State Consumer Disputes Redressal Commission
Deepu Trunk Stores & Safe Works vs Surendra Babu Pandey on 4 October, 2017
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/1193/2015 (Arisen out of Order Dated 10/07/2014 in Case No. C/905/2013 of District Lucknow-II) 1. Deepu Trunk Stores & Safe Works Auraiya ...........Appellant(s) Versus 1. Surendra Babu Pandey Lucknow ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. JUSTICE AKHTAR HUSAIN KHAN PRESIDENT For the Appellant: For the Respondent: Dated : 04 Oct 2017 Final Order / Judgement
राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग , उ0प्र0 , लखनऊ अपील सं0- 1193 /2015 (सुरक्षित) (जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष फोरम द्वितीय, लखनऊ द्वारा परिवाद सं0- 905/2013 में पारित आदेश दि0 10.07.2014 के विरूद्ध) Deepu trunk store and safe works, Sardar bhagat singh Chauraha, Bidhuna, Distt: Auraiya through competent authority/Proprietor.
............. Appellant Versus Surendra babu pandey, Village- Purva khagan, Post- Harvanshpur, Distt- Auraiya present Address- 538 Ka/1222, Triveni nagar-II Sitapur road, Lucknow.
.................... Respondent.
समक्ष:-
माननीय न्यायमूर्ति श्री अख्तर हुसैन खान, अध्यक्ष।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : श्री अमित शुक्ला, विद्वान अधिवक्ता। प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित : श्री एस0 इस्तेखार हसन, विद्वान अधिवक्ता। दिनांक:- 14.11.2017 माननीय न्यायमूर्ति श्री अख्तर हुसैन खान , अध्यक्ष द्वारा उद्घोषित निर्णय
परिवाद सं0- 905/2015 सुरेन्द्र बाबू बनाम दीपू ट्रंक स्टोर एण्ड सेफ वर्क्स में जिला फोरम द्वितीय, लखनऊ द्वारा पारित निर्णय और आदेश दि0 10.07.2014 के विरूद्ध यह अपील धारा 15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गई है।
आक्षेपित निर्णय और आदेश के द्वारा जिला फोरम ने परिवाद आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निम्न आदेश पारित किया है :-
"परिवादी का परिवाद आंशिक रूप से स्वीकार किया जाता है। विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह इस निर्णय की तिथि से छ: सप्ताह के अंदर परिवादी का जो सामान उसे अच्छी गुणवत्ता का नहीं दिया गया है उसे बदल दें, यदि विपक्षी ऐसा करने में असमर्थ हो तो परिवादी द्वारा उसे दी गयी धनराशि रू0 49,300/- (उन्चास हजार तीन सौ) मय ब्याज दौरान वाद व आइंदा बशरह 9 (नौ) प्रतिशत साधारण वार्षिक ब्याज की दर के साथ अदा करें। इसके अतिरिक्त विपक्षी परिवादी को मानसिक क्लेश हेतु रू0 10,000/- (दस हजार) तथा रू0 4,000/- (चार हजार) वाद व्यय अदा करेंगे, यदि विपक्षी उक्त निर्धारित अवधि के अन्दर परिवादी को यह धनराशि अदा नहीं करते हैं तो विपक्षी को समस्त धनराशि पर उक्त तिथि से ता अदायगी तक 12 (बारह) प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर के साथ अदा करना पड़ेगा। विपक्षी जो भी सामान परिवादी का बदलेगा अथवा उसका मूल्य उसे देगा, उस स्थिति में परिवादी विपक्षी को उसके द्वारा विवादित सामान वापस करेगा।"
