Lok Sabha Debates
Further Discussion On The Constitution Scheduled Castes Ordes (Amendment) ... on 30 July, 2002
14.20 hrs. Title: Further discussion on the Constitution Scheduled Castes Ordes (Amendment) Bill, 2001, moved by Dr. Satyanarayan Jatiya on 18,.7.2002. (Bill passed) MR. CHAIRMAN : Now, the House will take further consideration of the Constitution Scheduled Castes Orders (Amendment) Bill, 2001.
Shri Anandrao Adsul would continue his speech.
SHRI ANANDRAO VITHOBA ADSUL (BULDANA): Sir, basically the opinion of our Party’s supremo as well as the opinion of our Party is that reservation should be considered on income basis and not on caste basis. It is because our experience is that some good income people are getting the benefit of reservation in employment and other sectors in the name of caste while so many poor people are there in the society who are not getting those facilities. I know that this is a constitutional and policy matter.
Sir, people are getting some difficulties in getting the caste certificate. It is found that one caste is included in the Scheduled Caste category in one State while in another State, it is included in the Scheduled Tribe category. People are facing difficulties due to transfer or migration also. Sometimes, it is found that because of some difference in pronunciation or because of spelling mistakes, people are suffering. For example, people belonging to Gond and Gowari communities in Maharashtra are involved in the same profession or business. But on the record, these are two different communities. With the result, Gonds are getting the benefit of reservation whereas Gowaris are not getting those benefits. For the sake of example of spelling mistake, Balas are getting facilities of reservation but Balis are not getting those facilities.
Sir, last time also, I appreciated the hon. Minister for bringing this Bill. The hon. Minister has collected information from various States regarding difficulties that are faced by the people in getting these facilities. One more thing which I would like to bring to the notice of the hon. Minister is that in so many institutions, the services of the people are terminated in the name of false certificates. The certificate issuing authority had issued these certificates as per the records. But after 10 years or 15 years and after all those amendments, it is found that it is not as per today’s notification. That is why, the services are terminated after 10 years or 15 years or 20 years. That is a very serious matter. If it is found in some cases that somebody has obtained really a false certificate, he must be punished. But if any authority says that it is a false certificate after 15 or 20 years’ service, it is a matter of investigation and consideration. I think our Government will take care of it.
With these words, I again thank the hon. Minister for bringing this Bill and I support the Bill.
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): सभापति महोदय, जो विधेयक माननीय मंत्री जी ने जो विधेयक यहां प्रस्तुत किया है, उसमें कहा गया है कि अनुसूचित जाति की सूची में जिन जातियों के नाम दर्ज हैं उनमें कुछ स्पैलिंग मिस्टेक हैं, उनके सुधार हेतु यह विधेयक लाया गया है।
हम बार-बार सवाल उठा रहे हैं और सरकार से आग्रह भी किया है कि इस संबंध में एक कम्प्रीहैन्सिव बिल आना चाहिए। कई जातियों ऐसी हैं जो किसी राज्य में अनुसूचित जाति में, किसी राज्य में अनुसूचित जनजाति में है, किसी राज्य में पिछड़ी जाति में है तो किसी राज्य में अति पिछड़ी जाति में है। अत:सरकार को एक कम्प्रीहैन्सिव बिल लाना चाहिए।
इस बिल पर बहस करते हुए उधर से श्री कटारिया जी सरकार का जयकार करने लगे कि ये अनुसूचित जाति के बड़ा भारी कल्याण करने वाले हैं। हमने सब हिसाब लगाकर देखा कि नौंवी पंचवर्षीय योजना में सरकार ने यह फैसला किया था कि अनूसूचित जाति-जनजाति के लिए सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग १३ हजार करोड रुपये खर्च करेगा लेकिन सरकार को इस पैसे में कटौती करके संतोष नहीं हुआ। उसने दो बार पैसे में कटौती करके इसे साढ़े छ: हजार करोड़ रुपये कर दिया। मैं जानना चाहता हूं कि यह कटौती क्यों हुई ? जब पैसे घट जायेंगे तब उनका क्या भला होगा, क्या तरक्की होगी? जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक द्ृष्टि से पिछड़े हैं, दलित हैं, शोषित हैं, उनका सामाजिक स्तर नीचे से नीचे ही होता जा रहा है। हमारा कहना है कि उनको भी आगे आना चाहिए लेकिन पैसे में कटौती करने से यह कैसे होगा ? जुबानी मंतर से उनकी तरक्की कैसे होगी, यह मैं सरकार से पूछना चाहता हूं। दसवीं पंचवर्षीय योजना में कम पैसे का प्रावधान क्यों हुआ ? मेरी सरकार से मांग है कि उस पैसे में भी नौंवी पंचवर्षीय योजना की तरफ कटौती नहीं होनी चाहिए।
इसी तरह नौनिया जाति है। नौनिया जाति की संख्या बहुत अधिक है। ये सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पीछे है यानी दलित के समान है। लेकिन बिहार में इनका अति पिछड़ी जाति में नाम है। उनकी यूनियन ने दरख्वास्त भी दी है। समाज अध्ययन संस्थान बोर्ड की भी इस संबंध में अनुशंसा आई है। वहां के कमीशन ने भी अनुशंसा की है। राज्य सरकार ने भी अनुशंसा की है और हमने भी इस संबंध में सवाल उठाया था लेकिन नौनिया जाति के प्रस्ताव को अधिकारियों के जाल के कारण स्वीकार नहीं किया गया। वैस्ट बंगाल में नौनिया जाति अनुसूचित जाति में है जबकि बिहार में अति पिछड़ी जाति में है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में पिछडी जाति में उसका नाम है। मैं जानना चाहता हूं कि आप कब नौनिया जाति का सुधार करेंगे और इस संबंध में विधेयक लायेंगे या नहीं ?
मैं यह भी कहना चाहता हूं कि पान स्वासी का इस विधेयक में नाम है लेकिन ततमा और ताती का नहीं है। पान, स्वासी, ततमा और ताती का नाम अलग-अलग जरूर है लेकिन इनमें आपस में शादी विवाह होता रहता है। आपने पान स्वासी को अनुसूचित जाति में लेने का काम किया है लेकिन ततमा और ताती को छोड़ दिया है। मेरा कहना है कि ततमा को ही कहीं पान बोलते हैं, कहीं स्वासी बोलते हैं और कहीं स्वासा बोलते हैं, इनका कब सुधार होगा। आप इन्हें कब अनुसूचित जाति में लायेंगे क्योंकि इन जातियों के लोग भी दलित के समान है। ये सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक द्ृष्टि से पिछड़े हुए हैं।
इसी तरह दुराहा जाति है। ये सामाजिक आर्थिक और शैक्षणिक द्ृष्टि से बहुत नीचे हैं। यह भी दलित जाति के समान है लेकिन इसका भी नाम नहीं आ रहा है। वहां से राज्य सरकार नाम भेजती है लेकिन यहां हेराफेरी करके फिर से उसे वापिस भेज देते हैं। इसी तरह मल्लाह और साहनी जाति के लोग हैं जो मछली मारने का काम करते हैं। वभिन्न राज्यों में इनका नाम अनुसूचित जाति की श्रेणी में दर्ज है लेकिन बिहार में अति पिछड़ी जाति में इनका नाम है। इनकी सामाजिक आर्थिक हालत बहुत खराब है। इस तरह से चारों जातियां जिनका मैं उल्लेख कर रहा हूं, के नाम अनुसूचित जाति में डाला जाये। इनकी यूनियन बराबर इसकी मांग कर रही है। आप जानते हैं कि बिहार में अनुसूचित जाति-जनजाति और पिछड़ी जाति का जागरण है।
वहां पर अब वे लोग समता चाहते हैं, अबला न जानी, अबला न कहिहों-अब वे इस सिद्धान्त पर चल रहे हैं। अब तक उनका शोषण हुआ, सभी द्ृष्टिकोण से उनको पीछे नीचे छोड़ दिया गया, लेकिन अब वे लोग नीचे नहीं रहना चाहते हैं, आगे बढ़ना चाहते हैं। उनकी सामाजिक हालत खराब है। सरकार का उस तरफ ध्यान नहीं हैं, इसीलिए माननीय मंत्री जी मेरा निवेदन है।
माननीय मंत्री जी के साथ जो व्यवहार हो रहा है, वह भी हम जानते हैं। इस विभाग से उस विभाग में बराबर इनकी पोस्टें घटाने, कमाने और हटाने में लोग लगे रहते हैं। कुछ आर.एस.एस. के लोग मंत्री के विरुद्ध साजिश में लगे रहते हैं। इसकी जानकारी हमें होती रहती है। उधर से कोई नहीं बोलेगा, असली भेद तो मैं खोल रहा हूं। इसीलिए सारा सुधार करके, दसवीं पंचवर्षीय योजना में आप क्या खर्च करिएगा, ताकि अनुसूचित जाति, जनजाति और समाज के जो पीछे छूटे हुए लोग हैं, वे आगे आयें। डॉ. लोहिया कहा करते थे कि हिन्दुस्तान में जब तक अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों को जब तक शोषित रखा जायेगा, जब तक ये शोषण के शिकार रहेंगे। जब तक सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक आदि तमाम मामलों में इनको विकास और समता औरक बराबरी नहीं दी जायेगी तो दुनिया के मुल्कों में भी हिन्दुस्तान पिछली सीट पर बैठेगा। जब ये करोड़ों लोग आगे बढ़ेंगे, तब हिन्दुस्तान भी दुनिया के मुल्कों में आगे, ताकतवर मुल्क और एक नम्बर का मुल्क हो सकता है। इसीलिए सामाजिक न्याय का आन्दोलन चला क्योंकि सामाजिक न्याय के आन्दोलन के बिना ये करोड़ों लोग, जो मेहनतकश हैं, हमारे यहां यह बीमारी रही कि जो मेहनतकश लोग हैं, मेहनत करने वाले लोग हैं, उनको कहा गया कि ये छोटे हैं और जो मेहनत करने वाले लोग नहीं हैं, इनको कहा गया कि ये बड़े हैं। इस बीमारी के चलते करोड़ों लोग राष्ट्रीय मुख्य धारा से छूट गये, वंचित रह गये, शोषित रह गये।
इसीलिए संविधान निर्माताओं ने, बाबा साहेब अम्बेडकर और तमाम महान नेताओं ने संविधान में रिजर्वेशन का प्रावधान किया। आर्टिकल ३४० और ३४१ में यह प्रावधान किया गया है कि जो दबे हुए लोग हैं, राष्ट्र को मजबूत करने के लिए उनको आगे लाने की जरूरत है और उनको रिजर्वेशन दिया गया, विशेष सुविधा, पढ़ाई में विशेष ध्यान और सरकारी सेवाओं में आरक्षण दिया गया, लेकिन वह नाममात्र का आरक्षण रहा। इससे उनका विकास नहीं हो रहा है। इसीलिए हम बराबर मांग करते हैं कि जो प्राइवेटाइजेशन हो रहा है और ये डिसइन्वेस्टमेंट करा रहे हैं, कूद-कूद कर अपनी पीठ ठोक रहे हैं, जैसे देश की सम्पत्ति को बेचने में ये बहादुरी का काम करते हैं, लेकिन इसमें अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों के साथ भारी साजिश है। यह साजिश है कि सरकारी महकमे में रहने से आरक्षण मिलेगा, लेकिन उसे गैर-सरकारी कर दो, उसे प्राइवेटाइज कर दो, उसे मल्टीनेशनल के हाथ में बेच दो, पूजीपतियों के हाथों में बेच दो, ऐसा होने से आरक्षण खत्म हो जायेगा, उनका गला कट जायेगा। इसीलिए इस साजित का मैं भंडाफोड़ करना चाहता हूं। आप क्यों नहीं प्रावधान करके उसमें दर्ज करते हैं कि प्राइवेट नौकरियों में भी आरक्षण का प्रावधान किया जाये।
न्यायिक सेवा में नेशनल ज्यूडीशियल कमीशन बनाने की बात थी। सरकार कह रही है कि इस पर विचार करना है। हम लोग बराबर विचार दे रहे हैं कि नेशनल ज्यूडीशियल कमीशन हो और उसमें अनुसूचित जाति, जनजातियों के लिए रिजर्वेशन का प्रावधान हो, हर सैक्शन में उनका स्थान हो, हिस्सा हो, तब देश आगे बढ़ेगा। इसीलिए हमारा यह स्पेसफिक सवाल है कि ये चार जातियां बिहार में हैं, जो अति पिछड़ी श्रेणी में हैं, नोनिया, तुरहा, ततमा/तांती, साहनी/मल्लाह, इनके लिए ये विधेयक लाएं और एक कॉम्प्रीहेंसिव विधेयक लाकर उसका प्रावधान किया जाना चाहिए।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
SHRI TRILOCHAN KANUNGO (JAGATSINGHPUR): Sir, I rise to support this Constitution Scheduled Castes Orders (Amendment) Bill, 2001. Everybody supports this Bill. There are two articles in the Constitution of India, which I would like to refer to. One is article 341 (1) and the other is 341 (2). Article 341 (1) has given powers to the President of India to declare a group as a Scheduled Caste or Scheduled Tribe. Then, article 341 (2) has given powers to Parliament to enact a law in this regard. These are two independent steps. They are independent of each other because, if the first step is adopted, even then a group could be included in the list of Scheduled Castes or Scheduled Tribes. The second step, though independent, is a final one. Now, this is the final step, which we are going to enact for some Union Territories and States. Nobody will oppose this Bill because it deals with inclusion of some sections in the list of Scheduled Castes. But everybody has given some suggestions. I also would like to add some suggestions. My suggestions relate to Orissa.
