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Lok Sabha Debates

Further Discussion On The Motion Regarding Consideration Of Progress Of ... on 25 July, 2003

ont> 14.04 hrs. The Lok Sabha re-assembled at four minutes past Fourteen of the Clock.

(Mr. Deputy-Speaker in the Chair) MOTION RE : CONSIDERATION OF PROGRESS OF IMPLEMENTATION OF PARTS IX AND IX-A OF THE CONSTITUTION DEALING WITH PANCHAYATS AND MUNICIPALITIES – contd.

 Title: Further discussion on the motion regarding consideration of progress of implementation of parts IX and IX-A of the constitution dealing with Panchayats and Municipalities raised by Kashiram Rana on 24th July, 2003 (continued – concluded).

MR. DEPUTY-SPEAKER: The House shall now take up further discussion on the motion moved by Shri Kashiram Rana yesterday. Now Shri Vinay Kumar Sorake will lay his speech on the Table and thereafter Dr. Raghuvansh Prasad Singh will speak.

*SHRI VINAY KUMAR SORAKE (UDUPI) : While welcoming the Bill on Rural Development Panchayati Raj, which is long overdue, I would like to add my observations.

Our late Prime Minister, Shri Rajiv Gandhi, had envisioned this project of empowering the local bodies, espeically Panchayats. His vision encompassed all aspects of rural development – water, road, education, sanitation and communications links etc. The Rajiv Gandhi Technology Mission had made rapid strides in providing safe drinking water to rural population which has now been re-named as Swajaldhara.

* Laid on the Table.

As far as my constituency – Udupi is concerned allocations under Rajiv Gandhi Water Technology Mission projects were not earmarked as the allocations were made when Udupi was a part of Dakshina Kannada District. After bifurcation from Dakshina Kannada District as a separate district, it has not received any substantial allocation of grants under Rural Development scheme.

Udupi Zila Praishad has done pioneering work on many such schemes mainly drinking water supply. It had undertaken a thorough survey of the ground water/river water potential of the region and has drawn a detailed project for implementation under the Swajaldhara Scheme which has already been forwarded to the Centre for approval and sanction of grants. The Zila Panchayat has mobilised community support for the project by undertaking to provide 10% of the total estimate mainly through public contributions. Now that there has been undue delay in the approval of the project by the Centre, the people of Udupi have become restless and even questioned the Zila Panchayat of the utilisation of fund mobilised for the purpose (10%) of the project. Because of the delay at the Centre’s level, the Panchayat has lost trust and goodwill among its communities.

Empowering local bodies like Panchayats is laudable but adequate funds should be made available to Panchayats and also the power and discretion to spend such allocations without any bureaucratic interference. Complete freedom should be given to Panchayats and their bodies confederate like Zila Parishad both in terms of prioritising the projects and also controlling the funds allocated for them.

Local community is ever willing to involve itself with any projects undertaken under the overall supervision of Zila Praishads – be it sanitation, cleanliness, road connectivity, healthcare centres and primary educational centres. Apart from schemes/projects sponsored by Rural Development Ministry, the local Panchayats/Zila Prishad should also be made the nodal agency for implementation of schemes/programmes by other Ministries like Health and Family Welfare, Social Justice and Empowerment, Women and Child Development of HRD etc. The Government should come out open heartedly to lend support to local institutions (Panchayats) who have shown their readiness to undertake responsibilities concerning their own welfare and development. This calls for trust on the part of the Government in the ability of the local institutions to mange their own affairs. This is the key and crucial factor in any endeavour involving the local communities at grassroot level.

Discrimination against local bodies on political considerations should be discouraged. Despite being an elected body, the Panchayats should be considered as non-political insofar as developmental aspects are concerned. Thus, it is essential for the Government to de-politicise the process of empowering Panchayats and in the matter of allocation of funds.

Panchayati Raj as truly envisaged by Late Shri Rajiv Gandhiji should aim at providing equal and dignified rights for SC/ST, backward and other deprived sections including minorities. He also envisaged the new Panchayati Raj dispensation should be democratic and secular. If this measure is aimed to achieve these goals even in parts, it is welcome.

   

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली):उपाध्यक्ष महोदय, भारत के संविधान में हुए ७३वे और ७४वें संशोधन के महत्व को देखते हुए, चूंकि इन संशोधनों का दस वर्ष का कार्यकाल पूरा हुआ, उसकी समीक्षा करने के लिए माननीय ग्रामीण विकास मंत्री जी बहस के लिए प्रस्ताव सदन में लाये हैं, जिसके लिए हम उन्हें धन्यवाद देते हैं कि इन्होंने अच्छा काम किया है। हमारी विरासत में आदिकाल, वैदिक काल, भगवान बुद्ध और मौर्य काल यानी सभी कालों में पंचायत राज का जिक्र है। कभी सभा के नाम से जिक्र है, अथर्ववेद में भी सभा और समति का जिक्र और चर्चा है। बौद्ध काल में, मौर्यकाल में पंचायत का समति और सभा के रूप में जिक्र है, उसके प्रधान का जिक्र है। किसी न किसी तरह से हमारी विरासत में, हमारी संस्कृति में पंचायत का अस्तित्व पहले से मौजूद है। इसके संबंध में …( व्यवधान)

श्री श्रीचन्द कृपलानी (चित्तौड़गढ़):बिहार में पंचायत राज व्यवस्था की क्या हालत है, इनसे पूछिये। २३ साल के बाद वहां चुनाव हुए हैं और वह भी दबाव में कराये गए हैं…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप पूरा भाषण सुन लीजिए, फिर पूछिये।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : बिहार के बारे में मैं बताता हूं, उन्होंने अच्छा सवाल किया है। बिहार में पंचायत राज उन दिनों शुरू हुआ था, जिन दिनों इनका जन्म नहीं हुआ था।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : इस तरह से नहीं, आप बाद में पूछिये। आपने सवाल पूछा है, उसका जवाब आ रहा है।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : दुनिया में जब डेमोक्रेसी का जन्म नहीं हुआ था, बिहार के वैशाली में हमारे पुरखों के द्वारा डेमोक्रेसी पैदा की गई। वहां जनतंत्र, जम्हूरियत को जन्म दिया गया। आज से तीन हजार वर्ष पहले लिच्छवी राज में जनतंत्र पैदा हुआ। हमने अब्राहम लिंकन से प्रजातंत्र नहीं सीखा है। प्रजातंत्र को हमारे पुरखों ने बिहार में पैदा किया है। यह गौरव बिहार को प्राप्त है। १९३५ में कांग्रेस का रिजोल्यूशन…( व्यवधान)

डॉ.जसवन्त सिंह यादव (अलवर):आप इतना तेज क्यों चिल्ला रहे हैं, हमारे कान खराब हो रहे हैं…( व्यवधान)सब जगह नो होर्न, नो होर्न लिखा हुआ है और यह इतना तेज चिल्ला रहे हैं…( व्यवधान)

श्री पवन कुमार बंसल (चंडीगढ़) : उपाध्यक्ष महोदय, एक अच्छे विषय पर इतनी गंभीरता से बात हो रही है और ये लोग ऐसी बातें कर रहे हैं…( व्यवधान)

श्री श्रीचन्द कृपलानी:अच्छे विषय के लिए अच्छा आदमी चाहिए।…( व्यवधान)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :कान खराब नहीं होंगे, माथा जरूर खराब हो जायेगा।

श्री श्रीचन्द कृपलानी: हम कांग्रेस के खिलाफ नहीं है, हम तारीफ कर रहे हैं, इन्हें क्यों बुरा लग रहा है। सदन में आपका एक भी आदमी नहीं है।

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Kriplani, do not reduce the discussion to that level.

… (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: I am on my legs.

… (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Unless he yields, you cannot stand up and say anything. Let us have some orderly discussion here.

… (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record except what Dr. Raghuvansh Prasad Singh says.

(Interruptions) …* डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :उपाध्यक्ष महोदय, १९३५ में कांग्रेस का रिजोल्यूशन हुआ, महात्मा गांधी जी और हमारे पुरखे आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे, उन दिनों में भी एक प्रस्ताव पारित हुआ कि पंचायती राज लागू होना चाहिए। जब आजादी मिली तो बिहार में सबसे पहले पंचायत राज लागू हुआ। श्री बाबू तब चीफ मनिस्टर थे। मैं जानता हूं राजस्थान में भी पंचायत राज लागू है, कर्नाटक में बढि़या काम हो रहा है, बंगाल, केरल और मध्य प्रदेश आदि में पंचायती राज काम कर रहा है और कई जगहों पर इसकी शुरूआत हुई है, कहीं-कहीं ठीक काम हो रहा है।

महोदय, पंचायत राज के सबसे पहले बलवंतराय मेहता कमेटी बनी। उसके बाद अशोक मेहता कमेटी बनी, उसके बाद एल.एम.सिंधवी कमेटी बनी, उसके बाद हनुमंथाराव कमेटी बनी, उसके बाद एस.वी.राव कमेटी बनी और फिर दिलीप सिंह भूरिया कमेटी बनीं। ये सारी कमेटियां ७३वें और ७४वे संशोधन के पहले बनी और इन सभी कमेटियों ने अपनी अनुशंसाएं की थीं। शुरू में बलवंतराय मेहता कमेटी के बाद जब अशोक मेहता कमेटी बनी थी, तब बिहार से स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर उसमें सदस्य थे और बंगाल से श्री ज्योति बाबू उसमें सदस्य थे। उसने अपनी रिपोर्ट दी और सभी रिपोर्ट का मिलाजुला असर १९९२ में देखने को मिला, जब स्वर्गीय श्री राजीव गांधी ने पंचायत राज सम्मेलन बुलाकर उपरोक्त संशोधन पारित किये।

* Not Recorded आर्टिकल ४० में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का ज़िक्र है कि राज्य पंचायत राज को लागू करेगा, लेकिन पंचायती राज को असली संवैधानिक दर्जा स्वर्गीय राजीव गांधी जी की प्रेरणा से संविधान के ७३वें और ७४वें संशोधन के रूप में प्राप्त हुआ। यह उनके समय में तो लागू नहीं हो सका लेकिन १९९२ में लागू हुआ और १९९३ से उस पर काम शुरू हुआ।

महोदय, हमारे युगपुरुषों गांधी जी, लोहिया जी और जयप्रकाश जी का सपना था ग्राम स्वराज का और ये सभी परिकल्पनाएं पहले से थीं लेकिन अब हम देख रहे हैं कि ज्यादा ज़ोर इन पर दिया जा रहा है। संवैधानिक प्रावधान हो रहा है, फिर चर्चा हो रही है कि इसमें फिर से संशोधन किया जाए और अच्छा किया जाए। ऐसा क्यों? जब केन्द्रीय शासन प्रणाली और केन्द्र के द्वारा, राज्य के द्वारा गांवों में बसने वाले लोग, गरीब आदमी, मेहनतकश किसान मज़दूरों की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ, तब सोचा गया कि जिनकी समस्याओं का समाधान यहां से नहीं हुआ तो वहीं पर विकेन्द्रित शासन व्यवस्था करके वहीं पर उनको अधिकार दिया जाए जिससे वे अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं करें और लोग उनकी मदद करें। इसी फिलॉसौफी के तहत पंचायती राज का सपना पहले से आ रहा था कि वहां पर विकेन्द्रित शासन प्रणाली चले और लोकल सैल्फ गवर्नमेंट चले जिससे वे अपनी समस्याओं का समाधान अपने हाथों से करें। लेकिन इसमें बहुत विकृतियां और विसंगतियां हैं जिन पर सरकार को ध्यान देने की आवश्यकता है।

