Lok Sabha Debates
Introduction Of The Bihar Reorganisation Bill, 2000. on 25 July, 2000
Title: Introduction of the Bihar Reorganisation Bill, 2000.
MR. SPEAKER: The House will now take up Item No. 12. Shri L.K. Advani.
THE MINISTER OF HOME AFFAIRS (SHRI L.K. ADVANI): Sir, I beg to move for leave to introduce a Bill to provide for the reorganisation of the existing State of Bihar and for matters connected therewith.
कुमारी मायावती : अध्यक्ष महोदय, मैं इस बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक के समर्थन में हूं। मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है और मैंने जैसा पहले बताया, यदि कुछ आपत्ति भी है तो जब विधेयक पास किया जाएगा तो उस आपत्ति को विधेयक पास करने से पहले दूर कर लिया जाए और मैं इस विधेयक के समर्थन में खड़ी हुई हूं।
* Published in the Gazette of India,Extraordinary,Part-II,Sec-2,dt.25.7.2k SHRI TRILOCHAN KANUNGO (JAGATSINGHPUR): Mr. Speaker, Sir, I rise to oppose the Bihar Reorganisation Bill, 2000, which is sought to be introduced by the hon. Home Minister, for two reasons.
In the first place, history has caused immense damage to Orrisa and Oriyas, on their economy, language, culture etc. and we hope that this august House would repair some of the damages caused to a great region of this nation. It is a docile State. Under this Bihar Reorganisation Bill, the Government is proposing to create a new Jharkhand State. The people of Saraikala and Kharsawan were with Orissa when Bihar and Orissa States were together. It is not that Bihar was under Orissa, but it was Bihar-Orissa State. It was under Orissa Division and even in 1936, when separate Orissa was form, it was a tributary State under Orissa. Even after Independence in 1947, Saraikala and Kharsawan acceded to Orissa. In 1948, since Mayurbanj had not acceded to Orissa for some reason, it was temporarily handed over to the Central Government. The Central Government, in its turn, handed it over to Bihar for some time. The wily politicians at the centre have caused immense damage to Orissa and, I think, as a partner of the National Democratic Alliance, the damage will be repaired to some extent.
Sir, I demand that Saraikala and Kharsawan should be transferred to Orissa when the new State of Jharkhand is created. Now, the State of Orissa is ruled by the coalition Government of BJD and BJP. The Legislative Assembly of Orissa has passed a unanimous resolution demanding the transfer of Saraikala and Kharsawan to Orissa. In Orissa, BJD, BJP and all other political parties have also passed a unanimous resolution demanding the transfer of the same. Actually, Saraikala and Kharsawan are not big areas. Thy are very small areas belonging to West Singhbum district. If the Government does not do that, we will be disappointed. So, I caution the Home Minister and I would like to remind him the famous quotation of Dryden, who said this 300 years ago. I quote:
"Beware of the fury of the silent man;" a day will come when the silent man will be furious and will burst like an atom bomb.
Saraikala and Kharsawan should be transferred back to Orissa. I am not against the creation of Jharkhand State. But I am against the Bill, which does not contain the provision to transfer Saraikala and Kharsawan to Orissa.
The second reason is very specific for which I am objecting the introduction of this Bill. I would like to draw your kind attention to Rule 69 of the Rules of Procedure and Conduct of Business in Lok Sabha.
"(1) A Bill involving expenditure shall be accompanied by a financial memorandum which shall involve particular attention to the clauses involving expenditure and shall also give an estimate of the recurring and non-recurring expenditure involved in case the Bill is passed into law."
Please show me in the Bill where there is a mention about the financial memorandum and whether language and spirit of Rule 69 has been incorporated. If it has not been incorporated, it is out of order. Please declare it here and now. If I am wrong, please correct me also. If there is any other decision contrary to the Rule mentioned in the Rules of Procedure and Conduct of Business in Lok Sabha. Therefore, I request you to kindly go through the Rules. Please do not allow introduction of the Bill, as such, It should be verified and Saraikela and Kharsawan should be handed over to Orissa. Jharkhand be created.
What should the financial memorandum contain? In that particular region, how much revenue is being raised? How much amount is being spent in that region? Immediately after the creation of that State, how much amount will be spent in that region? All these things - showing both recurring and non-recurring expenditure - should be incorporated.. Even a token amount must be there. But it is not there. You kindly go through the financial memorandum. It does not say so in that language and spirit. Therefore, please reject the Bill. Do not allow the Bill to be introduced.
