Lok Sabha Debates
Further Discussion On The Compulsory Voting Bill, 2014. on 4 December, 2015
Sixteenth Loksabha an> Title: Further discussion on the Compulsory Voting Bill, 2014.
HON. DEPUTY SPEAKER: Now we are taking up Bills for consideration and passing – Item No. 57. Further consideration of the following motion moved by Shri Janardan Singh Sigriwal on the 13th March, 2015, namely:-
“That the Bill to provide for compulsory voting by the electorate in the country and for matters connected therewith, be taken into consideration.” श्री निशिकान्त दुबे (गोड्डा) : उपाध्यक्ष महोदय, माननीय सीग्रीवाल जी जिस बिल को लेकर आए हैं, उसके बारे में मैं कुछ बातें सदन और देश के सामने रखना चाहता हूं। 2013 में श्री गोपाल कृष्ण गांधी ने एक लैक्चर देते हुए कहा -
“I mean to diminish no individual, institution or phase in our history when I say that India is valued the world over for a great many things, but for three over all others: The Taj Mahal; Mahatma Gandhi; and India’s electoral democracy.” दूसरी बात यह है कि 1978 में सुप्रीम कोर्ट का एक बढ़िया जजमैन्ट है और सुप्रीम कोर्ट ने अपना जजमैन्ट देते हुए कहा -
“It needs little argument to hold that the heart of the Parliamentary system is free and fair election periodically held, based on adult franchise, although social and economic democracy may demand much more.” कम्पलसरी वोटिंग ठीक है, होनी चाहिए, नहीं होनी चाहिए, इसके लिए तरह-तरह के आर्गूमैन्ट्स हैं, कोई पक्ष में बोल सकते हैं और कोई विपक्ष में बोल सकते हैं। सीग्रीवाल जी जिन चीजों को लेकर आए और जो गुजरात में सरकार ने लागू किया। लेकिन इस देश में वह सिचुएशन आई है कि नहीं आई है। एक चीज बड़ी महत्वपूर्ण है और वह यह है कि इस डेमोक्रेसी को खतरा किससे है, हमें पहले यह देखना पड़ेगा कि इसे खतरा किससे है। खतरा यह है कि जो मनी पावर है, वह दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। ब्लैक मनी का जो यूज इलैक्टोरल सिस्टम में है, वह दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। हम लोग सांसद बनकर आते हैं और हम लोग इन चीजों को देखते हैं कि डिमांड बढ़ती जा रही है, चीजें बढ़ती जा रही हैं, पैसे कहां से आयेंगे और इसके लिए जो करप्शन बढ़ रहा है, उसके लिए हम लोग इस सिस्टम को कहीं से प्योरिफाई करने के लिए सोच नहीं पा रहे हैं। मेरा यह मानना है कि मेरी सबसे पहली जरूरत जो मुझे व्यक्तिगत तौर पर दिखाई देती है, नहीं तो एक समय ऐसा आयेगा कि यहां जो केवल बड़े लोग हैं, इनफ्लुएंशियल लोग हैं, जिनके पास पैसा है, वही इस पार्लियामैन्ट, असेम्बली, लोकल बॉडीज को या मुखिया को 3 टीयर जो कांस्टीटय़ूशन है या अधिकार है, उसमें वह चलाते हुए नजर आयेंगे, गांव, गरीब, किसान, मजदूर की बात करने वाले महिला की बात करने वाले जो हम लोग हैं, वे कोई भी इस पार्लियामैन्ट के सदस्य नहीं हो पायेंगे। सवाल यह है कि उन चीजों के बारे में हम क्या सोचते हैं।
दूसरा क्रिमिनल एलिमेन्टस का मुद्दा है, यह चर्चा बराबर होती है कि क्रिमिनल एलिमेन्ट्स हैं, कई एनजीओज भी हैं, जो क्रिमिनल एलिमेन्ट्स हैं। अब क्रिमिनल को नहीं आना चाहिए, यह बात सही है। हम लोग इन चीजों को कर रहे हैं, लेकिन कई बार देखने को मिलता है कि क्रिमिनल किसको बना दिया जाता है। जैसे मैं अपना उदाहरण बार-बार देता हूं कि जब मैं 2009 का चुनाव लड़ने के लिए गया तो मैं बड़े फLा के साथ बोलता था कि मैं और मेरा पूरा परिवार, चाहे नाना की तरफ से हो चाहे दादा की तरफ से हो, किसी भी परिवार के ऊपर 107 का कोई भी केस नहीं है। मैं आपके सामने ऐसा कैन्डीडेट हूं, कि जिसके 15.47 hours (Dr. Ratna De (Nag) in the Chair) ऊपर न कोई सिविल डिस्प्यूट है और न क्रिमिनल डिस्प्यूट है। लेकिन 2009 में जिस दिन मेरा चुनाव खत्म हुआ, मेरे और मेरी वाइफ के ऊपर 307 का मुकदमा हो गया। मतलब आप यह समझिये कि 14 दिन के अंदर मैं इस देश का एक ड्रेडिड क्रिमिनल हो गया। 353 में जैसे इसी पार्लियामैन्ट ने कानून पास कर दिया कि आप जो कोई धरना, प्रदर्शन, अनशन, ब्लाकेड या अन्य कुछ करेंगे तो 353 का केस आपके ऊपर लग जायेगा। इस पार्लियामैन्ट में यह कैसे पास हुआ, मुझे नहीं पता, लेकिन यहां जो मैक्सिमम मैम्बर्स ऑफ पार्लियामैन्ट हैं, मैं क्रिमिनल की बात नहीं करता, कोई क्रिमिनल होंगे, लेकिन जो मैक्सिमम मैम्बर्स ऑफ पार्लियामैन्ट हैं, उनके ऊपर यही केस है। यदि किसी दूसरे की राज्य सरकार है तो किसी के ऊपर चेन खींचने का केस है, किसी के ऊपर गोली चलाने का केस है, किसी के ऊपर 353 का केस है तो जो क्रिमिनल एलिमैन्ट है, उसकी व्याख्या करने की आवश्यकता है या क्रिमिनेलिटी हम किसे मानेंगे और इस पार्लियामैन्ट्री डेमोक्रेसी में क्रिमिनल प्योरिफिकेशऩ कैसे हो, यह दूसरा सवाल है, जो आज हमारे सामने खड़ा है।
तीसरा सवाल यह है कि इलैक्शन पिटिशन है, आज आरटीआई का ज़माना आ गया है, ठीक है आरटीआई अच्छा कानून है, आरटीआई एक ट्रांस्पेरेंट सिस्टम है, उससे कहीं न कहीं एक डर है, लेकिन आरटीआई के कारण क्या हुआ है? यदि आप ब्लॉक-ब्लॉक में देखेंगे तो आरटीआई एक्टिविस्ट पैदा हो गए हैं। आरटीआई के नाम पर आपकी ब्लैकमेलिंग शुरू हो गई है। आरटीआई के नाम पर आपसे पूछा जा रहा है कि आपका दादा क्या कर रहा था, आपका चाचा क्या कर रहा था, आपका फूफा क्या कर रहा था, आपने किस योजना में कितना पैसा दिया। जैसे एक एमपीलैड फंड है, उसमें एक एम.पी. को क्या अधिकर है? उसको केवल एक रिकमेंड करने के अलावा क्या अधिकार है? कौन सी एजेंसी काम करेगी, क्या करेगी, उसका कोई मतलब नहीं है। लेकिन आरटीआई हो गई। कई एक जगह होता है कि कोई आपका बैंक अकाउंट खोल दिया या बैंक अकाउंट आपने खोला है, हो सकता है कि आप उसको भरते हुए, उसमें कितना पैसा जमा है, एक आइडिया के तौर पर आपने दिया कि कितना पैसा हो सकता है, कल को उसमें इंट्रेस्ट बढ़ जाए और यदि दो-चार रूपया, पांच रूपया बढ़ जाए, मान लीजिए कि 31 मार्च का आपने सीएसी लिया कि 31 मार्च तक यह स्थिति है, जिस दिन आप नॉमिनेशन फाइल कर रहे हैं, उस दिन आपका कोई पांच रूपया बढ़ गया, उसके आधार पर एक इलैक्शन पिटिशन हो गया और इलैक्शन पिटिशन को कितने दिन में डिस्पोज़ करना है, दूसरा इलैक्शन पिटिशन मान लीजिए गलती से हो गया या सही बात है, तो उसके डिस्पोज़ल पर कोर्ट कितना वक्त लगाती है, चार साल-पांच साल लड़ते रहिए, तब तक एक पूरा सैशन खत्म हो जाता है तो सवाल यह है कि उसके बारे में सोचने का सवाल है।
चौथा, इंटरनल डैमोक्रेसी, जो पूरे पॉलिटिकल सिस्टम में है, सभी राजनीतिक दल इसके शिकार हैं, चाहे हमारी पार्टी हो, चाहे दूसरे की पार्टी हो चाहे तीसरे की पार्टी हो कि इंटरनल डैमोक्रेसी नहीं है। आप यदि कोई बात सहजता से कहना चाहते हैं तो कह पाने की स्थिति में हैं या नहीं हैं और यदि नहीं हैं तो आप आइडय़ोलॉजी से किस तरह गाइडिड हैं या आपका केवल उद्देश्य एम.पी. बनना है, एम.एल.ए. बनना है, मंत्री बनना है या जिंदाबाद करना है या जनता की सेवा करने के लिए आए हैं। सबसे बड़ी ओथ हम यहां लेते हैं, ऑफिस सीक्रेसी की ओथ लेते हैं कि भारत के संविधान के प्रति हमारी निष्ठा होगी और हम जो कुछ भी करेंगे, अंडर द कॉन्स्टिटय़ूशन करेंगे। जब हम एम.पी. भी बन कर आते हैं तो यही करते हैं, लेकिन कभी यदि अपने गिरेबान में झांकने का प्रयास कीजिए तो आपको यह समझ में आएगा कि हम इंटरनल डैमोक्रेसी के तौर पर जो बातें, यहां मान लीजिए कि वेल में लोग आ जाते हैं, मैं सभी एम.पी. से पूछना चाहता हूँ कि वे चर्चा चाहते हैं कि नहीं चाहते हैं। यहां हमें जनता ने चुन कर चर्चा के लिए भेजा है या इसी तरह से कहा है कि पार्लियामेंट को एकदम ब्लॉक कर देना है या अन्य चीजें कर देनी है। इसके पीछे जो रीजन होता है कि हम अपनी आत्मा से विपरीत जा कर, क्योंकि इंटरनल डैमोक्रेसी में लगता है कि पार्टी के डिक्टेशन को यदि हम नहीं मानेंगे तो शायद हमें कल को टिकट नहीं मिलेगा या शायद हमारे ऊपर कोई कार्यवाही हो जाएगी, कोई व्हिप जारी हो जाएगा, तो इस तरह के सिचुएशन में, उस रिफॉम्स की आवश्यकता है कि इंटरनल डैमोक्रेसी कैसी होनी चाहिए और जो पॉलिटकल पार्टीज़ में ट्रांस्पेरेंसी होनी चाहिए कि उसकी फाइनेंशियल ट्रांस्पेरेंसी होनी चाहिए कि पैसा कहां से आ रहा है, कौन दे रहा है, जो पैसा दे रहा है, वह हमारी चीजों को, हमारे कानून को कहीं प्रभावित करने का प्रयास तो नहीं कर रहा है, वह दबाव तो नहीं डाल रहा है। इस पैसे से आम जनता के प्रति जो हमारी कमिटमेंट है, वह तो खत्म नहीं हो जाती है।
मेरा कहना है कि इन सारी चीजों के पहले, इन तीन-चार चीजों के बारे में यदि हम रिफॉर्म्स की बात करते, चीजों की बात करते तो मुझे लगता है कि उसके बाद आता कि यह कंपलसरी वोटिंग का क्या सवाल है। इसके ऊपर मैं आपको बताऊ कि मैं कोई पहला आदमी नहीं हूँ, जो यह बातें कर रहा है, सन् 1990 में दिनेश गोस्वामी की एक कमेटी बनी थी। उस कमेटी ने इन सारी चीजों को यह करते हुए कंपल्सरी वोटिंग के बारे में भी बात की थी। दिनेश गोस्वामी साहब फाइनली इस कनक्लुज़न पर पहुंचे कि पहले इस तरह के रिफॉर्म्स को हम कर लें, यदि उसके बाद हम कंपल्सरी वोटिंग पर जाते हैं तो ज्यादा सुविधा होगी। उसी तरह से सन् 1993 में एन.एन. वोहरा साहब, जो अभी जम्मू-कश्मीर के गवर्नर हैं, उनकी कमेटी बनी और उन्होंने सबसे ज्यादा जो ज़ोर डाला कि जो क्रिमिनलाइजेशन ऑफ पॉलटिक्स हो रहा है, आज तो मान लीजिए कि काफी ट्रांस्पेरेंसी आ गई है, काफी सिस्टम में बदलाव आ गए हैं, उसमें लॉ मिनिस्टर साहब का बहुत बड़ा योगदान है, लेकिन सन् 1993-94 के जो हालत थे, वे यह थे कि नेता कौन हो रहा था? नेता जो था, वह अपराधी हो रहा था। मैक्सिमम राजनीतिक पार्टियों के लोग, खासकर जो रीजनल पार्टियाँ थीं, रीजनल पार्टियों के जो लोग जीत रहे थे, मैं दूसरे की बात नहीं करता, मैं बिहार, झारखंड का सबसे ज्यादा उदाहरण देता हूँ, मैं बहुत ज्यादा कोई प्रीच नहीं करना चाहता हूँ। उस वक्त सिचुएशन यह थी कि जो जनता का नेता बन रहा था, वह गुंडा बन रहा था, इसी कारण से एन. एन. वोहरा कमेटी ने क्रिमिनिलाइजेशन ऑफ पॉलिटिक्स की बात कही, इलेक्टोरल रिफार्म्स की बात कही, लेकिन उन्होंने भी यही कहा कि अभी वह मौका नहीं है कि हम किसी आधार पर अभी कंपल्सरी वोटिंग की तरफ जाएंगे। इसके बाद इंद्रजीत गुप्ता ने इसके बारे में काफी डिलेबरेशन किया। उनकी रिपोर्ट वर्ष 1998 की है। उन्होंने जो विशेष बात कही, वह विशेष बात यह कही कि इलेक्शन की स्टेट फंडिंग होनी चाहिए। मुझे लगता है कि यह बहुत ही बेहतर है, यह सभी राजनीतिक दलों के सोचने का सवाल है कि यदि स्टेट फंड करता है, यदि सरकारी फंड के आधार पर हम चुनाव लड़ेंगे, तो कहाँ बैनर लगेगा, कहाँ पोस्टर लगेगा, कहाँ मंच बनेगा, कहाँ माइक लगेगा, कहाँ डिबेट होगी, कौन पोलिंग एजेंट बनेगा, कौन से पोलिंग बूथ पर जाएंगे तो ये सारी चीजें ट्रांसपरेंट तरीके से होंगी। इससे एक सिचुएशन डेवलप होगी कि जो काबिल आदमी है, डेमोक्रेसी में काबिल आदमी का मतलब यह है कि जो जनता के बीच में सेवा करता है। काबिल आदमी से मेरा मतलब कोई पढ़े-लिखे आदमी से नहीं है। मेरा मतलब यह है कि जनता की जो समस्याये हैं, उसके साथ जो रूबरू होंगे। इस संबंध में एक इंद्रजीत गुप्ता कमेटी बनी। इसके बाद वर्ष 1999 में लॉ कमीशन को एक जिम्मेदारी दी और उसने इलेक्टोरल रिफार्म्स के लिए काफी कुछ रिकमेंडेशन किये, जिसके आधार पर हमने 2000, 2001, 2002, 2003 में इतनी चीजें कर ली हैं, जिसके कारण अब हमें लगता है कि काफी कुछ ट्रांसपरेंट सिस्टम हो गया है।
इसके बाद सेकेंड एडमिनिस्ट्रेटिव रिफार्म कमीशन, वीरप्पा मोइली साहब जो पूर्व कानून मंत्री थी, उन्होंने कहा, लेकिन कुल मिलाकर यह था कि सारे कमेटियों की जो रिपोर्ट थी, जितनी भी रिपोर्ट अभी तक आई हैं, उन सभी रिपोर्टों ने यह कहा है कि अभी वह मौका नहीं आया है, जहाँ हम कंपल्सरी वोटिंग की तरफ जा सकते हैं।
