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Lok Sabha Debates

Consideration Of The Essential Commodities (Amendment) Bill, 2003 (Bill As ... on 8 May, 2003

13.01 hrs. Title: Consideration of the Essential Commodities (Amendment) Bill, 2003 (Bill as amended, passed).

MR. SPEAKER: Motion moved:

"That the Bill further to amend the Essential Commodities Act, 1955, as passed by Rajya Sabha, be taken into consideration. "

  … (Interruptions)

MR. SPEAKER: I have already taken the permission of the House to take these two important Bills.

Mr. Minister, you had moved consideration motion for this Bill yesterday. Now you can speak on it.

… (Interruptions)

उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री (श्री शरद यादव) : अध्यक्ष जी, मैंने कल आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, २००३ पेश किया था। इस बिल के बारे में सदन में कई बार चर्चा हो चुकी है और पूरे देश में गन्ना उत्पादक किसानों के सवाल पर इस सदन में सरकार की ओर से कदम उठाये गये हैं…( व्यवधान)

MR. SPEAKER: I think, Mr. Minister, you had already spoken on this Bill when you had introduced it.

… (Interruptions)

श्री शरद यादव : अध्यक्ष जी, मैं कई बार कर चुका हूं।

अध्यक्ष महोदय : फिर बोलने की क्या जरूरत है? I want to finish this business as early as possible.

… (Interruptions)

MR. SPEAKER: You are aware that हमारे पास टाइम कम है आप पाइंट्स पर अपनी बात रखिये। We have got only half-an-hour for the entire Bill.

… (Interruptions)अध्यक्ष महोदय : मैंने सदन के सामने यह बात रखी थी। यदि आप इसका फायदा उपभोक्ताओं को देना चाहते हैं तो भाषण कम करें और किसानों को ज्यादा फायदा लेने दो। आप अपनी भावना व्यक्त करिये और और जल्दी खत्म करिये। This is in the interest of the farmers.

श्री लक्ष्मण सिंह (राजगढ़):अध्यक्ष महोदय, मुझे कितना समय देंगे।

अध्यक्ष महोदय : आपको तीन मिनट मिलेंगे।

श्री लक्ष्मण सिंह : अध्यक्ष जी, तीन मिनट कम हैं, मुझे दस मिनट दीजिये।…( व्यवधान)

श्री शरद यादव : अध्यक्ष जी, इस सदन में कई बार इसमें चिन्ता व्यक्त की गई है। इस बिल को लाने के बाद कई कदम उठाये गये हैं। इनमें एम.एस.पी. ५ रुपये प्रति क्िंवटल बढ़ाया गया, २० लाख टन का बफर स्टॉक क्रिएट किया गया और इंटरनल ट्रांसपोर्ट में सबसिडी दी गई। इसके अलावा ओशन ट्रेड में सबसिडी दी गई। जब इस विधेयक पर चर्चा की गई थी, उस समय प्रधान मंत्री जी ने १९ दिसम्बर को इसी सदन में कहा था। रेगुलेटेड रिलीज मैकेनिज्म आने के पहले बाजार में चीनी का दाम घट गया था, लगातार हमारा स्टाक नीचे नहीं आ रहा है। इसलिये मैं सदन के माननीय सदस्यों से कहूंगा कि इस विषय पर पहले ही बहस हो गई है। इसको जल्दी ही पास कर दें।

अध्यक्ष महोदय : मेरा भी यही सजेशन है कि इसे जल्दी पास कर दिया जाये।

श्री लक्ष्मण सिंह : अध्यक्ष जी, आदरणीय मंत्री जी ने कहा कि रेगुलेटेड रिलीज मैकेनिज्म के माध्यम से चीनी के दामों पर नियंत्रण करेंगे और गन्ना उत्पादकों को उनके उत्पाद की कीमत दिलायेंगे लेकिन मुझे कई शंकायें हैं। सब से पहली बात यह है कि मैं उन गन्ना किसानों को बधाई देता हूं जिन्होंने १८४ लाख टन चीनी का उत्पादन कर विश्व में पहला स्थान प्राप्त किया है। इस मामले में उन्होंने ब्राज़ील को पीछे छोड़ दिया है। मैं मंत्री जी को बताना चाहता हूं कि यह उनके प्रयास का फल नहीं, यह उन मेहनतकश किसानों की वजह से हुआ है। देश के तीन राज्यों - महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और हरियाणा ने क्रमश:६७ लाख टन, ४७ लाख टन और ५.९० लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। इस प्रकार कुल मिलाकर १८४ लाख टन चीनी में से ११० लाख टन चीनी का उत्पादन इन तीन राज्यों ने किया है।

१३.०५ hrs.(MR. DEPUTY SPEAKER IN THE CHAIR) किसानों की मेहनत से इतना गन्ना पैदा किया गया। जब उत्तर प्रदेश में गन्ना किसान अपना दाम मांगने आ रहे थे, उन पर गोलियों की बौछार की गई, इन्हें शर्म आनी चाहिये। आज चीनी मिलों की हालत यह है कि ५५०० करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है।

एक तरफ आप कहते हैं कि अगर रिकवरी अच्छी होगी तो दाम अच्छे मिलेंगे। अगर चीनी की ८.७ प्रतिशत रिकवरी होगी तो उसके दाम आप ५९ रुपये प्रति क्िंवटल देंगे।

उपाध्यक्ष महोदय, महाराष्ट्र की हुतात्मा और मंजरा चीनी मिलें सहकारी क्षेत्र की चीनी मिलें हैं। इन चीनी मिलों ने १३.७ प्रतिशत रिकवरी निकाली है, जब इन्होंने इतनी बड़ी रिकवरी निकाली है तो ९० रुपये प्रति क्िंवटल दाम आप क्यों नहीं देते हैं। सारी लड़ाई यही है, चूंकि आपकी नीति सही नहीं है। इसी वजह से आज चीनी मिल और उनके बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। मंत्री जी, आपने बताया कि निर्यात बढ़ाने के आपने प्रयास किये हैं। आपने क्यू.आर. हटाये हैं, बहुत अच्छी बात है। आपने निर्यातकों को कह दिया कि एपीडा में पंजीयन मत कराइये। लेकिन उसके बाद क्या हुआ। उसके बाद भी हमारा चीनी का निर्यात घटा है। चीनी का निर्यात २००१ में जो ११.५ लाख मीटरिक टन था, वह वर्ष २००२ में घटकर ९.३८ लाख मीटि्रक टन हो गया है और इस वर्ष भी चीनी का निर्यात बढ़ने की संभावना नहीं है। आपने चीनी पर २० प्रतिशत इम्पोर्ट डयूटी कर दी है, लेकिन उसके बाद भी चीनी का आयात हुआ है। इसलिए इम्पोर्ट डयूटी को बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके साथ-साथ जब तक आप एक्सपोर्ट सब्सिडी नहीं बढ़ायेंगे, तब तक चीनी का निर्यात हम लोग नहीं कर पायेंगे।

उपाध्यक्ष महोदय, गन्ना किसानों के सामने आज सबसे बड़ी समस्या उसकी उत्पादन लागत है। हमारे यहां १३७०० रुपये मीटि्रक टन चीनी की लागत बैठती है और दूसरे देशों में ९९७५ रुपये मीटि्रक टन लागत बैठती है। लगभग चार हजार रुपये मीटि्रक टन लागत हमारे यहां ज्यादा है। उसका मुख्य कारण यह है कि हमारे यहां बिजली की दरें और पानी का टैक्स ज्यादा है और जो टैक्नोलोजी हमारे पास होनी चाहिए, वह हमारे पास नहीं है। टैक्नोलोजी के प्रश्न पर नेशनल शुगर इंस्टीटयूट, कानपुर आपका एक संस्थान है। लेकिन मुझे पढ़ते हुए हंसी भी आती है और दुख भी होता है कि उस इंस्टीटयूट में छात्रों की कुल संख्या १५१ है। आपको चाहिए कि उस इंस्टीटयूट को कुछ और राशि दें और उस इंस्टीटयूट को तकनीकी द्ृष्टि से और उपयुक्त बनाया जाए। एसोसिएटशिप ऑफ नेशनल शुगर इंस्टीटयूट, शुगर टैक्नोलोजी, इस कोर्स के लिए ४४ छात्र हैं। एसोसिएटशिप ऑफ नेशनल शुगर इंस्टीटयूट, शुगर इंजीनियरिंग के कोर्स के लिए केवल १२ छात्र हैं और शुगर इंजीनियरिंग सर्टफिकेट कोर्स के लिए केवल चार छात्र हैं। इसलिए मैं समझता हूं कि इस इंस्टीटयूट को मदद देने की आवश्यकता है, ताकि हम तकनीकी द्ृष्टि से मजबूत हो सकें।

उपाध्यक्ष महोदय, आपने कम समय दिया है, इसलिए मैं दो-चार बातें कहकर अपनी बात समाप्त करूंगा। आपके पास शुगर डेवलपमैन्ट फंड में बहुत पैसा पड़ा हुआ है। शुगर डेवलपमैन्ट फंड का आपने ४५८ करोड़ रुपया गन्ने का उत्पादन बढ़ाने के लिए दिया है। गन्ने का उत्पादन बढ़ाने का काम राज्य सरकारों का है, वे इसे करेंगी। इसलिए इस पैसे को कम करके अगर आप एथनॉल का प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए चीनी मिलों को दें तो उनकी वॉयबलिटी बढ़ेगी। ब्राजील में दस प्रतिशत एथनॉल पैट्रोल में मिलाने की अनुमति है। आपने पांच प्रतिशत मिलाने की अनुमति दी है, यह आपने बहुत अच्छा काम किया है। लेकिन यह कम है, इसे कम से कम१५ प्रतिशत किया जाए, तब चीनी मिलों को कुछ लाभ होगा।

