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Lok Sabha Debates

Incidents Of Suicide Committed By Farmers In Various Parts Of The Country Due To ... on 1 June, 1998

Title: Incidents of suicide committed by farmers in various parts of the country due to non-payment of remunerative prices for their agricultural produce. (Not Concluded) 13.11 hrs. MR. SPEAKER: The House shall now take up discussion under Rule 193 regarding incidents of suicide committed by farmers in various parts of the country due to non-payment of remunerative prices for the agricultural produce.

Before the discussion starts, I would like to make a small observation.

Being personally aware of the plight of farmers in Andhra Pradesh, I can say that the reasons that have led the farmers all over the country to take resort to this extreme step are not far to seek. It is actually a combination of factors - natural and man-made - that has resulted in this calamitous situation. Be it the non-payment of remunerative prices in some States, the failure of crops due to inclement climatic conditions in other States or the supply of sub-standard insecticides and pesticides in some other places, or even the uncertified seeds, inadequate credit flow etc., the net result is that the poor farmer has been at the receiving end.

As the hon. Members are aware, agriculture sector today provides livelihood to about 64 per cent of the labour force, contributes nearly 33 per cent of Gross Domestic Product and accounts for about 18 per cent share of total value of the country's export. Keeping in view the importance of agriculture sector in India's economy and in view of the plight of the farming community, it has become necessary to have an in-depth look into the grievances of the farmers.

This House is about to discuss this matter now. I would urge upon the hon. Members to rise above party lines and maintain objectivity in their speeches. Apportioning blame is not going to help; constructive suggestions have to be made to overcome the problems that beset the agricultural sector.

I would also urge upon the Government to make some meaningful positive response by announcing concrete and comprehensive steps which it intends to take in this regard to ensure that such tragic incidents do not recur and to ameliorate the plight of the farmers.

Shri Vilas Muttemwar may now initiate the discussion on the subject.

"> श्री विलास मुत्तेमवार (नागपुर): माननीय अध्यक्ष महोदय, अतिव्ृाष्िट, प्राकृतिक विपदा से पीड़ित किसानों को उनके कृषि उत्पाद के लाभकारी मूल्य का भुगतान नहीं किए जाने के कारण देश के वभिन्न भागों में उनके द्वारा जो आत्महत्याएं हुई हैं, इस गम्भीर विषय को सदन में लाने के लिए आपने जो अनुमति दी, उसके लिए मैं आपका आभार व्यकत करता हूं। साथ ही इस विषय पर पार्टीलाइन से ऊपर उठकर सब लोगों को विचार करना चाहिए, ऐसी जो भावना आपने यहां व्यकत की, उससे मैं और मेरी पार्टी अपने को सम्बद्ध करती हैं।
13.14 hrs. (Shri P.M. Sayeed in the Chair) सभापति महोदय, यह ऐसी विपदा है कि आजादी के पचास साल हो गए हैं, जिसका हमने स्वर्ण महोत्सव भी मनाया है, लेकिन जितनी उपेक्षा इस देश में किसानों की हुई है, उतनी किसी अन्य क्षेत्र में किसी की नहीं हुई होगी। किसान हमारे देश के विकास की रीढ़ की हड्डी है, ऐसा हम बड़े फख़ के साथ कहते हैं, लेकिन इस रीढ़ की हड्डी को मजबूत करने का काम हमारी तरफ से नहीं हुआ। यह हम सब लोगों की तरफ से गलती हुई है। जिसका परिणाम हमें इस रूप में भुगतना पड़ा कि पूरे हिन्दुस्तान के वभिन्न राज्यों में ५०० से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की। देश की राजनैतिक पार्टीज भी इस काम में चूक गईं और उसका हमने निषेध किया, ऐसा मैं समझता हूं। अभी भी वकत नहीं गया है। इसलिए हमें वकत की नजाकत को समझते हुए इस बारे में कुछ स्थाई हल निकालना चाहिए। प्रधान मंत्रीजी जो देश की सुरक्षा के प्रति बड़े गम्भीर हैं और उन्होंने सुरक्षा को लेकर जो अगुवाई की, वह सही थी या गलत थी, इस पर पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। लेकिन अगर वह किसानों को मजबूत करने के लिए, किसानों के हितों के लिए, कोई कदम उठाते तो पूरा हिन्दुस्तान उनका धन्यवाद करता और आने वाले इतिहास में उनका नाम अमर हो जाता, ऐसा मैं मानता हूं लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह बहुत दुख के साथ कहना पड़ता है कि जब यहां बंगाल और उड़ीसा में साइकलोन आने से वहां किसानों का बड़ा नुकसान हुआ और उस मामले को लेकर पश्िचम बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र, कर्नाटक सब जगह के प्रतनधि इस सदन में मांग कर रहे थे, उस समय प्रधान मंत्री जी ने और हमारे कृषि राज्य मंत्री जी ने यह हामी भरी थी, सदन में यह आश्वासन दिया था कि इन राज्यों में विशेष दल भेजा जाएगा और वहां के किसानों की आवश्यकता के मुताबिक मदद की जाएगी लेकिन दुर्भाग्य के साथ कहना पड़ता है कि केन्द्र सरकार की तरफ से कोई इनशिएटिव नहीं लिया गया। जो भी इनशिएटिव लिया गया, वह अपर्याप्त मात्रा में लिया गया और राज्य सरकारों की भी कोई मदद नहीं की गई। मैं बड़ी जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं कि जब हाउस में यह मामला उठा था और हमारी तरफ से कई सांसदों ने इस बात की मांग की थी तथा आत्महत्याओं की घटनाएं बड़े जोरों से हो रही थीं, उस वकत का आंकड़ा २६ हुआ था और प्रधान मंत्री जी ने आश्वासन दिया था कि महाराष्ट्र में टीम भेजी जाएगी। वहां के मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री भी वहां टीम भेजने के लिए अर्ज कर रहे थे और अगर उस दिन उस तरफ ध्यान दिया जाता जो २७ तारीख को इसी विषय को लेकर जवाब दिया गया था, उसमें महाराष्ट्र में इस तरह की आत्महत्या करने की जो संख्या बताई गई है, वह ५१ है। अगर उस वकत ध्यान दिया जाता जिस वकत महाराष्ट्र सरकार ने मांग की थी तो आज पच्चीस लोगों ने आत्महत्या नहीं की होती। हमने २७ तारीख को जब चर्चा की थी तो महाराष्ट्र में ५१ लोगों ने आत्महत्या की थी। आज यह आंकड़ा ५२ पर पहुंच गया है। परसों अभी महाराष्ट्र में एक और किसान ने आत्महत्या की और उस गांव में किसान परिवार के मिलने के लिए, उनके आंसू पोंछने के लिए हमारे अपोजीशन लीडर श्री शरद पवार जी परसों होकर आए हैं। हम पहले इन गंभीर समस्याओं पर ध्यान नहीं देते, बाद में इसके परिणाम हमको भुगतने पड़ते हैं। मरने के बाद उनको हम जो भी सहायता देते हैं, वह भी पर्याप्त नहीं है और उसमें भी कोई यूनिफॉर्िमटी नहीं है। हमारे यहां, जैसा कि दूसरे कारणों से मौत होती है, उसकी कीमत भी अलग-अलग होती है। हम यहां हाउस में आज तक यह तय नहीं कर सके कि इस तरह की मौत मरने वालों के लिए कया सहायता दी जानी चाहिए। बस एकसीडेंट, रोड एकसीडेंट, रेलवे एकसीडेंट और एअर एकसीडेंट, जिसमें हुई मौत ज्यादा कीमती मौत होती है, उसमें पांच लाख रुपया मुआवजा दिया जाता है लेकिन जो किसानों ने इस सरकार की व्यवस्था का निषेध करते हुए आत्महत्या की है और जिन्हें हम सहायता नहीं दे सके, वे किसान किसी एकसीडेंट में नहीं मरे हैं। उन्होंने जानबूझकर हमारे सत्र का निषेध करने के लिए यह मार्ग अपनाया है तथा उसके लिए जो मुआवजा दिया गया, वह बहुत कम है। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग मुआवजा दिया गया है। आन्ध्र प्रदेश हम सबके सामने हैं, उन्होंने दो लाख रुपया मुआवजा दिया है। महाराष्ट्र में एक लाख रुपया मुआवजा दिया है। दूसरे राज्यों में और भी कम मुआवजा दिया गया है। मैं सरकार से आग्रह करूंगा कि कम से कम इस बारे में कोई आंकड़ा तय किया जाए। कोई भी व्यकित पैसे के लालच में अपनी जान नहीं गंवाता, इसलिए मैं आपसे आग्रह करूंगा कि जब ऐसी घटनाएं होती हैं तो पब्िलक अवेयरनेस के लिए जो इनशिएटिव राज्य सरकारों की ओर से, केन्द्र सरकार की ओर से लिया जाना चाहिए, वह नहीं लिया गया। हमारे राज्य में जब यह आत्महत्याओं का सिलसिला शुरु हुआ तब हमारे राज्य में मुख्य मंत्री भी हैं, उप मुख्य मंत्री भी हैं, दोनों काबिल इंसान हैं लेकिन इन लोगों ने भी राज्य का दौरा नहीं किया। दुर्भाग्य की बात यह है कि अभी अध्यक्ष महोदय कह रहे थे कि पार्टी लाइन के ऊपर उठकर हमें इस प्रश्न का हल ढूंढ़ना चाहिए। हमारे मुख्य मंत्री जी को फुर्सत नहीं मिली। महाराष्ट्र राज्य के लोग इन कारणों से आत्महत्या कर रहे थे और हमारे राज्य के मुख्य मंत्री मुम्बई में अपना जन्मदिन मना रहे थे। शिव सैना की सरकार है जिस तरह राजा का जन्मदिन मनाते हैं, ... (व्यवधान) श्री उत्तमसिंह पवार (जालना) : अध्यक्ष महोदय, हम इस पर ऑब्जेकट करते हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं है।
... (व्यवधान) श्री विलास मुत्तेमवार : कया उन्होंने जन्मदिन नहीं मनाया?
... (व्यवधान) श्री उत्तमसिंह पवार : आपको मालूम है?
... (व्यवधान) श्री मधुकर सरपोतदार (मुम्बई उत्तर-पश्िचम): उन्होंने जन्म-दिन मनाया, आपको मालूम है?
... (व्यवधान)
You please tell me the date ... (Interruptions) He should not make wrong allegations ... (Interruptions) Is it right? ... (Interruptions) श्री विलास मुत्तेमवार : डेट वेरीफाई कर लेंगे। ( Interruptions) MR. CHAIRMAN: No, no, Shri Sirpotdar, please resume your seat ... (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: He has not uttered any unparliamentary word. When you get your chance to speak, you refute it.
... (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Shri Sirpotdar, please ask your Members to resume their seats.
... (Interruptions)
SHRI MADHUKAR SIRPOTDAR : Sir, he should not name persons ... (Interruptions) What is this? ... (Interruptions)
SHRI VILAS MUTTEMWAR (NAGPUR): When your Party is not taking the initiative ... (Interruptions) The hon. Speaker has already asked all the political Parties ... (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: There is no unparliamentary word.
... (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Nothing will go on record.
(Interruptions) * MR. CHAIRMAN: Shri Muttemwar, you please do not yield. You must address the Chair.
SHRI VILAS MUTTEMWAR : Sir, thank you for giving me protection ... (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Shri Sirpotdar, you are going to speak on this subject and then you refute it.
SHRI MADHUKAR SIRPOTDAR : Sir, it is a good subject and everybody should speak by raising above Party lines ... (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Your name is there in the list of speakers. You refute whatever you want to when you speak.
... (Interruptions) श्री विलास मुत्तेमवार : महोदय, जैसा मैंने कहा, हमारा महाराष्ट्र राज्य पूर्वगामी राज्य रहा है जो पूरे हिन्दुस्तान में कभी एक नम्बर पर था, लेकिन आज जो घटनायें हो रही हैं, वैसी घटनायें पिछले पचास सालों में नहीं हुई हैं। मैं यह बात जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं।
MR. CHAIRMAN: No running commentary please.
... (Interruptions) श्री विलास मुत्तेमवार : महोदय, ऐसी आत्म-हत्यायें आज तक महाराष्ट्र में नहीं हुई है। सन् १९७२ में ... ... (व्यवधान)
______________________________________________________________________________ * Not Recorded.
MR. CHAIRMAN: Please do not speak like this. I have seen you. Do not do that. You are a new Member. There is a way to express your opinion here, not by giving a running commentary like this. There should be no running commentary. श्री विलास मुत्तेमवार (नागपुर) : महोदय, १९७२ में इस प्रकार का अकाल महाराष्ट्र में पड़ा था और तब आठ लाख लोगों को वभिन्न योजनाओं के अन्तर्गत रोजगार दिया था। उस वकत के मुख्य मंत्री, स्व. वसन्त रावजी नाईक, जो किसानों के नेता थे, उन्होंने कहा था कि किसान स्वाभिमानी होता है, उसको भीख नहीं चाहिए, वह श्रम करने के लिए तैयार है। उस समय जब यह समस्या सरकार के सामने आई, तो कर्जे माफ कर दिए गए थे। इसके बाद फिर नए कर्जे दिए गए और नए बीज दिए गए, लेकिन ऐसा इस वर्ष नहीं किया गया। हाल में प्रधान मंत्री जी ने कहा था कि हम किसानों के साथ अन्याय नहीं करेंगे। किसानो के साथ हमारा कन्सर्न है और उनकी इन आत्म-हत्याओं की वजह से हम चन्ितत हैं। इस बारे में जो आंकड़े हमें मंत्री जी ने दिए हैं, उसके अनुसार आन्ध्र प्रदेश में २३६ - जैसा कि बताया जा रहा है, अब यह आंकड़ा ३०० के करीब पहुंच गया है - कर्नाटक में २९, महाराष्ट्र में उस दिन ५१ थे और अब यह बढ़कर ५२ हो गया है। इस प्रकार आंकड़ा दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। हम यहां पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन उसका असर हमारी सरकार और यंत्रणा पर नहीं पड़ रहा है तथा हम पार्टी लाइन से ऊपर उठकर विचार करने की बात कहते हैं। हम सभी लोग जो संसद में आए हैं, हम सभी की इस समस्या के निदान के लिए जिम्मेदारी है। सरकार द्वारा कदम उठाए जाने के बाद भी हम आत्म-हत्या को रोक नहीं सके हैं। यह सबके लिए दु:ख की ही बात नहीं, बल्िक शर्म की बात है। मैं चाहूंगा, इस पर पूरे दिन चर्चा होनी चाहिए। हमारी तरफ से भी इस विषय पर बहुत सदस्य अपने विचार रखेंगे। उस दिन माननीय मंत्री जी, श्री सोमपाल जी, ने कहा कि हम कन्क़ीट कार्यक़म लेकर सदन में आने वाले हैं कि कैसे कन्सैशन और सहूलियतें दी जा सकती है। जिन सुविधायों की घोषणा हुई हैं, उनसे किसानों की समस्याओं का समाधान होने वाला नहीं है। मेरे विचार से अभी तक किसानों को बड़े पैमाने पर राहत नहीं दी गई है। मेरा आपके माध्यम से सदन से आग्रह है कि जिन किसानों ने आत्म-हत्यायें की हैं, उनको मुआवजे के रूप में एक-दो लाख नहीं, कम से काम पांच लाख रूपए दिए जाने चाहिए। कोई भी अपनी जान पैसों के लिए नहीं देता। यह जो विपदा उसके घर वालों पर आई है, उसके लिए हमें उनकी खुले दिल से मदद करनी चाहिए। किसानों पर जो कर्जे हैं, ऐसी परस्िथति में वे अपने कर्जे लौटा नहीं सकते तो मैं संसद से आग्रह करूंगा कि उनके कर्जे माफ किए जाएं, कयोंकि इससे पहले भी हम कई क्षेत्रों में कर्जे माफ कर चुके हैं। अगर कोई उद्योगपति बैंकों से करोड़ों रुपए के कर्जे लेता है और उसे अलग-अलग नई कम्पनियां बनाने में डाइवर्ट करके अपनी यूनिट सिक घोषित कर देता है तो सरकार और बैंक उसके कर्जे माफ कर देते हैं। जब हमारी संसद और बैंक खुले दिल से करोड़ों रुपए के कर्जे माफ कर सकते हैं तो किसानों के मामले में भी हमें बड़ा दिल करना चाहिए, उनके कर्जे माफ करने चाहिए। महोदय, मुझे फख़ है जब हमारी पार्टी १९८१ को सत्ता में थी, तब हमारी पार्टी के मुख्य मंत्री, अंतुले जी महाराष्ट्र में थे। उन्होंने आते ही किसानों के कर्जे माफ किए थे, वही परम्परा अब भी चलनी चाहिए। मेरा पुन: आग्रह है कि किसानों के कर्जे माफ करने के लिए सरकार की तरफ से इनीशियेटिव लेना चाहिए। अभी जो नयी फसल आने वाली है उसके लिए बीज, खाद आदि साधनों की सप्लाई गवर्नमेंट को करनी चाहिए, ऐसे आदेश केन्द्र सरकार की तरफ से राज्य सरकार को जाने चाहिए। उनको नयी फसल के लिए नये कर्जे दिए जाने चाहिए और उसकी भी इंस्टालमेंटस सात साल के अंतर से वसूल की जानी चाहिए। ऐसी इंस्ट्रकशन दी जानी चाहिए कि जो भी कर्जे देने वाली वित्तीय संस्था है- जैसे नबार्ड है, डिस्टि्रकट सेंट्रल कोआपरेटिव बैंक है, ग्रामीण विकास बैंक है, उनको हिदायत दी जाए। किसानों से कर्जा वसूल करने के लिए बड़ी सख्ती अपनाई जाती है, उनके सामान फेंके जाते हैं, उनको घर से बेदखल किया जाता है, उनकी गाय, भैंस और बैल को उठा कर ले जाया जाता है, इस पर रोक लगनी चाहिए।
SHRI RAVI SITARAM NAIK (PANAJI): May I point out, Sir, that there is no quorum in the House. A very few people are present from the ruling party.
MR. CHAIRMAN: The bell is being rung-
Now there is a quorum. The hon. Member, Shri Muttemwar may continue.
... (व्यवधान) श्री विलास मुत्तेमवार : सभापति महोदय, उस दिन जब चर्चा हो रही थी, उस दिन का डिबेट मेरे सामने रखा हुआ है। तब माननीय प्रधानमंत्री जी ने खुद कहा था कि पूरे दिन चर्चा होनी चाहिए, हम पूरी चर्चा चाहते हैं और हम यहां बैठेंगे। दुर्भाग्य की बात है कि वह ऐसी नहीं है और जिन्होंने हामी भरी है वह भी, संसदीय कार्य मंत्री भी यहां नहीं बैठे हैं। इस तरह से इस गंभीर प्रश्न पर सरकार का कया रवैया है वह भी आप सब लोगों के सामने है।
... (व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : Nothing but what Shri Muttemwar speaks will go on record.