इसके बाद राइट टू वोट का अधिकार हमें कांस्टीच्यूशन ने दिया है। उसमें आर्टिकल 326, इसमें सबसे इंपोर्टेंट आर्टिकल 326 है। आर्टिकल 326 यह कहता है कि “Every person who is a citizen of India shall be entitled to be registered as a vote at any such election.” वह इतना ही कहता है, लेकिन वही जब यह कहता है कि क्या करना है, क्या नहीं करना है, तो उसमें डय़ूटी जो पार्ट 4 (ए) में जो कांस्टीटय़ूशन की फंडामेंटल डय़ूटीज हैं, उसको डय़ूटी के बारे में नहीं माना गया है मतलब राइट नहीं कहा गया है। जो कांस्टीटय़ूशन का 4 (ए )है, वह यह कह रहा है कि यह राइट तो है, लेकिन यह डय़ूटी के आधार पर दिया है, इसको ऑब्लिगेट्री नहीं माना है, इसको परमानेंट नहीं माना है। इसी कारण से अभी हम जो संविधान की बात कर रहे हैं, हमने अभी 125वीं ऐनवर्सरी के तौर पर पूरे संविधान के ऊपर चर्चा की। कांस्टीच्युएंट एसेंबली में भी इसके ऊपर लगातार चर्चा चली थी। जब चर्चा चली तो जो आयंगर साहब थे, उनका एक विचार था कि कंपल्सरी वोटिंग उस वक्त कर देनी चाहिए। ड्राफ्टिंग कमेटी के जो चेयरमैन थे, उसमें उनका सपोर्ट कई लोगों ने किया था। उसमें पंडित ठाकुर दास भार्गव, देशबंधु गुप्ता, प्रभुदयाल हिम्मत सिंह थे, जहाँ से आज मैं मेंबर ऑफ पार्लियमेंट हूँ, उसके एक क्षेत्र से प्रभुदयाल हिम्मत सिंह भी कभी मेंबर आफ पार्लियामेंट हुआ करते थे, भूपिन्दर सिंह मान मतलब इन सारे लोगों ने कहा कि कंपल्सरी वोटिंग के बारे में देश को आगे बढ़ना चाहिए। यह दो बार हुआ, एक कांस्टीच्युएंट असेम्बली में हुआ और जब वे लॉ मिनिस्टर बन गए तो जब पार्लियामेंट में डिबेट चल रही थी तो उस वक्त भी हुआ, लेकिन उस वक्त डॉ. बी.आर.अम्बेडकर ने इन चीजों को निगेट किया और कहा कि भारत एक ऐसा देश है, जहाँ अगड़े की बात होती है, पिछड़े की बात होती है, गाँव की बात होती है, गरीब की बात होती है, इसीलिए कभी भी किसी हालत में कंपल्सरी वोटिंग के लिए इस देश को आगे नहीं जाना चाहिए। मैं यह कह रहा हूँ कि जिनकी 125वीं ऐनवर्सरी हम मना रहे हैं, जिस संविधान की बात कर रहे हैं, वे हमसे बड़े तेज थे, उन्होंने एक-एक चीज के ऊपर चर्चा की और उन्होंने भी यह कहा कि अभी इस देश की सिचुएशन ऐसी नहीं है, जिसमें कंपल्सरी वोटिंग होनी चाहिए। मुझे लगता है कि वर्ष 1946-47 की जो सिचुएशन थी और आज की सिचुएशन ऐसी है, जिसमें कोई इतना बड़ा परिवर्तन नहीं हो गया है कि कंपल्सरी वोटिंग की तरफ हम जा पाएं।
16.00 hours 2001 में एक कंसलटेशन पेपर निकाला गया और उसके बाद एक तारकुंडे कमेटी बनी। तारकुंडे कमेटी ने जो कंपलसरी वोटिंग पर कहा, वह इस सदन के लिए जानना बड़ा महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा -
“We have seriously considered the desirability of making it compulsory for voters to cast their votes in these elections. It appears to us that compulsory may be resented by the voters and may prove counter-productive. It is desirable that compliance with the duty to cast one’s vote should be brought about by persuasion and political education rather than compulsion. Moreover, the implementation of a law of a compulsory voting is likely to be very difficult and may lead to abuse. ” जहाँ शिक्षा नहीं है, अभी भी बिहार का वोट डालते हुए हमने यह कहा कि लोग जाति से ऊपर नहीं उठ पाए, लोग अपने कुनबे से ऊपर नहीं उठ पाते हैं। वहाँ यदि आप कंपलसरी वोटिंग की बात करेंगे ...(व्यवधान)
SHRI TATHAGATA SATPATHY (DHENKANAL): I object to this. बिहार के लोग बहुत समझदार हैं, बहुत सोच-विचार से उन्होंने वोट दिया है, जात पर न पात पर उन्होंने वोट दिया है। उनको मालूम है कि देश के लिए क्या अच्छा है, क्या खराब है।
श्री निशिकान्त दुबे: हमने यह नहीं कहा कि देश ने क्या कहा।
SHRI TATHAGATA SATPATHY: Let us never deride people.
श्री निशिकान्त दुबे : हमने यह नहीं कहा कि देश ने क्या कहा, हमने यह नहीं कहा कि सत्पथी साहब ने क्या कहा। हमने यह कहा कि हमने क्या कहा। हमने अपनी पार्टी की बात कही है और हमको अपनी बात करने का पूरा अधिकार है। इसीलिए सत्पथी साहब शायद मेरी बात से सहमत होंगे। मैंने तो तारकुंडे साहब ने क्या कहा, उसको क्वोट किया और उसके कंटैक्स्ट में वे बातें कहीं।
कंपलसरी वोटिंग के लिए ऐसा नहीं है सीग्रीवाल साहब 16वीं लोक सभा में पहली बार बिल लेकर आए हैं, इस सदन में इससे पहले भी इस पर चर्चा हो चुकी है। 2003 में आगरा के सांसद भगवान शंकर रावत जी इस बिल को लाए थे और 2009 में जे.पी.अग्रवाल साहब भी इस बिल को लाए थे। इसलिए माननीय सदस्य बधाई के पात्र हैं कि 1952 के बाद से तीसरी बार ऐसा हुआ है कि हम इस सदन में इन बातों को डिसकस कर रहे हैं। उस वक्त के तत्कालीन लॉ मिनिस्टर मोइली साहब थे, उनकी बात से मैं एग्री करता हूँ, उन्होंने उस वक्त जो कहा, वह सही कहा। Mr. Moily cautioned against such a move observing that it was coercive, difficult for the Government to implement and ignorant of causes of non-voting such as illness, pre-occupation and use of force by political parties. ये जो तीन बातें हैं जो मोइली साहब ने कहीं, ये भी पोलिटिक्स में ध्यान देने वाली बातें हैं। वे कह रहे हैं कि एक तो गवर्नमैंट के लिए इसको इंप्लीमैंट करना मुश्किल है। इंप्लीमैंट करना मुश्किल इसलिए है कि जैसे हमारे यहाँ, खासकर ईस्टर्न इंडिया के, जहाँ से श्री सत्पथी भी आते हैं, वे सारी चीज़ों का कंटैस्ट करते रहते हैं कि बिहार है, ओडिशा है, झारखंड है, छत्तीसगढ़ है, बंगाल है, हम लोगों के यहाँ बेरोज़गारी एक बड़ी समस्या है। बेरोज़गारी एक बड़ी समस्या होने के कारण लोग कमाने के लिए कहीं न कहीं दूसरी जगह जाते हैं। जब वे दूसरी जगह जाते हैं तो कोई पंजाब में काम कर रहा है, कोई कश्मीर में काम कर रहा है, कोई दिल्ली में काम कर रहा है, कोई मुम्बई में काम कर रहा है। आप यदि ज़बर्दस्ती करेंगे कि वह वोट डालने जाएँगे तो वह अपनी नौकरी छोड़कर जाएँगे, वे अपना पैसा खर्च करके जाएँगे। तो इसको इंप्लीमैंट करना आप समझिए कि कितना मुश्किल होगा। वह कहेंगे कि या तो हमको पैसा दीजिए। इतने लोगों को एक जगह से ले जाना, लाना, यह सबसे बड़ा सवाल है। गवर्नमैंट के लिए इंप्लीमैंट करना सचमुच मुश्किल का काम है जैसा उन्होंने कहा।
दूसरी बात उन्होंने कही कि मान लीजिए कोई बीमार है। हमारे यहाँ कई जगह है कि हमारे यहाँ बीमारी का सर्टिफिकेट देने के बाद भी कई लोगों को लगता है कि बहाना बना रहा है। लेकिन सचमुच का कोई बीमार हो सकता है। मैं आपको बताऊँ कि जब से मैं यहाँ दिल्ली आया हूँ पिछले 25 सालों से, साल में दो-तीन दिन छूट जाएँ तो अलग बात है, लेकिन कोई ऐसा दिन नहीं है कि कोई न कोई आदमी एम्स में इलाज कराने के लिए निश्चित तौर पर यहाँ पड़ा हुआ न हो। यदि एक आदमी यहां इलाज कराने के लिए निश्चित रूप से पड़ा हुई है तो उसके साथ उसके पूरे परिवार के लोग यहां मौजूद होते हैं तो इलनैस के कारण आप कैसे कम्पैल कर सकते हैं। आप तो कहिएगा कि एक आदमी का सर्टीफिकेट देगा, लेकिन यह हिन्दू वे ऑफ लाइफ है, हिन्दू सोसायटी है तो इसमें ऐसा नहीं होता है कि किसी दूसरे देश की तरह एक आदमी यदि बीमार है तो एक ही आदमी जिम्मेदार है। डॉक्टर यदि सर्टीफिकेट देगा तो एक ही आदमी की बीमारी का सर्टीफिकेट देगा। लेकिन उसका कोई बेटा है, कोई बेटी है, कोई वाइफ है, कोई चाचा है, कोई भतीजा है, कोई रिश्तेदार है, वह भी उसकी तीमारदारी में लगा हुई रहता है। उसे वह किस तरह का सर्टीफिकेट देगा, आप तो उसको नहीं मानिएगा, आप तो कहिएगा कि नहीं, यह बड़ा मुश्किल है।
तीसरा, प्रीऑक्यूपेशन है। प्रीऑक्यूपेशन यह है कि किसी दिन आपने वोट का तय कर दिया है, लेकिन किसी का कोई शादी-विवाह है। हमारे यहां तो एक जोइंट फैमिली का कांसैप्ट चलता है। आप तो ऐसा नहीं कहते हैं कि उस दिन कोई पूजा-पाठ नहीं होगी, कोई शादी-विवाह नहीं होगा, कोई बच्चा पैदा नहीं होगा, ऐसा इस देश में सम्भव नहीं है। प्रीऑक्यूपेशन के कारण भी यह सम्भव नहीं है। इन कारणों से इन चीजों का इम्प्लीमेंटेशन बहुत मुश्किल है, लेकिन इन चीजों की बहस एक इतने बड़े मुद्दे पर चल रही हैं कि 2009 में सुप्रीम कोर्ट का एक जजमेंट आया। अतुल सरलोंडे ने सुप्रीम कोर्ट में एक पी.आई.एल. की और अप्रैल, 2009 में दो जज की बैंच ने सुप्रीम कोर्ट का एक जजमेंट दिया और मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण है। उसमें जस्टिस बालाकृष्णन साहब, जो कि बाद में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बने और जस्टिस सदाशिवम साहब थे, जिनकी अभी चर्चा हो रही थी, उन्होंने कहा:
“We are not agreeable to your suggestion that electricity and water connection should be cut if anyone does not vote. These are inhuman methods to make a voter go to the polling booth.” जो पी.आई.एल. करने वाले थे, पी.आई.एल. करने वालों ने कहा कि आप इलैक्ट्रिसिटी और वाटर कनैक्शन काट दीजिए। कम्पलसरी वोटिंग यदि आप कराना चाहते हैं, जिसके बारे में मैं बाद में डैलीब्रेशन करूंगा तो किसी न किसी इकोनोमिक सैंक्शन की तो बात आप करते हैं तो ये जो पी.आई.एल. कर्ता थे, ये एक कदम और आगे बढ़े और ये कहते हैं कि पीने का पानी और बिजली काट दो। यदि इस तरह से सिस्टम से आप कम्पलसरी वोटिंग नहीं करेंगे तो आपका पीने का पानी काट देंगे, मतलब आदमी बिना खाने के तो रह सकता है, लेकिन बिना पानी पिए हुए वह कितने दिन रह सकता है, आप इसे समझिये।
हम और आप सभी जन-प्रतिनिधि हैं, यदि चुनाव में या गांव में सबसे महत्वपूर्ण आज कोई विषय है तो वह ट्रांसफार्मर लगाना है, गांवों में बिजली देना है। यदि आप अपने एम.पी.लैड फंड से कहीं किसी गांव में इलैक्शन के समय या इलैक्शन से पहले ट्रांसफार्मर लगा देते हैं तो गांव का गांव आपको वोट करता है कि इन्होंने मुझे बिजली दी और यदि आप ये दो काम करेंगे तो आपको लगता है, सीग्रीवाल साहब, मान लीजिए कि जैसे आपका बिल हम पास कर देंगे तो कहेंगे कि इसी के कारण हमको बिजली और पानी नहीं मिल रहा है तो क्या होगा। सवाल यह है कि इस पर भी विचार करने की आवश्यकता है। इसके बाद जो महत्वपूर्ण है, जो आपका बिल आया है या जो कम्पलसरी वोटिंग के लिए कहते हैं, वे इसके पीछे तीन-चार रीज़न देते हैं कि क्या होगा। सबसे पहला रीज़न देते हैं कि उससे वोटर टर्नआउट इन्क्रीज़ हो जायेगा। अभी जब चुनाव होता है तो अर्बन एरियाज़ में मुश्किल से 40, 45, 50 परसेंट वोट होता है और रूरल एरियाज़ में 60-65 परसेंट होता है। लोक सभा में 55 से 60 परसेंटेज के आसपास है, विधान सभा में भी लगभग उतना ही होता है। लोकल बॉडीज़ में थोड़ा बढ़ जाता है। इसके पीछे एक रीज़न है कि उससे टर्नआउट का एक बेसिक इन्क्रीज़ हो जायेगा। इसमें 1997 में एक डिबेट हुई, उसमें जो आर्ग्यूमेंट दिया गया, इसमें 171 देशों का1997 में एरेन लिस्फार्ट ने अमेरिका में एक आर्टीकल लिखा। उसने 171 देशों के पूरे डाटा को लिया और उसमें 28 देशों के डाटा को विशेष तौर पर लिया, जहां आज की तारीख में कम्पलसरी वोटिंग है। आपको आश्चर्य होगा कि दोनों के बीच का जो डिफरेंस है, वह केवल 7.37औ है। 171 देशों के डाटा में से 28 वैसे देश हैं, जहां कम्पलसरी वोटिंग है। 171 देशों के डाटा को अगर आप देखेंगे तो उसमें 7.37औ का ही दोनों के बीच डिफरेंस है। इसलिए जो लोग यह आर्ग्यूमेंट करते हैं कि इससे वोटर टर्न आउट बढ़ जाएगा, तो यदि इस आर्टिकल और इस डाटा को आप देखेंगे, तो आपको लगेगा कि उससे यह पर्पस सॉल्व नहीं होता है।