एक तरफ आपने फ्यूचर ट्रेडिंग की बात की है। आपने शुगर एक्सचेंज भी खोले हैं, मुम्बई में दो और हैदराबाद में एक खोलने की परमीशन दी है। एक तरफ आप फ्यूचर ट्रेडिंग की बात करते हैं और दूसरी तरफ आप कानून लाते हैं, जिसके अंतर्गत चीनी मिल के मालिक या सहकारी क्षेत्र के कारखानों को बाजार में माल बेचने की अनुमति लेनी पडेगी, तो ट्रेडिंग कैसे होगी।

इसलिए अंत में मेरा कहना है कि जब तक आप चीनी का निर्यात बढ़ाने का प्रयास नहीं करेंगे, तब तक इस समस्या का समाधान होना बहुत मुश्किल है।

इसी तरह बातचीत विफल होती रहेंगी, इसी तरह गन्ना किसान प्रदर्शन करते रहेंगे और इसी तरह चीनी की मिलें बंद होती रहेंगी।

मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से कहना चाहूँगा कि यह बहुत गंभीर विषय है। इसको ज़रा गंभीरता से लें और समस्या का निदान जल्दी करें।

SHRI H.D. DEVE GOWDA (KANAKPURA): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I would like to raise a few points. The hon. Minister has mentioned briefly that the only purpose of this Bill is to regulate the releases of sugar. This is not going to solve the problem. The purpose of this Bill is only to see that the market is not flooded with stocks of sugar as a result of which the prices go down and consequent to which the farmers suffer. This is the object of the Bill. Some people have gone to the courts and have obtained release orders from the courts. In such cases, the Government does not have any control. The Government intends to bring in certain measures to stop such type of release orders through the courts.

Sir, I am not going to quote the figures about the old stocks and the production of this year. The basic issue today is as to how to save the sugar industry and the sugarcane growers. The Government has not applied its mind to this aspect. I am not going to blame the Minister. This is an issue where the Government has to apply its mind in order to bring a comprehensive policy in this matter. Even the issue of fixing the Minimum Support Price is pending before a five-member Constitution Bench of the Supreme Court. If this is the situation that is prevailing in the country today, then who is going to decide about the Minimum Support Price to be given to the farmers? Is it the State Governments? Is it the Union Government? Or, is it the courts?

Sir, I do not want to criticise the Judiciary but the way things are moving in this country, I do not know whether the Government has applied its mind to it, or the Law Ministry has applied its mind to it or the Attorney-General has applied his mind to it. What would be the fate of the farmers? This matter has been dragging on from one court to another for the last four to five years. Now, this matter is pending before a Constitution Bench of the Supreme Court.

Sir, the other thing is that the Government is trying to regulate the releases of sugar, but what about the old stocks of sugar? They have been lying in the godowns for the last two to three years. They cannot be used for human consumption now. What does the Government propose to do with those old stocks? On the one hand there is a question of price. The State of Maharashtra says that they are going to give Rs. 1000/- per tonne. The State of Haryana is giving around Rs. 950/- or Rs. 960/- per tonne. But some States are not in a position to even pay Rs. 450/- per tonne. Sugarcane has not been crushed in several States even after four to five months have elapsed. Nobody is bothered about it. Today, the Government only propose to regulate the release of sugar. In what way does the Government proposes to help the farmers? You are trying to help the farmers in this way. But it would not help their cause.

Sir, I would like to make a point here. More than Rs. 2500 crore is lying with the Government of India under the Sugarcane Cess Fund. I do not know whether it has come under the General Budget for dealing with the fiscal deficit position of the Government or not. I do not want to argue on that point.

More than Rs.2500 crore is the Sugar Cess Fund that has been collected. For what purpose is that being used? Are you going to give any support to the farmers in the form of transport subsidy or export subsidy or to reduce the purchase tax? There are so many things.

Our friend is telling about ethanol. It is not going to solve the problem. We are talking very loudly on the ethanol business. I do not think there is going to be a solution to this. You are going to take 100 per cent of even the molasses. If you leave 25 or 30 per cent molasses to the farmers, even they can manufacture the spirit. This is not a big issue. There are so many ways to save the sugar industry.

For the pledge loan, our Finance Minister announced something. I do not want to interfere in these matters again by taking the time of the House because I know there is the constraint of time as various Parties are going to share the available time and I do not want to blame the Chair also. Shri Yerrannaidu was so jubilant when he said that the Reserve Bank was going to give guidelines to waive the interest component. Where is the Reserve Bank guideline? I do not want to criticise the Reserve Bank. Have you gone through the Reserve Bank direction? Have you gone through the NABARD direction? You want to say that the Government has accepted that one year interest is going to be waived. Where is it? Did you check up with your Finance Minister? Even if there is an iota of truth in it, I will apologise. Why do you unnecessarily mislead the people? Even on pledge loan, the sugarcane stockists are going to pay 17 per cent interest. Whereas for purchase of cars, loans are available at 8 to 9 per cent interest! Is this the way you save the sugar industry and the farmers?

Do not be under the impression that you will all continue for ever in the Government at the cost of the farmers. I can debate on this issue for hours together. I am sorry to say I do not know how many farmers, particularly the sugarcane growers, have committed suicide. They are playing with the lives of the farmers. In Uttar Pradesh, since 1998 the matter regarding fixation of the MSP has been in the court; first it had gone to the High Court and then to the Supreme Court. What is the Government of India doing? What is the Law Ministry doing? What is your Attorney-General doing? Can you not find a solution to this problem? You want to regulate only by bringing this piece of legislation. I am sorry to say that if at all there is a Government in the last 53 years which has been so callous towards the farming community, it is the Vajpayee Government. I am badly hurt at the fate of the farming community in this country.

Dr. M.V.V.S. MURTHI (VISAKHAPATNAM): Mr. Deputy-Speaker Sir, I will only confine to the main points of the Essential Commodities (Amendment) Bill, 2003. This Amending Bill has been brought to regulate the release of free-sale sugar because some vested interests are going to the court. Actually they are not vested interests; they are the real sufferers. Mills are going to the court for getting the extra releases. The Government want to regulate this because they do not want to release the stock.

SHRI H.D. DEVE GOWDA : Kindly yield for a minute. Even some of those people who got the releases through the court and have sold the sugarcane, have not paid the dues to the farmers. I welcome this measure insofar as regulating the releases is concerned. I just want to tell you that even those who got the release and sold their stocks have not paid the farmers.

Dr. M.V.V.S. MURTHI : As it has been rightly pointed out, it is my apprehension also that perhaps this amendment may create more problems for the farmers and also to the mills because you do not want to approach the court and at the same time you do not want to sell them the stocks. Ultimately, you will not be able to pay to the farmers.

So, this is a vicious circle. How will the Government come out of this vicious circle? I would like to know on this point. Instead of curbing sale, we should think of other means of making the mills healthy. There are 520 sugar mills out of which only 55 mills are Government mills. All other mills are in the co-operative sector and private sector. The mills under the co-operative sector as well as the public sector are already not able to pay anything to the farmers. Only the private mills are paying them. For the past one year, even they are also in heavy debt and not able to pay them. What are the measures taken by the Government to make the factories comfortable?

As it has been pointed by Shri Deve Gowda, the interest rates are very high. A year back, the interest rate was 17 per cent. Now, they are offering about 12 per cent to 13 per cent because of lower rates. It should be brought down to six per cent. Why are you asking them to pay interest on the stocks which they are already holding? Government can give subsidy in interest at least so that the burden will not be there on the mills. You are not allowing them to sell. At the same time, they are being charged extra interest. This is the problem.

For example, the excise duty on molasses has been increased year after year. Now, why do not you think of removing the excise on molasses at least so that the mills will get a higher rate? The mills are not being allowed to get a higher rate. The rate is very high now. Sugar production is declining already. At the end of 2002 season, it was 183 lakh tonnes. In 2003, it is estimated at 175 lakh tonnes. So, it is already coming down. Export is negligible except last year, 2001-02, which was 14.6 lakh metric tonnes. Why are we not exporting large quantity of sugar? Our internal consumption is also not increasing. Poor people are not using sugar. The internal consumption is 173 lakh metric tonnes. That means, with our production being 175 lakh tonnes, our internal consumption and production are equalised.

SHRI H.D. DEVE GOWDA : Our internal consumption is not more than 130 lakh tonnes.

Dr. M.V.V.S. MURTHI : They are showing our internal consumption as 173 lakh tonnes. This is the figure shown. That means, if the tendency continues, over the next two or three years, you have to import sugar. How to dispose of the present stock is the criteria. So, we have to make effort to export more sugar. Give them incentives. Why can you not give them Rs. 1000 as incentive, offer packing material, presentation and sell it so that this could be exported? If they could export, all the mills will be able to pay to the farmers.

We support the Bill for the time being. But this is not a long-term solution. You must think of a long-term solution keeping in view the difficulties of the farmers and see how to improve the efficiency of the sugar mills, their cash flows and productivity. I would request the hon. Minister to take all these suggestions into consideration.

I thank you, Sir, for giving me an opportunity to speak.

