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Lok Sabha Debates

Further Discussion On The Motion For Consideration Of The Sixth Schedule To The ... on 24 March, 2017

Sixteenth Loksabha pan> Title: Further discussion on the motion for consideration of the Sixth Schedule to the Constitution (Amendment) Bill, 2015, moved by Shri Vincent H. Pala on 5th August, 2016 (Discussion not concluded).

 

HON. DEPUTY SPEAKER: Now, we shall take up Item No. 73. Shri Nishikant Dubey.

 

श्री निशिकान्त दुबे (गोड्डा) :  माननीय उपाध्यक्ष जी, विंसेंट पाला जी, जो हमारे मित्र हैं, वे जो बिल लेकर आए, हम उसके समर्थन में खड़े हुए हैं। मैंने उस दिन भी कहा था कि देखने में यह बिल बहुत छोटा लगता है, लगता है कि बहुत छोटा संशोधन है, लेकिन पूरी की पूरी जो छठे शैडय़ूल की आत्मा है, उसमें जो उन्होंने तीन पाइंट दिये हैं कि जिला परि­षद में सदस्यों की संख्या 30 से बढ़ाकर 40 कर दी जाए, खान और खनिजों से संबंधित आदिवासियों की परम्परागत उपजीविकाओं को जिला परि­षद की विधायी सक्षमता के अंदर लाया जाए और आदिवासियों की रूढ़िजन्य पद्धतियों और हितों का संरक्षण करने की दृष्टि से संशोधन करने का प्रस्ताव है। मूल में आदिवासियों का विकास हो, क्योंकि मैं जिस इलाके से आता हूं, वह खुद ही आदिवासी बहुल्य इलाका संथाल परगना है।

 

16.00 hours           यह पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है और हम छठी अनुसूची की बात कर रहे हैं। आजादी के इतने वर्षों बाद अंग्रेजों की नीतियों के कारण आदिवासी समाज का विकास आज तक नहीं हो पाया है, इसलिए हम इसके समर्थन में खड़े हुए हैं। हमें यह भी देखना चाहिए कि इसकी आवश्यकता क्यों पड़ रही है। श्री विनसेंट एच. पाला कांग्रेस के हमारे बहुत अच्छे मित्र हैं और जे.बी. पटनायक जी कांग्रेस के बहुत वरि­ष्ठ नेता थे। उन्हें कांग्रेस पार्टी ने राज्यपाल भी बनाया था। यह बहुत महत्वपूर्ण बात है कि आखिर छठी अनुसूची क्या है, उसकी समस्याएं क्या हैं और कांग्रेस पार्टी की नीतियों के कारण हम आज कहां खड़े हैं। मैं पटनायक जी को क्वोट कर रहा हूं -

“In the Sixth Schedule Areas, there is no decentralization of powers and administration. There is no Panchayat and Parishad. All you have is only a District Council which elects a few people and they enjoy unbridled power, but democracy demands that power should not be concentrated in a few hands.”             आर्टिकल-275 और 342, आप जितने आर्टिकल्स की बात करेंगे, उसमें पांचवीं अनुसूची और छठी अनुसूची के लिए सारे अधिकार कांस्टीटय़ूशन ने गवर्नर के ऊपर निहित किए हैं। गवर्नर को अधिकार है कि वह अलग से इस क्षेत्र के विकास के लिए डेवलपमेंट कर पाए, अलग से सोच पाए, अलग से मीटिंग कर पाए, क्योंकि कांस्टीटय़ूशनली यह माना जाता है कि इस तरह के पांचवीं अनुसूची और छठी अनुसूची एरिया को हम डायरेक्ट देखते हैं। आप देखें कि गवर्नर साहब क्या कहते हैं, जो कि स्वयं मुख्यमंत्री रहे हैं, जो डेमोक्रेसी के बाद गवर्नर बने हैं। ऐसा नहीं है कि अचानक बैठे-बैठे किसी ब्यूरोक्रेट को गवर्नर बना दिया। वे ओडिसा जैसे राज्य के मुख्य मंत्री रहे। यदि किसी राज्य में आदिवासियों की जनसंख्या सबसे ज्यादा 32-33 परसेंट के आस-पास है, तो वह ओडिसा राज्य है। वे 15 साल तक ओडिसा के मुख्य मंत्री रहे। वे इसके आगे कहते हैं -

“Units should be created that will represent people at all strata, for instance, the MGNREGA scheme is implemented at the Panchayat level. Money comes directly to the Panchayats. If there is no Panchayat, there is no representation at the village level. Where will the money from the Centre go to?”   पैसा मिल ही नहीं रहा है, चाहे 12वें वित्त आयोग का पैसा हो, 13वें वित्त आयोग का पैसा हो, 14वें वित्त आयोग का पैसा हो। मनरेगा जैसी बड़ी योजना है, लेकिन वहां पंचायत सिस्टम नहीं है। आप देखिए कि वह इलाका किस तरह से पैसे से महरूम रहा है। वहां पैसा नहीं मिल रहा है और यदि पैसा नहीं मिलेगा, तो गरीबों का वहां से पलायन होगा।

          उपाध्यक्ष महोदय, आप देख सकते हैं कि नार्थ-ईस्ट के बच्चे पढ़ने के लिए दिल्ली आते हैं और शिक्षा प्राप्त करना उनका अधिकार है। यह देश जितना हमारा है, उनका भी उतना ही यह देश है। उन्हें भी अच्छी से अच्छी शिक्षा मिलनी चाहिए और मिल भी रही है। जब वे दिल्ली आते हैं, तो बार-बार आरोप लगता है कि उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है या किसी दूसरी जगह भी जाते हैं, तो उनके साथ भेदभाव किया जाता है। उसका कारण यह है कि हम वहां एक अच्छी यूनीवर्सिटी डेवलप नहीं कर पाए हैं। हम वहां बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दे पा रहे हैं, क्योंकि प्राइमरी एजुकेशन का पूरा अधिकार डिस्ट्रिक्ट कौंसिल का ही है और यह काम कैसे फेल हुआ है, यह मैं आपको बताऊंगा। वे कह रहे हैं -

“The non-Sixth Schedule Areas are more developed than the Sixth Schedule ones. While the Sixth Schedule was enacted for giving more benefit to the people and bring development at a faster pace, the result on the ground has been opposite.”   यह बहुत बड़ी समस्या है, क्योंकि मैंने स्वयं आपको कहा है कि मैं जिस इलाके से आता हूं, उसका कुछ इलाका जैसे गोड्डा, जहां से मैं सांसद हूं, उसके दो ब्लॉक पांचवीं अनुसूची में हैं। जिला दुमका पूरा का पूरा पांचवीं अनुसूची में है। मैं मानता हूं कि पांचवीं अनुसूची में ज्यादा डेवलपमेंट हुआ, लेकिन छठी अनुसूची, जिसे कि कांस्टीटय़ूशन ने दिया, उसमें कम डेवलपमेंट हुआ। मैं अपनी बात कहते हुए बताऊंगा कि किस तरह से नेहरू जी ने इन चीजों को किया और छैंन्न्बठी अनुसूची की क्या आवश्यकता होगी।

Practically, there is very little development in these areas. There is large scale unemployment. आप किस लिए मांग रहे हैं? पाला साहब आप उस एरिया से आते हैं और मैंने जैसा कहा कि वहां से लोग केवल पढ़ाई के लिए ही बाहर नहीं आ रहे हैं, वह पलायन कर रहे हैं, क्योंकि बेरोजगारी है। बेरोजगारी इसलिए है कि वहां इंडस्ट्री डेवलप नहीं हो पा रही है और इंडस्ट्री इसलिए डेवलप नहीं हो पा रही है कि स्टेट, डिस्ट्रिक्ट काउंसिल और केन्द्र के बीच कोऑर्डिनेशन खत्म हो चुका है। वहां के बच्चों को रोजगार कैसे मिलेगा, वहां का डेवलपमेंट कैसे होगा, इस बात को कोई सोचने को तैयार नहीं है। Under such circumstances, where will the young people go? They are becoming easy targets for rebel elements who take full advantage of the situation and recruit them. इन्होंने परेशानी बतायी की पूरे नॉर्थ-ईस्ट की क्या समस्या है? मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड में समस्या है। उल्फा के कारण बांग्लादेश और त्रिपुरा बॉर्डर पर समस्या है। वहां मिलिटैंसी बढ़ रही है। वहां का यूथ अपने को देश का हिस्सा नहीं मानता है। उसका कारण यह है कि वह सॉफ्ट टारगेट बन रहे हैं। वह सॉफ्ट टारगेट इसलिए हो रहे हैं कि वहां डेवलपमेंट का जो तरीका है, सिक्स्थ शेडय़ूल में दिया गया है, उसको न राज्य सरकार और न ही सिक्स्थ शेडय़ूल डिस्ट्रिक्ट काउंसिल इसको कर रहे हैं।

In my view, whoever is corrupt should be dealt with strongly. A CBI Inquiry is on. Prosecution will start any moment against those found guilty. If any new formation including new names comes up, the CBI should take up the cases. No corrupt persons should be protected. The North-Cachar Autonomous Council in Dima Hasao District is under the scrutiny of the NIA and the CBI for the alleged misappropriation of over Rs.1,000 crore of Government fund. 90-10 का हिसाब है, पूरे देश में 60-40 का है, चाहे सर्व शिक्षा अभियान हो, चाहे पीएमजीएसवाई हो, चाहे नेशनल रूरल हेल्थ मिशन हो। हम जो टैक्स इंसेंटिव देते हैं और आपको पता है कि डिमॉनेटाइजेशन के समय सारा पैसा नॉर्थ-ईस्ट के बैंकों में जमा किया जा रहा था। ऐसा क्यों हो रहा था? वह इसलिए हो रहा था कि हम चाहते हैं कि नॉर्थ-ईस्ट का डेवलपमेंट हो। लेकिन वहां डेवपलमेंट के नाम पर केवल पैसे की चोरी हो रही है। और कोई भी आदमी इसको देखने वाला नहीं है। पाला साहब यदि आप कॉप्रीहेंसिव बिल लेकर आते और  इन सब समस्याओं के बारे में सोचते तो अच्छा होता। यहां किरेन रिजीजू साहब और आप मुझ से कई गुना ज्यादा नॉर्थ-ईस्ट की समस्याओं के बारे में जानते हैं। यहां यह देखते हैं कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा। आप लोगों को थोड़ा टफ शब्दों में बोलना होगा, क्योंकि इलैक्शन का सवाल होता है। इलैक्शन के समय में कोई भी सही बात नहीं बोलता है, यदि कोई बोलेगा तो चुनाव हार जाएगा। हम भी किसी एरिया को रिप्रज़ेंट करते हैं और हम भी किसी एरिया के बारे में खुलकर नहीं बोल सकते हैं। चूंकि नॉर्थ-ईस्ट में मेरा सांसद के नाते बहुत ज्याद स्टेक नहीं है, मुझे लगता है कि पूरे देश को समझने की आवश्यकता है कि क्या कारण हैं?

          पहला कारण है, फाइनैंशियल मिसमैनेजमेंट। वहां ऑडिट सिस्टम फेल हो चुका है। डेवलपमेंट का सारा पैसा कहां जा रहा है, उसके बारे में कोई भी व्यक्ति चिंतित नहीं है। आर्टिकल 275 में यह दिया गया है कि राज्य के क्या अधिकार होंगे, डिस्ट्रिक्ट काउंसिल के क्या अधिकार होंगे और वह एक-दूसरे के अधिकार को ओवरलैप कर रहे हैं। डिस्ट्रिक्ट काउंसिल में एक व्यक्ति रिप्रजेंट कर रहा है और राज्य में कोई दूसरा व्यक्ति रिप्रजेंट कर रहा है। आर्टिकल 275 की भावना पूरी की पूरी वहां लागू नहीं हो रही है और डिस्ट्रिक्ट काउंसिल का कोऑर्डिनेशन वर्क पूरा का पूरा तबाह हो गया है।

          उसी तरह से शेडय़ूल 6 के अंडर पैरा 318, वह जो ले डाउन कर रहा है कि कोई भी कानून जब तक कि वहां लागू नहीं होगा, जैसे पार्लियामेंट यदि कोई कानून पास करती है तो यह शेडय़ूल 6 के एरिया में लागू नहीं होगा, लागू तब होगा जब उसको वहां की डिस्ट्रिक्ट काउन्सिल एक्सेप्ट करेगी। आपने मिजोरम के केस में क्या किया? उसमें एक पैरा 12(बी) जो है, उसे शेडय़ूल 6 में डाल दिया गया और वह लेजिस्लेचर को ओवर राइडिंग पॉवर दे रहा है। आप यह समझिए कि जिस मजबूती के लिए हमने यह काम किया, हमने वहां ओवर राइडिंग पॉवर 12(बी) देकर वहां के शेडय़ूल 6 की चीजों को डाइल्यूट करने का प्रयास किया है। उसी तरह से एक बड़ा प्रश्न यह है कि प्रधान कौन होगा और प्रधान का सैलेकशन क्या होगा? शेडय़ूल 6 में यह है कि 3 जी में डिस्ट्रिक काउन्सिल...(व्यवधान)

HON. DEPUTY SPEAKER: Hon. Members, four hours’ time allotted for discussion on the Bill is almost exhausted. As there are three more Members to take part in the discussion on the Bill, if the House agrees, the time for discussion on the Bill may be extended by one hour.

SOME HON. MEMBERS: Agreed.

HON. DEPUTY SPEAKER: The time is extended by one hour.

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF HOME AFFAIRS (SHRI KIREN RIJIJU): One hour would be insufficient for him, Sir! HON. DEPUTY SPEAKER: He can conclude in one minute also; he knows how to speak.

श्री निशिकान्त दुबे:  मैं केवल बिल पर ही बोल रहा हूं। मैं 6 शेडय़ूल से हटकर कहीं दायें-बायें नहीं जा रहा हूं। 

HON. DEPUTY SPEAKER: There are three Members more to speak and the Minister has to reply. Please keep that in mind.

