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Lok Sabha Debates

Discussion On The Need For Uniform Education System In The Country. on 13 December, 2012

> Title: Discussion on the need for uniform education system in the country.

 

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):सभापति महोदय, आपने मुझे नियम 193 के अधीन देश में एक समान शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता के बारे में चर्चा पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।  मैं इनका बहुत सम्मान करता हूं, हमारी बहन श्रीमती सुमित्रा महाजन जी ने भी इस पर नोटिस दिया है, मैं उनकी बातों से भी अपने को सम्बद्ध करूंगा।  

          सबसे पहले मैं शुरूआत करना चाहूंगा कि इस सदन में हमेशा जब भी शिक्षा पर चर्चा हुयी है, हर नियम के तहत, चाहे क्वैश्चन ऑवर हो या किसी भी अवसर पर इस पर चर्चा हुयी, तो बहुत ही गंभीरता से चर्चा हुयी। मुझे याद है कि कई मंत्री हमारे सामने आए और उन्होंने बहुत से वादे किए।  श्री पल्लम राजू जी, जो बहुत ही नौजवान मंत्री हैं, मैं उनका स्वागत करता हूं और सम्मान भी करता हूं कि जिस भी मंत्रालय का उन्होंने कार्यभार ग्रहण किया, उसकी जिम्मेदारी को आपने बहुत बखूबी निभाया।  

          शिक्षा ऐसा क्षेत्र है, अगर शिक्षा नहीं है तो व्यक्ति की पूरी जिंदगी अंधकारमय और अज्ञानता में रहती है।  यही कारण है कि देश में अनिवार्य शिक्षा को महत्ता दी गयी।  हमेशा इस सदन में इस बात की भी चर्चा उठी है कि आज पूरे भारतवर्ष में अगर देखा जाए तो जीवनयापन करने वाले लोग, समाज के अंदर चाहे किसी भी वर्ग के हों, एक क्लासेज बन गए हैं, उनकी एक श्रेणी बन गयी है।  एक उद्योगपति या इंडस्ट्रियलिस्ट्स हैं, बड़े लोग हैं, बड़े घराने हैं। उनके बच्चों की शिक्षा देखी जाए तो ज्यादातर विदेशों में है। दूसरा, जो मध्यमवर्गीय हैं, अगर उनके पास पैसा रहा तो वे अच्छे स्कूलों में, कान्वेंट में पढ़ाते हैं, अन्यथा वे भी बेसिक शिक्षा में गांव से लेकर शहरों की ओर जाते हैं। तीसरा वर्ग इस श्रेणी में वह आता है, जो बहुत ही कमजोर, खेतिहर मजदूर और किसान है, जो गरीब है, जो रोज का कमाने और खाने वाला है, उनके बच्चों की स्थिति देखी जाए तो भारत सरकार ने उनके लिए अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की है।  

          आज अनिवार्य शिक्षा पर अगर बात की जाए, तो मेरे ख्याल से सरकार की जो भी सुविधायें और योजनायें हैं, उन पर आप सुबह से शाम तक भाषण करेंगे। आज यह देखा जाए कि आईएएस का बेटा आईएएस ही क्यों होता है, डाक्टर का बेटा डाक्टर ही क्यों होता है, इंजीनियर का बेटा इंजीनियर ही क्यों होता है, इसको गंभीरता से सोचना और देखना पड़ेगा।  ...( व्यवधान) यह इसलिए कि वह सक्षम है, आर्थिक रूप से मजबूत है। ...( व्यवधान) पॉलिटिशियन का बेटा पॉलिटिशयन भी होता है।  ...( व्यवधान) यह तो क्षमता के ऊपर है। ...( व्यवधान)

सभापति महोदय : कृपया व्यवधान उत्पन्न न करें।

श्री शैलेन्द्र कुमार : हमेशा इस सदन में चर्चा हुयी है कि जब तक अपने देश की शिक्षा को एक समान शिक्षा का दर्जा नहीं दिया जाएगा, तब तक भारत एक विकसित देश नहीं बन सकता है।   हमेशा यह सुझाव आए हैं। कई चर्चाओं में इस सदन में यह सुझाव आया है। आज अगर देखा जाए तो अमीरों और गरीबों में भेदभावपूर्ण अलग-अलग शिक्षा पद्धति बनी है, इसको हमें समाप्त करना होगा। देश में समान और अनिवार्य शिक्षा कानून को लागू करना पड़ेगा तभी देश में किसी भी वर्ग का बालक होगा, वह शिक्षित होगा और हमारा समाज पूरी तरह से शिक्षित होगा। अगर शिक्षा के क्षेत्र में देखें तो प्रदेशों की स्थिति के आंकड़े अलग-अलग हैं जिसमें अग्रणी रूप से केरल है, साउथ के जो स्टेट्स हैं, वे हैं। उसके बाद उत्तर भारत में देखा जाए तो स्थिति बहुत बदतर है। वह वहां के परिस्थिति के अनुकूल है। इन तमाम बातों पर मैं विस्तार से नहीं जाना चाहूंगा। शिक्षा के बाद नौकरियां भी सीमित होती जा रही हैं। हर विभागों में कांट्रैक्ट बेसिस पर काम कराए जा रहे हैं। जहां तक भारतवर्ष की स्थिति देखी गई है, तो आज भी भारत युवा शक्ति वाला देश कहलाता है जिसमें 65 परसेंट 35 वर्ष से कम उम्र के लोग हैं। नौजवान भारत है और अगर हम 21वीं सदी की ओर सपने देख रहे हैं तो इस भारत में शिक्षा एक समान होनी चाहिए।

          सभापति महोदय, कल हम लोग क्वैश्चन अवर में, इधर के माननीय सदस्यों ने और उधर के माननीय सदस्यों ने पूर्वोत्तर राज्यों के पहाड़ों की स्थिति के बारे में सरकार से, मंत्री से प्रश्न जानना चाहा। हमारे अर्जुन मेघवाल जी यहां बैठे हुए हैं उन्होंने राजस्थान के रेगिस्तान की बात की थी कि तकनीकी शिक्षा में हम बहुत पीछे हैं। हर राज्यों की अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियां हैं। वहां की साक्षरता दर अलग-अलग है। वहां पर रोजगार के अवसर हैं। वहां के इंफ्रास्ट्रक्चर अलग-अलग हैं। हर प्रदेशों की अलग-अलग परिस्थितियां हैं।

          सभापति महोदय, वर्ष 2012 के बीच में रोजगार देने वाले हमारे जो मुख्य सेक्टर्स हैं, चाहे वे आईटी के क्षेत्र हों, फायनैंशियल सर्विसेज हों, टेलिकॉम से संबंधित या हॉस्पिटलिटी से संबंधित तमाम ऐसी नौकरियां हैं जिनसे हमें संभावनाएं थीं कि हम इनमें नौकरी पाएंगे, इनमें रोजगार के अवसर बढ़ेंगे लेकिन इन जगहों पर रोजगार में गिरावट आई है। उसका मुख्य कारण रहा कि हमने शिक्षा को वर्गीकृत किया और यही कारण है कि इन क्षेत्रों में जो पढ़े-लिखे, बड़े घर के लोग, आर्थिक रूप से जो सक्षम हैं उनके बच्चे तो जाते हैं और बाकी गरीब घर के बच्चे जो बेसिक शिक्षा गांव में पाते हैं, अगर वहां से पढ़ कर निकलते हैं तो उन नौकरियों तक नहीं पहुंच पाते हैं। मेरे ख्याल से ये क्लास-फोर्थ की नौकरी तक पहुंच पाते हैं और इसके बाद क्लास-थ्री तक पहुंच पाते हैं। क्लास-वन और क्लास-टू के नौकरियों की बात करें तो जो आर्थिक रूप से मजबूत हैं उनके बच्चे वहां जा पाते हैं।

          सभापति महोदय, हमारी मांग है कि देश के जितने जिला मुख्यालय हैं, वहां पर हमारे शेडय़ूल कास्टस, शेडय़ूल ट्राइब्स, जो गरीब घर के लोग हैं, उनके यहां शिक्षा की कमी है। देश के प्रत्येक जिला मुख्यालय के अंदर दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग की जो बालिकाएं हैं उनके लिए आवासीय विद्यालयों की व्यवस्था होनी चाहिए। महिला छात्रावासों की व्यवस्था अगर नहीं होगी तो मेरे ख्याल से देश शिक्षित नहीं हो पाएगा। छात्र और छात्राओं में तुलना करें तो अगर एक छात्र पढ़ता है तो केवल एक घर उजागर होता है और एक छात्रा पढ़ती है तो दो घर शिक्षित होते हैं। इस सदन में हमेशा इस बात की चिंता की गई है और प्रश्न उठाए गए हैं।  यह देखा गया है कि देश में शिक्षा का निजीकरण, बाजारीकरण हुआ है। हमें इसे तुंत प्रभाव से बंद करना पड़ेगा तभी शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान दे पाएंगे और आपका लक्ष्य पूरा हो पाएगा।

          सभापति महोदय, मैं आज आपके माध्यम से पुरजोर तरीके से सरकार से मांग करना चाहूंगा कि शिक्षा का भी राष्ट्रीयकरण होना चाहिए। जैसे स्वर्गीय प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था, उसी प्रकार समान शिक्षा के लिए शिक्षा का भी राष्ट्रीयकरण करना पड़ेगा तभी हमारा समाज शिक्षित हो पाएगा।

          शैडयूल्ड कास्ट्स और शैडयूल्ड ट्राइब्स के लिए छात्रवृति और फीस मिलती थी। हम ग्रामीण क्षेत्रों से चुनकर आते हैं। हम वहां के बच्चों से बात करते हैं तो पता लगता है कि पहले छात्रवृति मिलती थी, लोगों में जो जिज्ञासा थी, वह खत्म हुई है। छात्रवृति कभी मिलती है कभी नहीं मिलती। सरकारें आती जाती रहती हैं। हमें सरकारों के कृत्यों को भी झेलना पड़ता है। इसलिए हमें शैडयूल्ड कास्ट्स, शैडयूल्ड ट्राइब्स या पिछड़े वर्ग के लोगों की छात्रवृति और फीस की पूर्ति हेतु अधिकतम व्यवस्था सुनिश्चित करनी पड़ेगी, उन्हें आर्थिक तौर पर बजट देना पड़ेगा।

          हमने डैफिनेशन दी है कि जब हम छात्रवृति या शिक्षा ऋण, लोन देते हैं, तो आय सीमा कम से कम पांच लाख रुपये रखें। इससे मध्यम वर्ग के बच्चे शिक्षा ऋण लेकर अपने बच्चों को पढ़ा सकते हैं। छात्रवृति की धनराशि बहुत कम है। आप कहेंगे कि यह स्टेट सब्जैक्ट है, स्टेट गवर्नमैंट इसे देखे। लेकिन आप जब तक राज्यों के शिक्षा बजट को नहीं बढ़ाएंगे, तब तक हम इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते। एजुकेशनल लोन को ब्याज रहित किया जाना चाहिए। अगर हम शिक्षा के लिए ऋण लेते हैं तो खासकर जो कमजोर वर्ग है, जैसे एससी, एसटी, उनके लिए ब्याज मुक्त किया जाना चाहिए, तभी वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं।

          दोहरी शिक्षा नीति को समाप्त करना पड़ेगा। शिक्षा का बाजारीकरण तत्काल प्रभाव से बंद करना पड़ेगा। एससी, एसटी के जो लोग इसके लाभ से वंचित हैं, उन्हें विशेष महत्व देने की बात करनी चाहिए। आज चाहे अमीर हो या गरीब, सभी वर्ग के बच्चों को प्राइमरी से लेकर माध्यमिक या उच्च शिक्षा तक समान शिक्षा की व्यवस्था करनी पड़ेगी तभी हमारा मकसद पूरा हो पाएगा।

          हम अंग्रेजियत की तरफ ज्यादा बढ़े हैं। शिक्षा का माध्यम हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी होना चाहिए। हमें इस बारे में प्रयास करना चाहिए। मुझे याद है कि एक वक्त उत्तर प्रदेश की यह स्थिति थी कि वहां पीसीएस में अंग्रेजी अनिवार्य थी। ग्रामीण इलाकों से जो बच्चे पढ़कर निकलते थे, वे उसे क्वालीफाई नहीं कर पाते थे, क्लास टू, क्लास वन केटेगिरी में नहीं जा पाते थे।...( व्यवधान) पांडे जी कह रहे हैं कि हमारे समय में वही था। मैं माननीय मुलायम सिंह यादव जी को बधाई देना चाहूंगा कि उन्होंने अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त किया और हिन्दी को बढ़ावा दिया तो अंग्रेजी के लोग कम आए, ग्रामीण क्षेत्रों से जो नौजवान पढ़कर निकले थे, वे पीसीएस में प्रदेश सर्विसेज में आने लगे। हमें यह करना पड़ेगा।...( व्यवधान) अधीर रंजन जी, आप बैठ जाइए। अब आप मंत्री हो गए हैं।...( व्यवधान)

सभापति महोदय :  माननीय सदस्य को बोलने दीजिए। व्यवधान पैदा न करें।

…( व्यवधान)

श्री शैलेन्द्र कुमार : मैं वही बात कह रहा हूं कि आर्थिक तौर पर मजबूत हो, वह चाहे कोई भी हो।...( व्यवधान)

सभापति महोदय : शैलेन्द्र कुमार जी, आप चेयर की तरफ देखकर बोलिए।

…( व्यवधान)

