Lok Sabha Debates
Raised A Discussion On Points Arising Out Of The Answer Given By The Minister Of ... on 21 December, 1998
Title: Raised a discussion on points arising out of the answer given by the Minister of Textiles on 4.12.98 to Starred Question No.81 regarding revival of NTC Mills. (Not concluded) MR. CHAIRMAN :Now, the House will take up Half-an-Hour discussion as listed in the Agenda.
श्री बूटा सिंह (जालौर): महोदय, मुझे भी इस पर बोलने के लिए एक मिनट का समय दे देते।
MR. CHAIRMAN: Shri Buta Singh, this is the procedure. Now, the time is 5.30 p.m. I cannot allow anything else. Dr. Pandey, please make a brief statement.
... (Interruptions)
PROF. SAIFUDDIN SOZ (BARAMULLA): Will the discussion continue after this?
MR. CHAIRMAN: After this Half-an-Hour discussion, we will continue the discussion under Rule 193.
डा. लक्षमीनारायण पाण्डेय (मंदसौर) : सभापति महोदय, ४ दिसम्बर को मंत्री जी के समक्ष एन.टी.सी. मिलों के संबंध में एक प्रश्न प्रस्तुत किया गया था। मंत्री जी ने उत्तर देते हुए उनके रिवाइवल और आधुनिकीकरण के बारे में कुछ उत्तर दिए थे लेकिन तब भी कुछ ऐसे प्रश्न थे जिनका ठीक से उत्तर प्राप्त नहीं हुआ था, मैं मंत्री जी से उस संदर्भ में जानना चाहूंगा। जैसे कि सभी जानते हैं और मंत्री जी ने भी अपने उत्तर में कहा कि एन.टी.सी. द्वारा संचालित १२० मिलों में से एक मिल बंद हो गई है और ११९ मिलें अभी भी उनके हाथ में हैं। उनका गए तीन वषर्ों में १९९५-९६ में ५१८.३८ करोड़, १९९६-९७ में ५७३.२१ करोड़ और १९९७-९८ में ६४६.२५ करोड़ का घाटा हुआ है, लगातार तीन वषर्ों में घाटे होते रहे हैं। इसके बाद भी मंत्री जी कह रहे हैं कि हमने प्रयत्न किए और प्रयत्न कर रहे हैं। महोदय, मैं मंत्री जी को याद दिलाना चाहूंगा कि सन् १९९२ में एक योजना वित्तीय संस्थाओं से पैसा लेकर उन्हें चलाने की बनी थी, लेकिन १९९२ की योजना भी सरकार की असफल रही और वे उनके पुनर्जीवन के लिए अक्षम रहे तथा एन.टी.सी. मिलें ओर ज्यादा दयनीय स्िथति में पहुंच गईं। उसके बाद फिर से १९९५ में उन्होंने टर्न स्ट्रेटजी नामक एक योजना बनाई थी और उस योजना के तहत अलग-अलग राज्य सरकारों से पैसा मांगा था, कयोंकि राज्य सरकारों को इन मिलों के सुधार करने और इन मिलों को चलाने के बारे में तथा इनके आधुनिकीकरण के लिए पैसा देना था। जैसा कि मुझे सूचना है कि इस प्लान के अंदर २००५ करोड़ का प्रस्ताव था। महाराष्ट्र ने १७ सौ करोड़ रुपया जो देना था वह नहीं दिया जिसके कारण वह योजना असफल हो गयी। सबसे ज्यादा मिलें महाराष्ट्र में हैं, उसके बाद गुजरात और अन्य राज्यों में हैं। मध्य प्रदेश में जो मिलें हैं उनकी स्िथति बहुत दयनीय है और वहां हजारों मजदूर बेकार हैं। इन्दौर, उज्जैन व रतलाम की मिलों की हालत खराब है राज्य और केन्द्र सरकार से अनुरोध किया जाता है लेकिन कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता है। माननीय वस्त्र-मंत्री जी ने लगभग ९५ हजार श्रमिकों को बी आर एस के तहत अलग कर दिया है और अभी भी वह योजना चल रही है। मैं जानना