उपाध्यक्ष महोदय : अखिलेश जी, आप संक्षिप्त में बोलिए।

…( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह (महाराजगंज, उ.प्र.) : अगर समय नहीं देंगे तो हम ठीक से अपनी बात नहीं कह सकेंगे।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय, यह बहुत महत्वपूर्ण विधेयक है और इस विधेयक से किसानों का गला घुट रहा है, इसलिए मैं आपके संज्ञान में पूरे तथ्य लाना चाहता हूं।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आपको अध्यक्ष जी ने अपील की थी कि यह बिल और दूसरे भी दो-तीन बिल हैं, इसलिए इस बिल को जल्दी से खत्म करना है।

…( व्यवधान)कुंवर अखिलेश सिंह:उपाध्यक्ष महोदय, गन्ना किसान मर रहा है, यह बहुत महत्वपूर्ण विषय है।…( व्यवधान)इस विधेयक से चीनी मिल मालिकों को लाभ मिलेगा, किसानों को कोई लाभ नहीं मिलेगा ।

उपाध्यक्ष महोदय : अखिलेश जी, आप हर विषय पर इसी तरह करते हैं। आप बहस मत कीजिए और जितनी जल्दी हो सके, अपनी बात पूरी कीजिए।

…( व्यवधान)कुंवर अखिलेश सिंह:माननीय उपाध्यक्ष महोदय, मैं मंत्री जी के संज्ञान में यह बात लाना चाहता हूं कि आज देश का गन्ना किसान सबसे भीषण त्रासदी का सामना कर रहे है और आज देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के किसानों की दशा बहुत खऱाब है।

उसका आलम यह है कि मुंडेरवा में पुलिस की गोली से तीन किसान मारे गये, पडरौना में दो किसान पुलिस की गोली से मारे गये और रामकोला में तीन किसान पुलिस की गोली से मारे गये। आन्ध्रा प्रदेश की भी यही स्थिति है, यह बात अभी हमारे सदस्य साथी ने कही। किसान आज आत्महत्या करने के लिए मजबूर है। उत्तर प्रदेश में आज स्थिति इतनी दयनीय है कि गत वर्ष उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों को गन्ने का मूल्य ९५ और १०० रुपये प्रति क्िंवटल मिला था। इस साल उत्तर प्रदेश सरकार की साजिश से और चीनी मिल मालिकों की साजिश से उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों को प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद पांच रुपये एस.एम.पी. मूल्य बढ़ाने के बाद उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों को गन्ने का मूल्य ८२.५ रुपये और ८५ रुपये निर्धारित किया है। वह मूल्य भी किसानों के गन्ने का अभी नहीं दिया जा रहा है। आपने इस विधेयक के अन्दर तर्क दिया है कि न्यायालय के आदेश से जो चीनी मिल मालिक चीनी रिलीज आर्डर लेकर आ रहे हैं, हम ऐसा कानून लाएंगे कि वे न्यायालय के आदेश से रिलीज आर्डर नहीं ला पाएंगे और इससे चीनी के भाव बढ़ेंगे। हम आपके संज्ञान में यह बात लाना चाहते हैं कि अगर किसान सबसे बड़ा उत्पादक है तो किसान सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है। चीनी के बढ़े हुए मूल्य का कोई लाभ ये चीनी मिल मालिक किसानों को देने वाले नहीं हैं।

खाद्य मंत्री जी, आप तो किसानों की बात करते रहे हैं, आपको इन पूंजीपतियों के विषय में बड़ा कड़वा अनुभव है, इसलिए मुगालते में मत रहिये कि अगर चीनी के भाव बढ़ेंगे तो उसका लाभ किसानों को मिलने वाला है।…( व्यवधान)यह किसानों का उपभोक्ताओं के रूप में शोषण करेंगें।

श्री शिवाजी माने (हिंगोली): महाराष्ट्र में तो चीनी मिल के मालिक किसान ही हैं।

MR. DEPUTY-SPEAKER: I will call you. How can I call all of you together? Please sit down.

कुंवर अखिलेश सिंह:मैं आपके सामने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देना चाहता हूं। उत्तर प्रदेश में आपने ४०० करोड़ रुपये की सब्सिडी शुगर मिलों को दी है। परचेज टैक्स में एग्जम्शन दिया है, एंट्री टैक्स में छूट दिया है, इस तरह से लगभग ६०० करोड़ रुपये का लाभ चीनी मिल मालिकों को मिला है। यह सरकार के द्वारा जो चीनी मिल मालिकों को रियायत दी गई है, उसमें ६०० करोड़ रुपये का लाभ मिला है। पिछले साल गन्ने का मूल्य ९५ और १०० रुपये दिया गया और इस साल वे गन्ने का मूल्य ८२.५ और ८५ रुपये प्रति क्िंवटल दे रहे हैं। २४ मार्च तक जितने गन्ने की पिराई हुई है, वह पिछले साल की तुलना में इस साल… 600 करोड का अतरिक्त लाभ कमा चुके हैं। ( व्यवधान) मेरी बात खत्म नहीं हो पायेगी।

इस साल जो गन्ने का मूल्य दिया, उसमें अब तक ६०० करोड़ रुपये से ज्यादा का मुनाफा केवल दाम के अन्तर के आधार पर हो सका और आज चीनी मिलों पर बकाया कितना है, इसे देख लीजिए। अभी मेरे पास २२.४.२००३ की उत्तर प्रदेश की रिपोर्ट है, उसमें ७८१ करोड़ रुपया बकाया है। पिछले साल भी चीनी ११ रुपये किलो बिकी थी। खाद्य मंत्री जी सुनिये, पिछले साल चीनी मिल मालिकों का चीनी का थोक भाव ११ रुपये किलो था और इस साल भी उनकी चीनी ११ रुपये किलो बिकी है। उनको राज्य व केन्द्र सरकार की छूट व गन्ने का मूल्य कम देने से उत्तर प्रदेश में अतरिक्त मुनाफा १२०० करोड़ रुपये का हुआ। तब भी चीनी मिल मालिकों ने किसानों को गन्ने का गत वर्ष का मूल्य नहीं दिया। इसलिए मैं आपसे कहना चाहता हूं कि आप इसे देख लीजिए।

   

भारत सरकार ने जो एस.एम.पी. मूल्य तय किया है, उस एस.एम.पी. का भुगतान भी चीनी मिल मालिकों के द्वारा नहीं दिया जा रहा है, जबकि नियम यह है कि अगर १५ दिन के अन्दर गन्ना किसानों के मूल्य का भुगतान नहीं होगा तो उन्हें ब्याज देना पड़ेगा और ३० दिन के अन्दर अगर भुगतान नहीं होगा तो उनके खिलाफ रिकवरी सर्टफिकेट जारी होगा। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री को जब प्रधानमंत्री ने तलब किया तो उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री की बात नहीं सुनी। सुप्रीम कोर्ट का ३१.०१.२००१ का आदेश है, उसके मुताबिक जो समझौता मूल्य होगा, वह समझौता मूल्य ही लागू किया जायेगा। न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू नहीं किया जायेगा। उत्तर प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट को गलत तथ्य प्रस्तुत किये थे, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने चीनी मिल मालिकों के खिलाफ और उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ अवमानना का नोटिस दिया है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के मुताबिक उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों को ९५ और १०० रुपये प्रति क्विटल मिलना चाहिए। मंत्री जी, यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि जब सर्वोच्च न्यायालयके आदेश की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, प्रधानमंत्री की भी बात नहीं सुनी गई, तो इस बढ़े हुए चीनी मूल्य का लाभ किसानों को नहीं मिलेगा। इसलिए मैं आपसे कहना चाहता हूं कि यह विघेयक आप वापस लीजिए और संसदीय समति को सौंपने का काम करिये, वरना यदि चीनी का दाम बढ़ता है तो इसका लाभ किसानों को मिलना चाहिए, लेकिन किसानों को इसका कोई फायदा होने वाला नहीं है।

इसका उपभोक्ताओं पर जरूर असर पड़ेगा। मैं आपसे विनम्रतापूर्वक आग्रह करना चाहता हूं कि इसे प्रवर समति को सौंपा जाये और इस विधेयक को मंत्री जी अभी वापिस लें।

डॉ. मदन प्रसाद जायसवाल (बेतिया): उपाध्यक्ष महोदय, मेरा भी नाम है।

उपाध्यक्ष महोदय : आप निश्िंचत रहिये, मैं आपको बुलाऊंगा।

SHRI BAJU BAN RIYAN (TRIPURA EAST): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I thank you very much for giving me this opportunity to speak on this Bill. This Bill has been brought to plug the loopholes by which the mill owners are indulging in malpractices. The Minister is proposing to add two sub-clauses to Section 3 of the Essential Commodities Act and I welcome this piece of legislation.

The mill owners, by taking advantage of articles 14 and 19 of the Constitution, went to the court and got a decree in their favour to release more sugar which the Government has been controlling from time to time. But now, the Government has decided to decontrol the sugar industry in a phased manner. If the sugar industry is decontrolled, the worst sufferers will be the sugarcane growers. As on 15.11.2002, the arrears due to the sugarcane growers from the mill owners was Rs. 556.37 crore. I do not know when they will get their arrears. If the sugarcane growers fail to grow sugarcane in the country, then the whole sugar industry is bound to collapse. So, I would request the Government to review its decision to decontrol the sugar industry and try to protect the interests of sugarcane growers in the country.

Sir, we have the Sugar Control Order, 1966. But this also could not plug the loopholes which were taken advantage of by the mill owners to indulge in malpractices. Now the Government has tried to minimise the levy sugar quota and they are trying to withdraw the levy sugar in a phased manner. If the sugar industry is to be decontrolled and if the sugar mill owners are allowed to do their business as they like, then what is the necessity for this piece of legislation? To implement this legislation, I think, the Government should revive the 40 per cent production of mills to be made compulsory again. Otherwise, this legislation will become inoperative.

Sir, I would also request the Government to revive all the ration shops in the country. The running of ration shops fall under the jurisdiction of State Governments and it is not the responsibility of the Central Government. But suddenly, the price of sugar for APL consumers increased abruptly throughout the country. So, all the ration shops are running at a loss and the ration shop dealers have abandoned their business.

This way even we, the MPs, are not getting ration, though we have ration cards. So, I would request the hon. Minister that this should be revived. For the poor people the ration shop is the main shop for getting the essential commodities.

With these words I conclude.

   

MR. DEPUTY-SPEAKER: Any Member, who wants to lay his speech can do so. Shri Adhi Shankar can lay his speech.

श्री शिवाजी माने (हिंगोली):उपाध्यक्ष जी, आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अगर आप अपनी स्पीच ले करना चाहते हैं तो कर सकते हैं। वह ज्यादा अच्छा होगा।

…( व्यवधान)श्री शिवाजी माने : उपाध्यक्ष महोदय, मैं बोलूंगा।

उपाध्यक्ष महोदय : ठीक है, एक मिनट में अपनी बात कहिए।

…( व्यवधान)श्री शिवाजी माने : मैं अपनी स्पीच ले कर रहा हूं।

MR. DEPUTY-SPEAKER: You are allowed.

