State Consumer Disputes Redressal Commission
Mohd. Najam Khan & Others vs Sahara City Homes & Others on 10 February, 2015
Daily Order STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 Complaint Case No. C/2014/97 1. Mohd. Najam Khan & Others - ...........Complainant(s) Versus 1. Sahara City Homes & Others - ............Opp.Party(s) BEFORE: HON'BLE MR. JUSTICE Virendra Singh PRESIDENT HON'BLE MR. Jitendra Nath Sinha MEMBER HON'BLE MR. Sanjay Kumar MEMBER For the Complainant: For the Opp. Party: ORDER
राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।
(सुरक्षित) परिवाद संख्या : 97/2014 1 Mohd. Najam Khan, aged about 29 years, son of Mohd. Wasim Khan resident of 56, Umtsar, Unnao, Uttar Pradesh.
2 Smt. Shagoofa Naaz, wife of Mohd. Asif Khan. Resident of 171, idgah, Lakhimpurkhiri.
........... Complainants.
Versus 1- Sahara City Homes (Sahara Prime City Limited), Head office situated at Sahara India Center, 2, Kapoorthala Complex, Lucknow, through its Director/Managing Director.
2- Mr. O.P. Srivastava Deputy Managing Director, Sahara City Homes, situated at Sahara India Bhawan, Kapoorthala Complex, Aliganj, Lucknow.
3- Mr. Rajesh Singh sales head IIM Road, Sahara City Homes, Lucknow. 4- Mr. Amit Sharma Zonal Head Sales Sahara Prime City Limited, Lucknow. .......... Opposite Parties. समक्ष :- मा0 न्यायमूर्ति श्री वीरेन्द्र सिंह, अध्यक्ष मा0 श्री जितेन्द्र नाथ सिन्हा, सदस्य मा0 श्री संयज कुमार, सदस्य परिवादी के अधिवक्ता : श्री सर्वेश कुमार शर्मा विपक्षी के अधिवक्ता : श्री पियूष कुमार अग्रवाल दिनांक :10-7-2015 मा0 श्री जितेन्द्र नाथ सिन्हा, सदस्य द्वारा उदघोषित निर्णय
वर्तमान परिवाद परिवादीगण की ओर से इस अनुरोध के साथ प्रस्तुत किया गया कि विपक्षीगण को आदेशित किया जाय कि उनके द्वारा परिवादी को प्रथम तल पर फ्लेट नं0- सी-25/105 पर कब्जा प्रदान किया जाय अथवा उसी योजना के अन्तर्गत कोई दूसरे फ्लेट पर कब्जा परिवादीगण को उपलब्ध करा दिया जाय एवं जमा धनराशि पर जमा किये जाने की तिथि से कब्जा दिलाये जाने की तिथि तक 24 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से ब्याज भी दिलाया जाय एवं सेवा की कमी के कारण विपक्षीगण से रू0 20,00,000.00 क्षतिपूर्ति मय ब्याज के दिलाया जाय एवं परिवाद व्यय के रूप में रू0 1,00,000.00 भी दिलाया जाय।
-2-परिवाद पत्र का अभिवचन संक्षेप में इस प्रकार है कि परिवादी सं0-1 मो0 नजम खॉ विकलांग है एवं वह अपने परिवारिक सदस्यों एवं परिवाद सं0-2 पर निर्भर है एवं उन्हें भवन की तत्काल आवश्यकता रही। तो विपक्षीगण की योजना में परिवादीगण ने भवन प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। विपक्षीगण ने यह बताया था कि मार्च 2013 के पहले भवन पर कब्जा भी उपलब्ध करा दिया जायेगा। उक्त आश्वासन के दृष्टिगत रू0 45,70,000.00 की कीमत पर सी-25/105 परिवादी पक्ष को आवंटित किया गया एवं दिनांक 16.6.2012 के आवंटन के संदर्भ में विपक्षीगण द्वारा परिवादी को पत्र निर्गत किया गया और उसमें किस प्रकार से धनराशि की अदायगी की जायेगी उसका भी स्पष्ट उल्लेख किया गया। परिवादी विकलॉग श्रेणी में आता था, अत: परिवादी के लिए रू0 31,99,000.00 की कीमत प्रश्नगत फ्लेट के लिए निश्चित की गई। उक्त भवन के संदर्भ में परिवादी पक्ष ने रू0 28,85,000.00 विपक्षीगण को अदा कर दिये, परन्तु परिवादी पक्ष को कब्जा उपलब्ध नहीं कराया गया। परिवादी ने इस आशय का भी अनुरोध किया कि यदि कब्जा दिलाया जाना सम्भव नहीं है, तो परिवादी पक्ष द्वारा जमा