State Consumer Disputes Redressal Commission
M D A vs Anil Kumar Agrwal on 16 August, 2017
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/2462/2015 (Arisen out of Order Dated 28/10/2015 in Case No. C/350/2003 of District Meerut) 1. M D A Meerut ...........Appellant(s) Versus 1. Anil Kumar Agrwal Meerut ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. JUSTICE AKHTAR HUSAIN KHAN PRESIDENT For the Appellant: For the Respondent: Dated : 16 Aug 2017 Final Order / Judgement
राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग , उ0प्र0 , लखनऊ अपील सं0- 2462/2015 (सुरक्षित) (जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष फोरम, मेरठ द्वारा परिवाद सं0- 350/2003 में पारित आदेश दि0 12.10.2015 के विरूद्ध) Meerut development authority, Meerut through its Vice Chairman.
..............Appellant Versus Anil kumar agarwal son of Late Ratan prakash agarwal, 45 Vijay nagar, Meerut.
................Respondent समक्ष:-
माननीय न्यायमूर्ति श्री अख्तर हुसैन खान, अध्यक्ष।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : श्री सर्वेश कुमार शर्मा, विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित : श्री अनिल कुमार अग्रवाल, व्यक्तिगत रूप से।
दिनांक:- 28.09.2017 माननीय न्यायमूर्ति श्री अख्तर हुसैन खान , अध्यक्ष द्वारा उद्घोषित निर्णय परिवाद सं0- 350/2003 अनिल कुमार अग्रवाल बनाम मेरठ विकास प्राधिकरण में जिला फोरम, मेरठ द्वारा पारित निर्णय और आदेश दि0 12.10.2015 के विरूद्ध यह अपील धारा 15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गई है।
आक्षेपित निर्णय और आदेश के द्वारा जिला फोरम ने परिवाद आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निम्न आदेश पारित किया है :-
"परिवादी द्वारा प्रस्तुत परिवाद आंशिक रूप से स्वीकृत किया जाता है। विपक्षी मेरठ विकास प्राधिकरण द्वारा परिवादी को आवंटित भवन के सम्बन्ध में बढ़ी हुई कीमत अंकन 15,800/-रूपये एवं उस पर लगाया गया समस्त ब्याज की मांग निरस्त की जाती है।
विपक्षी मेरठ विकास प्राधिकारण को आदेशित किया जाता है कि वह परिवादी को अंकन- 50,000/-रूपये मानसिक व शारीरिक कष्ट की बाबत क्षति धनराशि तथा अंकन- 10,000/-रूपये परिवाद व्यय के रूप में अदा करे, इसके अतिरिक्त कथित आवंटित भवन की रजिस्ट्री परिवादी पक्ष में निष्पादित करे। विपक्षी मेरठ विकास प्राधिकरण को निर्देशित किया जाता है कि परिवादी को उपरोक्त अवार्ड की गई धनराशि तथा कथित भवन की रजिस्ट्री एक माह के अन्दर परिवादी के पक्ष में निष्पादित करे।"
जिला फोरम के निर्णय से क्षुब्ध होकर परिवाद के विपक्षी मेरठ विकास प्राधिकरण ने यह अपील प्रस्तुत की है।
अपील की सुनवाई के समय अपीलार्थी की ओर से उसके विद्वान अधिवक्ता श्री सर्वेश कुमार शर्मा उपस्थित आये हैं। प्रत्यर्थी अनिल कुमार अग्रवाल व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए हैं।
मैंने उभयपक्ष के तर्क को सुना है और आक्षपित निर्णय और आदेश तथा पत्रावली का अवलोकन किया है।