मैं कहना चाहूंगा कि इतनी कमेटियां इसे यहां लाने में बनी और दस वर्षों तक इसे लागू किया गया, उसके बाद भारत सरकार को इस पर एक अध्ययन दल बनाना चाहिए कि किस राज्य में क्या परिस्थिति निर्मित नहीं हुई। चूंकि सभी राज्यों में स्थिति एक जैसी नहीं है। कहीं मुखिया बोलें या सरपंच बोलते हैं, कहीं ग्राम अध्यक्ष बोलते हैं। पूर्वोत्तर में मुखिया या प्रधान को गांव बूढ़ा बोलते हैं। इस तरह से वभिन्न नामों से वे पुकारे जाते हैं और फिर वभिन्न प्रणालियां भी हैं। लेकिन थ्री टायर सिस्टम को आम तौर से लागू किया गया, इसमें संविधान संशोधन किया गया जिससे इसमें कुछ सुधार आया है और उस दिशा में हम आगे बढ़े हैं। इसमें जो विकृतियां आईं, उनको मैं बड़े संक्षेप में बताना चाहता हूँ।

महोदय, संविधान ७३वें संशोधन में यह प्रावधान किया गया कि अनुसूचित जाति का आरक्षण होगा, महिलाओं का आरक्षण होगा और अनुसूचित जनजाति का भी आरक्षण होगा, लेकिन पिछड़ी जातियों का आरक्षण राज्य सरकार के जिम्मे है। राज्य सरकार अपना पंचायती राज कानून बनाकर चाहे तो दे सकती है। बिहार की राज्य सरकार ने १९९३ में एक कानून पारित किया कि वहां पंचायतों के सभी पदों पर हम महिलाओं, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों तथा पिछड़ी जातियों को भी आरक्षण देंगे। बाद में वह पटना हाई कोर्ट में चैलेन्ज हुआ। माननीय सदस्य पूछते हैं कि बिहार में क्या हुआ? बिहार का किस्सा कोई सुने तो जाने, कोई समझे तो जाने। संविधान में आरक्षण हुआ सभी पदों पर। पटना हाई कोर्ट ने कहा कि गांव प्रमुख, ब्लाक प्रमुख और जिला प्रमुख इन तीनों पदों पर आरक्षण नहीं होगा, पिछड़ी जाति का आरक्षण नहीं होगा और इन तीनों पदों पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा महिलाओं का भी आरक्षण नहीं होगा। पटना हाई कोर्ट ने संविधान के ७३वें संशोधन की रिजर्वेशन क्लाज़ के खिलाफ फैसला दिया। हम नहीं जानते कि पटना हाई कोर्ट को संविधान की क्लाज़ को क्वैश करने का अधिकार है या नहीं। उसने उसे मानने से इंकार किया और तब लाचार होकर राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट में जाना पड़ा। मामला अभी तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। भारत सरकार और कई राज्य सरकारें उसमें पार्टी हैं। इस कारण वहां मुखिया, ब्लाक प्रमुख और जिला प्रमुख तीनों पर आरक्षण नहीं हुआ है। देश भर के तमाम राज्यों में आरक्षण हुआ लेकिन बिहार में इन तीनों पदों पर आरक्षण नहीं हुआ।

महोदय, क्यों नहीं हुआ, राज्य सरकार ने कानून बनाया और पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों और महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था की, लेकिन वहां इन तीन पदों पर आरक्षण लागू नहीं हुआ और पिछड़ी जातियों एवं अन्य सभी का आरक्षण पटना हाईकोर्ट ने बिलकुल क्वैश कर दिया। बिहार सरकार पटना हाईकोर्ट के फैसले के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में गई, जहां अभी तक मामला लम्बित है। इसलिए चुनाव नहीं हुआ। ७३ वें संशोधन के अनुसार वर्ष १९९३ में पंचायती राज की शुरूआत हुई, लेकिन पटना हाईकोर्ट ने अपने आदेश द्वारा वह क्वैश कर दिया। पटना सरकार के सामने एक संकट उत्पन्न हो गया। यदि वह संविधान के अनुसार चलती है, तो पटना हाईकोर्ट के आदेश का उल्लंघन होता है और कंटैम्प्ट आफ कोर्ट की दोषी बनती है और यदि पटना हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार चलती है, तो संविधान विरोधी होने का खतरा है। यह पीड़ा कोई नहीं समझता, लेकिन सब कहते हैं कि बिहार में पंचायतों के चुनाव नहीं हुए, लेकिन असलियत यह है कि यह मामला अभी भी सुप्रीमकोर्ट में लंबित है। इसलिए चुनाव टाला गया।

महोदय, बिहार सरकार के सामने चुनाव रोकने या टालने के सिवाय कोई चारा नहीं था। यदि वह संविधान के अनुसार काम करे, तो उसे कंटैम्प्ट आफ हाईकोर्ट का दोषी माना जाएगा और यदि वह हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार काम करे तो उसे संविधान विरोधी कहा जाएगा, ऐसी स्थिति में बिहार सरकार क्या करे। उसने हाईकोर्ट के आदेश के विरोध में सुप्रीमकोर्ट में मामला दायर किया। यह मामला अभी भी सुप्रीमकोर्ट में पेंडिंग है। माननीय मंत्री जी बताएंगे कि बात क्या है। क्या जायज है और क्या नाजायज है।

महोदय, भारत सरकार की ओर से कितनी बेईमानी का व्यवहार किया जाता है। इसका मैं एक उदाहरण दे रहा हूं। आप इंसाफ करें। दशम वित्त आयोग ने सिफारिश की कि पंचायती राज का धन स्थानीय निकायों को दिया जाए। भारत सरकार ने दशम वित्त आयोग की सिफारिश इन-टोटो स्वीकार कर ली और तदनुसार वर्ष १९९६-९७ का एक साल का पैसा बिहार को दिया गया। उस समय झारखंड भी बिहार में शामिल था, लेकिन उसके बाद चार साल तक, एक पैसा भी नहीं दिया गया।…( व्यवधान)

श्री श्रीचन्द कृपलानी:प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना का कितना पैसा बिहार में लैप्स हो गया, यह आपको मालूम है। आप वहां काम तो करा नहीं पाते और दोष केन्द्र सरकार को देते हैं। आप आरोप केन्द्र सरकार पर लगाते हैं जबकि वहां आपकी सरकार काम करा ही नहीं पाती।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : नागमणि जी, आप मंत्री हैं।

श्री रामजीलाल सुमन (फिरोजाबाद): उपाध्यक्ष महोदय, नागमणि जी, यहां अच्छा काम करते थे, वे गलती से वहां पहुंच गए।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री नागमणि): उपाध्यक्ष महोदय, बिहार सरकार ने पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव नहीं कराए और दूसरे इसके लिए बैंक में अलग से एकाउंट खोला जाना अनिवार्य था, वह नहीं खोला। इसलिए भारत सरकार ने धन नहीं दिया। …( व्यवधान)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :उपाध्यक्ष महोदय, नागमणि जी को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय का राज्य मंत्री बना दिया गया है। घूसखोरी चल रही है। यह बिहार का दुर्भाग्य है महोदय कि नागमणि जी जीते वहां से और …*…( व्यवधान)

प्रो. रीता वर्मा (धनबाद):आप चारा घोटाला भूल गए ? …( व्यवधान)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :उपाध्यक्ष महोदय, उधर से जब मैं बोलता हूं, तो बीच में मुझे टोकते हैं और वे सदस्य बोलते हैं जिन्हें पार्टी की ओर से जनहित की समस्याओं को बताने का सदन में कभी मौका नहीं दिया जाता। श्री कृपलानी जी को जनता की समस्याएं बताने के लिए भाषण करने हेतु उनकी पार्टी ने कभी मौका नहीं दिया। इसी प्रकार प्रो. रीता वर्मा को जनता की समस्याएं बताने हेतु सदन में बोलने के लिए उनकी पार्टी ने कभी मौका नहीं दिया। इसलिए ये हमें डिस्टर्ब कर रहे हैं। …( व्यवधान)

श्रीमती रेनु कुमारी (खगड़िया) :उपाध्यक्ष महोदय, ये कुछ भी कहें, लेकिन सच्चाई को नहीं छिपा सकते। मेरा माननीय सदस्य डा. रघुवंश प्रसाद सिंह से अनुरोध है कि वे सदस्यों पर व्यक्तिगत आरोप न लगाएं। जो बिहार की स्थिति है, उसे छिपाइए, मगर गलत बात करना ठीक नहीं है। …( व्यवधान)

       

* Expunged as ordered by the Chair उपाध्यक्ष महोदय : रेनु कुमारी जी, आपको जो बात कहनी है, वह मेरी आज्ञा से कहनी है।

श्रीमती रेनु कुमारी: उपाध्यक्ष महोदय, माननीय रघुवंश प्रसाद सिंह जी, वरिष्ठ सदस्य हैं। उन्हें इस प्रकार की गलत बात नहीं कहनी चाहिए। …( व्यवधान)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :उपाध्यक्ष महोदय, इनमें से ऐसा कोई सदस्य नहीं है जिसकी हम आलोचना कर सकें या ये ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जिन्हें हमारी आलोचना का गौरव प्राप्त हो सके। मैं जनता की समस्याओं को उठाना चाहता हूं। बिहार की ८ करोड़ ३० लाख जनता की पीड़ा है जिसे मैं यहां बयान कर रहा हूं। …* जो लोग राजसत्ता से चिपटे हुए हैं, वे बिहार की ८ करोड़ ३० लाख जनता की पीड़ा क्या समझेंगे? …( व्यवधान)

श्री श्रीचन्द कृपलानी:उपाध्यक्ष महोदय, ये असंसदीय भाषा का प्रयोग कर रहे हैं।…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: I will look into the records. If it is unparliamentary, it will be expunged.

… (Interruptions)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :मैं बिहार की जनता और पंचायती राज व्यवस्था का सवाल उठा रहा हूं।…( व्यवधान)उसे उठाने से कोई माई का लाल नहीं रोक सकता।…( व्यवधान)

श्री अरुण कुमार (जहानाबाद):उपाध्यक्ष महोदय, माननीय सदस्य असंसदीय शब्द का प्रयोग करते हैं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है।…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: If any unparliamentary remark has crept in, I will expunge it. Please resume your seat now.

… (Interruptions)

श्री अरुण कुमार : २२ साल तक पंचायत का चुनाव न करा कर ये लूट की प्रक्रिया में शामिल थे।…( व्यवधान)ये दूसरे के लिए क्या कह रहे हैं।…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record now except Dr. Raghuvansh Prasad Singh’s speech.

(Interruptions) … ** *Expunged as ordered by the Chair ** Not Recorded MR. DEPUTY-SPEAKER: There is not much time left now. The Minister has to reply now. Please resume your seat.