(Interruptions) * श्री विलास मुत्तेमवार : सभापति जी, मेरे पास डिबेट की कॉपी है जिसमें प्रधान मंत्री ने कहा था कि मैं पूरे दिन बैठूंगा। इसलिए मैं यह बात कह रहा हूं। ... (व्यवधान) सभापति महोदय : आप उनसे बात करेंगे तो इंटरप्शन होंगे। आप बात मत करिये। ... (व्यवधान) आज लंच आवर नहीं है। श्री विलास मुत्तेमवार : सभापति महोदय, जैसा कि मैं कह रहा था कि महाराष्ट्र में ५२ लोगों ने आत्महत्या की है। उस दिन के उत्तर में बताया गया है कि १२ लोगों को एक लाख के हिसाब से मुआवजा दिया गया है और सात लोगों को पचास हजार के हिसाब से मुआवजा दिया गया है। मैं इसलिए ही इस प्रश्न को पहले उठा रहा था कि मुआवजा देने के बारे में हमारी सरकार की ओर से, चाहे वह केन्द्र सरकार हो, राज्य सरकार हो, तय किया जाए कि मुआवजा देने के बारे में भेदभाव नहीं बरता जाएगा, एक रकम दी जाएगी और वह ज्यादा से ज्यादा दी जाएगी - जैसी की मैंने मांग की है कि वह रकम पांच लाख दी जाए। दूसरा, जो बीज और रासायनिक खाद किसान लेता है, उसमें मिलावट होती है, जिसके कई प्रकरण सामने आए हैं और जिसकी वजह से किसान को नुकसान हुआ और कई जगहों पर इसकी वजह से भी किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। मिलावट करने पर पहले सजा सात साल थी जिसको तीन साल कर दिया गया है।
... (व्यवधान)आर्िडनेंस लाया गया और सजा का प्रावधान तीन साल कर दिया गया। जबकि इस मामले में, जहां किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ता है ज्यादा से ज्यादा और सख्त सजा का प्रावधान होना चाहिए जिससे लोग मिलावट करने की हिम्मत न कर सकें। लेकिन यहां पर हमने मिलावट करने वालों को सजा में छूट दी है, ऐसा मैं समझता हूं। सभापति महोदय, मैं विदर्भ से आता हूं। जो ५२ केसिज हुए हैं उनमें से २६ केसिज विदर्भ में हुए हैं। विदर्भ जो हमेशा से उपेक्षा का शिकार रहा है और हर क्षेत्र में उसके साथ उपेक्षा हुई है, चाहे सिंचाई सुविधाएं देने का मामला हो, फंड देने का मामला हो और लगातार वहां की जनता सदन से और देश से आग्रह कर रही है कि हमें अलग कर दिया जाए, हम अपना विकास खुद कर लेंगे। अगर ऐसा होता तो हमारे किसानों को वहां दुख झेलने न पड़ते।
_______________________________________________________________________ * Not Recorded.   विदर्भ में चार हजार मैगावाट बिजली का हम निर्माण करते हैं, लेकिन वहां केवल आठ सौ मैगावाट बिजली दी जाती है। बाकी सारी मुम्बई, पूना, थाणे, शोलापुर, कोल्हापुर में चली जाती है। जो रेट मुम्बई की यूनिट के लिए लगता है वही रेट नागपुर के लिए लगता है, विदर्भ के लिए लगता है। बिजली वहां ले जाने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने अब तक दो हजार करोड़ रुपया खर्च किया है। वहां के किसानों के पम्पों के लिए जो बिजली चाहिए उसके लिए डेढ़ लाख एप्लीकेशन्स वहां के विद्युत-मंडल के सामने हैं, लेकिन अभी तक उनको देखा नहीं गया है, उनको कनेकशन नहीं दिया गया है। जबकि विदर्भ में २ लाख ८२ हजार इस तरह के बिजली के पम्प हैं। जबकि अकेले नासिक जिले में ३ लाख १८ हजार पम्प हैं। पूरे महाराष्ट्र में २२ लाख पम्प हैं जिसमें से विदर्भ में जहां ४ हजार मैगावाट बिजली होती है वहां केवल २ लाख २२ हजार पम्पों को बिजली दी गयी है। वहां की सरकार के सामने डेढ़ लाख एप्लीकेशन्स इसके लिए पड़ी हैं। जो असंतुलन हो रहा है और उनकी उपेक्षा हो रही है, यही कारण है कि वहां के किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं और यह बड़ा गंभीर मामला है। मैं आपके माध्यम से सरकार के अनुरोध करना चाहूंगा कि इसके लिए कोई ठोस कदम उठाए जाएं जिससे किसी भी राज्य का किसान आत्महत्या न करे, और उसमें ऐसी भावना जागे कि ऐसा कोई भी मौका होगा तो इस देश की सरकार, इस देश का सांसद, इस देश का कायदा-कानून और संविधान उसकी मदद के लिए आयेगा। अगर हम ऐसा विश्वास किसान में जाग्ृात न कर सके तो यहां पर हम जितनी भी चर्चा करें, उसकी कोई भी उपयोगिता नहीं होगी। मुझे उम्मीद है कि मेरी भावना का यहां बैठे सांसद, प्रधान मंत्री और उनके मंत्री आदर करेंगे। ऐसा अर्ज करते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।"> श्री अमर पाल सिंह (मेरठ): माननीय सभापति जी, १९९७-९८ में जो कपास के किसानों को खराब कीटाणु नाशक दवाओं के कारण तथा महाजन से अथिक ब्याज पर ऋण लेने के कारण या प्राकृतिक आपदाओं के कारण या आर्िथक तंगी के कारण आत्महत्याएं करनी पड़ीं, इसे १९९७-९८ के साथ ही १९९६-९७ के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। १९९६-९७ में बहुत अधिक कपास का उत्पादन हुआ था और सरकार पूरी कपास को नहीं खरीद पाई थी, जिसके कारण किसान की आर्िथक दुर्दशा हुई थी। भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां का किसान भारत के १०० करोड़ लोगों को भोजन दे रहा है। जो किसान १०० करोड़ लोगों को भोजन दे रहा है स्वयं वह और उसके बच्चे अगर भोजन रहित सोएं या उन्हें आर्िथक तंगी के कारण आत्महत्या करनी पड़े या अपने बच्चों को मजबूर होकर बेचना पड़े तो इससे गंभीर बात देश में नहीं हो सकती है। १९९६-९७ में जब किसान की आर्िथक दुर्दशा हो गयी तो १९९७-९८ में उसकी उपज कम होना स्वभाविक थी कयोंकि अच्छे बीज, खाद और दवाएं लेने के लिए उसके पास पैसा नहीं था। समय पर उसको ऋण नहीं मिला। आंध्र प्रदेश में भी १९८७-८८ में ३७ कपास के किसानों ने आत्महत्याएं की थीं और उस वकत एक पी.डी.औझा, डिप्टी गवर्नर, रिजर्व बैंक की अध्यक्षता में इसके अध्धयन के लिए एक समति का गठन हुआ था। लेकिन आज तक किसी भी सरकार ने १९८७-८८ में गठित उस समति के सुझावों को प्रकाशित नहीं किया और न ही उन सुझावों पर अमल किया। सदन को और इस देश के लोगों को अभी तक यह भी पता नहीं कि उस कमेटी की रिपोर्ट कया थी? किसान की इससे अधिक बदकिस्मती कया हो सकती है कि अगर वह गेहूं का उत्पादन बढ़ाए तो गेहूं के किसान की आर्िथक दुर्दशा हो जाए, गन्ने का उत्पादन बढ़ाए तो उसकी आर्िथक दुर्दशा हो जाए, आलू का उत्पादन बढ़ाए तो उसकी आर्िथक दुर्दशा हो जाए, प्याज का उत्पादन बढ़ाए तो उसकी आर्िथक दुर्दशा हो जाए और कपास का उत्पादन बढ़ाए तो उसकी आर्िथक दुर्दशा हो जाए। सभापति जी, १९७७-७८, १९९१-९२ और १९९५-९६ में गन्ने का बहुत अधिक उत्पादन हुआ। किसान को अपना गन्ना अपने खेतों में जलाना पड़ा था। इसी तरह से १९९४-९५ में प्याज का उत्पादन बहुत अधिक हुआ, प्याज सड़ गयी थी और किसान को प्याज का दाम नहीं मिला था। इसी तरह से १९९६-९७ में आलू सड़ गया था। लेकिन १९९५-९६ में रबड़ का आयात करना पड़ा, जिसके कारण १९९७-९८ में रबड़ का अधिक उत्पादन किसान ने किया, तब भी रबड़ के किसान की आर्िथक दुर्दशा हुई। सभापति जी, सदन को आज यह विचार करना पड़ेगा कि जब भी किसान अपनी फसल कलाईमेकस पर उत्पादन करे तो सरकार उसे पूरा संरक्षण प्रदान करे। पहले तो किसान कलाईमेकस उत्पादन करके आर्िथक दुर्दशा में फंसता है ऊपर से सरकार संरक्षण प्रदान नहीं करती है। दुनिया के हर देश में चाहे माल समुद्र में फैंक दिया जाए, किसान का आर्िथक शोषण वहां बर्दाश्त नहीं किया जाता है, लेकिन यहां अधिक पैदा करने पर उसकी आर्िथक दुर्दशा हो जाती है। उसका विपरीत असर यह पड़ता है कि आने वाले समय में उत्पादन कम हो जाता है। मैं गन्ने का एक उदाहरण देना चाहूंगा। १९९१-९२ में जब गन्ना किसान की आर्िथक दुर्दशा हो गई, उस समय सरकार चीनी का निर्यात कर रही थी। किसान की आर्िथक तंगी के कारण किसान का फसल चक़ बिगड़ जाता है तो उत्पादन गिर जाता है। १९९४-९५ में इस देश को फिर चीनी का आयात करना पड़ा था। चीनी का ही मामला नहीं है। हर तरफ यही मामला है। इसे रोकना होगा। अभी प्याज के मामले में महाराष्ट्र में शरद जोशी ने आन्दोलन चलाया था। १९९४-९५ में प्याज सड़ गया जिससे प्याज के भाव काफी ऊंचे हो गए। इसका कया कारण है? जिस वर्ष किसान अपनी फसल का बहुत अधिक उत्पादन करता है, उस साल अगर सरकार उसका संरक्षण कर, उसका आर्िथक शोषण रोक दे तो यह देश कहीं का कहीं चला जाएगा। इससे किसानों को न आत्महत्या करने की जरूरत पड़ेगी और किसान की उपज का हर वर्ष निर्यात भी होगा। देश की अर्थव्यवस्था को किसान ही बदल सकता है। कया राज्य सरकारें १९७४ से पहले टैकस नहीं लेती थीं? आज हर राज्य के बॉर्डर पर बैरियर लगे हुए हैं। २००२ तक सार्क देशों से १५०० वस्तुएं देश में आने के लिए सभी पाबंदियां समाप्त की जाने वाली हैं लेकिन हमारे यहां ऐसी पाबंदियां लगी हैं कहीं मंडी परिषद के नाम पर, कहीं व्यापार कर के नाम पर पाबंदी। आज किसान एक राज्य से दूसरे राज्य में अपनी उपज नहीं ले जा सकता। माननीय सोमपाल जी यहां बैठे हैं। मैंने अतारांकित प्रश्न संख्या ६८ और ३० मार्च को नियम ३७७ के अधीन एक विषय उठाया था कि किसान को अपनी उपज तथा उसपर आधारित प्रोडकटस और बाई प्रोडकटस को पूरे भारत में लेकर जाने की स्वतंत्रता होना चाहिए। उत्तर में माननीय मंत्री जी ने कहा कि जम्मू-कश्मीर, पश्िचम बंगाल और आन्ध्र प्रदेश में धान की फसल को छोड़ कर सभी जगह पूरी स्वतंत्रता है। मैं मंत्री जी के ध्यान में एक चीज लाना चाहता हूं। इनका निर्वाचन क्षेत्र बागपत है। वह हरियाणा का बार्डर है। जब उत्तर प्रदेश में अधिक धान होता है तो उसे हरियाणा में ले जाने का प्रयास किया जाता है। उसे बॉर्डर पर रोक दिया जाता है। उन्हें मंडी समति का नो ऑबजैकशन सर्िटफिकेट लेना पड़ता है। कया शीरा गन्ने का बाई प्रोडकट नहीं है? इसको किसी भी स्टेट से बाहर ले जाने के लिए आबकारी विभाग की अनुमति लेनी पड़ती है। ऐसे ही शीरे पर प्रतिबंध लगा हुआ है। पूरे देश में एक राजस्थान की ऐसी सरकार है जिसने बैरियर समाप्त कर दिए हैं। कया राजस्थान टैकस वसूल नहीं कर रहा? वर्लड बैंक ने भी इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। मैं मंत्री महोदय से पहला यह अनुरोध करना चाहता हूं कि पी.डी. ओझा कमेटी जिस का गठन १९८७-८८ में हुआ था, उसने जो रिपोर्ट दी, उसके सुझावों को प्रकाशित किया जाए तथा उसको लागू किया जाए जिससे किसानों को आत्महत्या न करनी पड़े। दूसरा, जब किसान अधिक उत्पादन करे, उसको सरकार संरक्षण देकर बचाए और समस्त उत्पादन जब तक सरकार खरीद न ले तब तक खरीदारी चलती रहनी चाहिए। तीसरा, दस वर्ष पहले भारत सरकार का बैंकों में एक निर्देश गया था कि वह पता करे कि एक बैंक में कौन-कौन से गांव रहेंगे? उन्होंने बैंकों को गांवों से संबंधित किया था। गांव तो बैंकों से संबंधित हो गए लेकिन बैंक के अधिकारियों ने आज तक किसानों की हैसियत के आधार पर उनकी लमिट फिकस नहीं की। किसान की हैसियत के आधार पर उनकी लमिट फिकस होनी चाहिए जिससे किसान को ऋण लेने में कभी दिककत न पड़े। प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए तत्काल फसल बीमा योजना एफैकिटव रूप में लागू की जानी चाहिए। जितनी भी राज्य सरकारों के अन्तर्राज्यीय बैरियर लग रहे हैं, उसके लिए मैं भारत सरकार से अनुरोध करता हूं कि वह सारे स्टेटस से ये बैरियर समाप्त कराए। यह राष्ट्रीय एकता के लिए भी ज़रूरी है और किसान को अपनी उपज एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जाने में जो बाधा हो रही है, उसके लिए भी ज़रूरी है। अगर कोई राज्य सरकार बैरियर समाप्त नहीं करती है तो केन्द्रीय सरकार को उसकी समस्त आर्िथक सहायता बंद कर देनी चाहिए। अभी माननीय मंत्री जी ने बताया था कि उत्तर प्रदेश में किसानों को खांडसारी को वैकयूमपैन क़शिंग की अनुमति दे दी गई है जिससे गन्ना किसानों की रिकवरी भी बढ़ेगी। इससे देश की राष्ट्रीय हानि भी बचेगी, बिजली का उत्पादन भी बढ़ेगा और किसानो को गन्ने का बेहतर दाम भी मिलेगा। उसमें सीमा लगा दी गई कि जो मिल रिज़र्व एरिया से बाहर होगी, उसे ही यह सुविधा मिलेगी। वह गलत है कयोंकि खांडसारी जो रिज़र्व एरिया में चल रही हैं वह आज भी गन्ना क़श कर रही हैं। जब तक सबको वैकयूमपैन अनुमति नहीं मिलेगी, तब तक गन्ना किसानों का भला होने वाला नहीं है। मेरा अनुरोध है कि मिलों को सुचारु रूप से चलाने के लिए सिर्फ इतना ही काफी है कि रिज़र्व एरिया में नयी खांडसारी नहीं चलाएं। किसान का हित इसी बात पर निर्भर है कि मिल भी चले और वैकयूमपैन वधि की खांडसारी भी चले और दोनों में कंपीटीशन हो। आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के कपास से संबधित किसानों के बारे में मेरा अनुरोध है कि एक हाई पावर्ड कमेटी बनाकर उनकी आत्महत्या कराने की जांच करायी जाए। उन्हें पूरी राहत दी जाए और उन पर जो महाजनों का ब्याज है उसे भी समाप्त कराया जाए। दोनों प्रदेश की सरकारों से भारत सरकार आग्रह करे कि जो महाजन लोग रुपया दे रहे हैं उसकी वसूली को समाप्त कर दिया जाए और उनका जो ऐकचुअल पैसा है, सरकार उसका भुगतान कर दे। इन राज्यों में बैंकों से भी किसानों को प्राॆपर लोन नहीं मिला। इन सब बातों का भारत सरकार से समायोजन करने के लिए मैं अनुरोध करता हूं और सदन से भी अनुरोध करता हूं कि अगर आज आपने इस गंभीर चर्चा के माध्यम से भारत के किसान को बचा लिया तो यह देश आर्िथक विकास के पथ पर बढ़ जाएगा। मैं आपको बताना चाहता हूं कि जब तक इस देश का किसान नहीं उठेगा, इस देश का मज़दूर नहीं उठेगा और जब तक दोनों की क़यशकित नहीं बढ़ेगी, बाज़ार का माल भी नहीं बिकेगा, और जब तक व्यापारी, किसान और मज़दूर, तीनों की क़यशकित नहीं बढ़ेगी, तब तक उद्योग का माल भी नहीं बिकेगा। बात साफ है कि भारत कृषि-प्रधान देश है। अगर देश के किसान गरीब हैं तो देश गरीब है। अगर किसान रईस है तो देश रईस है और देश की आर्िथक स्िथति सुधर जाएगी। मैं इन सब बातों का समाधान भारत सरकार से करने का अनुरोध करता हूं और आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया, उसके लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूं।"> श्री बलराम जाखड़ (बीकानेर): माननीय सभापति महोदय, एक बहुत ही अहम समस्या पर हम चर्चा कर रहे हैं और मैं इस बात से थोड़ा सा दुखी हूं कि आज कृषि मंत्री जी यहां नहीं हैं। सोमपाल जी बैठे हैं, मैं उनका आदर करता हूं। उनको जानकारी भी है कि किसान कया होता है। लेकिन यह ऐसा मुद्दा है जो ७४ प्रतिशत जनता से जुड़ा हुआ है इसलिए कृषि मंत्री का यहां होना आवश्यक था। मैं इधर भी देख रहा हूं, उधर भी देख रहा हूं और ऊपर भी देख रहा हूं। किसान की बात जब आती है तो सुनने वाला नहीं मिलता। मैं तो कभी सोचता हूं कि किसी को सज़ा देनी हो तो उसे जेल मत भेजो, उसे किसान बना दो। किसान की बात सुनने वाला कोई नहीं है। इसका दर्द हम ही समझ सकते हैं --- ठजिस तन लागे, सोई तन जाने।" इनसे देखते नहीं बनता! जब कोई बात कहते हैं तो उसको करना चाहिए। जब उन्होंने कहा कि मैं बैठूंगा तो बैठना चाहिए। यह ज़रूरी बात है। हमारे दिल में एक दर्द है, एक कराह है, एक ऐसी चीख है जिसको सुनने की ज़रूरत है। जो कुछ आज इस सदन में होने जा रहा है, जो कुछ आज हम कहने जा रहे हैं, उसे सुनने के लिए कानों की आवश्यकता है, आवश्यकता है उन दिलों की जो उसको महसूस कर सकें। पांच सौ आत्महत्याएं हो जाएं और कोई जूं नहीं रेंगती। ऐसा अनर्गल काम तो मैंने दुनिया में सुना नहीं, देखा नहीं, न कभी हुआ है। चाहे हमारी पार्टी हो या कोई और पार्टी हो। देश हम सबका है। यह देश उन लोगों पर निर्भर करता है जो इसका पेट भरते हैं। दिन-रात हम काम करते हैं, खून-पसीना एक करते हैं। सर्दी और गर्मी को एक सा देखते हैं। सोमपाल जी शायद इस बात को जानते हैं, मैं समझता हूं शायद इन्होंने खेती की हो। यह जरूर जानते हैं कि ठंड कया होती है। मैंने देखी है। जब सर्दी पड़ती है तो बर्फ जम जाती है और खेत में पानी लगाना पड़ता है और जब धूप होती है तो ५० डिग्री टैम्परेचर होता है, पसीना आ जाता है। आज इनमें से कोई भी आदमी मुझे ऐसा बतायें जो खेत में चले, उसका सन-स्ट्रोक हो जायेगा। लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि हम वह दर्द भी महसूस नहीं करते। हम कुछ करते हैं उसका कोई मापदंड नहीं है। आज हम कहने जा रहे हैं, मैंने बहुत कुछ कहा है। मैं कभी इस मसले पर किसी से सहमत नहीं होता हूं। चाहे वह मेरी सरकार हो या आपकी सरकार हो, मैंने हमेशा विरोध की नीति अपनाई है। कयोंकि हमें इसको वाकई करना है। आपने एटम बम विस्फोट कर लिया, ठीक है। दुश्मनों ने कर लिया, दोस्तों ने कर लिया, पड़ोसियों ने कर लिया या किसी ने भी कर लिया ठीक है। यह तो करते रहेंगे। लेकिन यहां जो एक टाइम बम बन रहा है, जो विस्फोट इस धरती पर होने वाला है, अपनी धरती मां पर होने वाला है, उसका हम कया कर रहे हैं। सोचने की बात है कि आप कया करने जा रहे हैं। हम ३३ करोड़ थे, आज ९९ करोड़ हो गये हैं। हमने पालिसी बनाई, हमने लैंड सीलिंग लागू कर दी, जमीन बांट दी, कुछ भी नहीं है। लेकिन अब उसका कया प्रारूप है। अगर यह इसी तरह से बढ़ती रही और इसी तरह से काम चलता रहा तो हम सोचेंगे । एक परिवार में तीन पीढ़ियां आ गईं एक बाप, दो बेटे। दो के तीन या चार या चार के छ: या आठ और वह धरती जिस पर आपने सीलिंग लगाई है, चाहे वह साढ़े १७ एकड़ थी कहीं पर साढ़े १२ एकड़ है। एक परिवार में तीन बच्चे और दो मियां-बीबी। बच्चे बड़े हो गये, जमीन बंट गई और आगे फिर वह बंटती चली गई तो वह एक फुटबाल फील्ड जितनी रह जायेगी और यह टीमिंग मलियंस पैदा हो रहे हैं। जो गांव में अनइम्पलायमेंट है, बेरोजगारी है, पढ़े-लिखे लोग हैं, वे कया करेंगे, कहां जायेंगे? यहां आयेंगे, स्लम्स में रहेंगे, यहां गंद करेंगे, गंदगी में रहेंगे और लोगों के लिए गंद करेंगे और आखिर में एक-दूसरे का गला काटेंगे। यह सोचने की बात है, इसको कोई सोच नहीं रहा है। इसी पार्िलयामेंट में चाहे मैं आपकी कुर्सी पर था या आज यहां हूं, लेकिन मैंने हमेशा इस बात को कहा है कि एक बात सोच लो, अगर इस बात का आज ध्यान नहीं करेंगे तो एक विस्फोट हो जायेगा, विप्लव हो जायेगा, खून की नदियां बहेंगी। इसलिए कि आप इस बारे में सोचते नहीं है। आज बेचारा किसान मर रहा है। पांच सौ किसान मर गये, फिर एक हजार मर जायेंगे, तीन हजार मर जायेंगें। उसके बाद जब वह मरते-मरते देखेंगे तो आपको और हमें भी मारेंगे। कयोंकि आप देखिये ... (व्यवधान)म्ौं जो बात कह रहा हूं उसको"ऊसुनने की जरूरत है। यह सोचने की बात है कि हम कया कर रहे हैं और हमारा भविष्य कया कहता है।
... (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : It is outside and not here. श्री बलराम जाखड़ : आज कया होने जा रहा है। मैं देख रहा हूं, मैं महसूस कर रहा हूं कि जहां जरूरत हैं वहां पीने का पानी नहीं है। पचास साल हो गये हैं। यहां एक दिन पानी नहीं मिलता है तो हड़ताल हो जाती है, घड़े फूट जाते हैं। एक दिन बिजली नहीं आती है तो पसीना आने लगता है।
(Interruptions)I am sorry, I am being interrupted. Please do not interrupt me. मैं अपने दिल से यह बात कह रहा हूं, ये मेरे जज्बात हैं, जो मैं बताना चाहता हूं। मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि प्राइम मनिस्टर कयों नहीं आये।
He should have been here. I demand his presence in the House because it is so volatile issue which has to be heard. It has to be heard throughout the country. Five hundred people have committed suicide and nobody listens to them. The State Governments are sleeping and so is the case with the Central Government here.
