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Lok Sabha Debates

Regarding Implementation Of Policies And Programmes For Sc/St Etc. (Not ... on 25 April, 2003

15.32 hrs. Title: Regarding implementation of policies and programmes for SC/ST etc. (Not concluded).

MR. DEPUTY-SPEAKER: The House will now take up the Resolution regarding implementation of policies and programmes for SC/ST etc. by Shri Ramdas Athawale.

Before we take up the Resolution for discussion, we have to fix the time for discussion of this Resolution. Usually, two hours are allotted in the first instance. If the House agrees, two hours may be allotted for discussion.

SHRI PAWAN KUMAR BANSAL (CHANDIGARH): More time would be required for this.

MR. DEPUTY-SPEAKER: All right. Let us now hear Shri Ramdas Athawale.

श्री रामदास आठवले (पंढरपुर) : उपाध्यक्ष महोदय, यह सभा सिफारिश करती है कि वह प्रशासन को सुद्ृढ़ बनाकर और उपयुक्त विधान लाकर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और समाज के अन्य कमजोर वर्गों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उत्थान के लिए नीतियों और कार्यक्रमों के कार्यान्वयन के लिए सक्रिय कदम उठाए।

उपाध्यक्ष महोदय, यह इश्यू बहुत गम्भीर है। हमारे देश में दलित, आदिवासी और कमजोर वर्गों के लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है और इन वर्गों के समाज को न्याय मिलना चाहिए। इसके लिए हम अनेक वर्षों से मांग करते रहे हैं, लेकिन उन्हें जिस प्रकार से न्याय मिलना चाहिए उस प्रकार से अभी तक नहीं मिला है।

महोदय, बाबा साहेब अम्बेडकर, जो संविधान की ड्राफ्िंटग कमेटी के प्रमुख थे, उन्होंने जो बातें बताईं और जो संविधान उनके नेतृत्व में बना, उसी प्रकार से समाज को न्याय देने का प्रयास हो रहा है, लेकिन उन लोगों तक न्याय पहुंच नहीं पा रहा है। यह हमारे लिए अच्छी बात नहीं है। इसलिए मैंने यह प्रस्ताव सदन में प्रस्तुत किया है। आज हमारे देश को आजाद हुए ५५ वर्ष पूर्ण हो चुके हैं और हम अपनी आजादी के ५६वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। इस विषय पर सदन में अनेक बार चर्चा हो चुकी है, लेकिन अभी तक कमजोर वर्गों को न्याय नहीं मिला है। हम यह भी नहीं चाहते कि हर बार इस विषय पर सदन में चर्चा हो और तभी उन्हें न्याय मिले, ऐसा भी हम नहीं मानते। यह ठीक नहीं है। अपने संविधान में इन वर्गों के लोगों को जितनी सुविधाएं प्रदान किए जाने का प्रावधान किया गया है वे बिना किसी अड़ंगे और अड़चन के मिलनी चाहिए।

महोदय, जो बलशाली हैं, उन्हें अपना बल, जो कमजोर हैं, जो बलहीन हैं, उन्हें देना चाहिए। सामाजिक और आर्थिक समानता का जो वातावरण है, वह हर व्यक्ति को अपने जीवन में अपनाना चाहिए। भारत के संविधान की जो मूल भावना है, उसे लागू करने, उसके अनुसार काम करने, उसके प्रॉवीजन्स को इम्पलीमेंट करने की आवश्यकता है, मगर अपने देश में उस तरह का काम नहीं हो रहा है। इसीलिए हमें बार-बार इस विषय पर, इस सदन में चर्चा करनी पड़ती है। बाबा साहब अम्बेडकर ने बताया था कि -