चाहता हूं कि वे और कितने मजदूरों की छंटनी करने वाले हैं तथा ११९ मिलों में से कितनी चलने के योग्य हैं और उनको चलाने के लिए कया उपाय किए जा रहे हैं। अभी आपने थ्री फोल्ड स्ट्रेटेजी बताई है। आपने एक प्रश्न के उत्तर में बताया था कि ११९ मिलों में से ३७ मिलें ऐसी हैं जिनको चलाने की योजना आप रख रहे हैं। मैं जानना चाहता हूं कि मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में या अन्य प्रदेशों में ऐसी कौनसी मिलें हैं जिनको चलाने की योजना आप रख रहे हैं तथा उनमें कितने श्रमिक लगे हुए हैं। मैंने पूरक प्रश्न के उत्तर में यह जानना चाहा था कि सभी मिलों के पास जो अतरिकत भूमि है कया उस भूमि को बेचकर मिलों के आधुनिकीकरण के बारे में सोचा जा सकता है। यह अतरिकत भूमि १५१४.५७ एकड़ के करीब है और जिसकी कीमत लगभग २३४९.१० करोड़ रुपये है। इसमें फ्री-होल्ड या पूर्ण-स्वामित्व वाली तथा लीज होल्ड दोनों तरह की जमीने हैं। फ्री होल्ड की ११४ और लीज होल्ड की १३ है। मैं जानना चाहता हूं कि रिवाइवल प्लान के लिए कया आपने जमीन बेचने के बारे में कोई विज्ञापित किया है या यह योजना विचाराधीन है या राज्य सरकारों से इस बारे में कोई बातचीत चल रही है। त्रिस्तरीय योजना कया इस वर्ष के अंत तक सामने आ सकेगी या इसमें और समय लगेगा। आपने विशेषज्ञ समति के निर्माण के बारे में भी एक बात कही थी। वह समति कब तक बन जाएगी। वर्तमान में उसकी स्िथति कया है? मिल सेकटर में, पावर-लूम सेकटर में और हथकरघा सेकटर मैं जो कम्प्टीशन चल रहा है उसके कारण आज बड़ी कठिनाई खड़ी हो गयी है। उस कठिनाई को दूर करने के लिए कया आपने कोई प्रयास किया है या नहीं। एक प्रश्न के उत्तर में माननीय मंत्री जी ने बताया था कि वर्ष १९९३-९४ से १९९५-९६ तक तीनों ही सेकटर्स में जो उत्पादन हुआ है उसमें उत्पादित कपड़े में लगातार गिरावट आई है। केवल पावर-लूम में उत्पादन बढ़ा है। पावरलूम सेकटर में आज स्िथति अच्छी है। लेकिन उसके बाद भी पावर-लूम सेकटर में जो सुविधाएं मिलनी चाहिए वह नहीं मिल रही हैं। कपड़ा नीति के बारे में मैं बाद में आऊंगा। उसका प्रभाव कपड़ा मिलों पर जो पड़ा है उसके बारे में आपने कया किया है। मैंने १७ जुलाई को जो प्रश्न पूछा था उसके उत्तर में आपने कहा था कि पावर-सेकटर, हैंड-लूम सेकटर और मिल सेकटर में वर्ष १९९३-९४, १९९४-९५, १९९५-९६, १९९६-९७ और वर्ष १९९७-९८ में क़मश: १९९०, २२७१, २०१९, १९५७ और १९६३ उत्पादन हुआ है। इस तरह से उत्पादन में लगातार गिरावट आई है। माननीय मंत्री जी से मैं जानना चाहता हूं कि यह जो सूती कपड़ा मिलों के लिए वांछित मात्रा में सूत कपास उपलब्ध होना चाहिए, वह सूत या धागा उपलब्ध होना चाहिए, वह सूत भी उपलब्ध नहीं हो रहा है कयोंकि कपास के उत्पादन में भी कमी आई है। जब कभी किसान कपास का उत्पादन करता है और जब वह ज्यादा उत्पादित होती है और उसके वाजिब दाम नहीं मिलते हैं। वह फिर लौट कर दूसरी फसलों में चला जाता है। कपास के उत्पादन में गए वर्ष १९९५-९६, १९९६-९७ और १९९७-९८ में कितना कपास का उत्पादन हुआ और कितना स्टाक है, कितनी कपड़ा मिलों को आवश्यकता है, उनको देखते हुए वह काफी है या नहीं? दूसरे फाइबर और यार्न इतने कम्पीटिशन में आ गए हैं कि काटन पीछे हट गई है। इसके कारण सूत मिलों को बड़ी कठिनाई हो रही है। अभी ठराष्ट्रीय सहारा" में २९.