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Lok Sabha Debates

Further Discussion On The Resolution On Implementation Of Policies And ... on 1 August, 2003

/font> 15.32 hrs. PRIVATE MEMBERS RESOLUTION

(i) Re: Implementation of policies and programmes for S.C./S.T. etc. Title: Further discussion on the resolution on implementation of policies and programmes for SC/ST, etc. moved by Shri Ramdas Athawale on 25.4.2003 (Resolution withdrawn) MR. DEPUTY-SPEAKER: Before further discussion on the Resolution regarding implementation of policies and programmes for Scheduled Castes and Scheduled Tribes, etc. moved by Shri Ram Das Athawale is resumed, I have to mention that 2 hours 53 minutes have been taken on this Resolution. The time allotted for discussion on this Resolution has already been exhausted. The concerned Minister who was on his legs has to resume his intervention now. Thereafter the mover has the right of reply. The House may consider whether to extend the time for further discussion on the Resolution.

Is it the pleasure of the House that the time for this Resolution be extended by 15 minutes?

SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.

MR. DEPUTY-SPEAKER: The time is extended by 15 minutes. So, the hon. Minister may resume his intervention now.

SHRI SANSUMA KHUNGGUR BWISWMUTHIARY (KOKRAJHAR): Mr. Deputy-Speaker, Sir, the learned Members of this august House may consider extending time for discussion on the Sixth Schedule to the Constitution (Amendment) Bill, 2003.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Sansuma Khunggur Bwiswmuthiary, you are a senior Member, we have already taken Private Members’ Business which I just mentioned now. The hon. Minister is now again on his legs.

DR. V. SAROJA (RASIPURAM): Mr. Deputy-Speaker, Sir, last time the discussion was not concluded and I was speaking at that time. I may be given one or two minutes to conclude my speech. It is not concluded.

MR. DEPUTY-SPEAKER: No, the hon. Minister was on his legs. The hon. Minister did not conclude his intervention.

DR. V. SAROJA : Sir, after his reply, I may be allowed to put one or two supplementaries.

THE MINISTER OF SOCIAL JUSTICE AND EMPOWERMENT (DR. SATYANARAYAN JATIYA): It will be welcome.… (Interruptions)

   

डॉ. सत्यनारायण जटिया : माननीय उपाध्यक्ष जी, निश्चित रूप से यह प्रस्ताव जो संकल्प के रूप में सदन के सामने आया है, इसमें जो चिन्ता व्यक्त की गई है वह यह है कि अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए नीति और कार्यक्रमों के बारे में सरकार कुछ ऐसे प्रबंध करे जो इस समाज के सामाजिक, शैक्षिक, राजनीतिक और आर्थिक उत्थान में सहायक बनें और उससे उनके जीवन स्तर में सुधार आए जिससे वे सम्माननीय नागरिक के रूप में अपना जीवन-यापन कर सकें।

हम सब जानते हैं कि भारत का संविधान इस बात के लिए प्रतिबद्ध है। उसकी उद्देश्यिका में जो कुछ कहा गया है, वही हमें इस बात के लिए संकल्पबद्ध करता है कि हम इसे कैसे पूरा कर सकें। प्रियैम्बल में ही संविधान की भावनाओं को व्यक्त करने का काम हुआ है। उसमें कहा गया है कि -