Rest of the Members can lay their speeches. Now, the hon. Minister.

…( व्यवधान)डॉ. मदन प्रसाद जायसवाल:उपाध्यक्ष महोदय, मुझे बोलने की अनुमति दीजिए। मैं किसानों के पक्ष में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। …( व्यवधान)भारतीय जनता पार्टीसे तीन नाम दिए गए हैं और अभी तक भारतीय जनता पार्टी से कोई भी सदस्य नहीं बोला है।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : सब कोआर्डीनेट करके, हम यहां कंडक्ट करते हैं। आप यह सब मुझे मत बताइए। आपकी पार्टी ने क्या कहा, वह मैं आपको नहीं बता सकता।

श्री चन्द्रनाथ सिंह (मछलीशहर): उपाध्यक्ष महोदय, हमें भी बोलने का समय दीजिए।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप अपनी स्पीच ले कर दीजिए।

*SHRI ADHI SANKAR (CUDDALORE) Mr. Deputy Speaker Sir, this Bill is brought with an intention to prevent the mill-owners from selling the sugar with the aid of the court order. But this Bill should have come with more amendments. I mean to say that this Bill is only intented to strengthen the hands of the Government.

There should have been a clause for strengthening the hands of the sugarcane growers also. The interests of the sugarcane growers have been totally neglected in this Bill. In our country, no consumer is saying that he is not getting sugar at a resonable price. There is no dearth of sugar in this country. It is not a case of the consumers saying that they are not getting sugar at a reasonable price in the shops or through the PDS. The Sugarcane growers, all over the country, have not been paid. The sugar mill owners are enjoying the fruits. The sugarcane growers have not been paid for the past three years. The sugarcane growers are getting on fire the sugarcane crops. They have no money to repay the loan that was taken to raise the crop. This is the important issue. This amendment, as I have said earlier, seeks to enable the mill-owners and exporters to sell the sugar which they have stocked in their godowns or warehouses. That is the motive. The Government has not considered the repeated requests and demands of the farmers. That is why I am asking the Minister: What are the steps that he is proposing to take to protect the interests of the sugarcane growers? What provisions have you provided in this Bill? The cooperative sugar mills have borrowed money after pledging their sugar to the banks. They are charging 14-16% interest. They are not getting the release orders from the Government.

   

I would like to know from the hon. Minister how he is going to save the sugarcane growers in this country. What provisions have you provided in this Bill? The Government has totally neglected the sugarcane growers. It is not caring for the sugarcane growers. Therefore, I humbly submit to you, please look into the problems of the sugarcane growers.

The interests of the consumers and the sugarcane growers have to be protected. I would like to know whether this Bill will serve this twin-purpose, When prices have come down, you are intervening. What about the sugarcane growers? How are you going to solve the problem? Will you kindly let me know how much amount the mill-owners have to pay to the sugarcane growers? For how long, they did not pay to them? What is the reason behind that? I would like to know whether the Government of India has taken any concrete steps in this regard, except giving that Rs. 800 crores. It is not a party issue. It is an issue concerning the people from Kashmir to Kanyakumari. The sugarcane growers are affected throughout India. I feel that the intention of this Bill is good.

   

*Speech was laid on the Table.

   

*श्री मानसिंह पटेल ( मांडवी):माननीय महोदय जी, माननीय मंत्री श्री शरद यादव जी आवश्यक वस्तु अधनियम १९५५ के सुधार हेतु आवश्यक वस्तु अधनियम २००३ लेकर आये हैं। मैं उसका स्वागत करता हूं और माननीय मंत्री जी और माननयी प्रधान मंत्री श्री अटल विहारी वाजपेयी का अभिनंदन करता हूं एवं आभार व्यक्त करता हूं और माननीय अध्यक्ष जी आपने मुझे इस चर्चा में भाग लेने का मौका दिया, मैं आपका भी आभारी हूं।

महोदय , हमारा देश कृषि प्रधान देश है। देश के करीब ७० प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं। कृषि में गन्ना उत्पादक और चीनी उद्योग देश का सबसे बड़ा कृषि उद्योग है। पिछले तीन चार साल से गन्ने का एवं चीनी का उत्पादन देश में लगातार बढ़ रहा है। देश की ऑनरोल खपत के अलावा बहुत भारी स्टोक चीनी मिलों के गोदामों में भरा पड़ा है। अतरिक्त गोदामों की कमी महसूस हो रही है और चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति भी लड़खड़ा रही है। चीनी मिलें गन्ना किसानों का पूरा भुगतान दे नहीं पाते हैं। परिणाम स्वरूप गन्ना किसान भूखे मर रहा है और बरबादी के कगार पर खड़ा हुआ है।

महोदय, गन्ना किसानों और चीनी मिलों को बचाने के लिये केन्द्र सरकार ने कई कदम उठाये हैं। आज भी चीनी मिलें गन्ना किसानों को न्यूनतम मूल्य भी नहीं दे पाती है, इससे कई कानूनी मुद्दे उपस्थित हो रहे है, जिससे चीनी मिले कानूनी मुश्किलों में फंस जायेंगी, इसके लिए माननीय मंत्री जी को कुछ रास्ता निकालना होगा।

महोदय, गन्ना उत्पादकों एवं चीनी मिलों को मदद करने हेतु हमारी सरकार ने कई कल्याणकारी कदम उठाये हैं। पिछली सरकारों की असमान आयात नीती को बदल कर देश में चीनी आयात पर रोक लगाने के लिये ६० प्रतिशत डयूटी लगा दी है ताकि देश में चीनी आयात पर रोक लगायी जा सके। सालों से अनिर्णित प्रश्न इथोनोल का था। चीनी मिलों की साइड प्रोडक्ट, शीरे से इथोनोल बना कर पांच प्रतिशत पेट्रोल में मिलाने की परमिशन दे दी गयी, जिससे ईंधन के आयात पर रोक लगेगी और बचत होगी और गन्ना किसानों को बराबर कीमत दे पायेंगे। ईंधन में इथोनोल की मिलावट ५ प्रतिशत से १५ प्रतिशत की जाये ताकि गन्ना किसान और भी फायदा उठा सकें।

अभी निर्यात को बढ़ावा देने हेतु सब्सिडी आनरोल ढुलाई और औसत सब्सिडी देने का निर्णय आवश्यक है, जिससे चीनी के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा। चीनी का बफर स्टोक करनो का केन्द्र सरकार के निर्णय से थोड़ा बहुत राहत चीनी मिलों को रही है और बफर स्टोक करने की आवश्यकता है।

माननीय महोदय, केन्द्र सरकार के पास चीनी विकास फंड के रूप में गन्ना किसानों के पैसे बचत के रूप में पड़े हुए हैं, इस फंड का व्यापक उपयोग गन्ना विकास और चीनी उद्योग विकास में लगाने की आवश्यकता है।

अलबत्ता सरकार ने चीनी विकास कार्य से गन्ना विकास, चीनी मिलों के आधुनिकीकरण, रूग्ण चीनी मिलों को मदद, इथोनोल प्लांट के लिये ऋण देने का क्रांतिकारी निर्णय लिया है।

महोदय, मेरे क्षेत्र गुजरात में और महाराष्ट्र में चीनी उद्योग १०० प्रतिशत सरकारी क्षेत्र में है और यह उद्योग मरणासन्न स्थिति में है, वहां पुरजोर मदद दी जाये, ऐसी मेंरी मांग है।

पिछले चार पांच माह में इस परिस्थिति को निपटाने के लिये कई ऐसी मिलें हैं, जिससे न्यायालय में जाकर केन्द्र सरकार ने चीनी रिलीज कर भारी मात्रा में चीनी बाजार में ला दी है। इससे बाजार में १०० से ३०० तक की कीमतों में गिरावट आयी है। इससे तमाम सरकारी मिले बंद होने के कगार पर हैं।

महोदय, मैं माननीय मंत्री जी आग्रह करता हूं कि इस विधेयक को प्रसारित करके केन्द्र का रिलीज मिकेनिज्म को मजबूत किया जाये और चीनी स्टॉक मार्केट में लाया जाये ताकि गन्ना एवं चीनी उद्योग और किसानों के हितों की रक्षा की जा सके।

अध्यक्ष महोदय, केन्द्र सरकार और माननीय मंत्री जी से मैं यह भी मांग करता हूं कि जिन चीनी मिल मालिकों ने न्यायालय का आसरा लेकर चीनी के दामों को तहस नहस कर दिया है उनको दंड दिया जाये और जो चीनी मिलें सरकार के नियमों का अनुपालन करती हैं उनको ज्यादा रिलीज दिया जाये ताकि खुले आसमान के नीचे पड़ा हुआ माल बरसात होने से पहले पहले बाजार में बेच सकें।

महोदय, मैं यह भी मांग करता हूं कि चीनी विकास निधी से जो ऋण दिया जाता है इसमें शीरे से इथोनोल तक का पूरे प्लांट का ऋण दिया जाये और ये ऋण राज्य सरकारों के न देकर सीधा चीनी मिलों को दिया जाये इससे चीनी मिलों को ज्यादा फायदा होगा और गन्ना किसानों को भी मदद मिलेगी।

महोदय, मैं पुन: मंत्री जी और केन्द्र सरकार का अभिनंदन करता हूं और आभार व्यक्त करता हूं और इस विधेयक का पुरजोर समर्थन करता हूं।

*Speech was laid on the Table.