14.37 hrs. (Dr. Raghuvansh Prasad Singh in the Chair) In Orissa, long back there was a case in the High Court, known as Narayan Behera versus the State of Orissa, wherein Dheebar and Keuta were included in the Dewar caste. That has to be ratified now. My point is that Dheebar, Kaivartha and Keuta form part of Scheduled Castes. There are some groups, who in fact belong to Kaivartha Dheebar caste, but have not been included in the Scheduled Castes. I am reading out those sub-castes. They are part of them; they have their relations; and they are of the same profession. But in their patta, they are known as some other sub-caste, that is like Radhi, Ghani, and Niari. These three sub-castes belong to Dheebar, the Kaivartha and the Keuta caste. I do not know when Government will include these castes in the Scheduled Castes or declare these groups as Scheduled Castes. Why have they not taken these groups into consideration? I want a straight answer from the hon. Minister. Will he kindly consult the Government of Orissa or use his independent agency to find out whether these Radhi, Ghani and Niari castes belong to the caste of Dheebar or not? If they are, then kindly see that they are also included in the list of Scheduled Caste at the earliest. Now, the job opportunities have been squeezed, so far as Scheduled Castes and Scheduled Tribes are concerned. There are no job opportunities now. Jobs have been taken away by those people who have already benefited-the creamy layer of Scheduled Castes and STs. If the hon. former President’s son competes on the reservation quota, then naturally the poorest man in the village will be deprived of that job.
Therefore, some sort of an arrangement should be made so that the first generation and second generation beneficiaries should be excluded from the benefits meant for the Scheduled Caste and the Scheduled Tribe people. That is my humble suggestion. The poorer people belonging to the Scheduled Caste and the Scheduled Tribe who are living in the rural areas should get the benefits if some jobs are available in the country. That is the suggestion I make to the hon. Minister. I hope the hon. Minister will take that into consideration. I am not going to the problems of other States. It has been said that in some other states like Andhra Pradesh States they are declared as belonging to scheduled castes only in two districts. People who would migrate to some other districts will not get the benefit because they will not be termed as belonging to Scheduled Caste. In Andhra Pradhesh, they declared that the people in two districts only would be termed as belonging to these two castes and they would get the benefits. If there are such people in some other districts, they will not be taken as belonging to the Scheduled Caste community. Therefore, my request is that firstly a very comprehensive list of SCs be prepared and secondly the benefit should go to the poorer section of the Scheduled Caste people. Thirdly the Radhi, Ghani, Niari who are part of Keuta, Kaibartaand Dewar caste. They should be included in the Scheduled Caste List for Orissa.
With these words, I conclude.
DR. BIKRAM SARKAR (PANSKURA): Sir, I am grateful to you for having given me this opportunity to rise to participate in the discussion on the Constitution Scheduled Castes Orders (Amendment) Bill, 2001.
At the very outset, I congratulate the hon. Minister Dr. Satyanarayan Jatiya for bringing forward this Bill for discussion and passing. I support the Bill. While supporting it, I would like to take this opportunity of making a few observations.
Firstly, I would like to state that these 81 communities have to wait for a long period of 52 years to be included in the List of Scheduled Castes in 18 States and Union Territories as mentioned here. They have been deprived of this facility for all these 52 years. It is a matter of shame and disgrace. In this, if we go deep into things as to why the delays have taken place, there are so many partners and players in this. The National Commission for Scheduled Castes and Scheduled Tribes is there. The most important partner is the State Government. Then there is the Registrar-General of India. After that there is the Government of India. I know for certain because I had to handle this for five years from 1982 to 1987 in my earlier capacity in the Ministry. I know that these things are kept pending for years together, if not decades, in the States. Whenever any question is put to the hon. Central Minister, who is in charge of this, he says: "It is pending with the State Government. What can we do?" This sort of helplessness would not take us anywhere. I know for certain that there are quite a number of mindsets in this matter. When the names of 81 communities were correctly recorded in the orders of the years 1950, 1951, 1956 and 1962, they got the benefits. But due to no fault of their own, they have been deprived of this but who are going to get it now. Who will compensate the earlier generations who have been deprived of this? Therefore, I make a suggestion at the very beginning that instead of throwing the hands in helplessness, the Central Government should take the initiative to impress upon the State Government.
May I suggest two things? The hon. Prime Minister should take a meeting of all the Members of Parliament of both the Houses belonging to the Scheduled Caste and the Scheduled Tribe to impress upon them about this aspect. Secondly, this should form an important agenda item of all the meetings of the Chief Ministers of different States organised by the Central Government in any such matter particularly by the Minister concerned.
Sir, this Bill is just to enable them to have their names recorded in the list so that they become eligible to get certain benefits provided to them in the Constitution. It is nobody’s charity. It not a question of doing a great thing. They have been deprived of these benefits for a very long time. As I said earlier, this is only a beginning. This should be followed by economic development of the Scheduled Castes.
Sir, as you yourself have mentioned earlier, if you see the total amount allocated in the Special Component Plan for the Scheduled Castes and the Tribal Sub-Plan for the Scheduled Tribes at the beginning of a Plan period and if you see at the end of the Plan, the amount spent is just about 50 per cent. So, this shows that there is a mind block somewhere. Even though Dr. B.R. Ambedkar and our forefathers, the framers of the Constitution, put this in the Constitution, this is given lip service. I know of many States in India where the amount allocated for the welfare of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes, even when it is shown as spent, has not been spent for the purpose for which it has been given.
Sir, out of a little more than 100 crore population of our country today, 22 to 25 crore people are the Scheduled Castes and 8 crore people are the Scheduled Tribes. It is generally shown, by a rough estimate, that 20 per cent of them are living below the poverty line. This means that 20 crore people are below the poverty line. Now, if you see the poor Scheduled Castes, you will find that the total number is 12 crore. That means, out of 25 crore, 12 crore are living below the poverty line. It comes to 48 to 49 per cent, almost 50 per cent, whereas if you deduct this figure from the total population of the country, it comes to 75 crores of the remaining people. So, out of 75 crore, only 8 crore are living below the poverty line and this comes to a little more than 10 per cent. The gap between 50 per cent and 10 per cent is yawning. It is five times more. Therefore, it is all the more essential for us, if we are honest to ourselves, to see that the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes should be given the topmost priority so far as their economic development is concerned.
Sir, Shri Trilochan Kanungo has mentioned in his speech that the first generation and the second generation of the Scheduled Castes should not be given reservation in service. I would like to say that 15 per cent of posts are reserved for the Scheduled Castes. In all these years, apart from the post of Sweeper, others are not getting filled up. So, who gets them? The Brahmins and caste Hindus get them. They have a vested interest in this. They would not like to part with it. They are crying from the rooftops that it should go to the poorest of the poor. Is there any Brahmin or caste Hindu here who is asking whether this is going to the poorest of the poor?
SHRI SATYAVRAT CHATURVEDI (KHAJURAHO): Here is one.
DR. BIKRAM SARKAR : Sir, he may be an exception.
Therefore, what happens is, they are not getting the right type of benefits which should go to them whether it is in the field of education or in the form of economic development.
Sir, you are from Bihar and you know for certain that the money flowing from the Central Government whether for IRDP or for any other economic development programme, a big part of it is going away in some other direction and the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes are not getting the benefits meant for them. Otherwise, in all these 52 years, the incidence of poverty among the Scheduled Castes would not be five times more than that of others.
I have given a suggestion to the hon. Minister, through you, to have a look at it and to take it with all seriousness. So far as this particular Bill is concerned, as I said, it is better late than never, but there are some questions. It is generally suggested that there should be a comprehensive Bill for the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes. It would take one hundred years if not more and had we waited for the comprehensiveness, these people who have been suffering for more than 52 years would have suffered for another hundred years. Therefore, instead of going for that, we should go in for a piecemeal measure. But it should be a time-bound programme impressing upon the State Governments to take it up seriously and all of them, all the partners and the actors in this should work in unison and in a time-bound manner.