… (Interruptions)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :उपाध्यक्ष महोदय, तीन साल का नहीं दिया गया। हम सवाल उठाते हैं कि दशम वित्त आयोग ने अनुशंसा की और सरकार ने उसे मंजूर किया। चार साल में एक साल का मिला, तीन साल का क्यों नहीं दिया? यदि पंचायत चुनाव कारण बनाया जाता तो सन् १९८३ से १९९६ तक, १३ वर्षों तक चुनाव नहीं हुए और १९९६-९७ में मिला, इसलिए कि केन्द्र सरकार ने उसे मंजूर किया तो एक साल का दे दिया और तीन साल का रोक लिया, वह नहीं दिया, जब कि इनका वित्त विभाग का सर्कुलर है कि जो राज्य चुनाव नहीं करेगा उनका पैसा रोका जाएगा। That will be placed as a non-lapseable amount. वह लेप्स करने वाला अमाउंट नहीं रहेगा। जब चुनाव हो जाएगा तब मिल जाएगा, यह मेरा पहला सवाल है।

दूसरा सवाल यह है कि झारखंड को जो १९९६-९७ का बिहार को पैसा मिला, उसका हिस्सा मिल गया। उनके अभी पंचायत चुनाव नहीं हुए। १९९६-९७ का झारखंड को मिल गया और बिहार का तीन वर्षों का सवा चार सौ करोड़ रुपया रोक कर रखा गया। इतना भारी अंधेर, जुल्म एवं अन्याय कहीं नहीं देखा गया। वहां एक लाख ४० हजार लोग चुने गए हैं - एक लाख ३७ हजार पंचायत में और तीन हजार के करीब नगरपालिका एवं नगर-निकाय में तथा पंचायती राज में एक लाख ३७ हजार। जिनमें एक-तिहाई महिलाएं हैं और एक-चौथाई अनुसूचित जाति के हैं तथा अन्य जातियों के भी लोग हैं। इस तरह वहां ५०० की आबादी पर एक वार्ड कमिश्नर चुना गया है। हम सरकार से जानना चाहते हैं कि हमारा पैसा अभी तक क्यों रोक कर रखा गया है ?…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Nagmani, the concerned Minister is there to reply to the debate. Please resume your seat.

…( व्यवधान)श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, जब कोई माननीय सदस्य बोल रहा हो तो किसी भी मंत्री को इस प्रकार का आचरण नहीं करना चाहिए।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : यह आप क्या करते हैं? रघुवंश प्रसाद जी, अब आप समाप्त कीजिए। मंत्री जी को रिप्लाई देना है।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : अगर ये लोग हमें नहीं टोकें तो हमारा पांच मिनट का भाषण था, लेकिन जब उधर से इस तरह से व्यवहार होगा तो हमें नहीं लगता है कि ये जनता के पक्ष में बोल रहे हैं।

उपाध्यक्ष महोदय : अब कोई टोका-टाकी नहीं करेगा।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : इसलिए हम धड़ाधड़ जल्दी-जल्दी बोल देते हैं। अगर बाधा न हो तो सबसे कम समय हम लें। हमारा सवाल नम्बर एक दशम वित्त आयोग का है…( व्यवधान)

श्रीमती आभा महतो (जमशेदपुर) :इनका पहले सवाल एक होता है, फिर दूसरा होता है और फिर से पहला हो जाता है।…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Why is it happening again and again?अगर अनपार्लियामेंटरी होगा तो मैं उसे रिकार्ड से निकाल दूंगा, आप जरा शान्ति से सुनिये।

… (Interruptions)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :सुनिये भी और समझिये भी। अभी आपका पैसा भी बाकी है, झारखण्ड का पैसा भी बाकी है। सवाल नम्बर एक- वर्ष २००२-२००३ में इन्दिरा आवास योजना में बिहार का हिस्सा इन लोगों ने १३२ करोड़ रुपया काटा। इन्दिरा आवास योजना से गरीबों का घर बनता है। सरकार सभा में बताये कि क्यों कटौती की गई? डी.आर.डी.ए. का पैसा जाता है, यहां खर्च नहीं आया, हिसाब नहीं आया और आपने हमारा हिस्सा काटकर दूसरे राज्यों को दे दिया। बिहार का हिस्सा काटने में भारत सरकार का मन लगता है, क्योंकि उनके सपोर्टर लोगों की तरफ देखा जा रहा है। मान लीजिए एक डी.आर.डी.ए. ने ठीक से खर्च नहीं किया तो हमारी परफोरमेंस के हिसाब से…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record except what Dr. Raghuvansh Prasad Singh says.

(Interruptions) …* MR. DEPUTY-SPEAKER: All these things will not go on record.

(Interruptions) …* * Not Recorded     डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :एक डी.आर.डी.ए. का अगर हिस्सा नहीं मिला तो दूसरे डी.आर.डी.ए. को दिया जाना चाहिए। बिहार का १३० करोड़ रुपया इन्दिरा आवास योजना का, सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना का ९८ करोड़ रुपया, स्वर्णजयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना का ३८ करोड़ और पीने के पानी का ३७ करोड़ रुपया एक साल में काटा गया है। इन ग्रामीण विकास योजनाओं का ३०१ करोड़ रुपया बिहार में काटा गया।

जब से पंचायती राज लागू हुआ, पंचायती राज का १४०० करोड़ रुपया हमारा काटकर रखा है-तो बिहार का कैसे भला होगा, वहां कैसे विकास होगा?वहां गांव के चुने हुए आदमी आज त्राहि-त्राहि कर रहे हैं और उनके पैसे का भुगतान नहीं हो रहा है। ये हिसाब बतायें कि क्यों कटौती हो रही है और बिहार की जनता का क्या कसूर है? हमने बंटवारे के बाद प्रधानमंत्री से कहा था कि ४० में से हम ५-६ आदमी आपके खिलाफ हैं, जो उधर बैठते हैं, बाकी आपकी ही तरफ हैं, काफी मंत्री हैं, जो हां में हां मिलाने वाले हैं, लेकिन जनता का क्या कसूर है। सरकार से लड़ाई तो समझ में आती है, राजनैतिक लड़ाई होगी तो उसका फैसला जनता करेगी, लेकिन जनता की हिस्सामारी, बिहार की हिस्सामारी कबूल नहीं है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

हमारा नम्बर दो सवाल य़ह है क…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : और आपके कितने सवाल हैं?

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :हमारा १६०० करोड़ रुपये वाला सवाल हो गया। आज १.३७ लाख लोग जो जीते हैं, ३.६० करोड़ रुपये इन्होंने उनकी ट्रेनिंग के लिए २००२-२००३ में बजट उपबन्ध किया था, लेकिन इस साल उसे घटा दिया तो क्यों? वह तीन करोड़ रुपया कहां चला गया-क्या नाश्ते पानी में चला गया?जो नये चुने हुए लोग हैं, उनको कैसे सिखाया जाये, उनका क्या अधिकार है, नहीं तो एक मुखिया कालेज में चले गये कि हम प्रिंसीपल की हाजिरी बनाएंगे। उन्हें ट्रेनिंग की जरूरत है, प्रशिक्षण की जरूरत है तो ट्रेनिंग क्यों नहीं हुई?

उपाध्यक्ष महोदय : अब आखिरी सवाल पूछिये।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : यह जो १० वर्षों की अवधि है, इसका हमें बड़ा बिटर अनुभव हुआ है। पंचायत का जो अध्यक्ष चुना गया, जिला परिषद का जो अध्यक्ष चुना गया, सरकार को जानकारी करनी चाहिए कि उसमें एक लाख, दो लाख, तीन लाख रुपये, क्वालिस और बोलेरो आदि सभी ले देकर अध्यक्ष का चुनाव हुआ। उनके खिलाफ बराबर अविश्वास प्रस्ताव आता रहता है और बराबर लेन-देन का बाजार चलता है, यह सभी को मालूम है। इसमें बहुत जांच-पड़ताल की जरूरत नहीं है, यह सब प्रकट है, सब लोग जानते हैं कि अध्यक्ष बनने में, जिला अध्यक्ष बनने में खरीद-बिक्री चलती है।

हमने कहा कि आप क्यों लोग पंचायत के चुनाव से चुनकर आये हैं ? आप पर लोगों को भरोसा है तो उन्होंने कहा कि आपके यहां एम.पी. जलवे ले लेता है और मंत्री बन जाता है। आपके यहां बक्सा ले लिया जाता है और इधर से उधर हो जाता है। अगर हम ले रहे हैं तो क्या बुराई है ? यह सुनकर हम बड़े चकित हुए कि कैसे यह सरजमीं का आदमी बोल रहा है। हमने उनको मना किया कि आप ऐसा मत कहो। आप इलैक्टेड रिप्रैजेंटेटिव हो इसलिए आप जनता के हक की हिफाजत करो।…( व्यवधान)वहां भ्रष्टाचार बहुत ज्यादा है, गड़बड़ बहुत ज्यादा है।

मैं कहना चाहता हूं कि जो लोग चुनकर आये हैं, उनकी मांग है कि एम.एल.ए. को वेतन भत्ता मिल रहा है, एम.पी. को वेतन भत्ता मिल रहा है, मंत्री को वेतन भत्ता मिल रहा है उसी तरह आप हमारे वेतन भत्ते का इंतजाम करिये। ३० लाख लोग जो इस काम में जुटे हुए हैं, वह वेतन भत्ता मांग रहे हैं। उनका कहना है कि हम भी इलैक्टेड रिप्रैजेंटेटिव हैं इसलिए हमें भी वेतन भत्ता मिलना चाहिए। इसके साथ-साथ वे यह भी मांग कर रहे हैं कि जिस तरह एम.पी. और एम.एल.ए. को एमपी लैड का पैसा दो करोड़ या उसके आसपास मिलता है उसी तरह हमें भी २५ या ५० लाख रुपये मिलने चाहिए क्योंकि हम भी चुनकर आये हैं। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अब आप समाप्त करिये।

...( व्यवधान)

श्री श्रीचन्द कृपलानी: उपाध्यक्ष महोदय, आपने उनको अकेले बोलने की जिम्मेदारी दे रखी है। यह केवल तीन मैम्बर की पार्टी है।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप बैठिये।

...( व्यवधान)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : उपाध्यक्ष महोदय, पंचायत समति या जिला परिषद में एम.पी. पदेन सदस्य होता है। हमारा कहना है कि आजकल जो लोग चुनकर आये हैं, वे सब एम.पी. और एम.एल.ए. के विरूद्ध एकजुट हो जाते हैं। भारत सरकार का कुछ पैसा वहां जाता है तो वे उसे बांट लेते हैं। अगर हम कुछ कहते हैं तो कहते हैं कि आपको तो कोटा मिलता है इसलिए हमारा यही कोटा है। वे खुद ही उद्घाटन या शिलान्यास करा लेते हैं। हम लोगों को उसकी कोई जानकारी नहीं होती। जो लोग वहां जाते नहीं इसलिए उनको जानकारी नहीं है। जो सरजमीं में जाता है उसको इन सब बातों की जानकारी है कि नीचे पंचायत व्यवस्था किस ढंग से लागू हुई है। उसमें विकृतियां कहां तक आ गयी हैं, गड़बड़ियां कहां आ गयी हैं । मेरा कहना है कि उनका सुधार कैसे होगा?वहां बड़ा भारी भ्रष्टाचार है। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अब आप समाप्त करिये। विकृतियां यहां भी नहीं आनी चाहिए।

...( व्यवधान)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : वर्तमान में जो स्थिति है, वह मैं बता रहा हूं। मैं कुछ सुझाव देना चाहता हूं। १० वर्षों में आप अध्ययन करा लीजिए।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप ज्यादा बातें बढ़ायेंगे तो आपको भी बैठाना पड़ेगा।

...( व्यवधान)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : मैं केवल सुझाव दे रहा हूं। इससे सरकार को फायदा होगा। आर्टिकल २४३ में ग्राम सभा एक संवैधानिक संस्था है। लोक सभा और विधान सभा हर पांच साल बाद भंग हो सकती है लेकिन ग्राम सभा कभी भंग नहीं होती। ग्राम सभा भंग होने का कोई कानून नहीं है। लोक सभा और विधान सभा की बैठकें घट रही हैं लेकिन ग्राम सभा की बैंठके घट नहीं रही बल्कि साफ ही हो रही हैं। अब ग्राम सभा की बैठकें क्यों नहीं हो रही, इसके लिए एक टास्क फोर्स बैठी है। उसकी सूचनायें नहीं जाती। जाली कागज बनता है, जाली रजिस्टर बनता है। जनता के सामने कुछ और पास होता है और होता कुछ और है। यह ग्राम सभा की परिस्थिति है। हम ग्राम सभा को मजबूत करने के पक्ष में हैं लेकिन उसमें कड़ा कानून बनाने की जरूरत है। ग्राम सभा में वोटर लिस्ट होती है जिसमें प्रत्येक नागरिक का नाम है। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अब आप समाप्त करिये।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : हमारा कहना है कि ग्राम सभा को नियमित करने की कार्रवाई होनी चाहिए। वहां जो कमेटी बैठी है, उसकी जांच रिपोर्ट आनी चाहिए। किसी पंचायत में एक गांव है, किसी पंचायत में दो गांव हैं और किसी पंचायत में १२ गांव हैं तो उन पंचायतों में १२ ग्राम सभायें होंगी।