श्री प्रसन्न आचार्य (सम्बलपुर) : अध्यक्ष महोदय, मैं सैद्धांतिक रूप से बिहार रिआर्गनाइजेशन बिल का विरोध नहीं कर रहा हूं क्योंकि यह एक ऐतिहासिक आवश्यकता है। पिछले कई दशकों से बिहार के आदिवासी, जनजाति लोग मुख्यतया इसी झारखंड प्रदेश के लिए आवाज बुलंद कर रहे थे, आंदोलन कर रहे थे। यह ऐतिहासिक कार्य आज सरकार करने जा रही है। मैं इस बिल का इसलिए विरोध कर रहा हूं क्योंकि ५३ साल पहले जो अन्याय उड़ीसा के साढ़े तीन करोड़ लोगों के प्रति हुआ और सिंहभूम जिले के सराइकलां और खरस्वां प्रिंसली स्टेट जहां लाखों उङिया लोग रहते हैं, उनके प्रति जो अन्याय हुआ था, उस अन्याय को दूर करने के लिए यह जो ऐतिहासिक मौका है, उस मौके का उपयोग सरकार नहीं करना चाहती। इसलिए मैं इस बिल का विरोध कर रहा हूं।
जैसा अभी कानूनगो जी ने कहा कि सराईकलां और खरस्वां जिले की संस्कृति उड़िया है। मैं कहना चाहता हूं कि वहां ज्यादातर उड़िया भाषा-भाषी लोग रहते हैं, उनकी परम्परा उड़ीसा की परम्परा है। वह टेक्नीकली एक है, ऐथिकली एक है, कल्चरली एक है। वह उड़ीसा का एक अभिन्न अंग है। जब आजादी के बाद सरदार पटेल के नेतृत्व में उस स्टेट का उड़ीसा में मर्जर हुआ तब सराईकलां के राजा ने और खरस्वां के राजा ने इसी शर्त पर यूनियन गवर्नमैंट के साथ मर्जर किया कि उनका राज्य उड़ीसा प्रदेश में रहना चाहिए लेकिन शायद सराईकलां और खरस्वां दो ऐसे प्रिंसली राज्य हिन्दुस्तान में थे जिनके राजा ने लोगों की मर्जी के खिलाफ, शर्त के खिलाफ उड़ीसा से निकालकर बिहार में मिला दिया गया और यह कारण दिखाया गया कि उनका टेरीटोरियल कनेक्शन उड़ीसा के साथ नहीं है क्योंकि मयूरभंज का जो राजा था उसने उड़ीसा के साथ मर्जर के लिए देरी की। जब एस.आर.सी. हुआ, सीमा आयोग बना, सीमा आयोग की जो रिपोर्ट है, वह भी यूनेनीमस रिपोर्ट नहीं है। उस समय भारत के राष्ट्रपति स्वर्गीय राजेन्द्र प्रसाद जी थे जो कि बिहार के थे। मैं यह सब नहीं कहना चाहता लेकिन किस कारण के लिए उडिया भाषा-भाषी इलाके को उड़ीसा से छीनकर ले लिया गया ? अभी गृह मंत्री जी बता रहे थे कि उत्तर प्रदेश विधान सभा ने उत्तरांचल राज्य के लिए प्रस्ताव पारित किया, मध्य प्रदेश विधान सभा ने भी छत्तीसगढ़ राज्य के लिए प्रस्ताव पारित किया है, बिहार विधान सभा ने भी झारखंड राज्य के लिए प्रस्ताव पारित किया है।
इन विधान सभाओं के प्रस्तावों को केन्द्र सरकार को इज्जत देनी चाहिए, यह सही बात है। इस सिलसिले में मैं कहना चाहता हूं कि उड़ीसा की विधान सभा ने भी सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया है और उड़ीसा की कैबिनेट ने भी प्रस्ताव पारित किया है। उड़ीसा की हर पोलीटिकल पार्टी, स्टेट लैवल की पोलीटिकल पार्टी, ऑल इंडिया नैशनल लैवल की पोलीटिकल पार्टी, मैं दोहराना चाहता हूं -
"Each and every political party in Orissa have unanimously passed the resolution demanding the re-merger Saraikala and Khersawa in Orissa."
इस प्रस्ताव को भी, उड़ीसा के साढ़े तीन करोड़ लोगों की इस भावना को भी केन्द्र सरकार को मान्यता देनी चाहिए। आज सवाल उठता है, हमसे पूछा जाता है कि पचास साल तक आप चुप क्यों रहे। आज ये सवाल उठा रहे हैं। हम कभी चुप नहीं रहे। आपको याद होगा, यदि आप इतिहास का पन्ना देखेंगे तो सन् १९५६ में, जब एस.आर.सी. की रिपोर्ट आई, १९५५ और ५६ में सारे उड़ीसा में आग सी लग गई थी, लोग मरे। हजारों लोग पुलिस की लाठी चार्ज में जख्मी हुए, हजारों लोग जेल गए। ...(व्यवधान)
MR. SPEAKER: What is your objection?
श्री प्रसन्न आचार्य : जैसा मैंने कहा, झारखंड राज्य बनाने का सरकार एक ऐतिहासिक कार्य कर रही है। इसी तरह उड़ीसा के प्रति जो ऐतिहासिक भूल की गई थी, उस भूल में संशोधन करने का ऐतिहासिक कर्तव्य भी केन्द्र सरकार का है। इसलिए मेरा माननीय गृह मंत्री जी से निवेदन है कि आज इस बिल को इंट्रोडयूस न करें, इसे डैफर कर दें और आवश्यक परिवर्तन के साथ कि सराई कला और खरसवां का उड़ीसा में भी मर्जर होगा, इस संशोधन के साथ इस बिल को इंट्रोडयूस करें।
MR. SPEAKER: Shri Kanungo, the financial memorandum is also there in the Bill at page 47.
SHRI TRILOCHAN KANUNGO : Yes, it is there but is it as per the language and spirit of Rule 69? I have said that in my speech.
MR. SPEAKER: That is also there in that.
SHRI TRILOCHAN KANUNGO: But the position about the recurring expenditure and non-recurring expenditure may be incorrect.
MR. SPEAKER: You can see page 9 also.
SHRI TRILOCHAN KANUNGO : I have gone through that.