" मैं उन देशवासियों में से हूं जो प्रजातंत्र के प्रेमी हैं और समाज में किसी भी रूप में विद्यमान एकाधिकार की स्थिति का अंत करना चाहते हैं।
" मेरा मुख्य उद्देश्य जीवन के सभी पहलुओं राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्र में व्यावहारिक रूप से, एक मनुष्य एक मूल्य के सिद्धांत की स्थापना करना है। "बाबासाहेब अम्बेडकर जी ने यह भी बताया था कि सामाजिक एकता के संयुक्त भावों का आभास ही राष्ट्रीयता है, जिसमें व्यक्ति एक-दूसरे को अपना सगा-सम्बन्धी समझने लगता है। इसी तरह बाबासाहेब अम्बेडकर जी ने ये बातें बताई हैं और सारे पक्ष के लोग भी इसी तरह की भूमिका रखते हैं, मगर न्याय उस वर्ग तक नहीं पहुच रहा है। शिक्षा के बारे में बाबासाहेब अम्बेडकर ने बताया था कि शिक्षा एक ऐसा माध्यम है, जो प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए। शिक्षा सस्ती से सस्ती हो, जिससे कि निर्धन से निर्धन व्यक्ति भी शिक्षा प्राप्त कर सके। अगर जीवन में हमें कोई परिवर्तन करना है तो शिक्षा भी बहुत जरूरी है। अगर इन्होंने भारत के संविधान में हमें शिक्षा देने की स्वतंत्रता नहीं दी होती तो मेरे जैसे कार्यकर्ता को पार्लियामेंट में आने का मौका न मिलता। हमें भारत के संविधान में बोलने की आजादी दी है, हमें अपनी ओपनियन रखने का पूरा अधिकार है। सरकार किसी की भी हो, मगर हमें यहां अपनी भूमिका रखने का पूरा अधिकार है। अगर हमें इस वर्ग को न्याय देना है तो हम सब लोगों को इस विषय पर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। इसके लिए कनून बनाने की आवश्यकता है। एससी, एसटी के लिए १५ प्रतिशत और साढ़े सात प्रतिशत, टोटल साढ़े २२ प्रतिशत रिजर्वेशन है, मगर उसका इम्प्लीमेंटेशन ठीक ढंग से नहीं हो रहा है।
महोदय, सरकार की तरफ से प्रयत्न हो रहा है, हमारे मंत्री जी प्रयत्न कर रहे हैं, मगर ब्यूरोक्रेसी इसके बारे में गंभीरता से नहीं सोच रही है। इसलिए हम पार्लियामेंट को बताना चाहते हैं कि दलितों को कानून के माध्यम से जो अधिकार मिले हैं, उसके मुताबिक उन्हें न्याय मिलना चाहिए। १-१-९८ को गवर्नमेंट ऑफ इंडिया की सर्विसेज़ में, क्लास वन, ग्रुप ए में एससी के लिए १०.८० प्रतिशत रिजर्वेशन है और एसटी के लिए ३.४४ प्रतिशत है, टोटल १४.२४ प्रतिशत है, मतलब साढ़े २२ प्रतिशत इन्हें रिजर्वेशन मिलना चाहिए, मगर खाली १४.२४ प्रतिशत ही है। एससी, एसटी की पापुलेशन २६-२७ प्रतिशत तक हो गई है, इसलिए हमारी सरकार से मांग है कि जो साढ़े २२ प्रतिशत रिजर्वेशन एससी, एसटी को मिलता है उसे २७ प्रतिशत करने की आवश्यकता है। उसी तरह इसमें १८ प्रतिशत एससी को और नौ प्रतिशत एसटी को मिलना चाहिए, इस बारे में भी आपको सोचना चाहिए। महोदय, आपके लक्षद्वीप का भी सवाल है। जब कोई एसटी का व्यक्ति लक्षद्वीप छोड़ कर दिल्ली आता है या किसी अन्य स्टेट में रहता है तो उसे एसटी नहीं कहा जाएगा। इसी तरह एक रेजोल्यूशन या आदेश सरकार ने निकाला है।
महोदय, मैं सरकार से अपील करता हूं कि अगर कोई एसटी का आदमी दिल्ली में आता है या दूसरी जगह जाता है तो उसे उसी केटेगिरी से हटाना ठीक नहीं है। अगर एससी, एसटी का कोई व्यक्ति किसी भी राज्य में जाता है तो हमारी मांग है कि वहां उसे रिजर्वेशन मिलना चहिए। इस तरह का कानून आपको बनाना चाहिए। इस बारे में भी भारत सरकार को सोचना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और सुपर क्लास वन तथा हर केटेगिरी में साढ़े २२ प्रतिशत रिजर्वेशन इन्हें देने की आवश्यकता है, इन्हें यहां रिजर्वेशन नहीं देना चाहिए, यह अच्छी बात नहीं है। अगर हमें इस वर्ग को ऊपर उठाना है तो इन जगहों पर भी इन्हें रिजर्वेशन देने की आवश्यकता है। रिजर्वेशन को १०वें शेडयूल में डालने की आवश्यकता है ताकि इन्हें पूरा प्रोटेक्शन मिले।
उसी तरह से जो पांच ओ.एम. निकले थे, उनमें से तीन ओ.एम. विथड्रा हो चुके हैं, मगर उनका इम्प्लीमेंटेशन नहीं हो रहा है। हमारी मांग यह भी है कि उनमें से तीन विथड्रा हुए ओ.एम. को अमल में लाने की आवश्यकता है। बाकी दो ओ.एम. को विथड्रा करने के बारे में सरकार को विचार करने की आवश्यकता है। उसके साथ-साथ एक रिजर्वेशन एक्ट बनाने की आवश्यकता है। अगर रिजर्वेशन एक्ट बन जाता है तो फिर रिजर्वेशन को और दलितों को न्याय दिलाने के लिए एक कानून बन जायेगा और जो अधिकारी रिजर्वेशन का इम्प्लीमेंटेशन नहीं करेगा तो उसके ऊपर पाबन्दी लगाई जा सकती है, उसे कानून में सजा भी दी जा सकती है। इसलिए रिजर्वेशन एक्ट भी बनाने की आवश्यकता है।
उसके साथ-साथ निजी क्षेत्र में रिजर्वेशन लागू करने के बारे में भी संविधान संशोधन कराने की आवश्यकता है, इसलिए पार्लियामेंट में यह कानून बनाना चाहिए कि निजी क्षेत्र में भी रिजर्वेशन एस.सी. एस.टी. को मिलना चाहिए। उसके साथ-साथ हमारी मांग यह भी है कि जमीन में भी रिजर्वेशन देने की आवश्यकता है। गांवों में जो जमीन है, एस.सी. एस.टी. की जितनी पोपुलेशन है, उतना रिजर्वेशन उनको उसमें मिलने की आवश्यकता है। जमीन में भी रिजर्वेशन मिलना चाहिए, इस तरह की हमारी मांग है।
उसके साथ-साथ हमारी यह भी मांग है कि राज्य सभा, विधान परिषद, केन्द्र और राज्यों के जो मंत्रिमंडल हैं, इनमें भी रिजर्वेशन रखने की आवश्यकता है। उसके साथ-साथ महाराष्ट्र में जो एस.सी. के लोगों की लिस्ट बनने के बाद उनका रिजर्वेशन खत्म हो चुका था, उनको सुविधा देने का जो प्रस्ताव है, यह केन्द्र सरकार ने मंजूर कर दिया है। इसलिए महाराष्ट्र में हमारी जो १८ जगह विधान सभा की हैं और तीन जगह लोक सभा की हैं, इनको बढ़ाने की आवश्यकता है।
फिजीएण्टी समाज ऐसा समाज है, जिसे रिजर्वेशन मिलना चाहिए। उनकी एक कैटेगरी बनाकर उन्हें रिजर्वेशन देना चाहिए, इस तरह की हमारी मांग है। उसके साथ-साथ जो मुस्लिम समाज है, उसे भी १५ परसेंट रिजर्वेशन मिलना चाहिए, इस तरह की हमारी मांग है।
दलितों पर जो एट्रासिटीज हैं, १९९७ में २७९४४, एस.टी. पर ४६४४, १९९८ में एस.सी. पर २५६३८, एस.टी. पर ४२७६, १९९९ में एस.टी. पर २५०९३, एस.टी. पर ४४५०, २००० में एस.सी. पर २५४५५, एस.टी. पर ४१९० और २००१ में एस.टी. पर २५५६२ और एस.टी. पर ४१२१ एट्रासिटीज हुई हैं। इस तरह दलित समाज पर जो अत्याचार हैं, ये बढ़ते जा रहे हैं। इसके लिए भी कड़ा से कड़ा कानून बनाने की आवश्यकता है। यह जो समाज है, इस समाज को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक द्ृष्टि से न्याय देने के लिए सरकार को प्रयत्न करना चाहिए, इस तरह की हमारी मांग है। हम चाहते हैं कि पार्लियामेंट में इसके सम्बन्ध में ज्यादा से ज्यादा बहस हो और सरकार हमारे राइट के बारे में अपना कानून बनाने के बारे में जिस तरह से सोचती है, उसी तरह इसके बारे में भी विचार करना चाहिए।
मैं समझता हूं कि हमें इसके बारे में अपने विचार सदन में बताने चाहिए।
SHRI SHIVRAJ V. PATIL (LATUR): Sir, I am grateful to you for having given me this opportunity.
The issue which has been highlighted by Shri Ramdas Athawale is really a very important issue.
In our Constitution we have provided for positive discrimination. That means those who are weak, those who need help, should be given more help than what is given to other ordinary citizens. This is one of the most important aspects of our Constitution which was drafted by Dr. Ambedkar and approved by the Constituent Assembly.
As far as education is concerned, we have provided that the students coming from the Scheduled Castes and Scheduled Tribes should have the benefit of reservation. So, as far as education is concerned, I think, 100 per cent benefit is secured by the students coming from the Scheduled Castes and Scheduled Tribes. Sometimes it is more. It is because the reserved seats are available to Scheduled Caste and Scheduled Tribe students. But if any student comes on merit, he can get admitted in the schools, colleges and technical institutions on that basis. So, the percentage of benefit going to the Scheduled Castes and Scheduled Tribes, as far as education is concerned, is 100 per cent. But that is not the case with the services. At the top, in group ‘A’ and ‘B’ services, the percentage of reservation which is available to Scheduled Castes and Scheduled Tribes is not really filled. Shri Ramdas Athawale did make, a reference to that. In groups ‘B’ and ‘C’ the position is different.
At the lower levels, all the vacancies which are reserved for the Scheduled Castes and Scheduled Tribes are filled, but at the middle level, there is a scope for improvement. At the higher level, the reservation is very poor. When this issue was taken up, it was said that there are not enough persons who are qualified to occupy these positions. I think in the period of fifty years, it should be possible for us to find out whether this statement made by some of us is correct or not. It is exactly here that something has to be done. It is exactly here that the Government has to be very particular. When Shri Rajiv Gandhi was the Prime Minister, he said that he would like to see that these vacancies are filled properly. Then, there was an effort made at that time and many vacancies were filled. But it is exactly here that something has to be done.
This kind of reservation is available only in Government services and public sector undertakings. Unfortunately, the policy of the present Government and other Governments in the States also, is to privatise the public sector units. When the public sector units are privatised, the law of reservation is not applicable to them. So, the vacancies which are reserved for them may not be filled. I had an occasion to examine as to what is happening in this matter sitting in one of the Standing Committees. I was told that when the public sector units are privatised an agreement is made with those who are taking over the public sector units, under which, they say that protection can be given to the people of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes.
I had the occasion to examine those agreements. What do the agreements say? They say that the Scheduled Castes and Scheduled Tribes should be given the same benefit. If the same benefit is not given, what is the remedy available to the Scheduled Caste or Scheduled Tribe ? The remedy available to him is to go to the court of law. When he goes to a court of law, he has to fight his case in the court of law not for one year but for ten or fifteen years. So, this kind of provision in the agreement, which is entered into between the Government and the person taking over the public sector undertaking does not really give any benefit to the people who come from the Scheduled Castes and Scheduled Tribes. What has to be done in this respect? This is the most important thing. This has been highlighted. Some time back this matter was discussed. Some ten or fifteen years back this matter was discussed. Those who are sitting on the ruling benches today were speaking from this side.
For hours together, they were saying that that was the difficulty, that was the lacuna and that lacuna and difficulty had to be overcome. Now, they are sitting there. They are taking pride in saying that they are privatising the public sector units and disinvesting the public sector shares. For disinvestment and privatisation, no intelligence is required. No efforts are required. What is required is just signing on a piece of paper. If you have to establish any public sector unit or any industry for that matter or any enterprise for that matter, you shall have to put in a lot of efforts. You shall have to see it for years together. You shall have to sweat it out. You will be putting in all your efforts to build that institution. Those institutions have been built and they have gone. But that is not the issue today before us. The issue today before us is that the small facility which has been made available to the Scheduled Caste and the Scheduled Tribe people is getting lost because of this policy of the Government. Let the hon. Minister, on behalf of the Government, explain as to how they are going to overcome this difficulty.
Reservation is available in Government service. Reservation is available in public sector units. The services which are available in the Government sector and the public sector are nothing compared to the private sector. The private sector is very much bigger. It is only 2.5 per cent of the services which would be available in Government sector and the public sector. Nearly 95 per cent of the activities are in private sector. In that private sector, the question of reservation does not arise at all. You do not have any reservation in private sector. If we really want to do some social justice, if we want to do economic justice, we must do something. Unfortunately, these days sometimes we are talking about social justice but we are not talking about economic justice. We have forgotten the words "economic justice." We are emphasising on social justice. Economic justice is forgotten. If we really want to do some economic justice, then, should we not think of some device and method, some instrument of helping the Scheduled Caste and the Scheduled Tribe people to be employed in the private sector also? I say this because the services available in the private sector are numerous whereas the services available in Government sector are very much limited. So, something has to be done by the Government in this respect.
The third most important point which was made by Shri Ramdas Athawale was relating to agricultural land. Fortunately, for us, we have the Tenancy Laws and the Land Ceiling Law. It is a different issue that the Tenancy Laws are not properly implemented in some case in some States. The Land Ceiling Law is also not properly implemented in some other States. But the law is there. The Land Ceiling Law is also there. Earlier, the Government had taken the land which was available with the land-lords and the big land-owning sections of the society. That land has to be distributed between those who are landless and those who are working on the fields. Many of the laws provide that the first preference should be given to the Scheduled Caste and the Scheduled Tribe people. At least, the law which is available in Andhra Pradesh and the law which is available in Maharashtra – I have seen them myself – provide that the land would be distributed to the Scheduled Caste and the Scheduled Tribe people. It has to be like that only. Only then real social justice can be done. But there is a limitation. You cannot stretch the land. The land is going to be limited and the population is increasing. The land is also getting divided. The maximum land which can be had by a family is approximately 50 acres. If one family has got 50 acres, what happens is that in two generations that family divides the land between the children in the family and each person in the family gets about 5 or 6 acres of land. So, the land cannot be stretched. Therefore, there is a limitation on distributing the land.
I would like to submit that in the ceiling law the first preference should be given to the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes. The tenancy law should also give preference to them. But there is a limitation in distributing the land. This has to be understood. In these circumstances, what can be done? We can provide reservation to the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes in private enterprises. But this is also going to be very difficult and people are going to object to it. They are going to object to it tooth and nail. So, this is also going to be very difficult. Then, what else can be done?
The people who are sitting in the apex body here, in Parliament, have to think about it. In my opinion, there are two solutions available to us. First of all, it is not sufficient for the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes to educate themselves. The second step that they shall have to take is to see that they get economic strength also and the economic strength can come from the services and the land. But there is limitation on services and land also. There is unlimited scope for them in trading activities and industrial activities. The industry is expanding, but trade has not become very strong and there is a scope for the educated people among the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes to enter this field. But they do not have funds. They do not have experience also and it is in this area that they should be helped. There should be laws made by this Parliament and by other Legislatures also that if the people belonging to the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes want to stand on their own legs, they should be provided with credit facilities from the banks and the financial institutions. If good credit facilities are provided to them to start trading activities in the country, this problem can be solved to a great extent.
The third and the most important thing is that they should be given funds to start industries. Some people say that if funds are given, they may not be returned and the industries may not function. We know what is happening to other industries. We know that the non-performing assets of this country, I am told by the exports in the field, is to the tune of two lakh crores of rupees. Many people have taken funds from the financial institutions and the banks and they have not returned these funds as they should have.
Now, supposing, we, the Government and the society take the risk of giving credit facilities and finances to the economically weaker sections of the society there is nothing wrong in it. There may be some risk involved in it. I do understand that there would be some risk involved in it and yet we have to take this kind of risk. When war takes place, there is a risk and when we give money to others there is a risk involved. If we give money to the weaker sections of the society, we would be doing some economic justice to them.
In my opinion, some thinking is necessary on this point and some decision has to be taken by the Government of India, the State Governments and the financial institutions to give money to them. Unfortunately, the situation which prevails in the country today is this. If a person belonging to the weaker section of the society is asking for a small amount of money, that is not easily available to him, but if a person is asking for a huge amount of money, Rs. 5,000 crore or Rs. 1,000 crore, that is easily given by the financial institutions and the banks. But if a person is asking for Rs. Five lakh or so, it is very difficult for him to get that money. So, if persons belonging to the weaker sections of the society intend to start some trading activity or industrial activity, we shall have to see that they are provided with funds by the banks and the financial institutions. In my opinion, this is the only solution which really gives them the financial sinews, financial muscles and the financial strength. We have tried all other things and they have given some help to them, but they are not sufficient.