वहां चालाकी से आम सभा कर देते हैं। पंचायत गांव के हिसाब से है, छोटे गांव हैं और बड़े गांव भी हैं। छोटे-छोटे गांव पंचायत में १०-१२ हैं। सभी गांव की ग्राम सभा अलग होगी, सभी गांव की ग्राम सभा रिपोर्ट में है। इसलिए ग्राम सभा और जिला प्रमुख के चुने जाने में जो खरीद-बिक्री होती है, उसे रोकने के लिए डायरैक्ट चुनाव होने चाहिए। ...(व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अब समाप्त कीजिए।

डा. रघुवंश प्रसाद सिंह : हमने जो सवाल उठाए हैं, उनका मोटा-मोटी संविधान में प्रावधान किया जाए। राज्य सरकार पर छोड़ देने से किसी राज्य सरकार में वह लागू होगा और किसी में नहीं होगा। इसलिए इस बारे में ध्यान रखा जाए कि वह ठीक ढंग से लागू हो रहा है या नहीं। यह भारत सरकार की जिम्मेदारी है। मैं समझता हूं कि भारत सरकार इस मामले में सीरियस नहीं है, ग्राम विकास उसके एजैंडा मैं नहीं है। इससे साबित होता है, लगातार मंत्रियों की बरखास्तगी, बहाली, आना-जाना, गांव में जो कपड़ा बुन रहे थे, उनको यहां बुला लाए। ...(व्यवधान) सरकार गंभीर नहीं है। पंचायत राज को अधिकार मिले, जयप्रकाश जी का सपना साकार हो और जिनकी समस्या, उनके हाथ में राजदार, पंचायत राज के पैर मजबूत हों।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं सरकार से कहना चाहता हूं कि सभी मामलों में संवैधानिक उपबंध किए जाएं। ...(व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : बिहार की सब बातें कह दी हैं, अब कुछ नहीं कहना।

   

ग्रामीण विकास मंत्री (श्री काशी राम राणा) :उपाध्यक्ष महोदय, कल से इस सदन में पंचायतों को सशक्तीकरण करने के बारे में माननीय सदस्यों ने अपने जो विचार रखे हैं, इसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देना चाहता हूं और उनका आभार भी प्रकट करना चाहता हूं। पंचायती राज के बारे में संविधान में ७३वां और ७४वां संशोधन किया गया। दस साल तक उसका इम्प्लीमैंटेशन कैसे हुआ, इसकी समीक्षा बहुत अच्छे ढंग से की गई है। कल करीब आठ, साढ़े आठ घंटे तक चर्चा हुई जिसमें ३९ माननीय सदस्यों ने हिस्सा लिया। पार्टी से ऊपर उठकर माननीय सदस्यों ने, पंचायतों को कैसे मजबूत किया जाए, खासकर ग्रामीण विकास के लिए हम कैसे संविधान संशोधन का उपयोग कर सकें, इसके बारे में बताया। इसके बारे में जो बहुमूल्य सुझाव रखे गए हैं, मैं सदन को विश्वास दिलाना चाहता हूं, एक माननीय सदस्य ने कहा कि यह समीक्षा का एक कर्मकांड है, यह सिर्फ चर्चा है। मैं कहना चाहता हूं कि सरकार इस बारे में बहुत गंभीर है। सरकार सोचती है कि जब तक ग्राम पंचायत या पंचायती राज इंस्टीटयूशन्स को मजबूत नहीं बनाएंगे, सशक्त नहीं बनाएंगे, तब तक विधान सभा या लोक सभा में लोकतंत्र की जितनी भी बात करें, उसका इम्पैक्ट नहीं होगा। इसलिए कल बहुत से माननीय सदस्यों ने महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण का उल्लेख किया। महात्मा गांधी का सपना था, जयप्रकाश नारायण का सपना था।

इससे आगे मैं और बढ़ाऊं तो पंडित दीन दयाल उपाध्याय जी का भी सपना था कि इस देश में जो आजादी हमने हासिल की है, अगर इस आजादी को हमें और गौरव और गरिमा देनी है तो गांवों की पंचायत को हमें मजबूत करना ही पड़ेगा। ग्राम स्वराज्य का जो शब्द था, महात्मा गांधी जी का ग्राम स्वराज्य यानी ग्राम का सवार्ंगीण विकास, पंचायत का सशक्तीकरण, यही लेकर जयप्रकाश नारायण जी भी चले। यही लेकर पंडित दीन दयाल उपाध्याय जी चले और यही लेकर तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी जी ने भी पंचायतों के सुद्ृढ़ीकरण और सशक्तीकरण के बारे में इसे आगे चलाया है और आज हमारे प्रधान मंत्री माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने इस पंचायती राज इंस्टीटयूशन के मजबूतीकरण के लिए जो कदम उठाए है और पंचायतों के मजबूतीकरण के लिए जो कदम उठाने जरूरी हैं, हम वे कदम उठाने से कहीं भी पीछे नहीं हटेंगे।

यहां बहुत सारे विचार रखे गये। मैं सभी का जिक्र नही करूंगा लेकिन मैं जितने भी सुझावों का स्पष्टीकरण करूंगा जिनके बारे में सरकार ठोस कदम उठा सकती है, मैं बात करूंगा कि यहां पर बहुत सारे सदस्यों ने एक बात बहुत ही एकता से रखी है और वह चाहे मणि शंकर अय््यर जी हों या रामजी लाल सुमन जी हों या प्रदीप यादव हो या सुरेश जाघव हों या मुलायम सिंह यादव हों या पण्डा जी हों या रामजीवन जैसे माननीय सदस्य हों। इन सारे सदस्यों ने एक बात एक आवाज से कही है कि आज ग्राम पंचायत की जो वित्तीय और प्रशासनिक स्थिति है, इसीलिए उसे और अधिकार देने चाहिए। हमें और अधिकार पंचायत को देने चाहिए। वैसे तो हम सब जानते हैं कि भारत सरकार ने जैसे भी हो, वित्तीय अधिकार पंचायत को देने के लिए आगे कदम बढ़ाये हैं चाहे वह स्वजल योजना हो, हरियाली हो, एसजीआरवाई हो। हम फंड पंचायत को देते हैं और जिला पंचायत के द्वारा फंड ताल्लुका ब्लॉक, पंचायत और ग्राम पंचायत को जाता है। हम चाहते हैं कि जो हमारे संविधान के ग्यारहवीं शैडयूल में २९ सब्जेक्ट जिनका जिक्र माननीय सदस्यों ने किया था, पूरे २९ सबजेक्ट पंचायतों के पास सौंप देने चाहिए। मुझे दुख है कि दस साल के अमलीकरण के बाद भी २९ सबजेक्ट्स को सभी राज्य सरकारों ने इम्पलीमेंट नहीं किया है। हालांकि कई राज्य ऐसे हैं जिन्होंने उनको अच्छी तरह से इम्पलीमेंट किया है, जिसमें कर्नाटक ने २९, केरल ने २९ में से २६, उड़ीसा ने २१, गुजरात ने १५, महाराष्ट्र ने १८, वेस्ट बंगाल ने १२, उत्तरांचल ने ११ और इसी तरह से मध्य प्रदेश ने ९ सब्जेक्ट इम्पलीमेंट किये हैं। इसी तरह से कई राज्यों ने २९ में से ८-१० सबजेक्ट इम्पलीमेंट किये हैं।

श्री पवन कुमार बंसल (चंडीगढ़) : कृपया यूनियन टैरीटरीज का बताइए।

श्री काशीराम राणा : बताऊंगा। कर्नाटक जैसे राज्य ने जिन्होंने २९ सबजेक्ट इम्पलीमेंट करने की कोशिश की है, उनको मैं धन्यवाद देना चाहता हूं और मैं चाहूंगा कि यह सिर्फ कागज पर नहीं रहे, बल्कि असलियत में हो ताकि ग्राम पंचायतों को लाभ मिले, यह कोशिश करें।

मान्यवर, हम चाहते हैं कि देश के सभी राज्य ११वें शिडयूल में जो बताए गए २९ सब्जेक्ट्स हैं, उनका अमलीकरण करें। इसीलिए जब अखिल भारतीय अध्यक्ष सम्मेलन हुआ तो उसमें यह तय किया गया कि ११वें शिडयूल में दिए गए सब्जेक्ट्स सभी राज्यों को पूरे करने चाहिए। इसके बाद एन.डी.सी. की मीटिंग हुई। उसमें प्रधान मंत्री जी और सभी राज्यों के मुख्य मंत्री उपस्थित थे। उसमें भी तय किया गया कि २९ सब्जेक्ट्स को जल्द ही इम्प्लीमेंट करने के लिए राज्य सरकारें आगे बढ़ें। कैसे बढ़ें, उसके लिए एक इम्पावरमेंट सब कमेटी बनाई गई। अभी जून में उसकी मीटिंग हुई थी और अगले हफ्ते मैं फिर उसकी मीटिंग बुला रहा हूं। हम चाहते हैं कि पंचायतों को वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार देने चाहिए। इसके लिए अगर संविधान में संशोधन करना जरूरी हुआ, तो उसके लिए भी सरकार तैयार है। ऐसा संविधान अवश्य होगा, जो हमारे राष्ट्रीय नेताओं का सपना था और जो उनका कहना था। यहां बहुत से सांसदों ने भी इस बात को माना है। इसके आधार पर कम से कम इतना तो जरूर हो कि पंचायतों को वित्तीय अधिकार मिले। बहुत सारे सांसदों ने कहा कि ग्राम पंचायतों की स्थिति बहुत ही खराब है, दयनीय है इसलिए वह कैसे काम कर सकती हैं। कभी वे राज्य सरकार की तरफ देखती हैं, कभी केन्द्र सरकार और कभी जिला पंचायत की तरफ देखती हैं, क्योंकि उनके पास कोई फंड नहीं आता। बिना पैसे के काम नहीं हो सकता और बिना प्रशासनिक अधिकार के वे काम नहीं कर सकतीं। ऐसी दयनीय अवस्था में पंचायत को रख दिया है। उसमें जब तक सुधार नहीं होगा, तब तक लोकतंत्र को मजबूत बनाना और नींव से मजबूत बनाना बड़ा मुश्किल है। संविधान सुधारों के उपायों पर मैं कहना चाहूंगा कि उनको ज्यादा अधिकार देने के लिये जब सारा सदन एकमत है तो सरकार भी इसमें अपना रुख रखेगी और बहुत जल्दी इसमें सुधार के लिए उपाय किया जाएगा।

श्री काशीराम राणा : उपाध्यक्ष जी, यह जो सुझाव दिया गया है, उसके बारे में हम जरूर सोचेंगे। पंचायतों को और वित्तीय तथा प्रशासनिक अधिकार दिए जाएं। हमारे देश की यह कितनी बड़ी उपलब्धि है कि ३० लाख चाहे बहन हो या भाई हों, पंचायत में चुने हुए प्रतनधियों के नाते बैठते हैं। दस लाख महिलाएं भी हैं। अगर इस देश के सार्वजनिक जीवन को सुधारना है, लोकतंत्र को और मजबूत करना है तो पंचायतों में बैठे हुए ३० लाख लोगों को ट्रेनिंग ठीक से देनी चाहिए। अगर उनको अच्छी तरह से प्रशासन करने की समझ आ गई तो सार्वजनिक जीवन में और सुधार हो सकता है।