श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी :माननीय सभापति महोदय, प्रागैतिहासिक काल में और उसके बाद वैदिक काल में देश में समाज को संचालित और नियमित करने के लिए जाति व्यवस्था बनी। मूलत: इस जाति व्यवस्था के पीछे जो सिद्धान्त था वह कर्म आधारित जाति व्यवस्था का था। अगर आप वैदिक साहित्य को पढ़ें, ऐसे एक नहीं, दो नहीं सैंकड़ों उदाहरण आपको मिलेंगे जहां एक शूद्र का बेटा अन्तत: ऋषि हुआ और उसी ऋषि का एक बेटा क्षत्रिय हुआ, दूसरा बेटा शूद्र हुआ और तीसरा ब्राहमण हुआ। जिस अभिरुचि से जिस कर्म को अपनाया, जिस प्रगति और स्वभाव के अनुसार कर्म अपनाया, जाति उसके कर्म के आधार पर होती थी न की जन्म के आधार पर, जैसा होता है लेकिन बाद में समाज विकृत हुआ। बाद की जो सामाजिक व्यवस्था बनी, वह जन्म आधारित बनी और जातीयता का भी निर्धारण जन्म के आधार पर होने लगा। तब से समाज में शोषण करने का एक वशिष्ट वर्ग पैदा हुआ चाहे वह ब्राहमण हो, क्षत्रिय हो, एक दूसरा वर्ग पैदा हुआ जो व्यापारियों का था। जो सबसे निचला वर्ग था जो सबसे गरीब, दलित, कमजोर, उपेक्षित था उन सारी दलित जाति के लोगों को सबसे नीचे शूद्र जाति में डाल दिया गया। निरन्तर हजारों वर्षों तक इस सारे समाज ने वे चाहे ब्राहमण हों. ठाकुर हों, चाहे क्षत्रिय हों, चाहे वैश्य हों, हमने समाज की इस व्यवस्था में एक बहुत बड़े वर्ग का निरन्तर शोषण किया। हमने उनके साथ सामाजिक भेदभाव किया। हमने उनको कभी आर्थिक स्थिति से सम्पन्न होने का अवसर नहीं दिया। हमने उनको शिक्षा के साधनों से वंचित रखा। उनको पूरी तरह शक्षित होने नहीं दिया, बराबरी के दर्जे पर आने नहीं दिया। आजादी के बाद जब संविधान बना तो संविधान के रचयिताओं ने इस बात का चिन्तन किया कि इस देश की सामाजिक व्यवस्था में जो कुरीतियां, विकृतियां हैं, उनको कैसे कम करें और कैसे सभी को समान रूप से समान धरातल पर लाएं। उद्देश्य यह था कि आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से समाज में व्याप्त कुरीतियों, विकृतियों, भेदभाव और छुआछूत की बुराइयों को समाप्त किया जाए। इसी उद्देश्य के तहत संविधान ने ऐसी जातियों को अनुसूचित किया, जन जातियों को अनुसूचित किया, उन्हें विशेष सहायता राज्य से देने का निश्चय किया। अब मैं इसके विस्तार में जाना नहीं चाहता। मैंने पृष्ठभूमि इसलिए दी क्योंकि इस पृष्ठभूमि के प्रकाश में हमें देखना है कि आज हम कहां पहुंचे हैं? देश के वभिन्न हिस्सों से जितनी जातियों का उल्लेख आज के इस विधेयक में किया गया है, आप उनमें कुछ तकनीकी सुधार कर रहे हैं और कहीं स्पैलिंग का सुधार कर रहे हैं। उनमें कुछ नई जातियां जोड़ी गई हैं जिन का मैं स्वागत करता हूं। जितने भी कमजोर, दलित और शोषित तबके के लोग हैं, उनको सरकार से संरक्षण मिलना चाहिए, यह उनका अधिकार है और सरकार की जिम्मेदारी है, संवैधानिक जिम्मेदारी है लेकिन मैं आपसे बहुत सहमत हूं जब आपने कहा कि वर्षों से ऐसी अनेकों जातियां आज भी मौजूद हैं जिन की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति दलित शोषित वर्ग में आती है लेकिन आज भी उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया गया।
कुछ उस कारण से राज्य सरकारों के स्तर से लापरवाही हो रही है लेकिन जहां राज्य सरकारों के स्तर से लापरवाही हो रही है, क्या वहां केन्द्र सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी? केन्द्र सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह स्वयं संविधान की मंशा के अनुसार पालन करे और राज्य सरकारों को इसके लिये बाध्य करे। आप यह कहकर बरी नहीं हो सकते कि राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारी को पूरा नहीं कर रही हैं, इसलिये केन्द्र सरकार कुछ नहीं कर सकती। यह बहाना आपका उचित नहीं है और ऐसा कह कर हम राज्य सरकारों की लापरवाही को प्रोत्साहन दे रहे होंगे। इसलिये मेरा आपसे अनुरोध है कि ऐसी राज्य सरकारें, जो संविधान की मंशा को पूरा नहीं कर रही हैं, उन राज्य सरकारों के लिये आप सख्त और कड़े आदेश जारी करें और समयानुसार और निश्चित समयावधि में ऐसे समस्त प्रस्तावों को यहां भेजने के लिये बाध्य करें। अगर वे ऐसा नहीं कर रही हैं तो उसके लिये उपाय करें ताकि वे बाध्य हों।
सभापति महोदय, जहां राज्य सरकारों की गलती है, वह बात तो समझ में आती है, कुछ राज्य सरकारों ने अपनी विधान सभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर के केन्द्र सरकार को भेज रखा है। हमारे यहां से ऐसा प्रस्ताव दो-तीन साल से नहीं, ११ साल से मध्य प्रदेश सरकार ने ‘ धोबी और रजत’ जाति के लोगों का एक प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेज रखा है। इस जाति के लोगों को अनुसूचित जाति में सम्मिलित करने के लिये प्रदेश सरकार ने केन्द्र सरकार को एक प्रस्ताव भेज रखा है। धोबी,रजत और बरेठा जाति को प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों मे अलग-अलग नाम से जाना जाता है। मध्य प्रदेश के रायसेन, सीहोर और होशंगाबाद जिले में धोबी को अनुसूचित जाति का मानते हैं लेकिन प्रदेश के अन्य हिस्सों में इसे पिछड़ा वर्ग के अंदर मानते हैं। इसी तरह हमारे वदिशा के सांसद श्री शिव राज सिंह चौहान के क्षेत्र में रायसेन और वदिशा दो जिले आते हैं। रायसेन में धोबी को अनुसूचित जाति लेकिन वदिशा जिले में पिछड़े वर्ग से जानते हैं। ऐसा विसंगतियां बनी हुई हैं। इस विसंगति को दूर करने के लिये सरकार की ओर से प्रयास होना चाहिये लेकिन कमीशन और सरकार के स्तर से लापरवाही हो रही है। अगर इसमें कोई तकनीकी कारण है तो उनके साथ न्याय नहीं हो रहा है। मेरे ख्याल से सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिये।
तीसरी बात यह है कि जैसा एक माननीय सदस्य ने इस बात को स्वीकार किया और सभापति महोदय, आपने भी माना, मैं आपकी इस बात से सहमत हूं। मछली पालन करने वाले, पकड़ने वाले लोगों को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है। मैं बुंदेलखंड से आता हूं जहां इनके ७-८ नाम हैं। कहीं इसे धीवर, कहीं धीमर, कहीं रैकवार, कहीं केवट, कहीं मल्लाह, कहीं कहार, कहीं मछुआ और कहीं मांझी कहते हैं। ये क्षेत्रीय नाम हैं लेकिन जाति एक है, काम और कर्म एक है। इन लोगों की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षणिक अवस्था इतनी नीचे हैं कि हमेशा इन लोगों को उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है।
सभापति महोदय, पिछले सत्र में, जब इसी तरह के एक संविधान संशोधन विधेयक पर चर्चा हो रही थी, मैंने अनुरोध किया था …( व्यवधान)सामने सब रामभक्त बैठे हुये हैं। भगवान राम को भी केवट ने पार लगाया था, आज वही लोग आप से अपेक्षा कर रहे हैं कि आप उनको पार लगाने के लिये कम से कम न्यायोचिते द्ृष्टिकोण अपनायें।
इसलिए मैं आपसे अनुरोध करना चाहता हूं कि इनकी आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक अवस्था को देखते हुए, ये पूरी तरह से दलित और शोषित वर्ग के लोग हैं, इन्हें भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजात 15.00 hrs. (Mr. Deputy Speaker in the Chair) में सम्मिलित किया जाना चाहिए, अनिवार्यत: किया जाना चाहिए। देश के दूसरे प्रदेशों में इन जाति के लोगों को अनुसूचित जाति में शामिल किया गया है। परंतु एक हिस्से में ऐसा किया जाए और दूसरे हिस्से में न किया जाए, इस विसंगति को दूर किया जाना चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय, तीसरी और अंतिम बात कहकर मैं अपना वक्तव्य समाप्त करूंगा। आरक्षण के मामले पर यहां बहुत सारी चर्चा हुई। इस पर वभिन्न लोगों के वभिन्न मत हैं। इसमें मेरा एक अनुरोध है। हमने यह देखा है और हम सब यह महसूस करते हैं चाहे वे अनुसूचित जाति के हों या अनुसूचित जनजाति के लोग हों, इन दोनों जातियों, दोनों वर्गों के अंदर आज अगर आप देखें कि बहुत से लोग आई.ए.एस., आई.पी.एस. अफसर भी हैं और वभिन्न वर्गों में उच्च पदस्थ अधिकारी भी हैं। इनमें से कुछ लोग अच्छा व्यापारिक काम भी कर रहे हैं। जो क्रीमी लेयर पर पहुंच गये हैं, जिन्हें पिछले ४०-५० वर्षों में इसका लाभ मिल चुका है। जिनका रहन-सहन, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति सब कुछ बदल गया है। लेकिन आज भी हम उनके बच्चों को निरंतर वही लाभ दिये चले जा रहे हैं। क्या इस पर चिंतन नहीं होना चाहिए। मैं किसी वर्ग या जाति के विरुद्ध नहीं हूं, परंतु मैं एक व्यावहारिक प्रश्न उठाना चाहता हूं कि क्या ऐसे लोग जिनकी सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक अवस्था विकसित जातियों में पहुंच गई है, वे उस अवस्था को पार कर चुके हैं। लेकिन आज भी उन्हें दकियानूसी तरीके से आंखें मींचकर वे सारे लाभ दिये जाने का क्या औचित्य है। क्या इस पर चिंतन नहीं होना चाहिए। ऐसे भी अनेक लोग हैं जो इन लाभों से पूरी तरह से वंचित हैं, क्योंकि सरकार के पास संसाधनों की कमी होती है। यदि वे वर्ग हमसे छूट जाते हैं, जिन्हें वाकई में मदद की जरूरत है, जिन्हें वाकई में मदद दी जानी चाहिए, उन्हें मदद नहीं मिल पा रही है। लेकिन जिन्हें अब मदद की कोई आवश्यकता नहीं है, जो इन लाभों को प्राप्त करके स्थिति में ऊपर उठ चुके हैं, उन्हें आज भी मदद मिलती जा रही है। एक बार इस बात पर नीतिगत चिंतन होना चाहिए। मैं कहता हूं कि इसमें कोई पार्टी का सवाल नहीं है, क्योंकि यह एक राष्ट्रीय मुद्दा है, जिस पर सभी लोगों को एक मत से बैठकर चिंतन करना चाहिए। जहां तक हो सके हमारा यह प्रयास होना चाहिए और हमारी सारी व्यवस्था इस द्ृष्टि से बनाई जानी चाहिए कि हम यह देखें और सुनिश्चित करें कि जो सबसे अधिक कमजोर वर्ग के लोग हैं, उन तक सबसे पहले लाभ पहुंचे। जो उनसे थोड़ा बेहतर स्थिति में हैं, उन्हें थोड़ा बाद में लाभ पहुंचे और जो इस स्थिति को पार कर चुके हैं, जो विकसित हो चुके हैं, उन्हें अब लाभ नहीं दिया जाना चाहिए। क्योंकि उन्हें अब लाभ देना हमारे संसाधनों को व्यर्थ में खर्च करने के बराबर होगा। इसलिए मैं आपसे अनुरोध करूंगा कि इस पर समग्र रूप से एक चिंतन हो और हम दकियानूसी तरीके से न चलें। हमारी व्यवस्था में अनेक विकृतियां हैं, मंत्री जी भी जानते हैं और आप सभी जानते हैं, कभी लाल फीताशाही की वजह से चीजें अटक जाती हैं, कभी राजनीतिक आंकड़ेबाजी के वजह से चीजें अटक जाती हैं। मैं समझता हूं कि ऐसी जातियों एवं गरीब तबके के लोगों को मदद करने के मामले में इन चीजों को आड़े नहीं आने देना चाहिए। मैं इन्हीं शब्दों के साथ अपेक्षा करता हूं कि मंत्री जी मैंने जो सुझाव दिये हैं कि धीवर जाति और जो उनसे जुड़ी हुई जातियां हैं, मध्य प्रदेश में विशेष रूप से धोबी जाति, इन दोनों जातियों के साथ न्याय होना चाहिए और उन्हें अनुसूचित जातियों में जरूर सम्मिलित किया जाना चाहिए। मैं आशा करता हूं कि आप इस सकारात्मक द्ृष्टिकोण अपनायेंगे।
*SHRI S. MURUGESAN (TENKASI): Hon’ble Deputy Speaker Sir, I thank the Chair for giving me an opportunity to participate in this discussion on the Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Amendment) Order Bill as provided for in the Constitution. The aim and objective of this Amendment Bill has been stated clearly. The proposed Amendment Bill falls under the categories of removing certain anomalies in the list, correction of spelling errors, inclusion of synonymous communities, imposing area restrictions, checking linguistic and phonetic variations and clubbing certain entries.