अपील के निर्णय हेतु संक्षिप्त सुसंगत तथ्य इस प्रकार हैं कि प्रत्यर्थी/परिवादी ने उपरोक्त परिवाद जिला फोरम, मेरठ के समक्ष इस कथन के साथ प्रस्तुत किया है कि उसने विपक्षी मेरठ विकास प्राधिकरण की पल्लवपुरम आवासीय योजना के अंतर्गत एम0आई0जी0 भवन हेतु दि0 04.09.19982 को 7,000/-रू0 पंजीकरण शुल्क जमा कर आवेदन किया, जिस पर विपक्षी ने अपनी उक्त योजना में एम0आई0जी0 भवन सं0- एस- 78 उसे आवंटित किया और प्रत्यर्थी/परिवादी ने विपक्षी की मांग के अनुसार 20,000/-रू0 ड्राफ्ट के द्वारा दि0 26.11.1988 को जमा किया। उसके बाद उसने परिवादी को कोई सूचना नहीं दी और जब अप्रैल 1991 में परिवादी ने विपक्षी द्वारा आयोजित कैम्प में जानकारी प्राप्त की तो बताया गया कि पल्लवपुरम फेस-2 में एम0आई0जी0 भवन की कीमत 1,48,000/-रू0 है जिसमें पंजीकरण शुल्क 7,000/-रू0 और आवंटन शुल्क 20,000/-रू0 एवं लीज रेंट 3,937/-रू0 50/- पैसा है। यह भी बताया गया कि पंजीकरण शुल्क पर 2,380/-रू0 ब्याज, भवन क्रय करने वाले व्यक्ति को दिया गया है। इस प्रकार शेष धनराशि 1,18,620/-रू0 12 साल में 1,704/-रू0 75/- पैसा की मासिक 144 किश्तों में अदा करना है जिसमें 14 प्रतिशत ब्याज भी शामिल है।
परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादी का कथन है कि उसने विपक्षी के कैम्प प्रभारी के निर्देशानुसार कब्जे हेतु लीज रेंट की धनराशि 3,937/-रू0 50/-पैसा दि0 08.04.1991 को जमा कर दिया और जनवरी 1991 से माह अप्रैल 1991 तक की चार अग्रिम किश्तों की धनराशि 6,819/-रू0 दि0 12.04.1991 को जमा किया। उसके बाद काफी प्रयास के बाद उसे दि0 26.04.1991 को भवन का कब्जा प्रदत्त किया गया।
परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादी का कथन है कि जब उसे भवन का कब्जा दिया गया तो भवन की हालत बहुत खराब थी। भवन को रहने लायक उसे ठीक करने में काफी खर्च करना पड़ा। उसके बाद कब्जा प्राप्त करने के बाद उसने विपक्षी से इकरारनामे हेतु अनुरोध किया तो दि0 25.04.1991 को इकरारनामा किया गया। इस बीच प्रत्यर्थी/परिवादी समय से किश्तों का भुगतान करता रहा और इकरारनामा की तिथि तक वह 97,570/-रू0 प्रत्यर्थी के यहां जमा कर चुका था।
परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादी का कथन है कि विपक्षी की मांग पर उसने फ्री होल्ड शुल्क 788/-रू0 दि0 09.02.1996 को जमा किया है। उसका कथन है कि उसके द्वारा विपक्षी मेरठ विकास प्राधिकरण के बीच दि0 25.04.1994 को जो इकरारनामा हुआ है उसमें स्पष्ट लिखा हुआ है कि 12 साल की किश्तें जनवरी 1991 से दिसम्बर 2002 तक की हैं। महीने की किश्त अंकन 1,704/-रू0 75/-पैसा है जो हर महीने की 10 तारीख तक जमा होनी है।
परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादी का कथन है कि उसने माह जनवरी 1991 से अप्रैल 1991 तक की चार अग्रिम किश्तें जमा की हैं तथा मई 1991 से समस्त बची हुई किश्तों को हर महीने की 10 तारीख से पूर्व ही जमा किया है। उसे विपक्षी मेरठ विकास प्राधिकरण के कार्यालय से भुगतान के सम्बन्ध में कम्प्यूटर शीट प्राप्त नहीं हुई तो उसने दि0 28.12.2002 को विपक्षी मेरठ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष से व्यक्तिगत रूप से मिलकर रजिस्ट्री कराने और कम्प्यूटर शीट देने हेतु प्रार्थना पत्र दिया, परन्तु उपाध्यक्ष के कहने के बावजूद भी सम्बन्धित क्लर्क ने कोई ध्यान नहीं दिया। उसके बाद काफी प्रयास के बाद उसे दि0 14.02.2003 को कम्प्यूटर की दो शीट प्राप्त हुई। प्रथम शीट के अनुसार उसके विरूद्ध 3,025/-रू0 65/-पैसा एवं दूसरी शीट के अनुसार 49,374/-रू0 03/-पैसा बकाया दर्शाया गया है तथा माह की प्रत्येक किश्त पर चक्रवृद्धि ब्याज के साथ दि0 20.02.1997 को 15,800/-रू0 बाकी दर्शाया गया है। जब कि प्रत्यर्थी/परिवादी ने समस्त धनराशि विपक्षी मेरठ विकास प्राधिकरण की मांग के अनुसार जमा कर दिया है जिसका विवरण परिवाद पत्र की धारा 16 में दिया गया है।
परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादी का कथन है कि उसने भवन की कुल कीमत 1,48,000/-रू0 विपक्षी के यहां जमा की है। कम्प्यूटर शीट में जो ब्याज व अन्य अवशेष दर्शाया गया है उसकी सूचना उसे कभी नहीं दी गई है। परिवादी से चार किश्त अग्रिम लेने के बावजूद भी विपक्षी ने 14 प्रतिशत चक्रवृद्धि ब्याज लगाया है जो उचित नहीं है। परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादी ने विपक्षी मेरठ विकास प्राधिकरण को अधिवक्ता के माध्यम से नोटिस दिया, परन्तु विपक्षी ने कोई कार्यवाही नहीं की।
परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादी का कथन है कि दि0 10.02.2002 को दैनिक जागरण समाचार पत्र में विपक्षी द्वारा प्रकाशित पल्लवपुरम आवासीय योजना के डिफाल्टर आवंटियों की सूची में परिवादी का नाम नहीं है।
विपक्षी मेरठ विकास प्राधिकरण ने जिला फोरम के समक्ष लिखित कथन प्रस्तुत किया है जिसमें कहा गया है कि प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा परिवाद पत्र की धारा 16 में कथित धनराशि का भुगतान किया गया है और यह स्वीकार किया है कि दि0 22.09.1988 को लाटरी से परिवादी के नाम कथित भवन का आवंटन किया गया है।
लिखित कथन में विपक्षी की ओर से कहा गया है कि आवंटन धनराशि जमा करने के उपरांत परिवादी को विपक्षी के कार्यालय के पत्र सं0- 3055/05 दि0 11.05.1990 द्वारा अवशेष धनराशि 1,18,620/-रू0 14 प्रतिशत ब्याज सहित 144 किश्तों में दि0 31.05.1990 से जमा करने की सूचना दी गई थी जिसमें यह भी दर्शित किया गया था कि प्रत्येक माह की 10 तारीख से पूर्व किश्त जमा करनी होगी। लिखित कथन में यह भी कहा गया है कि परिवादी को भवन का कब्जा लेने हेतु दि0 22.03.1991 के पत्र द्वारा सूचना दी गई, परन्तु उसने न तो किश्तें जमा की और न ही कब्जा लिया। उसके बाद प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा पल्लवपुरम योजना में लगने वाले कब्जा कैम्प में दि0 22.04.1991 को 10 प्रतिशत लीजरेन्ट जमा कर कब्जा प्राप्त किया गया है और दि0 26.04.1991 से उसने आवंटित भवन में ताला डाल दिया है।
लिखित कथन में विपक्षी की ओर से कहा गया है कि प्रत्यर्थी/परिवादी व विपक्षी के मध्य किश्तें समय से जमा करने का समझौता है जो आवंटी द्वारा स्वयं कराया जाता है।
लिखित कथन में विपक्षी मेरठ विकास प्राधिकरण की ओर से कथन किया गया है कि आवंटी की स्वयं की देरी के कारण कब्जा अनुबन्ध देर से सम्पन्न हुआ। विपक्षी द्वारा मांग किये जाने के बाद ही परिवादी ने दि0 09.02.1996 को 788/-रू0 विपक्षी के खाते में जमा कराया है। लिखित कथन में यह भी कहा गया है कि इकरारनामा में हस्ताक्षरों के उपरांत ओवर राइटिंग व कटिंग करके 1990 को 1991 तथा मई को कटिंग कर जनवरी लिखा गया है और अंत के अप्रैल के स्थान पर कटिंग करते हुए दिसम्बर लिख दिया गया है, किन्तु वर्ष 2002 ही रहने दिया गया है।