इसके बाद एक इन-ह्यूमन सजेशन है, जिसके बारे में मैंने आपको बताया कि वह वाटर हो सकता है, इलेक्ट्रिसिटी हो सकती है, और तीसरा बीपीएल कार्ड के बारे में आप कह सकते हैं कि वे बीपीएल कार्ड के लिए इंटाइटल नहीं हैं, राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना के अंतर्गत मुफ्त बिजली के लिए वह इंटाइटल नहीं है। लेकिन, हमारे यहां जो सिचुएशन है, वह दूसरी है। हमारे यहां गरीबों को सिखाने की बात नहीं है। दूसरे 28 देशों में, जहां यह कानून लागू हुआ है, वहां तो ये चीज़ें समझ में आती हैं। पर, हमारे यहां यह उलटा है। मैंने यह बात की कि अर्बन वोटिंग परसेंटेज कम है और रूरल वोटिंग परसेंटेज ज्यादा है, तो यह यह दर्शाता है कि जो लोग अपने आप को ज्यादा पढ़ा-लिखा हुआ मानते हैं, ज्यादा रिच मानते हैं, उनकी सोच इस चुनावी सिस्टम के प्रति कम है। लेकिन, जिनके बारे में हम बराबर कहते हैं कि जो गरीब लोग हैं, वे इसके बारे में नहीं सोचते हैं, तो हक़ीकत यह है कि वे ही ज्यादा सोचते हैं और वे ही ज्यादा परसेंटेज में वोट देते हैं। जब आप इसके लिए सैंक्शन लगाने की बात करेंगे तो आप इसमें क्या करेंगे? मान लीजिए कि आप इसके लिए किसी अमीर के घर की बिजली काट देंगे, तो वह क्या करेगा? उसके पास इतना पैसा है कि उस स्थिति में वह जेनरेटर यूज कर लेगा। मान लीजिए आप किसी अमीर व्यक्ति को पानी नहीं देंगे, तो उसके लिए टैंकर से पानी आ जाएगा। बीपीएल और एपीएल कार्ड की उसको आवश्यकता ही नहीं है। मान लीजिए कि आप किसी के ऊपर 50 हजार रुपए, किसी को एक लाख रुपए तो किसी को दो लाख रुपए का लगा देंगे, तो अमीर आदमी तो उसे दे भी सकता है, पर गरीब आदमी कहां से देगा? सवाल यह है कि यहां अमीर और गरीब के बीच में जो इतनी खाई है और गांव का आदमी, गरीब आदमी, किसान, शिडय़ूल्ड कास्ट, शिडय़ूल्ड ट्राइब के लोग हमारे यहां ज्यादा पैमाने पर वोट करते हैं। अमीर और गरीब के बीच में आपको एक खाई बनानी पड़ेगी, तभी आपका यह सिस्टम लागू हो पाएगा।
इसके बाद दूसरा आर्ग्यूमेंट है कि इससे पॉलिटिकल पार्टीसिपेशन और डिबेट ज्यादा बढ़ेगा, मतलब इससे ज्यादा से ज्यादा लोग पॉलिटिक्स में आएंगे। उन्हें लगेगा कि चुनाव एक ऐसा अधिकार है, जिसमें सबकी सहभागिता और सबकी ऊर्जा की आवश्यकता है। इसलिए लोग पॉलिटिक्स के प्रति आकर्षित होंगे। जैसे हम लोगों का पायजामा-कुर्ता पहनना खतरनाक हो गया है। लोगों को लगता है कि इन्हें कोई काम नहीं है, तो यह नेता बन गया होगा। जिस तरह से यह सिचुएशन है, यह फैक्ट है। इस सिचुएशन को बिगाड़ने में हम लोगों का सबसे बड़ा योगदान है, क्योंकि हम एक-दूसरे को एक्सपोज़ करने के लिए ऐसे तुले रहते हैं कि कोई अच्छा काम भी करता है, तो उसे नहीं बताते हैं।
मान लीजिए कि हम सीएजी की रिपोर्ट के ऊपर कोई डिबेट करते हैं। मैं जिस कमेटी में हूं, उसमें मैं बार-बार कह रहा हूं कि सीएजी को इस पार्लियामेंट का पार्ट होना चाहिए। उसकी जो कमिटमेंट है, वह पार्लियामेंट के प्रति होनी चाहिए। पर, इसमें क्या होता है? वे अफसर हैं। उन्होंने वर्षों तक किसी न किसी मंत्री के नीचे काम किया है। वह चाहे इलेक्शन कमिश्नर बन रहा हो, सीएजी बन रहा हो या सीवीसी बन रहा हो। खड़गे साहब लोकपाल वाली कमेटी में हैं। वे संयोग से यहां बैठे हैं। वह अधिकारी आपके पीछे-पीछे घूमते रहते हैं कि मुझे यह बना दीजिए, मुझे मेम्बर बना दीजिए, कमेटी का चेयरमैन बना दीजिए। खड़गे साहब, आप बताइए, ऐसे अधिकारी आपके पास आते हैं या नहीं? लेकिन, जब वह उस कुर्सी पर बैठ जाता है तो हम उसे एक फुलप्रूफ बॉडी मान लेते हैं और यह मान लेते हैं कि वह जो कह रहा है, वह सही कह रहा है।
HON. CHAIRPERSON : Shri Dubey, please stop for a while.
Hon. Members, since the time allotted for discussion of this Bill is almost complete and as there are eight more Members to take part in the discussion on the Bill, the House has to extend time for further discussion on the Bill.
If the House agrees, the time for discussion of this Bill may be extended by one hour.
SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.
SHRI N.K. PREMACHANDRAN (KOLLAM): Madam, I have a strong objection to this aspect because the Bill has already taken six hours and almost all the speakers have spoken at length and the discussion is getting prolonged. The next Bill to be considered or taken up by this House is the Rights of Transgender Persons Bill which was passed by the Rajya Sabha. I would like to know whether the Government is serious about it. Though the Government is not there, I would like to know whether this House is serious in taking up the Bill of the deprived and the disempowered section of society, that is, transgenders.
This is quite unfortunate to see that discussion on this Bill is being prolonged like anything. Even after six hours, the lengthy discussion is still going to take place. So, I have a strong objection to extending the time for discussion on this Bill because the other Bill should also be given an opportunity to be moved before this House so that a fruitful discussion on the Bill relating to transgenders may also take place. Otherwise, a bad message will be going because somebody or this House is trying to scuttle the movement of this Bill relating to transgenders which was passed by the other House. So, my submission is that the other Bill may also be taken into consideration. Otherwise, such a message from this House is going.
Specially, this Bill is in the Private Members’ Bill section and the Government has no role. This is my personal right and that right is being infringed. So, I would like to have a ruling from the Chair on this point.
श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर):मैडम, जो प्रेमचन्द्रन जी ने कहा, गवर्नमेंट उस पर बहुत सीरियस है। लेकिन जो कंपल्सरी वोटिंग बिल है, यह भी बहुत सीरियस है। यह भी प्राइवेट मेंबर लेकर आए हैं। हाउस का सेंस लेकर आगे चलिए। अगर लोग पार्टिसिपेट करना चाहते हैं तो यह मना कैसे कर सकते हैं, पार्टिसिपेट करना लोगों का अधिकार है। हम उसमें भी इंट्रेस्टेड हैं। ...(व्यवधान)
SHRI N.K. PREMACHANDRAN: It has already been discussed for six hours. … (Interruptions)
श्री अर्जुन राम मेघवाल :यह प्रैक्टिस रही है कि हाउस आगे बढ़ता रहा है। ...(व्यवधान) ऑवर्स बढ़ते रहे हैं, यह प्रैक्टिस रही है।
HON. CHAIRPERSON: Let me know the decision of the House.
If the House agrees, the time for discussion may be extended by one hour.
SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.
THE MINISTER OF LAW AND JUSTICE (SHRI D.V. SADANANDA GOWDA): Madam, as far as Rights of Transgender Persons Bill is concerned, there is no reservation either by the Government or by the House. That is my opinion. A wrong message should not go to the public as if we are scuttling the debate on the Bill relating to transgenders. We do not have any reservation as far as that matter is concerned.
I would also submit that the Compulsory Voting Bill is also one of the important Bills because the whole country wants to have electoral reforms. For that reason, this discussion cannot be curtailed. The Members should be given an opportunity to participate in the discussion.
HON. CHAIRPERSON: Shri Dubey, please complete your speech.
SHRI N.K. PREMACHANDRAN: Madam, I do have a strong objection. Please take the sense of the House.
HON. CHAIRPERSON: I have already told.
If the House agrees, the time for discussion of the Bill may be extended by one hour.
SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.
HON. CHAIRPERSON: This is the opinion of the House.
… (Interruptions)
HON. CHAIRPERSON: Shri Dubey, please continue.
SHRI MALLIKARJUN KHARGE (GULBARGA): Madam Chairperson, then I have to make a serious objection, but that will embarrass the Government. I do not want to do that.
HON. CHAIRPERSON: Please do not bring that.
SHRI MALLIKARJUN KHARGE : You count your Members and then talk.
SHRI NISHIKANT DUBEY: Kharge saheb, this is the time for Private Members’ Business.
SHRI MALLIKARJUN KHARGE: Does it prohibit raising the question of quorum? … (Interruptions)
HON. CHAIRPERSON: Shri Dubey, please continue.
श्री निशिकान्त दुबे : धन्यवाद महोदया। अभी जो हम लोग चर्चा कर रहे थे कि इससे लोगों को लगता है कि इसमें क्वालिटी ऑफ पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन और डिबेट का जो स्तर है, वह ऊपर हो जाएगा। मैं दो उदाहरण देना चाहूँगा कि वर्ष 2007 में हूग ने एक एनालिसिस किया। उसने बेल्जियम के इलेक्शन डाटा का, जहाँ कंपल्सरी वोटिंग है और क्यूबेक प्रोविन्स का डाटा लिया। बेल्जियम में नॉलेज इफेक्ट्स क्या है कि सैंक्शन है, बेल्जियम ने अपने नागरिकों को एक सैंक्शन लगा रखा है, इसीलिए वे कंपल्सरी वोट करते हैं कि वोटेड टू एवाइड सैंक्शन। क्यूबेक, जहां कंपल्सरी वोटिंग है, वहां वोट होता है क्योंकि उनको भी दूसरे प्रकार का फाइनैंशियल सैंक्शन है। विदेशों में ज्यादातर जो यूरोपियन कंट्रीज हैं या इस तरह के छोटे कंट्रीज हैं, उसमें फाइनैंशियल सैंक्शन बहुत बड़ा विषय है।
उन दोनों का डाटा लेने के बाद रिसर्चर हूग ने एक समरी थी कि “… though a sufficient motivator for getting an uninformed voter to the polls, avoiding forgoing money cannot be assumed to be a sufficient motivator for getting him or her to learn more about politics…”.
वे जबर्दस्ती वोट करने चले जाते हैं। वोट नहीं करने से उनको कोई फाइनैंशियल खतरा हो जायेगा, विदेशों में वह मोर और लेस है, हमारे यहां " तेते पांव पसारिए, जेती लांबी शौर " है, मतलब हमारे पॉकेट में जितना पैसा होगा, उतना ही पैसा हम खर्च करेंगे। लेकिन विदेशों में जो सिस्टम है, वह आपको पता है कि लोग क्रेडिट कार्ड्स पर चलते हैं। यदि उनके क्रेडिट कार्ड्स पर फाइनैंशियल सैंक्शन लग जायेगा तो कहीं न कहीं वे मर जायेंगे, उनके लिए वह सबसे महत्वपूर्ण है। बेल्जियम और क्यूबेक का जिसने रिसर्च किया, वह रिसर्चर कह रहा है कि इतना होने के बावजूद भी जो लोग वोट कर रहे हैं, उनको भी पॉलिटिक्स के बारे में कुछ नहीं पता है, पॉलिटिक्स से क्या अच्छा होगा, क्या बुरा होगा, किस पॉलिटिकल पार्टी का क्या आइडियोलॉजी है, कौन सी चीजें हैं? लोग कहते हैं कि इससे पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन और डिबेट बढ़ेगा, कम्पलसरी वोटिंग जहां लागू है, उसमें यह लागू हुआ कि उससे ये चीजें तय नहीं होती हैं। इसके बाद एक और थ्योरी है। आस्ट्रेलिया की थ्योरी सबसे महत्वपूर्ण है कि आस्ट्रेलिया में जो कम्पलसरी वोटिंग हुयी, उसमें वह 123 प्रतिशत इंक्रिज हुआ और उसमें यह देखा गया कि डाँकी वोटिंग, जो इस डेमोक्रेसी के लिए सबसे ज्यादा मौत वाली बात है कि कहीं कम्पलसरी वोटिंग हो गयी। आस्ट्रेलिय जैसे जगह में डाँकी वोटिंग हो रही है और वह कह रहा है कि “… which occurs when apathetic voters simply choose the first name on a ballot…”.
उनको कुछ पता ही नहीं है कि वह किस को वोट डालने जा रहा है। उनको वोट डालना है तो वोटर लिस्ट या बैलेट में जो पहला नाम है, उसी को वोट देना है। यह डाँकी वोटिंग है। मतलब आप यह समझिये कि जहां कम्पलसरी वोटिंग लागू है, वहां की यह स्थिति है। वर्ष 1984 में मैकलिस्टर ने वहां के बारे में बहुत बढ़िया स्टडी की है कि “… Australian candidates with a surname in the first third of the alphabet; whereas, such effects were not visible in the British elections …”.