डा. रघुवंश प्रसाद सिंह : हम बयान, व्यवहार और काम से देख रहे हैं कि सरकार के वचन और काम में मेल नहीं है। सरकार बोलती कुछ है, करती कुछ है और कहती कुछ और है। अभी गृह मंत्री जी बोल रहे थे कि विधान सभा ने इनको कह दिया। बिहार विधान सभा ने बिहार विभाजन के प्रस्ताव को, राष्ट्रपति जी ने जब मांग की थी, तो खारिज भी कर दिया था। उसके बाद जितनी जिद आप अभी इंट्रोडयूस करने के लिए किए हुए हैं, उससे कम जिद उस समय नहीं की थी। आपकी नजर में विधान सभा क्या होती है। बिहार विधान सभा पास करती है तो कुछ बात को आप आधार बनाते हैं। मैं क्रिया दूंगा कि आप बिहार विधान सभा की बात मान लीजिए, अक्षर-अक्षर मानिए, उसमें पीछे हटें तो कहा जाए। ...(व्यवधान) जम्मू कश्मीर ने भी विधान सभा पास कर दिया है। उस समय भी हम देखेंगे कि विधान सभा के प्रस्ताव पारित करने की आपके मन में क्या इज्जत है। आप डैमोक्रेसी चलाना चाहते हैं या क्या करना चाहते हैं। ...(व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : उन्हें डिस्टर्ब मत कीजिए। वे डिस्टर्ब हो गए तो प्रौब्लम हो जाएगी।
डा. रघुवंश प्रसाद सिंह : झारखंड के सवाल पर सौ वर्षों से आंदोलन है। अंग्रेजी सल्तनत ने कहा, उसका औचित्य नहीं है, कौन्सटीटूऐंट असैम्बली में बहस हुई, उसने कहा, उसका औचित्य नहीं है, पंडित जवाहर लाल नेहरू के राज में कहा गया, उसका औचित्य नहीं है, स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी के राज में कहा गया, उसका औचित्य नहीं है, राजीव गांधी जी के राज में भी कहा गया, उसका औचित्य नहीं है। लेकिन आंदोलन जारी रहा। मांग उठती रही। जब श्री नरसिंह राव थे, झारखंड पार्टी के समर्थन की आवश्यकता थी तो राजनैतिक कारणों से बिहार के बंटवारे की हवा दी गई। उसके बाद भाजपा की हुकुमत आ गई। ये लोग अब तो झारखंड पर तैयार हैं, वृहद झारखंड की मांग हो रही थी कि आदिवासियों का राज होगा, बंगाल के आदिवासी बहुल इलाके, उड़ीसा के आदिवासी बहुल इलाके, बिहार और मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल इलाकों को मिलाकर वृहद झारखंड बनाया जाए।
मध्य प्रदेश में गोंडवाना था। उसके दो खंड कर रहे हैं। गोंडवाना जो आदिवासी बहुल इलाका था, उसको दो भागों में बांटने के लिए और भविष्य में उस पर हुकूमत चलाने के लिए कर रहे है। बिहार विधान सभा ने इसे खारिज किया था औऱ उसके बाद भी जिद की हुई थी और आपके यहां बैठक हुई थी, कहा-सुनी हुई थी, झड़प हुई थी। उस पहले दिन बिल इंट्रोडयूस नही हो सका था और जब बिल इंट्रोडयूस हुआ तो लैप्स हो गया। पिछले समय में ऐसी कोशिश हुई थी। अभी कहते हैं कि विधान सभा की मैं इज्जत करता हूं औऱ जनतांत्रिक हूं। विघान सभा और विधान परिषद की कार्यवाही मैं आपकी सेवा में सुपुर्द करता हूं और इसे मैं सदन की मेज पर रखता हूं। वह भी सोवराइन विधान मंडल है। १९१२ में बिहार और उड़ीसा, बंगाल से अलग हुए थे। बिहार और उड़ीसा लेजिस्लेटिव असेम्बली बने थे। १९३७ में उड़ीसा अलग हुआ था। उसके बाद बिहार विधान मंडल चल रहा है। बिहार विधान परिषद की कार्यवाही में लोगों ने बहस की है। बिहार में जो विधेयक भेजा गया, उसमें उद्देश्य और हेतु गायब था। वहां भी पच्चीस-तीस वर्ष पुराने विधायक हैं, इनकी पार्टी से भी हैं और सब पार्टी के लोग हैं। सभी ने आश्चर्य प्रकट किया। भारत सरकार का इतना काबिल मंत्रालय...( व्यवधान) डिस्टर्ब होने से हम और फायदे में हो जाते हैं। कम से कम २६ पृष्ठों में बहस की गई। भारत सरकार का गृह मंत्रालय इतनी काबलियत का दावा करता है लेकिन उद्देश्य उस विधेयक से गायब क्यों है ? 26 पृष्ठों में उस पर बहस हुई है। उन लोगों ने चिंता प्रकट की। वहां की सरकार को भी बार-बार सोचना पड़ा कि कैसे उस विधेयक पर लोगों की राय ली जाये। फिर भी बिहार विधान सभा ने पारित कर दिया। इस बार हाल में...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : बाद में डिसकस करेंगे।
डा. रघुवंश प्रसाद सिंह : गृह मंत्री जी के मन में बिहार विधान सभा के निर्णय के प्रति इज्जत है और इनकी पार्टी का तो और ज्यादा का प्रस्ताव है। मैं अलग से बता देता हूं कि सर्वसम्मत प्रस्ताव है- १,८९,९०० करोड़ रुपये का तथा बाकी बिहार को दिया जाये जिसकी आर्थिक हालत बदतर हो जाएगी और यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ है।
श्री खारबेल स्वाइं (बालासोर) : बिहार के आदिवासियों के लिए अभी रोना कैसे बंद कर दिया ? रोइए न।
डा. रघुवंश प्रसाद सिंह : आदिवासियों का भला हो जाये और यह झारखंड प्रदेश हो जाये। है कोई माइका लाल जो चुनौती स्वीकार करेगा ? है कोई जो आदिवासियों के लिए लड़े ? बिहार विधान मंडल आदिवासियों का प्रांत बने और गोंडवाना मध्य प्रदेश में आदिवासियों को क्यों बांटकर रखे हो ? मैं भेद खोल दूंगा और ढ़ोल की पोल खुल जाएगी तथा मैं असलियत बता दूंगा कि आदिवासियों का भला करने वाले कौंन हैं। विधान सभा में सर्वसम्मति से पारित किया गया। उस इकॉनोमिकल पैकेज का संशोधन इसमें आ रहा है। इसका जिक्र इन्होंने नहीं किया बल्कि यह कहा कि उद्देश्य हेतु प्लानिंग कमीशन ने रख दिया, खटाई में डाल दिया। इस राज्य के द्वारा बिहार का सत्यानाश करने की तैयारी है। मैं कहना चाहता हूं कि बिहार विधान सभा ने जो सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया और बिहार विधान परिषद ने इसे पारित किया है, हमारा सर्वसम्मत प्रस्ताव १,८९,९०० करोड़ रुपये का है लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने २,१०,००० करोड़ कर दिया है। इसमें सबूत भारतीय जनता पार्टी की ओर से दिया गया प्रस्ताव है जिसमें २,१०,००० करोड़ रुपये है।