१०.९८ को जो एक समाचार प्रकाशित हुआ, मैं उसकी तरफ ध्यान दिलाना चाहता हूं। "इस समय भारतीय कपड़ा उद्योग मुद्रा संकट की चपेट में आए दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के यार्न व फैब्रिक के उठाव में गिरावट से प्रभावित हो रहा है। जनवरी १९९८ से स्िथति और गम्भीर हुई है जबकि भारत में हाल के वषर्ों में स्पन व फिलामैंट यार्न की उत्पादन क्षमता में बढ़ोत्तरी की वजह से आपूर्ित अधिक हो गई है। घरेलू बाजार अतरिकत उत्पादन को खपाने में अक्षम है। दूसरी तरफ देश में चीन, नेपाल, हांगकांग, दक्षिण कोरिया व बंगलादेश से कपड़ा उत्पादों का आयात बढ़ता जा रहा है। भारत में कपड़ा उद्योग की सबसे बड़ी समस्या यह है कि अधिकांश कपड़ा मिलें वित्तीय संकट का सामना कर रही हैं। उन्हें वाणज्ियक बैंकों द्वारा ऋण हासिल करने में भी परेशानी हो रही है। जो ऋण उन्हें प्राप्त हो रहा है उस पर उच्च ब्याज दर भी उनकी समस्या बढ़ाने वाला है। पड़ोसी व अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धीं देशों में कपड़ा उद्योगों को ६ प्रतिशत पर ऋण उपलब्ध है। इसके मुकाबले भारत में १७ से १८ प्रतिशत पर ऋण मिलता है। यही कारण है कि लागत कीमत में सीधी व्ृाद्धि हो रही है।" मैं जानना चाहूंगा कि हमारे यहां कपड़े का आयात कयों बढ़ रहा है? चाहे वह आयात पाकिस्तान, नेपाल और दूसरे देशों के जरिए हो। निश्चय ही इसका असर घरेलू उत्पादन पर पड़ेगा। दूसरी बात राष्ट्रीय सहारा अखबार में ऋणों की उपलब्धतता की आई है। वाणज्ियक बैंकों से ऋणों की उपलब्धतता सुगमता से होनी चाहिए लेकिन वह नहीं हो रही है। ब्याज की दरें १७-१८ परसैंट हैं। जबकि दूसरे देशों में इन उद्योगों में लगे लोगों को पांच या छ: परसैंट पर ऋण मिलता है। यही कारण है कि वह कम्पीटिशन करने में सक्षम होते हैं। यह बात केवल कपड़े की नहीं है, दूसरी चीजों की भी यही हालत है। इस अंतर को पाटने के लिए सरकार बैंकों के साथ बातचीत कर नीति निर्धारित कर सकती है। इन उद्योगों में लगे लोगों को कम दर पर ऋण मिल सके, इसका प्रयास करना चाहिए। सरकार रिवाइवल प्लान बनाने जा रही है। सरकार वह कब तक सदन के सामने लाएगी? मंत्री महोदय ने अपने उत्तर में भी कहा है क "कपड़ा उद्योग में रिसेशन तो चल रहा है। मैंने कभी नहीं कहा कि रिसेशन नहीं है। रिसेशन से बहुत हद तक उद्योग को बाहर लाने के लिए सरकार प्रयास कर रही है। जहां तक मिस-मैनेजमैंट का सवाल है तो उन्होंने कोई गुनाह नहीं किया है लेकिन जिस तरीके से समय सीमा और सामंजस्य से मिल चलानी चाहिए, वैसा नहीं हुआ है, इसलिए मेरा कहना है कि मिस मैनेजमैंट वाली बात सही है।" कपड़ा उद्योग को सक्षम बनाने की दृष्िट से आपका जो प्लान है, वह केवल प्लान न रहे, वह सामने आए और लोगों को लाभ मिले। साथ ही मजदूरों में एक आशंका पैदा हो गई है कि उन्हें घर में बिठाया जा रहा है। उनके सामने आजीविका की समस्या खड़ी हो गई है। वे दर-दर की ठोकरें खाने के लिए लाचार हो गए हैं। दूसरी तरफ उद्योगों में लगने वाला करोड़ों रुपया आज फिजूल जा रहा है। मशीनें जंग खा रही हैं। इन उद्योगों को बचाने की दृष्िट से आप कया करने जा रहे हैं? कृपया अपने उत्तर में स्पष्ट करें।