सारे विश्व में यह बहुत बड़ी उपलब्धि है कि इस संशोधन से हमने एक तिहाई महिलाओं को प्रतनधित्व दिया। उसके आधार पर दस लाख महिलां चुनकर पंचायतों में बैठी हैं। सरकार, मैं और सारा सदन इस पर गौरव करता है।

उपाध्यक्ष महोदय, अभी १०-१५ दिन पहले मैं जिनीवा गया था। वहां ग्लोबल इवेंट था। उसमें मार्केट एक्सेस फार रूरल डवलपमेंट के विषय में इवेंट था। जब मैंने कहा कि हमारे देश में एक संविधान संशोधन के आधार पर ३० लाख सदस्य चुनकर आए हैं और उनमें दस लाख महिलाएं भी चुनकर आई हैं, तो सभी आश्चर्यचकित रह गए। वे इसलिए आश्चर्यचकित रह गए कि इतनी बड़ी तादाद में, जिस देश के लोकतंत्र को हम मानते हैं कि ठीक से नहीं चलता, हम नहीं चला पाते, लेकिन भारत चला पाता है।

   

मैं यही बात कहना चाहूंगा कि हमारे पास बहुत बड़ी ताकत है और नीचे से वह ताकत पैदा हो रही है। सवाल है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए यदि इसका ठीक ढंग से उपयोग किया जाएगा तो सार्वजनिक जीवन में जो कठिनाइयां फेस करनी पड़ती हैं, उनसे उसे अवश्य मुक्त करा पाएंगे।

श्री रामजी लाल सुमन, श्री मुलायम सिंह यादव, श्री अरुण कुमार और श्री राम टहल चौधरी ने जिला पंचायतों के अध्यक्ष का एक मुद्दा उठाया और कहा कि उनका सीधा चुनाव होना चाहिए। जो सदस्य चुने जाते हैं उनमें से अध्यक्ष का चुनाव होता है लेकिन इसमें बहुत गड़बड़ होती है और आगे जाकर और भारी गड़बड़ पैदा होती है। इसके लिए जो सुझाव रखा गया कि पंचायतों के अध्यक्ष को यह काम देना चाहिए और उनका सीधे चुनाव करना चाहिए, यदि पूरे सदन की इस पर सहमति है तो सरकार को कोई आपत्ति नहीं है। हम सीधे चुनाव करा सकते हैं। जिला पंचायत में इनडायरैक्ट इलैक्शन से सदस्यों में से अध्यक्ष का चुनाव होता है। इसमें जो गड़बड़ होती है, इस संशोधन से वह दूर हो सकती है। सरकार इस दिशा में अवश्य सोचेगी।

बहुत से सदस्यों ने यह सवाल उठाया कि चाहे पंचायत हो, चाहे ग्राम पंचायत, ब्लॉक पंचायत हो या जिला पंचायत हो, उनके साथ जो अन्याय होता है, वह दूर हो। अभी रघुवंश जी ने कहा कि बिहार के साथ बहुत अन्याय होता है। मैं इस बात का अवश्य जवाब दूंगा। पंचायती राज इन्स्टीटयूशन्स को जो फंड रिलीज किए जाते हैं, वे जिला पंचायतों के अध्यक्ष के पास जाते हैं, ताल्लुका के पास जाते हैं और गांवों की पंचायतों के पास जाते हैं। हम देखेंगे कि ये फंड जिस काम के लिए जिसे दिए जाने चाहिए, वे उनके पास अवश्य पहुंचे। हम इस बात की व्यवस्था अवश्य करेंगे। हम चाहते हैं कि देश की पंचायतें ठीक से काम करें। ठीक से काम करने वाली जो पंचायतें हैं, जो श्रेष्ठ पंचायतें हैं, उनको हमने एवार्ड देने का निर्णय किया है। यह तय किया कि ऐसी पंचायतों को वित्तीय सहायता भी दी जाएगी। ऐसी पूरे देश में हर साल ६ डिस्टि्रक्ट पंचायतें, १२ इंटरमीडिएट पंचायतें यानी ताल्लुका ब्लॉक पंचायतें, ५० ग्राम पंचायतें पसन्द करेंगे। हम हर साल इन्हें चुनेंगे और उन्हें श्रेष्ठ पंचायत का एवार्ड देंगे।

श्री भर्तृहरि महताब (कटक): इसका क्या पैरामीटर है श्री काशी राम राणा: महताब जी, वह आपको मिल जाएगा। श्रेष्ठ डिस्टि्रक्ट पंचायतों को ३० लाख रुपए, इंटरमीडिएट पंचायत को २० लाख रुपए और ग्राम पंचायतों को १० लाख रुपए मिलेंगे। भारत सरकार वह पैसा केवल विकास के कामों के लिए उसे देगी। हम पंचायतों को और मजबूत करने के लिए और पैसों की कमी को दूर करने के लिए अवश्य इस प्रकार की मदद करके पंचायतों को मजबूत करने की कोशिश करेंगे।

यहां बहुत से सुझाव रखे गए लेकिन मैं उन सभी बातों को यहां नहीं कहूंगा लेकिन एक बात अवश्य कहना चाहूंगा कि जिस तरह से पंचायतों में अभी काम हो रहा है उनके बारे में कभी-कभी सांसदों की बहुत सी शिकायतें आती हैं कि हमारी प्रपोजल नहीं ली जाती है, या प्रपोजल ठुकरा दी जाती है। हम इस बारे में सोच रहे हैं कि हमारे चुने हुये प्रतनधि - एम.पी.,एम.एल..ए.,या पंचायत के चुने हुये प्रतनधियों के साथ जिला स्कीम के संदर्भ में अन्याय न हो और उन्हें पूरा न्याय मिले। आज कभी-कभी ऐसा होता है कि जो हमारी स्कीम्स हैं, अल्टीमेटली उनका फंड जिला पंचायत के पास जाता है लेकिन वह प्रपोजल स्वीकार नहीं की जाती है। कई माननीय सदस्यों ने इसके निराकरण के लिये सुझाव रखे हैं। मेरा भी ऐसा सुझाव है कि जिला पंचायत अध्यक्ष के साथ साथ अगर पंचायत के कार्यकारी अधिकारी को औथोराइज कर दिया जाये, चाहे उसमें दूसरी पार्टी के लोग भी हों, तो मुझे लगता है कि जन-प्रतनधियों में होने वाली अन्याय की भावना निकल जायेगी और वे अपने ऐरिया के विकास के लिये जो प्रपोजल भेजेंगे, उससे लाभ मिल सकेगा।

उपाध्यक्ष महोदय, कई माननीय सदस्यों ने पंचायत सदस्यो के ट्रेनिंग दिये जाने का सवाल उठाया। यह एक बहुत अच्छा सुझाव आया है। ग्रामीण क्षेत्रों के विकास करने में इसका अमलीकरण हो सके, इसके लिये हम चाहते हैं कि पंचायत सदस्यों को ट्रेनिंग दी जानी चाहिये। हम उन ट्रेंड सदस्यों की कार्य क्षमता का उपयोग दूसरे क्षेत्रों में करना चाहते हैं। देश के विकास में उनका ज्यादा उपयोग हो सके, इसके लिये ट्रेनिंग जरूरी है। डा. रघुवंश प्रसाद सिह जी ने भी यह सवाल उठाया। मैं आपके माध्यम से सदन को बताना चाहूंगा कि हमने पिछले साल पंचायत सदस्यों की ट्रेनिंग के लिये ५ करोड़ रुपये खर्च किये और इस साल १६ करोड़ रुपया रखा गया है। ऐसा नहीं कि हमने केवल कागजों पर रखा है बल्कि हर स्टेट और उसके जिले में जाकर हम उन्हें ट्रेनिंग देते हैं। हमारी बहनें पंचायतों में ट्रेनिंग ले सके, ऐसा डा. वी. सरोजा जो अभी सदन में नहीं हैं, ने कहा, श्री लक्षमण सिंह जी ने कहा और श्रीमती आभा महतो ने भी इस तरह का सुझाव दिया था। इस सुझाव के अंतर्गत हम बहनों को पंचायत सदस्य की ट्रेनिंग देने के बारे में सिंसयरली सोच रहे हैं और कई कदम भी उठाये हैं।

उपाध्यक्ष महोदय, जैसा मैंने कहा कि कभी कभी राज्य सरकारें पचायतों के साथ भेदभाव करती हैं। कभी राज्य सरकार के पास आया हुआ पैसा पंचायत को ट्रांसफर करना चाहिये, जितना जल्दी देना चाहिये, वे नहीं देते हैं। श्री मधुसूदन मिस्त्री जी ने ऐसा सवाल उठाया था, श्री राम जीवन सिंह और डा. राम कृष्ण कुसमरिया ने भी ऐसे सवाल उठाये हैं कि राज्य सरकार पंचायतों के प्रति उदासीन हैं। कहीं कहीं तो ऐसा है कि यदि राज्य में एक पार्टी की सरकार चल रही है तो पंचायत में दूसरा दल बहुमत में हैं। श्री मिस्त्री ने गुजरात राज्य का उदाहरण दिया कि वहां की सरकार पंचायतों के साथ अन्याय कर रही है। मैं उन्हें बताना चाहूंगा कि हम चाहते हैं कि पंचायत चुनावों से समरसता और एकता का वातावरण बने और वे चुने हुये प्रतनधि भेजें। गुजरात ऐसा राज्य है जिसने देश को रास्ता दिखाया है। उसने समरसता का एक नया कांसैप्ट रखा है। इसी आधार पर ५० प्रतिशत ग्राम पंचायत ने गावों में लोगों की एकता से अपना सरपंच बनाया है। हो सकता है कि वहां मुश्किल हुई होगी लेकिन राज्य सरकार पंचायतों के प्रति उदासीन नहीं है। मैं सदन के माध्यम से सभी राज्य सरकारों से कहना चाहता हूं कि उन्हें सदन की भावना समझ लेनी चाहिये। इस संदर्भ में उन्हें यह भी समझ लेना चाहिये कि राज्य में चाहे किसी दल की सरकार हो, उसे पंचायतों के प्रति भेदभाव नहीं रखना चाहिये।

15.00 hrs. जो फंड जिसे देना है, जिसे मिलना है, उसे देना चाहिए। ऐसा न हो कि फिर ग्रामीण विकास मंत्रालय या भारत सरकार को उसका पैसा रोकने या इंस्टालमैन्ट रिलीज करने के बारे में सोचने पर मजबूर होना पड़े।

उपाध्यक्ष महोदय, जैसा बताया गया कि पंचायतों के प्रति भेदभाव रखा जाता है। माननीय सदस्य खारबेल स्वाइं ने ऐसी बात कही थी कि पंचायतों में कहीं-कहीं सरपंच ठेकेदारी करते हैं। मान लीजिए कि जैसे एम.पी.लैड का कोई काम करवाना है या हमारी स्कीम के मुताबिक वहां पर काम करवाना है तो वहां पर सरपंच कभी-कभी ठेकेदार हो जाते हैं। ऐसी बातें कई माननीय सदस्यों ने कही हैं। यह बहुत गलत बात है और हम देखेंगे कि ऐसे सरपंचों को कैसे सस्पैन्ड किया जाए, इसके बारे में हम बहुत सिन्सेयर है, इसे हम बहुत गंभीरता से लेंगे।