16.00 hrs. Something more has to be done. Some new area has to be discovered. We have to identify those new areas and we have to take some new steps. The only area, which is remaining untouched and which is not yet used is the trading activity and the industrial activity. We shall have to create the saga also of the people coming from the Scheduled Castes and Scheduled Tribes. They are very brave people. They are very intelligent people. If you ask them to take the guns, go and fight in the war, they will easily do it. But if you ask them to take financial risk, they say no. As far as the financial risk is concerned, they say no. This kind of psychology, financial adventures, financial enterprising capacity should be developed for them and some steps have to be taken.

If the Government and other Governments will take the steps to give them the money, Shri Ramdas Athawale’s responsibility is to go and tell them that they should be adventurous, they should be bold enough in taking up these kinds of jobs and helping themselves and helping others also. They should be told that instead of asking for a job, instead of trying to be a servant in some service, where he will not be the man at the top, where he will not be in a position to give jobs to others.

He himself can be the owner of an enterprise, a shop or a trading organisation or an industrial organisation. He can give the jobs to others. If this is done, I think, the problem can be solved.

If a law has to be made for this, let there be a law made for this purpose. If the Executive decisions have to be taken in the Cabinet, let the Executive decisions be taken. If some resolution has to be passed for this purpose, let that resolution be made. Only then, we would have done real justice, social justice, economic justice and political justice to our brothers and sisters who have suffered for thousands of years in this country.

           

प्रो. रासा सिंह रावत (अजमेर): उपाध्यक्ष महोदय, मैं रामदास आठवले जी द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव का समर्थन करता हूं। उन्होंने सदन का ध्यान समाज के दुर्बल, पीड़ित, उपेक्षित, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के जो लोग हैं, उनके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उत्थान के लिए सरकार द्वारा जो नीतियां, कार्यक्रम बनाये जाते हैं, उनके क्रियान्वयन के लिए सकारात्मक और ठोस कदम उठाये जाएं, इस प्रकार की बात इन्होंने अपने प्रस्ताव में कही है।

मैं समझता हूं कि जहां तक उनके प्रस्ताव का प्रश्न है, इसमें आवश्यकता इस बात की है कि एक बार और हमें विचार करना चाहिए कि भारत का संविधान बना, उसमें बाबा सा. अम्बेडकर और अनेक लोगों के योगदान के आधार पर समाज के जो वंचित वर्ग थे या सैकड़ों वर्षों से जो वर्ग उपेक्षा की द्ृष्टि से देखे गये या जिनको एक प्रकार से शोषित औऱ पीड़ित वर्ग कहा जाता है, उसे समरसता की स्थिति में लाने के लिए, समाज के लोगों में ऐसे वर्ग के प्रति ममत्व की भावना लाने के लिए जो-जो संविधान में प्रावधान किये गये, उन सारे प्रावधानों के बावजूद भी आज ५३ वर्षों के बाद कितना परिवर्तन उनके जीवन में आया है, यह समीक्षा किये जाने की आवश्यकता है। इतना खर्च होने के बाद, चाहे शिक्षा, प्रशिक्षण या आवास के रूप में जो अन्य सुविधाएं देकर उन्हें ऊंचा बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं, इसके बावजूद यह देखने में आया है कि उनमें से कुछ लोग ही इन सुविधाओं का फायदा लेते हैं। फायदा उठाने के बाद उस वर्ग में भी ऐसे लोग अलग हो जाते हैं और एक अलग प्रकार की श्रेणी बन जाती है। जिस समाज में वे पैदा हुए, पाले-पोसे गये, ऐसे लोग पढ़-लिखकर योग्य बन गये लेकिन वे ये भूल जाते हैं कि जिस समाज से वे संबंध रखते हैं, उस समाज में जहां एससी, एसटी में वे पैदा हुए हैं, उन लोगों के प्रति भी हमारा कुछ कर्तव्य है, यह बात वे भूल जाते हैं और परिणामस्वरूप एक नयी क्लास पैदा हो जाती है। आखिर यह स्थिति पैदा क्यों हो रही है ? मुझे कल ही समाचार-पत्रों में पढ़ने को मिला कि अनुसूचित जाति और अनूसूचित जनजाति के अंदर क्रीमी लेयर जो कही जाती है, वह एससीएसटी के अंदर भी लागू होनी चाहिए।

