Lok Sabha Debates
Discussion On The Motion Regarding Consideration Of Issues Of Population ... on 4 August, 2010
> Title: Discussion on the motion regarding consideration of issues of Population Stabilisation in the country.
MR. DEPUTY-SPEAKER: The House will now take up item no. 15.
THE MINISTER OF HEALTH AND FAMILY WELFARE (SHRI GHULAM NABI AZAD): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I beg to move:
“That this House do consider the issues of Population Stabilisation in the country.” उपाध्यक्ष महोदय, सबसे पहले मैं माननीया स्पीकर साहिबा का बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने जनसंख्या के स्थिरीकरण पर हमें यह बहस करने का अवसर प्रदान किया।
माननीय डिप्टी स्पीकर साहब, सबसे पहले इस विषय पर लगभग 35 वर्ष पूर्व चर्चा हुई थी। इस सदन में हमारे बहुत सारे मैम्बर्स ऑफ पार्लियामेंट ऐसे हैं, जिनके सामने फेमिली प्लानिंग या पॉपुलेशन स्टैबिलाइजेशन के बारे में इस हाउस में पहली बार चर्चा हो रही है। यदि एग्जैक्ट कहूं, तो ठीक साढ़े 33 साल इस चर्चा को हुए हो गए हैं और साढ़े 33 साल एक इंसान की उम्र होती है। इतने वर्षों के बाद आज पॉपुलेशन स्टैबिलाइजेशन पर सदन में दुबारा चर्चा हो रही है।
महोदय, पिछले साल, जब मैंने हैल्थ मिनिस्ट्री का चार्ज संभाला, तो चार्ज संभालने के एक-डेढ़ महीने के अंदर-अंदर वर्ल्ड पॉपुलेशन डे आ गया। 11 जुलाई को ‘वर्ल्ड पॉपुलेशन डे’ मनाया जाता है, जिसमें पूरे विश्व में जनसंख्या को किस तरह से स्थिर रखा जाए, इसके बारे में चर्चा होती है। राज्य सरकारों की साल भर में क्या-क्या उपलब्धियां है और स्विटजरलैंड में डब्ल्यू.एच.ओ. की मीटिंग होती है, जिसमें 192 देश आते हैं और हजारों की संख्या में सारे विश्व से ऑफीसर्स आते हैं। वहां बड़े-बड़े जो इश्यूज होते हैं, उन पर चर्चा होती है और उन्होंने साल भर में क्या-क्या उपलब्धियां की हैं, वे पूरे साल चर्चा का विषय बनती रही हैं। मैंने देखा, जब हमारे मंत्रालय ने विश्व पॉपुलेशन डे पर एक एयरकंडीशंड कमरे में फंक्शन रखा, उसमें जाहिर है कि चीफ गैस्ट मैं ही था। सब स्टेट्स से ऑफीसर्स बुला लिए गए।
2-4 आदमियों को ईनाम दिया गया कि आपने शादी 18 साल की उम्र में की है और बात खत्म हो गई। मैंने पूछा कि क्या पिछले वर्षों से इसी तरह से यह वर्ल्ड पोपुलेशन डे मनाया जा रहा है कि हम एयरकंडीशंड कमरे में आयें, पोपुलेशन को, आबादी को पूरे देश में किस तरह से स्थिर किया जाये, उस पर एयरकंडीशंड कमरे में हम बहस करें और अगले साल का इन्तजार करें कि अगले साल फिर यह डे आयेगा, उस दिन फिर एक एयरकंडीशंड कमरे में इस पर हम बहस करेंगे। क्या यही सिलसिला है तो मुझे ऑफिसर्स ने कहा कि गवर्नमेंट्स बदल गईं, सरकारें बदल गईं, दांये की बांये हुई, बायें की दांये हुई, सैण्टर की भी दांये-बायें हो गईं, लेकिन यह एयरकंडीशंड कमरा नहीं बदला और न ही सोच बदली।
मैंने यह सोचा और अपने साथियों से कहा कि यदि हम इसी गति से एयरकंडीशंड कमरे में बैठकर हिन्दुस्तान की पोपुलेशन को स्थिर करना चाहेंगे तो हमको यह पोपुलेशन स्थिर करने में शायद कई हजार साल लगेंगे और कई जैनरेशंस निकल जाएंगी, शायद 5000 साल और लगेंगे। इसीलिए मैंने उसी वक्त और उसी दिन यह निश्चय किया और यह निर्णय लिया कि अगर हमको जनसंख्या को स्थिर करना है, जनसंख्या का स्थिरीकरण करना है तो एयरकंडीशंड कमरों में भाषण करने से, चाहे वह मैं हूं या ये हों या ये हों तो यह कभी नहीं हो पाएगा। इसके लिए हमको सड़कों पर उतरना होगा। उसके लिए पार्लियामेंट में बहस होनी चाहिए, उसके लिए विधानसभाओं में बहस होनी चाहिए, उसके लिए जिला परिषद् में बहस होनी चाहिए, उसके लिए कारपोरेशन में बहस होनी चाहिए, उसके बाद इसे हमें एक आन्दोलन की तरह लेना होगा और पार्टी पोलिटिक्स से ऊपर उठकर लेना होगा।
बदकिस्मती से पहले यह कार्यक्रम जब शुरू हुआ तो राजनीति ने बीच में आकर इसको ऐसे लिटा लिया कि अभी 33 साल के बाद आज हम सब इस पर चर्चा कर रहे हैं। लेकिन मुझे खुशी इस बात की है कि इन 33 वर्षों में सभी राजनैतिक दलों ने, चाहे वह अपोजीशन है या रूलिंग पार्टी है, छोटा अपोजीशन है या बड़ा अपोजीशन है, वे इस बात पर पहुंच गये, इस नतीजे पर पहुंच गये हैं कि इस देश में जब तक जनसंख्या का स्थिरीकरण हम नहीं करेंगे तो हमारे देश के लिए बहुत मुश्किल होगी। आपको यह सुनकर बड़ा आश्चर्य होगा कि जितनी भी दुनिया की जमीन है, भूमि है, उस भूमि का सिर्फ 2.5 प्रतिशत, टू बी प्रीसाइज़ 2.4 प्रतिशत हिन्दुस्तान, भारत के हिस्से में आया, लेकिन आबादी विश्व की कितनी हिस्से में आई है-17 प्रतिशत। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं। मुम्बई के लोग ज्यादा अच्छी तरह से जान सकते हैं, अब दिल्ली के भी जानने लगे हैं कि जो घर 2.5 आदमियों के लिए बना है, उसमें 17 आदमी रह रहे हैं। अभी तक जो बहस हो रही थी, सुषमा जी ने जिसको आरम्भ किया और खत्म भी किया, महंगाई पर, ठीक है, महंगाई के और बहुत कारण हैं, मैं यह नहीं कह सकता हूं। लेकिन यह भी एक कारण है।
यह भी एक कारण है कि जो भूमि ढाई लोगों के लिए बनी है, उसका अनाज 17 लोग खा रहे हैं। मुझे अफसोस है कि इस पर भी किसी को चर्चा करनी चाहिए थी, क्योंकि ये दोनों मुद्दे जुड़े हुए हैं। सरकार की जिम्मेदारी कितनी है, क्या है, राज्य सरकारों की कितनी जिम्मेदारी है, मैं उसमें नहीं जाना चाहता हूं, लेकिन यह जरूर है कि हर साल जमीन घटती जा रही है और आबादी बढ़ती जा रही है। हर साल 18 करोड़ आबादी बढ़ती है, लेकिन जमीन हर साल घटती रहती है। ढाई प्रतिशत जमीन का हिस्सा, जिसके बारे में मैंने कहा, उसी ढाई प्रतिशत जमीन पर हर साल लाखों मकान बनते हैं, उसी भूमि पर हर साल लाखों झोपड़ियां बनती हैं, उसी ढाई प्रतिशत जमीन पर हजारों-लाखों बड़ी और छोटी सड़कें बनती हैं, नहरें बनती हैं, पुल बनते हैं, रेलवे ट्रैक्स बनते हैं, रेलवे और बस स्टैंड्स बनते हैं, अस्पताल बनते हैं, स्कूल्स बनते हैं, डिस्पेंसरीज बनती हैं, कालेजेज और यूनिवर्सिटीज बनती हैं। आखिरकार ये हवा में तो नहीं बनते हैं, जितना भी हम इफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करें, देश के हर गांव तक पहुंचने के लिए सड़क बनायें, वह आसमान पर नहीं बनती है, वह जमीन पर बनती है। इसी ढाई पर्सेंट जमीन पर सब कुछ हो रहा है। आबादी बढ़ती जा रही है और जमीन घटती जा रही है। यह मिसमैच है। आबादी की जितनी संख्या बढ़ रही है, अगर एक चौथाई के हिसाब से जमीन भी बढ़ती जाती, तो शायद हम कहीं पहुंच पाते, लेकिन ये बिल्कुल नार्थ पोल और साउथ पोल हैं। इन हालात में क्या हमने कभी यह सोचा है कि इसका मुकाबला कैसे करें?
उपाध्यक्ष जी, मैं कहना चाहूंगा कि इस पर एक हेल्थ मिनिस्टर का, एक हेल्थ मिनिस्ट्री का, केवल गवर्नमेंट के अकेले का बस नहीं है। इसके लिए हम सबको एक होना पड़ेगा। मैं कुछ आंकड़ें यहां बताना चाहूंगा और आपको उनको जानकर हैरानी भी होगी। हमारी पापुलेशन पालिसी वर्ष 2000 में बनी थी। उस वक्त वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे। इसे बने दस साल हो चुके हैं, जिसमें तीन-चार चीजें रखी गयी थीं। उसका आब्जेक्ट, लक्ष्य क्या था, जिसे मानकर यह सरकार इसे आगे चला रही है। एक लक्ष्य तो यह था कि अनमेट नीड्स फार कांट्रासेप्टिव्ज का इस्तेमाल, इसके बाद इफ्रास्ट्रक्चर की कमी है, फेमिली प्लानिंग या हेल्थ से जुड़ी चीजों को ठीक करना। इसके मिड टर्म आब्जेक्टिव्स क्या थे और लांग टर्म आब्जेक्टिव्स क्या थे? मैं सबसे पहले मिड टर्म आब्जेक्टिव के बारे में कहना चाहता हूं। मिड टर्म आब्जेक्टिव था कि वर्ष 2010 तक हमारा टीएफआर, जिसको हम हिंदी में कुल प्रजनन कहते हैं, यह 2.1 होना चाहिए। यदि वर्ष 2010 तक टोटल फर्टिलिटी रेट 2.1 हो गया, तब वर्ष 2045 तक हमारी पापुलेशन का स्टेब्लाइजेशन होगा।
इसका मतलब उसके बाद होगी, कई साल लगेंगे। लेकिन टीएफआर की नेशनल ऐवरेज क्या होगी। टीएफआर को देसी भाषा में कुल प्रजनन कहते हैं, एक पति और पत्नी के पूरी उम्र में सिर्फ दो बच्चे हों। अगर यह ऐवरेज पूरी कंट्री की 2.1 आ गई और य वर्ष 2010 में हुई, तब 2010 में ही स्टैबिलाइजेशन नहीं होगा, उसके बाद भी 35 साल लगेंगे, 2045 में स्टैबिलाइजेशन होगा, क्योंकि जो बच्चे 5 साल, 8 साल या 10 साल पहले एक-एक कपल से 6,7,8 या 4,5,6 पैदा हुए हैं, 2010 तक उनकी बहुत ज्यादा संख्या पैदा करनी होगी और वे बच्चे पैदा करते रहेंगे। अगर वे दो बच्चे भी पैदा करेंगे, तब भी हमें स्टैबिलाइजेशन में 35 साल लगेंगे। लेकिन वर्ष 2045 में स्टैबिलाइजेशन कब होगी और जनसंख्या स्थिर होगी? वर्ष 2045 में जनसंख्या तब स्थिर होगी, जब 2.1 2010 में होगी। हमारी नेशनल ऐवरेज 2006 है। लेकिन आज मैं 14 राज्यों का नाम लेकर बधाई देना चाहता हूं। आज कौन सी पार्टी है, क्योंकि यह एक दिन में नहीं हुआ, जिन्होंने 2.1 का लक्ष्य 2010 तक पूरा कर दिया है। इनमें तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र और पंजाब, वैस्ट बंगाल और हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और सिक्किम, चंडीगढ़, पांडिचेरी और अंडमान-निकोबार है। मैं हैल्थ मिनिस्ट्री की तरफ से, अपनी तरफ से और इस सदन की तरफ से उन सरकारों और उनसे पहले वाली सरकारों को, क्योंकि यह एक दिन में नहीं होता, इसमें दस साल लगते हैं और इसमें बारी-बारी सब सरकारें आईं, और उन सरकारी कर्मचारियों को बधाई देना चाहता हैं, उनसे भी ज्यादा उन लोगों को बधाई देना चाहता हूं, उन माता-पिता को बधाई देना चाहता हूं जिन्होंने यह उपलब्धि प्राप्त की है।
माननीय डिप्टी स्पीकर साहब, तीन-चार और राज्य हैं जहां 2.8 और 3.0 के बीच है, वे मणिपुर, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश हैं। जम्मू कश्मीर भी इसी में है। लेकिन इससे काम नहीं बनेगा। हमारी चिन्ता, इस देश की सबसे बड़ी चिन्ता सैंट्रल इंडिया की है, जिसमें उत्तर प्रदेश,...( व्यवधान) यह किसी सरकार पर टिप्पणी नहीं है, माफ कीजिए। आज एक सरकार है, कल दूसरी थी, उससे पहले तीसरी थी। ये चीजें बराबर चलती आई हैं, इसमें कोई परिवर्तन नहीं लाया, माफ कीजिए। वह मेरी पार्टी हो या आपकी पार्टी हो, इसमें किसी पर टिप्पणी करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इस चीज में परिवर्तन कभी आया होता, मैं बाकी चीजों में नहीं कह रहा हूं, मैं एडमिनिस्ट्रेशन में नहीं कह रहा हूं, लॉ एंड आर्डर की बात नहीं कर रहा हूं। मैं केवल आज के संदर्भ में बात कर रहा हूं कि दुर्भाग्य से इसमें कोई भी परिवर्तन नहीं ला पाए हैं।
श्री मुलायम सिंह यादव (मैनपुरी): औरों का तो बताया, आपके कितने बच्चे हैं?
श्री गुलाम नबी आज़ाद: मेरे दो बच्चे हैं।
श्री मुलायम सिंह यादव : मेरे एक ही है।
श्री गुलाम नबी आज़ाद: मेरे दो बच्चे हैं, एक लड़का है और एक लड़की है।
श्रीमती सुषमा स्वराज (विदिशा): आपके दो हैं, इनके एक है और वह लड़का है, लेकिन मेरे तो एक ही बच्चा है और वह भी बेटी है। इस तरह मैं इकलौती बेटी की मां हूं।
श्री गुलाम नबी आज़ाद: मैं अभी घोषणा कर देता हूं, लेकिन हम वर्ल्ड पॉपुलेशन डे याद रखें, जो हर साल 11 जुलाई को मनाया जाता है, उसमें ऐसे लोगों को ईनाम दिया जाता है। आप ऐसे लोगों की लिस्ट में आ गए हैं।
श्रीमती सुषमा स्वराज : मेरे एक ही बेटी है, उसके लिए क्या करेंगे?
श्री गुलाम नबी आज़ाद: एक वाले को तो सबसे ज्यादा मिलेगा। हम बहुत ही गम्भीर विषय पर चर्चा कर रहे हैं। इसमें किसी राज्य सरकार या जो आज सत्ता में हैं, माफ कीजिए मैं किसी पर भी आरोप नहीं लगा रहा हूं और कोई यह न समझे कि उन पर कोई टिप्पणी है। इनमें कई राज्यों में कांग्रेस पार्टी की भी सरकारें हैं। मैं यह कहना चाहता हूं कि आबादी के मामले में सबसे बड़ा चिंता का विषय यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड राज्य हैं, क्योंकि यहां पर टीएफआर सबसे ज्यादा है। किसी राज्य में 3.7 है, तो किसी में 3.8 या 3.9 है। यह तो एक एवरेज है, क्योंकि मान लो किसी के एक ही बच्चा है, जैसे मुलायम सिंह जी के है, तो उसे भी साथ लेकर चलें तो एवरेज छः या सात बच्चे एक परिवार में आज भी पैदा हो रहे हैं।
उपाध्यक्ष महोदय: आपने सुषमा जी क्यों छोड़ दिया, इनके भी तो एक ही बच्ची है।
श्री गुलाम नबी आज़ाद: मैं यूपी, बिहार आदि राज्यों की बात कर रहा हूं, यह उनमें नहीं आतीं। इन राज्यों में एवरेज 3.8, 3.9 है और यहां एक बच्चे वालों की एवरेज कम है, दो बच्चे वालों की भी कम एवरेज है, लेकिन फिर भी काफी संख्या है। इन राज्यों में टोटल एवरेज देखी जाए तो पांच-छः बच्चों वाले परिवार का चलन अब भी है और यही हमारे लिए चिंता का सबसे बड़ा विषय है।
मैं इस बात का भी उल्लेख करना चाहता हूं कि रजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया जो सेंसस करते हैं, उनकी रिपोर्ट भी बड़ी चिंता का विषय है। उन्होंने बताया है कि सन् 2001 से 2026 तक यानि 25 बरसों में 37 करोड़ आबादी बढ़ेगी। अब इन 25 बरस में से दस बरस तो निकल गए, उसका पता अगले साल चलेगा। लेकिन इन 25 बरसों में 37 करोड़ आबादी बढ़ेगी, उसमें से 50 प्रतिशत आबादी इन सात राज्यों की होगी, जिनका जिक्र मैंने कुछ देर पहले किया है। बाकी जो राज्य हैं और केन्द्र शासित राज्य हैं, उनमें शेष 50 प्रतिशत आबादी बढ़ेगी। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कितना काम इन राज्यों में हमें करने की जरूरत है।
मुझे खुशी है कि हमारे यूपी, बिहार से आने वाले माननीय सदस्य इस समय यहां मौजूद हैं। मैं निवेदन करना चाहता हूं कि उनके सहयोग के बिना यह काम नहीं हो सकता। वे भी इस मामले की गम्भीरता को समझते हैं और जानते हैं।...( व्यवधान) साउथ वालों ने अपना काम कर दिया है।
यह मजाक की बात नहीं है, यह जो वास्तविकता है, इस वास्तविकता को कभी न कभी हमें मानना पड़ेगा। हम हजार बार यहां बहस करें कि पानी नहीं है, बिजली नहीं है, अनाज नहीं है, उस बहस से सरकारें आयेंगी, बदलेंगी, लेकिन उससे कुछ निकलेगा नहीं। एक सरकार ठीक नहीं करती दूसरी आयेगी, लेकिन जैसे मैंने शुरू में कहा कि जमीन तो वही ढाई परसेंट है, उसमें उतना ही अनाज पैदा होना है और उस ढाई परसेंट में भी मैंने बताया कि जंगल है, पहाड़ हैं, दरिया हैं, मकान और अस्पताल हैं तो उस जमीन में आप कोई भी तकनीक लगाओ, कितना अनाज निकलेगा?
श्री शरद यादव (मधेपुरा) : माननीय मंत्री जी सही दिशा में बात कर रहे हैं, मैं आपका शुक्रिया करता हूं कि आपने इस बहस को यहां उठाया। यह जो जनसंख्या का मामला है, जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं, उसमें कुछ नये रास्ते और सोचे जाने चाहिएं। जो कम बच्चे वाले लोग हैं उन्हें कोई न कोई इंसेंटिव मिलना चाहिए। अगर यह कंपोनेंट आप इसमें नहीं डालेंगे तो आजकल नौकरी चाहे प्राइवेट हो या सरकारी हो, इस कंपोनेंट को इसके साथ लिंक किया जाना चाहिए। मैं मानता हूं कि इसके पीछे एक बड़ा कारण गरीबी भी है। जिन सूबों का आपने नाम लिया, ये सूबे इतिहास गवाह है कि पहले से ही आबादी के हिसाब से बड़े रहे हैं। मुझे याद आता है इमरजेंसी का, स्वर्गीय संजय गांधी को कुछ लोग दोष देते हैं लेकिन मैं सोचता हूं कि कोई-न-कोई उपाय इस बढ़ती आबादी पर लगाना होगा और संजय गांधी ने जो बातें रखी थीं कि कुछ बातें मजबूती और सख्ती से भी करनी होंगी। इसलिए इसमें सख्ती भी बरतिये और इंसेंटिव भी दीजिए, इससे कोई रास्ता निकलेगा।
श्री गुलाम नबी आज़ाद : मैं आपका धन्यवाद करता हूं और माननीय उपाध्यक्ष जी का भी धन्यवाद करता हूं और मैं इसीलिए हाउस में आया हूं कि जब हमारे एयर-कंडीशन्ड कमरों में किसी पॉलिसी को इम्प्लीमेंट करने की बात होती है तो फिर वही बात होती है जिसकी चर्चा मैंने शुरू में की। इस हाउस में जब मैं आया हूं और अगले हाउस में भी इसी स्तर पर बहस होगी, तो मैं यहां इसलिए आया हूं कि यहां 120 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग बैठे हैं और ये 120 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि सुबह-शाम पानी की मुसीबत से, सड़क-बिजली, नौकरी की मुसीबत से, अनाज दिलाने की मुसीबत से जूझते रहते हैं, उन्हें मालूम है कि छोटी आबादी क्या है, बड़ी आबादी क्या है, उनको मालूम है कि आज से 30 साल पहले जहां खेत थे, आज वहां मकान हैं, किसान खेती किस पर करेगा? जमीन रही कहां, भूमि रही कहां? इसलिए मैं इस सदन में आया हूं कि हमारे कमरों में स्कीमें तो बनती हैं लेकिन उन स्कीमों से परिवर्तन नहीं आयेगा। ये संसद जो कानून बनाती है, जो निर्देश देती है, जिस पर पूरे देश की आशाएं और उम्मीदें हैं.
15.00 hrs. जिस पर पूरे देश की आशाएं और उम्मीदें हैं, वे पार्टी और राजनीति से हटकर निर्धारित करें और रास्ता दिखाएं कि आने वाले वक्त में देश को किस दिशा में जाना है। हम अपने बच्चों के लिए क्या सम्पत्ति छोड़ कर जा रहे हैं और उनके भविष्य के लिए क्या कर रहे हैं? हमें पता नहीं है कि जब तक हम जिंदा हैं, तब तक खाने के लिए अनाज और अनाज को बोने के लिए जगह उपलब्ध होगी या नहीं होगी। भारत और चीन बड़े देश हैं, लेकिन अमरीका, जिसकी आबादी 30 करोड़ है और हमसे ज्यादा एरिया है, बहुत सारे देश जैसे अस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि हैं, वहां आबादी बहुत कम है, वहां जमीन ही जमीन है, लेकिन फिर भी वहां वर्ल्ड पापुलेशन डे मनाया जाता है। वे आज से ही आने वाले 400-500 साल की बात सोच रहे हैं, वरना वे रात-दिन बच्चे पैदा करते। वे भी स्थिरता की बात करते हैं। इक्का-दुक्का देश हैं, जहां बिलकुल ही पापुलेशन नहीं है, फर्टिलिटी कम है, उनकी अलग बात है, लेकिन जहां फर्टिलिटी ठीक है, मर्द और औरत की बच्चे पैदा करने की क्षमता ठीक है, वे भी स्थिरता की बात करते हैं।
जहां जनसंख्या तूफान बन कर आ रही है और जमीन घटती जा रही हैं, वहां हम इसे अगर टाप प्राइयोरिटी नहीं देंगे, तो हम तमाम जो पेरिफिरल क्वैश्चन करते हैं, वे सब बेमानी हैं। हमें इस विषय पर डटे रहना है। ऐसा न हो कि कल हमें पानी और दूसरी चीजों की तरह सांस लेने के लिए भी लाइन में खड़ा होना पड़े। यह स्थिति पैदा न हो, इसलिए हमें आज इस विषय पर चर्चा करनी है।
मैं आपको बधाई देना चाहता हूं कि आपने यहां स्वर्गीय संजय गांधी का जिक्र किया। इसी कारण मैंने शुरू में ही कहा है कि आज 35 साल के बाद इस विषय पर चर्चा हो रही है। हम उस समय के और इस समय के इम्प्लिमेंटेशन में अंतर लाए हैं। हमें इसे समझना चाहिए और यह समझाना चाहिए। कभी-कभी यह होता है कि दूध का जला छाछ भी पूंक-पूंक कर पीता है। जब कभी हम परिवार नियोजन की बात करते हैं, तो लोग सोचते हैं कि कोई जबरदस्ती पकड़ तो नहीं लेगा। मैं एक बात सदन को बताना चाहता हूं कि इस सरकार ने और पिछली सरकारों ने भी, मैं पूरा क्रेडिट नहीं लेना चाहता, पिछली सरकारों ने भी यह निर्णय लिया कि हम कोई ऐसा सख्त कानून नहीं बनाएंगे, जिसकी वजह से कोई कोटा फिक्स किया जाएगा या जोर-जबरदस्ती होगी या आफिसर को कहा जाएगा कि इतने केस लाओ, वरना तुम्हारी तरक्की नहीं होगी, ऐसा कुछ नहीं होने वाला है।
15.04 hrs. (Shri P.C. Chacko in the Chair) हम चार-पांच चीजों द्वारा इस चीज को करना चाहते हैं। इसमें कोई कानून नहीं होगा, अलबत्ता आपने इन्सेंटिव की बात कही, वह बिलकुल वाजिब है। इसी कारण सदन में चर्चा हो रही है, क्योंकि दस साल पहले जो जनसंख्या पालिसी बनी थी, वह तो गई, क्योंकि उस पालिसी में हमें वर्ष 2010 तक टोटल फर्टिलिटी रेट 1.2 लानी थी, अब जहां बच्चे पैदा होते हैं, वहां हम 3-4 में ही हैं। हमें नई पापुलेशन पालिसी लानी ही होगी। पालिसी में क्या-क्या इन्सेंटिव्स, क्या-क्या डिसइन्सेंटिव्स, कहां कमियां रही हैं, कहां कमजोरियां रही हैं, कहां हम चूक रहे हैं, वे चीजें हमारे सामने नार्थ, वेस्ट, साउथ, ईस्ट से सदन में चर्चा करते समय आएंगी, तब जा कर हमारी मिनिस्टरी को एक अच्छी पालिसी बनाने में मदद मिलेगी।
अभी टार्गेट कोई नहीं दिया जाएगा, फोर्स इस्तेमाल नहीं की जाएगी बल्कि वालेंटरी तौर पर लोगों को तैयार करना होगा और इसके लिए अवेयरनेस और जानकारी की जरूरत है। तीसरी चीज फैमिली प्लानिंग से मुत्तालिक है, आज से 30-35 साल पहले वे साधन नहीं थे जो आज हैं। औरतों के लिए तो बिल्कुल ही नहीं थे और मर्दों के लिए थोड़े से साधन थे। कान्ट्रासेप्टिव नहीं थे, मर्दों के लिए सिर्फ कन्डोम थे और वे भी नहीं पहुंचते थे। लेकिन आज तकनीक ने इतनी प्रगति की है कि अब हमारी बहनों और बच्चों के लिए बहुत चीजें हैं। हमने इन साधनों को उन तक पहुंचाना है। विशेष रूप से उन राज्यों में जहां लोक संख्या ज्यादा बढ़ती है। हमें इसके कारण भी ढूंढने पड़ेंगे, कारण है - गरीबी, बेकारी, बैकवर्डनेस और जानकारी का न होना भी है।
श्री मुलायम सिंह यादव : गरीबी एक कारण है। एक ही कमरे में 15-20 लोग रहते हैं, वे मनोरंजन कहां करेंगे?
श्री गुलाम नबी आज़ाद : मैंने शुरू में ही कहा है कि गरीबी सबसे बड़ा कारण है। मनोरंजन के भी साधन कुछ नहीं हैं। गरीबी, बेकारी और रोजगारी तमाम चीजें हैं। ये बेकारी और बेरोजगारी भी गरीबी से है, ये अमीर की बीमारी थोड़ी है। इससे आबादी बढ़ती जा रही है। एक चीज जो इससे जुड़ी है उसका संबंध गरीबी से तो है ही लेकिन सोशल कस्टम से ज्यादा है, वह है अर्ली मैरिज। अगर पूरे देश का एवरेज निकालें तो 35 प्रतिशत देहातों में 15-16 साल की बच्चियों की शादी होती है। मैं शहर की बात नहीं कहता लेकिन आपको आश्चर्य होगा कि केवल बिहार के गांवों में जितनी शादियां होती हैं, 70 प्रतिशत 18 साल से नीचे की उम्र में होती है जबकि सरकार ने 18 साल की उम्र निर्धारित की है। इसी तरह से उत्तर प्रदेश में 59 प्रतिशत 18 साल से कम उम्र की बच्चियों की शादी होती है। इन इलाकों में एवेरज तकरीबन 36 प्रतिशत लड़कियों के बच्चे 18-19 साल की उम्र से पहले होते हैं। हमने शादी के लिए 18 साल का कानून बनाया लेकिन इससे पहले शादी भी हो गई और बच्चे भी हो गए। इससे दो नुकसान होते हैं, इससे बच्चे का भी नुकसान होता है और मां का भी नुकसान होता है। आप रोज हमसे जवाब मांगते हैं कि बाल मृत्यु दर कितनी है और माता मृत्यु दर कितनी है? हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि सबसे ज्यादा बाल और माता मृत्यु दर, इसी छोटे माता और इसी बच्चे की होती है।
जिसकी शादी 15, 16 या 17 साल में हुई हो और 16, 17 साल में उसका बच्चा पैदा हुआ हो। इसका मतलब है कि बच्चे के बच्चा पैदा हुआ है। जो खुद बच्ची है, उसे यह मालूम नहीं है कि मुझे अपने आपको कैसे संभालना है, उसे यह मालूम नहीं है कि मुझे बच्चे को कैसे संभालना है तो उसके कारण बच्चे की भी मृत्यु होती है और मां की भी मृत्यु होती है। तब जो हमारी माता मृत्यु दर, एमएमआर एंड आईएमआर है, यह भी कम नहीं होगा। जब तक हमारे समाज में चाइल्ड मैरिज की एक प्रथा बनी हुई है, इस चाइल्ड मैरिज का जब तक हम मुकाबला नहीं करेंगे तो मृत्यु दर भी कम नहीं होगी और पापुलेशन भी कम नहीं होगी। इसलिए हमारे आने वाले वक्त का जो सबसे बड़ा मुद्दा है, जिसमें हमें ऑनरेबल मैम्बर्स ऑफ पार्लियामैन्ट का कोऑपरेशन चाहिए कि यदि अगर हम डायरेक्टली काम करेंगे तो इनडायरेक्ट वाला फायदा पापुलेशन से होगा और यदि हम यह गांवों में कहेंगे कि यदि मृत्यु दर को कम करना है, मैटर्नल मोर्टेलिटी रेट को कम करना है, अगर बाल मृत्यु दर, इनफैन्ट मोर्टेलिटी रेट को कम करना है तो आप 18 साल के बाद शादी कीजिए तो उससे गांव के लोग समझ जायेंगे कि यह हमारे हित की बात है और उसका बाई प्रोडक्ट जो होगा, उससे अपने आप फैमिली प्लानिंग होगी और स्टेबिलाइजेशन होगा। इसमें कोई जबरदस्ती नहीं है। हम कानूनन भी ठीक कह रहे हैं और यह उसके स्वास्थ्य के लिए भी ठीक है। उसकी मां के लिए भी ठीक है, उसके बच्चे के लिए भी ठीक है।
सर, हम तीन-चार चीजें रिकमैंड करते हैं। यह मैं इसलिए बता रहा हूं ताकि इस पर ऑनरेबल मैम्बर्स ऑफ पार्लियामैन्ट अपनी-अपनी राय जितनी यहां दे सकते हैं, दे दें और जितनी नहीं दे सकते हैं, वे लिखकर हमारे मंत्रालय में मेरे नाम भेज दें, जो वे सोचते हैं। प्रथम जो शादी की उम्र 18 साल है, हम इसका प्रचार करें और इसे सुनिश्चित करें।
श्री मुलायम सिंह यादव : बिल लाकर कर दीजिए, नहीं तो पत्रकारों से अपील कीजिए, ताकि यह छप जाए।
श्री गुलाम नबी आज़ाद : बिल से नहीं होगा, वह कानून तो बना हुआ है। वह कानून है, उसे इम्पलीमैन्ट करना है। मैं उस पर बाद में आ जाऊंगा।
श्री मुलायम सिंह यादव : मैं सहमत हूं।
श्री गुलाम नबी आजाद : कैसे करना है, मैं उस पर भी बाद में आऊंगा। दूसरी बात मैं कहना चाहता हूं कि पहले और दूसरे बच्चे के बीच में तीन-चार साल का गैप हो। उससे मां का भी फायदा है और बच्चे का भी फायदा है। क्योंकि छोटे की परवरिश होगी और उसके बाद अगला चार साल के बाद होगा, इससे पापुलेशन कम होने में भी मदद मिलेगी।
तीसरी बात मैं कहना चाहता हूं कि जो बच्चियां अनपढ़ हैं, अभी मैं इन्हीं राज्यों की ज्यादा बात कर रहा हूं। यदि अगर हम बच्चों की, लड़कियों की शिक्षा पर ध्यान देंगे तो लड़कियां कम से कम 12वीं, 13वीं या 14वीं तक पढ़ेंगी तो 15, 16 या 18 साल की उम्र से ऊपर निकल जायेंगी। अभी क्या होता है, हमारे बिहार के अंदर कितनी लड़कियां 12वीं पास हैं, सिर्फ 15 प्रतिशत लड़कियां सैकेन्डरी पास हैं और उत्तर प्रदेश में सिर्फ 30 प्रतिशत हैं। अगर हमारी शिक्षा भी बढ़ जाए तो पहला अर्ली मैरिज के खिलाफ, दूसरा दो बच्चों के बीच में गैप और तीसरा लड़कियों की शिक्षा के बारे में अगर हम काम करें तो बहुत अच्छा रहेगा।
मेरे माननीय बुजुर्ग और मुझसे बहुत प्रेम करने वाले हमारे नेता जी ने सुझाव दिया है, हालांकि उसके लिए कानून है। लेकिन मेरा यह मानना है कि पार्लियामैन्ट और विधान सभा का इलैक्शन आता है। इस देश में कितने लोग कांग्रेस में हैं, बीजेपी में हैं, बीएसपी हो, एस.पी. हो, सीपीआई हो , सीपीएम हो, डीएमके हो, एआईडीएमके हो लेकिन 100 प्रतिशत तो नहीं है। हमारे हमदर्द 40 प्रतिशत होंगे। मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि मैं पिछले 35 सालों से कांग्रेस पार्टी का देश कई राज्यों का जनरल सैक्रेटरी और इंचार्ज रहा हूं, यू.टी से लेकर बड़े राज्यों तक मेरा अनुभव है कि कोई भी पार्टी नेशनल लैवल या स्टेट लैवल पर अपने बलबूते से सरकार नहीं बना सकती है। यह उस पार्टी की क्षमता होगी या उसके वरकर्स पर निर्भर होगा या पार्टी की कनविंसिंग पावर की बात होगी जो उस फरूटिंग पापुलेशन को जो नॉन-पार्टी पापुलेशन है, जो नॉन अलाइंस पापुलेशन है, 50-60 प्रतिशत को कनविंस करे कि मेरा उम्मीदवार, मेरी पार्टी दूसरे उम्मीदवार और दूसरी पार्टी से बेहतर है। जो पार्टी या जो उम्मीदवार अपनी मेहनत के द्वारा, अपने भाषण के द्वारा, अपनी शक्ति, - पैसे की शक्ति नहीं - मसल पॉवर की शक्ति नहीं बल्कि जब अपनी कनविंसिंग पावर का इस्तेमाल करता है तो वह पार्टी बाज़ी मार जाती है और वह सत्ता में आ जाती है। हम एक पार्टी हैं और अगर हम एक महीने के प्रचार में अपोजीशन को सरकार में और सरकार को अपोजीशन में ला सकते हैं तो अगर सभी पार्टियों का लक्ष्य एक है तो क्यों नहीं पापुलेशन में स्टेबिलिटी ला सकते हैं? इसमें कोई पार्टी नहीं है, कोई रीजन नहीं है, कोई रिलीजन नहीं है, कोई ऊंच-नीच नहीं है तो 365 दिन में यह आईएमआर का एक पाइंट या दो पाइंट क्यों नहीं कर सकते हैं? मेरा मतलब यह है कि कहीं न कहीं हमारी विल में कमी है, हमारी जो मेहनत है, उसमें कमी है, हमारी सोच में कमी है या हमारे इरादों में कमी है, इसलिये हम लक्ष्य नहीं पा सकते हैं।
सभापति जी, मैं सदन में माननीय सदस्यों से निवेदन करने आया हूं कि आज हम एक निश्चय कर लें कि हम सब इस मामले में एक हैं। कोई लैफ्ट -राईट सैंटर नहीं है, कोई नार्थ-साऊथ या ईस्ट-वैस्ट नहीं है। हमने वर्ष 2045 के लिये लक्ष्य रखा था कि हम पापुलेशन को स्टेबल करेंगे लेकिन जब हम वर्ष 2010 में रिव्यु करते हैं तो ऐसा लग रहा है कि उपलब्धि 2020 तक भी नहीं होगी। मैंने तीन-चार बातें कहीं हैं। एक तो यह है कि बाल विवाह बंद कर दें जो प्रोडक्टिव स्टेज में है। पापुलेशन स्टेबल करने में उसका फायदा आज नहीं 20 साल के बाद होगा। जो शादी के लिये तैय़ार लड़के-लड़कियां हैं, अगर हम उनके लिये प्लानिंग करेंगे, उसका फायदा अभी होगा। अगर हम 10-20 साल जल्दी शादी नहीं करेंगे, उनके बीच में स्पेस देंगे, उन की फैमिली प्लानिंग के जितने साधन हैं, चाहे वे मर्दों या औरतों के लिये हैं , हम उन्हें उपलब्ध करायेंगे। आपके लिये खुशी की बात होगी कि फैमिली प्लानिंग से जुड़े हुये साधन उन मर्दों के लिये विशेष रूप से हैं जो हम राज्य सरकारों को भेजते हैं। हमारी मिनिस्ट्री की खुद की फैक्ट्रियां हैं। जब राज्य सरकारों को भेजते हैं तो 50 प्रतिशत स्टोर में पड़े रहते हैं और 50 प्रतिशत डिस्ट्रिक्ट में पड़े रहते हैं।
अब हमने निर्णय किया है कि इस साल से हम 100 डिस्ट्रिक ले लेंगे, जिनमें हम ब्लाक लेवल, प्राइमरी हैल्थ सेंटर लेवल, सब सेंटर तक और आशा के द्वारा गांव तक उसे पहुंचायें ताकि घर-घर तक मर्द और औरत तक जो फैमिली प्लानिंग के साधन है, वे मिल सकें। जिसमें कोई ताकत नहीं लगती है, कोई जोर-जबरदस्ती नहीं लगती है, उसे इस्तेमाल करें। उसके लिए भी आपको प्रचार करना होगा। मैं हिन्दुस्तान के हर गांव में नहीं जा सकता, मैं हर खेड़े में नहीं जा सकता। हमारे मेंबर ऑफ पार्लियामेंट्स को उन पर चर्चा करनी होगी। मेरा आपसे निवेदन है कि सिर्फ दो लोग परिवर्तन ला सकते हैं, कायापलट कर सकते हैं। लोकतंत्र में इलेक्शन लड़ने वाले और दूसरे हमारे जो ऊपर बैठते हैं, मीडिया वाले और मीडिया में भी प्रिंट मीडिया से ज्यादा इलैक्ट्रानिक मीडिया वालों का सबसे बड़ा रोल है। उनका रोल हमसे भी ज्यादा है। यहां सदन के बाद मैं चाहूंगा कि आप सब मेरे साथ सहयोग देंगे। हम विधान सभाओं के एमएलऐज़ के साथ बात करें, हम जिला परिषद के प्रतिनिधियों के साथ बात करें और उन्हें बतायें कि क्या खतरे हैं, क्या खदशात हैं, कहां कमियां हैं और उन्हें दूर करें। मेरी इस शेर के साथ बड़े अदब के साथ इलैक्ट्रानिक मीडिया से अपील है। मुझे टेलीविजन देखने का बहुत कम समय मिलता है, लेकिन जब भी देखता हूं, या तो किसी हीरो की शादी हो रही होती है या किसी हीरोइन की शादी हो रही होती है। सभी चैनलों पर हो रही होती है।...( व्यवधान) या किसी खिलाड़ी की शादी हो रही होती है। उनका हनीमून कैसा होगा, वह भी इन्हें ही कवर करना है। कृपया, इन्हें मॉफी दे दीजिये। अभी राहुल महाजन कितनी लड़कियों के साथ शादी करेगा, कैसे करेगा, वह भी इन्हें ही दिखाना है। अगर यह आप दिखाओगे तो वह क्या करेगा।...( व्यवधान) मेरा उनसे निवेदन है। फैज़ अहमद फैज़ उर्दू के मशहूर शायर हैं। मैंने स्टूडेंट लाइफ में उनका एक शेर सुना और उस शेर से मेरी जिन्दगी में परिवर्तन आया। वह परिवर्तन यह था कि इस दुनिया में ऐशोआराम ही नहीं है, इश्क और माशूक ही नहीं है, इस दुनिया में उससे भी कई जरूरी चीजें हैं। ऍनजायमेंट ही सब चीज नहीं है। आज इस देश में हजारों, लाखों सड़कें बनती हैं, हजारों, लाखों पुल बनते हैं, एक-दो खराब हो गये, लेकिन लाखों ठीक भी बनते हैं, हजारों, लाखों अस्पताल और स्कूल बनते हैं, विश्वविद्यालय बनते हैं। मुझे माफ कीजिये, वह कहीं दिखाई नहीं देता है। हां, अगर कहीं कोई बिल्डिंग या स्कूल गिर गया तो फिर चौबीस घंटे क्या, वह एक हफ्ते तक दिखेगा। जो बन गयी है या बन रही है, वह दिखाई नहीं देती है। मैं बड़े अदब के साथ, बड़े प्रेम और प्यार के साथ एक शेर, वह जो चौथा स्तंभ है, जो डैमोक्रेसी की ज्यूडिशियरी, पार्लियामेंटेरियन और फोर्थ स्टेट, जो चौथी टांग है, क्योंकि तीन टांगों पर कोई बिल्डिंग खड़ी नहीं रहती है, चौथी टांग मीडिया है। मैं उनसे भी कहूंगा इस देश को बनाने में डैमोक्रेसी ने आपको हिस्सा दिया है। यह शेर उनके लिए हैं। और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा, ये जो आप फिल्में आदि दिखाते हैं, ये तो एक चीज है। और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा, राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा, और भी हैं गम जमाने में मुहब्बत के सिवा, राहतें और भी हैं, राहतें मतलब सैटिस्फैक्शन, जिस चीज से आपको सैटिस्फैक्शन हो, प्यार से हो, खेलकूद से हो, खिलाड़ी से हो, राहतें और भी हैं, वस्ल की राहत के सिवा, प्रेम और प्यार के अलावा भी कई चीजें हैं, जिससे आपको सैटिस्फैक्शन हो सकता है। अगर आप समाज के लिए, देश के लिए भी कुछ काम करेंगे तो वह सैटिस्फैक्शन आपको हो सकता है।
उसमें आपको ज्यादा सेटिसफेक्शन होगी, पैसा कम होगा, लेकिन सेटिसफेक्शन ज्यादा होगी।
सभापति महोदय, इन्हीं शब्दों के साथ मैं तमाम पार्लियामेंटेरियंस और तमाम मीडिया से अपील करूंगा कि इस कार्यक्रम को देश के हित के लिए चलाने में हमारी मदद मदद करें। यदि पार्लियामेंटेरियंस और मीडिया एक हो जाए तो मुझे कोई संदेह नहीं है, हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करेंगे। टाइम की सीमा में पापुलेशन को मत बांधिए, जितनी भी बहस होगी, हम उसे नोट करेंगे। मैंने बहुत ज्यादा इसलिए बोला ताकि आपको इसी में से बहुत सारा मेटिरियल मिल जाए, क्योंकि बहुत से एमपीस ये चाहते थे। उसका विश्लेषण मैंने जुबानी किया, जो उसमें लिखा है, इसलिए इसी से आपको बहुत सारा मेटिरियल मिल जाएगा। आप अगर अपने सुझाव हमें बताएंगे तो वे सुझाव हमारी आने वाली पॉलिसी बनाने में सहायता करेंगे। बहुत-बहुत धन्यवाद।
MR. CHAIRMAN : Motion moved:
“That this House do consider the issues of Population Stabilization in the Country.” Now we start the discussion on this. We have got 20 speakers to speak and four hours have been allotted. I request all the hon. Members to confine their speeches within five to ten minutes.