श्री महेश्वर सिंह (मंडी): यही नहीं, हिमाचल प्रदेश में ऐसी परम्परा है कि सवा दो रुपये का स्टाम्प पेपर लिया जाता है और प्रधान को कहा जाता है कि तुम एग्रीमैन्ट करो, एग्रीमैन्ट के बाद पैसा मिलेगा और वह पैसा पचास परसैन्ट एग्रीमैन्ट पर दिया जाता है और वह पंचायत अकाउंट में कहीं जमा नहीं होता है। इसीलिए मैंने कहा था कि पंचों का भी कोई स्थान होना चाहिए। लेकिन उन्हें कोई पूछता नहीं है।

श्री काशीराम राणा : श्री महेश्वर सिंह ने जो बात रखी है, मैं मानता हूं कि पंचायतों में ये जो सब कुछ हो रहा है, इसके बारे में माननीय सदस्य डा.रघुवंश बाबू ने भी कहा था कि इसके लिए एक अध्ययन दल बनाया जाए। लेकिन मैं मानता हूं कि अभी हमारे पास जितने भी साधन उपलब्ध हैं, उन साधनों से हम चाहे सरपंच की ठेकेदारी हो, चाहे किसी अन्य प्रतनधि की ठेकेदारी हो, इस ठेकेदारी को खत्म करने के लिए हम जरूर कदम उठायेंगे। जैसा अभी हिमाचल प्रदेश के बारे में कहा गया है, हिमाचल प्रदेश के साथ-साथ अन्य प्रदेशों में भी सरकार इसके बारे में कदम उठाने से नहीं हिचकेगी।

उपाध्यक्ष महोदय, बिहार के बारे में बहुत सी बातें कहीं गई। श्रीमती कांति सिंह, श्री राम जीवन सिंह तथा रघुवंश बाबू ने कहा कि बिहार के साथ अन्याय किया जाता है। बिहार के साथ अन्याय की बात से हम सहमत नहीं है। हम बिहार सरकार से बार-बार विनती करते हैं कि जो भी फंड आपको पहुंचाया जाता है, उसे ठीक ढंग से तथा समय पर आप यूटिलाइज करें। कहीं बिहार सरकार की अकर्मण्यता के कारण बिहार की गरीब प्रजा को लाभ पहुंचाने के लिए हमने जिन गांवों के विकास के लिए जो फंड भेजा है, बिहार सरकार की वजह से अगर यह नहीं पहुंचेगा तो यह बहुत दुखद बात होगी। जैसी भावना हमारे रघुवंश बाबू ने व्यक्त की हैं, वैसी ही भावनाएं हमारी भी हैं। हम चाहते हैं कि चाहे स्वजलधारा योजना हो, चाहे एस.जी.आर.वाई योजना हो, हरियाली योजना हो, इनके लिए १० हजार, ११ हजार करोड़ रुपये हम राज्यों को देते हैं। यह फंड हम इसलिए देते हैं कि जो गरीब लोग हैं, जो गांवों में रहते हैं, जहां आजादी के ५५ सालों के बाद भी विकास का एक भी काम नहीं हुआ, कहीं पीने का पानी नहीं मिला, कहीं शिक्षा के लिए विद्यालय नहीं है। इन सब कामों के लिए जो फंड यहां से जा रहा है, राज्य सरकार के लिए इस फंड का पूरा उपयोग करना पंचायतों के विकास और ग्रामीण गरीबी को दूर करने के लिए बहुत आवश्यक है। लेकिन बिहार में दिया गया बहुत सारा फंड अनयूटिलाइज्ड है। हम प्रधान मंत्री सड़क योजना की बात करेंगे। हमने पिछले साल ३०० करोड़ रुपये दिये, लेकिन उनका इस्तेमाल नहीं हुआ। इस साल पौने दो सौ करोड़ रुपये दिये हैं, लेकिन वह यूज नहीं हुए। इसी तरह से कई स्कीमों में हमने पैसा भेजा, हमने फस्र्ट इंस्टालमैन्ट रिलीज कर दी, लेकिन उसका यू.सी. हमें नहीं मिला। बिना यू.सी. मिले हम पैसा कैसे दे सकते हैं। सभी राज्यों में अगर यह सिस्टम है तो एक राज्य को हम एक्सैप्शन में कैसे रख सकते हैं। जब तक यू.सी. नहीं आयेगा, तब तक हम फंड रिलीज नहीं कर सकते।

उपाध्यक्ष महोदय, जहां तक पंचायत के बारे में सवाल उठाया गया, देश में कोई ऐसा राज्य नहीं होगा कि जहां पर हमने पंचायतों के लिए फंड का एलोकेशन किया और वह उसे नहीं मिला।

जहां पर पंचायत चुनाव ही नहीं हों तो फंड कैसे मिलेगा? दसवें वित्त आयोग की सिफारिश पर वित्त मंत्रालय ने पालिसी तय की थी कि जहां चुनी हुई पंचायतें नहीं हैं, वहां का पैसा वहां का फंड नॉन-लैप्सेबल फंड में रखा जाए। उसमें हमारी नीयत बिल्कुल साफ है। हम आपके लिए ही पैसा रखेंगे। आप जिस तरह से युटिलाइज़ करें मगर समय पर युटिलाइज़ करें, पैसे की कमी नहीं है। ५५ वर्ष की आज़ादी के बाद भी गांव भूखा है तो हम जैसे लोग अच्छी तरह से खाएं, वह ठीक बात नहीं है। देश में पांच-सात प्रतिशत लोग ही ऐशो-आराम करेंगे तो देश खुशहाल नहीं होगा। ग्रामीण विकास मंत्रालय से निकला हुआ पैसा बिहार और दूसरे राज्यों को देने में हम नहीं हिचकेंगे। स्पेशल केसेज़ में हमने पहले भी पैसे दिये हैं। सूखा, बाढ़ और साइक्लोन जैसे स्पेशल केसेज़ में हमने बहुत सारा रुपया राज्य सरकारों को मदद के लिए दिया है। मैं आशा करता हूँ कि बिहार भी इसी तरह से ग्रामीण विकास मंत्रालय फंड का तुरंत उपयोग करेगा। हम और इंस्टालमैंट रिलीज़ करने के लिए तैयार हैं।

उपाध्यक्ष महोदय, एक बात पंचायत से रिलेटेड नहीं है लेकिन एक दो बातें जो ऐसी कही गईं उनका उल्लेख करना मैं आवश्यक समझता हूँ। यहां पर वजिलेन्स मॉनीटरिंग के बारे में कहा गया। हमारे बहुत सारे एमपी अपनी असमर्थता बता रहे हैं कि हमारे प्रपोज़ल्स को कोई स्वीकार नहीं करता, ठुकरा देते हैं। १० लाख और १५ लाख मतदाताओं से वोट ले कर आने वाला जन प्रतनधि असमर्थ हो जाए तो क्या होगा। मंत्रियों की भी यही हालत है। वजिलैन्स और मॉनीटरिंग कमेटी के अध्यक्ष बना दिये हैं लेकिन राज्य सरकार अगर उसकी भी मीटिंग नहीं बुलाए तो वह ठीक नहीं है। यह खुशी की बात है कि अभी-अभी नेता प्रतिपक्ष की ओर से जब एक पत्र मिला और उसमें मुझे बताया कि उनके एक जिले में अध्यक्ष बनाया जाए तथा एक और जिले में वाइस चेयरमैन बनाया जाए, उस चिट्ठी को प्राप्त कर मुझे खुशी हुई। अगर इसी तरह से हमें सभी पार्टियों का सहयोग मिलता रहा तो यह जो वजिलैन्स मॉनीटरिंग कमेटी है, यह ठीक काम कर सकती है। एक ओर माननीय सदस्य कहते हैं कि इसमें करप्शन हो रहा है, पैसा अनयुटिलाइज़ रह रहा है। दूसरी ओर एम.पी. कहते हैं कि मीटिंग नहीं बुलाई जाती, प्रपोज़ल नहीं दिये जाते। प्रपोज़ल को प्रायॉरिटी में नहीं लिया जाता। ये सब बातें हैं जिनसे मुझे लगता है कि वजिलेन्स कमेटी की मीटिंग हर राज्य बुलाए। जैसे मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री ने मुझे एक चिट्ठी लिखी। वह मुझे मिले। मुझे बताया कि यह पंचायत के जो अधिकार हैं, आपने उसका हनन किया है। मैंने कहा कि ऐसा नहीं है। पंचायतों को दिये गये अधिकारों को हम जरा भी छीनने के हक में नहीं हैं। हमारा फंड ठीक से युटिलाइज़ हुआ या नहीं, इसके बारे में समति में बैठाकर हम हिसाब करेंगे।

श्री महेश्वर सिंह : मंत्री महोदय ने जो वजिलेन्स कमेटी का उल्लेख किया है …( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Maheshwar Singh, I will give you a chance, let the Minister complete his reply.

श्री महेश्वर सिंह : यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : मंत्री जी का जवाब पूरा होने के बाद मैं आपको क्लैरफिकेशन के लिए बुलाऊंगा।

...( व्यवधान)

श्री सुरेश रामराव जाधव (परभनी) : मैं इस संबंध में महाराष्ट्र के बारे में कुछ पूछना चाहता हूँ। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : जाधव जी, मंत्री जी का रिप्लाइ पूरा होने के बाद आपका कोई क्लैरफिकेशन होगा तो आप पूछ सकते हैं। अभी आप बैठ जाइए।

...( व्यवधान)

श्री पवन कुमार बंसल: महोदय, मंत्री महोदय ने नगरपालिकाओं का बिल्कुल भी ज़िक्र नहीं किया है। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : वह नगरपालिकाओं का भी ज़िक्र करेंगे। अभी तो रिप्लाइ पूरा ही नहीं हुआ है।

श्री काशीराम राणा : अभी तो रिप्लाइ पूरा नहीं हुआ है। अभी तो पंचायत ही चल रहा है।

उपाध्यक्ष महोदय : जब मंत्री महोदय का सारा रिप्लाई खत्म हो जाए, तब आप क्लैरीफिकेशन ले सकते हैं। मैंने आपसे कहा कि मैं आपको समय दूंगा।

श्री काशीराम राणा : आपकी जो भी बातें थीं, मैंने उनका उत्तर देने का प्रयास किया है। जहां तक वजिलैंस और मानिटरिंग कमेटियों का सवाल है, वे कैसे फंक्शन करें, इसके बारे में हम कदम उठाएंगे। इसके साथ-साथ डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह तथा कुछ अन्य सांसदों ने कहा कि जो पंचायतों में चुने हुए लोग हैं उन्हें एलाउंसेस मिलने चाहिए, यह तो राज्य सरकारें तय कर सकती हैं। माननीय सांसद श्री महबूब जहेदी ने बताया कि वैस्ट बंगाल में एलाउंस दिया जा रहा है, यह अच्छी बात है। जहां तक एलाउंस देने की बात है, अगर राज्य सरकार अपनी ओर से एलाउंस देती है, तो हमें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मैं चाहूंगा कि जो पंचायतें हैं, वे ठीक प्रकार से काम करें। इसमें बड़ी दिलचस्पी राज्य सरकारें लें। वे यह मान कर न चलें कि सब काम भारत सरकार का है और उसके ऊपर सभी कुछ छोड़ दें। राज्य सरकारों को भी यह जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

महोदय, आखिरकार संविधान में कहा गया है कि वह स्टेट सब्जैक्ट है और उसी के आधार पर मैने कहा है कि राज्य सरकारों को इन संस्थाओं को मजबूत करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखानी चाहिए और इसीलिए हमारे माननीय सांसद श्री मणि शंकर अय्यर जी और बंसल जी ने भी कहा कि…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : उन्होंने इस विषय को कान्करेंट लिस्ट में लाने की बात कही थी।