श्री शैलेन्द्र कुमार : मैं अन्य भाषाओं की बुराई नहीं करता। उसे स्वैच्छिक विषय के रूप में लिया जाए। मैं उसकी कभी बुराई नहीं करता। आप स्वैच्छिक विषय बना दीजिए, जिसे वे पढ़ें, आगे बढ़ें । इसमें हमें कोई दिक्कत नहीं है।...( व्यवधान) इन संस्थानों में जो व्यावसायिक शिक्षा है, स्कूल, कालेजों की उपलब्धियों के आधार पर प्रदेश की जो प्रतियोगी परीक्षाएं होती हैं, उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए तभी जाकर हम इस मकसद और लक्ष्य को आगे प्राप्त कर पायेंगे। आज भी हमारे जो केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैं, उनमें 40 प्रतिशत शिक्षकों की कमी है। मैंने समाचार पत्रों में पढ़ा कि कल एक डेलीगेशन सोनिया गांधी जी से मिला है। उच्च शिक्षा में भी आज करीब 4 हजार शिक्षकों की कमी है, जिसे हमें पूरा करना है। मैं चाहूंगा कि आप विशेष अभियान के तहत इसे भरने की कोशिश कीजिए। अब आपने व्यवस्था की और संविदा पर तमाम अध्यापक रखे जाते हैं। शिक्षा मित्रों को ले लीजिए। लेकिन आज अगर देखा जाये, तो कौन्ट्रेक्ट बेस पर शिक्षा मित्र या ग्रामीण इलाकों में जो शिक्षा मित्र पढ़ा रहे हैं, वे मेहनत करके पढ़ा रहे हैं। वहीं पर जो रेगुलर शिक्षक हैं, वे कम इंटरस्ट ले रहे हैं। चूंकि शिक्षा मित्र सरकारी नौकर नहीं कहलाते हैं। उनको मानदेय मिलता है, तो उनके ऊपर सारा काम छोड़ देते हैं। आज जरूरत इस बात की है, हमारी उत्तर प्रदेश सरकार करने जा रही है कि ऐसे शिक्षा मित्र जो मेहनत करके पढ़ा रहे हैं, जिनके पास क्वालिफिकेशन है, उसे क्लासीफाई करके उन्हें सरकारी सर्विस का  अवसर दे रहे हैं और  सरकारी सर्विस के बराबर उनके वेतन की व्यवस्था भी करने जा रहे हैं। शहरी एवं ग्रामीण स्तर के कालेजों में छात्रों की उपस्थिति में बड़ा अंतर पाया गया है। आज क्यों यह अंतर आ रहा है। हमें इस विषय पर सोचना पड़ेगा कि उनकी उपस्थिति में बड़ा अंतर आता है। जो साधन सम्पन्न लोग हैं, उनकी उपस्थिति ज्यादा है और जो साधन सम्पन्न नहीं हैं, उनकी उपस्थिति कम है। वे पढ़ नहीं पा रहे हैं। यह अनुपस्थिति का एक मुख्य कारण है। अगर हम आंकड़े देखे, तो वर्ष 2011-12 में 126 जिलों की पहचान की गयी है जहां स्कूलों में दाखिला लेने वाले 60 फीसदी से कम बच्चे  अपनी पढ़ाई जारी रख पाते हैं। ऐसा क्यों हो रहा है, जबकि आपने व्यवस्था की है। आप कहेंगे कि इसमें हमारे जनप्रतिनिधि सहयोग करें और स्टेट गवर्नमैंट को भी देखना पड़ेगा। हम लोग देख रहे हैं। कभी-कभी प्राइमरी विद्यालय में हम लोग चैक करते हैं। कभी-कभी विद्यालयों में भी जाते हैं। लेकिन दूसरी तरफ मैं आपको इशारा करना चाहूंगा कि हमारे जो निजी विद्यालय हैं, प्राइवेट स्कूल हैं, वे सरकारी विद्यालय से बेहतर शिक्षा दे रहे हैं। एक तरीके से आप जो व्यवस्था सरकारी विद्यालयों में करते हैं, वही व्यवस्था आपको प्राइवेट विद्यालयों में करनी चाहिए। ...( व्यवधान) उनको मानदेय मिलता है। उनको भी कम से कम वेतन इस स्तर का दें कि वे मन लगाकर पढ़ा सकें। वे कहीं कम नहीं हैं, बल्कि सरकारी विद्यालय के शिक्षक समझते हैं कि हमें महीने में इतना वेतन मिल जायेगा चाहे हम पढ़ायें या न पढ़ायें। लेकिन जो प्राइवेट विद्यालय हैं, जिनमें शिक्षक मेहनत करके और कम मानदेय पाकर पढ़ाई कराते हैं, उन्हें भी हमें विशेष अवसर देना चाहिए।

          आज भी 72 फीसदी बच्चों में खून की कमी है। बच्चे  स्कूल क्यों नहीं जा रहे, उनमें पढ़ाई के प्रति इंटरस्ट क्यों नहीं है, ये तमाम वजह हैं।  मंत्री जी, आपका जो मानव संसाधन विकास मंत्रालय है, वह हैल्थ से जुड़ा हुआ है, लेबर मंत्रालय से भी जुड़ा है। अगर आप तमाम मंत्रालयों की स्थितियों को लेकर चलेंगे, तो मेरे ख्याल से बेहतर शिक्षा की ओर बढ़ सकेंगे। ...( व्यवधान)

सभापति महोदय :   उनमें पौष्टिकता की कमी है, न्यूट्रिशियन की कमी है।

…( व्यवधान)

श्री शैलेन्द्र कुमार :  हां, पौष्टिकता की कमी है। वे कुपोषण के शिकार हैं। न्यूट्रिशियन की कमी है। यही वजह है कि हमने मिड डे मील योजना लागू की है। मिड डे मील के बारे में अभी पाण्डे जी ने बड़े विस्तार से कहा, मैं उस ओर नहीं जाना चाहता। आज भी 44 प्रतिशत बच्चे सामान्य वजन से कम हैं। बच्चों को जितने वजन का होना चाहिए, वे उससे कम हैं। तमाम ऐसे कारण हैं । अगर भारत वर्ष की स्थिति देखी जाये, तो कुपोषण के शिकार पांच वर्ष से कम आयु के बच्चे दो तिहाई हैं। आज जरूरत इस बात की है कि जब तक हमारे बच्चे हृष्ट-पुष्ट नहीं होंगे, तंदरुस्त नहीं होंगे, उनकी पढ़ाई अच्छी नहीं हो सकती। वे पढ़ने से भटकते हैं, दूर भागते हैं।  उनमें जिज्ञासा की कमी होती है। आज शर्मनाक किन्तु सच है कि दुनिया का हर चौथा व्यक्ति भूखा है, तो वह भारतीय है।  हमें इस ओर भी ध्यान देना पड़ेगा। आज अगर बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, बच्चों को इंट्रेस्ट नहीं है, एडमिशन लेने के बाद अगर वे पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते हैं, पढ़ाई बीच में छोड़कर जा रहे हैं, तो उस ओर भी हमें सोचना पड़ेगा। अगर आंकड़े देखें, नवजात मृत्यु दर हमारे पड़ोसी देशों में अगर तीन है, तो हमारे देश में यह संख्या 47 है।

          महोदय, मैं माननीय मंत्री जी से मांग करना चाहूंगा कि देश में शिक्षा की प्रणाली पूरी तरह से समान शिक्षा की नही है। आपने इतने बोर्ड्स बना दिए हैं - सीबीएसई बोर्ड अलग है, आईसीएसई बोर्ड अलग है, उत्तर प्रदेश का बोर्ड अलग है, अन्य राज्यों को शिक्षा बोर्ड अलग हैं और सभी के पाठय़क्रम अलग-अलग हैं, सबकी किताबें अलग-अलग हैं। बच्चों पर इतना ज्यादा बोझ बना दिया है कि जब वे स्कूल जाते हैं, तो उस बोझ को अपने कंधे पर लेकर जाते हैं। इसलिए एक समान पाठय़क्रम पूरे देश में होना चाहिए, कक्षा एक से लेकर उच्च शिक्षा तक एक ही पाठय़क्रम होना चाहिए। बच्चों पर आप जो बोझ लादते हैं, वह बड़ी चिंता का विषय है। उससे भी बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। जहां तक अंग्रेजी और हिन्दी माध्यम में जो दूरियां है, हमें उसे कम करना चाहिए। अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त करना होगा, मिड डे मील की, केवल सरकारी स्कूलों में ही नहीं, जो निजी स्कूल चल रहे हैं, उनमें भी व्यवस्था करनी पड़ेगी। चूंकि प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे अलग नहीं होते हैं, सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे भी अलग नहीं होते हैं, वही बच्चे होते हैं। इसलिए हमें इस भेदभाव को दूर करना पड़ेगा।

          महोदय, मैं  मांग करना चाहूंगा कि जीरो से लेकर 18 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा को शिक्षा अधिकार कानून, 2009 के अंतर्गत शामिल किया जाए। यह ध्यान दिलाना आवश्यक है कि बच्चों के अधिकार हेतु संयुक्त राष्ट्र सार्वभौम घोषणा पत्र, भारतीय किशोर न्याय अधिनियम, 2000 एवं संशोधित अधिनियम 2006 इत्यादि में बच्चों की इसी परिभाषा को स्वीकार करते हुए शिक्षा देनी चाहिए। राष्ट्रीय उत्पाद का 6 फीसदी या सरकारी बजट का 20 फीसदी शिक्षा के लिए खर्च किया जाए। साथ ही उपरोक्त धन का 50 प्रतिशत बुनियादी शिक्षा के मद में खर्च हो। शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए पैरा-शिक्षकों एवं अप्रशिक्षित शिक्षकों के स्थान पर स्थायी एवं प्रशिक्षित पूर्वकालिक शिक्षकों की भर्ती की जानी चाहिए। शिक्षा अधिकार कानून लागू हो जाने के बाद बाल मजदूरी प्रतिषध व विनिमय अधिनियम, 1986 में तत्काल बदलाव किया जाए और इसे बाल मजदूरी प्रतिषेध अधिनियम बनाया जाना चाहिए। शिक्षा अधिकार कानून में शिक्षा की गुणवत्ता जानने के लिए मापक सूचकों को शामिल किया जाना चाहिए जिससे माता-पिता एवं समुदाय के अन्य लोग शिक्षा की गुणवत्ता की निगरानी करने में सक्षम हो सकें। केंदीय विद्यालय को आधार मानते हुए केंद्र के सभी सरकारी विद्यालयों में गुणवत्ता हेतु केंद्रीय विद्यालय के मानको को क्रियान्वित किया जाए। बच्चों के शिक्षा अधिकार से वंचित होने की दशा में उनके अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग को प्रखण्ड स्तर पर विकेंद्रित किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग एवं राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग को न्यायिक अधिकार दिए जाने की आवश्यकता है। निजी विद्यालयों के नियमन के द्वारा सबके लिए समान शिक्षा का प्रावधान किया जाना चाहिए। आज उत्तर प्रदेश सरकार ने केंद्र सरकार से शिक्षा के क्षेत्र में मांग की है कि सर्वशिक्षा अभियान के तहत 2011-12 के अवशेष केंद्रांश की अवमुक्ति तथा मानक के अनुसार विद्यालयों में प्रशिक्षित शिक्षकों की तैनाती की अवधि 31 मार्च, 2015 तक बढाया जाए जिसमें 2346.8 करोड़ रुपये की मांग की है। दूसरी तरफ प्रदेश के नौ मंडलों में नए विश्वविद्यालयों की स्थापना हेतु सहायता उपलब्ध कराए जाने तथा छठे पुनरीक्षित वेतनमान के अनुसार प्राध्यापकों को एरियर का भुगतान किए जाने हेतु सहायता उपलब्ध कराए जाने के संबंध में 4006 करोड़ रुपये की व्यवस्था की है। व्यावसायिक शिक्षा में व्यावसायिक प्रशिक्षण दिए जाने हेतु राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना हेतु 5267 करोड़ रुपये की मांग की है। राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के अंतर्गत संचालित आईसीडी योजना के अंतर्गत अनुदेशकों के मानदेय में वृद्धि, छात्र-छात्राओं को टेबलेट, पीसी एवम् लैपटॉप, सभी माध्यमिक विद्यालयों के विद्यार्थियों को निशुल्क ड्रैस तथा पाठय़ पुस्तकें तथा अभियान के तहत अशासकीय विद्यालयों को भी सम्मिलत किए जाने के सम्बन्ध में 4100 करोड़ रुपए की मांग की है। मैं आपके माध्यम से मांग करना चाहूंगा कि  सरकार इसे गम्भीरता से ले। मैं उत्तर प्रदेश की मांग तो करता ही हूं, लेकिन जो अन्य प्रदेश हैं, जिन्होंने शिक्षा के लिए मांग की है, उन्हें भी समान और अच्छी शिक्षा के लिए सरकार बजट का प्रावधान करे। तब हमारी शिक्षा सुदृढ़ हो सकेगी और शिक्षा व्यवस्था का राष्ट्रीयकरण भी जरूर करें। तब जाकर भारतवर्ष शिक्षित बनेगा, विकास करेगा और विकसित होगा। इन्हीं बातों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

 

कुमारी मीनाक्षी नटराजन (मंदसौर): सभापति महोदय, आज एक गम्भीर विषय शिक्षा की समानता और शिक्षा की अनिवार्यता पर चर्चा हो रही है। इस विषय पर अभी समाजवादी पार्टी के माननीय सदस्य, जो एक वरिष्ठ सदस्य भी हैं, शैलेन्द्र कुमार जी ने अपने विचार व्यक्त किए हैं। मैं समझती हूं कि यह संसद के लिए बड़ा अनुकूल मौका है कि आज हम सब लोग यहां पर शिक्षा व्यवस्था पर, जो एक गम्भीर व जटिल विषय है, भारत जैसे विविधताओं जैसे देश में एक जरूरी विषय है, हमने आज चर्चा के लिए समय निकाला। मैं अपनी पार्टी की  ओर से इस मुद्दे पर अपने विचार व्यक्त करना चाहती हूं।

          सभापति महोदय, देश की आबादी करीब 125 करोड़ है। इस आबादी का बड़ा हिस्सा युवाओं का है। हमारे देश की जो प्राचीन संस्कृति है, वह शिक्षा  अध्ययन-अध्यापन को अपनी नींव में संजोए हुए है। जब हम अपने देश की बात करते हैं तो ज्ञान की पूजा हमारी संस्कृति में होती है। विश्व में अन्य संस्कृतियां रही हैं,लेकिन ज्ञान की पूजा, माँ सरस्वती की उपासना हमारी संस्कृति में ही होती है। यह हमारी संस्कृति की देन है कि हम शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता अपने जीवन में देते हैं।

          हमारी जो प्राचीन विरासत है, चाहे तक्षशिला विश्वविद्यालय के उस समय की बात हो या विक्रमशिला या नालंदा की बात हो, ये केन्द्र हुआ करते थे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और देश-विदेश के विद्यार्थी यहां आकर शिक्षा प्राप्त करते थे। मुझे यहां इस बात को दोहराते हुए बहुत फLा महसूस होता है कि स्वर्गीय राजीव गांधी जी ने नई शिक्षा नीति 1986 जब बनाने की बात हुई, तो उन्होंने उस समय एक नया फलसफा दिया। उस समय तक का दौर यह मानता था कि बहुत बड़ी जो यह आबादी है, वह दरअसल हमारे लिए कोई कमजोरी है, कोई चुनौती है। उससे हटकर उन्होंने कहा कि यह हमारी सबसे बड़ी ताकत है और हम मानव संसाधन का बेहतर विकास कर सकेंगे और उसी के आधार पर एक ज्ञान आधारित समाज का निर्माण कर सकेंगे।

          महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने सही कहा कि  "भारत की नियति अब उसकी कक्षाओं में आकार ले रही है। स्कूल्स और कालेजज़ से निकलने वालों की संख्या और गुणवत्ता पर राष्ट्र निर्माण के काम, हमारी सफलता निर्भर करती है। "  यह एक बहुत बड़ी बात है कि आज हमें एक ऐतिहासिक मौका मिला है कि अपनी युवा आबादी को सही दिशा में, सकारात्मक दिशा में और उनकी सृजनात्मक-रचनात्मकता को बेहतर आयाम देने की दिशा में शिक्षा नीति के माध्यम से आग बढ़ें।

          देश को जब आजादी मिली, उस समय केवल 14 फीसदी लोग साक्षर थे। आज यह स्थिति है कि वह साक्षरता की दर बढ़कर 60 फीसदी हो गई है। मैं यह भी बताना चाहती हूं कि 1961 में अनुसूचित जाति के बीच साक्षरता की दर 10.27 फीसदी थी, 1991 में बढ़कर साढ़े 37 फीसदी हो गई। इसी तरह अनुसूचित जनजाति की साक्षरता दर जो 1961 में साढ़े आठ फीसदी थी, वह 1991 में बढ़कर करीब 30 फीसदी हो गई।  लेकिन उसके बावजूद भी आज शिक्षा पर एक आमूलचूल विचार की जरुरत है। विचार की जरूरत इसलिए है कि मैं भी ग्रामीण पृष्ठभूमि से आती हूं। मैं यह महसूस करती हूं कि जो हमारे ग्रामीण जीवन का केलेंडर है उसमें और हमारे शैक्षणिक केलेंडर में सामंजस्य नहीं है।

          हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है और हम उसमें इस तरह से काम नहीं कर सकते हैं जैसे कुछ अन्य राष्ट्रों में होता है। उन्होंने अपने मौसम के अनुकूल किया है क्योंकि सर्दी में वे स्कूल चला नहीं सकते हैं इसलिए उन्होंने अपनी छुट्टियों और शैक्षणिक सत्र् का अलग टाइम-टेबल बनाया लेकिन हम भी उसी टाइम-टेबल का पालन करते हैं। जून-जुलाई-अगस्त में किसान को उसके बेटे की जरूरत पड़ती है खेत में तभी उसका शैक्षणिक सत्र् आरम्भ होता है। इस पर हमें बहुत गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि जो हमारे दैनिक जीवन का केलेंडर है उसमें और हमारे शैक्षणिक सत्र् के केलेंडर में एक तरह का साम्य होना चाहिए।

          दूसरी बात मैं यहां पर विशेष तौर से कहना चाहती हूं कि हमारी शिक्षा का मूल क्या होना चाहिए? हमारी शिक्षा समावेशी हो, हमारी शिक्षा व्यवस्था का विस्तार हो और हमारी शिक्षा गुणवत्ता पर ध्यान दे। आज गुणवत्ता पर कहीं पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। आज शिक्षा के क्षेत्र में अलग-अलग तरह का कैडर शिक्षित करता है। किसी भी सर्वशिक्षा अभियान के सरकारी स्कूल में चले जाएं, इस बात की खुशी है कि करोड़ों बच्चों को हम मध्याह्न भोजन के माध्यम से हम स्कूल से जोड़ने का काम कर रहे हैं। लेकिन साथ ही मैं बताना चाहती हूं कि जब भी हम स्कूल में जाते हैं और उससे उसका नाम लिखने के लिए भी कहते हैं तो वह अनभिज्ञता प्रकट करता है। बच्चे में आत्म-विश्वास नहीं होता है। बच्चे में स्कूल से ही भेद-भाव की शुरूआत हो जाती है। मैंने अपने संसदीय क्षेत्र के कई स्कूलों में जाकर जानकारी प्राप्त की तो पाया कि भेद-भाव पनपता है। मध्याह्न भोजन का काम पूरी तरह से एक वर्ग विशेष की महिलाएं करती हैं। स्कूल में एक पंगत में बैठकर सब बच्चों को एक साथ भोजन परोसा नहीं जाता है। बच्चे जो आगे की लाइन में बैठते हैं वे एक जाति विशेष के बच्चे होते हैं और जो बच्चे पीछे बैठते हैं उनके सरनेम से समझ में आता है कि किस तरह का भेद-भाव स्कूल के प्रांगण में हो रहा है और उस तरह के भेद-भाव के लिए कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।

          सभापति महोदय, मैं स्वयं एक महिला हूं और सांसद हूं। बालिकाओं की शिक्षा के मामले में कहना चाहती हूं। हमारी ज्यादातर जो बाल-भारती की किताबें हैं उसमें दो तस्वीरें बनी होती हैं। मैंने बहुत गौर से देखा, एक में बालक की और एक में बालिका की तस्वीर है। बालक के आगे लिखा है - राम जा, पाठशाला जा लेकिन बालिका के सामने लिखा है -रमा जा, खाना बना, यानी हम स्कूल शिक्षा से ही यह बताना चाहते हैं कि बालिका और महिला का स्थान रसोईघर में है, खाना बनाने में है, उसका काम स्कूल और कालेज जाने का नहीं है। कल्पना चावला जैसे एक-दो जो उदाहरण हैं उस लेवल तक वे पहुंच नहीं सकती हैं। मैं समझती हूं कि यह बिल्कुल समाप्त होना चाहिए।

          माननीय शैलेन्द्र जी ने राष्ट्रभाषा के बारे में कहा तो मैं कहना चाहती हूं कि मैं मूलतः तमिलभाषी हूं लेकिन मेरी पैदाइश मध्यप्रदेश की है और  हिंदी को अपनी भाषा मानती हूं और हिंदी में ही मैं विचार कर सकती हूं और हिंदी में ही अपने विचार और बात रख सकती हूं। मेरा मानना है कि इंग्लिश एक स्किल हो सकती है लेकिन इंग्लिश हमारी शिक्षा का माध्यम नहीं हो सकती। उसे हम एक भाषा के तौर पर सीखें क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी हमें प्रतियोगी बनना है, हमारे लोगों को आगे बढ़ना है लेकिन जो प्रारम्भिक शिक्षा है वह अगर मातृभाषा में नहीं हो तो बच्चा केवल तोता-रटंत बनकर रह जाता है।  बच्चा दुनिया में आगे बढ़ने का रास्ता नहीं देख पाता है और हमारी जो शिक्षा व्यवस्था है वह समझ से ज्यादा याददाश्त पर कायम रहेगी तो हम आगे नहीं बढ़ सकते हैं। हमारी जो शिक्षा प्रणाली है वह पूरी तरह से याददाश्त की परीक्षा लेती है, समझ की परीक्षा नहीं लेती है।   “ सिकंदर ने पौरस से की थी लड़ाई, जो की थी लड़ाई तो मैं क्या करुं।”  हमारे छात्र पूछते हैं क्योंकि कंफ्यूज होते हैं क्योंकि उन्हें बताया जाता है कि इसे रटना है तब जाकर आप परीक्षा उत्तीर्ण करेंगे। इसलिए हमें इस दिशा में जरूर ध्यान देना चाहिए।

          हमारे जो जवाहर नवोदय विद्यालय हैं उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है। जवाहर नवोदय विद्यालय अच्छी शिक्षा, गुणवत्ता की शिक्षा और उन्मुक्त वातावरण में शिक्षा दे रहे हैं। मैं मानव संसाधन विकास मंत्री जी से निवेदन करना चाहूंगी कि नवोदय स्कूलों का विस्तार होना चाहिए। नवोदय स्कूलों को आप ब्लाक-ब्लाक तक पहुंचाने का काम करें। माडल स्कूलों की जो आपने अवधारणा बनाई है, माडल स्कूलों की आपने घोषणा की, माडल कालेजों की भी घोषणा की, लेकिन अभी तक उनका क्रियान्वयन नहीं हो पाया। मुझे इस बात की खुशी है कि एक सवाल के उत्तर में आपने इस बात को स्वयं स्वीकार किया कि केवल चंद माडल स्कूल खुल पाए हैं। मेरा अनुरोध है कि इन्हें और ज्यादा बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।

          दूसरी बात मैं यहां कहना चाहती हूं कि हमारे शैक्षणिक संस्थान क्लोज्ड हैं। हम उम्मीद भी नहीं करते कि जो सन माइक्रो सिस्टम है, वह स्टैंडफोर्ड यूनिवर्सिटी नेटवर्क्स है। यानी कि एक विश्वविद्यालय इतनी बड़ी कंपनी को और एक साफ्टवेयर के इजाद के बारे में काम कर पाता है, लेकिन हमारे जो शैक्षणिक संस्थान हैं, वे अपने पुराने प्रशासनिक ढांचे से जुड़े हैं। आज स्कूलों और कालेजों के लिए जो बजट यहां स्वीकृत करते हैं, वह फरवरी-मार्च तक स्कूलों में पहुंचता है। उसके बाद उसमें लीपा-पोती होती है और आपके सामने एक यूटीलाइजेशन सर्टिफिकेट भेज दिया जाता है। इस तरह से प्रशासनिक ढांचे के लचरपन के कारण और लालफीताशाही के कारण आप ज्ञान के केंद्र को उन्मुक्त नहीं कर पा रहे हैं। आप लोगों को मौका नहीं दे पा रहे हैं कि वे वहां जा कर काम कर सकें। मैं आपको यह भी बताना चाहती हूं कि जितने प्राइवेट स्कूल और कालेज खुले हैं, उनमें से कालेज की जो स्थिति है, वे एक तरह से एक दिन का सैट लगाकर शो करते हैं। जब आपका निरीक्षक दल वहां जाता है, तो किराये पर वहां सारी चीजें मिल जाती हैं। उनका वे प्रदर्शन करते हैं और उसके आधार पर उनका सर्टिफिकेशन हो जाता है और उसके अगले दिन छात्रों को कुछ नहीं मिलता है। बहुत जरूरी है कि हमारे जो पेंडिंग कानून हैं, जिनमें आप मान्यता का नियमन करना चाहते हैं, वह ऐच्छिक नहीं होना चाहिए। वह सभी के लिए अनिवार्य होना चाहिए। मैं आपसे अनुरोध करूंगी कि एक्रिडिटेशन का बिल आप जल्द से जल्द ले कर आएं, ताकि कम से कम एक मानक तो स्थापित होगा, जिससे कि सभी लोगों को एक तरह की शिक्षा व्यवस्था के बारे में सोचने का मौका तो मिलेगा। वरना यह स्थिति है कि राजधानी दिल्ली से अगर आप चालीस किलोमीटर दूर चले जाएं, तो वहां के कालेज की स्थिति ऐसी होगी कि वहां छत टपकती है, वहां पीने का साफ पानी मुहैया नहीं होता, जहां लड़कियों के लिए अलग से गर्ल्स रूम तक नहीं हैं और दूसरी तरफ राजधानी में सेंट स्टीफन, एसआरसीसी जैसे कालेज हैं। ऐसे कालेज से अगर दो अलग-अलग तरह के स्नातक निकलेंगे, तो वे कैसे दुनिया के साथ नज़र मिला कर चल पाएंगे और कैसे आगे बढ़ पाएंगे। इस बारे में उचित व्यवस्था करने की जरूरत है।

          मैं मंत्रालय का बहुत धन्यवाद करना चाहूंगी कि आपने स्कालरशिप की शुरूआत की है। आपने प्रत्येक प्रदेश में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की शुरूआत की है। यह बहुत ही स्वागत योग्य कदम है। इसके लिए आपका आभार मानती हूं तथा कस्तूरबा ग्रामीण बालिका छात्रावास के माध्यम से स्त्री शिक्षा के बारे में भी आपने एक सोच बनाई तथा पहल की है। इसके साथ ही मैं कहना चाहती हूं कि आज चीन में पिछले पांच साल में 1250 नए विश्वविद्यालय खोले हैं और आज हमारे पास मात्र 611 विश्वविद्यालय हैं। हमारे पास जब तक 1500 विश्वविद्यालय नहीं होंगे, तब तक वर्ष 2015 में हम 15 फीसदी सकल भर्ती अनुपात को हासिल नहीं कर पाएंगे। आज भी केवल सात से आठ फीसदी लोग कालेज तक पहुंच पाते हैं, क्योंकि शिक्षा स्कूल के स्तर पर ही भेद कर देती है। बस्तों के बोझ की बात कही है। इसके अलावा भी शिक्षा परीक्षा प्रणाली और यादाश्त पर आधारित शिक्षा खुलकर आगे बढ़ने का मौका नहीं देती है इसलिए जरूरी है कि हम न केवल इसका विस्तार करें, फैलाव करें बल्कि इसकी गुणवत्ता पर पूरा-पूरा ध्यान देने का प्रयास करें।

          मैं आखिरी बात परीक्षा प्रणाली के बारे में कहना चाहती हूं। आधे से ज्यादा विश्वविद्यालयों की शिक्षा प्रणाली की स्थिति यह है कि परीक्षा का टाइम टेबल कब जारी होगा, किसी को पता नहीं होता है। कई जगहों पर ऐसी स्थिति है कि पहले साल की परीक्षा दूसरे साल की परीक्षा का समय आने तक भी पूरा नहीं होता है। उसके बाद हमारी जो शिक्षा प्रणाली है, वह पूरी तरह से पारदर्शी नहीं है। अभी हाल ही में आरटीआई के अन्तर्गत हाई कोर्ट ने भी फैसला दिया। मैं कहना चाहती हूं कि हम लोग बचपन से सुनते आए हैं और हमें भी कहा गया कि अपनी गलतियों से बेटा, सीखो। लेकिन गलतियां बताएंगे नहीं तो सीखेंगे कैसे? मैं आपसे अनुरोध करना चाहती हूं कि हमारे बच्चों को उनकी उत्तर पुस्तिका की प्रतिलिपि मिलनी चाहिए ताकि वे समझ सकें कि उन्होंने कहां कमियां की हैं और कहां गलतियां की हैं ताकि वे उनका सुधार कर सकें और अगली बार अच्छा अटैम्प्ट आपके सामने कर सकें।