लिखित कथन में विपक्षी की ओर से कहा गया है कि परिवादी द्वारा अग्रिम किश्तें जमा नहीं की गई हैं। 3,025/-रू0 65/-पैसा की देनदारी उसकी आती है, क्योंकि उसने प्रथम चार किश्तें बिना किसी ब्याज के जमा की थी। अवशेष धनराशि 1,18,620/-रू0 पर 14 प्रतिशत ब्याज के साथ किश्तें बनायी गई हैं। लिखित कथन में विपक्षी की ओर से कहा गया है कि भवन की अन्तिम कीमत 1,63,800/-रू0 एवं अनुमानित कीमत 1,48,000/-रू0 के अन्तर की सूचना परिवादी को दि0 25.01.1997 को पंजीकृत डाक द्वारा भेज दी गई थी जिसमें 49,374/-रू0 देय दर्शाया गया था।
लिखित कथन में विपक्षी की ओर से कहा गया है कि परिवादी ने भवन की अनुमानित कीमत 1,48,000/-रू0 की किश्तों का भुगतान किया है, अन्तर की धनराशि का भुगतान नहीं किया है जो परिवादी द्वारा देय है।
लिखित कथन में विपक्षी की ओर से कहा गया है कि 15,800/-रू0 के अन्तर की सूचना परिवादी को दि0 25.01.1997 को भेज दी गई थी, परन्तु उसने देय धनराशि जमा नहीं की।
लिखित कथन में विपक्षी की ओर से कहा गया है कि परिवाद हेतु कोई वाद हेतुक उत्पन्न नहीं हुआ है और परिवाद चलने योग्य नहीं है।
उभयपक्ष के अभिकथन एवं उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के उपरांत जिला फोरम ने आक्षेपित निर्णय और आदेश में यह उल्लेख किया है कि विपक्षी मेरठ विकास प्राधिकरण के स्वयं के कथनानुसार वर्ष 1993 में ही ठेकेदारों को भुगतान विपक्षी मेरठ विकास प्राधिकरण द्वारा कर दिया गया था जब कि प्रत्यर्थी/परिवादी के पक्ष में हायर परचेज किरायेदारी एग्रीमेंट दि0 25.04.1994 में निष्पादित किया गया है। ऐसी स्थिति में मेरठ विकास प्राधिकरण को परिवादी के पक्ष में आवंटित भवन की कीमत में वृद्धि किये जाने का उल्लेख करते हुए बढ़ी हुई धनराशि की मांग करने का कोई अधिकार नहीं रह जाता है। विपक्षी मेरठ विकास प्राधिकरण द्वारा किया गया इस प्रकार का कृत्य अनुचित व्यापार व्यवहार की श्रेणी में आता है।
उपरोक्त उल्लेख एवं उसके आधार पर निकाले गये निष्कर्ष के आधार पर जिला फोरम ने परिवाद आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उपरोक्त प्रकार से निर्णय और आदेश पारित किया है।
अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है विपक्षी द्वारा प्रत्यर्थी से बढ़े हुए मूल्य की मांग एग्रीमेंट के अनुसार की जा रही है। मूल्य निर्धारित करने का अधिकार जिला फोरम को नहीं है। जिला फोरम द्वारा पारित निर्णय और आदेश साक्ष्य और विधि के विरूद्ध है। अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि परिवाद जिला फोरम की अधिकारिता से बाहर है और परिवाद में मियाद भी बाधक है।
प्रत्यर्थी/परिवादी का तर्क है कि जिला फोरम द्वारा पारित निर्णय और आदेश साक्ष्य और विधि के अनुकूल है और अधिकार युक्त है। जिला फोरम के निर्णय और आदेश में हस्तक्षेप हेतु कोई उचित आधार नहीं है। प्रत्यर्थी का यह भी तर्क है कि अपीलार्थी द्वारा प्रस्तुत अपील काल बाधित है और विलम्ब का कोई कारण अपीलार्थी ने नहीं बताया है।
अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता ने अपने तर्क के समर्थन में निम्नलिखित नजीरें प्रस्तुत की हैं:-
Kartar Singh Vs Delhi Development Authority, I(2008) CPJ 93 (NC).