Several members of this august House have already put forth their views and rendered valuable suggestions while they participated in this discussion on this Amendment Bill.
Right from the days when we have got freedom and even after our having given to ourselves the Constitution framed by Dr Ambedkar, we find the living conditions of the Dalits the deprived sections of the society have not improved much. So to say that they remain what they were. Those who have come in life from among these sections of the society are negligible. Their number can be easily counted. But many others, the majority of this class remains most backward still. When we take the total population of the country, more than 35% of them are Dalits and belong to the deprived sections of the society. Many of them live below the poverty line. They struggle in life to fend for themselves. They strive for the dignity with which they must be treated equally well in the society. Many of them could not earn their daily bread. Many of them go without even a single square meal a day. What is the reason for this malady and why does it continue still. Several commissions and committees have come and gone specifically set up for this. But the Dalits remain in poor condition still. Their lot has not improved. There is no rise in their living standards. They have not met with progress fully as yet even after so many committees have been set up to probe and analyze the disparity. A change for better has not come about.
Whatever that has been provided for in the Constitution and whatever that has been offered by the Governments have not yet reached the Dalits. It has not percolated benefiting them directly. Why is there a lacuna? Is it being snatched away by those who come in between in handling these plans and schemes?
Through you, I would like to raise a pertinent question in this august House to the Government of the day as to the measures they have taken so far to remove this lacunae and imbalance.
I have also gathered that the benefits accruing out of the plans and schemes evolved and implemented for the Dalits are taken away by those who are already well off and have come up in life improving their living conditions. Those who have progressed already are cornering these benefits aimed at the downtrodden and underprivileged.
I would like to bring to the notice of this august House the fact that the benefits meant for the Dalits be it in education or employment or financial assistance schemes have all been gobbled up by those who have progressed already in life. Those who have bettered their standard of life continue to get these benefits that is aimed at uplifting the downtrodden. Those who remain backward and live in pitiable conditions especially in rural areas are not able to get the benefits of reservation. This goes on because the poor masses of the rural areas especially the Dalits and the deprived classes are not even aware of the schemes that are available to them. They need to be informed and educated about the benefits of reservation available to them.
For instance, take into consideration the reservation facilities available in the field of education. Those who have improved their living standards and those of them who live in urban areas and towns provide their children with better education with better facilities if need be even in convent schools. But the Dalit children hailing from rural areas study only in the village schools. It is evident that there is disparity. The children of the better off among the Dalits get better education and better marks. But at the same time their country cousins Dalit children from the rural areas are deprived of even admission facilities as they could not get better marks and compete with their urban counterparts. Children of top officials and better placed people garner the benefits of the facilities available through reservation in education. Whereas the deprived sections in the rural areas are still ignorant of the facilities that are available to them. The better off among Dalits become better and better. They take away the cake from their country cousins. They corner all benefits available both in basic education and in higher education and even in job opportunities.
I urge upon the hon. Minister to take note of this glaring disparity and I would like to impress upon him to contemplate and bring about suitable amendments in the coming years. A comprehensive Bill can be thought of to take the benefits to the really deprived and traditionally marginalised.
I would like to point out a social measure brought about by our beloved and respected leader Dr Puratchi Thalaivi in Tamil Nadu. With a vision and purpose she has envisioned, evolved and implemented a welfare scheme to benefit the children from the rural areas. Rural students are provided with bicycles to go to educational institutions and pursue their studies to come up in life. About one and a half lakh girls studying ‘plus two’ have been provided with bicycles. Centre and other States must emulate Tamil Nadu. In order to ensure that the benefits reach the rural masses directly suitable measures and methods must be evolved. Through this august House I urge upon the Government to take effective steps to carry forward the benefits of reservation to the really needy in the rural areas.
Both in education and employment the benefits come about through reservation must reach the poor people living in villages. The rural masses must not be sidelined and viable way out must be evolved to ensure that reservation benefits reach them directly.
I would request the hon. Minister, through you, Sir, to please think about these points. There should be some political will for the uplift of the Scheduled Castes, Scheduled Tribes and downtrodden people because now the Government’s policy is globalisation and they are not getting job opportunities and other benefits.
With these words, I conclude my points.
__________________________________________________________________ *English Translation of the speech originally delivered in Tamil.
श्री अनंत गुढे (अमरावती): माननीय उपाध्यक्ष जी, मैं माननीय मंत्री जी का कुछ जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने एवं कुछ के स्पेलिंगों ठीक करने के बारे में संविधान संशोधन विधेयक लाने के लिए धन्यवाद करता हूं, लेकिन मुझे दुर्भाग्य से यह कहना पड़ता है कि महाराष्ट्र भी एक ऐसा राज्य है जहां इस प्रकार की जातियां हैं जिन्हें अनुसूचित जाति में शामिल किया जाना चाहिए, लेकिन महाराष्ट्र के बारे में इस विधेयक में कुछ नहीं सोचा गया है। जो जातियां महाराष्ट्र में अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल की जानी चाहिए उन्हें उन नामों से शामिल नहीं किया गया है बल्कि अन्य नामों से शामिल किया गया है। इससे जो सुविधा उन्हें मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल रही है।
उपाध्यक्ष जी, मैं ऐसी जाति के बारे में बताना चाहता हूं जिसके बारे में अभी हमारी पार्टी के श्री आनन्दराव विठोबा अडसुल जी ने बताया वह गोवारी जाति है जिसकी पूरे महाराष्ट्र में लगभग २५ लाख आबादी है, लेकिन यह जाति अनुसूचित जाति की सूची में गोंड-गोवारी नाम से दर्ज है जबकि महाराष्ट्र में ऐसी कोई जाति नहीं है। गत ३०-३५ सालों से महाराष्ट्र की गोवारी जाति के लोग आन्दोलन कर रहे हैं कि गोंड-गोवारी नाम की कोई जाति नहीं है। गोंड अलग जाति है जिसको अनुसूचित जाति की सुविधाएं मिल रही हैं और गोवारी अलग जाति है, लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला। इस जाति के लोग पिछले ३५ वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं, प्रदेश में धरने दे रहे हैं और आंदोलन कर रहे हैं। कभी मार्च किया, कभी घेराव किया।
महोदय, १९९५ में तो ऐसा हुआ कि महाराष्ट्र की विधान सभा, नागपुर में जब गोवारी जाति के गांव में बसने वाले लोग, कसबों में रहने वाले लोग, जिनकी कोई शैक्षणिक योग्यता नहीं थी, वे लाखों की संख्या में एकत्रित होकर आ गए और विधान सभा का घेराव कर लिया। उस समय की महाराष्ट्र सरकार ने उनकी बात तो नहीं मानी, बल्कि उनके ऊपर गोलियां चलवाईं और बहुत बड़ी संख्या में उन लोगों को मारा गया। उस समय हुई गोलीबारी में १०२ गुआरी जाति के लोग आन्दोलन में शहीद हुए। वहां राम दास गोवारी नाम से मारे गए गोवारी जाति के एक बड़े नेता का एक बहुत बड़ा स्टैच्यू भी बना हुआ है। शहीद स्तम्भ भी वहां जनता ने बनाया, लेकिन इस जाति के लोगों को आज तक न्याय नहीं मिला।
महोदय, मेरी माननीय मंत्री जी से दख्र्वास्त है कि जो गोंड-गोवारी जाति अनुसूचित जाति में शामिल है उसमें से गोंड शब्द को अलग किया जाए और गुआरी जाति को अलग किया जाए। जो गुआरी जाति है उनका न कोई बिजनैस है और न उनकी कोई शैणिक योग्यता है और न उनकी कोई तरक्की हुई है। इस जाति की आज भी सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। इसलिए इस जाति के लिए संविधान में संशोधन करने वाला विधेयक लाना चाहिए तथा इस जाति को अनुसूचित जाति की सुविधाएं मिलनी चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय, मैं अमरावती संसदीय क्षेत्र से आता हूं। इस क्षंत्र में गवली नाम की एक जाति है जिसे गवलान भी कहते हैं। यह सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक द्ृष्टि से अत्यन्त पिछड़ी जाति है, लेकिन महाराष्ट्र में इस जाति को भी अनुसूचित जाति की सूची में नहीं रखा गया है। इस जाति के लोग गाय-भैंस और भेड़ बकरी चराने का काम करते हैं। इस जाति के लोगों को कहीं-कहीं गद्दी-गुज्जर भी कहा जाता है। पूरे देश में इस जाति के लोगों को अनुसूचित जाति की सुविधाएं प्राप्त हैं, लेकिन महाराष्ट्र में इस जाति को किसी अन्य जाति के नाम से सूची में रखा गया है जिसके कारण उन्हें अनुसूचित जाति की सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। ये लोग घुमन्तू जाति के भी होते हैं। उनके बच्चे कहीं पैदा होते हैं और कहीं पढ़ते हैं। ये लोग भेड़-बकरी चराने के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान को आते-जाते रहते हैं। इस जाति के लोगों ने बहुत संघर्ष किया है, कई बार महाराष्ट्र विधान सभा में यह इश्यू उठा, लेकिन केन्द्र सरकार ने इसके बारे में अभी तक विचार नहीं किया। इसलिए मैं केन्द्र सरकार और मंत्री महोदय से विनती करता हूं कि इन दोनों जातियों के बारे में, गोंड-गोवारी जाति के नाम में से गोंड को अलग करने और गोवारी को अलग करने तथा गवलान जाति, इन दोनों को अनुसूचित जाति में सम्मिलित करने के बारे में संशोधन लाएं जिससे उन्हें अनुसचित जाति की सुविधाएं मिल सकें । कई बहुत पिछड़ी जाति भी रह चुकी हैं। सारे महाराष्ट्र का ध्यान इसके ऊपर है। महाराष्ट्र विधान सभा में भी कई बार यह प्रश्न उठ चुका है लेकिन अभी तक उस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया। मैं यही बात कहकर अपनी बात समाप्त करता हूं।
आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
डॉ.लक्ष्मीनारायण पाण्डेय (मंदसौर): उपाध्यक्ष महोदय, मुझे भाषण नहीं करना है। मैं मंत्री जी से एक ही निवेदन करना चाहता हूं कि मुझे आज ज्ञापन मिला है कि धोबी समाज को भी अनुसूचित जाति में लिया जाए । लेकिन मेरा कहना है कि राजस्थान में तो माना गया है कि मध्य प्रदेश में ऐसा नहीं है। केवल दो जिलों में ही हैं। आप इसे शेष जिलों में भी ले लें। मध्य प्रदेश सरकार इसकी अनुशंसा नहीं भेज रही है इसलिए मेरा कहना है कि आप उनसे यह मंगवा लें।
डॉ. सुशील कुमार इन्दौरा (सिरसा) : उपाध्यक्ष महोदय, मुझे भी एक निवेदन करना है। हमें भी कई बार मेमोरेंडम मिले हैं, क्योंकि मैं इस कमेटी का चेयरमैन भी हूं। मैंने इस संबंध में कई बार रिकमेंडेशन भी भेजी है कि नायक जाति को इसमें शामिल किया जाये क्योंकि उसके साथ अनुसूचित जाति जैसा व्यवहार किया जाता है। इस संबंध में कई बार रजिस्ट्रार जनरल ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है। इसके साथ हरियाणा सरकार ने भी मांग की है कि नायक जाति को अनुसूचित जाति में शामिल किया जाये।
MR. DEPUTY-SPEAKER: We have taken an exceptionally different route. Without their names being there, both, Dr. Laxminarayan Pandeya and Dr. Sushil Kumar Indora have been given permission to go on record.