Shrimati Sumitra Mahajan.
श्रीमती सुमित्रा महाजन (इन्दौर):सभापति महोदय, आज कम से कम बहुत दिनों बाद मुझे एक बात अच्छी लगी, विषय तो डिसकशन के लिए अच्छा है ही, लेकिन एक समय ऐसा था, उस समय हमारे स्वास्थ्य मंत्री जी का एक स्टेटमेंट कहीं पेपर में आया था, कुछ टी.वी. देखते रहो, ज्यादा से ज्यादा टी.वी. देखो, पापुलेशन कंट्रोल हो जाएगा। तब मेरी जैसी महिला का मन धक करके रह गया, कि ये कैसे स्वास्थ्य मंत्री मिले हैं, ये क्या कर सकेंगे, क्या बोल रहे हैं। टी.वी. तो ये भी देखते हैं, आज जैसे थोड़ा-थोड़ा बताया, क्या टी.वी. देखने से आकांक्षाएं, इच्छाएं कम होंगी या उभरेंगी। मगर आज जिस तरीके से आपने गंभीरता से बात रखी है और जो इच्छा प्रकट की है, यह वास्तविकता है और ऐसा लगा कि आपने भी कुछ सही दिशा में सोचना प्रारम्भ किया है, इसके लिए भी मैं आपको धन्यवाद दूंगी।
सभापति महोदय, वास्तव में यह एक बहुत चिन्ता और चिन्तन का भी विषय है। यह बात सही है कि 1951 से हम इस विषय पर अलग-अलग तरीके से सोच रहे हैं। पहले 40 साल तक हम इसे फैमिली प्लानिंग करके टारगेट बेस सोचते रहे और फिर एक परिवर्तन आया। अभी जो इमर्जेंसी का उल्लेख हुआ, वह भी था, कई प्रकार की बातें चलती थीं। उसके बाद एक परिवर्तन आया और 1990 से 2000 तक हमने एक मंथन किया कि इसकी कोई एक नेशनल पॉलिसी होनी चाहिए, राष्ट्रीय जनसंख्या नीति होनी चाहिए। सन् 2000 में हमने पॉलिसी भी बनाई और उस पॉलिसी के अंतर्गत काम करना भी प्रारम्भ हुआ। जैसा कि आपने कहा, यह बात सही है कि कुछ प्रदेश ऐसे हैं, जो उसमें सहयोग करें, लेकिन कुछ प्रदेशों की अपनी कुछ समस्याएं हैं। सन् 2045 तक स्थिरीकरण होना है और यह बात भी सही है कि यह स्थिरीकरण होगा या नहीं होगा, यह कहीं न कहीं हमारे मन में प्रश्न है। आपने जो बात कही, वह बात भी सही है कि इन सब के कारण क्या हैं। आपने जो बातें कहीं, उसी आधार पर मैं बात करूंगी कि आज जो समस्या है, यह क्यों नहीं हो पा रहा है। आपने जिन प्रदेशों का उल्लेख किया, उन प्रदेशों में आखिर बात क्या है? अगर हम सोचें, देखें, मैं पहले उस आधार पर एक बात करूंगी। आपने काँट्रासेप्टिव की बात कही, गांव-गांव में पहुंचना चाहिए। मगर मुझे ऐसा लगता है, development is the best contraceptive.
सभापति महोदय, जिन प्रदेशों की हम बात कर रहे हैं, आपने ठीक कहा कि कुछ प्रदेश ऐसे हैं, मेरे पास भी आंकड़े हैं, जहां 18 साल से कम उम्र की लड़कियों की शादी हो जाती है। शिक्षा की कमी है। आपने जैसा कहा कि 18 साल में शादी की उम्र सुनश्चित करें। मगर उससे पहले यह भी सोचना पड़ेगा कि कहीं न कहीं जो गरीब तबका है, ...( व्यवधान) आप ठीक कह रहे हैं कि कानून है, लेकिन इसके इम्पलीमेंटेशन की आवश्यकता है।
श्री गुलाम नबी आजाद : कानून है। यह आलरेडी है।
श्रीमती सुमित्रा महाजन: मैं भी जानती हूं कि ऐसा कानून है। मैंने भी एल.एल.बी. किया है। जो हम लोग यहां बैठे हैं, जब सामूहिक शादियों में जाते हैं, तो यह देखते हैं। मेरे जैसी महिला तो घूंघट उठा-उठा कर देखती है और कहती है कि - देख यदि छोटी लड़की की शादी करेगी, तो मैं शादी में नहीं आऊंगी। बड़ी लड़की की शादी होनी चाहिए। यह हमारे जैसे लोग करते हैं, भले ही लोग नाराज हो जाएं। कानून तो मुझे भी मालूम है और उस गांव में बैठे हुए व्यक्ति को भी मालूम है। मुझे माफ करना, लेकिन उसका पालन बहुत कम होता है। मैं इन बातों की चर्चा घर के अंदर जाकर गृहिणी तक से करती हूं।
आपने कहा कि 18 साल से कम उम्र की लड़की की शादी नहीं होनी चाहिए, बिलकुल सही बात है, लेकिन आज गांवों में क्या वातावरण है। शिक्षा देना चाहिए। हमने उसका बिल भी पारित किया, लेकिन मुझे माफ करना, आज जो परिस्थिति है, उसमें गांव-गांव तक असुरक्षा का वातावरण बना हुआ है और यह वातावरण केवल गांवों में ही नहीं है, बल्कि शहरों में भी हो गया है। लड़कियों वाली कई माताओं से जब मेरी चर्चा होती है, तो मुझे पता चलता है कि शहरों में भी माताएं सोचने लगी हैं कि यदि 20 साल की लड़की उम्र हो गई है, तो उसकी शादी कर के उसके ससुराल पहुंचा दूं, तो मेरी जिम्मेदारी पूरी हो जाएगी। गांवों में तो इससे और ज्यादा खराब बात यह है कि गरीबी के कारण खाने को ही नहीं है। माल न्यूट्रीशन, जो आपने कहा, वह इतना है कि ...( व्यवधान)
श्री शरद यादव : सुमित्रा जी, एक मिनट के लिए मुझे बोलने दीजिए।
श्रीमती सुमित्रा महाजन : यादव जी, या तो मेरी ओर से आप ही भाषण दे दें, मैं बैठ जाती हूं। चूंकि मेरा समय सीमित है, इसलिए मैं अपने पाइंट ही इतने कम समय में रखने में कठिनाई अनुभव कर रही हूं। इसलिए पहले मुझे अपनी बात कह लेने दीजिए।
MR. CHAIRMAN : Are you yielding ?
श्रीमती सुमित्रा महाजन : जी नहीं। मेरे इतने मुद्दे हैं और 10 मिनट में सभी बोलने हैं।
MR. CHAIRMAN : She is not yielding. सुमित्रा जी, आप अपना भाषण कंटीन्यू कीजिए।
श्रीमती सुमित्रा महाजन : सभापति जी, बोलने में थोड़ी मैं भी गड़बड़ कर रही हूं, क्योंकि मैं सोच रही हूं कि 10 मिनिट में मैं क्या बोलूं।
मैं यह कह रही थी कि जब हम अशिक्षा की बात करते हैं, तो आज स्थिति यह है कि गांवों में इच्छा होते हुए भी हमारी लड़की स्कूल में नहीं जा सकती। हम मध्य प्रदेश और अन्य अनेक प्रदेशों में लड़कियों को साइकिल देने की योजनाएं बना रहे हैं, लेकिन जैसा मैंने पहले कहा, असुरक्षा का वातावरण है। इसलिए मां-बाप अपनी लड़की को यदि तीन किलोमीटर से थोड़ा सा ज्यादा दूर स्कूल है, तो भी वे उन्हें स्कूल नहीं भेजते, क्योंकि सुरक्षित वातावरण नहीं है। इसलिए हमें सबसे पहले शहर और गांवों में सुरक्षित वातावरण बनाना चाहिए। मंत्री जी ने जो पहली बात कही कि यह स्वास्थ्य मंत्रालय का काम नहीं है। मैं उनकी इस बात से बिलकुल सहमत हूं। इसलिए मैं यह बात उठा रही हूं, क्योंकि कहने में सब आसान होता है।
पहली बात तो यह है कि हम गांव-गांव में स्कूल नहीं दे पा रहे हैं। कितनी भी कोशिश करें, लेकिन हर गांव में स्कूल नहीं दे पा रहे हैं। हम पूरी कोशिश कर रहे हैं। आपने देखा होगा कि मध्य प्रदेश में 10वीं तक पढ़ी लड़कियों की संख्या 72 परसेंट से ज्यादा है। स्कूल नहीं हैं, ऐसा भी मैं नहीं कह रही हूं। स्कूल हैं, लेकिन 10वीं से आगे स्कूल ही नहीं हैं और यदि हैं, तो वे इतनी दूर हैं कि वहां माता-पिता भेज नहीं सकते हैं, क्योंकि उस स्कूल में लड़कियों के लिए जो आवश्यक मूलभूत सुविधाएं हैं, वे उपलब्ध नहीं हैं। अब हमने देना शुरू किया है जैसे बाथरूम वगैरह। शिक्षा की व्यवस्था नहीं है, यह पहली बात है। कहीं न कहीं असुरक्षा का वातावरण भी है और गरीबी उससे आगे का कारण है। गरीब की सोच बदलना भी एक आवश्यक कारण है। आपने जैसा कहा, मैं एक बात कहना चाहूंगी कि शिशु मृत्यु दर भी इसमें कहीं न कहीं एक कारण है, क्योंकि बच्चे पैदा तो हो जाते हैं, लेकिन उसमें से बचते कम हैं। पैदा तो आठ हो गए, लेकिन उनमें से जिन्दा तो चार ही हैं। उनमें बच्चों की कमी का एक भाव होता है। इसलिए वे बच्चे पैदा करते ही चले जाते हैं और जो चार हैं, वे कहीं न कहीं माल-न्यूट्रीशन से ग्रस्त हैं।
महोदय, लड़की के बारे में हमारी जो सोच है, वह भी कहीं न कहीं बदलनी पड़ेगी। केवल शिक्षा से काम नहीं चलेगा। लड़की के लिए जो न्यूट्रीशन है, वह ठीक नहीं है। इसके लिए पूरे परिवार की सोच बदलनी आवश्यक है।
कि यह केवल मेरी बेटी नहीं है, यह कल की मां है, कल की जननी है, यह कल किसी को जन्म देने वाली है और इसलिए उसकी हैल्थ, उसका स्वास्थ्य, यह सबसे जरूरी है, नहीं तो अक्षम या अस्वस्थ लड़की स्वस्थ लड़के या लड़की पैदा ही नहीं कर सकती, यह भाव आना चाहिए। मगर हम क्या दे रहे हैं, स्वास्थ्य मंत्रालय हो या अन्य मंत्रालय हों, माफ करना, मध्यान्ह भोजन-दो रुपये प्रति लड़का-लड़की, तीन रुपये प्रति लड़का-लड़की, यह आंगनबाड़ियों में है।
आपने कहा आंगनबाड़ी के जरिये एक जागरुकता पैदा करने की कोशिश हो गई थी, अच्छी योजना थी, मगर अच्छी योजनाओं को न जाने सरकार के दरबार में क्या हो जाता है। आज देश में जो आंगनबाड़ी हैं या आंगनबाड़ी वर्कर्स हैं, उनकी क्या स्थिति है, वहां पर क्या-क्या हो रहा है? वहां पर यह अपेक्षित था कि वे इन बातों की तरफ देखें, बच्चों के हैल्थ की तरफ देखें, गर्भवती माताओं को भी थोड़ा-बहुत देखें। वे उनके लिए काम कर रही हैं। बिहार हो, उत्तर प्रदेश हो या मध्य प्रदेश हो, ये स्टेट अपने तंई काम कर रहे हैं, लेकिन काम बहुत बड़ा है, इस बात पर थोड़ा सा सोचना पड़ेगा, ऐसा मुझे लगता है।
उसके बाद यह बात भी सही है कि अन्तर ज्यादा होना चाहिए। लेकिन अन्तर ज्यादा होना चाहिए, यह केवल कहने से नहीं चलेगा, अवेयरनैस होनी चाहिए, उन तक बात पहुंचनी चाहिए, पहुंचानी चाहिए। यह भी कहीं न कहीं आवश्यक है और यह सब क्यों होता है, यह भी हमारी जो सोच है, हमारी एक ट्रेडीशनल थिंकिंग है, वह भी एक वजह है। सबसे पहली बात तो यह है कि लड़का होना ही चाहिए, यह ट्रेडीशनल थिंकिंग है। यह ठीक है कि एकाध उदाहरण है कि कोई लड़की पर रुक गया, लेकिन लड़का होना ही चाहिए, इसलिए बच्चे होते जाते हैं, इस पर रोक नहीं लगती। यह ट्रेडीशनल थिंकिंग है, यह बदलनी बहुत आवश्यक है। मगर यह बदलने से क्या होगा, इसमें केवल महिलाओं को भी प्रशिक्षित करके नहीं चलेगा। मेरी मान्यता है कि महिलाओं की शिक्षा बहुत आवश्यक है, महिलाओं की सुरक्षा बहुत आवश्यक है। जब मैं महिला कह रही हूं तो उसका मतलब लड़की है, उसकी सुरक्षा बहुत आवश्यक है। उसमें जागृति बहुत आवश्यक है, मगर कहीं न कहीं साथ-साथ, क्योंकि आपने भी देखा होगा कि पुरुष ज्यादा से ज्यादा एक प्रतिशत ऑपरेशन कराते हैं, 96 प्रतिशत महिलाओं के ऑपरेशन होते हैं। इसको भी कहीं न कहीं बदलना आवश्यक है। यह सोच बदलनी आवश्यक है तो कहीं न कहीं पुरुष का भी प्रबोधन होना चाहिए। मुझे लगता है कि हमेशा हम इस बात पर ध्यान देते हैं कि महिला का प्रबोधन हो, लेकिन पुरुष का प्रबोधन भी आवश्यक है।
मैं आपको एक छोटी सी बात बताऊं, एक बार मैं एक कार्यक्रम में गई थी, वह संस्थान माता-बालक प्रतिष्ठान था। माता-बालक प्रतिष्ठान में सब कार्यक्रम अच्छा हो गया, उसमें ज्यादातर ग्रामीण महिलाएं थीं और अवेयरनैस कार्यक्रम हुआ, सब कुछ हुआ, उनसे चर्चा हो गई। मेरे मन में कौतूहल हो गया और मैंने उनमें से एक महिला को पूछा कि यह माता-बालक प्रतिष्ठान क्या है, इसमें पिता कहां है? आप समझदार हो गईं, आपका बच्चा भी समझदार हो गया, लेकिन क्या पिता को नहीं होना चाहिए, आप पिता को अपने आपमें नहीं समा सकते हो, इसमें पिता क्यों नहीं आया है? उस ग्रामीण महिला ने वास्तव में बोलते-बोलते मजाक में उत्तर दिया, लेकिन वह सोचने लायक बात थी, उसने कहा कि वह पिता पीते-पीते न जाने कहां चला गया, हमें नहीं मालूम। यह बात है, क्योंकि मैंने कहा, पिता है तो बोली कि वह पीता ही है। वह पीते-पीते कहां चला गया, पता नहीं। अब यह ग्रामीण क्षेत्र की महिला थी, वास्तव में अनपढ़ महिला थी, मगर उसने जब यह उत्तर दिया, तब मेरे मन में प्रश्न आया कि कहीं न कहीं पुरुषों का प्रबोधन भी आवश्यक है। आप इसको भी प्रोग्राम में शामिल कीजिएगा, केवल माताओं या लड़कियों को प्रशिक्षण या उनमें अवेयरनैस लाने से काम नहीं चलेगा। जो कुटुम्ब बनता है, जो फैमिली बनती है, यह दोनों से बनती है, किसी एक से नहीं बनती है और इसलिए इस बात को भी हम थोड़ा सा सोचें।
आपकी यह बात भी ठीक है कि इसका एक कारण गरीबी है। गरीबी तो एक कारण है ही, लेकिन गरीबी के साथ-साथ जो प्रसव पूर्व निदान होता है, जैसा मैंने कहा, लड़का चाहिए, लड़की नहीं चाहिए, अब इसका भी कानून बना है, मगर उस पर अमल कितना हो रहा है? इस पर भी हमें थोड़ा ध्यान देना होगा। ...( व्यवधान)
अब मैं केवल सुझाव दे दूंगी, मुझे मालूम है कि मैं दस मिनट ले चुकी हूं। आपने यह बात ठीक कही कि यह केवल एक स्वास्थ्य मंत्रालय की बात नहीं है। बहुत सारे प्रदेशों में बहुत सारी अच्छी योजनाएं चल रही हैं। हमारा जो नेशनल कमीशन है, इस पर कहीं न कहीं पार्टी से ऊपर उठकर हमें सोचना होगा। उसमें भी ज्यादातर मैं युवाओं के बारे में कहूंगी, क्योंकि जो आंकड़े आपने बताए हैं, अगर उनके अनुसार हम देखें तो वर्ष 2016 तक 15 वर्ष से नीचे आयु के बच्चों की संख्या घटने वाली है, जो 35 प्रतिशत से घटकर 28 प्रतिशत होने वाली है, लेकिन 15 वर्ष से 59 वर्ष के बीच की जो जनसंख्या है, जो आज 58 प्रतिशत है, वह बढ़कर 64 प्रतिशत होने वाली है। वही आगे चलकर बच्चे पैदा करने वाले हैं, मगर उनको केवल बच्चे पैदा करने वाले मत समझिए, वे अपने हिंदुस्तान के लिए सोचने वाले भी हैं। उनके मन में यह भाव आना चाहिए कि it is a question of survival of the nation. उनकी जब तक हम सहभागिता सुनिश्चित नहीं करेंगे, अवेयरनेस प्रोग्राम कहिए या बातचीत कहिए, जब तक उनके साथ हम नहीं करेंगे, तब तक हम कुछ नहीं कर पाएंगे। इस बात को ध्यान में रखना होगा।
दूसरी जो पापुलेशन बढ़ने वाली है, वह 60 साल से अधिक उम्र वालों की है, जो सात प्रतिशत से नौ प्रतिशत होने वाली है। कई बार यह भी होता है, जैसा मैंने पहले कहा कि असुरक्षा की भावना केवल लड़की के मन में ही नहीं रहती है, माता-पिता के मन भी रहती है कि कौन देखेगा, कौन पालेगा, कौन क्या करेगा? आपने कहा कि एक लड़की बस या लड़की दो भी हो जाए, तो बस। मेरे मन में एक बात आयी जिस पर आप विचार कर सकते हैं। जैसे कुछ इंश्योरेंस एजेंसीज सीनियर सिटीजन्स के लिए काम करती हैं, इसमें रिवर्स मार्टगेज एक योजना है, आप इसका अभ्यास करें, मैं यही नहीं कहूंगी, लेकिन सोशलाइजेशन आफ इंश्योरेंस सेक्टर हो। जिसके कारण असुरक्षा की भावना होती है, उसे हम कैसे दूर करें कि दो लड़के तो होने ही चाहिए या इससे ज्यादा होने चाहिए और हमें कौन देखेगा?
यह केवल स्वास्थ्य मंत्रालय की बात नहीं है, जितने भी अलग-अलग मंत्रालय हैं, जो सामाजिक मंत्रालय हैं, चाहे सोशल जस्टिस हो, मानव संसाधन मंत्रालय हो या और भी दूसरे मंत्रालयों की एक ग्रुप आफ मिनिस्टर्स का समूह बनाना चाहिए। मानव विकास की योजना और उसके साथ-साथ जो अनेक योजनाएं चलती हैं, इन योजनाओं का लाभ, जैसे अभी माननीय शरद जी बिल्कुल ठीक कह रहे थे कि जिनके बच्चे कम हैं, उनको ज्यादा लाभ मिले या ज्यादा बच्चे हों तो उनके थोड़े से लाभ में कमी कैसे हो सकती है, यह भाव भी रहे, लेकिन उनको बिल्कुल लाभ नहीं देना, मैं यह बात नहीं कहूंगी। हमें उनको लाभ देना है। सबको इस प्रकार से सोचना आवश्यक है। जैसा कि मैंने कहा कि पार्टीवाद से ऊपर उठकर इस पर विचार करें। ऐसे कई धार्मिक नेता हैं, आपने भी प्रचार माध्यमों की बात कही, इसके साथ ही हमारी अपनी जो संस्कृति है, क्योंकि कई बार हमारे संत महात्मा भी बहुत अच्छी बात कह जाते हैं, लेकिन हम उनकी तरफ ध्यान नहीं देते हैं। हमारे यहां एक संत ने कहा था - लेकुरे उदण्ड झाली, तोते लक्ष्मी निगोनिगली। एक छोटी सी बात है कि अगर बच्चे ज्यादा हों, तो लक्ष्मी चली जाती है, यह उन्होंने कहा। एक बात यह भी होती है कि केवल बच्चे कम कैसे हों या लोकसंख्या स्थिर कैसे हो, हमें यही नहीं देखना है, बल्कि जो हमारी लोकसंख्या है, हम उस आंकड़े से डरें भी नहीं। इस संबंध में एक पोजीटिव थिंकिंग भी आवश्यक है।
जो यंग पौपुलेशन है, आने वाला हिन्दुस्तान यंग पौपुलेशन का है, अगर हमारी योजनाएं ठीक नहीं चलीं या ठीक तरह से नहीं चलवाई गईं तो यह हमारा ह्यूज एसैट बन सकता है या डेंजरस लॉयबिलिटी भी बन सकता है। यह विकास का सहायक बन सकता है, विनाश का कारण भी बन सकता है। यह सशक्त संख्या भी बन सकती है। लेकिन अगर हमारी योजनाएं गरीब तक नहीं पहुंची तो यह हमारे लिए अधमरी विपदा भी बन सकती है। इसलिए मैं चाहूंगी कि सब मंत्रालय मिलकर, साथ ही हमारी संस्कृति, हमारे वेदों में लिखा हुआ है कि किस प्रकार संतति का निर्माण हो। हम उसका भी अभ्यास करें। अनेक शास्त्रों में कुछ-कुछ होगा। अगर हम कहीं न कहीं इन सबका सहयोग लेते हुए काम करने की सोचें तो कुछ हो सकता है। आपने बिल्कुल ठीक कहा कि बंद कमरे से बाहर आकर, खुले दिमाग से पार्टियों को अलग रखते हुए, युवाओं का साथ लेकर, धार्मिक नेताओं का साथ लेकर अगर सोचें तो कुछ हो सकता है। मैं उदाहरण के लिए बताना चाहती हूं। अभी मिलेनियम डैवलपमैंट गोल की बात हो रही है, उसी में एक बात यह भी है। युनाइटेड नेशन्स का डैवलपमैंटल ग्रुप है। उन्होंने पौपुलेशन स्थिर करने के लिए दो सौ बैस्ट प्रैक्टिसेज़ निकालीं। हिन्दुस्तान के लिए चौंकाने वाली बात है कि उसमें हिन्दुस्तान की केवल चार प्रैक्टिसेज़ दर्ज हुईं। मेरे लिए गौरव की बात है कि उन चार प्रैक्टिसेज़ में से दो प्रैक्टिस गुजरात सरकार की है, जिसे हम कोसते हैं। उसमें उनकी एक इंस्टीटय़ूशनल डिलीवरी है। उसे हम भी महत्व दे रहे हैं, सब प्रदेश महत्व दे रहे हैं। जननी सुरक्षा योजना भी बनाई गई है। मध्य प्रदेश भी कर रहा है। मगर उनकी इंस्टीटय़ूशनल डिलीवरी की कल्पना है, आपके इसमें भी इसका उल्लेख है कि प्राइवेट मेटरनिटी होम्स का सहयोग लेना। वहां वे 50 हजार की इप्रैस्ट मनी रखते हैं। उसमें कहते हैं कि आदिवासी हो, गरीब परिवार की हो, नीचे की जाति जैसे दलित आदि हो, अगर वह डिलीवरी के लिए आए तो आपको एडमिट करना है। कई बार समस्या आती है कि अस्पताल नहीं है, प्राइवेट वाले देखते नहीं हैं, सरकारी कुछ नहीं है। हमारी कई संस्थाएं हैं, लेकिन वे मौजूद नहीं हैं तो वे कहां जाएं। उसके लिए यह व्यवस्था की गई है। ये वर्ल्ड की चार बैस्ट प्रैक्टिसेज़ में आई हैं। इसलिए मैंने कहा कि यदि हम पार्टी पोलीटिक्स को छोड़कर विचार करेंगे और सब मंत्रालय मिलकर विचार करेंगे, तो जनसंख्या हमारे लिए एसैट बन सकती है, अच्छा कारण बन सकती है। लेकिन गरीब की सोच गरीबी के साथ बदलनी पड़ेगी। गरीबी में भी कहीं न कहीं परिवर्तन लाना होगा। इसलिए development is the best contraceptive, हम यह बात ध्यान में रखें।
श्री शरद यादव : मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि आपने बहुत महत्वपूर्ण चर्चा छेड़ी है। लेकिन इस समय आप टीवी पर सीरियल देखिए। अभी श्रीमती महाजन चाइल्ड मैरिज के बारे में बोल रही थीं। टीवी में दो सीरियल - लाडो और बालिका वधु चल रहे हैं। हमारे पास शारदा एक्ट है। शारदा एक्ट के होते हुए इस देश में ऐसे सीरियल मानसिक बीमारी हैं। जैसे श्रीमती महाजन ने कहा, मैं कहना चाहता हूं कि आबादी बढ़ाने में चाइल्ड मैरिज भी बहुत बड़ा कारण है।
दूसरा, लाडो सीरियल में बच्चियों को पैदा होते ही मार दिया जाता है। उस सीरियल की सबसे ज्यादा टीआरपी है। आप इस पर भी ध्यान दीजिए। आईबी मिनिस्ट्री, जिसमें आप खुद रहे हैं, उनसे बात करके आप ऐसे सीरियलों को रोक सकते हैं।
श्री नवीन जिन्दल (कुरुक्षेत्र): महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे देश में जनसंख्या स्थिरीकरण मुद्दे पर बोलने का अवसर दिया है। मेरे विचार में देश के अंदर तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या एक गंभीर और ज्वलंत मुद्दा है। मैं माननीय स्वास्थ्य मंत्री श्री गुलाम नबी जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने स्वयं ही सदन के सामने प्रस्ताव पेश करके इस गंभीर और महत्वूपर्ण विषय पर चर्चा का अवसर प्रदान किया है। यह चर्चा 33 साल बाद सदन में हो रही है, इसलिए भी मैं माननीय मंत्री जी को बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं। सदन में आज ही महंगाई जैसे महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा समाप्त हुई है। इस चर्चा के दौरान भी कुछ माननीय सदस्यों ने महंगाई के विभिन्न कारणों में से एक प्रमुख कारण जनसंख्या वृद्धि को माना है। मैं भी इस विचार से पूरी तरह सहमत हूं कि जनसंख्या वृद्धि का सीधा-सीधा असर हमारे सीमित साधनों पर पड़ता है, जिससे महंगाई बढ़ती है। देश में जनसंख्या स्थिरिकरण आज समय की मांग है। इस विषय में कामयाबी हासिल किए बिना देश की प्रगति व विकास अधूरा है। इस विषय में मेरी गहरी रुचि है और पिछले कुछ वर्षों से मैं इसका गहराई से अध्ययन कर रहा हूं। मैंने इस विषय पर बहुत से विशेषज्ञों, बुद्धिजीवियों, विभिन्न दलों के माननीय सांसदों तथा अपने क्षेत्र कुरुक्षेत्र के विभिन्न वर्गों के लोगों से चर्चा की है। इसी अनुभव के आधार पर मेरी जो धारणा बनी है, उसको आपके माध्यम से माननीय सदन के सामने रखना चाहूंगा। आज हमारे देश की जनसंख्या लगभग 120 करोड़ हो गई है और यह तेजी से बढ़ती जा रही है। अब तक के प्रयासों के परिणामस्वरूप जनसंख्या विकास दर जो कि 1981-91 के दशक में 2.14 प्रतिशत थी, वह घटकर 1.4 प्रतिशत हो गई है। विश्लेषण दर्शाते हैं कि इस दर के बावजूद, मतलब 1.4 दर के बावजूद हमारी जनसंख्या हर वर्ष 1 करोड़ 80 लाख बढ़ती जा रही है। हम हर वर्ष एक अस्ट्रेलिया अपने देश में शामिल कर रहे हैं। इस दर से हमारी जनसंख्या वर्ष 2030 तक 142 करोड़ के लगभग हो जाएगी और चीन से अधिक हो जाएगी। भारत विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश हो जाएगा। दुखः की बात यह है कि सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश होने के नाते हमें कोई स्वर्ण पदक नहीं मिलेगा, बल्कि हमें और ज्यादा मुसीबतें झेलनी पड़ेंगी। कुछ लोग इस बात का भी प्रचार करते हैं कि बड़ी जनसंख्या हमारी ताकत है और इस तरफ ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। यह अपने आप ही कंट्रोल हो जाएगी, लेकिन मैं समझता हूं कि वे भूल जाते हैं कि ज्यादा जनसंख्या देश के लिए तो दिक्कत की बात है ही, लेकिन उस परिवार के लिए भी बहुत दिक्कत की बात है, जिसकी संख्या ज्यादा है। सभी अपने-अपने अनुभव से जानते हैं कि वे परिवार ही ज्यादा खुशहाल हैं, जिनके एक या दो बच्चे हैं, उन परिवारों की अपेक्षा जिनके सात, आठ या नौ बच्चे हैं। जिस परिवार में बच्चों की संख्या कम होगी, वहां बच्चों की अच्छी परवरिश हो सकेगी। उनको अच्छी शिक्षा मिल सकेगी। अगर इस दिशा में हमने कारगर कदम नहीं उठाए, तो अगले 50 वर्षों में हमारी जनसंख्या लगभग दुगुनी हो जाएगी। अभी हमारी जनसंख्या 120 करोड़ है, यह जनसंख्या बढ़ कर 240 करोड़ हो जाएगी। जिसके मेरे ख्याल से बहुत ही गंभीर परिणाम होंगे। इस भयावह स्थिति के लिए हम सब जिम्मेदार होंगे और हमारी आने वाली पीढ़ी हमें कभी भी माफ नहीं करेगी।
मैं माननीय सदन को जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणामों से अवगत कराना चाहता हूं। जैसा माननीय मंत्री जी ने बताया कि प्राकृतिक संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी। भारत के पास विश्व की केवल 2.4 प्रतिशत भूमि है और जनसंख्या 17 प्रतिशत है। हमारा जनसंख्या घनत्व पौने चार सौ के करीब है, वह और ज्यादा बढ़ जाएगी। जनसंख्या का बढ़ता दबाव प्रति व्यक्ति के लिए भूमि की उपलब्धता को, खाद्यान्न को, पेयजल को तथा दूसरी आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता पर प्रतिकूल असर डालता है।
इससे स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और आवास के लिए होड़ और ज्यादा हो जाएगी। परिवारों की गरीबी और ज्यादा बढ़ जाएगी। हम जानते हैं कि मिडिल क्लास फैमिली में एक बच्चे को 18 साल की आयु तक पढ़ाने और पालने के लिए चार से पांच लाख रुपए खर्च होते हैं। यह बात स्वाभाविक है कि अगर किसी परिवार में ज्यादा बच्चे होंगे तो उनकी गरीबी और ज्यादा बढ़ेगी।
संयुक्त राष्ट्र संघ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट में मल्टी डाइमेंशनल पावर्टी इन्डेक्स (एमपीआई) के मापदंड में कहा गया है और माननीय मंत्री जी ने भी जिक्र किया है कि भारत के आठ राज्य- बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की जनसंख्या को देखते हैं तो पता चलता है कि अफ्रीका में 26 गरीब देशों से ज्यादा गरीब लोग इन आठ राज्यों में रहते हैं। अब हम शहरीकरण की बात करते हैं, जिसके कारण शहरों में झुग्गी झोपड़ियां बढ़ेंगी। हमारा लक्ष्य पांच साल के अंदर अपने देश को झुग्गी झोंपड़ी रहित बनाना है। अभी कुछ दिन पहले रिपोर्ट आई थी कि यह पांच साल में नहीं, यह बीस साल में संभव होगा। मैं समझता हूं कि इसी तरह से जनसंख्या बढ़ती रहेगी तो बीस साल में भी यह संभव नहीं हो पाएगा। हम आज क्लाइमेट चेंज की बात करते हैं। बढ़ती जनंसख्या का इस पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
महोदय, अब मैं उन मुख्य कारणों की चर्चा करना चाहता हूं जिनके कारण जनसंख्या बढ़ रही है। नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे के अनुसार टोटल फर्टिलिटी रेट 2.72 है जो 2.1 होना चाहिए था। माननीय मंत्री जी ने दक्षिण भारत के राज्यों के बारे में बताया कि तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल आदि कई राज्यों ने यह लक्ष्य हासिल किया है। लेकिन कुछ राज्यों में यह 4 तक हैं खास तौर से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश की तरफ बहुत ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि ये राज्य भी अपनी जनसंख्या पर नियंत्रण कर सकें। एक बड़ा कारण मेल चाइल्ड प्रेफरेंस यानी लड़कों को तरजीह देना है और लोग ज्यादा बच्चे पैदा करना चाहते हैं। हम कई बार लोगों से मिलते हैं तो हम पूछते हैं कि आपके पास सात बच्चे कैसे हैं? तो वे कहते हैं कि छः लड़कियां हुई। इस तरह से लड़के की चाह में और ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं। इन्फेंट मोर्टेलिटी रेट बहुत ज्यादा है और इसके कारण भी जनसंख्या बढ़ती है। शरद यादव जी ने इन्सेन्टिव की बात कही थी। मैं भी इस बात का पक्षधर हूं कि अगर किसी के बेटा नहीं भी है तो उनके बुढ़ापे की पेंशन को तीन या चार गुना कर दिया जाए ताकि उन्हें कोई फर्क न पड़े और उन्हें पता लगे कि हमारा सोशल सिक्योरिटी मेकेनिज्म पावरफुल है। सुमित्रा महाजन जी ने एक और कारण कम उम्र में लड़कियों की शादी कर देने का जिक्र किया। यह कानूनन अपराध है लेकिन फिर भी हम देखते हैं कि बहुत राज्यों में 18 साल से कम उम्र की लड़कियों को ब्याह दिया जाता है। इससे हम बेटियों की जान जोखिम में डाल रहे हैं और उनके बच्चों की जान भी जोखिम में डाल रहे हैं। इसके लिए बहुत अनिवार्य है कि हम सुनिश्चित करें कि 18 साल से पहले शादी न हो, अगर हो जाती है तो भी पहला बच्चा 20 साल की उम्र के बाद ही हो। अगर इसे हम सुनिश्चित करते हैं तो बेटियों की जान की सुरक्षा कर सकते हैं। दूसरा बड़ा कारण परिवार नियोजन सेवाओं की कमी का है। सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि करीब बीस करोड़ लोगों को गर्भ निरोधकों की आवश्यकता है जबकि इनमें से 50 प्रतिशत लोगों को ही सेवाएं मुहैया करा पाते हैं।
16.00 hrs. इसके कारण बहुत से अनवान्टेड गर्भपात भी किये जाते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम लोगों को परिवार नियोजन सेवाओं की उपलब्धता करवायें। हम जैसे ही प्राइमरी हैल्थ केयर इप्रूव करेंगे, उससे हाई इनफैन्ट मोर्टेलिटी रेट में कमी आयेगी। उससे लोगों के अंदर एक कांफीडैन्स आयेगा कि अगर उनके बच्चे कम भी होंगे तो भी वे जीयेंगे। वरना लोग यह सोचते हैं कि अगर बच्चे कम हुए और अगर किसी बच्चे का देहांत हो गया तो वह बिना बच्चों के रह जायेंगे। इसलिए हमें अपनी हैल्थ सर्विसेज को भी इप्रूव करना होगा। इसके अलावा इंस्टीटय़ूशनल डिलीवरी की जो बात कही गई, यह बहुत आवश्यक है कि हम संस्थागत डिलीवरीज को बढ़ायें। क्योंकि कुछ राज्य जैसे छत्तीसगढ़ और झारखंड में केवल 20 या 25 प्रतिशत इंस्टीट्य़ूशनल डिलीवरीज होती हैं। इसका एक बहुत बड़ा कारण यह है कि जब घर में डिलीवरीज होती है तो उसमें बहुत ज्यादा इनफैन्ट मोर्टेलिटी रेट और मैटर्नल मोर्टेलिटी रेट भी इन राज्यों में बहुत ज्यादा है। हमारे देश में जो जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, उसका एक कारण यह भी है कि उसमें पापुलेशन मोमैन्टम है। उस मोमैन्टम को कम करने के लिए, उस गति को कम करने के लिए हमें बच्चों में अंतराल को बढ़ाना पड़ेगा। एक बच्चे से दूसरे बच्चे के बीच अगर समय बढ़ता है तो उससे भी पापुलेशन मोमैन्टम में फर्क पड़ेगा। इसलिए मैं कहना चाहूंगा कि जनसंख्या स्थिरता कोष, राष्ट्रीय जनसंख्या स्थिरता निधि के विशेषज्ञों ने भी इसमें बहुत अच्छे सुझाव दिये हैं। वे लोग बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। मैं उनके कार्यों की सराहना करना चाहूंगा और मैं समझता हूं कि उन्हें और बढ़ावा दिये जाने की आवश्यकता है, ताकि वे और ज्यादा बढ़-चढ़कर इसमें काम कर सकें।
अभी माननीय मंत्री जी ने कहा कि इसमें सबसे महत्वपूर्ण जो काम किया जा सकता है, वह है एक राजनीतिक आम सहमति को बनाना, एक राजनीतिक इच्छा शक्ति का विकास करना। यदि हम सब लोग मिलजुलकर अपनी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अगर इसमें काम करें तो मैं समझता हूं कि हम इस लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं और हम अपने देश में उन्नति और खुशहाली भी ला सकते हैं। माननीय मंत्री जी ने कहा कि तमिलनाडु राज्य ने आवश्यक गर्भ निरोधक पर फोकस किया और टीएफआर के अंदर बीस प्रतिशत की कमी लाने में सफलता पाई। गुजरात के बारे में अभी श्रीमती सुमित्रा महाजन कह रही थीं और मैं भी कहना चाहता हूं कि गुजरात में चिरंजीवी योजना की सहायता से मातृत्व मृत्यु दर में महत्वपूर्ण कमी लाने में सफलता मिली है। हिमाचल प्रदेश और हरियाणा में भी महिला शिक्षा और महिला सशक्तीकरण पर ध्यान दिया गया है, जिससे मैटर्नल मोर्टेलिटी रेट में काफी कमी आई है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण काम जो 16.03 hrs. (Shri Arjun Charan Sethi in the Chair) हम कर सकते हैं, वह महिला शिक्षा और महिला सशक्तीकरण, इस पर पर्याप्त बल देने की आवश्यकता है। यह हमारा अनुभव हैं कि जो हमारी बेटियां अगर 12वीं कक्षा तक अगर पढ़ लेती हैं तो न तो उनकी कम उम्र में शादी होती है और वे जितने भी महत्वपूर्ण निर्णय हैं, उन महत्वपूर्ण निर्णयों को लेने के काबिल हो जाती हैं। जैसे कि बच्चों की संख्या कितनी होनी चाहिए, बच्चों में अंतराल कितना होना चाहिए। वे परिवार नियोजन के तरीकों का चुनाव करने के लायक हो जाती हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम महिलाओं और अपनी बेटियों की शिक्षा पर पूरा ध्यान दें। हमें सामाजिक व्यवहार और सोच में बदलाव लाने तथा जागरूकता के लिए बहुत काम करने की आवश्यकता है - जैसे शादी की सही आयु पर बल देना, लिंग समानता, महिला रोजगार को महत्व देना आदि।
इसके अलावा हमें अपने समाज में रोल माडलों को तैयार करना चाहिए। मैं समझता हूं कि हमारे संसद के अंदर भी बहुत से ऐसे सांसद रोल माडल्स हैं, जिनके पास केवल एक बेटा या बेटी है। उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए सिर्फ एक या दो ही बच्चे पैदा किये। मैं समझता हूं कि शादी की सही उम्र को सुनिश्चित किया जाना चाहिए। 18 साल से कम उम्र में हमारी किसी भी बेटी की शादी न हो, ताकि उनकी जान जोखिम में न डले और जहां ऐसा हो तो उसके लिए जो कानून है, उसके अनुसार कानूनी कार्यवाही को इम्पलीमैन्ट करना चाहिए।
मैं समझता हूं कि सब से बड़ी बात इसमें यह की जा सकती है कि उस व्यक्ति को इंसैंटिंव दिया जाये जो एक या दो बच्चे पैदा करता है, उसे बुढ़ापे में चार गुना पैंशन दी जाये। इस काम मे देश के सिर्फ 500 करोड़ रुपये खर्च होंगे लेकिन बुढ़ापे का सहारा हो जायेगा। जो लोग लड़के का वहम करते हैं कि हमारा लड़का जरूर होना चाहिये जिससे कि वह बुढ़ापे का सहारा बने, उससे काफी हद तक निजात मिलेगी। हमारे हरियाणा में लाडली स्कीम को काफी कामयाबी मिली है।
सभापति महोदय, मैं अंत में आपका और सदन का आभार प्रकट करता हूं कि मेरे विचारों को धैर्य और शान्ति से सुना गया। मैं अपेक्षा करता हूं और मुझे विश्वास है कि माननीय स्वास्थ्य मंत्री के संरक्षण में स्वास्थ्य मंत्रालय वह सभी कदम उठायेगा जो व्यक्ति, परिवार ,देश और समाज के हित में हैं। मैं माननीय मंत्री जी को विश्वास दिलाना चाहता हूं कि उन्हें इस प्रयास में पूरे सदन का समर्थन मिलेगा। उन्होंने माननीय सदस्यों से आह्वान किया है कि हम लोग अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर बात करें। पहले इस बारे में हम लोग संकोच करते थे लेकिन समय की मांग है कि आज हम लोगों में जागरूकता लेकर आयें। अगर हम सब में आम सहमति होगी, दलगत राजनीति से हटकर काम करेंगे तो मुझे विश्वास है कि हम अपने देशवासियों के लिये खुशहाली और सम्पन्नता लेकर आ सकते हैं और हम सब मिल जुलकर अपने सपनों का भारत बना सकते हैं।