श्री निशिकान्त दुबे:  मैं यह कह रहा हूं कि वर्ष 1971 में जो मिजो डिस्ट्रिक्ट हिल एरिया है, उसको स्टेटहुड वर्ष 1986 में मिला। वहां प्रधान का सैलेक्शन कैसे होगा, वह सैलेक्शन का अधिकार स्टेट ने अपने पास रख लिया। इस कारण शेडय़ूल 6 की चीज़ स्वयं डाइल्यूट हो गई। वह जिस दिन से दिया है, उसी दिन से डाइल्यूट हो रहा है। मुझे लगता है कि आजकल ट्राइबल्स की जो स्थिति है, खासकर शेडय़ूल 6 एरिया की, सर, मिस्टर पाला यहां आए हुए हैं, मैं निदा फाजली की एक कविता सुनाना चाहूंगा।

इंसान में हैवान यहां भी हैं, वहां भी हैं, अल्लाह निगेहबान यहां भी है, वहां भी है।

खूंखार दरिंदों के फकत नाम अलग हैं, शहरों में बयाबान यहां भी है, वहां भी है।

उठता है दिलो जान से धुआँ दोनों तरफ ही, ये मीर के दीवाने यहां भी हैं, वहां भी  हैं।

 

          उपाध्यक्ष महोदय, जिस चीज के लिए शेडय़ूल 6 आया, जिन लोगों के जिम्मे दिया गया, वे सारी चीजें आज कहीं न कहीं फेल नजर आ रही हैं। जब यह संविधान बन रहा था तो इसके ऊपर काफी लड़ाई हुई। एक बारदोली कॉन्स्टीटय़ूएंट असेंबली में बारदोली कमेटी बनी। अम्बेडकर साहब भी थे। एक सब कमेटी बनी और सब कमेटी ने वर्ष 1946 को एक रिपोर्ट दी कि फाइनली शेडय़ूल 6 क्यों होना चाहिए।  

“Sub-committee sought to evolve a system by which it could be possible to remove the apprehensions of the tribal people, simple and backward as they were, so they might not be exploited, subjugated and oppressed by the more advanced people.”                     इस कारण से यह सब-कमेटी के रिकमेंडेशंस थे। सब-कमेटी के रिकमेंडेशंस के आधार पर हिल काउन्सिल बनी। मान लिया, बहुत अच्छी बनी, लेकिन इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी? क्योंकि नॉर्थ ईस्ट के इतिहास को पहले देखने की आवश्यकता है। मगध साम्राज्य के समय इसकी एक बड़ी अच्छी स्थिति थी और अंत महात्या कहकर कोई राजा के तौर पर उसको विकसित किया जाता था। आप समझिए कि रूल कैसे किया जाएगा। अशोका डायनेस्टी के समय प्लेन में ट्राइब्स में किसी प्रकार का अंतर नहीं था। जब मुगल आए तो मुगलों ने उसी तरह से सैनिकों की छावनी बनाकर नार्थ-ईस्ट को एक आम आदमी की तरह से देखने का प्रयास किया। ट्राइबल्स को अलग करने के जो चेंजिज स्टार्ट हुए कि ट्राइबल्स अलग हैं, आर्य अलग हैं, अनार्य अलग हैं, द्रविड़ अलग हैं, हम इस देश के नागरिक नहीं हैं, वे देश के नागरिक हैं, यह जो शुरू हुआ, यह शुरू क्यों हुआ और इसके पीछे जो इतिहास है कि 1854 में एच.एम.ग्रोव की हत्या हुई। मैं आपको बताऊं कि संथाल म्यूटिनी के पहले, 1857 की क्रांति के पहले, 1855 में संथाल म्यूटिनी हुई और मैं जिस इलाके से आता हूं, वहीं संथाल म्यूटिनी हुई। भागलपुर, जो मेरा जिला  है, वहां 1776 में तिलका मांझी को फांसी पर लटकाया गया था। उसके पहले नार्थ-ईस्ट में जब-जब ब्रिटिशर्स ने क्रिश्चियनिटी फैलाने की कोशिश की, अपने आपको आगे बढ़ाने की कोशिश की, तब-तब वहां अटैक हुआ।

          पाला साहब को ध्यान होगा कि 1911 में 42 लोगों की हत्या हुई, उसमें विलियमसन और गार्सन की हत्या हुई थी। नार्थ-ईस्ट के इतिहास में 1911 एक खूनी इतिहास के तौर पर माना गया और इस कारण उन लोगों को यह लगा कि यहां शासन करना मुश्किल है। मैंने 1855 की जो संथाल म्यूटिनी की बात की, ट्राइबल्स किसी का कंट्रोल सुनने और समझने के लिए तैयार नहीं थे और उन्हें लगता था कि यह देश हमारा है, इस देश में यदि रहना है, इस देश में सारा अधिकार क्षेत्र हमारा है और ये जो विदेशी आ रहे हैं, इन विदेशियों के साथ मुकाबला करना चाहिए। उनका इतिहास इतना सशक्त था कि वे किसी से भी फाइट करने के लिए तैयार रहते थे। यह बात जब ब्रिटिशर्स के दिमाग में आ गई तो उन्होंने सबसे पहला काम यह किया कि इसका डैवलपमैन्ट कैसे नहीं हो और दूसरा, ये कैसे भारत के अन्य लोगों से अलग हैं, मैदानी लोगों से कैसे अलग हैं, उस तरह की स्कीम उन्होंने बनानी स्टार्ट की और उसके आधार पर यह कानून उन्होंने बनाया। जब भारत आजाद हुआ तो चाहे गांधी जी हों, गांधी जी के अनुयायी ए.बी.ठक्कर हों या देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू हों, उन सभी का यह कहना था कि आदिवासी और गैर-आदिवासियों के बीच में कोई बंटवारा नहीं होना चाहिए और कोई भी ऐसी शासन पद्धति नहीं होनी चाहिए, जिसमें कि आदिवासियों को जिंदगी भर यह लगता रहे कि हम आदिवासी हैं।

          मैं नेहरू जी को कोट करूंगा कि उन्होंने क्या कहा। उन्होंने जब कमेटी बनाई तो उन्होंने कहा - We must let them feel that we come to give and not to take something away from them. यह नेहरू जी ने उस वक्त कहा और नेहरू जी ने कहा कि जो एलविन की कमेटी की रिपोर्ट बनी और जिसने एक मिडिल पाथ की बात कही, उसमें उन्होंने कहा कि भारत देश स्वतंत्र हो गया है, यह देश जितना हमारा है, उतना उनका भी है। उन्हें यह फील होना चाहिए कि हम उनसे कुछ लेने नहीं आ रहे हैं। आज जब आप खान और खनिज की बात कर रहे हो, पाला साहब आप जो संशोधन लेकर आए हो, वहां हम पढ़ते हैं कि पूरा का पूरा यूरेनियम और थोरियम का भंडार है, कोयले का भंडार है। लेकिन न वहां यूरेनियम की कोई यूनिट आ पा रही है और न थोरियम की कोई यूनिट आ रही है। आपके खुद के राज्य में कोयले का इतना भंडार है, आपको पता है कि आप कोयले के मामले में बहुत रिच हो। लेकिन कोयले पर आधारित कोई इंडस्ट्री नहीं आ रही है। क्योंकि उन्हें लगता है कि यह हमारा काम है और यह देश के दूसरे कोने में चला जायेगा, जो हमारा क्षेत्र नहीं है।

यह जो सिक्स्थ शेडय़ूल है, इसमें एक बड़ा प्रॉब्लम आया है जिसमें एक बड़े संशोधन की आवश्यकता है। इस चीज को नेहरू जी उस वक्त जानते थे। 1950-51 का उनका भाषण मैं कोट कर रहा हूं, वह कहते थे कि इस तरह की बातें नहीं होनी चाहिए। उन्होंने क्या कहा, उन्होंने एक थ्योरी दी, नेहरू जी की थ्योरी थी - ट्राइबल पंचशील। उन्होंने पांच थ्योरी दीं और उन्होंने कहा कि इनके आधार पर शासन व्यवस्था बढ़नी चाहिए। ट्राइबल पंचशील की पहली थ्योरी थी - People should develop along the lines of their own genius and we should avoid imposing anything on them.  We should try to encourage in every way their own traditional arts and culture. परंतु क्या यह पूरा कर पाए, क्योंकि पूरी की पूरी शासन व्यवस्था, प्रह्लाद सिंह पटेल साहब यहां बैठे हुए हैं, वह मणिपुर में सरकार बनाकर आए हैं।     मैं इनको बधाई देना चाहता हूँ। लेकिन मैं आपको बताऊं कि आज वहां क्या सिचुएशन है। आज आप लड़ाई कर रहे हैं। उनका ट्रेडिशन क्या है, उनका कल्चर क्या है? आप इसको स्वीकार करना चाहें या न करना चाहें, यदि हम क्रिश्चैनिटी में कन्वर्ट हो रहे हैं तो क्या ट्राइबल कल्चर बच पा रहा है? ट्राइबल का अपना एक अलग कल्चर है। उन्होंने कभी वहां जा कर पूजा-पाठ नहीं किया है। वे कभी क्रिश्चियन मिशनरी के चक्कर में नहीं रहे हैं। मैंने आपको बताया है कि सन् 1846 से लेकर आज तक का उनका इतिहास है कि उन्होंने इसका विरोध किया है। आज वहां पूरा का पूरा नॉर्थ-ईस्ट कन्वर्ट हो गया है। जब कन्वर्ट हो जाएगा तो क्या जो नेहरू जी चाहते थे, यह पिछले 60-70 साल में हुआ है, अपने वहां भी शासन किया है। चाहे डिस्ट्रिक्ट काउंसिल का सवाल हो, चाहे स्टेट का सवाल हो, चाहे सैंटर का सवाल हो, सब जगह आपने ही शासन किया है। आज वह पंचशील का सिद्धांत, इस कारण से ट्राइबल पिपुल्स को यह लगता है कि हम अपने कल्चर को बचा नहीं पा रहे हैं। दूसरा, उनका सिद्धांत था कि ः-

 

“Tribal rights in land and forest should be respected.”   आज हम उनको नहीं दे रहे हैं। किस तरह से नेहरू जी ने जो बातें कहीं, उन्होंने किस तरह से उनको पलटा, यह मैं आपको बताऊंगा कि किस तरह से सन् 1950-52 के बाद से ही यह 6th schedule  और यह सब बनने के बाद ही उनका फॉरेस्ट राइट ले लिया, जो कि पेसा कानून के तहत हो गया। तीसरा सिद्धांत उन्होंने कहा कि ः-

 “We should try to train and build up a team of their own people to do the work of administration and development. Some technical person from our side will no doubt be needed especially in the beginning. But we should avoid introducing too many outsiders into the tribal territory.”   क्या आज वहां बाहर के लोग नहीं जा रहे हैं? बहुत से लोग जा रहे हैं। इसको रोकने के लिए क्या किया गया? क्या ऐसा कारण था? आपने कानून तो बना लिया, लेकिन जो करप्शन है, जो नैपोटिज़्म है, कुछ लोगों के हाथों में ये जो चीज़ें हैं, बाहर के लोगों को रोकने के लिए आपने क्या प्रयास किया? इसके बाद चौथा सिद्धांत है कः-

 

“We should not over-administer these areas or overwhelm them with multiplicity of schemes. We should rather work through and not in rivalry to their own social and cultural institutions.”   जिस बात को ट्राइबल पंचशील में कहा गया, आज क्या हो रहा है, आज जो शिडय़ुल एरिया है, डिस्ट्रिक्ट काउंसिल, स्टेट को मानने को तैयार नहीं है। स्टेट, सैंटर की बातों को इम्प्लिमेंट करने को तैयार नहीं है। 90-10 के सिस्टम के बाद भी आज यह फैक्ट है कि केवल और केवल ठेकेदार, नॉर्थ-ईस्ट का पैसा, आपको पता है कि 1600 करोड़ रुपये हमारी सरकार वहां खर्च करना चाहती है, नॉर्थ-ईस्ट का मंत्रालय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने बनाया था। ट्राइबल के मंत्रालय के बारे में आपको पता है कि अटल बिहारी वाजपेयी जी ने बनाया था। लेकिन दस सालों में आपने क्या काम किया है? वहां किस तरह का विकास हुआ है? वहां रोड नहीं है, रेल नहीं है, कनैक्टिविटी नहीं है, गैस नहीं है। इसके बाद जो पांचवा सिद्धांत है कि ः-

 “We should judge results not by statistics or the amount of money spent, but by the quality of human character that has evolved.”   लेकिन क्या हो गया कि हम केवल पैसा खर्चा कर रहे हैं, लेकिन क्वालिटी लाइफ नहीं दे पा रहे हैं। एक छोटी सी बात मैंने आपको कही कि प्राइमरी एजुकेशन, टैक्स कलैक्शन, आदि ये सारी चीजें आपके 6th schedule में मौजूद हैं। सबसे बुरी स्थिति, यदि जे.बी. पटनायक को कोट करें, यदि अपने प्रोग्राम इम्पिलिमेंटेशन और सांखियकी विभाग को कोट करें, यदि विश्व बैंक की रिपोर्ट को कोट करें, यदि आई.एम.एफ. की रिपोर्ट को कोट करें तो पता चलेगा कि नॉर्थ-ईस्ट में 6th schedule का जो एरिया है, प्राइमरी एजुकेशन का लैवल उसमें सबसे  कम है, उसकी सबसे बुरी स्थिति है। इसका मतलब है कि यह पूरा का पूरा सिस्टम फेल हो रहा है। उसके बाद आपने क्या किया है। मैं आपको बताऊं कि सन् 1952 में जो ट्राइबल राइट्स की बात थी और फॉरेस्ट की बात थी, यह बात देश के लिए सोचने वाली है कि कांग्रेस वाले कहते कुछ और हैं, करते कुछ और हैं। उसमें भी मैं पहले प्रधान मंत्री की बात कर रहा हूँ, सन् 1952 की बात कर रहा हूँ। उन्होंने क्या किया, सन् 1952 की नई फॉरेस्ट पॉलिसी आई। उसने कहा कः-

 “The release of forest land for cultivation subject to certain safeguards was there in the old policy whereas the new policy withdrew the concession.”   जो पुरानी पॉलिसी थी, आप पंचशील का सिद्धांत ले कर आए, मतलब आप समझें कि वोट बैंक की पॉलिसी कांग्रेस कैसे करती रही। किस तरह से आपने6th schedule  के नाम पर एक झुनझुना पकड़ा दिया, यह कह कर कि आपका विकास होगा, आपकी सभी चीज़ें होंगी और स्थिति क्या पैदा हुई?सिचुएशन यह पैदा हुई कि जो फॉरेस्ट लैंड के कल्टिवेशन का अधिकार ट्राइबल के पास था, उसने उस कन्सेशन को बाहर कर लिया। दूसरा काम क्या किया, ओल्ड पॉलिसी में क्या थाः “The old policy had left a margin for the supply of the villagers’ requirements from the outlying areas in the reserved forests and the new policy decided to have village forests for this purpose. ”                       मतलब आप यह समझिये कि वह रिजर्व फॉरेस्ट को आउटलाइन करता था। अब आपने कहीं भी, राज्य सरकार तय कर ले कि यह फॉरेस्ट है, आप उसी में काम करो, लेकिन उनका जो रिजर्व फॉरेस्ट है, उसके ऊपर आपका कोई अधिकार नहीं है। यह मैंने नहीं किया, यह वर्ष 1952 में कांग्रेस की आपकी सरकार थी, उसने किस तरह से फॉरेस्ट राइट्स, जिसकी आप बात लेकर आ रहे हो, खान, खनिज, सम्पदा, कल्टिवेशन, मैं उसकी बात कर रहा हूँ कि किस तरह हुआ।