"We the people of India solemnly resolve to constitute India into……"
"हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न... " अर्थात् किसी भी तरह से हम कमजोर नहीं देखना चाहते हैं। फिर उसमें विशेषता बताते हुए कहा गया है कि "समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा इसके समस्त नागरिकों को " - इसमें कोई गुंजाइश नहीं कि किसी को छोड़ दिया जाए -- समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय दें।
यह बहुत बड़ी बात है। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, यह होना जरूरी है। फिर उसके बाद तो हमने कहा है सामाजिक, आर्थिक न्याय, विश्वास, धर्म, उपासना सबकी स्वतंत्रता, न्याय की स्वतंत्रता, समता, बंधुता आदि, ये सारी विशेषताएं गिनाई गई हैं। सबसे पहली जो जरूरत है वह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय है। यानी जस्टिस सोश्यल, इकनौमिक एंड पालटिकल। सोश्यल जस्टिस के लिए आर्थिक प्रबन्ध होना चाहिए, सोश्यल जस्टिस के लिए राजनीतिक प्रबन्ध होना चाहिए और एजूकेशन का प्रबन्ध होना चाहिए। शिक्षा और आर्थिक रूप से सम्पन्नता होनी चाहिए। आर्थिक रूप से सम्पन्न होते हुए, राजनीतिकरूप से अधिकारिता कैसे मिले, इन सारी बातों का जो आज उल्लेख हुआ है, उस पर फिर से सदन में चर्चा करने के लिए अवसर उपलब्ध हुआ है। इसमें सरकार ने पिछले ५० वर्षों में जो उपाय किए हैं, उनसे जो कुछ भी उपलब्धियां प्राप्त हुई हैं, वे हमारे सामने हैं। यह बात नहीं है कि यह काम पूरा हो गया है, बल्कि इस काम को निरन्तर करते जाना है और जब हम लोग यह काम करते हैं, तो इसमें सब लोगों का सहयोग जरूर अपेक्षित है।
उपाध्यक्ष महोदय, हम जानते हैं कि सरकार कोई भी योजना चलाए, उसके लिए वित्तीय प्रबन्ध होना बहुत आवश्यक है और जिस अनुपात में वित्तीय प्रबन्ध होते हैं, उसी अनुपात में योजनाओं को आगे बढ़ाया जाता है। अर्थ के बिना तो सब कुछ अनर्थ हो जाता है। इसलिए यह बात सरकार के वित्तीय प्रबन्ध पर ज्यादा निर्भर करती है। इसके लिए हम सभी की चिन्ता है कि कितने वित्तीय प्रबन्ध की व्यवस्था की जाए जिससे हम सबको समर्थ और सक्षम बनाने का काम कर सकें। इन सारी बातों को करते हुए निश्चित रूप से हमें एक लम्बा समय हुआ है और उसके माध्यम से हम एक पुनर्विलोकन करने का काम भी कर रहे हैं। जहां हम पहुंचे हैं, वहां से आगे अभी हमें बहुत काम करना बाकी है।
महोदय, शिक्षा की द्ृष्टि से हमने आरक्षण के प्रावधान किए हैं। इसके अन्तर्गत स्कालरशिप, छात्रवृत्ति के माध्यम से उनका उन्नयन हो, फिर समय-समय पर छात्रवृत्ति का रिवीजन होना, रिवीजन होने के बाद, समय पर उसका वितरण होना चाहिए और इसमें सार्वदेशिक रूप से सभी सरकारों को, चाहे वे राज्य सरकारें हों, चाहे वह केन्द्र सरकार हो या और नीचे कोई और निकाय हों, उनका सामंजस्य पूर्ण संबंध ही इस स्थिति में परिवर्तन लाने का कारण बन सकता है, लेकिन हम देखते हैं कि इस बारे में कहीं थोड़ा सा भी ध्यान नहीं दिया गया, तो निश्चित रूप से अपेक्षित परिणाम नहीं आते, जिन्हें आना चाहिए और इसमें बहुत लम्बा समय लग जाता है।
महोदय, हमने गत ५० वर्षों में जो सुविधाएं देने का काम किया, उसमें पहली बात यह है कि सामाजिक प्रोटैक्शन मिलने का काम, सामाजिक समता के उपाय और सामाजिक समता के उपाय हेतु कानूनी तरीके से हम किस तरह से उस व्यक्ति के ऊपर, जो अनुसूचित जाति का है, किसी कमजोर वर्ग का है, उसके ऊपर अत्याचार न हों किसी तरह से समाज में उसके साथ डिस्क्रिमिनेशन न किया जाए, उसके साथ मनुष्यता का व्यवहार हो, नागरिकता का व्यवहार हो। एक नागरिक का दूसरे नागरिक के प्रति जो व्यवहार होना चाहिए, वह व्यवहार हो और इसलिए यह कहना कि सामाजिक समानता, मनुष्यता का जन्मसिद्ध अधिकार है, यह युक्तियुक्त है और यह बात, हमारे संविधान के मौलिक सिद्धान्तों के निष्कर्ष के रूप में आती है। इसलिए पहली बात यह है कि मनुष्य का मनुष्य के साथ मनुष्यता का व्यवहार होना चाहिए। एक नागरिक को दूसरे के साथ नागरिकता का ही व्यवहार करना चाहिए, इससे कम नहीं होना चाहिए और यदि कोई इससे कम व्यवहार करता है, तो वह भारत के संविधान के प्रति जो आस्था और सम्मान है, उसे पूरा करने का काम नहीं करता है। इसलिए हम सभी की जरूरत और चाहत निश्चित रूप से यही है और हमारा यही प्रयास होना चाहिए, लेकिन हम देख रहे हैं कि हमारे इतने वर्षों के प्रयास के बाद भी आज अन्तर है। यदि अन्तर नहीं रहा होता, तो इसे यहां लाने की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन निश्चितरूप से अन्तर आज भी विद्यमान है, पहले भी था। इस अन्तर को कैसे कम करें और कैसे उसे सम्मानित करने का काम करें, यह उपाय करने की द्ृष्टि से यह कानून बनाया है।
उपाध्यक्ष महोदय, रामजी लाल सुमन जी ने कहा था कि कमजोर वर्गों पर जो अत्याचार बढ़ रहे हैं, उन्हें कैसे रोका जाए। मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि कमजोर वर्गों पर अत्याचारों को रोकने के लिए ही हमने कानून का प्रबन्ध किया है। जहां-जहां यह अन्याय और अत्याचार हो रहा है, उसे प्रभावी ढंग से, सख्ती से, कड़ाई से रोका जाए और दोषी के खिलाफ किसी भी प्रकार की रियायत न बरतते हुए, किसी प्रकार का पक्षपात न करते हुए, कानून का उपयोग किया जाना चाहिए, किन्तु हम देखते हैं कि कानून के रहते हुए भी इस प्रकार की घटनाएं निरन्तर होती जा रही हैं। इस सदन में और सदन के बाहर, जनता का ध्यान, लोगों का ध्यान इस ओर जाता है। आज हम इस स्थिति में हैं कि हम पूर्ण रूप से अनुसूचित जाति के लोगों, कमजोर लोगों के साथ हैं, सरकार उनके साथ है, ऐसा कहने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि ऐसा करने का जो माद्दा है वह तभी आएगा जब कि हम सब सामाजिक रूप से जागरुक होकर इस बात को कहें॥ हमने पीसीआर एक्ट १९५५ और पीओ एक्ट १९८९ बना कर, इन सारे प्रावधानों को बनाने का काम हमने जरूर किया है, परन्तु इसमें जो प्रोसिक्यूशन और कानूनी कार्यवाही होती है, उस कानूनी कार्यवाही को पुरजोर तरीके से रखे जाने में जिस प्रकार की परेशानी और अन्याय का शिकार वह व्यक्ति या उन व्यक्तियों का समूह हुआ है। हम जब देखते हैं कि जब कार्यवाही होती है तो उसमें ठीक प्रकार से ध्यान न देने के अनेक प्रकार के कारण हो सकते हैं। हो सकता है कि उसके लिए वित्तीय संसाधन न हों, अन्य बातें प्रायोरटी पर रखें और इन बातों को कम प्रायोरटी मिलती हो। इसके कारण कानून होते हुए भी अन्याय और अत्याचार हो रहे हैं। हमारे यहां कई प्रकार के कानून बने हुए हैं। भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता के रहते हुए भी अपराध तो जरूर हैं परन्तु अपराध होने का अर्थ यह है कि जिसने अपराध किया है उसे दंड मिलना चाहिए। इसका प्रबंध कानून में किया है, लेकिन वह तब तक नहीं होता है जब तक कानून का भय लोगों में नहीं रहता है और इस द्ृष्टि से कानून के माध्यम से भी उन्हें प्रोटेक्शन देने का काम बहुत जरूरी है।
महोदय, हम जानते हैं कि संविधान में भी इस प्रकार के सारे उपाय हुए हैं, उसके आधार पर हमने कहा है कि किसी के साथ भेद नहीं किया जाए। हमने अस्पृश्यता को समाप्त कर दिया है। संविधान में कहा है कि जहां अस्पृश्यता का बर्ताव है, निश्चित रूप से मनुष्य के साथ ठीक प्रकार का बर्ताव न होना हम सबके लिए चिन्ता का विषय है। एक व्यक्ति पवित्र है और दूसरा अपवित्र है, क्या किसी को स्पर्श करने से कोई अपवित्र हो जाएगा? मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि उसकी पवित्रता ही कमजोर है, इस कारण वह स्पर्श करने से अपवित्र हो गया है। इसलिए यह जो मानसिकता है, इसे बदलने की जरूरत है। इसमें धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है, धीरे-धीरे ये बातें कम हो रही हैं। ५० वर्ष का समय कम नहीं होता है, इसलिए यह हम सब और सरकार के लिए भी चिन्ता का विषय है कि हम किस तरह से जागरूकता पैदा करके लोगों को इस प्रकार के अधिकार दें, जिसमें उन्हें सम्मान मिले। इसलिए अनेक स्थानीय निकाय, पंचायतें हैं, उनमें उनके लिए आरक्षित पद करके, उन्हें प्रतिष्ठित करने का काम करना चाहिए - कहीं सरपंच, नगरपालिका एवं नगर पंचायत के अध्यक्ष, नगर-निगम के अध्यक्ष और कहीं संसद एवं विधानसभा के सदस्य बना कर, उनमें पद प्राप्त करा कर उन्हें सम्मान देने की कोशिश हमारी जारी है, परन्तु फिर भी यह केवल राजनैतिक अधिकारिता हैं, निश्चित रूप आर्थिक अधिकारिता भी बहुत महत्वपूर्ण है। इन्हें आर्थिक रूप से संपन्न बनाना भी बहुत जरूरी है। उसके लिए सरकार ने योजनाएं शुरू की हैं। हमने सरकार की तरफ से ऐसी योजनाएं शुरू की हैं, जिनमें कम ब्याज पर कर्ज देने का काम हो। जो छोटे-छोटे काम करते हैं, अपना व्यवसाय करते हैं, उसे ज्यादा पूंजी की जरूरत नहीं होती है। कोई आदमी अपना ठेला चला कर, जमीन पर बैठ कर, नुक्कड़ पर दुकान लगा कर काम करता है, उसे ज्यादा पूंजी की जरूरत नहीं होती है, उसे दो,पांच,दस, २० या २५ हजार रुपए की जरूरत होती है। हमने जो कार्पोरेशंस बनाए हैं, उनके माध्यम से हम पांच प्रतिशत पर ऋण देने का काम करते हैं और उनके माध्यम से वे अपना रोजगार शुरू कर सकते हैं।