श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी): सभापति महोदय, मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने स्वास्थ्य मंत्री श्री गुलाम नबी द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव देश में जनसंख्या स्थरीकरण मुद्दे पर मुझे बोलने का मौका दिया। मैं माननीय मंत्री जी का आभार प्रकट करता हूं कि वह इस महत्वपूर्ण मुद्दे को सदन में लेकर आये।
मैंने बहिन सुमित्रा और श्री जिन्दल जी के विचारों को सुना है। मैं हिन्दुस्तान जैसे 120 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में जनसंख्या पर नियंत्रण करने के लिये मंत्री जी द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव पर अपने विचार रखना चाहूंगा। वर्तमान वर्ष 2010 चल रहा है और देखा जाये तो प्रतिवर्ष औसतन एक से डेढ करोड़ की जनसंख्या बढ़ रही है। मैं माननीय मंत्री जी के विचारों को थोड़ा सा इसलिये सुन पाया क्योंकि मैं बीएसी की मीटिंग में गया हुआ था। सदन जनसंख्या मुद्दे पर चिन्ता व्यक्त कर रहा है। अगर शिक्षा, जनसंख्या और जागरूकता - तीनों का मिलन हो जाये तो मेरे ख्याल से बहुत सारी समस्यायें हल हो सकती हैं। देश का आम जनता का विकास हो सकता है। खासकर जो बीपीएल कार्डधारक हैं, उनका भी विकास हो सकता है। माननीय स्वास्थ्य मंत्री बता रहे थे कि हम लोग हर वर्ष विश्व जनसंख्या दिवस मनाते हैं। एक ए.सी. कमरे में बैठकर मना लेते हैं। वैसे उन्होंने जनसंख्या मुद्दे पर बड़े विस्तार से बातें कही हैं। मैं उन पर तो नहीं जाना चाहूंगा लेकिन विश्व जनसंख्या दिवस मनाने के लिये मैं कुछ सुझाव देना चाहता हूं...( व्यवधान)
श्री गुलाम नबी आज़ाद : महोदय, मैं उस समय इस बारे में बताना भूल गया क्योंकि बहुत सारी चीजें आ रही थीं। जब हमने पिछले साल निर्णय लिया कि आइन्दा ऐसा नहीं होगा तो इस साल हमने यह कार्यक्रम कमरे में नहीं मनाया। इस साल इंडिया गेट पर सुबह छह बजे हजारों लड़के और लड़कियों ने तीन किलोमीटर की रेस की। इसे तमाम चैनल्स ने दिखाया, उसके लिए मैं समाचार पत्रों और टेलीविजन चैनल्स को धन्यवाद देता हूं। उन्होंने गलती से इसे दिखा दिया और इस बार हमने एक दिन नहीं, इसे एक हफ्ता मनाया। जहां ज्यादा समस्याएं हैं जैसे- उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में तकरीबन साढ़े तीन सौ जिलों में पूरे एक हफ्ते तक कार्यक्रम हुए और उसमें मुख्यमंत्रियों ने हिस्सा लिया। चाहे वे विपक्ष के मुख्यमंत्री हों या कांग्रेस के हों, मंत्रियों ने हिस्सा लिया, अधिकारियों ने हिस्सा लिया। जो आखिरी प्रोग्राम था, वह जयपुर में पूरे दिन का हुआ, जिसमें हजारों लोगों, हजारों वर्कर्स और बाकी लोग आये थे। खाली पिछले साल कहा तो ऐसा नहीं है कि हमने किया नहीं, इस दफा हम तीन सौ जिलों में गये हैं, अगली दफा यदि हम सब मिलकर करें तो हम तीन हजार, तीन लाख फंक्शन कराना चाहेंगे।
श्री शैलेन्द्र कुमार : महोदय, मेरा इसमें एक सुझाव है कि आप इसे एक पखवाड़ा या एक महीना मनाइये। स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय की तरफ से आपने सभी संसदीय क्षेत्रों स्वास्थ्य मेला लगवाने का काम किया था, इस वक्त वह बंद हो गया है। हो सकता है कि बजट की कमी हो, जो भी हो, लेकिन उसमें परिवर्तन करके आप विश्व जनसंख्या दिवस को पखवाड़े के रूप में हर संसदीय क्षेत्र में या हर विधान सभा में इसे मनवाने की व्यवस्था कर दीजिए। चाहे आपको इसके लिए यहां से कुछ धन भी निर्गत करना पड़े। आप यह राज्य सरकारों को दीजिए क्योंकि बढ़ती हुई जनसंख्या हिन्दुस्तान के विकास में बहुत बड़ा रोड़ा है। यह मेरा आपको सुझाव है।
महोदय, मेरी दूसरी बात यह है, जो बुकलेट आपने हम लोगों को दी है, उस रिपोर्ट को हम लोगों ने देखा है कि परिवार नियोजन से संबंधित आपने तमाम प्रोत्साहन दिये हैं। जिसमें राष्ट्रीय परिवार बीमा योजना की भी बात आपने कही है। मेरा आपको यह सुझाव है कि परिवार नियोजन योजना से संबंधित अगर कोई भी स्त्री या पुरूष उसमें सहभागिता देता है तो उसे जो भी सरकारी सुविधाएं मिलती हैं, उसमें उसे प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यह प्रोत्साहन देने से लोगों में जागरूकता आयेगी और लोग सक्रिय होकर परिवार नियोजन को एडॉप्ट करेंगे। परिवार नियोजन आठ सौ रूपये देते थे, आपने आठ सौ रूपये से उसे डेढ़ हजार रूपये बढ़ाया है। आज की महंगाई में यह धनराशि कोई मायने नहीं रखती है। आपको प्रोत्साहन स्वरूप कोई न कोई कार्य योजना बनानी पड़ेगी। खासकर इसमें जो दलित, मुस्लिम और बैकवर्ड जाति के लोग हैं, ये इससे ज्यादा प्रभावित होंगे। इसलिए मैं आपसे निवेदन करना चाहूंगा कि आप इसमें प्रोत्साहन दें। यह धनराशि बहुत कम है और आज की महंगाई को देखते हुए इसे बढ़ाने की जरूरत है।
महोदय, मैं रिपोर्ट में देख रहा था कि विभिन्न राज्यों की जो प्रजनन दरें हैं, जो जन्म-मृत्यु की दर आपने दर्शायी हैं, यह बात सत्य है कि, सुमित्रा महाजन बहन जी ने बड़े विस्तार से इस बारे में बताया है कि हर राज्य की जनसंख्या, हर राज्य की भौगोलिक परिस्थिति, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। बहुत से ऐसे राज्य हैं, जो बहुत पिछड़े हुए हैं। चाहे आप झारखंड ले लीजिये, बिहार ले लीजिये, उत्तर प्रदेश ले लीजिये, मध्य प्रदेश ले लीजिये, उड़ीसा ले लीजिये, ये तमाम राज्य पिछड़े हुए हैं। आज भी यहां इन तमाम बातों का अभाव है। मैं चाहूंगा कि इन राज्यों में आपको इस योजना को विशेष तौर पर प्रोत्साहन देकर आगे बढ़ाने की जरूरत है। यह देखा गया है कि जो बड़े लोग हैं, जो समझदार और पढ़े-लिखे लोग हैं, मैंने अभी कहा था कि इस अभियान में मुख्य चीज शिक्षा और जागरूकता है। इसलिए इन्हें बढ़ावा दिया जाना चाहिए। मानव संसाधन मंत्रालय भी आपके मंत्रालय से संबंधित है।
अगर अवेयरनैस के लिए दोनों मंत्रालय मिल कर इसकी व्यवस्था करें तो मेरे ख्याल से आपका यह प्रस्ताव बहुत कारगर साबित होगा। जहां तक मनोरंजन की बात है, बड़े-बड़े लोगों के पास या मध्यम वर्गीय पढ़े-लिखे जो लोग हैं, उनके पास धनराशि एवं सुविधाएं हैं। वे मनोरंजन कर लेते हैं, लेकिन जो स्लम बस्तियों में गरीब हैं, खास कर जो बीपीएल एवं अशिक्षित हैं, जिनके यहां अभी भी अज्ञानता है, ऐसे लोगों के यहां केवल टेलीविजन ही एक माध्यम है। अभी यहां बात चली है, कई बार राज्यसभा में भी यह बात उठ चुकी है, हमारे पहले नेता प्रो. रामगोपाल जी ने भी कहा था, टेलीविजन में इतनी अश्लीलता दिखाते हैं, हम जितने भी सदस्य यहां बैठे हैं, अपने परिवार के साथ समाचार नहीं देख सकते। आप बीच-बीच में जो विज्ञापन देते हैं, वह इतना अश्लील होता है कि हमें अपना मुंह दूसरी तरफ करना पड़ता है, क्योंकि बच्चे भी हमारे साथ बैठे होते हैं। आज यह स्थिति है।
सभापति महोदय, अभी आदरणीय शरद यादव जी कह रहे थे कि भारतवर्ष में यह कानून बना है। बाल विवाह के ऊपर यहां बात आई है कि 18 वर्ष की लड़की और 21 वर्ष के लड़के की शादी के लिए आपने वैधता की है। टी.वी. में एक सीरियल बालिका वधु आता है, जिसमें शारदा एक्ट की बात कही गई है, इसे कड़ाई से लागू करें, जो प्रभावित हो रहा है। इस पर आपको गंभीरता से सोचना पड़ेगा। दूसरा, लाडो सीरियल भी टी.वी. में आता है। उसमें वहां की जो महिला है, उसके यहां जो भी लड़की पैदा होती है, उसकी तत्काल हत्या कर दी जाती है, यह दिखाया जा रहा है। ...( व्यवधान)
सभापति महोदय : आपकी पार्टी की तरफ से एक अन्य माननीय सदस्य ने भी बोलना है।
श्री शैलेन्द्र कुमार : मैं आपको यह भी ध्यान दिलाना चाहूंगा कि इतनी सख्ती न करें, जिससे आपकी सरकार चली जाए। पहले भी आपकी सरकार इसकी वजह से गई थी। स्वर्गीय संजय गांधी जी ने अपने पांच सूत्री कार्यक्रम में परिवार नियोजन रखा था तो सरकार भी चली गई थी। इसलिए इस चीज का भी ख्याल रखें। यह जो आपदा है, यह राष्ट्रीय आपदा है और राष्ट्रीय कार्यक्रम भी है। इसलिए मैं चाहूंगा कि पक्ष-विपक्ष, सदन में जो भी हमारे सम्मानित सदस्य हैं, उनका सहयोग मिलना अतिआवश्यक है। बाल-विवाह पर रोक लगाने की बात है। कभी-कभी हम लोग टी.वी. पर देखते हैं कि बहुत बड़ा समारोह होता है। उसमें हमारे जनप्रतिनिधि और मंत्रिगण गए हैं। जिस विवाह समारोह में वे गए हैं, वहां उन बच्चों की आयु कम थी। ऐसे बाल-विवाह को रोकने के लिए खास कर जनप्रतिनिधियों को देखना चाहिए कि जिस परिवार में समारोह में हम जा रहे हैं, उस लड़का एवं लड़की की उम्र क्या है। अगर हम वहां जा रहे हैं तो इसका मतलब है कि हम बाल-विवाह को प्रोत्साहन दे रहे हैं। इस पर हमें चिन्ता व्यक्त करनी चाहिए। अगर कहीं भी हमारे जनप्रतिनिधि जाएं तो तत्काल अधिकारियों को सूचना दें। उस पर रोक लगानी चाहिए ताकि आने वाले समय में इस प्रकार की घटनाओं की पुर्नावृत्ति न होने पाए। इसीलिए सरकार ने कहा कि दो या तीन बच्चे, होते हैं घर में अच्छे। स्वास्थ्य मंत्री जी, आज अगर हमारे यहां की महिलाओं की स्थिति देखी जाए तो पता चलेगा कि उनमें हीमोग्लोबिन और एनिमा की कमी है। खास कर बच्चों की जो मृत्यु दर है, जो कुपोषण के शिकार हैं, ऐसी महिलाओं और बच्चों पर भी आपको विशेष ध्यान देना पड़ेगा। आप यहां से योजनाएं भेजते हैं, लेकिन राज्य सरकारें कहीं योजना लागू कर पाती हैं, कहीं नहीं लागू कर पाती हैं। आज भी जो ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं हैं, वे आपकी तमाम योजनाओं से वंचित हो जाती हैं। उन्हें सुविधाएं नहीं मिल पातीं। उसमें इतनी फोरमेलिटी होती है। वह बेचारी महिला अगर गर्भवती है तो वह कहां-कहां जाए। उसे क्या योजना मिलेगी, कितना पैसा मिलेगा, उसे कुछ नहीं मिल पाता। इसलिए इसमें कुछ सरलीकरण कीजिए। मान लीजिए कि अगर स्थानीय स्तर पर सीएचसी, पीएचसी या जो भी है, वहां से उसे डायरेक्ट सुविधा मिल जाए, यह व्यवस्था आपको करनी पड़ेगी।
सभापति महोदय, दूसरा मेरा कहना यह है कि एक बच्चे से दूसरे बच्चे के बीच में अंतर का जो विषय है, इसमें भी आपको कानून बनाना पड़ेगा। आज हमारी जो जनसंख्या बढ़ी है, उसका मैन कारण है कि एक बच्चे से दूसरे बच्चे के बीच में कम से कम पांच साल का अंतर होना चाहिए, यह मेरा मानना है। तभी हमारी महिलाओं में जो हीमोग्लोबिन की कमी है और बच्चे जो कुपोषण के शिकार हैं, उस पर रोक लग सकती है।
यह बात मैं आपको सुझाव के तौर पर बताना चाहता हूं।
इस समय, पूरे देश में जो लिंग अनुपात का असंतुलन है, वह बहुत है। अल्ट्रासाउंड से लोग बच्चे का पता लगा लेते हैं कि वह लड़का है या लड़की। आजकल पंजाब और हरियाणा में ऐसी जापानी किट आ गई हैं जिससे लड़का या लड़की होने का आसानी से पता लगाया जा सकता है। यहां जिंदल साहब बैठे हुए हैं। वे जानते होंगे। जापान या जर्मनी से कोई ऐसी किट आई है कि उस किट पर यदि ब्लड की एक ड्रॉप रख दीजिए, तो पता लग जाएगा कि गर्भवती महिला के पेट में लड़का है या लड़की। ऐसी किट की भी आपको जांच करानी पड़ेगी और उस पर रोक लगानी पड़ेगी। मंत्री जी, आप ठीक कह रहे हैं कि ऐसा कई सालों से है, लेकिन मेरा कहना है कि इस पर आपको रोक लगानी पड़ेगी और खासकर आपने जो योजना ‘सेव दि गर्ल चाइल्ड मिशन’ बनाई है, उसे चलाने के लिए ऐसा करना पड़ेगा। इस योजना को प्रभावी बनाने के लिए कुछ प्रोत्साहन योजना आप राज्यों को भेजें, ताकि इसका प्रभाव नीचे जमीन तक जाए।
मैं, माननीय मुलायम सिंह जी को धन्यवाद देना चाहूंगा कि जब वे हमारे प्रदेश के मुख्य मंत्री थे, यानी तत्कालीन मुख्य मंत्री, उस समय इन्होंने लड़कियों के लिए एक योजना ‘कन्या विद्या धन’ नाम से चलाई थी, जिसके अनुसार प्रत्येक लड़की को 20-20 हजार रुपए देने की व्यवस्था की गई थी। उस योजना के कारण बहुत सी ऐसी लड़कियां थीं, जिन्होंने इंटर पास करने के बाद ग्रेज्युएट या पोस्ट ग्रेज्युएट अथवा और ऊंची पढ़ाई की। यदि किसी पिता की बहुत मजबूरी रही होगी, तो उसने कम से कम उस बालिका के हाथ पीले करने का काम किया होगा। यह बहुत अच्छी योजना है। इस प्रकार की योजना आपको भारत सरकार की ओर से डायरैक्ट प्रदेशों को देनी चाहिए। तभी देश में जो लिंग-अनुपात असंतुलन है, वह व्यवस्थित हो पाएगा।
इस समय आपने भी आबादी के ऊपर चिन्ता व्यक्त की है कि आबादी बहुत बढ़ती जा रही है। हमारी जमीन उतनी ही है, बल्कि सिकुड़ रही है और हमारी आबादी बढ़ रही है। इसलिए हमें बढ़ती जनसंख्या पर चिन्ता व्यक्त करनी चाहिए। मैं सभी सम्मानित सदस्यों से यही निवेदन करूंगा कि यह जो प्रस्ताव आया है, इसका वे पुरजोर समर्थन करें और इसमें अपना सहयोग दें। यदि जनसंख्या को हम कंट्रोल कर लेंगे, तो हमारे जो सीमित संसाधन हैं, उन्हीं के माध्यम से हम अच्छा विकास कर लेंगे। अन्त में, मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं और इसका समर्थन करता हूं।
श्री गोरखनाथ पाण्डेय (भदोही):माननीय सभापति जी, माननीय स्वास्थ्य मंत्री जी द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रस्ताव कि देश में जनसंख्या के स्थिरीकरण के मुद्दे पर विचार किया जाए, जिस पर आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, मैं आपका आभारी हूं।
महोदय, माननीय मंत्री जी ने कहा कि साढ़े 33 वर्ष के बाद इस पर हम सदन में चर्चा कर रहे हैं। आपने बताया कि 11 जुलाई को ‘वर्ल्ड पॉपुलेशन डे’ पूरे विश्व में मनाया जाता है। देश के विकास में बढ़ती हुई जनसंख्या सबसे बड़ी समस्या है। यदि हम इसे जनसंख्या विस्फोट कहें, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा, बढ़ती हुई आबादी है। आपने बताया कि विश्व में हमारे देश की जमीन का जो प्रतिशत है, वह ढाई प्रतिशत है और विश्व की जनसंख्या की दृष्टि से हमारे देश की जनसंख्या का अनुपात साढ़े 17 प्रतिशत है, जो इस पर रहता है। यानी ढाई प्रतिशत भूमि पर साढ़े 17 प्रतिशत लोग रहते हैं। इस देश के विकास के लिए निश्चित रूप से यह संकट है। माननीय मंत्री जी को मेरा सुझाव है कि जहां हमें अपने देश में उपयोग के लिए ढाई प्रतिशत जमीन मिली है, उसमें भी हमारी आधी जमीन बंजर और परती जमीन है। ऐसे लोग जो खेती करना चाहते हैं, जो गरीब हैं, जो गांवों में रहते हैं और जिन्हें आबादी बढ़ाने में कहीं न कहीं पहली लाइन में रखा जा रहा है, अशिक्षा अथवा गरीबी है, उनमें यदि इस परती और बंजर जमीन को बांटा जाए, तो उन्हें देश में अन्न का उत्पादन बढ़ाने और अपनी व्यवस्था चलाने में भी मदद मिलेगी। जनसंख्या वृद्धि पर इसका भी असर पड़ेगा।
महोदय, आपने बताया कि हम कड़ा कानून नहीं बनाना चाहते, लेकिन आपने पूरे सदन से अपील की है कि एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिसमें लोग मिलजुल कर कुछ करें और निचले स्तर तक इस बात को ले जाएं। लोगों में जागरुकता पैदा करें कि हम जनसंख्या पर कंट्रोल करें। हम विश्व में दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा आबादी वाले देश हैं। चीन ने अपनी जनसंख्या पर कंट्रोल किया। उसने कुछ कानून बनाए। उसने व्यवस्था दी कि यदि लोग एक से अधिक बच्चे पैदा करते हैं, तो कहीं न कहीं उन्हें अन्य सुविधाओं से वंचित किया जाएगा।
सरकारी नौकरियों में उन्हें व्यवस्था नहीं मिल पाएगी, उनकी जमीन-जायदाद में दूसरे, तीसरे बच्चे को हिस्सा नहीं मिलेगा, यह कानून बना और उसका कुछ असर भी पड़ा, आबादी पर कंट्रोल हुआ। हमारे देश में, पूरे देशों या विश्व की बात हम अगर करें तो हम जो विकास की बात करते हैं, वह गणितीय विधि से बढ़ता है, 1-2-3-4-5, वहां जाकर विराम उसका हो जाता है और जब हम जनसंख्या की बात करते हैं तो यह ज्यामितीय विधि से बढ़ रही है, दो दुना चार चौके 16, इसका कोई अन्त नहीं है। आज जो चिन्ता का विषय है, हम इस पर बहस ही न करें, बल्कि इसको जमीन तक ले जायें, लोगों में जागृति पैदा करें और इस पर कंट्रोल करें।
महोदय, आपने कहा और सारे हमारे माननीय सदस्यों ने भी चिन्ता जताई कि बढ़ती हुई आबादी के कई कारण हैं। उसमें सबसे अहम कारण अशिक्षा है। माननीय मंत्री जी ने साउथ इंडिया के कई राज्यों का नाम लिया, जिन्होंने जनसंख्या की वृद्धि पर कंट्रोल किया, लेकिन वहां भी अगर ध्यान दिया जाये तो शिक्षा की प्रतिशत दर उनकी बढ़ी है, वे शिक्षित हुए हैं। हमें उधर भी ध्यान देने की जरूरत है और प्रशिक्षण की आवश्यकता है। माननीय मंत्री जी ने कहा कि पहले कानून बना था, 30 साल पहले हम उस समय पढ़ाई-लिखाई कर रहे थे, तब एक कड़ा कानून बना, लेकिन उसका कुछ इस तरह से प्रचार-प्रसार किया गया कि उसका रूप बदरूप हो गया। आज जरूरत शिक्षा की अनिवार्यता की है। शिक्षा की अनिवार्यता की बात तो की जाती है। आज ग्रामीण अंचल में जो दबे हैं, पिछड़े हैं, कुचले हैं, ऐसे लोगों को व्यवस्था मिलनी चाहिए, जिसके वे हकदार हैं।
मनोरंजन की भी बात आई। निश्चित रूप से आज गांवों में मनोरंजन की जरूरत है। शहरों में तो दो तरह की व्यवस्थाएं हैं। वहां एक तो सारी सुविधाएं हैं और उन्हें अपने स्तर से जीने की व्यवस्था है, लेकिन गांव का वह गरीब, गांव का वह किसान, गांव का वह मजदूर मनोरंजन के अभाव में अपने परिवार के बीच में रहता है और ज्यादा परिवार के बीच में रहने से भी यह स्थिति बनती है, जो बढ़ती हुई आबादी का एक कारण बनती है।
कम उम्र में बच्चे-बच्चियों की शादी, यह देहात में अभी भी चल रहा है। कानून बने हैं, लेकिन उसके बाद भी गांवों में कम उम्र के बच्चे-बच्चियों की शादी कर दी जाती है। जच्चा और बच्चा दोनों को इससे संकट होता है, बीमारियां होती हैं, उनका स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति भी उन्हें कहीं न कहीं प्रभावित करती है। इसमें भी एक व्यवस्था की आवश्यकता है। अभी हमारे माननीय सदस्य ने कहा कि टी.वी. पर एक सीरियल आता है, उसमें एक व्यवस्था दी गई है, उसमें जो कुछ बताया जा रहा है, वह देश के लिए, समाज के लिए हितकर नहीं है।
मैं आपका ध्यान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर आकृष्ट करना चाहूंगा, वहां आज भी बच्चियों को शिक्षित करने के लिए, बच्चियों को उनके विकास के लिए जो चाहे अनुसूचित जाति की है, गरीब है और चाहे बी.पी.एल. धारक है, उन बच्चियों को शिक्षित करने के लिए हाईस्कूल पास करने के बाद 15 हजार रुपये और एक साइकिल दी जा रही है, ताकि वे बच्चियां पढ़ सकें। जब वे इण्टर पास कर लेती हैं तो उन्हें 10 हजार रुपया मिल रहा है। यह हमारी गवर्नमेंट और उतर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जी ने व्यवस्था की है। पूरे प्रदेश में उससे दो लाभ हुए। एक तो जो बच्चियां गरीबों की हैं, पढ़ाई के अभाव में, धन के अभाव में, व्यवस्था के अभाव में वे घरों में बैठ जाती थीं, उनकी जल्दी शादी कर दी जाती थी, उनके बच्चे पैदा हुआ करते थे, उस पर विराम लगा और वे पढ़ाई की तरफ बढ़ीं और शिक्षित हुईं, उनकी साक्षरता बढ़ी। उत्तर प्रदेश में एक दूसरी महामाया आशीर्वाद योजना बनी। किसी भी जाति में, किसी भी वर्ग में कोई भी बच्ची अगर पैदा होती है, समाज में जो गरीब समाज है, उसमें बच्ची का पैदा होना आज भी अभिशाप माना जाता है। जैसा कि हमारे माननीय सदस्य जी ने कहा कि आज भ्रूण हत्या कराई जा रही है, लिंग परीक्षण कराया जा रहा है, इसमें भी आवश्यकता है, जैसे कि उत्तर प्रदेश सरकार में हमारी मुख्यमंत्री जी ने एक योजना बनाई कि अगर किसी भी गरीब परिवार में बच्ची पैदा हो रही है तो पैदा होते ही उसके नाम से 20 हजार रुपये जमा करा दिये जाते हैं और 18 साल के बाद उसे एक लाख रुपये का चैक प्रदान किया जाता है, तब तक वह लड़की पढ़ती रहती है और 18 साल की उम्र होने के साथ-साथ वह इण्टर तक की शिक्षा प्राप्त कर लेती है।
एक लाख रूपए का जो चेक उसे मिलता है, वह उसे पढ़ाई में सहयोग करता ही है, साथ ही साथ जब उसकी शादी होती है, उसकी शादी जो अवसाद के रूप में देखी जा रही थी, उसमें भी उसे मदद मिलती है। महोदय, मैं आपके माध्यम से केंद्र सरकार से और माननीय मंत्री जी से यह आग्रह करना चाहूंगा कि केवल बहस करके, व्यवस्था बनाकर, केवल आपस में वार्तालाप करके इस पर कंट्रोल नहीं कर सकते हैं। एक नीतिगत व्यवस्था होनी चाहिए। उतर प्रदेश सरकार ने जो व्यवस्था बनायी है, आप भी इस तरह की व्यवस्था पूरे देश में करें। पूरे देश में एक व्यवस्था दें और केंद्र सरकार की तरफ से मदद दें। उतर प्रदेश सरकारों की उसमें सहभागिता हो, ताकि जो बढ़ती हुयी आबादी है, उस पर कंट्रोल किया जा सके। यह बढ़ती आबादी हमारे देश के विकास में बाधक है और अगर इसे हम जनसंख्या विस्फोट कहें, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।
महोदय, मैं माननीय मंत्री जी से पुनः आग्रह करना चाहूंगा कि समाज में जागरूकता की आवश्यकता है, प्रशिक्षण की आवश्यकता है, मनोरंजन की व्यवस्था करने की आवश्यकता है और कम उम्र में होने वाली शादियों को रोकने की आवश्यकता है। ऐसे गरीब परिवारों को, निर्धन परिवारों को, झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले परिवारों को ऐसी सुविधायें प्रदान की जाएं कि उनका विकास हो सके, वे शिक्षित हो सकें। बच्चियां शिक्षित हों, क्योंकि जब एक लड़की शिक्षित होती है, तो उसका परिवार शिक्षित होता है, । उस बच्ची को हम कैसे शिक्षित करें? इस संबंध में हमारी उतर प्रदेश सरकार ने जो व्यवस्था दी है, वहां की मुख्यमंत्री जी ने जो व्यवस्था की है, इस तरह की व्यवस्था केंद्र की ओर से हो तो निश्चित रूप से बढ़ती हुयी आबादी पर रोक लगेगी और देश का विकास हो सकेगा।
श्री सुशील कुमार सिंह (औरंगाबाद):सभापति महोदय, आपने इस महत्वपूर्ण विषय पर मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आभार प्रकट करता हूं। जब माननीय मंत्री जी अपनी बात सदन के सामने रख रहे थे, तो उन्होंने बड़े विस्तार से आंकड़ों के साथ बताया कि देश में बढ़ती हुयी जनसंख्या के कारण क्या हैं? सुझाव के तौर पर भी उन्होंने कुछ बातें रखीं और बताया कि सरकार की क्या योजना है और सरकार क्या सोचती है?
महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा कि जनसंख्या वृद्धि का सीधा संबंध गरीबी से है। गरीबी के कारण अशिक्षा है और अशिक्षा के कारण जागरूकता का अभाव है। ये बातें एक-दूसरे से जुड़ी हुयी हैं। गरीबी और अशिक्षा के कारण, जागरूकता की कमी के कारण जो गरीब लोग हैं, उनके अंदर यह भावना होती है कि यदि हम ज्यादा बच्चे पैदा करेंगे, तो वे हमारे बुढ़ापे का सहारा बनेंगे। मैं जब अपने सुझाव रखूंगा, तब अपनी बात सरकार के सामने रखूंगा कि इसके लिए क्या किया जाना चाहिए। मैं यह कहना चाहता हूं कि जब से हमने होश संभाला है, तब से यह सुन रहा हूं कि छोटा परिवार, सुखी परिवार। मैं परिवार कल्याण से संबंधित तमाम कार्यक्रम और नारे सुन रहा हूं। लेकिन जो कार्यक्रम चल रहे हैं और जो नारे हैं, उन नारों से कोई खास फायदा अभी तक नहीं मिल पाया है। देश की जनसंख्या जिस तीव्र गति से बढ़ रही है, माननीय सदस्य ने ठीक कहा कि यह केवल जनसंख्या वृद्धि का ही मामला नहीं है, बल्कि यह कहें कि स्थिति विस्फोटक है, तो आज के दिन यही कहना सही होगा। आपने समस्या के संबंध में बड़े विस्तार में कहा, लेकिन मैं आपको यह बताना चाहूंगा और आप जब बार-बार आंकड़े पेश कर रहे थे, तो आपने बिहार का नाम हर संदर्भ में लिया, जहां से मैं चुनकर आता हूं। अशिक्षा है तो सबसे ज्यादा बिहार में है, टोटल फर्टिलिटी रेट बिहार का सबसे ज्यादा है और बालिकाओं की अशिक्षा की दर भी सबसे ज्यादा बिहार में है।
सभापति जी, मुझे आपके माध्यम से सदन को बताने में खुशी हो रही है, पहले क्या हुआ, नहीं हुआ, मैं नहीं कह सकता, लेकिन अभी की जो स्थिति है, बिहार में एनडीए की सरकार और वहां के माननीय मुख्य़ मंत्री नीतीश कुमार जी ने जनसंख्या वृद्धि पर लगाम लगाने के लिए राज्य में जो कार्यक्रम बनाए हैं, जो सबसे सुधारात्मक कार्यक्रम लाए गए हैं, उनमें महिला सशक्तीकरण के तहत पंचायत में महिलाओं को 50 प्रतिशत का आरक्षण दिया गया है ताकि महिलाएं निर्णय लेने वाली संस्थाओं में बैठें, वहां निर्णय ले सकें और उनके अंदर जागरुकता आए।
दूसरा, जहां तक महिलाओं में अशिक्षा का सवाल है, मुख्य मंत्री बालिका साइकिल योजना, मुख्य मंत्री बालिका पोषाक योजना है जिसके कारण काफी प्रगति हुई है। हमारी बच्चियां पहले प्राथमिक विद्यालयों तक शिक्षा ग्रहण करती थीं, उसके बाद उनका विद्यालय जाना बंद हो जाता था । लेकिन अब उच्च विद्यालय में नवीं कक्षा में पढ़ने वाली बालिकाओं को राज्य सरकार की तरफ से साइकिल दी जा रही है। इसके काफी अच्छे परिणाम आए हैं। उन्हें पढ़ने के लिए कॉपी-किताबें दी जा रही हैं, स्कूल जाने के लिए पोषाकें दी जा रही हैं। मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि बिहार में बालिकाओं की अशिक्षा की दर कम करने के लिए, उन्हें शिक्षित बनाने के लिए राज्य सरकार कारगर कदम उठा रही है।
मैं इस संदर्भ में आजादी से पहले की बात बताना चाहता हूं। जब हिन्दुस्तान गुलाम था, तब खैबर दर्रे से लेकर पटना तक लोगों ने आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसका नतीजा यह हुआ कि हम अंग्रेजों के निशाने पर रहे और आज की स्थिति भी यह है कि हम केन्द्र सरकार द्वारा उपेक्षित किए जा रहे हैं। अभी यहां जो आंकड़ा पेश किया गया, आपने बताया कि दक्षिण के राज्यों ने टोटल फर्टीलिटी रेट पर नियंत्रण कर लिया है। लेकिन जहां ज्यादा है, मैं माननीय स्वास्थ्य मंत्री जी से जानना चाहूंगा कि उन्होंने उन राज्यों के लिए क्या कार्यक्रम बनाए? किस कार्यक्रम के लिए कितना धन आवंटित किया गया ताकि उन राज्यों में उसे नियंत्रित किया जा सके। आपने उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों का नाम लिया, लेकिन इसके नियंत्रण के लिए क्या कार्यक्रम चलाए, मै यह जानना चाहता हूं? समस्या बताना हमारा काम है। यह कर्तव्य विपक्ष का है। आपका काम उनका समाधान ढूंढना है। हम सुझाव दे सकते हैं, लेकिन उन पर अमल करना, उन्हें लागू करना सरकार का दायित्व है।
कई माननीय सदस्यों और मंत्री महोदय ने कहा कि इसमें इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का काफी अहम रोल है। इस बात को प्रचारित करने में, देश को जागरुक बनाने में कि जनसंख्या पर किस तरह नियंत्रण किया जाए, इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का काफी अहम रोल है। लेकिन हमारे देश में शारदा एक्ट है। उसका उल्लंघन करते हुए टीवी पर कई सीरियल चल रहे हैं।
हमारे नेता श्री शरद जी ने इस बात को कहा और इसके पहले के सत्रों में भी उन्होंने इस बात को मजबूती से उठाया है, लेकिन अभी तक सरकार उस बात पर गंभीर नहीं है। इस प्रकार के सीरियल देश में चल रहे हैं बालिका वधू, न आना इस देश में लाडो। सरकार इस विषय में क्या कर रही है? एक तरफ तो आप चिंतित दिखाई दे रहे हैं कि हम जनसंख्या पर नियंत्रण करें और आपने भ्रूण हत्या, लिंग परीक्षण सारी बातों को स्वीकारा है। दूसरी तरफ आप इन पर कोई कार्यवाही नहीं करते हैं, तो मैं कैसे समझूं कि सरकार इस बात को लेकर गंभीर है।
महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि हमारे देश ने पिछले दशकों में तरक्की की है। यद्यपि इस विकास का सही रूप से वितरण नहीं हो पाया, हमारे देश में इसका उदाहरण है कि दक्षिण के राज्यों में ज्यादा विकास हुआ है। बढ़ती हुई जनसंख्या कारण है कि विकास में अपेक्षित संतुलन नहीं हुआ है। जनसंख्या पर नियंत्रण समकालीन भारत के लिए गंभीर चुनौती है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष 2030 में भारत की जनसंख्या 150 करोड़ से ज्यादा हो जाएगी और हम दुनिया के जनसंख्या के मामले में नम्बर एक देश हो जाएंगे। नोबल पुरस्कार विजेता डॉ. अमृत्य सेन का भी मानना है कि तब तक किसी देश का सर्वांगीण विकास नहीं हो सकता है, जब तक उस देश की महिलाओं को मुख्यधारा में शामिल नहीं किया जाता है। राज्य सरकारों ने अपने दायित्व का बखूबी निर्वाहन किया है। मैं बिहार सरकार की बात कह रहा हूं, लेकिन भारत सरकार इस विषय में क्या कर रही है, मैं यह जानना चाहता हूं?
मैं कुछ सुझाव देना चाहता हूं। आपातकाल के दौरान लोगों को पकड़-पकड़ कर नसबंदी की गई। डर के कारण लोगों ने बाजार जाना छोड़ दिया। मैं उस दौर की बात नहीं कहना चाहता हूं, लेकिन मंत्री जी ने जैसा कहा है कि किसी प्रकार की जोर-जबरदस्ती नहीं होगी, मैं आपसे सहमत हूं। लेकिन मुझे लगता है कि वह समय आ गया है जब बहुत कड़े कदम नहीं, बहुत कड़े कदम नहीं, लेकिन कुछ तो करना पड़ेगा, जिससे जनसंख्या पर रोक लगे। इन्सेंटिव की बात कही गई है। इन्सेंटिव देना चाहिए, लेकिन इसके साथ-साथ कोई प्रतिबंधात्मक कदम भी उठाना चाहिए, जिस तरह से चीन ने उठाया है। हम जनसंख्या पर रोक लगाने का कोई उपाय जरूर करें कि दो बच्चों को पैदा करने के बाद आपको फला-फला सुविधा नहीं मिलेगी। इस विषय पर सदन में चर्चा करके सभी दलों की राय लेने के बाद मैं समझता हूं कि कुछ न कुछ कड़े कदम दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ बिना राजनीति के उठाने की आवश्यकता है। अब वह समय आ गया है कि कुछ न कुछ कदम आने वाले एक, दो सालों में उठाने पड़ेंगे, जिनका परिणाम आने वाले समय में दिखाई देगा। बहुत लचीलापन दिखाने से काम नहीं चलेगा। यह समस्या विकराल होती जा रही है। आपने सही कहा है कि बाकी चीजों का उत्पादन तो हम कर लेंगे, लेकिन जमीन का उत्पादन कैसे बढ़ाएंगे? जमीन घटती जा रही है और जमीन के कारण इस देश में कानून और व्यवस्था की स्थिति खराब होती जा रही है। भूमि सुधार के लिए एजिटेशन्स चलते हैं, लेकिन जनसंख्या इस तरह से बढ़ती रहेगी, तो कोई एजिटेशन सफल नहीं होगा। हम कई तरह की योजनाएं बनाते हैं, लेकिन विस्फोटक जनसंख्या के कारण सारी योजनाएं फेल हो जाती हैं और आगे भी फेल होती जाएंगी।
आज हमारे देश की जनसंख्या विस्फोटक स्थिति में है। संसद में बड़ी गंभीर चर्चा हो रही है कि हम इसे कैसे रोकें? हम इसे रोक तो नहीं सकते हैं लेकिन इसे कम कैसे करें, इस पर चर्चा हो रही है। दूसरी तरफ इसी देश में प्रतिदिन हजारों लाखों की संख्या में बाहरी लोग, बांग्लादेशी आ रहे हैं और हम उन्हें रोकने के लिए गंभीर नहीं हैं। इसमें कहीं न कहीं राजनीति है। अपने देश की कीमत पर हम उन्हें संरक्षण दे रहे हैं, उन्हें संरक्षित कर रहे हैं। यहां लोगों के पास खाने के लिए नहीं है, रोजगार नहीं है, लोगों के पास काम नहीं है और दूसरे देशों से यहां लोग आ रहे हैं। अगर मैं चाहूं कि अपना राशन कार्ड बनवा लूं तो समय लगता है लेकिन बाहरी लोग हमसे पहले आइडेंटी प्रूफ बना लेते हैं, हर जगह ऐसा हो रहा है। झुग्गी झोंपड़ी की समस्या दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में है। यह समस्या बांग्लादेशियों के कारण है। इनके कारण कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ रही है। इस पर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए। आप सबसे पहले बांग्लादेश इन्फिलट्रेशन को रोकिए और कड़े कानून बनाइए।
सभापति महोदय : आपके लिए जितना टाइम अलाटिड था आपने उससे डबल ले लिया है। अभी 26 और स्पीकर हैं।
श्री सुशील कुमार सिंह : मैं अपनी पार्टी से अकेला मैम्बर हूं। माननीय मंत्री जी, आप अपना मन कड़ा कीजिए, इच्छा शक्ति को दृढ़ कीजिए और प्रतिबंध लगाने के लिए उपाय सोचिए। हम आपको सुझाव देंगे तब जाकर अगले 20-25 वााॉ में देश की जनसंख्या पर नियंत्रण हो पाएगा। आपने ठीक ही कहा कि आदमी को सांस लेने के लिए भी लाइन लगानी पड़ेगी। मुझे खुशी है कि संसद इस विाय पर गंभीर है और इस गंभीर विाय पर चर्चा हो रही है।
आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।
श्री शरद यादव : महोदय, यहां सबने बेटे और बेटियों की संख्या बताई है। पहले परंपरा थी कि एक घर में एक साधु बनता था। यहां महंत जी बैठे हैं, यह हमारे सामने उदाहरण हैं कि कैसे आबादी कम की जाए। इनके कोई बाल बच्चा नहीं है। अगर एक घर में एक साधु बन जाए तो आबादी कम हो जाए।
SHRI ABDUL RAHMAN (VELLORE): Thank you very much Mr. Chairman, Sir, for having given me an opportunity to participate in the discussion on stabilization of population. While the population growth worldwide is alarming, especially the growth rate and available development resources in Asian countries pose a tremendous problem primarily on the food and health fronts. Even though the economists are not accepting, the Malthusian theory of population is there. Some economists are accepting it is viable and it is to be corrected in the population growth in the world.
According to the Malthusian theory, the population grows at a geometrical progression whereas the available resources grow at arithmetical progression. Simply speaking, the growth rate of population does not match the foodgrain production to feed the exploding population which may result in confusion if steps are not taken to arrest the situation.