मतलब यह कि आस्ट्रेलिया में उन्होंने पहले नम्बर से लेकर तीसरे नम्बर तक लिस्टेड लोगों को वोट दे दिया, यह इन्होंने कहा। लेकिन ब्रिटेन में ये चीजें लागू नहीं हैं। ब्रिटेन में लोग पार्टी, आइडियोलॉजी और उनके किए हुए कामों के नाम पर वोट देते हैं, जो हिन्दुस्तान में लागू है। मेरा कहना है कि आस्ट्रेलिया के मॉडल को भी आप लेंगे तो वहां ये चीजें संभव नहीं हैं। इसीलिए उसने अपने रिसर्च में कन्क्लूड किया।...(व्यवधान)
श्री मल्लिकार्जुन खड़गे: वर्ष 2014 में डाँकी वोटिंग हो गयी।
श्री निशिकान्त दुबे : इसका मतलब यह है कि खड़गे साहब ने जबर्दस्ती वर्ष 2014 में भारतीय जनता पार्टी के सारे उम्मीदवारों को नाम नम्बर एक से नम्बर तीन के बीच में डाल दिया होगा, इसलिए डाँकी वोटिंग हुयी। इसके लिए आपका धन्यवाद। उसने कंक्लूड किया।
“… To conclude, there is no evidence that individuals will seek out more information in a bid to fulfill their voting obligation; and compulsory voting will not necessarily improve the quality of civic engagement…”.
मैकलिस्टर का रिसर्च इन चीजों को कंक्लूड करता है। इसके बाद तीसरा सवाल इक्वैलिटी की बात करता है। इसके बारे में, मैं बहुत बोल चुका हूं कि इक्वैलिटी यह है कि दूसरे देशों में जहां-जहां ये चीजें लागू हैं कि जो नौकरीपेशा लोग हैं, जो गांव-गरीब, किसान लोग हैं, वे कम वोट करने जाते हैं और शहर के लोग ज्यादा वोट करते हैं। हमारे यहां वह सिचुएशन अलग है। यदि हमारे यहां वह उल्टा है, तो हमारे यहां वह भी पैमाना नहीं हो सकता है। उसके बाद कॉन्स्टीटूशनली जो रिप्रजैंटेटिवनेस लोगों को लगता है कि गांव का गरीब किसान, शेडय़ुल्ड कास्ट, शेडय़ुल्ड ट्राइब का जो रिप्रजैंटेशन है, दूसरे जगह लगता है कि जिसकी ज्यादा हिस्सेदारी होगी, जिस एरिया के जहां लोग होंगे, वे यदि ज्यादा पार्टिसिपेट करेंगे तो उनका रिप्रजैंटेशन इस डेमोक्रेसी में बढ़ जाता है।
कम्पलसरी वोटिंग में लोग इन चीजों को बताते हैं। हमारे यहां ये चीजें नहीं हैं। हमारे यहां सिचुएशन है कि हमने शैडयूल्ड कास्ट्स के लिए सीट रिजर्व कर रखी है, शैडयूल्ड ट्राइब्स के लिए सीट रिजर्व कर रखी है, अभी हम महिला रिजर्वेशन की भी बात कर रहे हैं।...(व्यवधान) बात कर रहे हैं, करेंगे, नहीं करेंगे, वह सरकार तय करेगी, यहां जितने विद्वान लोग हैं, वे तय करेंगे। मैं केवल यह कह रहा हूं कि कर रहे हैं। यहां दो एंगलो-इंडियन पीछे बैठे हुए हैं। उनके समुदाय का कैसे रिप्रैजैंटेशन होगा, उसके लिए भी हमने दो सीट रिजर्व कर रखी है। सारे सैक्शन का जो रिप्रैजैंटेशन है, वह हमारे यहां पहले से कौन्सटीटय़ूशन में मौजूद है। इसीलिए कम्पलसरी वोटिंग से हमारी वे चीजें बढ़ेंगी, यह जरूरी नहीं है या उसकी कोई आवश्यकता नहीं है।
नोटा का जो जजमैंट आया, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नोटा एक ऑप्शन हो सकता है और नोटा के आधार पर जो लागू हुआ, उसमें आर्टिकल 19 (1) बहुत महत्वपूर्ण है। आर्टिकल 19 (1) की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा --
“…a fine distinction between the right to vote and the freedom of voting as a species of freedom of expression.” यह सुप्रीम कोर्ट ने नोटा के सवाल पर कहा। फ्रीडम ऑफ एक्सप्रैशन, संविधान में हमने मौलिक अधिकार दिया हुआ है। फ्रीडम ऑफ एक्सप्रैशन क्या है - किसी को वोट देना। जैसे हम कहते हैं कि हिन्दू कोई धर्म नहीं है, हिन्दू एक कल्चर है और हिन्दू वे ऑफ लाइफ है। यह फैक्ट है कि हिन्दू वे ऑफ लाइफ है। यदि आप पूजा करना चाहते हैं, मंदिर में जाना चाहते हैं, भगवान को प्रणाम करना चाहते हैं, तो बहुत बढ़िया है, आप हिन्दू हैं। यदि आप पूजा नहीं करना चाहते, मंदिर में नहीं जाना चाहते तो भी आप हिन्दू हैं। पूजा करने और नहीं करने से, पूजा पद्धति को मानने न मानने से आपकी हिन्दू आइडैंटिटी पर कोई खतरा नहीं है। उसी तरह फ्रीडम ऑफ एक्सप्रैशन में वोट डालना चाहते हैं तो बहुत बढ़िया बात है, वोट नहीं डालना चाहते तो भी बहुत बढ़िया बात है, कैंडिडेट को चुनना चाहते हैं, नोटा लागू करना चाहते हैं। फ्रीडम ऑफ एक्सप्रैशन को रोकने के लिए कहें कि वोट डालना ही है। कई लोगों को लगेगा कि हमें वोट नहीं डालना है। कौन्सटीटय़ूशन का आर्टिकल 19 (1), नोटा के जजमैंट के समय सुप्रीम कोर्ट ने ये बातें कहीं। यदि आप कम्पलसरी वोटिंग पर जाएंगे...(व्यवधान)
श्रीमती सुप्रिया सुले (बारामती) :सभापति महोदया,...(व्यवधान)
श्री निशिकान्त दुबे : मैडम, उनसे इंट्रोडय़ूस करवा लीजिए।... (व्यवधान) मेरा भाषण बहुत लम्बा चलेगा, आप इंट्रोडय़ूस कर लीजिए। सभापति महोदया, सुप्रिया सुले जी को इंट्रोडय़ूस करने दीजिए, उसके बाद मैं अपना भाषण कंटीन्यू करूंगा।...(व्यवधान) मैं अभी एक घंटा बोलूंगा। ...(व्यवधान)
HON. CHAIRPERSON : Shri Nishikant Dubey, please complete your speech.
श्री निशिकान्त दुबे : मैं लम्बा बोलूंगा।...(व्यवधान) मैं आर्टिकल 19(1) की बात कर रहा था और नोटा है, सुप्रीम कोर्ट, एक ऑब्जर्वेशन मैं पढ़ चुका, दो और ऑब्जर्वेशन हैं। उसने कहा --
“The decision taken by a voter after verifying the credentials of the candidate either to vote or not is his right of expression under Article 19 (1) (a) of the Constitution.
Thus coercing the citizens to be involved in the democratic process contravenes their freedom of expression while reeking of liberalism.” यह सुप्रीम कोर्ट ने नोटा के जजमैंट के बारे में कहा। इसके बाद फाइनली “Finally, political science perspectives on the complexity of democracies argue that democracies need to accommodate dissent and diversity of views. This includes the option of disengagement, namely, “right to abstain, to withhold assent, to refrain from making a statement or from participating”, if people believe, “voting is mistaken, undesirable, unnecessary or immoral”.” ये सारी बातें सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजमेंट कहीं हैं और जब उसने अपने जजमेंट में ये बात कही तो हम मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट कंस्टीटय़ूशन का कस्टोडियन है। आप फंडामेंटल राइटस पर अटैक करने की बात करते हैं।
HON. CHAIRPERSON : Shri Dubeyji, how much time will you take? I would like to know whether we can permit Shrimati Supriya Sule to introduce the Bills.
SHRI NISHIKANT DUBEY: I have said that if you permit Shrimati Supriyaji, I have no problem. I have no issue.
HON. CHAIRPERSON: Okay, thank you.
16.33 hours COMPULSORY VOTING BILL, 2014 – Contd.
HON. CHAIRPERSON: Shri Nishikant Dubey to continue.
श्री निशिकान्त दुबे (गोड्डा) : सभापति महोदया, दूसरा तर्क कम्पलसरी वोटिंग के लिए यह दिया जाता है कि इससे लोगों को बहुत बेनिफिट होगा, लेकिन कुछ चीजों को हम और आप आज नहीं समझ पा रहे हैं। मान लीजिए, किसी ने वोट नहीं किया, उसके लिए आप क्या करेंगे, शो-कॉज पूछेंगे, 80-85 करोड़ वोटर इस देश में होंगे, इनमें से आज वोट का परसेंटज लगभग 60औ हैं, लगभग 30-35 करोड़ लोग इस देश में वोट नहीं करते हैं। अभी बिल के समय आपने कहा कि इतने केस पेंडिंग है, जज नहीं है, फाइनली तो कोर्ट में ही सुनवाई होगी, शो-कॉज पूछने के लिए कोई अधिकारी होगा। आप जिस इलेक्शन प्रोसेस की बात कर रहे हैं उस प्रोसेस में इलेक्शन कमीशन का कोई कॉडर हीं नही है, जो वहां अधिकारी होते हैं और चुनाव के समय आचार संहिता लागू हो जाती है, उनको जिलों में डेवलपमेंट का काम करना होता है चाहे वह कलेक्टर, बीडीओ, सीओ या और एक्जिक्यूटिव इंजीनियर हो, वे सारे लोग इस चुनाव में लग जाते हैं कि यह चुनाव दो-तीन महीने में खत्म हो जाता है। लगभग 30-35 करोड़ वोटरों ने वोट ही नहीं किया, शो-कॉज पूछने के लिए कितना लंबा प्रोसेस है, पूरे देश के डेवलपमेंट के सारे कामों को आप रोक देना चाहते हैं।
दूसरी बात है कि क्या बेंच के लिए सरकार के पास पैसा है? लाख केस सुनने के लिए, जज नहीं हैं, हाई कोर्ट में जज नहीं है, लोअर ज्यूडिशयरी में जज नहीं हैं, सुप्रीम कोर्ट में जज नहीं हैं। जब भारत अलग हुआ था, अलग रीज़न में सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट बना, तब 33-35 करोड़ की पापुलेशन थी। अब पापुलेशन बढ़ती जा रही है और इस हिसाब से कोर्ट्स की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। इनको सुनने के लिए कितने जजों की आवश्यकता होगी? वर्ष 2003 में भगवान शंकर रावत की कम्पलसरी वोटिंग पर चर्चा का जवाब देते हुए तत्कालीन लॉ मिनिस्टर ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी और मुझे लगता है कि हमारे लिए भी यह बात सोचने वाली है। के. वेंकटपति तब लॉ मिनिस्टर थे, उन्होंने 2003 में कहा - Such a participation in democratic process should better come out from the people voluntarily rather than by coercion or allurements. मतलब किसी को इंसेन्टिव दे देंगे। उस वक्त जो चर्चा भगवान शंकर रावत ने शुरु की, उसमें कहा गया कि वोटर को कुछ इन्सेन्टिव दे दें। मान लीजिए कि कोई वोटर बाहर से वोट डालने आता है, उसे आने-जाने का किराया दे दीजिए, टीए दे दीजिए, चीजें दे दीजिए, डीए दे दीजिए। तब कहा गया - A sense of duty in this regard should inform the people on their own, and it is the sense of duty which should be the motivating factor in impelling people to turn up at the polling station in larger numbers. इसमें हमारी और आपकी डय़ूटी बनती है, लोगों की डय़ूटी बनती है, अपने आप की डय़ूटी बनती है। मैं आपको बताना चाहता हूं कि यह देश पाप और पुण्य से चलता है। यदि कोई कहे कि यह देश पाप और पुण्य से नहीं चलता या बड़े और छोटे के रिगॉर्ड से नहीं चलता है, तो मैं कहना चाहता हूं -
अभिवादन शीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलभ्।
जैसे ही खड़गे साहब खड़े होते हैं, मैं बैठ जाता हूं। मैं इसलिए बैठ जाता हूं क्योंकि वह हमारे बड़े हैं, सीनियर हैं, कोई ज्ञान की बात कर रहे होंगे, हमें गाईड करने की बात कर रहे होंगे। ऐसा नहीं है कि कोई जबरदस्ती है इसलिए मेरे कहने का यही मतलब है कि यह देश पाप और पुण्य से चलता है। देश में इतनी पुलिस फोर्स नहीं है जो कंट्रोल कर सके, क्राइम को कंट्रोल कर सके, चीजों को कंट्रोल कर सके। समाज में निर्भया जैसा कांड हो जाता है तो दिल्ली जैसा शहर उमड़ पड़ता है जबकि निर्भया हर किसी की बेटी नहीं थी, रिश्तेदार नहीं थी। इंडिया गेट पर लोग गए, उनको लगा कि देश में यह गलत हुआ है और ये चीजें नहीं होनी चाहिए। उसी तरह जब तक हमारे मन में नहीं होगा कि डेमोक्रेसी हमारी है, देश हमारा है, कांस्टीटुएशन हमारा है, इसमें हमारे पार्टिसिपेशन की आवश्यकता है, जब तक लोग एक्टिव होकर नहीं आएंगे तब तक कुछ नहीं होगा और यदि आप चाहेंगे कि जबदस्ती करा लें तो भी कुछ नहीं होगा।
महोदया, मैं आपको इसका सबसे बड़ा उदाहरण देता हूं, हम पार्लियामेंट में बैठे हैं, जब हमारी इच्छा होती है, हम सैंट्रल हॉल में चाय पीने के लिए चले जाते हैं, जब इच्छा होती है घर में खाना खाने चले जाते हैं। मेरी जब इच्छा होती है मैं इस कुर्सी से उठता हूं और खड़गे जी के पास चला जाता हूं प्रेमचन्द्रन जी के पास चला जाता हूं, तथागत जी के पास चला जाता हूं। यदि कहा जाए कि आप आते हैं, तो 40 नंबर पर ही बैठना है, 11 बजे से लेकर जब तक पार्लियामेंट का ताला बंद नहीं होता है, तब तक बैठना है, तब यहां कितने एमपी बैठेंगे? सवाल यह है कि जब हमें लगता है कि हमारी डय़ूटी है और आप उस तरह की जब तक एजुकेशन या अवेयरनेस लागू नहीं करेंगे, तब तक ये चीजें सक्सेफुल नहीं हो पाएंगी।...(व्यवधान)अभी हमारेबड़े भाईशत्रुघ्नजी आगए हैं,मुझे बड़ीखुशी हुईहै, मैंजब बोलताहूं, वहया तोटीवी परदेखते हैंया यहांआ जातेहैं, जैसेअभी टीवीपर देखतेहुए आगए हैं।...(व्यवधान)
महोदया, दुनिया में 28 देश हैं जहां कम्पलसरी वोटिंग है। मैं उसका एक कम्पेरेटिव चार्ट देना चाहता हूं कि कौन से देश हैं, उनकी क्या बातें भारत से अलग हैं। अब आप समझें कि 28 देशों में से 14 देशों ने लागू किया है, ये बहुत छोटे देश हैं, बेल्जियम, लिचेन्सटाइन, लक्समबर्ग, नौरु और एक कन्टोन स्विट्जरलैंड का है। आप इन सब देशों को देखें, ये हमारे ब्लॉक के बराबर है भी या नहीं, यह भी नहीं पता है। इतने छोटे-छोटे कंट्रीज हैं कि एक पंचायत का इलैक्शन, एक ब्लॉक का इलैक्शन, एक जिले का इलैक्शन, मान लीजिए कि जिले के बराबर यदि कोई देश हो गया तो उसको तो आप किसी तरह से कंट्रोल कर सकते हैं, यहां तक कि हमारे यहां कई ऐसे राज्य हैं जहां कमपलसरी वोटिंग यदि नहीं भी है तो भी 85-90 प्रतिशत- सिक्किम जैसे राज्य जो हैं जहां टोटल वोट ही पांच लाख के आसपास है। इसी तरह से गोआ है जहां टोटल वोट ही 12-13 लाख के आसपास है, जैसे लक्षद्वीप है, जहां टोटल वोट, जैसे लोक सभा के एम.पी. जो जीतकर आते हैं, वहां टोटल वोट ही 48-49 हजार हैं। मान लीजिए कि इस तरह की चीजों में यह संभव है और 14 देश जो हैं, वे छोटे-छोटे हैं लेकिन जो देश इतना बड़ा है जहां 130 करोड़ का बेस है, उसमें ये चीजें कैसे संभव है? यह सोचने वाली बात है।
इसी तरह से जो दूसरे तरह के देश हैं, जैसे आस्ट्रेलिया, ब्राजील, लिक्वीडर, सिंगापुर, पेरू और उरुग्वे है। इन देशों के बारे में यदि आप देखेंगे कि इटली और नीदरलैंड में भी यह कानून लागू था। इटली भी एक अच्छा देश है और नीदरलैंड भी एक बड़ा देश है और इन दोनों देशों ने यानी 1993 में इटली ने और 1967 में नीदरलैंड ने, यानी हमसे पहले नीदरलैंड ने जब लागू किया था तो 1967 में उन्होंने यह सोचा कि इससे हम आम जनता को फायदा पहुंचाने के बदले नुकसान कर रहे हैं तो नीदरलैंड ने 1967 में इसको एबॉलिश कर दिया, इटली ने इसको 1993 में एबॉलिश कर दिया। ग्रीस में भी जिसके यहां उसका एनफोर्समेंट कमपलसरी था, वह वाला क्लॉज 1995 में खत्म कर दिया। जहां जहां यह लागू हुआ, वहां वहां यह फेल भी हुआ और फेल होने के बाद उसको कहीं न कहीं उन लोगों ने वापस किया। उसके बाद ग्रीस ने जब ये आइडिया खत्म कर रहे थे तो इसको खत्म करते हुए ग्रीस ने कहा कि:
“Is compulsory voting a dying phenomena in Western Europe? Perhaps in a few years, it will only be kept as a ghost in country’s Constitution without any intention to enforce it.” SHRI MALLIKARJUN KHARGE(GULBARGA) : He has to speak on behalf of 282 Members. So, he has to justify from all of them.