श्री सुरेश चन्देल (हमीरपुर, हि.प्र.) : उपाध्यक्ष महोदय, माननीय मंत्री जी ने अनुसूचित जाति आदेश २००१ का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैं समझता हूं कि इस विधेयक का बड़ा सीमित उद्देश्य है। ३६८ अनुसूचित जातियां जो अनुसूचित जाति में शामिल होने की पात्रता रखती हैं लेकिन कई कारणों से जिनको अभी तक शामिल नहीं किया जा सका, उनको शामिल करने के लिए इस विधेयक को लाया गया है। मैं इसका समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं।
देश में ऐसी अनेक जातियां और समुदाय हैं जिनको मैं समझता रहूं कि इसमें शामिल करना चाहिए। हिमाचल प्रदेश में इस तरह की जाति है, जिसकी तरफ मैं मंत्री जी का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं। हिमाचल प्रदेश में एक तरखान जाति है जिसको अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त नहीं है। हिमाचल प्रदेश का गठन १९७१ में हुआ था। १९६६ में पंजाब के पहाड़ी क्षेत्रों को हिमाचल प्रदेश में सम्मिलित किया गया। हिमाचल प्रदेश का जो पुराना हिस्सा था, उसमें लुहार जाति के जो लोग काम करते थे, उनको अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त था लेकिन जो नया क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में शामिल किया गया, उनमें काम करने वाले लोगों को अभी तक इस जाति में शामिल नहीं किया गया। यह एक ऐसी विसंगति है, जिसको दूर किया जाना चाहिए।
मैंने १२वीं लोक सभा के समय में भी इस बात के लिए आग्रह किया था। इस संबंध में हिमाचल प्रदेश की विधान सभा ने भी एक प्रस्ताव पास करके केन्द्र सरकार के पास भेजा है लेकिन किसी न किसी कारण से वह जाति अभी तक इसमें शमिल नहीं हो सकी। यह बड़ा वचित्र लगता है कि एक प्रदेश के अंदर एक ही कारोबार करने वाले लोग एक ही स्तर के लोग और उनमें कुछ लोग शामिल होकर उसका लाभ लें और कुछ न लें, इसकी एक पीड़ा हिमाचल प्रदेश में व्याप्त है। लगभग ५२ हजार की संख्या इन लोगों की है।
मैं मंत्री जी से आग्रह करूंगा कि इस विसंगति को भी दूर किया जाये और उन लोगों को न्याय दिया जाये। इसी तरीके से हिमाचल प्रदेश में लवाना जाति है जो घूम फिरकर या ढुलाई का काम करके अपना जीवनयापन करती है। इनकी संख्या लगभग दो लाख के करीब है। कई दफा यहां विषय आया कि इनको भी अनुसूचित जाति में शामिल किया जाये लेकिन इनको अभी तक शामिल नहीं किया गया। इस संबंध में इनका बहुत आग्रह है। हिमाचल विधान सभा ने भी इस संबंध में निवेदन किया है कि इनको भी अनुसूचित जाति में शामिल किया जाये।
इसी तरीके से हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में उत्तर प्रदेश से लगता हुआ एक गरिपार का क्षेत्र है, वह जो एरिया है, उस क्षेत्र को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया हुआ है। वहां वे सुविधाएं प्राप्त हुई हैं, लेकिन जो क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में लगा हुआ है, उस क्षेत्र में वे सुविधाएं नहीं हैं। मेरा आग्रह है कि उस क्षेत्र में जो लोग शामिल हैं, उनको भी इसमें शामिल किया जाये। मैं मंत्री जी को और माननीय प्रधानमंत्री जी को इसके लिए बधाई देता हूं कि उन्होंने गद्दी और गूजरों की जो एक लम्बे अर्से से मांग हिमाचल प्रदेश की थी, उसको पिछले दिनों स्वीकार किया है। उसके कारण सालों से एक मांग यह भी हो रही थी, इसको शामिल करने से हिमाचल प्रदेश की उन जातियों में एक अच्छा संदेश गया है।
इसी तर्ज पर मेरा माननीय मंत्री जी से आग्रह रहेगा कि इसको जरूर शामिल किया जाये। इसके लिए पूरी प्रक्रिया अपनाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह वास्तविकता है कि एक जगह वह चीज दी गई है, इसलिए इसे सरकारी आदेश से लागू भी किया जा सकता है। मैंने कई बार इस विषय को सरकार के ध्यान में लाया है। मैं आशा करता हूं कि इसे शामिल करके माननीय मंत्री जी वहां के लोगों को एक अच्छा संदेश देंगे।
अन्त में मैं इस बिल का समर्थन करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री माणिकराव होडल्या गावीत (नन्दुरबार) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपका आभारी हूं। संविधान अनुसूचित जातियां आदेश (संशोधन) विधेयक, २००१ पर मैं बोलने के लिए खड़ा हूं। यहां बहुत से मित्रों ने अभी भाषण दिया कि इस आदेश में इस जनजाति को शामिल करना चाहिए। मैं खुद अनुसूचित जनजाति का हूं। १९५० में अनुसूचित जनजाति के लिए, अनुसूचित जाति के लिए जो शैडयूल ऑफ लिस्ट बनाई गई, उसमें बहुत से राज्यों की जातियां, जनजातियां इसमें नहीं आतीं, उनको शामिल करने के लिए हर बार यहां पर संविधान में संशोधन होते आये हैं।
मैं महाराष्ट्र की बात कहूंगा। अभी मेरे मित्र बोल रहे थे कि अनुसूचित जनजाति में यह भी जाति आती है, अनुसूचित जाति में यह भी जाति आती है, लेकिन जो सही अनुसूचित जनजाति के लोग महाराष्ट्र में हैं, उसमें आपने बताया था। मैं दूसरे के भाषण पर नहीं जाना चाहता, लेकिन जो सही बात है, वह मैं बताना चाहता हूं कि देश में जब संविधान बना और १९५० में शैडयूल ऑफ लिस्ट संविधान के मुताबिक जाहिर की गई, तब जो अनुसूचित जातियां, अनुसूचित जनजातियां थीं, वे सही थीं। जो लोग शिक्षा में पिछड़े हुए हैं, सामाजिक परिस्थिति से पिछड़े हुए हैं, उनके लिए संविधान में रिजर्वेशन रखा गया कि हर १० साल में जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लोग हैं, उनको शैक्षणिक, सामाजिक द्ृष्टि से ऊपर उठाने की सहूलियत संविधान में दी गई थी, उसके बाद आज देश की आजादी मिलने के बाद ५२-५३ साल हो चुके हैं। जो अनुसूचित जातियां, जनजातियां इस देश में हैं, उनके लिए क्रमश: १५ प्रतिशत और ७.५ प्रतिशत रिजर्वेशन दिया गया। हमने यह देखा है कि केन्द्र सरकार के हर विभाग में और राज्य सरकारों के जो विभाग हैं, वहां भी १५ प्रतिशत और साढ़े सात प्रतिशत आरक्षण नहीं भरा गया है। भारत सरकार के जो अंडरटेकिंग्स हैं, जो शिडयूल बैंक हैं, वहां भी आरक्षण पूरा नहीं हो रहा है। मैं काफी समय से संसद की अनुसूचित जाति और जनजाति समति का सदस्य रहा हूं। मैंने उसमें देखा है कि नौकरियों में अनुसूचित जातियों के लिए सिर्फ दस प्रतिशत और अनुसूचित जनजातियों के लिए सिर्फ दो प्रतिशत आरक्षण का कोटा ही भरा गया है। सही सही तौर पर पिछड़े हैं, उनके लिए अगर यह हालत देश में है, तो अनुसूचित जाति और जनजाति के नाम पर और दूसरी जातियां इसमें शामिल हो जाएंगी तो वास्तव में जो अनुसूचित जाति, जनजाति के लोग हैं, उनके लिए कुछ नहीं रहेगा। वे लोग पहाड़ों में, गांवों में और सुदूर गांवों में रहते हैं। अभी जो अनुसूचित जातियां और जनजातियां इसमें आना चाहती हैं, वे शहरों में रहती हैं। आज कम्पीटिशन का जमाना है। इसलिए नौकरियों में हमारे लोगों के आने का सवाल ही नहीं होता, क्योंकि हम लोग पिछड़े होने के कारण कम्पीटिशन में नहीं आ सकते।
महाराष्ट्र में गोन-गवारी अनुसूचित जनजाति के ऊपर काफी विवाद हुआ था, इस बात को कई सदस्य जानते होंगे। उसके बाद जो सही रूप से पिछड़े लोग हैं, वे आरक्षण से वंचित हो रहे हैं। महाराष्ट्र में अनुसूचित जनजाति के नाम पर टोकरकोली, महादेवकोली, डोरकोली एस.टी. की लिस्ट में हैं। उनके आधार पर जो सूर्यवंशीकोली हैं, मच्छीमारकोली हैं, वे भी उसका फायदा उठा रहे हैं। अभी इस जाति के दो सदस्य महानगर परिषद से चुनकर भी आए हैं। महाराष्ट्र सरकार ने एक समति बनाई है, उसमें जब यह प्रपोजल गया तो पता चला कि वे एस.टी. में नहीं आते। हमारे कई सदस्य बोलते हैं कि इन जातियों को भी जनजाति में समाविष्ट करना चाहिए, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि हम लोग इसका परिणाम भुगत रहे हैं। जो सही अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग हैं, उनके साथ अन्याय हो रहा है। भारत सरकार और राज्य सरकारों के विभागों में इनके आरक्षण का कोटा भरा नहीं गया है। वहां के कई अधिकारी तो यहां तक कहते हैं कि आप लोगों के लिए आरक्षण का कोटा है, यह हमें पता नहीं है। इस सम्बन्ध में जब भी कोई आदेश भारत सरकार या राज्य सरकारों में जाता है तो वहां के अधिकारी उसे पढ़ने तक के लिए तैयार नहीं होते।
मंत्री जी यहां बैठे हैं, वे स्वयं अनुसूचित जाति और जनजाति कल्याण समति के चेयरमैन थे। उनके साथ हमने कई बार दौरा किया। हमने देखा कि अनुसूचित जाति के लिए जो १५ प्रतिशत का कोटा है, जनजाति के लिए जो साढ़े सात प्रतिशत का कोटा है, वह भी नहीं भरा गया है। बैकलाग बहुत हो गया है। राष्ट्रीयकृत बैंकों में भी यही स्थिति है। सरकार ने बैंकों के लिए जो रिक्रूटमेंट बोर्ड बनाया था, उसे खत्म कर दिया है। अब बैंकों के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर के हाथों में कर्मचारियों की भरती का काम सौंप दिया है। जब राष्ट्रीयकृत बैंकों के रिक्रूटमेंट बोर्ड ने आरक्षण का कोटा नहीं भरा, तो ये चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर तो बिल्कुल भी नहीं भरेंगे। इसलिए मैं प्रधान मंत्री जी से और भारत सरकार से विनती करूंगा कि इस देश के पिछड़े लोगों अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को न्याय देना चाहिए। आपने जो रिक्रूटमेंट बोर्ड बर्खास्त करके बैंकों के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर के हाथों में अधिकार दिया है, यह ठीक नहीं है।