> श्री अमर पाल सिंह (मेरठ): सभापति जी, स्िथति इतनी भयंकर है कि टैकसटाइल का टोटल बजट ८५० करोड़ रुपए का है। इनमें से ५५० करोड़ रुपए एन.टी.सी. की बीमार मिलों के लिए हैं। वह इनके कर्मचारियों की तनख्वाह में चले जाएंगे। ३०० करोड़ रुपए बचते हैं। आप उन्हें पावरलूम, हैंडिक़ाफटस और हैंडलूम में ले जाएं। इन मिलों को चलाना इसलिए जरूरी है कि ये कपड़े के साथ-साथ यार्न भी बनाते हैं। वे कम से कम यार्न बनाना शुरु कर दें। मैं मंत्री जी से जानना चाहता हूं कि वह इस काम को कब तक करवा देंगे? इससे यार्न की कीमत स्टेबल रह सकेगी और एकसपोर्ट भी प्रभावित नहीं होगा। एकसपोर्ट के स्रोत बंद हो गये, यार्न की कीमत बढ़ गई। यार्न स्टेबिल न रहने के कारण राष्ट्रीय हितों को क्षति पहुंच रही है। बेसिक गलती यह रही कि जब से देश आजाद हुआ है, तब से पावरलूम का उत्पादन ७० परसेंट और बजट एक परसेंट मिलता रहा है। यह कितनी अजीबोगरीब स्िथति है? यदि बिना राष्ट्रीय सहायता के ७० परसेंट कपड़े का उत्पादन हो सकता है तो फिर इस देश में टैकसटाइल मनिस्टर की जरूरत ही कया है? मैं मंत्री महोदय से यह जानना चाहता हूं कि कया आप पावरलूम डैवलेपमेंट कमिशन का गठन करेंगे? उत्तर प्रदेश की ११ मिलों में से कितनी मिलों को नई योजना के अंतर्गत चालू करने जा रहे हैं? उत्तर प्रदेश की स्िथति यह है कि आज २१२ करोड़ रुपये की भूमि फालतू पड़ी हुई है, १९ करोड़ रुपये की पुरानी मशीनें बिक सकती हैं। कुल मिलाकर २९४ करोड़ रुपये से मिलें माडर्न हो सकती हैं। ग्रोवर कमेटी की स्टेंडिंग कमेटी ने यह सिफारिश की थी कि फालतू जमीन को बेचकर इन मिलों को माडर्न किया जाये लेकिन महाराष्ट्र की सरकार ने कहा कि इस पैसे को महाराष्ट्र में लगाया जाये। हम कहते हैं कि महाराष्ट्र की माडर्न करो लेकिन यह कब तक योजना लागू करेंगे। यदि स्टेट में मिल की फालतू जमीन को बेचकर वहां की मिल को माडर्न करते तो यार्न मिलता और कपड़ा बनना शुरु होता। आज तक इस देश में हैंडलूम और हैंडिक़ाफट इसलिये डेवलेप नहीं हो सका कयोंकि पिछले ५० साल में बोगस को-आप्रेटिव सोसाइटीज को सहायता दी जा रही है। अगर यह गलती नहीं होती तो प्राइवेट हैंडलूम ओनर्स देश के नं. वन एकपोर्टर्स होते। सभापति जी, मैं मंत्री जी से कुछ बातें जानना चाहता हूं। ये मिल कब तक चालू करेंगे, उत्तर प्रदेश की ११ मिलो में से कितनी मिलों को माडर्न करने के लिये टेकअप करेंगे, जमीन बेचकर इनको माडर्न कब तक करेंगे और पावरलूम कमिशन का गठन कब तक करेंगे? जितनी मिलें जिस सैकटर में उत्पादन कर रही हैं, उनकी बचत किस अनुपात में बांटेंगे तथा को-आप्रेटिव सैकटर के साथ प्राइवेट सैकटर में हैंडिक़ाफट और हैंडलूम को सहायता देंगे या नहीं?
MR. CHAIRMAN : Now, the reply by the hon. Minister.
SHRI C. KUPPUSAMI (MADRAS NORTH): Sir, please allow me.
MR. CHAIRMAN: Rules do not allow. It must be completed within half-an-hour. Shri Baalu, you are aware of the rules.
of two minutes.
MR. CHAIRMAN: It is not a question of one or two minutes. Now, the Minister.