राजस्थान के अंदर अनुसूचित जनजातियों के अंदर कई जातियों के नाम दिए गए हैं। इनमें दो जातियों की तरफ मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। एक तो भील जाति है। इस जाति का इतिहास बड़ा ही गौरवपूर्ण रहा है। मेवाड़ के अंदर यह आदिवासी कहलाते थे। महाराणा प्रताप की सेनाओं के साथ शौर्य और साहस का परिचय इस जाति ने दिया था। ये लोग जंगलों में जीवन व्यतीत करते हैं। वे अनुसूचित जनजाति में हैं, लेकिन उनके अंदर बहुत कम लोग पढ़े-लिखे हैं और उच्च पदों पर पहुंचे हैं। उनके उत्थान और विकास के लिए, उनकी बस्तियों के विकास के लिए जितना प्रयास होना चाहिए, उतना नहीं हो पाया है। इसी तरह राजस्थान में दूसरी जाति मीणा है। आज राजस्थान में ही नहीं, गुजरात में भी इस जाति के लोग हैं और कई राज्यों में भी हैं। देश का हर तीसरा आई.ए.एस. और आई.पी.एस. मीणा जाति से सम्बन्धित है। इसी प्रकार से जो अनुसूचित जाति के अंदर देखा जाता है, मैं यहां नाम नहीं लेना चाहूंगा, एक वर्ग विशेष अनुसूचित जाति में होकर उच्च पदों पर पहुंच गया, लेकिन उन्हीं की जाति के अंदर जो वास्तव में सबसे अधिक दलित है, डाउनट्राडन है, जिनको गांधी जी हरिजन कहकर पुकारा करते थे, जो सफाई कर्मी थे, उनका जितना उत्थान या विकास होना चाहिए, वह नहीं हो पाया। हम उनके आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक विकास की बात करते हैं, उसके लिए सरकारी नीतियां बनाने और कार्यान्वयन करने की बात करते हैं, वहां हमें इस बात का भी आत्मालोचन या समीक्षा करनी चाहिए कि जिन समाजों के लिए इतना प्रयास किया जा रहा है, उन समाजों में कुछ वर्ग बहुत आगे बढ़ गए और कुछ बहुत पीछे रह गए। आखिर यह भेदभाव क्यों, क्या हम फिर उनमें ऊंच-नीच की भावना पैदा करने की बात तो नहीं कर रहे हैं। छुआछूत एक सामाजिक कलंक है। उसका उच्छेदन, मूलोच्छेदन होना चाहिए।

आज सुबह शून्य काल में आठवले जी ने सवाल यहां उठाया था कि महाराष्ट्र के अंदर एक दलित की हत्या की गई। दो-तीन दिन पहले उत्तर प्रदेश के बारे में आया था कि जिस प्रदेश की मुख्य मंत्री दलित की बेटी है, वहीं दलितों के साथ दुव्र्यवहार और उनकी हत्या हो रही है। बिहार के बारे में हमें समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलता है कि किस प्रकार से सम्पन्न लोग इन अनुसूचित जातियों के लोगों की, दलित वर्ग के लोगों की बस्तियों में जाकर संहार करते हैं और उनके घरों को आग लगा देते हैं। वहां जिन लोगों का शासन है, वे इस बात के लिए प्रयत्नशील है, प्रतिबद्ध हैं कि दलितों का उत्थान और उद्धार हो। लेकिन फिर क्यों ऐसी परिस्थितियां निर्मित होती हैं कि उनके साथ अत्याचार होता है।

राजस्थान के अंदर भी कई घटनाएं ऐसी हुई हैं। जैसे वहां दलित वर्ग का दूल्हा अगर घोड़ी पर चढ़ कर बारात लेकर, बैंड बजाता हुआ गांव से जाता है तो तथाकथित ऊंचे वर्ग के लोग कहते हैं कि यह नहीं हो सकता और गांव की चौपाल के पास ही उसे घोड़ी से उतार दिया जाता है। यहां तक कि वहां पीने के पानी के लिए भी भेदभाव किया जाता है। इतने वर्षों के बाद भी, इतनी शिक्षा और साक्षरता बढ़ जाने के बाद भी तथा बड़े-बड़े नेताओं के प्रयास करने के बाद भी यह हालत है। महर्षि दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, महात्मा गांधी और स्वामी श्रद्धानंद जी के द्वारा जो छुआछूत मिटाने के प्रयास किए गए थे, उसके बावजूद भी ऐसी घटनाएं देश में घटित होती रहती हैं। कई जगह क्षेत्रीय दलों द्वारा भी ऐसा हुआ, जिन्होंने सुधारवादी आंदोलन चलाकर छुआछूत को मिटाने का प्रयास किया, उसके बावजूद भी समाज के अंदर कहीं न कहीं यह भावना व्याप्त है। कबीर जी ने भी इसी भावना के तहत कहा था कि -- को, बामन को शूद्रा। न कोई ब्राहमण है और न कोई शूद्र है। कबीर ने इस जात-पांत की व्यवस्था को फटकार लगाते हुए समाज की एकता के लिए कहा था :

एक ईश्वर के पुत्र हैं, जात-पात पूछे न कोई, जो हरि को भजे, सो हरि का होए।
यह बात वेदों के अंदर भी आई, उसमें भी कहा गया कि मानव मानव समान है और वेदों का ज्ञान मानव मात्र के लिए है। मध्य कालीन के लोगों ने अपने स्वार्थों की खातिर कहा था -- स्त्री शूद्रो नाडधीयनाम््॥ यह वास्तव में हमारी संकीर्णता का परिचायक था, लेकिन वेदों में कहीं इस बात को नहीं कहा गया था।
इसलिए मान्यवर, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि इन सारी बातों के बारे में हम विचार करें और यह भी विचार करें कि इतने प्रयास करने के बाद भी समाज में जो उत्थान इन दलित, कमजोर और पिछड़े वर्गों का होना चाहिए था, जो स्वाभिमान की भावना इनके अंदर आनी चाहिए थी और राष्ट्र की मुख्य धारा के अंदर लाकर, इनमें एक-रसता की भावना आनी चाहिए थी, वह क्यों नहीं आ रही है।
देश में चाहे किसी भी दल की सरकार रही हो, इनके उत्थान के लिए नीतियां और कानून तो अच्छे बने हैं लेकिन जैसी उन कानूनों और नीतियों की क्रियान्वयन होना चाहिए था वह नहीं हो रहा है। यह कौन सी मानसिकता का परिचायक है। क्या बड़े अधिकारियों के मन में उन वंचित लोगों के प्रति कोई भावना नहीं है। एट्रोसिटीज दूर करने के नाम पर गांवों में लड़ाई-झगड़े पैदा होने की स्थिति आ रही है। अनुसूचित जाति के हमारे बंधू, छोटी-छोटी बातों के ऊपर जाकर शिकायत कर देते हैं कि फलांने ठाकुर साहब ने, फलाने सेठ ने या फलांने आदमी ने हमें यह कह दिया। बैंकों के अंदर अधिकारी लोग काम के लिए कहते हुए डरते हैं। अगर वह किसी को काम के लिए कह देते हैं तो वह एट्रोसिटीज का आरोप लगा देते हैं। क्रिय और प्रतक्रिया दोनों ही गलत हैं। दोनों एक समान हैं और एक ईश्वर के पुत्र हैं। संविधान में सबको समानता का अधिकार दिया है।
16.12 hrs. (Shri Devendra PrasadYadav in the Chair) दोनों एक समान हैं, न कोई छोटा है न कोई बड़ा है। लेकिन तथाकथित उच्च-वर्ग के लोगों की मानसिकता में परिवर्तन लाना होगा और साथ में हर बात को लेकर जो प्रतक्रिया अनुसूचित जाति के लोगों की तरफ से होती है, समाज के प्रति विद्रोह की भावना जो उनमें आती है, उसमें भी परिवर्तन लाना पड़ेगा। सारे समाज में एक-रसता की स्थिति पैदा करनी होगी। दोनों को एक-दूसरे में दूध और पानी की तरह घुलमिल जाना है। जैसे पानी को जब दूध में मिलाया जाता है तो दूध पानी को अपने समान बना लेता है लेकिन जब उसे आग पर चढ़ाया जाता है तो पानी दूध को जलने नहीं देता है। हमारे समाज की स्थिति ऐसी होनी चाहिए जिसमें समता हो, ममता हो और एकत्व की स्थिति और भावना समाज में आये, जिससे हमारे समाज का विकास हो, उन्नति हो।