महोदय, हमने पिछले वर्ष इस योजना को शुरू किया है और उसके अच्छे परिणाम आए हैं। बड़ा कर्जा लेने के लिए बड़े बैंक हैं। इस समझ का जो आदमी है कि हमें कर्ज मिल सकता है, जो पढ़ा-लिखा है वह तो अपने लिए कोई उपाय कर सकता है, लेकिन जिसके पास शिक्षा एवं ज्यादा सुविधाएं नहीं हैं, उन्हें भी लाभान्वित करने के लिए हमने कोशिश की है और उसके कारण ही अच्छी संख्या में लोग आगे आए हैं। उसके लिए भी जो चेनालाइजिंग एजेंसियां हैं, राज्य सरकारें हैं, जिनके माध्यम से इसे किया जाना है, उन तक पहुंचने के लिए हितग्राही समूह है, उनके माध्यम से जिन्हें सहायता पहुंचानी है, उन्हें ठीक से सहायता पहुंच पाए, इसके लिए कम इंटरस्ट पर हम उन्हें लोन देते हैं। यहां से जब हम शुरू करते हैं तो दो प्रतिशत से शुरू करते हैं, लेकिन स्टेट में जाने के बाद दो-तीन प्रतिशत लेने का वे काम करते हैं और यदि आगे कोई चेनालाइजिंग एजेंसी हैं या किसी हितग्राही तक पहुंचने के लिए, उसे सहायता पहुंचानी हो तो उसमें भी ज्यादा खर्च हो जाता है। उसके कारण हमारा उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता है। इसलिए हमारी कोशिश यह है कि कैसे उन तक सीधे लाभ पहुंचाया जा सके, इस प्रकार का उपाय करने का हम प्रयास करते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में नयी छात्रवृत्तियां शुरू करने का काम हमने किया है और एजुकेशन के स्तर में सुधार करने का काम किया है। पिछले वर्ष अम्बेडकर छात्रवृत्ति योजना शुरू करने काम किया और उसका अच्छा रेस्पोंस आया है। देशभर से इसमें विद्यार्थी आए हैं।
जिनका कि मैटि्रक के बाद ड्राप आउट हो जाता है, वे आगे नहीं पढ़ पाते हैं। मैं अभी हैदराबाद में था, आन्ध्रा प्रदेश में यह कार्यक्रम हुआ, काफी लोगों का रैस्पोंस उसमें हमें मिला है। यहां भी दिल्ली में जब हमने प्रोग्राम किया था तो १०-११ प्रदेशों से लोग आये थे और हमने ऐसी एक विशेष स्कालरशिप शुरू की है, यानी जो प्रथम स्थान बोर्ड में प्राप्त करता है, यह स्कीम अनुसूचित जाति और जनजाति दोनों के लिए है, उसे हमने ६० हजार रुपये, जो दूसरा स्थान प्राप्त करता है, उसके लिए ५० हजार रुपये, तीसरा स्थान प्राप्त करने वाले के लिए ४० हजार रुपये का प्रावधान है। यदि उसमें कोई छात्रा नहीं है तो उसके लिए भी अतरिक्त छात्रवृत्ति का प्रावधान करते हुए ४० हजार रुपये का प्रावधान है। इतना ही नहीं, राज्यों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के संख्या के अनुपात में, वहां की आबादी में उनकी जनसंख्या का जो अनुपात है, उस अनुपात के आधार पर भी और १० हजार रुपये की २५० और छात्रवृत्तियां देकर उनको प्रोत्साहन देने का, शुरू करने का हमने काम किया है। मुझे यह प्रसन्नता है कि यह योजना प्रारम्भ हो चुकी है।
आगे भी हम यह चाहते हैं कि अच्छे रेजीडेंशियल स्कूल्स, अच्छे पब्लिक स्कूल्स में उन्हें एण्ट्री मिलने का काम हो सके, यह योजना अभी प्रक्रिया में है। शीघ्र ही वह योजना आने के लिए तैयार है। पैसे का अभाव भी एक कारण है। आजकल पैसा ही शिक्षा का एक माध्यम बन गया है, अच्छा पैसा, अच्छी शिक्षा और गरीब आदमी के पास, कमजोर वर्ग के आदमी के पास, अनुसूचित जाति के आदमी के पास पैसा नहीं होने के कारण उसकी शिक्षा भी उसी प्रकार की कमजोर हो जाती है, क्योंकि वह ज्यादा पैसा देकर शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता, इसलिए शिक्षा के स्तर में जो विभेद हो गया है, इस विभेद को दूर करने की द्ृष्टि से भी सरकार ने एक योजना की शुरूआत करने का निश्चय किया है और उसके माध्यम से हम चाहते हैं कि ऐसे विद्यार्थी को, जो पढ़ने के लिए आगे आनेके लिए अपने आपको तैयार करता है, जिसमें टेलेंट है, जो पढ़ना चाहता है, किन्तु उसके पास पैसा नहीं है तो ऐसे विद्यार्थी को भी ऐसे पब्लिक स्कूल में या ऐसे स्कूल में, जहां कि अच्छी शिक्षा का प्रबन्ध हुआ है, उस प्रबन्ध में हम उसे जितना उसका शुल्क लगता है, चाहे वह १० हजार, २० हजार, २५ हजार या ५० हजार हो और अच्छी उच्च शिक्षा के लिए एक लाख रुपये भी वर्ष भर का लगता है तो उसे हम सहायता के रूप में देकर उसकी शिक्षा को आगे बढ़ाने की योजना हमने बनाई है। वह योजना भी सरकार के विचाराधीन है।
इसी प्रकार से अच्छे रेजीडेंशियल स्कूल जो हैं, हम जानते हैं कि शिक्षा ही मनुष्य के विकास का आधार है। यदि शिक्षा न हो तो मनुष्य मनुष्य की तरह व्यवहार नहीं करेगा। हम जानते हैं कि प्रारम्भ से यदि शिक्षा का स्तर ठीक प्रकार का हो जाये तो आगे उसे जाने में कठिनाई नहीं होती। प्राथमिक शिक्षा उसकी ठीक हो जाये, उसके बाद उच्च प्राथमिक शिक्षा उसकी ठीक हो जाये, फिर उसके बाद हम देखेंगे कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने की द्ृष्टि से भी अच्छा मौका उसे मिल जाता है। फिर यदि प्रोफेशनल स्टडीज में कहीं उसे जाना है और उसमें हमारे अनेक साइंसेज हैं, उसमें उसे जाना है तो उसे मौका मिल सकता है तो इस प्रकार की सहायता करने के लिए भी जो संसाधान चाहिये, जो धन चाहिए, वह भले ही हमारे पास पर्याप्त नहीं है, किन्तु हमारी इच्छाशक्ति है, हम चाहते हैं कि शिक्षा के माध्यम से विकास करने का काम करें, शिक्षा के माध्यम से हम उनका उन्नयन करने का काम करें। इतना ही नहीं जो लोग जिस काम में लगे हैं…( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: The time allotted for this Resolution is already over. We may extend the time, for this Resolution, by 15 minutes. Is it the pleasure of the House to extend the time on this Resolution by 15 minutes?
SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.
MR. DEPUTY-SPEAKER: All right. The time on this Resolution is extended by 15 minutes.
डॉ. सत्यनारायण जटिया : इतना ही नहीं, हम उनको कोचिंग देने का, उन्हें प्रशिक्षण देने का काम करते हैं, जिससे कि वे कम्पीटीटिव एग्जाम में भाग ले सकें। यह विषय तो बहुत बड़ा है और इसका महत्व भी काफी है। संसद सदस्यों सहित माननीय शिवराज पाटिल जी, सुमन जी सहित इसमें आप सभी ने भाग लिया है। रामदास आठवले जी ने जो प्रस्ताव किया है, इसके पीछे देश के कमजोर वर्ग को आगे लाने का एक संकल्प है और एक इच्छाशक्ति है कि हमें जरूर इन लोगों को आगे लाना चाहिए। इस द्ृष्टि से इस संकल्प पर चर्चा करते हुए जितने महत्वपूर्ण प्रस्ताव आये हैं, उनके प्रकाश में बहुत सारी बातों को कहने के लिए यहां पर जरूर मुझे अवसर मिला। मैं उन्हें कह सकता हूं, परन्तु समय की सीमा को देखते हुए यह मेरे लिए भी कठिन हो जायेगा। किन्तु सरकार का और मंत्री होने के नाते मेरा अपना सीधा दायित्व को देखते हुए मेरी हरसम्भव कोशिश होगी कि हम शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए हर प्रकार का उपाय करने का काम करें और उसमें जरूर सब लोगों की जरूरत होती है। समाज में हम देखते हैं कि बहुत सारे स्थान जो शिक्षा के बने हुए होते हैं और निजी संस्थाएं भी बहुत बड़ी-बड़ी संख्या में होती हैं, किन्तु उन निजी संस्थाओं में अनुसूचित जाति, कमजोर वर्ग और जनजाति के लोगों के लिए, बैकवर्ड क्लास के लोगों के लिए कोई स्थान आरक्षित करके स्वत: रखती होंगी, ऐसा बहुत कम होता है। जहां-जहां रखती होंगी, उनकी जरूर अभिनन्दन और बधाई देनी चाहिए। किन्तु जैसे ही कोई अच्छी इंस्टीटयूशन बनती है, उसे ज्यादा फीस लेकर, ज्यादा शुल्क लेकर उसमें भर्ती होने के लिए ज्यादा पैसा चाहिए, इस प्रकार का मामला लगता है। यदि किसी के पास ५० हजार रुपये हैं तो ५० हजार की इंस्टीटयूशन में जायेगा, किसी के पास १० हजार रुपये हैं तो वह १० हजार वाले में जायेगा और किसी के पास कुछ भी नहीं है तो फिर वह ऐसे स्कूलों में जायेगा, जहां पढ़ाने के लिए न तो कोई साधन है, न पढ़ाने वाला कोई है।