श्री काशीराम राणा : उपाध्यक्ष महोदय, यह स्टेट सब्जैक्ट है, इसे कन्करेंट लिस्ट में लाया जाए, यह बात और माननीय सदस्यों ने भी कही है। यह बहुत बड़ा मसला है। इसके बारे में सदन में और चर्चा हो सकती है और बहुत बड़ी डिबेट हो सकती है। इस संबंध में मुझे एक ही बात कहनी है कि राज्य सरकारों को गांवों के विकास और पंचायतों की मजबूती के लिए अपनी जिम्मेदारी ठीक प्रकार से निभानी होगी। केन्द्र सरकार पूरक बन सकती है, सप्लीमेंट बन सकती है। मैंने कहा कि पंचायतें ऐसी संस्थाएं हैं जो आज ५५ साल के बाद भी अपनी बहुत इम्पौर्टेंस रखती हैं। राज्यों के विकास के लिए इन संस्थाओं की नैसेसिटी को समझते हुए इन्हें इगनोर करना ठीक नहीं है। हम ऐसा कदापि नहीं चाहेंगे कि इन संस्थाओं को इगनोर किया जाए। हम पंचायतों को और सुद्ृढ़ करना चाहते हैं, हम पंचायतों को और मजबूत करना चाहते हैं, हम पंचायतीराज सिस्टम को सुद्ृढ़ करना चाहते हैं। जहां तक भारत सरकार का सवाल है, भारत सरकार की ओर से इन संस्थाओं को सुद्ृढ़ करने के लिए, इनके सशक्तीकरण के लिए जितना भी सहयोग हो सकेगा, वह दिया जाएगा। हम मदद करने के लिए तैयार हैं, लेकिन हमारे साथ-साथ यह राज्यों की भी जिम्मेदारी है। यह सपना केवल हमारा ही नहीं, यह सपना आपका भी है, क्योंकि हम भले ही ५, १०, १५ या २५ सदस्य शहरों से चुनकर आए होंगे, लेकिन आखिर उनको भी गांवों का विकास देखना है, वे भी गांवों से जुड़े हुए हैं।

महोदय, १० साल बीत गए। हमने पंचायतीराज संस्थाओं की समीक्षा की। इस बहस में जो सुझाव रखे गए हैं उनके आधार पर सरकार संविधान में संशोधन भी लाएगी। जैसे वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार देना, जिला परिषदों के अध्यक्षों का डायरैक्ट चुनाव कराना आदि। इनके बारे में अल्टीमेटली जो हमारा ध्येय है, मोटो है वह यही है कि इन संस्थाओं को कामयाब बनाया जाए, लेकिन पिछले १० सालों में ये उतनी सक्षम नहीं हुईं, जितनी कि होनी चाहिए थीं। जैसे कहा जाता है कि आधा गिलास खाली है और आधा भरा है। इसी प्रकार इन संस्थाओं की स्थिति रही है। कुछ नहीं होने से तो कुछ काम हुआ है, यह माना जा सकता है। इस आधे खाली गिलास को भरने का कार्य अब करना है। इस चर्चा के आधार पर, सरकार सभी समस्याओं का समाधान करने का प्रयास करेगी। जितनी भी चुनाव की प्रक्रियाएं हैं उन्हें देखेगी और ७४ वें संविधान संशोधन के बारे में विचार करेगी जिसके बारे में कुछ माननीय सांसदों ने कहा और संघीय नगरपालिका का भी जिक्र किया गया था और नगरपालिका के बारे में भी माननीय बंसल जी ने सवाल उठाया था, मैं कहना चाहूंगा कि इसके बारे में भी चर्चा की गुंजाइश है।

श्री पवन कुमार बंसल: उपाध्यक्ष महोदय, मैंने एक बात कही थी, क्योंकि केन्द्र शासित प्रदेश केन्द्र सरकार के तहत आते हैं। इसलिए यह जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की हो जाती है कि वह कानून के प्रावधानों को केन्द्र शासित क्षेत्रों में इस हिसाब से, इस ढंग से लागू करे कि केन्द्र सरकार एक आदर्श बनकर आए और उसको आगे प्रान्तीय सरकारें फौलो कर पाएं। हम बाकी प्रान्तों का जिक्र करते हैं कि वहां उस प्रदेश में इतने मुद्दे हो गए, इतने सब्जैक्ट लागू किए गए, इतने ट्रांसफर कर दिए गए, क्यों नहीं आप यूनियन टैरीटरीज के अंदर, जो छोटी-छोटी हैं और केन्द्र सरकार के अधीन हैं, उनमें यह काम करते। उनके बारे में कानूनों के प्रावधानों के अनुसार काम आपको करना है, किसी और को नहीं करना। आपको करना है, किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहना है। आप वहां ऐक ऐसा सिस्टम क्यों नहीं बना देते कि वहां बहुत शानदार तरीके से नगरपालिकाओं और पंचायतों का संचालन हो।…( व्यवधान)

   

श्री काशीराम राणा : उपाध्यक्ष महोदय, सवाल अच्छा है और वही मैं कहने जा रहा था।…( व्यवधान)

श्री पवन कुमार बंसल:हम बार-बार दलील करते रहे हैं, क्योंकि दस वर्षों में इस पर कुछ नहीं हुआ।

श्री काशीराम राणा : बंसल जी, मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हूं - जैसे पंचायत के बारे में है, वैसे ही यूनियन टेरिटरी में जो नगरपालिका है, उसके बारे में भी है।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : जैसे अंडेमान और निकोबार, दमन एंड दियु, चंडीगढ़, ये यूनियन टेरिटरीज़ हैं। हमारा अपना भी है।

श्री पवन कुमार बंसल: उपाध्यक्ष महोदय, मैंने चंडीगढ़ का उदाहरण दिया था कि २९ विषयों में से एक विषय का अधिकार भी अभी तक वहां की ग्राम पंचायत और जिला परिषद को नहीं दिया गया। २९ विषयों में से एक पर भी नहीं दिया गया।…( व्यवधान)यह काम केन्द्र सरकार को करना है।…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Pawan Kumar Bansal, you have already put your question. Let him reply now.

श्री काशीराम राणा : मैंने कहा कि बहुत सारे ऐसे सुझाव मेरे पास हैं और मैंने ये सुझाव रखे हैं, अवश्य ही इस पर कदम उठाए जाएंगे। आखिर में मैं यही कहना चाहूंगा कि यह नौ घंटे की चर्चा बहुत उपयोगी थी, जो दस साल पूर्व किया, उसका इस सदन में लेखा-जोखा लिया। उसमें क्या पाया, क्या खोया और उसमें और आगे कैसे बढ़ सकते हैं, इसके लिए यहां बहुत अच्छे सुझाव रखे। हम जल्दी इन पर गौर करेंगे, खास करके वित्तीय और प्रशासनिक सुधार के बारे में ऐसे संशोधन लाएंगे तथा यहां जो सुझाव रखें हैं उन पर भी हम गौर करेंगे।…( व्यवधान)

श्री पवन कुमार बंसल:महोदय, डिस्टि्रक्ट प्लानिंग कमेटीज़ का जिक्र रह गया है, यह उसका एक बहुत अहम हिस्सा है। इस बारे में हमें मंत्री जी बताएं कि डिस्टि्रक्ट प्लानिंग कमेटी के लिए सभी प्रदेश सरकारों के साथ इस बात को उठा कर वहां सुनिश्चित करेंगे। सभी जगह डिस्टि्रक्ट प्लानिंग कमेटीज़ बनें और उनके जो प्लान तैयार हुए हैं, उसके हिसाब से आगे मेट्रोपोलिटीन प्लानिंग वगैरह, उसी के हिसाब से पूरी हो।

श्री काशीराम राणा : बंसल जी ने जो सुझाव रखा है, उसके बारे में हम अवश्य कोई सोल्यूशन निकालेंगे।

श्री शीशराम सिंह रवि (बिजनौर):उपाध्यक्ष महोदय, मंत्री जी ने खुद यह कहा है कि प्रधानमंत्री सड़क योजना में कार्य ठीक नहीं हुआ है और कम संख्या में हुआ है तथा कम पैसे का उपयोग हुआ है, कम सड़क बनी है। । हमारी जो निगरानी समति है, उसका भी कार्यान्वयन ठीक नहीं हो पा रहा है, मंत्री जी भी यह महसूस करते हैं। उसे सुधारने के लिए प्रबंध निदेशक होता है, वह पूरे देश और हर डिस्टि्रक्ट में भारत सरकार अपना प्रतनधि बना कर रखने की कोशिश करेगी, जिसकी पोस्िंटग और सारी जिम्मेदारी ग्रामीण विकास मंत्रालय करे, जिससे उसका पूरा संचालन किया जा सके।…( व्यवधान)कांग्रेस के लोग नहीं चाहते हैं। मैं चाहता हूं कि केन्द्र से कोई प्रबंध निदेशक जाना चाहिए।…( व्यवधान)

श्री महेश्वर सिंह : उपाध्यक्ष महोदय, मंत्री जी ने स्वयं कहा, जहां तक मोनिटरिंग कमेटी का संबंध है, वे देखेंगे कि किस प्रकार से यह बने। मैं आपके माध्यम से मंत्री जी के ध्यान में लाना चाहूंगा कि हिमाचल सरकार ने भी दो जुलाई को एक पत्र सभी उपायुक्तों को इशु किया, उसे मैं कोट करना चाहूंगा।

MR. DEPUTY-SPEAKER: Mr. Minister, can you note down the clarifications one-by-one? Then, at the end, you may reply to them.

SHRI KASHI RAM RANA: I am noting them down.

श्री महेश्वर सिंह : उसमें लिखा है -

"I am to refer to this Department’s letter of even number dated 31st May, 2003 vide which you were requested to… "

 MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Maheshwar Singh, please ask your clarification straight. Do not make a statement.

SHRI MAHESHWAR SINGH : Sir, let me quote a few lines. I have a very small clarification.

This letter reads as follows:

"I am to refer to this Department’s letter of even number dated 31st May, 2003 vide which you were requested to reconstitute the District Level Vigilance and Monitoring Committee. In this context, you are requested not to reconstitute the District Level Vigilance and Monitoring Committee in your district till further orders. If the Committee has been reconstituted, this Committee may not be convened till further directions. "

 SHRIMATI MARGARET ALVA (CANARA): Who has said this?

SHRI MAHESHWAR SINGH : It has been said by the Government of Himachal Pradesh.… (Interruptions)

Mr. Deputy-Speaker, Sir, if you permit, I can even lay this letter on the Table of the House.… (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Mr. Minister, I hope, you are noting down all these points raised by them.

SHRI KASHI RAM RANA: Yes, Sir, I am noting them down and I will reply them also.… (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Hon. Members, please resume your seats. I will allow you one-by-one to ask your clarification.