Ramesh Kumar Dua Vs Ghaziabad Authority, I(2008)CPJ(NC).
Tamil Nadu Housing Board Vs. J. Victor, II (2005)CPJ 214.
Aditya Prasad Soni Vs. United India Insurance Co. Ltd. II (2005)CPJ 217.
Jagdish Gurnani Vs. Lucknow Development Authority, 2010 SCC.
Radha Verma Vs. Vice Chairman Ghaziabad Development Authority. 2014 SCC.
मैंने उभयपक्ष के तर्क पर विचार किया है।
आक्षेपित निर्णय की नि:शुल्क प्रमाणित प्रतिलिपि दि0 30.10.2015 को अपीलार्थी/विपक्षी को जिला फोरम ने प्रदान की है और अपील दि0 30.11.2015 को प्रस्तुत की गई है। दि0 29.11.2015 को रविवार का अवकाश था। अत: अपील मियाद अन्दर है।
निर्विवाद रूप से प्रश्नगत भवन का विक्रय पत्र अभी निष्पादित नहीं किया गया जब कि कब्जा प्रत्यर्थी/परिवादी को विपक्षी/अपीलकर्ता द्वारा दिया जा चुका है। अत: परिवाद में मियाद बाधक नहीं है।
परिवाद प्रस्तुत किये जाने के समय परिवाद जिला फोरम के आर्थिक क्षेत्राधिकार की सीमा में रहा है। यह कहना उचित नहीं है कि परिवाद जिला फोरम की अधिकारिता से बाहर है।
निर्विवाद रूप से इकरारनामा दि0 25.04.1994 के अनुसार रू0 1,48,000/- प्रत्यर्थी/परिवादी ने जमा किया है। अपीलार्थी/विपक्षी के अनुसार अन्तिम मूल्य निर्धारण पर भवन का मूल्य रू0 1,63,800/- आया है। अत: अन्तर की धनराशि 15,800/-रू0 18 प्रतिशत ब्याज सहित प्रत्यर्थी के विरूद्ध अवशेष है।
इकरारनामा दि0 25.04.1994 के प्रस्तर 2 (a) (11) में प्राविधान है कि यदि ठेकेदार के बिलों या अन्य कारणों से भवन की लागत में वृद्धि होती है तो उसके भुगतान हेतु आवंटी बचन बद्ध है। अत: इकरारनामा की शर्त के अनुसार पुनरीक्षित लागत की अवशेष धनराशि के भुगतान हेतु प्रत्यर्थी/परिवादी उत्तरदायी है।
माननीय राष्ट्रीय आयोग ने करतार सिंह बनाम Delhi Development Authority, I (2008) C.P.J. 93 N.C. के वाद में स्पष्ट रूप से कहा है कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत फोरम को मूल्य निर्धारण करने का अधिकार नहीं है। माननीय राष्ट्रीय आयोग ने अपने इस निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रेमजी भाई परमार आदि बनाम डी0डी0ए0 (1980) 2 एस0सी0सी0 129 के वाद में प्रतिपादित सिद्धांत का अनुसरण किया है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का संगत अंश नीचे उदृत है:-
"A petition to the Supreme Court under Article 32 is not a proper remedy nor is the Court a proper Forum for reopening the concluded contracts with a view to getting back a part of the purchase price paid and the benefit taken. The DDA is covered by Article 12 and while determining the price of flats constructed by it, it acts purely in its executive capacity. But after the State or its agents have entered into the field of ordinary contract, no question arises of violation of Article 14 or of any other constitutional provision. In absence of any special statutory power or obligation on the State in the contractual field apart from the contract. The petitioners are bound by the terms and conditions of the contract. The camouflage of Article 14 cannot conceal the real purpose motivating the petitions, namely, to get back a part of the purchase price of flats paid by the petitioners with wide open eyes after flats have been securely obtained. Those who contract with open eyes must accept the burdens of the contract along with its benefits. Reciprocal rights and obligations arising out of contract do not depend for their enforceability upon whether a contracting party finds it prudent to abide by the terms of the contract. The jurisdiction under Article 32 is not intended to facilitate avoidance of obligations voluntarily incurred.