न ऊपर कोई छत है और न नीचे बैठने का कोई माघ्यम है। सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से सरकार ने जिस नयी चीज की शुरुआत की है, हम उम्मीद करते हैं कि इसके माध्यम से भी हम उस नयी चीज की शुरुआत कर सकेंगे। सरकार की सर्व शिक्षा अभियान की योजना को साकार करने के लिए राज्य सरकारें पर्याप्त सहयोग करें, समाज में जागरुकता लाने का काम करें। एक बच्चा शिक्षा के लिए जाये तो वह सभी पढ़े हुए नागरिकों का दायित्व हो जाये । जिसने भी जनप्रतनधि के कारण कुछ प्राप्त किया है, यदि हम भी उसे इनीशियेट करने का काम करें, यदि हम सब लोग सांसद नधि के माध्यम से भवन निर्माण का काम करते हैं तो जरूर गांव का छात्र, जिसके पास पढ़ने के लिए कोई सहारा नहीं है, उसे भी मदद मिल सकती है। हम वे सारे काम करना चाहते हैं लेकिन उनको ज्यादा महत्व देने की जरूरत है।
शिक्षा के इन सब क्षेत्रों में काम हुआ है। हम देखते हैं कि जो लोग अस्वच्छ कामों में लगे हुए हैं, सफाई के कामों में लगे हुए हैं, उनकी तरफ समाज का उतना ध्यान नहीं जाता। उस द्ृष्टि से हमने सफाई कर्मचारी वित्त विकास निगम बनाने का काम किया है, उनको ट्रेनिंग देने का काम किया है, उन्हें प्रशिक्षण देने का काम किया है, उनको रिहैबलिटेट करने का काम किया है। हम आज भी उस काम को तेजी से करना चाहते हैं किन्तु जैसा मैंने कहा, हमारी वित्तीय संसाधनों की सीमाएं हमारे काम को बढ़ाने की द्ृष्टि से उतनी समर्थ नहीं हो पातीं। लेकिन इस दिशा में काम करते हुए हमें जो अनुभव मिला, मुझे कहते हुए कोई कठिनाई नहीं कि हमने नवीं योजना में अस्वच्छ व्यवसायों में काम करने वाले १९ लाख से ज्यादा विद्यार्थियों को सहायता देने का काम किया है, जिनमें ३६ करोड़ २५ लाख रुपये खर्च किये गये हैं। वर्ष २००२-०३ में यह संख्या ५ लाख ५५ हजार हुई जिनमें १९ लाख ८ हजार रुपये की सहायता देने का हमने काम किया। गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले जो लोग इन अस्वच्छ कामों में लगे हुए हैं, उनकी तरफ भी सरकार का ध्यान गया है। नवीं योजना में हमने ४८,५०० बच्चों को कोचिंग देने के लिए ११ करोड़ १९ लाख रुपये खर्च करने का काम किया है। वर्ष २००२ -०३ में १२ हजार ८१ विद्यार्थियों पर ५ करोड़ ५० लाख रुपये खर्चा करने का काम किया गया। शैक्षिक न्याय की द्ृष्टि से हम सारी बातें पुस्तक बैंकिंग की द्ृष्टि से करते हैं। इन सारी बातों को करते हुए मैं कहना चाहूंगा कि आज भी काम बाकी है। यहां हुई बहस में आप सब महानुभाव, जिनमें प्रो. रासा सिंह रावत, श्री रामदास आठवले, राम जी लाल सुमन आदि ने अपने सुझाव दिये हैं। इस लम्बी बहस में जिस प्रकार के सुझाव हमें प्राप्त हुए, आने वाले समय में वे हमारी सहायता करने में मदद करेंगे।
अभी डा. सरोजा जी बोल रही थी कि वे एक सुझाव देना चाहेंगी। मैं उनके सुझाव का स्वागत करूंगा। मैं विश्वास करता हूं कि जो विचार-विमर्श हुआ है, उस विचार-विमर्श के आलोक में हम जरूर चाहेंगे कि सरकार पुरजोर कोशिश करते हुए, माननीय सदस्यों की भावना का सम्मान करते हुए इस काम को करे। माननीय सदस्य ने जो संकल्प दिया है, मैं उनसे अनुरोध करूंगा कि वे उस संकल्प को वापिस लेने का काम करें तो बहुत अच्छा होगा।
MR. DEPUTY-SPEAKER: Dr. V. Saroja, from the record I found that you have already spoken on this.
DR. V. SAROJA : Sir, I will give only one suggestion.
MR. DEPUTY-SPEAKER: After the Minister has spoken, only the Mover of the Resolution can speak. This is a deviation from the established convention. As a special case I will permit you for a minute.
… (Interruptions)
SHRI SANSUMA KHUNGGUR BWISWMUTHIARY : Sir, can I make certain suggestions to the hon. Minister in connection with this very particular issue? … (Interruptions)
DR. V. SAROJA : Hon. Deputy-Speaker, Sir, thank you very much for allowing me to give a suggestion.
After passing the Seventy-third Amendment Bill, out of 34 lakh elected representatives, we have elected 10 lakh women representatives, 3.64 lakh Scheduled Caste representatives and 2.59 lakh Scheduled Tribe representatives.
I would like to say that in Tamil Nadu, we have formed the male Self-Help Groups, and we are also forming economic-oriented schemes. Through the Scheduled Caste and Scheduled Tribe Finance Corporation, we are trying to focus our attention on these depressed groups. So, I would like to ask the Minister whether he would come up with concrete and specific economic-oriented programmes so that we will not only be empowering the male Self-Help Groups economically, but also we can find a solution to the problem of educated unemployed youth of the Scheduled Caste and Scheduled Tribe communities. This is one suggestion that I wanted to make. Sir, you can even involve all the elected representatives, the concerned MPs and the MLAs so that we will really do some justice to this community.
My second suggestion is that in Tamil Nadu, during 1994, a novel scheme was launched from the Special Component Plan for the Scheduled Caste and Scheduled Tribe people. Rs.130 crore loan was raised from the Tamil Nadu Industrial Investment Corporation. In that, 41 per cent of the money is to be paid towards import duty charges by the Scheduled Caste and Scheduled Tribe entrepreneurs under this novel scheme. This is the only one scheme in India to empower the economically depressed people. They have written to the hon. Prime Minister also. I would submit this copy to him for giving concession. Kindly look into this matter and do justice. I urge upon the hon. Minister to have the same scheme in all the States so that it really yields the fruits. Both the Scheduled Caste and Scheduled Tribe Commission and the Standing Committee visited this place at Tripur in Coimbatore district. They are much satisfied. I would request that the same scheme could be extended to all the States of India.
MR. DEPUTY-SPEAKER: As a special case, I am allowing you. Otherwise, we are deviating from the established convention.
SHRI SANSUMA KHUNGGUR BWISWMUTHIARY : Sir, actually I have been observing through some newspapers that a very dangerous law is being imposed upon the Scheduled Caste and Scheduled Tribe people in regard to contesting the Panchayat elections. This condition has been recently confirmed even by the Supreme Court of India. The Supreme Court of India’s latest order is that if a candidate is having more than two children, then that candidate cannot contest the election even if it is for Panchayat. This sort of restriction should be relaxed in the case of the Scheduled Caste and Scheduled Tribe people because they are not having much population compared to the population of the general category people. So, this relaxation should be there. This is my humble request to the Government of India. Please honour this.
श्री रामदास आठवले (पंढरपुर) : उपाध्यक्ष महोदय, हम इस भावना से, इस उद्देश्य से यह संकल्प लाए थे कि आजादी के ५३ वर्ष बाद भी समाज के अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग के लोगों को न्याय नहीं मिला है। हमने जब कौन्सटीटयूशन को स्वीकार किया था, तब उसमें कहा था ---
"WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved to constitute India into a SOVEREIGN SOCIALIST SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens:
JUSTICE, social, economic and political;
LIBERTY of thought, expression, belief, faith and worship;
EQUALITY of status and of opportunity; and to promote among them all FRATERNITY assuring the dignity of the individual and the unity and integrity of the Nation;… "  