       

*श्री दानवे रावसाहेब पाटील ( जालना):महोदय, माननीय मंत्री श्री शरद यादव जी ने आवश्यक वस्तु अधनियम १९५५ में और सुधार लाने वाला विधेयक जो राज्य सभा में पहले ही पारित हो चुका है, वह लोक सभा में पारित करने के लिए रखा, उसका समर्थन करने के लिए मैं खड़ा हूं।

महोदय, यह बिल मा० मंत्री जी को लोक सभा में लाने के लिये क्या जरूरत पड़ी, इसके बारे में कहता हूं- अध्यक्ष जी इस देश में जो चीनी मिल है। इस मिल में जो चीनी पैदा होती है, यह चीनी लोगों तक कैसे पहुंचे इसके लिए केन्द्र सरकार से एक मैकेनिजम बनाया था, वह मैकेनिजम सारे इंडिया के लिए लागू था। सरकार हर महीने हर चीनी मिल को उस मिल के स्टॉक को रिलीस आडॅर देती थी। इस आर्डर के मुताबिक चीनी मिल बाजार में चीनी बेचता था। ये मैकेनिजम जब तक चलता रहा तब तक कोई चीनी मिल को दिक्कत नहीं आयी। चीनी के भाव कम नहीं हुये।

महोदय दिक्कत तो तब हुयी जब उत्तर प्रदेश के प्राईवेट चीनी मिल मालिक हाईकोर्ट में गये और उन्होंने इस मैकेनिजम को चैलेंज किया और कहा कि हमारे पास जो चीनी का स्टाक है, वह रखने के लिए हमारे पास गोदाम नहीं हैं। बैंकों से कर्जा लेकर हमने गन्ने का पैसा दिया है। चीनी रखने के लिए जगह नहीं है। किसानों को पैसा देना बाकी है और यह चीनी कोई इसेंनसियल कमोडीटीज में नहीं आती है और वह शेडयूल(9)में भी नहीं है। इसलिए हमें यह चीनी बाजार में बेचने की अनुमति दी जाये। कोर्ट में इन मिलों को अनुमति दी है और चीनी बगैर सरकार को पूछे बेची जा रही है।

महोदय, कोर्ट ने यह अनुमति क्यों दी, क्योंकि चीनी आवश्यक वस्तु अधनियम, १९५५ शेडयूल (9)में नहीं है। इसलिए कोर्ट ने इसमें अनुमति दी है।

अगर चीनी शेडयूल (9)में होती तो कोर्ट अनुमति नहीं देता इसीलिए माननीय मंत्री जी ने शेडयूल(9)में लाने के लिए यह बिल लाया है।

महोदय, देश में चीनी की पैदावर कितनी है और उसका स्टॉक कितना है। यह एक बात मैं आपको बता दूं। इ.स. २००१ से २००२ -- ११७ ला मे. टन, इ.स. २००२ से २००३ -- १९१ ला मे. टन, यह दो साल में ३०८ लाख मे. टन है।

महोदय, इस देश में अगर अगले साल चीनी मिल नहीं भी चले तो एक सौ अड़तीस लाख मीटि्रक टन चीनी २००३ में स्टॉक रहने वाली है।

 

महोदय, इस देश में एक व्यक्ति एक साल में १५ किलो चीनी खाता है और इस देश की जनसंख्या सौ करोड़, आप पकड़ेंगे तो १५ किलो के हिसाब से १५० मीटि्रक टन चीनी एक साल में लगती है।महोदय, लेकिन चीनी की पैदावार और चीनी का कंजप्शन इसमें बहुत बड़ा अंतर है। इसलिए चीनी मिल के पास जो ज्यादा चीनी पड़ी है, उस चीनी पर जो बैंकों का ब्याज चल रहा है, उसमें चीनी मिल को सरकार की तरफ से राहत देने की जरूरत है।

महोदय, राहत देने की जरूरत किन्हें हैं, यह मैं आपको बता रहा हूं। अध्यक्ष जी, जैसे कोर्ट ने चीनी बेचने का आर्डर किया, वैसे ही इन चीनी मिलों ने पश्चिम बंगाल आसाम और उडीसा यह स्टेट में चीनी बेचना शुरू कर दिया। इसका परिणाम महाराष्ट्र में सहकारिता मिल पर हुआ।

महोदय, कोर्ट के निर्णय के कारण १५६८ कोटी रूपयों को शॉर्ट मार्जिन एक ही साल में होने के कारण चीनी मिल दिक्कत में आ गयी है लेकिन इस शॉट मारझीन को महाराष्ट्र शासन ने रिहेबिलेटिशन और उन १५६८ कोटी के पांच हफ्ते कर पैसे रिटर्न करने को कहा लेकिन अध्यक्ष महाराज यह बिल पास नही हुआ और स्थिति यही रही तो शॉट मार्जिन हर साल ३० प्रतिशत से और बढ़ेगा और चीनी मिल बंद होने में देरी नहीं लगेगी।

महोदय, कोर्ट के निर्णय के कारण, जो स्थिति पैदा हुयी उसे निपटाने के लिये महाराष्ट्र में कुछ प्रयास किये गये, इसमें से एक प्रयास यह था शुगर कमिश्नर की अध्यक्षता में शुगर एक्सपोर्ट सेल बनाया गया। इस सैल के जरिए चीनी मिल से चीनी एकत्र करके एक्सपोर्ट करना यह है आज तक सेल की तरफ से ८ लाख मटि्रक टन चीनी एक्सपोर्ट करने का करार हुआ लेकिन पांच लाख मैटि्रक टन ही चीनी एक्सपोर्ट हुई क्योंकि बाहर देश में भी चीनी के भाव में गिरावट है।

महोदय, चीनी की पैदावार केवल भारत में ही नहीं ब्राजील, केन्या, थाइलैंड, इन देशों में भी चीनी ज्यादा होती है। इस देश में जो चीनी पैदा होती है वह चीनी एक्सपोर्ट करने के लिए उस देश में बड़े पैमाने पर सब्सिडी दी जाती है। इसलिए जो चीनी हमने एक्सपोर्ट की है, उसकी कीमत चीनी मिल को केवल ९२० रू० प्रति क्िंवटल मिली है।

महोदय, मैं आपको बता दूं, चीनी मिल को १ क्िंवटल चीनी पैदा करने के लिए कम से कम १५०० से १६०० रूपये लगते हैं और ९०० से १००० अगर मिलते हौ, यह उद्योग का क्या होगा, इसका भविष्य देखने की कोई जरूरत नहीं।

महोदय, एक बार मैं आपको बता दूं कि भारत सरकार ने कुछ पाबंदियां मिल पर लगायी हैं, उसमें से एस.एम.पी की याद मैं आपको दिलाना चाहता हूं। भारत सरकार ने जिन चीनी मिलों की रिकवरी ८.३० है उनको ५६० के भाव देने के बारे में कहा है। उसके ऊपर जो भी रिकवरी रहेंगी उसके लिए प्रति प्वाइंट ७० पैसे देने को कहा है। यह रेट से कोई भी चीनी मिल यह रेट दे नहीं सकता और दूसरी बात मैं बताना चाहता हूं कि चीनी मिल को लेव्ही देना पड़ती है यह लेव्ही में. हाल में बदलाव आया। पहले ४०.६० बाद में ३०.७०, बाद में १५.८५, बाद में १०.९०, यह जो अंकों में बताया लेव्ही १० प्रतिशत होने के बाद भी चीनी उठायी नहीं जाती, क्योंकि लेव्ही भाव ११९१ प्रति क्िंवटल है। बाजार में लेव्ही महंगी और खुली साखर सस्ती आज बाजार में यह स्थिति है तो अध्यक्ष जी अंत में, वक्त कम होने के कारण इस बिल का मैं समर्थन तो करता हूं, इस स्थिति से उभारने के लिए जो उपाय शासन करने जा रही है, उसमें मेरे सुझाव देकर मैं भाषण खत्म करने वाला हूं।

उपाय इस प्रकार हैं- चीनी मिल को एग्री कलचरल प्राइवेट सेक्टर में लाना चाहिए बैंकों का ब्याज दर कम करना चाहिए कम से कम ५ साल के लिए एक्साईज डयूटी कम करनी चाहिए, नये चीनी मिल को संपत कमेटी के बेनफिट मिलते थे अब नहीं मिलते, उसके बजाये एस.डी.एफ से उतने फंड मिलने चाहिए।

महोदय, चीनी मिल उभारने के लिए आज जो कर्जा लेना पड़ता है, उसकी ब्याज दर १७ प्रतिशत से १८ प्रतिशत है,जो कि एक साल में केवल ब्याज ८ से १० करोड़ देना पड़ता है। मुझे लगता है कि ब्याज दरों में काफी कमी होती जा रही है, लेकिन चीनी मिल के लिए कर्ज को कम ब्याज दर पर पैसा देने की जरूरत है।

चीनी मिल से जो चीनी बेची जाती है उस पर ८५ रूपये क्िंवटल एक्साइज केन्द्र सरकार को दी जाती है। जब तक चीनी का बाजार सुधरता नहीं तब तक एक्साइज डयूटी माफ की जाये।

चीनी मिल एग्रीकलचर प्राइवेट सेक्टर में नहीं है, इस वजह से इन मिलों को जो फायदा होना है, वह नहीं होता, इसलिए चीनी मिल को एग्रीकलचर प्राइवेट सेक्टर में लाया जाये।

महोदय, पहले चीनी मिल खड़ी करने के लिए बैंक जो पैसा देती थी, वह वापिस करने के लिए सम्पत कमेटी के बेनफिट मिलते थे और आज सम्पत कमेटी के बेनफिट नहीं मिलने के कारण चीनी मिल संकट में हैं।

मेरी आपसे विनती है कि सम्पत कमेटी के बेनफिट से जितना फायदा चीनी मिल से होता था, उतने पैसे एस.डी.एफ. से नयी चीनी मिल को दिये जायें। इतने सुझाव करता हूं और बिल का समर्थन करता हूं।

   

*Speech was laid on the Table.