मैं कहना चाहता हूं …( व्यवधान) आप लोगों से तो पूछा भी नहीं जाता है। श्री कानुनगो और श्री प्रसन्ना आचार्य, जो एनडीए के सदस्य हैं, उन्होंने आपत्ति दर्ज कराई। आपकी हैसियत आपत्ति दर्ज कराने की है? श्री प्रभुनाथ जी ने असलियत का सवाल उठाया है। एनडीए के आपस की मन की पीड़ा के बारे में हमको बताते हो। पक्ष में खड़े होते हैं, चापलूसी बन्द करिए …( व्यवधान) महोदय, मैं एक सवाल उठा रहा हूं। बिहार की दस करोड़ आबादी का शोषण हुआ है। भारत सरकार द्वारा शोषण जारी है। हमारा ६ करोड़ ८५ लाख रुपया रुका हुआ है …( व्यवधान)
श्री राजीव प्रताप रुढी : बीस साल हो गए, पंचायत के चुनाव नहीं हुए है और १५ साल आपकी सरकार को हो गए हैं। …( व्यवधान)
श्रीमती रेनु कुमारी (खगड़िया) : आप अपने दामने में झांक कर देखिए, बिहार में आपकी सरकार क्या कर रही है। …( व्यवधान) विकास के लिए पैसा नहीं है। …( व्यवधान)
डा. रघुवंश प्रसाद सिंह : बिहार के विभाजन से वहां की जनता का विकास नहीं होगा। केन्द्रीय सरकार अपनी बदनियती और दोहरे मापदंड को छोड़ दे। अन्याय की कार्यवाही को छोड़ दे और विधान सभा ने जो पारित किया है, उस प्रस्ताव को अक्षरश: गृह मंत्री जी मान लें, तब मैं देखूंगा कि मर्यादा क्या कहती है, जनतन्त्र क्या कहता है।
महोदय, इस विषय में अन्य माननीय सदस्यों को भी सुना जाए, लेकिन तकनीकी फैसला जो आपने दिया है, वह हमको उचित नहीं लगता है। इन शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
SHRI PADMANAVA BEHERA (PHULBANI): Sir, I am one with my hon. friends, Shri Trilochan Kanungo and Shri Prasanna Acharya श्री रामजी लाल सुमन (फिरोजाबाद) : अध्यक्ष महोदय, राज्यों के गठन के संबंधमें माननीय गृह मंत्री जी ने जो भाषण दिया है, उसमें उन्होंने दो बातें मुख्य कही हैं। एक बात यह कि विधान सभाओं ने प्रस्ताव पारित किया है और दूसरे यह कि जिन राज्यों का हम गठन कर रहे हैं, वहां के लोग इससे सहमत हैं, इसके पक्ष में हैं। लगता है कि गृह मंत्री जी को यह गतलफहमी हो गई है कि हिन्दुस्तान की हर समस्या का इलाज नए राज्य बनाना है। इस देश में बेबसी, लाचारी, भूख, प्यास, बेरोजगारी और विकास में कमी, जिनका जनता की जिन्दगी से रिश्ता है, न तो सदन के अन्दर और न सदन के बाहर उस पर चर्चा हो रही है। अलग राज्य बनाए जाने से वहां के लोगों को कायाकल्प नहीं हो सकता है, वहां के लोगों की हालत नहीं बदल सकती है। हिन्दुस्तान की बुनियादी समस्याओं की तरफ आपको ध्यान देना चाहिए। लोगों की माली हालत कैसे बेहतर हो, बेरोजगारी कैसे दूर हो, रोजगार के अवसर कैसे पैदा हों, सड़के कैसे बनें, विकास कैसे हो, इन पर सदन में चर्चा होनी चाहिए। मैं आपके द्वारा माननीय गृह मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि वे जल्दबाजी न करें, देश की जनता को विश्वास में लें, तो उसके अच्छे परिणाम निकलेंगे।
प्रो, रासासिंह रावत (अजमेर) : महोदय, इनकी कथनी और करनी में अन्तर है। इनके दल की कार्य समति का राष्ट्रीय अधिवेशन पांच-सितारा होटल, आगरा में हुआ है। …( व्यवधान)
16.00 hrs. ये गरीबों की बात कर रहे हैं।…( व्यवधान)
श्री रामजीलाल सुमन : महोदय, हम लोग तो कभी-कभी फाइव स्टार होटल में मीटिंग कर लेते हैं, यहां ८० फीसदी लोग फाइव स्टार होटल में ही रहने वाले हैं, यही फर्क है।…( व्यवधान)
SHRI K.P. SINGH DEO : I rise to oppose the introduction not from any point of view of language on which the States Reorganisation Commission of l956 was done, neither from the point of the largeness or the smallness of the States. But mine is a totally different point and I would like to crave the indulgence of the House and draw you back to 1947 during the lapse of paramountcy.
When paramountcy was over, on the l4th of August, l947, Saraikala and Kharswan, along with the other Orissa States, 26 of them, out of the 544 were the first to accede to the Indian Union and thereafter when the Merger Agreement took place in l948, till then, my father was the first and till 1948 the Collector of Balasore used to look after Saraikala and Kharswan . But due to some action later on by some understanding Saraikala and Kharswan were administered by someone from Bihar. This was taken up in the Federal Court which was there during the Constituent Assembly days. When the Constitution came into being, the Federal Court was replaced by the Supreme Court. The Federal Court did not give a decision. The Supreme Court swept it under the carpet and then suddenly we found that the aggressor like Israel was riding roughshod over the area of the Arab countries, the aggressor took charge of Saraikala and Kharswan .