The World Conference on Population held at Cairo during the year 1994 explored the possibility of bringing down the population growth. Not only the population experts, but also the Governments are seriously thinking about population growth to be directly related to the development. According to the survey and the result released by the World Conference held at Cairo during 1994, if adequate measures are carefully carried out, the population growth can be very easily controlled.
Even though the rate of population growth depends on several factors, the main indicator is the birth rate and the death rate. While the death rate factor is beyond human approach of any country, India decided to launch the concept of family planning in 1952 to reduce the birth rate as the first country in the world. Unfortunately, the equilibrium between the death rate and the birth rate after 1952 did not match to achieve the desired results. The estimated population may touch around 1,263 million by the year 2016 from 971 million in 1998.
According to the survey done by the Technical Working Group on Population Projections of Planning Commission, on 11.5.2000, India was projected to have one billion people, which means 16 per cent of the world population in 2.4 per cent of the land area of the globe. If this current trend continues, India may overtake China in 2045 to become the most populous country in the world. While the global population has increased three-fold during the last century from two billion to six billion, the population of India has increased five times from 230 millions to one billion in the same period.
Mr. Chairman, Sir, presently, more than 50 per cent of the population in India is in the reproductive age, in-between 14 years and 49 years, which may impart a momentum to population growth. At this moment, according to the detailed report of the Indian Government, we are facing a challenge in respect of population in certain States, very particularly in the States of Bihar, Uttar Pradesh, Madhya Pradesh and Rajasthan. If you see the population of these few States, they are covering almost 50 per cent of the whole Indian population.
If one considers the factors behind this kind of population growth, it very clearly comes out that low literacy rates and higher levels of poverty are responsible for this. If you take certain States like Kerala, Tamil Nadu and other few States in India, where you see that the population growth has tremendously reduced, we can definitely see that the literacy rate is more. So, it means that the Government should take adequate steps to increase the literacy level in all the States wherever the rate of population growth is high.
Any legislation to implement the population stabilisation will result in anger and agony of the Indian population, irrespective of their caste, religion or creed. A positive and educational approach only shall have the desired results.
Indirectly speaking, higher literacy rate can bring the desired result in family planning and thereby pave way for population stabilisation.
At this moment, I would like to bring to your kind notice the ways in which we can bring down population and increase literacy rate. The Government should take adequate steps to conduct awareness programmes among the people by identifying certain States where illiteracy is too much. Even though, some States that are found to be more literate is appreciable like Kerala, Tamil Nadu and a few other States, yet in these States also, in certain parts, we find that the population growth is enormous. If you see in depth the reason behind this, then you will find that in those States also -- wherever we find that illiteracy is more -- those parts are having enormous population growth.
How will we find out that illiteracy is alarmingly increasing? Further, within the literate States also we find that in certain parts, the number of illiterates is increasing. Every year, the Government should take measures to find out in which area illiteracy is found, and ways to increase the literacy rate in those areas. For this purpose, death rate and birth rate have to be accounted for on an annual basis in each and every State; within the State in each and every district; within the district in each and every Taluk; and within the Taluk in each and every part of that geographical area. We do not have to wait for a decade to pass to get a census done to find out the literacy rate of each and every part of the country. The Government should have a proper count of birth rate and death rate by taking such measures at least once a year, and for this the death registration and birth registration should be made compulsory. Though, it is officially announced by the Government that this procedure should be followed, yet the process is not being followed stringently by the Government.
So, I would like to conclude by taking this opportunity to mention that population can be controlled only in two ways. One is by increasing the literacy rate, and the other is by decreasing or wiping out high levels of poverty.
Thank you very much for having given me the opportunity.
MR. CHAIRMAN: I have an announcement to make. I have a list of 25 Members to speak on this issue of Population Stabilization. Those who want to lay their written speeches, they can do so. It will be treated as part of the proceedings.
Now the hon. Member Dr. Anup Kumar Saha.
DR. ANUP KUMAR SAHA (BARDHMAN EAST): Thank you Chairman, Sir, for giving me a chance to speak on the important matter of Population Stabilization in India.
If we look into the world population trends, we can see that it requires all the human history up to 1800 AD for the world population to reach one billion. The second billion came in 130 years, around 1930, the third billion in 30 years in 1960, the fourth billion in 15 years in 1975, the fifth billion in 12 years in 1987 and the sixth billion in 12 years. The world population became six billions on 12th October, 1999. It is expected to reach eight billions by 2025.
17.09 hrs. (Dr. M. Thambidurai in the Chair) The problem we face in India in population is enormous. There is population explosion in India. At present, India is second most populous country in the world and it only after China; whereas land area of India is seventh in the world. With only 2.4 per cent of the world’s land area, India is supporting about 16.87 per cent of world’s population.
The United Nations has estimated that world’s population grow at the rate of 1.4 per cent whereas India’s population grow at 1.9 per cent at the present time and India will reach 1.61 billion by the year 2050, the present population is 1.18 billion in 2010.
India is a country of striking socio-economic and cultural diversity with great variation among States, districts and social groups. Population and development situation is a consequence of this diversity reflecting marked variation in demography as well as programme performance.
Population growth of India continues to be high on account of high fertility rate due to: (i) high level of poverty and literacy; (ii) large size of reproductive female population; (iii) high level of unmet need of contraception and family planning; (iv) high infant mortality rate leading to high fertility rates (this contributes to about 20 per cent increased birth rate as repeated childbirths are seen as an insurance against infant deaths): (v) high maternal mortality rate (this leads to multiple marriages and increase in the family size; and (vi) early age of marriage.
So to make the population size of India stable we need to take measures in every aspect that leads to population explosion. One of them is improvement in literacy and socio-economic status. We have seen that population growth is most in low literacy and socio-economic groups. Hence we must leave no stone unturned to improve the literacy and socio-economic status in our country. It may be said that the improvement of socio-economic status is the best contraceptive, and education is the best incentive.
The next aspect is the age of marriage. The age of marriage of a female has a great impact on her fertility. Those who are married before 18 years have a larger number of children. If the age of marriage can be raised to 20 years, the number of births would decrease by 20 per cent to 30 per cent. In India early marriage is a long established custom. Only law cannot stop it. We need a sustained and vigorous campaigning regarding awareness of evils of early marriages.
With regard to duration of married life, it has been seen that 10 per cent to 25 per cent of births occur in the period between one to five years of married life, 50 per cent to 55 per cent within 5 to 15 years. This suggests that family planning should be concentrated in early years of marriage.
Then comes spacing of children. Studies have shown that if births are postponed by one year in each age group, there is a definite decline in fertility rates. Also, there is variation in birth rate in different social groups. However it is due to varied socio-economic status of different groups. There is a relationship between nutritional status and fertility level. Poorly fed society has higher fertility. Hence we should try to improve nutritional status of our nation. We must improve our IMR and MMR to stabilize the population.
With regard to family planning, WHO defines family planning as “a way of thinking and living that is adopted voluntarily, upon the basis of knowledge, attitudes and responsible decisions by individuals and couples in order to promote the health and welfare of the family and group and thus contribute effectively to the social development of the country". Aims of family planning are: (a) To avoid unwanted birth; (b) to bring wanted birth; (c) to regulate the intervals between pregnancies; (d) to control the time at which birth occurs in relation to the ages of the parent; and (e) to determine the number of children in the family. Its scope also includes: (i) sex education and education on parenthood; (ii) screening of pathological condition directly related to reproduction, genetic counseling, and teaching home economics and nutrition.
Though family planning is one of the most important factors in fertility reduction, in India it is associated with numerous misconceptions. Lots of evils have been attributed to it. One of them is its strong association in the mind of people with sterilisation. Others equate it with birth control. The recognition of welfare concept came only after a decade and half of its inception. The family welfare programme aims at achieving a higher end, to improve the quality of life.
The obstacles to family planning could be overcome by improving health, education, nutrition, food security, employment and poverty alleviation. We have to stress on educating the people regarding the good effects of family planning. We have to make people aware that family planning not only improves the quality of life of a family but also improves the nation as a whole. Birth control and spacing of birth are much more effective than sterilization. Gender bias in sterilisation should also be avoided. Hence we can change our family planning policy accordingly.
With this I conclude. Thank you once again.
*श्री नारनभाई कछाड़िया (अमरेली): अपने देश में बढ़ती हुई जनसंख्या में बहुत अच्छा वक्तव्य रहा और मुझे उसमें मेरा सुझाव देना चाहता हूं अगर पॉप्यूलेशन को रोकना है देश में परिवार नियोजन के लिए कानून बनाना जरूरी है और उस पर अमल होना चाहिये। मेरा सुझाव जो है अगर देश की जनसंख्या पर रोक लगाना केन्द्र सरकार चाहता है तो देश में हर बच्ची को जो 12वीं तक पहुंचे चाहे वह पास हो या नापास सरकार की तरफ से उसे 25000 हजार लाभ दिया जायेगा। कंट्रोल हो जायेगा। जितना पैसा स्वास्थ्य के पीछे और अन्य खर्च करते हैं, वह भी कम हो जायेगा।
दूसरा सुझाव यह है कि अगर दो बच्चे से ज्यादा बच्चा जिसका भी होगा वह चुनाव लड़ नहीं पायेगा। उसी तरह सभी को, देश में रहने वाले हर जाति के लिए सरकारी फायदे का लाभ नहीं मिलना चाहिये। अगर कानून पर अमल करता है तो उसे प्रोत्साहित करना चाहिए, नौकरी नहीं मिलना चाहिये। अगर ज्यादा बच्चे हों तो उस व्यक्ति को नौकरी से निकाल देना चाहिये और जितना भी सरकारी लाभ उसे मिल रहा है, वह रूकवा देना चाहिये और दो बच्चे से ज्यादा होने पर बिजली, पानी और सभी सुविधाओं से वंचित कर देना चाहिये। सरकार को कड़े कानून बनाना पड़ेगा तभी हमारे देश का जनसंख्या में रोक लगा सकेंगे और पॉप्यूलेशन और पोलयूशन कम कर सकेंगे।
और जो सल्म ऐरिया है, गरीब बस्ती है, वहां उनके लिए मनोरंजन फ्री युक्त व्यवस्था होना चाहिये तभी हम देश की आने वाली पीढ़ियों को अच्छी तरह संभाल पायेंगे और कोई रास्ता नहीं है। धन्यवाद।
*SHRI S. SEMMALAI (SALEM):
For long, I had a doubt whether the country has forgotten the problems associated with population explosion. But today’s debate has convinced me that we are alive to the issue. Over 200 years ago, Thomas Malthur brought to light the adverse effect of population on development. India is one of the first few countries to formulate a national family planning policies in 1951. As we all know, the country has later expanded the policy to include Mother and Child health, family welfare and nutrition. We are a fast developing country. Philip Stephen, the American Economist once said “The nest phase of globalization will most likely to have an Asian face”. He meant that India and China would lead the World in the path of development. Such good news are pleasant music to our ears.
This is one side of India. There is another side of our country also. Nearly, 77 per cnet of Indian population are living below Rs. 20/- a day. Why, this contradictory picture of India, on one side growing as a wealth nation and on the other side, a nation with poor people. The main reason is unchecked growthof population. Our population grows at an undersirably high rate and the fruits of development could not be enjoyed by the growing population. India’s current population is 1.20 billion i.e. 120 crores it will increase by 371 million in 2020. Over taking China’s current population of 1.35 billion. If we grow at the present level, we will double our population in the next 50 years. The figures released by the Governemnt shows that while India’s population grow by 1.4 per cent annually over the last 5 years, China, our neighbour witnessed only 0.6 per cent population growth for the same period. India will overtake China to become world’s most populated nation within the next 25 years.
What is the solution? The answer lies in population stablization. It is not any easy taks. Population stablization is a challenging job. The Government has to intensify the d rive and provide dynamism in its strategies. At this juncture, I regret to say that the popular symbol of family planning ‘inverse triangle’ is now no more seen anywhere. We all know, our people mostly illiterate, identify an idea or concept more easily through a symbol. The Maharaja Symbol of Air India, SBI symbol are more popular. I do not know why family planning symobol is not exhibited fully now a days. I make fervent appeal to the Hon’ble Health Minister to rejuvenate and give rebirth to the family planning symbol. This will create grater awareness.
Secondly, education more particularly female education, will bring miraculous change in population front. There is a direct connection between female education and family planning devices. According to a Report only 48.3 per cent of married women are using family planning methods. That means 53 per cent of married women are not adopting any family planning methods. Worst still male sterilization is the lowest. Men do not undergo vasectomy operation. This has to change. The Government has to work out suitable strategy to attract more men to undergo family planning operation. I quote a research paper from Guttmacher Institute, USA “Every 1.4 dollar spent on family planning saves 1.4 dollar in medical costs.
At this juncture, let me request the Government to popularize slogans stressing the need for limiting the family size. I may say that Governemnt may employ slogan like “Children by choice and not by chance” to create awareness among the people. I appeal to theGovernemnt to consider the desirability of raising the marriageable age of girls from the present 18 years to 21 years. Another suggestion I would like to place before the August House, the Government has to persuade a plan for limiting the size of family to “One Baby per Couple”.
Finally, I may say that the Government may give some attractive incentives and concessions like tax concessions, employment opportunities, loan facilities etc to the couple, those who have limited the size of their family with one baby. It will give some fruitful result.
श्री वीरेन्द्र कुमार (टीकमगढ़): जनसंख्या स्थिरीकरण पर सदन के सभी दलों के सदस्य गंभीर हैं तथा सभी की एक ही राय है कि देश में बढ़ती हुई जनसंख्या को रोकना आवश्यक है। क्योंकि यह एक ओर जहां विकास में बाधक है, वहीं देश की अर्थव्यवस्था पर भी बोझ बढ़ाती है। गांवों में आठवीं कक्षा से आगे पढ़ाई करने छात्राओं को दूर जाना पड़ता है। जिससे माँ-बाप बच्चियों को नहीं पढ़ाना चाहते हैं। अतः छात्राओं के लिए नजदीक ही कन्या हाई स्कूल ज्यादा संख्या में खोला जाना चाहिए। एक बच्चे के बाद दूसरा बच्चा पैदा होने में 3-4 वर्ष का अंतर होना चाहिए तथा लड़की की शादी 18 वर्ष से कम उम्र में नहीं हो इसके लिए नियम तो बना है किंतु शहर एवं गांवों के जनप्रतिनिधियों को जागरूक रखकर कम उम्र की शादियों को रोकना चाहिए। क्योंकि कई बार शासकीय कर्मचारियो की लापरवाही के चलते सामूहिक विवाह सम्मेलनों में कुछ बच्चियों की कम उम्र में शादी हो जाती है।
धर्म गुरूओं को भी देश में बढ़ती हुई जनसंख्या को नियंत्रित करने का आह्वान अपने उपदेशों के माध्यम से बताना चाहिए क्योंकि सभी समाजों एवं धर्मों में अपने संत महात्मा, पादरी, मुनिजन एवं मौलवियों को बहुत अधिक सम्मान दिया जाता है। अतः दूरदर्शन के माध्यम से सभी धर्मगुरूओं से आह्वान कराना चाहिए।
स्कूलों एवं कॉलेजों में छात्र-छात्राओं को बढ़ती जनसंख्या के खतरे एवं दूसरे देश के विकास में बाधा तथा उपलब्ध संसाधनों जमीन, पानी, मकान, रोजगार आदि की समस्याओं के संबंध में चर्चा, वाद-विवाद, सेमिनार आका भी आयोजन शासकीय स्तर तथा शैक्षणिक, सामाजिक संस्थाओं का सहयोग लेकर करना चाहिए। बढ़ती जनसंख्या सम्पूर्ण देश के लिए गंभीर चुनौती है। अतः दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर इसे नियंत्रित करने के बारे में सदन में सिर्फ चर्चा ही नहीं बल्कि व्यवहारिक रूप में कार्यक्रम एवं योजनाएं बनेंगी तभी देश आगे बढ़ सकेगा।
(इति) SHRI B. MAHTAB (CUTTACK): Mr. Chairman, Sir, I stand here before this House today to deliberate on the discussion that we are having on an important subject relating to population stabilization. At present, India’s population stands at around 1,198 million to China’s 1,345.8 million. The Minister, in his opening remarks, had mentioned about alarming situation we are going to face in the near future. While average population growth in China was 0.6 per cent between 2005 and 2010, it was 1.4 per cent in India. Projections, therefore, are that by 2050 India will be home to 1,613.8 million people compared to China’s 1,417 million. In that respect, we will be overcoming China by 2050.
Here, I am reminded of former Prime Minister, Narasimha Rao’s statement, while on his visit to the United Nations, he had mentioned in his interaction with his counterpart of China. How much competition we may have at different levels, but we intend to never compete or over-cross you in the matter of population. But the figure which the Minister has said, which many demographers have been stating is that by 2050, India’s population will be much much higher than that of China.
While some States like Kerala, Himachal Pradesh, West Bengal, Maharashtra, Karnataka, Andhra Pradesh and Delhi have already achieved replacement level fertility, other States will take many more years like Uttar Pradesh would be achieving at 2027, Madhya Pradesh at 2025, Chhattisgarh at 2022; Bihar at 2012, Assam 2019, and Rajasthan 2021. this is relating to the fertility rate. Population stablisation is very vital for India’s future as the country has 17 per cent of the world’s population with only 2.5 per cent of global land. Small families are, therefore, important. Strict implementation of late marriage as has been suggested by the Minister, law about age of marriages, and delayed first child with proper spacing will help in dealing with population problem. These are the three suggestions which I have come across. I will be dealing with that towards completion of my speech.
But let us understand as to what is the present position of our country. Keeping the last decade in between 1998 and 2008 – when both NDA was in power and UPA was also in power and administering the country. Silently and without much Sarkarifanfare, dramatic changes are taking place. It is not that we are not achieving something. We have achieved many things.
The issue is not only confined to the South but also North because North has totally neglected the issue. I will quote some figures. Changes are taking place in the population indicators of some States that you will not see or reflected in the country level data.
Crude birth rate, that is the number of live births per 1000 population dipped from 26.4 to 22.8 for the whole country between 1998 and 2008, and that is, 14 per cent decline. But in eight major States, the decline was much more. In Punjab, the birth rate fell by 23 per cent, followed by Kerala and Maharashtra, both 20 per cent and West Bengal, 18 per cent. Country-wide, the crude death rate or the number of deaths per 1000 population in child birth came down by 18 per cent in a decade. There are surprises in the toppers’ list. Both Madhya Pradesh and Rajasthan, about which the Minister said and also, many hon. Members mentioned, saw a 23 per cent dip in death rates, closely followed by Bihar with 22 per cent and UP with 20 per cent. How was this achieved?
During this decade, a specific programme was initiated by the Health Ministry, that all pregnant women will be brought to the health institutes, whatever it may be, it may be primary health centre or dispensary, but they will be provided with a certain amount of funds – for their ambulance charge and also to have a regular birth in the institution. That created a dramatic change to bring down the child mortality rate, and that should be encouraged, because that is a support; you hardly give Rs. 500 or Rs.800; a number of States also have chipped in to support that programme. That was one of the revolutionary programmes which actually brought it down and it had made the change.
Subtracting death from birth rate, it gives the national growth rate of the population. For India, this key indicator declined by 11 per cent, but in Kerala and Punjab, the two States which stand out from other States, the rate of population growth by as much as 32 per cent; in Maharashtra, it was down by 23 per cent; in Andhra, Tamil Nadu and West Bengal by 18 per cent. All this has happened between 1998 and 2008.
There has been significant decline in infant mortality rate in India from 72 per 1000 in 1998 to 53 in 2008. Yet, I would say the figure is still shocking, but there has been decline of 23 per cent over the past decade; many States are way ahead in their fight to bring down the baby-deaths. Tamil Nadu has slashed infant mortality by an incredible 42 per cent; West Bengal by 34 per cent, Maharashtra by 33 per cent and Orissa by 30 per cent. A few smaller States – this is the alarming part – actually have shown an increase in infant mortality rates; and you will be surprised to know that one of those smaller States is Delhi. The Health Minister should find out why this has happened and why this infant mortality has taken place, and at which level. There are States like Jammu & Kashmir and Meghalaya also which added to that group. India today is passing through a demographic transition, to a society where population will grow slowly and people will live longer, hopefully leading a healthier life.
I am reminded here of the First Five Year Plan’s declaration, titled ‘Family Planning’.
This is given in the Chapter ‘Health’ in a sub-section called ‘Family Planning’ and I would quote:
“The recent increase in the population of India and the pressure exercised in the limited resources of the country have brought to the forefront the urgency of the problem of family planning and population control. The main appeal for family planning is based on considerations of the health and welfare of the family. Family limitation or spacing of the children is necessary and desirable in order to secure better health for the mother and better care and upbringing of children. Measures directed to this end should, therefore, form part of the public health programme.” And, what we hear today from the Health Minister! This was in the First Plan outlay. One can say since 1951 India was the first country in the world to talk about family planning. Everything that the Health Minister wants now is late marriage, delayed first children and proper spacing. This was in the agenda in 1951 also. The Health Minister says that this should the agenda even now. So, what should we construe? Has this not worked? Why it has not worked? These are the two basic questions which we should address ourselves. The question that was posed in the First Plan and the question that we are deliberating today which the Health Minister is putting before the country is the same. Has it not worked and why it has not worked? Are we deliberating today on these two aspects?
We have heard it a number of times since 1974 when I think Dr. Karan Singh was the Health Minister. He went to attend the Bucharest Meeting. Shrimati Indira Gandhi was then the Prime Minister. I do not know who coined that word. It is said development is the best contraceptive. Even today we are hearing the same line. Why should we say population is a liability rather than an asset? Nobody anticipated India’s Green Revolution in 1951. I agree that there is a second Green Revolution, every Prime Minister and every Government since 1991 have talked about it. There is a quote ascribed to Mao Zedong “With every mouth there are two hands”.
Since 1976 Chinese have adopted a policy of “Later, longer, fewer” which eventually became the coercive one child policy. Surely, we do not want to follow China in becoming a country that becomes grey before we become wealthy with all its adverse consequence which China is facing today. But India’s demographic dividend will whittle away by 2040. One wants later, longer, fewer but that should be the outcome of natural and voluntary choice. Health Ministry should show the outcomes instead of giving more stress on outlays and here I would come to the specifics.
I heard once the present Health Minister saying that he would prefer ‘family planning’ instead of ‘family welfare’.
I am not into that debate. It can be family welfare and planning or family planning and welfare or whatever it may be. Let us remove that baggage which we have been carrying for the last 35 years. But the question here is that the growth rate is coming down since 1980-85. A woman will be bearing two children that consciousness will come as it is being anticipated by 2025-26. The size will be going up but it will stabilize or in a way will come down by 2060-65 which means another five decades. But here for the last 60 years, why all our family welfare programmes and family planning programmes have been vertical? We have to spread. It has to be horizontal. Unless that is done, you can have very little impact.
I heard the Minister saying let us have more maternity huts erected in every village. That is a very good idea. He also said that contraceptives to be made available abundantly both in rural and urban areas. That is also a good thing. And you have battalion of personnel – 25,000 Primary Health Centres and 1,45,000 Sub-Centres, seven lakh ASHA Karmis in the country. But here I am reminded instead of comparing ourselves with other developed countries, let us see what Bangladesh has done relating to infant mortality rate. I think Bangladesh will be better understood by Bihar, Uttar Pradesh, Orissa, Assam and West Bengal also. How an Islamic country could stabilize? That is a challenge which they had taken up. Why can we not do that?
Here I have certain suggestions. The Chief Minister of Orissa has taken a lead in this. The best thing which I would say, the respective State Governments can consider – the Minister also can consider is that instead of observing one day in a year, the Orissa Government has announced every Monday as Parivar Kalyan Diwas that means you are observing 52 Mondays in a year as Parivar Kalyan Diwas. The supply chain management of family planning products and contraceptives, that is also being taken care of. Further proposal I would say, the district specific family planning plan is being worked out. Even today, we are State specific. I would suggest let us be district specific because the other day when we were having discussion in the Forum on Population and Public Health, this thing came up. Though in South, even in Tamil Nadu, population stabilisation has taken up at a greater length, yet there are districts where population explosion is taking place. Let us concentrate on districts. Let us find out which are those districts where population explosion is picking up and where we have to concentrate more. Of course, the State Government is the mechanism through which this has to be delivered and monitored.
Before ending my speech, I am reminded of a small story which was narrated to me by a farmer of my village which is around 150 kilometres from the State Capital of Orissa. That area is represented by my leader, Mr. Sethi. That farmer is not a literate person. He told me that, Sir, I have learnt about planning my family by planting a brinjal in my courtyard. The more I pluck brinjal from the tree, the tree will give me more brinjals.
The day I leave one brinjal for the seeds for the next season, the plant will die leaving the seed. This is the knowledge that the plant gives us. We are human beings. If we are sure about the seed, about our off-springs, about our progenies, then we do not have to have more children. It is quite explicit in the Mahabharata. King Dhritarashtra was not sure about his children and therefore he had 100 children. But Pandu did not have so many. It is a question of mindset.
Sir, I think, with these words, let us create awareness amongst us; let us create awareness in our constituencies and districts and in our country. Through awareness we can stabilise population in our country and make the demographic dividend favourable for the country’s progress and prosperity.
*श्री सी.आर.पाटिल (नवसारी): हमारे देश की बढ़ती जनसंख्या का परिणाम है कि असुविधाएं हो रही हैं। कई गांव में स्कूल तो हैं, बच्चे स्कूल भी जाते हैं लेकिन वह टीचर के नाम से केवल एक टीचर ही आते हैं और बच्चे पढ़ रहे हैं या नहीं पढ़ रहे हैं इससे कोई लेना-देना नहीं है। कई जगह तो स्कूल तक नहीं हैं। इसलिए हमें इस विषय की गंभीरता को देखते हुए कारगर कदम अभी नहीं उठाये गये तो आगे जाकर इसका बहुत भयंकर परिणाम होगा।
इसलिए मैं माननीय मंत्री जी से आग्रह करना चाहता हूं कि क्या सरकार इसमें ऐसा कोई कानून लाने वाली जिससे जो लोग इस कानून का उल्लंघन करते हैं। उनको कई तरह के पाबंदी लगाये जैसे की उन्हें कहीं सरकारी नौकरी नहीं दी जाएगी और स्कॉलरशिप नहीं दी जाएगी और राशन कार्ड नहीं दिया जाएगा। ऐसे कड़ाई से अगर सरकार कोई उपाय करती है तो हमें लगता है कि इस पर थोड़ी तो कामयाबी मिल सकती है। हमारे देश ने तरक्की तो करी है लेकिन गरीबी में भी बहुत तरक्की कर रही है। जैसे कि कमर तोड़ महंगाई का विषय जिस पर आज माननीय वित्त मंत्री जी ने उत्तर दिया लेकिन हमें इस विषय पर केवल सोचना नहीं है कुछ कर दिखाना पड़ेगा। जनसंख्या बढ़ने से हमारे संसाधनों पर भार बढ़ रहा है। बढ़ती जनसंख्या के लिए आवश्यक खाद्यान्न सुरक्षा हमारे लिए चेतावनी है। आज बढ़ती जनसंख्या और बेरोजगारी के कारण शहरों पर भी बोझ बढ़ रहा है।
गांवों से जनसंख्या का पलायन यह इसी की एक कड़ी है। हमें बढ़ती संख्या के लिए बुनियादी सुविधा और अवसंरचनात्मक ढांचा खड़ा करने में काफी मशक्कत का सामना करना पड़ सकता है इसलिए इस मामले में राजनैतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन कर देश में 2000 में लागू की राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का सफल क्रियान्वयन कराने के लिए एक राष्ट्रीय अभियान चलाये। इसके लिए देश में सभी राज्यों को साथ लेना होगा और एक ओर राजनीतिक इच्छाशक्ति और दूसरी ओर जन-जागरण कराकर हमें देश की जनसंख्या को सीमित करना होगा।
मैं सरकार से आग्रह करता हूं कि सरकार इस मामले में चिंता जाहिर करने के बजाय उपचारात्मक प्रयास करने के लिए ध्यान केन्द्रित करे।
*श्री ए.टी. नाना पाटील (जलगांव): आज सदन में जनसंख्या स्थिरीकरण के अतिमहत्वपूर्ण विषय पर चर्चा कर रहे हैं। कई वक्ताओं ने इस विषय पर काफी प्रकाश डाला है। उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए मैं अपनी बात सदन के सामने रखना चाहता हूं। भारत वर्तमान में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। जनसंख्या में अगर ऐसा ही चलता रहा तो देश किसी चीज में आगे बढ़े या न बढ़े लेकिन जनसंख्या में तो दुनिया का सबसे बड़ा देश बन जायेगा। हमें इस विषय में कई ठोस कदम उठाने की जरूरत है। अगर हम ऐसे केवल चर्चा करते रहे तो सभी विषयों की तरह ही यह भी एक चर्चा ही रह जाएगा। इसलिए हमें कुछ ठोस कदम उठाने पड़ेंगे जैसे कि हमारे देश में लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या कितनी कम हो गई है। ऐसा क्यों हो रहा है। हमारे देश में कानून तो बनते रहते हैं लेकिन उन पर अमल करने में या अमल कराने में कई दृष्टि से हम लोग ही दोषी हैं। जैसे मैंने भ्रूण हत्या का विषय सदन में उठाया था। सबसे ज्यादा भ्रूण हत्या हमारे देश में हो रही है। अगर लड़कियों की संख्या इसी तरह कम होती रही तो क्या होगा। यह हमारा देश है इसलिए हमें इस विषय पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। भ्रूण हत्या रोकने का कानून (पी.एन.डी. एक्ट) तो बना है और इसमें कुछ दोषियों को सजा भी दी गयी है। लेकिन हमें इसे कड़ाई से लागू करना पड़ेगा। कन्या भ्रूण हत्या के कारण हमारे सामाजिक समीकरण को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए।
हमारे देश की बढ़ती जनसंख्या का परिणाम है कि असुविधाएं हो रही हैं। कई गांव में स्कूल तो हैं, बच्चे स्कूल भी जाते हैं लेकिन वहां टीचर के नाम से केवल एक टीचर ही आते हैं और बच्चे पढ़ रहे हैं या नहीं पढ़ रहे हैं इसका कोई लेना-देना नहीं है। कई जगह तो स्कूल तक नहीं हैं। इसलिए, इस विषय की गंभीरता को देखते हुए कारगर कदम अभी नहीं उठाये गये तो आगे जाकर इसका बहुत भयंकर परिणाम होगा। इसलिए मैं माननीय मंत्री जी से आग्रह करना चाहता हूं कि क्या सरकार इसमें ऐसा कोई कानून लाने वाली जिससे जो लोग इस कानून का उल्लंघन करते हैं। उन पर कई तरह की पाबंदी लगाये जैसे कि उन्हें कहीं सरकारी नौकरी नहीं दी जाए और स्कॉलरशिप नहीं दी जाये और राशन कार्ड नहीं बनाया जाए। ऐसे कड़ाई से अगर सरकार कोई उपाय करती है तो हमें लगता है कि इस पर थोड़ी तो कामयाबी मिल सकती है। हमारे देश ने तरक्की तो करी है लेकिन गरीबी बहुत तरक्की कर रही है। जैसे कि कमर तोड़ महंगाई का विषय जिस पर आज माननीय वित्त मंत्री जी ने उत्तर दिया लेकिन हमें इस विषय पर केवल सोचना नहीं है कुछ कर दिखाना पड़ेगा। जनसंख्या बढ़ने से हमारे संसाधनों पर भार बढ़ रहा है। बढ़ती जनसंख्या के लिए आवश्यक खाद्यान्न सुरक्षा हमारे लिए चेतावनी है। आज बढ़ती जनसंख्या और बेरोजगारी के कारण शहरों पर भी बोझ बढ़ रहा है। गांवों से जनसंख्या का पलायन इसी की एक कड़ी है। हमें बढ़ती संख्या के लिए बुनियादी सुविधा और अवसंरचनात्मक ढांचा खड़ा करने में काफी मशक्कत का सामना करना पड़ सकता है इसलिए इस मामले में राजनैतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन कर देश में 2000 में लागू की राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का सफल क्रियान्वयन कराने के लिए एक राष्ट्रीय अभियान चलाये। इसके लिए देश में सभी राज्यों को साथ लेना होगा और एक ओर राजनीतिक इच्छाशक्ति और दूसरी ओर जन-जागरण कराकर हमें देश की जनसंख्या को सीमित करना होगा।
मैं सरकार से आग्रह करता हूं कि सरकार इस मामले में चिंता जाहिर करने के बजाय उपचारात्मक प्रयास करने के लिए ध्यान केन्द्रित करे।
श्री प्रतापराव गणपतराव जाधव (बुलढाणा):सभापति महोदय, आपने इस महत्वपूर्ण विषय पर मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।
माननीय स्वास्थ्यमंत्री जी ने बढ़ती हुई आबादी के बारे में जो चिंताएं यहां व्यक्त की हैं और इस सदन के सभी पक्ष के सदस्यों से यह अपेक्षा की है कि बढ़ती हुई आबादी को रोकने के लिए हम लोगों को भी कुछ प्रयास करने चाहिए, हम लोगों को जनता को यह बताना चाहिए कि कम उम्र में शादी न करें, जल्दी बच्चे पैदा न करें और बढ़ती हुई आबादी को थोड़ा रोकें। मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि बढ़ती हुई आबादी रोकने के लिए यहां पर जो कदम उठा रहे हैं, उनसे मुझे शंका होती है। यहां पर सभी मंत्रीगण एवं एमपीज बैठे हुए हैं, हमें लगता है कि आबादी कम होनी चाहिए, लेकिन शायद हम सोचते हैं कि लोगों के घर में आबादी कम होनी चाहिए, हमारे घर में आबादी कम नहीं होनी चाहिए क्योंकि हमने यह कानून बनाया है कि अगर किसी व्यक्ति के दो से ज्यादा बच्चे हैं तो वह नगरपालिका में, जिला परिषद पंचायत समिति में चुनाव नहीं लड़ सकता है। लेकिन यही कायदा विधानसभा और लोक सभा के चुनावों पर लागू नहीं किया गया है। अगर हमारी नीयत अच्छी है, हमें अपनी जनसंख्या को बढ़ने से रोकना है, तो हमें अपने से ही शुरूआत करनी चाहिए।
सभापति महोदय, अभी मंत्री महोदय ने बताया है कि हमें प्यार से लोकसंख्या घटानी है, हमें कोई सख्ती करनी नहीं है, न हमें किसी के ऊपर सख्ती करनी है कि आबादी कम करो। लेकिन प्यार से आबादी कम नहीं होगी, प्यार करने से तो आबादी बढ़ेगी। इसलिए सख्त कानून होना चाहिए। जिस तरह से हमारे यहां कानून है कि 18 साल से कम उम्र की लड़कियों की शादी नहीं होनी चाहिए। कुछ राज्यों में इसे सख्ती से लागू किया जाता है, लेकिन बहुत से राज्यों में 15 या 16 साल की उम्र में लड़कियों की शादी होती है। ये शादियां क्यों होती हैं? ग्रामीण इलाकों में सातवीं तक के स्कूल हैं, वहां की लड़कियां जब सातवीं कक्षा पास होती हैं, आगे पढ़ने के लिए वे शहर नहीं जा सकती हैं। वहां उनके रहने के लिए ठिकाना नहीं होता है, अगर वहां हॉस्टल में रहने के लिए भेजते हैं, तो उनकी सुरक्षा निश्चित नहीं होती है और उनके मां-बाप के अनपढ़ होने से उनके मन में यह बात रहती है कि 17-18 साल की बच्ची अगर बच्चों में जाकर पढ़ने लगेगी, तो वह ठीक नहीं होगा। इसलिए वे लोग उनको उच्च शिक्षा के लिए नहीं भेजते हैं।
इसीलिए मैं मंत्री महोदय से कहूंगा कि यदि आप लड़कियों की शिक्षा पर ध्यान देना चाहते हैं तो उसके लिए ग्रामीण इलाकों में महिला कालेज खोले जाने चाहिए। गांव के लोग, खासकर गरीब लोग और खेती करने वाले लोग अपनी लड़कियों को 18 वर्ष के बाद उच्च शिक्षा के लिए दूर भेजना पसंद नहीं करते। यही कारण है कि ग्रामीण इलाकों में अधिकांश लड़कियां 12वीं तक पढ़ाई करके ही रह जाती हैं।
लोक संख्या कम करने के लिए आपको कुछ न कुछ सख्त कानून बनाना जरूरी है। यहां पर कई सदस्यों ने कहा कि स्लम एरियाज में ज्यादा आबादी बढ़ती है या जहां पर गरीब रहते हैं वहां पर भी आबादी काफी बढ़ती है। उसका मुख्य कारण शिक्षा की व्यवस्था वहां न होना है। इसलिए मैं विनती करूंगा कि जो सहूलियतें सरकार की तरफ से दी जाती हैं, वे एक परिवार में दो से ज्यादा बच्चे होने पर न दी जाएं। उन्हें कहा जाए कि अब इनकी परवरिश आप करो, सरकार मदद नहीं देगी। लेकिन आजकल ऐसा होता है कि सरकार सबको सहूलियतें देती हैं और नतीजा यह होता है कि लोग सोचते हैं कि कितने ही बच्चे पैदा करो, जिम्मेदारी तो सरकार उठाएगी।
सभापति महोदय, आबादी बढ़ना भी महंगाई बढ़ने का एक कारण है। अगर देश की आबादी बढ़ेगी तो अन्न की खपत भी ज्यादा होगी, जबकि हमारे यहां अन्न का उत्पादन आबादी के हिसाब से नहीं बढ़ रहा है। मंत्री जी ने खुद कहा है कि जमीन कम होती जा रही है। अधिक मकान बन रहे हैं, डैम आदि बन रहे हैं इसलिए जमीन की कमी हो रही है। इसलिए आबादी को बढ़ने से रोकने के लिए हमें सख्त कानून बनाने की आवश्यकता है। जैसे इमर्जेंसी के समय संजय गांधी जी ने कदम उठाया था, मैं वैसा तो करने के लिए नहीं कहूंगा, लेकिन इतना जरूर कहना चाहूंगा कि कुछ न कुछ सख्त कदम आपको भी उठाने चाहिए।
जो पढ़ा-लिखा वर्ग है, उसमें फैमिली प्लानिंग की समझ आ चुकी है। मैंने महाराष्ट्र के अखबार में एक खबर पढ़ी कि वहां 1000 लड़कों के पीछे 869 लड़कियां हैं। जब ये लड़के जवान होंगे, शादी के लायक होंगे तो कैसे इनकी शादी होगी, क्योंकि लड़कों और लड़कियों के रेशो में 131 का फर्क है। यदि इसी तरह लड़कों की संख्या देश में बढ़ती रहेगी, तो देश की क्या हालत होगी, इस पर भी गम्भीरता से विचार करना चाहिए।
लोक संख्या पर कंट्रोल काफी हद तक शिक्षित वर्ग में तो हो गया है, लेकिन अशिक्षित वर्ग में नहीं हो पाया है। इसके लिए सख्त कानून बनाने की जरूरत है। आज आप देखें कि गरीब परिवारों में या स्लम एरियाज में आबादी बढ़ने से कई नुकसान भी होते हैं। अगर गरीब परिवार में बच्चे ज्यादा होंगे तो उनमें से कई क्राइम की तरफ रुख कर लेते हैं। इसीलिए स्लम एरियाज में क्राइम ज्यादा होते हैं। वहां पर कई बच्चे बड़ें होकर आतंकवादी, चोर-डाकू या लुटेरे बन जाते हैं, क्योंकि उनके पास पेट भरने के लिए दूसरा कोई साधन नहीं होता इसलिए मजबूरी में अपराध की दुनिया की तरफ रुख कर लेते हैं।
मीडिया को भी इस तरफ संज्ञान लेना चाहिए। इस बात को मंत्री जी ने भी कहा है और उससे अपील भी की है। आज आप देखें की टीवी पर कई सीरियल जैसे ‘न आना इस देश में लाडो’ और ‘बालिका वधू’ में क्या दिखाया जा रहा है। एक सीरियल में कन्या भ्रूण हत्या बताई गई है और दूसरे में छोटी बच्ची की शादी होते दिखाई गई है। इस पर भी सरकार को ध्यान देना चाहिए।
अगर आप आबादी को रोकने के लिए सख्त कानून नहीं बनाएंगे तो हमारा जो उद्देश्य है और जो टाइम लिमिट हमने तय की है जनसंख्या कम करने की, वह हम नहीं कर पाएंगे। आज लोक संख्या बढ़ने से काफी दिक्कतें भी आ रही हैं। जो योजनाएं बनती हैं, उनमें से कई बढ़ती आबादी के कारण पूरी नहीं हो पातीं या उनमें कमी रह जाती है। गरीबी और अशिक्षा जनसंख्या बढ़ने का मुख्य कारण है। इसके अलावा और भी कारण हैं। कुछ लोग धर्म का हवाला देते हैं या कुछ लोग अपनी परम्पराओं का भी हवाला देते हैं और इनका फायदा उठाकर जनसंख्या बढ़ाने का काम कर रहे हैं। हम सबको समझना चाहिए कि यह देश का विषय है और देश की चिंता है। इसलिए धर्म से आगे जाकर देश हित को ध्यान में रखकर जनसंख्या रोकने के लिए सख्त कदम उठाने चाहिए।
जो लोग एक बच्चा या दो बच्चे पैदा करें, उन्हें ज्यादा सहूलियतें दी जाएं। आज लोक संख्या देश के सामने एक चिंता का विषय है। लोक संख्या रोकने के लिए हम सब लोगों को प्रयास करना चाहिए और सब दलों को प्रयास करना चाहिए।
सभापति महोदय, कुछ लोग जनसंख्या के बढ़ने पर भी राजनीति कर रहे हैं। सभी जानते हैं कि पिछड़ी जातियों में लोकसंख्या ज्यादा तेजी से बढ़ रही है और कुछ लोग यह सोचते हैं कि इनकी बढ़ती हुई संख्या हमारी वोटों की संख्या को बढ़ाएगी और ऐसे लोग आबादी को बढ़ाना चाहते हैं। वे सोचते हैं कि आबादी बढ़ेगी तो उनके वोटर तैयार हो जाएंगे और उनके बल पर हम अपनी सरकार बनाएंगे। इस तरह की सोच से आबादी कंट्रोल में नहीं आयेगी, यही मेरा कहना है।
SHRIMATI SUPRIYA SULE (BARAMATI): Thank you, Mr. Chairman, for giving me this opportunity to speak here this afternoon. I would like to first congratulate the Ministry of Health and Family Welfare for bringing up this issue which is the most critical challenge in front of our nation right now. It is actually a shame that it has taken us 33 years to bring this topic to debate. But, I think, it is better late than never.