डॉ. मदन प्रसाद जायसवाल:उपाध्यक्ष महोदय, मैं आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैं इसका समर्थन इसलिए करना चाहता हूं क्योंकि ये मुद्दे तीन व्यक्तियों से जुड़े हुए हैं - एक उपभोक्ता, दूसरा किसान और तीसरा चीनी मिलों से। मैं तीनों की बात रखना चाहता हूं। पिछली बार बहुत से चीनी मिल वाले न्यायालय में चले गए थे। न्यायालय में अपनी चीनी रिलीज़ कराने के लिए जो स्थिति बनी है, उस बारे में मैं इसलिए बोलना चाहता हूं क्योंकि मैं इसी सदन में एक संकल्प लाया था कि किसानों के गन्ने का भुगतान करने के लिए और अपनी चीनी मिलों को चलाने के लिए व्यवस्था की जाए। मैं जिस जिले से आता हूं, वहां नौ चीनी मिले हैं। नौ चीनी मिलों में से दो सरकार की थीं जो बंद हो गईं, दो ब्रटिश इंडिया कार्पोरेशन की थीं, वे भी बंद हो गईं और दो जो प्राईवेट हैं, वे बंद होने की स्थिति में हैं। उनमें से केवल तीन चीनी मिलें चलीं। किसानों के साथ वहां आज जो दुर्दशा हो रही है, किसानों को जो पर्ची मिल रही है, उस पर उसका वजन लिखा जाता है लेकिन यह नहीं लिखा जाता कि कितना भुगतान किया जाना है, किस रेशियो से भुगतान किया जाएगा। गन्ना किसानों को लेकर सबसे अधिक चिन्ता हमारी यह है कि गन्ना किसानों के लिए चीनी मिलों को चलाने की सरकार व्यवस्था करे।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप बाद में क्लैरीफिकेशन पूछ सकते हैं।

…( व्यवधान)डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली):चीनी मिलों के बारे में बात हो रही है, आप ऐसे कैसे कर सकते हैं। यह नहीं हो सकता।…( व्यवधान)

१३.३९ hrs. ( At this stage Kunwar Akhilesh Singh and some other hon. Members came and stood near the Table) …( interruptions) १३.४०hrs.

(At this stage Kunwar Akhilesh Singh and some other hon. Members went back to their seats) उपाध्यक्ष महोदय : यहां क्या कोई पार्लियामेंट्री अफेयर्स मनिस्टर इन मैम्बर्स को संभालने के लिए है?

…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : जायसवाल जी, अब कंक्लूड कीजिए।

डॉ. मदन प्रसाद जायसवाल: इस अधनियम से यदि किसानों का फायदा होने जा रहा है तो…( व्यवधान)

श्री चन्द्रनाथ सिंह (मछलीशहर):महोदय, हमें भी बोलने का अवसर दिया जाए।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आपको मैं दो मिनट दे दूंगा।

डॉ. मदन प्रसाद जायसवाल: यदि इस अधनियम से किसानों का फायदा होने जा रहा है तो सराहनीय बात होगी। लेकिन इसी विषय को लेकर मैं एक संकल्प लाया था और पांच घंटे जिस पर इसी सदन में बहस चली थी कि गन्ना किसानों की बकाया राशि का भुगतान किया जाए। करीब-करीब ३०० करोड़ रुपया उनका बकाया है। जब यहां पर मामला उठा तो सरकार कहती है कि गन्ने की कीमत केन्द्र सरकार तय करेगी लेकिन भुगतान करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। जो चीनी मिलें बंद पड़ी हैं, शुगर डैवलपमेंट फंड सरकार के पास पड़ा हुआ है इन चीनी मिलों को चलाने के लिए तो क्यों नहीं भुगतान किया जा रहा है? काफी राशि पड़ी हुई है। १९३३ के दशक में ये चीनी मिलें बनी थीं जो आज चरमरा गई हैं। उनकी व्यवस्था ठीक नहीं है। चीनी का जो उत्पादन हो रहा है, उसकी क्वॉलिटी अच्छी नहीं है।…( व्यवधान)चीनी मिल मालिकों में भी दो ग्रुप हैं। एक ग्रुप इस अधनियम के पक्ष में है और एक विपक्ष में बोल रहे हैं। इसीलिए मैं आग्रह करना चाहता हूं कि किसानों और उपभोक्ताओं की ऐसी दुर्दशा न हो, यह अधनियम लागू हो। लेकिन इसको लेकर जो व्यवस्था होनी चाहिए, वह सरकार को करनी चाहिए कि किसानों के गन्ने का भुगतान केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहए औऱ केन्द्र सरकार यह न कहे कि प्रांत की सरकार गन्ने के किसानों का भुगतान करेगी। पर्ची पर राशि लिखी जानी चाहिए कि किस कीमत पर उनका भुगतान होगा और मैं सबसे अधिक पक्षधर किसानों की स्थिति को सुधारने के लिए हूं कि यदि सरकार उनके लिए व्यवस्था करने जा रही है तो अच्छी बात होगी लेकिन जो बफर स्टॉक है, जो पैदावार हुई है, उसका सरकार क्या करेगी?उसको कहां रखेगी और एक महीना यदि चीनी पड़ी रह गई तो चीनी पड़े-पड़े पीली पड़ जाएगी, उसका एक्सपोर्ट नही कर पाएंगे।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अब आप समाप्त करिए। कम से कम इतना तो सहयोग करिए।

डॉ. मदन प्रसाद जायसवाल: मैं सहयोग कर रहा हूं इसीलिए तो मैंने कहा कि मैं समाप्त कर रहा हूं। मेरा मंत्री जी से आग्रह है कि किसानों के हक की रक्षा करने के लिए इस अधनियम के जरिए कोई व्यवस्था कराएं।…( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह (महाराजगंज, उ.प्र.) : इस अधनियम में कोई व्यवस्था ही नहीं है।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अखिलेश जी, क्या आप अपनी पार्टी के लोगों को भी नहीं बोलने देंगे?

श्री चन्द्रनाथ सिंह : यह बिल चीनी मिल मालिकों और पूंजीपतियों के दबाब से आया है। इसमें भयंकर घपला हुआ है। इस सरकार ने करोड़ों-करोड़ों रुपया लिया है। यह बिल इतनी जल्दबाजी में लाया जा रहा है। यह इतना महत्वपूर्ण है कि उत्तर प्रदेश के किसानों का करोड़ों रुपया बकाया पड़ा हुआ है। ७५१ करोड़ रुपये किसानों को मिलने हैं और उसके बाद प्राइवेट चीनी मिल मालिकों को उनका स्टॉक रखने को दिया जाएगा तो खुल्लमखुल्ला ब्लैकमार्केटिंग बढ़ेगी और इससे नुकसान होगा तथा चीनी मनचाहे दाम पर बेचेंगे और कहेंगे कि हमारे पास स्टॉक है तो मैं किसानों से गन्ना नहीं खरीदूंगा। तो फिर किसान अपना गन्ना कहां ले जाएंगे?

परंतु मुझे बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि शरद यादव जी किसान के बेटे होते हुए भी किसान विरोधी बिल लेकर आए हैं। यह बिल उपभोक्ता विरोधी है और चीनी मिल मालिकों को फायदा पहुंचाने वाला बिल है। इसलिए मैं निवेदन करना चाहता हूं कि इस बिल को स्टेंडिंग कमेटी को भेजा जाए और वहां इस पर विचार किया जाए। अगर यह स्टेंडिंग कमेटी में नहीं ले जाया जाता तो मैं समझूंगा कि सरकार ने भारी घपला किया है और यह किसान विरोधी सरकार है। मैं इस बिल का विरोध करता हूं और मांग करता हूं कि इस बिल पर व्यापक रूप से चर्चा होनी चाहिए।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली):उपाध्यक्ष महोदय, कल से मैं देख रहा हूं और आज भी देख रहा हूं कि चीनी लॉबी कितनी सशक्त है। सरकार की तरफ से कोई नहीं यह कह सकता कि इस बिल से चीनी मिल मालिकों की पौ बारह होगी और किसान की तकलीफ और बढ़ेगी। अगर ऐसी बात नहीं है तो फिर क्यों इसे चीनी मिल मालिकों के दबाव से जल्दी से जल्दी पास किया जा रहा है। मैं कल से देख रहा हूं कि सरकार की तरफ से यह प्रयास हो रहा है कि अफरा-तफरी में यह बिल पास हो जाए। सारे सदस्य इस बिल पर बोलना चाहते हैं, क्योंकि किसान आज मारा जा रहा है।

इस बिल के द्वारा चीनी मिल मालिकों को तीन फायदे पहुंचाए जा रहे हैं। पहले सरकार द्वारा चीनी पर ६५ प्रतिशत लेवी थी, जिसको बाद में चीनी मिल मालिकों के दबाव में घटा कर ४० प्रतिशत कर दिया। उसके बाद इसको भी घटा कर दस प्रतिशत कर दिया गया और अब तो यह भी खत्म होने जा रही है। ३५० करोड़ रुपए का लाभ चीनी मिल मालिकों को पहुंचाया गया है।

बफर स्टाक के नाम पर ७५० करोड़ रुपए का लाभ चीनी मिल मालिकों को पहुंचाया गया है। मूल्य वृद्धि कराकर चीनी मिल मालिकों की पौ बारह होगी। लेकिन गन्ना किसानों की तकलीफ बढ़ रही है, उसके लिए कोई कानून नहीं है, कोई बहस या चर्चा नहीं है और कोई चिंता नहीं है। मदन प्रसाद जायसवाल जी अभी बोल रहे थे। किसान सदस्यों को खोज रहा है इसलिए हमें मारे नहीं, वह उसके पक्ष में बोल गए, जबकि लाभ चीनी मिल मालिकों को मिलेगा। इस प्रकार की नीति सत्ता पक्ष की चल रही है। सरकार मिनीमम सपोर्ट प्राइस तय करती है, लेकिन वह भी गन्ना किसानों को नहीं मिलता है, जबकि अन्य सभी चीजों के दाम बढ़ रहे हैं। पिछले साल एमएसपी ९५ रुपए प्रति क्िंवटल था, लेकिन इस साल ८५ रुपए कर दिया गया है। ऐसा अंधेर गन्ना किसानों के साथ हो रहा है। और किसी चीज की कीमत नहीं घटी है, केवल गन्ने की कीमत घटा दी गई है।