भगवान बुद्ध, भगवान महावीर वह अन्य महापुरुष हजारों सालों से छुआछूत और जाति-प्रथा की बुराई को दूर करने का प्रयास करते आ रहे हैं लेकिन समाज से यह बुराई मिटी नहीं है। अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों का बैकलॉग नौकरियों में बढ़ता ही चला जाता है, अनुसूचित जाति को लोगों का प्रमोशन नहीं हो रहा है। मैंने दस चटि्ठयां कार्मिक विभाग को लिखी, उन्होंने आगे भेजी और फिर कहा कि संसद में अमेंडमेंट आना चाहिए। संसद में अमेंडमेंट भी हो गया, लेकिन फिर भी कहते हैं कि इसमें यह कमी रह गयी है, वह कमी रह गयी है। इतने रिलैक्सेशन और योग्यता में रिलैक्सेशन करने के बाद भी बैकलॉग भरा नहीं जा रहा है और हमारे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के भाइयों को कठिनाइयों का समाना करना पड़ रहे है। हम उन पर कोई अहसान नहीं कर रहे हैं। हजारों सालों से उनको उनके हक से वंचित रखा गया है। इसलिए हम सभी का कर्तव्य है कि हम उन लोगों को समाज के अंदर सम-स्थिति में लाने का प्रयास करें और सरकारी नौकरियों और अन्य सेवाओं में उनके प्रति किसी प्रकार का भेदभाव न करें। उनके लिए जो पन्द्रह प्रतिशत और साढ़े सात प्रतिशत आरक्षित स्थान हैं उनकी पूर्ति की जानी चाहिए।

स्कॉलरशिप के लिए एनडीए की सरकार ने संशोधन तो किया है लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए जो स्कॉलरशिप इन वर्गों के विद्यार्थियों को दी जाती है चाहे वह माध्यमिक स्तर पर हो, उच्च-माध्यमिक स्तर पर हो, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय स्तर पर हो, उस पर पुन: विचार करने की आवश्यकता है।

समाज कल्याण मंत्रालय के जो छात्रावास चलते हैं उनमें खुराक के लिए जो प्रावधान किये गये हैं वहां तो सारी सुविधाएं हैं।

डैस्टीचूड्स चिल्ड्रन स्कीम के अन्तर्गत जो आनुदानिक सहायता दी जा रही है, आवास के लिए, भोजन के लिए, शिक्षा के लिए या प्रशिक्षण के लिए, वह अनुदान दिया जाना चाहिए, ताकि वे स्वावलम्बी हो सकें। मैं समझता हूं कि दिए जाने वाले अनुदान की मात्रा के बारे में पुन: विचार करने की आवश्यकता है। इसी प्रकार एससी और एसटी लोगों के लिए आदिवासी क्षेत्रों में आश्रम स्कूल खोले गए हैं। उन के आवासों की छतें टपकती हैं। उन भवनों के पुनरुद्धार के लिए, भवनों के मेंटेनेंनस के लिए, उनकी उचित देख-रेख करने के लिए ग्रान्ट दिए जाने की आवश्यकता है। सुविधा न होने की वजह से उनकी स्थिति बहुत दयनीय है। इसलिए आश्रम विद्यालयों की ओर भी पुन: ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। कोचिंग के लिए जो व्यवस्था है, उसमें भी भ्रष्टाचार देखने को मिलता है। यह बहुत अच्छी बात है, वभिन्न परीक्षाओं के लिए कम्पीटीशन के लिए तैयार किया जाए। देखने में यह आ रहा है कि नियमित रूप से वे कक्षायें नहीं चल रही हैं। उन पर जितना खर्च किया जा रहा है, उसको भी देखनी आवश्यकता है। नीतियां और कार्यक्रम तो सरकार द्वारा अनेक बना दिए गए हैं, लेकिन जब कार्यान्वयन का प्रश्न आता है, तो मुझे कबीर की युक्ति याद आती है - "कथनी थोथी जगत में, करनी उत्तम सार। कह कबीर - करनी सबल, उतरे भवजल पार।" Saying and doing are different things.इसलिए मैं आपके माध्यम से सरकार से कहना चाहता हूं कि कार्यक्रम और नीतियां तो बहुत बन चुकी हैं और सिद्धान्तों के बारे में बहुत बातें कर ली है, लेकिन व्यावहारिक जगत के अन्दर उन नीतियों और कार्यक्रमों को यथार्थ रूप में कार्यान्वित करने की आवश्यकता है। इसी प्रकार स्पेशल कम्पोनेंट प्लान आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए सहयता प्रदान की जाती है अथवा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तथा गरीब तबके लिए इंदिरा आवास योजना में जो अनुदान दिया जाता है, उस अनुदान के अनुपात में मकान बनाने का सामान कितना मंहगा हो गया है, जितना पैसा सैक्शन है, वह उन पैसों में मकान तैयार कर सकता है या बैंक व लोन देने वाली संस्थाओं के पास उनको कितने चक्कर लगाने पड़ते हैं, इन सारी व्यवस्थाओं पर पुन: विचार किए जाने की आवश्यकता है।

अंत में, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि आठवले जी का प्रस्ताव बहुत सामयिक है, अनुकूल है और जैसा मैंने प्रारम्भ में कहा कि सम्पूर्ण स्थिति पर समग्र रूप से विचार किए जाने की आवश्यकता है, जिससे समाज में व्यापत ऊंच-नीच की दीवार टूट जाए। इंसान इंसान से प्यार करने लगे। इंसान इंसान के दुख में भागीदार बनें, जैसे व्यवहार में भाई भाई के लिए काम आता है, लेकिन फिर भी अमानवीय व्यवहार देखने को मिलता है। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि नौकरियों के अन्दर जो बैकलोग बढ़ रहा है, उस स्थिति के बारे में समीक्षा करने की आवश्यकता है। जैसा मैंने कहा, उन तबकों में भी क्रिमीलेयर पैदा हो गए हैं कि मैजिस्ट्रेट का लड़का मैजिस्ट्रेट बनता है, क्लैक्टर का लड़का क्लैक्टर बनता है, लेकिन दूसरी तरफ मोची का जो काम कर रहा है या जो गांव में झाड़ू लगाने का काम कर रहा है, वह अपने बच्चे के लिए सपने देखता रहता है कि उसका लड़का कब शिक्षा प्राप्त करके ऊंचा बनेगा। उन लोगों को भी अधिकार मिले, यह प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। मैं समझता हूं कि सरकार इन चीजों पर ध्यान देने के लिए एक आयोग बना सकती है जो विशेष रूप से इन परिस्थितियों पर विचार करे।

इन शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं और आपके प्रति आभार व्यक्त करता हूं कि आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया।

श्री रामजीलाल सुमन (फिरोजाबाद): सभापति महोदय, मैं रामदास आठवले के प्रस्ताव "प्रशासन को सुद्ृढ़ बना कर और उपयुक्त विधान लाकर अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और समाज के अन्य कमजोर वर्गों के सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक उत्थान के लिए नीतियों और कार्यक्रमों में कार्यान्वयन के लिए सक्रिय कदम उठाए" का समर्थन करता हूं। अभी इस चर्चा में श्री शिवराज पाटील जी ने बहुत अच्छा भाषण दिया। इस बहस का मतलब यही है कि सम्मानित सदस्यों की बातों को गम्भीरता के साथ सुना जाए और सुनने के बाद सरकार सकारात्मक और कारगर कदम उठाए। सदन में जब कभी व्यवधान होता है तो उसका मूल कारण यह होता है कि गुण-दोष और तथ्यों के आधार पर सरकार को जो प्रभावी कार्रवाई करनी चाहिए, उनमें जब वह ढिलाई बरतती है तो संसद में तनाव पैदा होता है।

श्री जटिया इस विभाग के मंत्री हैं लेकिन वह चले गए। डा. संजय पासवान जो इस विभाग के राज्य मंत्री है, वह यहां बैठे हैं। मैं चाहूंगा कि आज की चर्चा मात्र औपचारिकता मात्र बन कर न रह जाए। सरकार कोई ठोस कदम उठाएगी तभी इस चर्चा की सार्थकता होगी।