The hon. Minister in his extensive speech right at the beginning has covered most pieces of the entire puzzle. I really take this opportunity to only talk about incentives because most of my colleagues have covered most of the critical points in the debate. In Satara district, which is a part of Maharashtra State, in the zilla parishad, we have started a programme. As per that programme, if a couple gets married, they are paid Rs. 5,000 if the first child is born after two years. It is within the budget of the zilla parishad; after that if the gap between the two children is over three years, then they are given another Rs. 2,500. After that for sterilization, they are paid Rs. 7,500 as an incentive for family planning. The entire cost is covered by the Health Ministry of the Maharashtra State as well as the zilla parishad. So, a lot of incentives are given in our State.
Take, for example, Pune. We have a sterilization programme where a car is sent from the Pune Corporation to a woman or a man, whoever calls, to bring them, the entire procedure is done and is dropped back home. We are monitoring this entire programme especially in the slums. It is because the elite, the top pyramid, is definitely doing the family planning. Most people are choosing not to have children or at the most only one child. But at the bottom of the pyramid, that is not the case and we are concerned about it today. It is definitely a challenge and it is painful that a lot of States, particularly the BIMARU States, like Madhya Pradesh and Bihar, have not done well in this regard. I will urge my colleagues from these States to take the initiative. I have asked the hon. Minister to highlight it in the NDC. Unless it is competitive amongst our States, when will other States catch up with us?
The other big challenge, which I would like to highlight is that, we see it more among the migrant workers. Most workers who come for construction work in various States, come as young couple. By the time the building is ready, they have probably two or three children within a short span of time. That is the biggest challenge. They are probably not counted in the census because they are the moving population. I do not even know whether they are ever counted. The only way it is going to happen is through the democratic means and awareness programmes, which we have to take to the panchayat level. The discussions and debates here will make some difference.
I am sure what the hon. Minister has said is absolutely true that air-condition room discussions will not make a difference and we have to take it to the people. I urge the hon. Minister to use our SHGs as a major tool to strengthen this. We have seen in Bangladesh that these SHGs made a huge difference financially and are helping women to make a choice. The States like Tamil Nadu, Andhra Pradesh, Kerala and Maharashtra have done exceptionally well. The population is actually declining more than stabilising in these States. So, the SHG is a big way forward. When women have the right and when they have a choice to say no to second or third child, it makes a huge difference.
Along with this what we really need to do is to save the girl child. My colleague from Maharashtra mentioned earlier about the girl child. I am a proud example of that. My parents had only one child and stopped with one child. But have we been able to take this forward? There is a Bill regarding two children norm, which is lying, for which I have also put in, has not come even for a discussion. My colleague earlier said that it is applicable to zilla parishads and panchayat samitis. Why are we forcing all our changes on the people at the bottom of the pyramid? Why can the MLAs and MPs not take this forward? I think the buck stops at us. Let us make a difference. The difference will come only when we practise what we preach. As a group, let us give a deadline. Children who are already born need not necessarily suffer. But at least in the future we have to give us a benchmark, either one child or two children. We have to practise what we preach.
I urge the hon. Minister to take this programme. I promise on behalf of all my colleagues present here today that whatever supports he needs in whichever State or in whichever district, we are all with him. I think this is the first experience for me being here in four years that the entire House has the same feeling towards it. I think it is for a good cause. We are setting a good example even to the nation that when it comes to serious issues like us, we are together and we want to make a difference in the progress of this country.
*SHRI HASSAN KHAN (LADAKH): The State of Jammu and Kashmir consists of three regions - Kashmir, Jammu and Ladakh. Ladakh Region is the largest region in the State from area point of view. Ladakh is bigger than Jammu and Kashmir together in size but the population in this area is low, as low as the density is only 7 to 8 persons per km, which is lowest in the country. Increase in population is also not very fast but the concentration or movement of population from far off places to the two towns, Leh and Kargil is very fast because of non-availability of social and other facilities in the remote areas. This concentration of population to the main towns is creating lot of problem on every front of economic dispersal of resources. Towns are becoming over populated and rural areas empty in ladakh. Along with check on population or stabilizing the growth, the government needs to have plans for containing the rural population at their original places than to make the towns over populated against the available resources. MNREGA and other schemes formulated for rural population are not proving effective in ladakh on this direction. Over population in regions like ladakh is no problem at the moment provided the government is able to contain the rural population by shifting from remote areas to main towns. Population stabilization programmes can be more effective if we can keep people at their original places than making the towns slum and harder as the BPL population is less interested in adopting population stabilization schemes than the above poverty line people. Today, Ladakh in Jammu Kashmir State is heading towards this kind of economic and social problems and at the long run it would not be able to contain or follow the population policies of the country.
*SHRI C. SIVASAMI (TIRUPPUR): Mr. Chairman, Sir, I thank you for giving me an opportunity to speak on this Motion on Population Stabilization that is being discussed in this august House.
119.8 crore is the population of India today. Our country’s population is about 17 per cent of the global population. This is not an encouraging fact. The land mass of India is just 2 per cent of the world’s land mass. A country that occupies just 2 per cent of the world’s land surface accommodates 17 per cent of world’s population and this is a matter to ponder over.
When we are to compare ourselves with China, the most populous country which is in our neighbourhood, that has got a population of 134 crores, the population growth rate of that country is now at a slower pace and it will reach only 141 crore in 2050 whereas our country is expected to touch upon the figure of 161 crore from about 119 crore. All these are causing great concern.
Cultivable lands are being converted to residential areas. At this juncture, the alarming increase in our population give us an apprehension that we may be forced into great scarcity for food as we exploit the natural resources in a big way with a big population. We have just now concluded a discussion in this august House on price rise which is a reflection on the demand and supply that involves food production too. It is appropriate to hold a discussion on population growth and to evolve ways to contain the same.
In India, we find in the Southern States, which are considered to be developed ones, population growth rate coming down. We have succeeded there in bringing down the population increase. But in certain Northern States we are quite unable to control population explosion and we are really struggling hard. This has resulted in a situation where the Northern States get more funds according to their population and the so-called developed States in the South are getting reduced funds from the Centre. I urge upon the Union Government to evolve a method to provide incentives to the Southern States which have succeeded in effectively controlling the population growth, but to the contrary they are being deprived of their share.
Normally families resort to family planning method only after getting a male child. They avoid adopting family planning methods till they get a male child. When they get girl child, with a hope to get a male child subsequently, they continue to increase their progeny without resorting to family planning measures.
It is an urgent need to create an awareness in the minds of all our people that no girl is inferior to a boy and they are equal. We must gain confidence that women can succeed in all fields and they are in no way lagging behind. The Presiding Officer of this august House is a lady, the Leader of the Opposition is also a lady Member, our Leader Dr. Puratchi Thalaivi, General Secretary of our Party is also a lady and they have all significantly contributed to the society in their public life. They are vastly popular and famous in their fields. So, we must make people realize that men and women are equal and they are in no way inferior to one another. Women are more capable of leading and managing a house. I would like to emphasize this point. If the man of the family dies, the lady, the mother of the children in the family, takes over courageously and bring up the children overcoming all hardships. But when a wife dies, the husband most often goes for remarriage ignoring, in the process, the tender care and protection needed by the children born to him through his previous wife. This normal happening establishes the fact that women are more capable than men in leading and managing family life.
That is why, when our Leader Dr. Puratchi Thalaivi was the Chief Minister of Tamil Nadu extended a special scheme for the welfare of the families that had resorted to family planning method after stopping with two girl children. During her tenure, our General Secretary, when she was the Chief Minister of Tamil Nadu, accorded equal status to mothers along with the fathers. She announced that children can have their mother’s name also as initials of their names. In order to instill courage and confidence in the minds of our women folk we must ensure that all our girl children get education which has been made compulsory and available as a right.
Right from the days of golden rule of our founder leader Dr. Puratchi Thalaivar and the measures that continued during the reign of our General Secretary Dr. Puratchi Thalaivi Amma, we have been ensuring in Tamil Nadu that the drop-out rates in schools are contained by way of successfully implementing the Nutritious Noon Day Meal Scheme, free distribution of textbooks and distribution cycles free of cost to the gill children to begin with especially in rural areas.
Women getting education will directly benefit the society and that will also help us to bring down the growth rate of population. Hence, I urge upon the Union Health Minister to consider introducing a scheme to give incentive to girls getting education throughout the country. Assuming that they attend school for 240 days in a year, extending a sum of 5 rupees per day to every girl child and working it out to be a total of Rs. 1,200 a year, the Government must give every girl child that much of money to continue their education till they complete schooling. That amount should be deposited in the name of each girl child which will be of great help to them to build a bright future after completing their school education. This will help our society in a big way and will make the compulsory education a meaningful one. Hence, I urge upon the Union Minister to look into this and consider implementing it to give a boost to women education. The Government must come forward to encourage families that may stop with one child. Such children should be extended with grant from the Government to get education till they complete their collegiate education. They must get priority in the job market. Apart from priority in employment opportunities, they also must get Government assistance and funds when they go in for self-employment. They must get loan for investment at reduced rate of interest. These incentives to encourage one-child-a-family norm will go a long way in containing population explosion. Through our primary health infrastructure facilities and by way of utilizing the services of Rural Health Workers in every village, we must take this message to every house in every nook and corner of our country. The Government may also think in terms of extending to every newly married couple a gift box consisting of books and materials on sex education and family planning methods.
We had inverted red triangle as the symbol of the family control programme in the past. Later on, when it became family planning programme, we introduced the slogan of “Let us not have more than two children now and not have any at all after three children”. It was further changed to “We Two, Ours Two”. Now we are harping on “One Family, One Child”. We must uphold and promote this to bring down the growth rate, contain population going in for population stabilization. With these words, I conclude.
MR. CHAIRMAN : Hon. Members, I am still having a list of 18 hon. Members to speak. Therefore, I want the sense of the House. Another 18 Members are yet to speak.
… (Interruption THE MINISTER OF HEALTH AND FAMILY WELFARE (SHRI GHULAM NABI AZAD): We will continue with this discussion.… (Interruptions)
श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय (गिरिडीह):आप पहले जीरो आवर लीजिए और उसके बाद चर्चा कन्टीन्यु करें।...( व्यवधान)
THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PLANNING AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI V. NARAYANASAMY): Sir, I have one suggestion.… (Interruptions)
18.00 hrs. श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय : महोदय, अभी जीरो ऑवर ले लिया जाए और उसके बाद इस डिस्कशन को कांटीन्यू किया जाए।...( व्यवधान) यह डिस्कशन जीरो ऑवर के बाद लिया जाए।...( व्यवधान)
श्री हुक्मदेव नारायण यादव (मधुबनी):आप हाउस के बिजनेस को निर्धारित समय पर खत्म करिये। अभी जीरो ऑवर लीजिए।...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : The hon. Minister wants to say something. Please take your seat.
… (Interruptions)
SHRI V. NARAYANASAMY Mr. Chairman, Sir, we are going to complete this discussion within one hour and after that ‘Zero Hour’ can be taken up.… (Interruptions)
श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय : आप अभी जीरो ऑवर ले लें, उसके बाद हाउस को कांटीन्यू करें। ...( व्यवधान) कल भी जीरो ऑवर नहीं हुआ। इसका क्या मतलब है? ...( व्यवधान) हमारा नाम बैलट में निकलता है।...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : We are going to take up ‘Zero Hour’ also. Let us finish this discussion quickly. We do not want to create a new convention.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : I think within one hour we will finish this discussion and then we can take up ‘Zero Hour.’ … (Interruptions)
श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय : सभापति जी, हमारा यह कहना है कि अभी जीरो ऑवर ले लिया जाए।...( व्यवधान)
श्री हुक्मदेव नारायण यादव (मधुबनी):आप निर्धारित समय पर काम खत्म करिये। ...( व्यवधान)
SHRI GHULAM NABI AZAD :Mr. Chairman, Sir, my submission is Calling Attention, ‘Zero Hour’ are very important. I do not undermine the importance of ‘Zero Hour.’ But, as I said in the beginning, we are discussing this issue after more than three decades, after 34 years, in this House. We are discussing about family planning measures, population stabilization and how to go about it etc. I am extremely happy that Members from all sections of the House, irrespective of their party affiliations, are taking active part in this discussion. We will stay here till 7.00 p.m. or 7.30 p.m. also for ‘Zero Hour.’ So, let us finish this important discussion first.
MR. CHAIRMAN : All right. We are extending the sitting of the House by one hour for this discussion.
श्री हुक्मदेव नारायण यादव : जीरो ऑवर माननीय सदस्य का अधिकार है। वह गैर सरकारी चीज है। सरकारी काम रोका जा सकता है, लेकिन गैर सरकारी सदस्यों को जो अधिकार प्राप्त है, उस अधिकार में कटौती हम नहीं होने देंगे। ...( व्यवधान) आप बैठिये और इसे रात को 12 बजे पास कराइये।...( व्यवधान)
श्री गुलाम नबी आजाद : क्या यह बिल पास नहीं हो रहा है। आप मेरी बात सुनिये। यह न सरकारी है और न गैर सरकारी है। ...( व्यवधान)
श्री हुक्मदेव नारायण यादव : कल भी जीरो ऑवर नहीं लिया गया था। ...( व्यवधान) आज भी आप जीरो ऑवर नहीं ले रहे हैं।...( व्यवधान)
श्री गुलाम नबी आजाद : आपको तीन घंटे से सरकारी और गैर सरकारी काम मालूम ही नहीं है।...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : We are going to take up ‘Zero Hour’ after this discussion is completed. Please take your seat.
… (Interruptions)
श्री हुक्मदेव नारायण यादव : कल भी जीरो ऑवर नहीं लिया गया था और आज भी नहीं ले रहे हैं। आप इस पर कल बहस कराइये और अभी जीरो ऑवर लीजिए।...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : The Minister has also made a request and generally, first we finish the ongoing discussion and then take up ‘Zero Hour.’ So, please cooperate.
*श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): भारत के स्वास्थ्य मंत्री, श्री गुलाम नबी आजाद द्वारा सदन में एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, जिसमें भारत में बढ़ती हुई जनसंख्या का स्थिरीकरण करने के संबंध में है। यह विषय सत्ता अथवा प्रतिपक्ष का नहीं है बल्कि सम्पूर्ण सदन एवं देश की चिंता है कि आज भारत में दुनिया का कुल क्षेत्रफल की जमीन मात्र ढाई प्रतिशत है जबकि आबादी दुनिया के कुल का 17औ है। यह स्थिति भारत के लिए आने वाले दिनों में यदि जनसंख्या का स्थिरीकरण नहीं किया गया तो देश के लिए चुनौती उत्पन्न हो जायेगी। क्योंकि उक्त ढाई प्रतिशत जमीन पर भी कृषि भूमि दिन प्रतिदिन वकास की योजनाओं के कारण कम होती जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में जनसंख्या पर नियंत्रण करने के लिए न केवल सरकारी स्तर पर केवल उपाय किये जायें बल्कि भारत के सभी लोगों को सहभागिता जरूरी है। इसके लिए केन्द्र तथा राज्य सरकारें तथा जनप्रतिनिधियों को लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। क्योंकि बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए खाद्यान्न उपलब्ध कराना सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती होगी। आज भारत के अंदर जिन राज्यों में शिक्षा का प्रतिशत अधिक है, लोगों में जागरूकता है, जिसके कारण केरल, कर्नाटका, तमिलनाडु, गोवा, हिमाचल आदि राज्यों में जनसंख्या के स्थिरीकरण के लिए कारगार उपाय किये हैं लेकिन उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश आदि राज्यों की जनसंख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है जबकि पंजाब में 23औ की जन्म दर में गिरावट आई है। इसी तरह दक्षिण भारत के राज्यों में 18औ की जन्म दर में गिरावट आई है। लेकिन सन् 2000 में भारत में जनसंख्या के लिए नीति निर्धारित किया था आज सन् 2010 में आ तक अपेक्षित कार्यवाही नहीं हई। यदि समय रहते हमने प्रयास नहीं किया तो सन् 2025 तक चीन की जनसंख्या के स्तर पर पहुंच जायेंगे। जनसंख्या बढ़ने से केवल खाद्यान्न की चुनौती नहीं उत्पन्न होती बल्कि विकास भी प्रभावित होता है। पिछले दिनों दुनिया वैश्विक मंदीकरण से गुजर रहा था जिससे भारत भी अछूता नहीं रहा। आज 2010 में हमने विकास दर 8औ हासिल की है। विश्वास है कि आने वाले वित्तीय वर्ष के अंत तक 9औ विकास दर होगी। आज सभी को खाद्यान्न उपलब्ध कराने हेतु कृषि विकास दर 4औ रखना होगा तभी आने वाले दिनों में सभी को खाद्यान्न उपलब्ध करा पायेंगे। यदि भारत की विकास दर को दुनिया के सापेक्ष प्राप्त करना है तो गर्भ निरोधक प्रक्रिया को अपनाना होगा। आज उत्तर भारत के राज्यों में जनसंख्या स्थिरीकरण के लिए यदि कानून नहीं बना सकते हैं तो हमें जागरूकता को आम जन में पैदा करना होगा। उसके लिए विवाह की कानूनी उम्र 18 वर्ष से कम में शादी की इजाजत नहीं मिलनी चाहिये। सबसे पहली प्राथमिकता हम लोगों को होनी चाहिये कि बाल विवाह पर प्रतिबंध हो। उसे लोगों को अंगीकार करना चाहिये। शादी के बाद बच्चा भी पैदा करने में कम से कम 3 से 4 वर्ष का अंतर होना चाहिये। इसके लिए आशा बहुओं को देश के 25000 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर गर्भ निरोधक के लिए महिलाओं के बीच में जागरूकता पैदा करनी होगी। आज पूरे देश में 7 लाख आशा बहुयें ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं। उनका सीधा सम्पर्क ग्राम की महिलाओं से रहता है। उन्हें परिवार नियोजन के काम को कम से कम सप्ताह में एक बार उसके लिए प्रयास किया जाना चाहिये। उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा राज्य है, जहां जनसंख्या में विस्फोटक स्थिति पैदा हो गई है। देश की बढ़ती हुई आबादी का पचास प्रतिशत हिस्सा केवल उत्तर भारत के राज्यों में बढ़ रहा है। इसका एक प्रमुख कारण उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं झारखंड आदि राज्यों में गरीबी भी एक प्रमुख कारण है। गरीबी अभिशाप है और उसमें अधिक बच्चे होने के बाद उस परिवार के लिए एक बोझ पैदा हो जाता है। आज सभी सहमत हैं कि भारत के विकास को दुनिया के प्रतिपर्धा में ठहराना है तो जनसंख्या स्थिरीकरण पर आज प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। इसके लिए शिक्षा का अभाव एक प्रमुख कारण है। इसलिए सबसे पहले कन्याओं की शिक्षा के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में कॉलेज के खोलने की आवश्यकता है जिससे लड़किया शिक्षित होकर के एक पूरे घर को शिक्षित करेगीं। आज जिस तरह नगर पालिकाओं एवं जिला परिषदों के चुनाव में दो बच्चे का फैसला हुआ है उसी तरह से तमाम सरकार द्वारा शासकीय योजनाओं की सुविधा उन्हें मिलनी चाहिये। जो जनसंख्या स्थिरीकरण में विश्वास रख रहे हैं, केवल जागरूकता से प्रभावी सफलता नहीं मिल पायेगी। लेकिन सरकारों के द्वारा भी कारगर कदम उठाया जायेगा तो सफलता मिलेगी। आज जो चर्चा सदन में हो रही है उसे सभी राज्य के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक करके एक सामूहिक सम्यक रूप से एक रणनीति बनाने की आवश्यकता है। आज सबसे महत्वपूर्ण देश के समक्ष जनसंख्या स्थिरीकरण करने की है। मुझे विश्वास है कि सर्वोचच सदन में इस प्रस्ताव पर चर्चा से सार्थक निष्कर्ष निकलेगा। क्योंकि देर से ही लेकिन अब भी यह कदम उठाना समीचीन होगा।
*SHRI S.S. RAMASUBBU (TIRUNELVELI):
Population explosion problem is an important and vital problem in almost all the countries of the world. In developed economy, they are having vast area of land and resources. At the same time their population is very meagre.
Population explosion in India is a matter of great concern. We are having 17% of total population of the world. But the land availability to accommodate all the population and developmental activities are only 2.54% of total world available land.
If the population growth is not checked, in this limit, whatever may the steps taken by the Government for development, it is not going be fruitful.
Effect of Population growth
1. Food material shortage will be occurring continuously.
2. The unemployment problem will be augmented.
3. The problem of shelter will be arising.
4. We will need more medicine and hospitals to meet out the various diseases of the growing populations.
5. Infrastructure facilities such as road, transport, hospitals, water facilities, power production have to be enhanced.
It is calculated that during 2050 we will reach 162 crores. China it may be only 148 crores. India’s population growth rate is 1.4% when the growth rate in China is only 0.6%.
Advanced countries are having larger amount of area of land with the lesser population strengths. So, it is possible for them for development.
The alarming population growth must be minimized in the following ways.
Our Government has taken various steps.
1. Usage of contraceptive has been increased from 41% to 56% during 2008 from 1993.
2. Fixed day family planning services in P.H.Cs.
3. Introducing new and effective method of contraceptive in programme.
4. National family planning insurance scheme has been introduced in 2005 to compensate the sterilization failure and complications.
5. Compensation to sterilization is enhanced from Rs.800 to Rs.1500 in the year 2007 for vasectomy and Rs.800 to Rs.1000 for Tubectomy.
Measure to reduce the population growth we can keep in the following attempts
1. The child marriage should be strictly prohibited.
2. The marriage age can be increased.
3. The family planning programme and propaganda should be reached the public still more.
4. Enactment of law for having only two children for a couple of family.
5. Awareness campaign should be accelerated.
6. The educational instruction and also the curriculum must be introduced for creating more awareness for the students regarding the consequence of population growth.
In order to bring down the population growth and stabilization, all the State Governments should co-operate with Central Government by considering it as a common problem. Then only we can bring all the development and peaceful situation in our country.
*डॉ. संजीव गणेश नाईक (ठाणे): श्री गुलाम नबी आजाद साहब ने आज देश की जनसंख्या स्थिरीकरण के मुद्दे को विचार करने के लिए सदन में रखा है। मैं उन्हें धन्यवाद करता हूं।
, मैं समझता हूं देश को आजादी मिले 62 साल से ज्यादा हो गये हैं पर हमें इस मुद्दे पर जितनी पहल करनी चाहिए थी या ध्यान देना चाहिये था, दुर्भाग्य से दिया नहीं गया। हमारा देश 115 करोड़ की आबादी का हुआ है। इसी तरह अगर आबादी बढ़ती गयी तो 2045 तक हमारा देश जनसंख्या के बारे में विश्व का सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश होगा जो कि चीन के भी आगे जायेगा। महाराष्ट्र में 23औ जनसंख्या में कमी आई है। इसलिए हमें देश में महाराष्ट्र की तरह सभी राज्यों में जनसंख्या कम कैसे की जायेगी, इस बारे में ध्यान देना चाहिए। शिक्षा में सबसे बड़ी महत्वपूर्ण बात इसमें काम करती है। हमारी जनता शिक्षा की कमी से बच्चे पैदा न करने की सलाह या शिक्षा को समझती नहीं है। फैमिली प्लानिंग के ऑपरेशन सिर्फ महिलाओं में किये जाते हैं। इसलिए हर राज्य को टारगेट दिया जाना चाहिए। उन्हें ज्यादा सुविधा दी जानी चाहिए। पर मैं समझता हूं (पुरूष) - आदमी के ऑपरेशन के लिए ज्यादा उन्हें प्रोत्साहित करने की ज्यादा और नई योजना लानी चाहिये।
हमारे देश को आने वाले 25 सालों में बहुत समस्या का सामना करना पड़ने वाला है। पीने के पानी, शिक्षा, आरोग्य, मकान, अनाज बड़ी मात्रा में आवश्यकता लगने वाली है। मैं समझता हूं कि अगर हमें आने वाली नई पीढ़ी को अच्छा नागरिक बनाना है तो देश को समूह देश बनाना है। तो सभी राज्यों को इस बात को गंभीरता से लेने के लिए ज्यादा मिटिंग लेकर, जिला, तहसील, गांव स्तर पर। छोटे-छोटे गांव, खेड़े, कबीले, शहरों में प्रयोग करना चाहिए। देश के हर राज्यों को इसलिए नई योजना को लागू करके परिवार कल्याण दिवस, जैसा उड़ीसा में आयोजित होता है, आयोजन करने को कहना चाहिए।
महाराष्ट्र राज्य एक जमाने में ज्यादा जनसंख्या का राज्य और जनसंख्या बढ़ने का स्तर गति ज्यादा थी। पर पिछले 25 साल में राज्य में बहुत अच्छी तरह केंद्र शासन और राज्य शासन की फैमिली प्लानिंग की ऑपरेशन दी हुई संख्या से ज्यादा और जल्दी अपनी राज्य में किया गया है।
मैं समझता हूं कि स्वास्थ्य मंत्री जी ने इस पर जो सुझाव दिया है कि हमारे परिवार में कम उम्र में शादी न करके, कम बच्चों को पैदा करें। पर इस बात को लोगों को कुछ अच्छे सुझाव देना चाहता हूं। सभी राज्यों में हमें राज्य के कानून में बदलाव करने की आवश्यकता है।
जिनके 3 से ज्यादा बच्चे हों, उन्हें सरकार के फायदे न दिये जायें। ज्यादा बच्चे कम अनाज और थोड़ा मंहगा दिया जाये, जिस परिवार के 2 बच्चे हैं उन्हें ही सरकार की योजनाओं के फायदे दिए जायें।
जिन परिवारों में 2 से ज्यादा बच्चे हैं, उन्हें ज्यादा पैसे से बिजली दी जाये।
हमें जवानों का देश बनाना है। स्थिति यह है देश अपने जवान जनता को खाने के लिए लगने वाले साधन उपलब्ध न कर पा रहा है, अच्छी शिक्षा दे पा रहा है। शहरों में आबादी बढ़ रही है। उन्हें पानी, शिक्षा अच्छी तरह नहीं दे पा रहे हैं। गाड़ियां शहरों में इतनी हो गई हैं कि ट्रैफिक जाम लगा रहता है।
मैं चाहूंगा कि मंत्री जी सभी राज्यों में कड़ा नियम बनाकर उसे राज्य सरकार को लगाने के लिए आज से शुरूआत करनी चाहिए।
*SHRI P. KUMAR (TIRUCHIRAPPALLI) : I wish to put forth my views on the motion regarding population stablization, moved by the Hon’ble Minister of Health and Family Welfare in this House on behalf of AIADMK Party.
During the discussion on stablization of population in our country I wish to point out that India is having 119 crore population at present which is expected to go up to 161 crores in the year 2050. China whichis thickly populated is having 134 crore of population now and expected to reach only 141 crore. The increase in Indian population estimated as 1.4 percent per year whereas the Chinese population is expected to increase only 0.6 percent. There is a huge difference in between India and China in increase of population. Comparing the world population India is haivng 17 percent of the world population and having only 2 percent of land comparing to the availability of world.
The population increase in Uttar Pradesh is 22 percent, in Rajasthan and Madhya Pradesh each 7 percent, in Bihar 8 percent and the four souther states counts only total population of 13 percent. The Government is spending huge money for the improvement of northern states and introducing new schemes for northern states only, thus neglecting southern states. Despite the schemes the population of northern states are not controlled whereas the population of southern states are under control. The Government should think seriously to bring down the population growth in northern states. The Government is contemplating awareness schemes to bring down the population but it is not ready to bring any legislation in this regard. The awareness scheme should be implemented properly in northern states in order to bring the population under the control.
In Tamil Nadu during the regime of our Hon’ble General Secretary, AIADMK Party several schemes for controlling population have been successfully launched.
The population in urban areas are decreasing whereas the population in rural areas in increase. The awareness programmes are not implemented properly is the main reason for this situation. The primary health centres and the hospitals situated in rural areas are not equipped with required doctors strength. The Central Government should come forward to provide incentives to those doctors who are going to serve in rural areas. Then only the awareness programmes instituted by the Government to control the population will be succeeded.
The Government should come forward to provide incentives and increase in salary for those Government servants who are having one or two child. The poor people who have followed the family planning norms of the government should be given priority in getting bank loans for their small business. The Government should come forward to provide scholarship for the poor women children to remove the illitieracy in rural areas. The parents should be given priority in getting the admission for their children in professional institutes at free of cost.
Parents those who are adopting two children norms should be provided with free train and bus passes. The Government should oversse the utilization of the National Population stabilization fund and to see that the scheme is being implemented properly. Then only the growing population of our country will be under control.
योगी आदित्यनाथ (गोरखपुर): सभापति महोदय, जनसंख्या स्थिरीकरण संबंधी माननीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जी ने जो प्रस्ताव सदन के सम्मुख रखा है, मैं इस साहसिक कदम के लिए उन्हें धन्यवाद देता हूं और इस प्रस्ताव का स्वागत भी करता हूं। लेकिन उनके द्वारा जो प्रस्ताव आया है, सरकार ने अब तक जो उपाय प्रारम्भ किये थे, यह उन्हीं में थोड़े बहुत संशोधन से संबंधित है। इसलिए आने वाले समय में हम लोग जनसंख्या को प्रभावी रुप से नियंत्रित कर पायेंगे, मुझे इस पर अभी भी संदेह है। लेकिन नःसंदेह यह अच्छा प्रयास है, इसलिए इसका स्वागत किया जाना चाहिए। जनसंख्या विस्फोट की इस समस्या को कम से कम सरकार ने स्वीकार तो किया, वरना अब तक इस समस्या को ये लोग स्वीकार ही नहीं कर रहे थे।
जनसंख्या विस्फोट है लेकिन इस देश के लिये संसाधन नहीं हैं जो एक समस्या बनती जा रही है। आज भी इस देश में बहुत बड़ी जनसंख्या निरक्षर है जिन्हें बुनियादी सुविधायें प्राप्त नहीं पाती हैं। हम ग्रामीण क्षेत्रों में जाते हैं और देखते हैं कि उन लोगों के लिये सड़क नहीं, शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं है। वहां विद्यालय नहीं हैं, चिकित्सालय की उचित व्यवस्था नहीं है। किसी भी बुनियादी सुविधा से वंचित लोगों से समाज के निर्माण में या राष्ट्र के विकास में योगदान करने की अपेक्षा मुझे लगता है कि यह अत्यंत अव्यावहारिक होगी। इसलिये सरकार ने अगर इस समस्या को सुना और इस समस्या का समाधान करने के लिये एक प्रस्ताव के माध्य़म से प्रयास किया है तो मैं विश्वास कर सकता हूं कि वह एक संकल्प के रूप में भी सदन में आ जायेगा और पूरा देश उस संकल्प के साथ जुड़कर इस बीमारी के उपचार में अपना योगदान देगा। जनसंख्या विस्फोट के देश में बहुत से कारण हैं। जिनमें कुछ रूढ़िवादी कारण हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि जब पल्स पोलियो अभियान चलते हैं तो कुछ मज़हबी वर्ग उसे स्वीकार नहीं करते हैं। वे कहते हैं कि पल्स पोलियो ड्राप्स हम लोगों की जनसंख्या रोकने के लिये एक षडय़ंत्र हो रहा है।
सभापति महोदय, मुझे याद है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में इन्सफलाईटिस एक बीमारी है और इससे पिछले 25-30 वर्षों से बहुत बड़ी संख्या में मौतें हो रही हैं। एन.डी.ए. सरकार के समय वहां के क्षेत्रों में टीकाकरण की व्यवस्था की गई थी। वर्ष 2005-06 में पहली बार वहां टीकाकरण का प्रयास प्रारम्भ हुआ था। मैं विभिन्न क्षेत्रों में देखने के लिये गया था कि एक से 15 वर्ष के बच्चों पर कहां-कहां टीकाकरण हो रहा है। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि उस समय भी पल्स पोलियो की तर्ज़ पर बहुत सारे मज़हबी समूह टीकाकरण का बहिष्कार कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हम टीकाकरण नहीं लेंगे, यह हमारे खिलाफ बहुत बड़ी साज़िश है। मुझे लगता है कि यह रूढ़िवादिता है, इसे या तो जागरूकता के माध्यम से या प्रभावी कानून बनाकर या फिर समाज के उन मजहबी समूहों के जो धार्मिक नेता हैं, उनके माध्यम से रूढ़िवादिता को समाप्त करने का प्रयास होना चाहिये था लेकिन वह नहीं हुआ। मुझे लगता है कि जब हिन्दू परम्परा में भी किसी को आशीर्वाद देते थे तो सौ पुत्र होने का आशीर्वाद देते थे। लेकिन वह परम्परा हटी, लोग उससे हटे। एक शुद्ध हिन्दू परम्परा में चार आश्रमों की व्यवस्था की गई है। एक से 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य आश्रम, 25 से 50 वर्ष तक गृहस्थ आश्रम, 50 से 75 वर्ष तक वानप्रस्थ आश्रम और 75 वर्ष के बाद अगर आदमी जीता है तो सन्यास आश्रम की परम्परा का विधान किया गया था। मेरे विचार में समाज की सभी समस्याओं का एक आदर्श समाधान प्रस्तुत करता था। आज यहां जो बातें हो रही हैं कि बाल विवाह होते हैं, कुपोषण की समस्या आती है। इन समस्याओं के समाधान का उचित माध्यम आश्रम व्यवस्था थी। बालिका की आयु 18 वर्ष और बालक की आयु 21 वर्ष विवाह के लिये किस प्रकार से की गई है? मेरे विचार से यह मैडिकल साईंस के अनुसार भी नहीं है और यह सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप भी नहीं है। अगर आपको करना था तो एक आदर्श आश्रम परम्परा थी, आप विवाह की आयु 25 साल क्यों नहीं कर रहे हैं, 21 वर्ष ही क्यो करना चाहते हैं? आप 25 साल तक कर सकते हैं। अगर आप 18 और 21 वर्ष कर सकते हैं तो 23 से 25 साल से पहले हम शादी नहीं होने देंगे, अगर यह भी एक कानून बने और देश में सभी लोगों पर समान रूप से लागू हो तो उसमें किसी को आपत्ति नही होगी।
सभापति महोदय, परिवार नियोजन व्यवस्था में बहुत सारे मतभेद हैं। हो सकता है कि कुछ लोग संजय गांधी के मामले का समर्थन नहीं करते हों लेकिन उनके फैसले स्वयं के हित में नहीं रहे होंगे। उन्होंने उस समय समाज और राष्ट्र की समस्या को जानकर ही उस तरह की व्यवस्था लागू करने का प्रयास किया । लेकिन उस फैसले को एक नकारात्मक दृष्टि से देखा गया। हम लोग हर कार्य को नकारात्मक दृष्टि से क्यों लेते हैं, हम उसे सकारात्मक दृष्टि देने का प्रयास क्यों नहीं करते हैं ?
हम उसमें सकारात्मक दृष्टिकोण क्यों नहीं अपनाते हैं? मुझे लगता है कि अगर समाज की इन सभी दुरःव्यवस्थाओं का समाधान करना है तो हमें इस समस्या पर कहीं न कहीं कोई प्रभावी कानून बनाने के लिए तैयार होना पड़ेगा। एक बात तो यह है।
महोदय, दूसरी बात, हम लोगों के सामने एक समस्या और आयी है। आज देश की आबादी लगभग 120 करोड़ है। इसमें चार से छह करोड़ विकलांग बच्चे हैं, जो शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग हैं। मैं माननीय मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि आने वाले समय में उनकी भी संख्या बढ़ेगी। वैक्टरजनित बीमारियां बढ़ रही हैं, इंसेफेलाइटिस बढ़ रहा है, डेंगू है, कालाजार आदि के प्रभावी उपचार की कोई व्यवस्था आज तक नहीं हो पायी है। आप कुछ भी कहें, आपके आंकड़े कुछ भी कहते हों कि देश के अंदर इतने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं, इतने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं, लेकिन क्या सचमुच वे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र उन ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य की उचित सुविधा दे पा रहे हैं। स्वास्थ्य की उचित सुविधा तो दूर क्या वे प्राथमिक स्वास्थ्य की सुविधाएं भी वहां उपलब्ध करा पा रहे हैं, कोई उपलब्ध नहीं करा रहा है। आंगनबाड़ी की जो कार्यकर्त्रियां ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करती हैं, क्या वे ईमानदारी से कार्य कर पर रही हैं? क्या बाल- पुष्टाहार जो उनके द्वारा वितरित होना है, वह सचमुच वहां तक जाता है, वह वहां तक नहीं जाता है। वह ब्लाक स्तर पर बिक जाता है। ब्लाक स्तर पर ही उस सारे बाल-पुष्टाहार को कुछ लोग बेच देते हैं। क्या आप यह कल्पना करेंगे कि हम उनके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में फैमिली प्लानिंग की योजना को पहुंचायेंगे। जो बाल-पुष्टाहार उन तक नहीं पहुंच रहा है, आप इसकी ईमानदारी से जांच करायेंगे तो इस मामले में बहुत सारे आंकड़े आपके पास आयेंगे। आपको एक वीभत्स दृश्य देखने को मिलेगा। जिस प्रकार से पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम में तमाम प्रकार की विसंगतियां हैं, वैसे ही इस मामले में भी लूट-खसोट चरम पर है। जब लूट-खसोट होगी और आप उनके माध्यम से इस योजना को लागू करने की बात कर रहे हैं तो मुझे संदेह पैदा होता है। आपने उन विकलांग, वृद्ध लोगों के पुनर्वास की क्या व्यवस्था की है? उनके लिए कोई व्यवस्था नहीं है। एक समय भारत में संयुक्त परिवार की परंपरा थी। यह ठीक बात थी, लेकिन जैसे-जैसे आधुनिकीकरण और पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव पड़ता जा रहा है, वैसे-वैसे संयुक्त परिवार टूटते जा रहे हैं, समाप्त होते जा रहे हैं। चूंकि हम लोग आश्रमों में रहते हैं, हम इस बात को देखते हैं। हमारे पास बुजुर्ग आते हैं और कहते हैं कि हमारे लड़के ने हमें घर से निकाल दिया। आप हमारे लिए कोई व्यवस्था कीजिये, हम भी यहीं रहना चाहते हैं। उन वृद्ध लोगों की एक बहुत बड़ी संख्या है। आप उन लोगों के लिए क्या व्यवस्था कर रहे हैं, सरकार उनके लिए क्या कदम उठाने जा रही है? महिला और पुरूष के अनुपात में बहुत सारे राज्यों में जो विसंगतियां आयी हैं, उस विसंगति को दूर करने के लिए महिला सशक्तीकरण का अभियान चलना चाहिए। यह अभियान बिल्कुल चलना चाहिए और हर व्यक्ति इसका समर्थन करेगा। भारतीय मातृशक्ति का पाश्चात्यीकरण न हो, मुझे लगता है कि यह भी एक खतरा है, संकेत है, हम लोगों को इस पर भी अवश्य ध्यान देना पड़ेगा।
महोदय, बहुत सारी चीजें हैं। जनसंख्या विस्फोट का कारण गरीबी और अशिक्षा है। गरीबी होगी तो अशिक्षा होगी ही। इसके साथ-साथ बाहर से आने वाले लोग भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। आज के दिन बांग्लादेश की लगभग पांच करोड़ की आबादी भारत में रह रही है। वे झुग्गी-झोंपड़ियों में जगह-जगह रह रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर होने के बावजूद भी हम उन्हें वापस भेजने के लिए तैयार नहीं हैं, हम उन्हें केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने का प्रयास कर रहे हैं। मुझे लगता है कि जब तक हम राजनीतिक दृष्टिकोण से ऊपर उठकर, राष्ट्र के हित को सर्वोपरि मानकर कोई प्रभावी कदम नहीं उठायेंगे, मुझे लगता है कि तब तक हम जनसंख्या विस्फोट को नियंत्रित नहीं कर पायेंगे। इसके साथ-साथ आपने जो कुछ बातें यहां पर कही हैं, खास तौर से फैमिली प्लानिंग के बारे में, हम लोगों को यह करना चाहिए कि अगर कोई राष्ट्रीय कार्यक्रम है तो वह कार्यक्रम राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक पर समान रूप से लागू होना चाहिए। अगर राष्ट्र का हर व्यक्ति, राष्ट्र की सभी सुविधाओं का उपभोग समान रूप से कर रहा है तो राष्ट्र के कार्यक्रम को या राष्ट्र के कानून को उस पर समान रूप से लागू क्यों नहीं किया जा सकता है। मैं आपसे अनुरोध करूंगा कि इसके लिए एक प्रस्ताव नहीं, एक बिल लेकर आना चाहिए। एक समान जनसंख्या नीति को पूरे देश के अंदर लागू करने के लिए इस प्रकार का एक बिल इस सदन में आना चाहिए। इस पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए इस प्रकार के कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है। आपने अपने प्रस्तावना भाषण में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान राज्य के बारे में इस बात का उल्लेख किया था कि इन राज्यों में जनसंख्या की दर अन्य राज्यों की तुलना में बहुत ज्यादा है।
हम मानते हैं कि प्रदेशों की जनसंख्या पहले से ही बहुत ज्यादा है। जनसंख्या का सघन अनुपात इस क्षेत्र में भी है। प्रकृति और परमात्मा की ऐसी कृपा भी इस क्षेत्र विशेष पर है, ये क्षेत्र वैसे भी अपने आप में प्राकृतिक दृष्टि से फर्टाइल है ही, जनसंख्या की दृष्टि से फर्टाइल होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।
सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से यह भी जानना चाहूंगा कि क्या सरकार ने कोई सर्वे करवाया कि इन क्षेत्रों में जनसंख्या का जो सघन घनत्व है, उस सघन घनत्व के साथ-साथ ऐसे कौन से वे समूह हैं, जिनमें जनसंख्या की दर ज्यादा पाई गई है। क्या सरकार इस बात को सदन के सामने रखेगी? जनसंख्या स्थिरीकरण के बारे में, सरकार ने अभी तक जो बातें फैमिली प्लानिंग से संबंधित की हैं या रखी हैं, मुझे उसमें संदेह है। मैं आपसे अनुरोध करना चाहूंगा कि सरकार इस पर ईमानदारी से प्रयास करे। राष्ट्र के व्यापक हित में, राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उस पर ध्यान देने के लिए एक समान जनसंख्या नीति पूरे देश के अंदर बने। इसके लिए आवश्यकता पड़ती है तो जनसंख्या नियंत्रण के लिए एक प्रभावी कानून भी बनाया जाना चाहिए। जो लोग शासन की उस नीति को नहीं मानते हैं या नेशनल प्रोग्राम में भागीदार नहीं होते हैं, उन पर बहुत सारे अंकुश लगाएं। उसे सरकारी सुविधा से वंचित किया जा सकता है, आप उसे मताधिकार से वंचित कर दीजिए। बहुत सारे राज्यों में यह व्यवस्था है कि वहां पर पंच, प्रधान नहीं बन सकता या फिर वहां पर चेयरमैन नहीं हो सकता। क्या आप यह नहीं कह सकते कि जिसके दो से ज्यादा बच्चे होंगे, उसे हम सांसद और विधायक नहीं बनने देंगे। अगर यह भी आप लागू करेंगे और सरकारी नौकरी से उसे वंचित करेंगे तो मुझे लगता है कि काफी हद तक इसे नियंत्रित करने में सफल होंगे।
आप इस प्रस्ताव को लाए हैं, इसलिए मुझे लगता है कि इस पर कोई फतवा भी जारी नहीं कर पाएगा। दिनेश जी या कोई अन्य मंत्री अगर इस प्रस्ताव को यहां रखते तो मुझे भय था कि इस पर फतवा जारी हो सकता था। आप इस प्रस्ताव को यहां लेकर लाए हैं, आपने एक साहसिक कदम उठाया है, जिसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं और आपके इस प्रयास की सराहना करता हूं।
* श्री घनश्याम अनुरागी (जालौन): मैं सरकार का ध्यान इस गंभीर मुद्दे पर तथा इससे हो रहे व्यापक दुष्परिणामों पर आकर्षित करना चाहता हूं।
देश में जनसंख्या लगातार बढ़ती चली जा रही है। वर्ष 2010 में यह मुद्दा सदन के समक्ष है और यह एक संयोग ही है कि यह वर्ष जनगणना का वर्ष भी है। सम्पूर्ण देश में जनगणना की जा रही है। इस संबंध में कई सुझाव सदन के सामने पहले से ही हैं जिसमें जनगणना फार्म में विभिन्न प्रकार के कॉलम बनाए जाने का अनुरोध किया गया है।
देश में जनसंख्या के अनुपात में व्यापक विषमताएं बढ़ती जा रही हैं। पुरुषों की संख्या लगातार बढ़ रही है और भ्रूण हत्या एवं कन्या हत्याओं के कारण देश में महिलाओं की संख्या पुरुषों के अनुपात में काफी कम हो गई है। यह गंभीर विषय सरकार के सामने हैं परन्तु सरकार इस संबंध में कोई भी कारगर कदम उठाने में असमर्थ रही है। मैं यह नहीं कहता कि सरकार ने इस दिशा में कोई प्रयास ही नहीं किए, लेकिन जितने भी प्रयास किए गए हैं वे सभी अपर्याप्त, नाकाफी और निप्रभावी रहे हैं। केवल लड़के की चाह रखना भी जनसंख्या वृद्धि का एक प्रमुख कारण है। इस संबंध में कानून बनाने की अपेक्षा सरकार को जनमानस को मानसिक रूप से तैयार करना अति आवश्यक है ताकि जनमानस की यह अवधारणा खत्म हो जाए कि केवल लड़का ही उनको वैतरणी पार लगाएगा। यह सबसे महत्वपूर्ण कारक है जनसंख्या वृद्धि का।
दूसरा एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण कारण है देश में अशिक्षा। मैं इसे दूसरा नहीं पहला ही कारण कहूंगा क्योंकि अशिक्षा के कारण ही उपरोक्त जनभावना है। इस संबंध में मेरा यह सुझाव भी है कि पहले सरकार को महिलाओं की शिक्षा में ज्यादा जोर देना चाहिए यदि वे शिक्षित होंगी तभी आने वाली पीढ़ी को सही दिशा दिखा पाएंगी तथा जनसंख्या नियंत्रण हो सकेगा। शिक्षा के अभाव के कारण ही आज भी गांव देहात में लोग बच्चों को भगवान की देन मानते हैं। इस धारणा को भी बदले जाने की अति आवश्यकता है।
एक अन्य कारण जिस तरफ मैं सदन का विशेष ध्यान चाहूंगा, वह यह कि गांव देहातों में अस्पतालों का अभाव है, अस्पताल हैं, तो डॉक्टर नहीं है, यदि डॉक्टर हैं तो विशेषज्ञ नहीं हैं। विशेषज्ञ यदि कहीं हैं भी तो दवाईयां नहीं है और महिला डॉक्टरो की बेहद कमी है या यूं कहिए कि कई जगह तो महिला डॉक्टर हैं ही नहीं। डॉक्टरों में कम प्रशिक्षित डॉक्टरों की संख्या ज्यादा है। महिला डॉक्टरों के न होने के कारण दूर-दराज गांव, देहात की महिलाओं को जनसंख्या नियंत्रण संबंधी सरकार द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों और अन्य गर्भ निरोधकों संबंधी जानकारी महिलाओं को लज्जावश नहीं मिल पाती है या ऐसे भी कहा जा सकता है कि गर्भ धारण न करने के साधनों के बारे में ज्ञान नहीं है या वे पुरुष डॉक्टरों से इस संबंध में सार्थक जानकारी नहीं ले पाती है। इसलिए, मेरी सरकार से यह भी मांग है कि देश में महिला डॉक्टरों की अधिक नियुक्तियों पर बल दिया जाना चाहिए। कम उम्र में शादी अथवा बाल विवाह पर भी सख्ती से रोक लगाए जाने की आवश्यकता है क्योंकि कम उम्र में शादी होने के कारण भी जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं पाया जा रहा क्योंकि खेलने खाने की उम्र में यदि विवाह हो जाता है तो मानसिक रूप से तैयार न होने के कारण इस समस्या में वृद्धि हो रही है।
लगातार जनसंख्या वृद्धि ही देश की सभी समस्याओं का मुख्य कारण है, यह सभी जानते हैं क्योंकि केन्द्र सरकार या राज्य सरकारें देश के लिए जो भी कार्यक्रम और नीतियों को लागू करते हैं, जनसंख्या की वृद्धि के कारण सबकी उपयोगिता निरर्थक हो जाती है। जितने भी रोजगार के अवसरों का सृजन किया जाता है वह बेकार चले जाते हैं। इससे देश में बेरोजगारों की फौज बढ़ती जा रही है। शिक्षित बेरोजगारों की संख्या में भी व्यापक वृद्धि हो रही है। हर क्षेत्र में लम्बी-लम्बी कतारें दिखाई देती हैं। जनसंख्या वृद्धि गरीबी का मुख्य कारण हैं। जनसंख्या नियंत्रण से ही कई प्रकार की समस्याएं मनुष्य की और देश की हल हो सकती हैं। इसलिए इस कानून को सख्ती से लागू करने की ही आवश्यकता नहीं बल्कि सरकार को जनमानस को मानसिक रूप से तैयार करने की भी आवश्यकता पर बल देना चाहिए क्योंकि पूर्व में भी ऐसे अनुभव रहे हैं जब सरकारों ने सख्ती बरती है जैसे कि नसबंदी कार्यक्रमों को इमरजेंसी के दौरान सख्ती से लागू करने के कारण यह कार्यक्रम अलोकप्रिय एवं फेल हो गया था।
SHRI DEEPENDER SINGH HOODA (ROHTAK): Mr. Chairman, Sir, first of all let me congratulate the hon. Health Minister for bringing in this debate. He rightly said that it is after a gap of 33 years that we are having such an important debate in our Parliament.
