State Consumer Disputes Redressal Commission
U P S E B vs Arvind Kumar Gupta on 18 May, 2022
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/2000/1403 ( Date of Filing : 04 May 2000 ) (Arisen out of Order Dated in Case No. of District State Commission) 1. U P S E B a ...........Appellant(s) Versus 1. Arvind Kumar Gupta a ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. JUSTICE ASHOK KUMAR PRESIDENT HON'BLE MR. Vikas Saxena JUDICIAL MEMBER PRESENT: Dated : 18 May 2022 Final Order / Judgement
(सुरक्षित) राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग , उ0प्र0 , लखनऊ।
अपील सं0 :- 1403 / 20 00 (जिला उपभोक्ता आयोग, बदांयू द्वारा परिवाद सं0- 85/1993 में पारित निर्णय/आदेश दिनांक 16/06/1999 के विरूद्ध) यू0पी0 स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (नॉ यू0पी0 पॉवर कारपोरेशन लिमिटेड), द्वारा चेयरमैन, शक्ति भवन, लखनऊ।
अधिशाषी अभियंता, इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन डिवीजन, यू0पी0 स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (नॉ यू0पी0 पॉवर कारपोरेशन लिमिटेड) बदांयू अपीलार्थीगण बनाम अरविन्द कुमार गुप्ता पुत्र बृजनंदन स्वरूप गुप्ता, निवासी मोहल्ला विजय नगर कॉलोनी, 19, बदॉंयू।
प्रत्यर्थी समक्ष मा0 न्यायमूर्ति श्री अशोक कुमार, अध्यक्ष मा0 श्री विकास सक्सेना, सदस्य उपस्थिति:
अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता:- श्री इसार हुसैन, एडवोकेट प्रत्यर्थीगण की ओर से विद्वान अधिवक्ता:- श्री राजेश चड्ढा, एडवोकेट दिनांक:-02.06.2022 माननीय श्री विकास सक्सेना , सदस्य द्वारा उदघोषित निर्णय
यह अपील जिला उपभोक्ता आयोग, बदांयू द्वारा परिवाद सं0 85/1993 अरविन्द कुमार गुप्ता बनाम बिजली बोर्ड व 01 अन्य में पारित निर्णय व आदेश दिनांकित 16.06.1999 से व्यथित होकर प्रस्तुत की गयी है।
संक्षेप में परिवादी का कथन इस प्रकार हैं कि प्रत्यर्थी/परिवादी मेसर्स विमल इंडस्ट्रियल प्रोडक्स के नाम से व्यवसाय करता था और उसने अपने व्यापार हेतु विपक्षीगण से 3.5 किलोवाट का लोड लेकर विद्युत कनेक्शन मंजूर कराया। दिनांक 08.08.1990 को विद्युत विभाग के प्रवर्तन दल द्वारा निरीक्षण किया गया, निरीक्षण के समय वेल्डिंग मशीन सिंगल फेज एवं छोटी साईज की ड्रिल मशीन तथा लाईट के तीन प्वांइट थे। परिवादी के अनुसार उक्त निरीक्षण दल ने कोरे सादे फार्म पर प्रत्यर्थी/परिवादी के हस्ताक्षर करा लिये, जिसकी कॉपी प्रत्यर्थी/परिवादी को नहीं दी गयी, बाद में दिनांक 03.12.1990 को परिवादी को एक एसेसमेंट बिल भेज दिया गया, जिसमें देय धनराशि रू0 6,160.85/- तथा देय तिथि के बाद रू0 6,689.85/- अदा करने को कहा गया था। परिवादी द्वारा उपरोक्त असेसमेंट बिल को गलत बताया गया एवं उसे सुधारने की प्रार्थना की गयी, किन्तु अपीलार्थी विद्युत