          एक बात और मैं कहना चाहती हूं जो कि आगे आने वाले वर्षों के हिसाब से हमारे लिए बहुत जरूरी है  हमारे जो शिक्षा के संस्थान हैं, वे शोध औऱ अनुसंधान पर भरपूर ध्यान दे सकें। शोध औऱ अनुसंधान पर भरपूर ध्यान दिये बगैर हम आगे बढ़ने का काम नहीं कर सकते। मैं यहां पर यह भी कहना चाहती हूं कि जो हमारे शिक्षा के केन्द्र हैं, वे किसी भी तरह की कूपमंडूकता से मुक्त हों। वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रचार-प्रसार करने वाले हों और शिक्षा में पाठय़क्रम के माध्यम से किसी भी तरह का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए वरना  एक विचारधारा की सरकार अगर किसी एक राज्य में आ गई तो कुछ नेहरू जी पर लिखी गई कविताएं अचानक पाठय़क्रम से गायब हो जाती हैं। मेरे अपने प्रदेश में ऐसे प्रयास हुए। इसलिए मैं कहना चाहती हूं कि शिक्षा का करिकुलम पूरी तरह से राजनीति से मुक्त होना चाहिए औऱ वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रचार प्रसार करने वाली समान शिक्षा सब जगह लागू होनी चाहिए।

          अंत में, मैं केवल एक बात कहना चाहती हूं कि जॉन लिनोन ने अपनी पंक्ति में कहा कि एक बच्चे को उसकी मां ने सिखाया कि आपको अपने जीवन में क्या बनना है? बच्चे के सामने उन्होंने कहा कि आपके जीवन का लक्ष्य होना चाहिए One should be happy. जब उन्हें स्कूल में असाइनमेंट मिला तो बच्चे से पूछा गया कि आप बीस साल बाद क्या बनना चाहते हैं? बच्चे ने लिखा: I want to be happy. टीचर ने कहा कि आप अपना असाइनमेंट समझ नहीं पाए हैं। बच्चे ने कहा मैं तो सिर्फ असाइनमेंट नहीं समझ पाया हूं लेकिन आप जीवन को नहीं समझ पाए हैं।

           इसलिए जो हमारी शिक्षा के परिसर हैं, वे ज्ञान आधारित हों और वे हमारी मानसिकता को मुक्त करें और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को फैलाने का काम करें। लेकिन हमारी विविधताओं का समावेश करते हुए एक शिक्षा व्यवस्था लागू होनी चाहिए। मैं यही विचार आपके समक्ष रखना चाहती हूं। धन्यवाद।

श्रीमती सुमित्रा महाजन (इन्दौर):सभापति जी, आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपके धन्यवाद देती हूं। मैं सबसे पहले एक बात कहना चाहूंगी कि मैंने जो नियम 193 के अधीन विषय दिया था, उसमें मैंने कोई समान शिक्षा प्रणाली की बात नहीं कही थी। मैंने कहा था कि शिक्षा प्रणाली में सुधार कैसे होना चाहिए? हालांकि कोई बात नहीं है, हम दोनों विषयों को एक साथ भी कर सकते हैं। अभी जो बात हो गई कि समान शिक्षा प्रणाली होनी चाहिए। मैंने कहा था कि शिक्षा प्रणाली में सुधार कैसे हो सकते हैं? क्योंकि समान शिक्षा प्रणाली अगर हम कहेंगे या कोई एक समान कानून जैसे आज आरटीई कानून यहां से आ गया लेकिन हमें एक बात ध्यान में रखनी पड़ेगी कि शिक्षा राज्य का विषय है। यहां से हम कुछ डाइरेक्शन दे सकते हैं।...( व्यवधान) वह डाइरेक्शन ऑल इंडिया लैवल का होना ही चाहिए क्योंकि भारतवर्ष एक राष्ट्र है और इस दृष्टि से...( व्यवधान) माइक्रोफोन में भी सुधार होना चाहिए।...( व्यवधान) एम्पलीफायर में सुधार होना चाहिए। उचित माध्यम होना चाहिए।

           समान शिक्षा प्रणाली की बात आपने भी कही थी और मीनाक्षी ने भी उसके लिए हां कहा था। मेरा कहना यह है कि कोई एक कानून बनाकर क्योंकि बाद में हमने नया राइट टू एजुकेशन का कानून यहां से बना दिया, उसकी भी मैं बाद में बात करूंगी। लेकिन कानून यहां बनाए और राज्य केवल उसको फोलो करे, यह नहीं हो सकता है। राज्यों की भी अपनी एक पद्धति होती है लेकिन कुछेक कॉमन बातें तो होनी ही चाहिए। कॉमन बातें क्यों होनी चाहिए? शिक्षा के क्षेत्र में हमारी एक ऐसी पॉलिसी बननी चाहिए जो यहां से फोलो होनी चाहिए और राज्यों में भी जानी चाहिए क्योंकि हम यह मानते हैं कि शिक्षा केवल अक्षरित ज्ञान नहीं है। केवल एबीसीडी, किताबी ज्ञान देना या कखग सिखाना शिक्षा का उद्देश्य नहीं है। शिक्षा से एक चरित्रवान, सुशिक्षित, शारीरिक और मानसिक रूप से विकसित व्यक्ति बनना चाहिए जो आगे जाकर राष्ट्र निर्माण में काम आ सके। यह बात केवल मैं नहीं कह रही हूं, प्रधानमंत्री जी ने भी राइट टू एजुकेशन की बात की थी।

सभापति महोदय : शिक्षा की तरह माइक्रोफोन में भी सुधार होना चाहिए।

श्रीमती सुमित्रा महाजन :  महोदय, शिक्षा का मूल उद्देश्य क्या है? हम भी मानते हैं और आप भी बहुत ज्ञाता हैं और आपको भी मालूम है- “विद्या ददाति विनयं, विनयाद्याति पात्रताम्। पात्रत्वाधनम् आप्नोति    धनाद्धर्म ततः सुखम।” इसमें आखिरी लाइन बहुत महत्वपूर्ण है कि ये सब क्यों प्राप्त करना है? आज की प्रणाली है -eat, drink and be merry.  No, it is not for that. धर्म यानी जिसे हम या आप समझते हैं, यह कोई पूजा पद्धति नहीं है बल्कि कल्याणकारी भावना है, चारित्रिक शुद्धता की भावना है। इससे ही हम सबको सुखी कर सकते हैं। यह क्वालिटी है। मैं प्रधानमंत्री जी की बातें पढ़ रही थी, उन्होंने कहा - We are committed to ensuring that all children, irrespective of gender and social category, have access to education. यहां तक बात ठीक है कि उन्होंने राइट टू एजुकेशन की बात कही है। इसके आगे वे कहते हैं - An education that enables them to acquire the skills, knowledge, values and attitudes necessary to become responsible and active citizens of India. मैं वही बात कह रही थी कि शिक्षा के मूल उद्देश्य को ध्यान में रखना होगा और उस दृष्टि से कुछ बातें तय करनी होंगी, पालिसी बनानी होगी जिसमें यूनिफार्मिटी हो। शिक्षा कैसी होनी चाहिए? मैं इस बात से बिल्कुल सहमत हूं जब हम एलीमेंटरी एजुकेशन की बात कहते हैं, एक तरफ कहा जाता है कि पांच-छः साल तक बच्चे को कुछ नहीं सिखाना चाहिए, उसके हाथ में किताब देने की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि वह वैसे ही दादी मां की कहानी या मां की लोरी सुनते-सुनते समझदार हो जाता है। लेकिन हम आज दो या ढाई साल के बच्चे को जबरदस्ती पालनाघर में भेज देते हैं और फिर पूछना शुरु कर देते हैं कि एक-डेढ़ साल हो गया है लेकिन बच्चा कुछ लिखना नहीं सीख पाया है। यह एक अलग बात है।

          महोदय, पहली बात यह है, जो वास्तविकता है कि बच्चा जो सीखेगा, अपनी मातृभाषा में बहुत जल्दी सीखेगा, ग्रहण करेगा। मैं भी प्राथमिक शिक्षा की पुरस्कर्ता हूं, मेरा मानना है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए। हमारा यह प्रयास होना चाहिए कि एलीमेंटरी एजुकेशन मातृभाषा में हो ताकि बच्चा अपने घर के संस्कारों को ग्रहण कर सके। एक और बात है जो कॉमन है कि हम एक व्यक्तित्व का निर्माण शिक्षा से करते हैं। इसलिए नैतिक शिक्षा जिसे वैल्यू कहा जाता है, जिससे एटीटियूड बनता है, नैतिक शिक्षा स्कूलों में होना अत्यंत आवश्यक है। जब हमने इस तरह की बातें कही तो कुछ लोगों ने इसे भगवाकरण कहा। मेरा कहना है कि भगवाकरण कुछ नहीं होता है। हर कोई चाहता है कि उसका बच्चा अच्छा बने। जब हम राम को आदर्श मानते हैं तो मेरे ख्याल से भगवाकरण करने की धार्मिक बात नहीं होती है कौन सी मां नहीं चाहेगी कि उसे राम जैसा पुत्र हो, कौन पत्नी नहीं चाहेगी कि उसे राम जैसा पति मिले। हम उसे क्वालिटीवाइज लेते हैं। इसलिए नैतिक शिक्षा बहुत आवश्यक है। मैं आपको एक उदाहरण देती हूं जो मेरी उम्र के होंगे, उन्होंने इस प्रकार की कुछ कहानियां पढ़ी होंगी। आज भी मुझे बाबा भारती का घोड़ा कहानी याद है, यह कहानी आपने भी पढ़ी होगी और बाबा भारती का घोड़ा हमारे लिए केवल कहानी नहीं थी। उसमें आखिर में वह एक बात कहता है कि किसी को मत बताना कि तुमने मुझे इस प्रकार से डिच किया है और मेरा घोड़ा चुरा लिया है। मैं कमजोर हूं, यह भले ही बता देना, भले ही यह बात लोगों को मालूम हो जाए। लेकिन अगर यह मालूम हो जाएगा कि जिस भेष में तुमने मेरा घोड़ा चुराया है, अपंग, अपाहिज बनकर और गरीब से गरीब व्यक्ति बनते हुए तुमने ऐसा काम किया है। मैं तुम्हारी मदद करने के लिए गया और तब तुमने घोड़ा चुरा लिया, यह इसलिए मत बताना कि आगे जाकर कोई किसी भी गरीब व्यक्ति पर विश्वास नहीं रखेगा। कोई भी किसी अपाहिज पर विश्वास नहीं रखेगा, यह इस कहानी की मूल बात है। यह नैतिक शिक्षा की मूल बात है। इसके अलावा अबू खां की बकरी और अन्य बहुत सी ऐसी कहानियां थीं। मेरा कहना यह है नैतिक शिक्षा हमारे लिए कहीं न कहीं जरूरी है। हमारे सामने अनेक समस्याएं खड़ी हो जाती है। मगर नैतिक शिक्षा बहुत आवश्यक है।

          इसके अलावा मैं कहना चाहती हूं कि लोगों को इतिहास का सही ज्ञान होना आवश्यक है। अभी आपने ठीक कहा, वह उदाहरण दे रहे थे कि सिकंदर ने पौरस से की थी लड़ाई तो मैं क्या करूं, ऐसी बातें आपने कही। लेकिन इतिहास का सही ज्ञान और वह भी अखिल भारतीय स्तर के इतिहास का ज्ञान होना बहुत जरूरी है। हमारे यहां कई ऐसी विभूतियां हैं, जैसे साउथ की चेन्नम्मा है, ओबऊआ है, हम कहते हैं कि अगर शिवा न होते तो सबकी सुन्नत होती। शिवाजी महाराज की कहानी हम कहते हैं। अगर उत्तर भारत में मालूम ही नहीं हैं कि ये हमारे आदर्श हैं या हमारे यहां जो रानी गेदिनल्यू हुई हैं, ये अगर दक्षिण में मालूम नहीं है या हमारे स्वतंत्रता संग्राम का जो सही इतिहास है कि जिसमें हम देखते हैं कि किस तरीके से अनेकों प्रकार से संग्राम हुए, जिनमें क्रंतिकारी भी थे, उनमें महात्मा गांधी जी भी थे। माफ करना, मैं कोई उनकी विरोधी नहीं हूं। वह भी उसमें थे, मगर भगत सिंह भी था, लोकमान्य तिलक भी थे। आज ही आपने पेपर में पढ़ा होगा कि जम्मू-कश्मीर में जिस तरीके से आयोग में प्रश्न रखा गया, उसमें पूछा गया था कि इन चार में से कौन आतंकवादी नहीं था। प्रश्न भी देखिये किस तरह से निगेटिव है, यह भी एक सोचने लायक बात है, जब हम परीक्षा प्रणाली की बात करते हैं। इनमें से कौन आतंकवादी नहीं है। इसका मतलब यह है कि बाकी तीन आतंकवादी हैं और उनमें एक नाम लोकमान्य तिलक जी का है। क्या जम्मू-कश्मीर के लोगों को लोकमान्य तिलक के बारे मे मालूम नहीं है। हालांकि ऐसा भी नहीं हो सकता कि जो प्रश्नकर्ता थे, वह कम से कम विद्वान तो होंगे या उन्हें लोकमान्य तिलक के बारे में मालूम नहीं था, यह जानबूझकर की गई बात है। इस पर धिक्कार होना चाहिए, इस पर तुंत एक्शन होना चाहिए। मगर मैं जो बोल रहीं हूं कि इतिहास का सही ज्ञान शिक्षा से मिले, शिक्षा प्रणाली में यह सुधार होना चाहिए, यह यूनिफार्म होना चाहिए। चाहे अश्फाकुल्ला खां हो, गुरु गोविंद सिंह जी हैं, जिन्होंने अपने चार-चार बेटे न्यौछावर कर दिये, अपनी अस्मिता, अपने देश की अस्मिता, अपने धर्म को कायम रखने के लिए उन्होंने ऐसा किया, यह साउथ के लोगों को भी मालूम होना चाहिए, आसाम के लोगों को भी मालूम होना चाहिए, सबको मालूम होना चाहिए। इसलिए कहीं न कहीं इतिहास का सही ज्ञान शिक्षा में होना आवश्यक है, जिससे बच्चों का चरित्र निर्माण होता है। बच्चा कुछ ग्रहण करता है तो फिर ये प्रश्न नहीं आते हैं, क्योंकि ज्ञान देने में कहीं न कहीं हम नीरसता पैदा करते हैं। इसलिए इतिहास का सही ज्ञान बच्चों को देना आवश्यक है। आज मुझे कई बार यह अनुभव होता है, आप इसे भगवाकरण कहोगे, लेकिन वास्तव में मेरे अपने बच्चों ने मुझसे एक बार प्रश्न किया था कि उन्हें अगर पाठय़क्रम में पढ़ाया गया कि अकबर महान था, यह मैं आपको एकदम सही बात बता रही हूं। यह घटना मेरे घर में घटी थी और मेरे बच्चे ने मुझसे पूछा कि तुम तो मुझे महाराणा राणा प्रताप की कहानी बताती हाव माँ मुझे बताओ कि अगर अकबर महान था तो महाराणा राणा प्रताप क्या था? इन प्रश्नों का उत्तर कभी न कभी हमें हमारे बच्चों को देते रहना चाहिए। इसलिए मैंने कहा कि हमारे हिंदुस्तान का सही-सही इतिहास, यहां से वह यूनिफॉर्म पालिसी बन सकती है। आपने शिक्षा प्रणाली की भी बात की है। उसके लिए कुछ यूनिफॉर्म पॉलिसी यहां से बन कर जा सकती है। मगर इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्यों की अपनी स्वतंत्रता नहीं है, वह कायम रहनी ही चाहिए।