I am not talking of language or anything. Otherwise, I will go to Jagdalpur, I will go to Srikakulam, your own State. There are 40 per cent Oriya speaking people and I am not talking about language, culture or anything. Today Kashmir is in India because of the signature of Maharaja Hari Singh. So also, Saraikala and Kharswan merged with Orissa part of the Orissa States, the 26 of them in the Eastern State Agency. Just before Mayurbhanj which is part of Part of Orissa used to be part of the Bengal State along with Tripura.
Therefore, the just demands of Orissa have not been looked after in this legislation which has been brought, the Bihar Reorganisation Bill, 2000. Since no States Reorganisation Commission has been set up after l956 there was no opportunity for this House or for Orissa or for the Orissa Assembly or for anyone to come forward with any grievance. Now that this legislation has been brought by the hon. Home Minister -- the hon. Minister is a very able and capable Home Minister – I am sure if he goes through what I have said, if I have said something which is not factual, if I have said something which is not true, he can set it aside . But if what I have said is true then I expect the Home Minister to correct the aberrations and to return Saraikala and Kharswan to Orissa.
श्री बसुदेव आचार्य : हम बिहार पुनर्गठन विधेयक-२००० का विरोध कर रहे हैं, इसकी कोई जरूरत नहीं है। पहले राज्य पुनर्गठन आयोग बनाकर इसे किया जाये जोकि नहीं किया है। इसके जो कारण बताये जा रहे हैं वे भी कोई सही कारण नहीं हैं। एक कारण बताया गया कि बिहार विधान सभा में सर्वसम्मति से यह हुआ है। हमारी पार्टी ने वहां भी इसका विरोध किया था। इसलिए यह सर्वसम्मति से नहीं बहुमत से हुआ है। क्या विधान सभा में जो भी सर्वसम्मति से पारित होगा, उसे आप लागू करेंगे। इसलिए हम कह रहे हैं कि यह सिलैक्टिव है। क्या अंडमान-निकोबार की जो प्रांतीय कॉन्सिल है उसने यह पारित नहीं किया है कि अंडमान-निकोबार को राज्य का दर्जा दिया जाये। उस पर अमल नहीं है लेकिन आज उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार का विभाजन करने की बात चल रही है। इसमें पूरे हाउस की भी राय नहीं ली गयी है, राजनैतिक दलों की भी राय नहीं ली गयी है और जो एन.डी.ए. के कांस्टीटयूएंट दल हैं उनसे भी कोई राय नहीं ली गयी है। अभी प्रभुनाथ सिंह जी और देवेन्द्र जी बोलने के लिए तैयार हो रहे हैं और वे बोलेंगे।
उड़ीसा से मांग आ रही है कि उन्हें खरस्वॉन और सरायकला लौटा दो। बंगाल से भी मांग आ सकती है कि खाली पुरलिया नहीं, पूरा धनबाद जिला हमें लौटा दो, क्योंकि पुरलिया बंगला भाषा के कारण चला गया, लेकिन वहां बंगला-भाषियों की भी बहुत आबादी है। लेकिन हम विभाजन नहीं चाहते हैं, हम बंटवारा नहीं चाहते हैं, हम तो देश की अखंडता की रक्षा चाहते हैं। लेकिन जो कदम आप उठा रहे हैं उससे देश में ऐसी मांगे दूसरे प्रदेशों से भी आयेंगी और आप उनको रोक नहीं सकेंगे। हमारे विरोध का यही कारण है।
दूसरा, आप विधान सभा के प्रस्ताव के बारे में जिक्र कर रहे हैं। लेकिन उसके साथ तो वह पैकेज भी जुड़ा हुआ है, वह अलग नहीं है। जो १ लाख ७९ हजार ९०० करोड़ रुपये अलग नहीं हैं। उनका इस विधेयक में कहीं भी जिक्र नहीं किया गया है।
आप इसके ऊपर विचार करें। वहां की विधान सभा ने इसे बहुमत से पास किया है। बी.जे.पी. ने २ लाख १० हजार रुपए की मांग की थी। आप इसे बारे में अपने जवाब के समय बोलें। इसलिए हम कहते हैं कि यह सिलेक्टिव है। आप राज्य का विभाजन करना चाहते हैं। इसके साथ जुड़े मामले अलग नहीं हैं। वह प्रस्ताव बहुमत से पारित हुआ है। आपने उसे छोड़ दिया। दक्षिण बिहार अलग हो गया तो उत्तर बिहार का क्या होगा? हमें इस बारे में सोचना पड़ेगा। सरकार ने इस बारे में सोचा नहीं है। उसने इतना ही सोचा कि विभाजन कर दो और यदि इस बारे में मांग हुई है तो इसे ले आओ। इसका कोई आधार नहीं है? इसलिए हम इसका विरोध करते हैं। हम गृह मंत्री से आग्रह करेंगे कि वह इस विधेयक को न लाएं और इसे वापस ले लें। ऐसा करके वह देश को बचाएं और बिहार का बंटवारा न करें।
एक माननीय सदस्य: यह बंटवारा नहीं है।
श्री बसुदेव आचार्य: हम भी हिन्दी जानते हैं।... (व्यवधान)
श्री लाल मुनी चौबे: यह आपने आप को गरीबों का मसीहा कहते हैं। यह दक्षिण बिहार को उत्तर बिहार का गुलाम बनाना चाहते हैं और उसके बाद पैकेज लाना चाहते हैं। दक्षिण बिहार में कौन लोग रहते हैं? वहां के आदिवासियों का सैंकड़ों वर्षों से शोषण हो रहा है। यह बिहार को अपने पैरों को खड़ा होने नहीं देना चाहते।... (व्यवधान)
श्री बसुदेव आचार्य: हम सब बातें अच्छी तरह से जानते हैं।
MR. SPEAKER: Shri Basu Deb Acharia, please conclude now.