          तीसरा, जो है, वह फ्री गेजिंग है, आपको पता है कि हम यहाँ जितने भी मेंबर ऑफ पार्लियामेंट बैठे हैं, सभी जगह चरागाह के लिए जगह निर्धारित है। जितने भी गाँव हैं, इस देश में कोई ऐसा गाँव नहीं है, जहाँ वह जमीन निर्धारित नहीं है, वह आज भी निर्धारित है। सबसे मुश्किल काम है उस लैंड को ट्रांसफर करना और वह लैंड ट्रांसफर तभी होगी, जब उसी पंचायत में या उसी जगह पर हम कहीं दूसरी लैंड दे देंगे। यह नहीं है कि सरकार उस जमीन को ले लेगी, क्योंकि उनको गाय, भैंस, भेड़, बकरी आदि को खिलाने की आवश्यकता है। वह सबसे मुश्किल काम है। यह कहा कः “Free grazing of cattle in the forest was there in the old policy whereas the new policy has brought it under control.”             अब आप पूछकर जाइए। पहले यह था कि जहाँ जंगल, झाड़ आदि है, वहाँ आप खिलाते रहिए, लेकिन जो वर्ष 1952 की न्यू पॉलिसी बनी, उसने उस अधिकार को, ट्राइबल किस तरह से मिलिटेन्ट हुए, किस तरह से नॉर्थ-ईस्ट अपने आपको व­ााॉ तक इस देश का पार्ट नहीं मान पाया। इस तरह के मूवमेन्ट पैदा हुए, उसमें कौन-कौन सी पॉलिसी जिम्मेदार हैं, क्योंकि कांग्रेस का होता है कि कोई चीज खत्म हो गई, आप समझिए कि जब इसके ऊपर समस्या आयी तो एक ढेबर कमेटी बन गयी। ढेबर कमेटी हो गई तो बलवंत राय मेहता की कमेटी बन गई। बलवंत राय मेहता कमेटी से पिन्ड छूटा तो वेंकटचलैया कमेटी बन गई। वेंकटचलैया कमेटी से पीछा छुड़ा तो कोई एक और कमेटी बन गई। इस तरह की कमेटियाँ बनाने का खेल कांग्रेस हमेशा करती रहती है। इसके बाद चौथा यह थाः  “The old policy did not touch the private forests of the tribals.  The new policy has placed restrictions to them.”             जो प्राइवेट फॉरेस्ट है, यह ठीक है कि यदि हम लोग भी पेड़-पौधे लगाते हैं, यदि उसको काटने की आवश्यकता पड़ती है तो हम लोगों को भी फॉरेस्ट डिपार्टमेंट से उसकी आवश्यकता होती है कि हम उसे काटें या न काटें। आपने पूरा का पूरा रिस्ट्रिक्ट कर दिया कि आप अब उसको कुछ नहीं कर सकते हो और वहाँ, मैं आपको बताऊँ कि ट्राइबल की एक ऐसी संस्कृति है, जिस संस्कृति के न­ष्ट होने के लिए मैंने आपको बताया कि पूरा का पूरा कन्वर्शन हो रहा है और वह संस्कृति को न­ष्ट कर रहा है। ट्राइबल उन्हें पूजते हैं, क्योंकि मैं भी उस इलाके से आता हूँ, पेड़ उनके लिए भगवान की तरह हैं। आपने ठेकेदार को वहाँ डाल दिया। यह काम वह ठेकेदार कर रहा है, जो ट्राइबल नहीं है, जो बाहर का आदमी है। बाहर का आदमी बिचौलिया बनकर यह काम करता था तो बाहर के कान्ट्रेक्टर को रोकने के बदले उससे पैसा लेकर, उससे करप्शन करके आपने पूरे रूल को ही बदल दिया। यह काम आपने किया। पाँचवां जो सबसे बड़ा किया कः “The new policy made one important concession. It admitted that while it was emphatically opposed to shifting cultivation, persuasive and not coercive measures should be used in a sort of missionary, rather in an authoritarian manner to attempt to wean the tribals form their traditional method”             आप उसको क्या कर रहे हैं, आप उसको कह रहे हैं कि आप कल्टिवेशन की तरफ चले जाओ। आप यह काम मत कीजिए, वह काम मत कीजिए, पूजा मत कीजिए, आप पढ़ाई की तरफ चले जाओ। आप यदि इस तरह से रिस्ट्रिक्शन डालेंगे तो हालत कितनी खराब होगी। उसका ही यह सब नतीजा है कि आज भी वह इलाका डेवलप नहीं हुआ है। इसके बाद वहाँ बड़ा आन्दोलन हो गया, चीजें हो गईं, लोगों को लगा कि अब इसको संभाल पाना बहुत मुश्किल है, कहीं एक अलग राज्य की माँग होने लगी, सिक्स्थ शेडय़ूल के और भी एरिया की माँग होने लगी, तो एक ढेबर कमेटी बन गई। ढेबर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट दी। जब ढेबर कमेटी की रिपोर्ट से आदमी संतु­ष्ट नहीं हुआ तो मैं आपको बताऊँ कि एक बलवंत राय कमेटी बनी। बलवंत राय कमेटी को ट्राइबल एरिया के लिए कैसे डेवलपमेंट होगा, इसके लिए कहा गया कि आप रिकमंडेशन दीजिए। आज तक बलवंत राय कमेटी की रिकमंडेशंस इम्प्लीमेंट ही नहीं हो पायीं। उसने पहली रिकमंडेशन क्या की, उसने कहा कः  “Like other blocks, Budget for development work in tribal areas should be for six years.”             चुनाव कितने सालों के लिए? पांच सालों के लिए। स्टेट का चुनाव अलग होता है, डिस्ट्रिक्ट काउंसिल का चुनाव अलग होता है। मैं उस विषय पर जाऊंगा कि डिस्ट्रिक्ट काउंसिल को बीच में ही भंग भी किया जा सकता है, यदि वह राज्य के हिसाब से नहीं चल सकता। क्या आज तक ब्लॉक के लेवल पर कोई बजट बन पाया? उन्होंने कहा कि ट्राइबल एरिया के डेवलपमेंट की इकाई आप ब्लॉक को मानिए। पर, आप उसके लिए ब्लॉक को नहीं मानते, आप तो डिस्ट्रिक्ट काउंसिल को एक ईकाई मानते हैं। जैसा मैंने कहा कि सिचुएशन यह है कि तेरहवें वित्त आयोग का, चौदहवें वित्त आयोग का पैसा वहां नहीं जा पा रहा है। मनरेगा जैसी योजनाएं वहां लागू करने में ढेर सारी समस्याएं आ रही हैं। यह वर्ष 1981 की बलवंत राय मेहता कमेटी की रिपोर्ट है। हम लोग यहां बलवंत राय मेहता रोड पढ़ते थे तो मुझे लगता था कि उनका क्या कंट्रीब्यूशन है। अब मुझे समझ में आ रहा है कि बलवंत राय मेहता ने किस तरह की रिपोर्ट दी थी।

   

दूसरी उन्होंने रिपोर्ट दी -

“The right type of personnel with sympathy and understanding of the tribal people should be selected, preferably local people.”             लेकिन क्या हुआ? नेपोटिज्म हावी हो गया। वहां इलेक्शन नहीं हो रहे हैं। आप समझिए कि एक तरह से वहां नॉमिनेशन की स्थिति है। राजा चले गए, पर आप समझिए कि कुछ जो पैसे वाले लोग हैं, ठेकेदार टाइप लोग हैं, वे वहां पर हैं।

          अभी संयोग से अरुणाचल के पूर्व चीफ मिनिस्टर का लेटर जो सर्कुलेट हो रहा है, वह सही है या गलत है, मैं उस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। लेकिन, यदि वह सही है तो वह जो दिखा रहा है, ठीक यही स्थिति पूरे-के-पूरे नॉर्थ-ईस्ट में है।

श्री विनसेंट एच. पाला (शिलौंग) : पर अरुणाचल प्रदेश तो सिक्स्थ शेडय़ूल में नहीं है।

श्री निशिकान्त दुबे : मैं नॉर्थ-ईस्ट की बात कर रहा हूं। मुझे पता है कि अरुणाचल प्रदेश सिक्स्थ शेडय़ूल में नहीं है। लेकिन, पूरे नॉर्थ-ईस्ट एरिया के बारे में, आठ बहनों के बारे में जो कहानी चल रही है, वह कहानी तो उसी तरह की है।

          मैंने तो जे.बी. पटनायक को कोट किया। वे तो सिक्स्थ शेडय़ूल के लिए ही कह रहे थे। वे तो कह रहे थे कि पूरा पैसा करप्शन के कारण ड्रेन में जा रहा है।

          बलवंत राय मेहता ने तीसरा रिकमेंडेशन किया -

“the recruited personnel should acquire knowledge of the dialects, customs and ways of life of the people among whom they work.”             ऐसा ही हो रहा है। बाहर के लोग जा रहे हैं। बाहर के लोगों को गांव के बारे में क्या पता? उन्हें ट्राइबल कस्टम्स के बारे में क्या पता?

          मैं अपनी बात कह रहा हूं। मुझे मेम्बर ऑफ पार्लियामेंट बने हुए अब आठ साल हो गए हैं। यदि मुझे आज भी कह दें कि पूरा-का-पूरा मुझे ट्राइबल का कस्टम पता है, तो मुझे यह नहीं पता। वे किस तरह से शादी करते हैं, किस तरह से पूजा-पाठ की पद्धति होगी, कौन-सी चीज़ें होंगी, सरना पद्धति में करेंगे, मुझे नहीं पता। लेकिन, यह पूरा-का-पूरा जो नॉर्थ-ईस्ट में कन्वर्ज़न है।...(व्यवधान)

           मेरे यहां भी ऐसे ब्लॉक हैं। मेरे यहां चार ब्लॉक्स शेडय़ूल-फाइव के ब्लॉक्स हैं - जरमुंडी, सरैया हाट, बोआरीजोर और सुन्दर पहाड़ी। जहां से मैं सांसद हूं, वहां ये चार शेडय़ूल-फाइव के ब्लॉक्स हैं। आप समझिए कि मुझे भी इनके कस्टम्स के बारे में नहीं पता। लेकिन, आप समझिए कि यह पूरा कन्वर्जन चलेगा। जिस तरह से यह चल रहा है, उसके कारण जो बाहर के लोग आ रहे हैं, ये बाहर के लोग उनकी पूरी परम्परा को न­ष्ट  कर रहे हैं, पूरी संस्कृति को न­ष्ट  कर रहे हैं।

          महोदय, संयोग से यहांथावर चंद गहलोत साहब बैठे हुए हैं। इनके मंत्रालय में एक अच्छी बात है कि यदि शेडय़ूल्ड कास्ट अपना धर्म परिवर्तन कर लेता है तो वह रिज़र्वेशन का हक़दार नहीं होता है। उसी तरह से, शेडय़ूल्ड ट्राइब्स में भी यह परंपरा होनी चाहिए, चूंकि आपके ही विभाग का, पहले शेडय़ूल्ड कास्ट डिपार्टमेंट का यह नियम था कि जो भी शेडय़ूल्ड ट्राइब कन्वर्जन कर लेंगे, उन्हें रिज़र्वेशन नहीं मिलेगा। जैसे ही यह काम होगा, उनकी सभ्यता और संस्कृति बच जाएगी। सरना धर्म की संस्कृति बच जाएगी। गहलोत जी संयोग से यहां बैठे हुए हैं। महोदय, मैं आपके माध्यम से भारत सरकार से यह मांग करता हूं कि इस तरह का बिल उन्हें लाना चाहिए।

          उसी तरह से, उन्होंने कहा -

“Efforts should be made to induce the people in tribal areas to take up settled cultivation wherever possible”             उन्होंने कहा कि उन्हें खेती की तरफ एक्टिव कीजिए। जहां-जहां सरकारी ज़मीनें हैं, चीज़ें हैं, उस तरफ एक्टिव कीजिए। ब्रिटिश सरकार की पूरी-की-पूरी ज़मीन स्टेट में निहित हुई। उसके बाद फिर उस पर प्रश्न चिन्ह लगा है कि वह वर्ष 1935 के कानून के खिलाफ़ है। उसके लिए भी शेडय़ूल-सिक्स्थ एरिया वाले बहुत परेशान हो रहे हैं। लेकिन, यह कहा गया कि जो खेती करना चाहते हैं और जो बगल में कहीं बसे हुए हैं, उन्हें आप ज़गह दीजिए। आप उन्हें कॉन्ट्रैक्ट के बेसिस पर दे दीजिए। वहां पर सरकारी ज़मीनें हैं, अन्य चीज़ें हैं। लेकिन, वह आज तक नहीं हुआ।

          उसके बाद उन्होंने कहा-

“Supply of necessary agricultural credit should be stressed”             मैं फाइनैंस कमेटी का आठ साल से मेम्बर हूं। जब श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने बैंकों का नेशनलाइजेशन किया, इसका एक ही कारण था और उन्होंने कहा था कि हम बैंकों का नेशनलाइजेशन इसलिए कर रहे हैं कि जो पूरा का पूरा पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर भारत है, चाहे बिहार है, चाहे उत्तर प्रदेश है, चाहे मेरा राज्य झारखंड है, चाहे पश्चिम बंगाल, चाहे असम है, चाहे मिजोरम है, चाहे नागालैंड है और चाहे मेघालय है, इन सब में जो क्रेडिट डिपोजिट (सीडी) रेशियो है, वह लो है। यह कितना लो है, यह 30 से 35 पर्सेंट है। हम लोगों को इसे 70, 75 तथा 80 पर्सेंट से आगे ले जाना है। वर्ष 1969 का यह नारा है, क्योंकि कांग्रेस हमेशा भारतीय जनता पार्टी के ऊपर यह क्वैश्चन करती रहती है कि आपने यह कह दिया, यह पूरा हुआ कि नहीं हुआ, यह छह महीने में पूरा नहीं किया, दो साल में हिसाब लेना शुरू कर देते हैं।