          आज हमने क्या किया है? मैं थोड़ा सा शिक्षा के अधिकार की तरफ आउंगी। हमने यहां से एक्ट बना दिया तो हमें लगा कि हमने कितना बड़ काम कर दिया है। उसके पहले मैं एक और बात बताना चाहूंगी कि जब हम यूनिफॉर्म शिक्षा प्रणाली की बात सोचेंगे, तब यह भी सोचना पड़ेगा कि हमारी संसद ने या हमारे संविधान त्रिभाषा शिक्षा फार्मूला एक्सेप्ट किया हुआ है। उसमें संस्कृत एक महत्वपूर्ण भाषा है। आज हम संस्कृत को भूलते जा रहे हैं। आगे जा कर अगर हमारे देश का इतिहास, अगर हमारे देश का पूर्व ज्ञान, पूरा का पूरा हमारे बच्चों को दें, ऐसा हमें लगता है, तो यह संस्कृत का ज्ञान बहुत-बहुत आवश्यक है। नहीं तो आज हमारे समाज की जो स्थिति हो रही है, उसे देख कर मुझे वास्तव में बहुत दुख होता है।

          हमने बड़े लोगों को, देवी-देवताओं को, गुरूओं को भी जाति में बांट लिया है। वाल्मिकी जयंती कौन मनाएगा तो बोले वाल्मिकी समाज मनाएगा। मैंने पूछा कि क्यों? क्या वाल्मिकी मेरे बच्चों के लिए आदर्श नहीं हैं? क्या यह बात मेरे बच्चों के लिए आदर्श नहीं हैं कि वे किस तरीके से वाल्मिकी ऋषि बन गए थे। यहां तक तो हमारी सोच हो गई है। मुझे मालूम नहीं कि उत्तर प्रदेश की स्थिति क्या है? वहां तो हम सबसे ज्यादा बांटते हैं? लेकिन मेरे यहां मैंने देखा कि जब भगवान श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी आयी  तो यादव समाज के नेताओं ने बड़े-बड़े पोस्टर लगा दिए। मैंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण यादव समाज को किसने दिए? क्या वे बाकी सभी के नहीं हैं? इसका कारण यही है। हमारी संस्कृति का ज्ञान है। कहीं न कहीं हम संस्कृत को दूर कर रहे हैं। यह मैं नहीं कह रही हूँ। यह हमारे न्यायाधीश कहते हैं। संस्कृत भाषा पर जो प्रहार शुरू हो गया, उस समय सन् 1994 में सर्वोच्च न्यायालय ने स्कूल पाठय़क्रम में संस्कृत भाषा सिखाने का महत्व समझाया था और उस समय यह कहा था कि किसी देश की सीमा के साथ उसकी संस्कृति की रक्षा भी मुख्य राष्ट्रीय दायित्व होता है। केवल देश की सीमाओं की रक्षा करना ही काफी नहीं है। मगर उसमें भी कई बार यह होता है कि ठीक तरीके से ध्यान नहीं हो, हिंदुस्तान का ध्यान नहीं हो या मैं कहूँ कि थोड़ी सी भी लापरवाही मन में हो। आपको याद होगा कि एक समय ऐसा भी था कि इसी संसद में चर्चा हो रही थी और यह कहा गया कि तिब्बत का कुछ हिस्सा चला गया है। तब यह कहा गया कि वहां घास का एक तिनका भी नहीं उगता है। उस समय हमारे लोहिया जी ने ही उत्तर दिया था। हालांकि मैं उसका कुछ उल्लेख नहीं करना चाहूंगी। लेकिन उन्होंने कहा कि देश की सीमा ही नहीं देश की सीमा के साथ-साथ संस्कृति की भी रक्षा मुख्य राष्ट्रीय दायित्व होता है। हम भारत वासियों के लिए संस्कृत का अध्ययन देश की सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा के लिए किया जाता है। अगर संस्कृत हतोत्साहित होती है तो हमारी संस्कृति की धारा सूख जाएगी। यह दो न्यायमूर्तियों ने उस समय कहा था। हमें इन बातों का भी कहीं न कहीं ध्यान रखना चाहिए।

          हमने राइट टू एजुकेशन तो पास कर दिया है। बड़े जोर शोर से हमने कह दिया लेकिन आगे का क्या? हमने उसमें कामकाजी बच्चों की शिक्षा की कोई बात की है। हर बच्चे को स्कूल जाना चाहिए। बिल्कुल जाना चाहिए। मैं भी उस मत की हूँ। मगर उसकी व्यवस्था के लिए क्या है? उसके बजट के लिए क्या है? मैं बहुत डिटेल में नहीं कहती हूँ। मध्य प्रदेश का ही उदाहरण मेरे सामने है। कई बार मांग की गई है। जो आवश्यक हैं, उतने स्कूलों की बिल्डिंग के लिए भी पैसा नहीं जाता है।

17.00 hrs. जो पैसा जाता है, वह भी इस तरीके से जाता है, मैंने कहा कि थोड़ा अधिकार स्टेट को मिलना चाहिए। मंत्री जी, यह एक वास्तविक बात है कि सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत एक कमरे के लिए यहां से पैसे जाते हैं। अब होता क्या है, मैं कई बार गांव में जाती हूं, पहले तो गांव की स्थिति ऐसी है कि लोग शिक्षा को सबसे आखिरी में महत्व देते हैं। वे पहले बोलते हैं कि पहले हमारी खेती की बात करो, उनका ऐसा कहना नैचुरल है, हमारे यहां के बाकी सुधारों की बात करो। मैं यह बता रही हूं कि सर्व शिक्षा अभियान में एक-एक कमरा दिया जाता है और मुझे मालूम नहीं कि यहां से क्या नियम बताये जाते हैं, मैं गांव में जाती हूं, आप लोगों ने भी अनुभव किया होगा, हमारी कल्पना के अनुसार स्कूल बिल्डिंग एकसाथ होनी चाहिए। मगर कहीं न कहीं कोने में या बीच में एक छोटा सा कमरा बना हुआ दिखता है। मैं पूछती हूं कि यह क्या है तो वे बताते हैं कि यह सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत बना हुआ कमरा है। मैंने कहा कि ऐसा क्यों बनाया, क्या पूरी बिल्डिंग के साथ नहीं बन सकता तो वे बोले कि नहीं, नहीं, उसे ऐसा ही बनाना है क्योंकि उसे दिखाना होता है। बाकी स्कूल की बिल्डिंग अच्छी है, प्रदेश सरकार ने उसके लिए पैसे दिये हैं और इस कमरे के लिए तो तीन लाख रूपये ही दिये हैं तो तीन लाख रूपये में तो ऐसा ही बनेगा तो उतना एक अलग से बनाकर रख दिया है। यह कौन सी पद्धति है? मैं पूछती हूं कि जितना बजट चाहिए, पूरा बजट क्यों नहीं है? राइट टू एजुकेशन में जो-जो बातें आपने कहीं, पूरा बजट नहीं मिल रहा है और आप कहते हो कि चार साल में, पांच साल में ये सब चीजें होनी चाहिए। आप कहते हो कि हर बच्चा स्कूल जाये, हम भी चाहते हैं कि ऐसा हो, लेकिन वास्तव में मैं कहती हूं कि कामकाजी बच्चों की शिक्षा की कोई सुध हमने नहीं ली है। अभी यहां पर चर्चा हो रही थी कि शिक्षक का बेटा शिक्षक, ऐसा तो होता नहीं है, लेकिन डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, पॉलिटीशियन का बेटा पॉलिटीशियन आदि-आदि, लेकिन वास्तव में हमारे यहां आज भी पद्धति है कि कोई शिल्पी है, कोई कुम्हार है तो कुम्हार का बेटा अपने पिता को बचपन से ही मदद करता है। अगर हम उसकी प्रगति उसी में करने की सोचेंगे या वह वही काम करते हुए जिस काम को वह कर रहा है, पिता की मदद कर रहा है, वह मदद करते हुए वह शिक्षा करे, वह स्कूल जाये और पढ़े, क्या उसके लिए हमने कुछ सोचा है या व्यावसायिक शिक्षा की बात हमने की है। मैं जो सुधार की बात कर रही थी तो यह होना चाहिए, केवल राइट टू एजुकेशन कानून देकर, हर बच्चे की अंगुली पकड़कर एक अभियान चलाओ, चलाना चाहिए, मगर हर बच्चे की अंगुली पकड़कर स्कूल में ले जाओ। हमारे भूरिया जी, आदिवासी क्षेत्र से चुनकर आते हैं। वे दूर-दराज के क्षेत्रों में अलग-अलग रहते हैं। गांवों में लड़कियों की बात जब करते हैं, मीनाक्षी जी आपने भी अनुभव किया होगा, मैं जो बोल रही हूं कि हर बच्चे की अंगुली पकड़कर स्कूल में मत ले जाओ, हमने सुविधायें क्या दी हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए हमने क्या सोचा है। गांव में जब हम जाते हैं तो महिलाएं हमसे बात करती हैं तो हम उनसे बोलते हैं कि आपकी लड़की स्कूल क्यों नहीं जा रही है तो वे कहती हैं कि अब हमारी लड़की बड़ी हो गयी है, अब वह स्कूल नहीं जा सकती है। लड़की तो पांचवीं, छठी कक्षा में आते-आते ही बड़ी हो जाती है। क्योंकि स्कूल में सुविधा नहीं है, स्कूल में बाथरूम नहीं है, बाथरूम है तो वहां पानी नहीं है, या फिर बाथरूम ठीक तरीके से नहीं बना है, कई सारी समस्यायें हैं, स्कूल दूर है, अब लड़की बड़ी हो गयी है, उसे हम थोड़ी दूर भी, दो किलोमीटर तक भी नहीं भेज सकते हैं। इसलिए मैं कहती हूं कि केवल राइट टू एजुकेशन बोलकर कुछ नहीं होगा। हमें यह भी सोचना पड़ेगा कि उसकी ऐक्सेसबिलिटी क्या है? केवल हमने प्रदेशों को दे दिया कि यह करो, यह केवल कहने से नहीं होता है। मैं केवल एक बात और कहूंगी कि जो आवश्यक बजट है, क्या बजट में बढ़ा हुआ कभी हुआ है, शिक्षा का बजट क्या है, मुझे नहीं लगता कि दो परसेंट-तीन परसेंट से ज्यादा कभी जाता हो, आज भी वही स्थिति है। जो बजट आवश्यक है, आपके कानून के मुताबिक जो बजट आवश्यक है, 40 हजार करोड़ रूपये सालाना आपको अतिरिक्त आवश्यक है। क्या इतना मिल रहा है, क्या आप प्रदेशों को दे रहे हैं? आप ट्रेनिंग की बात कर रहे हो। खेलों को पाठय़क्रम का अंग बनाना, जो रिफॉर्म की बात मैं कर रही हूं, वह बहुत आवश्यक है। स्कूल में खेल के टीचर नहीं हैं, पढ़ाने वाले टीचरों की ही कमी है, खेल के टीचर नहीं है और स्कूलों में खेल के मैदानों को सुरक्षित रखने की भी बात हमने कभी नहीं की है। वह तो प्रदेशों का विषय है कि एक एक कमरे में स्कूल चलते हैं। वह बिल्कुल बंद होना चाहिए और इसका सख्ती से पालन होना चाहिए। ...( व्यवधान) लेकिन मेरा यह कहना है कि खेलों को शिक्षा का एक महत्वपूर्ण अंग बनाना चाहिए।

सभापति महोदय :  योग की शिक्षा भी अनिवार्य होनी चाहिए।

श्रीमती सुमित्रा महाजन: बिल्कुल सही बात है। मैंने कहा कि जिससे बच्चे का व्यक्तित्व बने, वैसी शिक्षा होनी चाहिए। उसमें केवल अक्षरज्ञान नहीं हो और अक्षरज्ञान में भी आप भगवाकरण की बात करते हैं, कहते कहते हम इतना नीचे गिर गए हैं कि हम ‘ग’ से गणेश बोलते हुए बड़े हो गए, आप भी ‘ग’ से गणेश बोलते हुए बड़े हो गए लेकिन अब हम कहेंगे कि नहीं नहीं, यह तो भगवाकरण हो गया, ‘ग’ से गधा लिखो, तो बच्चा तो हमारा गधा ही बनेगा ना, माफ कीजिए। ...( व्यवधान)  चाहे हम इस दृष्टि से नहीं सोचें लेकिन अक्षर से भी संस्कार होता है। वह अ क्षर है,  वह क्षरण होने वाली चीज नहीं है, इसलिए वह भी एक संस्कार लेकर बच्चों के मन में जाकर बैठती है।  खेल को पाठय़क्रम का अंग बनाने की बात मैं इसलिए करती हूँ कि जैसा आपने कहा, उसमें योग की शिक्षा है। योग कोई धर्म की बात नहीं सिखाता है। मानसिक रूप से भी कहीं न कहीं वह बच्चों को ताकतवर बनाता है। इसलिए खेल को शिक्षा का प्रमुख अंग बनाने की बात मैं कर रही हूँ यदि हम रिफॉर्म की दृष्टि से देखें।