किसान अपना गन्ना मिलों में देते हैं, लेकिन उनको लाभ नहीं मिलता है और समय पर पैसा नहीं मिलता है। उसके लिए सूद का प्रावधान है, लेकिन सूद क्या, मूल भी नहीं मिल रहा है। हजारों करोड़ रुपया गन्ना किसानों का चीनी मिल मालिकों पर बकाया है। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में चीनी मिलें बंद हो रही हैं। इसके लिए सरकार की कोई नीति नहीं है, कोई कानून नहीं है और कोई चर्चा नहीं हो रही है। चीनी मिल मालिकों को कैसे लाभ हो, कैसे चीनी की कीमत बढ़े, यह देखा जा रहा है। कहा जाता है कि ३५० करोड़ रुपए गन्ना किसानों को दिए गए हैं। सरकार बताए कि कहां गन्ना किसानों को यह पैसा मिला है ?नाम होता है किसानों का और फायदा चीनी मिल मालिकों को पहुंचाया जाता है। चीनी मिल मालिकों की बहुत सशक्त लॉबी है। देश में १६ करोड़ परिवार उपभोक्ता हैं। छ: करोड़ परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं और दस करोड़ परिवार गरीबी रेखा से ऊपर हैं। उनके लिए पीडीएस से चीनी मिलना बंद हो गया है। एपीएल वालों का कार्ड बना हुआ है, लेकिन चीनी नहीं मिलती है। गरीबी रेखा से जो लोग थोड़ा ऊपर हैं, उनको पहले पीडीएस से चीनी मिलती थी, लेकिन वह भी बंद कर दी है और एपीएल वालों के लिए भी बंद कर दी है। आम उपभोक्ता के साथ अन्याय हो रहा है, गन्ना किसानों के साथ अन्याय हो रहा है।

फायदा केवल चीनी मिल-मालिकों को हो रहा है। शुगर का जो कंट्रोल आर्डर था, उसका कानून में ही प्रावधान कर दिया जाए तो अच्छा है जिससे कम दाम में चीनी किसानों को मिले। गन्ना किसानों का गन्ने का भुगतान नहीं किया जा रहा है। एक तरफ चीनी मिल मालिकों की चीनी की कीमत बढ़ाई जा रही है और उन्हें चीनी एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट में सब्सिडी भी दी जा रही है। इसमें सब्सिडी नहीं होनी चाहिए। किसान और मेहनतकश लोगों के साथ अन्याय हो रहा है। सरकार द्वारा जो चीनी मिलें बंद हैं उन्हें खोलने के लिए क्या कार्रवाई की गयी है। गन्ना उत्पादन से लेकर, चीनी को चीनी मिलों तक पहुंचाने में, रास्ते भर उनका शोषण होता है, उनके साथ अन्याय होता है। पर्ची के लेन-देन में उनका शोषण होता है। आज किसानों की पीड़ा अनंत हैं। सभी एरिया के किसान कह रहे हैं कि वे तकलीफ में हैं लेकिन सरकार की ओर से उनकी समस्याओं की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। चीनी मिल मालिकों की लॉबी बहुत सशक्त है। वे जो चाहते हैं वह कानून बनवा लेते हैं। कल जब सारे सदस्य चले गये थे तो बिल को पास करवा रहे थे, ऐसी अंधेरगर्दी पहले नहीं देखी गयी। किसान के बकाये का भुगतान होना चाहिए। बंद चीनी मिलों को चलाने की कार्रवाई होनी चाहिए। इस पर सरकार क्षमताहीन हो जाती है। मिल मालिकों के लिए तो सरकार की गाड़ी तेज दौड़ने लगती है लेकिन किसान के लिए सरकार की गाड़ी फंस जाती है। हम इसके खिलाफ हैं।

श्री मोहन रावले (मुम्बई दक्षिण मध्य) : सर, मुझे भी बोलने का मौका दिया जाए।…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: His speech has already been laid on the Table of the House. At 2 o’ clock, we have to take up discussion under rule 193. There are two discussions under rule 193.

… (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: You can lay it on the Table.

SHRI A.P. ABDULLAKUTTY (CANNANORE): Sir, I am laying my speech.

… (Interruptions)

* SHRI A.P. ABDULLAKUTTY Mr. Deputy-Speaker Sir, I rise to support this Bill. The Bill contains many provisions, which are intended to protect Sugar industry. The Central Government is given more power towards control and distribution of sugar. The Essential Commodity Act required more amendments.

The Food Supply in the country is now completely privatised. The Public distribution system is more or less given up by the Government. The people will have to depend on open market. The big traders and wholesale traders get the upper hand. They decide the prices of essential goods. Hence the Essential Commodity Act requires changes. The sugar industry is also facing a crisis. The sugarcane producers are in debts.

The banks do not help them at proper time. Sugar industry is facing acute competition from abroad.

The drought situations is the another reason for crop failure. The Bill seeks to protect their interests. I support this Bill.

                       

* Speech was laid on the Table.

   

MR. DEPUTY-SPEAKER: Let the Minister reply. Do not interrupt now.

… (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Singh, this is unbecoming a Member.

… (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please do not disrupt now.

श्री चन्द्रनाथ सिंह : सरकार मिल-मालिकों से रिश्वत ले रही है।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : मिस्टर सिंह, मैंने आपको चांस दिया, फिर आप क्यों बोल रहे हैं। आप बैठ जाइये।

उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री (श्री शरद यादव) : उपाध्यक्ष जी, इस सवाल पर इस सदन में पहले भी कई बार बहस हुई है और बहस के तहत, एक नहीं कई कदम भारत सरकार की ओर से उठाये गये हैं। जो कदम हमारे हाथ में हैं, उनको हमने जरुर उठाया है। इस सवाल पर पिछले साल १६ दिसम्बर को जब चर्चा चल रही थी तब माननीय प्रधान मंत्री जी मौजूद थे। सारे लोगों की बहस के बाद उन्होंने चार-पांच कदम उठाये थे। मनिमम स्पोर्ट प्राइस पर पांच रुपये यानि जो मनिमम प्राइस ६४ रुपये था उसे ६९.५० किया। इसी सदन में ये कदम उठाये गये थे। भारत में यह जो स्थिति पैदा हुई है निश्चित तौर पर जो आज शुगर इंडस्ट्री है उसमें शुगर-केन ग्रोवर हैं, उपभोक्ता हैं और इस उद्योग के साथ गांव के लोगों का बहुत गहरा रिश्ता है। इसमें जो परिस्थिति बनी है उसमें शुगर उत्पादन पिछले चार साल में लगातार बढ़ता गया है।

लगभग १८० लाख टन प्रोडक्शन रहा है। शुगर प्रोडक्शन की वजह से स्टाक हाई लैवल पर रहा है। दिसम्बर, २००२ में १०२ लाख टन का स्टाक था। इसके चलते सारे सिस्टम में, शुगर इन्डस्ट्रीज में क्राइसैस आया है। शुगर प्राइस १५० रुपए से लेकर २९० रुपए घटी है। इस वजह से उत्पादन में भी कमी आई है। हाई शुगर प्रोडक्शन की वजह से हिन्दुस्तान पहले स्थान पर चला गया है। कोर्ट से निश्चित तौर पर इस बिल को लाने की कतई जरूरत नहीं थी और स्थिति यह है कि शुगर इन्डस्ट्रीज के रिलीज मैकेनिज्म को तोड़ने का काम नहीं किया गया। पिछले एक-डेढ़ साल में डिकन्ट्रोल करने के फैसले के चलते यह फैसला हुआ कि शुगर लैवल घटाया जाए, डिकन्ट्रोल किया जाए, तो उससे इन्डस्ट्रीज में एक पैनिक क्रिएट हुई और लोग अदालत में चले गए।…( व्यवधान)महोदय, ४० लाख मटि्रक टन शुगरकेन मार्केट में आ गया और मार्केट में बड़े पैमाने पर प्राइसैस नीचे चले गए। इस आधार पर शुगर इन्डस्ट्रीज के लोग कोर्ट में चले गए। इसके बाद स्टैचुटरी मनिमम प्राइस जो भारत सरकार तय करती है, उसमें हमने चार-पांच रुपए बढ़ाने का काम किया। पिछली बार कुंवर अखिलेश सिंह जी ने ठीक कहा था कि पिछले साल ९५ से १०० रुपए प्रति क्िंवटल तक कीमत मिली, लेकिन इस बार सरकार ने यह काम किया कि शुगर इन्डस्ट्रीज के लोग कोर्ट में चले गए और वे स्टे ले आए। इस पर हमने सुप्रीम कोर्ट में जाने का काम किया। इस सवाल पर प्रधान मंत्री जी के साथ तीन-चार मीटिंग हो चुकी है। अभी कीमतों में अन्तर आ रहा है, लेकिन भारत सरकार और सूबों की सरकारों के साथ यह लड़ाई अभी चल रही है। इस मामले में हम जूझने का काम कर रहे हैं। शुगर इन्डस्ट्रीज और शुगर ग्रोअर्स के बीच काफी दिक्कतें हैं औऱ उनका मुकाबला करने के लिए हमने कई कदम उठाए हैं। बफर स्टाक जो नीचे चला गया था, उसको बीस लाख टन तक किया गया है। दूसरी कदम हमने उठाया है कि इन्टरनल ट्रांसपोर्ट सब्सिडी दी है और बफर स्टाक ७८६ करोड़ रुपए…( व्यवधान)

श्री लक्ष्मण सिंह (राजगढ़):उसके बात एक्सपोर्ट क्यों घट रहा है? …( व्यवधान)