 जब भारत का संविधान स्वीकार किया गया था, तब सब लोगों को न्याय देने की बात कही गई थी।

16.00 hrs. अभी मंत्री महोदय श्री जटिया साहब ने कुछ स्कीम यहां बताई है लेकिन हर साल के बजट में इसी तरह की स्कीम्स दी जाती हैं लेकिन यहां लोगों को न्याय नहीं मिल रहा है। यहां अगर हम देखते हैं तो एससीएसटी के लैंड लैस लोगों का प्रतिशत ७० है और कल्टीवेशन का प्रतिशत २० है और रुरल एरिया के वर्कर्स का प्रतिशत ६५ है और अर्बन एरिया में तीस है। लिटरेसी का १९६१ में १०.३ प्रतिशत था और १९९१ में सात प्रतिशत बढ़ गया है लेकिन इसे और बढ़ाने की आवश्यकता है। यहां जो रिजर्वेशन पॉलिसी है, जो क्लास-वन है, इसमें १९९९ के आंकड़ों के मुताबिक क्लास-वन में ९.८३ प्रतिशत रिजर्वेशन एससी का बढ़ गया है और एसटी का ३.१ प्रतिशत है। क्लास-टू में एससी का ११.४ प्रतिशत है और एसटी का २.७८ प्रतिशत है। क्लास-थ्री में एससी का १७.५ प्रतिशत है और एसटी का ५.९४ प्रतिशत है और क्लास-फोर में एससी का १९.२० प्रतिशत है और एसटी का ७.६४ प्रतिशत है। इस संख्या को और भी बढ़ाने की आवश्यकता है। एससीएसटी की पोपुलेशन का प्रतिशत २००१ की जनगणना के मुताबिक बढ़ गया है। १९५१ की जनगणना के मुताबिक एससीएसटी की पोपुलेशन २२.५ प्रतिशत थी लेकिन अभी २८-२९ प्रतिशत हो गई है। इसीलिए इस रिजर्वेशन को बढ़ाने की आवश्यकता है। प्राइवेट सैक्टर में रिजर्वेशन देना बहुत जरूरी है और इसके लिए एक्ट बनाने की आवश्यकता है। प्राइवेटाइजेशन की पॉलिसी जब थी तो उसमें रिजर्वेशन रखने के संबंध में विचार रखने की आवश्यकता थी लेकिन रिजर्वेशन खत्म करने के लिए ही ब्राहमणवादी मनोवृत्ति ने एससीएसटी को खत्म करने के लिए ही प्राइवेटाइजेशन का मुद्दा यहां लाया गया है। हमारी मांग है कि प्राइवेटाइजेशन में रिजर्वेशन रखना चाहिए। अगर हम प्राइवेटाइजेशन में रिजर्वेशन नहीं रखेंगे तो एससीएसटी के लोगों को नौकरी नहीं मिलेगी और इन्हें देश छोड़कर जाना पड़ेगा। इस तरह की स्थिति है। इस तरह जब इन्हें नौकरी नहीं मिलेगी तो गंभीर परिस्थितियां बनने वाली हैं और इसीलिए प्राइवेट सैक्टर में रिजर्वेशन के संबंध में हमारे एक्स प्रेसीडेंट श्री के.आर.नारायणन ने भी बोला था।…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Ramdas Athawale, how much more time would you require? We have to extend the time accordingly.