श्री निशिकान्त दुबे : खड़गे साहब, आप तो बड़े हैं। हमेशा अच्छा होता है कि खऱाब से खराब भाषण में भी आपको बैठना पड़ता है क्योंकि आपकी मजबूरी है।...(व्यवधान)
श्री तथागत सत्पथी (धेंकानाल) : आप इटली के बारे में बोलिए। सब सुनेंगे।...(व्यवधान)
श्री निशिकान्त दुबे: मैडम, फिजी ने इसको 2014 में खत्म कर दिया। वहां भी यह लागू था और चिली ने 2012 में खत्म कर दिया। आप यह समझिए कि जहां जहां कमपलसरी वोटिंग थी, यानी मैं सदन को केवल यह बताना चाहता हूं कि जहां जहां कमपलसरी वोटिंग लागू हुई, वहां वहां यह सफल नहीं हुआ। मैंने अभी आपको जो उदाहरण दिये, फिजी ने 2014 में और चिली ने 2012 में इस कानून को खत्म कर दिया। इसी के बाद आस्ट्रिया ने जो उसका ट्रॉयल डिस्ट्रिक्ट था, जिसको वे रीनेम करना चाहते थे, उसके लिए 2004 में कमपलसरी वोटिंग का कानून खत्म कर दिया।
उसी तरह से जहां पर यह कमपलसरी वोटिंग है, जिसके बारे में मैंने आपको कहा, आस्ट्रेलिया जहां कि डीफॉल्टर्स को फाइन देना पड़ता है यदि आप वोटिंग के लिए नहीं जाते हैं तो फाइन देना पड़ेगा। उसके कारण आस्ट्रेलिया में भी यह चर्चा शुरु हो चुकी है कि हम इन चीजों को किसी और चीजों के साथ जोड़कर देख सकते हैं या नहीं देख सकते हैं, आस्ट्रेलिया की अभी रीसेंट रिपोर्ट आई है कि वहां जो रिजेंटमेंट है कि वहां की सरकारें बन रही हैं, बिगड़ रही हैं, वहां भी फुल मेनडेट की सरकार नहीं बन पा रही है। इस कारण से आस्ट्रेलिया में भी इस तरह की चीजें चालू हो गई है और पेरू यह कह रहा है कि हम इस चीज को यदि लागू करते हैं तो पहले जैसे वोटर आइकार्ड के आधार पर जब आप ठप्पा मारते थे तो उसमें कुछ चीजों के लिए आप एलीजिबल थे। सोशल सिक्योरिटी के काम के लिए आप योग्य थे, इसे लागू रखना है या नहीं? पेरू में यह डिस्कशन का पार्ट है। इसके अलावा ब्राजील में महत्वपूर्ण बात यह चल रही है कि उसकी परिस्थिति कुछ भारत जैसी है। उसमें गरीब लोग उतनी पेनल्टी दे पाने की स्थिति में अपने आपको नहीं पाते हैं और इस कारण उन्होंने ब्राजील में एक ग्रुप बना रखा है और वे अगले चुनाव के लिए सारी राजनीतिक पार्टियों से कमिटमेंट चाह रहे हैं कि इस बार तो हम आपको वोट दे रहे हैं लेकिन अगली बार यदि वोट देने जाते हैं तो आप इसे खत्म करेंगे या नहीं, ऐसा ब्राजील में चल रहा है।
इसी कारण भारत सरकार ने लॉ कमिशन बनाया था। लॉ मिनिस्टर सदन में मौजूद हैं। उनका कंक्लूजन मार्च, 2015 में आया है। लॉ कमिशन ने अपनी रिपोर्ट यह दी है कि कहीं से भी कम्प्लसरी वोटिंग नहीं होनी चाहिए और उसके बारे में उन्होंने कहा हैः-
“Thus the Law Commission does not recommend the introduction of compulsory voting in India and in fact, believes it to be highly undesirable for a variety of reasons described above such as being undemocratic, illegitimate, expensive, unable to improve quality of political participation and awareness, and difficult to implement.” 15 मार्च 2015 को माननीय सदानंद गौड़ा जी को लॉ कमिशन ने दिया है और लॉ कमिशन ने बहुत ही डेलिब्रेशन किया है। उसने 270 पेज की रिपोर्ट दी है। उसमें ये सारी बातें उन्होंने बताई हैं। मेरा उन माननीय सदस्य से आग्रह है जो इस विषय को लेकर आए हैं और सरकार से भी कि कम्प्लसरी वोटिंग के स्थान पर कई दूसरी चीजें करने की आवश्यकता है क्योंकि हम जिस डेमोक्रेसी में विश्वास करते हैं, उसमें पजामा-कुर्ता पहनना आजकल दुष्कर हो गया है। लोगों का कहना है कि कोई काम नहीं है तो पजामा-कुर्ता पहन लिया है। यदि आप अच्छी गाड़ी में घूम रहे हैं तो लोग कहेंगे किसी न किसी से कमीशन ली होगी। कहीं हवाई जहाज में परिवार के साथ जा रहे हैं तो कहेंगे कि किसी न किसी ने अरेंजमेंट कर दिया होगा। किसी पांच सितारा होटल में खाना खा रहे हैं तो कहेंगे कि किसी मोटी पार्टी को पकड़ रखा है। हमने इसमें बहुत पारदर्शिता की है लेकिन कुछ न कुछ ऐसा है जिसे बदलने की बात है। मेरा कहना है कि सैक्शन 77 रिप्रेजेंटेटिव्स पीपल्स एक्ट है, उसमें आथोराइज केंडिडेट के द्वारा जो इलेक्शन एक्सपेंसिस हैं, वे सैक्शन 77(1) जो है, जो डेट आफ नोटिफिकेशन से एप्लाई होता है, इसमें एक अमेंडमेंट की आवश्यकता है। उसके पहले भी कोई पोलिटिकल पार्टी अगर लगातार पैसा खर्च करती है, उदाहरण के लिए मान लीजिए कि हम सीटिंग एमपी हैं, हम कोई न कोई रैली करते रहते हैं, लोग सोचते हैं कि हम इलेक्शन कमिशन को बताते हैं कि हमने दस लाख खर्च किया या इतने पैसे खर्च किए, तो लोग कहते हैं कि झूठ की खानापूर्ति करने के लिए कह रहे हैं। मेरा मानना है कि सैक्शन 77(ए) में आपको बदलाव करने की आवश्यकता है।
दूसरी बात यह है कि पालिटिकल पार्टीज को जो चंदा मिल रहा है, उसमें पारदर्शिता नहीं है। मेरा दूसरा आग्रह है कि सैक्शन 182(1) जो कम्पनीज एक्ट वर्ष 2013 का है, उसमें संशोधन करना चाहिए कि जो पैसा पालिटिकल पार्टी को कम्पनियां दे रही हैं, वे बोर्ड आफ डायरेक्टर्स अपने आप तय कर लेते हैं जबकि आपको पता है कि कम्पनियों में इक्विटी मुश्किल से दो परसेंट, चार परसेंट, दस परसेंट होती है और 90 परसेंट पैसा कम्पनियों में आम लोगों का है। इसके लिए एनुअल जनरल मीटिंग की आवश्यकता है। एजीएम के बिना ही बोर्ड आफ डायरेक्टर्स उसे पास कर लेते हैं। मेरा मानना है कि आप इसमें अमेंडमेंट कीजिए कि जो पालिटिकल पार्टी को चंदा दिया जाएगा, वह एजीएम से तय होगा न कि बोर्ड आफ डायरेक्टर्स से तय होगा। इसके अलावा जो डिस्क्लोजर है, 78 रिप्रेजेंटेशन आफ पीपल्स एक्ट का, उसमें अमेंडमेंट करने की आवश्यकता है। एक न्यु सैक्शन 78 (ए) लगाने की आवश्यकता है जिससे कि जो डिस्ट्रिक्ट इलैक्शन आफिसर है, वह अपनी वेबसाइट पर इंस्पेक्शन करता है, दौरा करता है कि किस आफिसर ने क्या चीजें की हैं और कौन-सी नहीं की है। हमारे और आपके ऊपर आचार संहिता का केस लग जाता है। मान लीजिए कि खंभे पर पोस्टर लगा है और केंडिडेट दूसरी जगह पर है, जिस दिन पोस्टर लगा है, उसमें केंडिडेट को मतलब ही नहीं है। आपका कोई विरोधी ऐसा काम कर देता है तो आपके ऊपर आचार संहिता का केस हो जाता है। अगर कहीं हेलीकाप्टर गलत लैंड हो गया और जो प्रचार करने जा रहा है, उसे तो पता ही नहीं है कि उसे कहां उतारा जा रहा है। उसे तो यह पता है कि उसे यहां जा कर भाषण देना है। इन चीजों में जो पारदर्शिता नहीं है, उन्हें चेंज करने की आवश्यकता है। इसके अलावा इन्नर पार्टी डेमोक्रेसी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि कोई भी पालिटिकल पार्टी ज्वाइन करता है तो आइडियोलोजी के कारण ज्वाइन करता है। जब हम यहां एमपी बनकर आते हैं तो पार्टी की आइडियोलोजी तो रखते हैं लेकिन हमारा जो महत्वपूर्ण काम है कि हमारे यहां की जनता की जो समस्याएं हैं उनका क्या होगा। वहां सूखा पड़ता है या बाढ़ आती है लेकिन यहां किसी न किसी कारण संसद चलने नहीं देते हैं या पालिटिकल पार्टी के दबाव में हमें काम करना पड़ता है इसलिए इन्नर पार्टी डेमोक्रेसी होनी चाहिए। इसके लिए क्या सुधार किए जा सकते हैं, यह सोचने की बात है।
HON. CHAIRPERSON : There are eight more Members to speak. Shri Dubey, please conclude.
SHRI NISHIKANT DUBEY: I will conclude within three to four minutes. इसके बाद प्रपोरशन आफ रिप्रेजेंटेशन जो है, कई एक इलाके पालिटिकल पार्टी में ऐसा होता है कि शहरों के ज्यादा लोग आ जाते हैं और गांव का प्रतिनिधित्व कम होता है। किसानों का प्रतिनिधित्व कम हो जाता है, इसके लिए पारदर्शिता होनी चाहिए कि पूरे पोलिटिकल सिस्टम में सभी का प्रतिनिधित्व बराबर का होना चाहिए। अलग-अलग वर्ग का कैसे रिप्रेजेंटेशन हो, यह भी देखने की जरूरत है।
एंटीडिफेक्शनलॉ एकमौकरी बनगया है।हमने जिसआधार परइसे बनायाथा, वहकाम नहींकर पारहा है,तो हमइसे कैसेस्ट्रेनदेनकर सकतेहैं, इसपर ध्यानदेने कीआवश्यकताहै। सबसेमहत्वपूर्णबात, जोमैंने अपनेतक़रीरमें कहीकि इलेक्शनकमीशन काएक कैडरहोना चाहिए।इलेक्शनकमीशन आजभी इंडिपेंडेंटनहीं है।स्टेट केऊपर औरबहुत-सेलोगों केऊपर उसेनिर्भरकरना होताहै। इसलिएइंडिपेंडेंटइलेक्शनकमीशन केलिए इसकाएक कैडरहोना चाहिए।
मैंपेड न्यूज़के संबंधमें कहनाचाहता हूँकि हमलोग जबचुनाव लड़नेके लिएजाते हैं,तो कोईइलैक्ट्रोनिकमीडियावाला याकोई प्रिंटमीडियाकहता हैकि इतनापैसा दीजिएतो हमआपको इतनासमय देंगे।श्री चौहानसाहब इससदन केसदस्य हैं,उन्हींके केसमें सुप्रीमकोर्ट केकई फैसलेहैं, मुझेलगता हैकि आजवह समयआ गयाहै किपेड न्यूज़और एडवर्टिजमेंटके बारेमें कदमउठाना है।
इसकेबाद ओपीनियनपोल कीबात आतीहै। अभीओपीनियनपोल काकितना बुराहाल हुआ,अभी आपनेदेखा है।किस तरहसे ओपीनियनपोल लोगोंको प्रभावितकरने काप्रयासकरता हैऔर इससेजो दो-चारप्रतिशतफ्लोटिंगहै, वहप्रभावितहोता है।इस रिफॉर्मसे ओपीनियनपोल परक्या असरहोगा, इलेक्शनपीटीशनपर क्याअसर होगा?