          आपने वर्ष 1969 में बैंकों को नेशनलाइज़ किया। आज हम कितने सालों के बाद बात कर रहे हैं? आज हम लगभग 48‑49 साल के बाद बात कर रहे हैं। आज भी पूरे के पूरे नॉर्थ‑ईस्ट का, पूरे के पूरे ईस्टर्न इंडिया इंक्लूडिंग झारखंड का हमारा सीडी रेशियो 35‑36 पर्सेंट पर ही है। तमिलनाडु में 100 पर्सेंट से ऊपर, चंडीगढ़ में 100 पर्सेंट से ऊपर, दिल्ली में लगभग 90 पर्सेंट के आसपास है, लेकिन जहां तक उत्तर प्रदेश का सवाल है, बिहार का सवाल है, पश्चिम बंगाल का सवाल है, पैसा हमारा है, हम पैसा देते हैं। क्रेडिट डिपोजिट रेशियो का मतलब यह है कि हम बैंक में जो पैसा जमा कर रहे हैं, यदि हमारे लोग 100 रुपये जमा कर रहे हैं तो उसका मात्र 30 से 35 रुपये ही उस इलाके में खर्च हो रहा है। इसका मानक है कि हमने जितना पैसा लिया है, उतना पैसा ही खर्च करना है। यदि आपने 100 रुपये लिया है तो 100 रुपये ही देना है, लेकिन उन्होंने जो कहा, वर्ष 1980‑81 की रिपोर्ट आपके सामने है। नॉर्थ‑ईस्ट में बैंक की पर्याप्त शाखाएं नहीं हैं, नॉर्थ‑ईस्ट की यह हालत है कि आज भी ग्रामीण एरिया में बैंक की शाखाएं नहीं हैं। अभी संयोग से मेघालय और त्रिपुरा के हमारे दो माननीय सदस्य बैठे हुए हैं। आप जानते है कि वहां की क्या हालत हैं।

          इसी तरह से programmes like irrigation, आप कहते हैं कि वहां पूरा का पूरा नदी है। It further says:

“Reclamation, communication and soil conservation should be taken up to provide employment to the unemployed or under-employed tribals.”    वहां इरिगेशन की कोई सुविधा ही नहीं है, खेती की हालत बहुत ही खराब है। उसी तरह से जो रीक्लेम करना है, आप समझिए कि बंजर जमीन को उपजाऊ बनाना है। जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए कोई बोर्ड नहीं हैं। इस बारे में सरकार एक्टिव ही नहीं है। शेडयूल्ड 6 का एरिया तो और भी एक्टिव नहीं है। वहां कम्युनिकेशन का तो बुरा हाल है। नॉर्थ‑ईस्ट में तो और भी बुरा हाल है। जिंदगी भर नॉर्थ‑ईस्ट का पूरा का पूरा मालिकाना हक कांग्रेस के पास ही रहा है। आप समझ सकते हैं कि वहां पर कम्युनिकेशन की क्या हालत है।...(व्यवधान) मैं बिल पर ही तो बोल रहा हूं।  आपने आज तक वहां पर क्या नहीं किया और उसके कारण वहां पर कैसी समस्या है। वहां पर आपका टेलिफोन कम्युनिकेशन लगेगा ही नहीं, वहां पर यूएसओ फंड ऐसे ही पड़ा रहा, ऑप्टिकल फाइबर बिछाने की आवश्यकता है। माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी की जब सरकार आई तो आपको पता है कि वर्ष 2014 में कैबिनेट के माध्यम नॉर्थ‑ईस्ट में टेंडर हुआ है और फोन लगना शुरू हुआ है। अब आपके यहां बीएसएनएल अपना टॉवर लगाएगी। प्राइवेट कंपनियां आपके यहाँ टॉवर लगाने के लिए तैयार नहीं हैं। वहां पर कम्युनिकेशन का इतना बुरा हाल है।
          इसके बाद वहां एजुकेटेड और अन‑एजुकेटेड के बीच सिस्टम ऑफ एजुकेशन डेवलप करना है। शिलांग में एक यूनिवर्सिटी खुल गयी और आप समझिए कि वह फेक सर्टिफिकेट बॉट रही है। चेयरमैन को पकड़ने के लिए गवर्नर श्री राजखोवा साहब पीछे पड़े हुए हैं। इसका कारण यही है कि केवल टैक्स इनसेंटिव लेने के लिए, नॉर्थ‑ईस्ट के लोगों को एक्सपल्वायट करने के अलावा आप लोगों ने कोई रास्ता नहीं पकड़ा है। हमको नहीं लगता है कि इस तरह के बिल लाने से बहुत ज्याद डेवलपमेंट हो सकता है।
          मेरा यह कहना है कि श्री विनसेंट एच. पाला को सबसे पहले एक कंप्रिहेनसिव बिल लेकर आना चाहिए। कंप्रिहेनसिव बिल वैसी हो, फंक्शनिंग ऑफ डिस्ट्रिक्ट काउंसिल का जो माहौल बिगड़ा हुआ है, एक दूसरे के ऊपर फेथ नहीं है, स्टेट के ऊपर फेथ नहीं है, सेंटर  के ऊपर फेथ नहीं है और स्टेट के डिस्ट्रिक्ट काउंसिल के ऊपर फेथ नहीं है। इसका पार्लियामेंट्री प्रोसेस कैसे अच्छा हो, पहले उसका माहौल अच्छा कैसे बनेगा, माहौल के लिए लेजिस्लेशन में क्या चेंजेंज हो सकते हैं। सबसे पहले इसमें चेंज आना चाहिए। जो वर्किंग ईयर है, समय पर काम हो, जितना भी काम है, वह टाइम बाउंड हो। मैं यह कह रहा हूं कि क्या-क्या चेंजेज डिस्ट्रिक्ट काउंसिल में होने चाहिए, जिससे कि यह आगे बढ़े। इस देश में यदि आप कोई कानून बना देते हैं तो उस कानून को वापस लेने की कोई स्थिति आपकी नहीं होती है। मेरा यह कहना है कि टाइम बाउंड मैनर में काम हो।
जैसा कि मैंने कहा कि 1,600 करोड़ रुपये डोनर मिनिस्ट्री में पड़ा हुआ है, कोई खर्च करने को तैयार नहीं है। खर्च करने को क्यों तैयार नहीं है, क्योंकि डीपीआर बनने में ही वक्त लग जाता है। फिर यह तय नहीं है कि कौन सा काम केन्द्र सरकार करेगी, कौन सा काम राज्य सरकार करेगी, कौन सा काम डिस्ट्रिक्ट काउंसिल करेगी। डिस्ट्रिक्ट काउंसिल के ऊपर जो-जो काम हैं, उनका एक समय निर्धारित होना चाहिए कि यह काम 6 महीने के अंदर होगा। जैसा कि आपको पता है कि रियल्टी सैक्टर का बिल वेंकैय्या नायड़ू जी ने यहां पास किया। आपको पता है कि यदि हमने अपने मकान को बुक किया, तो पांच साल के बाद मकान मिलेगा या दस साल के बाद मिलेगा, उसकी कोई समय-सीमा ही निर्धारित नहीं थी। सारे केस में जा रहे थे। अब उन्होंने तय कर दिया कि उसका एन्वायर्नमेंट क्लियरेंस कितने दिन में मिलेगा, लैंड की पोजिशनिंग कितने दिन में मिलेगी, उसकी क्रेडिट गारंटी कितने दिन में मिलेगी, उसका सप्लाई साइज कितना होगा, डिमांड साइज कितना होगा, तो एक कानून डिस्ट्रिक्ट काउंसिल में बनाने की आवश्यकता है।
          डिस्ट्रिक्ट काउंसिल का क्या रोल होगा, स्टेट काउंसिल का क्या रोल होगा और सेंटर का क्या रोल होगा, वह देखने की आवश्यकता है। जो वहां समस्या है, जिसके लिए ये लेकर आए कि 30 से ज्यादा मेंबर्स ढूंढ़ रहे हैं। मैं मेघालय की बात कर रहा हूं कि खासी हिल में 29 लोग इलेक्टेड हैं, 1 नॉमिनेटेड है, गारो में 29 लोग इलेक्टेड हैं, 1 नॉमिनेटेड है, लेकिन जो जयंतिया हिल है, उसमें 16 लोग इलेक्टेड हैं और 3 नॉमिनेटेड हैं। मुझे तो यह समझ में नहीं आया कि यह जो नॉमिनेशन की पद्धति है, वह कैसे निर्धारित हुई। जहां 30 लोगों की डिस्ट्रिक्ट काउंसिल है, वहां 1 आदमी नॉमिनेट हो रहा है और जहां 19 लोगों की डिस्ट्रिक्ट काउंसिल है, वहां 3 लोग नॉमिनेट हो रहे हैं। इसके बारे में भी बहुत कुछ सोचने की आवश्यकता है।
          इसमें कौन नॉमिनेट करेगा और किस तरह के लोग नॉमिनेट होंगे, उसका कोई क्राइटेरिया फिक्स नहीं है। मेंबर ऑफ पार्लियामेंट कौन बनेगा, एमएलए कौन बनेगा, उसका एक क्राइटेरिया संविधान में फिक्स कर रखा है, लेकिन आपके यहां कौन सदस्य होगा, इसके नॉमिनेशन का कोई क्राइटेरिया ही फिक्स नहीं है।
          दूसरा, नामिनेट कौन करेगा, क्योंकि आर्टिकल 275 यह अधिकार गवर्नर का देता है। आर्टिकल 275 यहां के पूरे विकास के लिए अधिकार गवर्नर को देता है। यहां कई राज्यों ने यह तय कर दिया कि गवर्नर काउंसिल ऑफ मिनिस्टर से पूछकर यह काम करेगा। जो नॉमिनेशन की पद्धति है, कभी-कभी यह बहुत बड़ा सवाल हो जाता है। चंडीगढ़ बगल में है। चंडीगढ़ में हमेशा इंबैलेंस हो जाता है। यहां इंबैलेंस होने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। गवर्नर क्या कर सकते हैं। चण्डीगढ़ में जो नॉमिनेटेड क्राइटेरिया है, वह बहुत ज्यादा है। मान लीजिए कि इलेक्शन में आप जीत भी गए, पिछली बार जब यूपीए की सरकार थी, तो उस समय हम लोग जीत गए, भारतीय जनता पार्टी के ज्यादा से ज्यादा पार्षद जीत गए, तो लगा कि हम लोग वहां शासन चलाएंगे, लेकिन 50 पर्सेंट के आसपास नॉमिनेटेड थे, जो कि सेंट्रल गवर्नमेंट नॉमिनेट करती थी। उन्होंने अपने सारे लोगों को नॉमिनेट कर दिया और हम लोग सरकार नहीं बना पाये। इस तरह की स्थिति है। इसमें क्राइटेरिया फिक्स करने की आवश्यकता है।
          इसके बाद, यह आता है कि कोई डीनॉमिनेट होगा या नहीं। यदि एक मेंबर नॉमिनेट होगा, जैसे झारखंड असेंबली में एंग्लो-इंडियन नॉमिनेट होते हैं, लेकिन अब ऐसा हो गया है कि झारखंड जैसे राज्य में एंग्लो-इंडियन मिलते ही नहीं हैं। जब से झारखंड राज्य बना है, तो पहले उनके पिता जी एमएलए थे और अब उनके बेटे एमएलए हैं। सरकार कोई भी बने, वे लगातार 17, 18 साल से एमएलए बने हुए हैं। इस तरह की सिचुएशन है।
          इसके बाद, यदि गवर्नर नॉमिनेट करते हैं, तो गवर्नर को नॉमिनेट करने के लिए किस तरह की कमेटी बननी चाहिए। हमने देखा है कि सिक्सथ शिडय़ूल उसके ट्रेडिशन और कल्चर को प्रिजर्व करने  लिए बना है, उसकी संस्कृति को रिजर्व करने के लिए रखा है। उसका एक सलाहकार बोर्ड होना चाहिए जो नॉमिनेशन करे, यह होगा। फंक्शन  ऑफ डिस्ट्रिक्ट काऊन्सिल बाई गवर्नर, डिजोल्यूशन ऑफ पॉवर, इसमें स्टेट का क्या रोल होगा? मैं बार-बार इसको कह रहा हूं कि इसे लिखत-पढ़त में कर लीजिए। यदि इसे लिखत पढ़त में नहीं करेंगे तो स्टेट कोई दूसरा चीज इम्लीमेंट करना चाहता है लेकिन डिस्ट्रिक्ट काऊन्सिल कोई दूसरा चीज इम्पलीमेंट करना चाहता है। जब डिस्ट्रिक्ट काऊन्सिल उसकी बात नहीं मानती तो गवर्नर के माध्यम से उसे डिजोल्व कर देते हैं और डिजोल्व करने के बाद कितने दिनों के बाद इलेक्शन होगा, यह भी निर्धारित नहीं है। किसी-किसी डिस्ट्रिक्ट कौन्सिल  का छह महीने तक चुनाव ही न हो, साल भर तक चुनाव ही न हो, दो साल तक चुनाव न हो, क्योंकि यह लिखत-पढ़त में नहीं है। इस पॉवर के लिए एक कप्रिहेन्सिव बिल की आवश्यकता है। देश में हमने एंटी डिफेक्शन लॉ के ऊपर बहुत जोर दिया है कि एंटी डिफेक्शन लॉ होना चाहिए, नहीं तो आयाराम गयाराम, दिन में किसी पार्टी में और रात में किसी पार्टी में। लोक सभा में भी ऐसा होता था और विधान सभा में भी ऐसा होता था।
सिक्सथ शिडय़ूल में कोई भी एंटी डिफेक्शन लॉ नहीं है। एंटी डिफेक्शन लॉ कैसे लागू होगा, इसके लिए एक कानून की आवश्यकता है। इसके बाद ऑडिट ऑफ डिस्ट्रिक्ट फंड सबसे इम्पोर्टेंट है। करप्शन की बात जे.बी.पटनायक ने की। आपको पता है, यदि मैं मंत्रालय में जाता  हूं तो मंत्रियों को देखता हूं कि वह किसी न किसी आदमी के माध्यम से करते है क्योंकि 90: 10 का रेशियो है। यहां केन्द्रीय मंत्री बैठे हुए हैं, मुझे नहीं पता, इनका क्या अनुभव है। यह हो सकता है कि हमारी सरकार आने के बाद न खाएंगे न खाने देंगे और करप्शन पर पूरा कंट्रोल होने की बात हो रही है, इस तरह के दलालों, बिचौलियों और ठेकेदार का सामना हमारी सरकार से कम हो रहा होगा। लेकिन जो इसके पहले की सरकारें थीं, उसमें ठेकेदार और बिचौलिये काम करता था जिसका कारण यह है कि उसमें ऑडिट नहीं है। सी एंड एजी का पूरा अधिकार नहीं है। ऑडिट की मैथोडोलोजी कैसे हो उसके बारे में सोचना चाहिए, उसके बाद, पॉवर और फंक्शन ऑफ हेडमैन का है, जो सबसे इम्पोर्टेंट है।
          सिक्सथ शिडय़ूल में डिस्ट्रिक्ट काऊन्सिल हो गई, इलेक्टेड बॉडी हो गई। आदिवासी परंपरा की बात करते है, आदिवासी संस्कृति की बात करते हैं प्रधानी सिस्टम सबसे इम्पोर्टेंट फैक्टर है। प्रधानी सिस्टम को खत्म करेंगे तो पूरा का पूरा ट्राइबल कल्चर को समाप्त कर देंगे। इसका पॉवर और फंक्शन, चीफ और हेडमैन गांव का होगा। उसका पॉवर क्या होगा, सेलेक्शन कैसे होगा। यदि प्रधान की डेथ हो जाती है तो दूसरा प्रधानी सिस्टम में क्या होगा? उसकी फैमिली से कोई आएगा, फैमिली में चार भाई है, उनका क्या होगा या दो भाई हैं तो क्या होगा? इसमें कोई क्लेरिटी नहीं है। इस कारण से आज जो सलेक्शन होता है, आज जो सूट करता है वही आप करते हैं, उसके बारे में होना चाहिए। मैनेजमेंट, प्राइमरी एजुकेशन को कैसे मैनेज करेंगे। जो टारगेट आपको बताया, आप टारगेट फिक्स करेंगे कि इतने दिनों में सभी बच्चों को राईट टू एजुकेशन होगा, राईट टू एजुकेशन लागू करना है, मिड डे मील लागू करना है, आंगनवाड़ी लागू करना है, इसे कैसे लागू करना है? नार्थ ईस्ट के लड़के और लड़कियां कैसे अपने पैरों पर खड़े हों, उनकी पढ़ाई हो जाए, बेसिक इनकम हो जाए।
          दूसरा, मैंने फॉरेस्ट राइट की बात की। कांग्रेस की सरकार ने इसे वापस ले लिया जिस कारण से ट्राइबल्स में बहुत ज्यादा समस्या हो गई। आप उसे खान और खनिज तक ले जा रहे हैं। खान और खनिज एक अलग चीज है, उसके लिए एक अलग लेजिसलेशन लाने की आवश्यकता है। फॉरेस्ट उनका अधिकार है, जिसके कारण हमारे बाप-दादा जिन्दगी भर पढ़ते रहे, उस फॉरेस्ट में हमारा क्या अधिकार होना चाहिए, हम किस तरह के अधिकार को बढ़ाएंगे। इन्कवायरी का पॉवर है, करप्शन में जेल कौन देगा, आप किस तरह के काम को आगे बढ़ाएंगे, आपके यहां इन्कवायरी की पॉवर नहीं है। आपने सिस्टम डेवलप नहीं किया है, विजिलेंस का सिस्टम किसी भी डिस्ट्रिक्ट में आज तक नहीं देखा है। इंक्वायरी के सिस्टम को आगे ले जाना है, क्योंकि पूरे के पूरे नार्थ ईस्ट की इमेज चौपट हो रही है। मान लीजिए जैसे त्रिपुरा है, यह अपने आपको कटा हुआ महसूस करता है। यदि इस तरह का करप्शन नहीं होता, आपके इलाके में नहीं होता तो नार्थ ईस्ट इस देश का सबसे बड़ा हब होता। भारत सरकार पूरी दुनिया में मार्किट तलाश रही है।
 माननीय नेहरु जी की बहुत इच्छा थी कि नार्थ ईस्ट मिडल हो जाए। 1960-62 में उनकी परियोजना था, जिसे अब माननीय नरेन्द्र मोदी जी और माननीय गडकरी जी आगे बढ़ा रहे हैं। उनका कहना था कि एशिया की मार्किट को यदि कंट्रोल करना है, तो रोड कनैक्टिविटी देनी पड़ेगी। रोड कनैक्टिविटी कैसे होगी, यदि नार्थ ईस्ट में यदि चार या आठ लेन का रोड बना देते हैं तो सबसे पहले बर्मा चले जाते। बर्मा से थाइलैंड चले जाते, सिंगापुर चले जाते, मलेशिया चले जाते, इण्डोनेशिया चले जाते और वहां से मनीला तक चले जाते। यह माननीय नेहरु जी की 1960-62 में कल्पना थी। बर्मा तक जा रहे थे, बर्मा से इसे आगे बढ़ाने की बात थी। सुमात्रा द्वीप, बाली द्वीप, रामायण और महाभारत की बात कर रहे हैं, जो बातें रुक गई थी, उसे मॉडर्नाइज करने की आवश्यकता थी। लेकिन हमने क्या किया? इस करप्शन, नेपोटिज्म, सिक्स्थ शैडय़ल ने, कांग्रेस की मिसरूलिंग से हालत यह कर दी कि वहां लोग एक छोटे से रोड के लिए परेशान हैं। आंगनवाड़ी बनाने के लिए परेशान हैं।
          महोदय, वहाँ पूरी की पूरी पनबिजली परियोजना…* अब दिवंगत हो गए हैं, इसलिए बोलना उचित नहीं है। लाख रुपया, दो इतना करोड़ रुपया दो, किस तरह उन्होंने प्रति मेगावाट पानी बेचने का काम किया। इस तरह की सिचुएशन में वहां के लोग अपने आपको एलूफ पा रहे हैं। वहां के लोग अपने आपको देश के साथ जोड़ने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। इंक्वायरी सिस्टम कैसा हो? हम इंक्वायरी सिस्टम को कैसे आगे बढ़ा सकते हैं, इसकी आवश्यकता देश महसूस कर रहा था।
          मैं केवल इतना ही कहूंगा यदि इन चीजों को आगे नहीं बढाएंगे, यदि ट्राइबल लोगों के लिए सिक्स्थ शैडय़ूल के एरिया के लिए, नार्थ ईस्ट के डैवलपमेंट के लिए नहीं चेते तो मैं कह सकता हूं जो रामधारी सिंह दिनकर जी ने कहा था -
सबसे विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा तैंतीस कोटि हित सिंहासन तैयार करो।
अभिष्­ाॊक आज राजा का नहीं प्रजा का है तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।
आरती लिए तूं किसे ढूंढता है मूर्ख, मंदिरों राजप्रसादों में तहखानों में।
देवता कहीं सड़कों पर मिट्टी तोड़ रहे देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।
फावड़े और हल राजदंड बनने को है धुसरता सोने से सिंगार सजाती है।
दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
    
