा, तब तक हम कार्रवाई नहीं करेंगे।
हमयह चाहेंगे,हमारा यहसुझाव हैकि केन्द्रसरकार कीओर सेइस दिशामें स्वयंपहल होनीचाहिए।हमें यहपरम्पराछोड़नीहोगी किराज्य सरकारहमारे पासकटोरा लेकरआएगी, तभीहम उसेकुछ राहतदें याउसकी मददकरें। यहसिलसिलाबदलने कीआवश्यकताहै। सूखेऔर बाढ़से क्षतिग्रस्तक्षेत्रका अंदाजालगाने केलिए केन्द्रसरकार कोअपनी मशीनरीका भीउपयोग पूरीतरह सेकरना चाहिए।आज विज्ञानका ज़मानाहै। हमारेदेश मेंऐसे वैज्ञानिकहैं, जोकृषि केक्षेत्रमें कामकर रहेहैं औरकेन्द्रसरकार केपास मौसमविभाग भीहै तथाऔर भीकई तरीकेहैं, जिससेआने वालेसमय मेंयह पतालगाया जासकता हैकि कहाँज्यादाबारिश होगी,कहाँ सूखापड़ेगा,कहाँ ओलेपड़ेंगे।यदि केन्द्रसरकार इसओर कोशिशकरें तोइन तमामचीजों कीजानकारीपहले प्राप्तकी जासकती है।सैटेलाइटके जरियेभी हमलोग पताकर सकतेहैं किकहाँ कितनानुकसानहुआ है,किस तरहकी हानिहुई है।इन सबचीजों काउपयोग करतेहुए, किसानोंको राहतदी जासकती है।यदि किसानोंको समयपर राहतन मिले,तो उसकाकोई अर्थनहीं रहताहै। यदिचार-छः महीनेके बादकिसानोंको राहतमिलेगीतो यकीननजो उनकीतत्कालजरूरत है,उनकी जोआवश्यकताहै, उसेवे पूरानहीं करपाते हैं।जिसकी वजहसे उनकोपरेशानीझेलनी पड़तीहै।
राहतपहुंचानेके लिएकेन्द्रऔर राज्यसरकारोंके बीचमें समन्वयहोना चाहिए,यह जरूरीहै। उसकेसाथ हीसाथ, हमारायह भीमानना हैकि सरकारकिसानोंतक अपनीबात पहुंचानेके लिएदूरदर्शनऔर इलैक्ट्रोनिकमीडियातथा जोभी अन्यतरीके होसकते हैं,उसका उपयोगकरती है।इस दिशामें सरकारने एकडीडी किसानचैनल कीशुरुआतकी गयीहै। यहअच्छी बातहै। मैंसमझता हूँकि किसानोंकी जोभी समस्याहै, उनकोरेडियोके जरिएउन तकपहुंचायाजाए, तोअच्छी बातहोगी। लेकिन,इस संबंधमें सरकारको मैंएक सुझावदेना चाहूंगाकि डीडीकिसान चैनलसिर्फ हिन्दीमें है।इसकी आवश्यकताक्षेत्रीयभाषाओंमें भीहै क्योंकिहमारे बहुतसारे किसानहिन्दीनहीं समझपाते हैं।उनको यदिक्षेत्रीयभाषा मेंभी यहबताया जाएकि मौसमका हालकब कैसाहोगा, उनकोमौसम कीजानकारीउनकी क्षेत्रीयभाषा केमाध्यमसे दीजाए, तोयह उपयोगीसाबित होगा।कब क्यानुकसानहोने वालाहै, इसकीजानकारीउनको पहलेमिल जाएतो यहअच्छा होगाऔर मैंसमझता हूँकि यहजरूरी भीहै।
किसानोंके लिएसबसे मुश्किलयह होताहै किजो किटाणुनाशकदवाइयाँहोती हैं,खाद होतेहैं, उनकाउपयोग कैसेकरना हैऔर कितनीमात्रामें करनाहै, किसानोंको इसबात कीपूरी जानकारीनहीं है।इस बातको यहाँपर उठायाभी गयाहै। हमारेकई माननीयसदस्योंने भीकहा हैकि चूंकिहमारे ज्यादातरकिसान कमपढ़े-लिखेहैं, उनकोउन तमामचीजों कीजानकारीया कृषिसे संबंधितजो तकनीकीजानकारीहोनी चाहिएकि कौन-सेखाद काउपयोग कबकरना चाहिएऔर कितनीमात्रामें करनाचाहिए, इसबात कीजानकारीके अभावके कारणउसका नुकसानउनको उठानापड़ता है।आदमी कीजान बचानेके लिएदवाइयोंकी जरूरतपड़ती हैऔर जिसप्रकारसे आजदवाइयाँबेचने केलिए लाइसेंसकी जरूरतपड़ती है,उसी प्रकारसे खादऔर किटाणुनाशकदवाइयोंको बेचनेके लिएभी सरकारकी तरफसे ऐसीकोई व्यवस्थाकी जाएक्योंकिकिसान कोऐसा लगताहै किउसे जोजानकारीमिलनी चाहिए,वह नहींमिल पातीहै औरउसी केअभाव मेंवह बहुत-साऐसा गलतकाम करजाता है,जिससे उसकीफसल कोनुकसानहोता है।
मैंउम्मीदकरता हूँकि हमनेजो सुझावदिये हैं,उस परकृषि मंत्रीजी विचारकरेंगेऔर आनेवाले समयमें किसप्रकारसे राहतपहुंचायीजाए, उसमेंसमय कोबचाना बहुतमहत्वपूर्णहै, समयको घटानामहत्वपूर्णहै ताकिकिसानोंको समयपर उसकाफायदा पहुंचसके।
श्री हुक्मदेव नारायण यादव (मधुबनी) : उपाध्यक्ष महोदय, किसान होने के नाते मैं इस बात से प्रारम्भ करूंगा कि "का दुख जाने दुखिया, का दुख जाने दुखिया माय, जाके पैर न फटी बिवाई, सो का जाने पीर पराई।" जो खेती करता है, खेत में पूंजी लगाता है, रात-दिन मेहनत करता है, धूप में तपता है, कीचड़ में सड़ता है और जाड़े में ठिठुरता है, उसी को एहसास होता है कि सूखा पड़ने से और बाढ़ में फसल बर्बाद होने से क्या सहना पड़ता है। सुखाड़ दो तरह से आत है, एक है अनावृष्टि और दूसरा है बाढ़ के उपरान्त आने वाला सुखाड़। मैं जिस एरिया से आता हूं, मिथिलांचल बिहार में बाढ़ भी आती है और बाढ़ जब चली जाती है तो उसके बाद सुखाड़ आ जाता है क्योंकि खेत में पानी रहता नहीं, सिंचाई के कोई स्रोत नहीं होते। इस तरह वह किसान दोनों तरह से मरता है। दूसरा सुखाड़ होता है अनावृष्टि के कारण, इसमें भी कुछ क्षेत्र ऐसा है जो बराबर सूखग्रस्त एरिया है और कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें चक्रानुसार सूखा होता है, तीन साल पर, पांच साल पर या दस साल पर सूखा आता है। इस बात को मैं इसलिए कह रहा हूं कि जब से हिन्दुस्तान आजाद हुआ है, इतने कृषि वैज्ञानिक हुए, मैं बराबर इस बात को उठाता रहा हूं कि इसका कोई इतिहास उन्होंने नहीं बनाया कि जो चक्रानुसार सुखाड़ होता है, वह कब-कब और किस-किस स्थिति में आता है क्योंकि इस पर उन लोगों ने चिन्तन नहीं किया। हमारे पुराने परम्परागत किसान थे, उस समय हमारे यहां लोक कवि थे - डाक कवि। डाक कवि की वाणी को ध्यान में रखती थी और किसान उसी के हिसाब से अपनी खेती करता था :
“सावन पछवा भादों पुरवा आसिन बहे इशान, कातिक कन्त सीस न डोले, कहां क राखब धान किसान।” मैथिली में लोग कहते थे कि सावन महीना में अगर पछवा हवा बहे, भादों महीने में पूरवा हवा बहे, आसिन में इसान की हवा बहे और कातिक में हवा बिल्कुल न चले जिससे सीस भी न डोले तो इसका मतलब है कि इतना धान पैदा होगा कि किसान का घर धान से भर जाएगा। दूसरी तरफ वह कहते थे :
“सावनमास जबबहै पुरवइया,बेचो बरदाकीनो गइया।” अर्थातअगर सावनमहीने मेंपुरवा हवाबहने लगेतो बैलबेच दो,गाय रखलो क्योंकितुम्हारीखेती होनेवाली नहीं है। वर्षा के बारे में वह कहते थे:
“सावन शुक्ल सप्तमी छिप के उगे भानु कहे डाक सुनु डाकिनी तावत मेघ बरसिहों, जब लगि देव उत्थान।” यह परम्परागत ज्ञान था, किसान अपने उस कम्प्यूटर के आधार पर खेती करता था। कृषि वैज्ञानिक हुए, आधुनिक तत्र आया, आधुनिक यत्र आया, लेकिन प्राचीन मत्र चला गया। अगर वह प्राचीन, परम्परागत मत्र रहता और आधिनुक यत्र एवं तत्र के साथ उसका समन्वय किया जाता तो मैं समझता हूं कि हिन्दुस्तान के किसान को कम कष्ट होता। लेकिन यह मान लिया गया कि गांव के किसान के पास कोई अक्ल नहीं है और किसान परिवार में से अगर प्रहलाद पटेल जी या मेरे जैसे कोई संयोग से अगर संसद में आ भी जाते हैं तो सामान्यतः आज के लोग हम लोगों को समझते हैं कि ये लोग किसान परिवार से आए हैं, धोती-कुर्ता-पैजामा वाले, साधारण चेहरे वाले ये लोग क्या जानते होंगे। हमें तो वैसे भी नादान समझा जाता है।
इसलिए मैं माननीय मंत्री जी से आग्रह करना चाहूंगा कि इस पर सोचें। मैं सदन से प्रार्थना करना चाहूंगा कि कांग्रेस पार्टी के लोग, ज्योतिरादित्य जी जो व्याख्यान दे रहे थे, क्या आज जो समस्या हिन्दुस्तान के किसान और कृषि की है, वह डेढ़ साल में पैदा हुई है? नरेन्द्र मोदी जी जब गद्दी पर बैठे थे तो क्या वह समस्याओं की गठरी लेकर बैठ गए थे? समस्या पैदा की किसी ने, बच्चा पैदा किया किसी ने, उसे भूखा रखा किसी ने और जब वह बीमार होकर मरने लगता है तो कहते हैं कि ऐसा बच्चा क्यों लाए। जिसने पैदा किया, वह बताए कि क्यों पैदा किया, भूखा क्यों रखा, बीमार क्यों बनाया। लगातार आज़ाद भारत में देश के किसानों की ऐसी हालत बनाकर रखी गई है। हमें इसके लिए तात्कालिक उपाय भी करने हैं और दीर्घकालिक उपाय भी करने होंगे। तात्कालिक उपायों में तो राहत के काम होते हैं, जो इस बार भी सुखाड़ के समय विपत्ति आई है तो आपदा प्रबंधन से भारत सरकार की तरफ से राहत में कोई कमी या त्रुटि नहीं रखी गई है। लेकिन मैं उस बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का हूं, जब हम बाढ़ से प्रभावित होते हैं और उस पीड़ा को झेलते हैं तो उस समय भारत सरकार का पूरा खज़ाना भी यदि बांट दिया जाए, तब भी बाढ़ पीड़ितों के बीच पूरा नहीं पड़ेगा, क्योंकि उसकी भी एक सीमा है। दीर्घकालीन उपाय किया जा सकता है, अगर सिंचाई का प्रबंध हो। प्रधान मंत्री सिंचाई योजना लागू की गई है, उस पर पूरी तरह से अमल हो।
तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नदियों को जोड़ने का काम शुरू किया था, लेकिन दस वर्षों तक उसमें कुछ नहीं हुआ। अगर ये नदियां जुड़ जातीं, सन् 1962 में डॉ. राम मनोहर लोहिया हमारे नेता थे, उस समय हम उनके नेतृत्व में आंदोलन चलाते थे - बाढ़-सुखाड़ स्थाई निदान तब हम नारा लगाते थे कि सभी नदियों को जोड़ा जाए, क्योंकि हिन्दुस्तान की सभी नदियों में एक समय बाढ़ नहीं आती है। कुछ नदियां नीचे रहती हैं तो कुछ ऊपर रहती हैं। अगर सभी नदियों को जोड़ दिया जाए तो पानी अपनी सतह को बराबर में रखना चाहता है, यह विज्ञान का नियम है इसलिए सब नदियों में जल स्तर बराबर हो जाएगा। इससे हम एक तरफ बाढ़ से भी बचेंगे और दूसरी तरफ सुखाड़ से भी बचेंगे। लेकिन इस वैज्ञानिक सिद्धांत को न मानते हुए, मैं जिस इलाके से हूं, बड़े-बड़े तटबंध बना दिए गए। उन तटबंधों के अन्दर ऊपर पहाड़ से मिट्टी आती गई भूक्षरण के कारण नदी का पेट ऊंचा हो गया तथा दोनों तरफ के खेत नीचे हो गए। इन तटबंधों ने जितनी हमारी समस्या का समाधान नहीं किया है, उससे अधिक कोसी, कमला, गंडक, तिलजुगा नदियों के इन तटबंधों ने नुकसान किया है।
आज़ाद भारत के समय पश्चिमी कोसी नहर बना दी गई। पश्चिमी कोसी नहर खोद दी गई, लेकिन उसमें जो छोटे-छोटे चैनल बनाने थे, वे नहीं बनाए। किसान की जमीन भी चली गई, नहर भी अधूरी पड़ी है। हमारे यहां पानी उत्तर से दक्षिण की ओर बहता है लेकिन सारी नहरें पूर्व से पश्चिम की ओर बना दी गई हैं। विपरीत दिशा में ये पानी को रोकती हैं, इसके कारण हमारे यहां बाढ़ की समस्या बढ़ती गई और सुखाड़ भी पड़ता है। अभी वहां सुखाड़ है। कोसी नहर में अगर पानी हो तो लोग सिंचाई करके खेत सींच सकते थे। इसलिए हमारी प्रार्थना है कि दीर्घकालीन उपाय किए जाएं।
सभी मृत नदियों की खुदाई कर दी जाए। जितने नदियों के डेड बेड हैं, उन्हें खुदाई करके फिर से चालू कीजिए, जिससे पानी भी आएगा और जल का बहाव भी होगा। हमारे देश में जितनी भी बरसाती नदियां हैं, उन सबमें गुजरात जैसे चेकडैम बना दीजिए। आखिर गुजरात में भी 20,000-25,000 चेकडैम बनाने का काम नरेन्द्र मोदी जी ने किया जब वहां के मुख्य मंत्री थे, उन्होंने किया था। अगर उसी तरह छोटी-छोटी नदियों में जगह-जगह चेकडैम, सुलिसगेट बना दिए जाते, पानी को रोक दिया जाता, भूजल का स्तर उससे ऊपर आता। फिर किसान अपने परिश्रम से पम्पिंग सेट और अन्य साधनों के जरिए अपने खेत की सिंचाई कर लेता। इससे जिन खेतों में सूखा पड़ता है, वहां 12 महीने हरियाली आती और किसान अपने पसीने और परिश्रम से तीन फसलों का उत्पादन कर सकता था। बारिश के समय जल संचयन हो। पानी को रोकने के लिए खेत का पानी खेत में और गांव का पानी गांव में रहे। यह जो हम नारा लगाते रहे, इस पर अमल नहीं किया गया।
प्रधान मंत्री सिंचाई योजना एक महत्वाकांक्षी योजना है। मैं समझता हूं कि मनरेगा या फूड सिक्योरिटी के नाम पर जो लूट है, भारत सरकार यह सारा पैसा बंद कर दे और सारा पैसा केवल प्रधान मंत्री सिंचाई योजना में लगा दे तो - हर खेत को पानी, हर हाथ को काम। एक साधे सब सधे और सब साधे जग जाए। इसलिए वह सारा पैसा इस एक योजना में लगा दीजिए। होता क्या है कि थोड़ा-थोड़ा पैसा कई योजनाओं में बांटा जाता है। जैसे मनरेगा है, मैं तो उसका सीधा अर्थ लगाता हूं, मनरेगा मतलब किसान मरेगा। फूड सिक्योरिटी, खाद्य सुरक्षा इसका मतलब है किसान की पूर्ण असुरक्षा।
तारिकसाहब आपकह रहेथे, मैंगांव सेआया हूं,किसान हूं।धान काटनेके लिएमजदूर नहीं,काट करखेत मेंरख दियातो उसकोझाड़नेके लिएमजदूर नहीं।किसान कहांतक करेगा?अपने बीवी-बच्चोंको मिलाकरचार-पांचआदमी वेहैं। जिनकेपास मशीनहै, वहतो करलेगा। आपनेजितनी योजनाएंचलायीं,आजाद भारतमें वेसभी योजनाएंकिसान विरोधीथीं। आपनेकिसान कानारा लगाया,लेकिन कामकिसी ओरका हुआ।किसान कोमारो, क्यों?इसलिए किकिसान मरेगातो उत्पादनकम होगा,अन्न काअभाव होगा,विदेश सेमंगाएंगेऔर बीचमें बंदरबांटकरके खाएंगे।“बाप-बेटादलाल औरबैल कादाम बारहआना।” यहकरके हिन्दुस्तानचलाएंगेऔर यहीतो चलातेचले गए।अगर देशमें किसानउत्पादनकरता तोअन्न कानिर्यातभी होता,जो हरितक्रांतिआयी थी,मैंने उसकोअपनी आंखोंसे देखाहै। हरितक्रांतिलाने मेंअगर कृषिवैज्ञानिकोंका योगदानहै तोउससे भीज्यादायोगदानलघु औरसीमांतकिसानोंका है।जिसने जुगाड़टेक्नोलॉजीसे, कुछआधुनिकविज्ञानऔर परम्परागतकृषि कोजोड़ करअपनी कृषिउपज कोबढ़ायाऔर हिन्दुस्तानको अनाजमें आत्मनिर्भरतामें पहुंचाया।पहुंचाएकिसान औरडुगडुगीबजाए कोईऔर? यहांबैठे बड़े-बड़ेअफसर हैं,मैं उनकेबारे मेंकुछ नहींकहना चाहताहूं। जिन्होंनेन अरहर,न मसूर,न तिलऔर नसोयाबीनदेखा है,यदि उनकेहाथ मेंभिंडी काबीज औरलौकी काबीज देदिया जाएऔर कहाजाए किखेत मेंरोप केबताओ तोसिर कोनीचे करेंगेया ऊपरपता नहीं।जैसे मनहोगा, वैसेलगाएंगे।जो बीजलगाना नहींजानते औरसदन मेंऐसे बहुतनेता हैंश्रीमान,जिनके आगेगाय खड़ीकर दीजाए तोउन्हेंपता नहींकि दूधआगे सेनिकलेगाया पीछेसे निकलेगा।अगर कालीगाय आजाए तोयह भीनहीं पताहै किभैंस हैया गायहै? कुछपता हीनहीं हैऔर किसानके दर्दकी बातबखानतेहैं। जिन्होंनेदेखा नहीं,वह दर्दकी बातबखानतेहैं।
इसलिएमैं मंत्रीजी सेआग्रह करूंगाकि अभीकिसान आयोगबनाने कीबात होरही हैमैंने पत्रभी लिखाहै किदो तरहके वैज्ञानिकहैं, एकहै कृषिवैज्ञानिकऔर दूसरेहैं कृषकवैज्ञानिक।आज देशमें आवश्यकताकृषक वैज्ञानिककी है,कृषि वैज्ञानिकहै जोलेब्रोटरीमें जातेहैं, रिसर्चकरते हैं,लेकिन उसकेआगे एक्सटेंशनका प्रोग्रामनहीं है।न प्रशिक्षणहै, नप्रसारहै, नप्रयोगहै। वहकभी किसानके पासनहीं जाताहै, वहअनुसंधानप्रयोगशालाओंमें बंदहै। बड़ी-बड़ीकिताब लिखतेहैं, विदेशोंमें जातेहैं, सेमिनारकरते हैं,पंच सिताराहोटल मेंबैठते हैं,चाय काफीपीते हैं,लंच-डिनरकरते हैं,एक मेंमोरंडमबनाते हैं,सरकार कोभेजते हैं।मैं कहताहूं वाहरे किसानपर सेमिनारकरने वाले,पंच सिताराहोटल मेंबैठने वाले,हम यहांपसीने सेतर-बतर हैंऔर तेरेसिर परएक बूंदपसीना नहींहै। ठंडी-गर्मीमें बैठकर कृषिकी समस्याका निदानकरते हो।इसीलिएकृषि आयोगमें कृषकवैज्ञानिकोंको रखाजाए जोजमीन कोजानता है,जो सतहको पहचानताहै।
मैंअपनी बातको समाप्तकरते हुएकहना चाहूंगाकि किसाननेता चौधरीचरण सिंहकी किताब Economic Nightmare of India – Its cause and cure आजभी भारतसरकार केकृषि मंत्रालयके जितनेअफसर हैं,इस किताबको पढ़ें,उसमें समस्याको देखें।समस्याका कारणऔर उसकानिदान ढूंढे।समस्याका कारणपता नहींऔर निदानढूंढ रहेहैं। एकटाइम परकिसान आयोगबना था।राम निवाममिर्धाजी उसकिसान आयोगके अध्यक्षबने थे।उस समयदीपेन्द्रहुड्डाजी केदादा जीबाबू रणवीरसिंह हुड्डाउसके सदस्यबने थे।किसान बनेगातो किसानके दर्दकी बातजानेगा।मैं अपनीबात समापतकरूंगाक्योंकिअन्य सदस्यभी बोलनाचाहते हैं।बिहार केमिथिलांचलसे आयाहूं, सबसेपीड़ितऔर प्रभावितक्षेत्रसे आयाहूं। बाढ़से भीमरता हूं,सुखाड़से भीमरता हूं।नेपाल कीसीमा परहूं। माआवादियोंका भीहम परहमला होताहै औरउसके साथ-साथहिन्दुस्तानके उग्रवादीऔर आतंकवादीतत्वोंका भीहम परहमला है।हम सबतरह कीचक्की मेंपिसते रहतेहैं, फिरभी हमदेश कीसेवा मेंलगे रहतेहैं। मैंकह सकताहूं किहिन्दुस्तानमें राष्ट्रके लिएपसीना बहानेवाला औरसीमा परअपने बेटेको भेजनेवाला जो अपना खून बहाता है, लाश गिराता है और सीमा की सुरक्षा करता है। जिस दिन किसान कमजोर होगा, उस दिन देश की सीमा कमजोर होगी, उस दिन देश की सुरक्षा भी कमजोर होगी। इसलिए यदि किसान मजबूत बनेगा, उसका बेटा मजबूत बनेगा, सीमा पर जाकर लड़ेगा तो दुश्मन के छक्के छुड़ायेगा। इसलिए अगर देश बचाना है तो किसान को पहले बचाना है। धन्यवाद।
श्री चामाकुरा मल्ला रेड्डी (मलकाजगिरी) :उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे 193 नियम के तहत ड्राउट पर बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। भारत देश में 70 प्रतिशत लोग खेती-बाड़ी पर जीते हैं। हमारी संसद में आधे से अधिक एम.पीज. एग्रीकल्चर फैमिलीज से आए हैं। किसान हमारे देश की बैकबोन है। हमारे देश का नारा ‘जय जवान, जय किसान’ है। लेकिन हमारे प्रधान मंत्री जी ने डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया का नारा दिया है। मैं समझता हूं कि उन्हें किसानों के लिए किसान इंडिया भी लाना चाहिए।
महोदय, हमारा तेलंगाना राज्य 18 महीने पहले सैपरेट हुआ, लेकिन 18 महीनों में दो हजार किसानों ने आत्महत्या कर ली। हमारे दस जिलों को मिलाकर नया तेलंगाना राज्य बना, लेकिन उसमें कोई भी नदी नहीं है। हमारे यहां पूरी खेती-बाड़ी पावर बोरवैल से ही चलती है। पिछले दो सालों से वहां सूखा पड़ा है और खरीब और रबी की दोनों फसलें बर्बाद हो गईं। करीब तीन महीने पहले थोड़ी बहुत काटन आई, लेकिन सीसीआई के पास स्टाफ नहीं है। दो-तीन साल पहले छः हजार रुपये में काटन जाता था, लेकिन लास्ट टाइम चार हजार रुपये में जाता है और उसमें भी गीला है, परसैन्टेज कम है आदि बातें बोलकर दलाल लोग पहले खरीदते थे। लेकिन इन लोगों के पास स्टाफ नहीं है, इस समस्या को लेकर हम मंत्री जी के पास गये। उसके बाद बाद से साढ़े तीन हजार या तीन हजार रुपये में लेकर सीसीआई को बेचते थे। हमारे तेलंगाना में हजार फीट का बोर डालने पर भी पानी नहीं आता है, वहां का पूरा पानी सूख चुका है। इसलिए मैं माननीय मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि हमारे यहां कोई नदी नहीं है। हमारे यहां पुरानी इतनी अच्छी प्रोजैक्ट है, जिसे नेशनलाइज करना है। यह आलरेडी आर्गेनाइजेशन बिल में है। सैंट्रल कमेटी हमारे तेलंगाना के जिलों में पूरे ड्राउट की रिपोर्ट लेकर आई। मैं समझता हूं कि उस रिपोर्ट के हिसाब से जल्दी से जल्दी किसानों को बचाना है। राज्य सरकार किसानों को कोई भरोसा नहीं दे पा रही है। सरकार ने इलैक्शन में जो कहा कि हम किसानों की ऋण माफी करेंगे, लेकिन वह एक बार में नहीं कर सके। वे इसे इंस्टालमैन्ट में कर रहे हैं और इंस्टालमैन्ट में करने से पूरा पैसा इंटरैस्ट में जा रहा है। वहां के लोग अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए, अपनी बेटियों की शादी के लिए बाहर से पांच या दस परसैंट इंटरैस्ट रेट पर पैसा ले रहे हैं और पैसा न चुकाने के कारण कर्जा बढ़ने पर वे लोग आत्महत्या कर रहे हैं।
महोदय, मैं समझता हूं कि भारत सरकार ने जैसा मुद्रा बैंक खोला है, जो छोटे-छोटे व्यापारियों को बिना इंटरैस्ट और बिना श्योरिटी का लोन देता है, वैसे ही हमें एक किसान बैंक पूरे देश में खोलना चाहिए और किसानों को बचाना चाहिए। उससे किसानों को बिना श्योरिटी और बिना इंटरैस्ट के लोन देना चाहिए। आज किसान जब अपना सामान बेचने के लिए जाता है तो उसे उसका सस्ता दाम मिलता है। जबकि पूरे देश में ड्राउट की वजह बहुत महंगाई हो रही है। इसलिए मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी को कहना चाहता हूं कि जल्दी से जल्दी हमारे तेलंगाना राज्य को ड्राफ्ट रिलीफ फंड भेजना चाहिए। हमारी राज्य सरकार ने देर से अपनी टीम को यहां भेजा है।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
*डॉ. किरिट पी. सोलंकी (अहमदाबाद) : आज देश में दोनों तरफ विरोधाभासी स्थिति है कि एक ओर देश के कई प्रदेशों में अतिवृष्टि एवं बाढ़ का कहर है, जिसके बारे में यही सदन ने अभी अभी चर्चा की है दूसरी तरफ देश के कई प्रदेशों में वर्षा की कमी के कारण भीषण सूखे की स्थिति पैदा हुई है ।
देश में कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात के कुछ प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार तथा अन्य प्रदेशों में सूखे से लोग, खासकर किसान परेशान है । किसानों की स्थिति खराब है उनकी पूरी फसल बर्बाद हो चुकी है । ऐसी विषम स्थिति की वजह से किसान मजबूर हैं, और देश के कई भागों में किसानों ने आत्महत्या भी की है । मेरा स्पष्ट मानना है कि सरकार को किसानों को मदद करने का ठोस निर्णय लेना चाहिए । जहां तक छोटे एवं सीमांत किसानों का सवाल है, उनकी स्थिति और भी खराब है । उनके पास जमीन नहीं है, मगर ज्यादातर ऐसे किसान खेत मजदूर के रूप में कार्य करते हैं । मेरा निवेदन है कि किसानों के ऋण में माफी देनी चाहिए तथा उनको क्रॉप इंशोरेंस पारित कराना चाहिए । मैं सरकार का अभिनंदन करता हूँ कि, पिछले साल सरकार ने इंसूरेंस में 50 फीसदी से घटा कर 33 फीसदी नुकसान में भी मुआवजा देने का निर्णय किया है ।
मैंछोटे -छोटेकिसान,खेतमजदूर केलिए उनकोस्पेशलपैकेज देनेके लिएसरकार सेनिवेदनकरता हूँ। हमेंयह भिनिश्चितकरना पड़ेगाकि एकभी किसानआत्महत्याकरने परमजबूर नहो । हमें ऐसेकिसानोंको चिन्हितकरके उनकोउस स्थितिसे बाहरलाने काप्रयासकरना चाहिए। सरकारने किसानोंकी जमीनका स्वायलकार्ड देनेका निर्णयकिया है,मैं उसकीसराहनाकरता हूँऔर उनको कृषि वैज्ञानिकोंद्वाराकृषि कीपैदावारके लिएसलाह देनाचाहिए ।
मेरीमांग हैकि किसानोंको अपनीउपज केसही दाममिलना चाहिए। मैंसरकार सेप्रार्थनाकरता हूंकि येनिर्णयशीघ्र हीलेकर उसकाक्रियान्वयनकरे ।