सबसेमहत्वपूर्णबात यहहै किहम जबचुनाव लड़नेजाते हैं,तो हमारेलिए अलगवोटिंगरजिस्टरबना हुआहै किकिनको-किनकोवोट करनाहै। विधानसभा केलिए अलगहै, मुखियाके लिएअलग है,जिला परिषदयानी पंचायतीराज सिस्टमके लिएराज्य नेअलग सेव्यवस्थाकी है।लोक सभाचुनाव काअलग सेहै। यहाँतक किबूथ काभी अलगसे है।मेरा यहकहना हैकि पूरादेश एकहै। एकही देशमें अलग-अलगबूथ कैसेहो सकतेहैं। वोटर्सका जोरजिस्ट्रेशनहै किकौन किसमेंवोट देगा,उसमें उसकाअलग वोटहै, इसकाकारण यहहोता हैकि जिन्होंनेमुखियाके चुनावमें वोटदिया है,जिन्होंनेजिला परिषदके चुनावमें वोटदिया है,जब लोकसभा काचुनाव आनेलगता है,तो उनकानाम कटाहुआ नज़रआने लगताहै। वेइस भरोसेमें रहतेहैं किमेरा नामउसमें ऑलरेडीमौजूद है।मेरा यहकहना हैकि इससिस्टममें एकबड़े परिवर्तनकी आवश्यकताहै किवोटर लिस्टएक हीहोगा चाहेवह लोकसभा काहो, चाहेविधान सभाका हो,चाहे पंचायतचुनाव काहो। पोलिंगस्टेशनभी एकही होनाचाहिए ताकिलोगों कोपता चलपाए। नहींतो, होतायह हैकि कोईमुखियाके चुनावमें अपनेगांव मेंवोट देतेहैं औरजब लोकसभा काचुनाव होताहै, तोतीन किलोमीटरदूर जानापड़ता है।उनको यहअंदाजाही नहींहोता हैकि येसारी चीजेंहोती हैं। मेरा यह मानना है कि आज समय यह है कि ब्लैक मनी कैसे खत्म होगी, सिस्टम में ट्रांसपेरेंसी कैसे आएगी, जब ये सब काम कर लेंगे, जब यह देश इतना परिपक्व हो जाएगा, इंडिपेंडेंट इलेक्शन कमीशन हो जाएगा, तब कम्पलसरी वोट का समय होगा। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। जय हिन्द, जय भारत।
श्री अधीर रंजन चौधरी (बहरामपुर) : धन्यवाद मैडम। श्री निशिकान्त दुबे ने सारी महाभारत का वर्णन कर दिया है, अब ज्यादा कुछ कहने के लिए नहीं बचा है। वह इतना निर्दयी हैं, यह मुझे पहले पता नहीं था कि सारी बातें उन्होंने बता दीं, मेरे लिए कुछ नहीं छोड़ा है।
मैडम, हम पहली बार देख रहे हैं कि प्राइवेट मेंबर बिल में इनिशिएटर के अलावा भी इतने सदस्यों को बोलने का मौका दिया गया। जो जिम्मेदारी निशिकान्त दुबे जी को दी गयी थी,...(व्यवधान)
श्री मल्लिकार्जुन खड़गे : ये बुफे सिस्टम में आए हैं, जो पहले आया, उसने खा लिया।
श्री अधीर रंजन चौधरी : श्री निशिकान्त दुबे जी के ऊपर जो दायित्व सौंपा गया था, उसे बड़ी जिम्मेदारी के साथ निभाया है।
I want to participate in the discussion on the Bill introduced by Shri Janardan Singh ‘Sigriwal’under the nomenclature - Compulsory Voting Bill, 2014. It is intending to provide for compulsory voting by the electorates in the country and for matters connected therewith.
The concept of compulsory voting had also been initiated earlier in this House and outside the House as well. It is not a new concept that is being examined. Over the years, the concept of compulsory voting has been discussed in various fora of our country and in the global arena also.
In the Statement of Objects and Reasons, it has been stated that our country is the largest democracy in the world having a population of more than a billion. There is no dispute about it. But it is seen that only about 50 per cent of the eligible voters exercise their right to vote. In almost all the elections in the country, it has been observed that the number of actual voters – I would like to highlight it – is far below the number of eligible voters.
In the last Lok Sabha election, the eligible voters were accounted to be more than 81 crore. It is really a mindboggling aspect of Indian democracy that 81 crore eligible voters are there who are entitled to exercise their franchise in order to elect someone of their choice to run this country. So, naturally we are proud of it. It is the largest democracy in the world. It is a glorious democracy in the world and it is a vibrant democracy in the world.
17.00 hours But in the same vein I would like to highlight that still India is in the process of evolution as a democracy. We, as a country, are yet to achieve the crown of matured democracy like the United States of America or other European countries. We are still recognised as an evolving democracy, rather than a matured democracy. So, what is sauce for the goose cannot be the sauce for the gander. So, we have to devise our own ways without compromising the basic tenets of democracy to run our country.
17.01 hours (Shri P.Venugopal in the Chair) Therefore, we never exercised any kind of coercive measures in order to enhance the turn out of the electorate in our electoral system. We never encouraged any kind of coercive policy, rather we always encouraged the persuasive policy in order to enhance the voter turn out in our country. So, there is a widening gap between the number of actual voters and the number of eligible voters, as a result of which the average voting is also low. Therefore, my esteemed colleague has suggested that some sort of legislative measures should be initiated to encourage the citizens to exercise their votes in order to elect their representatives so that the results of the elections show the will of the electors and not just a segment of them.
Sir, it is a lucid argument. There is no denying it. If anyone of us can garner a single vote more than my immediate contestant, then I will be declared elected by a margin of even single vote. First past the post policy is being adopted in our country. But it does not mean, in any way, that the elected person who has won the election by a single vote and not even been able to garner more than 50 per cent of the votes is being represented by a majority of the electorate. However, he is elected. Naturally, there is some sort of contradiction and confusion in saying that elected representatives is representing the majority of the electorate. This cannot be established by this argument. But it has become the norm and practice of our country.
Here my esteemed colleague also spelt out that the problem of low voting percentage has become worse and the voting percentage has come down even below 50 per cent. In many cases, citizens were deliberately avoiding casting of votes or even boycott elections. Therefore, the Bill seeks to make voting compulsory for all the electorate subject to certain restrictions so that the voting percentage in the country is increased. However, the citizens who are physically incapacitated or have bona fide reasons have been given exemptions under the Act. Since voting is being made compulsory, punishment is also sought to be given to those who do not cast their votes. At the same time, incentives are also proposed for those who do exercise their right to vote without break or in spite of illness.
Here, in this legislative document, to ensure casting of vote, carrot and stick policy has been proposed. On the one hand, there has been a provision of punishment and on the other hand, there has been a provision of incentive. That means, both inducements and intimidations have been enshrined in this legislative document. This is a new phenomenon that has been inserted here. Inducement and intimidation or threat are the twin weapons that are being played in various parts of our country before, during and after elections.
कुछ रोज पहले बिहार में चुनाव हो रहे थे तो बंगाल में बिहार के रहने वाले पैसे वाले लोगों से मेरी मुलाकात हुई और मैंने उनसे पूछा कि बिहार में चुनाव कैसे हो रहे हैं तो उन्होंने कहा कि बिहार के चुनाव में पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। मैंने उनसे पूछा कि कौन जीतेगा? उन्होंने कहा कि बीजेपी जीतेगी। किसने पैसा डाला और कौन पानी की तरह से पैसा बहा रहा है, यह मैं नहीं कहना चाहता। लेकिन उन्होंने कहा कि बिहार में पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है और समझ लो बीजेपी भारी बहुमत से जीत जायेगी। तब यह धारणा हममें भी पैदा हुई थी कि जिस तरीके की वहां हाई पिच कैम्पेन हो रही है, जहां के आसमान में उड़नखटोला छा गये थे, चारों तरफ उड़नखटोला ही उड़नखटोला आसमान में छा गये थे। लोग सोचते थे कि ये देवदूत लोग कहां से आ रहे हैं। हम लोगों ने भी सोचा था कि बिहार में नतीजा वैसा ही होगा, जो बीजेपी की सोच में है। लेकिन बाद में देखा कि common people have dashed the hopes of the ruling regime. It bears an eloquent testimony that our electorates cannot be induced provided they have been offered an access to exercise their franchise. If they are able to cast their votes, many fortunes could be tumbled, as has been evident in various parts of our country.
सर, मैं भी बंगाल से आता हूँ। कुछ महीने पहले बंगाल में पंचायत और नगरपालिका के चुनाव हुए हैं। आप सब लोग टीवी पर देखें हैं। उस चुनाव में बेतहाशा दहशतगर्दी सबको देखने को मिली है। सौगत दादा यहां हैं। सौगत दादा बुरा नहीं मानोगे, लेकिन जो हुआ सो हुआ। ...(व्यवधान) कलकत्ता में दिन दहाड़े in the full glare of police, in the full glare of administration, गुंडागर्दी इस तरीके की हुई थी कि आम लोगों की हिम्मत वोट देने की नहीं हुई। स्टेट इलैक्शन कमिश्नर तो सूबे की सरकार के चुने हुए नुमाइंदे हैं, उनकी क्या हिम्मत है कुछ कहने की, उनकी बोलने की क्या हिम्मत है? वे तो खुद सरकार से डरते हैं। बिना कुछ बोले इलैक्शन कमीशन की सिक्युरिटी को उठा लिया जाता है। उनको डराने की कोशिश की जाती है, भड़काने की कोशिश की जाती है। समझ लीजिए कि बंगाल के जो चुनाव टीएमसी के जमाने में हुए, उसमें जो खून बहा और यह mockery of democracy देखने को मिला। यह हम सबके लिए शर्मिंदा की बात है कि जो सरकार कहती है कि हम लोग माँ मानुष और माटी की सरकार बनाएंगे, उसी के ज़माने में गुंडागर्दी और दहशतगर्दी देखते हुए, बंगाल के लोगों के साथ-साथ, पूरे हिंदुस्तान के लोग चौंक गए कि ये क्या देख रहे हैं। वह यह बंगाल है, जिस बंगाल में नेताजी सुभाष चंद्र बोस से ले कर, रवींद्रनाथ टैगोर और नजीरूल इस्लाम हुए हैं, यह वह बंगाल है, जहा रामकृष्ण टैगोर से ले कर स्वामी विवेकानंद की भूमि है। सब लोग घबरा गए हैं। आज हमें जा कर लोगों को यह कहना पड़ता है कि घबराओ मत, क्योंकि छह महीने बाद वहां फिर चुनाव होने वाला है। हमारे यहां चुनाव होंगे, केरल में होंगे, असम में होंगे। अभी वहां के आम लोग यह कहते हैं कि भाई साहब आप चुनाव के बारे में बात करना शुरू किए हैं, लेकिन विधान सभा चुनावों में क्या हम लोग वोट डाल सकेंगे? क्या हमें वोट डालने का मौका मिलेगा? हमें कोई पीटेगा तो नहीं? हमें कोई मारेगा तो नहीं? आपको सुनने में अचरज होगा कि विपक्षी दलों के जो लोग हैं, जैसे कि हमारी पार्टी के लोग हैं, चुनाव आते ही सत्तारूढ़ पार्टी एक प्लान बना लेती है, कौन सा प्लान? जहां हमारे एक्टिव लीडर्स लोग हैं, हमारे वरिष्ठ लीडर्स लोग हैं, उन्हीं सबको तरह-तरह के झूठे इल्जाम से फंसाने की साजिश बन रही है, उनको सलाखों के पीछे किया जा रहा है। इसलिए कि चुनाव आने के पहले ही ये सारे किस्से खत्म किए जाएं। इसको कौन संभालेगा? इसको कौन रोकेगा? क्योंकि सत्ता और लॉ एण्ड ऑर्डर स्टेट सब्जेक्ट है तो इसको कौन रोकेगा? हाँ लोगों को हम यह भरोसा तो जरूर दिलाते हैं कि घबराओ नहीं, अगले चुनाव सेंट्रल इलैक्शन कमीशन करेगा। जब सेंट्रल इलैक्शन कमीशन करेगा तो बिहार जैसा वोटिंग होगा। यह हम उदाहरण के तौर पर आम लोगों को कहते हैं। उनको हिम्मत और ताकत देने के लिए कहते हैं। उनको हम लोग कहते हैं कि घबराओ नहीं, तुमने देखा नहीं कि बिहार में किस तरीके के कड़े कदम उठाए गए। उसी तरह के कड़े कदम यहां भी उठाए जाएंगे, क्योंकि इलैक्शन कमीशन किसी पार्टी की बात नहीं सुनते हैं। यह भरोसा अब तक है। ...(व्यवधान)
HON. CHAIRPERSON: Hon. Members, there are still eight Members who want to speak on this Bill. If the House agrees, the time for discussion of the Bill may be further extended by one hour.
SOME HON. MEMBERS: Yes.
HON. CHAIRPERSON: Shri Adhir Ranjan Chowdhury, please continue.
… (Interruptions)
SHRI N.K. PREMACHANDRAN (KOLLAM): How can it be extended by one hour? I have already made a suggestion.
HON. CHAIRPERSON: Eight more hon. Members are there to speak.
SHRI N.K. PREMACHANDRAN: Kindly hear me. My point is that the Bill which has been approved or passed by the Rajya Sabha is pending before this House. We should give priority to that Bill also. That is a matter which is related to the rights of the transgender persons in our society. So, definitely, that should also be taken into consideration.
HON. CHAIRPERSON: Already you have made that suggestion. Why are you raising it again?
श्री जनार्दन सिंह सीग्रीवाल (महाराजगंज) : महोदय, जब स्वीकृति हो गई है तो फिर इसका कोई मतलब नहीं है।...(व्यवधान)
श्री निशिकान्त दुबे : महोदय, आठ लोग बोलने वाले हैं तो कैसे होगा?...(व्यवधान)
SHRI N.K. PREMACHANDRAN: I have made the suggestion. Now, the time is extended and further extended.… (Interruptions)
HON. CHAIRPERSON: Eight more Members are there to speak. This is also an important Bill.