SHRI A.C. JOS (MUKUNDAPURAM): Even that side is empty.
SHRI BALRAM JAKHAR : I do not mind whether it is empty or not because I have already seen this. मैंने देख रखा है, १७-१८ साल से मैं देख रहा हूं। जब किसान की बात आती है तो ऐसा ही होता है। सभापति महोदय, मैं सरकार से कहना चाहता हूं कि इस देश में कंसेंसस हो। इस देश के लिए जीना है। इस देश के लिए मैं जीना चाहता हूं। मैं किसान के लिए सब कुछ करने के लिए तैयार हूं। कैसे मरे वे लोग। श्री इन्द्रजीत गुप्त (मिदनापुर): यह बताइए कि वे कैसे मरे? श्री बलराम जाखड़: वही बता रहा हूं। एक तो इतनी कम जमीन उनके पास रह गई है कि उनका गुजारा चलना मुश्िकल हो गया है। दूसरी बात है कि आज एग्रीकल्चर करने के लिए इन्वेस्टमेंट की जरूरत है। ये नाबार्ड, ये कोआपरेटिव, ये छोटी-छोटी संस्थाएं जो बहुत कम पैसा किसान को देती हैं। इनके दिए पैसे से कुछ बनता नहीं है। इन्द्रजीत जी मेरा दिल दहल जाता है। मैंने वहां लाशें देखी हैं। मैं एक टीम लेकर साउथ में गया था। कांग्रेस प्रेसीडेंट ने मुझे चार लोगों की एक टीम के साथ वहां भेजा था। मैं आन्ध्र प्रदेश गया, मैं कर्नाटक गया। मैंने वहां से आकर खुद प्रधान मंत्री जी को जाकर रिपोर्ट प्रस्तुत की और कहा कि प्रधान मंत्री जी जागो। यह स्िथति वहां की हो रही है। प्रधान मंत्री जी ने कहा कि मुझे कुछ मालूम ह। मैं इस बाति को मानता हूं, लेकिन यह स्टेट गवर्नमेंट सोई हुई हैं। मैं भी इस बात को मानता हूं कि यह स्टेट सब्जैकट है, लेकिन कया हम राज्य का विषय कहकर अपने दायित्व से हट जाएंगे। हमें जागना पड़ेगा। हमें उनके साथ कोआर्डीनेशन करना पड़ेगा। उनको डायरैकशन देना पड़ेगा। मुझे मालूम है, किसानों को हायब्रीड सीड ३५ रुपए किलो देने की बात तय हुई थी, लेकिन नहीं मिला। थोड़ा बहुत मिला भी तो वह २०० रुपए किलो मिला और वह भी निकम्मा बीज मिला। और उसके बाद स्पूरियस सीड मिला। उसके लिए ५०० रुपए किलो के दाम किसान को देने पड़े। उससे भी बात नहीं बनी। फिर कया हुआ इन्कलीमेंट वैदर के कारण किसान तबाह हो गया। उसके बाद वह बेचारा इंसैकटीसाइड और पैस्टीसाड वालों के पास गया और उन्होंने भी स्पूरियस कीटनाशक दिए जिससे रही सही कसर और पूरी हो गई और वह पूरी तरह तबाह हो गया। सभापति महोदय, इस देश में एग्रीकल्चरल डिपार्टमेंट सोया हुआ है और एग्रीकल्चरल सर्िवसेस बिलकुल नहीं चल रही है। इसको कोई पूछने वाला नहीं है। पूरी तूअर की फसल बरबाद हो गई। पूरी काटन की फसल बरबाद हो गई। आप को यह जानकर आश्चर्य होगा कि किसानों ने बहुत ऊंची दरों पर पैसा लिया जिसके कारण उनको अपनी जान देनी पड़ी। पंजाब में जब यूननिस्ट गवर्नमेंट हुआ करती थी, तब वहां एक सर छोटू राम मंत्री बनै जिन्होंने किसान की जमीन, मकान और भैंस को कुडक न करने का कानून बनाया। हालांकि इस कानून का बड़ा विरोध हुआ कि यह काला कालून है। वहां पर लोन शार्क या ब्याज पर पैसा देने वाले व्यापारी किसान यदि पैसा नहीं दे पाता था, तो उसकी जमीन कुर्क करा लेते थे, उसका मकान कुर्क करा लेते थे, उसकी भैंस कुर्क करा लेते थे, लेकिन सर छोटू राम ने ऐसा कानून बनाया कि पंजाब में अब किसान की कोई जमीन कुर्क नहीं करा सकता, कोई मकान कुर्क नहीं करा सकता, कोई भैंस कुर्क नहीं करा सकता। सभापति महोदय, जहां तक साउथ की बात है और किसानों द्वारा हत्याएं किए जाने की बात है, वहां ४० से ५० प्रतिशत ब्याज पर किसानों ने पैसा लिया हुआ था। जब८,९,१० और ११ प्रतिशत ब्याज के पैसे को किसान चुका नहीं पाता है, तो फिर ४० और ५० प्रतिशत ब्याज पर लिए पैसे को किसान कैसे चुका सकता है। नाबार्ड और कोआपरेटिव बैंकों से जो किसान को सस्ती दर पर पैसा मिलता है, जिसके लिए उसे कुछ लेना दाना भी पड़ता है, जब वह उस पैसे को ही नहीं चुका पाता, तो फिर इतनी ऊंची ब्याज दर पर लिए गए पैसे को कैसे चुका पाएगा। सभापति महोदय, मैं वारंगल गया था। वहां एक महीने से हड़ताल चल रही थी। वहां नायडू साहब भी आए हुए थे। मैंने उनसे भी बात चीत की थी। वहां सरकारी एजेंसियों द्वारा किसान का माल भी नहीं खरीदा गया था। इसलिए हड़ताल चल रही थी। जो माल खरीदा गया वह भी सस्ती कीमत पर खरीदा गया। काटन का भाव २३००-२४०० रुपए का चल रहा था, लेकिन १६००-१७०० रुपए पर खरीदा गया। आप बताइए किसान आत्म हत्या नहीं करेगा, तो कया करेगा। मैं म्ृातक किसान की बहन और बीवी से मिला हूं। उन्होंने बताया कि दो साल पहले २०० टन गन्ना दिया था। आज तक उसका पेमेंट नहीं हुआ है। इस प्रकार से अनेक किसानों के करोड़ों रुपए चीनी मिलों पर बकाया हैं। इस ओर कोई ध्यान नहीं देता। मनी लैंडर उसके गले में रस्सी डालकर लटकाता है।
14.00 hrs. (Shri Raghuvansh Prasad Singh in the Chair) मैं कहना चाहता हूं कि यह एक शुरुआत है और अच्छी शुरुआत नहीं है। अगर यही चीज रही तो फिर एक नया बवंडर उठेगा, एक नयी चीज फूटेगी और बम विस्फोट होगा। आदमी-आदमी को मारेंगे। यही बात वहां चलती है, यही लफड़ा होता है। मैं वहां देखकर आया हूं। इसका निराकरण कया है? स्टेट गवर्नमैंट को वहां जाना चाहिए था लेकिन वहां कोई नहीं गया। चीफ मनिस्टर साहब एक बार गये। वहां एक आदमी मर गया, दो आदमी मर गये, १० आदमी मर गये-अब तो आप जागो। कया कुम्भकरण की नींद सो गये? कोई पूछने वाला नहीं है। काम खत्म हो गया, जाने की जरूरत नहीं है और अगर गये भी तो एक चककर लगाकर आ गये। खरीद हो गयी काटन-यह प्रॉमिस देकर आये लेकिन उसके बाद किसी ने नहीं पूछा। मैंने नायडू साहब को यही कहा कि आपने तो वायदा किया था। यह तो वह बात है कि वायदा किया जो निभाना कया । ऐसा सिलसिला थोड़ा ही होता है। यहां भी वही है और वहां भी वही है। छोटे मियां सो छोटे मियां, बड़े मियां सुभान अल्लाहा। मेरी समझ में नहीं आता कि कया होगा? कैसे काम चलेगा। मै कहना चाहता हूं कि दिन दहाड़े डाका पड़ रहा है, दिन दहाड़े लूट हो रही है। किसान से ५० परसेंट ब्याज लिया जा रहा है।
You are not taking any action. These are daylight robberies. इनको फांसी लगाओ। मारेटोरियम लगा दिये। अगर आप न्यायप्रिय हो तो आपका जो पैसा है, उस पर १० परसेंट ब्याज ले लो। लेकिन ५० परसेंट ब्याज यह तो चमड़ी उतारने वाली बात है। यही सारा सिलसिला है। मैं इस बात को देखता रहा हूं कि यह सिलसिला कया है और कयों हो रहा है? इसके अलावा कम्पनसैशन की बात है। ठीक है कि फसल मर गयी लेकिन देश को दूसरी फसल की जरूरत है। जो बच्चे बचे हैं उनको खाने-पीने की जरूरत है। उसके लिए उन्हें आप पैरों पर खड़ा करो। मैं जानता हूं कि सारी मदद आप नहीं कर सकते, कोई भी देश हो, सारे का सारा मुआवजा नहीं दे सकता, इस बात को मैं जानता हूं, यह प्रैकिटकल चीज होती है लेकिन उसको पैरों पर खड़े होने के लिए आप जो कुछ दे सकते हैं, वह तो दो जिससे वह नये बीज ला सके, नयी फसल खड़ी कर सके, उतने दिन के लिए खाद ला सके और सारा कुछ कर सके। इसके लिए असेम्बली में धरने हो रहे हैं। वहां कोई पूछने वाला नहीं है। असेम्बली में उन्होंने मेरे सामने बोला कि १४० मौतें हुई हैं लेकिन ३५० के लगभग मौतें हुई हैं। इतनी उस वकत कहते थे लेकिन जिस दिन मैं गया तो उन्होंने १९९ मान ली। आप अंदाजा लगा सकते हैं। यह एक तूफान है जो वहां से उठ रहा है। फिर कया हुआ? मैंने कहा कि उनको पैसे दे दो, जो मरे गए हैं, उनके घर की तरफ देखो कि उनके घर में कोई काम करने वाला बचा है या नहीं। एक जगह मैंने देखा कि तेरह विधवायें मेरे सामने बैठी हैं जिनके छोटे-छोटे बच्चे हैं। मैंने कहा कि उनके पास पांच-पांच, दो-दो, तीन-तीन एकड़ जमीन भी नहीं है, ऊपर से इन्होंने इतना कर्जा ले लिया है, आप उनका कर्जा माफ करिये, उनको सहारा दीजिए और जैसा मैंने कहा कि एक लाख, दो लाख या पांच लाख रुपए दे दो लेकिन वह भी कम है। मैं जानता हूं कि आप ज्यादा नहीं दे सकते लेकिन उनको कुछ तो दो जिससे वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें। यह भी उनके दिमाग में नहीं है। यह सिलसिला कैसे चलेगा? श्री सोमपाल जी, आप ध्यान से देखिये। मैंने प्रधान मंत्री जी से कहा था कि आपका केलेमिटी रिलीफ फंड है, मुझे पता है कि वह बहुत कम है, छोटा है, इसके लिए आपको ज्यादा प्रबन्ध करना पड़ेगा। मैंने वह बात रखी लेकिन वह बात नहीं बनी। १० हजार रुपये की एक इंश्योरेंस स्कीम है, वह खास मायने नहीं रखती। आप इंश्योरेंस कम्प्रहैनसिव बनाइये। किसान जो दे सकते हैं, उनसे प्रीमियम ले लीजिए। कारखाना जलता है तो पैसा मिल जाता है। बैंक से कर्ज ले लेते हैं, राईट ऑफ हो जाता है लेकिन किसान का कौन राइट ऑफ करेगा? यहां तो जो काम नहीं करता उनको आप साढ़े आठ परसेंट बोनस दे देते हैं। देश में जो काम करे, उसको कोई छूट नहीं मिलती। हमारे पंजाब में एक कहावत है कि "नाचन खान नूं बंदरिया और डंडे खान नूं रीछ" यानी नाचने खाने के लिए बंदरिया होती है, जो चना मीठा होता है उसको बंदरिया खाती है--यह कया तमाशा है? हमारे कंधे पर रखकर सबसिडी दी जाती है, हम फसल पैदा करते हैं, पेटेटो बहुत पैदा किया था, अब ज्यादा आलू पैदा करो लेकिन उसे उठाने वाला कोई नहीं, स्टोरेज करने वाला कोई नहीं। किसान मर गया। बहुत दिककत की बात आई तो कहते हैं कि सरकार दे, नेफेड दे। प्याज के बारे में मुझे पता था। मैंने एकसपोर्ट किया था, बहुत बढ़िया काम दिलाया था, इस दफा कुछ नहीं हुआ। हमने खुद पैदा किया। यहां जयपुर के पास वाले बैठे हैं, उनसे आप पूछिये। मजदूरी पूरी नहीं हुई और फिर आपको पता है कि यहां किस तरह प्याज की त्राहि-त्राहि मची हुई है। यह कया है? पोस्ट हारवेस्ट टैकनोलोजी नहीं है, ग्रेडिंग नहीं है, स्टोरेज नहीं है, ट्रांसपोर्टेशन नहीं है, यह कया है? मैंने शुरू किया था, आप इसको जरा संभालिएगा। इसके लिए २४ करोड़ का प्रोवीजन सातवें प्लान में था, उसकी जगह एक हजार करोड़ रुपया मैंने इस बात के लिए रखा था कि कम से कम कोई सिलसिला बने तो सही, स्टोरेज तो बने, कोई प्रोसेसिंग प्लांट तो लगे। आप एग्रो बेस्ड इंडस्ट्रीज जब तक नहीं लगाओगे और प्ृाथ्वी से यह भार नहीं उठाओगे तो आपका यह काम नहीं बनने वाला है, यह आप सुन लीजिए। अमेरिका में १.९ परसेंट आदमी खेती में काम करते हैं, यूरोप में ६ से ७ परसेंट लोग काम करते हैं। जापान में सिर्फ ढाई से तीन परसेंट आदमी खेती में काम करते हैं और हमारे यहां ७० फीसदी आदमी खेती में काम करते हैं। कहां तक यह प्ृाथ्वी आपका बोझ संभालेगी, कहां तक हम इसमें से रोटी निकाल कर खाएंगे। यह सारा सिलसिला समझने वाला है, इसको समझने की कोशिश करो। हमारे पैरीसेबिल प्रोडकट का २५ से ३० फीसदी जाया हो जाता है, जो कि बाहर के, डवलप्ड कण्ट्रीज में सिर्फ डेढ़ या दो परसेंट जाया होता है। पहले जापान में भी इतना ही होता था, मैं वहां गया था, उनका आदमी यहां आया था, उसके साथ हमने काम भी किया, उसके स्टोरेज के लिए, प्रोसेसिंग के लिए, बेचने के लिए एक स्कीम भी बनवाई। किसान को साथ में लगाकर एग्रो बेस्ड कन्सोर्िटयम की बात फिर से बीच में लटक रही है, उसको चलाओ। कृषि विज्ञान केन्द्र चलाने की बात की थी, उसमें लोगों को सिखाओ कि कया करना है, कैसे नये बीज बनाना है, किस तरीके से नये बीज पैदा करके बाहर भेजना है। यह मुकाबला तो लोगों से करना पड़ेगा। हमारे पास आदमी हैं, हमारे पास हाथ हैं। उनके पास आदमी नहीं हैं, उनके पास हाथ नहीं हैं। उनका बनाया हुआ महंगा होगा, हमारा बनाया हुए सस्ता होगा। लेकिन हम उससे बहुत पैसा कमा सकते हैं। इसमें लोगों को सिखाने की जरूरत है। हम उनको नये बीज बनाना कैसे सिखाएंगे? कृषि में आप बात करते हैं, आपके यहां तो शायद बरसात हो जाती है, लेकिन मैं उस इलाके की नुमाइंदगी करता हूं, जहां पानी की बूंद नहीं बरसती, २५-२५ मील तक चले जाओ पानी नहीं मिलता, दरख्त नहीं मिलता, मकान नहीं मिलता। वहां कया है? किस तरह से होगा? होगा, अगर दिल होगा तो जरूर होगा। अगर दिमाग होगा तो जरूर होगा और अगर हमारी इच्छा होगी तो जरूर होगा। इसी पानी से कितनी भूमि सिंचित हो सकती है, लेकिन यह वही करेगा, जिसको खेती करने का पता है। जिसको पता ही नहीं कि चने का बूटा दो फुट का होता है या २० फुट का होता है, वह वहां कया करेगा। सैक़ेटरी बैठ जाते हैं, जिनको कुछ पता नहीं, जो कभी खेत में गये नहीं। एग्रीकल्चर मनिस्टर बैठ गये, जिसका पता नहीं, खेती किस चड़िया का नाम होता है, वह यहां कया करेगा। खेती खस्मां खेती होती है, जिसने खेती हाथ से नहीं की, उसको कोई पता नहीं, किसान कया होता है। यह जरूरी है, आशय समझना जरूरी है कि कया है। आप पानी की बात करते हैं, कहते हैं, कया करोगे। थोड़ी बहुत जमीन जो बाकी बची हुई है, उसके लिए पानी दे सकते हैं। मैंने कृषि मंत्री के तौर पर राजस्थान में इजराइल की टीम भेजी थी, They had developed a plan. वहां पूरा का पूरा बनाकर आये हैं, I handed it over to the State Government. उसी इन्िदरा गांधी कैनाल के पानी से तीन गुना एरिया सिंचित हो सकता है और मैं जो वहां पीलीबंगा के एरिया में देखकर आया हूं, उस एरिया के लिए मैं स्टेट गवर्नमेंट को लिख-लिख कर थक गया, आठ साल से मैं लगातार लिख रहा हूं और देखने की बात यह है कि वह सारी भूमि पानी से भर गई, वाटर लाग्ड हो गई। वहां २० लाख एकड़ के करीब जमीन पानी में दब गई, वहां मकान ढेर हो गये, उनकी छुट्टी हो गई। जो बेचारे कमाने वाले किसान थे, वे बेघरबार हो गये, न उनकी जमीन का मुआवजा है, न उनके घरों के लिए है, न उनको पुन:स्थापित करने की बात है। वहां जमीन ले लेते हैं, अभी यहां बैठे हुए एक भाई कह रहे थे, वे चले गये कि एकवीजीशन के बाद पैसा भी नहीं देते। तुम एकवायर कर लेते हो, हमारी जमीन भी लेते हो, हमको पैसा भी नहीं देते, यह कया तमाशा है? उनको पूरा पट्टा भी नहीं देते, लटकाये रखते हैं। उसके बाद पट्टा दे देते हैं, उसको कहते हैं कि अगले साल फिर पट्टा लाओ, फिर पैसा ले लेते हैं, फिर उसको पट्टा इश्यू कर देते हैं, यह कया तमाशा है, यह कब तक चलेगा? यह खाल हमारी कब तक उतरनी है, हमारी ऊन कब तक उतारते रहोगे, हमें तो इन लोगों ने भेड़ समझ रखा है। यह सारी चीज समझने की जरूरत है। अगर इर्रीगेशन में हम काम करें, अब नर्मदा कैनाल जा रही है, मैं आपसे कहना चाहता हूं, नर्मदा कैनाल राजस्थान में, कच्छ में और सौराष्ट्र में जा रही है। उसमें कुछ एरिया महाराष्ट्र का भी लगा हुआ है, मध्य प्रदेश में भी आयेगा, मैंने राव साहब जब प्रधान मंत्री थे, तब उनसे कहा था, हमारे पटेल जी थे, उनको भी मैंने बोला, उनसे पहले जो कांग्रेस के थे, उनको भी इकट्ठा करके बताया था कि यह आप ऐसा कर रहे हो कि या तो सर्वनाश हो जायेगा, या स्वर्ग बन जायेगा। यह सारी भूमि समुद्र के नजदीक है, इसमें साल्ट है और सब पानी भर जायेगा, इसमें ऊपर नमक आ जायेगा, साल्िटश होगा, फिर न उसमें खेती होगी, न कुछ होगा, नर्मदा नर्मदा रह जायेगी। अगर इसी से स्प्रिंकलर इर्रीगेशन कर देंगे, इसी से ड़िप इर्रीगेशन कर