डॉ. अरुण कुमार (जहानाबाद) : उपाध्यक्ष महोदय, आपने नियम 193 के तहत इस गंभीर विषय पर चर्चा में मुझे भाग लेने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपके प्रति आभार व्यक्त करता हूं।
महोदय, निश्चित रूप से किसान इस देश की रीढ़ है। जैसाकि हुक्मदेव बाबू कह रहे थे कि किसान सिर्फ अन्न ही नहीं उपजाता है, बल्कि यहां की सांस्कृतिक विरासत की पहचान भी गांव से है, खेत-खलिहान से है और सुरक्षा का सवाल हो या जहां जोखिम लेने का सवाल हो, किसान और किसान परिवार इसमें अगली पंक्ति में रहता है। इसलिए मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूँ कि सुखाड़ की जो स्थिति देश में एक चक्र की तरह, कभी इस राज्य में, कभी उस राज्य में चलता रहता है, इसके लिए हमें दो तरह का प्रबंधन करना चाहिए। पहला तो हमें लॉन्ग टर्म प्लान करना चाहिए। शॉर्ट टर्म प्लानिंग तो होता रहता है, क्योंकि चक्र के हिसाब से हमेशा आज कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना, बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल, उड़ीसा आदि कई राज्य इससे बुरी तरह प्रभावित हैं। निश्चित तौर से हमें इस बात पर एक लॉन्ग टर्म प्लानिंग करनी चाहिए। एनडीए फर्स्ट में अटल बिहारी वाजपयी की सकार में नदियों को जोड़ने की बात उठी थी। निश्चित तौर से यह एक ऐसा कारक बन सकता है, जो किसानों को जीवन दे सकता है और सिर्फ किसानों को जीवन ही नहीं दे सकता है, बल्कि जो जल समस्या है, उसका भी हल कर सकता है। इस देश में सुखाड़ के साथ-साथ, जल समस्या भी आज बृहत्तर रूप लेता जा रहा है। हमें पानी को रोकने के लिए भी, भूगर्भीय पानी को बढ़ाने के लिए भी एक कोई लंबी योजना बनानी चाहिए, दीर्घकालिक योजना बनानी चाहिए, ताकि खेतों में पानी जाए। हमारे पूर्वज, जो पहले से तालाब था, जो कुंआ था, ये सारी जो पारंपरिक व्यवस्था थीं, जहां जल संरक्षण की पूर्ण व्यवस्था थी। पारंपरिक तौर पर आज ताल, तलैया और कुएं, ये सब बंद हो रहे हैं, भरे जा रहे हैं। हम चेक डैम की चर्चा कर रहे थे, चेक डैम के माध्यम से भी और विभिन्न नई टैक्नोलॉजी के माध्यम से भी हम किसानों की मदद कर सकते हैं। लेकिन परंपरागत तरीके से भी हमारे किसान बड़े वैज्ञानिक थे, हमारे पूर्वज़ बड़े वैज्ञानिक थे और इन चीजों का प्रबंधन किया था। धीरे-धीरे हम लोगों ने नष्ट किया है। एक बात हम सरकार के ध्यान में लाना चाहेंगे, जिसकी चर्चा कई माननीय सदस्यों ने की है, कि किसानी एक समस्या बनती जा रही है। इसके कई कारण हैं। जिसमें मनरेगा की चर्चा हुक्मदेव बाबू ने की है। निश्चित तौर पर वोट के लिए ऐसी योजना का निर्माण करते हैं, जिसमें क्रप्शन इनबिल्ट हो और काम करने का स्कोप कम हो। निश्चित तौर से खेत खलिहान में आज जिस तरह का वातावरण बना है, एक अराजक स्थिति बनी है। इसमें मज़दूरों को भी फायदा नहीं हो रहा है। यदि हम कोई ऐसा काम करें, जिससे गांवों में खेती का प्रबंधन हो तो किसान और मज़दूर, दोनों इससे लाभान्वित होंगे। किसानों के एक बड़े नेता, उनका जन्म तो उत्तर प्रदेश में हुआ था, लेकिन बिहार में उनकी कर्मभूमि रही थी - स्वामी सहजानंद सरस्वती का एक नारा था कि जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा, सो कानून बनाएगा, भारतवर्ष उसी का है, शासन वहीं चलाएगा। लेकिन 60 वर्षों के इतिहास में उल्टा हुआ है। हमने अपने छात्र जीवन में खेत-खलिहान को बहुत नज़दीक से देखा है कि पहले हर किसान के घर में दो-चार कमरे ऐसे जरूर होते थे, जहां पर अनाज का भण्डारण होता था। लेकिन आज एक प्रवृत्ति बन गई है कि किसानी महंगी हो गई है, वह जल्दी से जल्दी कर्ज से उबरना चाहता है। हम लोगों के यहां जो खाद गोबर से तैयार होता था और जिस तरह से खेतों में बिछाया जाता था, फैक्ट्री के खाद की बहुत कम आवश्यकता पड़ती थी। बीज़ पर तो कोई पैसा लगता ही नहीं था। चाहे वह धान हो या मक्का हो, सब कुछ पारंपरिक तरीके से राख में बंद कर के, आइसोलेट कर के रखा जाता था और उस पर कोई पैसा खर्च नहीं होता था।
आज यह स्थिति है कि हाईब्रिड के नाम पर बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ आई हैं। जब हम बीज लगाते हैं तो वह कभी-कभी उगता ही नहीं है, उग भी गया तो असमय उसमें फूल आ गया, फल नहीं आया तो इस तरह की तमाम समस्याएं आज सामने आ रही हैं। उत्तर बिहार में जो भागलपुर का इलाका है, नौगछिया का इलाका है, बड़ी मात्रा में केले की खेती वहाँ होती है, वहाँ ऐसा बीज हाईब्रिड के नाम पर गया है कि अभी वह केला छोटा-छोटा ही है, लेकिन वह केला पेड़ पर ही पक गया है, तो वहाँ पूरी बर्बादी हुई है। इस तरीके से वहाँ किसान तबाह है, कई और तरीके से भी वह तबाह है।
आज स्वाइल हेल्थ कार्ड की बात चल रही है। कृषि विज्ञान केन्द्र में यह काम भी चल रहा है। कृषि विज्ञान केन्द्र पूरी तरह से सक्षम नहीं है, राज्य सरकारों को भी यह जिम्मेदारी लेनी चाहिए कि स्वाइल टेस्टिंग का सही तरीका अख्तियार हो।
महोदय, मैं एक बात शार्ट में कहना चाहूँगा कि अभी वैज्ञानिक कृषि के नाम पर जिस तरीके से हार्वेस्टर का प्रयोग हो रहा है, ये फसल निकाल लेते हैं और डाँट वहीं रह जाता है, फिर उसमें आग लगा दी जाती है। आग लगाने से हमारी मिट्टी 6 इंच तक बर्बाद हो जाती है और उसकी उर्वरा शक्ति समाप्त हो जाती है। इन सारी चीजों पर हमें ध्यान देना चाहिए। कृषि से संबंधित मिट्टी को ऊर्जान्वित करने वाले जो सकारात्मक जीव-जन्तु हैं, आग लगाने से वे भी उसमें मर जाते हैं। हमारे यहाँ जो पिछले साल में कृषि के क्षेत्र में अराजकता हुई है और हमने हरित क्रांति के नाम पर जिस तरीके से किसानी को बर्बाद किया है, महँगा बनाया है और हमने उसे दूसरे पर आश्रित करने का जो काम किया है, उससे मुक्त करने का भी काम होना चाहिए। किसानों के हाथ में भण्डारण, किसानों के आधार पर वैज्ञानिक प्रयोग जो हुए हैं, वह उनके हाथ में जाना चाहिए। बाजार के हाथ में जो कृषि जा रही है, इसके कारण निश्चित तौर से किसान शोषण का एक बड़ा केन्द्र बना है।
मैं आपके माध्यम से सरकार से अनुरोध करना चाहूँगा कि इस पर जो कृषि आयोग बनता है, उसमें किसानों का भी मत लेकर, उनके प्रतिनिधियों को भी लेकर, कृषि लाभकारी हो, इस पर गहन चिंतन करने की आवश्यकता है। इन्हीं शब्दों के साथ आपके प्रति आभार व्यक्त करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूँ।
*श्री कपिल मोरेश्वर पाटील (भिवंडी) : सूखा एक ऐसी सामाजिक और आर्थिक व्याधि है जिसके परिणामस्वरूप कई किसान और कृषक श्रमिक आत्महत्या कर रहे हैं। सूखा मात्र कृषि अर्थव्यवस्था को ही प्रभावित नहीं करता, अपितु इसका असर उद्योग, वाणिज्य निर्यात इत्यादि सहित शेयर बाजार तक पर पड़ता है। यह बहुत ही चिंता का विषय है कि देश में प्रतिवर्ष भू-जल स्तर गिरता जा रहा है, जिसके कारण किसान को अपने कुओं को और अधिक गहरा कराने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। हाल के इतिहास में वर्तमान सूखा भारत का सबसे बड़ा सूखा है। पूरा देश के लगभग 302 जिल सूखे की मार झेल रहे हैं। मैंमहाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता हूं। वहां पर किसान सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।
देश में सूखे और चक्रवात जैसी आपदा से निपटने के लिए एक स्थायी पद्धति होनी चाहिए। वर्तमान में केवल 40 प्रतिशत लघु और सीमांत किसान ही बैंक से लोन ल पाते हैं। जिन क्षेत्रों में किसानों की गलती के बिना मौसम की मार से फसलें नष्ट होती हैं और वहां फसल बीमा उपलब्ध नहीं है, वहां के किसानों के ऋणों को तत्काल माफ करने क लिए बैंकों को सकारात्मक भूमिका पर विचार करना चाहिए।
गत वर्ष देश में 20 प्रतिशत बारीश कम हुई, जिसके कारण गेहूं की फसल 28 प्रतिशत होने से देश के किसानों की आमदनी कम हुई और वह आज बहुत परेशान है। देश में वर्षा का पानी बर्बाद न हो इसके लिए योजना होनी चाहिए। चैक डैम्स बनाने होंगे, ताकी पानी की उपलब्धि तो बनी रहे। फसल बीमा स्कीम में इंश्योरेंश बहुत कम है, उसे बढ़ाने के लिए उपचारात्मक कदम उठाये जाने चाहिए। हमें किसानों को राष्ट्रीय बैंकों से कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराने की सुविधा प्रदान करने की जरूरत है। इसके अलावा राष्ट्रीयकृत बैंकों की किसानों से ऋण वसूली की प्रक्रिया भी किसानों के संबंध में जो कानून बनाये हुए हैं उनमें वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार बदलाव करने चाहिए। इसके लिए आवश्यक संशोधन किये जाने चाहिए। जैसा कि मनरेगा देश का एक कार्यक्रम है जिसके तहत इस्टिमेट रेशो के आधार देश के 40 टक्का कुशल मजदूरों को और 60 टक्का अकुशल मजदूरों को 100 दिन का रोजगार मिलता है और रोजगार नहीं मिलने पर उन्हें भत्ता दिया जाता है। देश के किसान और मजदूर 365 दिन अपने खेती में रोजगार देते हैं। मेरा अनुरोध है कि मनरेगा के अंतर्गत जो मजदूर किसान के खेत में काम करता है, उनको 100 दिन की मजदूरी किसानों के खेत में काम करने वाले मजदूरों को दिये जाने का प्रावधान किया जाना चाहिए।
देश में मुफ्त बिजली देने से किसानों का मनोबल बढ़ेगा। तालाबों और झीलों की गाद हटाने का कार्य लगातार किया जाना चाहिए। मेरी केन्द्र सरकार से प्रार्थना है कि सूखे से निपटने के लिए सभी गंभीर प्रयास करने चाहिए। हस्तक्षेप कर राज्य सरकारों को कुशलता और समयबद्ध तरीके से किसानों को दी जाने वाली सुविधा हेतु धनराशि का उपयोग करने का निर्देश देने हेतु आवश्यक कदम उठाने की कृपा करें।
श्री राजेश रंजन (मधेपुरा) : महोदय, मैं आपको शुभकामना देता हूँ।
महोदय, हुक्मदेव बाबू अभी कह रहे थे, अभी वे सदन में उपस्थित नहीं हैं, लेकिन मैं उनको कहना चाहूँगा कि विज्ञान जहाँ समाप्त होता है, वहीं से अध्यात्म की शुरूआत होती है। यह बात वह नहीं भूलें। उन्होंने कुछ पुरानी बातें छेड़ीं। मैं सिर्फ कुछ बात कहूँगा। इतिहास पढ़ने वाला और इतिहास बोलने वाला इतिहासकार नहीं होता है, कर देने वाला इतिहासकार होता है। आपको करने के लिए भेजा है, आप इतिहासकार बन जाइए। आपको कौन कहता है कि आप मत बनिए, जो नहीं बना, वह तो गाली सुन रहा है और जो है, आप उसको करिए। पीछे गाली देने से कोई फायदा नहीं है। आप इतिहासपुरूष बनिए। पूरे देश ने आपको इतिहासपुरूष बनने का मौका दिया है, आप बनिए। हम तो चाहते हैं कि आप इतिहासपुरूष बनें, लेकिन आप लोग बनने नहीं देना चाहते हैं। नरेन्द्र मोदी जी कहते हैं किसान, कुछ लोग कहते हैं जीडीपी। नरेन्द्र मोदी जी कहते हैं यूथ, कुछ लोग कहते हैं शेयर मार्केट। द्वंद में और दुविधा में जीने की आदत आपकी रहेगी तो आप इतिहासपुरूष नहीं बन सकते हैं। आप इस बात को मानकर चलिए। दुविधा और द्वंद से आपको निकलना पड़ेगा। जो जिद और जुनून है और जिस भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पुस्तक को पढ़कर आप आए हैं, हम सिर्फ इतना कहना चाहेंगे कि समय, काल, पात्र इन तीनों का चयन हर युग में हुआ है। शिव के काल में भी हुआ है, कृष्ण के काल में भी हुआ है, राम के काल में भी हुआ है, बुद्ध के काल में भी, सब कालों में इन तीनों का चयन हुआ है और आज भी है। वे हमारे बुजुर्ग थे, वे कह रहे थे, मैं तो कहूँगा कि यह कृषि प्रधान देश नहीं है, यह तो पूँजीपति, दलाल, भ्रष्ट नेता, भ्रष्ट पदाधिकारी प्रधान देश हो गया है। कृषि प्रधान का तो कोई मीनिंग ही नहीं है। राजस्थान मैं जैसे कहते हैं सारे शहर में हल्ला हो गया, लल्ला के घर में बल्ला हो गया, पगड़िया नाचने चल देती है, हम पोलिटीशियन का हाल भी वही है। हल्ला होता है और हम लोग नाचते हैं, कभी तमिलनाडु के सवाल पर, कभी कोसी के सवाल पर। ...(व्यवधान)
एक माननीय सदस्य :वह राजस्थान में नहीं है, बिहार में होता होगा। ...(व्यवधान)
श्री राजेश रंजन: वही बात मैं कह रहा हूँ। मैंने राजस्थान के संदर्भ में अच्छी बात कही, मैंने गलत बात नहीं कही। मैंने कहा कि राजस्थान में एक मुहावरा है कि जब किसी के घर में बच्चे होते हैं तो नाचने जाते हैं, तो वह हमारी एक संस्कृति है। मैंने उस रूप में कहा है। अब मैं सिर्फ यह कह सकता हूँ कि हम नए युग में प्रवेश कर चुके हैं। मान्यवर, मैंने कहा कि समय, काल और पात्र की बात है। जब हम एलिगोसिन और मायोसिन युग में आए और फिर पायलियोसिन युग के अंतिम युग में आए तो मानव के पूर्वज आए। एक लाख वर्ष पहले मानव का जन्म हुआ लेकिन जिस बहस पर हम हैं, लगता है कि 1 लाख वर्ष के बाद मानव की सभ्यता शायद अब नहीं रहेगी। हम कुछ बात कहना चाहेंगे, हम किसी भाषण में नहीं जाएँगे। मानव की ज़रूरतों की सूची में सबसे पहले भोजन और पानी लिखा हुआ है। मैं तो कहूँगा कि अब किसान इस देश में नहीं है, जो लिखा हुआ है, वह मैं बता रहा हूँ। बटाईदारी करने वाले लोगों की संख्या बढ़ गई और किसान शायद निम्नमात्र बच गए। दो बीघा, डेढ़ बीघा, एक बीघा कट्ठे में ज़मीन है लोगों के पास। हम बहुत बड़े ज़मींदार थे, हमारी 9000 बीघा जमीन थी और हमारी 100 बीघा जमीन अब नहीं है, 70 बीघा पर हम पहुँच चुके हैं। हमारे गाँव में 90 नहीं, 96 प्रतिशत लोगों के पास डेढ़ बीघा, एक बीघा कट्ठे में ज़मीन है और वह किसान नहीं हो सकता।
महोदय, हमारे एक पूर्वज ने जो बात कही, उसको हम उद्धृत करना चाहेंगे। विश्वप्रसिद्ध विद्वान प्रो. अश्विनी शर्मा ने कहा है कि अगर पूरी दुनिया का अनाज इकट्ठा करके एक ढेर बनाया जाए और दुनिया के सभी 739 करोड़ मानवों को खिलाया जाए तो 90 करोड़ लोग आज भी भूखे रह जाएँगे। यह स्थिति तब है जब सिर्फ हम नहीं, विश्व के विकसित देश तक कई दशकों तक एड़ी से चोटी तक का दम लगाकर अपनी कृषि को पनपाने में लगे हैं। यानी हम पृथ्वीवासी अभी पर्याप्त भोजन को लेकर ही निश्चिंत और आश्वस्त नहीं हैं। लिहाज़ा यह सोचकर चलना बड़ी गलतफहमी होगी कि अनाज की बड़ी कमी पड़ी तो विदेश से हम मंगा लेंगे। बात सिर्फ अनाज तक ही नहीं है, तिलहन और दलहन की भारी कमी से आज सिर्फ हम ही नहीं, दूसरे देश भी जूझ रहे हैं। इसका अंदाज़ा हमें दालों के अंतर्राष्ट्रीय दाम देखकर लगाना चाहिए कि हम अब दूसरे देशों से अनाज मंगाने के लायक नहीं हैं।, अभी लेटेस्ट जो कहा गया, मैं उस पर आपको बताना चाह रहा था।
महोदय, मैं कुछ सुझाव दूँगा और सरकार से आग्रह करूँगा कि किसानों की चर्चा लगातार 67 सालों से और उसके पहले भी होती रही। चौधरी चरण सिंह साहब, सहजानन्द सरस्वती जी, लालबहादुर शास्त्री जी, सरदार पटेल तथा बहुत से साहित्यकार और आध्यात्मिक गुरुओं ने किसानों की बड़ी चर्चाएँ कीं, लेकिन आज भी हम 67 साल बाद किसानों के सवाल पर, सुखाड़ पर चर्चा कर रहे हैं। इसमें मेरा महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या कृषि को इस देश में उद्योग का दर्जा दिया जा सकता है? क्या पूरा सदन इस मामले पर एक राय हो सकता है? जैसे आप देखें कि हम गाँवों में सीलिंग लगाते हैं लेकिन बाज़ारों में वैल्थ पर कोई सीलिंग नहीं है। जब आप गाँवों में 18 बीघा से ज्यादा ज़मीन रखने का अधिकार किसानों को नहीं दे सकते हैं तो बाज़ारों में अरबों खरबों की संपत्ति रखने का अधिकार आप कैसे दे सकते हैं? आप कृषि को उद्योग का दर्जा नहीं देते। आप उद्योग लगाने के लिए तो ज़मीन देते हैं, रियायत देते हैं, लेकिन किसान को किसी भी तरह से रियायती दर पर ज़मीन देने के लिए आप तैयार नहीं हैं।
महोदय, प्लानिंग कमीशन के बारे में मेरे कुछ सुझाव हैं। आपने प्लानिंग कमीशन खत्म कर दिया और नीति आयोग बनाया। प्लानिंग कमीशन का मतलब दुनिया में क्या था? प्लानिंग कमीशन का मतलब यह था कि भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संरचना के आधार पर प्लानिंग की व्यवस्था हो। मिथिला का क्या कल्चर है, छत्तीसगढ़ क्या चाहता है, स्विट्ज़रलैंड में -45 डिग्री तापमान में किसान कैसे रहना चाहते हैं। स्विटजरलैंड की प्लानिंग को मोंटेक सिंह अहलूवालिया की तरह यदि सभी लोग करना चाहेंगे...(व्यवधान) उपाध्यक्ष महोदय, मैं बिन्दुवार आग्रह करना चाहता हूं, उस पर मैं आना चाहता हूं। प्लानिंग कमीशन या नीति आयोग आपने बनाया है, आपको कोई न कोई प्लानिंग नीति आयोग के तहत सामाजिक सन्दर्भ और भौगोलिक दृष्टिकोण के अनुसार बनानी चाहिए। मैंने पहले भी कहा कि समय, काल, पात्र का ध्यान रखना पड़ेगा। उसमें आप भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक दृष्टिकोण को कहां पर किस तरह क्या हो रहा है, इसका ख्याल रखते हुए आपको कृषि की नीति बनानी पड़ेगी।
दूसरी बात, कोऑपरेटिव सिस्टम से खेती करने का मेरा आपसे आग्रह है। एक प्रोडय़ूसर कोऑपरेटिव है, दूसरा कंज्यूमर कोऑपरेटिव है। यदि आप कोऑपरेटिव सिस्टम को लागू करेंगे तो आप देखियेगा कि बड़े और छोटे किसान, जब सब को आप एक साथ लेकर के चलना चाहेंगे तो निश्चित रूप से किसान की जो बुरी स्थिति है, माली स्थिति है, वह डैवलप करेगी, वह आगे बढ़ेगा। इसीलिए हम चाहते हैं, प्रोडय़ूसर कोऑपरेटिव और कंज्यूमर कोऑपरेटिव को कैसे आप सिस्टम से आप आगे करें।
दूसरा, फसल इंश्योरेंस के बारे में मेरा आपसे आग्रह है, क्योंकि किसान किसी भी परिस्थिति में दोषी नहीं होता है, या तो प्रकृति को हम छेड़ते हैं या प्रकृति और परमात्मा दोनों को छेड़ने वाले हम लोग हैं तो जब हम लोग प्रकृति को छेड़ेंगे, अभी हमारे हुक्मदेव बाबू कह रहे थे तो इसका दोषी कौन है। इसके दोषी हम हैं। हम प्रकृति का नाश करते जा रहे हैं और परमात्मा को अपने तरीके से सजाए जा रहे हैं। समय और पात्र के अनुसार तो दुनिया बदलेगी। मैंने आपसे पहले भी कहा था, मैं आपको एक बहुत महत्वपूर्ण बात बताना चाहूंगा, एक आध्यात्मिक गुरू ने सुनेजिक युग 65 हजार, 164 लाख वर्ष पूर्व पौधेकृटसिन युग और मोसायइत युग 146 65 लाख वर्ष पूर्व नहीं पाया जाता था। उसमें उन्होंने दिया है, स्पष्ट कहा है कि ये जो क्रिटिसियम युग और पलायसिन, मायोसिन ...(व्यवधान) उपाध्यक्ष महोदय, मैं इसको थोड़ा सा कहना चाहता हूं, इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप कुछ लोगों का कहना है कि पूर्वी गोलार्थ और उत्तरी ध्रुव उत्तर से दक्षिण की ओर और पश्चिमी गोलार्थ दक्षिण से उत्तर की तरफ सरक रहा है। उनका सापेक्षिक अन्तर अपरिवर्तित रहेगा, अतः हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए। हमें ध्रुवीय परिवर्तन के परिणाम के कारण पर्यावरण और पारिस्थितिकीय संरचना में परिवर्तन के लिए तैयार रहना होगा। इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप पृथ्वी की चुम्बकीय संरचना में भी बदलाव आएगा। इसका परिणाम सौर मंडल के अन्य ग्रहों-उपग्रहों पर भी पड़ेगा। इन सारी वैज्ञानिक चीजों पर आप किस नीति के तहत आगे बढ़ना चाहते हैं।...(व्यवधान)
इसमें मैं दो मिनट में लास्ट करना चाहता हूं। यह बहुत ही महत्वपूर्ण था, इसलिए मैं इसे कहकर अपनी बात खत्म करूंगा। मेरा सिर्फ सुझाव था, इसमें मैं आपको कहना चाहूंगा कि जैसे 10 किलोमीटर दूर, आप जानते हैं को ओजोन की क्या स्थिति है। उसमें आपको क्या करना चाहिए, हमारे भारत को वैज्ञानिक स्तर पर, सामाजिक या जो बराबर ग्लोबल वार्मिंग की बात हो रही है या प्रदूषण से बचने की बात हो रही है, उस पर क्या करना चाहिए, ताकि आप इस व्यवस्था को लागू कर सकें। मेरी दूसरी चीज़ आपसे है कि कारखानों से...(व्यवधान) निकलने वाली रासायनिक खाद क्लोरीन, ब्रोमीन आदि हैं, दूषित समस्या का निवारण और अर्थव्यवस्था को कैसे आप सुदृढ़ कीजिएगा, खेती की आर्थिक व्यवस्था के लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण है।
पानी एक बहुमूल्य प्राकृतिक सम्पदा है। आज जघन्य समस्या से हम गुजर रहे हैं, पानी के अभाव से त्रस्त हैं। इसमें मेरा कहना है कि भारत की सभी नदियों के बारे में सभी लोग बोलते हैं। यह सही है कि वर्षा और बाढ़ के पानी का कैसे संरक्षण और संग्रह किया जाये, तमिलनाडू में जिस तरह किया गया था। एक कमिश्नर ने जैसे बहुत वृहत रूप से किया तो बाढ़ और वर्षा के पानी के लिए आपके पास क्या नीति है और भारत की सभी नदियों को जोड़ने वाली क्या नीति है। हाइड्रोलॉजिस्ट्स के अनुसार 40 प्रतिशत पानी कारखानों में जाता है और केवल 10 प्रतिशत पानी ही पेयजल के उपयोग में है। मैं आपसे आग्रह करना चाहूंगा, सभी नदियों के बारे में यह परामर्श 1977 में हुए, उस समय 30 नदियों को जोड़ने की योजना बनाई गई थी और अटल बिहारी वाजपेयी जी सच में इस देश के पारखी थे, जिन्होंने इसे समझा। उससे पूर्व के प्रधानमंत्री भी पारखी थे और अटल बिहारी वाजपेयी जी आये तो एक पारखी दृष्टि से उन्होंने अपने वैज्ञानिकों को समझा। मेरा उसमें यही कहना है कि वर्षा के पानी को एकत्र कर बोरवैल और चलते पानी को रोका जाये। ...(व्यवधान)
15.00 hours उपाध्यक्ष महोदय, मैं अपनी बात समाप्त कर रहा हूं। मेरा सिर्फ आपसे एक आग्रह है। मैं बहुत ही विनम्रता के साथ आपसे कहना चाहूंगा। बिहार के बारे में बात कह कर मैं अपनी बात समाप्त कर देता हूं।
माननीय कृषि मंत्री जी बिहार से आते हैं। बिहार के बारे में उन्हें पता है कि हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा नदियां बिहार में हैं। जैसे कमला, महानंदा, गंडक, कोसी आदि नदियां हैं। आप कैसे उन्हें एक तरफ से जोड़ेंगे?