श्री रामदास आठवले : टाइम बढ़ाइए। आधा घंटा चलेगा।…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Is it the pleasure of the House to extend the time allotted for this Resolution by fifteen more minutes?

SOME HON. MEMBERS: Yes.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Yes, the time is extended by fifteen minutes.

श्री रामदास आठवले :टाइम ही बढ़ाने को कह रहे हैं, पैसा बढ़ाने को नहीं बोल रहे हैं।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : कोई बात नहीं, आप सबजेक्ट को हटा दो।

श्री रामदास आठवले :श्री के.आर.नारायणन जी ने २६ जनवरी २००१ को रिजर्वेशन के संबंध में बोला था कि प्राइवेट सैक्टर में एससीएसटी का रिजर्वेशन रखना चाहिए। इसलिए भारत सरकार से हमारी मांग है कि प्राइवेट सैक्टर में रिजर्वेशन लाने के लिए इसी सैशन में कांस्टीटयूशनल अमेंडमेंट लाने की आवश्यकता है। प्राइवेट सैक्टर में यदि रिजर्वेशन नहीं लाया गया तो इस देश का गरीब आदिवासी आदमी, दलित आदमी रास्ते पर आ जाएगा। उधर के लोगों को, रतिलाल वर्मा जी को भी हम अपने साथ ले लेंगे।

१६.०५ hrs. (Shri K. Yerrannaidu in the Chair) हमारी एक मांग यह भी है। आरक्षण को संरक्षण देने के लिए और इस पर अमल करने के लिए आरक्षण कानून बनाने की आवश्यकता है। मैं मांग करता हूं कि आरक्षण को नौवें शिडयूल के तहत लाना चाहिए। दलितों को सामाजिक आधार पर, आर्थिक आधार पर मजबूत बनाने की आवश्यकता है। अगर हम इन लोगों को मजबूत नहीं बनाएंगे, तो देश मजबूत नहीं बन सकेगा। अगर हम मजबूत नहीं बनेंगे, तो आप सब भी खोखले हो जाएंगे। इसलिए आरक्षण को नौवें शिडयूल में लाना चाहिए।

डा. भीम राव अम्बेडकर साहब ने एस.सी., एस.टी. के लोगों के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए १९४७ में करीब तीस साल तक आरक्षण की मांग को लेकर संघर्ष किया था और साउथ ब्यूरो कमीशन से यह मंजूर कराया था। उन्होंने महात्मा गांधी के साथ इस सम्बन्ध में पूना पैक्ट भी किया था। अगर हम उसको नहीं मानेंगे तो यह महात्मा गांधी के साथ भी धोखा होगा। अटल जी और अन्य सभी लोग, चाहे इधर के हों या उधर के हों, महात्मा गांधी का नाम लेते हैं और उनके विचारों को आगे बढ़ाने का काम करते हैं। महात्मा गांधी का नाम लेना बहुत आसान है, लेकिन उनके विचारों को आगे बढ़ाना बहुत मुश्किल काम है. इसलिए दलितों को आरक्षण की आवश्यकता है।