          एक और बात है कि जब हम शिक्षा की बात करते हैं तो पाँच-छः चीज़ें प्रमुखता से होनी ही चाहिए - शिक्षकों की पर्याप्त संख्या, पीने का पानी, शौचालय, पुस्तकालय, ये चीज़ें ही गायब होती जा रही हैं। आज कहा जाता है कि बच्चे शिक्षा की पाठय़पुस्तक के अलावा पुस्तकें पढ़ें। मैं यूँ ही नहीं बोल रही हूँ। हम लोग आज यहाँ बैठे हुए हैं, सभी जानते हैं कि कहीं न कहीं पाठय़पुस्तक के अलावा पुस्तकें पढ़ने की बात आती है। मैं एक बात और आपको कहना चाहती हूँ कि एक नयी बात और शुरू हो गई है और प्राइवेट स्कूलों में यह सबसे ज्यादा हो रही है। एक रैफरैन्स बुक करके देते हैं यानी साइंस की एक किताब, साइंस का एक सिलेबस, और मीनाक्षी जी से भी मैं कहूँगी कि वे भी इस बात को देखें, मध्य प्रदेश में भी यह हो रहा है। दो-तीन रैफरैन्स बुक दे देते हैं। ठीक है कि रैफरैन्स बुक होना चाहिए, मगर 10वीं के बच्चों को काहे की रैफरैन्स बुक? अभी तो इतना कमाल हो गया कि मेरे ही घर में मेरा पोता दसवीं कक्षा में है तो मालूम पड़ा। वह बोला कि आज मैं कुछ भी लिखकर  नहीं आया। मैंने पूछा कि क्यों नहीं आया तो उसने कहा कि - दादी, वह जो प्रश्न आए, सब रैफरैन्स बुक से प्रश्न आए। रैफरैन्स बुक में से प्रश्न क्यों आएँ? यह भी कहीं न कहीं साँठ-गाँठ है। रैफरैन्स बुक का महत्व बढ़ाने की बात है। इस पर भी ध्यान देना आवश्यक है। मैं पुस्तकालय की बात कर रही थी जिसमें अलग अलग प्रकार की पुस्तकें पढ़कर बच्चों में सामान्य ज्ञान बढ़ता है, रुचि बढ़ती है, जिससे बच्चों का चरित्र बनता है। इसके अलावा स्कूलों में प्रयोगशाला तो होनी ही चाहिए।

          मैं एक बात और कहकर अपनी बात समाप्त करूँगी। आपने राइट टु एजुकेशन में अनिवार्य कक्षोन्नति रखा है। इस पर सोचना बहुत आवश्यक है। वह भी 10वीं कक्षा तक आपको जाना है। इस पर इसलिए भी सोचना चाहिए कि वास्तव में अनिवार्य कक्षोन्नति की जो कल्पना है, वह यह है कि कमज़ोर बच्चों को विशेष प्रयास से सामान्य स्तर पर पहुँचाया जाए। आपने कुछ कंटीन्युअस कंप्रिहैन्सिव इवैल्युएशन की बात की। यह कंटीन्युअस कंप्रिहैन्सिव इवैल्युएशन समझने में मुझे ही तकलीफ है कि कैसे करूँ तो जो शिक्षक बेचारा और दस डय़ूटी करता है, चुनाव आएँगे तो चुनाव की डय़ूटी करेगा, फिर जनगणना में डय़ूटी करेगा। वह बंद होना चाहिए ऐसी हम डिमांड कर रहे हैं। यह कैसे संभव है इस पर हमें फिर से सोचना पड़ेगा कि यह जो अनिवार्य कक्षोन्नति की बात है और वह मैं इसलिए बोल रही हूँ कि अभी तो बात हो रही थी महाविद्यालयीन शिक्षा की, वहाँ के स्तर की। अमेरिका का राष्ट्रपति कहता है कि हमारे यहाँ की जो शिक्षा प्रणाली है, वह कहीं न कहीं हमारे बच्चों को कमजोर बना रही है और इसलिए हिन्दुस्तान के बच्चे मेरे यहाँ आकर अच्छी जॉब्स पा रहे हैं क्या यह ला कर हम बराक ओबामा की सहायता करना चाहते हैं कि नहीं-नहीं हम अपने बच्चों को भी कमजोर रखेंगे, चिंता मत करो। इससे भी ज्यादा हमारे दूसरे मंत्री बैठे हैं, शशि थरूर जी। होगा क्या आगे जाकर के? उन्होंने तो अपने एक भाषण में कहा, जिसे मैं पढ़ रही थी, उसमें उन्होंने कहा, मेरे पास आपका पूरा भाषण तो नहीं है, लेकिन आप बात उच्च शिक्षा की कर रहे थे। लेकिन उच्च शिक्षा का पाया तो यही है, मूल बात तो यही है। यहीं से शुरूआत होगी। यहां हम दसवीं तक बढ़ाते जाएंगे। मालूम नहीं उसको कुछ आया भी है या नहीं। ग-म-भ-ण भी आया या नहीं, लेकिन बढ़ाते गए। आपने अपने भाषण के शुरू में कहा था जो बात बिलकुल ठीक थी, लेकिन शुरूआत कहां से करोगे? आपने कहा था कि बड़ी कम्पनियां जो ग्रेजुएट्स लेती हैं, आज की तारीख में आपने हिन्दुस्तानी कम्पनियों के बारे में उल्लेख किया था, आप फिक्की के कार्यक्रम में गए थे, वह आवश्यतानुसार नहीं रहते हैं इसलिए उनको फिर से छः महीने की ट्रैनिंग कम्पनियों को देनी पड़ती है, इस प्रकार से आपने कहा था। आपने कहा था- Our university system simply is not producing enough well educated graduates to meet the need of Indian companies today. यह आपका ही वाक्य है। यह उच्च शिक्षा के लिए आपने कहा था। आप अपने मंत्रालय में इन बातों की चर्चा करो कि मूल शुरूआत ही अगर हम ऐसी करेंगे तो कैसे होगा। इसलिए मेरा इतना ही कहना है कि आप स्ट्रक्चर की बात कर रहे हैं, फिज़ीकल स्ट्रक्चर की बात कर रहे हैं, इनफ्रास्ट्रक्चर की बात कर रहे हैं, उसको हम प्रदेशों पर छोड़ें, उनको फैसलीटेट करें, आप उनको मदद दें, आप उनको बजट दे दें। लेकिन मूल बात जो शिक्षा के लिए सोचने की है, वह यह है, जो कि हमने नहीं की है, पूरी आरटीई में मैंने देखा कि Norms to minimum quality of education क्या होना चाहिए? क्वान्टिटी की तरफ ध्यान देंगे कि हर बच्चा आना चाहिए। मगर जब तक क्वालिटी की तरफ ध्यान नहीं देंगे, उस तरीके से शिक्षा प्रणाली को हम नहीं बनाएंगे, तब तक बच्चा कितना भी और कुछ भी पढ़े, जो हमारी कल्पना है देश को गढ़ने के लिए, राष्ट्र निर्माण के लिए आने वाले नागरिक बनाने की जो बात हम करते हैं वह बात कभी सार्थक नहीं हो सकती, यह हम थोड़ा ध्यान में रखें।

 

श्री गोरखनाथ पाण्डेय (भदोही):महोदय, आपने मुझे शैलेन्द्र कुमार जी द्वारा देश में एक समान शिक्षा के संबंध में उठायी गयी चर्चा पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।

          महोदय, मैं अभी बहुत ध्यान से भाई शैलेन्द्र कुमार जी का, सुमित्रा महाजन जी और बहन नटराजन जी की बात को सुन रहा था।

          महोदय, किसी भी देश और समाज के लिए शिक्षा विकास की प्रथम धुरी और प्रथम सौपान होता है। हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है कि “विद्या विहिनः पशु” जो विद्या से विहिन है, शिक्षा से वंचित है, उसका जीवन पशुवत है, पशु के समान है। आज माननीय मंत्री जी उपस्थित हैं और शिक्षा के संबंध में देश में बहुत सारी योजनाएं और व्यवस्थाएं चलायी जा रही हैं। मंत्री जी उस बारे में काफी कुछ करने की सोच रहे हैं। देश को एक नयी दिशा देने का प्रयास कर रहे हैं, हम सब उनके प्रयासों के साथ हैं। लेकिन यह देश दो भागों में बंटा है, एक श्रेणी अमीरों की है और दूसरी श्रेणी गरीबों की है। शिक्षा प्रणाली भी दो धुरी में बंटी है। एक है हिन्दी माध्यम से शिक्षा और दूसरी है अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा। गांव में गरीब परिवार रहते हैं, सामान्य परिवार रहते हैं और उच्च स्तर के भी परिवार रहते हैं। परिवार की व्यवस्था तीन श्रेणियों में बंटी है। एक उच्च परिवार के लोग हैं, जिनके बच्चे मॉडल स्कूल में, इंग्लिश मीडियम स्कूल में, अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं। मध्यम स्तर के जो परिवार हैं, उनके बच्चे सामान्य ढंग से अपनी पढ़ाई करते हैं। तीसरे तबके के लोग, जिनकी संख्या इस देश में बहुत ज्यादा है, वे गरीब हैं, किसान हैं, मजदूर हैं, और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग हैं। उनके परिवार के बच्चे किसी तरह से अपनी शिक्षा प्राप्त करते हैं।

          महोदय, शिक्षा की भी दो विधाएं हैं। एक को हम कहते हैं साक्षर होना और दूसरा है शिक्षित होना। साक्षर होने के लिए तो आज गांव में "स्कूल चलो " अभियान है। रैलियां निकाली जा रही हैं। बच्चे स्कूल जाते हैं और उन्हें अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था दी जा रही है। लेकिन, दुर्भाग्य के साथ कहना पड़ रहा है कि उन गांवों में शिक्षा की व्यवस्था दयनीय है। संयोग से, मैं गांव से आता हूं और पेशे से अध्यापक भी रहा हूं। महोदय, मुझे शिक्षा के बारे में पूरी-पूरी जानकारी है। आज हम जहां हैं, जिस देश में हैं, हमारी मातृभाषा हिन्दी है। लेकिन गांव का वह गरीब व्यक्ति जिसके पास दो वक्त का भोजन, दो जून की रोटी का जुगाड़ नहीं है, वह भी चाहता है कि हम अपने बच्चे को इंग्लिश मीडियम की शिक्षा प्राप्त कराएं। उसको स्कूल में भेजने के लिए वह कर्ज़ लेता है, अनेक तरह की व्यवस्थाएं करता है ताकि उसके बच्चे शिक्षित हों और अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकें। लेकिन, दुर्भाग्य के साथ कहना पड़ रहा है कि उन व्यवस्थाओं में उसका सपना दिवास्वप्न के रूप में रह जाता है, उसके सपने धरे के धरे रह जाते हैं। वह उन्हें शिक्षा नहीं दिला पाता।

          महोदय, बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। उन्हें जिस तरह के पाठय़क्रम दिए जाते हैं, उससे वह उन किताबों के बोझ से दबे रहते हैं। पाठय़क्रमों के बारे में सारी चर्चाएं हुई। सुमित्रा महाजन जी ने बहुत विस्तार से बातें बतायीं। मैं उधर नहीं जाना चाहता। लेकिन, इस तरफ जरूर जाना चाहूंगा कि हमारी सोच कहां है? हमें किस तरह से देश को साक्षरता की तरफ ले जाना है। जब कोई बालक शिक्षित होता है तो हम एक व्यक्ति को शिक्षित करते हैं, लेकिन जब एक बालिका शिक्षित होती है तो हम दो परिवारों को शिक्षित करते हैं। गांवों में आज भी बालिकाओं की शिक्षा का प्रतिशत कम है। उनकी बच्चियां किन्हीं कारणों से स्कूल नहीं जा पातीं। एक तो शिक्षा की व्यवस्था में विभेदीकरण है - अच्छी शिक्षा, मध्यम स्तर की शिक्षा, और निम्न स्तर की शिक्षा। एक तरफ तो चमचमाती बिल्डिंगें हैं, सारी सुविधाएं हैं और मॉडल स्कूल हैं, वहां डोनेशन लिए जाते हैं। उन बच्चों से जितनी भी फी की जरूरत होती है, उनके अभिभावकों के पास उससे ज्यादा देने के लिए है। दूसरी तरफ, ऐसे परिवारों के लोग हैं जो चाहते हैं कि हमारे बच्चे शिक्षित हों, उन्हें अच्छी शिक्षा प्राप्त हो, मगर उसकी व्यवस्था नहीं है। गांवों में व्यवस्था तो है। वहां कहने के लिए स्कूल हैं, लेकिन वहां अध्यापक नहीं है। उनके पास पढ़ने के लिए इंस्ट्रूमेंट्स नहीं हैं। वहां शौचालय नहीं हैं, लाइब्रेरी नहीं है। वे सुविधाओं से वंचित हैं। हम कैसी शिक्षा देना चाहते हैं? हम कैसा समाज का निर्माण करना चाहते हैं, किस तरह से देश को उठाना चाहते हैं जब तक यह भेदभाव बना रहेगा? एक तरफ शिक्षा में सुधार हो ओर दूसरी तरफ इसमें एकरुपता हो। ये दोनों बातें जरूरी हैं। शिक्षा में सुधार की आवश्यकता है, परीक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है, और उनके क्रिया-कलापों में भी सुधार की आवश्यकता है। दूसरी तरफ, जब हम गांवों की तरफ जाते हैं तो हमें बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि ऐसे परिवार भी हैं जो अपनी महत्वाकांक्षा को, अपने बच्चों की इच्छा को पूरा करने के लिए बैंकों से ऋण लेना चाहते हैं। जब वे बैंक में शिक्षा ऋण लेने के लिए जाते हैं तो उन्हें अनेक तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और अंत तक उन्हें ऋण नहीं मिलता। उनके मेधावी बच्चे भी शिक्षा से वंचित रह जाते हैं।

          महोदय, आज इस देश में स्पर्द्धा का युग है। हम कम्प्यूटर की बात करते हैं। आज घर-घर में जो छोटे-छोटे बच्चे हैं, उन्हें भी कम्प्यूटर की जानकारी है और चाहते भी हैं। जहां उनके ज्ञान की बात है, हम लोग भी जब पढ़ाई करते थे तो जोड़-भाग, गुणा-भाग, दशमलव की पढ़ाई करते थे। आज सारी चीजें कम्प्यूटर में सिमट गई हैं। आज सारी चीजें उन व्यवस्थाओं से हट कर हो गई हैं, जो हमें कभी-कभी मौखिक परिक्षा, इंटरव्यू, कभी प्रतियोगिता के माध्यम से  ...( व्यवधान)