महोदय, बिहार के दो भाग हैं। एक भाग बाढ़ से प्रभावित है और दूसरा भाग सुखाड़ से प्रभावित है। बाढ़ के पानी को सुखाड़ वाले भागों तक कैसे पहुंचाएंगे? आज की स्थिति के बारे में आप जानते हैं। मेरा सिर्फ इतना कहना है कि आप बिहार को विशेष पैकेज के तहत किस रूप में लेंगे?...(व्यवधान)
*श्रीमती रीती पाठक (सीधी) : सूखा इस देश की समस्याओं में एक बहुत बड़ी समस्या है जिससे देश का किसान व कृषि सीधे प्रभावित होता है। हम जानते हैं कि सूखा अवर्षा के कारण ही होता है। विगत वर्षों में हम महसूस भी कर रहे हैं कि देश के विभिन्न हिस्सों में अपेक्षा से बहुत कम वर्षा हो रही है। फलतः भयावहः सूखे की स्थिति निर्मित हुई है। विशेषतया मैं मध्य प्रदेश राज्य के जिस हिस्से से आती हूं वह क्षेत्र कुछ तो मैदानी पर अधिकांशतः पहाड़ी क्षेत्र है। फलतः यदि वर्षा पर्याप्त मात्रा में नहीं हो तो शीघ्र ही पूर्ण सूखा की स्थिति निर्मित हो जाती है और कृषि आजीविका आधारित बहुसंख्यक किसान भूखा रहने की स्थिति में आ जाता है।
इस वर्ष तो सूखा के कारण हमारे सभी किसान भाई हमारे अन्नदाता खेतों में बोये गये बीज तक का मूल्य पाने की स्थिति में नहीं रहा और उसका दिन-रात चिन्ता में बीत रहा है। यद्यपि हमारे प्रदेश के आदरणीय मुख्य मंत्री जी यथासंभव व यथाशीघ्र किसान भाइयों को सूखा राहत की राशि प्रदान कर रहे हैं किंतु शायद किसान को उसकी रीढ़ हड्डियों पर खड़ा करने के लिए और भी सहयोग व मदद की आवश्यकता है जिस हेतु मैं मा. प्रधान मंत्री, भारत सरकार से भी आग्रह करती हूं।
हम सब जिस वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं, वह वैज्ञानिक तकनीकी की वृद्धि से बड़ा ही समृद्ध है। किंतु क्या हम अवर्षा की स्थिति से निपटने के लिए कोई ऐसी विशेष तकनीक हमारे वैज्ञानिक निर्मित कर पाने की दिशा में बढ़ पा रहे हैं और विश्व के किसी भी देश के वैज्ञानिक इस दिशा में काम कर पा रहे हैं कि पूर्ण अवर्षा की स्थिति को हम वर्षा की स्थिति में तबदील कर पाये। साथ ही भारत के वैदिक ग्रंथों में जो ऋषियों की मनीखा है उनके द्वारा अन्वेषण से प्राप्त ज्ञान कहता हैः-
त्यज्ञात भवति पर्जन्यः पर्जन्यात् अन्न सम्भवः अर्थात यज्ञ से वर्षा होती है और वर्षा से अन्न की उत्पत्ति। अतः इस दिशा में भी शोध की आवश्यकता है कि वे कौन से यज्ञ हैं या पर्जन्य अनुष्ठान हैं और उनकी क्या विधि है जिससे वर्षा होती है और यह धरती और यहां का किसान पर्याप्त वर्षा प्राप्त कर इसे हरा-भरा कर पाये।
मुझे एक विषय और भी ध्यान में आता है कि हम वर्षा से जितना जल धरती पर पाते भी हैं उसे संग्रहित करने में भी असफल रहे हैं और वर्षों से मिलने वाला जल भी नालों व नदियों में बहता हुआ अनन्त समुद्र में विसर्जित हो गया और किसी काम का नहीं हुआ। फलतः पानी को संग्रहित करने की दिशा में भी हम यदि ठीक प्रभावी व स्थायी पहल कर पायें तो परिणाम बड़े हितकारी हो सकते हैं।
*श्री राहुल कस्वां (चुरू) : इस बार मानसून सामान्य के मुकाबले में काफी कम रहा है, बारिश में 20 फीसदी से 50 फीसदी तक रिकार्ड कमी है। सितम्बर माह देश के अधिकांश हिस्सों में सूखा रहा, जिससे खरीफ की फसल तो प्राय खत्म हो गई, रबी की फसल की बुवाई भी नहीं हो पाई है। राजस्थान में तो और भी विकट स्थिति है। मेरे संसदीय क्षेत्र चूरू में चालू वर्ष में चनों की बुवाई नहीं हुई है, यही हालात गेंहू और सरसों की बुवाई का है। कई क्षेत्रों में मानसून पिछले तीन चार सालों से किसानों का साथ नहीं दे रहा है। देश के सामने यह चुनौती लगभग स्थायी रूप लेती जा रही है कि मानसून के कम होने की स्थिति में किसानों की जान माल की रक्षा कैसे की जाए। आज मानसून का समय पर न आना, सूखा, अकाल व बाढ़ जैसी आपदाएं अर्थव्यवस्था को तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ती। कमजोर मानसून और मंहगाई का नाता पुराना है। वर्षा कम होने पर कीमतें और बढ़ने के हालात बन गए हैं। इसको नियंत्रित करना आवश्यक हैं। कृषि उत्पादन गिरने से सीधा असर बैंकिंग व्यवस्था पर पडेगा, बैंकों को कर्ज वसूली में दिक्कत आएगी, कृषि क्षेत्र में ऋण वसूली प्रभावित होगी। बैंक किसानों से ऋण वसूली के लिए मजबूर करेंगे। सरकार को किसानों को राहत प्रदान करनी चाहिए ताकि उनके हितों की रक्षा हो सके। भारत में प्रतिवर्ष लगभग 21 मीलियन टन गेंहू भंडारण की समुचित व्यवस्था के अभाव में नष्ट हो जाता है, जो आस्ट्रेलिया में प्रतिवर्ष पैदा होने वाले गेंहू के बराबर है। सूखे की आहट के बीच जरूरी है कि देश में भंडारण की सुविधा बढ़ाई जाये। हर दाने की हिफाजत हो। कृषि बीमा योजना में भी किसानों के साथ छलावा किया जा रहा है। बीमा प्रीमियम राशि काफी बढोत्तरी करने के पश्चात भी किसान को इंश्योरेंस का पूरा पैसा नहीं मिल रहा है। मेरा सरकार से अनुरोध है कि ऐसी व्यवस्था की जाये ताकि किसान को हुए नुकसान की पूरी भरपाई की जा सके। राजस्थान वर्षों से कमजोर मानसून की पीड़ा से जूझ रहा है। राजस्थान के लिए इंदिरा गांधी नहर परियोजना को पूर्ण करना उसको उनके हिस्से का पूरा पानी मिलना अत्यंत आवश्यक है।
पंजाब हरियाणा एवं राजस्थान के मध्य 31.12.1981 को हुए समझौते में राजस्थान को रावी व्यास के आध्यिक्य जल में से 8.60 एम.ए.एफ. जल आबंटित किया गया था, जिसमें से 8 एम.ए.एफ. जल ही मिल रहा है। इंदिरा गांधी नहर प्रणाली के तीव्र विकास के कारण राजस्थान पिछले कई वर्षों से अपने सम्पूर्ण हिस्से के जल का उपयोग करने की स्थिति में है, फिर भी राजस्थान के हिस्से का शेष जल .60 एम.ए.एफ. नहीं मिल रहा है। पंजाब द्वारा पंजाब समझौता समाप्ति अधिनियम 2014 पारित कर रावी व्यास जल में संबंधित सभी समझौतों को रद्द कर दिया, जिसमें 31.12.1981 को सम्पादित समझौता भी शामिल है। भारत सरकार द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय में प्रेसीडेनशियल रेफरेंश द्वारा पंजाब समाप्ति अधिनियम 2004 की सवैंधानिक वैधता के परीक्षण हेतु भिजवाया है। मेरा सरकार से आग्रह है कि माननीय प्रधानमंत्री महोदय एवं माननीय जल संसाधन मंत्री उच्चतम न्यायालय को निवेदन करे कि माननीय राष्ट्रपति भारत सरकार के द्वारा रावी-व्यास जल के संबंध में दिये गये रेफरेंश पर एक विशेष पीठ का गठन कर शीघ्रताशीघ्र निर्णय करावे। इसके अतिरिव्त सिधमुख-नोहर सिंचाई प्रणाली के लिए 0.47 एम.ए.एफ पानी आबंटित किया गया था, जिसमें से 0.30 एम.ए.एफ पानी ही दिया जा रहा है, शेष .17 एम.ए.एफ के लिए राजस्थान सरकार वर्षों से प्रयास करती आ रही है लकिन हरियाणा द्वारा विरोध करने पर प्रकरण भारत सरकार को प्रेषित किया गया है। उव्त 0.17 एम.ए.एफ जल राजस्थान को भारत सरकार द्वारा आबंटित किया गया था, जो अनुबंध की शर्तों के अनुसार सभी राज्यों के लिए बाध्य है। फिर भी हरियाणा के कारण हमें यह जल उपलब्ध नहीं हो रहा है। 1981 के समझौते के अनुसार राजस्थान में नहरों का डिजाइन तैयार किया गया था। नहर, माईनर आदि सम्पूर्ण सिस्टम तैयार है लेकिन पूरा पानी नहीं मिलने के कारण किसान आंदोलित हैं। राजस्थान सरकार के समक्ष कानून व्यवस्था बनाए रखना मुश्किल हो रहा है। मेरा सरकार से आग्रह है कि समझौते के अनुसार राजस्थान को उसके हिस्से का पूरा पानी मिले ताकि इस क्षेत्र के किसानों को अकाल से राहत मिल सके।
*DR. KULMANI SAMAL (JAGATSINGHPUR) : In relation to the discussion, I would like to opine that most of the States of our country namely, Maharashtra, Madhya Pradesh, Rajasthan, Karnataka, Uttar Pradesh, Odisha, West Bengal, etc. are facing the drought situation due to erratic behavior of Monsoon. The failure of south west monsoon has affected severely the people in different parts of our country. It is to be noted that around seventy five percentages of rainfall occurs during the period from June to September. So, the water we get during the monsoon should be harvested appropriately so that the shortage of water could be addressed at the time of necessity. It is known to all that once monsoon fails in the country, the livelihood of majority of rural populace gets affected. Subsequently, the country faces crop failure leading to increase in prices of food items as well as other essential materials. It is not only that agriculture is affected because of the scanty rainfall, but also the industrial sector which needs a lot of water for the purpose of production.
Recently, the suicide by farmers has become common news in all parts of the country. This is happening when the farmers are unable to meet the expectation to produce the quantity of crops for their livelihood. If the same could not happen, might be, because of crop failure due to lack of rainfall leading to drought or due to excess rainfall leading to flood, he does not see any other option to lead his life and to feed his family. Consequently, the loser is the farmer who is depending on agriculture. It is a matter of question as to what is responsible for this type of natural calamities.
The level of pollution has increased manifold over the period of time. As we are relying more upon industrial economy as one of the most important parameters of development, the level of pollution is bound to increase. We are also not showing seriousness towards forest management which is the source of water cycle. Over the period of time, the rapid depletion of forest cover has become responsible for water stress leading to drought. India has a forest cover of 76 million hectares which is 23% of its total geographical area. This area is much lower than the prescribed global norm of 33%. The forest protests soil erosion, increases rainfall and controls floods and landslide, etc. So, the loss of forest is directly responsible for destruction caused by climate change.
I would like to state further that even after 68 years of independence, we have failed to approach an efficient irrigation system and water management policy as per the requirement of different geographical areas of our country. I feel, we have to strengthen the community based water harvesting system as well as irrigation system in the country, especially in the areas where there is no river system or any other source of water.
At the other end, we have also emphasized upon river-linking project. The river linking project will definitely sort out the problem either caused by flood or drought. So, the same would be immensely beneficial for farmers of both the flood prone as well as drought hit areas all over the country. We should wholeheartedly expedite the process of river linking project in all the states.
In this regard, I would like to tell that we do not have any direct control over the rainfall or on monsoon. But we can have the control to harvest water in scientific ways for the purpose. So, the initiative for the purpose should also be taken into consideration in order to protect the farmers from drought.
* SHRI KESINENI SRINIVAS (VIJAYAWADA) : 2015 is the second straight year of drought in India. 302 of the 640 districts have received deficit rainfall of at least 20% compared to normal. Two consecutive years of drought translates into 4 failed cropping seasons. This state of affairs has wreaked havoc in the lives of farmers in the 9 drought affected states of the country.
According to the Socio Economic and Caste Census data, 833 million people that is 73% of India's population lives in rural areas. Out of this 833 million, 670 million people live below the poverty line i.e. earning less that Rs.33 per person per day. Independent surveys designed by economists Jean Dreze and Reetika Khera have reported that eight of every ten households in western UP's Bundelkhand region are eating rotis with spices and salt. Upto 17% of all households in Bundelkhand have replaced regular meals with rotis made of grass and half of all household had not eaten vegetables in over 10 days.
The crises in the 9 drought affected states of Andhra Pradesh, Karnataka, Maharashtra, Chhattisgarh, Jharkhand, Uttar Pradesh, Odisha, Madhya Pradesh and Telangana have been further aggravated by the poor health of the rural economy and mounting farm debts.
Host of factors like drought, unseasonal rainfall, hailstroms, floods and structural factors like rising farm debt, high input costs, small size of land holdings, low Minimum Support Price for crops, poor availability of institutional finance, low investment in rural infrastructure and slow rate of farm modernization have left the farmers in distress.
In 2014, the number of suicide by farmers and farm labourers was 5% higher than in 2013. The Accidental Deaths and Suicides in India (ADSI) report published by the National Crime Records Bureau (NCRB) put the number of people who committed suicide in 2014 at 12,360. 5650 were farmers and 6710 were agricultural labourers. 20.6% of the 5650 farmer suicides were due to bankruptcy and indebtedness and 16.8% were because of crop failure.
While these are just numbers, let us imagine the plight of the families these farmers left behind. There are scores of ageing parents whose sons committed suicide because of the adverse farming environment in the country, scores of school going children who were forced to drop out of school work as labourers to support their families. We would fail as a nation if we cannot wipe tears from farmers' eyes.
There are various reasons for agrarian crises in India today and we must address the root cause of the problems.
The small landholdings in the country are further getting reduced every year. In Andhra Pradesh, the average size of the land holdings have declined from 2.5 hectares in the early 1970s to 1.20 hectares in 2005-06. This only shows that the peasants are increasingly being marginalised. The NCRB data on farmer suicides for the year 2014 shows that 72.4% of the farmers who committed suicide were small and marginal farmers with less than 2 hectares of land.
In rural areas, the informal lenders are charging interests rates of upto 50% per annum. In this situation, even one season of crop failure forces farmers into a vicious cycle of debt. Here we are talking about four failed cropping seasons.
The major cause reported by most of the victims' households is accumulated debt for digging or deepening of wells and repeated crop losses or the failure of bore wells. According to a case study, in one village thirty years ago there were only six tube wells and the water table was at shallow level of six feet from the surface. But by 1998, there were 1800 borewells, half of which were dry and water table was at 240 feet. As per a study done by agricultural economist P Sainath, in Musapally village in Nalgonda district of undivided Andhra Pradesh there were 6000 borewells dug to cultivate an area of 2000 acres. Out of these 6000 wells, 85% have failed. Attempts to source ground water for irrigation are proving to be a costly affair as the water table further recedes.
The case is similar in most states; traditional ways of cultivation have given way to water intensive ways. The states of Punjab and Haryana are suffering a similar decline in water table. Planting of water intensive crops in arid regions is wreaking havoc on the environment, damaging soil, and causing agrarian distress.
During a recent interaction in Hyderabad, hon. Minister of Rural Development Chaudhary Birender Singh ji shared the idea of revival of traditional village ponds and water bodies in the country. I did a little search and found out that this is a very sustainable and successful model. There are numerous examples of villages which have ensured adequate water supply throughout the year by using ponds and traditional water bodies. Farmers in Punjab, Dewas in Madhya Pradesh are actively using ponds for irrigation purpose.
India's Waterman Rajender Singh has shown that revival of traditional water systems can enable cultivation in even deserts. In a span of two decades he has worked to revive over 8600 'Johads' or traditional water structures in Rajasthan. These ancient structures were used to collect rainwater around 1500 BC and have helped improve ground water levels apart from storing water for daily use. In many places where 'Johads' were developed, the depth of underground water rose from about 100 meters to between 13 and 3 meters. The area under cropping increased from 11% to 70% and the area under double cropping went from 3% to 50%. Further, the forest cover expanded from 7% to 40% . We must replicate this model in other drought hit regions of the country.
My constituency of Vijayawada suffers from water shortages even though the Krishna River flows through the region. We should create a strong network for irrigation using surface water. In the state of Andhra Pradesh, we have Krishna and Godavari rivers; still major parts of the state are reeling under acute drought. Under the visionary leadership of our Chief Minister Shri Chandrababu Naidu, Andhra Pradesh launched the Neeru Chettu Program. The program aims to plant trees in all districts of the state and rejuvenate water bodies in the state. Water tanks and bodies were desilted on a massive scale and this had led to an increase in water storage capacity of the tanks. This farsighted program has been a boon to the farmers. The Neeru Chettu program has the following objectives.
(1)Inventory of existing water harvesting structures and repairs needed.
(2)Construction of new water harvesting structures using remote sensing technology.
(3)Construction of targeted recharge structures (root water harvesting, artificial recharge of aquifers and defunct wells).
(4) Restoration of major, medium and minor irrigation systems (repair of breach of structures and supply channels, desilting of tanks.
(5) Participatory Hydrological Monitoring (surface and groundwater) for community water audit and crop water budgeting.
(6)Promoting sustainable water use by improved Irrigation and Agricultural practices.
Our hon. Chief Minister, Shri Chandrababu Naidu's commitment to farmers is such that the state successfully completed the Pattiseema lift irrigation project in record time of six months.
The Pattiseema lift irrigation project, taps surplus Godavari river water flowing into the sea and diverts it to the Krishna river for supply to the Krishna delta and Rayalaseema. 80tmc of water is being transferred from Godavari river to Krishna delta. Of the 80TMC of Godavari water, 10TMC will be diverted to domestic and industrial users in major towns in Krishna and West Godavari districts. The remaining 70 TMC will be released for irrigation in Krishna and West Godavari districts, enough to irrigate 7 lakh acres of paddy fileds. Additional 80 TMC of Godavari water in the Krishna delta means the pressure to supply water from river Krishna eases and the Krishna water can be saved and stored at Srisailam dam, from where it can be supplied to the drought-prone Rayalaseema region.
These timely and visionary interventions by the state government has definitely helped in reducing the severity of drought in some regions but still 7 of the 13 districts in the state of Andhra Pradesh are reeling under drought. The situation in Rayalaseema and Uttar Andhra is severe and farmers need immediate support. We urge the Central Government to provide drought relief funds to the State of Andhra Pradesh at the earliest. Further, I request the Central Government to disburse its share of funds for the Pollavaram project and support the state government for the completion of the project on a war footing. Pollavaram will help bring water to the parched parts of the state and improve rural livelihood.
The government's effort to bring in more and more people into the formal lending sector are laudable but clearly more needs to be done. Crop insurance and claim making has become a painful process. Sometimes, land surveyors are not even visiting the field for the survey but just basing their numbers as per who gives them more bribes. In the case where the survey takes place, it is both very late and just by means of eye estimation. We need to reassure our farmers through better means of crop insurance and quicker delivery mechanism in times of crop damage and failure.
Last month, we visited National Remote Sensing Centre in Hyderabad as part of the Consultative Committee of Rural Development's tour. The kind of advances in satellite imaging and analysis that our scientists have achieved is remarkable. We understand that there are means to estimate crop damage in case of natural calamities by comparing pre and post calamity image of the fields. Use of this technology will aid in faster assessment of crop damage based assessment of crop damage will be a major improvement over the manual assessment that takes eternity to complete and is fraught with manpower hurdles and corruption. Further, we can use drone technology for quicker assessment of crop damage and disburse funds to farmers at the earliest. In an age, where we are technology behemoth, not using technology to help our farmers is almost criminal.
Another important reason for farm distress is the low or sometimes negative returns on many agricultural produce. As per studies done by Agricultural Economist Ashok Gulati on the data collected by Commission for Agriculture Costs and Prices (CACP), there is a small positive return of 6.5% on paddy and this too only in states where the MSP system is strong. In the case of groundnut, Ragi, Moong and Sun Flower seed there is a negative return of 4%, 20%, 3.5% and 8% respectively. Such losses on farm produce are pushing farmers to the wall.
The targeted rate of growth of agriculture sector accroding to the 12th Five Year Plan is 4%, however a severe drought situation could lead to negative growth in the sector that grew at a dismal rate of 0.2% in 2014-15. The biggest challenge is to provide immediate income support to the farmers as we take steps to fix structual anomalies in the system. This immediate support could be in the form of increased spending on jobs guarantee scheme and rural infrastructure creation. In the long run we need to make structural changes in pricing strategy for farm produce, provide effective crop insurance, organised credit and ensure that best technologies are used at farms that conserve resources and improve yields. The example of drip irrigation from Israel is worth mentioning. Drip Irrigation is Israel has helped the desert nation conserve water and ensure food security. We can draw lessons from there.
Further, we need to intensify efforts to develop drought and flood tolerant crops. There are numerous varieties of crops that have been traditionally tolerant to droughts. We should encourage merging of this drought tolerant gene into the high yielding variety of grains. I am happy to learn that Kerala Agriculture University has developed a saline tolerant variety of rice and is using it in coastal areas. Similar work has been done using traditional genes from the Sunderbans in West Bengal. The rich plant diversity in our country provides a vast gene pool to develop drought and flood tolerant crops.
I believe that the next stage of food security challenge to India will come from the unpredictable weather. We must develop a comprehensive plan to insure ourselves against the vagaries of climate change, even as we work with other nations to reach an agreement on Climate Change in Paris. The farmers of the country deserve our utmost attention and we must create an eco system where farmers don't barely survive but thrive. I urge the Central Government to look into the immediate demands of the 9 drought affected states, including Andhra Pradesh and release necessary funds so that the states farmers suffer no more.