यदि आप नहीं करेंगे तो जनता आपको उखाड़ फेंकेगी। इसी तरह से नार्थ ईस्ट हमेशा परेशानी में रहेगा, इसलिए बड़े काप्रिहेन्सिव लॉ की आवश्यकता है। इसके विकास के लिए हम सब बड़ी पार्टियां मिल बैठकर फैसला करेंगे तो निश्चित तौर पर नार्थ ईस्ट का विकास कर पाएंगे। नार्थ ईस्ट का विकास इस देश का विकास है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं, जय हिंद, जय भारत।
 
श्री प्रहलाद सिंह पटेल (दमोह) : उपाध्यक्ष महोदय, विनसेंट एच. पाला जी ने जो विधेयक प्रस्तुत किया है, मैं उसका समर्थन तो नहीं कर सकता, लेकिन एक बात जरूर कह सकता हूं कि कम से कम एक विषय ...(व्यवधान) मैं अभी वही बात कहने वाला हूं। ...(व्यवधान) एक चर्चा, जिससे लोग बचते थे, जिसके बारे में बोलने से कतराते थे, जैसे निशिकांत जी कह रहे थे कि इस देश में कोई कानून बन गया, तो लोग शायद उसकी समीक्षा का नैतिक साहस करने में हिचकिचाते हैं। एक बार ईमानदारी के साथ हमें इससे बाहर आना पड़ेगा। हमें इस बात की भी चर्चा सदन में करनी चाहिए और शायद प्राइवेट मैम्बर बिल इसी बात की इजाज़त देता है कि हम एक नागिरक होने के नाते अपनी बात को ईमानदारी के साथ रखें, चाहे कोई सहमत हो या न हो।
          उपाध्यक्ष महोदय, मैं पौने दो साल पहले मणिपुर में प्रभारी बनकर गया। उससे पहले मैं वर्ष 1999 में नेहरू युवा केन्द्र का महानिदेशक था। आप जानते हैं कि उस वक्त नार्थ ईस्ट में इन्सर्जेंसी किस हालत में थी। उस समय मुझे एक अधिकारी के रूप में, महानिदेशक के रूप में नार्थ ईस्ट में जाने का मौका मिला। लेकिन उस समय कार्यालय काम नहीं करते थे। आप गुवाहटी से आगे नहीं जा सकते थे। अगर आप किसी अधिकारी के खिलाफ कोई कार्रवाई करना चाहें, तो वह कहता था आप मेरे खिलाफ कार्रवाई कर दीजिए, मैं कम से कम वापस तो चला जाऊंगा। इन बातों को भुलाया नहीं जा सकता। ...(व्यवधान) यह तकलीफ आपकी हो सकती है।
          अब मैं यहीं से शुरू करता हूं, जैसा निशिकांत जी ने कहा कि सिक्किम अब आपके पास नहीं है। अरुणाचल, असम आपके पास नहीं है। नागालैंड में भी आप यह दावा नहीं कर पायेंगे। अब मणिपुर भी चला गया है। त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम का नम्बर है। इसलिए मुझे लगता है कि हमें कम से कम, अगर छठी अनुसूची हो या पांचवीं अनुसूची हो, सिर्फ नार्थ ईस्ट का सवाल नहीं है, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ ऐसे जिले हैं, क्या वास्तव में हम इसकी समीक्षा नहीं करेंगे? उन्होंने वर्ष 1952 से लेकर अब तक जितनी भी कमेटियां बनीं, उनका और जवाहर लाल नेहरू जी को उद्धृत किया। मुझे बहुत दुख के साथ कहना पड़ता है कि जब मैं मणिपुर के भूगोल को देखता हूं, मणिपुर इस देश की आजादी से पहले आजाद हुआ और वर्ष 1972 में राज्य बना। लेकिन उसके भूगोल को बदलने का काम किसने किया? मणिपुर की वह जमीन देने वाला कौन है? इस समय इस देश में लोग नहीं जागे। उस समय लोगों को यह नहीं लगा कि गलती हो रही है, क्योंकि उस समय जवाहर लाल नेहरू के वर्चस्व के सामने कोई बोलने के लिए तैयार नहीं था। 
          पाला जी, मैं आपसे कहूंगा कि जब वहां सीमा पर पोल तोड़ दिये गये थे, तो यह इश्यू मैंने संसद में उठाया था। कांग्रेस की सरकार राज्य में थी। हमें मोदी जी की सरकार को धन्यवाद देना चाहिए कि गृह मंत्रालय ने भी कार्रवाई की और विदेश मंत्रालय ने भी कार्रवाई की, तो वह चीज रुक गयी। जब निशिकांत जी कह रहे थे, तब मैं उनसे यह बात कह रहा था कि चलिए, आप रामायण के उस तथ्य को मत मानिये, आपको बहुत तकलीफ होगी, लेकिन देश जब गुलाम था, तब लोग साइकिल से थाइलैंड तक अपना कपड़ा लेकर गये हैं। क्या आप इसे स्वीकार करेंगे? उस मार्ग का महत्व तब भी था, लेकिन उसे ठीक करने का काम क्यों नहीं किया गया? यह बात क्यों पैदा की गयी? मैं नागालैंड, मेघालय की बात न करके मणिपुर की बात कर रहा हूं। नागा, कुकी आदि आपके फिफ्थ शैडय़ूल के एरिया में रहने वाले लोग हैं। जहां एडीसी इलैक्शन होते हैं, वे तो हैं, जैसे सेनापति, उखरूल आदि हैं। मुझे लगता है कि जब आप कमेटीज की बात करते हैं, तो इन पर अलगाववाद के अलावा क्या हुआ है? अगर उससे कोई लाभ मिला है, तो वह बताइये। आप जो संशोधन लेकर आये हैं, उस संशोधन से क्या चमत्कार हो जायेगा? इतना अलगाववाद, इतनी सारी परिस्थितियां हैं। आप जिस फ्रेमवर्क में कहते हैं, तो मैं कहूंगा कि चर्च ने क्या किया? अगर यह बात कही जाती है, तो अभी तीन दिन पहले एक निर्वाचित विधायक कहता है कि मेरा बर्थ सर्टिफिकेट, जो चर्च का मिलता है, वही औथेंटिक माना जाता है। क्या चर्च इस बात के लिए था?

17.00 hours           क्या आप इसे ठीक मानते हैं? एक तरफ अगर हम कह दें, तो हमारे ऊपर पूरा बवाल खड़ा हो जायेगा। वहां एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि कह रहा है कि मेरा बर्थ सर्टिफिकेट, जो चर्च से इश्यू होता है, वही औथेंटिक माना जाता है। यह आजादी के 67 साल बाद की स्थिति है।

          इसके लिए जिम्मेदार कौन है? आजाद भारत में आज तक वहां एक तंत्र नहीं खड़ा कर सके कि एक निर्वाचित संस्था, उस क्षेत्र में रहने वाले किसी व्यक्ति इस बात का सर्टिफिकेट दे सके, फिर भी आप उसे बहुत गर्व के साथ कह रहे हैं। इस व्यवस्था को ध्वस्त करने वाला कौन है? अगर इसकी कोई खिलाफत करता है तो आपको लगता है कि हम साप्रदायिक हैं, हम किसी धर्म विशे­ष का विरोध कर रहे हैं।

          मैं मणिपुर के संदर्भ में कहना चाहता हूं कि छठी अनुसूची को सब जगह मत ले जाइए, कानून की बात निशिकांत दुबे जी ने की है। वहां लोगों का धर्म परिवर्तन कर दिया गया, लेकिन उनके बीच मनमुटाव को हम रोक नहीं पाए। मणिपुर इसका उदाहरण हैं। वहां दोनों लोग एक ही धर्म को मानने वाले लोग हैं, लेकिन एक-दूसरे के चर्च में नहीं जाते हैं। दोनों की परम्पराएं अलग हैं। कुकीज में मुखिया ही सारी सम्पत्ति का राजा होता है, लेकिन जहां बाकी लोग हैं, वहां सोसाइटी उसकी ओनर होती है और जो वैली के लोग हैं, जो छठी अनुसूची से बाहर हैं, उनके लिए अलग राजस्व कानून है। जहां एक ही राज्य में तीन प्रकार की भूमि अधिकार की व्यवस्था हो, मैं समझता हूं कि क्या इस पर विचार नहीं होना चाहिए। वैली का आदमी पांचवीं और छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों में जमीन नहीं ले सकता है, वहां वह एक डिसमल जमीन नहीं खरीद सकता है, लेकिन बाकी लोग वहां आकर जमीन और सम्पत्ति खरीद सकते हैं। मैं उन टकरावों की बात कर रहा हूं कि जो परिस्थिति आपने बनाई, उससे विघटन ही हुआ। जब मणिपुर के राजा थे, उस समय किसी के बीच झगड़ा नहीं था, नागा, कुकी और मैतेयी के बीच कोई झगड़ा नहीं था। वे गर्व करते थे कि मैं मणिपुर का योद्धा हूं और वे पूरी ईमानदारी के साथ अपना काम करते थे। वहां का मुसलमान आज भी कहता है कि मैं मैतेयी पांगल हूं और उसकी अपनी अलग परिस्थितियां हैं। जब कभी आप इन बातों की चर्चा करते हैं तो समग्र नॉर्थ-ईस्ट रीजन के बारे में विचार करना चाहिए। मुझे लगता है कि यह बिल और भी ज्यादा खतरनाक है।