सभापति महोदय :  आप संक्षिप्त करें।

श्री गोरखनाथ पाण्डेय (भदोही):सभापति महोदय, मैं एक तरफ शिक्षा में सुधार की बात करता हूं और दूसरी तरफ उन बच्चों के उत्पीड़न की बात करता हूं, इस तरफ भी ध्यान जाना चाहिए। कभी टीवी पर सर्वशिक्षा अभियान के प्रचार में दिखाया जाता है कि कोई बच्चा प्लास्टिक की चीजें उठा रहा है। किसी स्कूल में टीचर्स नाम पुकार रहे हैं तो उसका ध्यान उधर जाता है। बच्चों में पढ़ने की इच्छा है, लेकिन उनकी मजबूरी है, वे स्कूल नहीं जा पाते। कहीं उनके शोषण की बात आती है, कभी पेपर में निकलता है कि किसी बच्ची के साथ दुर्व्यवहार हुआ और वह किसी छत से कूद पड़ी।

          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा कि हमारे देश की मातृभाषा हिन्दी है। लोगों में एक बड़ी ही हीन भावना आती है, हम लोग गांव में हिन्दी मीडियम से पढ़े हैं, हमें भी कभी-कभी एहसास होता है। जब हम साऊथ में जाते हैं, किसी ट्रेन में या फ्लाइट में कहीं यात्रा करते हैं, हिन्दी का न्यूज़ पेपर चाहते हैं तो वह हमें नहीं मिलता है, अंग्रेजी का ही मिलता है। जब हम लोग पढ़ा करते थे तो पीसीएस की परीक्षा अंग्रेजी में होती थीं। हम चाहते हुए भी वहां नहीं जा पाए। ये चीजें हैं, शिक्षा में सुधार के लिए हमारे प्रदेश में कभी बसपा गवर्नमेंट थी, उसने कई तरह की योजनाएं...( व्यवधान)

सभापति महोदय: अब आप समाप्त करें।

श्री गोरखनाथ पाण्डेय : ज्योतिबा फूले योजना, महामाया योजना और सारी योजनाओं के माध्यम से उन्हें व्यवस्था दी जाती थी। आज भी योजनाएं चल रही हैं। जहां हमारे शिक्षा में सुधार की बात है, अनिवार्य शिक्षा की बात है, वहां दो-तीन बिन्दुओं पर मैं जरूर आपका और मंत्री जी का ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा कि देश में एक तरह की शिक्षा प्रणाली हो। अंग्रेजी और हिन्दी की जो दूरियां हैं, जिन लोगों को अपने को उच्च और निम्न व्यवस्था की बात सोचने के लिए मजबूर होना पड़ता है, उसकी दूरी को कम करना चाहिए। अंग्रेजी की जो अनिवार्यता है, वे भी समाप्त होनी चाहिए। हमारी मातृभाषा हिन्दी है, ये प्रथम रूप से शिक्षा का माध्यम बने। यदि कोई चाहता है तो अन्य भाषाओं में भी शिक्षा प्राप्त करे।

          सभापति महोदय, मैं अंतिम बात कहना चाहूंगा कि जो नॉन एडेड स्कूल गांवों में चलते हैं, वहां पढ़ाई होती है। वहां बच्चों की उपस्थिति होती है, अनुशासन एवं व्यवस्था होती है, लेकिन वहां अध्यापकों को उचित वेतन नहीं मिल पाता, उन्हें भी उचित वेतन मिलना चाहिए। जैसा कि आपने कहा कि जहां नैतिक शिक्षा है, व्यायाम की शिक्षा दी जाती है, वहां हमें योग की शिक्षा भी दी जानी चाहिए।

सभापति महोदय: जगदीश शर्मा जी, आप सारगर्भित बोलिए।

श्री जगदीश शर्मा (जहानाबाद): सभापति महोदय, जब आप आसन पर विराजमान हैं तो जो कुछ नहीं रहेगा, वह भी आ जाएगा।

सभापति महोदय:जगदीश शर्मा जी, धन्यवाद।

श्री जगदीश शर्मा : आपकी साधना में यह गुण है।

          सभापति महोदय, आपने मुझे बोलने का समय दिया, उसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। यहां बहुत महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा हो रही है - समान शिक्षा। इस देश के महान नेता डॉ. राममनोहर लौहिया पैदा हुए। उन्होंने कहा, उनका नारा था कि - “राजा हो या भंगी की संतान, सब को शिक्षा एक समान।” आज ये नारा केवल नारा बन कर रह गया है। आज जिनकी जो हैसियत है, पढ़ाई उनकी हैसियत से हो रही है। दो तरह के स्कूल हैं - एक सरकारी स्कूल और दूसरे अंग्रेजी मीडियम के कंवेंट स्कूल। मैं गांव से आता हूं और मेरी शिक्षा भी गांव में हुई। मैं सात किलोमीटर पैदल चल कर हाई स्कूल में गया हूं। उस समय जो टीचर्स थे, बिहार में पटना विश्वविद्यालय है। वह अपने समय का नामी विश्वविद्यालय था और मैं वहां के साइंस कालेज का विद्यार्थी रहा हूं, वहां गांव से पढ़ा हुआ लड़का सात किलोमीटर पैदल चलकर कालेज जाता है। मैं बिहार से आता हूं और आज भी पूरे देश में आई.ए.एस. और आई.पी.एस. काफी संख्या में बिहारी लोग हैं और इसमें योगदान सरकारी स्कूलों का रहा है। डॉ. श्रीकृष्ण बिहार के पहले मुख्यमंत्री हुए। उन्होंने नेतरहाट विद्यालय खोला, उस नेतरहाट का नाम आज भी पूरे देश और दुनिया में है। आज क्या हो गया, सरकारी स्कूल में लाचारी में लोग वहां पढ़ाई करवा रहे हैं, बिल्कुल लाचारी में, 30 वर्षों में ऐसी स्थिति क्यों आ गई है? आज लोग कहते हैं कि सबसे अच्छा बिजनेस कौन सा है तो अब लोग कहते हैं कि सबसे अच्छा बिजनेस प्राइवेट स्कूल खोल देना है। अब कहावत चल गई है कि बढ़िया शर्ट-पैंट पहना दो, 1500-2000 पर टीचर रख लो, पुटपुटिया अंग्रेजी बोल दो, बस में चढ़ा दो तो लोग समझते हैं कि बढ़िया स्कूल में हमारे बच्चे चले गये।  प्राइवेट स्कूल में शिक्षक आज वैसे ही हैं।  

          हम केन्द्र सरकार से कहना चाहते हैं कि शिक्षा देना आपकी प्राइम डय़ूटी है। आप जो बार-बार अपने सरकारी जवाब में कहते हैं कि शिक्षा राज्य का विषय है, राज्य का विषय है, इसे राज्य सरकार को करना है तो हमारे देश का संघीय ढांचा है और पूरे देश में दो तरह के राज्य बसते हैं। एक तरफ विकसित राज्य हैं, महाराष्ट्र है, गुजरात है, जो इस देश की आर्थिक राजधानी कहे जाते हैं और दूसरी ओर बिहार है, उड़ीसा है, राजस्थान है, उत्तराखण्ड है, झारखण्ड है, छत्तीसगढ़ है, मध्य प्रदेश है, ये गरीब राज्य हैं। इनके लिए आपने क्या फार्मूला बनाया है कि महाराष्ट्र को उतना ही देंगे, गुजरात को उतना ही देंगे और जो गरीब पिछड़े राज्य हैं, उनको भी उतना ही अनुदान हम देंगे तो कैसे राज्यों के भरोसे शिक्षा चलेगी?

          हम आपके माध्यम से केन्द्र सरकार से कहना चाहते हैं कि आप आम आदमी की बात करते हैं, चाहे बजट भाषण हो, उसमें भी सरकार का हाथ-आम आदमी के साथ कहते हैं, लेकिन आम आदमी कहां बसता है? आम आदमी, जो किसान है, मजदूर है, जिस वोट बैंक के लिए आप कहते हैं, वोट के लिए खाते में पैसा जायेगा, उसके लिए आपने अब तक क्या किया है? उसके लिए आपकी कोई योजना नहीं है। हम यह मांग करना चाहते हैं कि अगर आपमें ईमानदारी है और आम आदमी के हित की चिन्ता है, आप किसान की बात करना चाहते हैं, आप मजदूर के बच्चों की बात करना चाहते हैं तो विकास की कुंजी क्या है, विकास की कुंजी और माध्यम शिक्षा है तो जो गांव में स्कूल हैं, वहां केन्द्र सरकार से आप केवल सर्व शिक्षा अभियान चला रहे हैं। वहां आप पूरा पैसा टीचरों को तनख्वाह का दीजिए और निर्देश दीजिए, आप पैसा दीजिए और राज्य सरकारों को निर्देश दीजिए कि आप कम्पीटीशन करके टीचरों को बहाल कीजिए, अच्छी बहाली करिये और उनको गांवों में अच्छी तनख्वाह पर करिये।

          जो मध्यान्ह भोजन है, उसमें आजकल क्या हो रहा है। आपने टीचरों को मध्यान्ह भोजन में लगा दिया है। मैं इस बात को मानता हूं कि मध्यान्ह भोजन मिलना चाहिए, उनको पौष्टिक आहार मिलना चाहिए, लेकिन आज के टीचर बेचारे क्या कर रहे हैं। 10 बजते-बजते स्कूल में इन्तजाम हो रहा है, लकड़ी लाओ, गोड्डा लाओ, गैस तो आपने बन्द ही कर दी है। स्कूल की जो किचन थी, मोइली साहब बैठे हैं, सुन लें, पहले वहां गैस, आपकी एल.पी.जी. मिलती थी, लेकिन उसको आपने बन्द कर दिया। उनकी गैस आपने बन्द कर दी। अब सवेरे-सवेरे क्या हाल हो रहा है?  आजकल जाड़े के दिन हैं। लकड़ी गीली हो जाती है।  उसको गर्म करने में इंतजार करना पड़ता है, जब धूप आएगी, तब होगा, सब लड़के बेचारे इसी इंतजार में खड़े हैं। हम एक निवेदन करना चाहते हैं।

सभापति महोदय :  शिक्षा पर बोलिए।

श्री जगदीश शर्मा : आज स्कूलों में आप बढ़िया खाना देना चाहते हैं तो यहां के कल्चर के अनुसार पौष्टिक भोजन का मीनू बनाइए।  उसको आप अलग से टेंडर सिस्टम से करके सप्लाई करने वाले को दीजिए। मास्टर को उससे बिल्कुल अलग रखिए।  अगर आप बढ़ना चाहते हैं, ...( व्यवधान) एनजीओ को दें, जैसे भी करें।  हम गांव से आते हैं।

सभापति महोदय : आप समाप्त करें, काफी समय हो गया।

श्री जगदीश शर्मा: महोदय, आप हमारी बात सुनिए। हम आपका प्रवचन बचपन से सुन रहे हैं।  

सभापति महोदय : धन्यवाद। 

श्री जगदीश शर्मा : आपकी किताब भी मेरे पास है।  

          महोदय, हम आपसे इसके लिए निवेदन करना चाहते हैं। दूसरा, आप सर्व शिक्षा अभियान में बिल्डिंग का पैसा देते हैं। क्या आपने इसका एस्टीमेट देखा है? आपके राज में ईंट के दाम कितने बढ़ गए हैं, छड़ और सीमेंट के दाम कितने बढ़ गए हैं?  आपने एक मॉडल बना दिया है।  माननीय सुमित्रा महाजन ठीक कह रही थीं।  तीन लाख रूपए में एक बिल्डिंग किस एस्टीमेट से बनेगी?  राज्यों की अलग-अलग स्थिति है।  आप अगर बिल्डिंग बनाना चाहते हैं तो जिलों को एकमुश्त पैसा दीजिए और बिल्डिंग का जो काम है, उसका भी पैकेज बनाकर टेंडर सिस्टम से करिए। टीचर्स को उससे भी अलग करिए।  गांव में लड़ाई हो रही है।  

          जहां तक बालिका शिक्षा की बात है, केंद्र सरकार ने अच्छा काम किया है।  आपने जो अच्छा काम किया है, हम उसके बारे में भी कहते हैं। आप जवाहर नवोदय विद्यालय की संख्या हर ब्लॉक में कम से कम एक करिए।  आपका नवोदय विद्यालय का इंतजाम बढ़िया है।  इसे हर ब्लॉक में एक खोलिए।  महिलाओं की शिक्षा के लिए हर ब्लॉक में दो-तीन पंचायतों पर केवल बालिका हाई स्कूल हो, यह आपका क्रंतिकारी काम होगा।  आजकल पॉलिटेक्निक शिक्षा, टेक्निकल एजुकेशन और दूसरी शिक्षा भी दी जा रही है।  एक बात की तरफ हम आपका ध्यान ले जाना चाहेंगे। आप मिडिल स्कूल को हाई स्कूल में अपग्रेड करते हैं।  आपने दो एकड़ जमीन की सीमा रखी है।  आप उस सीमा को घटाइए।  जितने स्थान में स्कूल के लिए बिल्डिंग बन सकती है, उसमें बनाइए, चूंकि खेलने का मैदान करीब-करीब हर गांव में अलग से है।  आपने जो हाई स्कूल के लिए दो एकड़ का क्राइटेरिया रहता है, उसे शिथिल कीजिए। उसको आप दस कट्ठा या पन्द्रह कट्ठा करिए।  चूंकि आपने योग की बात कही, तो खेल और योग  का बहुत गहरा संबंध है।  

          आज सभी गांवों में खेल के मैदान हैं, लेकिन उसकी घेरेबंदी नहीं होने के कारण लगातार उसका अतिक्रमण हो रहा है।  राज्यों के पास उतने साधन नहीं हैं।  हम बिहार से आते हैं।  वह गरीब राज्य है।  बिहार सरकार अपने बूते बढ़िया-बढ़िया काम कर रही है, साईकिल योजना सहित दूसरी योजनाएं लायी है। खेल के मैदान की घेरेबंदी के लिए उसे पैसा दीजिए। आपने समय दिया, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।  

                                                                                                     

PROF. SAUGATA ROY (DUM DUM): Sir, I welcome this discussion on education and uniform pattern of education brought forward by Shri Shailendra Kumar and Shrimati Sumitra Mahajan.  I welcome the young team in the HRD Ministry led by Shri Pallam Raju who is an engineer and trained MBA from the U.S.  I would urge them firstly that let them give up the legalistic approach of his predecessor Shri Kapil Sibal.  Shri Kapil Sibal is a brilliant lawyer. He thought that he could change education by bringing in laws. Most of the laws which were brought by him in Parliament have not been passed in the last three and a half years. That is not the way to change education. Shri Kapil Sibal thought that education could be controlled from the Centre. As Shrimati Sumitra Mahajan has correctly pointed out that education has essentially to be administered by the State. The Centre can help in advising them. Shri Kapil Sibal said that they would abolish exams up to Class 10. Ultimately, they were able to abolish exams only for CBSE. The class 10 exams remained everywhere. I would request the new HRD Minister to adopt a policy of consensus with the States. He should, through the Central Advisory Board on Education, bring about a consensus and then bring about a change. He need not be in a hurry to suddenly change education in the country.