श्री गणेश सिंह (सतना) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं।...(व्यवधान) देश में सूखा एक बहुत बड़ी समस्या है।...(व्यवधान) यह समस्या कोई इस वर्ष की अकेले नहीं है, बल्कि पिछले कई वर्षों से लगातार देश को एक बड़े सुखाड़ का सामना करना पड़ रहा है।...(व्यवधान) कांग्रेस पार्टी के हमारे मित्र श्री ज्योतिरादित्य जी ने नियम-193 के तहत इस मामले को उठाया था, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि उन्होंने सदन में सवाल तो खड़ा कर दिया और वे खुद सदन में नहीं हैं, उनकी पूरी पार्टी नहीं है। अच्छा होता कि वे अन्य माननीय सदस्यों की बातों को भी सुनते।
महोदय, देश में लगभग 50औ खेती मॉनसून पर निर्भर है। पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष की जो बारिश है, वह सोलह फीसदी से कम है। जलवायु परिवर्तन पूरे विश्व के लिए सबसे बड़ा चिंता का विषय है। अभी हमारे प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी पेरिस गए थे। जलवायु परिवर्तन पर पूरे विश्व के लोग बैठे थे। सभी ने गहरी चिंता प्रकट की है। प्राकृतिक संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। बेमौसम बारिश से भी कभी-कभी बड़ा नुकसान होता है। बादल फटते हैं। अभी चेन्नई में जो बारिश हुई, उसके बारे में लोग बता रहे हैं कि पिछले एक सौ वर्षों में भी इतनी ज्यादा बारिश कभी नहीं हुई। इसमें बहुत तबाही हुई। हमारी भारत सरकार ने चौदहवें वित्त आयोग में प्राकृतिक आपदाओं को शामिल किया है। मैं मंत्री जी को और प्रधान मंत्री जी को उसके लिए धन्यवाद देना चाहता हूं, जिसमें उन्होंने सूखे को, पाले को, बाढ़, सुनामी, चक्रवात, भूकंप, आग, भूस्खलन, बादल फटना, हिमस्खलन जैसे तमाम प्राकृतिक आपदाओं को उसमें शामिल किया है। मैं माननीय प्रधान मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाया है। पहले की सरकार की जो नीति थी, उसमें प्राकृतिक आपदाओं से जब किसी फसल को नुकसान होता था, तो यदि उसमें 50औ से ज्यादा नुकसान हुआ है, तो ही उसमें उसे शामिल करते थे। इस तरह से कभी किसी क्षेत्र को उसमें फायदा नहीं मिल पाता है। लेकिन, हमारे प्रधान मंत्री जी ने नुकसानी की सीमा को घटाते हुए कहा है कि अगर खेतों को 33औ भी नुकसान हुआ है, तो हम उसको प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में लेंगे और उसके लिए राहत राशि देंगे। इतना ही नहीं, उन्होंने सहायता राशि के प्रावधान को भी 50औ बढ़ाया है। यह निश्चित तौर पर एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी कदम है और उसके लिए उनका बहुत-बहुत धन्यवाद।
महोदय, हमारी केन्द्र सरकार के मानक ब्यूरो ने प्राकृतिक आपदाओं के कुछ क्षेत्र चिन्ह्ति किए हैं। भूकंप से जो प्रभावित क्षेत्र हैं, उनमें चार ऐसे क्षेत्रों को चिन्ह्ति किया गया है। अत्यधिक वर्षा पहाड़ी क्षेत्रों में होती है और वहीं से मिट्टी का कटाव भी सर्वाधिक होता है। बारह प्रतिशत मिट्टी का कटाव उन नदियों के माध्यम से होता है, जो समुद्र में जाकर गिरती हैं। लगभग 5,700 किलोमीटर का सुनामी क्षेत्र चिन्ह्ति हुआ है। देश की कुल खेती योग्य भूमि का 68औ हिस्सा सूखा प्रभावित चिन्ह्ति हुआ है। यह बहुत गंभीर चिंता का विषय है कि हमारी जितनी खेती है, उसका 68औ हिस्सा हमेशा सूखे की चपेट में रहता है। यह वाक़ई में बहुत गंभीर चिंता का विषय है। अब प्रश्न यह उठता है कि इसके बचाव एवं राहत के लिए सरकार ने क्या किया? पहले की सरकारों ने क्या किया, मैं उस पर नहीं जाना चाहता हूं। लेकिन, वर्तमान में हमारी जो सरकार है, उसमें हमारे प्रधान मंत्री जी किसानों की मदद के लिए बहुत चिंतित हैं। फसलों को नुकसान हो रहा है। खाद्यान्न का उत्पादन घट रहा है। देश की जरूरत के आधार पर अनाजों का उत्पादन हो, चाहे वह दलहन हो, चाहे तिलहन हो, चाहे गेहूं हो, चाहे चावल हो, सभी तरह की फसलें समान रूप से पैदा हों, इसके लिए उन्होंने सबसे पहले शुरूआत की देश के सभी किसानों को प्रधानमंत्री सिंचाई योजना के साथ जोड़ेंगे, पर्याप्त बिजली देने का काम करेंगे, बड़ी-बड़ी जल संरचनाओं को बनायेंगे।
जब श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने सिंचाई के लिए प्रधानमंत्री फास्ट ट्रैक योजना शुरू की थी। जितने आधे-अधूरे बांध देश के विभिन्न राज्यों में पड़े थे, उनको पूरा करने के लिए हर साल बजट में पैसा जाएगा, ऐसी फास्ट ट्रैक योजना उन्होंने शुरू की थी। उसका परिणाम यह हुआ है कि जो आधे-अधूरे बांध पड़े थे, उनका काम पूरा हुआ है। इससे सिंचाई का रकबा बढ़ा है, विद्युत का उत्पादन बढ़ा है, नए रोजगार पैदा हुए हैं और खेती की गुणवत्ता बढ़ी है।
महोदय, जहां सूखा पड़ता है, वहां केन्द्रीय अध्ययन दल जाता है। मध्य प्रदेश में भी अध्ययन दल गया था। अध्ययन दल ने अपनी रिपोर्ट दी। हमारे मुख्यमंत्री जी ने विधान सभा का स्पेशल सत्र बुलाया। साढ़े आठ हजार करोड़ रूपए का प्रावधान किया। उन्होंने एक-एक खेत में, चाहे वह छोटा किसान हो, चाहे वह बड़ा किसान हो, सभी के नुकसान का आंकलन कराया। उन्होंने एक उच्च स्तरीय टीम भेजी, अधिकारियों की, मंत्रियों की, खुद मुख्यमंत्री जी भी गए और सभी वरिष्ठ अधिकारियों को भेजकर उन्होंने उसका आंकलन कराया। उन्होंने उसके लिए व्यवस्था की।
भारत सरकार ने, 1 दिसंबर के इसी सदन में हमारे मंत्री जी ने उत्तर में कहा है कि देश के 614 जिलो में से 180 जिलों में सूखा है। मैं मानता हूं कि ये 180 जिले से भी ज्यादा हैं। देश का एक-तिहाई हिस्सा सूखा है। ऐसी स्थिति में मैं मध्य प्रदेश के बारे में जरूर कहूंगा कि मध्य प्रदेश के 45 जिले सूखे हैं, 268 तहसीलें सूखी हैं, 38,898 गांव प्रभावित हुए हैं, 59,30,196 किसान प्रभावित हुए हैं और 56,72,679 हेक्टेअर फसलें सूखे की चपेट में आ गई हैं। हमारी राज्य सरकार ने केन्द्र से 4,017 करोड़ की सहायता राशि मांगी है। हमारी राज्य सरकार ने अपने प्रदेश के किसानों के लिए जो राहत दी है, वह मैं बाद में बताऊंगा। कर्नाटक में 27 जिले सूखे हैं, छत्तीसगढ़ में 25 जिले सूखे हैं, महाराष्ट्र में 21 जिले सूखे हैं, उड़ीसा में 21 जिले, आध्र प्रदेश में 7 जिले, उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 50 जिले, तेलंगाना में 7 जिले सूखे की चपेट में हैं। सभी राज्यों ने प्रथम दृष्टया भारत सरकार से 23,739.79 करोड़ की सहायता राशि माँगी है।
मैं माननीय मंत्री जी से जानना चाहता हूँ कि आईएमसीटी ने जो राज्यवार एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के माध्यम से सहायता की सिफारिश की है, उसमें कितनी-कितनी राशि, किन-किन राज्यों को अभी तक जारी की गई है? जब मंत्री जे अपना उत्तर दें तो इस बारे में निश्चित तौर पर बताएं।
मैं मध्य प्रदेश के बारे में उनसे कहूंगा कि मध्य प्रदेश को एनडीआरएफ के माध्यम से वर्ष 2012-13 में एक रूपया भी नहीं मिला, जबकि 3-4 सालों से हमारे प्रदेश में सूखा पड़ रहा है। वर्ष 2013-14 में 502.59 करोड़ मिले, वर्ष 2014-15 में 83.13 करोड़ मात्र मिले, जबकि वर्ष 2015-16 में अभी तक एक पैसा भी नहीं मिला। मैं निवेदन करना चाहता हूं कि इसको वह नोटिस में जरूर लें।
हमारे प्रदेश से कांग्रेस के हमारे मित्र श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया जी गुना से जीतकर आते हैं। अभी वह सदन में उपस्थित नहीं हैं, उन्होंने अपने भाषण में प्रदेश सरकार पर झूठे जो आरोप लगाये थे तो मैं उनको बताना चाहता हूं। जहां से वह जीतकर आते हैं, उनके जिले की 5 तहसील 632 गांव प्रभावित हैं, 24,920 किसान प्रभावित हैं और 20,149 हेक्टेअर क्षेत्र सूखा प्रभावित हुआ है। उनके जिले से 1,508.5 लाख रूपए की मांग आई थी। राज्य सरकार ने 1,369 लाख रूपए जारी कर दिए। राज्य सरकार ने न सिर्फ आबंटन किया, बल्कि पैसा दे दिया। यहां पर वे कह रहे थे कि एक पैसा नहीं मिला। इसके बाद वे कह रहे थे कि हमारी राज्य सरकार ने राजस्व पुस्तक परिपत्र 6 और 4 में कुछ परिवर्तन करके कहा है कि ऐसे किसानों को हम लाभान्वित नहीं करेंगे, जो आयकर दाता है, को नहीं देंगे, वृत्तिकर दाता को नहीं, सेवाकर वालों को नहीं देंगे।
ऐसा एक पत्र जरूर हमारे राज्य सरकार के राजस्व विभाग ने 6 नवम्बर और 20 नवम्बर को जारी हुआ था। जैसे ही इसकी जानकारी मुख्यमंत्री जी को मिली, उन्होंने तत्काल उसको रोका। उन्होंने उसे 1 दिसम्बर को रोक दिया और उन्होंने 2 दिसम्बर को निर्देश जारी किया कि जो राजस्व पुस्तक क्रमांक 6 एवं 4 में जो प्रावधान है, इसी सरकार ने किया था, उसी आधार पर, सभी को पात्रता के आधार पर सभी किसानों को हम उसमें शामिल करेंगे। मैं उनकी जानकारी के लिए यह बताना चाहता हूं।
उपाध्यक्ष महोदय, हमारी राज्य सरकार ने 43 जिलों में 3132 करोड़ रुपये किसानों को राहत देने के लिए जारी कर दिये हैं। उसमें 8 दिसम्बर तक 795 करोड़ 80 लाख 473 रुपये का भुगतान भी हो चुका है। मैं कांग्रेस के एक दूसरे मित्र जो छिंदवाड़ा संसदीय क्षेत्र से जो माननीय सदस्य चुन कर आये हैं, मैं उनके बारे में भी कहूंगा कि उनके जिले की 14 तहसीलें प्रभावित हुयी हैं, 1732 गांव प्रभावित हुए हैं और 1,39,000 किसान प्रभावित हुये हैं, 96290 हेक्टेयर भूमि में बोयी गयी फसलें प्रभावित हुयी हैं। उनके जिले की मांग 6759 लाख रुपये की थी। हमारी राज्य सरकार ने उन्हें एक-एक पैसा देने का काम किया है। झाबुआ संसदीय क्षेत्र से कांति लाल भूरिया जी चुनाव जीत कर आये हैं, मैं उनके बारे में भी कहना चाहूंगा। उनके क्षेत्र की तीन तहसीलें प्रभावित हुयी हैं, 317 गांव और 59108 किसान प्रभावित हुए हैं, 86125 हेक्टेयर भूमि में बोयी हुयी फसल सूखे की चपेट में आयी है। वहां की मांग 6562 लाख रुपये की थी, वहां भी राज्य सरकार ने एक-एक पैसे का भुगतान किया है। मैं कहना चाहता हूं कि जिस तरह से यहां कांग्रेस के सांसद श्री सिंधिया जी ने बयानबाजी और झूठे भाषणबाजी कर रहे थे वह पूरी तरह से अनुचित है, तथ्यों के खिलाफ है, तथा आधारहीन हैं।
उपाध्यक्ष महोदय इसी तरह से मैं अपने क्षेत्र की बात भी बताना चाहता हूं। मेरे लोक सभा संसदीय क्षेत्र में 10 तहसीलें हैं, और सभी तहसीलें सूखी हैं। वहां 1665 गांव प्रभावित हुये हैं, 256873 किसान प्रभावित हुये हैं, 94781 हेक्टेयर फसलों का नुकसान हुआ है। हमारे जिले से 119 करोड़ रुपये की मांग की गयी थी राज्य सरकार से एक-एक पैसा हमारे जिले को भी मिला है। उनमें से 33 प्रतिशत का भुगतान भी हो चुका है। ऐसे ही हमारे रीवा संभाग के रीवा, सिंगरौली, सीधी, सतना और महाकौशल में, बुंदेलखंड में, हमारे पड़ोसी राज्य यूपी का भी क्षेत्र आता है, वह भी इलाका भयंकर सूखे की चपेट में है। मैं माननीय मंत्री जी से निवेदन करूंगा की सूखे से निपटने के लिए सिर्फ राहत राशि देना पर्याप्त नहीं है। सरकार को कुछ नयी नीतियों की तरफ ध्यान देना होगा। जो किसान आत्महत्या कर रहे हैं, कर्ज के बोझ से लदे हुए हैं, वे दिनोंदिन गरीब होते जा रहे हैं, अगर उनकी फसल को हम प्राकृतिक आपदाओं से बचाने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं तो हम कम से कम एक नयी कारगर फसल बीमा योजना बनाकर उन्हें मदद पहुंचा सकते हैं। जब तक कारगर फसल बीमा योजना नहीं होगी, तब तक उनको कोई भी मदद नहीं मिल सकती है। अभी जो फसल बीमा योजना है, वह उन्हें लाभ नहीं दे रही है। उन्हें बहुत कम पैसे मिलते हैं और किसान उससे संतुष्ट भी नहीं हैं। ऋणी किसानों को तो कुछ थोड़ा-बहुत मिलता भी है लेकिन गैरऋणी किसानों को एक पैसे भी नहीं मिलते हैं। हमारी मध्यप्रदेश की सरकार ने एक अच्छी शुरुआत की है। मैं आपको बताना चाहता हूं कि राज्य सरकार जीरो प्रतिशत ब्याज पर सभी किसानों को ऋण दे रही है। हम बोनस भी दे रहे थे, लेकिन खाद्य सुरक्षा के कानून के कारण केन्द्र सरकार को निर्णय लेना पड़ा कि जो राज्य सरकार बोनस देती हैं, उनको वह बंद करना पड़ेगा ताकि एक समान व्यवस्था देश में चलती रहे। हमारी सरकार ने उतना ही बोनस, किसानों को एक लाख रुपये का ऋण लेने पर तो उनको उस पर ब्याज भी नहीं देना हैं और एक लाख रुपये में से मात्र 90 हजार रुपये उन्हें जमा करने हैं, उनमें 10 हजार रुपये की छूट है। हमारी सरकार ने 10 घंटे बिजली देने की योजना बनायी है। कांग्रेस के समय में वर्ष 2003 में सात लाख हेक्टेयर भूमि में सिंचाई होती थी, लेकिन आज हमारे यहां 36 लाख हेक्टेयर भूमि में सिंचाई होती है। वर्ष 2018 पूरा होते-होते, हमारी सरकार 50 लाख हेक्टेयर भूमि में सिंचाई का काम पूरा करेंगी। तीन बार "कृषि क्रर्मण " पुरस्कार हमारे राज्य को मिला है। प्रदेश की कृषि विकास दर 24 प्रतिशत है, जो देश में नम्बर एक स्थान पर है। हमारे राज्य ने किसानों के लिए इतना कुछ किया लेकिन इसके बावजूद भारत सरकार से मदद की जरूरत है।
हमारी राज्य सरकार एक और बात पर विचार कर रही है। यह अन्य राज्यों से जो सांसद आते हैं, मैं उनके लिए यह जानकारी दे रहा हूं। हमारी राज्य सरकार ने कहा है कि यदि केन्द्र सरकार हमें मंजूरी दे दे तो हम अलग से फसल बीमा योजना बनाना चाहते हैं। मैं निवेदन करना चाहता हूं कि कुछ उपाय निश्चित तौर पर करने पड़ेंगे। प्रधान मंत्री जी ने मृदा परीक्षण की एक योजना चलाई है। निश्चित तौर पर उसका असर हुआ है। सिंचाई योजना का असर हुआ है, नदियां जोड़ने का असर हुआ है। देश में मध्य प्रदेश ही अकेला राज्य है जहां नदियां जोड़ने का काम शुरू है। हमारी सरकार ने नर्मदा और शिप्रा को जोड़ दिया। केन, बेतवा और काली सिंधु को जोड़ने की तैयारी में लगी हुई है। मैं चाहता हूं कि उन योजनाओं को पैसा केन्द्र सरकार से पहुंचे। हमारी जो अधूरी सिंचाई योजनाएं पड़ी हैं, जैसे बर्गी बांध की योजना की दाईं तट नहर के लिए हम चाहते थे कि उसे बजट मिल जाए। उसका राष्ट्रीय परियोजना में शामिल करके बजट करीब पौने चार हजार करोड़ रुपये है। वह आज तक नहीं मिला। मैं निवेदन करूंगा कि उसका पैसा मिल जाए। नहरों के निर्माण का जो पैसा बकाया है, वह मिल जाए। जो वाटरशैड की योजनाएं थीं, हम छोटे-छोटे तालाब बनाना चाहते हैं, बरसात के पानी को रोकना चाहते हैं। उसके लिए हमें फंडिंग की जरूरत है। हम निवेदन करना चाहते हैं कि कृषि ही एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें पूरे देश की 60 से 65 फीसदी आबादी की जीविका लगी हुई है। ...(व्यवधान) मैं चाहता हूं उत्पादन खर्च कम किया जाए, फसलों का उचित मूल्य तय करे तभी किसान मजबूत हो पाएगा। बहुत-बहुत धन्यवाद।
*डॉ. मनोज राजोरिया (करौली-धौलपुर):सूखा नाम लेते ही आंखों के सामने एक ऐसी भयावह तस्वीर सामने आती है जिसके बारे में देश को गम्भीरता पूर्वक विचार कर इसका समाधान करना चाहिए। सूखे की वजह से जमीन के ऊपर व जमीन के नीचे पानी समाप्त हो जाता है, सारे कुंए नदिया, तालाब, खेत सूख जाते हैं। इसकी वजह से समस्याओं का एक दौर शुरू होता है जिसकी सबसे अधिक मार किसानों को झेलनी पड़ती है, क्योंकि सूखा पड़ते ही किसान की जीवन रेखा, उसकी खेती तबाह और बर्बाद हो जाती है और इसी बर्बादी की वजह से देश में हजारों किसानों ने अब तक आत्महत्याएं की हैं।
सूखे की वजह से सभी प्रकार के अनाजों एवं दलहनों का उत्पादन कम अथवा नगण्य हो जाता है और अन्नदाता भूखे मरने को मजबूर हो जाते हैं। साथ ही समाज पर इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी बड़े नुकसानदायक होते हैं जैसे कि पशुओं को चारा एवं पानी नहीं मिलने की वजह से पशुधन एवं दूध की कमी, कृषि क्षेत्र में रोजगार की कमी, आम लोगों की क्रय शव्ति में कमी, पीने के पानी की कमी, महंगाई दर में वृद्धि, गरीब तबके में कुपोषण की समस्या एवं अन्य प्रकार की बीमारियां, किसानों के द्वारा जमीन और गहने गिरवी रखने से साहूकारों द्वारा उनका आर्थिक शोषण, किसानों एवं लोगों का ग्रामीण क्षेत्र से शहरों की ओर जीवन यापन के लिए पलायन, लोगों के आत्मविश्वास में कमी की वजह से सामाजिक तनाव, झगड़े, अपराधों में वृद्धि इत्यादि, और इन सब दुप्रभावों का सबसे अधिक नुकसान किसान को, गरीब को, दलित को, महिलाओं को उठाना पड़ता है।
जब पूरे देश में सूखे की स्थिति पर चर्चा हो रही है, मैं बताना चाहूंगा कि देश की लगभग 12 प्रतिशत जनता सूखे की मार से पीड़ित है। सिंचाई आयोग के द्वारा 74 जिलों को सूखे से पीड़ित माना गया है जिसमें कि मेरा राज्य राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, उड़ीसा, आध्रप्रदेश, तमिलनाडु केरल, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश इत्यादि राज्य प्रभावित रहे हैं।
मैं राजस्थान के बारे में ध्यान दिलाना चाहूंगा कि राजस्थान में 11 जिले सूखे से अति पीड़ित हैं एवं अन्य जिले सूखे से पीड़ित हैं। राजस्थान में भूमि जल स्तर 250 से 400 फीट गहरा हो चुका है। दुर्भाग्य से बादलों की कृपा भी राजस्थान पर कम होती है। जिसकी वजह से एक वर्ष में राजस्थान में औसत वर्षा सिर्फ 164 मिमी होती है। राजस्थान का 57 प्रतिशत हिस्सा सूखे पीड़ित जोन में आता है।
मैं सरकार का ध्यान इस ओर दिलाना चाहूंगा कि सूखे की स्थिति से निपटने के लिए विभिन्न सरकारों ने अपने-अपने तरीकों से सभी प्रयत्न किए लेकिन दुर्भाग्य से अरबों रूपये खर्च करने के बाद भी इसका स्थाई समाधान नहीं हो पाया।
मैं माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी के सपने प्रत्येक खेत को पानी से काफी उत्साहित हूं। मुझे लगता है कि हमारे पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी का देश की नदियों को जोड़ कर बाढ़ एवं सूखे की स्थिति पर नियंत्रण करने का सपना माननीय नरेन्द्र भाई मोदी पूरा करेंगे।
मैं राजस्थान की यशस्वी मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे जी की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं जिन्होंने इस समस्या से किसानों एवं आम जन को राहत पहुंचाने के लिए देश के पहले राज्य के रूप में नदियों को जोड़ने की योजना बनाई है। मैं आशा करता हूं कि कि माननीय मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के विजन एवं कठिन परिश्रम से ये कार्य पूर्ण हो सकता है। क्योंकि राजस्थान सरकार यह कार्य आर्थिक संसाधनों की कमी की वजह से कठिनाई महसूस कर सकती है। अतः मेरा माननीय प्रधानमंत्री जी से आग्रह है कि राजस्थान में नदियों को जोड़ने के लिए एक विशेष पैकेज की घोषणा एवं सहयोग करेंगे।
*DR. MAMTAZ SANGHAMITA (BARDHMAN DURGAPUR) : Drought is a condition which happens to be an impact of short term environmental mishaps as well as a continuous long term process. Interactive environmental changes tropical monsoon character of the country less amount of rainfall in our country by south west monsoon and global climatic change, leads to soil erosion, soil devastation, increase in ground water level depth, reduction in river bed and less water reserves in lakes and other water reserves. About one sixth of land area, 12% of population is drought prone.
At this moment 302 districts of eight states are affected by drought. In West Bengal after flood and due to less rainfall, yields of crops is suspected to be less in Bengal this year. Drought affects the life, society and nation in various ways and losses are enormous and sometimes irreversible. Meteorological drought reduces soil moisture and enables recharge of soil moisture, leads to surface run off and reduction of ground water level.
Two third of our agricultural land is water fed so it leads to less cultivation and shortfall of agricultural products as well as fodder feed. Import of foodgrains become extreme necessity which leads to economic burden. However, India manages to build a buffer stock because it partly retains green field.
Impact is drastic in case of social structure and economy which leads to poverty, famine, ill health, malnutrition and increases death rate and reduces the productive population and children and cattle.
Economic loss is due to crop and fodder deficiency, more monitory loss due to irrigation and water supply maintenance. Even the business related to water transport and hydro electric power generation is hampered.
Environmental impact is disruption of eco-balance of fish, cattle and wild life habitat. Wild life migration is another burden over the nearby villages. There is lack of drinking water for man and animal and the poor quality of soil produces damage to further food production. In this situation not only the drought affected areas are suffering but in other areas people migrates in search of job, food and shelter which creates big problem for the whole nation.
Drought is a continuous and recurrent problem. The immediate help from government and non-government agencies is a temporary relief but actually it needs a permanent solution. As a temporary measure Central Disaster Management and the State Disaster Management are supplementing with food and money. There is a plan for seed subsidy and diesel subsidy which is very necessary for the present and future situation.
As drought is a recurrent phenomenon like in West Bengal, Jharkhand and it comes in every 5-6 years and in other states like Maharastra, Karnataka the frequency is 2-3 years, we should seek permanent solution, methods of prevention and early management.
For global warming, it needs international interference, international rules on carbon emission, sea water pollution, etc. Preservation of natural lakes, improvement of depth of river beds, rain water harvesting, etc. is required More of water needs to be taken through canals from rivers. There is need for implementation of interventions on perennial horticulture crops under MIDH and additional fodder development programme under RKVY. Scientists are researching on artificial rain by cloud seedling.
So, drought is a universal problem. We should deal with it on a war footing.