देंगे, जैसे इजरायल वाले करते हैं तो काम बन जायेगा। तो यह ४५ लाख एकड़ के बजाए डेढ़ करोड़ एकड़ में होगा। इससे कितना फायदा हो सकता है, यह देखने की बात है। सिर्फ एक इन्वैस्टमेंट की बात है, एक वकत की बात है और दो साल भी नहीं लगेंगे पूरा पैसा आने में। मैंने मनमोहन सिंह जी से लड़कर यह करवाया था। मैंने कहा कि ड़िप इरीगेशन के लिए, स्प्रिंकलर इरीगेशन के लिए आप सब्िसडी दो। उस वकत ५० प्रतिशत आम किसान के लिए दी गई और ७५ प्रतिशत हरिजनों और बहनों के लिए दी गई। मैंने कहा यह सब्िसडी आप नहीं दे रहे हो, यह किसान तुम्हें दे रहा है। आप एक नहर निकालते हैं, डैम बनाते हैं तो १०० रुपया खर्च करते हो, यहां किसान डबल सिंचाई करके दे रहा है और उसमें आधा वह दे रहा है, आधा तुम दे दोगे तो उस पर कोई एहसान नहीं करोगे। जबकि वह तुम्हारे पर एहसान कर रहा है। इसी तरह से सरकार द्वारा भाव निर्धारित किए जाते हैं। सरकार द्वारा सारा माल खरीदा जाता है और कहा जाता है कि उपभोकताओं के लिए खरीदते हैं इसलिए उनको ठीक मूल्य पर मिलना चाहिए। ठीक है आपकी जेब में पैसा है तो बांटो। लेकिन गरीब किसान के कंधों पर रखकर आप सब्िसडी देना चाहते हैं और कहते हैं कि हम सब्िसडी दे रहे हैं, तो हम कहां दे रहे हैं, वास्तव में वह दे रहा है। आप कारखानों को खाद बनाने के लिए सब्िसडी देते हो, तो उनको कयों नहीं दे सकते। आप मेरे साथ चलकर गांव की हालत देखिए, अगर तीन दिन भी वहां रुक जाएंगे तो नानी याद आ जाएगी। मैंने पहले भी कहा था कि मेरी जमीन ले लो और उसको साफ करके बता दो। इसलिए मेरा कहना यह है कि कुछ करने से बात बनेगी, यह कोई तमाशा नहीं है। आप सिंचाई में बहुत कुछ कर सकते हैं। सिंचाई वालों से मैंने बात की है। अगर सोमपाल जी, आपको भविष्य की बात करनी है, मेरे दिल में जो दर्द है, उसको समझना होगा। मैं आज की बात नहीं कर रहा हूं, किसी पार्टी के लिए या अपने लिए नहीं कह रहा हूं, मैं तो अपने देश के ७५ प्रतिशत किसान के लिए कह रहा हूं। उनकी हालत आप देखिए। वे लोग उजड़ गए हैं, सत्यानाश हो गया है। वही पानी अम्ृात बनकर फसल उगा सकता था। अब भी इस मामले में बहुत कुछ किया जा सकता है। एक जगह लोग एक चैनल में पानी डाल रहे थे और कहते थे कि १६ या १८ डिप्रैशन में डाल दो। मेरे पास सेंट्रल वाटर कमीशन की रिपोर्ट की कापी है। उसमें लिखा है कि अगर आप डिप्रैशन में घग्घर का पानी डालेंगे तो साढ़े चार या पांच साल में सूरतगढ़ शहर डूब जाएगा, और वे उसमें पानी डाल रहे हैं। मैंने कहा कि तुम्हारी समझ को कया हो गया है। मैंने मुख्य मंत्री को पत्र लिखा था। मैंने कहा कि कया कर रहे हो, आप बचाने की बात करते हो या उजाड़ने की बात कर रहे हैं। इसलिए यह सोचने की बात है कि इसको कैसे ठीक किया जा सकता है और कैसे सिंचाई ठीक ढंग से हो सकती है। जहां तक पैसे की बात है आप सोसाइटीज से, नाबार्ड से कहो कि ज्यादा पैसा दें। मैंने अपने समय में यह व्यवस्था की थी कि अनाज सारे देश में ले जाया जाए। कुछ राज्य ऐसे हैं जो बीच में बैठ जाते हैं और कहते हैं कि हम अपने यहां से बाहर नहीं जाने देंगे। जबकि देश का किसान एक है। किसान को भी जीने का अधिकार मिलना चाहिए। अगर एक साइकिल लुधियाना में बनकर कलकत्ता, चैन्नई जा सकती है तो किसान का माल एक जगह से दूसरी जगह कयों नहीं जा सकता। किसान की बात करते हैं तो उसको मना कर देते हैं और उसका माल एक जिले से दूसरे जिले में भी नहीं पहुंचने देते। अगर पूछते हैं तो कहते हैं कि उपभोकता मर जाएगा। कया किसान ने ठेका ले रखा है जिलाने का, कया हमने भार उठा रखा है? हमें भी जीने का अधिकार है। ऐसा नहीं हो सकता कि किसान की आप खाल तक उतार लें। इसलिए आपके पास पैसा है तो सबमें बांटो। जहां तक एफ.सी.आई. की बात है, मैं पिछले दिनों राजस्थान में गया था। वहां मैंने घड़साना मंडी, खाजूबाला मंडी और जाने कितनी मंडियों का दौरा किया। लोग कहते हैं कि एफ.सी.आई. वाले नहीं आते, किसान का माल पड़ा रहता है, कोई उठाने वाला नहीं है। बाकी लोग सस्ते भाव में ले जाते हैं और आगे बेच देते हैं। इसी तरह से सी.सी.आई. माल नहीं खरीदती, उस पर हो यह रहा है कि है कॉटन इम्पोर्ट कर रहे हैं। मेरी समझ में यह बात नहीं आती। अभी हमने १० लाख गांठें बाहर से मंगवाईं, उसकी कया जरूरत थी? जबकि कॉटन का निर्यात होना चाहिए। इसलिए एक सही नीति होनी चाहिए, नीयत साफ होनी चाहिए। यह ठीक है कि आप दुनिया के साथ व्यापार करना चाहते हैं। लेकिन आपके फसल हो तो निर्यात करें और न हो तो उस वकत आयात करने की बात करें। यह न हो कि हमारा किसान मारा जाए। हमने चार मलियन टन गेहूं पहले मंगवा लिया, अब फिर एक मलियन टन मंगवा रहे हैं, जबकि हमारे पास उसे रखने के लिए जगह नहीं है। सदर्न पोर्टस पर जगह नहीं है। जो गेहूं ला रहे हैं उसमें ३६ तरह के अंश मिले हुए हैं, जो घातक भी हो सकते हैं।
They can destroy my agriculture. Who cares for them? I left 37.8 million tonnes in storage. पीसकर उसको खिलाओ। एक दाना भी खेत में मत आने दो लेकिन जब उसकी जगह ही तीस हजार टन की है तो आप उसको कयों ला रहे हैं? आज हमारे पास छ: मलियन टन पहले ही पड़ा हुआ है जब पहले ही हमारे पास छ: मलियन टन है और साढ़े छ: मलियन टन हमारी फसल आ रही है, फिर हमें किसी की जरूरत नहीं है। यह सोचने की बात है। ... (व्यवधान) श्री राजवीर सिंह (आंवला): सभापति महोदय, मैं जाखड़ जी के भाषण से प्रभावित हूं। आप कृषि मंत्री रहे हैं। आपने बहुत कुछ करने की कोशिश की है लेकिन आज जो सारी बातें हुई हैं, उनके लिए आप भर्तसना कर रहे हैं, कया इन सबके लिए आज की सरकार जिम्मेदार है?
... (व्यवधान) श्री विलास मुत्तेमवार : हम सब लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं।
... (व्यवधान) श्री राजवीर सिंह : वह हम सुन रहे हैं। हमारा उनका पुराना रिश्ता है। आपसे ज्यादा पुराना रिश्ता है।
... (व्यवधान) श्री बलराम जाखड़ (बीकानेर): मैंने आपका विरोध नहीं किया। श्री राजवीर सिंह : आप जैसे विद्वान व्यकित आज इतने अच्छे विषय पर बोल रहे हैं। मैं चाहता हूं कि आप साफ-साफ कहिए कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है? पचास साल के अंदर किसान की यह दुर्दशा कयों हो गई? सभापति महोदय : अब उन्हें बोलने दीजिए। श्री बलराम जाखड़ : आप तो किसान को बोलने देना भी नहीं देना चाहते हैं। मैं बोल रहा था कि मेरे एक पूर्व प्रधान मंत्री ने मुझसे कहा कि अरे, भारत के पूर्व कृषि मंत्री सूट पहनकर बैठे हुए हैं- हम कया सूट भी नहीं पहन सकते? हम कया मां के पेट से पैदा नहीं हुए हैं? कया हम पैराशूट से उतरे हैं? मेरा बस चलेगा तो किसान को सूट पहनाकर छोड़ूंगा। यह लड़ाई जारी रहेगी। मैं आपकी बात का विरोध नहीं करता। मैं आपकी बात से सहमत हूं। मैं किसी बात की परवाह नहीं करता।"> कृषि मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री सोमपाल): सभापति महोदय, जाखड़ जी भारत के जानेमाने और बहुत ही प्रगतिशील किसान होने के साथ-साथ देश के लम्बे समय तक कृषि मंत्री भी रहे हैं। इनकी इस विषय के ऊपर बहुत पकड़ है, इसमें संदेह नहीं है, यह बिल्कुल नर्िववाद है। मैं यह भी जानता हूं कि जब वह किसान की बात करते हैं तो भावुक हो जाते हैं। आप भारत सरकार में कृषि मंत्री रहे हैं। इस महान सदन के दस वर्ष तक अध्यक्ष भी रहे हैं। बहुत कम लोग ऐसे रहे होंगे। किसान के विषय में आपकी जानकारी और दर्द भी सर्ववदित है। आप जिम्मेदारी के पद पर रहे हैं और आपकी सीमाएं रही हैं। राजवीर सिंह जी का कहना अनुचित नहीं है। मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं, मैं उसमें ज्यादा जाना नहीं चाहता कयोंकि दलगत भाव से ऊपर उठकर इस बहस के चलने की बात माननीय अध्यक्ष महोदय ने स्वयं अपने मुखारविन्द से अपने प्राथमिक वकतव्य में कही है। मैं आपसे इतना ही निवेदन करना चाहता हूं कि इसे भावुकत पूर्ण शब्दों में व्यकत करने की बजाए आप कुछ कारगर सुझाव दीजिए, हम नश्िचत तौर पर उन पर विचार करेंगे। श्री बलराम जाखड़ : मैंने तो कोई पार्टी की बात नहीं की है। मैंने अपने को भी नहीं बख्शा। मैं किसी को नहीं बख्श रहा हूं। जो मैंने बातें कही हैं, वे सुझाव ही दिए हैं। जो खुला करने की बात कही है, वह भी सुझाव है। जो एकसपोर्ट करने की बात कही है, वह भी सुझाव है। जो आपको एग्रो-बेस्ड-हार्वेस्ट-टैकनॉलोजी का सुझाव दिया है कि हम उसको स्टोरेज करें, प्रोसेस करें, डिब्बाबंद करके भेजें। बीज उगाने की बात कही है, ये सब सुझाव ही हैं। मैं बिल्कुल अनर्गल बात नहीं करूंगा। मैं इस पक्ष में और उस पक्ष में नहीं जा रहा हूं। मेरी वाणी ने कभी फर्क नहीं किया। मैं हमेशा सच कहता आ रहा हूं और जब तक मुझमें आत्मविश्वास है, मैं सच कहता रहूंगा॥ प्रो. प्रेम सिंह चन्दूमाजरा (पटियाला) : आप ऐसा कहिए कि हम इन सब बातों की अपेक्षा करते हैं।
... (व्यवधान) श्री बलराम जाखड़ : यहीं नहीं, आप देखिए कि हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में कपास की फसल भी तबाह हो गई। पिछले साल तो सत्यानाश हो गया। मैं आपसे कहना चाहता हूं, आप इस बारे में पता कर सकते हैं। आप माननीय सदस्य सदन से उठकर जाइए मत, बैठिए। मैं कहना चाहता हूं, मुकतसर, मलोट और फरीदकोट के सारे क्षेत्र में वाटरलोग की समस्या पैदा हो गई है। इसका कारण मिसमैनेजमेंट है और हमारी छोटी विचारधारा है। हम पानी में डूब जायें, लेकिन पानी नहीं देना चाहते हैं। मैं कहना चाहता हूं कि बांट कर खाना चाहिए और इसी से तरककी होगी। इसके साथ-साथ ड़नेज का भी बन्दोबस्त करना होगा। हमें यह भी देखना होगा कि कितना पानी आता है और कितना पानी भूमि ले सकती है। जहां तक यूनिवर्िसटीज का सवाल है, हमें देखना चाहिए कि इनको कितना पैसा दिया गया है और इससे किसानों को कितना लाभ हुआ है। हमने कृषि विज्ञान केन्द्रों की स्थापना अपनी आवश्यकता के अनुसार की थी। मेरे विचार से इसको सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार को कदम उठाने चाहिए। हमारी सरकार ने इसकी बुनियाद रखी थी और आप यह देखें कि किस प्रकार ये चलाए जा सकते हैं।
This is just a constructive suggestion. I am not criticising anybody. I am just pouring out the pains in my heart which I feel it. हमारे किसान ५०-५१ डिग्री तापमान में खेतों में काम करते हैं। मैं अभी एक गांव में गया था, वहां मुझे एक बूढ़ी मां मिलीं, जिनकी उम्र ९० साल की थी, और कहने लगीं कि बेटा हमें तो पीने का पानी मिल जाए। यह हालत वहां हैं। मैं यह बात आप से कहना चाहता हूं, सिंचाई मंत्री जी से कहना चाहता हूं। इसके साथ ही यदि समस्या का निदान लिफट इर्िरगेशन से हो सकता है, तो उसको करना चाहिए। एक झगड़ा यह भी हो रहा है कि हम इर्िरगेशन पोटेंशियलिटी कम करना चाहते हैं। इसके बारे में हमें सोचना पड़ेगा। मेरे विचार से इसका दूसरा निराकरण है और वह यह है कि इसको हम सार्थक तरीके से चलायें, तभी हम विकास कर सकेंगे। जहां तक ड़िप इर्िरगेशन की बात है, मैं आपको एक उदाहरण देना चाहता हूं। मैसूर के पास एक गांव में एक आदमी के पास १२ एकड़ जमीन थी। मुझे उस व्यकित ने दिखाया कि वह तीन एकड़ में गन्ना पैदा करता है और दो पम्पस काम करते हैं। वह कोशिश करता है कि पांच घन्टे पम्प चला कर १२ एकड़ में गन्ना पैदा करे। उसने किया, तो १५० फीसदी प्रोडकशन हुआ। प्रश्न यह है कि यह कैसे होता है और किस हिसाब से काम होता है, इस बारे में सोचने की जरूरत है। इसके साथ ही मैं कहना चाहता हूं कि को-आपरेटिव्स को मजबूत करें। इस बारे में कानून लायें। इस बारे में मैंने कोशिश की थी, लेकिन यह मामला बीच में लटका हुआ है। एक शेर है - "बहुत शोर सुनते थे, पहलू में दिल का। जो चीरा, तो कतरा-ए-खून न निकला।"

... (व्यवधान) श्री सोमपाल: महोदय, मैं कहना चाहता हूं, माननीय सदस्य यहां नहीं थे, तो उनके सहयोग के बिना को-अपरेशन कैसे होता। श्री बलराम जाखड़ : महोदय, सीधी बात है कि काम कैसे करना है, यह सोचने की जरूरत है। मैं अपने समय में एक एग्रीकल्चरल पालिसी दी थी। उसमें कमियां हो सकती है, मैं कोई साइंस-दां नहीं हूं कि मुझ से गलती नहीं हो सकती है।

I am not all wise. मैं चाहता हूं कि उसमें सुधार करके लागू करें। हमारा कोई सहयोग आप लेना चाहते हैं, तो हम देने के लिए तैयार हैं। आपको ऐसे लोगों को अपने पैरों पर खड़ा करने की कोशिश करनी चाहिए। आपको यह देखना चाहिए कि उनका विकास आप किस तरह से करते हैं। मैं यह भी कहना चाहता हूं, किसानों को उनके उत्पादन का उचित भाव देना चाहिए। मैं एक बात और कहना चाहता हूं। अभी जो गेहूं देश के अन्दर आई है, उसको पीस कर दें, बीज मत दीजिएगा। हमारे पास स्टोरेज की व्यवस्था नहीं है। जो गेहू आप लेने जा रहे हैं, वह आपको ९०० रूपए तक पड़ेगा, लेकिन हम तो आपको ५१० में दी देने जा रहे हैं, कयोंकि हम रख नहीं सकते हैं। मजबूरी का नाम कोई दूसरा नहीं है - हमारे पास पैसा नहीं होता है। किसान की जब फसल पैदा होती है, तो उसको वह फसल मंडी में लानी ही होती है। जब मंडी में लाना पड़ता है। जब वह आपके भाव पर नहीं बिकती है, जब आपको खरीदनी नहीं होती है तो वह ४००-४५० रूपए रेट पर बेचने पर मजबूर हो जाता है। अगर उसके पास पैसा होता या आप बैंक से दे देते तो वह भी उसको घर रख लेता, छह महीने बाद आपको दे देता तो उसको भी ७००-८०० रुपए मिल जाते। लेकिन आप किसान को देना नहीं चाहते, यहां काम करने वाले को दे देंगे लेकिन किसान की खाल उतारने में होशियार हैं। जिनको लिखना होता है वे लिखते नहीं, उनकी मर्जी है। जब किसान की बात होती है तो सिर्फ दो लाइन में बात हो जाती है। चलो, आपकी इच्छा है, हम तो पिटने के लिए पैदा हुए हैं, पिटते रहे हैं और पिटते रहेंगे। जब तक आवाज नहीं आएगी तब तक नहीं उठेंगे। महोदय, इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपका ज्यादा समय न लेते हुए इतना ही कहता हूं कि- "करिए सहायता, देखिए उनके दुख, उनके आंसू पोंछने की कोशिश करिए, हम आपके साथ हैं।" अगर अच्छा काम करोगे तो आपकी प्रशंसा होगी।

">SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN (CHIRAYINKIL): Mr. Chairman, Sir, first of all, I must thank you for giving me this opportunity to speak on the prevailing conditions of farmers in Southern States and specially in Kerala. Now it may be stated that suicide as such has not been committed in Kerala. As we all know, Kerala is a State which is producing commercial crops such as rubber, copra which is a coconut produce, pepper, arecanut, cardamom etc. Now we do admit that our State is also deficit in foodgrains. Now I must inform the Government about the wretched conditions being faced by the farmers of Kerala. I wish to deal with each crop with their specific issues.