श्रीमती जयाबेन बी.ठक्कर (वडोदरा) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री महोदय से यह कहना चाहूंगी कि जो जिला पंचायत डवलपमेंट का अच्छा काम कर रही हैं, उनके लिए इंसेंटिव अगर हम तय कर रहे हैं, देने के लिए सोच रहे हैं, तालुका पंचायत जो अच्छा काम कर रही हैं, ग्राम पंचायत जो अच्छा काम कर रही हैं, अगर उनके लिए हम इंसेंटिव देने की सोच रहे हैं, लेकिन ग्राम पंचायतों के चुनाव आर्थिक द्ृष्टि से हम सब लोगों ने अनुभव किया है कि बहुत खर्चीले होते हैं।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : स्पीच मत दीजिए, सवाल या क्लैरीफिकेशंस पूछिये। यह भाषण करने का टाइम नहीं है।

श्रीमती जयाबेन बी.ठक्कर: मैं यह कहना चाहती हूं कि चुनाव के कारण वहां वैर और दुश्मनी भी कायम रहती है। इस बारे में मैं यह सुझाव देना चाहूंगी कि समरथ ग्राम पंचायत वाला जो हमने गुजरात में प्रयोग इम्प्लीमेंट किया, इसी चीज को पूरे देश में लागू किया जाये और कुछ इंसेंटिव के लिए तय किया जाये। इससे ३० लाख ग्राम पंचायतों में वैर, वैमनस्य और सारी दुर्भावनाएं हम कम कर सकेंगे, यह मेरा सुझाव है।

SHRIMATI MARGARET ALVA : I asked a specific question yesterday about funding of training programmes particularly for women who are elected to local bodies. पैसे नहीं जा रहे हैं, जब बजट में आप देखते हैं कि इतना पैसा तो बजट में ट्रेनिंग के लिए है,… (Interruptions) The women elected Members need it. Normally men claim that they are very good and they do not need any training, but women are very backward and are not capable of doing their job. I therefore asked this question, but he has not replied to that. यहां से कोई मदद नहीं मिल रही है। मेरी कांस्टीट्वेंसी में सारी वीमेन को मैंने नेशनल कमीशन और यूनेस्को से पैसे लेकर ट्रेनिंग दिलवाई, सरकार से एक पैसा भी नहीं मिला।We are asking as to how it is possible to carry on training for women who are at the grassroots, if there is no funding from the Central Government side. I raised it in my speech yesterday, but it has not been replied to.

SHRI KASHIRAM RANA: I stated in my reply that we spent nearly Rs.3 crore last year and this year, an amount of Rs.16 crore has been allocated for training of women.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Is it only to train women representatives?

SHRI KASHIRAM RANA: No. It is to train the entire panchayatmembers, where women members are also included. … (Interruptions)

SHRIMATI MARGARET ALVA: Have you earmarked some money exclusively for training of women? The Committee on Empowerment of Women has submitted a report to Parliament on training of women in local bodies. Our report is before the Government. We have seen throughout the country that nothing is happening. That is why, I wanted you to look at our report and take some action.… (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: The hon. Minister said that last year an amount of Rs.3 crore had been spent on training of members who are elected to panchayats and that this year, an amount of Rs.16 crore has been allotted.

… (Interruptions)

SHRI SONTOSH MOHAN DEV (SILCHAR): This morning, MPs have got a D.O. letter from the hon. Minister which is very disturbing. The reason is this. Originally, MPs were the ones who were the final authority to select and recommend the names. Now, MLAs are being brought in; Zila Parishads are also there. I do not object to that. But what is happening is that some roads are half-constructed which are not completed and they are neglected. Suppose there is a ten km. road in which seven km. is constructed and the rest is left as it is. Such roads should be completed first and then, a new policy should be taken up. Whenever a new Minister comes in, new policy is being taken up; it disturbs the area. Some works which are already started under the PMGSY must be completed first and then, you can do the rest. It is not clear in that letter. He may kindly clarify this.

श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, मैं समझता हूं कि कल से जो चर्चा पंचायती राज पर हुई है, उस पर माननीय मंत्री जी ने काफी सार्थक भाषण दिया है। जहां तक नीतियों का सवाल है, उस पर मंत्री जी पूरी तरह से स्पष्ट हैं। मेरा कहना है कि असली सवाल कार्यान्वयन का है। उसमें कहां सुधार करना है, इसके बारे में उन्होंने कहा है। मैं आपकी मार्फत एक ही निवेदन करना चाहता हूं कि जिले में सांसद की अध्यक्षता में सतर्कता और निगरानी समति बनी है। भारत सरकार की तरफ से जो योजनायें बनती हैं, उन योजनाओं के लिए जो दौलत जायेगी, यह कमेटी उसकी निगरानी और समीक्षा करेगी। ऐसा लगता है कि यह कोई सुधारात्मक कमेटी है। मेरा कहना है कि जब तक इस कमेटी का कोई मनोवैज्ञानिक प्रभाव नहीं होगा, आला अफसरान उदासीनता बरतेंगे और भारत सरकार द्वारा दिये गये पैसे का गलत इस्तेमाल होगा तो इस कमेटी को उनके खिलाफ एक्शन लेने का राइट हो। यह मनौवैज्ञानिक प्रभाव यदि वहां के ब्यूरोक्रेट्स पर नहीं रहेगा, वहां के आला अफसरान पर नहीं रहेगा, तो मैं कहना चाहूंगा कि मंत्री जी, आपने जिस मकसद से यह कमेटी बनाई है, वह किसी भी कीमत पर इस मकसद को पूरा नहीं कर सकती। लिहाजा मेरा आपसे आग्रह है कि आप इस बारे में बतायें कि सतर्कता और निगरानी समति जो बनी है, उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव अधिकारियों पर हो कि यदि योजनाओं का सही कार्यान्वयन नहीं होगा तो कमेटी को यह हक होगा कि वह उनके खिलाफ कार्रवाई करने की संस्तुति करें जिससे सरकार उन पर एक्शन ले सके।

श्रीमती आभा महतो (जमशेदपुर) :मेरा सवाल इससे हटकर है। मैं झारखंड राज्य से आती हूं। वहां आज तक पंचायत चुनाव ही नहीं हुए हैं। मैं मंत्री जी से कहना चाहती हूं कि वहां कुछ शैडयूल एरिया की बात है, उसका सुधार करते हुए पंचायत चुनाव हमारे एरिया में जल्दी हों, इसके लिए मैं उनसे आश्वासन चाहती हूं।

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK): The Motion which was moved yesterday by the hon. Minister was to discuss about the implementation aspect of the progress that has been made within the last ten years. My question was very specific yesterday and today also I want to repeat that question relating to the social audit aspect related to the Gram Sabha. Instead of identifying the project which is to be implemented, why not give that responsibility of social audit to the Gram Sabha?

Secondly, if you are going in for second generation ofPanchayati Raj institution reforms, is anything being done to have audit in an independent manner? As we have C&AG and Accountant General in other States, we should have independent audit organisations for Panchayati Raj institutions.

डॉ.रामकृष्ण कुसमरिया (दमोह) : उपाध्यक्ष महोदय, मध्य प्रदेश में जो जिला सरकार बनाई गयी है वह असंवैधानिक है। जैसा कि अभी मंत्री जी ने स्वीकार किया है कि मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री ने कहा है कि यह जो वजिलेंस कमेटी है, उसको हम इसलिए नहीं मानते क्योंकि यह पंचायतों के अधिकारों का हनन करती है। जबकि वास्तविकता यह है कि वहां पर जो जिला सरकार का गठन किया गया है, जो भी जिला पंचायत का सी.ओ. है यानी मुख्य कार्यपालन अधिकारी है, वह जवाबदेह जिला सरकार के लिए है न कि जिला पंचायत के लिए है। मेरा निवेदन है कि इस व्यवस्था का परीक्षण करके वहां की पंचायतों के अधिकारों को बहाल कराया जाये।

श्रीमती श्यामा सिंह (औरंगाबाद, बिहार) : आप जो कह रहे हैं, बहुत सी जगह ओवरलैपिंग होती है फंड्स की, जो पंचायतों की स्थिति बहुत दयनीय है, इसका मुख्य कारण है। आपको उसका स्पेसफिकेशन करना होगा। जो बहुत सारा फंड विधायकों को जाता है, पंचायत में जाता है, नीचे मुखिया को जाता है, सारा इंटरलैपिंग होने के कार कोई काम नहीं हो पाता। इसके लिए हम लोगों को ठोस कदम उठाना पड़ेगा।

SHRIMATI SHYAMA SINGH (AURANGABAD, BIHAR): In view of the fact that we should get full benefits of this Panchayati Raj system, one very important thing we have to think about is the overlapping of so many schemes that keep going from the Centre. Enormous schemes are in the pipeline. There are four tiers and by the time it travels down it gets delayed. We are earmarking a particular scheme. Four different bodies are involved and there is enormous corruption. Is there any method by which this money can be properly utilised instead of going into the pockets ofThekedar,contractor, middlemen and so on? Should not there be a Central monitoring system by which from time to time at least the Government could see whether the Panchayati Raj money is being utilised properly or not?

At least, there will a sense of fear in the minds of the people.

डा. लक्ष्मीनारायण पाण्डेय (मंदसौर) :उपाध्यक्ष महोदय, केन्द्र सरकार द्वारा जिन परियोजनाओं के लिए धनराशि दी जाती है, उनकी मौनीटरिंग के लिए यहां एक समति बनाई गई है और प्रत्येक जिले में वहां के सांसदों को, व जनप्रतनधियों को किया गया । सांसद को उनमें अध्यक्ष बनाकर नियुक्ति दी गई। लेकिन मध्य प्रदेश सरकार द्वारा आज तक उस आदेश का पालन नहीं किया जा रहा है। मैं ऐसा मानता हूं कि यह केन्द्र सरकार द्वारा दिए गए आदेश का सर्वथा उल्लंघन है। इसे देखा जाना चाहिए अन्यथा समति बनाने का, जो केन्द्र के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा बनाई गई है, कोई औचित्य नहीं है। अभी महेश्वर सिंह जी ने कहा कि उनके राज्य में विपरीत स्थिति बन गई है। अगर राज्य सरकारें नहीं चाहतीं तो मैं समझता हूं कि यह गंभीर विषय है और केन्द्र को इसे देखना चाहिए।

श्री खारबेल स्वाइं (बालासोर) : उपाध्यक्ष महोदय, मंत्री जी से मैं जानना चाहता हूं कि अगर एक एमपी ने प्रधान मंत्री सड़क योजना के लिए किसी रास्ते का प्रस्ताव दिया और उसे जिला परिषद ने स्वीकार नहीं किया तो क्या होगा? क्या मंत्री जी को लिख कर देने से वह उस रास्ते को इन्क्लूड करेंगे?

मेरा दूसरा प्रस्ताव है कि जैसा मंत्री जी ने कहा कि जिला पंचायत, जिला परिषद के अध्यक्ष और पंचायत समति के अध्यक्ष के लिए डायरैक्ट इलैक्शन के प्रस्ताव को वह संविधान संशोधन के रूप में लाएंगें । मेरा कहना है कि यह यूनैनीमस नहीं है, सिर्फ बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ सांसदों ने यह प्रस्ताव दिया है, हम इससे सहमत नहीं हैं। अगर आप इस प्रस्ताव के लिए संविधान संशोधन कराना चाहते हैं तो पहले यहां बहस कराएं।

SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN (CHIRAYINKIL): I have only one question. I would like to know whether the present three-tier system should continue in this form or not. I think a two-tier system will be sufficient. Why do we need block level in between Zila Parishad and Gram Sabha? I think there is no need to have a Block President in a State like ours. We can easily manage with the Panchayat and the Zila Parishad. So, the two-tier system will be sufficient.

SHRI VINAY KUMAR SORAKE (UDUPI): This time the Central Government announced a new drinking water scheme, namely, Swa-Jal Dhara Yojana. We all are involved in this. We have motivated the Panchayat people and they have collected Rs.2.6 crore towards 10 per cent margin money. We all have recommended for this through Zila Parishad andPanchayat as also through the State Government. This proposal came to the Central Government seven months ago. Till now, no decision has been taken on this proposal. Now the Panchayat has collected ten per cent margin money. Therefore, there is a little confusion as to who will give the approval, whether it is the State Government or the Zila Parishador the Central Government.

SHRI KASHIRAM RANA: Sir, I have noted all the suggestions and I will definitely consider them seriously for taking a decision.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, let us go to the Private Members’ Business. He has noted down all the suggestions and he will write to the Members also.

SHRI KASHIRAM RANA: Yes, Sir.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, the House will take up the Private Members’ Business. We have already encroached upon its time by five minutes.

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