*श्रीमती अंजू बाला (मिश्रिख) : मैं अपने संसदीय निर्वाचन क्षेत्र मिश्रिख में किसानों की बदहाली की ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट करना चाहती हूं। उत्तर प्रदेश का मिश्रिख संसदीय क्षेत्र उत्तर प्रदेश के तीन जिलों तक फैला है- सीतापुर, हरदोई और कानपुर। यहां की 90 प्रतिशत आबादी खेती-बाड़ी पर निर्भर है, और इसी से लोग अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। उपरोव्त तीनों जिले भारत के सर्वाधिक पिछड़े जिलों की सूची में शामिल हैं। यहां उद्योग धंधे न के बराबर हैं। यहां जो खेती करते हैं वो भी कमर्शियल खेती नहीं है। खेती, सिर्फ जीविका का साधन मात्र है। मेरे क्षेत्र में बड़ी संख्या में अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के लोग रहते हैं जिनके पास पट्टे पर मिली छोटी-छोटी जमीनें हैं। ये लोग पूरे साल इन्हीं जमीनों में खुद को खपाये रहते हैं कि थोड़ा बहुत अनाज हो जाए ताकि इनकी जिन्दगी बसर हो सके और कुछ नहीं तो कम से कम खाने के लिए अन्न पैदा हो सके।
मैं अक्सर शनिवार और रविवार के दिन अपने संसदीय क्षेत्र का दौरा करती हूं। वहां के दूरदराज के गांवों में जाती हूं। मुझे बड़े भारी मन से और दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि मेरे संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के कई गांवों में अब भी लोग 18वीं सदी की जिन्दगी बसर कर रहे हैं। उनके पास कुछ नहीं है। रहने के लिए घर नहीं, पहनने के लिए कपड़े नहीं, खाने के लिए अन्न नहीं। ऐसी हालत में जी रहे हैं लोग। कांग्रेस ने अपने 60-70 वषों के शासन में इनके लिए कुछ नहीं किया। खेती करने वालों पर कुदरत आए दिन कहर बरपा करती रहती है। पिछले साल जब इनकी रबी की फसल तैयार होने को थी, तब बे-मौसम की बारिश ने रबी की फसल चौपट कर दी। गेहूं सरसों की सारी फसल खराब हो गई। जैसे-तैसे, कर्ज लेकर किसानों ने धान-मक्का बोया तो सूखा पड़ गया, खरीफ की सारी फसल चौपट हो गई। एक दाना भी लोगों के घर नहीं पहुंचा। लोग दाने-दाने को तरस रहे हैं। जिन्दा रहने के लिए लोग गांवों से दिल्ली जैसे महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
हमारे क्षेत्र में फसल बीमा कम्पनियां बिल्कुल प्रभावी नहीं हैं। कुल कृषि क्षेत्र का 10 प्रतिशत हिस्सा भी बीमा कम्पनियों द्वारा कवर नहीं है। छोटी-छोटी जोत वाले किसानों में फसल बीमा संबंधी कोई जागरूकता नहीं है और जो किसान फसल बीमा करवाते हैं, फसल बीमा कंपनियां उन्हें भी तकनीकी कारण बताकर कोई लाभ नहीं देती हैं। इससे दूसरे किसान हतोत्साहित हो जाते हैं और वो फसल बीमा कंपनियों के पास नहीं जाते।
मेरा सरकार से अनुरोध है कि वह इस दिशा में तत्काल कदम उठाए और हमारे जिन किसान भाइयों का, बेमौसम की बारिश और सूखा से नुकसान हुआ है उनकी फसलें तबाह हुई हैं, उन्हें तत्काल मुआवजा और हर्जाना दिया जाए।
श्रीमती अनुप्रिया पटेल (मिर्ज़ापुर): उपाध्यक्ष महोदय, आपने सूखे पर चल रही इस चर्चा में भाग लेने का मुझे अवसर दिया है। हाल ही में पैरिस में जलवायु परिवर्तन पर एक बड़ा सम्मेलन हुआ क्योंकि जलवायु परिवर्तन पूरे विश्व के लिए आज चिन्ता का कारण बना हुआ है। भारत में भी इसका असर देखने को मिला है। सूखे ने लगातार दूसरे वर्ष भारत में दस्तक दी है और देशभर के बीस राज्यों में 300 से अधिक जिले इससे प्रभावित हैं। इन बीस राज्यों में एक मेरा राज्य उत्तर प्रदेश भी है जहां के कुल 75 जिलों में से 50 जिलों को राज्य सरकार ने सूखाग्रस्त घोषित किया है। उसमें से एक जिला मेरा संसदीय क्षेत्र मिर्जापुर भी है। वैसे तो राज्य सरकार को सूखाग्रस्त घोषित करने का काम बहुत पहले कर देना चाहिए, लेकिन सरकार ने यह काम अत्यधिक विलंब से किया है और हमेशा की तरह इसका खामियाजा हमारे प्रदेश के किसानों को ही भुगतना पड़ेगा।
मैंने समाचार पत्रों में पढ़ा कि हमारी राज्य सरकार ने केन्द्र से राहत के नाम पर 2057 करोड़ रुपये की मांग की है। मुझे पूरा विश्वास है कि केन्द्र सरकार हमेशा की तरह राज्य सरकार को धनराशि देकर किसानों की मदद करने का प्रयास भी करेगी। लेकिन मैं एक महत्वपूर्ण सवाल उठाना चाहती हूं। माननीय कृषि मंत्री जी यहां बैठे हुए हैं। मैं उनसे यह जरूर कहना चाहती हूं कि जब केन्द्र से राज्यों को आपदा राहत के नाम पर बहुत मोटी धनराशि देते हैं तो क्या कभी यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि वह पैसा किसानों तक पहुंचा या नहीं। ऐसा मैं इसलिए कह रही हूं क्योंकि पिछले वर्ष भी जब सूखा पड़ा तो आपने उत्तर प्रदेश सरकार को किसानों की मदद के लिए 777 करोड़ रुपये दिए। इस वर्ष के प्रारंभ में अप्रैल माह में जब ओला वृष्टि और भीषण बारिश से किसानों की फसलें बर्बाद हुईं तब भी 2081 करोड़ रुपये केन्द्र सरकार से राज्य सरकार को दिए गए। लेकिन जब जमीन पर जाकर किसानों से पूछो कि उन्हें मुआवजे की रकम मिली या नहीं तो कम से कम उत्तर प्रदेश के गांव में किसानों के मुंह से यही सुनने को मिलता है कि उन तक मुआवजे की कोई धनराशि नहीं पहुंच पाई। आज हालात यह हो चुके हैं कि केन्द्र सरकार का पैसा है लेकिन उसका मालिक राजस्व विभाग का एक छोटा सा कर्मचारी एक तहसीलदार बन चुका है जिसकी जिम्मेदारी है कि गांव में जाए और क्षतिग्रस्त फसलों का मुआयना करे। लेकिन तहसीलदार गांव में जाते नहीं हैं, मुआयना नहीं करते हैं और अपनी रिपोर्ट लिख देते हैं। किसानों के भाग्य का फैसला एक तहसीलदार कर रहा है और रकम भेजने का काम केन्द्र सरकार कर रही है। हमारे उत्तर प्रदेश में यह हुआ कि जो आपदा राहत के नाम पर पैसा भेजा गया, वह या तो किसानों तक नहीं पहुंचा या अगर बांटा गया तो केवल लोहिया ग्रामो में बांटा गया क्योंकि लोहिया समग्र ग्राम विकास योजना उत्तर प्रदेश सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना है। लोहिया गांव में पैसा बांटने से उत्तर प्रदेश सरकार को वाह-वाही लूटने का मौका मिल रहा है। ये हालात उत्तर प्रदेश के हैं। इतना ही नहीं, राज्य सरकार द्वारा दूसरे कार्यों में इस पैसे को डायवर्ट कर दिया गया है। हमारे प्रदेश के मुख्य मंत्री जी ने तो किसानों की आत्महत्या को लेकर यहां तक बयान दिए हैं कि किसान अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक परेशानियों के कारण आत्महत्याएं कर रहे हैं। किसान इसलिए आत्महत्या नहीं कर रहे क्योंकि उनकी कोई व्यक्तिगत समस्या है। वे यह सोचकर आत्महत्या करने को मजबूर हैं कि उनके कर्ज का बोझ वे कहां से पूरा करेंगे। वे अपने बच्चों को क्या खिलाएंगे। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार इतनी संवेदनहीन हो चुकी है कि इस तरह के बयान हमारे प्रदेश के किसानों को लेकर दिए गए हैं।
मैं माननीय कृषि मंत्री जी से यह अनुरोध करता हूं कि जो पैसा केन्द्र सरकार से आपदा राहत के नाम पर उत्तर प्रदेश सरकार को भेजा जाता है, आप सख्ती से पूछे कि वह पैसा किस तरीके से वितरित किया जाता है। आज पूरे प्रदेश में सूखे जैसे हालात पैदा हो गए हैं, पशुओं के लिए चारा उपलब्ध नहीं है, पेयजल का संकट गहरा गया है, खरीफ की फसल चौपट हो गई है, आज किसान को यह समझ नहीं आ रहा है कि वह क्या बेचे, कहां से पैसा लाए, कहां से खाद-बीज खरीदे और रबी की बुआई कैसे करे? इस पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि रबी की फसल की पैदावार भी प्रभावित हो जाए। यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात है, राष्ट्र के लिए शर्म का विषय है, जय जवान जय किसान का नारा देने वाला देश आज तक बाढ़ और सूखे की समस्या का स्थायी समाधान नहीं ढूंढ पाया है, इस पर गंभीरता से चिंतन करने की जरूरत है। फसल बीमा योजनाओं में तमाम तरह की विसंगतियां हैं, हमारे प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश के किसानों को भी फसल बीमा योजना का लाभ नहीं पहुंच पा रहा है, प्रीमियम की राशि भी उनको नहीं मिल पा रही है। मेरा सरकार से अनुरोध है कि एक उच्च स्तरीय समिति का गठन करे और इस बात की जांच कराई जाए कि फसल बीमा की जो योजनाएं चल रही हैं वह कितनी प्रभावशाली साबित हुई हैं। स्वामीनाथन आयोग बनाया गया, उसकी सिफारिशों में हमारे देश के किसानों की तमाम समस्याओं का निराकरण छिपा हुआ है, लेकिन हम उन सिफारिशों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। मुझे यह जानकर खुशी होती है कि हमारी सरकार कृषि आयोग बनाने जा रही है। उस आयोग के माध्यम से हम इन समस्याओं का समाधान कैसे करना चाहेंगे यह मेरे लिए उत्सुकता का विषय है। मुझे उम्मीद है कि हमारी सरकार इस आयोग के माध्यम से स्थायी समाधान निकालेगी।
कृषि मंत्री (श्री राधा मोहन सिंह) : माननीय सदस्या ने किसान आयोग की चर्चा की है, अखबारों ने ऐसी खबरें छापी हैं। मैं मानता हूं कि अगर किसी विषय को टालना है तो आयोग बना दीजिए। वर्ष 2007 में आयोग बना, 2009 में किसान नीति बनी, इसके सात-आठ वर्ष हो गए इसलिए इसका रिव्यू होना चाहिए, इसके लिए हम एक कमेटी बनाएंगे जो जल्द से जल्द रिव्यू करके रिपोर्ट देगी।
श्रीमती अनुप्रिया पटेल: माननीय मंत्री जी की बात सुनकर विश्वास हुआ है कि एनडीए सरकार किसानों के चेहरे पर मुस्कुराहट लाने में कामयाब होगी। मेरा निवेदन है कि जो पैसा केन्द्र से भेजा जा रहा है, उसका हिसाब-किताब राज्य से पूरी तरीके से लिया जाना चाहिए।
HON. DEPUTY SPEAKER: Once again I want to bring to the notice of the hon. Members that the hon. Minister is going to reply today itself. So, we have to complete the discussion somewhat early.
Also, I am having a list of nearly 20 Members who are yet to speak. If any Member wants to lay his written speech on the Table of the House, that is allowed. Therefore, Members can do that also.
*श्री संजय काका पाटील (सांगली) : सूखा एक ऐसी सामाजिक और आर्थिक व्याधि है जिसके परिणामस्वरूप कई किसान और कृषक श्रमिक आत्महत्या कर रहे हैं। सूखा मात्र कृषि अर्थव्यवस्था को ही प्रभावित नहीं करता, अपितु इसका असर उद्योग, वाणिज्य निर्यात इत्यादि सहित शेयर बाजार तक पर पड़ता है। यह बहुत ही चिंता का विषय है कि देश में प्रतिवर्ष भू-जल स्तर गिरता जा रहा है, जिसके कारण किसान को अपने कुओं को और अधिक गहरा कराने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। हाल के इतिहास में वर्तमान सूखा भारत का सबसे बड़ा सूखा है। पूरा देश के लगभग 302 जिल सूखे की मार झेल रहे हैं। ा़ महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता हूं। वहां पर किसान सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।
देश में सूखे और चक्रवात जैसी आपदा से निपटने के लिए एक स्थायी पद्धति होनी चाहिए। वर्तमान में केवल 40 प्रतिशत लघु और सीमांत किसान ही बैंक से लोन ल पाते हैं। जिन क्षेत्रों में किसानों की गलती के बिना मौसम की मार से फसलें नष्ट होती हैं और वहां फसल बीमा उपलब्ध नहीं है, वहां के किसानों के ऋणों को तत्काल माफ करने क लिए बैंकों को सकारात्मक भूमिका पर विचार करना चाहिए।
गत वर्ष देश में 20 प्रतिशत बारीश कम हुई, जिसके कारण गेहूं की फसल 28 प्रतिशत होने से देश के किसानों की आमदनी कम हुई और वह आज बहुत परेशान है। देश में वर्षा का पानी बर्बाद न हो इसके लिए योजना होनी चाहिए। चैक डैम्स बनाने होंगे, ताकी पानी की उपलब्धि तो बनी रहे। फसल बीमा स्कीम में इंश्योरेंश बहुत कम है, उसे बढ़ाने के लिए उपचारात्मक कदम उठाये जाने चाहिए। हमें किसानों को राष्ट्रीय बैंकों से कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराने की सुविधा प्रदान करने की जरूरत है। इसके अलावा राष्ट्रीयकृत बैंकों की किसानों से ऋण वसूली की प्रक्रिया भी किसानों के संबंध में जो कानून बनाये हुए हैं उनमें वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार बदलाव करने चाहिए। इसके लिए आवश्यक संशोधन किये जाने चाहिए। जैसा कि मनरेगा देश का एक कार्यक्रम है जिसके तहत इस्टिमेट रेशो के आधार देश के 40 टक्का कुशल मजदूरों को और 60 टक्का अकुशल मजदूरों को 100 दिन का रोजगार मिलता है और रोजगार नहीं मिलने पर उन्हें भत्ता दिया जाता है। देश के किसान और मजदूर 365 दिन अपने खेती में रोजगार देते हैं। मेरा अनुरोध है कि मनरेगा के अंतर्गत जो मजदूर किसान के खेत में काम करता है, उनको 100 दिन की मजदूरी किसानों के खेत में काम करने वाले मजदूरों को दिये जाने का प्रावधान किया जाना चाहिए।
देश में मुफ्त बिजली देने से किसानों का मनोबल बढ़ेगा। तालाबों और झीलों की गाद हटाने का कार्य लगातार किया जाना चाहिए। मेरी केन्द्र सरकार से प्रार्थना है कि सूखे से निपटने के लिए सभी गंभीर प्रयास करने चाहिए। हस्तक्षेप कर राज्य सरकारों को कुशलता और समयबद्ध तरीके से किसानों को दी जाने वाली सुविधा हेतु धनराशि का उपयोग करने का निर्देश देने हेतु आवश्यक कदम उठाने की कृपा करें।
श्री रावसाहेब पाटील दानवे (जालना) : उपाध्यक्ष महोदय, देश में हर साल कहीं न कहीं सूखे की स्थिति पैदा होती है लेकिन महाराष्ट्र में गत तीन सालों से लगातार सूखे की स्थिति पैदा हो गई है। इस कारण किसानों की अड़चन हर साल बढ़ती जा रही है। मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी जी को धन्यवाद देना चाहूंगा, जब पहले सूखा होता था जब तक 50औ किसानों का नुकसान नहीं होता था तब तक सूखा डिक्लेयर नहीं होता था लेकिन इस बार 33औ नुकसान होने पर भी सूखा डिक्लेयर किया जाता है। इसलिए मैं माननीय प्रधान मंत्री जी का अभिनंदन करता हूं। महाराष्ट्र में गत तीन सालों से सूखे की स्थिति पैदा हो रही है। सूखा एक ऐसा सामाजिक और आर्थिक वेदी है, जिसके परिणाम केवल किसानों को प्रभावित करते हैं, ऐसा नहीं है। वहां के रोजगार और उद्योग पर भी उसका असर बहुत ज्यादा होता है। आज महाराष्ट्र में सूखे के कारण रोजगार कम हुए हैं और मुझे लगता है कि वहां के उद्योग भी लगभग बंद होने के कगार पर हैं।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपसे इतना ही कहना चाहता हूं कि महाराष्ट्र सरकार ने केन्द्र सरकार से जो राहत पैकेज मांगा है, वह दिया जाये। पिछले साल महाराष्ट्र ने जो राहत पैकेज मांगा था, उसमें से 1957 करोड़ रुपये केन्द्र सरकार ने दिये थे। ...(व्यवधान) यह बात भी सही है कि इतना पैसा पहले कभी भी नहीं मिला। इस राशि में से 1427 करोड़ रुपये सूखे और 530 करोड़ रुपये अतिवृष्टि के लिए दिये थे। केन्द्र सरकार ने कुल मिलाकर 1957 करोड़ रुपये महाराष्ट्र को दिये। वहां काफी समय से सूखा है, लेकिन इतने पैसे महाराष्ट्र को पहले कभी नहीं मिले। इसके लिए मैं केन्द्र सरकार और कृषि मंत्री जी का आभार मानता हूं।
उपाध्यक्ष महोदय, मैंने आपको जैसे बताया कि महाराष्ट्र में इस साल सूखे की स्थिति पिछली बार से भी ज्यादा खराब है। महाराष्ट्र के 21 जिले सूखे की चपेट में आये हैं जिसमें से विदर्भ और मराठवाड़ा में सूखे की स्थिति बहुत खराब है। जालना, औरंगाबाद, लातूर, उस्मानाबाद, बीड, हिंगोली आदि जिलों में बहुत ही खराब स्थिति है। उसमें सांगली, सतारा, बुलढाना और उत्तर महाराष्ट्र में भी लगातार सूखा पड़ रहा है। मुझे ऐसा लगता है कि इस साल महाराष्ट्र सरकार ने केन्द्र सरकार से जो राहत पैकेज मांगा है, उसमें 4 हजार 2 करोड़ रुपये हमने सूखे के लिए मांगे हैं। मुझे ऐसा लगता है कि केन्द्र सरकार ने हमें आज तक सूखे के लिए पैसा नहीं दिया, लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने अपने बजट से सूखे के लिए किसानों को पैकेज दिया है। महाराष्ट्र सरकार ने इसके लिए कई उपाय किये हैं। लोन स्ट्रक्चरिंग का जो काम है, जहां पर सूखा है, वहां किसानों को बैंक का लोन मुहैया नहीं कराया गया। इसके लिए लोन रीस्ट्रक्चर महाराष्ट्र सरकार ने किया है। उसके बाद बिजली का बिल महाराष्ट्र सरकार ने माफ किया है। जिस दिन से महाराष्ट्र में सूखा डिक्लेयर किया गया, उसके बाद से पूरे साल का बिजली का बिल महाराष्ट्र सरकार ने देने का निर्णय किया है। हमारे जो विद्यार्थी स्कूल जाते हैं, उनकी परीक्षा फीस को भी माफ कर दिया गया है। जहां पर सूखा डिक्लेयर हुआ, वहां पर पीने के पानी की दिक्कत है। वहां पर भी महाराष्ट्र सरकार ने टैंकर लगाने की व्यवस्था की है। जानवरों के लिए जो छावनी होती है, उसके लिए गवर्नमैंट ने पैसा दिया है। महाराष्ट्र सरकार ने ये सारे उपाय अपने बजट में से किये हैं। महाराष्ट्र में किसान को जो नुकसान हुआ, उसे जांचने के लिए केन्द्र सरकार की टीम गयी है। महाराष्ट्र सरकार ने भी अपनी तरफ से वहां के नुकसान का अंदाजा लगाकर केन्द्र सरकार से राहत पैकेज मांगा है। मुझे ऐसा लगता है कि वह 4 हजार 2 करोड़ रुपये का राहत पैकेज महाराष्ट्र सरकार को दिया गया, तो उससे सूखे की स्थिति से निपटने में सहायता मिलेगी।
मैं आपके माध्यम से सरकार से विनती करूंगा कि महाराष्ट्र सरकार को सूखे की स्थिति से निपटने के लिए 4 हजार 2 करोड़ रुपये का राहत पैकेज दे। बहुत-बहुत धन्यवाद।
* श्री देवेन्द्र सिंह भोले (अकबरपुर):देश के विभिन्न भागों में तथा उत्तर प्रदेश में सूखा तथा विगत मार्च-अप्रैल माह में हुई बेमौसम बरसात, भयंकर ओलागर्दी एवं तूफानी हवाओं के कारण किसानों को काफी नुकसान हुआ था। पर्यावरण में आया आकस्मिक परिवर्तन घोर आपदा का कारण बन रहा है। उत्तर प्रदेश एवं मेरी लोक सभा क्षेत्र के कई जगहों पर भारी वर्षा और कई जगहों पर पानी की एक बूंद तक नहीं पड़ी। जिसके कारण खरीफ व जायद की फसल पूर्णतयाः नष्ट हो गई। किसान भुखमरी की कगार पर है। भारत सरकार के माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा विगत में हुई दैवीय आपदा पीड़ित किसानों के नुकसान की भरपाई के स्पष्ट निर्देशों की राज्य सरकार द्वारा अवहेलना की जा रही है। जिसके कारण लगभग 60 प्रतिशत किसानों को अब तक मदद नहीं मिल सकी है। इस प्राकृतिक आपदा के कारण किसान की कमर टूट चुकी थी, अब सूखे पर किसान असहाय होने के कारण किसान आत्महत्या करने पर मजबूर है।
आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में मेरी लोक सभा के अन्तर्गत जनपद कानपुर नगर एवं कानपुर देहात के किसानों पर राज्य सरकार द्वारा पक्षपात किए जाने के कारण जनपद कानपुर देहात द्वारा प्रेषित कृषि क्षति धनराशि रू0 19458 लाख की अपेक्षा में मात्र 7102 लाख का आवंटन किया, जिससे अभी तक 4917 लाख ही किसानों को मुहैया कराया जा सका है। इसी तरह जनपद कानपुर नगर में 9301 लाख की अपेक्षा में 7756 लाख का आवंटन किया गया, जिसमें 6376 लाख रू0 ही वितरित किए गए। जबकि जनपद इटावा में प्रेषित क्षति धनराशि 6036 लाख की अपेक्षा में 6036 लाख की सम्पूर्ण धनराशि आवंटित की गई एवं सम्पूर्ण धनराशि किसानों में वितरित भी कर दी गयी। यह तो एक उदाहरण मात्र है। इसी तरह के पक्षपात में किसानों को भारत सरकार द्वारा दिनांक 08.04.2015 को संशोधित मानकों एवं दरों में दैवीय आपदा की वजह असामयिक मृत्यु पर मृतकों के परिवार को अहैतुक सहायता 5 लाख से बढ़ाकर 7 लाख कर दी गयी थी, जिसे 4 लाख भारत सरकार एवं 3 लाख रू0 राज्य सरकार से देने का निर्देश किया गया था। मैं अवगत कराना चाहूंगा कि मेरी लोक सभा क्षेत्र के घाटमपुर विधानसभा क्षेत्र के ग्राम अमौर, तहसील घाटमपुर के किसान शिवकुमार की मृत्यु दिनांक 07.04..2015 को हुई थी, जिसकी सूचना समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुई थी एवं आर्थिक सहायता प्रदान कराये जाने के संबंध में दिनांक 03.05.2015 को जिलाधिकारी, कानपुर नगर से पत्र के माध्यम से अनुरोध किया था एवं मेरे द्वारा दिनांक 05.05.2015 को भी शून्यकाल में उव्त प्रकरण से अवगत कराया था। मृतक के परिवारजनों द्वारा कई बार अनुरोध के उपरान्त अभी तक उव्त मृतक के परिवार को आर्थिक सहायता धनराशि राज्य सरकार द्वारा प्राप्त नहीं हो पाई है। जिसके कारण मृतक के परिवारजन भी भूखों मरने की कगार पर है। इसी प्रकार विद्युत विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की कार्य के प्रति उदासीनता एवं लापरवाही के कारण बिठूर विधानसभा के विकास खण्ड बिधनू के ग्राम ओरछी के किसान श्री हाकिम सिंह की मृत्यु विद्युत करंट लगने के कारण हुई। आकस्मिक दुर्घटना में मृत्यु का मुआवजा भी प्रदेश सरकार द्वारा आवंटित नहे किया गया है तथा अभी भी किसानों की सदमों से मौत हो रही है। उन्हें भी प्रशासन द्वारा स्वाभाविक मौत बताकर आर्थिक सहायता प्रदान नहीं की जा रही है। यह स्थिति मेरी लोक सभा के अलावा अन्य जनपदों की भी है।
मेरी लोक सभा क्षेत्र में किसानों को दी जा रही राहत धनराशि के आवंटन पर भी विभागीय अधिकारियों द्वारा गोलमाल किया जा रही है। भारत सरकार द्वारा मुआवजा धनराशि डेढ़ गुना किए जाने के बावजूद उत्तर प्रदेश के किसानों को पुराने रेट 9000/-रूपए सिंचित एवं 4500/-रू0 असिंचित के हिसाब से भुगतान किया जा रहा है। उस पर किसी को भी एक समान धनराशि आवंटित नहे की जा रही है। विभागीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा बराबर भूमि के किसानों को अलग-अलग धनराशि की चेकों का वितरण किया जा रहा है।
जिन परिस्थितियों का सामना आज किसान कर रहा है, वह अत्यन्त विकट एवं दुर्भाग्यपूर्ण है। सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि हम सभी लोग किसानों के हितैषी होने का पुरजोर दावा तो करते हैं लेकिन इन सबके बावजूद किसानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा है। मैं कहना चाहता हूं कि यह सरकार किसान की है और जब किसान, हमारा अन्नदाता, ही खुशहाल नहीं रहेगा तो देश की तरक्की की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। हमें तय करना होगा कि जब अकाल पड़ता है, सूखा आता है, भूकम्प आता है या कोई अन्य दैवीय आपदा आती है, तो इन आपदाओं से किसानों की किस प्रकार रक्षा की जाये। ऐसी क्या व्यवस्था स्थापित की जाए कि इससे किसानों को कम से कम नुकसान हो। अगर आप सूखे पर विचार कर के लिए खड़े हैं तो आपको अपना दृष्टिकोण बदलना होगा। सिंचाई के उपयुव्त साधन न होने के कारण भी किसानों को सूखे का दंश झेलना पड़ता है। मेरी लोक सभा क्षेत्र के जनपद कानपुर नगर एवं कानपुर देहात जो कि निचली नहर गंग के अंतिम छोर पर अवस्थित है जिसके कारण से पिछले कई दशकों से यह क्षेत्र नहरी सिंचाई से शून्य है, राजबहों, नहरों, बम्बों की सफाई न होने एवं पानी न आने के कारण भी किसानों के खेतों पर पानी नहीं पहुंच पाता है। जैसे जनपद कानपुर देहात के रूरा से वन्नाजारवा से निकलते हुए घुघुवा के पास से नोन नदी में मिलने वाला माइनर कई महीनों से पानी न आने के कारण सूखा पड़ा है। जिससे फसल सूख कर बर्बाद हो जाती है। इस संबंध में मैंने प्रदेश सरकार के विभागीय अधिकारियों को अपने लोक सभा क्षेत्र से संबंधित रजबहों, माइनरों, बम्बों एवं नहरों में सिल्ट सफाई न होने एवं पानी न होने के कारण किसानों की सूख रही फसल के संबंध में दिनांक 09.04.2015 एवं दिनांक 02.06.2015 के पत्रों के माध्यम से उव्त समस्या के निदान की अपेक्षा की थी, किन्तु प्रदेश सरकार के अधिकारियों की उदासीनता के कारण समस्या जस की तस बनी रही। जनपद कानपुर देहात में यमुना नदी पर अमराहट पम्प कैनाल योजना का उद्धाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री जी द्वारा किया गया था, जिसका अभी तक मात्र एक चरण ही पूर्ण हो पाया है। उव्त कैनाल के चालू होने से जनपद कानपुर देहात के किसानों की सिंचाई संबंधी समस्या का निदान हो सकता था किन्तु प्रदेश सरकार के नकारात्मक रवैये के चलते उव्त योजना अभी जस की तस है। रजबहों एवं बम्बों तक में पानी नहीं है। नहर सिंचाई के बाद सिंचाई का जो दूसरा साधन है वह है बिजली, जिसकी आपूर्ति भी अत्यन्त दयनीय स्थिति में होने के कारण खेतों की सिंचाई हो पाना असंभव होता है। किसानों को समय पर बिजली न मिल पाने के कारण, चाहे वो निजी नलकूप हों या फिर राजकीय नलकूप सभी के सभी ठप्प पड़े हैं, किसानों को समय पर बिजली न के बराबर मिल पाती है।
दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तहत केन्द्र सरकार पूरी तरह से सहयोग को तत्पर है किन्तु यह योजना अपने लक्ष्यों को पाने में क्यों विफल हो रही है, यह चिन्ता का विषय है जिन गांवों का विद्युतीकरण हो गया है, वहां पर्याप्त मात्रा में विद्युत आपूर्ति नहीं है तथा अनेकानेक गांव ऐसे हैं जहां का विद्युतीकरण अभी होना है तथा समयावधि के बीतने के बाद भी इन गांवों में बिजली नहीं पहुंची है। पूरे प्रदेश में इस योजना के क्रियान्वयन की समीक्षा की सख्त जरूरत है। इस बात के बावजूद कि संबंधित सांसद को इस व्यवस्था से सम्बद्ध किया गया है फिर भी प्रदेश के अधिकारियों के रवैये के कारण अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो रहे हैं। इसलिए इसके पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है। पुनर्मूल्यांकन में विद्युतीकरण गांवों की परिभाषा, विद्युत आपूर्ति की समयावधि, फीडर सेपरेशन व ट्रांसफार्मर की क्षमता व गुणवत्ता तथा इसके क्रियान्वयन में शामिल एजेंसियों की भूमिका भी शामिल होनीचाहिए, जिससे कि सरकार की मंशा के अनुरूप कुछ हासिल किया जा सके।
* डॉ. प्रीतम गोपीनाथ मुंडे (बीड): सदन में सूखे पर चर्चा हो और उसमें महाराष्ट्र के मराठवाड़ा विभाग से और उस पर भी बीड जिले से होने के नाते अगर मैं अपनी आवाज न उठाऊं, तो यह केवल गैरजिम्मेदाराना ही नहीं होगा बल्कि यह चर्चा पूरी ही नहीं होगी ।
आज जिस जिले से बीड से मैं चुनकर संसद में आयी हूं, उसकी स्थिति कुछ इस प्रकार है। मेरे जिले में 1403 गांव हैं और दुर्दशा देखिए कि 1403 गांवों में सूखा घोषित हो चुका है । यह समस्या केवल आज की नहीं लगातार चौथा साल हम सूखे का मुकाबला कर रह हैं । किस सरकार की क्या खामियां रहीं, कौन सी सरकार ने क्या किया और क्या नहीं किया, इसे न खत्म होने वाली बहस को मैं हवा नहीं देना चाहती ।
सदन में चर्चा इस पर हो कि अब क्या करना चाहिए? सृष्टि के चक्र को क्या हम अपने किसानों को इतना सबल नहीं बना सकते कि वे इस सूखे से सामना करने की लड़ाई में हार के अपनी जान न गवायें ।
आज मेरे चुनाव क्षेत्र में 1403 गांव हैं, जिसमें से हर एक गांव में सूखा घोषित हो चुका है। फसल की उत्पादकता 40 प्रतिशत से कम है । आज की तारीख में 800 टैंकर चल रहे हैं । आने वाले समय में स्थिति और गंभीर होगी । राहत के लिए एक बात जरूर है कि 350 करोड़ का फसल बीमा हमारे जिले में बंट चुका है, खरीफ की फसल के लिए और रबी का अब शुरू है । जिन लोगों ने यह आलोचना की थी कि बीमा राशि किसानों तक नहीं पहुंची, उनको यह बताना चाहती हूं कि जिला प्रशासन और हम जनता के प्रतिनिधि मिलकर इसके लिए प्रयास करें तो यह संभव है । सिर्फ बड़े-बड़े पैकेजेज की मांग करना या सरकार द्वारा उनकी घोषणा होना काफी नहीं है । उनकी जरूरत है । परन्तु एक डॉक्टर होने के नाते मैं Prevention is better then cure में सच्चा विश्वास रखती हूं और इंसान की जिन्दगी की जान की मेरे लिए बहुत अहमियत भी है । पैकेजेज दुखी परिवार के माली कष्ट थोड़ी मात्रा में दूर कर सकते हैं, लेकिन उनके परिवार के सदस्य को वापिस नहीं ला सकते । अपने क्षेत्र का अनुभव ध्यान में रखते हुए मैं कुछ मुद्दों पर सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहती हूं ।
जलयुव्त शिवार-इस योजना के चलते सारी नदियों-नालों को चौड़ा और गहरा करने का जो काम चल रहा है, वे बेहद ही उपयुव्त और एक पारदर्शी काम रहा है । राजस्थान से भी समिति आकर इस योजना की जानकारी ले चुके हैं । महाराष्ट्र सरकार की यह सबसे सफल और लोकप्रिय योजना रही है । अन्य राज्य इससे प्रेरणा लेकर अपने राज्यों में इसका उपयोग कर सकते हैं ।
प्रधानमंत्री किसान सिंचाई योजना के चलते महाराष्ट्र में आई.डब्ल्यू.एम.पी. को बंद करने की चर्चा है । PMKSY यह एक बेहद ही उपयुव्त योजना है । इसके तहत हर खेत को पानी और Every drop more crop महाराष्ट्र में खेती का कुल क्षेत्र 17,386 हजार हैक्टेयर है जिसमें से सिंचाई क्षेत्र केवल 3000 और 14000 हजार हैक्टेयर क्षेत्र बारीश के पानी पर निर्भर है ।
इन लक्ष्यों को सामने रखा गया है । इनकी पूर्ति तो महाराष्ट्र से शायद सूखे का निशान ही मिटा दे, पर कम से कम आने वाले 2 सालों तक आई.डब्ल्यू.एम.पी. को राज्य में बंद न किया जाये।
इस भीषण सूखे का सामना करने के लिए केंद्र सरकार ने मनरेगा में 100 दिनों से ज्यादा काम हो तो वह भी मनरेगा में शामिल करने का निर्णय लिया है । यह जो राशि उपलब्ध करवायी है उसको सूखा पीड़ित गांवों में ही विनियोग करने का निर्देश दिये जायें ।
महिला सबलीकरण-National Rural Livelihood Mission को सूखा प्रभावित क्षेत्र में Intensive Phase में चलाकर महिलाओं को घर में आर्थिक सहायता करने का अवसर देना चाहिए, जिससे कि फसल को तबाह होने पर हमारे किसानों पर खुदकुशी करने की नौबत न आये ।
आसान, कृषक अनुकूल तथा आसानी से भुगतान योग्य ऋण योजनाएं लाना चाहिए। ऐसे कुछ मुद्दों पर ध्यान देकर जो पीड़ित किसान हैं, उनको हो चुके नुकसान का मुआवजा और आने वाली मुश्किलों का सामना करने की ताकत हम दे सकते हैं ।
अंत में इतना ही कहूंगी कि देश में हर मुंह को निवाला देने वाले अन्नदाता के घर में चूल्हा जलना चाहिए, न कि उसकी चिता ”जय जवान जय किसान” को सिर्फ एक नारा बनाकर नहीं रखना है ।
श्री प्रतापराव जाधव (बुलढाणा) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं मराठी भाषा में अपना भाषण देना चाहता हूं।
HON. DEPUTY SPEAKER: Hon. Member, we will call you next as the interpreter is not there.
श्री प्रतापराव जाधव : उपाध्यक्ष महोदय, मैं हिन्दी में अपना भाषण दे देता हूं।
HON. DEPUTY SPEAKER: Okay.
श्री प्रतापराव जाधव: महोदय, हमारे देश के किसान को अन्नदाता कहा जाता है। लेकिन आज देश के किसानों की हालत ऐसी है कि वे आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं। भारत देश कृषि प्रधान देश है। देश में रेल के लिए बजट लाया जाता है। यहां सबसे ज्यादा जनता, 60 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं। मैं माननीय कृषि मंत्री जी से पूछना चाहता हूं कि क्यों नहीं इस देश में कृषि के लिए अलग से बजट लाया जाता है ताकि किसानों को राहत मिल सके।
महोदय, मुझ से पहले कई साथियों ने कहा कि कृषि को उद्योग का दर्जा मिलना चाहिए। आज कृषि की हालत बहुत बदतर है। यहां बहुत से माननीय सदस्यों ने कहा, हमारी सरकार ने पिछले साल सूखे की वजह से किसानों के लिए कर्ज के पुनर्गठन का एलान किया। मैं माननीय कृषि मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि आप जांच कीजिए क्योंकि महाराष्ट्र के 50 परसेंट किसानों के कर्जे का पुनर्गठन नहीं हुआ है। इसके अलावा जो भी पुनर्गठन हुआ, समय पर नहीं हुआ। किसान उधार में बीज लाए, खाद लाए, बुआई की, व्यापारियों को ज्यादा पैसे दिए और उसके बाद दो-तीन महीने बाद बैंक वालों ने मर्जी से कर्ज का पुनर्गठन किया जो किसानों के हित में नहीं था और किसानों को इससे कुछ भी फायदा नहीं मिला।
महोदय, किसानों की एक मांग रहती है कि फसल के खर्चे पर आधारित दाम मिले। लेकिन क्या होता है? अभी मैं आपके सामने दाल का उदाहरण रखता हूं। हमारे देश में दाल की पैदावार कम हुई है इसलिए सरकार और सबको मालूम था कि इस साल दाल के भाव थोड़े बढ़ेंगे। इस कारण बड़े व्यापारियों ने स्टाक कर लिया, तूहर की दाल के भाव बढ़ गए। तब हमारी सरकार जागी और अन्य देशों से दाल का आयात किया। दाल क्या भाव मिली? दाल के आयात के कारण 12000 रुपए प्रति क्विंटल से ज्यादा दाम हो गया। किसान जो तूहर का उत्पादन करते हैं, उन्हें कितना दाम दे रहे हैं? अगर उनको उत्पाद का अच्छा भाव नहीं मिलेगा तो किसान कैसे उत्पादन करने के लिए प्रेरित होगा? आज की स्थिति ऐसी है कि तूहर का दाम 8000-8500 रुपए प्रति क्विंटल है। अब आयात की गई दाल भी पोर्ट पर आना शुरु हो गई है। आयात की गई दाल चार या पांच लाख टन है, वह भी देश में आएगी और अगर इधर किसानों की फसल का बाजार में आने का समय एक ही होगा तो किसान को उत्पाद का सही दाम नहीं मिलेगा। अगर किसान को सही दाम नहीं मिला तो अगले साल बुआई कम होगी, इस कारण अगले साल भी दाल का दाम बढ़ेगा और सरकार को दाल का आयात करना पड़ेगा।
महोदय, बहुत सालों से बीमा योजना किसानों के लिए है, फसल के लिए है। फसल बीमा का फायदा किसानों को कितना होता है? किसान जितनी इंस्टालमेंट भरते हैं उतना भी पैसा बीमा कंपनी किसानों को नहीं देती है। सरकार से ज्यादा पैसा ऐंंठ लेते हैं, किसानों से पैसा ऐंंठ लेते हैं और जब किसानों को देने का समय आता है तो सब बीमा कंपनियां मनमर्जी से उत्पादन का एवरेज निकालकर बीमा राशि समय पर नहीं देती हैं।
महोदय, महाराष्ट्र में जो भी किसान आत्महत्या करता है, महाराष्ट्र सरकार उसके लिए एक लाख रुपए का मुआवजा देती है। मैं आपके माध्यम से माननीय कृषि मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि इस देश में अगर दारु पीकर कोई मरता है तो उसके घर के लोगों को दो-तीन लाख रुपए की मदद दी जाती है। महाराष्ट्र सरकार ने भी चार लाख रुपए की मदद की है। जब कोई किसान आत्महत्या करता है तो बहुत नियम लगाए जाते हैं, क्या उसके ऊपर कर्जा है, क्या बैंक ने नोटिस भेजा है? महोदय, किसानों के बारे में सोचते समय जो भी हमारी ब्यूरोक्रेसी है, चाहे वह कलैक्टर हो, चाहे वह तहसीलदार हो, या जिले की कमेटी हो, इतनी बारीकी से क्यों देखते हैं? इसके बाद जब भी किसी कर्मचारी के लिए कानून बना है, उनको भी बहुत सारी सहूलियतें हमने दीं, फिर उनको सहूलियतें देते समय इतनी बारीकी से क्यों नहीं देखा जाता?
मैं उदाहरण के तौर पर यहां पर बताना चाहूंगा कि कोई कर्मचारी यदि ऑन डय़ूटी मर जाता है तो उसके घर के किसी लड़के या लड़की को अनुकम्पा के आधार पर नौकरी दी जाती है। क्या यह कभी देखा जाता है कि वह दारू पीकर मर गया या कैसे मरा? देश में कई कर्मचारी हैं, जो अपने मुख्यालय पर नहीं रहें तो भी वे घर-भाड़ा वसूल करते हैं।...(व्यवधान) जो कर्मचारी यहां पर मेडिकल बिल्स लेते हैं, तो पांच लाख रुपये के बिल भी ले जाते हैं. मैं कृषि मंत्री जी से मांग करूंगा कि किसी भी कारण से अगर किसी भी किसान के घर में आत्महत्या किसी काम करने वाले की या प्रमुख व्यक्ति की होती है तो वहां पर मुआवजा या मदद सरकार की ओर से मिलनी चाहिए।
हम मनरेगा की योजना लेकर आए। मनरेगा का अर्थ क्या है? मनरेगा का अर्थ यह है कि जो अनस्किल्ड लोग हैं. उनको कम से कम सौ दिन की मजदूरी मिलनी चाहिए। मैं माननीय मंत्री जी से यह भी बताना चाहूंगा कि इस देश में अगर अनस्किल्ड लोगों को रोजगार देने वाला अगर कोई होगा तो वह किसान है, खेती है, तो फिर क्यों न हम इस मनरेगा को खेती के साथ जोड़ें कि अगर कोई मजदूर किसान के खेत में काम करे तो भी सौ दिन की मजदूरी मनरेगा के माध्यम से किसानों को इंवाल्व करके मजदूरों को अगर हम देंगे, उससे भी किसानों को लाभ होगा, राष्ट्रीय उत्पाद भी बढ़ेगा और अनस्किल्ड लोगों को काम देने की जो हमारी सोच है, इससे उनको मदद मिलेगी।
अभी मैं एक ही मांग करूंगा कि हमने बहुत सारे पैकेज दिए। पिछली यूपीए की सरकार के समय में भी महाराष्ट्र में अकाल पड़ा था। उन्होंने पैकेज दिया। पैकेज यह था कि जिनके खेत में बिजली नहीं, उनको बिजली की मोटर दी गई। जिनके खेत में बावड़ी नहीं, कुंआ नहीं, उनको इंजन दिया गया। जिसके पास बैल नहीं, उनको खेती के औजार दिये गये और फिर लोगों ने भी उनको जमा किया और बाजार में बेच दिये। मैं यहां पर यह मांग करूंगा कि अभी महाराष्ट्र में हमारे शिव सेना के उद्धव ठाकरे साहब ने हर जिले में हर किसान के घर में जाकर जिस जिस किसान ने आत्महत्या की है, उस किसान को सीधे मदद देने का काम किया और आज भी हमारे नेता हर महीने एक जिले में मदद देने का काम कर रहे हैं। उनकी भी यही मांग है कि अगर किसानों को सही राहत देनी है तो एक बार किसानों को सौ प्रतिशत कर्जा मुक्ति दो। कर्जा माफी नहीं। माफी तो उसे दी जाती है जो गुनहगार होता है। किसानों ने कर्जा लिया है, लेकिन उन्होंने कोई गुनाह नहीं किया है।
किसानों ने कर्जा लिया लेकिन वहां पर नैसर्गिक आपत्ति आ गई। कभी सूखा पड़ गया या कभी ओले गिर गये, कभी ज्यादा बरसात हो गई। प्राकृतिक आपत्ति के कारण से किसान अपना कर्जा नहीं चुका सके। इसलिए मेरी सरकार से यही मांग है कि किसानों को सौ प्रतिशत यदि हम कर्जे से मुक्ति दे देंगे तो उनको बहुत बड़ी राहत मिलेगी। यही कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। धन्यवाद।
श्री अभिषेक सिंह (राजनंदगांव) : माननीय उपाध्यक्ष जी, आज पूरे देश में सूखे की जो गंभीर स्थिति पर चर्चा हो रही है और सदन में किसानों के इस विपरीत समय पर जो चर्चा हो रही है, वह सदन की और इस सरकार की संवेदनशीलता का परिचय देता है। मैं आपको और पूरे सदन को धन्यवाद देना चाहता हूं कि इस गंभीर विषय पर हम चर्चा करने को तैयार हुए हैं। मुझे उम्मीद है कि सदन की इस सार्थक चर्चा से आने वाले समय में इन कठिन परिस्थितियों में हम किसानों के हितों की बात को जमीन तक पहुंचा पाएंगे।
मैं अपने संसदीय क्षेत्र राजनंदगांव और छत्तीसगढ़ प्रदेश की स्थिति को बयान करने के लिए आपके समक्ष उपस्थित हुआ हूं। महोदय, हर वर्ष नवम्बर और दिसम्बर माह में जब धान की कटाई का समय आता था, तब पूरे छत्तीसगढ़ के सभी गांवों में उत्सव और त्योहार का माहौल हो जाता था। हर गांव में किसानों के चेहरे पर खुशी दिखती थी लेकिन दुर्भाग्य से पिछले 12 सालों का सबसे बड़ा सूखा इस बार छत्तीसगढ़ प्रदेश में पड़ा है। मेरे लोक सभा क्षेत्र में 13 तहसीले हैं और 13 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। पूरे छत्तीसगढ़ प्रदेश के 27 जिलों में से 25 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है और 146 तहसीलों में से 117 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। केंद्रीय टीम छत्तीसगढ़ में जा कर जमीनी दौरा कर चुकी है और राज्य सरकार का सूखा राहत का प्रस्ताव लगभग 6034 करोड़ रुपयों का आदरणीय मंत्री जी के पास पहुंच चुका है। यह स्थिति पिछले 12 सालों में पहली बार आई है। हालांकि जब छत्तीसगढ़ राज्य का जन्म हुआ था, तब बहुत विपरीत परिस्थितियां पूरे प्रदेश में थीं। वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ में सिंचाई का प्रतिशत मात्र 21 था जो आज बढ़कर 33 प्रतिशत हो चुका है लेकिन उसके बाद भी हम नेशनल एवरेज जो कि 45 प्रतिशत है, उससे काफी पीछे हैं।
मैं आदरणीय मंत्री जी से निवेदन करना चाहता हूं कि सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि उन सभी राज्यों को ध्यान में रखते हुए जिनकी सिंचाई का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से कम है, उन्हें तेजी से आगे बढ़ाने के लिए कोई योजना बनाएं। इसके साथ-साथ छत्तीसगढ़ में पिछले 12 सालों में प्रयास हुआ है कि खेती की लागत कम की जाए। खेती की मेहनत का उचित मूल्य किसानों को मिल सके और इसके लिए लगातार कई प्रयास हुए हैं। वर्ष 2000 में किसानों को 13 प्रतिशत की ब्याज पर ऋण दिया जाता था और आज हम जीरो प्रतिशत पर किसानों को ऋण दे रहे हैं। वर्ष 2003 का आंकड़ा मैं सदन के सामने रखना चाहता हूं। किसानों को कुल ऋण का जो वितरण हुआ करता था, वह 250 करोड़ रुपयों के आस-पास का आंकड़ा था जो आज बढ़कर 2900 करोड़ रुपयों के आस-पास पहुंच चुका है। जीरो परसेंट ब्याज पर 2900 करोड़ रुपयों का ऋण हम आज किसानों को दे रहे हैं। इसके साथ-साथ 4,75,000 किसानों को हम वर्ष 2000 में लोन देते थे लेकिन आज इनकी संख्या बढ़कर 13 लाख हो चुकी है। इन सभी आंकड़ों पर ध्यान डालने के बाद भी इस बार जो सूखा आया है, उसने किसानों की आर्थिक स्थिति को बेहद चोट पहुंचाई है इसलिए मैं केंद्र सरकार से, मंत्री जी से निवेदन करना चाहता हूं कि जल्दी से जल्दी राज्यों की ओर से और केंद्रीय दल की रिपोर्ट के अनुसार सूखा राहत राशि की मांग की गई है, छत्तीसगढ़ और पूरे देश के किसानों को मुहैया कराई जाए।
महोदय, छत्तीसगढ़ 42 प्रतिशत वन सम्पदा से आच्छादित क्षेत्र है। इस वजह से सिंचाई की बहुत सारी परियोजनाएं पर्यावरण और फारेस्ट क्लीयरेंस की वजह से लम्बित हैं। वे सभी राज्य जहां ज्यादा जंगल हैं, वहां सिंचाई की परियोजनाओं के विस्तार में पिछले दशकों में बहुत कमी आई है। इसके साथ-साथ मेरी लोकसभा का क्षेत्र छायावृष्टि क्षेत्र के अंदर आता है और पूरे देश के अनुपात में औसत वर्षा सामान्य से हमेशा कम रहती है। मेरा निवेदन है कि पूरे देश के छायावृष्टि के क्षेत्र चिह्नित किए जाएं और उनके लिए हम सिंचाई की एक वृहद परियोजना बनाएं ताकि सिंचाई की दृष्टि से पिछड़े राज्यों को आगे ले जा सकें। इसके साथ-साथ कृषि विज्ञान केंद्र कृषि आधारित हर विकास खंड में उपस्थित होने चाहिए जिससे कि किसानों को कृषि की मार्डन टेक्नोलोजी को समझने में और जमीन पर उतारने में एक्सटेंशन में मदद मिल सके। मैं यह भी निवेदन करना चाहूंगा कि हमारा देश कृषि प्रधान देश है और देश की 70 प्रतिशत आबादी खेती से जुड़ी है लेकिन आज भी कृषि अनुसंधान को स्टेट सूची में रखा गया है। मैं सरकार से निवेदन करना चाहूंगा कि कृषि को कृषि अनुसंधान को संविधान की समवर्ती सूची में शामिल किया जाए।
मैं अंत में छत्तीसगढ़ के किसानों की संवेदना को व्यक्त करते हुए छत्तीसगढ़ी की दो पंक्तियों के साथ अपने वक्तव्य को समाप्त करना चाहूंगा।
" सूखा लेतै मत डर संगी, सूखा लेतै मत डर संगी हर किसान हमर मितान हय, जेन माटी के पांव पखारो जेन माटी के पांव पखारो, उही भुइयां भगवान हय। "
SHRI ASADUDDIN OWAISI (HYDERABAD): Hon. Deputy Speaker Sir, the drought situation in the country is very grave and never in the last 15 years have we seen such kind of drought in our country. I propose to the Government that it is very important and it is the need of the hour that the hon. Prime Minister calls a meeting of all the seven States who are suffering an unprecedented drought. That meeting has to be chaired immediately by the Prime Minister if he cannot visit these drought-affected States.
The second point is that in Uttar Pradesh, especially in Bundelkhand, we have seen that because of severe drought, poor people are consuming rotis made of grass and sabzis made of wheat. What we are seeing is that the ruling party over there is celebrating birthday parties and eating cakes and the poor people are force to eat rotis made of grass and sabzis made of wheat. It is really shameful. This is not said by me but it is a survey done by Shri Yogendra Yadav under Swaraj Abhiyan which says that out of seven districts in Uttar Pradesh, 80 per cent of the households have decreased consumption of daal and milk for the small children. This is an emergency situation and I hope that the Government will respond. … (Interruptions) I also want to ask the hon. Minister of Agriculture to please find out if this is a man-made situation in Bundelkhand. A special package of Rs 7,266 crore was also given as drought relief in 2009. What has happened to that? Where has that money gone? It is the Government of India money.
The next point is regarding MGNREGA. If a State declares a drought, under MGNREGA, one is entitled for 150 days of work. But you can find out that not even 100 days’ work is given in any State. I also want to know why this Government has brought a bad name to the legacy of Shri Vajpayee. This Government has phased out the Antyodaya scheme. Specially when States are facing drought, you have issued executive order whereby no new Antyodaya Card can be given, you have made Aadhar mandatory and you have freezed the whole coverage. Can you relax that? Your executive order was issued on March 28 by the Department of Food and Public Distribution. Please amend it or remove it because things are very bad on the ground.
Now I come to my home State of Telangana. Already my State has spent Rs 118 crore under SDRF. That is not enough but that is the most the State Government can do. They have declared 231 mandals as drought-affected and in the last 20 years Telangana has faced 18 years of drought. That is why the State Government is asking the Central Government for Rs 2,514 crore. The Government has Rs 5,690 crore under NDRF. It is high time that Telangana is given its rightful share. My State is demanding Rs 2,514 and this is very important because Rs 134 crore is required for drinking water for Hyderabad city alone.
Lastly, I come to Maharashtra. About 15,000 villages have been declared as drought-affected. In Marathwada, more than 1,500 farmers have committed suicide, the highest being in Beed, Nanded, Aurangabad and other places. I do not know what the Government is doing. Why can you not call the national banks and tell them, ‘For God’s sake, give them new loans, and restructure the new loans.’ If you have the power, please waive off the loans because 1500 farmers have committed suicide in Marathwada alone. With the beef ban imposed by the State Government, the poor farmer cannot even go and sell his cattle now and even if he wants to sell it, no one will buy it. Can this Government also take a policy decision that they will not allow any more sugar mills in the dry area of Marathwada? It is because those sugar mills have taken away all the ground water. There is no drinking water. There is severe situation in Maharashtra and that is why Rs 4,000 crore has been demanded by Maharashtra Government. Let them have it because under NDRF you have Rs 5,690 crore. You have the money, you have the finances. There is no point in standing here and saying, ‘whatever is your need, we will give you.’ It is high time the Prime Minister went there, visited these States, called a meeting in Delhi and told the whole nation what this Government proposed to do. It is a very emergency situation; it is very grave. I hope the Government responds.