> वस्त्र मंत्री (श्री काशीराम राणा): सभापति महोदय, माननीय पांडेय जी ने अपने वकतव्य में बहुत सारे सवाल उठाये हैं। एन.टी.सी. मिलों को रिवाइव करने के लिये स्ट्रेटेजी प्लान बने, यह सच है कि उन्हें जिस तरह से एग्िजबिट और इंप्लीमेंट होना चाहिये था, नहीं हुये। लेकिन इससे यह मानना ठीक नहीं कि जो नई स्ट्रेटेजी बनेगी, उसका भी यही हाल होगा। जो स्ट्रेटेजी बनेगी और अंडर कंसीड़ेशन है, उससे एन.टी.सी. मिलों के मजदूरों को बहुत फायदा होगा। इसके पहले जो फेल्योर्स हुये हैं, उससे हम बच पायेंगे। सभापति जी, माननीय पांडेय जी ने सही बताया कि अब तक तीन स्ट्रेटेजी और तीन प्लान बने। पहला १९९२ में बना लेकिन वह पूरी तरह से इंप्लीमेंट नहीं हो सका कयोंकि फाइनेंशियल इंस्टीटयूशन्स से जो पैसा लेना था, उन्होंने देने से इन्कार कर दिया। इसका कारण यह था कि जिन मिलों का माडर्नाइजेशन किया जाना था, वे बी.आई.एफ.आर. में पड़ी थीं। इसके बाद भी वह बनी। जैसे बताया गया कि १९९५ में दो लाख पांच करोड़ रुपये की लागत से रिवाइवल प्लान बना लेकिन महाराष्ट्र में जो बंद मिलें हैं, उनकी जमीन बेचकर १७८० करोड़ रुपये हमें लेने थे। वह जमीन हम नहीं बेच पाए। सिर्फ जमीन बेचकर पैसा आएगा तो मॉडर्नाइज़ होगा, इस आधार पर वह योजना बनी थी, प्लान बना था, लेकिन वह इंप्लीमेंट नहीं हो सका। इससे आगे १९९७ में टर्न अराउंड प्लान बना, जिसकी टोटल ऐस्िटमेटेड कॉस्ट २६८४.६६ करोड़ रुपये थी। वह कैबिनेट में डिसकस हुआ और कैबिनेट ने, उस पर विस्तार से चर्चा हो सके, इसलिए एक ग्रुप ऑफ मनिस्टर्स बनाया। ग्रुप ऑफ मनिस्टर्स ने जो डिसीज़न लिया, उसके आधार पर मनिस्ट्री ऑफ टैकसटाइल को कैसे यह प्लान सकसेस हो, इस पर एक पेपर बनाने के लिए कहा गया। उसके आधार पर हम जो स्ट्रैटेजी बनाने जा रहे हैं -- रिवाइवल प्लान १९९८ का -- वह तीन-चार स्ट्रैटेजी का प्लान है। वह जो प्लान बनेगा, जो अभी कंसिडरेशन स्टेज में है, कैबिनेट के पास हम पूरा नोट रख देंगे। उसके अंतर्गत ११९ मिलों में से ३७ मिलें चलेंगी जो वायेबल हैं। ८२ ऐसी मिलें हैं जो बिल्कुल चल नहीं सकतीं। मैं कहना चाहूंगा कि अभी भी हमारी ११९ मिलों में से ३४ मिलें ऐसी हैं जो चलती नहीं हैं, टोटली कलोज़ड हैं। जो रिवाइवल प्लान हम बनाने जा रहे हैं उसका जिक़ अभी पाण्डे जी ने अपने भाषण में किया कि कहां से पैसा आएगा, किस प्रकार की ज़मीन बेचकर आएगा। जो ३४ वायेबल मिलें हैं, उनमें करीब २९८.४ एकड़ जमीन है, जिसकी वैल्यू ७३३.९५ करोड़ रुपये है और जो अनवायेबल मिल्स हैं, उनकी लैण्ड १४९२.०१ एकड़ है और उसकी वैल्यू १९४७.६२ करोड़ रुपये है। मशीनरी की भी उसमें कॉस्ट लगाई गई है। टोटल ऐस्िटमेटेड कॉस्ट २७८६.५६ करोड़ रुपये है। मैं कहना चाहूंगा कि ये जो प्लान बनेगा, उसमें वायेबल भी शामिल हैं, अनवायेबल भी शामिल हैं, और वी.आर.एस. भी शामिल हैं। वी.आर.एस. का मामला एक माननीय सदस्य ने उठाया है कि यह वी.आर.एस. कया है। अभी भी हम वी.आर.एस. दे रहे हैं। जो वी.आर.एस. अभी हम दे रहे हैं और वित्त मंत्री जी ने भी बजट में एक वी.आर.एस. की घोषणा की थी, लेकिन हम मानते हैं कि अगर मज़दूरों को और इनसेन्िटव मिले, गुजराल पैटर्न पर वी.आर.एस. का इंप्लीमेंटेशन हो, उसका ज़िक़ हमने रिवाइवल प्लान १९९८ में किया है। यह जो पूरा प्लान बनेगा, मैं अवश्य कहना चाहूंगा कि जितनी भी जल्दी हो सके, इसका ऐकज़ीकयूशन हो यह सरकार की इच्छा है। लेकिन उसमें भी समय लगेगा कयोंकि ऐसा नहीं है कि एक बार तय कर लिया तो तुरंत उसका इंप्लीमेंटेशन हो जाएगा। सभापति महोदय, यह पूरी स्ट्रेटेजी बी.