I was trying to look up to the debate that took place in 1976. What I have found out that even in 1976, it was tabled and was not discussed much.
Let me start by quoting Swami Vivekananda: “We are responsible for what we are, and whatever we wish ourselves to be, we have the power to make ourselves. If what we are now has been the result of our own past actions, whatever we wish to be in future can be produced by our present actions.”
18. 08 hrs. (Shrimati Sumitra Mahajan in the Chair) Madam as I deliberate further, let me just start by highlighting the dimensions of this problem, the contours of this problem from a perspective of a young Indian and not just as a parliamentarian, as I see it. After that, towards the conclusion, I would point out some of things that we can do to address them.
Much has been said about the enormity of the problems that we are facing, namely, 17.3 per cent of the world’s population living on 2.4 per cent of world’s total land, having only four per cent of world’s total water resources to quench our thrust. By 2025, we are going to overtake China; by 2050, our population will be more than 1.6 billion people; in the next 10 years, we will have 350 million more mouths to feed, which is more than the population of the United States; there will be 350 million more jobs to produce, which are more than the jobs in the world’s largest economy today. I am just talking about the next 10 years. Every year, our population is increasing by more than 20 million, which is the size of the population of Australia. For the next 20 years, one-fourth of all the population increase in the world is going to come from India and one-eighth of all the population increase in the world is going to come from Uttar Pradesh.
And, one-eighth of all the population increase of the world is going to come from Uttar Pradesh. The TFR, as the Minister pointed out, stands at 2.7. We wanted it to be at 2.2 in 2010 but it stands at 2.7 with Bihar and U.P, the TFR is almost 4.0. The problem manifests itself in multiple forms.On resources about which the Minister pointed out, in our youth and in urbanisation, we are going to see great churning in the next 25-50 years in our country, and we have to address that churning. Of course, on the resources, enormous pressure is going to be put for water. Like I pointed out, the world’s total fresh water resources would be four per cent. I am talking about demand. Today our demand is 950 billion cubic metres of water. The total supply that we have in our country, including exhaustive ground water is 1.4 trillion cubic metres. By 2050, we will double our demand for water. The demand will be 1.9 trillion cubic metres. Our supply, including from all the rivers, fresh water, rainfall, ground water, will stay at 1.4 trillion cubic metres. We will far exceed the total supply that we have. हम पानी तो उगा नहीं सकते। आज इस बात के बारे में हमें सोचना पड़ेगा।
In our cities on average every year the ground water table is falling by six feet on annual basis. In Gurgaon in Haryana, we are having 300 per cent water exploitation rate which is above the highest in the world, which means every year for every one litre of water that goes in, we are taking out three litres already and we are just looking at the demographic tsunami that we will see over the next few years.
Regarding food grains, even today our per capita availability of food grains is 525 grams per capita per day in our country. Compare this to China. The per capita food grains availability per day in China is 980 grams. In the United States, it is already 2,850 grams. Even at this level, by 2050, we will need to produce 430 million tonnes on annual basis. We do not even produce 200 million tonnes today.
Now, we can say that we will put into place wide irrigation network; and we will improve our agricultural sector but we do all know that agriculture sector has been growing just at about two per cent. We do have some good growth here but at the same time we do have some bad growth. Last year our agricultural growth rate was minus 0.2 per cent. Are we surprised that we are facing inflation?
Regarding urbanisation, millions and millions of people are going to move to cities. Are our cities ready to accept them? Forty per cent of our population by 2020 will move to cities, and not just by the young people looking for livelihoods. They will move because of desertification. They will move because of the depletion of water table in Rajasthan, Haryana and in a lot of other places. They will move because of deforestation and loss of livelihoods in their own habitats. This will lead to great churning.
But one particular manifestation of this problem that was not talked about by any of the other esteemed Members before me that I want to touch on is the problem of the youth. Even today 60 per cent of our youth is tied to agriculture, the primary sector. Over the next 10 years, we need to move a majority of this into secondary and tertiary sectors.
Even in the current Plan, the Planning Commission knows that between 2007 and 2012, we need 100 million more jobs to maintain the current level of employment. By 2020, we need to create 350 million more jobs and to create more jobs, obviously, we need growth but we also need employability.
You know, two economists David Bloom and David Canning coined the words, “Demographic dividend”. They did lot of brilliant work but I am not a big fan of them for coining these words because behind these words, it has become an easy tool for us to forget the problem that we are seeing. Any macro economic model will tell you that it is not just the growth in labour force which will see our economic growth but it is also good human capital. You see any Human Development Index. We are having numbers.
But, as far as human development index is concerned, we are not doing that well. We stand at the spot of 127th out of 177 nations when we look at the human development index. All this has happened because of our population increase and because we have not been able to effectively provide this lesson to our youngsters, to our next generation.
The demographic dividend that we talk about, I think we are inching closer to demographic disaster. The problem for our youth is showing in Kashmir. The restlessness and the negative energy of our youth is showing in Chhattisgarh. I am afraid that if we are unable to tackle this, it is going to show all over our country. Recently, a magazine called Open painted rather a grim picture in which they envisioned that India is on the verge of disaster, if the young and their youthful energy is not tapped properly. Then we can fragment into a lot of different nation-states and the entire complexion of our country and the nationhood can change.
One of the things that I have been arguing for long is that, just looking at the GDP growth and inflation, these are the two measures that we talk about in our Parliament a lot, along with that we should also talk about unemployment rate. That should be one of the main measures on which our Finance Minister and the Government of the day should be measured. When the Finance Minister stands up in the Parliament and talks about the Budget, he should say that in the last year how many lakh new jobs were created in our country. मैं किसान का बेटा हूं। मेरे दादा के पास 10 एकड़, 20 एकड़ जमीन थी, आज मेरे पास ढाई एकड़ जमीन, एक एकड़ जमीन आ रही है, ढाई कीले जमीन आ रही है। अगली पीढ़ी के पास कितने कीले जमीन आएगी, वे लोग कहां जाएंगे? The population of youth is also important. The problem of population is the problem of youth and this is the mother of all problems.
I looked at many population control policies throughout the world. Taking a look at China, Iran, Bangladesh, I want to point out some of those in our House today. Of course, China has much feigned one child policy. But the consensus on one child policy did not come in one day. In 1948, after the Revolution, they thought of their population as an asset, as a lot of us think. It was after their great leap forward that they started thinking about it as an obstacle. Then, they reversed their policies after cultural revolution and it was only decisively in 1973 when Mao Zedong associated himself with the population control policies.
सभापति महोदय : आप जितना ज्यादा बोल रहे हो, आपके बाद के बाकी लोगों का समय कम हो रहा है, आप इतना ध्यान में रखिये।
SHRI DEEPENDER SINGH HOODA : In 1979 they decisively enacted the single child policy. Even in China, under special circumstances, for ethnic and religious minorities, they are relaxing this single child policy to two or three children. Of course, they are bringing about this policy through propaganda, coercion, commune birth planning committees and so on and so forth.
Iran is very unique and I want to point this out to our hon. Minister. Iran has done something which no other country in the world has done. They are most successful in population planning. What they have done is that it is the only country in the world which has made contraceptive courses mandatory for both males and females before they can obtain a marriage certificate. Everybody has to go through this training one day for five hours before they can obtain a marriage certificate. This has been very successful in Iran.
Of course, we have done a lot of things as the hon. Minister pointed out. As I conclude, let me just quickly run through a list of some of the suggestions that I have for the hon. Minister. The first and foremost is that we have to have a dialogue. That is why, I congratulate him for initiating that dialogue. I also congratulate the Minister because when he initiated the dialogue he was able to hit a common ground across all political parties in Lok Sabha.
We need to have incentives. Without incentives the schemes are not going to work. Of course, Shri Naveen Jindal pointed out about the retirement age, old age pension, etc. We can think about having a longer retirement age for parents who have less children, we can think about giving additional marks to their wards in interviews for Government jobs. We can think about a lot of different incentives. But incentives have to be there.
Female literacy is the most important thing. We all know that. We need to work on it, we need to work for female literacy.
Of course, the hon. Minister pointed out about the average age of getting married and said that 68 per cent of girls in Bihar were getting married before the age of 18.
Madam, I conclude with the last point. While we cannot force sterilisation, we need to enforce these things. We need to enforce the correct age at the time of marriage.
श्री जयंत चौधरी (मथुरा): सभापति महोदया, जनप्रतिनिधियों को हमेशा तैयार रहना होता है कि पत्रकार उनसे कब, कहां और कैसा सवाल पूछ लें? एक सवाल अगर मुझसे पूछा जाए, तो मैं भी थोड़ा डगमगा जाऊंगा कि भारत की जनसंख्या कितनी है? यह एक ऐसा आंकड़ा है, जो मेरे देखते-देखते बहुत तेजी से बदल रहा है। यह दर्शाता है कि कितनी बड़ी चुनौती हमारे देश के सामने है।
आज सरकार में चर्चा चल रही है कि खाद्यान्न की सुरक्षा के लिए हम एक कानून लाएंगे। यूनिवर्सल पीडीएस की जब मांग संसद में उठती है, तो जवाब मिलता है कि अनुदान का भार हमारी अर्थव्यवस्था सहन नहीं कर सकती। मेरे मन में ख्याल आता है कि मैं अपने जीवनकाल में वह दिन देखूंगा जब हमारे देश की जनसंख्या शायद दोगुनी हो जाएगी, उस समय अनुदान और अर्थव्यवस्था का बोझ कैसे उठा पाएंगे? यह सही है कि यह समस्या सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। अनुमान यह कहते हैं कि वर्ष 2025 तक विश्व की जनसंख्या आठ सौ करोड़ तक हो सकती है। मुझसे पूर्व कई सांसदों ने उल्लेख किया है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्या मूवमेंट चल रहा है और क्या प्रयास हो रहे हैं? इसमें संयुक्त राष्ट्र की भागीदारी है। मेरी जानकारी के अनुसार 1960 के दशक में जागरूकता फैली कि विकास के लिए, बढ़ रही जनसंख्या एक चुनौती है। अमेरिका ने वर्ष 1967 में फंड दिया और संयुक्त राष्ट्र का एक जनसंख्या कोष स्थापित हुआ। काइरो की बैठक, जो बहुत प्रसिद्ध है और सदन में भी उसके बारे में चर्चा हुयी, वह एक मील का पत्थर साबित हुयी। ऐसा क्यों, क्योंकि उसके पूर्व जो सेमिनार होते थे, जैसे बुखारेस्ट में सेमिनार हुआ, मैक्सिको में वर्ष 1984 में सेमिनार हुआ, उनमें विशेषज्ञ जाते थे, जो अपनी सरकार का प्रतिनिधित्व करके यह दावा नहीं कर सकते थे कि हम अपनी नीतियों में परिवर्तन लाएंगे। काइरो में गैर सरकारी संस्थानों ने एकजुट होकर अपनी आवाज को बुलंद किया, महिला शशक्तीकरण के मुद्दे को उठाया और उनको इसमें सफलता मिली। मैं कोट करना चाहूंगा -
Chapter 4 of Cairo Programme of Action is entitled ‘Gender Equality, Equity and Empowerment of Women’ which says “Empowerment and autonomy of women, the improvement of their political, social and economic and health status is a highly important end in itself. In addition it is essential for the achievement of sustainable development.” हमें सराहना करनी होगी, लेकिन वहीं इस पूरे माहौल में, क्योंकि भारतीय परिप्रेक्ष्य में इमरजेंसी का कलंक भी हमने देखा और महसूस किया। उस समय के जो प्रयास थे, उनका दुप्रभाव आज भी हम महसूस करते हैं। उस परिप्रेक्ष्य में हम देखें तो कहीं न कहीं जहां परिवार नियोजन और जनसंख्या को नियंत्रित करने की बात होनी चाहिए थी, वहीं आज हम जनसंख्या में स्थिरता की बात कहते हैं और फेमिली वेलफेयर तक ही सीमित हैं। मैं कहना चाहता हूं कि इस बात को हम सब स्वीकार करते हैं और इस क्षेत्र में हुआ अनुसंधान भी यही बताता है कि इनमें सीधे तौर पर एक लिंक है। महिला साक्षरता का एक इनवर्स रिलेशनशिप है, साथ ही साथ गरीबी हटेगी तो उसका एक इनवर्स रिलेशनशिप है। मंत्री जी ने बताया कि टीएफआर की चुनौती हमें कम करनी है और उसके आंकड़े भी उन्होंने प्रस्तुत किए। मैं कहना चाहता हूं कि दोनों एप्रोच, दोनों पहलुओं को मद्देनजर रखते हुए एक नया तरीका क्यों नहीं निकाल सकते, जिसमें विकास भी हो, लेकिन साथ ही परिवार नियोजन को भी हम प्रमुखता से आगे रखें। जो आंकड़े हैं, वे चौकाने वाले हैं। मैं ज्यादा आंकड़े नहीं दूंगा। मंत्री जी ने खुद इस बात को कहा कि जो बीमारू प्रदेश हैं, वे हमारे लिए एक चुनौती हैं। कानून के बावजूद 18 वर्ष से कम उम्र में जिन लड़कियों की शादी हो रही है, उनका उत्तर प्रदेश में आंकड़ा 33 प्रतिशत है।
उसमें बहराइच जिले का 70.7 प्रतिशत, महाराजगंज का 62 प्रतिशत, शाहजहांपुर का 47 प्रतिशत, मेरे जिले मथुरा का 31 प्रतिशत है। ये चौंकाने वाले आंकड़े हैं। 15 से 19 साल की महिलाओं में टोटल बर्थ के प्रतिशत में सोनभद्र जिले का 20 प्रतिशत, महोबा का 17 प्रतिशत, मथुरा का 15 प्रतिशत है। ऐसा नहीं है कि कानून नहीं है। मेरी एक गैर सरकारी संस्था के साथ बात हो रही थी। वे कह रही थीं कि माननीय सदस्य शादियों में जाते हैं। आपने खुद भी इस बात को कहा। हम सब क्यों नहीं इस संकल्प को लेते कि जब हमें कोई इनविटिशेन आए, तब हम उसे देखें और सबसे पहले यह सवाल पूछे कि उम्र कितनी है। जब हम शादी में जाएं और बाहर एक गाड़ी सजी हुई हो और दहेज हो, तब हम सवाल पूछें कि यह दहेज किसलिए है। अगर हम यह कदम उठाएंगे तो उससे निश्चित रूप से और लोगों को प्रेरणा मिलेगी। मैं कहना चाह रहा था कि संयुक्त अभियान चले जिसमें प्रमुखता से वेल्फेयर, विकास, साक्षरता, सशक्तीकरण की बात हो, लेकिन वहीं नियोजन की बात भी होनी चाहिए। उसे अनुसंधान सपोर्ट करता है।
मैं एक रिसर्च पेपर पढ़ रहा था। श्री बृजेश पुरोहित नाम के एक व्यक्ति हैं। उनकी बेसिक फाइंडिंग थी। उन्होंने तीन प्रदेशों की रिग्रैशन एनालेसिस के माध्यम से स्टडी की थी जिसमें महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उड़ीसा था। जहां पर केपिटा इनकम कम है, वहां डायरैक्ट सरकार का इंटरवैंशन काम आता है और जहां हाई पर केपिटा इनकम है, वहां आप कह सकते हैं कि इकोनॉमिक डैवलपमैंट मेजर इनफ्लुंस बन जाता है। उन्होंने अपनी स्टडी में यह भी बताया कि उन्हें हर जिले में वेरिएंस मिला। उन्होंने जिला स्तर की इन्फार्मेशन को इस्तेमाल किया। हमारे जिलों में जो इन्फार्मेशन है, वह सही नहीं है।
दूसरी बात यह है कि इस क्षेत्र में अनुसंधान कर रही संस्थाएं हैं। आपके मंत्रालय में भी हैं। जो एपैक्स आर्गनाइजेशन हैं - नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ हैल्थ एंड फैमिली वेल्फेयर, इंटरनेशनल इंस्टीटय़ूट ऑफ पौपुलेशन साइंसेज़। रिसर्च आर्गनाइजेशन्स का एक बहुत बड़ा नेटवर्क है। में मंत्री जी से सिर्फ यह जानकारी चाहूंगा कि इन इंस्टीटय़ूट्स की क्या हालत है? क्या इनमें ऑटोनॉमी है? क्या अनुसंधान हो रहा है? जैसे मैं पहले बताना चाह रहा था कि परिवार नियोजन एक बुरा शब्द बन चुका है। वेल्फेयर की बात है, फैमिली प्लानिंग अब बैड वर्ड है। डैमोग्रैफिक सिचुएशन, जो समाज की आवश्यकता है कि हम उन बातों को नियंत्रित करें, हम भी बोलने से कतराते हैं। हमें देखना होगा कि इन संस्थाओं की क्या हालत है। जो मौजूदा कानून है, मैं जानता हूं कि यह स्टेट सब्जैक्ट है, लेकिन आप मॉडल एक्ट बना सकते हैं, कानून की आवश्यकता हो तो आप ला सकते हैं। अगर कानून का कहीं भी पालन नहीं हो रहा है और वहां आप प्रो-एक्टिव मेजर्स लेंगे, सरकारों, एजैंसियों से बात करेंगे, हम उसमें मदद कर सकते हैं, तो निश्चित रूप से परिवर्तन होगा। मैं उदाहरण देना चाहूंगा। पीएनडीटी एक्ट जो प्री-नेटल डायगनौस्टिक टैस्टिंग के खिलाफ है।...( व्यवधान)सुप्रीम कोर्ट ने भी मैनडेट किया था कि आप अल्ट्रासाउंड की मशीन की रजिस्ट्री कीजिए। क्या वह रजिस्ट्री हो रही है? हर जिले में एक नोडल ऑफिसर चाइल्ड मैरिज पर नजर रखने और उसके खिलाफ कार्यवाही करने के लिए नियुक्त होना था। क्या वह है? एमपीज़ की मौनीटरिंग और विजिलैंस कमेटी बैठती है, हर क्वार्टर में एक मीटिंग होती है। क्यों नहीं उसके एजैंडा में जिले स्तर की जानकारी हमें उपलब्ध करवा सके? क्यों नहीं संबंधित विभाग के लोग हमें आकर प्रैजैंटेशन दें कि हमारे जिले की क्या हालत है, ताकि हम आप तक जानकारी पहुंचा सकें और उस पर अपनी कार्यवाही कर सकें?
मैं कुछ सुझाव देना चाहता हूं। कोई कारण नहीं है कि हम इंसैनटिव से दूर रहें। इंसैनटिव हो सकते हैं। आप बैंकिंग सिस्टम में सुविधा दीजिए, लोन में सुविधा दीजिए। सरकारी नौकरियों में हम क्यों नहीं महिलाओं को आरक्षण दें, विशेषकर जो गरीब परिवारों से निकली हैं। हम सशक्तीकरण की बात तभी कर पाएंगे जब महिलाएं घर-गृहस्थी के कामों से निकलकर दुनिया में आएंगी। उन्हें आमदनी होंगी, जिसं वे घर ले जाएंगी। समाज में उनकी जो कद्र, पहुंच और आवाज होनी चाहिए, वह तभी बुलंद हो सकती है।
मैं ज्यादा वक्त नहीं लेना चाहता। मैं आखिरी प्वाइंट बताना चाहता हूं। मुझे मंत्री जी का पत्र वर्ल्ड पौपुलेशन डे के संबंध में मिला था। मैं उनकी सराहना करता हूं। आज की चर्चा में सब स्पीकर्स ने इस बात को कहा कि राजनीति से ऊपर उठने की आवश्यकता है। दलीय भावनाओं और सीमाओं को तोड़कर आगे बढ़ें, एकजुट होकर चलें। मैं कहना चाहता हूं कि हमारे प्रदेश की हालत यह है। यहां विपक्षी दल के सांसद भी बैठे होंगे। मुझे पत्र मिला था कि वर्ल्ड पौपुलेशन डे पर माननीय सदस्यों को आना चाहिए। जब माननीय सदस्य आएंगे तो लोगों में जागरूकता बनेगी। मैं अपने जिले की नहीं, अपनी पार्टी के और सदस्यों की बात कह सकता हूं कि जानकारी भी नहीं मिली। सत्ताधारी दल के विधायक वहां चीफ गैस्ट थे।
*श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय (गिरिडीह): आज हमारा देश स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा रोजगार के क्षेत्र में आज भी कई देशों के मुकाबले काफी पीछे है। आज जो कानून व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति से विस्फोट हो रहा है, उससे तीव्रतम विस्फोट जनसंख्या विस्फोट है। देश के अनेक हिस्सों में भू-जल का स्तर गिरता जा रहा है और करोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। जिस अनुपात में इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ रहा है, उसके विपरीत जनसंख्या बढ़ रही है। आज आजादी के 63 वर्षों के बाद भी हम जनसंख्या विस्फोट को रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठा पाये हैं।
आज सत्ता का मुख्य बिन्दु वोट की राजनीति है। जब तक हम वोट की राजनीति से हटकर कार्य नहीं करेंगे तब तक हम भारत निर्माण की परिकल्पना नहीं कर सकते। आज हमारे देश के बेरोजगारों को रोजगार नहीं मिल रहा है। गरीबी के दंश से गरीबों को पर्याप्त और गुणवत्ता पूर्ण अनाज की कमी है, वहीं हम दूसरे देशों के लोगों को पनाह दे रहे हैं। क्यों वोट की खातिर? आज अशिक्षा, रूढ़ीवादिता, धार्मिक विश्वास की खातिर देश में जनसंख्या को रोकने में विवश हैं। आद देश में एन0जे0ओ0 के माध्यम से करोड़ों रूपये निधी सरकार द्वारा खर्च की जा रही है।, जिसका अधिकांश हिस्से का अपव्यय होता है। अगर सरकार इस कार्य को करने में विवश है तो इस टास्क को एन.जी.ओ के माध्यम से कार्यान्वित कराने का कार्य किया जाये और इसकी मॉनिटरिंग के लिए समाज के हर वर्ग, हर धर्म के लोगों की सहभागिता हो।
हमें याद है, 1974-75 में आपातकाल के दौरान नसबंदी कार्यक्रमों का अनुपालन। आज भी वह क्षण रोंगटे खड़ा कर देने वाला है। लेकिन हम अपनी ईमानदार कोशिश से जनसंख्या विस्फोट को रोकने के लिए जन-जागरूकता कार्यक्रम को चालू रखें। अगले 10-20 वर्षों में हमारी अगली पीढ़ी को जनसंख्या विस्फोट का भयानक परिणाम भुगतना होगा।
अतः सरकार से आग्रह है कि देश में जनसंख्या वृद्धि दर को रोकने के लिए समयबद्ध कार्यक्रम तैयार किया जाये और इसके लिए एक प्रभावी कानून का निर्माण किया जाये।
*SHRIMATI. PARAMJIT KAUR GULSHAN (FARIDKOT) : I thank you, Madam Chairperson, for giving me the opportunity to speak on an important subject. Yesterday, in this august House, we discussed at length the serious issue of ‘Rise in the prices of essential commodities’. Members expressed their grave concern on this issue. However, there is another very serious matter – the issue of population-explosion. This is a matter of more concern than price-rise. Population-explosion is the root cause of a plethora of problems. Inflation is one such problem. Population is sprialling out of control and it has engendered and aggravated a host of other problems like poverty, illiteracy, hunger, criminal activities, unemployment, taking of drugs and intoxicants by youths, left-wing extremism, terrorism, the widening chasm between the rich and the poor, adulteration in food-items, environment-pollution, malnutrition, corruption, graft etc. Thus, population-explosion is a hydra-headed monster.
Madam, in the last 5 years, the population of India increased by 14% whereas the population of China increased by a mere 6%. By 2050, India will have the dubious distinction of overtaking China as the most populous country in the world. In 2050, the population of India will be around 161.38 crores whereas that of China will be much less. This is nothing to be proud of. It will only lead us to catastrophe.
Madam, successive governments have taken several steps to rein in the burgeoning population but to no avail. Several commissions were set up, several committees were constituted, surveys were conducted, social reform measures were undertaken, family-planning and family-welfare programmes were initiated. However, the result has been a big cipher. We have miserably failed in realizing any of our targets.
Madam, the seriousness of the Government in tackling this gargantuan problem can be gauged from the fact that we are discussing this vital issue in this august House after a long gap of 33 years. We should have taken the bull by the horns much earlier. Madam, it seems that the Government was afraid of losing the votes of the opponents of family-planning. That is why this issue was always brushed under the carpet.
Madam, various factors are responsible for this alarming increase in the population of our country. Due to paucity of time, I shall be brief. However, I must register my complain that members of Punjab are not given ample time to ventilate their grievances in the House.
Madam, I want to make a few suggestions. Until and unless we frame stringent laws, it will be almost impossible to control the population-explosion. However, the Hon’ble Health Minister does not plan to enact any legislation in this matter. In a press-briefing, the hon. Minister said, “Let me make it clear, we are not in favour of controlling population-growth through any kind of legislation. But we favour generating awareness and persuading people to have small size of family for betterment of the health of the mother and child.” However, a majority of wise people do not conform to this view. They know that the country is already bursting at its seams. The ever-increasing population is eating into the very vitals of all developmental efforts. The country is already over-burdened. It can not longer bear population-explosion. All family-planning schemes launched with much fanfare in the last 62 years have failed to deliver the goods. Hence, the need for a stringent law is the only realistic answer to this problem. It should be enforced uniformly on the rich and the poor and all segments of society. Only punitive measures can act as deterrent.
Madam, a special package should be granted to those states that have succeeded in controlling the population growth. I seek the attention of the Hon’ble Minister towards this suggestion. A special package should be given to the states that have succeeded in checking the alarming population-growth. There are six such states and I am happy to inform you that Punjab tops the list of such states. I want to congratulate the present Government of Punjab. It has taken concrete steps and reduced the population-growth in Punjab by 23% and it has slowed down the population-growth by 32%. This is a wonderful achievement of the Government of Punjab.
Madam, we must contain this malaise by taking political steps. Some states have made family-planning mandatory for those in local self-Government and also for the municipal council members. However, the need of the hour is for MPs and MLAs to take the lead and practice what we preach. Charity should begin at home. A benchmark should be set for Lok Sabha and Rajya Sabha members also. All political parties should refrain from granting tickets to people who have more than two children. Of course, there should be a cut-off date. Let me tell you that I have only 2 daughters. But, we must have a futuristic vision. We must embrace progressive ideas. All political parties must implement strictly such a norm and should not back regressive ideas.
Madam, we are the elected representatives of the people. We are the role-models of the people. The people look up to us for inspiration and guidance. If Ministers and Members of Lok Sabha and Rajya Sabha marry three or four times and have several children, what kind of precedence will we set? What kind of message will be sent to the public? How can we check population-explosion in such a scenario?
MADAM CHAIRMAN : Please wind up.
SMT. PARAMJIT KAUR GULSHAN : Madam, we must empower our women if we intend to control the population-growth. In this regard, the data and statistics that are reeled out by the Government are mostly fake. They are mostly concocted and fabricated. The bureaucrats in the ministries just want to achieve the targets. The ground-reality is different. The data that reaches the Government is generally fudged. The officials just want to save their skin. Thus, the Government remains under the misconception that it has achieved its targets. Constant monitoring should be done to verify the genuineness of the tall claims that are made by officials. Figures of the present year should be strictly compared with those of the previous years. If population-growth continues unabated, the Government should review its schemes and policies. The failure of our schemes should serve as an eye-opener for the Government.
MADAM CHAIRMAN : Please wind up. Many other hon’ble members have yet to speak.
SMT. PARAMJIT KAUR GULSHAN : Madam, I will conclude my speech in one minute.
The Government should also focus on Government employees. All employees should be asked to furnish am affidavit that they will stick to family-planning norms. If they fail to do so, no increments should be given to them. They should not be given any promotion either.
Madam, the Government must take stern measures if it wants to control population-growth. We can overcome all impediments. But the will and intention to do so should be there. 70% population of country is earning hardly Rs.20/- per day. The rate of 1Kg of pulses varies between Rs.60/- to Rs.100/-. Madam, time is running out. If we do not take concrete measures to check population-explosion, it will further aggravate other problems like poverty, inflation, illiteracy, unemployment and taking of drugs and intoxicants by youths. The country will lag behind in the race of progress and development and the future generations will suffer irreparable damage.
Hence, it is high time that we awake from our deep slumber and take the bull of population-explosion by the horns. Only then can we stabilize our population. The future generations will never forgive us if we fail to rise to the occasion.
*श्री हंसराज गं. अहीर (चन्द्रपुर):माननीय स्वास्थ्य मंत्री द्वारा जनसंख्या स्थिरीकरण के संबंध में लाये गये मामले पर सदन में चर्चा चल रही है। आज हम विश्व में सबसे अधिक युवा जनसंख्या वाला राष्ट्र के नाते जाने जाते हैं। इस समय हमारी जनसंख्या का 50 प्रतिशत 15 से 49 आयु वर्ग के लोग होने से जनसंख्या वृद्धि में अधिक गति होने की आशंका भी है। हमने फरवरी, 2000 में राष्ट्रीय जनसंख्या नीति अपनाई, लेकिन बावजूद इसके हम जनसंख्या नियंत्रण के लिए आवश्यक माहौल तैयार नहीं हो पा रहा है। इसके लिए सरकार भी उतनी ही दोषी है। देश में पुरुष और महिला में भेदभाव नहीं होना चाहिए। लिंग के आधार पर कायदे से पक्षपात नहीं किया जा सकता लेकिन सरकार ने पुरुष नसबंदी के लिए 2007 में 800 से 1500 रुपए दिए और महिला नसबंदी के लिए 800 से केवल 1000 रुपए दिए। महिलाओं के लिए केवल 200 रुपए बढ़ाये गए। दूसरी बात है, भारत में बाल विवाह की कुप्रथा का होना। बाल विवाह कायदे से बंद है, लेकिन आज भी कई प्रदेशों में यह हो रहे हैं, इससे जनसंख्या नियंत्रण को धक्का लगता है। इस पर कानून तथा जन-जागरण के माध्यम से नियंत्रण लाने के लिए प्रयास करने की आवश्यकता है। हमारी जनसंख्या नीति के अंतर्गत हमने प्रजनन दर 2012 तक 2.1 पर लाने का लक्ष्य रखा है। लेकिन बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश में यह 3 से 4 प्रतिशत है। इसे देखकर हमें जनसंख्या नियंत्रण के लिए कितना कष्ट करना पड़ेगा यह स्पष्ट हो जाता है। जनजातीय क्षेत्र में जनसंख्या की दर भी अधिक होती है। पिछड़े तथा अविकसित होने के कारण वहां शिशु जन्मदर अधिक है। वहीं शिशु मृत्युदर भी अधिक है। कुपोषण के कारण बाल मृत्युदर भी अधिक है, कुपोषण के कारण बाल मृत्यु होने पर वहां परिवार नियोजन के बारे में कोई सहयोग नहीं दिया जाता। अगर वहां पर अच्छी स्वास्थ्य सुविधा, पौष्टिक खाद्यान्न की भरपाई की गई तो वहां पर भी परिवार नियोजन सफल हो सकता है। भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, ऐसे में हमें बढ़ती आबादी के लिए आवश्यक खाद्यान्न जुटाना, संसाधन और बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराने का भार भी हमें सहन करना होगा। ऐसे में हमें अपनी जनसंख्या सीमित करनी होगी। सरकार को चीन की तरह सोचना होगा। चीन ने अपनी जनसंख्या के बढ़ते दबाव को देखकर जनसंख्या स्थिरीकरण में सफलता पाई है। चीन के उन सभी प्रयासों और कार्यक्रम का अनुकरण करने पर विचार करें, अध्ययन करें।
किसी परिवार ने एक संतान के पश्चात् फैमिली प्लानिंग करने की इच्छा की तो सरकार विशेष पुरस्कार देने का कार्यक्रम चलाती है। कई राज्य सरकारें भी इसमें अपना हिस्सा देती हैं। मैं इस कार्यक्रम में सुझाव दूंगा इसमें स्वयं स्फूर्त फैमिली की चिंता होनी चाहिए कि उस एकलौती संतान को छह माह तक जांच करें किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित न होने पर ही एकलौते संतान पर फैमिली प्लानिंग की अनुमति दें। ऐसे कई परिवार देश में पश्चाताप् कर रहे हैं उन्हें एकलौती संतान को गंभीर बीमारी का पता फैमिली प्लानिंग के बाद चला तब सारी बची जिन्दगी उन्हें पछताना पड़ रहा है।
जनसंख्या विस्फोट यह हमारी राष्ट्रीय आपत्ति है। इसलिए इसके नियंत्रण हेतु हमें धर्म, लिंग, भेदों से ऊपर उठकर एक राय बनाकर सोचना होगा। सरकार को जनसंख्या का स्थिरीकरण करने के लिए जन-जागरण अभियान चलाना चाहिए। जनसंख्या नियंत्रण के लिए हमें कुछ कड़े कदम भी उठाने होंगे। जो लोग इसमें साथ न दें उन्हें दरकिनार करना होगा। जनसंख्या स्थिरीकरण के खिलाफ जो लोग हैं, उन्हें कोई सरकारी योजनाओं का लाभ न मिले, ऐसी व्यवस्था करनी होगी। सरकारी नौकरी में रहने वाले लोगों को परिवार नियोजन करने की शर्त रखनी होगी। दूसरे क्षेत्र में भी हम राशन, सरकारी योजनाओं में हिस्सेदारी के लिए छोटे परिवार की शर्त लगाये तो हम जनसंख्या स्थिरीकरण में सफलता पा सकते हैं। महाराष्ट्र राज्य में पंचायतों के चुनाव में 2 बच्चों से अधिक वालों को उम्मीदवार नहीं बनाया जाता इससे भारी लाभ हुआ। वहां पर दो बच्चों के बाद परिवार नियोजन करने का अच्छा चलन हो गया। इसे पूरे देश में लागू करना होगा। सरकार जनसंख्या स्थिरीकरण के मामले को गंभीरता से ले और इस मामले में राजकीय इच्छाशक्ति का परिचय देकर इसे लागू कराये।
*SHRI P. LINGAM (TENKASI): Madam Chairperson, the House is now deliberating on the ways and means to stabilise our population and contain the population growth rate. I thank you for giving me an opportunity to participate in this discussion and share some of my views.
In 2001-02, the total number of families in India was about 18.20 crores and it had risen to 22.84 crores in 2009-10. I deem it fit that this discussion on Population explosion has been taken up at this juncture and it is appropriate.
We must put our heads and hearts together to find out the causes for the population increase. It is not enough to talk about population and containing the same. Population is our asset, wealth and resource. It is a natural resource and is taken as human resource. In the Asian Continent, we are the second largest country to have such a vast human resource. Both in the North and South Pole region and in the West, there is not much scope for increased population growth. But in the tropical region where we find ourselves in the Asian Continent the natural potential for increased population is more. The climatic conditions here are responsible for more population than other regions. This is not only a human factor but also a climatic factor. If we scientifically analyse the demographic distribution, we find that increased population is found among the society that is more relying on religions and religious practices. People who are responsible for increase in population are mostly illiterate and impoverished because they consider their progenies to be their assets who can help them to overcome oddities in life. We must consider the ways and means to make the Government of the day aware of the ground reality and to evolve suitable measures to contain population that come in the way of our achieving the target for growth.
People go in for children not only because they like them but also because they consider them to be their assets and means to improve their life. Most of the religions are impressing upon their followers that reproduction is an assigned duty and they must not put a stop to it as it will go against the tenets of their faith. In our country, only those who have their lives centered on religions keep on increasing the population. In addition to it, we find a situation in our country that contributes to increased population. Adequate social security is not available to the citizens of this country. In the absence of a viable social security mechanism, every individual tends to think that only their children can take care of them in their old age.
Resolutions and Motions cannot contain population explosion. We must enhance the standard of life and Human Resources. Education alone is not Human Resource. Along with education, health, economic growth, increased infrastructure facilities are all factors that constitute Human Resource. In the absence of enhancement of in the standard of living, we cannot but witness increase in population. Even countries like America and Britain are thinking in terms of controlling population today. So, naturally it is right that India is also considering on the same lines to stabilize its population. But there must be a common view, a uniform view, a universal view to take effective steps to contain population. We must go into the roots of the problem and must come out with necessary steps to find a solution. Mere laws cannot control population explosion. We must create awareness in the minds of the people. We must instill confidence in the minds of our people that they can live on their own and rely on self-sufficiency.