सभापति महोदय, भारत एक कल्याणकारी राज्य है और समाज के कमजोर वर्गों के कल्याण के लिए वचनबद्ध है। ऐसा हमने संविधान में भी स्वीकार किया। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में वर्णित नीति निर्देशक सिंद्धात हैं। संविधान के अनुच्छेद ३८, ३९ और ४६ विशेष अनुच्छेद हैं और वे कमजोर वर्गों के लिए सरकार की वचनबद्धता के प्रमाण हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों का काम ठीक ढंग से हो और आरक्षण ठीक ढंग से लागू हो, उनके लिए बनायी गई योजनाओं का कार्यान्वयन ठीक ढंग से हो, इसके लिए २५ सितम्बर १९८५ को कल्याण मंत्रालय बना दिया गया और बाद में उसमें एक नया नाम सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय जोड़ दिया। १३ अक्तूबर १९९९ से इसमें जनजातीय मंत्रालय को अलग कर दिया गया और एक अलग विभाग बना दिया। वर्ष १९९१ की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जातियों की संख्या का प्रतिशत १३.८२ था लेकिन उस समय देश की आबादी का जो आकलन किया गया उसके अनुसार वह ८४.६३ करोड़ थी। कुल मिला कर १९९१ की जनगणना को आधार मान लें तो उसमें अनुसूचित जाति का प्रतिशत १६.८ है। हर पंचवर्षीय योजना में इन वर्गों के कल्याण के लिए प्राथमिकता के आधार पर योजनाएं बनायी जाती हैं लेकिन इनका कितना लाभ कमजोर वर्ग के लोगों को होता है यह देखने की आवश्यकता है। ६५वें संविधान संशोधन अधनियम १९९० के अन्तर्गत, अनुच्छेद ३८८ के तहत हमने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग भी बना दिया। इस आयोग को काम सुपुर्द किया - अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की सुरक्षा संबंधी मामलों की जांच, निगरानी आर्थिक विकास में सहयोग, और परामर्श देना। इस प्रकार कुल मिलाकर, मैं कह सकता हूं कि आयोग को कोई संवैधानिक दायित्व नहीं दिया गया है, कोई कानूनी दायित्व नहीं दिया गया है। मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की रिपोर्ट राष्ट्रपति जी को प्रस्तुत की जाती है, सदन के पटल पर रख दी जाती है लेकिन उस पर बहस नहीं की जाती है। अगर ईमानदारी से सरकार सदन में उस आयोग की रिपोर्ट पर विचार करे, सांसदों के पक्ष को सुने और जो निष्कर्ष निकले, उस दिशा में कुछ पहल करने की कोशिश करे तो अच्छा परिणाम निकल सकता है। सभापति महोदय, मुझे बेहद ही तकलीफ के साथ कहना पड़ता है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की रिपोर्ट पर इस सदन में चर्चा नहीं की जाती है। मेरा अनुरोध है कि उस रिपोर्ट पर बहस कराये जाने की आवश्यकता है।

सभापति महोदय, कानून के अनुसार हमारे देश में अस्पृशयता का निवारण हो गया है लेकिन आये दिन अखबारों में ऐसी घटनायें पढ़ने को मिलती हैं। मैं किसी दल की बात नहीं करना चाहता। यह मामला मनोवृत्ति से जुड़ा हुआ है। हमारी मानसिकता से जुड़ा हुआ है। समाज में कुछ लोग अपनी मनोवृत्ति से समझौता करने के लिये तैयार नहीं है। आज हिन्दुस्तान के कमजोर वर्ग के लोग रूस और फ्रांस में हुई क्रान्ति के बारे में पढ़ते हैं। जिस वातावरण में हमारे पुरखे आज से १००-१५० साल पहले रहते थे, उस वातावरण में नई पीढ़ी रहने के लिये तैयार नहीं है। वह सामाजिक विद्रोह पर उतारू है। आज जितने मामले प्रकाश में आते हैं, हमें यह सोचना होगा कि उन पर अंकुश कैसे लगे। हमें इस बात पर विचार करना चाहिये। मैं भी श्री संजय पासवान जी की सामाजिक आधिकारिता संबंधी समति का सदस्य हूं।

सभापति जी, भारत सरकार राज्य सरकारों को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियो के कल्याण के लिये विशेष आर्थिक सहयोग देती है। मैंने एक बार नहीं अनेक बार इस बात का जिक्र किया है कि राज्य सरकारों को जो धनराशि दी जाती है, उसका सदुपयोग भी होता है या नहीं, यह देखा जाये। राज्य सरकार को पैसा तो यहां से चला जाता है लेकिन उसका इस्तेमाल करने के मामले में उसका उपयोगिता प्रमाण-पत्र नहीं आता कि जो पैसा केन्द्र से गया है, उसका सही इस्तेमाल हुआ है या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं वह पैसा किसी और मद में खर्च कर दिया जाता है। इस मामले की निगरानी करने की आवश्यकता है। केन्द्र सरकार द्वारा राज्य सरकार को भेजे गये पैसे को खर्च करने के जो आंकड़े उपलब्ध होते हैं, वे संतोषजनक नहीं होते। इसलिये मैंने बार-बार कहा कि इसका निगरानी तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है। जब आपने अगला पैसा भेज दिया, आपका काम शुरु हो गया, इसके लिये तंत्र विकसित करना चाहिये जो यह सुनिश्चित करे कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिये जो पैसा भेजा गया, उसका सही इस्तेमाल हुआ या नहीं? जब तक सरकार इस ओर नहीं देखेगी, तब तक जन-कल्याण के नाम पर पैसे का सदुपयोग नहीं होगा।

मैं एक निवेदन यह भी करना चाहता हूं कि समाज में एक कौकस बन गया है। समाज के जिस पात्र व्यक्ति को सहायता मिलनी चाहिये, वह उससे वंचित रह जाता है लेकिन जो तिकड़मबाज और चतुर व्यक्ति होता है, वह जानता है कि सरकार से पैसा कैसे लेना है। इसलिये वही एक विशेष वर्ग इस सरकारी पैसे का इस्तेमाल करता है। फलत:पात्र व्यक्ति उस पैसे से वंचित रह जाता है। इसे देखने की आवश्यकता है।

सभापति महोदय, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों को मैटि्रक से पूर्व और मैटि्रक के बाद छात्रवृत्ति दी जाती है। उसका कोई ज्यादा अर्थ नही है आज शिक्षा का व्यवसायीकरण हो गया है। सरकार की तरफ से जो शिक्षा दी जाती है, आज उसमें आकर्षण नहीं रहा। निजी शिक्षण संस्थान आकर्षण का केन्द्र बन गये हैं। उसकी तुलना में या स्पर्द्धा में सरकारी शिक्षा कहीं टिकती नहीं है।

गैर सरकारी शिक्षा लेना अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के काबू के बाहर की बात है। आज ऐसा नहीं है कि अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों में प्रतिभा नहीं है। उनके मां-बाप चाहते हैं कि हमारा बच्चा पढ़े, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण वे अपने बच्चों को उच्च शिक्षा नहीं दे पाते। मैं सभी वर्गों की बात कर रहा हूं। आज स्थिति यह है कि १२वीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते ८७ प्रतिशत बच्चे घर बैठ जाते हैं। उसका कारण यह नहीं है कि उनके मां-बाप बच्चों को पढ़ाना नहीं चाहते, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण वे अपने बच्चों को उच्च शिक्षा नहीं दिला पाते। आप जो यहां सहायता राशि देते हैं, आज के समय में उस सहायता राशि का कोई अर्थ नहीं है।

सभापति महोदय, आज हम आई.टी. की बात करते हैं। आज इंफोर्मेशन टैक्नोलोजी का जमाना है। आप मुझे माफ करें, इसका लाभ भी उन्हीं लोगों को मिलेगा, जो उच्च श्रेणी की शिक्षा तक जा सकेंगे। हर व्यक्ति को उसका लाभ नहीं मिल सकता। आज उसमें भी एक निश्चित वर्ग बन गया है, जिसे इसका लाभ मिलना है। अनुसूचित जाति और जनजाति के कमजोर बच्चों को उसका ज्यादा लाभ नहीं मिल सकता। इसलिए आज शिक्षा के नाम पर जो कुछ हो रहा है, शिक्षा का जिस तरह से व्यावसायीकरण हुआ है, उसके कारण गरीब आदमी, अनुसूचित जाति और जनजाति के व्यक्ति जिनकी माली हालत ठीक नहीं है, उसके लिए अपने बच्चों को तालीम देना उसके बस की बात नहीं है। आपके विभाग द्वारा कहा जाता है कि हमने इतने छात्रावास बनवा दिये, हम छात्रों को छात्रवृत्ति भी दे रहे हैं, लेकिन आपके विभाग द्वारा संचालित जो छात्रावास हैं, आप जरा उनकी दशा देख लीजिए और जो निजी संस्थान हैं, जहां अमीर लोगों के बच्चे पढ़ते हैं, उनके छात्रावासों की दशा देख लीजिए, उनमें जमीन-आसमान का अंतर है। इसलिए आज जो परिस्थिति है, उसके बदलने के लिए हमें सकारात्मक सोच की आवश्यकता है।