आई.एफ.आर. के पास जायेगी। वे यूनियन वालों को बुलायेंगे और जिनके भी डयूज हैं, चाहे वे स्टेच्यूटरी डयूज हों या कोई और डयूज हों, उनके बारे में बात करेंगे और हमें लगता कि इस सब मशविरे के बाद इस योजना को लागू करने में शायद एक या दो साल निकल सकता है। लेकिन जितना जल्दी इसका एकजीकयूशन हो, इम्पलीमेन्टेशन हो, इस दिशा में सरकार आगे बढ़ेी। सभापति महोदय, इसमें एक मुद्दा विशेषज्ञ कमेटी के बारे में और उठाया गया है जैसे कि विशेषज्ञ कमेटी के बारे में डीटेल मांगे गये हैं। मैं चाहूंगा कि जो रिवाइवल प्लान बनेगा और अगर हमें उसका कैबिनेट अप्रूवल मिल गया तो इसके बारे में हम एक सैपरेट कमीशन बनायेंगे। उसमें सुप्रीम कोर्ट के रिटार्यड जज को चेयरमैन बनायेंगे और इनकी जमीन को कैसे सेल करना है, वह तय करेंगे और इसके आधार पर यह कमेटी काम करेगी। मिल सैकटर में प्रोडकशन कम हुआ है, यह बात सही है। लेकिन जैसा कि मैने पहले भी कहा था कि मिल सैकटर का प्रोडकशन इसलिए कम हो रहा है चूंकि पावरलूम सैकटर की संख्या बढ़ रही है। पावरलूम सैकटर में प्रोडकशन बढ़ रहा है और पावरलूम सैकटर का जो प्रोडकशन बढ़ता है तो और मजदूरों को इसमें रोजी मिलती है। चूंकि डीसैण्ट्रलाइज यूनिटस खड़ी होती जा रही हैं। मिल सैकटर के नुकसान को कम करने की कोशिश की है। पावरलूम सैकटर का जो प्रोडकशन बढ़ता है, उससे हमारी कंजम्पशन और प्रोडकशन अवेलेबलिटी के बारे में सरकार सावधान होकर इस दिशा में चिंतित है। कपड़ा मिलों को सूती यार्न नहीं मिलता है, ऐसा नहीं है। ऐसी कई मिलें हैं जिनकी अनेक और भी परेशानियां हैं, उनको शायद यार्न नही मिलता होगा। लेकिन जो मिलें अच्छी तरह से चलती हैं उनको सूती यार्न मिलता रहता है। देश में कपास का उत्पादन भी बढ़ा है। पिछले वर्ष १५६ लाख बेल्स का कपास का उत्पादन हुआ था, इस बार करीब १६५ से १७० लाख बेल्स काटन का प्रोडकशन होगा। लास्ट ईयर के कम्पैरीजन में इस साल कॉटन का उत्पादन बढ़ेगा। सभापति महोदय, माननीय सांसद ने यह बात उठाई है जो रीसैशन की स्िथति है, मंदी की स्िथति है और इस स्िथति से बाहर निकालने के लिए बैंक उनको ऋण दें। इसके लिए भी मनिस्ट्री ने सभी फाइनेंशियल इंस्टीटयूशंस के अधिकारियों की मीटिंग बुलाई थी जिसमें पावरलूम सैकटर, मिल सैकटर या स्िपनिंग करने वालों को फाइनेंशियल असिस्टैंस देने के लिए हमने सभी इंस्टीटयूशंस के चैयरमैन को बताया है। उन्होंने हमसे वायदा किया है कि केस बाई केस हम इनको मदद करने के लिए तैयार रहेंगे और इसके साथ-साथ हम मॉनीटरिंग करेंगे कि फाइनेंशियल इंस्टीटयूशंस से इनको सहायता मिलती रहे, ऐसी व्यवस्था हम देखते रहेंगे। डा. लक्षमीनारायण पाण्डेय (मंदसौर) : मंत्री जी, ब्याज की दरें बहुत अधिक हैं, १७ से १८ प्रतिशत इन पर ब्याज लगता है, वह कैसे कम हो सकता है, इसके बारे में आप कया कर रहे हैं? श्री काशीराम राणा: जहां तक मजदूरों का सवाल है उनकी रोजी-रोटी चलती रहे, इसके बारे में सरकार केयर करती है। कोई मजदूर रिट्रैन्च न हो, हमेशा सरकार की यह चिंता रही है और इसीलिए आज एन.टी.सी. के सिक होते हुए भी हम करीब ९७ हजार मजदूरों और स्टाफ को वेजिज दे रहे हैं। मजदूरों को कम से कम परेशानी भुगतनी पड़े, हम इसकी व्यवस्था करते हैं। लेकिन एन.टी.सी. की जो स्िथति है, उसमें सभी मजदूर चाहते हैं कि यदि एन.टी.सी. चालू न रहे तो वे वी.आर.एस. लेकर चले जाएं।