माननीय सर्वोच्च न्यायालय एवं माननीय राष्ट्रीय आयोग के उपरोक्त निर्णयों में प्रतिपादित सिद्धांत से स्पष्ट है कि अपीलार्थी ने प्रश्नगत भवन की जो अन्तिम लागत निर्धारित किया है उसमें हस्तक्षेप करने का जिला फोरम को अधिकार नहीं है।
अपीलार्थी के अनुसार पुनरीक्षित लागत मूल्य के अन्तर की मांग उसने प्रत्यर्थी से पत्र दि0 25.01.1997 के द्वारा की है, परन्तु यह पत्र प्रत्यर्थी को प्रेषित किया जाना और उसे प्राप्त होना प्रमाणित नहीं है। प्रत्यर्थी के अनुसार उसे इस पुनरीक्षित लागत मूल्य के अवशेष की जानकारी दि0 14.02.2003 को कम्प्यूटर शीट निकलवाने पर हुई है।
पुनरीक्षित लागत मूल्य पर प्रत्यर्थी ब्याज देने हेतु तब उत्तरदायी होगा जब वह मांग पत्र प्राप्त होने पर उसे अदा करने में चूक की हो और उपरोक्त विवेचना से स्पष्ट है कि पुनरीक्षित लागत मूल्य का मांग पत्र प्रत्यर्थी/परिवादी को प्रेषित किया जाना व उसे प्राप्त होना प्रमाणित नहीं है। अत: पुनरीक्षित लागत मूल्य के अन्तर पर प्रत्यर्थी ब्याज देने हेतु उत्तरदायी नहीं है। अत: इस धनराशि पर प्रत्यर्थी से जो ब्याज मांगा है वह उचित नहीं है। मांग पत्र प्रत्यर्थी को प्राप्त कराये बिना अन्तर की धनराशि पर ब्याज की मांग करना सेवा में कमी है।
उपरोक्त निष्कर्ष के आधार पर पुनरीक्षित लागत मूल्य के अन्तर की धनराशि रू0 15,800/- परिवादी द्वारा जमा करने पर विक्रय पत्र निष्पादित करने हेतु अपीलार्थी/विपक्षी को निर्देशित किया जाना उचित है और तदनुसार प्रत्यर्थी द्वारा प्रस्तुत परिवाद स्वीकार किया जाना उचित है।
उपरोक्त निष्कर्ष के आधार पर स्पष्ट है कि जिला फोरम ने जो अन्तर की धनराशि रू0 15,800/- की मांग को भी निरस्त किया है वह उचित नहीं है। जिला फोरम ने जो क्षतिपूर्ति रू0 50,000/- प्रत्यर्थी को दिया वह भी उचित नहीं है। प्रत्यर्थी आवंटित भवन पर कब्जे में है। जिला फोरम ने जो वाद व्यय रू0 10,000/- प्रत्यर्थी/परिवादी को दिलाया है उसे कम कर 5,000/-रू0 किया जाना उचित है।
उपरोक्त निष्कर्ष के आधार पर अपील आंशिक रूप से स्वीकार की जाती है और जिला फोरम का निर्णय व आदेश संशोधित करते हुए अपीलार्थी/विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा पुनरीक्षित लागत मूल्य के अन्तर की धनराशि 15,800/-रू0 जमा करने पर वह उसके पक्ष में विक्रय पत्र दो मास के अन्दर निष्पादित करे। अपीलार्थी, प्रत्यर्थी को 5,000/-रू0 वाद व्यय भी अदा करेगा। वाद व्यय की यह धनराशि उपरोक्त अन्तर की धनराशि 15,800/-रू0 में समायोजित की जा सकती है।
जिला फोरम का निर्णय व आदेश्ा 50,000/-रू0 क्षतिपूर्ति के सम्बन्ध में अपास्त किया जाता है।
धारा 15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत अपील में जमा धनराशि अर्जित ब्याज सहित अपीलार्थी को वापस की जायेगी।
(न्यायमूर्ति अख्तर हुसैन खान) अध्यक्ष शेर सिंह आशु0, कोर्ट नं0-1 [HON'BLE MR. JUSTICE AKHTAR HUSAIN KHAN] PRESIDENT