श्री लाल मुनी चौबे: आप बिल्कुल नहीं जानते। आप पुरुलिया नहीं जाते हैं। कुछ बातें केवल घर में बैठ कर कही जाती हैं। आज आप देश के सामने बोल रहे हैं। आप इन्हें कब तक गुलाम बनाए रखेंगे? (व्यवधान)
MR. SPEAKER: Shri Chaubey, you are unnecessarily provoking him.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER: This will not go on record.
(Interruptions) … * श्री बसुदेव आचार्य: यह राष्ट्र विरोधी काम है। आप देश का बंटवारा करना चाहते हैं। इसलिए हम इसका विरोध करते हैं। इस बिल को वापस लिया जाए।
* Not recorded SHRI RUPCHAND PAL : Sir, when I have been saying that there is no consensus in this country about the steps being taken by this Government, it is only corroborated subsequently that in Orissa, where some of the partners of the NDA Government are ruling, the State Assembly has adopted a Resolution with regard to Seraikella and Kharsawan. But this Government has not been listening to the very justified and democratic demands expressed in the Resolution passed by the Orissa Assembly. When the hon. Home Minister has been saying about consensus in the Government, even at that point we find that Shri Prabhunath Singh, whose party is a partner in this Government, has been objecting to that, saying that there was no consensus and this decision is unilateral.… (Interruptions)
MR. SPEAKER: Shri Mandal, please take your seat.
SHRI RUPCHAND PAL : Sir, this Government is behaving in a manner opposed to each other. On the one hand they are taking away the rights and authorities of the States and depriving the authorities of the States and on the other hand failing to respond to the needs of the States in a critical situation which we have witnessed very recently in the State of Maharashtra when the State has sought some help in the form of Central forces from this Government.
This Government is eroding the authorities and rights of the existing States. On the other hand they are trying to say that they are fulfilling the democratic aspirations of the people. They are doing it to fulfil some partisan ends and they are doing it in a selective manner. So, I am opposing it.
MR. SPEAKER : Hon. Minister to speak now.
… (Interruptions)
MR. SPEAKER : Shri Prabhunath Singh and Shri Devendra Prasad Yadav, please understand. You have not given any notice. At this stage, without notice, the Chair cannot allow you.
… (Interruptions)
श्री प्रभुनाथ सिंह : अध्यक्ष महोदय, मैंने भी नोटिस दिया है, चाहे थोड़ा विलम्ब से दिया है।
अध्यक्ष महोदय : आपने नोटिस नहीं दिया है।
श्री प्रभुनाथ सिंह : अध्यक्ष जी, मैंने विलम्ब से दिया है। बिहार का सवाल है, मैं दो मिनट समय लूंगा।
अध्यक्ष महोदय : प्रभुनाथ सिंह जी, आपने नोटिस नहीं दिया है।
श्री प्रभुनाथ सिंह : हमने दिया है।
अध्यक्ष महोदय : सुबह १० बजे नोटिस देना था, अभी नहीं।
श्री प्रभुनाथ सिंह : अध्यक्ष जी, मैं दो मिनट में अपनी भावना आपके सामने रख देना चाहता हूं। अभी बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक आया है.....
श्री लालमुनि चौबे : अध्यक्ष महोदय, जिन लोगों ने नोटिस नहीं दिया, फिर भी उन्हें बोलने दिया जाये, यह बात सब लोगों के साथ एक जैसी होनी चाहिये। इन्होंने नोटिस लखित नहीं दिया है।
श्री प्रभुनाथ सिंह : हमने नोटिस विलम्ब से दिया है।
श्री लालमुनि चौबे : विलम्ब से हम लोग भी तो दे सकते हैं।
श्री प्रभुनाथ सिंह : अध्यक्ष जी, मैं कहना चाहता हूं कि बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक यहां आया है। हम यह मानकर चलते हैं कि एन.डी.ए. के मैनिफैस्टो के अनुसार वनांचल राज्य बनाने की बात थी, जबकि इसमें झारखंड के नाम से बात चल रही है। बिहार में भी कई वर्षों से झारखंड की डिमांड हो रही थी...