धनराशि वापस कर दी जाय। विपक्षीगण ने न तो कब्जा दिया और न ही धनराशि वापस की। परिवादी प्रश्नगत भवन के स्थल पर भी गया। वहॉ उसे पता चला कि वर्ष-2015 में निर्माण पूरा हो जायेगा और यह भी पता चला कि भवन का जो निर्माण हुआ है, वह त्रुटि पूर्ण है और मानक से कम है। परिवादी द्वारा कर्ज लेकर प्रश्नगत धनराशि विपक्षीगण को अदा की गई थी और इस प्रकार विपक्षीगण द्वारा फ्लेट उपलबध न कराकर परिवादी को मानसिक एवं आर्थिक रूप से परेशानी में डाला गया और इस प्रकार परिवादीगण ने उपरोक्त वर्णित अनुतोष प्रदान किये जाने हेतु दिनांक 16.7.2014 को वर्तमान परिवाद प्रस्तुत किया।
विपक्षीगण की ओर से प्रारम्भिक आपत्ति के माध्यम से यह अभिवचित किया गया कि वर्तमान प्रकरण में परिवादी उपभोक्ता की श्रेणी में स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है। अत: परिवादी उपभोक्ता फोरम के समक्ष अपोषणीय है।
विपक्षीगण की ओर से लिखित कथन में प्रारम्भिक आपत्ति पर बल देते हुए परिवादी पक्ष द्वारा विपक्षीगण के विरूद्ध लगाये गये दोषारोपण -3- को अस्वीकार किया एवं लिखित कथन में स्पष्ट रूप से यह अभिवचित किया गया कि भवन का आवंटन परिवादी पक्ष के संदर्भ में रू0 31,99,000.00 की धनराशि पर तय किया गया था एवं दिनांक 21.8.2014 तक प्रश्नगत भवन के संदर्भ में विपक्षीगण ने परिवादी पक्ष से रू0 24,29,297.00 प्राप्त कर लिया था एवं रू0 63,059.00 भी प्राप्त किया गया, जो विलम्ब के संदर्भ में ब्याज के रूप में है। विपक्षीगण ने परिवादी के पक्ष में अनापत्ति प्रमाण पत्र निर्गत किया, जिससे कि वह यूको बैंक से कर्ज प्राप्त कर सके। परिवादी और विपक्षीगण के बीच एग्रीमेंट टू सेल की संविदा का होना भी स्वीकार किया गया एवं परिवादी द्वारा आवंटन निरस्त किये जाने के संदर्भ में जो अनुरोध विपक्षी से किया गया, उस संदर्भ में विपक्षीगण ने परिवादी को सूचित कर दिया था कि आवंटन उसी संदर्भ में निरस्त किया जा सकता है, जब बैंक द्वारा अनापत्ति प्रमाण पत्र निर्गत किया जाय और मूल दस्तावेज एन0ओ0सी0 आदि परिवादीगण द्वारा विपक्षीगण को वापस कर दी जाय। परिवादी द्वारा उपरोक्त वर्णित अभिलेख विपक्षीगण को उपलब्ध नहीं कराये गये एवं दुर्भावनापूर्ण रूप से परिवाद प्रस्तुत कर दिया गया और स्पष्ट रूप से यह भी अभिवचित किया गया कि वर्तमान परिवाद उपभोक्ता फोरम के समक्ष पोषणीय नहीं है।
परिवादी की ओर से मुख्य रूप से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि परिवादी एक विकलांग व्यक्ति है और संविदा के तहत परिवादी ने विपक्षी के माध्यम से फ्लेट प्राप्त किये जाने हेतु अभिवचित धनराशि की अदायगी की गई थी, परन्तु परिवादी को निर्धारित समय के अन्तर्गत फ्लेट पर कब्जा उपलब्ध नहीं कराया गया एवं विपक्षी के पत्र दिनांक 21.9.2012 के अनुसार प्रश्नगत फ्लेट की कीमत 31,99,000.00 रू0 रही और परिवादी द्वारा कुल 28,85,500.00 रू0 अदा किया गया। इस प्रकार केवल 3,13,500.00रू0 ही परिवादी द्वारा विपक्षी को इस संदर्भ में अदा करना शेष था और विपक्षी द्वारा प्रश्नगत फ्लेट परिवादी को उपलब्ध नहीं कराया जा सका। अत: परिवादी ने वर्तमान परिवाद कब्जा प्राप्त किये जाने हेतु अनुतोष एवं जमा की गई धनराशि पर कब्जा दिलाये जाने की तिथि तक 24 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से ब्याज और रू0 10,00,000.00 क्षतिपूर्ति दिलाये जाने हेतु प्रस्तुत किया।