          उपाध्यक्ष महोदय, जब मैं पहली बार इस सदन में आया था, तब मैंने वन अधिनियम, 1980 के संशोधन विधेयक के बारे में बोला था। रिजर्व फॉरेस्ट के बारे में मेरा पहला भा­षण उसी विषय पर हुआ था। तब मैंने यह कहा था कि देश के जिन लोगों ने यह गलती की है, हमारी प्रवृत्ति और प्रकृति के खिलाफ कानून बनाकर, जो आदिवासी या उसके निकट रहने वाला जंगल पर जान देता था, आपने उनको दुश्मन बनाने का काम किया। वह कानून बनाने वाले कौन थे? क्या उनकी समीक्षा नहीं होनी चाहिए? वही गलती इस पांचवीं अनुसूची और छठी अनुसूची में है। आपने अगर कोई लाभ दे दिया होता तो ठीक था, लेकिन आज वे अलगाववाद के कारण बन गए। उनके अपने गुट बन गए, उनके अंडरग्राउण्ड ग्रुप्स बन गए और एक ग्रुप नहीं है, एक ही क्षेत्र में आपको पन्द्रह-बीस प्रकार के लोग मिल जाएंगे। उनमें से जिसकी ताकत ज्यादा होगी, वह अपनी ताकत बढ़ाने का काम करेगा। अभी 139 दिन बाद मणिपुर का ब्लॉकेड खुला है। दुख यह होता है कि उसमें सफरर कौन रहा है, क्या बाहर के लोग सफरर रहे हैं? गैस किसे नहीं मिला, डीजल-पेट्रोल किसे नहीं मिला, सामान किसे नहीं मिले? लेकिन 139 दिनों के ब्लॉकेड के बाद भी कोई उसका विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। भारत सरकार ने वहां सेना को एलर्ट कर दिया, 135 कंपनियां भेज दीं, लेकिन उसके बाद भी वहां राज्य सरकार, कांग्रेस की सरकार हिम्मत नहीं जुटा पाई और जैसे ही सरकार बदली, वह ब्लॉकेड 48 घण्टों में खुल गया। इसके लिए कौन गुनाहगार है? आप किस प्रवृत्ति को बढ़ाना चाहते हैं? क्या आप अलगाववाद की प्रवृत्ति को बढ़ाना चाहते हैं या विकास को बढ़ाना चाहते हैं?

इसीलिए मैं आपसे कह रहा हूं कि अगर विकास की परिभाषा तय करनी है तो जब तक इससे बाहर नहीं आएंगे, वह नहीं होगा। इसे ज्यादा कठोर मत बनाइए। अगर अनुच्छेद 370 जैसा तमाशा न बने तो ज्यादा अच्छा है, बल्कि समय से पहले इस महीन रेखा को कम करने का प्रयास कीजिए। वहां पानी नहीं है, बिजली नहीं है, बैंक की ब्रांच 22 किलोमीटर दूर है। एटीएम लगाने के लिए कोई बैंक तैयार नहीं है। वहां बैंक की सिंगल मेंबर ब्रांच है। वहां कम्यूनिकेशन नहीं है। वहां 22 किलोमीटर से दूर लोग बाजार करने नहीं आते हैं, वे एटीएम से पैसा निकालने आते हैं। मणिपुर का मेरा अनुभव है, मैं उन क्षेत्रों में गया हूं। सेनापति जिले में 22 किलोमीटर आदमी चलकर आता है, उसके बाद भी उसे पैसा नहीं मिलता है। क्या यह सच्चाई नहीं है कि आदिवासियों के नाम पर जो लोग ठेकेदारी कर रहे हैं, टैक्स बचाने के लिए दो प्रतिशत पैसा हम उस नागा को भेज देते हैं? वहां धन्धा करने वाला कोई और है। एक फूटी कौड़ी सरकार को नहीं मिलती है, काम वहां पर होता नहीं है और टैक्सेशन की व्यवस्था यह है कि वहां पर आदिवासी पर टैक्स नहीं है। क्या यही पांचवीं अनुसूची या छठी अनुसूची का लाभ है? किसको मिला? आपने कपड़े पहना दिये, छोटी-मोटी अंग्रेजी उनको  बोलनी आने लगी। बाकी चीजें तो आपने खत्म कर दी, लेकिन आज भी जाइए, हर कम्युनिटी का अपना डिजाइन है। उसका गमछा बता देगा, उसकी कमर का पट्टा बता देगा कि ये नागाओं में भी किस फिरके को स्वीकार करता है। लेकिन वह सिर्फ कपड़ों तक बचा है। बाकी चीजें तो आपने खत्म कर दी और इनको खत्म करने का गुनहगार कौन है? अगर वह नागा जो सूर्य का उपासक था, आज भी वह सूर्य की उपासना करने में हिचक नहीं रखता है, जैसे निशिकान्त जी कह रहे थे कि वहां पर जंगल के प्रति जो उसका रुझान था, उससे दूर उसको किसने किया? आपने अपने लाभ  के लिए, आपने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए, जिस अलगाववाद को बढ़ाने का काम किया है, उसने भी­षण संकट पैदा किया है, क्योंकि आप तो उनको भा­षा के नाम पर लड़ाते रहे, वे­षभू­षा औऱ वर्ग के नाम पर उनको लड़ाते रहे, लेकिन आज मोदी जी का जो जादू चला, उसी का परिणाम है  कि वास्तव में अब ये सब चीजें खत्म होंगी।

           जब अटल जी ने शुरुआत की थी, सारे के सारे वही काम ही तो पूरे हो रहे हैं, चाहे वह ट्राइबल्स की मिनिस्ट्री का काम हो या और अन्य कोई काम हो। आप अरुणाचल में ईटानगर अगर रेलवे लाइन से पहुंचिए तो यह डवलपमेंट का विचार नहीं है कि उस समय जब अटल जी ने शुरुआत की थी और आज एटानगर तक रेल लाइन पहुंच गई, त्रिपुरा में पहुंच गई, मिजोरम में पहुंच गई और वर्ष 2019 में मणिपुर में पहुंच जाएगी। ये काम आप बिना इसके भी कर सकते थे।

          मैं इस बात पर गर्व करता हूं कि आप जो विषय लेकर आए हैं, कम से कम यह विषय संसद में चर्चा में आया है। आज नहीं तो कल लोग उसकी बारीकियों की तरफ जाएंगे। आज पंडित दीन दयाल उपाध्याय की जन्म शताब्दी है। मैं उसको सौभाग्य मानता हूं कि आज नहीं कल, आपको उसी विचार के साथ जाना पड़ेगा कि दरिद्र नारायण की सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा है। दरिद्र कोई एक फ्रेमवर्क में नहीं हो सकता कि यह 6ठी अनुसूची वाला है, सिर्फ यही दरिद्र है। वहां अगर विकास होगा तो किसको लाभ मिलेगा? अगर वहां पर सड़क जाएगी तो लाभ किसको मिलेगा? यही बात पंचशील में आई थी कि जल पर उनका अधिकार होगा, जंगल पर अधिकार उनका होगा, उसके बाद खनिज पर अधिकार उनका होगा। विकास का प्लान बनाने वाली उनकी अपनी पंचायत होगी। उनकी अपनी व्यवस्था जो ट्रेडीशनल व्यवस्था है, यह होगी। यह कहा गया था। आज स्थिति यह है कि वहां पर पानी पहुंच नहीं रहा है। वहां पर हैंड-पंप नहीं हो सकते।

          मैं मणिपुर की बात करूंगा। वहां पर पानी बह रहा है, पानी भरा हुआ है, लेकिन पानी पीने लायक नहीं है। आज भी वहां गरीब आदमी भी बोतल का पानी खरीदकर पी रहा है। यहां पर हमारा मजाक उड़ता है, जब हम पानी खरीदकर पीते हैं तो यहां का मीडिया हमारा मजाक उड़ाता है, लेकिन आप मणिपुर चले जाइए, मजदूर भी वहां पर पानी की बोतल खरीदकर पीता है क्योंकि वहां पानी पीने लायक नहीं है। मणिपुर में एक भी हैंडपंप आपको नहीं मिलेगा। वह मणिपुर जहां पर चारों तरफ पानी भरा है, मीठे पानी की झील है, लेकिन पीने लायक पानी नहीं है। आप किस विकास की बात करते हैं? वहां बिजली नहीं है, सड़कें नहीं हैं, पानी नहीं है, पहाड़ पर हालत तो यह हो गई है क्योंकि पहले तो ग्रेविटी से पानी आता था, अब तो ग्रेविटी से पानी नहीं आता है। आपकी इंसर्जेन्सी के कारण वहां पर सड़कें नहीं बन सकतीं। वहां पर पीने के पानी की पाइपलाइन्स नहीं जा सकतीं। वहां पर बिजली नहीं पहुंच सकती। बाकी चीजें नहीं हो सकती।

           आखिर छठी अनुसूची का लाभ क्या हुआ? इसलिए मैं पाला जी से निवेदन करूंगा कि कम से कम जब कोई बिल हम डिसकस करने के लिए लाते हैं तो जो पिछले समय में हमने गलतियां की हैं, जैसे कोई कानून बना, तो उसकी एक सार्थक समीक्षा होनी चाहिए। समीक्षा के भाव से इस प्रस्ताव पर आइए। इस बात की वकालत मत करिए कि इसमें कुछ और सख्तियां की जाएं। बल्कि मैं यह कहूंगा कि जो सख्तियां की गईं, उन्होंने हमारे बीच में एक अलगाव पैदा किया है।

           हमारे यहां सिर्फ पांचवी अनुसूची है। हमारे यहां छठी अनुसूची नहीं है। मैं मंडला की बात करता हूं। एक समय में उस पूरे जिले में सात विघान सभा क्षेत्र होते थे। तब अलग अलग जिले नहीं बने थे। अब वे दो जिले हो गये हैं। उस समय एक मुख्यालय की सीट पर हमारा एक एम.एल.ए. होता था। कोई भी सामान्य व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है। लेकिन जैसे ही पांचवी अनुसूची जारी हुई तो पंच से लेकर विधायक तक सारे के सारे ट्राईबल्स की बात आ गई। जो कल तक उनकी सेवा में, मदद में, उनकी बहुओं और बेटियों की इज्जत के लिए लड़ने वाले लोग थे, वे घर-बैठे उनके दुश्मन बन गये। यह सच्चाई है। इसलिए मैं कहता हूं कि चाहे वह वन अधिनियम 1980 हो, चाहे छठी अनुसूची हो, दोनों ऐसे प्रावधान हैं कि संसद को खुले मन से उन पर चर्चा करनी चाहिए। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर इसका समाधान चाहिए तो विकास ही एकमात्र आधार है। अगर सड़क जाएगी तो वह किसी के साथ भेद नहीं करती कि यह पांचवी अनुसूची वाला है या छठी अनुसूची वाला है, सड़क सबके लिए रास्ता देती है।    अगर वहां रेल की सुविधा है, तो निश्चित रूप से वह सभी को लाभ देगी, किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगी। मैं राजनीतिक तरीके से यह बात नहीं कह रहा हूं कि हमें लाभ मिलेगा, बल्कि मैं विजन के तौर पर यह बात कह रहा हूं कि एक समय में व्यापार का केंद्र गेटवे आफ इंडिया, मुम्बई हुआ करता था। आप इसकी कल्पना कीजिए कि बराक और मकरू जैसी नदियों पर 70 सालों में पुल नहीं बना पाए। मोदी जी ने 22 हजार करोड़ रुपए का पैकेज दिया है और इस सरकार ने पहली बार इसके लिए टेंडर किया है। मुझे लगता है कि इस वि­षय पर बात करनी चाहिए कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है। मैंने जो ट्रेडिशनल रास्ता बताया है, जो वास्तव में व्यापार का रास्ता था, यदि वह रास्ता अपग्रेड हो जाएगा, तो मेरे जैसे लोग विश्वास के साथ कह सकते हैं कि एक समय जिस प्रकार हिंदुस्तान में व्यापार का केंद्र गेटवे आफ इंडिया, मुम्बई था, नार्थ-ईस्ट का व्यापार का केंद्र गेटवे आफ इंडिया, इम्फाल होगा। मणिपुर के पास क्या नहीं है? मणिपुर में 37 प्रकार के बांस हैं। आपके पास कारीगर भी हैं, वैल्यु एडिशन करने के लिए सिर्फ आपके पास कनेक्टिविटी नहीं है।

HON. DEPUTY SPEAKER: Hon. Members, we have allotted four hours for this Bill. We have extended one more hour.  We have exhausted five hours in total.  Still, there are three Members who want to speak.  If the House agrees, we can extend this discussion for one more hour.  

SEVERAL HON. MEMBERS: Yes Sir.

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF FINANCE AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF CORPORATE AFFAIRS (SHRI ARJUN RAM MEGHWAL): Yes Sir, it is very important Bill and we must extend for one more hour.

HON. DEPUTY SPEAKER: When the hon. Minister is saying that it is very important, then we can extend the discussion for one more hour.