अध्यक्ष महोदय : इस बिल के बारे में आपको क्या आब्जैक्शन है, उस बारे में बोलिये।
श्री प्रभुनाथ सिंह : अध्यक्ष महोदय, जब तक पूरी भूमिका नहीं बांधेंगे, आब्जैक्शन कोई समझ नहीं सकेगा। हम यह कहना चाहते हैं कि …( व्यवधान)
SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : Sir, let the NDA be brought into peace. We are in the Opposition. We are confused as to what they are doing and saying. … (Interruptions)२ अध्यक्ष महोदय : प्रभुनाथ सिंह जी, यह इंट्रोडक्शन स्टेज है, कंसीड्रेशन की बात नहीं है। उसी समय आप कह सकते हैं।
श्री प्रभुनाथ सिंह : हम भाषण नहीं दे रहे हैं, अपनी आपत्ति कह रहे हैं। हम यह कहना चाहते हैं कि श्री जॉर्ज फर्नान्डीज के नेतृत्व में एक डेलीगेशन प्रधानमंत्री जी से मिला था और उनसे कहा था कि अगर बिहार का बंटवारा होगा तो उसे विशेष पैकेज देने की बात थी लेकिन इस बिल में वह विशेष पैकेज देने की बात को बिलकुल स्पष्ट नहीं किया गया है कि बचे हुये बिहार के लिये पैकेज क्या दिया जायेगा। हम आपसे निवेदन करेंगे कि जब तक बचे हुये बिहार के पैकेज की बात साफ-सुथरी न हो जाये, इस विधेयक को नहीं लाना चाहिये अन्यथा बिहार की जनता के साथ खिलवाड़ होगा।
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव (झंझारपुर): अध्यक्ष महोदय, मैं बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक के प्रति सिद्धान्तत: खिलाफ नहीं हूं और इस विधेयक के खिलाफ इसलिये भी नहीं हूं कि इससे आदिवासी और दबे-कुचले लोगों का विकास हो, यह मैं चाहता हूं.। इस विधेयक का जो हेतू और उद्देश्य़ हैं, पूरे देश में इतनी मेहनत, रिहर्सल और एक्सरसाइज़ करके इस बिल को लाया गया है।
अध्यक्ष महोदय, आप देख सकते हैं कि जो इसके हेतु और उद्देश्य है, माननीय सदस्य श्री प्रभुनाथ सिंह ने ठीक ही कहा था कि जो स्पेशल पैकेज देने की बात थी, वह इसमें बिल्कुल लुप्त नजर आ रही है, कहीं उसका स्पष्ट जिक्र नहीं है और प्लानिंग कमीशन में डिप्टी चेयरमैन को भेज दिया गया। क्या बिहार के शेष नौ करोड़ लोगों की नीड्स को, उनकी गरीबी को, उनकी फ्लड डिवास्टेशन को, बिहार में नदी और बालू में छोड़ देने का यह प्लान बनाया जा रहा है। बिहार को उपनिवेश कालोनी नहीं बनने दिया जाए, बिहार के ह्ृदय को नहीं बांटा जाए। हम सब लोग एक हैं। आदिवासी और शेष बिहार के नौ करोड़ लोग हम सब एक हैं। हम उनकी भावना से जुड़े हुए हैं। लेकिन हम यह नहीं चाहते हैं…( व्यवधान) मैं इन प्रसिपल इसके खिलाफ नहीं हूं। लेकिन बिहार के जो नौ करोड़ लोग हैं, जहां छ: करोड़ लोग छ: महीने बाढ़ और छ: महीने सुखाड़ में रहते हैं - क्या उन लोगों के जीवन के बारे में कभी सोचा गया है, क्या उनके बारे में कभी कल्पना की गई है कि शेष बिहार की क्या हालत है। इसीलिए मैं निवेदन करना चाहता हूं कि जैसा प्रभुनाथ सिंह जी ने ठीक ही कहा था और मैं भी अपने आपको उनसे सम्बद्ध करता हूं कि एन.डी.ए. के सभी माननीय सदस्यों की बैठक नहीं बुलाई गई, इसे मैं प्रोसीडिंग्स में दर्ज करता हूं, एन.डी.ए. के सभी सदस्यों को विश्वास में नहीं लिया गया और कुछ नेताओं से बात करके यह बिल लाया गया है। इसलिए हम चाहते हैं कि एक कांम्प्रीहेन्सिव बिल लाया जाए। निश्चित रूप से इस तरह का बिल आये। हम लोग बिल के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन बिहार विधान सभा में जो प्रस्ताव पारित हुआ है, उसके मात्र २५ प्रतिशत भाग को इसमें अंगीकार करके, समाहित करके यहां लाया गया है, ७५ परसेंट जो बिल का कान्सेप्ट था, उद्देश्य था, हेतु था, एम्स और ऑब्जेक्ट्स था, उसे नहीं रखा गया है। इसमें बी.जे.पी. के माननीय सदस्य, जो बिहार में रहते हैं, उन्हें भी मालूम है और हमारे माननीय सदस्यों को मालूम है कि किन लोगों ने किस तरह से ..वृहत झारखंडराज्य के पक्षधर रहे है… (Interruptions)
MR. SPEAKER: Shri Yadav, this is Introduction Stage. What is this?
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव : ठीक है, इंट्रोडक्टरी स्टेज है, मैं इस बात को जानता हूं। विषय आने पर हम बोलेंगे। लेकिन मेरा आपके माध्यम से सरकार से नम्र निवेदन है कि इस बिल को इस रूप में, प्रेजेन्ट फोर्म में न लाया जाए, इसे अभी तत्काल वापिस किया जाए।
SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : Mr. Speaker Sir, my appeal, through you, to the Government is that any Bill that the Government wants to introduce in future - it is a different issue whether we cooperate or not – let them sort the issue among their constituents and bring it here, and not put us into greater confusion about transparency of the functioning of the Government. … (Interruptions) This is questioning their transparency. … (Interruptions) No, they cannot. … (Interruptions)
SHRI VAIKO (SIVAKASI): It was agreed to by all the Leaders in the NDA. ….(Interruptions)
MR. SPEAKER: Hon. Members, please do not interrupt. It has already taken two hours.