-4-विपक्षी की ओर से मुख्य रूप से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि वर्तमान परिवाद उपभोक्ता फोरम के समक्ष पोषणीय नहीं है। परिवादी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा उ0प्र0 राज्य आयोग की नजीर Shriram Transport Finance Company Limited. Vs. Pramod Kumar Tripathi IV (2011) CPJ 26 की ओर पीठ का ध्यान आकर्षित कराते हुए यह कहा गया कि क्षेत्राधिकार के सम्बन्ध में मामला किसी भी स्तर पर उठाया जा सकता है और अपने तर्क को आगे बढाते हुए विपक्षी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा Bangalore Development Authority Vs. Syndicate Bank (2007) 6 Supreme Court Cases 711 एवं Lucknow Development Authority Vs. M.K.Gupta (1994) 1 Supreme Court Cases 243 की ओर पीठ का ध्यान आकर्षित कराते हुए यह कहा गया कि ऐसे प्रकरण में जहॉ मकान की बिक्री की बावत संविदा हो, वहॉ विक्रेता को सर्विस प्रोवाइडर एवं क्रेता को उपभोक्ता स्वीकार करना उचित नहीं है। वर्तमान प्रकरण उपभोक्ता फोरम की परिधि से बाहर है सम्बन्धी अपने तर्क को आगे बढाते हुए विपक्षी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा पीठ का ध्यान मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा M/s. Sahara India Commercial Corpn. Ltd. Vs. P. Gajendra Chary, Revision Petition No. 497 of 2006 निर्णीत दिनांक 22.4.2010 की फोटो प्रति प्रस्तुत की गई और यह कहा गया कि मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा उपरोक्त वर्णित प्रकरण में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया कि संविदा की शर्तो की बाध्यता पक्षकारान पर है एवं फोरम को यह अधिकार प्राप्त नहीं है कि पक्षकारान के बीच हुई संविदा के किसी अंश को अवैध घोषित कर दें।
उपरोक्त तर्क के खण्डन में परिवादी की ओर से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि वर्तमान प्रकरण में संविदा की किसी शर्त को अवैध घोषित करने का कोई प्रकरण विचाराधीन नहीं है, इसलिए मा0 राष्ट्रीय आयोग की उपरोक्त वर्णित निर्णय का कोई प्रभाव वर्तमान परिवाद में नहीं है।
परिवादी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा विपक्षी के तर्क का खण्डन करते हुए यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा- 2 (1) (O) में भवन निर्माण (Housing Construction) भी सेवा की परिभाषा में स्वीकार किया गया है एवं विपक्षी की ओर से प्रश्नगत नजीर -5- Bangalore Development Authority Vs. Syndicate Bank (2007) 6 Supreme Court Cases 711 की धारा-10 (बी) उल्लेखनीय है, जो इस प्रकार है:-
10. Where a development authority forms layouts and allots plots/flats (or houses) by inviting applications, the following general principles regulate the granting of relief to a consumer (the applicant for allotment) who complains of delay in delivery or non-delivery and seeks redressal under the Consumer Protection Act, 1986 ("the Act", for short) (vide Lucknow Development Authority v. M.K. Gupta, Ghaziabad Development Authority v. Balbir Singh and HUDA v. Darsh Kumar, as also Ghaziabad Development Authority v. Union of India):
(b) Where no time is stipulated for performance of the contract (that is for delivery), or where time is not the essence of the contract and the buyer does not issue a notice making time the essence by fixing a reasonable time for performance, if the buyer, instead of rescinding the contract on the ground of non-performance, accepts the belated performance in terms of the contract, there is no question of any breach or payment of damages under the general law governing contracts. However, if some statute steps in and creates any statutory obligations on the part of the development authority in the contractual field, the matter will be governed by the provisions of that statute.