श्री निशिकान्त दुबे : वे लोग चाहते हैं, हमारी पार्टी चाहती है, इसमें कोई दिक्कत नहीं है। अभी इस पर आठ लोग बोलने वाले हैं।...(व्यवधान)
SHRI N.K. PREMACHANDRAN: I am strictly going by the rules. The time for the Private Members’ Business is allotted by the Committee chaired by the Deputy-Speaker. Two hours’ time has been allocated for this. Now, the time has exceeded by seven hours. My point is that extending the time further definitely gives a message that this House is not going to take up the Transgender Persons Bill. This is my point. Therefore, my point is that please conclude the discussion today. I may be allowed to at least move the Bill. Let us have the discussion on the 18th. Otherwise, this is the fourth time that my Bill is being listed and not taken up. Unfortunately, the House is prolonging the discussion on the Compulsory Voting Bill and denying the right of the deprived sections of the society… (Interruptions)
HON. CHAIRPERSON: Let him first complete it.
SHRI N.K. PREMACHANDRAN: The total time allotted to this Bill is two hours. The Mover has taken more than one hour. How much time will you allot? That is my question to the House.
HON. CHAIRPERSON: More Members are willing to speak. How can you deny the willingness of the Members? Eight more Members are there to speak. How can you deny them the chance?
श्री निशिकान्त दुबे : आप उन्हें बोलने से कैसे रोक सकते हैं?...(व्यवधान) यह आपका अधिकार है तो प्राइवेट मेंबर में और भी आठ लोगों का अधिकार भी है, वे बोलना चाहते हैं।...(व्यवधान) यह सरकारी बिल तो है नहीं।...(व्यवधान) आप कैसे आठ लोगों की बात को रोक सकते हैं?...(व्यवधान) सरकार ने कह दिया है और वह चाहती है कि आपका बिल आ जाए।...(व्यवधान)
SHRI N.K. PREMACHANDRAN: Every Member is willing to speak. Members have the right to speak. It is a question of decorum of the House. How to conclude the discussion? Suppose all the Members want to speak. Will it be allowed? That is my question. That is why, we are fixing the time for a Bill.
HON. CHAIRPERSON: Let us first complete this Bill. Let us see later on.
PROF. SAUGATA ROY (DUM DUM): I can understand it. He is very much anxious because the other Bill is in his name. Naturally, when he has taken the trouble of moving a Bill, he would expect that he should be able to speak. I make this suggestion. Since many Members are interested, let the debate continue. In the meantime, after Shri Adhir Ranjan Chowdhury finishes his speech, let him be allowed to move that the Bill be taken into consideration.
HON. CHAIRPERSON: Prof. Roy, this is also an important Bill. Shri Premachandran, you can initiate the discussion on the 18th.
श्री निशिकान्त दुबे: ऑलरेडी जब भी यह डिस्कशन खत्म होगा, वह बिल लैप्स नहीं करेगा।...(व्यवधान) मैं केवल आपकी जानकारी के लिए बता रहा हूँ कि जब यह बिल खत्म होगा, ऑटोमेटिक वह बिल सबसे पहले लिया जाएगा।...(व्यवधान) इसके बाद वही होगा।...(व्यवधान) वह लैप्स नहीं होगा।...(व्यवधान) मूव तो वे करते हैं, जौ लैप्स होता है।...(व्यवधान) वह बिल लैप्स नहीं होगा।...(व्यवधान)
श्री जनार्दन सिंह सीग्रीवाल : महोदय, तब तो कोई बात ही नहीं है।...(व्यवधान)
HON. CHAIRPERSON: The House agrees to extend the time by one hour. Shri Adhir Ranjan Chowdhury, please continue.
श्री अधीर रंजन चौधरी : महोदय,मैं अभी यह बात रख रहा था कि लोगों को हमें यह समझाना पड़ता है कि हिंदुस्तान में एक सेंट्रल इलेक्शन कमीशन है, जिसके पास ताकत है, जिसके पास रिसोर्सेज हैं, आप डरो मत और चुनाव के समय आपके वोट डालने के मौके को सुरक्षित किया जाएगा। मैं इसलिए यह मुद्दा उठा रहा हूँ कि इससे यह साबित होता है कि आज भी हिन्दुस्तान में डैमोक्रेसी रहते हुए भी आम लोग चुनावों में भाग नहीं ले पाते हैं और इसीलिए चुनाव आयोग को करोड़ों रुपये खर्च कर फौज तैनात करनी पड़ती है। यह फौज हमें क्यों तैनात करनी पड़ती है? क्या यह हमारी डैमोक्रेसी की खामी नहीं है? हमारी डैमोक्रेसी की सबसे बड़ी खामी यह है कि - to ensure the electorates of casting their votes, we have to deploy our security forces and contingents while defraying the huge expenditure. I think, this is a glaring example of democratic deficit, rather I say, in our country. It is a deficit of democracy; it is a deficiency of democracy that we are witnessing in our country. My esteemed colleague, Shri Janardan Singh Sigriwal, with a lot of confidence, he has a clear vision and intention to bring this legislation, he intends to strengthen our democracy so that we may be recognised on par with other matured democracies in the world. But again I will say that only punitive measures cannot yield the desired results as has been sought after by bringing this legislation. I would like to quote Joseph A. Schumpeter – “Democracy is a political method or an institutional arrangement for arriving at political - legislative and administrative - decisions by vesting in certain individual power to decide on all matters as a consequence of their successful pursuit of peoples’ vote.” India is a democratic republic and we have attained our Independence by the sacrifice of the people of our country and by taking the conscience and consent of the common people into confidence, we have established the democratic republic. Democracy is not new in the world. Even in India also, democracy was nourished by our ancient civilization. However, modern democracy can be traced to the Athenian leader, Pericles who defined it as a government in which people are powerful. According to Abraham Lincoln, it is the government of the people, by the people and for the people. Since the times of Herodotus, the word `democracy’ has been used to denote that form of government in which the ruling power of a State is largely vested not in any particular class or classes but in the members of community as a whole.
Sir, in a democracy, electorates play the central part of this institution. Election is the central and core activity in a democratic concept. Since elections are the life blood of democratic procedure, it is via the act of voting that democratic principles are protected. Electoral systems are the main tools in which the notions of participation and representation are transformed into reality. The main purpose of the electoral system is to exchange votes cast by electors, into seats in the Parliament. So, election and democracy could play a symbiotic role in strengthening of our country. That is why, more and more voters should participate in the electoral process so that our democratic institutions could be strengthened further. To achieve this result, we should think about the measures needed.
Here we are deliberating on compulsory voting. Compulsory voting has been experienced in many countries of the world. My esteemed colleague Shri Nishikant Dubey also had referred to many examples regarding compulsory voting and its outcomes. Compulsory voting was first advocated by Alfred Deaking at the turn of the 20th Century. Voting was voluntary at the first federal elections. Compulsory enrolment for federal elections was introduced in 1911. In 1915, consideration was given to introduce compulsory voting for a proposed referendum. As the referendum was never held, the idea was not pursued. Here, compulsory voting was first considered by our Parliament in 1950 and the chief architect of our Constitution Dr. B.R. Ambedkar had rejected the idea as it was not suited for a country like India.
Sir, in the world, 28 countries indicate the trend towards which countries are moving globally. Here I would like to quote some references for your convenience. Compulsory voting was first introduced in Belgium in the year 1892.
In Argentina it was introduced in 1914 and in Australia in 1924. What does it mean by compulsory voting? We are discussing about compulsory voting.
Compulsory voting is a system in which electors are obliged to vote in elections or attend a polling place on voting day. Here, the report of Dinesh Goswami Committee has also been cited which I do not want to repeat. Here, Tarkunde Committee Report is also relevant which I would like to mention; I quote:
“We have seriously considered the desirability of making it compulsory for voters to cast their votes in these elections. It appears to us that compulsory voting may be resented by the voters and may on balance prove counter-productive. It is desirable that compliance with the duty to cast one’s vote should be brought about by persuasion and political education, rather than compulsion. Moreover, the implementation of a law of compulsory voting is likely to be very difficult and may lead to abuse.” The compulsory voting was first introduced as per the report in 28 countries. But most of the countries are gradually rejecting the idea of compulsory voting. Even in Gujarat – it has been referred to Nishikant Dubey ji – where compulsory voting was introduced as a progressive measure, it has also been negated by the High Court verdict. Naturally, the success of compulsory voting has not been very encouraging, that I can say.
Any compulsion affects the freedom of an individual. There is no dispute about it. A democratic type of Government means that it was built on the basis of respecting basic human freedoms and rights, particularly free choice. However, it can be violated if voting is made mandatory because people would not have the freedom to not express their opinion. As we enjoy the freedom to vote, the right to vote, in the same way, we also enjoy the right not to vote. … (Interruptions) It could push individuals who have no interest in taking part of building a Government for the people to vote. Although it could compel the citizens to educate themselves, there is also the possibility that those who are honestly not interested will be forced to vote. This could push people to choose candidates randomly, forfeiting the purpose of an election, which is to place deserving people in key positions. In other words, votes and consequently the budget spent for the polls will go to waste. It is not my personal opinion; it is the opinion of the experts also.
It could minimize right to express religion. It could take away people’s rights to express their religion. There are religious sectors that discourage their members from participating in political events. Therefore, forcing them to vote explicitly violates their right to practise there religion.
Again, it would be unacceptable and unlawful to punish those who would choose not to vote. It would be a violation of the Fundamental Rights to punish people who refuse to practice their right to suffrage. Again, voting is a right – it is not a duty – which means that people should have the freedom to choose whether to vote or not.
Besides that imposing penalties and punishment to citizens, who have no interest in politics, would be unlawful because they did not harm anybody; they did not violate anyone’s right; and they did not break any law. But in spite of all they would be punished for committing no fault. That is, I think, contrary to any democratic concept.
Sir, compulsory vote means ballot papers with no appropriate marking, encourages informal votes. Informal vote means that ballot papers with no appropriate markings of voting rules could be used to cater for the large number of voters every election. We have already introduced NOTA in our electoral process.
Now, I would like to tell our hon. Law Minister that it will require a considerable amount of money to enforce such law. How will you mobilise the resources? If voting becomes compulsory, the Government will be compelled to punish those who violate it? It will require a large sum for law to be enforced. It would also involve finding out who may or may not have broken the mandate although there would be fines as a result of the violation of law. But this could not be enough to compensate what the Government has to spend to impose the law.
If the punishment is imposed, I think, only the poor and the marginal people would have been severely affected because the rich can afford to pay the fine. In the long run the poor and the marginal people will be hit hard if we try to quash themselves into casting their votes. It is all about making it fear for all parties involved. If enforcing mandatory voting would violate people’s basic right to not vote then, it would not be a practical law.
Therefore, I would suggest that more and more awareness campaign should be conducted so that our common people, who are the electors of our country, may be aware that it is their fundamental right that needs to be exercised as a citizen of our country. So more and more persuasive measures, more and more educational measures and awareness measures should be resorted if we want more participation of electorates into our voting mechanism.
I would be thankful to my esteemed colleague Sigriwal ji because he has brought this legislation with an honest intention. But the fact is that in a country like India, where still we are languishing with illiteracy, people still believe in superstition and still where the witch hunt has been continuing unabated, I think, it will not be the proper democratic diet for this country. Therefore, I would suggest that more and more persuasive measures need to be adopted before making any kind of compulsory voting mechanism.