Thank you.
*श्री सुमेधानन्द सरस्वती (सीकर): नियम 193 के अन्तर्गत सूखे के संदर्भ में हुई चर्चा के विषय में लिखित में आपने विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ । सूखा भारत के लिए विकट समस्या बन गया है । मैंने विभिन्न विद्वान सदस्यों को सुना हे अनेक सदस्यों ने बहुत ही शोधपूर्वक सार्थक विचार प्रस्तुत किये हैं । विषय यह है कि समस्या के कारण और निवारण दोनों ही विषयों पर गंभीरता से सोचना आवश्यक है । इस समस्या में प्रमुख कारण है जलवायु प्रदूषण, धीरे-धीरे मौसम में परिवर्तन आ रहा है । जो सर्दी नवंबर में होनी थी वह दिसम्बर अन्त में आ रही है इसी प्रकार गर्मी व वर्षा की स्थिति है । देश के अनेक प्रान्त इस समस्या से जूझ रहे हैं । देश की वर्तमान मोदी सरकार इस विषय में अच्छा कार्य कर रही है । परंतु इस विषय में त्वरित समाधान के साथ-साथ स्थाई समाधान पर विचार करना पड़ेगा ।
मैं राजस्थान के सीकर क्षेत्र से सांसद हूँ । राजस्थान प्रान्त का हर जिला सूखे की चपेट में रहता हे । राजस्थान में सदैव मानसून का अभाव रहता है । विशेष रूप से अकाल के समय पशुधन का 10 औ अकेले राजस्थान में है दिल्ली में भी दूध राजस्थान से ही आता है परंतु अकाल के समय किसान के लिए पशुपालन एक समस्या बन जाती है । जिस पशु से उसको रोजगार मिलता था वहीं पशु किसान के लिए अभिशाप बन जाता है । अतः सूखे की समस्या से निपटे बिना किसान को बचाना कठिन है और यदि किसान नहीं बचा तो कोई भी नहीं बचेगा क्योंकि जनता के लिए अन्न, दूध, फल व सब्जियां सभी किसान देता है । यह समस्या मात्र किसान की समस्या नहीं है यह राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति की समस्या है । अतः इस समस्या से निपटने हेतु मेरे कुछ सुझाव हैं, जो इस प्रकार हैं-
1. पर्याप्त वर्षा हेतु-जलवायु को संतुलित करना। उसके लिए पर्याप्त मात्रा में वृक्षारोपण करना । वृक्षों के दोहन को बन्द करना ।
2. प्लास्टिक की थैलियों को बन्द करना ।
3. प्राचीन भारतीय परंपरा यज्ञ को प्रोत्साहन करना, यज्ञ पर अनुसंधान करना ।
4. उद्योगों में प्रदूषण नियंत्रण हेतु आधुनिक यंत्र लगाना ।
5. नदियों के पानी को रोककर उससे तालाबों में पानी संकलित करना ।
6. नदियों को जोड़कर बाढ़ पीड़ित क्षेत्र से सूखाग्रस्त क्षेत्र में पानी को ले जाना ।
7. समय-समय पर किसानों की स्थिति पर विचार करना । इस हेतु आयोग का गठन हो।
8. अकाल की समस्या के समाधान हेतु एक स्थाई समिति या आयोग का गठन करना ।
इसके अतिरिक्त राजस्थान के विषय में कहना चाहूंगा कि इस प्रान्त हेतु विशेष योजना बने तथा इस प्रान्त हेतु पेयजल तथा सिंचाई हेतु विशेष सहायता दी जानी चाहिये । इस प्रान्त में पंजाब की नदियां, सतलज, रावी व व्यास नदी के पानी को लाने की योजना बनाई जाये । वर्षा ऋतु के समय इन नदियों का पानी बहकर पाकिस्तान जाता है बाढ़ की स्थिति में भारत सरकार को पाकिस्तान की सरकार को सहायता देनी हाती है ।
अतःइस पानीको रोककरराजस्थानमें लायाजाए । इसके लिएपंजाब केहरिके हैडसे नदीखोदकर लाईजाए तथापश्चिमिराजस्थानके चुरू,सीकर, झुंझुन,नागौर, जयपुरग्रामीण,इत्यादिजिलों कोपानी दियाजा सकताहै । अतः मेराभारत सरकारके माननीयकृषि मंत्रीजी, वित्तमंत्रीजी, वमाननीयप्रधानमंत्रीजी सेविशेष आग्रहहै किइस विषयको गंभीरतासे लियाजाए तथाराजस्थानप्रान्तहेतु एकविशेष योजनाबनाई जाए। अकेलाराजस्थानही देशकी खाद्यान्नव दूधकी समस्याके समाधानहेतु सक्षमहै । अतः देशहित मेंविशेष योजनाकी आवश्यकताहै ।
श्री भैरों प्रसाद मिश्र (बांदा) : उपाध्यक्ष महोदय, आज देश का 25 प्रतिशत से ज्यादा भूभाग सूखे की भयंकर चपेट में है। लगभग 300 से ज्यादा जिले, 18 से ज्यादा राज्य और लगभग 66 करोड़ लोग इससे प्रभावित हुए हैं। मैं जिस क्षेत्र से चुनकर आता हूं, वह बुन्देलखण्ड क्षेत्र में आता है, जिसकी चर्चा अभी ओवैसी जी कर रहे थे। वहां पर लगातार कई वर्षों से सूखे के कारण हालात बहुत खराब हो गए हैं। लगातार किसान आत्महत्या कर रहे हैं, इस वर्ष फिर सूखा पड़ने से न तो खरीफ की फसल हुई है और न ही रबी की बुआई की गयी है। केन्द्र की एक टीम भी गयी थी जो हालात का जायजा लेकर आई है। प्रदेश सरकार ने सूखे की रिपोर्ट देर से ही सही, केन्द्र सरकार को भेज दी है। प्रदेश सरकार ने भी इस क्षेत्र को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है, लेकिन अभी तक कोई राहत कार्य नहीं शुरू कराए गए हैं, न ही राहत राशि जारी की गयी है। लगातार पिछले कई वर्षों से सूखे के कारण, पिछले वर्ष पड़े सूखे और फिर ओलावृष्टि के कारण पूरी फसल नष्ट हो गयी थी, जिसका मुआवजा भी केन्द्र ने डेढ़ गुना बढ़ाकर 9000 से 13500 रुपये प्रति हेक्टेअर कर दिया था, लेकिन अभी भी हमारे यहां केवल 9000 रूपये प्रति हेक्टेअर ही बांटा गया है और उसमें भी आधे से अधिक लोग अभी भी बाकी हैं। बड़ी जोत वालों को भी दो हेक्टेअर तक का मुआवजा न देकर, केवल 9000 रुपये ही दिए गए हैं, बाकी सभी लोग अभी बाकी हैं। सबसे खराब हालत बंटाईदारों की है, जो कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाए हैं। बीमा कंपनियों ने अभी तक फसल बीमा का पैसा नहीं दिया है और आधे से ज्यादा लोगों का फसल बीमा का पैसा बाकी है।
इस वर्ष खरीफ की फसल न होने से किसान परेशान हो गया है, वह आत्महत्या करने पर मजबूर है। रबी की फसल की भी आस अब तक बुआई न होने से नहीं रह गयी है। क्षेत्र में शादी-ब्याह तक किसानों ने रोक दिया है। गांवों में ताले पड़े हैं, पूरे बुन्देलखण्ड क्षेत्र से करीब 62 लाख से ज्यादा लोग पिछले दस वर्षों में पलायन कर चुके हैं। केवल मेरे क्षेत्र बांदा से ही 7,37,920 किसान पलायन कर चुके हैं। मेरे दूसरे जनपद, जो मेरे संसदीय क्षेत्र में आता है, चित्रकूट से लगभग 3,44,801 लोग पलायन कर चुके है। यही हाल महोबा जनपद का है जहां से 2,97,547 लोग पलायन कर चुके हैं। हमीरपुर से 4,17,489 लोग और उरई-जालौन से 5,38,147 लोग पलायन कर चुके हैं। झांसी से 5,58,377 लोग और ललितपुर से 3,81,316 लोग पलायन कर चुके हैं। आप अगर वहां जाएंगे तो आधे से ज्यादा घरों में ताले लटकते मिलेंगे। पिछले दस वर्षों में 4000 से ज्यादा लोगों ने खुदकुशी की है। घरों में भोजन की व्यवस्था न होने के कारण बाहर दिहाड़ी के लिए गए लोग, यहां तक कि अभी जो पंचायत चुनाव हुए हैं, उसमें वोट डालने के लिए भी नहीं आ पाए हैं। मेरा सरकार से अनुरोध है कि इस गंभीर समस्या के समाधान हेतु बुन्देलखण्ड क्षेत्र की विशेष परिस्थिति को देखते हुए, इसके लिए अलग से एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया जाए। यह बहुत ही जरूरी है। बुन्देलखण्ड क्षेत्र की परिस्थिति बहुत ही विषम है। समिति लगातार हो रही प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के उपाय सुझाए तथा वर्तमान हालात से लोगों को उबारने हेतु कारगर उपाय किए जाएं। इस क्षेत्र में कम पानी की फसलें उगाने को प्रोत्साहन दिया जाए, सभी नदियों को आपस में जोड़ने की योजना में इस क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाए, परम्परागत जल स्रोतों एवं सिंचाई साधनों को बढ़ावा देने की विशेष योजनाएं लागू की जाएं। खेत का पानी खेत में रोकने और गांव का पानी गांव में रोकने हेतु योजना बनाकर उसका क्रियान्वयन शीघ्र कराया जाए। ग्रामीण आधारित उद्योगों की शीघ्र स्थापना कराने हेतु व्यवस्था की जाए। किसानों को सीधे सहायता उनके खातों में भेजी जाए, जो कि प्रदेश में रुक जाती है, जैसे मैंने पूर्व में बताया कि साढ़े 13 में से नौ ही दिए हैं। किसान ऋण कार्ड के खातों, लोन के ब्याज यथाशीघ्र माफ कर दिए जाएं, यह मेरा अनुरोध है। किसानों के बिजली के बिल माफ किए जाएं। प्रस्तावित नई गारंटीड फसल बीमा योजना है, जो माननीय अटल बिहारी वाजपेयी और तत्कालीन कृषि राजनाथ सिंह जी के समय शुरू होने वाली थी, उसे यथाशीघ्र लागू किया जाए।
बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण का गठन किया जाए, उसे यहां की सब समस्याओं के समाधान हेतु बजट और अधिकार दिए जाएं। इस क्षेत्र में कृत्रिम वर्षा हेतु एक उच्च स्तरीय संस्थान खोला जाए, जो ऐसे सूखे की विषम स्थितियों में कृत्रिम वर्षा करा सके। क्षेत्र की नदियों से अवैध रेत खनन को रोका जाए। अवैध वन कटाई को रोकने के उपाय किए जाएं। पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था की जाए और चरागाहों को कब्जों से मुक्त कराया जाए।
पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र को बिजली कटौती से मुक्त किया जाए और वहां 24 घंटे बिजली की व्यवस्था की जाए, जिससे किसान निजी साधनों से सिंचाई कर जीने के लायक फसल पैदा कर सके। पेयजल व्यवस्था के समाधान हेतु क्षेत्र के हैंडपम्पों को रीबोर कराकर शीघ्र उपाय किए जाएं। साथ ही नए गहरे हैंडपम्प लगाकर पेयजल समस्या से निजात दिलाई जाए।
प्रधान मंत्री सिंचाई योजना में बुंदेलखंड के सभी जनपदों को शामिल कर इसी वर्ष प्रथम स्टेज पर ही वहां हर खेत में सिंचाई की व्यवस्था हेतु पहल की जाए। यमुना आदि नदियों में जहां अभी जल उपलब्ध है, वहां नई लिफ्ट योजना लगाकर सिंचाई एवम् पेयजल समस्या का समाधान किया जा सकता है। इसलिए इसके लिए एक कारगर योजना बनाई जाए। यमुना पर लिफ्ट योजनाओं की और अन्य नदियों में जहां जल पर्याप्त है, क्षमता बढ़ाई जाए और पूरे बुंदेलखंड की सूखे की समस्या के तुरंत समाधान हेतु सरकार से निवेदन करते हुए मैं अपनी बात को विराम देता हूं।
*SHRI C.R. CHAUDHARY (NAGAUR): I come from the western Rajasthan where drought or famine is a general phenomenon. We face the famine situation for four years out of five years.
I am surprised to know that this time that there is no district figures in the list of drought effected district of the country. The main reason behind it is that of the initial stage the rainfall was so-so but after 15th of August, there was no rainfall and hence the crops could not reap and almost 50% to 65% crops damaged and farmers suffered because of it. This matter was raised in State Assembly by the MLAs and reports were called by the Hon’ble Chief Minister. According to the reports from Collector, 19 districts are under drought situation where 50% and above crops were damaged. I would like to request hon’ble Agriculture Minister to kindly consider the report of the Government of Rajasthan and provided compensation to the poor farmers.
I would like to thank our Central Government and Hon’ble Prime Minister sir for launching good schemes for water conservation in the country.
1. one drop more crop.
2. 60% expenditure of MNREGA have been given for water conservation and others under Agriculture.
3. PMSY- Pradhan Mantri Sinchar Yojana is the best scheme for providing water to every field.
4. Restoring Irrigation Infrastructure by desilting the canals etc. I would like to request the Central Government to implement the following short term and immediate measures to save the farmers.
1. By giving compensation as early as possible.
2. Diesel Subsidy
3. Stay on repayment of loans and that too on interest free for one year.
4. Interest free loan to K.C.C. holder up to 1.5 lakh rupees.
5. Subsidies on sprinklers and solar pumping system.
6. Re-survey of dark zone.
7. New crop Insurance policy should be brought.
Long Term Policy requires the following:
1. Linking of rivers for water to those areas which does not have water.
2. Water conservation.
3. Artificial rainfall.
4. construction of new reservoir.
5. Studies on Al-Nino which is the major cause of weak monsoon.
6. Implementation of Report of Swaminathan Committee.
In the last, I would like to request the Hon’ble Agriculture Minister for immediate action for the followings:- Compensation. Temporary employment. Arrangement of fodder. Providing potable water to the public of famine affected areas. Provide subsidized wheat, rice and pulses to the farmers.
I am highly thankful to your honour for providing me the time to participate in this debate on “Drought Situation in India”. At the same time, I would like to welcome the decisions of our Prime Minister Shri Narenderji Modi for increasing the 50% compensation under NDRF and SDRF and decreasing the percentage of damage limit i.e. 50% to 33%. It is a historic decision of our Government.
*SHRIMATI RAKSHATAI KHADSE (RAVER) : The farmers, throughout the country are facing a serious problem of heavy rainfall in few areas but at the same time drought conditions in some parts of the country. At some places heavy downpour badly affected the crops but in some areas there are drought conditions due to lack of adequate rainfall. In my State of Maharashtra, the percentage of agriculture produce is below 50% in the total 14708 rural areas. Moreover, the Kharip crops were also destroyed due to no rainfall since the month of July. In 15745 villages of Maharashtra, Government has declared drought and it has affected 53 lac hectare of cultivable land. Last year, farmers of Maharashtra were concerned about the overall situation but this year they have landed in trouble due to heavy as well as scanty rainfall.
To get higher yields, the farmers throughout India have been using chemical fertilizers excessively and hence the fertility of the soil has been compromised and it is decreasing day by day. Due to excessive use of chemical the natural atmosphere is affected and even normal seasonal cycle is also disturbed. It has brought no prosperity to the farmers but on the contrary our atmosphere is affected and polluted badly. Today, we are witnessing the side effects of it.
I think, the subsidy given for the chemical fertilzers is partly responsible for its excessive usage. Farmers do not get this kind of handsome subsidy on the organic fertilizers and it is also not readily available in the market at cheaper rates. Hence, the farmers use it excessively which lead to harming our natural resources. We can see, it has disturbed our seasonal cycle and also has resulted to climate change. Usage of organic fertilizers would not bring instant results but we will definitely see the difference in the next 3 to 4 years. A concrete change would be visible only after 8 to 10 years. Due to this disburbed seasonal cycle, we are witnessing irregular and unpredictable climate. We should encourage farmers for maximum use of organic manure. Simultaneously, we should focus on teaching them the latest crop and cultivation techniques along with water usage and irrigation technologies. That would also help to some extent. Providing soil health card to farmers is a welcome step and I would like to thank the Government from the bottom of my heart. It would help the farmers in crop and water management which is turn would be helpful in encountering this climate change.
Government of Maharashtra is implementing different schemes through Department of agriculture and other departments. 'Jalyukta Shivar' is one of them which has received a massive support from people and it has also enhanced the availability of water. It has brought some positive changes in climate too. Through the scheme like NRHM, we can promote afforestration and by conservation of trees, we can slow down the process of climate change and that would also help to check pollution indirectly.
Our entire nation is embracing newer technology but at the same time we are neglecting our natural resources. We have to make a balance between them. To check and control the problems of flood and drought, we should take it as a mission. A committee comprising agriculture scientists, technologists and expert farmers should be constituted and on the basis of the recommendations made by them we should formulate a policy to take some concrete measures. Today, we can see the drastic changes in the atmosphere and climate and it has caused adverse effects on agriculture produce. To overcome this, wise use of water is essential. Rain-water harvesting, water conservation through ponds, lakes and micro irrigation and other special campaigns and programmes should be implemented extensively.
State and Central Government have extended their helping hand to the drought affected farmers. State Government has also paid the annual premiums of Rs.12/- of all the farmers under Pradhan Mantri Suraksha Beema Yojana. Every state has different method of assessment of drought affected area or value fixation which is usually decided within a fixed time. Hence, I would like to request the Government through you that all the states should declare their facts and figures regarding the drought conditions to enable the Central Government to help them on time.
All the States have taken many such initiatives to help the farmers. But for fighting the climate changes, everybody should come forward to take responsibility to deal with this menace. Do not take it as a problem but as a chance to bring in some changes. A joint committee of states should take stock of the situation and also examine the various relief and assistance packages and programmes formulated by different State Governments. A comprehensive policy should be made in this respect to take some futuristic steps.
*SHRIMATI MEENAKASHI LEKHI (NEW DELHI) : River linking and cloud seeding are two essential technologies that the government of India should consider given the frequencies at which we face either flooding or droughts. River linking is the process by which two or more rivers are linked by creating a network of manually created canals and providing land areas that otherwise do not have river water access. Whereas cloud seeding is a form of weather modification used for changing the amount of precipitation that falls from clouds.
In India the rainfall over the country is primarily orographic. The summer monsoon accounts for more than 85 per cent of the precipitation. The uncertainty of occurrence of rainfall marked by prolonged dry spells and fluctuations in seasonal and annual rainfalls is a serious problem for the country.
Countries such as Japan and Brazil excessively use cloud seeding technologies for irrigation of crops where as country like US and UK have created a well connected inland water link.
Given the background that large states such as Uttar Pradesh, Bihar, West Bengal, Orissa, coasts of Tamil Nadu and Kerala and the North Eastern Regions are all prone to flooding and droughts, such technologies would help in resolving the current state of affairs.
In India, roughly 40 million hectare of land is prone to flooding, whereas droughts have led to major famine across the country. By engaging in developing these two technologies, we will be successful in gauging safe river water levels in flood prone areas and divert the excessive water across water links to drought prone areas.
I, therefore, humbly request the government to actively pursue the two technologies and constitute a board to identify the drought and flood prone areas and then map the possible water links to balance the areas with either of the two extremities.