श्री प्रहलाद सिंह पटेल:  महोदय, मैं मानता हूं कि अगर किसी भी चीज का वैल्यु एडिशन होना है, वह तभी हो सकता है जब रोड़ कनेक्टिविटी हो, रेल कनेक्टिविटी हो। अगर वहां के समाज में गुणवत्तापूर्ण विकास की संभावना है, तो ये सुविधाएं होना बहुत जरूरी है। आप जानते होंगे कि नागा लोग जिस प्रकार की चादर बनाते हैं, वह यहां नहीं पहुंचती है, लेकिन अमेरिका में 32 हजार रुपए में बिकती है, लेकिन यह पैसा बिचौलिया कमाता है। क्या वहां के कारीगर ने इस कल्चर की पहचान की कीमत वसूल करने की कोशिश की है? आज भी करघा उसके हाथ में है। वह स्वयं अपने हाथ से काम करता है। यह अच्छी बात है कि नार्थ-ईस्ट के किसी भी ट्राइबल के पास जाओ, तो आप उनके पास करघा जरूर देख सकते हैं। करघा उनकी अपनी पहचान है। वह भले ही ईसाई बन गया हो, लेकिन जब वह चर्च में जाएगा, तो अपनी वेश-भूषा में जाएगा।

17.12 hours                        (Dr. P. Venugopal in the Chair) वह अपने तरीके से सारी रस्म-अदायगी करेगा। मुझे लगता है कि इन सभी बातों पर हमें फिर से फोकस करना चाहिए। हमारी यह विरासत नष्ट नहीं होनी चाहिए। कहीं यह छठी अनुसूची हमारी इन पहचानों को खत्म न कर दे, हमें सदन में इस बात की चर्चा भी करनी चाहिए।

          सभापति महोदय, मुझे शायद पहले इतना तजुर्बा नहीं होता। मैं नेहरू युवा केन्द्र का डायरेक्टर जनरल था। जब हमारा एनआईसी होता था, तब सभी यूथ क्लब के सदस्य आते थे। कुछ अपना सामान लेकर आते थे, हम उन्हें बेचने का प्रबंध करते थे। वे नृत्य भी करते थे, लेकिन वह एक सिम्बोलिक था। आज क्या हम वह कल्चर बचा पाए हैं? आज सबसे बड़ा खतरा यह है कि आज नई पीढ़ी इस सांस्कृतिक विरासत से दूर होती जा रही है। अब वे ऐसे अवसरों में भाग नहीं लेना चाहते हैं। मैं अभी होली के समय 23 मार्च को गोविंद मंदिर में था। वहां मृदंग बजाने वाले नौजवान गिनती के थे। गांव-गांव से चलकर लोग वहां आते हैं और गोविंद मंदिर में होली के लिए लाइन लगाते हैं और किसी का नम्बर दस घंटे में आता है और किसी का 15 घंटे बाद नम्बर आता है। जो सबसे अच्छा करता है, उसे उस समय के राजा के प्रतीक चिह्न देकर अभिनंदित किया जाता है। वहां कांगड़ा पोर्ट है, जो मणिपुर के प्राइड के नाम पर है। वहां के राजा का महल है। हालांकि वह राजा वहां की सम्पत्ति के सुख से जूझ रहे हैं। वहां अंग्रेज छावनी बनाकर चले गए थे। उन्होंने टाइटल चेंज नहीं कराया, इसलिए आजादी के बाद राज परिवार की हालत खराब है। मैंने इस वर्ष परम्परा अपनी आंख से देखी कि हर क्लब का व्यक्ति होली के समय अपने सबसे बूढ़े व्यक्ति और सबसे छोटा बच्चा, दोनों एक साथ, एक-सी ड्रेस में आते हैं और पैदल मशाल जलाकर अपने क्लब तक जाते हैं। होली के पांच दिन उनके लिए उत्सव के दिन होते हैं। उनका स्लोगन है कि ‘मैं इस अग्नि को साक्षी मानकर शपथ लेता हूं कि मैं देश के लिए एक सर्वश्रेष्ठ ओलम्पियन दूंगा।’ यह परम्परा भारत में कभी चर्चा में नहीं आयी। यह मामूली परम्परा नहीं है। आदमी अपनी सेहत की चिंता करता है, अपने परिवार के सेहत की चिंता करता है, लेकिन यह संकल्प लेना कि मेरा क्लब देश के लिए सबसे अच्छा खिलाड़ी देगा और वह होली की मशाल लेकर जाता है, आप इन परम्पराओं की चर्चा कब करेंगे। यह परम्पराएं कब धराशायी हुईं? उस क्लब में पहले नगा भी था, कुकी भी था, मैतयी भी था और वे सब अपने को मणिपुरी मानते थे। आज भी नगा मैतयी जानता है, वह मणिपुरी भाषा बोलता है, कुकी भी बोलता है। नगा, लोकल नगा की भाषा नहीं समझ पाता है, लेकिन फिर भी वह भाषा उनको बांधकर रखती थी। आपने उस मणिपुरी प्राइड को ध्वस्त कर दिया। क्या यह उसकी विफलता नहीं है? इसलिए मुझे लगा कि मुझे इस पर बोलना चाहिए।

          सभापति महोदय, मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि इस पर सदन में चर्चा होनी चाहिए। यह मणिपुर और नॉर्थ-ईस्ट की कोई टीआरपी नहीं है, इसलिए उसको कोई नहीं दिखाता है। दो साल से नौ डेडबॉडीज़ चुरचानपुर में रखी हैं, उनका अंतिम संस्कार नहीं हो सका है। यह भारत की संस्कृति है कि जिंदा आदमी से आपका मतभेद हो सकता है, लेकिन मृत शरीर की अंत्येष्टि हिन्दुस्तान के हर नागरिक का अधिकार है। लेकिन वहां की सरकारें नहीं कर पायी हैं। दो साल से आज तक नौ नौजवानों की लाशें रखी हुई हैं, जिसमें एक ग्यारह साल का बच्चा भी है। परिवार ने कहा कि हमने सोसायटी को डोनेट कर दिया है। यह उनका मनोभाव हो सकता है, लेकिन इन चीजों को रोकने की किसी ने हिम्मत क्यों नहीं जुटाई? हमारी व्यवस्था किस काम की है, हमारा कानून किस काम का है, हम किस प्रकार का कानून बनाते हैं, जिसको इम्प्लीमेंट करने की हम हिम्मत न रख सकें और हमारे सामने उसका मजाक उड़ता रहे। दो साल से डेडबॉडीज़ पड़ी हैं। इसलिए मुझे लगता है कि एक तरफ तो हम इस संकल्प का सम्मान कर सकते हैं कि कोई अपनी संतान को समाज के लिए डोनेट कर दे, लेकिन दूसरी तरफ यह सब हमारे इन अलगावों का ही परिणाम है। उनके मरने के कारणों का पता यदि आपको चले और आप उस पर विचार करेंगे तो आपका दिल दहल जाएगा कि वह किस बात के लिए मारे गए हैं? इतनी छोटी सी बात के लिए, आपसी टकराव की वजह से और मैं इसका जिम्मेदार किसी को मानता हूं तो इन विघटनकारी कानूनों को मानता हूं। इन व्यवस्थाओं ने समाज को तोड़ने का काम किया है, जिन्होंने समाज को बांटने का काम किया, कम से कम इनको और मजबूत होने मत दीजिए, बल्कि इनको कमजोर करने का काम कीजिए। यह काम कोई कर सकता है तो वह विकास का रास्ता कर सकता है। सबके साथ एक सा बर्ताव करेंगे तो ही ठीक होगा। वह तभी होगा, जब हम उनकी पहचान को सुरक्षित रखें, उनकी कला को सुरक्षित रखें, उनके नृत्य को सुरक्षित रखें।

          आने वाली पीढ़ी को हमने इतना दूर कर दिया है कि वह न तो नृत्य से जुड़ने को तैयार है, न उसकी वेशभू­षा धारण करने को तैयार है, कुल-मिलाकर हमने उनको उनकी संस्कृति से दूर कर दिया है और मैं नहीं मानता हूं कि हम उसमें सफल हुए हैं। दूसरी तरफ लोग कहते हैं कि वह जंगल के साथ हैं। लेकिन वे वहां रहना नहीं चाहते हैं। वे लोग एनजीओ बनाते हैं, लेकिन उनकी इम्फाल और दिल्ली में दस-दस करोड़ रुपये की अट्टालिकाएं हैं। वह वापस लौटकर जाना नहीं चाहते हैं। वह जमीन पर रहना नहीं चाहते हैं, उनका जंगल से कोई वास्ता नहीं है, उनकी संस्कृति छूट गयी है। पंडित जवाहर लाल नेहरू का यही पंचशील का सिद्धांत है, जिसका एक भी हिस्सा वहां मौजूद नहीं है। वह देश में कहीं भी नौकरी करने को तैयार हैं, लेकिन वह अपने पहाड़ के क्षेत्र में रहने को तैयार नहीं हैं। मैं इसे छठी अनुसूची का अभिशाप ही कहूंगा और मैं तो इसका कम से कम समर्थन नहीं करूंगा।

          मैं आप सभी से निवेदन करूंगा कि आप इस चर्चा में भाग लीजिए और इस चर्चा को सकारात्मक बनाइए कि कहीं हमारे पुराने कानून किसी भावावेग में तो नहीं बना दिए गए, जो आज हमारे दुश्मन बन गए हैं। निशिकांत जी ने बहुत सारी कमेटियों के बारे में बताया है, जिनमें घेवर कमेटी, बलवंत कमेटी और वैंकेटचलइया कमेटी है। इन सब को मैं तात्कालिक समाधान देने का काम तो नहीं कहूंगा, बल्कि मैं तो यह कहूंगा कि कांग्रेस ने यह सब काम इसलिए किया कि जहां कोई स्थिति उत्पन्न होती थी, उसके आगे छोटा सा टुकड़ा फेंक दिया जाता था। मैं अटल जी की इस बात को कोट करके अपनी बात को समाप्त करूंगा, उन्होंने कहा था - नॉर्थ-ईस्ट में कमल खिलेगा। कमल खिल गया है, अब तो बहुत छोटा हिस्सा बचा है। मुझे लगता है कि कोई रास्ता निकलेगा और हम उसी पुरातन परम्परा तक जाएंगे, जिसमें बाली का इतिहास है या वह सिक्ख, जो बंगाल से अपना मलमल लेकर थाईलैंड तक जाते थे और वहीं बस गए। हम तो चाहेंगे कि वही हमारे पैमाने हों। उस समय उनको रास्ते में किसी ने लूटा नहीं था, न नगा ने लूटा, न कूकी ने लूटा, न मैतयी ने लूटा। साइकिल से एक सरदार जी पश्चिम बंगाल से मलमल लेकर चले और थाईलैंड में बस गए। उनकी सातवीं पीढ़ी आज भी वहां व्यापार कर रही है। मुझे लगता है, वे दिन ज्यादा ही अच्छे थे। कुछ चीजें की होंगी, कपड़े पहना दिए होंगे, भाषा अंग्रेजी में बदल दी होगी, चर्च में जाकर वे प्रेयर कर रहे होंगे। यह हो सकता है, लेकिन नुकसान ज्यादा हुआ है। मुझे फायदा तो कहीं दिखता नहीं हैं।

          सभापति महोदय, मुझे इस विषय पर बात करने का मौका मिला मैं पाला जी का धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने कम से कम मुझे अपनी बात करने का एक निमित्त तो बनाया। इसके लिए मैं जरूर धन्यवाद दूंगा, लेकिन मैं फिर से अपनी बात की पुनरावृत्ति करूंगा कि हम जब कभी कोई बिल लाएं, उसके पीछे नीयत क्या है, यह महत्वपूर्ण बात है। शायद मेरा शक उसी नीयत पर था, जिसमें जल्दबाजी कुछ ऐसे कानून बनाए थे, जिसका परिणाम आज हम भुगत रहे हैं। यहां पर किरण जी बैठे हुए हैं। अगर श्यांग 2, श्यांग 1 बन गए होते तो अरुणाचल प्रदेश में 90 फीसदी खेतों की सिंचाईं हो गई होती। किसने रोका है? अरुणाचल के आदमी तो राष्ट्रविरोधियों के साथ नहीं हैं, लेकिन हमने गलती की, हमने गुहावटी में बैरियर लगाया, यह गलती किसकी है? मैं कम से कम श्यांग 2 के बारे में जानता हूं। अरूणाचल के लोग तो तरसते रहे, वे चाहते थे कि श्यांग 2 बन जाएगा तो बिजली-पानी मिलेगा। हमने गुवाहटी में बैरियर लगाया। ये गलतियां हुई हैं। इन गलतियों को सुधारने की जरूरत है। कानून की भाषा में ऐसे कड़े कानून या अड़ंगा लगाने वाले कानून से बाहर आने की आवश्यकता है। महोदय, आपने मुझे इस अच्छी बात कहने का अवसर दिया। धन्यवाद।

SHRI JITENDRA CHAUDHURY (TRIPURA EAST): Vanakkam, Sir.

          I would like to thank hon. Members from the other parts of the country. They have also participated in the discussion on this Bill.  Though it is a Private Member’s Bill, I consider it as a very important agenda item or issue raised by my friend, Mr. Pala. इसमें दुबे जी ने भाग लिया है। उन्होंने अच्छा भी बोला है, भला भी बोला है। गाली दी या प्यार किया, वह भी समझ में आया है। प्रहलाद पटेल जी ने भाग लिया है, अच्छी बात है, लेकिन कुछ जानते हुए और कुछ न जानते हुए भी बहुत कुछ बताया है। Sir, I would like to come to the point. Where is the Sixth Schedule applicable? It is there only in the four States of the North-East. In Meghalaya, there are three ADCs under the Sixth Schedule – Jaintia, Khasi and Garo. In Assam, there are three in Karbi Anglong, North Cachar Hills and Bodo Territorial Council.  In Mizoram, there are three – Chakma, Mara and Lai. In my State, Tripura, there is no separate thing for any particular community. There is a Tripura Tribal Areas Autonomous District Council and all the 19 tribes come under a single umbrella.प्रहलाद जी मणिपुर और नागालैण्ड के बारे में बोल रहे थे, वहां पर शेडय़ूल 6 का कोई सवाल नहीं है, वहां काउन्सिल है। वह स्टेट गवर्नमेंट का एक्जीक्यूटिव ऑर्डर में कुछ बना हुआ है। इसका शेडय़ुल 6 के साथ कुछ लेना-देना नहीं है। Now, Sir, I am not talking about the amendment Mr. Pala has brought. Of course, it is essentially required that the Sixth provision under Article 244(2) and Article 275(1) of our Constitution deserves to be amended.

Of course, Shri Patel rightly said that there should be more discussion on it. Why is it so? It is because this was enacted right from the beginning of our Constitution coming into being. While Meghalaya and Mizoram were under the united Assam, at that time this provision was only with Assam, and after 1982, after the Constitution Amendment during the time of late Shri Morarji Desai it has been extended to Tripura initially under the Seventh Schedule and after 1985 under the Sixth Schedule. But the main structure of the provision was there since 1950s, that is, from the early age of the making of the Constitution.

Now, in these 70 years of our Independence, successive Governments at the Centre and in the States have governed the economic structure, social structure, people’s desire has been changed and it is the order of the day. So, that is why that provision, which was made during the 1950s, was continuing for this long, which should be amended to address the aspiration and desire of the people.

But, of course, by honouring the main ambition or objective of the provision, that is, protecting the land within the hand of the indigenous people / tribals ...

