Lok Sabha Debates
Further Discussion On The Motion For Consideration Of Compulsory Voting Bill, ... on 30 April, 2010
> Title: Further discussion on the motion for consideration of Compulsory Voting Bill, 2009, moved by Shri J.P. Aggarwal on the 4th December, 2009 (Under Consideration).
MR. CHAIRMAN: Now, we will take item No. 41 – Compulsory Voting Bill for consideration and passing.
Shri Arjun Ram Meghwal.
श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर): सभापति महोदय, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं माननीय सदस्य श्री जय प्रकाश अग्रवाल द्वारा पेश किए गए गैर सरकारी विधेयक अनिवार्य मतदान का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैंने पिछली बार चर्चा करते हुए कहा था कि अनिवार्य वोटिंग होने से इस देश में कई बीमारियां एक साथ दूर हो जाएंगी। जैसे मसल पावर की बीमारी दूर हो जाएगी। धन बल का प्रयोग वोटिंग के समय काफी होता है, यह बीमारी भी दूर हो जाएगी। इसके अलावा पिछड़े वर्ग के लोग, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग जब वोटिंग करने जाते हैं तो उन्हें कह दिया जाता है कि तुम्हारा वोट तो पड़ गया है, इस समस्या से भी निजात मिल जाएगी।
16.12 hrs. (Shri Inder Singh Namdhari in the Chair) यह एक महत्वपूर्ण बिल है, जिस पर सदन को गम्भीरता से विचार करना चाहिए। मैं कहना चाहता हूं कि इस देश में चुनाव प्रक्रिया में सुधार का भी लम्बा इतिहास रहा है और अनिवार्य वोटिंग का भी लम्बा इतिहास रहा है। लेकिन बार-बार दिनेश गोस्वामी समिति की रिपोर्ट का सहारा लेकर इस अनिवार्य मतदान प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। दिनेश गोस्वामी समिति की रिपोर्ट जब आई थी, उस समय देश में कई तरह की परिस्थितियां थीं। देशकाल और परिस्थिति के अनुसार निर्णयों में परिवर्तन होते रहे हैं। किसी जमाने में दिल्ली में कोई आदमी जब सीएनजी की बात करता था, तो उसे पागल कहा जाता था। लेकिन जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने डंडा चलाया, तो आज दिल्ली में सीएनजी जरूरी हो गई है और प्रेक्टिकल भी हो गई है।
आज हम सदन में तो अनिवार्य वोटिंग की चर्चा कर रहे हैं, लेकिन हमारे मुख्य चुनाव आयुक्त चावला साहब ने मदुरै में कहा कि अनिवार्य वोटिंग व्यावहारिक नहीं है। वह यह बात दिनेश गोस्वामी समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कह रहे थे। मैं यह कहना चाहता हूं कि सदन को यह तय करना चाहिए कि अनिवार्य वोटिंग होनी चाहिए या नहीं। अगर ऐसा हो जाएगा तो जैसा मैंने पूर्व में कहा कि देश से कई बीमारियां दूर हो सकती हैं। मुझे खुद का अनुभव रहा है और मैंने देखा है कि एससी और एसटी के लोग वोटिंग नहीं कर पाते हैं। जब चुनाव के समय वे वोटिंग के लिए जाते हैं तो उन्हें कह दिया जाता है कि आपका वोट तो पड़ गया है यानि कोई और उनका वोट डाल जाता है।
अगर वोटिंग अनिवार्य हो जाएगी तो जो वोट नहीं देगा, उनकी कई सुविधाएं वापस ली जा सकती हैं और पोजिटिव पनिशमेंट भी लगा सकते हैं । लेकिन चुनाव आयोग के कुछ लोग कह रहे हैं कि यह प्रेक्टिकल नहीं है, क्योंकि इतना बड़ा देश है और इतने सारे लोग हैं, कैसे इसे अनिवार्य कर सकते हैं। दूसरी तरफ कई लोग कहते हैं कि वोटिंग राइट फेंडामेंटल राइट का हनन है। वोट देना अधिकार है, सिविल राइट नहीं है। सन् 2004 में इसी सदन में उस समय के माननीय सदस्य श्री बची सिंह रावत ने अनिवार्य वोटिंग हेतु गैर सरकारी विधेयक प्रस्तुत किया था।
उस समय भी दिनेश गोस्वामी समिति की बात कहते हुए, यह कहा गया था कि यह व्यावहारिक नहीं है। व्यावहारिक नहीं है के साथ यह भी कहते हैं कि मतदान करना कर्तव्य नहीं है।
सभापति महोदय : मेघवाल जी, गुजरात हाईकोर्ट ने जो जजमेंट दिया है, वहां गुजरात में अनिवार्य वोटिंग कर दी गयी थी।
श्री अर्जुन राम मेघवाल : वह लोकल-बॉडीज में की थी।
सभापति महोदय : हां, चुनाव तो वह भी है ना।
श्री अर्जुन राम मेघवाल : लेकिन वह बिल राज्यपाल ने वापिस किया है, डिसीजन कहां आया है?