There is a common thinking that girl children are mere burdens and they cannot help their parents. This is the mindset of a patriarchal society. There is a notion that the family can be led only by a man and only men can be relied upon. There is a belief in the society that there must be at least one male child in a family. With a hope to beget a male child, some families give rise to girl child after girl child unmindful of the number of the members of the family increase. They think it is necessary and essential. The Government must evolve ways and means to help people to come out of this mindset. We must not think that our duty is over by way of moving this Motion in this House. Social security measures, enhancing human resources and its potential, growth in education, economic development are all factors that will help people to gain confidence in living together as part of a body polity. Only then we can find a reverse trend and can witness a fall in population growth. People of the elite society are having awareness and are not increasing the population because they have a sense of security. Poor people want to live somehow because of a sense of insecurity occupying them. So we must help them gain confidence so that they do not go in for more children. The mindset that a male child is a must, should go. We must involve religious leaders also to impress upon the people that this attitude must go because we find some religious leaders urging their followers to increase their progeny so that the number of their followers increase manifold. Adequate awareness has not been created world over. Even in China the population control measures have succeeded only to the extent of 40 per cent. In India it is 34 per cent. No other country finds such effective implementation of family planning programmes. Only by way of extended campaign involving common people with political leaders and religious leaders, we can create a conducive atmosphere and enough of awareness to control population. Emphasizing the need to go in for this, let me complete my speech.
श्री जगदानंद सिंह (बक्सर) : सभापति महोदया, माननीय मंत्री जी ने बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर विचार-विमर्श करने का मौका दिया है। मैं समझता हूं कि प्रस्ताव प्रस्तुत करते समय जितने प्रभावशाली ढंग से प्रस्ताव को इस सदन में उन्होंने रखा, हम सभी उनसे सहमत हैं। उन्होंने जो कुछ कहा वह सही है लेकिन उनकी चाहत में जो अवरोध है, मैं उसके बारे में थोड़ी सी चर्चा करना चाहता हूं।
तीन तरह के राज्य जनसंख्या स्थिरीकरण के मामले में बंटे हुए हैं। जो 2.1 परसेंट ग्रोथ वाले राज्य हैं और जो 2.2 से 2.6 परसेंट ग्रोथ वाले राज्य हैं और जहां खतरनाक स्थिति है, वह 3 परसेंट से 3.9 परसेंट ग्रोथ वाले राज्य हैं। जब राष्ट्रीय स्तर पर समस्या की चर्चा करते हैं तो यह समस्या 6 राज्यों के बीच में सिमट कर रह जाती है जहां पॉपुलेशन ग्रोथ रेट 3 प्रतिशत से 3.9 प्रतिशत के बीच में है। संयोग से महोदया, आप भी मध्य प्रदेश राज्य से आती हैं और आपने इस बहस की शुरुआत करते हुए जिन बातों की चर्चा की थी मैं शत-प्रतिशत उन बातों से सहमत हूं।
महोदया, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश पॉपुलेशन ग्रोथ में सबसे ऊंचाई पर हैं और गरीबी और अशिक्षा में सबसे निचले पायदान पर हैं। इन दोनों का संबंध कहीं न कहीं बनता है। माननीय मंत्री जी ने इस देश में 18 ऐसे केन्द्रों की स्थापना कराई है जो विश्वविद्यालयों के भीतर अन्य स्वतंत्र संस्थाओं के द्वारा अध्ययन किये जा रहे हैं। माननीय मंत्री जी के सामने पॉपुलेशन रिसर्च केन्द्रों के 74 अध्ययन आ चुके हैं। मैं नहीं समझता हूं कि उनके क्या निर्णय है, लेकिन हम लोगों के राजनैतिक जीवन के जो अनुभव है, उनके आधार पर मैं कह सकता हूं कि 6 राज्यों में पॉपुलेशन की खतरनाक स्थिति है। अगर उस स्थिति से इन राज्यों को नहीं उबारा गया तो इस समस्या का राष्ट्रीय समाधान भी नहीं निकल सकता है। अगर राष्ट्र की इस समस्या का समाधान निकालना है तो इन राज्यों में इस समस्या का समाधान तलाशना होगा। महोदया, इन्हीं 6 राज्यों में विस्फोटक स्थिति है। यह चर्चा है कि वर्ष 2030 तक 37 करोड़ आबादी और बढ़ जाएगी जिसमें से 50 प्रतिशत आबादी इन्हीं 6 राज्यों में बढ़ेगी। अगर इन राज्यों की तरफ ध्यान नहीं दिया गया तो परिणाम अपेक्षित नहीं आ पाएगा और परिणाम लाना है तो हमें उन्हीं राज्यों की चर्चा करनी चाहिए।
पॉपुलेशन की समस्या वहीं है जहां अशिक्षा है, अशिक्षा वहीं है जहां गरीबी है और गरीबी का कारण उन राज्यों का पिछड़ापन है। राज्यों का पिछड़ापन, इस मुल्क में क्षेत्रीय असंतुलन का कारण है। अगर क्षेत्रीय असंतुलन राष्ट्र में होंगे तो परिणाम भी अलग-अलग आयेंगे। अगर हम समान परिणाम चाहते हैं तो हमें समान अवसर भी राज्यों को देना पड़ेगा और विशेषकर उन राज्यों के बारे में सोचना पड़ेगा, जहां अशिक्षा है, गरीबी है, पिछड़ापन है और लोग असंतुलन के शिकार हैं। माननीय मंत्री जी, आपकी जितनी भी पवित्र भावना हो, यह अकेले स्वास्थ्य मंत्रालय का विषय नहीं है, यह भारत सरकार का विषय है। यदि क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने का प्रयास केन्द्र की सरकार नहीं करेगी तो गरीबी, पिछड़ापन, अशिक्षा के साथ-साथ पॉपुलेशन ग्रोथ के रूप में यह समस्या भी बनी रहेगी।
19.00 hrs. इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि इन विषयों को लेकर केंद्र सरकार को चिंतित होना पड़ेगा। राजस्थान, उत्तर प्रदेश राज्यों में ही नहीं, बल्कि बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के भीतर भी असमानताएं हैं। जिस तरह इन राज्यों में जिलों की अलग-अलग आर्थिक स्थिति है, उसी तरह से जनसंख्या ग्रोथ का भी अलग-अलग पैमाना है। मैं बिहार की चर्चा करना चाहता हूं। हम उस जिले से आते हैं, जो बिहार के सबसे शिक्षित जिले हैं और वहां की समस्या दूसरे जिलों से अलग है। लेकिन हमारे सीमान्त इलाके के जो जिले हैं, जहां अशिक्षा बहुत है, जहां गरीबी है, पिछड़ापन है, वहां जनसंख्या ग्रोथ रेट भी बहुत ऊंचा है और चार प्रतिशत से भी आगे है। हमारे राज्य का जो भी प्रतिशत है, यदि हम अलग-अलग जिलों की समीक्षा करें तो यह चार से पांच प्रतिशत के बीच में आता है। आखिर यह विस्फोटक स्थिति क्यों है, इसके लिए कौन जिम्मेदार है और कौन इसे दूर करने का प्रयास करेगा? 18 साल की लड़की की शादी होनी चाहिए, तो मंत्री जी बताएंगे कि क्या 18 साल के तक लड़की को विद्यालय नहीं जाना चाहिए।
सभापति महोदया : हमने इस चर्चा के लिए सात बजे तक समय बढ़ाया था और अभी भी बहुत से माननीय सदस्यों ने अपनी बात सभापटल पर रखनी है। अगर आप सभी की सहमति हो, तो एक घंटे का समय और बढ़ा दिया जाए। लेकिन सभी सदस्यों से निवेदन है कि तीन-चार मिनट में अपनी बात समाप्त करें और सुझावों को रिपीट न किया जाए।
अनेक माननीय सदस्य :ठीक है, एक घंटे का समय बढ़ा दीजिए।
श्री जगदानंद सिंह :मैं मंत्री जी से कहना चाहूंगा कि आपके इस प्रभावशाली विषय पर तभी नतीजा निकलेगा, जब समग्रता में इस विषय को लीजिएगा। जनसंख्या ग्रोथ की विस्फोटक स्थिति हमारी गलतियों का परिणाम है। केवल एकांगी सोच के तहत जनसंख्या ग्रोथ समाप्त नहीं होने वाला है। महोदया, यह राष्ट्र रहेगा, राष्ट्र स्वस्थ रहेगा। इस राष्ट्र की जनसंख्या ग्रोथ अगर रुकेगी, तभी कहीं न कहीं दुनिया में यह राष्ट्र आगे जाएगा। इन बीमार राज्यों को छोड़ कर इस दुनिया के पैमाने पर भारत कभी भी आगे नहीं जा सकता है। अगर समृद्ध भारत बनना है, तो पापुलेशन ग्रोथ को भी नियंत्रण करना पड़ेगा। यदि समृद्ध भारत बनाना है, तो इन बीमार राज्यों को जिनकी चर्चा बार-बार होती है - मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार की स्थिति में परिवर्तन करने के लिए, रीजनल इम्बैलेंस को दूर करने के लिए माननीय मंत्री जी पांच-सात सालों की योजनाएं बना रहे हैं कि जनसंख्या स्थिरीकरण होगा, तो रीजनल इम्बैलेंस को दूर करने का भी प्रोग्राम बनाना चाहिए। हमें लोगों को शिक्षित करना पड़ेगा। गरीबी से मुक्ति दिलानी होगी। भारत में रहने के लिए स्वच्छ स्थान देना पड़ेगा। गांवों में सड़कें देनी पड़ेंगी, ताकि डाक्टर गांवों तक जा सकें। समग्रता में यदि स्वास्थ्य मंत्रालय यदि चिंतन करेगा, तब जाकर भारत की सबसे बड़ी समस्या हल हो सकेगी।
श्री हुक्मदेव नारायण यादव (मधुबनी): महोदया, सरकार को धन्यवाद देता हूं कि इस विषय पर सरकार द्वारा प्रस्ताव सदन में विचार करने के लिए लाया गया है। सभी माननीय सदस्यों ने अपनी राय दी है। सदस्यों ने जितनी राय दी हैं, अगर उन्हें इकट्ठा करके सरकार दृढ़तापूर्वक संकल्प लेगी, तभी कुछ सकारात्मक काम बन सकता है। अगर दिशा ठीक हो, दृष्टि ठीक हो और मन में दृढ़ संकल्प हो, तो जनसंख्या नियंत्रण का काम एक साल में पूरा किया जा सकता है। अगर मन में संकल्प न हो, दृढ़ता न हो, तो कोई भी काम पूरा नहीं हो सकता है। जनसंख्या बढ़ती जाएगी और उत्पादन नहीं बढ़ेगा, तो मुश्किल उत्पन्न होगी ही। मैं किसान हूं, खेती स्टैगनेंट होती जा रही है। जब उत्पादन में स्थिरता आएगी और जनसंख्या में वृद्धि होगी, तो सहज नियम है कि खाने वाले ज्यादा होंगे।
उपज कम होगी तो लोग भूखे मरेंगे, नंगे रहेंगे। जब जनसंख्या का घनत्व बढ़ेगा तो बसने की जमीन का अभाव होगा, लोग बिना घर के रहेंगे, झुग्गी-झोंपड़ी में रहेंगे, सड़क के किनारे रहेंगे, जहां जगह पाएंगे वहां बस जाएंगे और फिर बिल्डर उनके नाम पर कमाएंगे। मैं सरकार से इस गोरखधंधे को बंद करने के लिए थोड़ी सी बातें कहना चाहता हूं। हमने नारा दिया- “हम दो, हमारे दो” इसका मतलब है स्थिर, रोक देना, इससे आगे न बढ़ना और जो इस काम को करे वह नंबर तीन रहे। “हम दो, हमारा एक” इस काम को जो करे वह नंबर दो रहे और “हम न किसी के और कोई न हमारा, हम दो के दो चले जाएंगे” वह नंबर एक रहे। इस तरह आप प्रथम, द्वितीय और तृतीय नागरिक की श्रेणी बना दें। आप पदम विभूषण, पदम श्री से सम्मानित करते हैं आप इन्हें सम्मानित कीजिए। फिर देखिए इस देश के आदमी कैसे जनसंख्या कंट्रोल करते हैं। यह काम या तो दंड से होगा या लोभ से होगा। आप या तो इसे भय से कीजिए, दंड से कीजिए या लोभ से कीजिए। आप दंड का विधान नहीं कर सकते क्योंकि दंड का प्रावधान करेंगे तो हर चीज में, धर्म, संप्रदाय, दुनिया भर की चीजें निहित स्वार्थी सिर पर भूत सवार हो जाएगा और कुछ नहीं होने देगा। आप अगर कुछ करना चाहते हैं तो योजना आयोग या माननीय प्रधानमंत्री जी के साथ मिलकर हिन्दुस्तान के सभी धर्माचार्यों का सम्मेलन बुलाइए। उन्हें कहिए कि आपस में बैठकर तय करें कि अपने धर्म और संप्रदाय के लोगों को जानवर या कीट - पतंगों के जैसे मरने देंगे या इंसानियत की जिंदगी जीने देंगे, यह निर्णय आप स्वयं करें। जिस धर्म के लोग इस बात को मानने के लिए तैयार हों, जो इस देश में स्वस्थ, सबल, साक्षर, शिक्षित, समृद्ध और सुखी नागरिक बनाना चाहते हैं, उन धर्माचार्यों को पुरस्कृत कीजिए और जो बाधा पैदा करे उन्हें राष्ट्रद्रोह के अपराध में बंद कीजिए। क्या आप यह डर पैदा कर सकते हैं? राष्ट्र निर्माण कोई सहज बात नहीं है। राष्ट्र का निर्माण बहुत दिल कठोर करके होता है। आप सरकारी नौकरी और सुविधाएं देते हैं, मेरी प्रार्थना है कि आप किसी पर प्रतिबंध मत लगाइए लेकिन जिस तरह से किसी नौकरी के लिए एजुकेशनल क्वालिफिकेशन निर्धारित करते हैं उसी तरह से एक और योग्यता रखिए कि इन तीन कैटेगरी के नागरिकों को सरकारी नौकरियों और सुविधाओं में उसी तरह से प्राथमिकता देंगे। जिसे जरूरत है वह उसे करेगा, जिसे आवश्कता नहीं है वह प्राथमिकता लेकर सरकारी नौकरी और सुविधा पाएगा।
महोदया, आप ग्रामीण विकास योजना के लिए जो भी योजनाएं चलाते हैं। मेरा सुझाव है कि इन्दिरा आवास योजना, सामाजिक सुरक्षा पेंशन आदि में जनसंख्या के स्थिरीकरण में जो भी नागरिक सहयोगी हों, उन्हें प्राथमिकता दीजिए कि इन्दिरा आवास पहले देंगे, सामाजिक सुरक्षा पेंशन पहले देंगे। “हम दो हमारे दो” को स्थिर करने वाली कैटेगरी में आने वालों को 500 रुपए प्रति माह पेंशन दीजिए। “हम दो, हमारा एक” वाली कैटेगरी में आने वालों को 700 रुपए प्रति माह दीजिए और “हम दो, हमारा न कोई” इनको 1000 रुपए प्रति माह जीवन निर्वाह भत्ता दीजिए, फिर आप देखिए कि इस तरह कैसे नागरिक सहयोगी बनते हैं। लोग फैशन, ठाटबाट, भोग, आराम, लेनदेन, भ्रष्टाचार में करोड़ों अरबों रुपए लुटा देते हैं लेकिन आप राष्ट्र निर्माण के नाम देंगे तो मैं कहता हूं कि गगनचुंबी अट्टालिकाओं में रहने वाले ठाटबाट करने वाले, गिटपिट बोलने वाले, कंठ लंगोट और पैंट पतलून पहनने वाले करें या न करें लेकिन हिन्दुस्तान के गरीबों को पुरस्कार देंगे तो वह जनसंख्या नियंत्रित करके दिखा देगा। लेकिन आप नहीं करेंगे क्योंकि हम बहस करना जानते हैं। अगर आप करना चाहते हैं तो करिए। योजना आयोग में योजना बनाने में इन सबको प्राथमिकता दीजिए।
मुझे पूरा विश्वास है कि भारत का नागरिक, जिसके हृदय में राष्ट्रीयता है, राष्ट्र प्रेम है, जिसके दिल में समाज कल्याण की भावना है और जो इस राष्ट्र को समृद्ध, शक्तिशाली और सम्पन्न बनाना चाहता है, वह आपके इस काम में भागीदार बनेगा, आगे बढ़कर आयेगा। यह आपको करना चाहिए, यह आपको ही करना है, नहीं तो सबकी बात सुनिये, घर में जाकर सोइये, चादर ओढ़कर रहिये, बहस कराइये और बहस का कहीं कोई लाभ न निकले, इससे कुछ नहीं मिलेगा। यदि करना है तो संकल्प लेकर आइये - करो या मरो करके दिखाइये।
SHRI ADHIR CHOWDHURY (BAHARAMPUR): I must appreciate the hon. Health Minister who has already set the tone and tenor of the ensuing discussion. He has already elucidated the whole thing with all the available resources at his disposal.
India is the youngest country in the world. In the year 1790 Venetian monk, Ortis concluded that expansion of population will discontinue. It cannot continue indefinitely. In the later stage Malthus stimulated the discussion on population. Even Charles Darwin theorized the biological evolution which denoted ‘survival of the fittest’. So, the fact is that the issue of population is not a new phenomenon. It has been continuing on. In the aftermath of the Second World War when the peace and tranquility descended on the world, we found that population started increasing by leaps and bounds.
First of all, I would suggest the hon. Minister that in India Kerala is the only State which has initiated and achieved population control long years back. So, I would propose the Ministry to replicate Kerala model throughout the country.
Secondly, we should initiate People’s Movement on the demographic situation of our country. In the past, common people were afraid of donating blood but now even female members of conservative families are coming forward to donate blood. In the similar way, as there has been universal donation of blood or what was called as the ‘Blood Donation Movement’ can we not initiate a movement named after ‘Stabilization of our Population’?
We have to engage a number of NGOs to educate the common people with regard to the demographic situation of our country. We should even persuade the religious leaders with different hues to come forward and teach their disciples to follow the demographic principles. India is a country of God-fearing people. So, if the religious leaders inculcate the benefit of population control in the psyche of our common people, I think it will have a salubrious effect on the common people.
Madam, India is in a state of demographic transition, however, it is slow and steady. During the demographic transition, it is inevitable that we will be witnessing a population growth. But there lies two points – whether it is an asset or whether it is a liability. I think so far as our economic condition is concerned, it becomes a liability but if we can create a conducive economical as also political and social environment in our country, this population can be turned into an asset and naturally we would be able to call it a demographic dividend.
Insofar as dependency ratio is concerned, I would like to draw the attention of the hon. Minister to it. So far as the dependency ratio is concerned, in 1970, it was 79. It is a ratio between workers and non-workers. In the year 2005, the dependency ratio was brought down to 64. It is estimated that in the year 2025, the dependency ratio will be again brought down to 48 but in 2050, it will have a slight increase and it would become 50. The fact is that we need to put hands on work. If we are able to create employment scenario and skilled development then we will be able to generate surplus and by the surplus, we will be able to invest in our economy which will ultimately help our socio-economic development.
By the year 2020, 25 per cent of our population will be under 15 years of age and 64 per cent will be in the working age group in our country. Madam, you will be interested to note that by 2020, the United States will require 17 million workers; Japan – 9 million workers; China – 10 million workers; and Russia – 6 million workers. So right now, in addition to the control of our population, we need to convert this population into our asset to earn demographic dividend and that should also be our objective.
मैडम, हमारे हैल्थ मिनिस्टर ने एक शेर कहा था, इसलिये मैं भी एक शेर में जवाब देना चाहता हूं।
मैं वो बदनसीब हूं बहादुरशाह जफर, दफन के लिए दो गज़ जमीन भी न मिली कूए-यार में।
ऐसा न हो कि हमारे हिन्दुस्तान में आबादी और जमीन का इतना फर्क हो कि हमें दो गज जमीन न मिले।
SHRI NARAHARI MAHATO (PURULIA): Madam, I am grateful to you for giving me a chance to speak in the discussion on population stabilization. Today, many hon. Members have discussed this issue. My humble submission is that population stabilization is very important for India’s future. Everybody knows that population stabilization is now a great challenge to us. After 33 or 34 years, we have discussed it vividly how we can stabilize the population. After 63 years of Independence, we are not able to carry on the population stabilization throughout India because of many hindrances and causes.
Madam, I belong to a remote village where people are totally illiterate. I have seen ignorance. Illiteracy is the main cause of population de-stabilisation. In my parliamentary constituency there is a block which has the lowest literacy rate amongst women not only in West Bengal and India but in the Asia continent. In that block 85% of women population is illiterate.
Madam, my parliamentary constituency is Purulia. It is a very under-developed district in the State of West Bengal where there is a very high rate of illiteracy amongst women. So, the parents of girls, belonging to the backward classes and to the Scheduled Caste and Scheduled Tribe communities, who completes their education upto the matriculation level are afraid to send their daughters to schools that are located a few kilometres away because of security reasons. We have a law in this country that stipulates the age of marriage of boys and girls. The prescribed age limit for marriage, according to the law, is 21 years for boys and 18 years for girls. But in the remote villages, because of security concern of parents for their daughters, they get their daughters married before the prescribed age limit.
Madam, poverty and unemployment are two other main reasons and causes for this. What we need is awareness amongst people. Awareness should be created in the villages, amongst the down-trodden people, people belonging to the Scheduled Caste and Scheduled Tribe communities and people living below the poverty line. There are Anganwadi workers; there are the Ashas, the medical employees and also the NGOs working in the rural field. They have been given the responsibility for creating awareness amongst masses about the ill-effects of early marriage. Population stabilisation can be brought about by bringing in awareness not only in the health department, but also in the departments of education, rural development and all other allied departments. We can achieve the goal of population stabilisation if we provide facilities in all these sectors.
All political parties and people cutting across caste, creed and religion should come together to achieve this goal. Population stabilisation is a challenge to the people of India. With increased population there is mal-nutrition amongst the people. So, the point that I would like to make is that there should not only be a discussion in the Parliament, but the policies should be implemented and the people belonging particularly to the backward classes, the people belonging to the Scheduled Castes and Scheduled Tribes and living below the poverty line should be made aware of the ill-effects of population de-stabilisation.
*SHRI PRASANTA KUMAR MAJUMDAR : Respected madam chairperson, at the very outset I would like to say that India was the first country to adopt a population policy with the aim to check population growth. But for the last 34 years, this issue was being overlooked. Today, Hon. Minister of Health has taken the right initiative to raise this important subject for discussion in this august House and I congratulate him for that and hope in the future more such discussions will take place.
We all know that if the population of a country in not kept under check, economic development cannot be brought about. Yesterday we had discussed the issue of price rise and one of the major causes of such price escalation is increasing population. India is the second largest populated country in the world after China and by 2030 Indian population will cross the Chinese number causing a population explosion – the figure will become 1.59 billion. The rate of population growth in India is 1.93; crude birth rate per thousand in 27; crude death rate per thousand is 9; fertility rate is 3.3; infant mortality rate per thousand is 72 and the average age of the Indians is 62 years. Not only that, maternal mortality rate is very high – every year more than one lakh women die while delivery. The reason is complications during pregnancy. About 2 crore 70 lakh babies are born each year out of which 15 lakh babies die. The reason for this is early marriage of girls. They conceive at a tender age and there is also no spacing between two child births. Various diseases, malnutrition and unsafe abortion are the causes of mishaps and deaths.
We have seen in China, Bangladesh, Iran the policy of single child is prevalent Infact Iran has a particular rule under which the newly wed couples are to go for compulsory contraceptive courses before obtaining a marriage certificate in order to check population growth. Likewise, India should also have some kind of regulation is place. However, we are not in favour of strict regulation but the Government can evolve a balanced mechanism to arrest exponential growth of population.
What is the reason for such high birth rate in this country? The reasons are illiteracy and less awareness, poverty, backwardness, unemployment. Lots and poverty; they do not know how to read or write and in turn do not care for population control. Thus they give birth to more and more children.
Though the Government has adopted various schemes in this respect like family planning service, community health service, basket of choice, sterilization and tubectomy programmes, recruitment of ASHAs etc. to bring about population stabilization, much more needs to be done. There is also the Population Stabilization Fund. National Rural Health Mission has been initiated to provide better basic healthcare facilities to the poor people of the rural areas with the aim of taking care of the issue of rising population.
We know that there is a policy of ‘We two, ours two’ (hum do, hamare do) in this country but actually this policy in not followed everywhere. Karnataka has successfully implemented this policy and has been able to arrest increasing population growth.
So I suggest that awareness should be spread; people should be educated more and more; human development should be the first priority; gender equality should be established; health of mothers and babies should be taken care of. This issue of population control and stabilization must be treated as a movement – a movement for a better socio-economic environment – a movement with the same zeal and fervour as in any religious congregation will be able to remain on the fast track of development.
Madam, with these words, I thank you for allowing me to participate in this debate and conclude my speech.
डॉ. संजय जायसवाल (पश्चिम चम्पारण): सभापति महोदया, आपने मुझे इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने की अनुमति प्रदान की, इसके लिए मैं आपके प्रति आभार व्यक्त करता हूं। मैं केवल दो मिनट बोलूंगा।
मैं स्वास्थ्य मंत्री जी का बहुत आभारी हूं, क्योंकि जब से वे स्वास्थ्य मंत्री बने हैं, तब से उन्होंने मीडिया में हमेशा पॉपुलेशन कंट्रोल की बात उठाई है और मैं उन्हें साधुवाद देना चाहता हूं कि आज यहां उस मैटर पर डिसकशन हो रहा है। मुझे तब बहुत खुशी होती, जब सांसद भाषण देने के लिए खड़े होते हैं, वे अपने बच्चों की संख्या के बारे में भी बताते। इससे कम से कम देश में एक मैसेज जाता। मैं अपनी बताता हूं कि मेरे दो बच्चे हैं।
महोदया, जिन आठ स्टेटों की बात कही जा रही है कि वे पीछे छूट गए हैं, उसमें आपको सबसे पहले यह समझना होगा कि वे पीछे क्यों छूटे हैं। इनके पीछे छूटने का सबसे बड़ा कारण हैं- गरीबी और अशिक्षा। जब तक गरीबी और अशिक्षा से उबरेंगे नहीं, तब तक ये पीछे रहेंगे और इन्हें गरीबी और अशिक्षा से ऊपर लाना आपके मंत्रालय के लिए बहुत मुश्किल काम है। यह तो पूरी सरकार का काम है और इसमें बहुत समय लगेगा, लेकिन इन जगहों पर हम कम से कम इंसेंटिव दे सकते हैं।
महोदया, आज हम हर काम को लाभ और हानि की दृष्टि से देखते हैं, फिर चाहे कोई भी काम हो। आज अगर हम कोई राजनैतिक कदम भी उठाते हैं, तो उसमें भी लाभ और हानि देखते हैं। एन.आर.एच. एम. में बच्चा पैदा करने के लिए 1600 रुपए दिए जाते हैं और बच्चा बन्द करने के लिए 500 रुपए दिए जाते हैं। अब आप ही बताइए कि फायदा किस में है, बच्चा पैदा करने में या बच्चा बन्द कराने में? सबसे पहले आपको एन.आर.एच. एम. की इस सोच को बदलना पड़ेगा। मैं माननीय सुप्रिया सुले जी का आभारी हूं कि उन्होंने जो सतारा की बात कही, वह चीज पहले पूरे हिन्दुस्तान में लागू करनी चाहिए। एन.आर.एच. एम. का एक इश्यू होना चाहिए कि जो बच्चे बन्द कर रहे हैं उन्हें हम ज्यादा इंसेंटिव दें, लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है।
महोदया, मैं एक चिकित्सक रह चुका हूं और सरकारी अस्पताल में भी एक डॉक्टर के रूप में कार्य कर चुका हूं। मैं एक बात आप सभी को बताना चाहूंगा कि मेरे यहां सरकारी अस्पताल में एन.आर.एच. एम. यानी जननी बाल सुरक्षा का जिस दिन पैसा बंटता है, उस दिन मेला सा लग जाता है। मैंने स्वयं एक महिला को दूसरी महिला से यह कहते हुए सुना है कि देखो, वह तीसरी महिला कितनी भाग्यशाली है कि तीन महीने में वह दुबारा प्रिगनेंट हो गई। हमें पहले यह सोच बदलनी होगी। हम यहां बैठकर यह सोच लेते हैं कि गरीब बहुत बच्चे पैदा कर रहे हैं और उन पर भार पड़ रहा है, लेकिन गरीबों से आप पूछिए, जब वह पांच बच्चे पैदा करता है, तो वह यह नहीं सोचता कि उस पर भार बढ़ रहा है, वह तो यह सोचता है कि मैं अपने पांच हाथ और क्रिएट कर रहा हूं। सबसे पहले हमें इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है। वह सोचता है कि पांच बच्चे होंगे तो पांचों खेत में काम करेंगे और ज्यादा पैदा करेंगे। आप उसे कुछ भी समझाइए, वह नहीं समझता। इसलिए सबसे पहले जरूरी है शिक्षा देने की और उसकी गरीबी दूर करने की।
महोदया, जो हम प्रचार करते हैं, मुझे लगता है कि उस पर हमें ज्यादा ध्यान देना चाहिए। हिन्दुस्तान में जो आई.ए.एस और आई.पी.एस. ऑफीसर हैं या जो 10 लाख रुपए प्रति वर्ष से ज्यादा कमाने वाले हैं और 50 साल से कम के जितने भी सांसद हैं, एक बार उनके कितने बच्चे हैं, यह डाटा लीजिए और रिलीजन वाइज डाटा लीजिए, फिर चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान। जो भी अमीर हैं या पढ़े-लिखे हैं, वे दो या दो से कम ही बच्चे पैदा कर रहे हैं और जो गरीब हैं, वे ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हैं। आप उनके सामने यह एग्जाम्पल रख सकते हैं कि इस कॉम में इतने आई.ए.एस. हैं, इतने आई.पी.एस. हैं और इतने मंत्री हैं, इनके कितने कम बच्चे हैं, फिर तुम क्यों ज्यादा बच्चे पैदा कर रहे हो?
मैं आपका ध्यान पुनः एन.आर.एच. एम. में जो आपने 1600 रुपए फिक्स किए हैं, उसकी तरफ दिलाते हुए कहना चाहता हूं कि आपने उसकी आत्मा की हत्या कर दी है। एन.आर.एच.एम. का मुख्य उद्देश्य था कि जब पहली बार महिला तीन महीने की गर्भावस्था में अस्पताल आए, तो उसे 100 रुपए मिलेंगे। उसके बाद छः महीने की गर्भावस्था में आएगी, तो 200 रुपए मिलेंगे और जब डिलीवरी होगी, तो 400 रुपए मिलेंगे। इसके बदले हर जगह क्या हो रहा है कि बच्चा जब पैदा हो जाता है, तो उसे 1600 रुपए दे देते हैं। इसलिए नौ महीने तक कोई आशा ध्यान नहीं देती है कि वह महिला को अस्पताल ले जाए या उसे पहले दिखाए। ऐसा नहीं होने के कारण ही हमारी मैटर्नल मॉर्टेलिटी रेट और इन्फैंट मार्टेलिटी रेट नहीं घट रही है।
क्योंकि आशा कार्यकर्ता अस्पताल में वेट करती है कि कब मेरे गांव की महिला आएगी, उसका बच्चा पैदा होगा, हम रजिस्ट्रेशन कराएंगे और पैसा लेंगे। इसीलिए इसका बिल्कुल फर्म नियम होना चाहिए कि जब तक उसकी पहली बार जांच नहीं हो तो यह पैसा कट जायेगा, दूसरी बार नहीं हो तो यह पैसा कट जायेगा, क्योंकि एन.आर.एच.एम. की आत्मा में यह शामिल था और जब पैसे कटने की बात होगी तो वह खुद आशा कार्यकर्ता महिला को लेकर हर हालत में अस्पताल जाएगी और मोर्टेलिटी रेट और इन्फेंट मोर्टेलिटी रेट दोनों में सुधार होगा।
इसके बाद मैं चाहूंगा कि 2012 में जैसे सर्वशिक्षा अभियान आ रहा है तो क्यों नहीं हम 2012 में एक टार्गेट फिक्स करते हैं कि अब तक जो हो गया सो हो गया, लेकिन 2012 के बाद जिसके भी दो से ज्यादा बच्चे पैदा होंगे, उन्हें हम सांसद, विधायक नहीं बनने देंगे, उन्हें बी.पी.एल. परिवार का लाभ नहीं मिलेगा। वहीं अगर कोई दो बच्चे से पहले कोई बच्चे बन्द कराता है तोउसे इन्दिरा आवास योजना में दो यूनिट्स एलाट करेंगे। इससे गरीबों को एक इन्सेंटिव मिलेगा।...( व्यवधान) यह 2012 के बाद के लिए है। मैं भी वही कह रहा हूं।
आपको गरीबों को इन्सेंटिव देने की जरूरत है, अमीर और पढ़े-लिखे तो खुद ही ठीक हैं। आप कहीं पर भी वह रेश्यो उठा लीजिए, उनका रेश्यो ठीक है। वैसे ही आप इन्कम टैक्स में रिबेट दीजिए, जो दो या एक बच्चे पैदा करते हैं। अब जैसे आप महिलाओं को अलग से रिबेट देते हैं, आप कम बच्चे वालों को भी रिबेट दीजिए। इसी तरह से 10 हजार रुपये जैसे माइनोरिटीज़ को टेंथ पास करने के ऊपर इन्सेंटिव दिया जाता है, गांव में कोई भी लड़की अगर दसवीं कक्षा पास करती है और वह अनमैरिड होती है तो हम उसे भी 10 हजार रुपये दें। आप उससे बहुत बड़ा पोपुलेशन कंट्रोल कर लेंगे, लैजिस्लेशन से तो आप कंट्रोल करके देख चुके। आप यह फिक्स कीजिए कि टेंथ क्लास जो गांव की लड़की पास करती है और अनमैरिड है, हम उसे 10 हजार रुपये इन्सेंटिव देंगे। वह 12वीं कक्षा पास करती है तो हम फिर उसे 10 हजार रुपये देंगे। इससे जो 18 साल की लड़कियां हैं, उनको फायदा होगा। अब तक आपको कोई फायदा नहीं हुआ, लेकिन इन्सेंटिव देने से जरूर पोपुलेशन कंट्रोल होगा।
मैंने बिहार में देखा है कि 2005 तक पांच बजे शाम के बाद महिलाओं को तो छोड़िये, कोई पुरुष तक बाहर नहीं निकलता था और अमेरिका जैसे देश में 9/11 के बाद जब फर्टिलिटी रेट बढ़ गया तो बिहार के जिस गांव में पांच बजे के बाद जब पुरुष और महिलाएं बाहर नहीं निकलेंगी तो फर्टीलिटी रेट तो बढ़ना ही है। हमने अभी क्या किया है कि बच्चियों को नवीं कक्षा में एक-एक साइकिल दी है, नवीं कक्षा में जो बच्ची आ जाती है। उसके चलते हम गांवों में देख रहे हैं कि आज पचासों लड़कियां साइकिल लेकर गांवों में निकलती हैं तो हमें भी बहुत अच्छा लगता है। उसी तरह से हमें एक तरफ इन्सेंटीवाइज़ करने की जरूरत है और जो सरकारी नौकरी में हैं, अगर वह तीसरा बच्चा पैदा करता है, जब वह हमारी नेशनल पॉलिसी के खिलाफ है तो हम क्यों नहीं उसकी सी.आर. से एक प्रमोशन काट लेंगे। इसी तरह से पहले से यह नियम रहेगा तो कोई तीसरा बच्चा पैदा नहीं करेगा, इसलिए थोड़ा सा हार्ड होकर और सॉफ्ट होकर इन्सेंटिव, दोनों देकर हम इस कानून में बहुत कुछ सफल हो सकते हैं।
SHRIMATI BOTCHA JHANSI LAKSHMI (VIZIANAGARAM): Madam. Chairman, Sir I thank you for giving me an opportunity to speak on this very important subject.
First of all, I would like to congratulate the hon. Minister of Health for his serious commitment and concern to move this motion in this august House.
Since independence controlling and stabilization of population growth is one chief focus area of any Government. In spite of all the efforts, the population of the country has increased from 53 crore in 1901 to 101 crore in 2001, in 2009 to 119.8 crore and growing at a rate of 1.4 per cent over the last five years; and I am afraid, if it grows at this rate, India will overtake China by 2050. If this happens in the next forty years, sustainable development will be unattainable in our country. Then, all the economic development will be of no use. All the hon. Members have touched the point about the seriousness of this problem.
This is a serious problem and continues to be so. For all the problems our country is facing, we say the reason is population explosion. Even our hon. Health Minister said while initiating this discussion that population is also one main reason for price rise in our country.
If we go back to the year 2000, it would be clear that the immediate objective of the National Population Policy, 2000 is to address the unmet needs for contraception, health care infrastructure and health personnel, and to provide integrated service delivery for basic reproductive and child health care. The medium-term objective is to bring the TFR (Total Fertility Ratio) to replacement levels by 2010 through the vigorous implementation of inter-sectoral operational strategies. In this connection, I would like to mention that the long-term objective is to achieve a stable population by 2045, at a level consistent with the requirements of sustainable economic growth, social development and environmental protection.
If we go a little back to 1953, it would be clear that the Family Planning Research and Programme Committee, in its first meeting in July, 1953 took a comprehensive and broad view and I quote from its report:
“The Committee emphasized that the family planning programmes should not be conceived of in the narrow sense of birth control or merely of spacing of birth of children. The purpose of family planning was to promote, as far as possible, the growth of the family as a unit or society, in a manner designed to facilitate the fulfillment of those conditions which were necessary for the welfare of the unit from the social, economic and cultural points of view. The functions of a family planning centre include sex education, marriage counseling, marriage hygiene, spacing of children and advice on such other matters, including on infertility, as necessary to promote welfare of the families.” It is a pity that it paid a lip-service to the rationale and sane advice of the Family Planning Research and Programme Committee in 1953 and instead adopted disjointed, verticalised and top-down contraceptive programmes with targets of sterilization integrated with maternal child health, nutrition, etc. The programmes have not yielded the desired results. On the other hand, issues like gender equity, malnutrition and lack of reproductive rights and choices are key factors contributing to the population growth. For example, the sex ratio stands at 933:1000. As a population stabilization policy, if we go in for a one-child norm, it would further lead to female infanticide and foeticide. In other words, population control has discouraged the birth of girl child. In view of the high infant mortality rate, going in for the one-child norm is also not desirable. For example, in 1961, the IMR was 115 per thousand live births. The current all-India average is 50 per thousand. However, in most developed countries, it is less than five. Population and demographic stabilization, and female literacy play a crucial role. For example, in the State of Kerala, the sex ratio is 1058 per thousand. The infant mortality rate is also very less because all are very well educated. Our State also implements the Girl Child Protection Scheme to curtail foeticide.
For the overall development of the family, it is just not the birth control but the economic development of the women with literacy which is important. This we should start from the lower socio-economic strata of women. An educated woman with self-sufficient economic status is in a better position to take the family forward in the economic development.
It is pertinent to recall what Norman Borlaug, the lone Nobel Laureate in Agriculture and the man credited with feeding the humanity has said in 1970 in his acceptance speech. I quote:
“There can be no permanent progress in the battle against hunger until the agencies that fight for increased food production and those that fight for population control unite in a common effort. Fighting alone, they may win temporary skirmishes, but united, they can win a decisive and lasting victory to provide food and other amenities of a progressive civilization for the benefit of all mankind.” It is not only true of food production but also about providing quality of life to the people, which involves efficient management of the natural resources which are very scare in our country. … (Interruptions) We have the world’s largest illiterates and children and women suffering from malnutrition.
The UNDP has placed India at 134th rank in terms of human development indices.
MADAM CHAIRMAN : Nothing will go on record.
(Interruptions) … * MADAM CHAIRMAN : Nobody is concluding in one or two minutes. This is not correct.
… (Interruptions)
MADAM CHAIRMAN : I request all the hon. Members, who want to speak, to speak only for one minute. Please cooperate with the Chair. Otherwise, I will call the hon. Minister to reply.