          Briefly, I would say that in the first three and a half decades of Independence, we followed a wrong policy on education. We built up an inverted pyramid. Pandit Jawaharlal Nehru was responsible for building the IITs, the national laboratories. But the primary education remained neglected in that period. It was Shri Rajiv Gandhi who for the first time thought anew about education and brought about a new National Education Policy, started the National Literacy Mission for removing illiteracy and also started the pace-setting Navodaya Vidyalayas in each district. I think, his initiative was a welcome. In the 90s, two important initiatives were taken to bring back dropouts into the primary school. One was by the Narasimha Rao’s Government in introducing Mid-Day Meal and the second was by the NDA Government in introducing Sarva Shiksha Abhiyan. There is no doubt that the money from Sarva Shiksha Abhiyan has at least contributed to building one class room and one toilet in all the primary schools of the country.

Now it is time to give the educational structure a pyramidal structure with a broad base. It must benefit every boy and girl of this country. We have given them the Right to Education. But it must taper also to an apex. Higher education is not for everyone. Higher education should be limited. I have taught education in an undergraduate college for 35 years. I was a teacher of science. At the end of it, I feel it was an exercise in futility. Whatever skill I could impart to my students, that could get jobs to them after passing out. Only a few students went into post-graduation and maybe into teaching. The others whom I thought are medical representatives, clerks in Government offices and so on. All their education was lost.

The education must keep in touch with job needs. We must make people fit for jobs or it must be related to their lives. I have seen that just for the sake of prestige, we have established colleges in remote villages. There are paddy fields all round and we are teaching them Shakespeare. It has no meaning to them. Maybe, you need an agricultural college there. But colleges are mushrooming. There are 33,000 colleges in the country. The education that we give does not make them fit for jobs. It is time to urgently look into total vocationalisation of education starting from Class 8. In no advanced country of the world, normal students go for studies after Class 10th. In our country, people go to colleges because there are no jobs. So, they spend their time in the colleges. If they have proper jobs, they would not go to colleges. This is not the way.

Lastly, I want to say that education is for knowledge and is for developing skills. Kumari Meenakshi Natrajan correctly said that English is a skill that we ought to acquire. We have talked much about teaching in mother-tongue. I do not object to it. I will be happy to learn. But having studied in an English medium school, I feel that I am at an unfair advantage vis-à-vis the others.  Why deprive the poor students of this advantage of learning and knowing English well? In Kolkata today, most of the sarkariprimary schools have no students because even a rikshawalah prefers to send his child to a school which teaches English. This is the demand of the market. So, how can you really dispense with English?

          We must free education from our old concepts. Dr. Lohia was very good in his time like Jawaharlal Nehru was. But in today’s time and age, in a globalised world where computers are ruling the roost, our children must be exposed to an international language.

          Minister Pallam Raju was saying the other day that none of our universities feature in the top 200 universities in the world. We have 611 universities and 18 IITs.  None of them is world class. The Prime Minister talked of creating world class universities. Indians have been proved to be the best teachers abroad. Why has the Prime Minister not been able to bring his friends Nobel Laureate Amartya Sen and Jagdish Bhagwati back to India?

I would like to remind the House of our pre-Independence days when Sir Ashutosh Mukherjee as Vice-Chancellor of Calcutta University brought to Calcutta University Sir C.V. Raman who became a Nobel Laureate, top scientists Dr. M.N. Saha, and Prof. S.N. Bose after whom Boson was named. Why are our universities not getting the best talent from all over the world? We must stop the inbreeding in education. Our universities must try and make themselves world class.

In higher education, nothing matters except excellence. All academic appointments must be made on merit only. There is no scope for politicisation in education. There is no scope for either saffronisation or redification of education. Education must be value neutral. But value education is important.

I think that a lot more discussion on education is necessary. As Brecht who said, “Hungry man, reach for the book, it is your weapon.”, and as Paulo Freire who taught the poor people in the jungles of Latin America, we must develop the pedagogy of the oppressed. We must give the oppressed people of this country a new weapon in the shape of education.

   

SK. SAIDUL HAQUE (BARDHMAN-DURGAPUR): Mr. Chairman, Sir, a uniform educational pattern does not mean centralization of education. India is a country with diverse cultures, diverse social backgrounds and diverse social structures. So, what we can do is make some common guidelines which can be equal to all, but not as strictures to all States. That is because education is a subject in the Concurrent List meant both for the State and the Centre.

          As regards a common uniform system of education, the first education policy of the country was framed in the year 1968 following the recommendation of Kothari Commission of 1964-1966. The Kothari Commission talked of a common school system and a neighbourhood school system.

In 1986, that is when the National Education Policy came, a uniform structure of school education and curriculum was thought of. As a result of that, we know that the 10+2 structure has been adopted by all the States. In the case of curriculum, the National Curriculum Framework of 1985 was framed and later on it was modified in 2005 which sought to identify certain essential levels of learning for all students, particularly basic knowledge of literature and science, and common social and human values. That does not mean that it is only a religious and spiritual learning but it is common human social values.

          As Swami Vivekananda said in his time, education is the manifestation of the perfection in the man. That should be common to every State. That perfection should be created.

          As regards the question of uniformity, it was stated in the 1986 policy that uniformity means universal access, universal enrolment, universal retention and universal achievement of quality education. So, DPEP programme came; SSA programme came; now, RMSA came. But the question is what should be the target. The target should be to achieve not only quality, but also quantity and equality. What is the picture now?

          I will quote from the report of the HRD Ministry. In 2003, we had a dropout rate in primary school of 34.9 per cent; in upper primary, it was 52.8 per cent; in 2009-10, it was 62.6 per cent in secondary level. Two years back, NUEPA, National University of Educational Planning and Administration, brought out a figure stating that till today, in spite of so many programmes, we have a dropout rate in the primary level to the extent of more than 20 per cent and in upper primary, including elementary education, it is almost more than 45 per cent. This is the picture today.

          In 2005, UNESCO brought out a report which talks about the present position of today. It says that India lacks infrastructure, there is teacher-absenteeism, high teacher-pupil ratio, and inadequate teaching materials and facilities, etc. Based on this, when we talk about universal retention and universal enrolment, the first thing is about funding. The Kothari Commission told that six per cent of the GDP and 10 per cent of the Budget should be spent on education. Kothari Commission said this in 1966. We are now in 2012. How much are we spending on this? We are not able to reach that criterion. We need to think about this, and also about the textbook evaluation, etc.           Another important thing is this. We are ourselves making education as two parallel systems – one is education for the rich and another is education for the poor. In RTE, there is no scope for pre-primary education. What we ourselves are doing? Our children are going to pre-primary education. In the case of poor and backward class children, there is no scope for pre-primary education. We are telling that they should be sent to EECC, Early Education and Child Care, which is in ICDS. What is done in ICDS? वहां से नारा दे रही है। क्या एजुकेशन मिलेगी, लड़कों का क्या होग, कैसे वह हमारे लड़के के साथ कम्पीट करेगा? This is the problem. My humble submission is this. We are talking about the poor. But I think, there should be an assessment of all the MPs, MLAs and MLCs of all the States, to find out how many of them are sending their children to the common neighbouring schools, and how many of them are sending their children to the private English medium schools. That should be surveyed. Without doing so, we cannot do anything. We have the basic structure of the country.

          The Kothari Commission had pointed out this – if there is a parallel system, what will happen is, we will send our children to the elite schools and they will send their children to the poor school and there will be dropouts. That is why, we do not want privatization and commercialization of education. The Government had proposed that 6000 model schools will be built up – 3500 between the States and the Centre and 2500 under PPP mode. What will the private entrepreneurs do? They will make business out of that. So, we will encourage business in education, as if we are making education as a commodity. That cannot be done.

          Rabindranath Tagore told Jibone Jibonjog - education means man-to-man relationship. That relationship can come only when we build our common school and neighbouring school system. Otherwise, we cannot do so.

          Our country is facing the scourge of illiteracy. We are signatory to 1990 Thailand Declaration and we are signatory to 2000 Senegal-Dhaka Declaration. We have committed there that we shall remove the scourge of illiteracy by 2015. But how shall we do? Till today, what is the level of illiteracy rate?

MR. CHAIRMAN : Okay, please conclude your speech now.

SK. SAIDUL HAQUE : If we want to remove the scourge of illiteracy, what is needed is we need to encourage the admission of these children to the schools. That will be the place where the students will grow and then the scourge of illiteracy will be removed. So, we need to think in that line, to spend more funds on further education, think of having neighbouring schools; and that should be initiated by us; in our attitude and in our behaviour, we should do that; otherwise, we will talk about the poor and keep ourselves at a distance from the poor in separate schools.

 That is why I say that uniformity means universal enrolment and universal achievement of quality education.  Otherwise, we have no right to talk about the uniform education system.

                                                                               

SHRI TATHAGATA SATPATHY (DHENKANAL):  Sir, I would like to thank my colleague, Shri Shailendra Kumar and our senior colleague Sumitra Mahajan ji for bringing about a discussion on a very important issue of the ‘Need for Uniform Education in the country’. 

          As you might be aware, there is a proverb in Latin.  Unfortunately, since I cannot speak Latin, I will only read the translation in English.  The proverb says, “We have not inherited the earth from our ancestors.  We are borrowing it from our children”. 

          We are in a country where we only dwell on the past.  We only speak about what achievements were made by Shah Jahan or what Babar or Chandragupta Maurya did forgetting that even while we stand here and speak on the floor of this green carpeted room, this is actually a creation of history.  History is created now.  It is not something that we have inherited from the past.

           In my opinion, although it may sound a little odd, we are not a federal country.  We are a Union of States.  We may have one major religion and many minor religions however, we are as different from each other as crows and sparrows.  We have heard many speakers talk about Sarva Shiksha Abhiyan; talk about Government funding and talk about what the Government should do. But in the opinion of many people that I have come across in this country even in my State of Odisha, it is not alone the Government which can transform a society.  It is the society itself which should be willing to be transformed which can bring about the change. 

          We have many inherent problems.  For instance, a huge unwieldy population which puts every project, everything that you do, as a drop of water in the ocean and it gets lost.  Added to that, we have the problem of so many languages and so many dialects.  So, when I sit in this House and hear many  colleagues talk about English and Hindi being brought on the same footing, obviously I think about the Ministers here.  What about Telugu, Malayalam, Oriya, Tamil, Bengali, Gujarati and Kannada? Are they in any way inferior languages? Long before the Aryans came into this sub-continent, long before Sanskrit came in, we – the dark skinned people like me – are the original inhabitants.  We are tribals.    We lived here.  Our language, Telugu, Odiya are the languages without a line on top.  These are derivatives of Pali, a language which was spoken and used on this sub-continent long before Sanskrit came and long before the progenies of Sanskrit manifested.  So, this reminds me of what once a great national Leader, Shri C.N. Annadurai had said. He had said that just because a lot of people speak one language, if you put it down on everybody in a ham-handed manner that this will be the national language, then what about a lot of crows?  Let us make the crow a national bird.  So, he had equated common sense with not just numbers but with knowledge. 

In this country today, I am saddened to say that our education system has become a system where we only impart general information.   We are forgetting that information and knowledge are completely different things.  It is true that this is an over-populated subcontinent but many of us are also very confused.  We always claim that we are going to be one of the youngest countries in the world.  But you will be surprised to know and people who have travelled to neighbouring countries like Thailand, Malaysia, Indonesia, Sri Lanka know it that all these countries also have – although they have much smaller population – a huge youth population.  You see them on their streets, in their cities and in their rural areas.  It is all young boys and girls who are on the streets.  They do not rape their women.  They do not become hoodlums.  They do not go into hospitals and shot patients.  They are conscious of their national identities. 

But today we have very successfully after Independence managed to create a country which has lost its national identity.  It is absurd to speak that we are descendants of a great culture.  What is the culture?  We have to think of our children now and decide what we want to offer them.  In India today we have, for instance, two major systems.  One is CBSE and another is ICSE.  The CBSE has more of a subjective thing.  You have to appear for examination.  You will become an IAS or IPS officer.  You are taught how to ride horses or fire to weapon, how to become a babu without ever being taught how to be perceptive; how to be humane as a human being; and how to be taking decisions.  You must be encountering many such people in your career.  We also do that.   They are people who are not taught how to take decisions in their lives. 

The country today detests politicians. But I am proud to say that all these people sitting here – everybody from that side to this side – are people who are willing to wager their careers and to wager their lives for what they believe in.  It is not only a belief in say 2G or CWG or यहां जी- वहां जी।  It is also a belief in the love for the country.  We do not know what tomorrow holds for us but we take our own decisions.  We risk our lives and we are facing the people. That uniqueness of a politician is not appreciated in this country because at large we are not teaching our children how to be independent, how to be thinkers and how to fight not only for their rights but to understand their responsibilities towards the nation and towards the society. 

We have failed in teaching our children logical thinking.   An earlier speaker had mentioned that our children are being crammed with information as to when did Porus fight Alexander; what happened to Shah Jahan; who created the Qutub Minar and details like that.

18.00 hrs. But when children ask us as to what relevance will it have in their lives, we are at a loss to answer them. It is because we are not teaching our children to think logically and take decisions and be capable to face the consequences of those decisions. That is what is most important for a nation like ours which hopes to be one amongst the international players… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN :  You may kindly take your seat now. Your time is over. 

          Hon. Members, it is six o’clock now. If the House agrees, then we can continue this discussion on some other day and now we can take up `Zero Hour’ matters. 

SEVERAL HON. MEMBERS:  Sir, yes.

     

MR. CHAIRMAN: Shri K. Sugumar.