विभाग ने प्रार्थना पर कोई ध्यान नहीं दिया और परिवादी को निर्देशित किया कि वह अपने अधिकार को सुरक्षित रखते हुए रू0 1,333.40/- जमा कर दें, अन्यथा कनेक्शन काट दिया जायेगा। परिवादी ने उपरोक्त धनराशि जमा कर दी। इसके उपरान्त भी वह विभाग से बिल को सही करने की शिकायत करता रहा। दिनांक 27.03.1992 को विपक्षी विद्युत विभाग द्वारा परिवादी का कनेक्शन काट दिया गया एवं विपक्षी के कर्मचारी केबिल तार आदि ले गये, जिससे उसका व्यापार पूरी तरह से ठप हो गया। बाद में प्रत्यर्थी/परिवादी को एक एसेसमेंट बिल कुल रूपये 16,580.10/- का हो गया था। उक्त वसूली के विरूद्ध सिविल जज (जूनियर डिवीजन) बदायूं के न्यायालय में निषेधित करने हेतु वाद प्रस्तुत किया गया, जिसको न्यायालय द्वारा स्थगित कर दिया गया। परिवादी ने जिला उपभोक्ता फोरम से प्रश्नगत कनेक्शन जुडवाये जाने तथा अवैधानिक एसेसमेंट समाप्त किये जाने तथा सही रीडिंग के आधार पर बिल बनाये जाने की प्रार्थना की।
विद्धान जिला उपभोक्ता फोरम ने यह परिवाद आज्ञप्त करते हुए प्रत्यर्थी/परिवादी का विद्युत कनेक्शन निर्णय की तिथि से एक माह के अंदर जोड़े जाने तथा विद्युत कनेक्शन विच्छेदन की तिथि 27.03.1992 से कनेक्शन जोडे जाने की तिथि तक 500/- रू0 प्रतिमाह के हिसाब से क्षतिपूर्ति अदा करने का आदेश दिया, जिससे व्यथित होकर अपीलार्थी यूपीएसईबी द्वारा यह अपील प्रस्तुत की गयी।
अपील में मुख्य रूप से यह कथन किया गया है कि प्रत्यर्थी/परिवादी को प्रश्नगत विद्युत कनेक्शन 3.5 किलोवाट के हिसाब से दिया गया था, जो विमल इण्डस्ट्रीज प्रोडक्ट के नाम से था। 08 अगस्त 1990 को समय 11.30 बजे अपीलकर्ता के प्रवर्तन दल द्वारा उक्त विद्युत कनेक्शन का स्थलीय निरीक्षण किया गया, जिसमें यह पाया गया कि परिवादी 8.8 किलोवाट के लोड की विद्युत भार का उपभोग कर रहा है। स्वयं परिवादी ने चेकिंग रिपोर्ट दिनांक 08.08.1990 पर हस्ताक्षर किये, परिवादी से ऐससमेंट के अनुसार धनराशि की मांग की गयी तथा संबंधित बिल एसेसमेंट एमाउण्ट को सम्मिलित करते हुए उसे भेजा गया, किन्तु परिवादी ने मात्र 1,337.90/-रू0 ही जमा किये, जिस कारण परिवादी का वाद पोषणीय नहीं है। प्रश्नगत निर्णय व आदेश तर्क के बिना कारण रहित दिया गया है। इसके अतिरिक्त धारा 14 (2ए) उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में यह प्रावधान है कि प्रत्येक निर्णय सदस्यों एवं अध्यक्ष द्वारा हस्ताक्षरित किया जायेगा, किन्तु इस मामले में सदस्य श्रीमती नीता गुप्ता द्वारा केवल कार्यवाही की गयी, जो प्रत्यर्थी/परिवादी की सगी भाभी थी और इसके अतिरिक्त परिवादी ने वे अनुतोष की मांग ही नहीं की, जो अनुतोष निर्णय में प्रदान कर दिये गये हैं। इसके अतिरिक्त अपीलार्थी विभाग को कोई नोटिस प्राप्त नहीं हुयी थी। प्रश्नगत मामले में परिवादी के विरूद्ध चेकिंग रिपोर्ट दी गयी थी, जिस पर स्वयं परिवादी ने भी हस्ताक्षर किये थे, जिसके विरूद्ध मामला पोषणीय नहीं है। अत: निर्णय अपास्त होने योग्य है एवं अपील स्वीकार किये जाने योग्य है।