इस पर भारत सरकार फिर से विचार करे, ऐसी मेरी विनती है। शिक्षा के बारे में भी आज वैसा ही चल रहा है। मैडिकल कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेजों में वह भारत सरकार का हो या राज्य सरकार के अन्तर्गत हो, वहां पर भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए जो आरक्षण है और संविधान में जो सुविधा उन्हें दी गई है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को शिक्षा में, नौकरियों में न्याय मिलना चाहिए, यह मेरी आपके माध्यम से सरकार से और खासकर माननीय मंत्री जी से प्रार्थना है कि इसकी तरफ वह जरूर ध्यान दें। इसमें अनुसूचित जनजाति को जहां पर समाविष्ट करने की बात है, वह भी मैंने पढ़ी है। ठीक है, जो जाति सही है, उसका और भी अभ्यास करके हर राज्यों से मामलात की जानकारी आपने ली होगी, इसीलिए यह बिल यहां पर लाए हैं। फिर भी जो सही अनुसूचित जाति के लोग हैं, वे रह गये हैं और इसमें शामिल नहीं हुए हैं, उनके लिए आप सोचें और अनुसूचित जनजाति के लिए यह विषय आज नहीं है तो भी मैं बता रहा हूं कि जो भी राज्य सरकार अनुसूचित जनजाति की लिस्ट आपकी तरफ भेजे कि इस जाति को अनुसूचित जनजाति में समाविष्ट करें तो उसकी पूरी जांच करने के बाद ही यहां पर यह बिल आगे लाने की कोशिश करेंगे, ऐसी मेरी आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से विनती है। अंत में, हमारे संविधान में बाबा अम्बेडकर जी ने जो न्याय दिया और उस समय के नेता लोगों ने पिछड़ी जातियों को ऊपर उठाने के लिए संविधान में जो प्रावधान किये हैं, गलत लोग इसमें न आएं, यह पूरी जवाबदारी भारत सरकार और संसद की है, इसीलिए मैं विनती करूंगा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के साथ अन्याय न हो, इस तरफ भी ध्यान दिया जाए।
श्रीमती जस कौर मीणा (सवाई माधोपुर): उपाध्यक्ष महोदय, संविधान अनुसूचित जातियां आदेश (संशोधऩ) विधेयक, २००१ पर मैं अपनी सहमति के लिए खड़ी हुई हूं और साथ ही अपने विचार रखती हूं कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के संदर्भ में आज़ादी के ५५ साल बाद भी उनके हितों की रक्षा के लिए सरकार ने जो कार्य किए हैं, वे बहुत अधिक नहीं हैं। यदि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के हितों पर अक्षरश:नीतियों का पालन हुआ होता तो पचास वर्षों के बाद ये जातियां अपने विकास की दौड़ में सबके समान खड़ी हो सकती थीं, लेकिन यथा समय सरकारों के आदेशों की और सरकारों द्वारा दी गई सम्पूर्ण वित्तीय व्यवस्था का पूरा-पूरा लाभ इन जातियों तक नहीं पहुंच पाया। शिक्षा, स्वास्थ्य ये प्राथमिक आवश्यकताएं हैं जिनको देखते हुए आज भी अनुसूचित जनजाति के लोग गांवों के अंदर पहाड़ों पर रहते हैं। ये दुर्गम स्थानों पर रहते हैं। उन तक इन सुविधाओं का लाभ नहीं पहुंच पाया है जिसको यदि हम आंकडों के हिसाब से देखते हैं या स्थिति के हिसाब से देखते हैं तो अनुसूचित जाति आज मेहनत मजदूरी से अपना पेट भर रही है । ये े जातियां मेहनत-मजदूरी के लिए महानगरों के आसपास जहां-जहां भी मजदूरी उपलब्ध होती है, वहां आकर बस जाती हैं। महानगरों में या बड़े शहरों में मैसन या सफाई वर्ग या अन्य किसी प्रकार के काम करती हैं। काम के बाद जो भी समय मिलता है और जहां सुविधायें मिलती हैं, ये शिक्षा के नजदीक आने लगी हैं। अनुसूचित जनजातियों के लोग अरावली और विंध्याचल पर्वत श्रृखलाओं में निवास करते हैं। अनुसूचित जनजातियों के लोग अधिकतर इन्हीं क्षेत्रों में रहने की वजह से या दूरगामी स्थानों पर रहने की वजह से भी शिक्षा से वंचित हैं। मेरा संसदीय क्षेत्र अनुसूचित जनजाति बाहुल्य क्षेत्र है। यदि हम आंकड़ों के देखते हैं, तो इन क्षेत्रों में महिलाओं की साक्षरता अभी-अभी एक या डेढ़ प्रतिशत के मध्य है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इन जातियों में आजादी के ५५ साल गुजर जाने के बाद भी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधायें नहीं पहुंचने की वजह से इनमें विकास की गति अभी-अभी पीछे है, लेकिन पिछली शताब्दी में इनका विकास कुछ प्रतिशत आगे बढ़ा है, जो पर्याप्त नहीं है। अभी-भी यदि हम इन जातियों की महिलाओं की विकास दर के आंकड़ों को देखें, तो आंकड़े चौंकाने वाली स्थिति में है। आज भी महिलायें पैर की जूती समझी जाती हैं। पिछले पचास वर्षों में केवल मात्र इनका उपयोग राजनीतिक लाभ और मत के लिए हुआ है। इसमें भी अतिश्योक्ति नहीं है, ये भोले और अज्ञानी लोग हैं और इनको अभी तक केवल मात्र वोट देने का ही अधिकार दिया है। इसके साथ ही जहां-कहीं आरक्षित स्थान थे, उन आरक्षित स्थानों पर इनका प्रतनधित्व बढ़ा है और साक्षरता आई है, लेकिन पर्याप्त नहीं है। ऐसी स्थिति में आरक्षण की समूची व्यवस्था में एनडीए की सरकार ने पिछले तीन वर्षों में तीन अमेंडमेंड किए, लेकिन अधिकांश राज्यों की सरकारों ने उन अध्यादेशों को लागू नहीं किया है। उन अध्यादेशों को न लागू करने की वजह से वे आदेश, केवल आदेश होकर ही रह गए हैं । उन आदेशों का व्यावहारिक रूप में लाभ नहीं मिला है। मैं आपके माध्यम से कहना चाहती हूं, यदि माननीय मंत्री जी उन राज्यों के आंकड़े मंगायें, जिनमें बैकलाग भरने और नौकरियों में आज क्या स्थिति है, तो वास्तविकता का पता चलेगा। मंत्री जी यदि राजस्थान और मध्य प्रदेश के ही आंकड़े मंगायें, तो पता चलेगा कि इन राज्यों में इन अध्यादेशों का पालन नहीं हुआ है। इसलिए मैं कहना चाहती हूं कि यदि कोई भी आदेश इन जातियों के हितार्थ सरकार द्वारा निकाले जाते हैं, तो उनका अक्षरश: पालन सुनिश्चित किया जाए।
दूसरी बात मैं कहना चाहती हूं कि इन जातियों के लिए प्रत्येक मंत्रालय में कुछ न कुछ बजट में प्रावधान किया जाता है, जैसे कृषि मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय और ट्राइबल वैलफेयर मंत्रालय। इसके साथ-साथ अन्य मंत्रालयों में भी अनुसूचित जनजाति के विकास के लिए कुछ-न-कुछ लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं । आपके ध्यान में यह बात आई है या नहीं, उपक्रमों और उद्योगों में इनकी हैसियत उभरकर नहीं आई है। केवल मात्र मकड़ जाल तैयार किया जाता है और किसी भी तरह का लाभ इनको नहीं पहुंच पाता है। शिक्षा के क्षेत्र में भी जो छोटी-छोटी स्कीमें राज्यों में जारी की जाती हैं, उनको सुनिश्चित करने के लिए सरकारी मशीनरी और राज्य सरकारें गम्भीरता से नहीं लेती हैं और उनको पूरा करने के लिए सजग नहीं हैं।
अंत में, मैं अपनी बात समाप्त करते हुए, कहना चाहती हूं कि इन जातियों के रक्षार्थ के लिए सदन में कोई भी चर्चा होती है, उसका नि:सन्देह पालन होना चाहिए, ताकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों की रक्षा हो सके।
श्रीमती कैलाशो देवी (कुरूक्षेत्र): उपाध्यक्ष महोदय, जिस बिल पर हम चर्चा कर रहे हैं, उसके अनुसार ३६८ जातियां ऐसी हैं जिन्हें अनुसूचित जाति में शामिल किया जाना चाहिए। मैं ज्यादा लम्बी-चौड़ी बात न करके हरियाणा और उससे लगे एक-दो प्रदेशों की बात करूंगी। हरियाणा में मछली मार, धोबी समाज और तरखान जाति को एससी में शामिल किया जाना उचित है। हमारे यहां एक नायक जाति भी है जिसे एससी में शामिल किया जाना चाहिए। धानुक जाति बिहार में है लेकिन वह मोस्ट बैकवर्ड में है।
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): वहां उनकी हालत खराब है। …( व्यवधान)मैं आपका समर्थन कर रहा हूं। बिहार में धानुक जाति को एससी में शामिल करना चाहिए, ऐसी मांग हो रही है।
डॉ. सुशील कुमार इन्दौरा: धानुक जाति हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और बिहार में है। उनकी संस्कृति को देखते हुए उन्हें एससी में शामिल करना चाहिए।
श्रीमती कैलाशो देवी : सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक द्ृष्टि से कमजोर वर्ग में चाहे कोई भी हो, उसे एससी में शामिल करना चाहिए। तभी उन्हें इस संशोधन विधेयक का लाभ मिल पाएगा और इसका उद्देश्य सार्थक होगा। जो इसका सही हकदार है उसे एससी में शामिल करना चाहिए। इसमें कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। वास्तव में राज्यवार सर्वे करवा कर जो जातियां शामिल करने लायक हैं, उन्हें शामिल किया जाए। इतना ही कह कर आपका धन्यवाद करना चाहूंगी।
श्री सोहन पोटाई (कांकेर): उपाध्यक्ष महोदय, धन्यवाद। अनुसूचित जातियां आदेश संशोधन विधेयक पर मैं बोलने के लिए ख़ड़ा हुआ हूं। मैं मीणा जी द्वारा कही बातों से सहमत हूं। आजादी के ५४-५५ वर्षों में अनुसूचित जाति और जन जाति के लोगों को केवल वोट की द्ृष्टि से देखा गया और निश्चित रूप से उनका शोषण हुआ। सरकार द्वारा कई योजनाएं और नीतियां बनी लेकिन वे एससी और एसटी के लोगों तक नहीं पहुंची। वे मात्र फाइलों तक सीमित रह गई। मैं छत्तीसगढ़ के बस्तर सम्भाग के पिछड़े आदिवासी क्षेत्र का प्रतनधित्व करता हूं। वहां के लोगों की आज भी मूलभूत आवश्यतकाओं की पूर्ति नहीं होती है। बिजली, पीने का पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क आदि सभी चीजों को वहां अभाव है। वहां के लोग नदी-नालों से पानी पीने के लिए मजबूर हैं। इसी कारण बारिश के दिनों में कई लोग मौत के शिकार होते हैं।
हमारे यहां गोंड समाज अनुसूचित जन जाति में है लेकिन यदि बिहार, उत्तर प्रदेश में जाते हैं तो उन्हें अनुसूचित जन जाति का लाभ नहीं मिलता है। इंग्लिश में लिखें तोGond होता है और यदि हिन्दी में लिखा जाता है तो कहीं" गौंड " कहीं " गोड" लिखते हैं।
जहां पर‘गोंड’ लिखा दिया जाता है, वहां यह लाभ मिलता है लेकिन जहां‘ गौंड ’ लिख दिया जाता है, वहां यह लाभ नहीं मिलता है। माननीय मंत्री जी को इस ओर ध्यान देना चाहिये। यदि शब्दों की विसंगतियों के आधार पर किसी को लाभ नहीं मिल पाता है तो सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिये। इसी प्रकार महाराष्ट्र में एक जाति‘महर’ है जिसे अनुसूचित जाति में लिया जाता है लेकिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में यह अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं आती है। पश्चिमी बंगाल में‘नमोशूद्र’अनुसूचित जाति में है लेकिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में नहीं है। सरकार से अनुरोध है कि इन सब बातों का सर्वे कराये और जहां विसंगतियां हैं, वहां निश्चित रूप से इन को भी लाभ मिले।
उपाध्यक्ष महोदय, अंत में एक बात और कहूंगा कि यहां कई माननीय सदस्यों ने इस बात का जिक्र किया कि कई राज्यों में निषाद, ढीमर, केवट के स्थान पर केवट शब्द लिखा जाता है उन्हें लाभ नहीं मिलता। मांझी लिखने पर तो लाभ मिलता है लेकिन ढीमर, निषाद या केवट लिखने पर अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं दिया जाता है। सरकार इन विसंगतियो को दूर करे। मेरे बस्तर जिले में धोबी को अनुसूचित जाति में लिया जाये ।