First of all, let me deal with the wretched conditions of coconut growers in Kerala. There are about 30 lakhs of coconut growers in Kerala. Kerala is the first State to have implemented the Land Reforms Act. Most of the farmers are small holders. That is why, I told you at the outset that there are about 25 or 26 lakhs of small growers of coconut in Kerala. Their condition is very very pitiable. The State Government has taken some steps. But that alone will not solve the problem. Now the main question is that they are not getting remunerative prices. I may be permitted to bring out certain statistics regarding the price fluctuations.
Copra or coconut, as such, is not having a stable market. It is varied from time to time due to many reasons. I am not going to deal with all those reasons. First of all, you must know that the word `Kerala' is derived from the word `coconut'. Kera is a word meant for coconut crop. The State itself is named after coconut crop. Our land is a land of coconut farms. If you travel State of Kerala from South to North on the coastal areas, you will see lakhs and lakhs of coconut farms stretching all over the State.
People are living within that small area. The farmers are having only one acre or two acres but not more than three acres. As I have already mentioned, their number may come about to 25 lakh. Their main source of income is derived from selling the coconut tree once in very 50 days. That is the position of coconut in Kerala.
The economy of the State will be adversely affected if there is price fluctuation in coconut. Now, the price fluctuation has become the order of the day. The coconut farmers have been put to hardships. The prices of coconut, copra and coconut oil are always on the decline. Recently, due to the Exim Policy of the Central Government, the price of coconut has come down which is alarming. The price of copra declined from Rs. 4,434 per quintal to Rs. 2,650 per quintal. You see the decline. Approximately, from Rs. 4,500, it has come down to Rs. 2,500 per quintal. So, there is a decline of about Rs. 2,000 within a span of two or three months. After the declaration of the Exim policy by Shri Ramakrishna Hegde, our hon. Minister of Commerce, the prices have come down.
Now, these are the lean months where production is low. But unfortunately, we are not getting the remunerative prices even in this lean period where production is at a low level. The prices which I quoted earlier are only on record. In actual, the poor farmer will not get this price. For him, it will be far below the prices which are published. So, the condition of the coconut farmer is much worse when he is experiencing with the selling of his products. This is the position of Kerala.
Now, the State Government and the coconut farmers of Kerala are demanding a Minimum Support Price per quintal of copra. The price, now they demand, is Rs. 4,160 per quintal. Without a support price or without a Minimum Standard Price fixed, it will not be possible for the coconut farmers of Kerala to survive in the present condition. These poor farmers are sending their children for education with the income which they derive by selling coconut. Now, their condition is very very deplorable, as a matter of fact. Under the Exim policy declared by the Government of India in 1997-98, coconut and copra are now being imported. About coconut, previously, there were some restrictions. Now, all those restrictions have been removed. So, copra and coconut can be freely imported in India without any condition. And, this has adversely affected the home market. Without curtaining the important, the coconut farmers of Kerala can never survive.
Further, there is another difficulty also. The import duty of vegetable oil has been reduced from 65 per cent during 1994 to 30 per cent during 1995.
That also will show that the living condition of coconut growing farmers has come down to a considerable extent. Again it was reduced to 20 per cent in 1966. These measures have a depressing effect on the prices of coconut oil and copra. This is another problem.
Further, import of palm oil has been permitted under Open General Licence as a result of which coconut oil is facing serious competition in the domestic market. It is reported that nearly 1.3 lakh tonnes of palm oil has been imported into the country during 1997. It is used largely for mixing with coconut and other edible oils. The imported palm oil is mixed with the domestic coconut oil and sold in the market at reduced prices. Further, coconut oil and copra imported from Philippines and Sri Lanka are understood to be of poor quality when compared to the coconut oil of Kerala which is available in the market. Some of them are fungus infected and they will be hazardous for health also. So, it is dangerous to use the imported coconut oil from Philippines and Sri Lanka. It will not be of better quality when you compare it with the quality of coconut oil produced in Kerala. We have been telling the Government of India all these things for quite some time. There were Dharnas and there were Memoranda submitted by the Kerala Government as well as the coconut growing farmers of Kerala. But nothing has materialised, nothing has been done so far to better the conditions of the coconut growers of Kerala.
So, we suggest at least three measures for making remunerative prices available to coconut farmers in Kerala. Firstly, the minimum support price for copra should be adequately raised to make it remunerative and the same may be announced without any further delay. The Central Government should take a decision to declare that there is a minimum support price for copra. Without this the condition of the coconut growers in Kerala will never improve. But they do not believe in committing suicide. Committing suicide is no solution to the problem. Our people are educated and the State is totally educated. So, they will not think of committing suicide to solve this problem. But still they are suffering. So, the first thing the Government of India will have to do is to declare a minimum support price for coconut. I would suggest that the minimum support price for coconut should be fixed at Rs.4150 per quintal. We have worked it out, the Kerala Government has worked it out and the farmers of Kerala have also worked it out. So, the reasonable minimum price that can be fixed in the existing condition will be Rs.4150 per quintal.
The second aspect of the question is to ban import of coconut oil and palm oil. I would assure the hon. Minister that Kerala will produce the required quantum of coconut oil for the home market consumption. Why should you import coconut oil from Philippines and Sri Lanka which is of no use and dangerous for health also? So, the second request is to ban the import of coconut oil from abroad.
Thirdly, the Government should reduce the import duty on certain oils and the status quo should be maintained. For that purpose, increase the import duty on vegetable oil from the present twenty per cent to sixty-five per cent as a precautionary measure for home-produced coconut oil. The Government of India, going by the Exim policy, has reduced it to twenty per cent. I would request the Government of India to increase it to fifty per cent which was there before. Without this, the coconut growers of Kerala cannot survive.
Finally, ban the import of coconut products like the coconut cream, coconut milk powder etc. These are some of the products that are being imported. But we can tell the Government that Kerala can produce the best coconut cream available anywhere in the world. And certainly Kerala farmers are producing the most delicious coconut milk powder in the world. So, when the conditions are such, why should you import coconut cream and coconut milk powder from abroad? They are doing it for ages. Even the land is named after the coconut farms. This is the first crop for remunerative prices so far as the State of Kerala is concerned.
Now, I will come to the issue of rubber. The only rubber producing State in India is Kerala. Ninety per cent of the natural rubber is produced in Kerala. The economy of the State, to a considerable extent, depends on the price of this produce. Rubber is also on the same footing as that of coconut. The price has declined from Rs. 58 in May, 1995 to Rs. 49 in May, 1996 per kg. It further declined to Rs. 39 in May, 1997. Please see the gradual decline. Every year it is declining. Now, the price has gone down to Rs. 25 per kg. I would like to ask the hon. Minister whether the rubber growers of Kerala should commit suicide. What is the way out? A produce which was getting Rs.58 a few years ago is getting only Rs. 25 per kg. now. This is the wretched condition of the rubber growers of Kerala. This is the only State which produces rubber. This State enjoys the monopoly. We have staged dharnas also. What is the present condition? The rubber producers are not big land owners. Some people are owning five acres; some people have three acres, two acres etc. They are all small land holders. They are adversely affected. There is no other go for rubber growers of Kerala. Their condition is so wretched that they find it difficult to live in this world. I would like to know whether the hon. Minister is asking them to commit suicide en masse. Would it solve the problem? They are not getting the remunerative prices. This is the lean month. So, naturally the price of rubber should increase at this stage. But this year that did not take place. The prices are declining day by day.
What are the reasons for this wretched condition? What are the reasons for this decline? I will deal with those reasons now.
Firstly, the import of natural rubber has worsened the situation. Natural rubber which is being imported is of a poor quality. It is not on a par with the rubber produced in Kerala. Unfortunately, to help the tyre manufacturers, the Government has removed all the restrictions on import of rubber and rubber is now imported freely in India. This is one of the major reasons for the decline in rubber prices.
Moreover, under the new Exim policy, the reduction of import duty on rubber from 25 per cent to 20 per cent has adversely affected the domestic prices. Again, the duty-free import of polythene which is used for the manufacture of synthetic rubber has adversely affected the rubber growers of Kerala.
Lastly, the Government has allowed the import of tyre from abroad.
PROF. P.J. KURIEN (MAVELIKARA): This is done only to help big industries. That is the point.
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN : Yes. It is to finish the farmers! So, the Government of India may be requested to take the following measures to save the condition of rubber growers. Firstly, they have to ban the import of natural rubber. श्री राजवीर सिंह : सभापति महोदय कया हमको भी बाद में इतना ही समय मिलेगा? सबको इतना ही समय मिलना चाहिए। कृपया इस बात को आप कहीं लिख दीजिए। सभापति महोदय : श्री राधा कृष्णन आपका समय हो गया। कृपया अब समाप्त करें। श्री राजवीर सिंह: सभापति महोदय, समय की कुछ तो मर्यादा रहनी चाहिए।
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN : Yes. I am concluding.
The first condition is that there has to be a ban on import of rubber. Natural rubber should not be imported. I can assure that Kerala is capable of producing the rubber which is required for home consumption. When we are producing required quantity for home consumption, why should they import it? They have to ameliorate the conditions of the growers.
Secondly, they have to declare that Rs.55 per kg. would be the minimum price for rubber. There must be a minimum support price of Rs.55 per kg. Firstly, they have to do this. Moreover, they have to immediately start procuring 5,000 tonnes of natural rubber through the State Trading Corporation. That is a major demand that is being made. At the same time, I must tell the Government that procuring rubber through the STC and again delivering it in the local market will harm them and there will be no benefit to the rubber growers. So, the Government of India should make an attempt to export rubber. We will produce the best quality rubber in the world. If the Government makes an earnest attempt, it can be done. सभापति महोदय : अब समाप्त किया जाए। अब बहुत अधिक हो गया है। आप समाप्त कर दें।
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN : I am concluding, Sir. I am coming to that. I will stop now.
So, I say that arrangements may kindly be made for the export of rubber, if possible. The Government of Kerala is also making some attempts to export 5,000 tonnes of rubber through some other agencies. Export of rubber produced in India can be done by the Government of India also. सभापति महोदय : अब आप समाप्त कर दें। आपका समय समाप्त हो गया है। कृपया आसन ग्रहण करें। जब कोई दूसरा ऐसा विषय आए, तब आप फिर बोल लें। अब तो आपका समय समाप्त हो गया। कृपया समाप्त करें।
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN : Yes. I am concluding. I will make only one or two sentences more. सभापति महोदय :आपका एक मिनट बचा है। अब आप समाप्त करिये।
... (व्यवधान)
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN : Mr. Chairman, I am concluding. Please allow me to conclude...(interruptions) PROF. P.J. KURIEN : Sir, he himself had been the Speaker of the Kerala Assembly. So, you may give him one more minute.
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN : I was the Speaker in Kerala Assembly for about five years. I know to control the House. सभापति महोदय : जब आप स्पीकर थे तो आप लमिटेड लोगों को बोलने की छूट दे देते थे?
SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN : I had been in the same Chair and I have got experience in these matters. So, let me conclude now.
There are other crops like pepper and areca nut solely grown in Kerala. All these agricultural produce require remunerative prices. Areca nut growers who are in tens of thousands are put to starvation. Then, you may also take the case of pepper growers of Kerala. They do not get a steady market. They could not sell their products on a remunerative basis. So, all pepper growers of Kerala are put to starvation. ... ( व्यवधान)
Almost all the farmers of Kerala are put to starvation. So, immediate remedial measures shall have to be taken to save the farmers from the wretched conditions in Kerala.
I thank you for having given me this opportunity to speak.