अपीलार्थीगण के विद्धान अधिवक्ता श्री इसार हुसैन को सुना गया तथा प्रत्यर्थी के विद्धान अधिवक्ता श्री राजेश चड्ढा को सुना गया। पत्रावली पर उपलब्ध समस्त अभिलेख का परिशीलन किया गया:-
अपीलकर्ता का कथन है कि दिनांक 08.08.1990 को समय 11.30 बजे विद्युत प्रवर्तन दल द्वारा चेकिंग की गयी, जिसमें परिवादी के विद्युत कनेक्शन पर लोड अधिक पाया गया, स्वयं परिवादी के अभिकथनों में एसेसमेंट किये जाने का वर्णन किया गया है एवं यह स्वीकार किया गया है कि विद्युत प्रवर्तन दल द्वारा उनके विद्युत के कनेक्शन की चेकिंग की गयी थी। अपीलकर्ता की ओर से पत्रांक सं0 1495 दिनांकित 26.01.1990 के रूप में एसेसमेंट बिल की प्रतिलिपि प्रस्तुत की गयी है, जिससे स्पष्ट होता है कि परिवादी ने प्रवर्तन दल द्वारा किये गये स्थलीय निरीक्षण में किये गये एसेसमेंट के विरूद्ध यह परिवाद प्रस्तुत किया है।
इस संबंध में परिवादी की ओर से माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय यू0पी0 पावर कारपोरेशन लिमिटेड प्रति अनीश अहमद प्रकाशित III 2013 CPJ प्रस्तुत किया गया है, जिसमें मा0 सवोच्च न्यायालय द्वारा निर्णय के प्रस्तर 29 तथा 30 में स्पष्ट रूप से दिया गया है कि यदि विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 126 के अनुपालन में विद्युत विभाग के आंकलन अधिकारी द्वारा निरीक्षण करके एसेसमेंट किया जाता है एवं यह पाया जाता है कि विद्युत का उपभोक्ता अवैध रूप से विद्युत का उपभोग कर रहा है तो इस आंकलन, जो धारा 126 विद्युत अधिनियम के अंतर्गत किया गया है, के विरूद्व उपभोक्ता न्यायालय में वाद पोषणीय नहीं होगा। उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि स्वयं परिवादी ने एसेसमेंट को गलत बताते हुए परिवाद प्रस्तुत किया है। एसेसमेंट के विरूद्ध यह परिवाद मा0 सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय यूपीएसईबी प्रति अनीश अहमद (उपरोक्त) के आधार पर पोषणीय नहीं है। अत:परिवादी इस मामले में किसी अनुतोष को पाने के अधिकारी नही है। विद्धान जिला उपभोक्ता फोरम ने गलत प्रकार से एवं माननीय सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय में पारित सिद्धान्त को अनदेखा करते हुए निर्णय दिया है अत: निर्णय अपास्त होने योग्य है एवं अपील स्वीकार किये जाने योग्य है।
अपील स्वीकार की जाती है। प्रश्नगत निर्णय व आदेश अपास्त किया जाता है।
अपील में उभय पक्ष अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।
आशुलिपिक से अपेक्षा की जाती है कि वह इस निर्णय/आदेश को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दें।
(न्यायमूर्ति अशोक कुमार) (विकास सक्सेना) अध्यक्ष सदस्य संदीप, आशु0 कोर्ट नं0-1 [HON'BLE MR. JUSTICE ASHOK KUMAR] PRESIDENT [HON'BLE MR. Vikas Saxena] JUDICIAL MEMBER