उपाध्यक्ष महोदय, सरकार ने अनुसूचित आदिवासी और अनुसूचित जनजातियों के विकास के लिये अलग से एक मंत्रालय भी बनाया है तबसे विकास में गति आई है जिसके लिये मैं माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार को धन्यवाद देता हूं कि उन्होंने इन लोगों के कल्याण और विकास के लिये चिन्ता करके सही वक्त पर विघेयक लाकर सराहनीय कदम उठाया है। उससे विकास और उत्थान में तेजी आएगी इसलिये यह विधेयक लाया गया है, मैं इसका समर्थन करते हुये अपनी बात समाप्त करता हूं।
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री (डॉ. सत्यनारायण जटिया) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं अत्यंत ही संक्षेप में और सारगर्भित ढंग से अपनी बात कहूंगा।
उपाध्यक्ष महोदय, संविधान अनुसूचित जातियां आदेश (संशोधन) विधेयक, २००१ निश्चित रूप से संशोधन करने के लिये लाया गया है। इसमें आठ जातियो को सम्मिलित करने, ५० जातियो को संशोधित करने तथा २४ विलोपित किये जाने का संशोधन है। इस प्रकार ८१ प्रस्ताव बने हुये हैं जिसे संशोधित करने के लिये हम यहां लाये हैं।
उपाध्यक्ष महोदय, चर्चा के दौरान कई माननीय सदस्यों ने अपने महत्वपूर्ण सुझाव दिये हैं। उन्हें मैने लपिबद्ध किया है । वे सुझाव इसलिये महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे अनुसूचित जाति के विकास और उत्थान से संबंधित हैं ताकि वे देश के विकास में बराबर का योगदान कर सकें। राष्ट्र के उत्थान में इनका सहयोग प्राप्त हो सके, इस द्ृष्टि से उन्हें चिन्हित करके इन बातों को शामिल करने का काम किया गया है।
इस पर प्राय: २१ माननीय सदस्य बोलें हैं और उन माननीय सदस्यों ने स्पेशल सैन्ट्रल असिस्टैन्स, स्पेशल कम्पोनैन्ट प्लान, स्कॉलरशिप, होस्टल्स और कोचिंग आदि के बारे में कहा है तथा आर्थिक रूप से उन्नयन के बारे में भी कहा है। उस द्ृष्टि से भी निश्चित रूप से प्रस्ताव आये हुए हैं और उन सबमें भी हमने हर वर्ष प्रावधान बढ़ाने का काम किया है। जैसा कि सभी माननीय सदस्यों ने चिंता व्यक्त की है कि जितने बड़े उत्थान का काम हमने हाथ में लिया है, उसके अनुपात में जो भी प्रावधान किया जाता है, वह उस बात को पूरा करने के लिए निश्चित रूप से अपर्याप्त है। किंतु जैसा हम सब जानते हैं कि यह सब संसाधनों के बिना संभव नहीं होगा और जितने भी संसाधन हैं, उनका पर्याप्त रूप से उपयोग होना चाहिए, यह सबकी इच्छा है और इस इच्छा की पूर्ति करने के लिए हमने कुछ आधारभूत बातें की हैं। उन सबकी भावनाओं का सार यही रहा - जमीं भी है तो थोड़ा सा आसमां दे दो, कुल एक ऊंचाई, प्रतिष्ठा, एक स्वाभिमान दे दो। प्रत्येक नागरिक को निश्चित रूप से स्वाभिमान मिले, यह हम सबकी इच्छा है। इसलिए जो स्पेशल कम्पोनैन्ट प्लान है, जो हमारी सैन्ट्रल असिस्टैन्स राज्यों को जाती हैं। उसका पूरा-पूरा सदुपयोग हो, यह अपेक्षा रहती है। किंतु अनेक प्रकार के प्रश्नों के बाद मेरे पास २१ महानुभावों के सुझाव हैं। श्री पवन कुमार बंसल जी मुझे सामने बैठे दिखाई दे रहे हैं, उनका भी चंडीगढ़ की रामदासिया जाति के बारे में एक प्रस्ताव है। वह प्रस्ताव अभी हमें प्राप्त नहीं हुआ है। जैसे ही वह हमें प्राप्त होगा, उस पर अपेक्षित कार्रवाई करने का काम होगा। इसी तरह से सभी सदस्यों ने कुछ न कुछ जरूर पूछा है। यदि उन सबको जवाब दिया जायेगा तो उसमें बहुत समय लगने वाला है। इसलिए मैं कहूंगा कि हमने बजट में, निरंतर इस काम में…( व्यवधान)मैं आपको बता सकता हूं कि हमारे पास जो व्यय का अनुमान है, वह इस प्रकार है। हमारे पास वर्ष १९९७-१९९८ से कुछ फीगर्स हैं, जिन्हें मैं बताने का काम करूंगा। वर्ष १९९७-१९९८ में बजट ऐस्टीमेट ७७१ करोड़ रुपये था, रिवाइज्ड ऐस्टीमेट ६११ करोड़ रुपये था और ५९३.६३ लाख व्यय हुआ। ९७.६८ प्रतिशत उसका उपयोग हो पाया। वर्ष १९९८-१९९९ में बजट ऐस्टीमेंट ७.६८ करोड़ रुपया था, रिवाइज्ड ऐस्टीमेट ६९४.३८ करोड़ था और ६५२.३८ करोड़ रुपया व्यय हुआ। इस तरह से ९३.९५ प्रतिशत उपयोग हुआ। वर्ष १९९९-२००० में ६४५.७५ बजट ऐस्टीमेट था, रिवाइज्ड ऐस्टीमेट ७४१.४६ करोड़ था और ७९६.१८ करोड़ व्यय हुआ। इस तरह से १००.६४ प्रतिशत उपयोग हुआ। वर्ष २०००-२००१ में बजट ऐस्टीमेट ७८७.७० करोड़ रुपये था, रिवाइज्ड ऐस्टीमेट ७५०.५५ करोड़ था और ७६५.८५ करोड़ रुपया व्यय हुआ। इस तरह से १०२.१६ प्रतिशत उपयोग हुआ। वर्ष २००१-२००२ में बजट ऐस्टीमेट ८५४.८४ करोड़ रुपये, रिवाइज्ड ऐस्टीमेट ८०२.५० और व्यय ८०७.८२ हुआ। इस प्रकार १००.५० प्रतिशत उपयोग हुआ। इस प्रकार से हमें जो पैसा मिला है। उसे पूरा-पूरा सदुपयोग करते हुए हमने उसे अनुसूचित जातियों के उत्थान और विकास कार्यों में लगाया है।
इसके अलावा हमने अनेक प्रकार की योजनाओं का शुभारंभ किया है। शिक्षा के क्षेत्र में हमने अभी अम्बेडकर छात्रवृत्ति योजना का भी शुभारंभ किया है। उसमें मैटि्रक पास होने के बाद अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के प्रत्येक विद्यार्थी को, जिसका मैरिट में, प्रवणता सूची पहला स्थान आता है, उसे एकमुश्त साठ हजार रुपये देने का प्रावधान है। दूसरे स्थान पर आने वाले को ५० हजार रुपये और तीसरे स्थान पर आने वाले छात्र को ४० हजार रुपये देने का प्रावधान है। यदि इन सब में कोई छात्र नहीं है तो भी ४० हजार रुपये की अतरिक्त राशि देने का प्रावधान है। इसके साथ-साथ प्रदेशों की आबादी के अनुसार प्रत्येक छात्र को दस हजार रुपये देने का भी इसमें प्रावधान है। इस प्रकार से कुल मिलाकर प्राय: एक करोड़ २३ लाख रुपये की नयी छात्रवृत्ति भी इस वर्ष हमने प्रारंभ की है। इस तरह से शिक्षा की द्ृष्टि से उनका उत्थान करने के लिए जो हमारा कमिटमैन्ट, हमारा संकल्प है, उस दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं। आर्थिक द्ृष्टि से भी उन्हें सक्षम बनाने के लिए सरकार ने योजना बनाई है। उसके लिए हमने लघु ऋण योजना देने का काम किया है। उसमें भी अधिकतम जो लोन दे सकते हैं वह छोटे काम करने वालों को देते हैं, चाहे वह ठेला चलाने वाला हो या चाहे जमीन पर बैठकर काम करने वाला हो, इस प्रकार के कामों में सहायता देते हैं और ७ प्रतिशत ब्याज के आधार पर उनको कर्ज़ देकर उनके आर्थिक उत्थान की द्ृष्टि से पूरी चिन्ता सरकार कर रही है। जितने भी हमें संशोधन मिलते हैं, हम उसका पूरा-पूरा उपयोग करने का प्रयास कर रहे हैं।
माननीय सदस्यों ने जो भी सुझाव दिये हैं, उसमें जाति सम्मिलित करने के बारे में भी उनका आग्रह है। जैसा कि पद्धति बनी हुई है, कोई प्रस्ताव यदि आता है तो वह प्रस्ताव जो जनगणना के महापंजीयक हैं, उनके पास जाता है और फिर वंशीय आधार पर उसका क्या प्रकार रहा होगा, उसका अध्ययन करने के बाद रिपोर्ट दी जाती है। फिर वह प्रस्ताव एस.सी.एस.टी. कमीशन के पास जाता है और फिर हमारे पास आता है। फिर उसको हम प्रोसेस करने का काम करते हैं। पिछले तीन-चार वर्षों में यह काम तेज़ी से हुआ है। पिछले बजट में भी हम इस प्रकार का प्रस्ताव लेकर आए थे और संसोधन करके उसको संसद से पारित कराने का काम किया था। इस वक्त भी यह बिल लेकर हम आए हैं।
बहुत से माननीय सदस्यों की इच्छा थी कि एक समग्र बिल लेकर आना चाहिए, परंतु समग्र बिल लाने के लिए कब तक प्रतीक्षा करनी चाहिए यह सोचने की बात है। इसलिए जैसे-जैसे हमारे पास प्रस्ताव आते हैं, राज्य सरकारों से आग्रह मिलता है और जैसा कि मैंने बताया कि राज्य सरकारों के पास भी बहुत बड़ी संख्या में ऐसे प्रस्ताव पड़े हैं। जैसे धोबी जाति का कहा है, वह प्रस्ताव भी उनके पास है। हरियाणा के बारे में कहा है, नायक जाति के बारे में कहा है, उसकी जानकारी हमने लेने का काम किया है। इस द्ृष्टि से जैसे ही हमारे पास प्रस्ताव पूरी द्ृष्टि से आ जाते हैं, उसमें संशोधन लाकर जोड़ने का काम हम करते हैं। गावीत जी ने कहा कि इसमें सावधानी बरती जानी चाहिए और वह सावधानी बरतने का काम एजेन्सियों के माध्यम से होता है। निश्चित रूप से संशोधन होकर परिपूर्ण प्रस्ताव हमारे पास आता है तो उसको हम पारित कराने का काम करते हैं। जो प्रस्ताव हमारे पास आए हैं वह हमारे लिए मार्गदर्शन हैं और उसके आधार पर जो भी काम करना चाहिए वह करने के लिए जो महत्वपूर्ण सुझाव आपने दिये हैं, उसके लिए मैं आपको ह्ृदय से धन्यवाद ज्ञापित करते हुए सदन से निवेदन करूँगा कि इस विधेयक को पास किया जाए।
श्री पवन कुमार बंसल (चंडीगढ़) : महोदय, एक बुनियादी लेकिन बहुत अहम बात का जिक्र किया था कि हम बड़ी बातें यहां तो कर रहे हैं लेकिन जो अनुसूचित जाति का प्रमाण-पत्र होता है, वह भी लोगों को नहीं मिलता है। उसके लिए जो आपके कानून बने हुए हैं, उसमें एक तारीख का ज़िक्र होता है कि यू.टी. कब से बनी, स्टेट कब से बनी। उसका गलत इस्तेमाल किया जा रहा है, गलत इंटरप्रटेशन किया जा रहा है कि अगर कोई आदमी उस यू,टी. में उस तारीख के बाद से आया बेशक उस अनुसूचित जाति का नाम उस लिस्ट में दिया हो, उसके बावजूद भी उसको प्रमाण-पत्र नहीं दिया जाता है। आप बड़ी बातें कह रहे हैं कि यह कर रहे हैं, वह कर रहे हैं मगर उनका जो मौलिक अधिकार है कि जिस जाति के साथ वह संबंध रखता है, उसका प्रमाण-पत्र उसे मिले, वह नहीं मिलता, इस कारण उनको नौकरी नहीं मिलती। मैंने उदाहरण दिया था और इस बार हमारे यहां ऐसा हुआ कि उन बच्चों को कालेजों में दाखिला भी नहीं मिला। पंजाब और हरियाणा दोनों की राजधानी चंडीगढ़ है। दोनों प्रांतों से लोग यहां आते हैं। उनको सर्टफिकेट नहीं मिलते।…( व्यवधान)
श्री बली राम कश्यप (बस्तर): मंत्री जी से मेरा आग्रह है कि एक सर्वे कमेटी बना दी जाए ताकि जो जातियों में भ्रांति है वह दूर हो जाए।…( व्यवधान)
SHRI BIKRAM KESHARI DEO (KALAHANDI): Sir, I would like to seek a clarification from the hon. Minister. He has brought this Bill now which is relevant only to the Scheduled Castes. As he is the Minister for Empowerment, will he get a similar Bill for the Scheduled Tribes also based upon inclusion of synonyms, clubbing of castes in the existing list, correction in spelling in the castes for tribals? There are similar tribes in Orissa and Madhya Pradesh. In Orissa they are called Bhataras and in Madhya Pradesh they are called Bhottodas. Whereas, in Kalahandi Distt. In Orissa they are not treated as tribals, in Madhya Pradesh they are treated as tribals.