*श्री नारणभाई काछड़िया (अमरेली) : ऐसा देखा गया है कि गुजरात के लगभग तीन वर्षों में एक बार सूखा पड़ता है जबकि राजस्थान, हरियाणा, आध्र प्रदेश तथा कर्नाटक में यदि हम पिछले पांच वर्षों की बात करें तो लगभग प्रत्येक दो वर्षों में एक बार सूखा पड़ता है। उपरोक्त राज्यों मे सूखे का मुख्य कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून में बारिश होना। लगभग 75 प्रतिशत कम वर्षा होने के कारण इन राज्यों में सूखे ने एक भयावह समस्या का रूप ले लिया है।
गुजरात सरकार के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2010 की तुलना में वर्ष 2012 में कम बारिश हुई और वर्ष 2015 में यह बारिश वर्ष 2012 की तुलना में और भी कम हुई है। वर्ष 2014 में कम बारिश के कारण गुजरात के कच्छ तथा उत्तर गुजरात के कुछ क्षेत्र भी मुख्यतः सूखे से प्रभावित हुए हैं। इस वर्ष सौराष्ट्र, दक्षिण गुजरात तथा सेंट्रल गुजरात में कम वर्षा के कारण कई क्षेत्रे सूखे से प्रभावित रहे।
मैं केन्द सरकार से आग्रह करता हूं कि डिजास्टर मैनेजमेंट अथारिटी के अंतर्गत सूखा नियंत्रण केन्द्र हर एक राज्य में स्थापित किए जाएं जो कि सूखा पड़ने की संभावनाओं संबंधित और उससे निपटने के उपाय राज्यों तथा राज्य के किसानों के समक्ष रखें। इसके दूसरे चरण में इस प्रकार के केन्द्र राज्य के हर एक जिले में, जिनमें सूखा पड़ने की संभावना हो, खोले जाएं, जिससे किसानों तथा राज्यों की आर्थिक हानि को रोका जा सके। आज हमारा देश कृषि प्रधान देश कहलाता है। इसे कृषकों का देश कहा जाता है, लेकिन पिछले कई सालों में हजारों-हजार किसानों ने आत्महत्या की। क्यूं आज आजादी के 66 सालों बाद भी किसान की स्थिति वहीं की वहीं है। हम हरेक सत्र में सूखे और किसानो के बारे में चर्चा करते हैं, लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकल रहा है। आज किसान जो फसल उगाता है, उसकी लागत मूल्य नहीं मिलता है। आज अगर गुजरात की बात करें तो गुजरात में जो कॉटन की खेती होती है, पूरे देश में जो कॉटन होती है, उसका 30 प्रतिशत हिस्सा अकेले गुजरात उत्पादन करता है। लेकिन आज उसका एमएसपी बहुत कम है। इसमें किसान को घाटा होता है, तो कैसे वह किसान जिन्दा रहेगा। मेरी केन्द्र सरकार से मांग है कि एमएसपी को बढ़ाया जाए।
*श्री संजय धोत्रे (अकोला) : गत 3 वर्षों से सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि, आंधी तूफान कई दिनों तक वर्षा न होना और एक ही समय ज्यादा बारीस होना इस तरह की आपदा का सामना हमारा किसान कर रहा है । इसके पूर्व की कांग्रेस सरकार की गलत नीतियों के कारण किसानों की हालत पहले ही बहुत गंभीर थी । कांग्रेस सरकार कर्ज माफी का ढोल पीटती रही । इस कर्ज माफी का फायदा किसानों को बिल्कुल नहीं हुआ । इसका लाभ सिर्फ बांकी को हुआ । कांग्रेस सरकार ने किसानों को कुपोषित और कमजोर किया और कर्ज माफी जैसी बेकार दवा दी ।
देश के किसानों की हालत बहुत ही गंभीर और दयनीय है वह पूरी तरह कर्जे में डूबा हुआ है, किसानों की आत्महत्यायें बढ़ रही है । कोई भी व्यक्ति निराश होता कोई उम्मीद नहीं बचती तब आत्महत्या करने पर मजबूर होता । मेरे क्षेत्र में विदर्भ में सबसे ज्यादा आत्महत्यायें हुई और करीब करीब रोज 2-3 आत्महत्यों हो रही इसका कारण गत 3 वर्षों से औसतन उत्पाद के सिर्फ 10 औ से 50 औ फसल का उत्पाद होना । अब ऐसे हालात पैदा हुये कि उसका गुजारा भी नहीं हो सकता । बच्चें की पढ़ाई किताबों के लिए पैसे नहीं खेती के लागत के लिए पैसे नहीं 15 दिन पहले मेरे लोक सभा क्षेत्र में एक किसान के बेटे ने किताबें खरीदने के लिये पैसे नहीं इसलिये आत्महत्या की ।
विदर्भ की प्रमुख फसल कपास, सोयाबीन और तुअर है । कपास के दाम पिछले दस साल पहले 4000 से 5000 रही या कभी तो उससे भी कम दाम किसानों को मिल रहे हैं ।
सबसे ज्यादा पीड़ित हमारा वह किसान है जहां ड्राई लैंड फार्मिंग होती है वह है और यही किसान हमारी अन्तसुरक्षा पूरी करता है । इसकी हालत बहुत गंभीर है, क्रिटिकल है ।
हमें देश का विकास करना है देश को मजबूत बनाना है तो किसानों को मजबूत सशक्त बनाना होगा । किसान हमारे रीढ़ की हड्डी है किसानों को सुरक्षा होगी तो ही खाद्य सुरक्षा होगी ।
इसके लिए कुछ तत्कालीन और दीर्घकालीन उपाय और योजनाए बनानी होगी और पुरानी योजनायों जिसके कारण किसान का नुकसान हुआ उनकी समीक्षा करनी होगी । कई योजनाये ऐसी है जिनमें बहुत ज्यादा लिकेज है इसका लाभ दूसरे ही उठाते हैं । हमारी योजना बनाने वाले लोग जिन्हें जमीनी हकीकत पता नहीं वे लोग योजना बनाते है और वे योजना फेल हो जाती है, फिर भी वह जारी रहती है । काँग्रेस सरकार की योजना (1). खाद्य सुरक्षा एवं (2) मनरेगा से किसान का बहुत नुकसान हुआ इनमें बहुत बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होता है । खाद्य सुरक्षा मतलब किसान की असुरक्षा, मनरेगा मतलब किसान मरेगा और देश डूबेगा ।
मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह जी का अभिनंदन करता हूं । यह सरकार कृषि और किसान को नई दिशा देने का काम कर रही है । जैसा कि हर खेत को मिट्टी की जांच और स्वायल हेल्थ कार्ड बनाना । इससे पता चलेगा कि मिट्टी की स्थिति क्या है और किसान सही मात्रा में खाद माइक्रोन्यूट्रीशीएन्ट दे सकेगा । उसकी लागत कम होगी और उत्पाद बढ़ेगा ।
दूसरी योजना प्रधानमंत्री सिंचाई योजना है । इसके कारण अनइरिगेटेड जमीन इरिगेटेड हो जायेगी ।
इसके साथ ही जनधन योजना, दुर्घटना बीमा योजना, मुद्रा बैंक, कृषि आधारित उद्योग, हाईटेक एग्रीकल्चर वैल्यू एडीशन, मार्केटिंग सपोर्ट ऐसी कई योजनायें इस सरकार ने बनाई मैं प्रधानमंत्री जी का और सरकार का धन्यवाद देता हूँ ।
मैं सरकार से निवेदन करना चाहता हूं ।
1. हमारापश्चिमविदर्भजिसकी सिंचनक्षमता 10 औ सेभी कमहै यहांबहुत सारेइरिगेशनप्रोजेक्टपेंडिंगहै इसकेपूरा कियाजाए ।
2. फर्टीलाइजरसब्सिडीकिसानोंको दीजाए, मैन्यूफैक्चररको नहीं।
3. एमएसपी,मिनिममसपोर्टप्राइस,पुननिर्धारितकी जाए। किसानोंको लागतके कमसे कम 50औ शुद्धलाभ मिले।
4. कृषि फसलबीमा इसकीसमीक्षाकी जाए। सभीफसलों केलिए लागूहो । इसका निर्धारणक्षेत्र 25 वर्ग किलोमीटरसे ज्यादान हो।
5. जंगलीजानवर जैसेकी हिरण,सुअर ,नीलगायइसके कारणफसलों काभारी मात्रामें नुकसानहोता है। इसकेलिए व्यक्तिगतकिसान केखेत केलिए नहींतो पूरेगों कीसीमा कोफेंसिंगलगाने कीयोजना तैयारकी जाए। मुझेविश्वासहै सरकारइस दिशामें कदमउठायेगी।
महाराष्ट्रसरकार नेअगस्त महीनेमें सूखेसे प्रभावितक्षेत्रके लिए 4500 करोड़की मददमांगी था। केन्द्रसरकार ने 1500 करोड़दिये उसकेलिए धन्यवाद। अगस्त केबाद हालतऔर बिगड़ेहैं। इसआपदा सेनिपटनेके लिएकेन्द्रसरकार सेआपके माध्यमसे निवेदनकरता हूंकि तुरंत 10,000 करोड़की सहायताराशि महाराष्ट्रसरकार कोदेने कीकृपा करे।
* श्री सदाशिव लोखंडे (शिर्डी) : सूखे से महाराष्ट्र राज्य पूरी तरह से प्रभावित है और माननीय कृषि मंत्री जी के निर्देश पर एक केन्द्रीय टीम महाराष्ट्र राज्य के मराठवाड़ा क्षेत्र के सूखाग्रस्त जिलों का सर्वे करने गयी थी।
मैं माननीय कृषि मंत्री जी का आभार प्रकट करता हूं कि उन्होंने मेरे अनुरोध को स्वीकार करते हुए मराठवाड़ा क्षेत्र से सटे मेरे संसदीय जिले अहमदनगर के सूखाग्रस्त इलाकों का भी सर्वे करने का निर्देश केन्द्रीय टीम को दिया था और केन्द्रीय टीम द्वारा मेरे संसदीय जिले अहमदनगर का भी सर्वे किया गया। लेकिन, अभी तक विशेषकर मेरे संसदीय जिले अहमदनगर के सूखाग्रस्त किसानों को कोई राहत नहीं मिली है, जिसकी वजह से मेरे क्षेत्र के किसानों में भारी रोष व्याप्त है।
मेरा संसदीय जिला अहमदनगर ही नहीं बल्कि पूरा महाराष्ट्र राज्य इस समय भारी सूखे की चपेट में है। इस संबंध में मेरा एक मुख्य सुझाव यह है कि ठाणे क्षेत्र से लगभग 154 टी0एम0सी0 पानी, जो आर्वी समुद्र में जाता है, उसको समुद्र में जाने से रोककर नीलवण्डे भण्डारदारा डैम में पहुंचा दिया जाए, तो इससे अहमदनगर जिला ही नहीं नासिक एवं मराठवाड़ा क्षेत्र में निरंतर पड़ने वाले सूखे से बचा जा सकता है।
महाराष्ट्र राज्य के अहमदनगर जिले में स्थित अपर प्रवरा नीलवंडे डैम आधे से अधिक खाली है, जिसकी वजह से प्रचुर मात्रा में पानी न उपलब्ध होने के परिणामस्वरूप और अधिक भयंकर समस्या अहमदनगर जिले के किसानों के लिए हो गयी है। पानी की विकट समस्या से अहमदनगर के किसानों, शुगर मिलों, पशुओं आदि की बहुत ही बुरी दुर्दशा है।
आजादी के बाद वर्ष 1972 में महाराष्ट्र राज्य भयंकर सूखे की चपेट में आया था। लेकिन, विगत 2-3 वर्षें से महाराष्ट्र राज्य में जो सूखा पड़ रहा है, वह उससे भी कहीं अधिक भयंकर है। किसानों की हालत बहुत ही खराब है। वे कर्जे से डूबे हुए हैं। फसल उगाने के लिए उनके पास संसाधन एवं पैसा नहीं है।
अतः किसानों के हित में निम्नांकित कदम उठाए जाने की सख्त आवश्यकता है ः-
1- किसानों के सभी कर्जे माफ किए जाएं। 2- किसानों के विद्युत बिल माफ किए जाएं। 3- किसानों के स्कूली बच्चों की फीस माफ की जाए। 4- चारा डिपो की जिस-जिस गांव में आवश्यकता है, वहां पर प्राथमिकता के आधार पर तुरंत स्थापित किए जाएं। 5- दो-तीन वर्ष पूर्व किसानों को 27/- रू0 प्रति लीटर दूध का मूल्य मिलता था, लेकिन आज किसान को दूध की कीमत 27/- रू0 से घटकर 15/- रू0 प्रति लीटर मिल रही है। जबकि आज उसको पशु आहार, पानी, विद्युत, मजदूर आदि की ज्यादा कीमत अदा करनी पड़ रही है। दुग्ध कृषकों को दूध का मूल्य कम से कम 35/- रू0 प्रति लीटर निर्धारित किया जाए। 6- महाराष्ट्र का किसान अपने दुधारू जानवर जो उसने 70 हजार रू0 की कीमत में खरीदे हैं, बदहाली की स्थिति में वह अपने दुधारू जानवर को 70 हजार रू0 के स्थान पर 40-50 हजार रू0 में बेचने पर मजबूर हो रहे हैं। 7- महाराष्ट्र के किसान पानी के अभाव में गन्ना की खेती करने में असमर्थ हैं। अतः उनको आगामी तीमाही के लिए उगाही जाने वाली फसल यथा - कांदा, कपास, टमाटर, आलू, भाजीपाला आदि हेतु केन्द्रीय स्तर से मदद उपलब्ध करवायी जाए।
महाराष्ट्र राज्य की जनता की ओर से केन्द्र की एन0डी0ए0 सरकार को भरपूर समर्थन मिला है तथा आज महाराष्ट्र राज्य में जो सरकार बनी है, उसमें भी महाराष्ट्र राज्य की जनता ने अपना भरपूर समर्थन दिया था, तभी राज्य में सरकार बनी। अतः राज्य एवं केन्द्र सरकार का यह पूरा दायित्व बनता है कि वह राज्य के किसानों को बुरी स्थिति से बचाकर उनको अपना भरपूर सहयोग देते हुए उनके लिए कल्याणकारी कदम उठाए और उनको सूखे से बचाकर यह दिखाए कि दुःख की घड़ी में राज्य एवं केन्द्र सरकार उनके साथ है।
श्री दुष्यंत चौटाला (हिसार) : उपाध्यक्ष महोदय, आपकी अनुमति हो तो मैं यहां से अपनी बात कह दूं। आज नियम 193 के तहत सूखे पर चर्चा हो रही है। पूरे देश के अंदर खास तौर पर हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, ओडिशा और अन्य राज्यों में सूखे की वजह से किसान पूरे तौर पर टूटा हुआ है। पिछले 11 वर्षों में हमारे प्रदेश हरियाणा में इस बार छठी बार सूखा पड़ा है। पिछली बार जब सरकार से हमने सहायता की मांग की थी तो कृषि मंत्री जी ने सदन में खड़े होकर विश्वास दिलाया था कि किसानों के साथ न्याय करने का काम सरकार करेगी। लेकिन पिछले दिनों जब प्रश्न काल के दौरान सरकार से जवाब मांगा गया तो बड़े खेद के साथ मुझे कहना पड़ता है कि उस जवाब के अंदर कहा गया कि हरियाणा में कोई सूखा नहीं है और न ही किसी मक्खी के प्रकोप की वजह से फसल बर्बाद हुई है। हमारी मंत्री जी से निरंतर इस पर चर्चा भी हुई। मंत्री जी ने हमें विश्वास दिलाया कि सरकार इस पर गहन चिंतन के साथ विचार करेगी।
आज यहां देश के तीनों कृषि मंत्री जी मौजूद हैं। मैं हरियाणा प्रदेश के नहीं, बल्कि देश के किसान की बात करना चाहता हूं कि आज जिस तरीके से वित्त मंत्रालय द्वारा वित्त बजट यहां पेश किया जाता है। आज जरूरत है कि सब मिलकर हमारे देश के किसानों के लिए बजट लाने का काम करें। जिस तरह से वित्त आयोग इस देश के भविष्य को तय करने का काम करता है, क्यों नहीं हमारे देश के किसानों के लिए भी एक कमीशन बनाया जाए, जो किसानों के भविष्य को तय करने का काम करे।
यह तो इतिहास बताता है कि जिस तरह से किसान ने अपनी मेहनत से और लगन से सूखे में भी पानी लाकर खेती करने की शुरूआत की है, उसका नतीजा है कि अगले 20 वर्षों में हमारे देश में तीन गुना और पानी की जरूरत पड़ेगी। माननीय प्रधान मंत्री जी का भी यह सपना है और अटल बिहारी वाजपेयी जी का भी सपना था और उन्होंने शुरूआत भी की कि हम नदियों को जोड़ने का काम करें। मैं सरकार से निवेदन करता हूं कि अगर सूखे की मार से किसान को बचाना है तो अटल बिहारी वाजपेयी जी के सपने को पूरा करना होगा, जिससे हम देश की सभी नदियों को आपस में जोड़ कर किसान के खेत में पानी पहुंचाने का काम कर सकें। मैं मंत्री जी से आग्रह करूंगा कि वह इस पर सोचना का काम करें।
आज हमारे देश में प्राइवेट कम्पनीज आकर अच्छी क्वालिटी के बीज बताकर सीड्स को बेचने का काम करती हैं और कहती हैं कि इसमें कम पानी लगेगा और उपज ज्यादा होगी। ऐसी बातें करके ये कम्पनीज महंगे दामों पर किसानों को अपने बीज बेचने का काम करती हैं।
16.00hours हमारे देश के अंदर बीटी-2 कॉटन सीड आया। मैं उस कंपनी का नाम नहीं लेना चाहूंगा। उस कंपनी ने उसका इतनी अच्छी तरीके से मार्किटिंग की कि उसके लिए पानी की कम जरूरत पड़ेगी, कम फर्टिलाइजर की जरूरत पड़ेगी और किसान को भारी मात्रा में कॉटन मिलेगा। हम भुक्तभोगी हैं। मेरी लोक सभा क्षेत्र में छः ऐसे गांव हैं, जहां एक ईंच भी नरमे की फसल नहीं पड़ी, क्योंकि बीटी-2 कॉटन में सबसे ज्यादा अटैक व्हाइटफ्लाई नामक इंसैक्ट का हुआ। हमने सरकार से मांग की कि उस की इनक्वायरी होनी चाहिए और किसानों को मुआवजा दिया जाना चाहिए। आज उस बात को चार महीने का समय हो चुका है, लेकिन किसी ने भी प्रदेश या केन्द्र सरकार की ओर से उन बीज मालिकों के खिलाफ कोई कदम उठाने का काम किया और न ही व्हाइटफ्लाई की चपेट में आए किसानों को किसी तरह का मुआवजा दिया गया।
महोदय, जब हम किसान की बात करते हैं तो हम उसकी मूलभूत सुविधा की बात नहीं करते हैं। आज स्पिंकलर सेट एक ऐसा अल्टरेनेटिव है, जो सूखे इलाकों में या जहां सूखा पड़ता है, वहां किसानों को मजबूती दे सकता है। मगर जहां तक सब्सिडी की बात है तो उस समय की सरकार द्वारा बहुत अच्छी शुरूआत की गयी थी और 70-75 परसेंट तक सब्सिडी प्रिंकलर सेट पर दी गयी। लेकिन जैसे-जैसे किसानों ने उसका ज्यादा उपयोग करना शुरू किया, वैसे-वैसे उस पर सब्सिडी खत्म करने का काम किया गया। आज जो सब्सिडी कम्पनियां देती हैं, वह उन पर देती है, जो साल-डेढ़ साल में खराब हो जाते हैं। आज हमें देखना होगा कि हम किस तरह से सस्ते और क्वालिटी प्रोडक्ट्स किसानों तक सस्ते दामों तक पहुंचा पाएं। रेतीले और सुखे से प्रभावित इलाकों में अल्टरनेटिव इक्युपमेंट्स यदि प्रोवाइड करवा देंगे, जिससे हमारे किसान को कम पानी में ज्यादा उपज मिलेगी तो मेरा यह मानना है कि तब हमारा किसान समृद्ध होगा।
महोदय, आज हरियाणा में 21 में से 10 जिले सूखे की चपेट में हैं। लेकिन हमारे प्रदेश या केन्द्र की सरकार ने किसानों की तरफ देखने का काम नहीं किया है। मैं यह मांग आपके माध्यम से सरकार से करता हूं कि हरियाणा में केन्द्र सरकार की ओर से एक टीम भिजवा कर सफेद मक्खी के प्रकोप से पीड़ित किसानों और सूखे से पीड़ित किसानों के लिए मजबूती से सहारा बन कर उनकी आर्थिक मदद करने का काम सरकार करे। हमारे सांसद साथियों ने एक मांग उठायी है कि अगर सरकार चाहे तो पिछली तीन फसलों से चाहे बेमौसम बारिश हो या सूखा हो, हमारा किसान पूरी तरह से टूट चुका है, इसलिए उनका कर्ज माफ केन्द्र सरकार करे। अगर हमारा किसान समृद्ध होगा तो हमारा देश समृद्ध होगा। आज हमारे देश की आबादी का 62 प्रतिशत हिस्सा खेती से संबंधित रखता है। यदि किसान टूटता है तो उसकी अगली पीड़ी का बच्चा खेती छोड़ कर दूसरे धंधों में जाएगा। यह तो वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट कहती है कि अगर किसान खेती करना छोड़ देगा तो आप यह मानकर चलना की दो या तीन परसेंट की कमी की वजह से भी आपको 50 परसेंट अनाज इस देश में इम्पोर्ट करना होगा।
महोदय, मैं आपके माध्यम से तीनों कृषि मंत्री जी जो यहां बैठे हैं, उनसे आग्रह करूंगा कि हरियाणा में आपकी सरकार है और हरियाणा की ओर देख कर सफेद मक्खी के प्रकोप से, जिस तरह से हमारे किसान टूटे हैं, उनके लिए कम से कम दो हज़ार करोड़ रुपये का मुआवजा देने का काम करें। खास तौर पर सूखे की चपेट में आयी हुई फसलों का जल्दी से जल्दी सर्वे करा कर आर्थिक मदद देने का काम करें। आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
*श्री बीरेन्द्र कुमार चौधरी (झंझारपुर) : बाढ़ और सुखाड़ से पूरा देश तबाह है। खास करके, बिहार में बाढ़ और सुखाड़ दोनों से जूझना पड़ता है। बिहार में कोशी, कमला, बागमती इत्यादि कई नदियां ऐसी हैं जिससे प्रत्येक साल लोगों को बाढ़ की मार झेलनी पड़ती है और बाढ़ चले जाने के बाद सुखाड़ पड़ जाती है। ऐसी परिस्थिति में लोगों के समक्ष भूखमरी का समस्या उत्पन्न हो जाती है। मेरे संसदीय क्षेत्र में कई ऐसी छोटी-छोटी नदियां हैं, जैसे- सुगरवे, बिहुल, बछराजा, अधवार इत्यादि। यदि जगह-जगह पर स्लूस गेट की व्यवस्था कर दी जाती है तो लाखों एकड़ जमीन की सिंचाई हो जाएगी। हम सुखाड़ से निजात पा सकते हैं। प्रधानमंत्री सिंचाई योजना के तहत इन सभी जगहों पर स्लूस गेट की व्यवस्था करवायी जाए।
*श्री रोड़मल नागर (राजगढ़) : सूखा बाढ़, अतिवृष्टि, यह हमारे देश के किसानों के लिए एक विकट समस्या है, इसके तत्कालिक और दीर्घकालिक योजनाएं बनानी होगी। प्राकृतिक आपदाएं तब आती हैं जब हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते हैं। जब हम उसक स्वभाव को बिगाड़ना प्रारंभ किया जंगल(पेड़-पौधे) आज देश में कितने हैं प्रदूषण पर्यावरण को आज हमने किस स्थिति में पहुंचाया है। नदियों की बाढ़ जहां तांडव मचा रही है वहीं हमने घर में अपने घर बना लिए हैं। नदियों ने हमें नहीं डुबाया बल्कि हम खुद निदियों में डूबने गए, दोष बाढ़ को दे रहे हैं। डूब क्षेत्र में बड़े-बड़े निर्माण हो गए, किसने इन्हें बनाने की अनुमति दी उस पर भी जवाब देना चाहिए। आज देश सूखे सू जूझ रहा है, किसान परेशान है उसकी फसल का लागत मूल्य जब साधारण मौसम में ही नहीं निकल रहा तो सूखे में उसको आत्महत्या या दर-दर की ठोकरें खाने के सिवा और क्या रहेगा।
हमें दीर्घकालीन योजनाएं बनानी पड़ेंगी, नदियों को नदियों से जोड़ना, बड़े-बड़े पानी के तलाब, बांध इसके साथ ही खाली पड़े भूभाग पर भारी मात्रा में वृक्षारोपण, जैविक खाद को बढ़ावा देना ताकि रासायनिक खाद की तपन से सूखे में भी मिट्टी की तपन में साध्रता बनी रहे। प्रत्येक शहर का नक्शा उसका निर्माण और अतिक्रमण किसके कार्यकाल में किया गया उस व्यक्ति की जवाबदेही सुनिश्चित कर एक-एक बूंद पानी का कैसे उपयोग हो कम पानी में सिंचाई क्षेत्र को बढ़ावा देना साथ ही नदियों से नदियों को जोड़कर जहां बांध है सूखे की और मोड़ कर समाधान जैसी योजनाएं जितनी जल्दी क्रियान्वित होगी उतना ही जल्द समाज को लाभ मिलेगा।
श्रीमती संतोष अहलावत (झुंझुनू): उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपकी आभारी हूं कि आपने मुझे एक महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का मौका दिया है।
महोदय, आजादी के 67 वर्ष के बाद भी हम सूखे के विषय पर सदन में चर्चा कर रहे हैं। अच्छा होता कि पिछली सरकारें इस पर ध्यान देतीं। सूखे पर किसी प्रकार की राष्ट्रीय नीति बनायी होती, किसी प्रकार का शोध किया होता और कोई ठोस कदम उठाए होते तो शायद किसान की आज यह हालत नहीं होती। इस देश का दुर्भाग्य है कि हमें बैक-टू-बैक चौथी बार हम लोगों को सूखे की मार झेलनी पड़ रही है। इससे न केवल कृषि प्रभावित हुई अपितु पीने के पानी का गंभीर संकट भी हमारे सामने खड़ा हो गया है। मैं राजस्थान से आती हूं। राजस्थान का बाड़मेर, बीकानेर, जैसलमेर, झुंझुनु जिला और पूरा शेखावटी क्षेत्र पीने के पानी की गंभीर पीड़ा में पहुंच गया है। सूखा प्रकृति की देन नहीं है, किसी को भी यह सुनकर बड़ा आश्चर्य होगा, लेकिन सूखा आदमी की देन है। इंसान ने प्रकृति के साथ जो छेड़छाड़ की है, सूखा उसी का परिणाम है। लोग कहीं पानी और बाढ़ से मर रहे हैं तो कहीं पानी के अभाव से मर रहे हैं। यानी पानी ही है जो मृत्यु का कारण बनता जा रहा है।
उपाध्यक्ष महोदय, प्राचीन भारत में पानी से हमारा जीवन कहीं न कहीं एक संतुलित तालमेल बैठाकर चलता था। कुएं से हम उतना ही पानी निकालते थे, जितनी हमें जरूरत होती थी। लेकिन अब हम पानी की इस कदर बेकद्री कर रहे हैं कि जिस भारत में जल को देवता माना गया, वही देवता आज हमसे रुष्ट नजर आ रहे हैं। प्रकृति का नियम है कि उसने जो रचा है, उसका पालन-पोषण भी वही करती है। अगर पेड़ जंगल में लगा है तो उसका पालन-पोषण प्रकृति ही करती है। परंतु अगर कहीं पेड़ सूख रहा है या मनुष्य मर रहे हैं या पशु मर रहे हैं तो इसमें कहीं न कहीं नाराजगी इस बात की दिखाई दे रही है कि प्रकृति हमसे रूठ गई है, उसकी नाराजगी के संकेत हमें निरंतर मिल रहे हैं। प्रकृति की एक भाषा होती है, जो संकेतों में बात करती है। इस जनजीवन का पोषण प्रकृति का जिम्मा है। इसलिए अगर कहीं सूखा है तो हमने कहीं न कहीं प्रकृति के नियमों का उल्लंघन किया है। देश में हर साल कहीं न कहीं सूखा पड़ता है तो कहीं न कहीं बाढ़ की मार भी हम झेल रहे होते हैं। इसलिए सभ्यता के इस दौर में हमें अपने भीतर झांकना पड़ेगा और प्रकृति के साथ अपने जीवन का सामंजस्य और संतुलन बैठाना पड़ेगा। जिस देश में मेघों को देवता, जल को देवता, वृक्षों को देवता और नदियों को माता कहकर पुकारा जाता था, यदि वहां सूखा पड़ता है तो निश्चित तौर पर हमें अपने आचरण पर विचार करना चाहिए।
महोदय, इस वर्ष महाराष्ट्र में करीब 90 लाख लोग सूखे से प्रभावित हुए हैं। यही कारण है कि विदर्भ के किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हुए। सूखे के कारण उन पशुओं को हमने घरों से जंगलों में धकेल दिया, जिनके नाम हम अपने बच्चों के नाम से निकाला करते थे। इससे गंभीर बात और कोई नहीं हो सकती। कई प्रदेशों में लोग सूखे के कारण खेती-बाड़ी व्यवसाय को तरजीह नहीं दे रहे हैं और इस वजह से शहरों की तरफ पलायन हो रहा है तथा झुग्गी और झोंपड़िय़ों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। इसलिए मेरा सदन से अनुरोध है कि सूखे को लेकर एक राष्ट्रीय नीति बनाई जाए। सूखे को लेकर बच्चों के स्कूल में ही बच्चों को प्रकृति के साथ तालमेल बैठाने की शिक्षा दी जाए। यदि यही संस्कार और तालमेल की शिक्षा हम अपनी आगामी पीढ़ी को देंगे तो निश्चित तौर पर लोग जागरूक होंगे और प्रकृति की नाराजगी को हम ठीक कर पायेंगे। इसलिए हमें स्कूलों के पाठय़क्रमों में भी प्राकृतिक संसाधनों के ठीक से रख-रखाव को शामिल करना चाहिए, ताकि आगे आने वाले 15-20 सालों में हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर सकें जो प्रकृति के महत्व को समझे और सूखे पर एक राष्ट्रीय नीति बनें।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपको धन्यवाद करते हुए अपना वक्तव्य समाप्त करती हूं।
THE MINISTER OF URBAN DEVELOPMENT, MINISTER OF HOUSING AND URBAN POVERTY ALLEVIATION AND MINISTER OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI M. VENKAIAH NAIDU): Hon. Deputy-Speaker, what I would like to suggest is that we would continue this discussion on drought tomorrow also because some more hon. Members want to speak on this subject. So, we may now take up the Bills and continue this discussion on drought tomorrow.
श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय (गिरिडीह) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं झारखंड प्रदेश से आता हूं। हर वर्ष देश में कहीं न कहीं सुखाड़ आता है या बाढ़ आती है और लोक सभा में उस पर चर्चा होती है और उसके बाद जो किसानों की समस्या है, वह यथावत रह जाती है। हम अगर देखें तो जो वर्तमान में ग्लोबल वार्मिंग है, कहीं सूखा है तो कहीं बाढ़ है, इस पर अगर हम कोई रिसर्च न करें, हमारे वैज्ञानिक अगर इस पर चिंतन न करें तो इस समस्या का निदान इस बहस के मुताबिक नहीं हो सकता है। अभी लगातार चार वर्षों से झारखंड में सूखे की स्थिति बनी हुई है। जो पुरानी सिंचाई की परियोजना है, कोणार सिंचाई परियोजना पिछले 30 वर्षों से ज्वाइंट बिहार के समय से अवरुद्ध पड़ी हुई है।
उसी ढंग से विद्युत सिंचाई योजना भी अधूरी पड़ी हुई है। चांडिल डैम 40 साल से आज भी अधूरा पड़ा हुआ है और जिसकी सरकारी एस्टिमेट सौ गुना ज्यादा बढ़ गई है। हमें याद है, हम सब लोग इसी हाऊस में थे, प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने कहा था कि अगर अगला विश्व युद्ध होगा तो पीने के पानी के लिए होगा। जब तक हम नदियों को जोड़ने के कार्यक्रम की शुरूआत नहीं करेंगे और जल्दी से जल्दी उसको पूर्ण नहीं करेंगे, तब तक इस सूखे और बाढ़ से हमें निजात नहीं मिलने वाली है। हम मंत्री महोदय को धन्यवाद देना चाहेंगे, ये झारखण्ड गए, इन्होंने वहां अवलोकन भी किया, कृषि अनुसंधान केंद्र में भी गए और हमारे मुख्य मंत्री महोदय ने वहां से सुखाड़ के लिए 1140.77 करोड़ पैकेज की मांग की। हम चाहेंगे कि भारत सरकार यह सूखा राहत अविलंब उपलब्ध करवाए। आपको जान कर ताज्जुब लगेगा कि जो ऋण पूर्व की सरकार ने किसानों का माफ कर दिया था, उसकी उगाही के लिए अभी किसानों पर दबाव दिया जा रहा है। चाहे उनका बिजली का बिल हो, चाहे मालगुजारी हो, चाहे जो कृषि ऋण है, वह अविलंब उसका माफ किया जाए और झारखण्ड में पुरानी बंद पड़ी हुई सिंचाई परियोजनाओं को अविलंब पूर्ण कराने का भारत सरकार से मेरा आग्रह है। माननीय मंत्री महोदय से मेरा निवेदन है कि आप इस पर ध्यान दें।
HON. DEPUTY SPEAKER: The discussion under Rule 193 will continue tomorrow.