भारतीय संविधान में यह सिफारिश की गई है कि दलितों को आरक्षण मिलना चाहिए। १९०२ में महाराष्ट्र में छत्रपति साहूजी महाराज ने कोल्हापुर में एक संस्थान में आरक्षण चालू किया था। आज उसको १०० साल हो गए हैं। उनके भी आदर्श को हमें आगे लाना चाहिए। अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के लिए आरक्षण की जो व्यवस्था की गई है, वह कोई भिक्षा नहीं है, यह भारतीय संविधान द्वारा दिया हुआ हक है। संविधान में कहा गया है कि एस.सी. और एस.टी. के लोगों को राष्ट्र की मुख्य धारा में लाना है। सोशल जस्टिस इन दि प्रिएम्बल आफ दि कांस्टीटयूशन, यह मुख्य हेतु हम सब लोगों का है। इसलिए इसको अमल करने के लिए सब लोगों को गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है। भारत सरकार ने २००१ की जनगणना को स्वीकार किया है। मेरी मांग है कि २००१ में जितनी आबादी थी, उसके मुताबिक लोक सभा और विधान सभाओं की सीट्स बढ़ाने की आवश्यकता है। एस.सी. और एस.टी. के लोगों के आर्थिक विकास के लिए हर दलित को गांव में पांच से दस एकड़ जमीन देनी चाहिए। चाहे केन्द्र सरकार यह काम करे या राज्य सरकार करे। अगर सरकार के पास जमीन नहीं है तो उसको जमीन खरीद कर मुहैया करानी चाहिए। हर विभाग में स्पेशल कम्पोनेंट प्लान के नाम पर जो पैसा आबंटित होता है, वह हमारी आबादी के मुताबिक अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए खर्च होना चाहिए। अभी तक ऐसा नहीं हो पा रहा है।

मंत्री जी का नाम सत्य नारायण जटिया है। आप सत्य भी हैं, आपके नाम में नारायण भी है और जटिया भी हैं। आपको अब मौका मिला है इसलिए जो पैसा आपके मंत्रालय को मिला है, उसका उपयोग करना चाहिए। अगर वह कम है तो आप उसके लिए आवाज उठाएं। हम भी आपका साथ देंगे। सरकार को दलितों को जमीन देने के लिए कार्यक्रम बनाने की आवश्यकता है। भारतीय संविधान में आर्थिक समानता का जो अधिकार है, उसको अमल में लाने की आवश्यकता है। अधिक प्रापर्टी पर बैन होना चाहिए। आज अम्बानी और मफतलाल के पास हजारों एकड़ जमीन है। दूसरी ओर दलितों के पास आज भी जमीन नहीं है। इस तरह से देश में आर्थिक असमानता है इसलिए प्रापर्टी पर बैन होना चाहिए। जिसके पास ज्यादा जमीन है, उससे सरकार को जमीन ले लेनी चाहिए। एक परिवार के पास ५० एकड़ से ज्यादा जमीन नहीं होनी चाहिए, बाकी जमीन दलितों में बांट देनी चाहिए।अगर आपकी सरकार यह काम नहीं कर सकती है तो सत्ता छोड़ दीजिए, हम लोग यह काम करेंगे। यह दलितों की भलाई का काम है। इसलिए प्रॉपर्टी और जमीन पर एक हद के बाद बैन लगाने की आवश्यकता है। मेरा कहना यह है कि एससीएसटी के लोगों को इस क्षेत्र में समान अवसर दिये जाने की आवश्यकता है। इतना ही नहीं व्यावसायिक क्षेत्र में भी उनको रिजर्वेशन देने की आवश्यकता है। ट्रांसपोर्ट कंपनियों में, मल्टीनेशनल कंपनियों में एससीएसटी के लोगों को रिजर्वेशन देने की आवश्यकता है। हाई-कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, विधान परिषदों में, केन्द्र और राज्यों के मंत्रिमंडलों में भी एससीएसटी के लोगों को रिजर्वेशन देने की आवश्यकता है। जब लोक सभा, विधान सभा में रिजर्वेशन है तो मंत्रिमंडल में भी एससीएसटी के लोगों को रिजर्वेशन मिलना चाहिए। मंत्रिमंडल में ३० प्रतिशत हमारे समाज के मंत्री होने चाहिए। हमारे समाज के अगर ३० प्रतिशत मंत्री मंत्रिमंडल में आ जाते हैं तो हमारे समाज को ऊपर उठाने में उनका अच्छा उपयोग हो सकता है।

एससीएसटी पर एट्रोसिटीज बढ़ती जा रही हैं। एट्रोसिटीज एक्ट भी बना हुआ है लेकिन उस पर कहीं अमल हो रहा है और कहीं पर नहीं भी हो रहा है और अभी सामाजिक समानता देश में आई नहीं है। उनको अभी तक मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलता है। हम प्रधान मंत्री जी से इस बारे में अपील करते हैं कि वे सभी पार्टियों की मीटिंग बुलाएं और चर्चा करें कि जिस भी पार्टी का सदस्य एससीएसटी के लोगों के खिलाफ अत्याचार करता है उसे पार्टी से निकाल दिया जाएगा और ऐसे लोगों को दूसरी पार्टी में भी नहीं लेना चाहिए। यह नहीं हो कि इस पार्टी से निकला तो दूसरी पार्टी ने ले लिया। इधर से निकला तो उधर चला जाए और उधर से निकला तो इधर चला जाए, ऐसा नहीं होना चाहिए। इसलिए उनका बॉयकाट करने की आवश्यकता है। एससीएसटी के लोगों को सामाजिक समानता कैसे प्राप्त हो, इस पर भी मजबूती से विचार करने की आवश्यकता है। सोशलिज्म को मजबूत करने के लिए भी हम सबको काम करने की आवश्यकता है।

जहां तक शिक्षा की बात है तो एससीएसटी के स्टूडेंट्स को अगर हमें अच्छी तरह से शक्षित करना है तो जो नॉन-गवर्नमेंट कॉलेज होते हैं जिनमें डोनेशन देना पड़ता है, वहां भी एससीएसटी के स्टूडेंट्स को रिजर्वेशन मिलना चाहिए क्योंकि उनके पास डोनेशन देने के लिए पैसे नहीं होते हैं। केजी के बच्चों के लिए जो अच्छे स्कूल हैं उनमें भी २०-२५ हजार रुपया देना पड़ता है। पेमेंट सीट पर मैडीकल कॉलेज में एडमीशन के लिए ३०-३५ लाख रुपये हमारे लोग नहीं दे सकते हैं, वे कहां से इतना पैसा लाएंगे। इसलिए चाहे जूनियर स्कूल हो, सीनियर स्कूल हो, कॉलेज हो या फैकल्टी हो, एससीएसटी के स्टूडेंट्स को उनकी जनसंख्या के हिसाब से प्रवेश मिलना चाहिए। साथ ही यह बंधन मैनेजमेंट पर होना चाहिए और उसके लिए हमें प्रयत्न करना चाहिए। इस तरह का आदेश भी आपके मंत्रालय से जाना चाहिए।