DR. T. SUBBARAMI REDDY (VISAKHAPATNAM): Sir, I just want to know one thing. There are a number of Members who would like to speak on this very important subject. If you fix the time specifically, then all of us may get a chance to speak or if you extend it for tomorrow, there will be no problem. You may please decide accordingly. अब आपको डिसीजन लेना है। सभापति महोदय : माननीय सदस्यों से आग्रह है कि आप अपना वकतव्य संक्षिप्त दें। हम जानते हैं कि कम समय में ज्यादा अच्छा भाषण होता है और ज्यादा लम्बा भाषण नीरस हो जाता है। किसानों ने आत्महत्या की, यह संवेदनशील मामला है। किसान इस देश का महत्वपूर्ण वर्ग है इसलिए उनके विषय में जो बहस हो, वह ज्यादा गंभीर हो। इस विषय पर सभी सदस्य समय लेना चाहेंगे। डा. टी. सुब्बारामी रेड्डी :सभापति महोदय,मैं इसे कल के लिए एकसटैंड करने की रिकवैस्ट कर रहा हूं। सभापति महोदय : अभी तो काफी समय है, देखा जायेगा।
PROF. P.J. KURIEN : This is such an important subject that every Member would like to speak. Our party has given nine names and we think that all of them would speak. So, if necessary, you may extend the time of the discussion so that all Members would get an opportunity to speak. This is my request. सभापति महोदय : माननीय सदस्यों की भावनाओं की कद्र की जाये।"> ">*m0">5"> श्री मधुकर सरपोतदार :सभापति महोदय, श्री विलास मुत्तेमवार और श्री अमर पाल सिंह, दोनों ने एक बहुत महत्वपूर्ण विषय पर आज यहां चर्चा शुरू की है। मुझे यह बताने में बहुत खुशी है कि इस सदन में इस विषय पर खास जानकारी रखने वाले लोग मौजूद हैं और जिनको इंटरैस्ट नहीं है, वे शायद सदन के बाहर बैठे होंगे। हमें इससे कोई शिकायत नहीं है। जब यहां कभी भी किसानों की बात की जाती है, मैंने पिछलो दो सालों में यह देखा कि यहां बहुत कम तादाद में लोग मौजूद होते हैं। यदि कोई राजनीति का सवाल आता है तो बहुत बड़ी तादाद में लोग मौजूद होते हैं और उसमें हिस्सा भी लेते हैं। अभी विलास मुत्तेमवार जी, जिन्होंने यह चर्चा शुरू की, यहां मौजूद नहीं हैं। अन्य कुछ काम से या खाना खाने के लिए गये होंगे कयोंकि आज लंच टाइम नहीं हुआ। उन्होंने जो बातें उठायी, उससे मुझे कोई शिकायत नहीं है लेकिन सभापति महोदय ने कहा था जब यह चर्चा शुरू हो जायेगी तो आप पार्टी लेवल से ऊपर उठकर इस चर्चा में शामिल हों। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि बात करते-करते उन्होंने पार्टी लेवल छोड़ दिया। पर खुलेआम पांच लाख रुपया हर खेती करने वाले को दे दो ताकि वह आगे जाकर खुदकुशी नहीं करे। लेकिन खुदकुशी कौन करने वाला है, उसके बारे में पहले पता कैसे लगेगा? यह पता तो खुदकुशी होने के बाद लगता है, तब तक उसकी हालत कया होगी, उसकी जानकारी जो स्वयं खेती करने वाला किसान है, कोई पार्टी जो उनके ऊपर हो तो पार्टी में या अन्य किसी जिम्मेदारी व्यकित हो, उनको जाकर बोलना चाहिए कि हमारे घर की हालत यह है। यदि हममें इसमें कुछ राहत नहीं मिलेगी तो हमें तो कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा, हमें सिर्फ खुदकुशी ही करनी होगी। किसी ने मेरे हिसाब से यह जानकारी नहीं निकाली थी। हमारे पक्ष की तरफ से हम लोगों ने जो महाराष्ट्र के अन्दर जो जानकारी निकाली थी, उसमें हमें इस बात का पता लगा ... (व्यवधान)आप जा रहे हैं।
14.57 hrs. (Shri V. Sathiamoorthy in the Chair) आप कम से कम यहां तो बैठेंगे। आप इससे पहले फूड एवं सविल सप्लाई मनिस्टर थे और आपके साथ मेरी बात हो चुकी है। आप यहां बैठेंगे तो मुझे उसका सन्दर्भ लेने के लिए बहुत आसानी हो जाती, बहुत अच्छी बात है। हम लोगों ने जो जानकारी ली, उसमें मुझे यह पता लगा कि कितने व्यकित उनमें से खुदकुशी करके मर गये। अभी कहा गया कि ५२ व्यकितयों ने वहां पर खुदकुशी कर ली। हम लोगों ने जब इसकी तलाश की कि उसकी वजह कया है तो पता चला कि १४ लोगों ने खुदकुशी जरूर की। अन्य जिन लोगों ने खुदकुशी की, उसकी वजह अलग थी। उनके बारे में मैंने जानकारी एकत्रित की है ... (व्यवधान) श्री राजेश पायलट (दौसा) : १४ ने किसलिए आत्महत्या की? श्री मधुकर सरपोतदार : जो महाजन को समय पर पैसा देना चाहिए था, वह नहीं दे पाये और खेती में बहुत नुकसान हो गया। उनको घर में रहना मुश्िकल हो गया, इसलिए उन्होंने अपने परिवार के सामने आज का दिन गुजर गया, कल का दिन कैसे गुजारेंगे, यह जो जिम्मेदारी हरेक किसान की होती है, जो परिवार के प्रमुख होते हैं, उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं रहता तो वे हैल्पलैस हो जाते हैं, और आखिर खुदकुशी कर लेते हैं ।
In short, this is the analysis of that suicide and nothing else. अभी वहां पर हमने जो राहत देने का फैसला किया है, उसमें यह है कि पहले गवर्नमेंट के जो नॉर्मस थे, वे नोर्मस ऐसे थे ... (व्यवधान) श्री नरेश पुगलीया : बाकी लोगों ने नहीं बताया कि बाकी लोगों ने कैसे खुदकुशी की? श्री मधुकर सरपोतदार : हमने जो एनेलेसिस किया है क श्री नरेश पुगलीया : महाराष्ट्र गवर्नमेंट ने ५२ लोगों का जो एनेलेसिस बताया है कि शराब पीकर उन्होंने आत्महत्या की या अन्य कोई वजह है तो वजह देने में किसानों के बारे में गलत चीज बताई गई है। एक तरफ तो हमारे किसान आत्महत्या कर रहे हैं और उनके बारे में आप कह रहे हैं कि १४ लोगों ने आत्महत्या की।
... (व्यवधान) श्री मधुकर सरपोतदार : मैंने जो बात कही, हमने पार्टी के पक्ष की तरफ से जो जानकारी ली, मैं उसकी बात कर रहा हूं। मैं गवर्नमेंट की तरफ से बात नहीं कर रहा हूं, यह पहली बात है। श्री नरेश पुगलीया : नहीं, मुंबई में रहने वालों को इसकी कम जानकारी रहती है। हम लोग ग्रामीण एरियाज़ से आते हैं, इसलिए कम से कम जो किसान आत्महत्या कर चुके हैं, उनके विषय में सहानुभूति रखिये, गलत तो मत बताइये। श्री मधुकर सरपोतदार : एक बात तो मैंने पहले कह दी कि खुदकुशी करना समस्या का कोई समाधान नहीं है। जैसा अभी माननीय राधाकृष्णन जी ने कहा था कि किसी भी समस्या का यह समाधान नहीं हो सकता कि खुदकुशी करो।
15.00 hrs. यह समस्या का अन्त नहीं है।
This would further accentuate the problem. यह कभी नहीं भूलना चाहिए।
Whenever we discuss any issue in such an august House we must put the things in a proper perspective. We must examine the entire issue and thereafter we should express our opinion. We have to take into account the steps that need to be initiated in order that such suicide cases do not recur. श्री नरेश पुगलीया : माननीय सदस्य, हम राष्ट्रीय स्तर पर संसद में बोल रहे हैं। हमारी स्टेट के बारे में गलत पिकचर नहीं जानी चाहिए न देश के सामने और न ही आदरणीय कृषि मंत्री के सामने। श्री मधुकर सरपोतदार : मेरे पास भी जानकारी है, वही मैं आपको बता रहा हूं। आपको जितनी जानकारी अपने स्टेट की है, मेरे पास भी है, मैं उसी राज्य से आया हूं। श्री नरेश पुगलीया : जानकारी होती तो आप ऐसे नहीं बोलते। श्री मधुकर सरपोतदार : मैं भी वहां का सासंद हूं। मैं भी वहां के किसानों और खेती की बात कर रहा हूं।
MR. CHAIRMAN : Shri Sirpotdar, please address the Chair. You need not yield to other Members. श्री मधुकर सरपोतदार : मैं भी किसान का बेटा हूं। मैंने भी खेती देखी है, किसान की हालत कया है, मैं जानता हूं। ऐसा नहीं है कि मैंने अनुभव नहीं किया। हम मुम्बई में रहते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है खेत से, देहात से हमारा सम्बन्ध नहीं है। ऐसा मानना गलत है। जो मुम्बई शहर में आया है वह देहात से ही आया है। उसने जन्म देहात में लिया है, बाद में मुम्बई में आया है। बहुत सारे लोग जो उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और अन्य जगहों से मुम्बई व्यवसाय या नौकरी करने के लिए आए हैं, पहले वे देहात में ही थे। इसका मतलब यह नहीं है कि देहात से हमारा नाता टूट गया है। श्री नरेश पुगलीया : आप मुम्बई में कयों रहते हैं, यह हमारा कहना नहीं है। श्री मधुकर सरपोतदार : मैं कोई गलत मैसेज नहीं देना चाहता। जो आत्महत्याएं हुई हैं, भविष्य में न हों, उसका रास्ता निकालना चाहिए।
We should try and find out some preventive measures. That is very much necessary. मैं प्रिंएटिव एकशन की बात कर रहा हूं, अन्य बात नहीं कर रहा हूं। आखिर हाउस की जिम्मेदारी बनती है।
What steps should be taken to avoid these suicide cases is very important. जो हो गया, वह हो गया, उसका कुछ नहीं कर सकते। पूरे देश में ५०० आत्महत्याएं हुईं हैं। उसको अवायड कैसे किया जाए, इसके लिए सुझाव दे सकता हूं। जो हो गया, मौतें हो गईं, उसका इलाज तो डाकटर आने के बाद नहीं हो सकता, उसका कोई फायदा नहीं है। किसी भी आदमी की कीमत कम नहीं है। एक लाख रूपये या पांच लाख रुपये देकर उसकी वेल्यू हम लोग अदा नहीं करना चाहते। यह तो राहत देने की कोशिश है। कहीं कोई दंगा-फसाद होता है, जैसे हमारे यहां भी हुआ तो हमारे महाराष्ट्र शासन ने एक-एक लाख रुपया दिया, उस परिवार को राहत मिली, लेकिन भविष्य में ऐसा न हो, यह हमें देखना चाहिए। उसके लिए हम कया कर सकते हैं, यह मैं कहना चाहता हूं।
That is very important. We should discuss it and we should find out some remedy for this. I look at it from that angle. मेरे देखने का जो तरीका है, वह आप समझें, यही मैं आपसे अनुरोध करना चाहता हूं। आप अपने विचार इस सदन में रख सकते हैं, आप अपने सुझाव दे सकते हैं, कोई रोकने वाला नहीं है। हम सब लोग यहां चुनकर आए हैं। सभी लोग अपने-अपने क्षेत्र से चुनकर आए हैं। लोगों ने हमें चुनकर भेजा है, कुछ तो वजह रही होगी। इसलिए मुझे अपनी बात कहने दीजिए। मैं नार्मस की बात कर रहा था। पहले की सरकार कया दे रही थी, हमने कया परिवर्तन किया और हमारे महाराष्ट्र शासन ने कया किया, जो जानकारी मुझे है वही मैं पेश कर रहा हूं। अगर गलत हो तो आप कह सकते हैं। मुझे इसमें कोई शिकायत नहीं है। महाराष्ट्र शासन जो कर रहा है, हो सकता है उसमें कुछ कमियां हों, आप इंगित करें और हम उन्हें सुधारने की कोशिश करेंगे।
You have the right to criticise the Government. There is nothing wrong in that. Just because we have the Government there does not mean that they would not commit any mistake. They are not super human beings. They also are a part and parcel of the entire society. I look at it from that angle. मैं आंकड़े देना चाहता हूं। करीब १८४३६ घर महाराष्ट्र में नष्ट हो चुके हैं, १००० से ज्यादा जानवरों की मौत हो चुकी है, लेकिन ११ लाख हेकटेयर जमीन जो खेती लायक थी, उसमें पचास प्रतिशत को नुकसान पहुंचा है। यह जानकारी मैं सदन को देना चाहता हूं। यह महाराष्ट्र में विदर्भ की बात है। जब मैं विदर्भ की बात करता हूं तो उसे महाराष्ट्र से अलग नहीं मानता, विदर्भ महाराष्ट्र का एक भाग है। विदर्भ और हम सब एक साथ हैं। आज नहीं, वषर्ों से एक साथ हैं और आइंदा भी एक साथ रहेंगे। एक साथ रहेंगे तो हमारी ताकत बढ़ेगी, अलग हो जाएंगे तो ताकत कम हो जाएगी। किसी के दिमाग में यदि ऐसी बात है कि विदर्भ अलग कर दें और उसके लिए कुछ खास सहुलियतें मागें तो विदर्भ मजबूत होगा - यह विचार गलत है। जितना हम सब एक साथ रहेंगे, उतना हम सब लोग मजबूत होंगे। पहले ऐसा था और इसी के अन्तर्गत यह डिसीजन लिया गया कि जिन खेती करने वाले किसानों का ७५ फीसदी से ज्यादा नुकसान हो गया है, उनको मदद दी जाएगी लेकिन जिनका पचास फीसदी से ज्यादा नुकसान हुआ है, उनको भी मदद देने का फैसला महाराष्ट्र सरकार ने लिया है। पहले एक हेकटेअर के प्रति सौ रुपया देते थे, अब १००० रुपया कर दिया है। पहले मर्यादा एक हेकटेअर की थी, अभी दो हेकटेअर की हो गई है तथा पांच हेकटेअर तक मदद देने का फैसला महाराष्ट्र सरकार ने किया है। पहले जमीन के ऊपर टैकस देना पड़ता था परन्तु Stay order was given for collection of those taxes. अब इसे माफ कर दिया गया है। मैं दोनों में परिवर्तन बता रहा था। श्री राजेश पायलट : जब यह चर्चा चली तो इस बात पर चली कि आज़ादी के बाद पचास साल में पहली बार इतनी ज्यादा स्यूसाइडल डैथ्स कयों हुई हैं।
that is not of much concern. We should get into the reason why suicidal deaths are taking place. Maharashtra is one of the proud agriculture-based States in the country. Farmers are well to do there. Suddenly, why suicidal deaths are there in Maharashtra? We should know from you the reason behind it because you belong to Maharashtra. That is more important to me than what the Government is doing. Please tell us why the suicidal deaths are taking place in Maharashtra so that we may plan a policy for the future. श्री मधुकर सरपोतदार : महाराष्ट्र में खेती का जो नुकसान हुआ उसकी वजह आसमानी संकट थी, ऐसा नहीं कि किसी ने उनके ऊपर कोई जबर्दस्ती संकट पैदा कर दिया।
SHRI RAJESH PILOT : Was the credit policy all right? श्री मधुकर सरपोतदार : क़ेडिट पॉलिसी वगैरह सब है। महाराष्ट्र में ये सब सुविधाएं हैं। ये सब सुविधाएं होने के बावजूद भी खेती करने वाले किसान इसका मुकाबला नहीं कर सके, इसलिए उन्होंने खुदकुशी की। अन्य लोगों ने खुदकुशी नहीं की, मैं इतना ही बताना चाहता हूं। इतना ही नहीं, अभी किसी ने यह कहा कि हमारे चीफ मनिस्टर अपना जन्मदिन मनाते रहे - यह बिल्कुल गलत है। हमारे चीफ मनिस्टर साहब, जिन खेती करने वालों का नुकसान हुआ है, उनके घरों में गए। हमारे रेवेन्यू मनिस्टर ने भी हरेक घर में जाकर बातचीत की और देखा कि वह वहां कया-कया राहत दे सकते हैं, इसके बारे में उन्होंने बातचीत की। हमारे मुख्य मंत्री घर-घर में गए और जिस घर में अगर कोई कमाने वाला नहीं रह गया है, उसे कया नौकरी दी जा सकती है या कया राहत दी जा सकती है, इस बारे में भी उन्होंने बातचीत की।
MR. CHAIRMAN : The time is very limited. Please conclude in two minutes.
SHRI MADHUKAR SIRPOTDAR : I am coming to the same point. Whenever I start my argument, I am being disturbed. It is not proper. A number of Members have spoken so far and not a single Member was disturbed.
MR. CHAIRMAN: You have wantonly given time to Shri Pilot. Now, please come to the subject. श्री मधुकर सरपोतदार : मैं यह जानकारी दे रहा था कि हमारी पार्टी की तरफ से इस बारे में सर्वे कराया कि इसका कया इलाज हो सकता है तथा भविष्य में कया किया जाना चाहिए, इसके बारे में भी फैसला लिया गया। पार्टी ने बहुत सारे लोगों के घरों में जाकर फंडस कलेकट किए हैं, जो अफेकटेड फैमिलीज हैं, उनके घरों में जाकर राहत भी दी गई है तथा इस समय उन्हे कया मदद दी जा सकती है, इस बारे में भी बातचीत की गई।
The Government will take all precautionary measures but it is our responsibility - not the responsibility of the people of Maharashtra alone to help the people in need. हम लोगों की यह कोशिश रही है कि इसमें राजनीति नहीं आनी चाहिए। गन्दी राजनीति नहीं आनी चाहिए। यह काम हम लोगों को किसी भी हालत में नहीं करना चाहिए। गेहूं के बारे में हमारे भूतपूर्व कृषि अपनी बात कह रहे थे। हमारे देश में गेहूं अच्छा पैदा होता है, लेकिन फिर भी हम गेहूं बाहर से मंगाते हैं। जो गेहूं बाहर से मंगाते हैं, वह सड़ा हुआ गेहूं होता है और हमारे देश की जनता को उसको लेना पड़ता है।
Under what circumstances was this wheat imported? One has to find it out. That aspect also has to be gone into. यही हालत हमारे शुगर की है, प्याज की है और अन्य चीजों की है। ऐसी कोई चीज है, जो हमारे देश में न बनती हो, लेकिन फिर भी हम इम्पोर्ट करते हैं।
In the case of certain rare commodities, and commodities which we are short of, like oil etc., it is different. But why should we purchase from outside and import those commodities which are in abundant supply in the country itself? That is my simple question. दूसरी बात, जो किसान खेत में काम करता है, मेहनत करता है, मजदूरी करता है, उसका उत्पादन किस के हाथ में जाता है। किसान को कुछ नहीं मिलता है और बीच के दलाल उसका लाभ कमा लेते हैं। दूध भी जो किसान की तरफ से आता है, उसका रेट भी किसान को १०-११ रुपए ही मिलता है, जबकि उसकी कीमत मार्केट में १८-१९ रूपए होती है। इस प्रकार चीजों में ६-७ रूपए का अन्तर रहता है। इस प्रकार किसानों को लूटने का काम और उनका खून चूसने का काम इन दलालों द्वारा किया जाता है। कया इसका इलाज नहीं होना चाहिए? मैं कहना चाहता हूं कि इन पचास सालों में खेती के बारे में पिछली सरकारों ने कुछ नहीं किया। खेती में ७४ फीसदी लोग काम करते हैं, लेकिन उनके बारे में सरकार ने कोई पालिसी नहीं बनाई।
Seventy-four per cent people are engaged in farming. खेती करने वालों में भी अलग-अलग ग्रूप हैं। कुछ बहुत धनवान लोग हैं, जो घर में बैठकर दूसरों से काम लेते हैं।
... (व्यवधान)घर में बैठकर गरीबों को लूटने का काम करते हैं। जो मेहनत करता है, अनाज पैदा करता है, उसको कुछ नहीं मिलता है। इसके बाद अनाज में भी कालाबाजारी होती है। इसके बारे में भी सरकार को सोचना चाहिए और कानून बनाना चाहिए। मैं मंत्री महोदय से दरख्वास्त करूंगा कि वे इसके बारे में चाहे तो कोई कमेटी गठित कर दें, जो अपने विचार सरकार को प्रस्तुत कर सके। मैं बताना चाहता हूं, १९८६-८७ में इससे संबंधित एक समति की रिपोर्ट आयी थी, लेकिन उसके बारे में किसी को भी पता नहीं है। आज तक उसको सदन में नहीं पेश किया गया और उस पर कोई अमल नहीं किया गया। श्री सोमपाल: महोदय, सदन की जानकारी के लिए कृषि नीति से संबंधित वह दस्तावेज १९९४ में आया था और उस समय की सरकार द्वारा कृषि संबंधी स्थायी समिती का १२वां प्रतिवेदन संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत किया गया था। उसकी टिप्पणी को आप पढ़े। इसके बाद भी कृषि नीति नहीं आई, यह हमारा दुर्भाग्य है। समति बनीं और समति ने अपनी संस्तुति १४.५.९४ को दोनों सदनों में प्रस्तुत की। श्री मधुकर सरपोतदार : कोई समति काम करती है, लेकिन नतीजा कुछ नहीं होता है। उसके ऊपर अमल नहीं होता है, तो मेरे विचार से यह समति किस लिए बनाई जाती है। श्री सोमपाल: दुर्भाग्य की बात है, हमारा राजेश पायलेट जी भी इस बारे में कह रहे हैं। यह उनकी रुचि है। इतनी महत्वपूर्ण कृषि नीति से संबंधित समति की रिपोर्ट सदस्यों ने नहीं पढ़ी, यह दुखद स्िथति नहीं है। इसकी रिपोर्ट १४.५.९४ को आ गई थी। चार साल तक उसके ऊपर कोई क़ियान्िवति नहीं हुई है। श्री मधुकर सरपोतदार : यह हमारे देश का दुर्भाग्य है। हम किसानों के बारे में बात करते हैं, लेकिन जब इससे संबंधित नीति बनाने की बात आती है, तो पीछ हठ जाते हैं। कया वजह है? ऐसा लगता है, इसमें वैस्टेड इन्टरैस्ट है। मैं कहना चाहता हूं, जब हमें किसानों के लिए काम करना है, तो किसानों के लिए काम करना चाहिए।
let us work together for only farmers. When the question of labourers come, let us work together for the labourers; when the question of community development comes, let us work for that, but there should not be any politics in that. Unfortunately, what is happening in this country is that in every aspect, there is the involvement of dirty politics. Because of that we do not get results. It is an unfortunate thing. किसानों को अच्छी यूरिया नहीं मिलती है, इसके लिए कौन जिम्मेदार है? वहां पर जानवर पैसों के लिए गिरवी रखा जाता है और पैसा नहीं मिलता है। किसान तंग आ चुके हैं। किसानों की तंगी दूर करना, उनकी मदद करना, उनको राहत देना, उनके लिए कोई ऐसा रास्ता हम लोगों को निकालना पड़ेगा जिससे कि उनकी हालत अच्छी हो।
Let us create that machinery. Let the farmer go to that machinery first instead of committing suicide. अगर कोई रास्ता निकालना है तो उसके लिए एक ही आवश्यक चीज है कि हम लोग खेती के बारे में, किसानें के बारे में, Let us adopt some policy; let us adopt some guidelines in this country.
MR. CHAIRMAN : You please conclude.
SHRI MADHUKAR SIRPOTDAR : Thank you, Sir. I am concluding. What hurts me is that only when I speak.... (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: You have taken 24 minutes. A number of hon. Members will be participating on the same subject.