श्री आर.के.िंसह पटेल (बांदा): सभापति महोदया, मैं मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने इस महत्वपूर्ण विषय पर यहां चर्चा करवाने का मन बनाया और इसके लिए भी धन्यवाद कि उन्होंने 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस पर सब माननीय सांसदों को मुंतखब बनाने का आदेश जारी किया। इस विषय पर बहुत सी बातें आई हैं। मैं बात को ज्यादा लम्बा नहीं करना चाहता। मैं एक शेर के साथ अर्ज करना चाहता हूं -
तमन्ना सच्ची होती है तो रास्ते निकल आते हैं और तमन्ना झूठी होती है तो बहाने बन जाते हैं।
अगर आप सच्ची तमन्ना लेकर बर्थ कंट्रोल की बहस में आए हैं तो मेरा अनुरोध है कि आप सरकार में बैठे हैं और तमाम ऐसी योजनाएं हैं जिनका लाभ आम आदमी तक जाता है। अभी हमारे माननीय सदस्य ने एक योजना बताई। गांवों में आशा बहु होती है। आप एक बच्चा पैदा करवाने के लिए 1600 रुपये इनाम देते हैं। हम कहते हैं कि 1600 रुपये की बजाए 16,000 रुपये इनाम दे दीजिए। लेकिन यदि कोई एक बच्चा पैदा करे तो उसे 16,000 रुपये, दूसरा बच्चा पैदा करे तो कोई इनाम नहीं और तीसरा बच्चा पैदा करे तो उसे भारत सरकार द्वारा दी गई सारी सुविधाओं से वंचित कर दिया जाए। अगर इस तरह का कोई कड़ा कानून बनाएंगे तो कुछ होगा। कानून दो तरह से लागू होता है - भय और लालच। भय आप दे नहीं सकते इसलिए लालच दीजिए। हमारे देश में लालच काम करता है। यदि आप लालच देकर ऐसा काम करेंगे तो निश्चित तौर पर जनसंख्या वृद्धि पर कंट्रोल होगा।
श्री विजय बहादुर सिंह (हमीरपुर): सभापति महोदया, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देना चाहता हूं। समय बहुत कम है, इसलिए मैं एक बात रिपीट नहीं करूंगा और न ही एक आंकड़ा देना चाहूंगा। मैं एकदम एसैंस की बात बताना चाहता हूं। मैं एसैंस बताने से पहले यह बताना चाहता हूं कि बहुजन समाज पार्टी की गंभीरता देखिए कि हम इसमें पूरी स्ट्रैन्थ से हैं। इससे यह जाहिर होता है कि इसका कानून से कोई मतलब नहीं है। इन्होंने एक बार कानून बनाया था तो once bitten twice shy, एकदम साफ हो गए थे। इसमें सामाजिक परिवर्तन होगा। मैं आजाद साहब से सौ प्रतिशत एग्री करता हूं कि यह व्यवस्था कानून से नहीं होगी। अगर हम युद्ध स्तर पर जुट जाएं, इन्होंने जिस तरह बढ़िया आरग्यूमैंट पेश किया कि जब हम लोग दो महीने में सरकार पलट देते हैं, अगर वह इच्छा सबमें आ जाए, मैं इलैबोरोट नहीं करता, इसे पांच हिस्सों में बांटना चाहता हूं। पहला, यह वॉलंट्री होना चाहिए। यह स्टे आर्डर और कानून से नहीं हो सकता, प्रेम वाली बात है। दूसरा, अवेयरनैस। मेरा फार्म हाउस है और मैं पेशे से इलाहाबाद में 38 वर्षों से लॉयर हूं। गांवों में गरीब लोग पूछते हैं कि कंट्रासैपटिव मिलता कहां है। वे जानते ही नहीं हैं। इन्होंने जो योजना बनाई है, अगर घर-घर में कंट्रासैपटिव पहुंचा दें तो इसका रिज़ल्ट तुंत आ जाएगा। तीसरा, जो टैक्नीकल एडवांसेज़ हैं।
जैसे एक बार बात आयी थी कि फैमिली प्लानिंग का जो आपरेशन होता है, सभापति जी, शायद इसे आपने ही बताया था कि महिलाओं में वह 95 परसेंट और पुरुषों में एक या दो परसेंट होता है। इसका भी लेटेस्ट टेक्नोलॉजिकल डेवलपमैंट होना चाहिए। लेकिन असली दो बातें हैं। आप रिवार्ड दीजिए और इंसेंटिव में दूसरे को पनिश मत कीजिये। जिसका एक बच्चा है, मुझे एक बार चीन जाने का मौका मिला। मैंने वहां की फर्स्ट सैक्रेट्री से बात की, तो उन्होंने बताया कि वहां दूसरे बच्चे के बारे में कोई कल्पना ही नहीं कर सकता। उनको न एडमिशन मिलता है, उनकी स्कॉलरशिप कट जाती है, उनको सर्विस में प्राब्लम होती है। आप रिवार्ड्स को बढ़ा दीजिए। आप रिवार्ड्स को इतना ज्यादा बढ़ाइये कि उसका रिजल्ट आ जाये। आप एडमिशन में, उनकी सर्विस में, बैंक लोन्स में उनके रिवार्ड्स को बढ़ा दीजिए। अंत में एजुकेशन का मुद्दा आता है। ...( व्यवधान) कांग्रेसी लोग समझ नहीं पायेंगे। ...( व्यवधान)
सभापति महोदया : आप दूसरी बात मत कीजिए।
…( व्यवधान)
सभापति महोदया : आप अपनी बात समाप्त कीजिए।
…( व्यवधान)
श्री विजय बहादुर सिंह : इनकी गलती नहीं है क्योंकि ये घबरा रहे हैं।...( व्यवधान)
सभापति महोदया: आप अपनी बात पूरी कीजिए।
…( व्यवधान)
श्री विजय बहादुर सिंह : मैं आजाद साहब को बधाई देता हूं कि इन्होंने कितना ब्रेव कदम लिया है कि 33 साल बाद कम से कम इनमें क्षमता आयी।
अंत में मैं आपके माध्यम से बताना चाहता हूं कि हमारे उत्तर प्रदेश में, मुख्य मंत्री जी ने ...( व्यवधान) वही राज करेंगी, आप घबराइये नहीं। जो लड़की हाई स्कूल पास करती है, उसे दस हजार रुपये और साइकिल देते हैं। जो लड़की इंटरमीडिएट में जाती है, उसे पन्द्रह हजार रुपये देते हैं और अगर लड़की पैदा होती है, उसके नाम से एक लाख रुपये का बीमा हो जाता है और जब वह 18 साल की होती है, तो उसे एक लाख रूपये मिलते हैं। इससे भ्रूण हत्या और सैक्स को किल कराने का मामला खत्म होगा। हम अपना स्वार्थ देखते हैं। ...( व्यवधान)
सभापति महोदया : आपको बोलते हुए पांच मिनट से ज्यादा हो गए हैं, इसलिए अब आप अपनी बात समाप्त कीजिए।
…( व्यवधान)
श्री विजय बहादुर सिंह : आप इतनी लंबी बहस कर रहे हैं। इसको आप इम्प्लीमैंट कीजिए और कानून से मत कीजिए। आप इस बारे में अवेयरनैंस कराइये और बेस बनाइये। ...( व्यवधान)
सभापति महोदया : कमल किशोर जी, आप बोलिये।
श्री विजय बहादुर सिंह : मैं दूसरी बात बताना चाहता हूं।
सभापति महोदया : विजय बहादुर सिंह जी, अब आपकी कोई भी बात रिकार्ड में नहीं जा रही है, इसलिए आप बैठ जाइये।
केवल कमल किशोर जी की बात ही रिकार्ड में जायेगी। उसके अलावा किसी की कोई बात रिकार्ड में नहीं जायेगी।
...( व्यवधान)* श्री कमल किशोर कमांडो (बहराइच): सभापति महोदया, आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं स्वास्थ्य मंत्री जी को बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं, जो बहुत हिम्मत जुटाकर इस प्रस्ताव को सदन मे लाये हैं। यहां बहुत सारी बातें हो गयीं जिन्हें मैं सुनता रहा। सबसे बड़ी बात यह है कि अगर जनसंख्या को रोकना है, तो शिक्षा जरूरी है। मैं जिस इलाके से आता हूं या जिन इलाकों में घूमकर देखा है, हिन्दुस्तान के चारों तरफ मुझे नहीं लगता है कि कोई भी ऐसा इलाका है, जिसे मैंने न देखा हो। जो लोग केवल झुग्गी-झोंपड़ियों में रहते हैं, वहां से संख्या बढ़नी शुरू हो जाती है। आप लोग अपनी आंखें खोलकर देखिये। गरीबी तभी दूर हो सकती है जब सबको शिक्षा मिलेगी। शिक्षा पर अगर हम लोग ध्यान देंगे तो आटोमेटिकली जनसंख्या पर बिल्कुल असर पड़ेगा।
अभी माननीय सदस्य बात कर रहे थे। मैं उत्तर प्रदेश की बात करना चाहता हूं जहां आज भी लोग जंगलों में वास करते हैं। वनवासी, जहां वनगांवों में आज भी वास करते हैं, उन वनगांवों में आज छोटी झोंपड़ी डालकर एक परिवार, जहां अपंग लोग रहते हैं, उनके चार-चार बच्चे हैं।
इसका कारण यह है कि वे शिक्षित नहीं हैं। अगर हम शिक्षा पर ज्यादा ध्यान देंगे तो निश्चित रूप से यहां की आबादी कम होगी। अभी बीएसपी के माननीय सदस्य बोल रहे थे, वह समय याद कीजिए जब इंदिरा गांधी जी ने इस तरह का कदम उठाया था, उस वक्त हम लोगों को बड़ी हार का सामना करना पड़ा था। मैं वर्ष 1976-77 की बात कर रहा हूं। ...( व्यवधान)
MADAM CHAIRMAN : Shri S.K. Bwiswmuthiary ji.
… (Interruptions)
श्री कमल किशोर ‘कमांडो’ : आज हमारे स्वास्थ्य मंत्री जी ने यह कदम उठाया हुआ है।...( व्यवधान)
MADAM CHAIRMAN: Nothing will go on record.
(Interruptions) … * श्री कमल किशोर ‘कमांडो’ (बहराइच) : मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
MADAM CHAIRMAN: Shri S.K. Bwiswmuthiary ji, speak for only two minutes; not more than that.
SHRI SANSUMA KHUNGGUR BWISWMUTHIARY (KOKRAJHAR): Madam, on 23rd of July, last month, there was a meeting at Room No. 53 among different political Parties, and it was decided that a single-Member Party will be allowed to speak sufficiently.
आपने मुझे इस मामले के ऊपर कुछ बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं और साथ ही साथ वर्तमान स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री श्री आजाद जी को मैं बधाई देना चाहता हूं। हिन्दुस्तान की जनसंख्या में आज जो विस्फोट हुआ है, वह देश के लिए एक बहुत खतरनाक स्थिति बन गयी है। यहां बैठै हुए जितने आदरणीय सांसदों ने अपने परामर्श दिए हैं, मैं उन सभी से सहमत हूं, लेकिन मेरा कहना है कि जबर्दस्त, खतरनाक कानून बनाकर, उसे इम्पोज करके इस मिशन को कभी सफल नहीं कर पाएंगे। It can be done only through voluntary persuasion. Here again I would like to say कि अगर कोई जबर्दस्त कानून बनाकर हिन्दुस्तान के लोगों को अगर दबाना चाहे, इम्पोज करना चाहे, तो करे, लेकिन हमारे अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों ऊपर उसको कदापि लागू नहीं करना चाहिए। आज हिन्दुस्तान में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति लोगों की आबादी इतनी ज्यादा नहीं है। आज हिन्दुस्तान में जितनी बड़ी-बड़ी पोलिटिकल पार्टीज हैं, जितने बड़े नेता हैं, उनकी सोच में भी बदलाव लाना होगा। आज क्या हो रहा है? इस हाउस में 545 सांसद हैं, जब मंत्रिमंडल बनाते हैं, कुछ संवेदनशील मुद्दों पर जब बहस या चर्चा होती है, तो नंबर-गेम चलता है। अगर आप इस कल्चर को हमेशा लागू करते रहेंगे, then why would the tribal people of India reduce their population? Rather they would try to increase their population.… (Interruptions)
What is happening nowadays in the State of Assam? नेचुरल ग्रोथ के कारण से हिन्दुस्तान की जनसंख्या वृद्धि में इतनी खतरनाक सिचुएशन पैदा नहीं हुई। Apart from the natural growth, there is unnatural growth of the population by way of huge influx of illegal migrants into Assam from the neighbouring countries like Bangladesh etc. . वहां के जितने इंडिजनस लोग हैं, उनकी हालत बहुत खराब है। What kind of policy the Government of India is going to adopt in this regard? This is my vital question. What kind of medical and health care facilities, what kind of educational facilities are going to be given to the backward and tribal areas? This is a very vital question.… (Interruptions)
MADAM CHAIRMAN: Nothing else will go on record.
(Interruptions) … * श्री सानछुमा खुंगुर बैसीमुथियारी : मैडम, इसी के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
*SHRI J.M. AARON RASHID (THENI): In India/ China population is increasing. We have to bring awareness among the people and the important community leaders. A government consultation among the leaders of community can be called for in all districts. Because of over population our people are not getting jobs. We are going to foreign countries like Singapore/ Malaysia/ Dubai/ Saudi Arabia etc. There they are exploited. We have to see that other human resources should be strengthened. The NDA is particularly speaking about minorities for population growth. It is really not the old days of thakurs giving birth to 10 to 14 children. We have to bring awareness of population growth in remote villages and hilly areas where SC/ ST/OBC and minorities are living. Going on accusing a particular community is not fair on our part. Now minorities are giving birth to one or two children only in these days. It is very difficult to maintain the family, to give education and getting jobs. Minority has been sidelined.
I request the Government of India to give job reservation to minorities as you have already given to SC/ST.
The Government should encourage small families who are having one or two children by giving free education and government job assurance. Rural hospitals are there but without doctors / nurses and adequate medicines. The UPA Government should bring all rural hospitals on line and doctors and other staffs attendance should be strictly maintained in the larger interest of our country.
By going on bringing computer revolution in all sectors, many will become jobless like in US/ USSR. The Government have to stop child marriages. The Government should bring awareness programmes through NGOs and other social welfare organizations. Our population growth is increasing like China and in another 10 years we may cross China also.
If population increases, the government also have many things to do – to give water, electricity, good food and other facilities like education/ job / house etc. To avoid all these, the Government have to bring good schemes and incentives to those who have only one children. If they have two, somewhat less so that the family may not have more than two children. I welcome this motion and with these words I conclude.
20.00 hrs. सभापति महोदया : आठ बज रहे हैं,अभी एक और माननीय सदस्य को अपनी बात कहनी है। मैं उनसे निवेदन करूंगी की वह एक मिनट में अपनी बात समाप्त करें। उसके बाद मंत्री जी जवाब देंगे इसलिए हम सदन का समय आधा घंटा और बढ़ाकर साढ़े आठ बजे तक कर देते हैं।
डॉ. प्रभा किशोर ताविआड (दाहोद): सभापति महोदया, मैं आपकी बहुत आभारी हूं कि आपने मुझे इस विषय पर बोलने का अवसर प्रदान किया। मैं एक गायनोक्लोजिस्ट हूं। मुझे आज बहुत खुशी हुई कि सदन में आज से 35 साल पहले इंदिरा जी ने बहुत दूरदर्शिता दिखाई थी और इस मुद्दे को रखा था। आज फिर उस विषय को यहां उठाया गया है, मैं उसकी प्रशंसा करती हूं और मुझे इस बात की बहुत खुशी है। अगर उस समय जो अभियान इंदिरा जी ने शुरू किया था, अगर उस पर अमल किया जाता, तो आज भारत की तस्वीर कुछ और होती। इस अवधि में गंगा में पानी बहुत बह गया और हिन्दुस्तान की आबादी भी बहुत बढ़ गई। आज कहा जाता है - हम दो, हमारे दो। मैं मंत्री जी को बधाई देते हुए एक अन्य स्लोगन देना चाहती हूं -पहला बच्चा अभी नहीं और दो के बाद कभी नहीं। अगर हम इस पर अमल करें, तो आबादी पर कंट्रोल किया जा सकता है। वैसे हमने इस सम्बन्ध में काफी बातें की हैं, लेकिन मैं एक बात कहना चाहूंगी। Education is an important factor; employment is also an important factor. We can extend the facility of compulsory and free education for ladies up to the age of 18 years. Priority is to be given to ladies in employment. Supposing, there is one vacancy and for it one girl and one boy have applied, priority should be given to the girl.
Madam, you would find that the ladies who are doing jobs are always adopting the family planning. At the level of Zila Panchayat, Taluka Panchayat and Gram Panchayat, we are implementing two child norm. But you would find that many MPs and MLAs are not following this norm. Even persons in the Government services are not adopting this norm. I have seen even so many Class I officers who are having three to four children. This is the situation now.
In regard to पहला बच्चा अभी नहीं और दो के बाद कभी नहीं, temporary means are very effective, like copper-T etc. I know it because I am a gynaecologist. Many incentives are being given.
I know time is very less and so many speakers are still there to participate. In the end I would say that if we create awareness, everybody would start following these norms in each and every castes and community. I have seen it happening. I was practising in Godhra and I saw these family planning measures implemented there.
With these few words, I conclude.
* श्री नारायण सिंह अमलाबे (राजगढ़): आज जनसंख्या स्थिरीकरण प्रस्ताव जो स्वास्थ्य मंत्री जी ने रखा है, मैं उसका स्वागत करता हूं और इसके बारे में अपनी बात कहना चाहता हूं।
1. जनसंख्या स्थिरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए बालिका शिक्षा के लिए केन्द्र सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। उससे जागरूकता आएगी और आने वाले समय में निश्चित रूप से जनसंख्या स्थिरीकरण का जो कदम उठाया है, उसमें सफलता मिलेगी।
2. गरीबी भी बढ़ती जनसंख्या का एक कारण है। महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना जब से चली है, उसके बाद बेरोजगारी मिटने लगी है, लोगों को रोजगार और सारी सुविधाएं मिल रही हैं, पूरे देश में गरीबी कम हो रही है और इसके साथ ही साथ जागरूकता भी आ रही है। निश्चित रूप से इस योजना का लाभ मिलेगा और इससे बढ़ती जनसंख्या पर रोक लगेगी, जागरूकता आएगी।
3. ग्राम पंचपायतों में जो महिला आरक्षण लागू हुआ है, उससे भी जनसंख्या पर रोक लगेगी।
4. राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना के अंतर्गत गांव-गांव तक बिजली पहुंचेगी और टीवी एवं मनोरंजन के साधन जब गांव-गांव में पहुंचेगे और वहां लाइट मिलेगी तो निश्चित रूप से बढ़ती जनसंख्या पर रोक लगेगी।
श्री रमाशंकर राजभर (सलेमपुर):सभापति महोदया, मैं एक बात कहना चाहता हूं कि मंत्री जी ने एक अच्छा कदम उठाया है। लेकिन जो आंकड़े विवाह और मृत्यु दर के सम्बन्ध में आए हैं, उन पर मेरी सरकार से सहमति नहीं है। जब हमारे देश में विवाह का रजिस्ट्रेशन ही नहीं होता। इसलिए 15 वर्ष से 16 वर्ष के और 25 वर्ष से 30 वर्ष की आय वर्ग के आंकड़े कहां से आ रहे हैं? देश में जो आंकड़े आ रहे हैं कि इस प्रांत में इतनी स्थिरता हुई और उसमें इतनी हुई। पोस्ट ग्रेजुएट के आंकड़े इकट्ठा किए जाएं, तो वहां परिवार नियोजन की और परिवार कल्याण की सारी योजनाएं अपने आप पहुंच चुकी हैं। इसलिए कि जहां सरस्वती और लक्ष्मी पहुंच गईं, वहां जनसंख्या में स्थिरता आ गई। लेकिन जहां दरिद्र नारायण है, जहां अंधविश्वास है, वहां काम करने की जरूरत है। जब हमने इस बात को चिन्हित नहीं किया, तो चाहे वह झारखंड हो, यूपी हो या केरल हो या बिहार का हो, डाक्टर या इंजीनियर अगर पूरे देश का है, वहां जनसंख्या रुकी है। लेकिन मनरेगा का मजदूर चाहे केरल का है, चाहे बिहार या यूपी का है, वह जनसंख्या नहीं रोक सका। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि पहले चिन्हिकरण को ठीक किया जाए। जो क्लास चलती है, जो ट्रेनिंग सेंटर्स चलते हैं, जिसे भी आप दरोगा बना देते हैं, उसे उस विद्यालय से आगे काम करने के लिए भेजते हैं और जो वहां दूसरे ट्रेनिंग लेते हैं, वहां उनकी फिर ट्रेनिंग कराते हैं।
जब इस देश में गरीब के पास ही यह समस्या है तो उसका कारण है कि गरीब के अंदर एक लज्जा है। आपने आशा बनाई, उम्र रखी है 18 वर्ष। 18 वर्ष से 25 वर्ष की इस देश की बिटिया जो लज्जा से ओत-प्रोत है वह कभी भी परिवार नियोजन की विधाओं का प्रचार करने गांव में नहीं जा सकती है, उसके अंदर भारत की संस्कृति है, उसके अंदर भारत की सभ्यता है, वह प्रचार करने गांव में नहीं जा सकती है। इसलिए गोपनीय ढंग से गांव के स्तर पर जब आप इसे पहुंचाएंगे, तभी यह संभव हो पाएगा, नहीं तो 80 प्रतिशत लोग जो गांव में निवास करते हैं, जब पांच बच्चों के बाप हो जाते हैं तब उन्हें परिवार नियोजन की विधाओं से जानकारी होती है।
श्री गुलाम नबी आज़ाद : सभापति महोदया, सभी दलों के 29 सांसद इस विषय पर बोल चुके हैं, मैं उन सभी को बधाई देना चाहता हूं। मुझे जो लम्बी बात करनी थी वह मैंने शुरु में ही कर दी, अब में 5-6 मिनट से ज्यादा समय नहीं लूंगा।
जनसंख्या के स्थिरीकरण के प्रस्ताव पर बहस करने का जो लक्ष्य था, वह सवाल-जवाब का नहीं था। यह कोई प्रश्नकाल नहीं है, यह कोई बिल नहीं है जिसमें यह प्रावधान रखा जाए, वह प्रावधान रखा जाए। जैसा मैंने शुरु में कहा था कि यह प्रस्ताव हमने इसलिए रखा कि कई सालों से 34-35 वर्षों से परिवार-नियोजन के बारे में सिर्फ दफ्तरों में चर्चा होती रही, चाहे वे केन्द्रीय सरकार के दफ्तर हों या राज्य सरकार के दफ्तर हों। लेकिन जो असली प्लेटफार्म संसद और विधान सभाए हैं, जिला-परिषद् हैं, जहां कानून बनाए जाते हैं, जहां वातावरण बनाया जाता है, उनके बीच में अगर चर्चा न हो तो आफिसर्स का मन भी खट्टा होता है। मैं ऑफिसर्स को इसका दोष नहीं देता। जब मैंने कहा कि एयर-कंडीशन्ड कमरे में बैठकर काम होता है, तो यह केवल दिल्ली का सवाल नहीं है और यह पिछले 34-35 वर्षों से हो रहा है। किसी भी सरकार की पार्टी क्यों न हो, कोई भी ऑफिसर क्यों न हो, जब उन्होंने देखा कि राजनेता ही इस विषय में रुचि नहीं लेते हैं और आप जानते ही हैं कि सरकार में कर्मचारी और ऑफिसर्स उस काम को ज्यादा लगन से आगे बढ़ाते हैं जिसमें सरकार चलाने वाले नेता और उसके साथ-साथ विपक्ष का रोल हो। आज वह तीस साल वाली राजनीति नहीं है जब इमरजेंसी में यह बात हुई थी। उस समय कांग्रेस का राज था, दिल्ली में अपने बलबूते पर गवर्नमेंट थी और हिंदुस्तान के एक-आध राज्य को छोड़कर सभी राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी। लेकिन आज कोई पार्टी अगर यहां विपक्ष में है तो वह पार्टी, उसी का दल किसी न किसी राज्य में सत्ताधारी पार्टी है। आज सभी विपक्ष में हैं और सभी सत्ताधारी हैं। आज कोई यह नहीं कह सकता कि कौन सत्ता में है और कौन विपक्ष में है।
अगर मैं यहां सत्ता में हूं, तो यूपी में विपक्ष में रहूंगा। अगर यूपी वाले हमारे साथी वहां सत्ताधारी हैं, तो यहां विपक्ष में हैं। सभी पार्टियों में ऐसा ही है। आज की जो जिम्मेदारी है, वह वर्ष 1975 से बिलकुल हटकर है। उस समय केंद्र सरकार और राज्य सरकारें, एक नेता एक नीति थी, लेकिन आज अनेक नेता हैं, अनेक नीतियां हैं, अनेक पक्ष हैं, अनेक विचार धाराएं हैं। इन अनेक विचारधाराओं में हमारे भारत का गौरव है कि हमारे विशाल देश में बहुत धर्म हैं, बहुत भाषाएं हैं, अनेकता में एकता है। यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। यही हमारी ताकत है। विश्व में अगर हमें मान्यता मिलती है, तो इसलिए मिलती है कि अनेकता में एकता हो कर, इतने धर्म इतनी जातियां हो कर हम लोकतंत्र को चला रहे हैं। जो देश दो सौ, तीन सौ, चार सौ साल से लोकतंत्र चला रहे हैं, हम उनसे अच्छा लोकतंत्र चला रहे हैं। उन पर पिछले कई सालों से संदेह हो रहा है, लेकिन हमारे चुनावों पर संदेह नहीं हो रहा है। व्यक्तिगत संदेह हो सकता है, लेकिन समूचे देश पर नहीं हो सकता है। यही हमारी ताकत है, इसी अनेकता में एकता है। इस समय जो हमारी अनेकता है, उसे हम इस मुद्दे को लेकर एकता में बदलना चाहते हैं। एक व्यक्ति या एक पक्ष या एक सत्ताधारी विपक्ष का मसला नहीं है। इतनी अच्छी बातें हुईं, एक पल के लिए भी मुझे यह नहीं लगा कि कौन सत्ताधारी है और कौन विपक्ष का सदस्य है। हम यहां एक घंटे का प्रश्नकाल चलाते हैं या दूसरी चर्चा करते हैं, तो दस बार इंटरअपशन होती है। आज साढ़े पांच घंटे की चर्चा में एक बार भी टकरार नहीं हुई, टकराव नहीं हुआ। यह इस बात का सबूत है कि हम सभी एक मत के हैं। हम सभी को समझ आया है कि जिस रास्ते पर पूरा देश चल रहा है, जिस प्रकार से आबादी बढ़ती जा रही है, अगर यह आबादी इसी स्तर से बढ़ती जाएगी, तो हमारे देश के लिए यह बहुत खतरनाक चीज है। हमारे बच्चों के लिए, आने वाली पीढ़ी के लिए यह बहुत खतरनाक चीज है। यहां उल्लेख हुआ कि कई तरह की बीमारियां हैं, गुंडागर्दी है, बेरोजगारी है, जमीन के लिए झगड़े भी हैं तथा दूसरे भी कई प्रकार के मसले हैं। यदि जमीन छोटी हो जाती है, तो उस पर झगड़े हो जाते हैं। खाने के लिए जमीन पर झगड़े हो जाते हैं। घर बनाने के लिए जमीन पर झगड़े हो जाते हैं। आज सोने और चांदी की कीमत नहीं है। आज जमीन की कीमत है। आज जो बुद्धिमान आदमी हैं, जो पैसा बनाते हैं, वे सोना चांदी खरीद कर घर में रखना नहीं चाहते हैं, बैंकों में पैसा नहीं रखते हैं, बल्कि वे जमीन का टुकड़ा खरीदते हैं कि वह पड़ा रहेगा और 15-20 साल में इससे एक हजार गुना कीमत पर बेचेंगे। आखिर क्यों जमीन की कीमत बढ़ती जा रही है, क्योंकि जमीन कम है और आदमी ज्यादा हैं। आज से पचास साल पहले, सौ साल पहले जमीन की कीमत क्यों ज्यादा नहीं थी, क्योंकि जमीन ज्यादा थी और इस्तेमाल करने वाले लोग कम थे। जमीन को इस्तेमाल करने की जरूरत कम थी।
आज घर बनाने के लिए जमीन नहीं मिलती। हमारे जैसे आदमी जो 30-35 साल से ढूंढ रहे हैं कि कहीं मिले लेकिन जमीन लेने की हिम्मत नहीं है कि मकान बना लें। साधारण आदमी कहां से बनाएगा? हमारे मुल्क में यह स्थिति बढ़ती हुई आबादी की वजह से पहुंच गई है। खतरे की घंटी तो बहुत पहले बज गई थी, अब खतरे की घंटियां बज गई हैं। अब अगर हमें खतरे की घंटियां भी नहीं सुन रही हैं तो हमारे में कोई नुक्स है। मैं विस्तार में चर्चा नहीं करूंगा संक्षेप में बात कहूंगा। मैंने सब चीज विस्तार से देखी है और सब के भाषणों में जो बात है, मैंने उनमें से एक-एक प्वाइंट निकाला है। मैं इस बात पर पहुंचा कि माननीय सदस्यों ने सबसे ज्यादा बात इन्सेन्टिव के बारे में कही है। यह बात अलग-अलग किस्म के इन्सेन्टिव के बारे में है। सहुलियतें, रिवार्ड्स सरकारी नौकरी, बैंक लोन, महाराष्ट्र या यूपी में लड़कियों को शिक्षा देने के बारे में हैं, इन पर सबसे ज्यादा चर्चा हुई है। मेरा लक्ष्य भी यही था और मैंने शुरू में कहा कि जब हम कमरे में बैठकर पॉलिसी बनाते हैं तो हमारे समूचे देश की सोच उसमें नहीं आती। आज सामने आ गया कि इस देश के चुने हुए नुमाइंदे क्या चाहते हैं। एक बात और उभर कर आई है कि बढ़ती आबादी के बहुत से कारण हो सकते है और सबसे बड़ा कारण गरीबी, बेकारी और बेरोजगारी है। यह ज्यादा वहीं भागती है जहां गरीबी है। गरीबी के साथ सब चीजें जुड़ी हैं। गरीब के साथ बीमारी जुड़ी है, बेकारी जुड़ी है, अनपढ़ता जुड़ी है, तमाम चीजें जुड़ी हैं। जिसके कारण उसे यह मालूम नहीं कि मैं एक बच्चा पैदा करूं या दस करूं। सड़क पर तो एक बच्चे वाला भी है और दस वाला भी है। इससे यह बात उभर कर आ गई न सिर्फ हैल्थ मिनिस्ट्री को ही नहीं बल्कि पूरी सरकार के साथ राज्यों में जो सरकारें हैं, उनको भी इस बात पर विचार करना होगा।
इसी तरह से चाइल्ड मैरिज के बारे में चर्चा हुई है। लड़कियों की शिक्षा के बारे में बात हुई। इसके साथ दो बच्चे वालों के लिए इन्सेन्टिव की बहुत बात हुई और डिसइन्सेन्टिव भी देने की बात हुई। जहां इन्सेन्टिव की बात हुई वहां बहुत से साथियों ने कहा कि डिसइन्सेन्टिव भी देना चाहिए। दो से ज्यादा बच्चे पैदा होने पर नौकरी नहीं देनी चाहिए, उनके लिए यह चीज नहीं होनी चाहिए, वह चीज नहीं होनी चाहिए। इस बारे में बहुत साथियों ने कहा। एक और बात उभर कर आई है और इसमें बहुत दम है। हम टेलीविजन में देखते हैं कि बहुत सी चीजें छाई हुई हैं और इनमें धार्मिक नेताओं का बहुत बड़ा रोल है। मुस्लिम धार्मिक नेता बहुत कम टेलीविजन पर दिखते हैं, जाकिर साहब पीस टेलीविजन में आते हैं बहुत अच्छी बातें बताते है, कुरान की इन्टरप्रेटेशन बहुत अच्छी करते हैं। मैं हिंदू धार्मिक नेताओं के बारे में कह रहा हूं कि कुछ धार्मिक नेताओं की बात बहुत अच्छी लगती है। मैं हिंदू धार्मिक प्रोग्राम में देखता हूं कि वे कितनी अच्छी सैक्युलरिज्म की बातें कहते हैं। आम तौर पर देखा जाता है कि हिंदू धार्मिक नेता को सुनते नहीं हैं और दूसरे धर्म का आदमी सोचता है कि पता नहीं, यह हिंदू धर्म का प्रचार कर रहा है।
लेकिन यदि आप एकाध घंटा देखेंगे तो वे इतनी अच्छी-अच्छी बातें करते हैं कि दूसरे धर्मों को भी उनसे फायदा होता है। यह बात भी यहां उठी कि अगर इस काम को, इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए धार्मिक नेता हो या धर्मगुरू हो, यदि हम उनका भी उपयोग करेंगे तो इस काम को आगे चलाने में बहुत फायदा होगा। कानून बनाने की बहुत सारे लोगों ने अलग-अलग बात की। वर्ल्ड पापुलेशन डे के बारे में एक दिन या एक हफ्ते के बजाय 15 दिन की बात की। कई माननीय सदस्यों ने कहा कि शादी की उम्र 18 साल के बजाय 23 या 25 साल करो। बर्थ और डैथ रजिस्ट्रेशन के बारे में बात की। इसी तरह से इच्छा शक्ति और आम सहमति की भी यहां बात कही गई और कहा गया कि बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ जो अनाज पैदा हो रहा है, उसका मिसमैच है। आबादी ज्यादा बढ़ती रही है। मैं शायद यहां भूल गया, लेकिन पहले कह चुका हूं कि हर साल हमारे यहां दो करोड़ सत्तर लाख बच्चे पैदा होते हैं। मुझे याद है जब मैंने राजनीति शुरू की थी तो उस वक्त हम कहते थे और आप सुनते थे कि हम हर साल एक आस्ट्रेलिया पैदा करते हैं और उस वक्त आस्ट्रेलिया की जनसंख्या एक करोड़ थी। साथ में यह भी बोलते थे कि एक आस्ट्रेलिया हम एक साल में पैदा करते हैं, क्योंकि आस्ट्रेलिया की जनसंख्या एक करोड़ है। अभी मैं हैल्थ मिनिस्टर बना हूं और राजनीति में हूं और वे एक करोड़ से दो करोड़ सत्तर लाख तक पहुंच गये। आप अंदाजा लगाइये कि अब कितने आस्ट्रेलिया, कितने न्यूजीलैंड और कितने देश हम हर साल पैदा करते हैं। जाहिर है जिस गति से हम बच्चे पैदा करते हैं, उस गति से हम अनाज पैदा नहीं करते। इसलिए यह हमारे लिए एक बहुत बड़ी चिंता का विषय है।
सभापति महोदया, एक बहुत अच्छी बात शादियों के बारे में उभरकर आई। जैसा मैंने पहले ही उल्लेख किया था कि 15,16 या 17 साल की बच्चियां होती हैं और अधिकतर देखा गया है कि कहीं भी शादी हो, नेता को जरूर बुलाया जाता है और सिर्फ एक पार्टी या एक दल के नेता को नहीं बुलाया जाता, बल्कि सभी दलों के नेताओं को बुलाया जाता है। क्योंकि अब लोग भी बड़े चालाक हो गये हैं, वे जानते हैं कि आज यह सत्ता में हैं, कल दूसरा सत्ता में होगा, परसों पहले वाला सत्ता में था। इसलिए सबको जोड़ लो, कौन कब सत्ता में आ जाए, इसलिए वे शादी में सबको घेर लाते हैं। यदि अगर हम सारे नेता हर लैवल पर यह निर्णय ले लें कि वहां नहीं जाए, बल्कि पहले उम्र मालूम करायें। आप यदि एक महीना पहले इंक्वायरी शुरू करेंगे तो उसका बहुत फर्क पड़ेगा। क्योंकि कानूनन 18 साल की उम्र तक आप शादी नहीं कर सकते। परंतु जब एमएलए और एमपी उसकी इंक्वायरी शुरू करेगा और वह अखबार में आने लगेगा तो यदि एक आदमी की इंक्वायरी होगी तो उसके गांव के सौ लोग सतर्क हो जायेंगे कि एमपी साहब, मिनिस्टर साहब या एमएलए साहब ने इंक्वायरी कराई और पुलिस के थानेदार को बताया, चौकीदार को बताया, नम्बरदार को बताया या रेवेन्यू ऑफिसर को बताया कि इसकी उम्र कितनी है। इसलिए भाई बचे रहो, अब चाहे वह उस वक्त गलत लिखाये, लेकिन दूसरे लोग इस मामले में सतर्क रहेंगे। यह बात भी यहां आई। ...( व्यवधान) अब इसी में अगर हम डर कर करेंगे तो फिर कुछ नहीं कर पायेंगे। जो डर गया, वह मर गया। यदि गांव के लोगों के डर से नही मरना है तो वैसे ही 20-30 साल के बाद भूखे मर जाओगे। यह बात मैं अपनी तरफ से नहीं कह रहा हूं, ये तमाम चीजें आप लोगों ने बताई हैं। जो मेरे मुंह से आ रही हैं, ये बातें आप लोगों के बीच से उभरकर आई हैं, मैं उनका खाली उल्लेख कर रहा हूं कि ये चीजें यहां उभरकर आई हैं।
इसी तरह अल्ट्रासाउंड के बारे में चर्चा हुई। हमारी एक बहिन, जो पंजाब से हैं, ने अच्छा भाषण किया और बताया। जहां दूसरी चीजें टीएफआर के बारे में अच्छी हो रही हैं लेकिन पंजाब में लड़कियों की संख्या बहुत कम है और कम हो रही हैं। ये इसलिये कम हो गई हैं क्यों कि अल्ट्रासाउंड से मुसीबत हो गई है आप गर्भवती महिला को देखते हैं, वे अल्ट्रासाउंड कराती हैं कि लड़का है या लड़की है,, यदि लड़की है तो अबौर्शन करा देती हैं। देश के कुछ राज्य ऐसे हैं - जैसे पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड जहां लड़कियों की कमी आ गई है। लड़कियां कम लेकिन लड़के ज्यादा हो गये हैं। जैसे आने वाले वक्त में जमीन और अनाज के बीच की खाने वाले और पैदा करने वाले की प्राब्लम है, उसी तरह लड़के और लड़कियों की मुसीबत हो जायेगी। यह तो एक नेचुरल प्रोसैस है कि लड़के और लड़कियां बराबर होनी चाहिये जिसमें थोड़ा फर्क हो। लेकिन अगर इतना ज्यादा फर्क हो तो बहुत ज्यादा मुसीबत हो जायेगी, लॉ एंड ऑर्डर की समस्या पैदा हो जायेगी। अल्ट्रासाउंड के लिये तो कानून बना है कि जो अबौर्शन अल्ट्रासाउंड के जरिये करेगा, उसका लाइसैंस जब्त हो जायेगा, उस पर एक्शन होगा, वह जेल जायेंगे लेकिन इसे इंपलीमेंटेशन करने की जरूरत है।
सभापति महोदया, इसी तरह फैमिली प्लानिंग के जो इंटरनैशनल इंस्टीटय़ुटस हैं, उनके बारे में चर्चा हुई। कई ऐसी बातों पर यहां चर्चा हुई जिन्हें हम चाहते थे। अब मैं दो-तीन बातें आपसे कहना चाहूंगा। एक तो यह कि जो आपने बताईं। आपसे एक हफ्ता...( व्यवधान)
SHRI SANSUMA KHUNGGUR BWISWMUTHIARY (KOKRAJHAR): What about the two issues – checking infiltration from Bangladesh and giving special concession to tribal people – that I have raised?
श्री गुलाम नबी आजाद: वह तो फॉरेन मिनिस्टर और होम मिनिस्टर बतायेंगे। हम तो यहां पापुलेशन के बारे में बात कर रहे हैं। जो कॉमन बातें थीं, उनका मैंने उल्लेख किया। जैसा मैंने शुरु में कहा कि अभी जो हमारी पौलिसी थी, वह कानून के जरिये नहीं बल्कि अवेयरनैस के जरिये थी। । यह पौलिसी अभी तक मौजूद है। हमारे साथी कहते थे कि सख्त कानून के बगैर नहीं हो सकता है, ऐसा मेरा मानना नहीं है। आखिर क्यों? मैंने जिन 14 राज्यों का अपने भाषण में शुरु में उल्लेख किया कि वे पूर्व, पश्चिम, उत्तर दक्षिण के हैं, सैंट्रल के भी हैं। जब उन 14 राज्यों में बगैर किसी मार्शल लॉ के, बगैर किसी कानून के, बगैर किसी ज्युडिशियरी के, बगैर किसी दबाव के, बगैर किसी धमकी के, बगैर किसी लाठी के, बगैर किसी लालच के यह हो पाया बाकी राज्यों में क्यों नहीं हो पाया? मैं माननीय सदस्यों से बिलकुल सहमत हूं। शायद श्री यादव जी ने कहा कि इस काम में विल होने की जरूरत है। इसमें हिम्मत की जरूरत है। अगर हम अपने अंदर विल पैदा करेंगे तो काम हो जायेगा। शुरु शुरु में कश्मीर में फिदाईन हुये थे, बाद में नहीं हुये। भगवान करे अब यहां न हो लेकिन पाकिस्तान में फिदाईन दूसरों की जान लेने के लिये हुये हैं। लेकिन हमें इस काम को चलाने के लिए फिदाईन की जरूरत है जो जागरूकता पैदा करें, जो जान न लें लेकिन हिन्दुस्तान को बचायें। वह लाठी के जरिये नहीं, कानून के जरिये नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन मानसिकता में लायें और अगर माईंड सैट में परिवर्तन लायेंगे तो परिवर्तन आ सकता है। मैंने शुरु में भी कहा है कि हम अपोजीशन को रूलिंग में बदलते हैं, रूलिंग को अपोज़ीशन में बदलते हैं, हारने वाले को जीतने वाले में बदलते हैं, और जीतने वाले को हारने वाले में बदलते हैं । इस सब का क्या कारण है? वह सिर्फ हम एक महीने में करते हैं लेकिन आज तो वह 15 दिन में करते हैं।
बीस साल पहले तो यह एक महीने में होता था, लेकिन अब तो यह पन्द्रह दिन में होता है।
सभापति महोदया : माननीय मंत्री जी आप कितना समय लेंगे? आपके रिप्लाई तक कितना समय बढ़ा दिया जाये?
श्री गुलाम नबी आज़ाद : महोदया, बस अब मैं समाप्त कर रहा हूं। यह उथल-पुथल हम सिर्फ पन्द्रह दिनों में करते हैं तो हम सब मिलकर सोलह साल में यह काम क्यों नहीं कर सकते हैं? मुझे खुशी है कि आज मेरे पास स्वास्थ्य मंत्रालय में अधिकारियों की बहुत अच्छी टीम है। जिस विचार का मैं हूं, उसी विचार के वे लोग हैं। कभी-कभी यह भी होता है कि मंत्री एक विचार का और अधिकारी दूसरे विचार के होते हैं। वे इस वक्त भिड़ने के लिए तैयार हैं, इनके साथ अगर आप भी भिड़ जायेंगे तो गाड़ी आगे चलेगी। मैं चाहता हूं हर मेंबर ऑफ पार्लियामेंट इस मिशन को चलाने के लिए एक एम्बेसडर बने, न सिर्फ अपने निर्वाचन क्षेत्र में बल्कि जहां भी वे सत्ताधारी हैं, वहां अपने मुख्यमंत्री जी से, अपने स्वास्थ्य मंत्री जी और दूसरे लोगों से इस पर चर्चा करके इस प्रोग्राम को सफल बनायें। आप सबने इसमें हिस्सा लिया, समय दिया, अच्छे सुझाव दिये और स्पीकर महोदया, ने हमें यह चर्चा करने की अनुमति दी, इसके लिए मैं आप सबका अपने मंत्रालय की तरफ से बहुत-बहुत आभार इस आशा के साथ प्रकट करता हूं कि एमपीज़ और मीड़िया मिलकर इस मिशन को आगे चलायेंगे और यह मिशन सफलता प्राप्त करेगा। धन्यवाद।
सभापति महोदया : मुझे लगता है कि अब यहीं समाप्त करें।
…( व्यवधान)
श्री हुक्मदेव नारायण यादव (मधुबनी): महोदया, यहां कहा गया था कि जीरो ऑवर लिया जायेगा।...( व्यवधान)
सभापति महोदया : जीरो ऑवर एक ही शर्त पर लेंगे कि प्रत्यके माननीय सदस्य एक-एक मिनट में अपनी बात कहकर समाप्त करें।
…( व्यवधान)
श्री रामकिशुन (चन्दौली):महोदया, ये देश की जनता की समस्याओं से जुड़े हुए मुद्दे हैं, एक मिनट में कैसे समाप्त हो सकता है।...( व्यवधान)
सभापति महोदया : मैं आपकी बात को समझ रही हूं, इसीलिए मैं यह कह रही हूं।
…( व्यवधान)
श्री रामकिशुन (चन्दौली): पहले जीरो ऑवर शुरू तो होने दीजिये।...( व्यवधान)
सभापति महोदया : मुझे लगता है कि अब आज कुछ न करें।
…( व्यवधान)
MADAM CHAIRMAN : The House stands adjourned to meet tomorrow at 11.00 A.M.