     

HON. CHAIRPERSON: Hon. Member, just wait for a while.

          Now, Item No. 50, Shri Ravneet Singh.

             

SHRI JITENDRA CHAUDHURY (TRIPURA EAST): Sir, now I am coming to the experience of my State of Tripura. Till 1982, Tripura was not under the purview of the Sixth Schedule. But the people of Tripura under the leadership of the Ganamukti Parishad, Communist Party of India (Marxist) and many other political parties, since the early 60s, they have been struggling for the amendment of the Constitution and to promulgate the Sixth Schedule in the State of Tripura. Why was that urge? You know that Tripura once was a princely State for more than 1300 years. The Tribal King of Manikya Dynasty ruled the State. They were in the majority till the 1950s. Until 1949, Tripura was independent. On 15th October, 1949, Tripura merged with the Indian Union. As the fall out of the partition of India - Hindustan and Pakistan - thousands of Hindu Bengali speaking people had been compelled by their destiny to migrate from East Pakistan. Definitely, they had migrated to the nearby territory. Tripura is surrounded by East Pakistan, which is now Bangladesh, from three sides. That is very near. So, in thousands they came to Tripura, Assam and Bengal. Hence, the majority Tribal State has been outnumbered by the minority people who migrated from East Pakistan and the original population has reduced to the minority. Their land, language and culture, everything has been overpowered and diluted. That is why, there is a survival for the protection of these people. Though there is a Tribal Reserve Law, but the Law of the land was not enough to protect the land in the hand of the Tribals.

On the other hand, because of illiteracy and because of under-development, the Tribals were divided. They are being alienated from their land. So, this slogan has been raised by the Ganamukti Parishad, the dominating political party and the Communist Party of India (Marxist), that the Constitution may be amended immediately and the Sixth Schedule be promulgated in the Tribal areas so that the land be protected and the culture and language of the adivasis and tribals may be preserved and developed. But it was not so easy. There has been a huge struggle. Lastly, in the year 1977 when the Morarji Desai Government came, in Tripura also, the regime has been changed. The Left Front Government for the frist time assumed office.  The Left Front Government was able to convince the then Union Government, but the Union Government was not in a mood to agree with the Sixth Schedule proposal. As a strategy, as a compromising formula, Tripura had accepted the Seventh Schedule. Then, after three years, in 1985, again, the Constitution was amended and the Sixth had been promulgated.

          What is the difference between the pre-Sixth Schedule or pre-ADC and post-ADC? Before 1982, though there was the Land Reforms and Land Records Act like in the mainland where PESA was there, पाँचवाँ सूची जहाँ पर लागू है, वहाँ आदिवासियों की जमीन गैर-आदिवासी नहीं खरीद सकते हैं, वह जमीन ट्रांसफर नहीं हो सकती है। That was also there. As per the 1960 Tripura Land Records and Land Revenue Act, no tribal land can be transferred to non-tribals by any means, but that Act was not enough that way. In the tribal contiguous areas, in those days, the ruling party of the 1960s and the 1970s, very intentionally, non-tribals were rehabilitated. They were given accommodation. They were given land in tribal contiguous areas.

          Tribals are very backward educationally, economically and socially. On the one hand, the Government does not have any programme to uplift the tribal community and, on the other hand, there are the ill-fated refugees. The Bengali Hindus have not migrated to Tripura with pleasure. They were the victims of the instrument of partition. They have been compelled to migrate, but they also have not been rehabilitated properly or they were not looked after properly.

          So, there was a mismatch. Tribals, being very backward and very simple, have become the victims. Now, after 1982 when the Sixth Schedule was promulgated, not a single inch of land was transferred to non-tribals. Not a single part of land is being transferred to the non-tribals. Of course, those non-tribals are living within the Autonomous District Council area of Tripura. Those families whose names were in the electoral rolls of 1971, they have the equal right like other non-tribals. They have been very peacefully residing there. They can sell; they can purchase; and they can do anything like the tribals. That way, today, in my State of Tripura, the tribals have been protected. The land has been protected. Further alienation has been checked. The harmony could be established. Of course, land does not mean everything. Land is very important, of course. Why are these tribals called as ‘indigenous’? ‘Indigenous’ means that their livelihood is based on the indigenous form of living. They do not know any other than the primitive form of cultivation. They know only the Jhoom Cultivation or the shifting cultivation. In most parts of the North-Eastern Region, in Tripura, in Mizoram, in Manipur, Nagaland and Assam, those who are very backward, they are surviving on the shifting cultivation. This is the indigenous form. When we say ‘indigenous’ in any form of the world, it would mean the indigenous form of livelihood. Once the land is protected, slowly, the standard of living of this section of the population has to be improved. They have to provided education; they have to be provided the skill; and the new form of life should be introduced for them. That is why, the main objective of the Sixth Schedule is to protect the land. But, they should not confine within that.

There are other linkages for development. They should be encouraged to the modern way of life. What is this? How could they enjoy the benefits of democracy? How could they enjoy the benefits of science and technology? How could they enjoy the benefits of modern livelihood, culture and everything? That is why, I do agree with my learned friend Shri Dubey.  उन्होंने बोला कि ऐसा किया, ऐसा किया गया, आपने क्या करके रखा है? यह ठीक है। इससे बाहर निकल कर आना है। इसके लिए तो उन्हें मौका देना चाहिए। उन्हें तो इसके लिए एक रोडमैप देनी चाहिए। Here, I would like to congratulate or appreciate that during the time of Shri Rajiv Gandhi the Constitution 73rd and 74th Amendments were passed. It was not implemented properly even in the Congress-ruled States. That has opened up some opportunities. Today, in most of the States where the vibrant three-tier form of Government is functioning or panchayats are functioning, the development is also vibrant.

We are experiencing this three-tier panchyat system in my State of Tripura. The people at the grass roots level, that is, the panchayat level, again at the inter-mediatory level, the block level and at the district level, they chalk out their own plans and implement them. That way, the people’s भागीदारी or the sense of ownership has been built. People have realised this. हम भी बोलते हैं कि हमने ऐसा दिया, वैसा दिया, जैसे आप बोल रहे हैं कि मोदी जी ने ऐसा दिया, मोदी जी ने वैसा दिया। यह ठीक है। मोदी जी हों, गांधी जी हों, जो भी हों, The country, the land, the resources and everything belongs to people. It does not belong to you or me alone. When people realise that it is their land, their property, their State, their district and they chalk out their plans accordingly, the participation would be something different.

I am not talking just about my State. Wherever in the country - whether it is BJP-ruled States, Congress-ruled States or States ruled by any party – the three-tier Panchayat system is given a free hand and capacity has been built, the economy there and the standard of life of people are different, people’s urges are different. But unfortunately in my State of Tripura the case is different. Tripura is a tiny State of 10,449 square kilometres. महारा­ट्र तथा मध्यप्रदेश का जो एक बड़ा जिला है, हमारा प्रदेश उससे भी छोटा है। इसी छोटे प्रदेश में टी.टी.ए.ए.डी.सी. एक हिस्सा है, जहां पर आदिवासी रहते हैं, लेकिन टी.टी.ए.ए.डी.सी. त्रिपुरा का दो तिहाई, 65 per cent of the area of Tripura is under the TTADC, only 35 per cent of the area is outside TTADC. But there I find the difference. In the three-tier Panchayat area, participation of people in the functioning is something different. They are in the ADC areas in the absence of the intermediate level body, in the absence of the District level body. The ADC Village Committee does not have any role there at the intermediate level, at the District level. The State Government, in the absence of the provision, made block level committee, block advisory committee substituting the intermediate level. But now we are strongly feeling that protecting the land alone does not suffice for the development of Adivasis, the tribals. It does require empowerment. How? There also the aspirations of the people should be taken into account. The mechanism may be something different. In the ADC areas also that three-tier Panchayat system or a system similar to that should be introduced.

          In ADC areas, Council areas also urban areas are coming up like district headquarters, subdivision headquarters, mandal headquarters. In my small State of Tripura there are 15 Nagar Panchayats and they are directly receiving funds from the Ministry of Urban Development. Apart from getting money from the State’s Budget, they are getting money directly from the Urban Development Ministry. That is good. But in the ADC areas when they send the proposals, they say no, it does not come under an urban area, how could that be given in the ADC area? The ADC villages and ADC sub-blocks were deprived of even the award of 13th and 14th Finance Commissions. That is why my argument is that the Government should consider that the three-tier Panchayat system and also the urban body should be there in the ADC areas also because the tribals also feel that they need streetlights, good roads, good infrastructure for safe drinking water, infrastructure for amusement and other things in the city they live. But it is not there. That is one thing.

          Secondly, though it is not within the purview of the Sixth Schedule, it should be considered.  My friend Shri Kiren Rijiju is in charge of the Home Ministry and the Sixth Schedule is also with the Home Ministry.  During last 29 months, I have met him four or five times personally and also with delegation.  In our country, every citizen is entitled for one vote, whether he is Rashtrapati, Pradhan Mantri, Mantri or Santri.  Everyone has his own mother tongue. अपनी मातृभा­षा, आप लोग हिंदी में बोलते हैं, तो बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि अपनी मातृभा­षा है। I would like to speak in my own mother tongue. My mother tongue is Kokborok or Tripuri.  If I have to speak in Kokborok, I can speak better than you. That way, I can express from the core of my heart. But I have to speak in English or Hindi.  My friend Shri Rijiju gives a prototype reply every time that some time in 1993 or 2003, a committee was constituted and they have not done anything.  I am not talking only about my own mother tongue.  I am also recommending Maithili, Bhojpuri, Rajasthani etc. Shri Rijiju, you are from north-east, from Arunachal Pradesh; the same heartburning is there.  You should look into this matter.  It is very important.  We are talking about the Vibrant India. हिंदुस्तान तब ताकतवर हिंदुस्तान बन सकता है, जब हम हर जाति, जनजाति की भाषा, संस्कृति, वेशभू­षा को ईमानदारी से इज्जत दे पायें। वे भी संकोच छोड़कर चल पायें कि हम भी हिंदुस्तानी हैं और गर्व से कहें कि यह मेरी संस्कृति है।

You are nailing Mr. Pala because he was once a Minister and he is a member of the Congress Party which was in power for more than six decades and they have not done it.  आपके पास सत्ता है। आपके पास सब कुछ है। आप इतना बड़ा बहुमत लेकर आए हैं। Please do something.  We may have the difference.

श्री निशिकान्त दुबे:  त्रिपुरा में सिक्स्थ शेडय़ूल में ग्रामोदय और नगरोदय का जो कांसेप्ट है, वह यूनीक है। आप मिस्टर पाला को बतायेंगे कि ग्रामोदय, नगरोदय के माध्यम से आप जो पंचायत सिस्टम की बात कर रहे थे कि हमने कैसे पंचायत सिस्टम को डेवलप किया, वह जरा बताइए, क्योंकि आपका बहुत नया, 1995 का लॉ है। उससे ज्यादा सुविधा हो जाएगी।

श्री जितेन्द्र चौधरी: इसीलिए तो मैंने बोला कि पाला जी जो अमेंडमेंट लाए, उसके साथ मैं सहमत नहीं हूं। यह एडीसी हो, नॉन एडीसी हो, सिक्स्थ शेडय़ूल हो, फिफ्थ शेडय़ूल हो, सब कहीं ट्रेजरी फंक्शन होना चाहिए, सीएजी का ऑडिट होना चाहिए। कंट्री के रूल्सshould be the same everywhere.  For ADCs, some extra thing should not be there; it is wrong. I do agree with you.  But what I am telling is that not only the land, but the culture and the language are very important today for the unity and integrity of our country. I think this Government will definitely take care of it.

Thirdly,प्रहलाद जी ने मणिपुर के बारे में कहा है।   

          He was saying that Nagaland and Manipur were not under the Sixth Schedule. In Manipur where there were eight districts and seven more have been added, in eight or nine out of 15 districts tribals are in a majority but there are no Sixth Schedule areas.

          The then Congress Government in Manipur brought three legislations and those three legislations were very cleverly against the tribals and they were about how to deprive the tribals so that they would not claim ownership of the land. In Manipur also there are Nagas, Kukis and Jhumis. In the Naga areas, in the Jhumi areas and in the Kuki areas, there should be autonomous district councils under the Sixth Schedule.

          Simultaneously, I would like to debate about the point which was raised about Madhya Pradesh. In Madhya Pradesh, Andhra Pradesh, Telangana and Chhattisgarh, there are some systems. There is what is called Integrated Tribal Development Agency. Who is the Chairman of this Agency? It is the Collector. They get crores of rupees but he is not accountable to anybody. There are exceptions. I have seen some officers doing good work but in many places there is corruption. So, there should be a mechanism of the elected council and not a nominated body. There should be such a mechanism. I would like to very strongly recommend that. Why should there not be autonomous district councils in the tribal majority districts of Madhya Pradesh? It ranks first in our country with a tribal population of 1,20,00,000. In Maharashtra, there are 1,15,00,000 tribals.   

श्री निशिकान्त दुबे :  महोदय,जो पेसा लॉ है, इसमें मोर और लेस जो पंचायत है और डिस्ट्रीक्ट काऊन्सिल है वह ट्राइबल्स के लिए रिजर्व है और वही जीत कर आते हैं इसलिए इसमें बहुत कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।

श्री जितेन्द्र चौधरी: पेसामें है, Under the Integrated Tribal Development Agency concept, there are some exceptions. Some IAS officers are doing very good work but in most cases that development has not taken place. You go anywhere, like Korba in Chhattisgarh, or Araku in Andhra Pradesh, or Bastar, there is no business in the hands of tribals. They are there in the name of adivasis only for the sake of it. When you go to the sub-divisions or big towns and ask for their shops, there is nothing.

 

18.00 hours We have to go into the depth.  That is why I am recommending it. मैं कुछ दिन पहले डूंगरपुर, राजस्थान गया था, वहां नारा उठा रहे थे कि 100 प्रतिशत जिस डिपार्टमेंट में हो, ट्राइबल को देना होगा। मेरे पास कार्यकर्ता आए और बोले कि आप भी चाहते हैं, आप आदिवासी एमपी हैं।I told him that I do not agree. कैसे हो सकता है। हम आदिवासी, गैर-आदिवासियों को एक साथ रहना है। ठीक है, उसमें आदिवासियों का जो अधिकार है, मेघवाल साहब राजस्थान से आते हैं, उनको स्वीकार करना पड़ेगा, लेकिन अभी पेसा एक्ट में पांचवी अनुसूची में जो इसका ज्यूरिसडिक्शन है, ...(व्यवधान)

HON. CHAIRPERSON: Shri Chaudhury, you may continue next time.

The House stands adjourned to meet on Monday, the 27th   March, 2017 at 11.00 a.m.