मैं एक निवेदन और करना चाहता हूं कि २४ मार्च, १९९२ को डा.बाबासाहेब अम्बेडकर फाउंडेशन बना। पंडित जवाहर लाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद, महात्मा गांधी और इस बार श्री जयप्रकाश नारायण और चौधरी चरण सिंह के जन्म शताब्दी समारोह मनाये जा रहे है। इन सब महापुरुषों के जन्म शताब्दी समारोह एक वर्ष में मने हैं। लेकिन डा. बाबासाहेब अम्बेडकर का जन्म शताब्दी समारोह तीन वर्षों तक मना है। यह मेरी खुशनसीबी है कि उस समय मैं इस विभाग का मंत्री था और जब डा. बाबासाहेब अम्बेडकर का जन्म शताब्दी समारोह मना उस समय वभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, आरक्षण, आर्थिक सवाल और जमीन के बंटवारे आदि पर छ: उप-समतियां बनाई गई थीं। उन छ: उप-समतियों की सिफारिशें आने के बाद सरकार ने वायदा किया था कि हम इनकी सिफारिशों को लागू करने का काम करेंगे, श्री रासा सिंह रावत जी, मैं आपको याद दिला दूं कि वाजपेयी जी ने भी कमिट किया था और कैबिनेट ने भी मंजूर किया था कि डा. बाबासाहेब अम्बेडकर जन्म शताब्दी समारोह की सिफारिशों को हम लागू करने का काम करेंगे, लेकिन उन पर आज तक अमल नहीं हुआ है। उसमें यह भी कहा गया था कि डा. बाबासाहेब अम्बेडकर का जो साहित्य है, उस साहित्य को वभिन्न भाषाओं में छपवाने का काम भी करेंगे। आपका जो कार्यालय है, मेहरबानी करके जरा उसे देखिये, उसकी हालत ठीक नहीं है। जिस मंशा से आपने इस फाउंडेशन की स्थापना की थी, यह फाउंडेशन उन मंशाओं को पूरा नहीं कर रहा है। इसे देखने की आवश्यकता है। डा.बाबासाहेब अम्बेडकर का निवास स्थान अलीपुर रोड, दिल्ली में था। इसके स्मारक निर्माण की बात हुई थी, लेकिन मुझे जो सूचना है, उसके अनुसार उस स्मारक के निर्माण का काम भी पूरा नहीं हुआ है। इन सब चीजों पर भी विचार करने की आवश्यकता है।

मैं आपकी मार्फत यह भी कहना चाहता हूं कि आज जो वनिवेश और आर्थिक उदारीकरण है, इनके चलते सबसे अधिक नुकसान कमजोर वर्गों, दलितों, गरीबों और अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों को होगा। जब निजी क्षेत्रो में कोई सरकारी उपक्रम जायेगा तो वहां सेवा-शर्तें तय करने का काम भी निजी क्षेत्रों का होगा। इसका सीधा-सीधा मतलब होगा कि आरक्षण समाप्त हो जाए।

इसलिए मैं कहना चाहता हूँ कि उसके परिणाम क्या निकलेंगे, वह अलग बात है, लेकिन एक निवेदन है कि स्वरोज़गार वाला जो बजट है, उसको बढ़ाये जाने की आवश्यकता है। आदमी अपने पैरों पर खड़ा हो और जैसे शिवराज पाटिल जी ने कहा कि लोगों को दौलत मिलनी चाहिए कि वे अपने उद्योग चला सकें। इसके लिए स्वरोज़गार के लिए जो धन का आबंटन होता है, उसमें वृद्धि करने की आवश्यकता है। अभी रासा सिंह रावत जी ने ज़िक्र किया कि इंदिरा आवास योजना में २० हजार रुपये मिलते हैं और ईमानदारी से जो लाभ पाने वाला व्यक्ति है, उसके पास २० हज़ार रुपये कहां पहुंचते हैं? जब २० हज़ार रुपये देना शुरू किया था, तब से तुलनात्मक अध्ययन करें तो चीजों के दाम बहुत बढ़ गए हैं। आज के संदर्भ में इतनी राशि व्यावहारिक नहीं है। २० हज़ार रुपये में भी शर्तें होती हैं कि आपको इस तरह का मकान बनाना है। कौन सा मकान २० हज़ार रुपये में बन जाएगा? इसलिए गरीबों के लिए जो मकान बनाने के लिए पैसा भेजते हैं, उसको भी बढ़ाए जाने की आवश्यकता है।

सभापति जी, मैं एक निवेदन आपके मार्फत और करना चाहूँगा। अभी रासा सिंह जी कह रहे थे कि लोगों को स्वाभिमान के साथ ज़िन्दा रहना चाहिए। स्वाभिमान और कंगाली का आपस में कोई तालमेल नहीं है। स्वाभिमान का मतलब होता है कि आदमी अपने पैरों पर खड़ा हो। गरीब आदमी, जिसकी माली हालत ठीक नहीं है, उसमें वह भाव पैदा नहीं हो सकता। अगर लोगों की माली हालत ठीक करेंगे तो उनमें स्वाभिमान की भावना पैदा होगी। असल और बुनियादी सवाल यह है कि जब तक कमज़ोर वर्ग के लोगों को आत्मनिर्भर नहीं बनाएंगे, उनको अपने पैरों पर खड़ा नहीं करेंगे, उनके परंपरागत उद्योगों को संरक्षण नहीं देंगे, उनके लिए बाज़ार की व्यवस्था नहीं करेंगे, तब तक उनको लाभ मिलने वाला नहीं है। उदाहरण के तौर पर मैं कहना चाहता हूँ कि आगरा में एक कुटीर उद्योग है जूता उद्योग। एक घर-परिवार के पांच साल के बच्चे से लेकर ७० साल तक के बूढ़े लोग सब जूता बनाने के उस कुटीर उद्योग में लगे हैं। वह जूता बनाकर सिर पर डलिया रखकर जो उनकी मंडी होती है, वहां ले जाता है। उसको एक जोड़ी जूते पर २० रुपये मिलते हैं और बाज़ार में वह ३०० रुपये में बिकता है। फिर जिसका कोई संबंध जूता बनाने से नहीं है, वह उस जूते को एक अच्छे डिब्बे में बंद करके अपना ट्रेड मार्क लगाकर बाज़ार में ३००० रुपये में बेचता है। लाभ उसको हो रहा है जिसका जूता बनाने से कोई संबंध नहीं है। जिनका कुटीर उद्योग से संबंध है, अगर उनके लिए बाज़ार की व्यवस्था करें, उनके लिए सामान की व्यवस्था करें, उनके लिए ऋण की व्यवस्था करें तो लोग अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं। इसलिए सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि कमज़ोर वर्गों के हाथ में जहां कहीं भी जो परंपरागत उद्योग हैं, उन उद्योंगों को संरक्षण दिया जाए और उनको सशक्त बनाया जाए। इस दिशा में कोई पहल नहीं की गई है। रामदास जी ने ठीक कहा कि आरक्षण का जो सवाल है, उसमें लोग कोर्ट में चले जाते हैं, इसलिए इसको नौवीं अनुसूची में डालने की आवश्यकता है।

अंत में मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि असल सवाल भूमि सुधार का है। शिवराज पाटिल जी ने इसका ज़िक्र किया है। एक तो अभी भी कारण कुछ भी रहा हो, लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ। तिकड़मबाज़ी से तमाम लोगों ने ज़मीन को अपने कब्जे में कर रखा है, वह एक पक्ष है। इसके बाद जो देश में बंजर और बेकार भूमि पड़ी हुई है, अगर वह दलितों में बांट दी जाए और उसको कृषि योग्य बना दें तो मैं समझता हूँ कि काफी हद तक उन्हें सहारा मिल सकता है। यह काम भी हम लोग नहीं करना चाहते हैं। असल सवाल यह है कि अगर यह काम हम नहीं करेंगे तो उनमें आत्मविश्वास कैसे पैदा होगा। अंत में मुझे आपकी मार्फत निवेदन करना है, प्रार्थना करनी है कि आज जो स्थिति है, मैं समझता हूँ कि उस स्थिति को हमें बदलना होगा। दलितों पर होने वाले अत्याचारों की घटनाएं बढ़ रही हैं और अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग की जो रिपोर्ट है, उसके मुताबिक सबसे अधिक दलितों पर अत्याचार उत्तर प्रदेश में हो रहा है। मैं आपकी मार्फत निवेदन करना चाहूंगा कि झज्झर में जो घटना हुई दुलिना चौकी पर हरियाणा में और उसके बाद जो खबरें समाचार पत्रों में आईं दलितों की मौत के बाद, वह ठीक नहीं है। कहा गया कि जिन लोगों ने दुलिना चौकी से खींचकर पांच दलितों की हत्या की है, उनको हम सम्मानित करने का काम करेंगे।