SHRI MADHUKAR SIRPOTDAR : Other hon. Members have spoken for one hour or so without any disturbance. This is an unfortunate thing. Initially, if I have informed you, you would have given me 20 minutes and I would have finished my speech within 20 minutes. ... (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Please conclude. All the Members are very anxious to participate in the debate. So, you please give way to them. श्री मधुकर सरपोतदार: अभी भी महाजन हर देहात में हैं। वे कर्जा देते हैं और कर्जे से राहत लेकर किसान खेती करता है। अगर वहां मशीनरी नहीं होगी या महाजन नहीं होगा तो दूसरा अल्टरनेटिव कया है? बैंक हमारी मदद नहीं करता, किसानों के लिए अन्य कोई व्यवस्था पैसा देने की नहीं है। हमारे यहां कोई क़ॉप इंश्योरेंस भी नहीं होता है। अब नयी पालिसी आ गई, इसके अंदर क़ॉप इंश्योरेंस भी हो जाएगा और अगर एक बार क़ॉप इंश्योरेंस हो जाएगा तो इनको बहुत अच्छी राहत मिलेगी, ऐसा मैं समझता हूं।
... (व्यवधान)
Whenever I start my speech there have been disturbances continuously. लेकिन फिर भी मैं चेयर की इज्जत करता हूं।
I know that there is a time constraint.
My humble request to the entire House is that whenever we form the policy on farmers of this country, let us take into account all these points which I have raised. You come to the conclusion first before finalising the policy. You may delay the decision. But once the decision is taken, you should see to it that the same is implemented with determination by this august House.
The incidents of suicidal cases are unfortunate. We should see to it that at the end of the day, there should not be any suicidal deaths in this country. That is the aim of today's discussion. If we achieve that purpose, I think, we have achieved something. That is my feeling. Once again, I thank Shri Vilas Muttemwar and Shri Amar Pal Singh, in particular, for initiating this debate on this particular subject today under Rule 193, and all the other hon. Members, in general. "> श्री रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): सभापति महोदय, देश के वभिन्न राज्यों में बड़े पैमाने पर किसानों ने आत्महत्याएं की हैं तथा उससे उत्पन्न परस्िथति पर सदन में विचार-विमर्श हो रहा है। इस बहस की शुरूआत में जो आसन से माननीय सभाध्यक्ष ने चिंता व्यकत की, जो उदगार प्रकट किये हैं उन पर देश को और तमाम लोगों को गंभीरता से विचार करना चाहिए। मैं नहीं जानता कि दुनिया के किसी भी हिस्से में ऐसे विषय पर इतनी बड़ी संख्या में किसी एक वर्ग के लोगों ने आत्महत्याएं की हों। ऐसी आत्महत्याएं कयों होती हैं और कयों लोग आत्महत्याएं करने के लिए विवश होते हैं? कहीं-कहीं देखा जाता है कि जब आदमी को दुनिया में कहीं प्रकाश की किरण दिखाई नहीं देती है तथा परिवार, समाज, कुटुम्ब, सरकार और सभी तरफ से जब आदमी निराश, हताश हो जाता है तभी वह आत्महत्या को विवश होता है। मानसिक असंतुलन के चलते भी आत्महत्याएं होती हैं तथा साईकलोजिकल और मैडीकल कारणों से भी ऐसा होता है। सभापति महोदय, उस दिन सरकार के उत्तर में बताया गया कि तीन राज्यों, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में ३१६ आत्महत्याएं हुई है। लेकिन सरकारी आंकड़ें सभी जानते हैं कि कम करके लिखे जाते हैं और बहुत सी आत्महत्याओं को नैचुरल म्ृात्यु मान लिया जाता है। लेकिन सरकार द्वारा ३१६ आत्महत्याएं प्रतिवेदित हैं। यह एक-आध महीने पहले की स्िथति है। आत्महत्याओं का दौर रुका या नहीं रुका है, यह प्रश्न नहीं है। प्रश्न यह है कि आत्महत्याएं कयों होती हैं और किन परस्िथतियों में होती हैं? किसान जब निराश, हताश या अधिक पीड़ित हुआ और दुनिया में उसको कहीं से भी सहायता नहीं मिली - चाहे वह नेता हो, किसान के लिए काम करने वाला पार्टी का आदमी हो, राज्य सरकार हो या केन्द्र सरकार हो, तब किसान आत्महत्या करने के लिए इतने बड़े पैमाने पर विवश हुआ। मैं नहीं समझ पाया कि आत्महत्या राष्ट्रव्यापी भी हो सकती हैं। मैं नहीं जानता कि दुनिया के किसी भी मुल्क में इतनी बड़ी संख्या में, एक वर्ग के लोगों द्वारा, किसी भी विषय पर इतनी आत्महत्याएं हुई हों। इस बात को तो समाज-शास्त्र की जानकारी रखने वाले और बड़े-बड़े दिमाग वाले लोग ही जानते होंगे, लेकिन मुझे अभी तक जानकारी नहीं मिली कि इतने बड़े पैमाने पर किसी एक वर्ग के लोगों को कहीं पर आत्महत्याएं करने के लिए विवश होना पड़ा हो। इसलिए यह गंभीर चिंता का विषय है तथा यह हम सभी के लिए कलंक का अध्याय है। हमें समझना होगा कि किन कारणों से किसानों को आत्महत्या करने के लिए विवश होना पड़ा। किसानों की पीड़ाएं अनन्त हैं। दुनिया के किसी भी हिस्से में किसान देश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। वह भोजन पैदा करता है और भोजन के बिना किसी भी पंडित, सिद्ध, सूरमा की जिंदगी नहीं चल सकती। आज फूड सिकयोरिटी और फूड मैनेंजमेंट की बात होती है, लेकिन किसान की खुशहाली के बिना फूड सिकयोरिटी की बात पाखंड है और फूड मैनेजमेंट भी मिस-मैनेजमेंट है। यह दोनों चीजें फालतू हैं जब तक किसान की हालत नहीं सुधरती। माननीय कृषि मंत्री जी सुझाव देने के लिए कह रहे थे। मेरा सुझाव यह है कि इस बात की जानकारी सरकार को गहराई से लेनी चाहिए कि किस पीड़ा के कारण किसानों को आत्महत्याएं करनी पड़ी। तीन राज्यों में तो आत्महत्याएं प्रतिवेदित हैं लेकिन और राज्यों में भी हुई होंगी। इस बात का सरकार पता लगाए कि वे कौन से कारण हैं, कौन सी उनको पीड़ा हुई, राज्य सरकार और केन्द्र सरकार ने कौन सी कार्यवाही की। जब सब जगह उनके लिए दरवाजें बंद हो गये होंगे, जब कोई उन्हें सुनने वाला, उनके लिए बोलने वाला, उन्हें सहानुभूति देने वाला नहीं मिला होगा, तभी इतने बड़े पैमाने पर किसान आत्महत्याएं करने पर विवश हुए होंगे। इसलिए मेरा सुझाव नं. एक यह है कि सरकार को आत्महत्याओं की गहराई से जानकारी लेनी चाहिए और उसके समाधान के लिए प्रयास करने चाहिए तथा भविष्य में ऐसी स्िथति पैदा नहीं होने देनी चाहिए। इस तरह की उपेक्षा और संवेदनहीनता किसानों के साथ नहीं होनी चाहिए। जिससे किसानों को आत्महत्या करने के लिए विवश न होना पड़े। उनको आत्महत्या करने के लिए विवश होना पड़ा है। मैं फसल बीमा योजना के बारे में भी कुछ कहना चाहता हूं। यह नाम की योजना है। लोग कहते हैं कि इससे खाना-पूर्ित हुई है। हमने सुना था कि इससे बड़े किसानों को ही लाभ हुआ और जो किसान ऋण लेते हैं, वे ही इसमें शामिल होते हैं। जब जिला स्तर पर आधे से ज्यादा बर्बादी होती है, तभी फसल बीमा योजना का लाभ मिलता है। इसमें जिले यूनिट माने गए। इस योजना से किसानों को कोई लाभ नहीं हुआ और न ही उन्हें कोई सहारा मिला। जब चतुरानन मिश्र जी कृषि मंत्री थे तो उन्होंने सभी सदस्यों को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने कहा था कि हम फसल बीमा योजना लागू करने जा रहे हैं। मेरा सुझाव है कि आप इस योजना के तहत गांवों को यूनिट मानें। अगर गांवों में आधी से ज्यादा फसल बर्बाद हो जाए और जिस किसान की फसल बर्बाद हो, उनको इसमें जोड़ा जाए। ऐसी व्यवस्था तुरन्त लागू की जाए। यह योजना प्रयोग के तौर पर कुछ जिलों में लागू भी हुई थी लेकिन इसमें वित्त विभाग ने खूंटा गाढ़ दिया। वह किसी हालत में किसान को फायदा नहीं पहुंचाना चाहता था। इसमें ब्यूरोक़ेसी भी आड़े आई। "जाके पैर न फटे बिवाई, वह कया जानें पीड़ पराई" किसान जेठ की दोपहरी में और भादो के महीने में अपने खेतों में काम करता है, उस किसान की पीड़ा को ठंडे कमरों में बैठने वाले अफसर समझ नहीं सकते। गांवों में रहने वाला किसान इस पीड़ा और दूसरी अनेक कठिनाइयों को झेलता है। उसकी पीड़ा को कोई सुनने वाला नहीं है, इस कारण वह आत्महत्या करने के लिए विवश होता है। मेरा अनुरोध है कि फसल बीमा योजना को व्यापक रूप में लागू किया जाए। देश के तमाम हिस्सों में रहने वाले किसान हर साल बाढ़ और सुखाड़ से प्रभावित होते हैं। अगर उसकी कुछ फसल बचती है तो वह कीड़ा लगने से और दूसरी अनेक बीमारियों से बर्बाद हो जाती है। उसे समय पर खाद उपलब्ध नहीं होती। अगर कहीं उपलब्ध भी होती है तो वह महंगी मिलती है। उसे कई बार खाद भी मिलावटी मिलती है। वह कीटाणुओं को मारने के लिए जिन दवाइयों का इस्तेमाल करता है, वे भी जाली होती हैं। उन दवाइयों का कोई असर ही नहीं पड़ता और उससे कीटाणु नहीं मरते। इतने कष्ट झेलने के बाद उसे सूद चुकाना पड़ता है। सूद के बाद दंड सूद और दंड सूद के बाद तन सूद तक चुकाना पड़ता है। इसके अलावा उसे कम्पाउंड इंटरस्ट और पता नहीं और कितने इंटस्ट देने पड़ते हैं। किसान इतनी पीड़ा को सहन नहीं कर पाता। इस तरह से किसान निराश,हताश, उदास और पीड़ित होकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाता है। आप आज तक कृषि नीति नहीं ला सके है। जब हमारी सरकार थी तो कृषि नीति का ड़ाफट बन रहा था और विशेषज्ञों की राय ली जा रही थी। कृषि को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जब हमें आजादी मिली थी तो कृषि का जी.डी.पी. में कितना कंट्रीब्यूशन था? इसका कंट्रीब्यूशन लगातार घट रहा है। वह स्टैग्नेट हो गया है। एग्रीकल्चर पर अधिक पूंजी निवेश होना चाहिए और इसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अभी बलराम जाखड़ जी कह रहे थे कि किसान का मतलब सिंचाई से है। उन्होंने जल जमाव का भी जिक़ किया। आज कहीं बाढ़ की, कहीं सुखाड़ की और कहीं वाटर लौगिंग की समस्या है। उत्तर बिहार में ९ लाख एकड़ जमीन में जल जमाव है। अगर कोई किसान १० एकड़ जमीन भी खरीदता है तो यह महसूस करता है कि उसने जमीन में व्ृाद्धि की है। वह अपना पेट काट कर जमीन खरीदता है। अब जिन हजारों लाखों किसानों की साढ़े बाइस लाख एकड़ ज़मीन पर जल-जमाव है, उसमें गेहूं नहीं होता, मछली नहीं होती, मूंग नहीं होती, धान भी नहीं होता, कुछ नहीं होता। केवल मालगुज़ारी लगती है। साढ़े बाईस लाख एकड़ ज़मीन है गंडक एरिया और पश्िचम कोसी एरिया में। भारत सरकार और राज्य सरकार के बीच में भी लिखा-पढ़ी हुई है लेकिन राज्य सरकार और भारत सरकार के बीच पत्राचार इस तरह से चलता है कि वह काम किसी तरह से न हो। इस तरह की छीलन और कागज़ की गिजैया होती है और उसमें इस तरह के सवाल उठाए जाते हैं कि काम नहीं हो। राज्य सरकार और भारत सरकार के बीच में बरसों से बात चल रही है। गंडक कमांड एरिया की अभी भी दो दर्जन योजनाएं लंबित हैं। लिखा-पढ़ी हो रही है। १५ जून से मिट्टी का काम बंद हो जाता है। लिखा-पढ़ी चल रही है। मतलब यह कि इस साल भी जल-जमाव से लोग प्रभावित ही रहेंगे। लेकिन देखा गया है कि एकाध शहर में एकाध लाख रुपया खर्च कर दिया गया और जल-निकासी कर दी गई। अब गांव का आदमी बोल रहा है कि हम पंजाब की तरह हो गए, गेहूं रखने की जगह नहीं है। इस तरह का अनुभव है। इसलिए हमारा सुझाव नंबर तीन है कि देश के किसी भी हिस्से में जल-जमाव की समस्या को हल करने के लिए प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वेस्टलैण्ड डॆवलपमेंट और वाटर शॆड मैनैजमेंट में हम देखें कि कितने पैसे का बजट में उपबंध है। उसका १० परसेंट खर्च हो जाता है, बाकी खर्च नहीं होता है। कागज़ों में दिखाया जाता है कि इतना बजट दिया गया लेकिन उस पर उतना पैसा खर्च नहीं होता। सिंचाई में छोटी-छोटी तुरन्त लाभ देने वाली योजनाओं को प्राथमिकता दी जाए। वाटर लौगिंग की जो प्राबलम है, देश के किसी भी हिस्से में उसकी जो लंबित योजनाएं हैं उनको प्राथमिकता दी जाए और फिर किसान को ऋण की जो व्यवस्था है उसमें किसान पहले पॆटीशन देता है। दौड़ते-दौड़ते उसको इस साल का काम अगले साल देर से मिलता है और फिर उसमें घूस का परसेंटेज अलग है, गड़बड़ी अलग है। फिर सूद दर सूद का बोझ उसके माथे पर रहता है। इसलिए किसानों की बड़ी पीड़ा है। उसको सरल किया जाए। जो सहकारिता वाला मामला है उसमें किसानों को शामिल करके सहज भाव से उन्हें ऋण और उत्तम बीज दिये जाएं। किसान चाहता है कि बढ़िया बीज से वह उत्पादन करे लेकिन देश के हरेक हिस्से में किसानों को बढ़िया बीज उपलब्ध नहीं होते। इस कारण से भी उन्हें नुकसान होता है। इसलिए सरकार का दायित्व है कि बढ़िया बीज उपलब्ध कराए और सीड के फार्मस देश के पैमाने पर कितना काम कर रहे हैं इस बात की जांच करने की ज़रूरत है ताकि किसानों को बीज मुहैया हो सके। खाद पर सब्िसडी खत्म करने का अंतर्राष्ट्रीय दबाव हम पर बढ़ रहा है। यह दबाव है कि उद्योग को सब्िसडी बढ़ जाए और किसान की दी जाने वाली सब्िसडी बंद की जाए। इसलिए हम सावधान और चौकन्ने हैं कि किसी भी हालत में किसानों की सब्िसडी न घटाई जाए, सब्िसडी बढ़ाने की बात हो। खाद, पॆस्िटसाइड, औजार या अन्य किसान के उपयोग में आने वाली चीजों में सब्िसडी खत्म करने की अंतर्राष्ट्रीय साजिश है। हमको जानकारी है कि कुछ वैज्ञानिक लोग हिसाब जोड़कर बताते हैं कि यहां अनाज उत्पादन करने से ज्यादा महंगा होता है, बाहर से खरीद लेने में सस्ता पड़ता है। लेकिन उनको यह मालूम नहीं है कि जब अंतर्राष्ट्रीय समूह में एक दूसरे को पछाड़ने की कोशिश होती है तो उस समय वे ऐटौमिक वैपन का परीक्षण करते हैं। जब इतने बड़े मुल्क में भोजन नहीं मिलेगा तो अनाज को लोग फूड वैपन के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं और हमें पछाड़ सकते हैं। इसलिए जहां ऐटौमिक बम से आदमी सबल होने का अनुभव करता है वहां पर फूड वैपन को भी मज़बूत रखना चाहिए, नहीं तो दूसरे देश पर हमें अनाज के मामले में जब निर्भर रहना पड़ेगा, उस समय हम फूड वैपन के शिकार हो सकते हैं और एक अंतर्राष्ट्रीय साजिश है कि हिन्दुस्तान किसानों के द्वारा अनाज के मामले में आत्मनिर्भर न हो सके। हमारा सौ करोड़ की आबादी वाला मुल्क है। कुछ अन्य मुल्क हैं जो हम लोगों का एक ग्रास का भोजन है। बहुत से मुल्क जो शक्षित कहे जाते हैं वे साल भर खायेंगे. हमारे हिंदुस्तान के आदमी एक दिन में उनका नाश्ता कर जायेंगे। हमारी इतनी बड़ी आबादी है। रकबे के मामले में पांच हिंदुस्तान जुटेंगे तो एक अमरीका बनेगा। लेकिन साढ़े तीन अमरीका आबादी के मामले में जुटेंगे तो एक हिंदुस्तान बनेगा। यह एक रेश्यो है। दुनिया की २.४ प्रतिशत जमीन पर हिंदुस्तान बसा हुआ है। लेकिन हमारी आबादी १६ प्रतिशत है। इसीलिए सन् २००५, २०१०, २०१५, २०२०, २०३० में हमारी आबादी कितनी होगी और हमें कितने अनाज की जरूरत पड़ेगी उसके लिए सरकार को दीर्घकालिक और तात्कालिक दो तरह की योजनाएं बनानी चाहिए। तात्कालिक योजना में इस तरह से कार्यवाही हो, राष्ट्रीय कृषि नीति में इस तरह का प्रावधान हो और तात्कालिक कार्यवाही हो कि किसानों को आत्महत्या के लिए विवश न होना पड़े। जब देश का किसान खुशहाल होगा तो हिंदुस्तान मजबूत होगा। एटोमिक वैपन्स के मुकाबले, मैं महसूस करता हूं कि जब किसान मजबूत, सबल, खुशहाल होगा तब हिंदुस्तान ज्यादा मजबूत होगा। तभी एटोमिक वीपन्स से मजबूती आती है। किसानों की आत्महत्या सहन नहीं की जा सकती, इसे हम सहन नहीं करेंगे। अंत में मैं सरकार को किसानों के मामले की प्राथमिकता देने का सुझाव देते हुए आप सबको धन्यवाद देना चाहता हूं कि आपने नियम १९३ के अधीन इतने अहम विषय पर बहस करके बड़ी कृपा की है और माननीय सदस्यों को इस पर बोलने का मौका दिया। इसके लिए आपको धन्यवाद। किसान एकता जिंदाबाद।
">*m0">7"> श्री राजवीर सिंह : माननीय सभापति जी, मुझे इस बात की बड़ी प्रसन्नता है कि मेरे मित्र, मेरे पुराने साथी श्री विलास मुत्तेमवार ने पहली बार किसानों की समस्याओं को इस सदन में बड़ी गंभीरता के साथ उठाया है।
... (व्यवधान)कयोंकि इनका कभी किसानों से वास्ता नहीं रहा। लेकिन मैं उनको बधाई देता हूं कि कम से कम अपोजीशन में जाने के बाद किसानों की आपको सुधि आई। उसके लिए मेरी तरफ से आपको बहुत-बहुत साधुवाद।
... (व्यवधान)आखिर किसानों को आत्महत्या करने की जरूरत कयों पड़ी, उसके कया कारण थे। कया यह सडनली आत्महत्या का केस था, कया अचानक किसानों ने आत्महत्या करनी शुरू कर दी थी, कया कारण थे? इतनी लम्बी बहस के बाद किसी ने भी इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया। यह जरूर है कि लोगों ने बड़े ओजस्वी भाषण दिये, बड़े भावनात्मक भाषण दिये, लेकिन मैं आपके माध्यम से इस सदन से पूछना चाहता हूं, मैं सरकार से पूछना नहीं चाहता, यह सरकार का दोष नहीं है, कम से कम इस सरकार का तो दोष नहीं है बल्िक पूरे सदन का दोष है, अगर किसान मरा है तो पूरे सदन की कमी से मरा है। अगर किसान ने आत्महत्या की है तो पचास वषर्ों तक इस पार्िलयामेंट हाउस में बैठने वाले चाहे वे सरकार में रहे हों या कहीं भी रहे हों, उनकी लापरवाही का नतीजा है। श्री विलास मुत्तेमवार : पचास साल में कभी ऐसा नहीं हुआ था।
... (व्यवधान) श्री राजवीर सिंह : यह परिणाम है आपके उन पापों का, बच्चा एकदम नहीं होता, उसे पैदा होने में समय लगता है।