जिला फोरम के निर्णय और आदेश से क्षुब्ध होकर परिवाद के विपक्षी दीपू ट्रंक स्टोर एण्ड सेफ वर्क्स ने यह अपील प्रस्तुत की है।
अपील की सुनवाई के समय अपीलार्थी की ओर से उसके विद्वान अधिवक्ता श्री अमित शुक्ला और प्रत्यर्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री एस0 इस्तेखार हसन उपस्थित आये हैं।
मैंने उभयपक्ष के विद्वान अधिवक्तागण के तर्क को सुना है और आक्षेपित निर्णय और आदेश तथा पत्रावली का अवलोकन किया है।
अपील के निर्णय हेतु संक्षिप्त सुसंगत तथ्य इस प्रकार हैं कि प्रत्यर्थी/परिवादी ने जिला फोरम द्वितीय, लखनऊ के समक्ष परिवाद इस कथन के साथ प्रस्तुत किया है कि उसने अपनी पुत्री के विवाह में देने हेतु डबल बेड, ड्रेसिंग टेबल, डायनिंग टेबल, कुर्सी, मेज, अलमारी, सोफा सेट व स्लीपवेल कम्पनी का गद्दा आदि 49,300/-रू0 का दि0 13.11.2011 को अपीलार्थी/विपक्षी के यहां बुक कराया जिसमें से 2,000/-रू0 दि0 13.11.2011 को एडवांस के रूप में दिया और दि0 29.11.2011 को 30,000/-रू0 बाद में जमा कर अपीलार्थी/विपक्षी से डिलीवरी हेतु कहा और दि0 30.11.2011 को बिल की शेष धनराशि का भुगतान कर दिया।
परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादी का कथन है कि अपीलार्थी/विपक्षी से क्रय किये गये सामान उसकी पुत्री के ससुराल में रखे जाने के समय से ही टूटने लगे जिससे उसे शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा। परिवाद पत्र के अनुसार प्रत्यर्थी/परिवादी का कथन है कि अपीलार्थी/विपक्षी ने जो सामान दिखाया और बताया उस सामान की डिलीवरी नहीं दिया है। प्रत्यर्थी/परिवादी ने अपीलार्थी/विपक्षी को इस संदर्भ में सूचना दिया, परन्तु उसने कोई ध्यान नहीं दिया तब प्रत्यर्थी/परिवादी ने अपीलार्थी/विपक्षी को विधिक नोटिस दिया, फिर भी उसने कोई कार्यवाही नहीं किया। इसके विपरीत उसने जवाब दि0 16.09.2013 को दिया जिसमें उसने प्रत्यर्थी/परिवादी के जिम्मा का 7680/-रू0 का गलत बकाया बताया। अत: विवश होकर प्रत्यर्थी/परिवादी ने जिला फोरम द्वितीय, लखनऊ के समक्ष परिवाद प्रस्तुत किया है।
जिला फोरम के आक्षेपित निर्णय और आदेश से स्पष्ट है कि अपीलार्थी/विपक्षी जिला फोरम के समक्ष नोटिस तामीला के बाद भी उपस्थित नहीं हुआ है और न लिखित कथन प्रस्तुत किया है। अत: जिला फोरम ने उसके विरूद्ध परिवाद की कार्यवाही एकपक्षीय रूप से करते हुए आक्षेपित निर्णय और आदेश पारित किया है।
अपीलार्थी/विपक्षी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि जिला फोरम द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश साक्ष्य और विधि के विरूद्ध है। अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि अपीलार्थी/विपक्षी को जिला फोरम द्वितीय, लखनऊ से कोई नोटिस प्राप्त नहीं हुई है और उस पर नोटिस का तामीला किये बिना जिला फोरम ने आक्ष्ोपित निर्णय और आदेश पारित किया है। अत: उसे अपना अपक्ष प्रस्तुत करने का अवसर नहीं मिला है।
अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि प्रत्यर्थी/परिवादी ने जो सामान अपीलार्थी/विपक्षी के यहां से खरीदा है उसके संदर्भ में प्रत्यर्थी/परिवादी का बकाया है जिसका भुगतान किये बिना प्रत्यर्थी/परिवादी ने अपीलार्थी/विपक्षी की अनुपस्थिती में उसके पुत्र से धोखे से सामान प्राप्त कर लिया है और अवशेष धनराशि के भुगतान से बचने के लिए झूठे कथन के साथ यह परिवाद प्रस्तुत किया है तथा गलत ढंग से जिला फोरम द्वितीय, लखनऊ से आक्षेपित निर्णय और आदेश प्राप्त किया है।
प्रत्यर्थी/परिवादी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि अपीलार्थी/विपक्षी को जिला फोरम द्वितीय, लखनऊ ने नोटिस प्रेषित किया है, परन्तु नोटिस तामीला के बाद भी वह उपस्थित नहीं हुआ है। जिला फोरम ने उसके विरूद्ध परिवाद की कार्यवाही एकपक्षीय रूप से करते हुए आक्षेपित निर्णय और आदेश पारित किया है जो उचित है।
प्रत्यर्थी/परिवादी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि उसने परिवाद सही और सत्य कथन के साथ प्रस्तुत किया है। जिला फोरम ने परिवाद स्वीकार कर कोई गलती नहीं की है।
मैंने उभयपक्ष के तर्क पर विचार किया है।
निर्विवाद रूप से आक्षेपित निर्णय और आदेश जिला फोरम ने एकपक्षीय रूप से अपीलार्थी/विपक्षी की अनुपस्थिती में पारित किया है और अपीलार्थी/विपक्षी की ओर से जिला फोरम के समक्ष अपना कथन प्रस्तुत नहीं किया गया है। अपीलार्थी/विपक्षी के अनुसार परिवाद की नोटिस उस पर तामील नहीं की गई है जब कि आक्षेपित निर्णय और आदेश के अवलोकन से स्पष्ट है कि जिला फोरम द्वारा नोटिस उसे भेजी गई है, परन्तु वह उपस्थित नहीं हुआ है। अत: सम्पूर्ण तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करते हुए मैं इस मत का हूँ कि जिला फोरम द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश अपास्त कर अपीलार्थी/विपक्षी को अपना कथन जिला फोरम के समक्ष प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना उचित है, परन्तु अपीलार्थी/विपक्षी के जिला फोरम के समक्ष उपस्थित न होने के कारण जो परिवाद के निस्तारण में विलम्ब हो रहा है उसकी क्षतिपूर्ति हेतु अपीलार्थी/विपक्षी से प्रत्यर्थी/परिवादी को 5,000/-रू0 हर्जा दिलाया जाना उचित है।
उपरोक्त निष्कर्ष के आधार पर अपील स्वीकार की जाती है और अपीलार्थी/विपक्षी द्वारा प्रत्यर्थी/परिवादी को 5,000/-रू0 हर्जा अदा किये जाने पर जिला फोरम द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश अपास्त किया जाता है तथा पत्रावली जिला फोरम को इस निर्देश के साथ प्रत्यावर्तित की जाती है कि वह अपीलार्थी/विपक्षी को इस निर्णय में हाजिरी हेतु निश्चित तिथि से 30 दिन के अन्दर अपना लिखित कथन प्रस्तुत करने का अवसर देकर परिवाद की अग्रिम कार्यवाही विधि के अनुसार उभयपक्ष को साक्ष्य और सुनवाई का अवसर देकर तीन मास के अन्दर सम्पादित करे और अन्तिम निर्णय और आदेश पारित करे।
उभयपक्ष जिला फोरम के समक्ष दि0 15.12.2017 को उपस्थित हों।
उभयपक्ष अपील में अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।
धारा 15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत अपील में जमा धनराशि 25,000/-रू0 व उस पर अर्जित ब्याज से 5,000/-रू0 हर्जे की उपरोक्त धनराशि प्रत्यर्थी/परिवादी को अदा की जायेगी और शेष धनराशि अपीलार्थी/विपक्षी को वापस कर दी जायेगी।
(न्यायमूर्ति अख्तर हुसैन खान) अध्यक्ष शेर सिंह आशु0, कोर्ट नं0-1 [HON'BLE MR. JUSTICE AKHTAR HUSAIN KHAN] PRESIDENT