इस संदर्भ में मा0 उच्चतम न्यायालय की नजीर McDermott International Inc. v. Burn Standard Co. Ltd., (2006) 11 SCC 181 at page 217 एवं GDA v. Balbir Singh, (2004) 5 SCC 65, में मा0 उच्चतम न्यायालय द्वारा निम्नलिखित टिप्पणी का उल्लेख किया गया है:-
Where an allotment is made, price is received/paid but possession is not given within the period set out in the brochure, the Commission/Forum would then need to determine the loss. Loss could be determined on basis of loss of rent which could have been earned if possession was given and the premises let out or if the consumer has had to stay in rented premises then on basis of rent actually paid by him. Along with recompensing the loss, the Commission/Forum may also -6- compensate for harassment/injury, both mental and physical. Similarly, compensation can be given if after allotment is made there has been cancellation of scheme without any justifiable cause.
That compensation cannot be uniform can best be illustrated by considering cases where possession is being directed to be delivered and cases where only monies are directed to be returned. In cases where possession is being directed to be delivered the compensation for harassment will necessarily have to be less because in a way that party is being compensated by increase in the value of the property he is getting. But in cases where monies are being simply returned then the party is suffering a greater loss inasmuch as he had deposited the money in the hope of getting a flat/plot. He is being deprived of that flat/plot. He has been deprived of the benefit of escalation of the price of that flat/plot. Therefore the compensation in such cases would necessarily have to be higher.
वर्तमान प्रकरण में विपक्षी और परिवादी के बीच फ्लेट के संदर्भ में संविदा हुई थी और रू0 31,99,000.00 में परिवादी जो विकलॉग है, को प्रश्नगत फ्लेट विपक्षी द्वारा दिये जाने की बात तय हई थी एवं परिवादी ने रू0 28,85,500.00 की धनराशि अदा कर दी है, उसके बावजूद भी परिवादी को फ्लेट पर कब्जा नहीं दिया गया और यह बताया गया कि फ्लेट अभी बनकर तैयार नहीं है। अत: परिवादी द्वारा दिनांक 04.3.2014 को विपक्षी को इस आशय का पत्र लिखा गया कि दिनांक 31.3.2014 तक उसे फ्लेट पर कब्जा दिया जाय अन्यथा परिवादी द्वारा अदा की गई धनराशि मय ब्याज के वापस कर दिया जाय। तत्पश्चात कई बार अनुरोध के बावजूद भी परिवादी को विपक्षी द्वारा प्रश्नगत फ्लेट पर कब्जा भी नहीं दिया गया और प्रश्नगत धनराशि मय ब्याज के वापस भी नहीं किया गया एवं बाद में विपक्षी द्वारा यह कहा गया कि प्रश्नगत फ्लेट का निर्माण तेजी से हो रहा है और वह जल्दी ही परिवादी को फ्लेट पर कब्जा