श्री लाल कृष्ण आडवाणी : अध्यक्ष जी, बिहार के इस पुनर्गठन विधेयक के संबंध में जो चर्चा हुई है, उसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण जो मुद्दा उभरा है वह यह है कि जब दो राज्य बनेंगे - झारखंड और बिहार, तो उस समय बिहार की वित्तीय स्थिति कैसी होगी और इस कारण जो स्पेशल पैकेज की बात यादव जी ने कही, प्रभुनाथ सिंह जी ने कही या विपक्ष की ओर से कही गई, उसके बारे में मैं इतना बता सकता हूं कि तब से लेकर, आज नहीं, १९९८ में पहली बार जब इस अलग राज्य के गठन की बात सोची गई, प्रभुनाथ सिहं जी ने सही कहा कि हम इसे उस समय वनांचल कहते थे, झारखंड नहीं कहते थे। चूंकि झारखंड का आंदोलन जब शुरू हुआ था तो उस आंदोलन में केवल मात्र दक्षिण बिहार को झारखंड बनाने की कल्पना नहीं थी। जिन लोगों ने वह आंदोलन शुरू किया, उन्होंने कहा कि छोटा नागपुर संथाल परगना बिहार का हिस्सा, एक हिस्सा पश्चिम बंगाल का, एक हिस्सा उड़ीसा का और एक हिस्सा मध्य प्रदेश का, ये सारे हिस्से मिलाकर, जिसमें वनवासी बाहुल्य जनसंख्या हो, उन्हें एक झारखंड राज्य के रूप में बनाया जाए।
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव : वृहद् झारखंड राज्य।
श्री लाल कृष्ण आडवाणी : हां, ठीक है। लेकिन वनांचल की कल्पना बाद में जब भारतीय जनता पार्टी की ओर से की गई तब वह इस रूप में की गई कि यह हमें संभव नहीं लगता कि बाकी प्रदेश अपने राज्यों का हिस्सा दे देंगे और एक नया राज्य बन जायेगा। यह व्यावहारिक नहीं है और यह बात तब तक प्रमाणित भी हो गई जब एक-एक राज्य ने पश्चिम बंगाल ने, उड़ीसा ने और मध्य प्रदेश ने कहा कि हम किसी भी सूरत में झारखंड का हिस्सा नहीं बनना चाहते - तब हमने कहा कि छोटा नागपुर संथाल परगना का जो क्षेत्र है, उसे हम वनांचल के रूप में रखें। हमने नाम इसलिए रखा क्योंकि उस समय झारखंड की कल्पना वृहद् झारखंड की थी, इसीलिए अलग रखा।
उसमें हमने कहा कि इस नाम पर झगड़ा मत करो। आखिर यहां की जनता ने आंदोलन किया है झारखंड के रूप में खासकर वनवासियों ने झारखंड के नाम पर आंदोलन किया है। इसलिए अगर वे मानते हैं कि हम छोटा नागपुर, संथाल परगना के क्षेत्र को अलग राज्य बनाने की कल्पना करते हैं तो आप नाम पर झगड़ा मत करिये और इसलिए उस समय १९९८ में जब हम वनांचल की बात कर रहे थे तब भी हमको इस बात की चिन्ता थी कि आखिर बिहार राज्य के अधिकांश संसाधन यहां पर हैं। मनिरल्स हैं, और भी बहुत सी चीजें हैं तो उत्तर बिहार का क्या होगा। हम चाहेंगे कि दो राज्य जब बनें तो दोनों राज्य सुखी, सम्पन्न और समृद्ध हों। किसी में कमी न रहे और इसलिए स्पेशल पैकेज के नाम पर लोगों ने इतने लाख करोड़ रुपये मांगे, बड़ा मुश्किल है इस समय कहना और इतने लाख करोड़ रुपये शायद कुल मिलाकर पूरे बिहार के पास भी होंगे या नहीं, नहीं कह सकते लेकिन पहली बार राज्य पुनर्गठन की कल्पना करते हुए १९९८ में मंत्रिमंडल ने निर्णय किया और मैं उस निर्णय को पढ़कर सुनाना चाहता हूं क्योंकि आज की इस चर्चा के संदर्भ में वह समीचीन है।
"In view of certain normative economic factors that would operate in the remaining State of Bihar, consequent upon the formation of a new State of Vananchal, a dedicated unit may be set up in the Planning Commission to deal exclusively with Bihar under the direct charge of the Deputy Chairman, Planning Commission. This unit will inter alia ensure that with the help of better financial management and adequate devolution of funds from the Centre, multi-faceted development of the region takes place especially with respect of core infrastructure."
SHRI BASU DEB ACHARIA : It is very vague.
श्री लाल कृष्ण आडवाणी : यह निर्णय है और आपकी अनुमति से मैं यहां विधेयक प्रस्तुत करने की अनुमति ले रहा हूं क्योंकि यह अभी कानून नहीं है, लेकिन स्टेटमेंट ऑफ ऑब्जेक्ट्स एंड रीजन्स में पैराग्राफ ३ में यह बात लिखी है।
"Paragraph 3 says, The Government has set up a unit in the Planning Commission under the direct charge of the Deputy Chairman, Planning Commission, to deal exclusively with matters relating to the development of the rest of Bihar, consequent upon the formation of the State of Jharkhand."
मैं इन चीजों का उल्लेख इसलिए कर रहा हूं क्योंकि यह सरकार इसके प्रति उदासीननहीं है कि इस प्राकर का विभाजन ही होगा कि जिस विभाजन में काफी संसाधन दक्षिण बिहार के पास पहुंच जाएंगे अर्थात् झारखंड के पास पहुंच जाएंगे। उत्तर बिहार भी संपन्न रहे, उत्तर बिहार भी प्रगति करता रहे, वह भी समृद्ध बने, यह भी जिम्मेदारी भारत सरकार की है और उसके प्रति हम जागरूक हैं। बाकी जितनी बातें कही गई हैं, उनके बारे में कुछ कहना होगा तो जिस समय बहस होगी, मैं जवाब दूंगा और जिस समय कंसिडरेशन के लिए लिया जाएगा मैं जवाब दूंगा। धन्यवाद।
…( व्यवधान)
१६२८ बजे ( तत्पश्चात् श्री मुलायम सिंह यादव, श्री रघुंवंश प्रसाद सिंह, श्री बसुदेव आचार्य तथा कुछ अन्य माननीय सदस्यों ने सदन से बहिर्गमन किया।) MR. SPEAKER: The question is:
"That leave be granted to introduce a Bill to provide for the reorganisation of the existing State of Bihar and for matters connected therewith."
The motion was adopted.
श्री लाल कृष्ण आडवाणी : महोदय, मैं विधेयक पुर:स्थापित करता हूं। *
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* Introduced with the Recommendation of the President