... (व्यवधान)आप मेरी बात सुन लीजिए। पचास वर्ष हो गये हैं अभी तक हिंदुस्तान में कृषि नीति नहीं बन पाई। सन् १९९४ में यहां बड़ी बहस हुई थी। मैं स्टैंडिंग कमेटी में था। हम लोगों ने सर्वसम्मत रिपोर्ट दी थी। माननीय जाखड़ जी सामने बैठे हैं, वह तब कृषि मंत्री थे। उस समय हम लोग आपस में बात करते थे। मेरा जाखड़ जी से राजनीतिक मदभेद हो सकता है, लेकिन किसानों की समस्याओं पर हम लोग एक दूसरे के काफी सहयोगी रहे, सहमत रहे। सभापति महोदय, दुर्भाग्य यह है कि इस देश में उद्योग नीति तो १९५१ में बन गई, लेकिन कृषि नीति आज १ जून, १९९८ तक नहीं बनी है। आखिर किसान आत्महत्या नहीं करेगा, तो कया करेगा। किसान को आपने कया दिया है। अभी हमारे मित्र कह रहे थे कि किसान ब्याज नहीं दे पा रहे थे इसलिए उन्होंने आत्महत्या की। मैं पूछना चाहता हूं कि किसान को महाजन से रुपया लेने की जरूरत कयों पड़ी। कया हमारे कृषि विकास बैंक, कृषि भूमि विकासि बैंक और राष्ट्रीयकृक बैंक नहीं हैं जिनसे ८,९,१० या ११ प्रतिशत ब्जाय पर कर्जा मिल जाता है, फिर उसको महाजन के पास जाने की जरूरत कया पड़ी। कया यह बात भी सही नहीं है कि नाबार्ड और अन्य सरकारी संस्थाओं से सस्ती दर पर कर्ज लेने के बाद भी किसान की जमीन नीलाम नहीं हो रही है या कुर्क नहीं हो रही है। पूरे के पूरे अखबरा भरे पड़े हैं. रोजाना अनेक समाचार ऐसे निकलते हैं कि फलां जगह पर फलां की जमीन नीलाम हो रही है या कुर्क हो रही है। किसान सस्ती दर पर कर्ज लेने के बाद भी कया कर्ज अदा कर पा रहा है? ४० प्रतिशत ब्याज पर कर्ज लेने के बाद तो किसान अदा कर ही नहीं पाएगा। जब आज स्िथति यह हो रही है कि किसान ८,९,१० या ११ प्रतिशत दर पर सरकारी संस्थाओं से कर्ज लेकर भी कर्ज अदा नहीं कर पा रहा है, तो ४० प्रतिशत ब्याज दर पर कर्ज लेकर वह कैसे अदा कर पाएगा। सभापति महोदय, यह एक दिन में नहीं हुआ। यह पिछले ५० वषर्ों का नतीजा है। जैसी हमारे देश में नीतियां पिछले ५० वषर्ों में अपनाई गईं उनका परिणाम आज देश के सामने किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने के रूप में आपके सामने आ रहा है। आज तक हमने किसानों की समस्याओं के बारे में, खेती के बारे में कोई ध्यान नहीं दिया। इसिका एक मुख्य कारण यह भी है कि किसान आर्गेनाइज्ड नहीं है। जो लोग आर्गेनाइज्ड हैं, वे अपनी बात आंदोंलन कर के मवना लेते हैं, लेकिन किसान बेचारा आंदोलन तो कया प्रदर्शन भी नहीं कर पाता है और कभी जैसे तैसे प्रदर्शन करने की कोशिश करता है, तो हमारे नेता लोग बीच में आ जाते हैं और उसे भी असफल करवा देते हैं। सभापति महोदय, मैं लंबी-चौड़ी बात नहीं कहना चाहता हूं। मैं सिर्फ यह कहना चाह रहा हूं कि यदि आपकी नीतियां इसी प्रकार से चलती रहीं, तो आज तो ५०० किसानों ने आत्महत्या की है, आने वाले समय में पांच लाख किसान आत्महत्या करेंगे या फिर वे अत्याचार करने वालों और अनाचार करने वालों की हत्या करने पर मजबूर होंगे। मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि आज किसान रासायनिक खाद का इस्तेमाल करके अपनी जमीन को ऊसर बना रहा है। जिन दवाओं पर अमरीका ने बैन लगा दिया, वे दवाएं हमारे देश में प्रयोग के लिए भेजी जा रही हैं और हमारे यहां अनाप-शनाप मात्रा में हम लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। हम लोग रासायनिक खाद डाल-डाल कर अपनी प्ृाथ्वी माता के साथ बलात्कार कर रहे हैं। ज्यादा फसल लेने के लिए हम अपनी जमीन को सदा के लिए बेकार करते जा रहे हैं। केमीकल इंसैकटासाइड और पैस्टीसाइड डाल्ृाडाल कर हम अपनी जमीन को सदा के लिए बेकार कर रहे हैं। हर वर्ष इन केमीकलों की मात्रा बढ़ानी पड़ रही है और दूसरी ओर सिंचाई का कोई प्रबन्ध नहीं है। जितनी भी वर्षा होती है उसका सारा पानी समुंदर में चला जाता है। हम आज तक जल प्रबन्धन नहीं कर पाए है। सभापति महोदय, पिछले ५० सालों से हम आज तत अपने देश में सिंचाई का प्रबन्ध कर पाए हैं। कभी बाढ़ आ जाती है, कभी सूखा पड़ जाता है और सारी खेती तबाह हो जाती है, लेकिन कभी इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता है कि ऐसा कयों होता है। मैं कृषि मंत्री महोदय से प्रार्थना करना चाहता हूं कि आप एक अधिकार संपन्न कमेटी बनाइए जो इन सब बातों की जांच करे कि इनके कया कारण हैं। यह भाषण देने से नहीं होगा। हमको तय करना होगा कि भविष्य की हमारी कृषि नीति कया हो? हम किसान को कया सुविधायें दे सकते हैं? आज हम सबसिडी की बात करते हैं। आज सबसिडी के लिए किसान हाथ में भीख का कटोरा थामे नहीं घूम रहा है। किसान को सबसिडी नहीं चाहिए। हमारे कुछ पूंजापति लोग, कुछ अति विज्ञानी लोग, उदारवादी लोग रेस्तरां में बैठकर किसान की सबसिडी को इस देश के पिछड़ापन की बात कहते हैं। वे कहते हैं कि सारा पैसा तो किसान को चला जाता है मगर कया आपने कभी हिसाब लगाया है कि किसान को कितना पैसा जाता है। कभी हिसाब नहीं लगाया। आप यह तय कराइये कि कया होना चाहिए, केवल भाषण देने से काम चलने वाला नहीं है। इसके लिए गंभीरता से बात करनी होगी। हो सकता है कि भावुकता में कुछ कहकर हम पब्िलक मीटिंग में ताली बजवा लें मगर उस भावुकता से समस्या का समाधान नहीं हो सकता। समस्या का समाधान करने के लिए हमें कठोर कदम उठाने पड़ेंगे, चाहे वह किसी के खिलाफ भी कयों न हो। उसके लिए जो भी उत्तरदायी है, वह दंडित होना चाहिए, नहीं तो समस्यायें मुंह बाये खड़ी रहेंगी। मैं एक उदाहरण देना चाहता हूं। मैं जहां से चुनकर आता हैं, जिस क्षेत्र से आता हूं, वहां पूरा एक जिला है। मंत्री जी, मैं आपको बताना चाहता हूं, इसे आप नोट कर ले, वहां १५ साल के बाद सामूहिक आत्महत्या होने लगेगी। राम गंगा और गंगा के बीच एक इलाका है जिसके दोनों तरफ नदियां हैं। बाढ़ की विभीषिका तो वह इलाका बर्दाश्त करता है मगर इन दोनों नदियों के पानी की एक बूंद भी उन्हें सिंचाई के लिए नहीं मिलती जिसके मायने हैं कि वे नदियां अभिशाप तो है, वरदान नहीं है। दोनों जिलों में एक भी नहर नहीं है। नतीजा यह है कि वहां सिंचाई व्यवस्था फेल हो गयी है, सभी बोरिंग फेल हो गये। गर्वनमैंट ने कह दिया है कि वहां पर बोरिंग नहीं होगी कयोंकि यह डार्क एरिया घोषित कर दिया गया है। आप क्षमा करें कि जहां टयूबवैल नहीं बनेंगे, नहर का पानी नहीं है।
15.47 hrs. (Mr. Speaker in the Chair) सिंचाई का और कोई प्रबन्ध नहीं है तो १५ साल के बाद, जब जमीन का पानी बिल्कुल खत्म हो जायेगा तो सिंचाई कहां से होगी और अगर सिंचाई नहीं होगी तो कया ५० लाख आबादी का इलाका भूखा नहीं मरेगा? कया वहां सामूहिक आत्महत्यायें नहीं होंगी? श्री भूपिन्द्र सिंह हुड्डा (रोहतक): उन जिलों के नाम बताइये। श्री राजवीर सिंह : मैं बंदायूं और बरेली जिले का पार्ट कह रहा हूं। मैंने राम गंगा और बूढ़ी गंगा के बीच के इलाके के बारे में कहा। हमारे मंत्री जी राम गंगा और बूढ़ी गंगा के बीच के क्षेत्र को जानते हैं। जाखड़ साहब भी उस इलाके को जानते हैं।
... (व्यवधान)उनका फार्म होगा। उनका फार्म ऐसी जगह है जहां पानी की जरूरत ही नहीं पड़ती। आटोमेटिकली सिंचाई होती है। मुझे मालूम है कि वे बहुत परेशान हैं। इसलिए वे परेशान हैं कयोंकि उनका फार्म उत्तरांचल में जा रहा है। इसलिए ये बहुत परेशान हैं। वहां सिंचाई की जरूरत नहीं है। सिंचाई की जहां जरूरत है वहां व्यवस्था होनी चाहिए। अध्यक्ष महोदय, मैं बहुत अधिक समय नहीं लूंगा और मैं नहीं चाहूंगा कि मेरे भाषण में घंटी बजे। इसलिए मैंने कुछ मुद्दे रखे हैं। उन पर आप विचार करें। अंत में मैं कृषि मंत्री और अपने सामने बैठे हुए मित्रों से एक निवेदन करना चाहता हूं कि यह जो बार-बार भाषण में ध्वनि निकल रही है, उधर से जो भी भाषण दिये गये उन सबसे यह ध्वनि निकली कि यह गवर्नमैंट बनने के बाद आत्महत्यायें हुई हैं, उसके लिए यह गवर्नमैंट जिम्मेदार है। इस देश का दुर्भाग्य यह है कि हमने हर चीज को गवर्नमैंट पर छोड़ने की कोशिश की है। क्षमा करें, यदि किसी का बालक न हो, तो कहते हैं कि गवर्नमैंट जिम्मेदार है। टिकट न मिले तो गवर्नमैंट जिम्मेदार है। किसी काम के लिए गये तो ... (व्यवधान) एक माननीय सदस्य: जब आप ओपोजिशन में थे तब भी आप यही बोलते थे।
... (व्यवधान) श्री राजवीर सिंह : मैं नहीं कहता था। आप मेरे भाषण उठाकर देख लीजिए। ... (व्यवधान) श्री विलास मुत्तेमवार : आपके लोग कहते थे।
... (व्यवधान) श्री राजवीर सिंह : कोई नहीं कहता था। आपके सुनने में फर्क था।
... (व्यवधान) श्री विलास मुत्तेमवार : अब पोजीशन बदल गयी है।
... (व्यवधान)
DR. T. SUBBARAMI REDDY : We are very anxious to know your suggestions. What are your observations? श्री राजवीर सिंह : आप मेरी बात सुनिये। मैं बार-बार कहता हूं कि आपको उधर बैठने का भी तजुर्बा नहीं है और इधर बैठने की भी तजुर्बा नहीं है। जाखड़ साहब आप सीनियर मैम्बर हैं। आप एक ट्रेनिंग कैम्प लगाइए और अपने मित्रों को विपक्ष में बैठने के लिए कया करना चाहिए, यह सिखाइए। यह बात खत्म हो गयी। ... मैंने जाखड़ साहब से इसलिए कहा कयोंकि वह स्पीकर भी रह चुके हैं। वह पार्िलयामैंट के नियम, कानून को जानते हैं। श्री विलास मुत्तेमवार : आपको अब मौका ही नहीं मिलेगा।
... (व्यवधान)कयोंकि आप जल्दी ही इधर आने वाले हैं।
... (व्यवधान)आपको सत्ता में रहना नही आया और हमें ओपोजिशन में रहना नहीं आया।
... (व्यवधान) श्री राजवीर सिंह : तुम्हें तो दोनों ही नहीं आया लेकिन हम तो सत्ता में रहना सीख रहे हैं। तुम्हें तो ओपोजिशन में बैठना भी नहीं आता।
... (व्यवधान)
MR. SPEAKER: Please Address the Chair. श्री राजवीर सिंह : अध्यक्ष महोदय, इन्होंने बीच में इंटरप्ट किया था, तो मैंने जवाब दिया। यह पहले भी मेरे भाषण में ऐसे ही छेड़छाड़ करते थे।
MR. SPEAKER: You address the Chair. श्री राजवीर सिंह : इन्होंने श्री सोमपाल: आप इसको पांच साल चलने दीजिए, दोनों सीख जाएंगे। श्री राजवीर सिंह : अध्यक्ष जी, मैं आपके माध्यम से पूरे सदन से निवेदन करना चाहता हूं कि एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप न करके इसको गम्भीरता से लें। अगर ये आत्महत्या हुई हैं तो यह सोमपाल जी के दो महीने १० दिन के शासन का परिणाम नहीं हैं। ये आत्महत्याएं हुई हैं तो यह ५० वषर्ों की हमारी लापरवाही थी, यह उसका परिणाम है। इसमें स्टेट गवर्नमेंटस का भी दोष नहीं है, किसी स्टेट गवर्नमेंट का दोष नहीं है। हम केवल स्टेट गवर्नमेंट के ऊपर डालकर इस बात को नहीं छोड़ सकते। आपने कृषि नीति नहीं बनाई, इससे स्टेट गवर्नमेंट को कुछ लेना-देना नहीं, आपने यहां पर कुछ तय ही नहीं किया और आप स्टेट गवर्नमेंट को गाली दे रहे हैं। सच बात तो यह है कि अगर यह सारा दोष किसी का है तो वह आपका है, कांग्रेस पार्टी के लोगों का है, कयोंकि ५० साल में से ४५ साल आपने यहां सरकार चलाई है। इसलिए दोषी आप हैं और दोष का दूसरी तरफ इशारा कर रहे हैं। इन्हीं शब्दों के साथ, आपने मुझे समय दिया, बहुत-बहुत धन्यवाद।
">SHRI NADENDLA BHASKARA RAO (KHAMMAM): Mr. Speaker, Sir, most of us come from the farming community, but none of us is interested in the welfare of farmers. Hats off for the Indian farmers who have production about 198 million tonnes of foodgrains so far.
As far as Andhra Pradesh is concerned, the farmers have produced about 1.35 million tonnes of foodgrains. They have given their sweat and blood to us. But what have we given to them? Nothing. From us, there is no helping hand to the farmer. They are left high and dry.
In fifties, sixties and seventies, we used to beg for food from other countries. In those days, our population was only 40 crore or 50 crore. Now, our population is about 95 crore. We are providing food to all of them. It is these farmers who are responsible for this. They are supplying 19 million tonnes of food, and their target is going to be 21 million tonnes of foodgrains in the near future. They are prepared to fulfil it. In spite of that, we are not showing any interest to them. They are being cheated, if I may be allowed to use this word. They are being cheated by all sections of the society. The trader has cheated them, the Government has cheated them, and the middleman has cheated them. Everybody in the society has cheated them. Bureaucrats have cheated them. They are being supplied spurious seeds and adulterated manures. No remunerative price is being fixed or given.
Remunerative price has been fixed for wheat recently. In this regard, I met the hon. Minister and explained to him the plight of the farmers in Andhra Pradesh. A bonus of Rs. 55 has been fixed for wheat whereas paddy is not given any bonus. The paddy ryots are left like that. Most of the paddy is produced in the southern parts of the country, but they have not been given that benefit which he has accorded to the wheat ryots. What was the reason? The credit system that is available to the farmers is miserable.
The conditions which they are putting are very stringent. This is the case either with the cooperative banks or commercial banks. They are unable to tap the proper channel. They have to be motivated and make the credit facility easier for the farmers.
Then, a proper crop pattern has to be introduced in the country. Since a proper crop pattern has not been introduced in the country, if some farmers grow a particular type of crop, everybody is going in for it. So, a proper crop pattern should be introduced in the country. For example, in Andhra Pradesh, cotton has been grown by some farmers this year and everybody has gone in for cotton. Our leader, Dr. Balram Jakhar, has also visited some parts of Andhra Pradesh and he has seen how the cotton growers are suffering there.
Many cotton growers have committed suicide there, because their crop was not insured. The crop insurance scheme has completely failed. There was no proper insurance of their crops. Some foreign countries are following some method. If that system is adopted in our country also, the farmers will be benefited. But that system has not been introduced in our country so far. Some banks have introduced that system in some pockets, but not in the entire country. In Andhra Pradesh, that system is not being followed. Most of the farmers who have committed suicide were from Andhra Pradesh. About 300 farmers have committed suicide there and they were all cotton growers. They have committed suicide because spurious seeds and spurious drugs have been supplied to them. On account of that, they suffered very much, they felt desperate and have committed suicide.
Sir, what ex-gratia amounts are being given by the Central Government and the State Governments? They have given Rs. One lakh to each family. Is it sufficient for the man who had grown the crop and suffered? It is not sufficient. As our hon. friend Shri Vilas Muttemwar has suggested, a minimum of Rs. Five lakh has to be fixed as ex-gratia.
When I met the hon. Minister, I suggested to him to follow the insurance credit card system. In that system, whatever amount the farmer takes as credit, whether it is Rs.10,000/- or Rs.20,000/- or Rs. One lakh from the bank, that amount will be insured by the insurance company. That provision has to be there in the guidelines of the banks. Then, in case the farmer fails to return that amount, the insurance company will step in and pay the amount so that he need not commit suicide. This is the system which is prevailing in some foreign countries. This system is easy to be adopted and this system should be introduced in our country.
Sir, I was the Minister of Agriculture for some time in Andhra Pradesh and I introduced a crop insurance scheme.
MR. SPEAKER: Shri Bhaskar Rao, you can continue tomorrow. I would like to make some announcements.
The House has already taken three hours on this subject. As you are aware, the subject under discussion is very important and I am sure some more Members would like to participate in this debate. If the House agrees, the discussion may be resumed tomorrow, the 2nd June, 1998, at 1.00 p.m. by dispensing with the Lunch hour.
SEVERAL HON. MEMBERS: Yes, Sir.
MR. SPEAKER: All right. Thank you.
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