श्री महेश गिरी (पूर्वी दिल्ली) :महोदय, आपने मुझे अवसर दिया, इसके लिए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं। मैं सबसे पहले अभिनन्दन देना चाहूँगा सीग्रीवाल जी को, जो यह कंपल्सरी वोटिंग का बिल इस सदन में लेकर आए हैं।
महोदय, इस पूरी सृष्टि को यदि हम देखते हैं तो मुझे तीन बातें ध्यान में आती हैं। यह कहा जाता है कि एक विधि का विधान होता है, दूसरा देश का जो हम संविधान बनाते हैं, वह संविधान होता है और तीसरा मतदान होता है। विधि का विधान, यह कहा जाता है कि परमात्मा या प्रारब्ध से जो हमें मिलता है, उसे विधि का विधान हम कहते हैं, जो हमे प्रारब्ध में मिल जाता है। हम संविधान के तहत यह तय करते हैं कि हमारा भविष्य कैसा हो सकता है, हम संविधान बनाते हैं, एक विधि का विधान जहां भविष्य तय हो जाता है, एक संविधान जहां पर हम इस भविष्य को तय करते हैं कि यह कैसे होगा और एक मतदान है, जहां पर हम यह तय करते हैं कि भविष्य देने वाला कौन हो सकता है? यह हम उस मतदान के माध्यम से तय करते हैं।
इस भारत देश के अंदर जहां सुशिक्षित समाज बसता है, वहीं पर अशिक्षित समाज भी बसता है। यहां गरीबी-अमीरी है। भारत कई सारी भाषाओं और विविधताओं के साथ चलता है और अनेकता में एकता के सूत्र को लेकर जब भारत चलता है, वहां कई सारे असामंजस्य भी फैले हुए हैं। अगड़ा-पिछड़ा और मेजॉरिटी-माइनॉरिटी, ऐसी कई बातों की वजह से देश कई बार संघर्ष भी करता है। जब मतदान की बात आती है तो इस देश के अंदर लगभग 70-80 करोड़ जो मतदाता हैं, ये मतदाता जिनको मतदान का अधिकार है, सबसे पहले तो यह तय होना जरूरी है कि मतदान हमारा अधिकार है, या यह जिम्मेदारी है। जब इस मतदान के लिए वोटर कार्ड्स बनते हैं तो मैं बड़े दुःख के साथ यह कहना चाहूंगा कि वोटर कार्ड्स मतदान से ज्यादा, कौन-सी सुविधायें ज्यादा से ज्यादा उस मतदान पत्र या उस वोटिंग कार्ड के साथ मिल सकती हैं, उस पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है, न कि मतदान के ऊपर ध्यान दिया जाता है। मैं यह मानता हूं कि जो मतदान पत्र या पहचान पत्र मिलते हैं, उस पहचान पत्र के साथ-साथ मतदान का अनिवार्यकरण करने के लिए हम विचार करते हैं तो सुविधाओं का उसमें विचार करना बहुत आवश्यक है।
इस देश के अंदर कई जगहों पर 55 प्रतिशत मतदान होता है और कई जगह पर यह बड़ी मुश्किल से 40-45 प्रतिशत मतदान होता है। यदि यह माना कि 55 प्रतिशत मतदान हुआ और 55 प्रतिशत मतदान होने पर लगभग 10 पार्टियां वहां से चुनाव लड़ती हैं तो वह मतदान 10 पार्टियों में विभाजित हो जाता है और 45 प्रतिशत लोगों ने वहां मतदान ही नहीं किया है, उनमें ज्यादातर वे लोग होते हैं जो डिसिजन मेकर्स भी कहे जाते हैं। जो ज्यादा से ज्यादा यह प्रचार भी करते हैं कि सरकार यह काम नहीं करती है, वह काम नहीं करती है, डिसिजन बनाने का काम समाज में करती है, लेकिन जब मतदान का समय आता है तो या तो वे छुट्टी पर चले जाते हैं या उसको हॉलीडे भी माना जाता है, वे मतदान नहीं करते हैं। लेकिन ये 55 प्रतिशत जो मतदान होता है, वह 10 पार्टियों में बंट जाता है और 12 प्रतिशत वोट प्राप्त करने वाली पार्टी चुनाव में जीत जाती है और उनकी सरकार बन जाती है। इस तरह से पारदर्शिता का महत्व भी खो जाता है। उस मतदान की सत्यता के ऊपर भी प्रश्न चिन्ह लग जाता है। यदि इस देश के अंदर हमें विकास लाना है तो मैं यह मानता हूं कि केवल विकास लाने से बात आगे नहीं बढ़ती है, उसकी शिक्षा भी बहुत जरूरी है कि उस विकास को कैसे भोगा जाये। आज भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने इसका बीड़ा उठाया है कि विकास के साथ शिक्षा पर भी उतना ही जोर दिया जा रहा है, जिसके बाद हम इस विकास को भोगते हुए, उस विकास को और तीव्र गति से आगे बढ़ायेंगे। उसी के साथ-साथ यह भी कहना चाहूंगा कि यदि मतदान की अनिवार्यकरण की प्रक्रिया को हम लागू करते हैं तो इसके प्रॉस और कॉन्स को भी ध्यान में रखना होगा। उसे ध्यान में रखते हुए मतदान करने के लिए शिक्षा और संस्कार की भी उतनी ही आवश्यकता है कि उस अधिकार और जिम्मेदारी को कैसे निभाया जा सकता है। कई देशों ने इसे लागू भी किया है।
भारत में हमारे विजनरी प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जी गुजरात में 2009 में इसका प्रस्ताव भी लेकर आए थे। इस प्रस्ताव के साथ विजन और स्वप्न यह था कि एक विकासशील भारत को भी जन्म दिया जाए और गुजरात जो विकास कर रहा है, उसमें तीव्र गति लाई जाए क्योंकि जब मतदान होता है, महोदय, मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि जब मतदान होता है तो क्या होता है। 50 प्रतिशत या 55 प्रतिशत मतदान होता है। एक तबका जो मतदान नहीं करता और दूसरा तबका जो मतदान करता है, उसमें पोलिटिकल पार्टीज का बहुत ज्यादा इनफ्लुएंस भी होना शुरू हो जाता है। उसमें बहुत ज्यादा गरीब तबका होता है जो झुग्गी-बस्तियों में रहता है, पिछड़ी जातियों से आता है, जो अपना विकास नहीं कर पाया हो। बहुत सा तबका अशिक्षित होता है। ऐसे लोगों को जिनको शायद यह अनुभव नहीं हो पाता या वह समझ नहीं हो पाती कि उनके अधिकारों का उपयोग कैसे किया जाए, तो बहुत सारे प्रलोभनों को लाया जाता है। न्यूज में कई बार देखा गया है कि शराब की तस्करी होती है, शराब बांटी जाती है, पैसा बांटा जाता है या कोई प्रलोभन दिए जाते हैं। ऐसी बातें होने की वजह से अधिकार का दुरुपयोग भी होता है। कई ऐसे असामाजिक तत्व भी उसका लाभ उठा लेते हैं। एक गरीब व्यक्ति किसी प्रलोभन में आने के बाद पांच साल की और गरीबी खरीद लेता है। मेरा मानना है कि यदि हम अनिवार्य मतदान कर देते हैं उसके प्रॉज़ एंड कॉन्स देखकर कि कैसे इसका एक अच्छा निर्णय लेकर आया जाए, उसमें सुधार कैसे किया जाए, इफ्रास्ट्रक्चर भी डैवलप किया जाए।
जैसे हमारे भाई निशिकांत दूबे जी ने बहुत विस्तार से बात की कि इसके लिए सुधार लाने भी जरूरी हैं, क्योंकि भारत एक ऐसा संस्कृति प्रधान देश है जिसमें शादी होती है, कई अनिवार्य चीजें आ जाती हैं। अगर अनिवार्य मतदान हुआ और उसमें दंडित करने की प्रणाली हुई तो क्या दूल्हे को घोड़े से उतारकर लेकर आएंगे कि तुझे शादी से पहले वोटिंग करना जरूरी है। ऐसी बहुत सारी दिक्कतें आ सकती हैं। कोई हॉस्पिटलाइज्ड हो, कोई आईसीयू में हो, इन सब बातों को भी ध्यान में रखकर इसके नियम-कानून बनने चाहिए। मैं यह भी मानता हूं कि मतदान अनिवार्य होने से जो दुरुपयोग होता है या प्रलोभन देकर एक निश्चित समाज के अधिकारों का जो दुरुपयोग होता है, कम से कम वह बंद हो जाएगा और पारदर्शिता आएगी। ऐसे प्रलोभन बंद हो जाएंगे और जो गरीब, पिछले लोग हैं जो शिक्षित नहीं हैं, ऐसे लोग हैं जिन्हें समझ नहीं है कि वोट के अधिकार का उपयोग कैसे करना चाहिए, वे उस प्रलोभन में नहीं आएंगे और हम अनिवार्य मतदान की वजह से देश के विकास में एक नया अध्याय भी जोड़ सकते हैं।
मैं एक और बात की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा। मतदान अनिवार्य न होने की वजह से, आपको न्यूज चैनल में सुनने को मिलता है कि बहुत जगह फर्जी वोटिंग होती है। उसमें पारदर्शिता चुनाव प्राधिकरण लेकर आया जिसकी वजह से बहुत ज्यादा बदलाव आ गया। हम इलैक्ट्रॉनिक वोटिंग पर आ गए। उस बदलाव के बाद ये चीजें कम हुई हैं लेकिन रुकी नहीं हैं। जब अनिवार्य मतदान होगा तो इसका फायदा भी मिल सकता है और दुरुपयोग भी बहुत हो सकता है। कहीं कोई व्यक्ति मतदान करने के लिए अनिवार्य है और इसकी वजह से फर्जी वोटिंग बढ़ सकती है। फर्जी वोटिंग को इनफ्लुएंस किया जाता है, इसमें समाज प्रताड़ित होता है। उनके अधिकारों का बहुत हनन होता है। मैं सदन के माध्यम से सरकार का ध्यान दिलाना चाहूंगा कि कई तरह के चुनाव होते हैं। हमारे साथी श्री निशिकान्त दुबे जी ने ध्यान दिलाया था कि वोटिंग के लिए रजिस्ट्रेशन अलग-अलग होते हैं फिर जब वोटिंग के लिए जाते हैं तो उसे पता भी नहीं होता है कि कहां वोट डालना है, पोलिंग बुथ बदल जाता है , उसकी वजह से भी दिक्कतें होती है। हमारे देश के अंदर कई तरह के चुनाव होते हैं इसके समय अल-अलग होते हैं, चाहे ग्राम पंचायत का चुनाव हो, जिला परिषद् का चुनाव हो, या वार्ड का चुनाव हो, स्टेट इलेक्शन का चुनाव या केन्द्र सरकार का चुनाव हो, इनके समय अलग-अलग होने की वजह से आचार संहिता भी अलग-अलग होती है, इससे विकास का काम भी रुक जाता है। पांच साल में चार-पांच चुनाव होने की वजह से हर बार दो-तीन महीने का समय लगता है, सत्ता में जो पार्टियां होती हैं वह भी प्रयास करना शुरू कर देती है, एक सुझाव यह भी रखा जा सकता है कि बार-बार वोटिंग करने की वजह से लोगों में रुचि कम होती है, क्या हम देश में सारे चुनाव एक निश्चित समय में नहीं करा सकते जिससे लोगों की रुचि भी बढ़े और देश के विकास में कोई बाधा न आए। यह बहुत अच्छा प्रस्ताव हो सकता है, यदि इसे सदन के सामने लाया जाता है।
प्रधानमंत्री जी ने बहुत सुंदर बात कही थी कि यह देश बुलेट से नहीं बैलेट से चलता है। आज मतदान का दुरुपयोग होता है, जहां शासन पहुंच नहीं पाता, जो कमजोर होते हैं उनके ऊपर गन रखकर वोटिंग करवाई जाती है ऐसी जगह पर मतदान की ताकत तभी उभरकर सामने आ सकती है जब मतदान अधिकार के साथ साथ जिम्मेदारी तय होगी, हमें अनिवार्य मतदान के लिए उन सुविधाओं को भी लाना पड़ेगा नहीं तो उसका भी दुरुपयोग होगा। पूरे देशवासियों को मतदान की ताकत का पता चलेगा। 25 जनवरी, मतदान दिवस की घोषणा होने के बाद उसे उत्सव के रूप में मनाने की बात आई, इससे थोड़ा-बहुत बदलाव आएगा, इस तरह की जागरूकता भी बढ़नी आवश्यक है। अभी अधीर रंजन भाई और निशिकान्त जी ने बहुत अच्छी बात कही, हमारा जो इलेक्शन कमीशन है उसमें कैडर का भी होना बहुत जरूरी है, इसे कैडर बेस्ड बनाया जाए, मतदान के समय इलेक्शन कमीश्न का कैडर न होने की वजह से कोई व्यक्ति लड़के को लेकर जाता है और खुद ही बटन दबा देता है, जागरूकता न होने की वजह से भी दिक्कतें आती हैं। अनिवार्य मतदान के साथ-साथ बहुत सारे सुधार भी इलेक्शन कमीशन में लाने पड़ेंगे, तभी हम अनिवार्य मतदान के लिए आगे बढ़ पाएंगे। अनिवार्य मतदान के लिए जो अलग-अलग एजेंसियां इलेक्शन कमीशन के साथ काम करती हैं। अभी जो व्यवस्था है उसे ही हम अभी पूरा कर पाने में समक्ष नहीं हो पा रहे हैं। जो एजेंसियां वोटर कार्ड बनाती हैं या वोटिंग के लिए जो मतदान होता है, बहुत जगह ऐसा देखा गया है कि वक्त पर एजेंसियां वोटर कार्ड नहीं दे पातीं। वोटिंग एजेंसियां सही वक्त पर वोटिंग कार्ड पहुंचा नहीं पाती हैं और जब शख्स वोट डालने जाता है, उसके पास वोटिंग कार्ड नहीं होता है, उसे वोट देने का अधिकार है लेकिन वह वोट नहीं कर पाता है। इसकी भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। अनिवार्य मतदान के साथ अभी जो व्यवस्था है, उसके साथ सुधारवादी आयोजनों, प्रयोजनों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। मतदान की व्यवस्था के साथ जागरुकता का प्रोग्राम चलाया जाए तो देश का विकास होगा, हम तीव्र गति से आगे बढ़ सकते हैं।
मैं इन्हीं शब्दों के साथ अपनी बात समाप्त करते हुए इस बिल का समर्थन करता हूं। धन्यवाद।
श्री निनोंग इरिंग (अरुणाचल पूर्व) : माननीय सभापति जी, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। प्रिय मित्र जनार्दन सीग्रीवाल जी ने अनिवार्य मतदान विधेयक, 2014 को सदन में प्रस्तुत किया है। इस बिल को लेकर उनकी मंशा और विचार बहुत अच्छा है। देश में जब चुनाव होता है तो कई जगह पर 50 प्रतिशत तक ही वोटिंग होती है इसलिए शायद उन्होंने सोचा होगा कि मतदान को कम्पलसरी क्यों न बनाया जाए। हमारे छोटे भाई निशिकान्त जी, अधीर रंजन जी और महेश जी ने जो वक्तव्य रखे हैं, उसे सुनकर ऐसा लगा है कि इस पर ज्यादा टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है। इस विधेयक में कुछ प्रस्ताव रखे गए हैं, जैसे जुर्माने की बात कही है, अगर कोई मतदान नहीं करता तो जुर्माना लगेगा, कारावास की सज़ा होगी, राशन कार्ड जब्त होगा। You have kept some sections. इस तरह से लोगों को लगेगा कि जो अधिकार उन्हें संविधान से मिले हैं, उनको छीना जा रहा है और इससे डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट रिपब्लिक में बाधा आ जाएगी।
वैसे तो मैं ज्यादा समय नहीं लूंगा, लेकिन मैं अपने अरुणाचल प्रदेश के बारे में बताना चाहूंगा कि वहां की आबादी सिर्फ 13 लाख है लेकिन उसमें आप देखिए कि वहां जो एरिया है, वह 83000 स्कवेयर कि.मी. है, तो आप सोचिए कि अगर ऐसा कानून लागू कर देंगे क्योंकि वहां एक-दो ऐसी जगह हैं, जैसे अंजाव है, दिवांग वैली है, तमांग जिला है, जहां के लोगों को पहुंच पाना असंभव है। अगर आप वोटिंग उससे जबर्दस्ती कराएंगे तो कई ऐसी जगह हैं जहां लोगों को तीन-चार दिन या एक सप्ताह वोटिंग करने में लग जाएगा। वहां टीम्स जाती हैं। जहां पुलिस स्टेशन होता है, वहां से भी लोगों को दो-तीन दिन का समय लेकर आना पड़ता है। हालांकि यह आवश्यक है कि मतदान जरूर हो। देश को हम किस प्रकार बनाएंगे, सरकार कैसे बनाएंगे, लोगों में विकास के जो कार्यक्रम लेते हैं, चाहे वह संसद में हो या विधान सभा में हो, मतदान के प्रति जो जागरूकता है, उसे तो हम सबको बढ़ाना होगा। जिस प्रकार से आप इस विधेयक को हमारे बीच में लाए हैं, उसकी हम प्रशंसा करते हैं लेकिन अगर कम्पलसरी वोटिंग होगी, उसमें हमारे जैसे इलाके में बहुत सारी कठिनाइयां महसूस करनी पड़ेगी।
इसलिए मैं सोचता हूं कि जो आपका प्रस्ताव है, लोगों को ज्यादा जागरूक कराना अच्छा होगा क्योंकि लोगों को जो वोटिंग का कमपलशन है कि किस पार्टी को वह वोट करना चाहते हैं। जैसे अधीर रंजन जी ने कहा है कि आजकल तो नोटा की भी सुविधा दी गई है कि यानी किसी विधायक या सांसद को या किसी प्रतिनिधि को नहीं चुनना चाहते हैं तो आप नोटा को भी दे सकते हैं। इसलिए मैं बहुत ज्यादा समय नहीं लूंगा क्योंकि इसमें बहुत सारे प्रस्ताव हैं, मैरिट्स और डीमैरिट्स हैं, लेकिन मैं देख रहा हूं कि समय भी हो रहा है।...(व्यवधान)
HON. CHAIRPERSON: Mr. Ering, you may continue your speech next time.
The House stands adjourned to meet again on Monday, i.e., 7th December, 2015 at 11 a.m.
18.00 hours The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Monday, December 7, 2015/ Agrahayana 16, 1937 (Saka).
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