एनएसबीसी को ज्यादा मजबूत बनाने के आवश्यकता है, उसको ज्यादा पैसा देने की आवश्यकता है। एनएसबीसी के माध्यम से या बैंकों के माध्यम से जो लोन मिलता है, उसके लिए सिक्योरिटी की आवश्यकता होती है। १०-२० लाख रुपये या एक करोड़ रुपये के लोन के लिए हमारे लोगों को सिक्योरिटी नहीं मिलती है। इसलिए एनएसबीसी से या बैंकों से लोन देना है तो उसके लिए सिक्योरिटी केन्द्र सरकार या राज्य सरकारों को देने की आवश्यकता है। इस तरह से हमारे लोगों को जो समस्या होती है उस पर भी सरकार को विचार करने की आवश्यकता है। इसी तरह से दलितों पर हो रहे अत्याचारों को कम करने की आवश्यकता है। आपने कहा है कि इस प्रस्ताव को वापिस लिया जाए, मैं यह प्रस्ताव वापिस नहीं ले सकता हूं। यह प्रस्ताव भारत को मजबूत करने वाला है, सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत करने वाला प्रस्ताव है। मैं यह प्रस्ताव वापिस नहीं ले सकता हूं। मैं दलितों को धोखा नही दूंगा। धोखा देने के लिए हम यहां संसद में नहीं आए हैं। मैं आपसे अपील करता हूं कि इसी तरह का प्रस्ताव सरकार की तरफ से आना चाहिए। दलितों, आदिवासियों और पिछड़े लोगों के उत्थान के लिए सरकार की तरफ से प्रयत्न करने चाहिए। मंत्रिमंडल द्वारा प्रयत्न करना चाहिए। अटल जी द्वारा प्रयत्न करना चाहिए। श्री जार्ज फनार्ंडीस द्वारा प्रयत्न करना चाहिए। श्रम मंत्री, डा. साहिब सिंह वर्मा जी द्वारा प्रयत्न करना चाहिए। अगर यह सरकार एससी और एसटी लोगों के लिए काम नहीं करेगी, तो आने वाले चुनाव में वह इधर आ जाएगी। मैं सभापति जी से भी निवेदन करना चाहता हूं, आप आन्ध्रा प्रदेश से आते हैं, अगर आपकी पार्टी हमारे साथ आएगी, तो हम अच्छी सरकार बनायेंगे। अभी आप इस संकल्प को पूरा करने का वायदा देते हैं, तो मैं यह संकल्प वापिस ले सकता हूं। मेरा मंत्री महोदय से निवेदन है कि जो भी सुझाव आए हैं, उन पर गम्भीरता से विचार करिए और दलितों के कल्याण के लिए आपको काम करने की आवश्यकता है और आप की सरकार को प्रयत्न करना चाहिए।

MR. CHAIRMAN : Shri Ramdas Athawale, are you withdrawing this resolution or not?

SHRI RAMDAS ATHAWALE : Sir, I want an assurance from the Minister and from you also.

MR. CHAIRMAN: The Chair will always assure you for the welfare of the people, particularly dalits, tribals and of other weaker sections.

श्री रतिलाल कालीदास वर्मा : सभापति महोदय, मैं एक मिनट में अपनी बात कहना चाहता हूं।

MR. CHAIRMAN: You may ask only one clarification.

श्री रतिलाल कालीदास वर्मा : सभापति महोदय, पीएसयू के डिसइन्वैस्टमेंट के बाद, प्राइवटाइजेशन के बाद अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए रिजर्वेशन होना चाहिए। अन्य सदस्यों ने जो रिजर्वेशन के बारे में सुझाव दिए हैं, मैं उनका समर्थन करता हूं और माननीय मंत्री जी से प्रार्थना करता हूं कि वे संबंधित बिल में संशोधन करने के लिए प्रयत्न करें।

डॉ. सत्यनारायण जटिया : महोदय, निश्चित रूप से इस विषय पर सदन में विचार विमर्श बहुत उपयोगी हुआ है। अभी डा. सरोजा जी ने स्पेशल कम्पोनेंट प्रोग्राम और स्पेशल सैन्ट्रल एसिसटैंस के बारे में कहा है और इस दिशा में काम करने के लिए राज्य सरकारों को अवसर है। अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए जो एसिसटैंस केन्द्र से जाती है, निश्चित रूप से वह राशि इस काम में लेनी चाहिए, जिसके लिए नीयत की गई है। हम सब की कोशिश है और इस काम को करने के लिए सबका सहयोग मिलना चाहिए। जो सुझाव माननीय सदस्य ने दिया है, उसको मैंने नोट कर लिया है। ऐसा नहीं है कि संकल्प वापिस लेने से सारी बातें वापिस हो जायेंगी। सरकार इस दिशा में गम्भीरता से काम कर रही है और आपका सहयोग प्राप्त हो रहा है और आगे भी जो सुझाव देंगे, सरकार उन सुझावों पर विचार करेगी। इस आलोक में मैं कहना चाहता हूं कि हम और आप इस समस्या के प्रति गम्भीर हैं।

इसका उपाय भी निकालना चाहिए, इसलिए बेहतर होगा कि आप संकल्प वापस लें।

श्री रामदास आठवले : मैं संकल्प वापस ले लूंगा लेकिन प्राइवेट कम्पनियों में इन वर्गों के रिजर्वेशन के लिए आपसे साफ तौर पर आश्वासन चाहता हूं।

श्री बसुदेव आचार्य : मंत्री जी ने इस बारे में पूरा आश्वासन दे दिया है।

MR. CHAIRMAN : Shri Ramdas Athawale, the Government will take all your suggestions with true letter and spirit.

श्री रामदास आठवले :महोदय, मैंने यहां अनुसूचित जातियों और जनजातियों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास के लिए जो सुझाव दिए, उन्हें कार्यान्वित करने के लिए यदि सरकार राजी और गम्भीर है तो मैं अपना संकल्प वापस लेता हूं। केवल जटिया जी के तैयार होने से काम नहीं चलेगा, इसके लिए पूरी कैबिनेट तैयार होनी चाहिए। आपने इसे कार्यान्वित करने के लिए जो आश्वासन दिया है, उसे देखते हुए मैं कुछ दिन के लिए अपने इस संकल्प को वापस लेना चाहता हूं।

MR. CHAIRMAN : Is it the pleasure of the House that the Resolution moved by Shri Ramdas Athawale be withdrawn?

The Resolution was, by leave, withdrawn.

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