महोदय, कानून दंड देता है। अगर उन्होंने कोई गलती की है, तो कानून उन्हें दंड देगा, लोग दंड देने वाले कौन होते हैं। यदि ऐसा होगा, तो राज्य क्यों बना है, राज्य का कंसैप्ट क्यों बना है, राज्य की अवधारणा क्यों बनी है। यह इसीलिए है कि कोई किसी की जान न ले, कोई किसी की सम्पत्ति न छीने ॥ दंड देने का काम राज्य का है। यदि लोग एक दूसरे को दंड देना शुरू कर देंगे, तो राज्य की अवधारणा समाप्त हो जाएगी और लोगों में राज्य के प्रति अविश्वास पैदा हो जाएगा, निराशा पैदा हो जाएगी। उसके बाद यह भी कहा गया कि जिन लोगों ने ५ दलितों की हत्या की उन लोगों का कोई गुनाह नहीं था, उन्होंने ठीक किया। इस प्रकार की मनोवृत्ति यदि देश में चलेगी, तो यह देश के लिए घातक होगी।

महोदय, हमारे पासवान जी, अभी धर्मान्तरण की बात कह रहे थे कि कुछ लोग प्रलोभनवश धर्मान्तरण करते हैं, ऐसा कहना ठीक नहीं है। आप इसे इस द्ृष्टि से भी देखिए कि उनके साथ समाज में भेदभाव होता है, इसलिए वे धर्मान्तरण करते हैं। मैंने इस बारे में जो अभी कहा है, उसके ऊपर ध्यान दें। धर्मान्तरण का एक कारण यह भी है। मैं कोई बड़ा शायर नहीं हूं, मैं एक शेर पढना चाहता हूं, किसी ने चार लाइनें लिखी हैं-

" रात का इन्तजार कौन करे, आजकल दिन में क्या नहीं होता, कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगी, यों ही कोई बेवफा नहीं होता। "
 

 महोदय, हमारे व्यवहार, आचरण, सोच, संस्कार, इन सब चीजों में परिवर्तन लाना होगा। इसके लिए ये सब जिम्मेदार हैं। बदलते संदर्भों में सामन्तवादी वृत्ति के जो लोग हैं, उन्हें अपने को बदलना होगा। अगर वे नहीं बदलेंगे, तो हालात बहुत खराब होंगे और गम्भीर परिस्थितियां उत्पन्न होंगी।

महोदय, अन्त में मैं आपकी मार्फत यही निवेदन करना चाहता हूं कि असली और बुनियादी सवाल, जो शिवराज जी पाटिल ने उठाया कि न सिर्फ सामाजिक न्याय हो बल्कि आर्थिक न्याय भी होना चाहिए। आज अगर हमारी जेब में ५०० रुपए हों, तो हमारे बात करने का तौर-तरीका कुछ और होगा, अगर हमारी जेब में ५००० रुपए हों, तो हमारा मिजाज़ बदल जाएगा। आज अगर सही मायने में दलितों को अपने बराबर लाना है, तो उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने की आवश्यकता है। उनकी माली हालत ऊपर उठाने की आवश्यकता है। परम्परागत उद्योगों को चलाने की आवश्यकता है। स्वरोजगार को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है और मैं समझता हूं कि श्री रामदास आठवले जी के प्रस्ताव से यदि चार कदम आगे जाकर, हम इसे सार्थक बना सकें, तो दलितों के लिए इससे अच्छा कोई और काम नहीं होगा।

               

DR. V. SAROJA (RASIPURAM): Hon. Chairman, Sir, thank you very much for giving me this opportunity to place my views on record on the Resolution brought forth by Shri Ramdas Athawale. The Resolution urges upon the Government to take vigorous steps for implementation of policies and programmes for socio-economic and political upliftment of Scheduled Castes, Scheduled Tribes and other weaker sections of the society by strengthening the administration and by bringing forward suitable legislation.

The Resolution itself defines its purpose. It has emphasised the role of the Government machinery. We, the policy makers, have to realise our duties and responsibilities for the upliftment of these weaker sections. Fifty-five years after Independence, it is unfortunate that we still have to discuss this. As Shri Ramji Lal Suman has rightly pointed out, we will have to make concrete policies in this regard in the initial year of the Tenth Plan.

Babasaheb Dr. Ambedkar, the architect of the Constitution of India had, in the Fifth and the Sixth Schedules of the Constitution of India, defined the policies and programmes and also safeguards.

Dr. B.R. Ambedkar has already mentioned. I would like to quote a few lines of his Address which he delivered in a gathering, about untouchability in 1927. He said:

"Untouchables can attain self-elevation only by learning self-help, gaining self-knowledge and gaining self-respect. "
 

 Are our programmes and policies moving towards these goals which the Father of our Constitution had dreamt about? Where are we lagging behind?

Sir, I would like to draw the attention of this august House that it has been said in the 10th Five Year Plan that ‘to tackle various unresolved problems of tribals, the 10th Plan shall formulate a comprehensive National Policy for empowering tribals through the integrated development which will lay down the responsibilities of different wings of Government and appropriate accountability.’ Sir, out of this 22.5 per cent population of our great nation, what is the level of upliftment we have achieved in the socio-political and economic empowerment during all these years? Does the fault lie on the policy makers; or is it the problem in implementation by the implementing agencies; or is it the fault of group of officials committed to carry these schemes at the grassroots level; or is there any lacuna that we have failed ourselves to address these issues all these years?

Sir, the Ministry of Information and Broadcasting, Government of India has brought out a publication "Milestones of Success". There, under the heading "Tribal Affairs", they have mentioned about 15-16 schemes. I would like to concentrate only on three issues. The level of Special Central Assistance to Tribal Sub-Plan has been increased from Rs. 400 crore to Rs. 500 crore from 1999-2000 to 2001-02. This is the budget allocation for the upliftment of the eight per cent of the tribal population. Here again, I would like to inform, with a painful heart, that there is a grate regional imbalance among the Scheduled Caste, poor and downtrodden people. This eight per cent tribal population is living and is scattered in 20 per cent of the geographical area of the country. Except States like Punjab and Haryana, they are spread throughout the country. Their main concentration is in the central parts of India, namely, Gujarat, Maharashtra, Rajasthan, Madhya Pradesh, Chhatisgarh, Andhra Pradesh, Jharkhand, Orissa, and West Bengal. About 85 per cent of them are located only in these areas. Another pocket of population is living in the North-East where 12 per cent of such tribal population resides.

For the North-Eastern States, even the hon. Prime Minister has announced a special budget allocation. They are trying to formulate the schemes.

Are we not competent enough, are we not committed to implement the schemes which will cater to the needs, which will address the issues of socio-political and economic empowerment of this tribal community?

We are decentralising everything. There is no proper Budget allocation which is proportionate to the population. This is the first one. The second one is that even when the Budget allocation is made, we are not concentrating on policies and programmes in a need-based manner. I would like to have a concrete reply from the hon. Minister as to on what schemes the Government of India had focussed and formulated, and what is the Budget allotment in these areas where regional imbalance is more like between North and South India and also the North Indian States, where tribal population is more. Are we not having a specific or special programme for upliftment of the tribal people?

I congratulate the Government of India for having appointed a Commission for the Tribal Welfare under article 337 of the Constitution of India. There are members in this Commission. They are vested with the responsibilities; it is given in the Gazette of India that they would submit the report to His Excellency the President of India as soon as they prepare the report, or not later than one year from the publication of this order. This Commission has to address some items, which I place on the Table of the House, for want of time. We will have the commitments mentioned in the Gazette. I appeal through you, Sir, to have a separate discussion. The Commission will have to give a concrete reply as to the State-wise Budget allocation, different programmes, the achievement, etc. so that instead of waiting for a year, we can have it after six months; if the House contributes something, it could be incorporated and we can improve the implementation of the programmes so that the Commission definitely helps upliftment of the tribal community.

Shri Shivraj Patil has given good suggestions. Will the Ministry take note of these suggestions? The suggestions and the points that we are making here should have a result in implementing the programmes. There is no point only in speaking here. The Constitution of India has all the schemes; but they are only in the book-form. It has not reached the grassroots.

In this context, I would like to invite the Commission to come to Tamil Nadu; at least, they can see the best performed State where the poor and downtrodden community is uplifted; they can see the schemes the State Government has adopted and how it has done it, etc. MR. CHAIRMAN : Please conclude.

DR. V. SAROJA : I have not yet started.

DR. C. KRISHNAN (POLLACHI): Sir, there is no quorum.

MR. CHAIRMAN: Please sit down. Please take your seat.

Let the quorum bell be rung --

MR. CHAIRMAN : Since there is no quorum in the House, the House stands adjourned to meet again at 5.30 p.m. 17.06 hrs. The Lok Sabha then adjourned till thirty* minutes past Seventeen of the Clock.

17.34 hrs. The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Monday, April 28, 2003/Vaisakha 8, 1925 (Saka).

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