18.00 hrs. सभापति महोदय, हमारे गुजरात में गुजरात सरकार और वहां की ११ मिलों के मजदूरों ने वी.आर.एस. स्वीकार की और मजदूरों ने उसे माना। जब मजदूर संगठनों ने देखा कि वे मिलें चल ही नहीं सकती हैं और जनता का पैसा ऐसे ही बेकार हो रहा है तब उन्होंने वी.आर.एस.स्वीकार किया और वे चले गए। महोदय, मैं बताना चाहता हूं कि एन.टी.सी. की जो ११९ मिलें हैं उनमें से ज्यादा से ज्यादा को चलाने का प्रयास किया जाएगा। उसके लिए पूरा कंसन्ट्रेशन किया जाएगा और उनको मॉडर्नाईज किया जाएगा। जो प्लान उनके लिए बनाया गया है उसके अनुसार पूरा काम किया जाएगा। हमारा यही प्रयास होगा कि हम सरकार से ज्यादा से ज्यादा धन बिना ब्याज के ऋण के रूप में लें और हमें मिलों की जमीनें न बेचनी पड़ें। इस प्रकार की योजना हमारे रिवाइव प्लान में है। सभापति महोदय, अमरपाल सिंह जी ने एक बात पूछी है कि यू.पी. में कितनी मिलें वाएबल हैं और कितनी नॉन वाएबल हैं। मैं इस संबंध में बताना चाहता हूं कि अभी तक पूरी रिपोर्ट आई नहीं है। जब पूरी और आखिरी रिपोर्ट आ जाएगी तभी पता चलेगा कि कितनी मिलें चलने लायक हैं और कितनी चलने लायक नहीं हैं। उन्होंने एक बड़ा अच्छा सुझाव दिया है कि पावरलूम डिवेलपमेंट कापर्ोरेशन का गठन किया जाए। यह सुझाव बहुत अच्छा और स्वागतयोग्य है। हमारे देश में जब हैंडलूम विकास निगम है, तो पावरलूप विकास निगम बनाने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। हम इस बारे में पॉजीटिवली विचार करेंगे। अमरपाल सिंह जी ने यार्न के भाव अधिक होने का भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। मैं उन्हें बता दूं कि यार्न के भाव बाजार में पहले से ही अधिक हैं। हमारी ओर से यार्न की मनिमम सपोर्ट प्राइस तय की गई है उससे भी ४० से ५० प्रतिशत अधिक पर परचेज हो रहा है। यार्न की कीमतें इंटरनैशनल मार्केट में हमारे यहां से कम हो गई हैं। हमारे देश में काटन यार्न के भाव बहुत ज्यादा हैं इसकी इन्फर्मेशन हमें मिली है, लेकिन उसकी वजह से एन.टी.सी.की मिलों पर कोई असर नहीं हुआ। ये भाव तो जब एन.टी.सी. की मिलें हमारे पास आई थीं उससे पहले भी ज्यादा थे। ये एन.टी.सी.की मिलें काटन यार्न के भाव के ज्यादा होने के कारण बंद नहीं हुई हैं। मैं बताना चाहता हूं कि हम काटन के भावों को भी मानीटर करते रहते हैं जिससे हमारी जो काटन या पावरलूम की मिलें हैं उनको यार्न अवेलेबल हो सके। श्री माधवराव पाटील (नासिक) : सभापति महोदय, मंत्री महोदय ने महाराष्ट्र के बारे में सवाल का उत्तर नहीं दिया है कि महाराष्ट्र की कपड़ा मिलों की भूमि को बेचकर जो धन आएगा, कया उसका इस्तेमाल महाराष्ट्र में ही करने पर विचार करेंगे? श्री काशी राम राणा: सभापति महोदय, यहां पर अनेक सवाल रखे गए हैं जिनमें से एक सवाल यह भी है कि कुल किनते कर्मचारी हैं। मैं बताना चाहूंगा कि सितम्बर, १९९८ तक वर्कर ८२,८१० और आफीसर इत्यादि ९,८९३ हैं। इस प्रकार से कुल एन.टी.सी. के कर्मचारियों की संख्या ९६,३७० है।
... (व्यवधान) श्री अमर पाल सिंह : सभापति महोदय, मेरे इस प्रश्न का उत्तर नहीं आया ... (व्यवधान) सभापति महोदय : मंत्री महोदय, को अपना आंसर कम्पलीट करने दीजिए। श्री काशी राम राणा: सभापति महोदय, सैलरी के बारे में भेदभाव की स्िथति को दूर करने के लिए सुप्रीमकोर्ट ने एक डायरैकशन दी है उसके अनुसार एमीकेबल साल्यूशन के बारे में हम लीगल डिपार्टमेंट से ओपीनियन मांग रहे हैं और उसके आधार पर हम आगे बढेंगे। मैं मानता हूं कि माननीय सदस्यों ने बहुत सारे सवाल रेज किये हैं लेकिन जो महत्वपूर्ण प्रश्न थे, मैंने उनका उत्तर देने की कोशिश की है। मैं मानता हूं कि एन.टी.सी. की जो सिक मिलें हैं, उनकी ऐसी स्िथति आज या कल नहीं हुई है। जब वे नैशनलाइज हुई तब से यह स्िथति है। पिछली सरकारों ने इसको ठीक करने की कोशिश की लेकिन वे नाकामयाब रहे। हमें विश्वास है कि नई स्ट्रेटेजी के आधार पर एन.टी.सी. की सालों से जो सिक मिलें हैं, उनको हम पूरे हाउस के सहयोग से उनकी समस्या को सुलझाने में सफल होंगे। धन्यवाद।