श्री शरद यादव : महोदय, यह सारी परिस्थिति है। शरद पवार जी इस देश के नेता हैं और फार्मिंग कम्युनिटी से चर्चा की गई है। श्री देवगौड़ी जी ने ठीक कहा कि तात्कालिक कदम उठाए गए हैं।

14.00 hrs. मैं मानता हूं कि उन्होंने बहुत वाजिब बात कही है। हमने बहुत से कदम उठाए हैं। शूगर डेवलपमैंट फंड के बारे में मैं एक चीज देवेगौड़ा जी की नजर में लाना चाहता हूं। भारत सरकार के एसडीएफ में १३०० करोड़ रुपए हैं। मैं मानता हूं कि हमारे पास बहुत ज्यादा पैसा नहीं है लेकिन मेरे हाथ में जो संभव था, वह काम मैंने किया। इसमें सबसे ज्यादा पैसा ७८६ करोड़ रुपया गया। जो पुराने केन डयूज हैं और आगे आने वाले जो डयूज हैं, उसके लिए अकेले शूगर डेवलपमैंट फंड में ७८६ करोड़ रुपए दिए गए जो सबसे बड़ा एमाउंट है। मैंने शूगरकेन के कमिश्नर और दूसरे सभी लोगों को बुला कर बैंक में ऐसा इंतजाम किया कि जब तक वह पैसा चुका नहीं देंगे और बैंक से ऐसा सर्टफिकेट नहीं आ जाएगा कि किसानों को ये डयूज पे हो गए हैं, तब तक उनको पैसा नहीं दिया जाएगा। मैं सदन को एश्योर करता हूं कि हमने जो भी पैसा दिया, उसके लिए एक कमेटी बनायी है और पूरे डिपार्टमैंट में डे-टुडे इसे ऑब्जर्व किया जाएगा जिससे किसानों के पास ठीक से पैसा जाए। माडर्नाइजेशन के बिना इंडस्ट्री को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। मैं मानता हूं कि एथनॉल और को-जैनरेशन से काम नहीं चलेगा और यह क्राइसिज उससे मिटने वाली नहीं है। इंडस्ट्री को मॉडर्नाइज करना पड़ेगा। दुनिया में ग्लोबलाइजेशन हुआ है और ओपन मार्किट हुई है। इसके चलते बहुत बड़ी दिक्कत है। दुनिया में शूगर के दाम नीचे गए हैं। हम जब तक इंडस्ट्री को मॉडर्नाइज नहीं करेंगे, अपग्रेड नहीं करेंगे, तब तक बात नहीं बनेगी। शूगर डैवलपमैंट फंड में १५० करोड़ रुपए रखे गए हैं, को-जैनरेश्न के लिए १०० करोड़ रुपए रखे गए हैं, एथनॉल बनाने के लिए ५० करोड़ रुपए रखे गए हैं, इंटरनल ट्रांसपोर्ट के लिए ५० करोड़ रुपए रखे गए हैं। केन डेवलपमैंट के बगैर रिकवरी जब तक नहीं बढ़ेगी, तब तक इंडस्ट्री प्राइसिज देने का काम नहीं कर पाएगी। देवेगौड़ा जी ने जो कहा मैं मानता हूं कि यह तात्कालिक कदम उठाए हैं। हमारे हाथ में जो था, वह काम हमने किया। शूगर डेवलपमैंट फंड में १३०० करोड़ रुपए में से १२०० करोड़ रुपए इस परिस्थिति को बदलने में हुए चूंकि यह इंडस्ट्री गांव के लोगों से वास्ता रखती है। इसके नीचे जाने का मतलब गांव के उद्योगों का बरबाद करना है।

MR. DEPUTY-SPEAKER: Mr. Minister, now you have to conclude.

… (Interruptions)

श्री शरद यादव: कृष्णामूर्ति जी ने जो कुछ कहा, मैंने उसका थोड़ा बहुत जवाब दे दिया है। लक्ष्मण जी ने कहा कि चीनी का एक्सपोर्ट घट रहा है। वह २००१ में ३ लाख ४९ हजार गया। वह २००१-२००२ में १४.५६ लाख बढ़ा है। …( व्यवधान)

श्री लक्ष्मण सिंह: उपाध्यक्ष महोदय, चीनी का एक्सपोर्ट घटा है लेकिन मंत्री जी कह रहे हैं कि वह बढ़ा है। वह बढ़ा नहीं है। मंत्री जी ऐसा कह कर सदन को गुमराह कर रहे हैं।

श्री शरद यादव: उपाध्यक्ष महोदय, इस बिल का मकसद किसानों को फायदा पहुंचाना है। हम यह बिल सदन की आम सहमति से लाए हैं। मैं इससे ज्यादा नहीं कहना चाहता हूं क्योंकि दूसरे बिल भी आपको लेने हैं।…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: The question is:

"That the Bill further to amend the Essential Commodities Act, 1955, as passed by Rajya Sabha, be taken into consideration. "
 

  The motion was adopted.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, the House will take up clause-by-clause consideration of the Bill.

… (Interruptions)

MR. DEPUTY SPEAKER: Kunwar Akhilesh Singh, please do not interrupt like this.

… (Interruptions)

१४.०३ hrs. ( At this stage Kunwar Akhilesh Singh and some other hon. Members came and stood near the Table) उपाध्यक्ष महोदय: अब हमने नियम १९३ टेक-अप करना है। आप अपनी सीट पर जाएं।

…( व्यवधान)

…( व्यवधान) १४.०५ ण्द्ध.

(At this stage Kunwar Akhilesh Singh and some other hon. Members went back to their seats) श्री शरद यादव : उपाध्यक्ष जी, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि माननीय सदस्य ने जो बात यहां रखी है और उच्च न्यायालय का जो स्टे हुआ है, वहां हमारा वकील जा रहा है…( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह (महाराजगंज, उ.प्र.) : उपाध्यक्ष जी, अभी जो कहा गया है…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : बात सुनाने की नहीं, आप उनकी सुनिये, वे स्पष्टीकरण दे रहे हैं।

श्री शरद यादव : उपाध्यक्ष महोदय, माननीय़ सदस्य ने जिस बात को मेरे संज्ञान में लाने का काम किया है, मैं चाहूगा कि वे लिखकर दे दें। इसमें जो भी हो सकेगा, जिस तरह से सिसट्म वर्क आउट करना होगा, करेंगे। सरकार वह सब करने के लिये तैयार है…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अखिलेश जी, मंत्री जी ने कह दिया है। आप उन्हें लिखकर दे दीजिये। उंन्होंने आपकी बात मान ली है। आप बैठिये।

कुंवर अखिलेश सिंह: उपाध्यक्ष जी, मैं एक मिनट के लिय आपसे इजाजत चाहता हूं कि जो उन्होंने कहा है,वह सत्य नहीं है…( व्यवधान)वे सत्य को छिपा रहे हैं…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : जब उन्होंने आपकी बात मान ली है तो फिर इस पर बहस क्या है? आप दुबारा बहस पर नहीं जा सकते। जब एक बार उन्होंने कह दिया है कि आप लिखकर दे दीजिये, तो वे करेंगे।

कुंवर अखिलेश सिंह: उपाध्यक्ष जी, माननीय मंत्री जी ने अपने उत्तर में न्यायालय का उल्लेख किया है, इसलिये मैं भी रिकॉर्ड पर लाना चाहूंगा कि माननीय मंत्री जी ने जिस उच्च न्यायालय का उल्लेख किया है, मैं उनके संज्ञान में यह लाना चाहता हूं कि ३१.०१.२००१ को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने गन्ना किसानों के मामले में फैसला दिया…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अखिलेश जी, आप दुबारा स्पीच शुरु मत करें। मंत्री जी ने आपकी बात मान ली है।

कुंवर अखिलेश सिंह: उपाध्यक्ष जी, उत्तर प्रदेश सरकार ने तथ्य छिपाकर बात की है, इसलिये सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार और चीनी मिल मालिकों के खिलाफ अवमानना का नोटिस दिया है। ये सारे तथ्य माननीय राष्ट्रपति जी के संज्ञान में लाये जा चुके हैं…( व्यवधान)

श्री शरद यादव : उपाध्यक्ष जी, हाई कोर्ट में हमारा वकील जाने वाला है। माननीय सदस्य तथ्य दे दें दें।

उपाध्यक्ष महोदय : मंत्री जी ने कह दिया है कि आप सारे तथ्य उन्हें दे दें। मुझे नियम १९३ टेक अप करना है, यह आप लोगों ने डिसाइड किया हुआ है।

श्री शिवाजी माने (हिंगोली): उपाध्यक्ष जी, यह ठीक है कि कंट्रोल करना है लेकिन अगर चीनी एक दिन भी गोदाम में रहेगी तो उसका इंट्रेरस्ट कौन पे करेगा?

श्री शरद यादव : उपाध्यक्ष जी, माननीय सदस्य ने जो शंका व्यक्त की है, मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि यह रिलीज मैकेनिज्म सिस्टम आज से नहीं, पिछले ३०-४० साल से चल रहा है। हमारे कम्युनिस्ट पार्टी को लोग बता रहे थे वे डी-कंट्रोल के खिलाफ हैं। उन लोगों की यह शंका ठीक नहीं है।

MR. DEPUTY-SPEAKER : The question is :

"That clauses 2 and 3 stand part of the Bill."

  The motion was adopted.

Clauses 2 and 3 were added to the Bill.

Clause 1, the Enacting Formula and the long Title were added to the Bill.

SHRI SHARAD YADAV : Sir, I beg to move :

"That the Bill be passed."

 MR. DEPUTY-SPEAKER : The question is :

"That the Bill be passed."

  The motion was adopted.

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कुंवर अखिलेश सिंह:उपाध्यक्ष जी, आपने हमारी बिल पर डिवीजन की मांग स्वीकार नहीं की है, इसलिये सदन से वॉक आउट कर रहे हैं।

   

१४.१० hrs. ( At this stage Kunwar Akhilesh Singh and some other hon. Members left the House.)

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