दे देंगे और जमा की गई धनराशि वापस किया जाना स्वीकार नहीं किया -7- गया। परिवाद पत्र में स्पष्ट रूप से यह अभिवचित किया गया कि 2015 तक अभी फ्लेट बनाया नहीं जा सका है और परिवाद के माध्यम से परिवादी द्वारा फ्लेट पर कब्जा दिलाये जाने हेतु अनुरोध किया गया और क्षतिपूर्ति व जमा धनराशि पर ब्याज की भी मॉग की गई और परिवाद पत्र के अभिवचन को देखते हुए एवं उपरोक्त वर्णित नजीरों में प्रतिपादित सिद्धांत के दृष्टिगत वर्तमान परिवाद उपभोक्ता फोरम की परिधि में स्वीकार किये जाने योग्य है और परिवादी प्रश्नगत भवन पर बकाया धनराशि अदा करने के पश्चात कब्जा पाने का अधिकारी है। यहॉ इस बात का उल्लेख करना उचित प्रतीत होता है कि वर्तमान परिवाद में परिवादी ने प्रश्नगत धनराशि प्रश्नगत धनराशि की वापसी के संदर्भ में अनुतोष नहीं मॉगा है, अत: इस संदर्भ में वर्तमान प्रकरण में आदेश पारित किया जाना विधि अनुकूल नहीं है।
वर्तमान प्रकरण में अविवादित रूप से परिवादी द्वारा बकाया धनराशि विपक्षी को अदा करना शेष है एवं रजिस्ट्री आदि के संदर्भ में भी जो व्यय होता है, उसका भुगतान भी परिवादी द्वारा ही किया जाना है। अत: इस संदर्भ में भी परिवादी को वॉछित धनराशि की अदायगी किया जाना आवश्यक है और इस प्रकार वर्तमान प्रकरण में परिवादी को निर्णय की तिथि से दो माह के अन्दर बकाया धनराशि एवं संविदा के अनुसार शेष धनराशि व पंजीकरण आदि के संदर्भ में धनराशि का भुगतान विपक्षी को दो माह के अन्दर कर दे। यहॉ यह उल्लेख किया जाना समीचीन है कि बकाया धनराशि पर कोई दण्ड ब्याज विपक्षी को देय नहीं है क्योंकि विपक्षी स्वयं संविदा में वर्णित तिथि तक भवन का कब्जा देने में विफल रहे हैं। यदि परिवादी द्वारा उपरोक्त वर्णित धनराशि की अदायगी निर्धारित समय के अन्दर कर दी जाती है, तो उस स्थिति में परिवादी द्वारा अभिवचित धनराशि की अदायगी के दो माह के अन्दर विपक्षी द्वारा परिवादी को प्रश्नगत भवन और यदि उक्त भवन तैयार न हो तो समान मूल्य व आकार का अन्य कोई भवन पर कानूनी औपचारिकताएं पूरी करते हुए कब्जा उपलब्ध कराये जाने हेतु आदेशित किया जाना न्याय संगत एवं उचित प्रतीत होता है।-8-
आदेश वर्तमान परिवाद अंशत: स्वीकार करते हुए परिवादी को आदेशित किया जाता है कि वह निर्णय की तिथि से दो माह के अन्दर बकाया धनराशि व अन्य धनराशियां अर्थात पंजीकरण के संदर्भ में देय धनराशि आदि विपक्षी को अदा कर दें एवं विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह परिवादी द्वारा प्रश्नगत धनराशि की अदायगी की तिथि से दो माह के अन्दर प्रश्नगत भवन और यदि उक्त भवन तैयार न हो तो समान मूल्य व आकार के अन्य भवन पर परिवादी को कब्जा कानूनी औपचारिकताएं पूरी करते हुए उपलब्ध करा दें।
(न्यायमूर्ति वीरेन्द्र सिंह) (जे0एन0 सिन्हा) (संजय कुमार) अध्यक्ष सदस्य सदस्य हरीश आशु., कोर्ट सं0-1 [HON'BLE MR. JUSTICE Virendra Singh] PRESIDENT [HON'BLE MR. Jitendra Nath Sinha] MEMBER [HON'BLE MR. Sanjay Kumar] MEMBER