SHRI N.K. PREMCHANDRAN (QUILON): Sir, I want to raise one question.
MR. CHAIRMAN : Please sit down. He has given notice. श्री अमर पाल सिंह : मेरा प्रश्न यह था कि जिस सैकटर में जितना उत्पादन हो रहा है, कया बजट एलोकेशन उसके अनुरूप करेंगे तथा हैंडीक़ाफट, पावरलूम और हैंडलूम सैकटर में आज तक जो सहायता बोगस कोआपरेटिव सोसाटीज को दी जा रही है, वैसी ही सहायता कया आप प्राइवेट ओनर्स को भी देंगे या नहीं?
SHRI KASHIRAM RANA: Sir, this is a suggestion for action. The Government will keep it in mind. जहां तक बजट का सवाल है, ... (व्यवधान)माननीय सदस्यो ने इसके बारे में जो सजेशन दिया है, हम उसका ख्याल रखेंगे।
SHRI N.K. PREMCHANDRAN : Sir, I have got a pointed question.
MR. CHAIRMAN: So many people are asking for raising question without having given notice.
SHRI N.K. PREMCHANDRAN : I want to know whether it has come to the notice of the hon. Minister that those mills which are viable are only 34. We had submitted a clean proposal regarding Parvati Mills, Kollam. It can be revived, but it has not been mentioned in the list of 34 mills. ....(Interruptions). It could well be revived. We, from the trade union, have submitted a very clean project and are the first who are entering into a long-term agreement. We are fully cooperating, but this mill is not included in the list of 34 mills which are supposed to be viable. I want to ask the hon. Minister whether it will be considered by the Minister after going through the details.
MR. CHAIRMAN: Mr. Minister, you need not reply. You note down.
Shri Premchandran, he will give reply later. Please sit down.
SHRI N.K. PREMCHANDRAN : Sir, the hon. Minister is ready to reply.
SHRI KASHIRAM RANA: The entire proposal of the revival plan is under consideration so far. I will keep the suggestion of the hon. Member in mind.
SHRI C.P. RADHAKRISHNAN (COIMBATORE): Hon. Chairman, we are requesting the hon. Textiles Minister that cotton waste should not be exported because it is the raw material of the small open-end spinning mills. With that, the powerloom sector and the handloom sector will benefit highly by the low count yarn. We have already made this suggestion through the Standing Committee on Commerce. I hereby request the hon. Minister that at least in future, the cotton waste should not be exported from this country.
MR. CHAIRMAN: Shri Janardan Prasad Misra.
MR. CHAIRMAN: He need not reply to everything.
... (Interruptions)
SHRI KASHIRAM RANA: This is a suggestion.
19.00 hrs. The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Tuesday, December 22, 1998/Pausa 1, 1920 (Saka).
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