16.00 hrs. MR. DEPUTY-SPEAKER: You cannot go on indefinitely with clarifications.
डॉ. सत्यनारायण जटिया : माननीय उपाध्यक्ष जी, जैसा माननीय सदस्य पूछ रहे थे कि किसी जाति विशेष को जनजाति की सूची में शामिल किया जाए, मैं उनके ध्यान में लाना चाहता हूं कि मेरा विभाग अनुसूचित जाति का है। उन्होंने जिस अनुसूचित जनजाति के बारे में कहा है, उसे निश्चित रूप से अनुसूचित जनजाति मंत्रालय का कार्य देखने वाले मंत्री जी के पास प्रेषित कर दिया जाएगा और वे उसके ऊपर निश्चित रूप से कार्रवाई करेंगे।
माननीय डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह जी ने जो नोनिया, तुराह और तत्वा जातियों के बारे में कहा है कि उन्हें अनुसूचित जाति घोषित किया जाए, मैं उनके ध्यान में लाना चाहता हूं कि इस बारे में हमें जो और जानकारी चाहिए, उसके लिए हमने बिहार राज्य सरकार से आग्रह किया है कि वह हमें तुरन्त भेजे। इसी प्रकार तत्वा जाति के बारे में मैं बताना चाहता हूं कि रजिस्ट्रार जनरल ने और जानकारी प्राप्त करने के लिए वह प्रकरण राज्य सरकार को भेजा है। जैसे ही बिहार सरकार से संपूर्ण जानकारी आ जाएगी, वैसे ही इस बारे में आगे कार्रवाई प्रारंभ कर दी जाएगी।
महोदय, पवन कुमार बंसल जी ने चंडीगढ़ में चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा वहां निवास करने वाले लोगों को अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र देने के काम में आ रही कठिनाई की ओर ध्यान आकर्षित किया है। मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि केन्द्र सरकार जाति प्रमाणपत्र देने का कार्य नहीं करती है। वह राज्य सरकारों से प्राप्त जानकारी को संकलित करने का काम करती है और उन्हें प्रौसेस करती है। राज्य सरकारें ही जाति प्रमाण पत्र देने का काम करती हैं। यदि प्रामाणिक रूप से प्रमाणपत्र देने के बारे में किसी व्यवस्था को बनाने की बात है, तो राज्य में वैसी व्यवस्था राज्य सरकार बना सकती है और प्रमाण पत्र देने का काम प्रामाणिक रूप से कर सकती है ताकि जो-जो सर्टफिकेट जिनको मिलने चाहिए, वे पर्याप्त रूप से मिल सकें। राज्य सरकारों के पास पूरी जानकारी होती है और वे ही सर्टफिकेट देने का काम करती हैं।
MR. DEPUTY-SPEAKER: What about issuing of the certificate?
SHRI PAWAN KUMAR BANSAL : Sir, he is evading the question. With all respect, I have said that, despite the fact that the castes exist in the Scheduled Castes list, only because there is one date mentioned in the Constitution Scheduled Castes Order, it is being wrongly interpreted by everybody to deny certificates to the people who happen to come to that place after that date. For instance, as I had said, Chandigarh is the capital of Punjab and Haryana. I had mentioned about all those castes in the three States. If a person belonging to any of those castes happens to come to Chandigarh, he is denied a certificate by the Chandigarh Administration. That is a Union Territory. What are you talking of? What States are you talking about? Please own the responsibility. If you do not have the facts, then say so. But rectify the situation for the people.
डॉ. सत्यनारायण जटिया :उपाध्यक्ष महोदय, माननीय सदस्य ने जो बात कही है, मैंने उसे नोट किया है। चूंकि चंडीगढ़ केन्द्र शासित क्षेत्र है, पहले वह पंजाब का हिस्सा था और विभाजन के बाद चंडीगढ़ में जो पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में अनुसूचित जातियों के रूप में हैं, वे रह रही हैं, उन्हें चंडीगढ़ में भी अनुसूचित जातियों की सूची में रखना चाहिए और जो उस सूची में नहीं हैं उनके बारे में अवश्य विचार किया जाएगा।…( व्यवधान)
श्री पवन कुमार बंसल: उपाध्यक्ष महोदय, मैं जो जातियां नहीं हैं उनकी बात नहीं कह रहा हूं, बल्कि जो जातियां अनुसूचित जाति की सूची में शामिल हैं, जो वर्तमान सूची में शामिल हैं, उन्हें भी चंडीगढ़ में अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र नहीं मिल रहे हैं। मैं तीसरी बार फिर कह रहा हूं कि जिन जातियों के नाम वहां अनुसूचित जाति की सूची में शामिल हैं, उन जातियों के लोगों को भी चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से अनुसूचित जाति के प्रमाणपत्र नहीं मिल रहे हैं।
डॉ. सत्यनारायण जटिया : उपाध्यक्ष महोदय, चूंकि यह प्रश्न चंडीगढ़ प्रशासन के बारे में है और चंडीगढ़ केन्द्र शासित क्षेत्र है तथा माननीय सदस्य चंडीगढ़ प्रशासन के बारे में कह रहे हैं कि वहां से अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र जारी नहीं किए जा रहे हैं, इस बारे में उनकी शिकायत पर ध्यान देकर चंडीगढ़ प्रशासन को तदनुसार निर्देश देने के लिए मैं तैयार हूं।
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please give a sympathetic consideration to the suggestions given by the Members.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: There would be no end to it. You have all taken part in the discussion.
श्री रामदास आठवले : उपाध्यक्ष महोदय, जो विभुक्त जातियां और ट्राइबल जातियां हैं, उनको ट्राइबल की सूची में शामिल करना चाहिए।…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : यहांट्राइबल्स के बारे में बात न होकर शैडयूल्ड कास्ट्स के बारे में बात हो रही है। आप कैसी बात करते हैं?
...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आठवले जी, मैंने आपसे कहा कि आपको अगले बिल में बोलने का चांस दूंगा। लेकिन आप इसी तरह बोलते रहे तो वह चांस खत्म हो जायेगा।
...( व्यवधान)
SHRI K. FRANCIS GEORGE (IDUKKI) : Sir, in the Kasargod district of Kerala, there is a community called Marathi tribe. They were already in the list. But there have been Press reports saying that they are going to be removed from the list. I would like to know the fact of the matter from the hon. Minister, whether they are going to be retained or removed from the list.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Are they Scheduled Castes?
SHRI K. FRANCIS GEORGE : Scheduled Tribes.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Mr. Minister, have you got any readymade information available with you?
डॉ. सत्यनारायण जटिया : àÉé <ºÉBÉEÉÒ ºÉÚSÉxÉÉ àÉÉxÉxÉÉÒªÉ ºÉnºªÉ BÉEÉä ÉÊ£ÉVÉ´ÉÉ nÚÆMÉÉ* MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri George, the hon. Minister will write to you.
"That the Bill further to amend the Constitution (Scheduled Castes) Order 1950, the Constitution (Scheduled Castes) (Union Territories) Order, 1951, the Constitution (Jammu and Kashimr) Scheduled Castes Order, 1956, the Constitution (Dadra and Nagar Haveli) Scheduled Castes Order, 1962 and the Constitution (Pondicherry) Scheduled Castes Order, 1964, be taken into consideration. "
The motion was adopted.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, the House will take up clause-by-clause consideration of the Bill.
"That clause 2 stand part of the Bill."
The motion was adopted.
Clause 2 was added to the Bill.
MR. DEPUTY-SPEAKER: The question is:
"That the First Schedule stand part of the Bill".
The motion was adopted.
First Schedule was added to the Bill.
The Second Schedule to the Fifth Schedules were added to the Bill.
Clause 1 - Short Title Amendment made:
Page 1, lines 3 and 4, --
for "the Constitution Scheduled Castes Orders (Amendment) Act, 2001."
substitute "the Constitution (Scheduled Castes) Orders (Second Amendment) Act, 2002." (2) (Dr. Satyanarayan Jatiya) MR. DEPUTY-SPEAKER: The question is:
"That clause 1, as amended, stand part of the Bill."
The motion was adopted.
Clause 1, as amended, was added to the Bill.
Enacting formula संशोधन किया गया:
(i) कि पृष्ठ १, पंक्ति १, में" बावनवें"शब्द के स्थानपर " तिरपनवें" शब्द प्रतिस्थापित कया जाए।
(१) (डॉ. सत्यनारायण जटिया) MR. DEPUTY-SPEAKER: The question is:
"That the Enacting Formula, as amended, stand part of the Bill."
The motion was adopted.
The Enacting Formula, as amended, was added to the Bill.
The Title was added to the Bill.
DR. SATYANARAYAN JATIYA: I beg to move:
"That the Bill, as amended, be passed."
MR. DEPUTY-SPEAKER: The question is:
"That the Bill, as amended, be passed."
The motion was adopted.
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