वह बिल राज्यपाल ने वापिस कर दिया है। जो इसके विपक्ष में तर्क देते हैं, वे कहते हैं कि भारत जैसे बड़े देशों के लिए यह व्यावहारिक नहीं है। मतदान करना कर्तव्य नहीं है, बल्कि अधिकार है। अतः मौलिक अधिकारों का प्रयोग चाहे तो व्यक्ति करे, या नहीं करे। अगर कोई व्यक्ति किसी को वोट नहीं देना चाहता तो नैगेटिव वोट का विकल्प उपलब्ध नहीं है। मैंने नेट से भी बहुत सी सूचना ली, मैंने यहां जो डिबेट हुई, उससे भी बहुत सी इंफोर्मेंशन ली। यह जो तीन मुद्दे अनिवार्य मतदान के विपक्ष में जा रहे हैं और वे इन्हें बार-बार कह रहे हैं।
अनिवार्य मतदान के पक्ष में जो मुद्दे हैं, मैं उन्हें यहां प्रस्तुत करना चाहता हूं। अनिवार्य मतदान लागू होने से वोट प्रतिशत में बढ़ोत्तरी होगी। सरकार भी कहती है कि वोट प्रतिशत में बढ़ोत्तरी हो। लोकतंत्र की मजबूती होगी, ज्यादा लोग भाग लेंगे। दुनिया के लगभग 32 देशों ने अनिवार्य मतदान प्रक्रिया अपना ली है। इसमें ब्राजील जैसा देश भी है, जिसकी भारत से कई बातों में समानता है। भारत के समान वह देश भी बड़ा देश है, जनसंख्या भी काफी है। आस्ट्रेलिया, इटली के साथ ब्राजील जैसे देश ने भी अनिवार्य मतदान की प्रक्रिया अपना ली है। इससे लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी। मतदान के दिन अपनाई जाने वाली बैड-प्रैक्टिसेज जैसी समस्या का समाधान हो जाएगा। कुछ लोग दारू बांटते हैं, कुछ लोग पैसा बांटते हैं, उससे छुटकारा मिलेगा। धनबल, बाहुबल में कमी आयेगी और कमजोर वर्गों के वोट सुरक्षित हो जाएंगे। किसी और समुदाय द्वारा वोट देने के भय से मुक्ति मिलेगी तथा लोगों का सही प्रतिनिधित्व होगा। आज हम देखें तो बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां 40-50 प्रतिशत वोट ही पड़ते हैं।
अभी हमारे राजस्थान में, बीकानेर जिले में, ग्राम पंचायतों के चुनावों में 90 प्रतिशत, 95 प्रतिशत वोट पड़े, इसका मतलब यह है कि लोग वोट देना चाहते हैं। एमपी के चुनावों में वोट कम पड़ते हैं, एमएलए के चुनावों में भी वोट कम पड़ते हैं, कारण क्या है, इस पर हमें चिंता करने की जरुरत है? मैंने बहुत से ऐसे वोटरों से चर्चा की जो वोट नहीं देते हैं, जैसे आर्मी के लोग - वे कहते हैं कि हमारा आई-कार्ड ही नहीं बना। ऐसे ही कुछ उद्योगपति हैं जो घर से बाहर निकलना नहीं चाहते। कुछ ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि लाइन बहुत लम्बी होती है, कुछ कहते हैं कि हम जाएंगे, वोटर-आई-कार्ड देखेंगे या और कोई प्रूफ देखेंगे, वह नहीं होगा तो वापस आना पड़ेगा। अगर चले गये और लाइन में तीन घंटे बिताने के बाद हमारा नम्बर आया, तो वह हमसे सहन नहीं होगा। इसलिए हम वोट देना नहीं चाहते हैं। इन छोटी-छोटी चीजों का समाधान यह सदन कर सकता है। अनिवार्य वोटिंग का मुद्दा माननीय जेपी अग्रवाल जी ने जो प्रस्तुत किया है, यह स्वागत-योग्य कदम है। इससे कई बीमारियां एक साथ दूर होंगी। समाज में कुछ लोग ठेकेदार बने हुए हैं, वे कहते हैं कि हमारे पास आओ, हम आपको हजार वोट एक साथ दिला देंगे। They are the contractors of the voters. इस बीमारी से भी आपको मुक्ति मिलेगी। ठेकेदार सब को वोट देने के लिए कहेगा और जो नहीं देगा, उसे नॉन-वोटर का सर्टिफिकेट जारी हो जाएगा। उसे लगेगा कि अगर मैं नहीं जाऊंगा तो मेरी सुविधा को छीन लिया जाएगा। उसको डर लगेगा और वह वोट देने के लिए मोटिवेट होगा।
भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र है, इसलिए इसमें अनिवार्य वोट देने की प्रक्रिया होनी चाहिए। मतदान के बाद जो कोर्ट कैसेज होते हैं, उससे भी हमें मुक्ति मिलेगी। सबसे बड़ा फायदा इससे यह होगा कि जो राजनैतिक अस्थिरता आ रही है उसमें कमी आयेगी। चुनाव आयोग को भी फायदा होगा, जो कोड ऑफ कंडक्ट लगाते हैं, बहुत से पाइंट उसमें जोड़ते हैं। जब अनिवार्य मतदान हो जाएगा तो मॉडल-कोड ऑफ कंडक्ट भी लगाना नहीं पड़ेगा, गवर्नमेंट की मशीनरी में कमी आयेगी। ये कुछ बिंदू थे, जिनके ऊपर मैं आपके माध्यम से, माननीय मंत्री जी का ध्यान आकर्षित करना चाहता था।
सभापति महोदय, कई ऐसे देश हैं, जिनमें नियम तो बन गया है, लेकिन उन्होंने अपवाद छोड़ा है। जैसे इटली, अस्ट्रिया हैं, उन्होंने कहा है कि अनिवार्य मतदान है, लेकिन कोई आदमी बहुत बूढ़ा है, कोई बीमार है, कोई मतदान केंद्र से बहुत दूर है और ये अगर मतदान केंद्र तक नहीं पहुंच सकते हैं या कोई व्यक्ति जेल में है, तो इनके लिए छूट है। ऐसे कुछ अपवाद इस बिल में हम भी ला सकते हैं। अगर लगता है कि शुरू में कुछ ज्यादा अपवाद होने चाहिए, तो उनका भी प्रावधान कर सकते हैं, जिससे कि कुछ परसेंट छोड़ कर ज्यादातर लोग तो वोट देने के लिए प्रेरित होंगे।
गुजरात में ऐसा हुआ था, बाद में राज्यपाल महोदय ने वापस ले लिया था। उन्होंने दो चीजें की थीं, एक थी, जो वोट देने नहीं आएगा, उसका राशन कार्ड जब्त किया जाएगा, दूसरा, उसमें दो दिन की सज़ा का प्रावधान था। मैं इसके पक्ष में नहीं हूं क्योंकि दो दिन की सज़ा ठीक नहीं है। मैं पोज़ीटिव पनिशमेंट की बात करता हूं। जैसे कोई आदमी साल में बीस लाख रुपए कमा रहा है, वह वोट देने नहीं आ रहा है, तो हम उसे दंड दे सकते हैं कि अगर तुमने वोट नहीं दिया और नॉन वोटर केटेगिरी में भारत सरकार ने खड़ा कर दिया, तो तुम्हें प्रधानमंत्री सहायता कोष में बीस हजार रुपए देने पड़ेंगे। वह भारत से पैसा कमा रहा है, भारत में ही लखपति बना है और भारत की लोकतंत्र की प्रक्रिया में वोट नहीं दे रहा है। हम नेगेटिव पनिशमेंट न देकर पोजीटिव पनिशमेंट तो दे ही सकते हैं। जैसे कोई गरीब आदमी है, यह कह सकते हैं कि नॉन वोटर गरीब आदमी का इलाज कराएगा। इससे भारत सरकार का रिलीफ फंड भी इकट्ठा होगा। जैसे मुख्यमंत्री सहायता फंड है, प्राकृतिक आपदा फंड है, कहीं बाढ़ आ जाती है, उस फंड में हम पैसा इकट्ठा कर सकते हैं। कई सालों के बाद उसे लगेगा कि बहुत पैसा लग रहा है, हमें वोट देना चाहिए, तो वह वोट देने के लिए प्रेरित होगा।
मैंने नेट से बहुत चीजें ली हैं। कई देशों ने कहा कि उनके राशनकार्ड जब्त कर दो। सरकारी अस्पताल में इलाज की मनाही। सरकारी स्कूलों में दाखिले की अनुमति न देना। पासपोर्ट वीजा पर प्रतिबंध और वोट न देने वाले को ग्राम पंचायत, नगर निगम, सरकारी निकाय में आर्थिक जुर्माना जमा कराना। इनकम टैक्स रिटर्न के साथ मतदान प्रमाण पत्र लगाएं अन्यथा टैक्स ज्यादा देना पड़ेगा। जब श्री टी.एन. शेषण थे, तब आई कार्ड शुरू हुआ। अभी तक हम वोटर आई कार्ड नहीं बना पाए हैं। जब ऐसा किया गया था, तब भी लोगों ने कहा कि यह प्रेक्टिकल नहीं है, लेकिन आज बहुत से राज्य ऐसे हैं, जहां 90 परसेंट या 95 परसेंट वोटर आई कार्ड हैं। वोटर आई कार्ड बनाया गया, ऐसे ही हमें नॉन वोटर आई कार्ड का सर्टिफिकेट बनाना पड़ेगा कि इस आदमी ने वोट नहीं दिया, इसलिए उसे जारी कर दो। इसे जारी करने के बाद पाजीटिव पनिशमेंट के सिद्धांत जारी कर दिए जाएं, इससे रिलीफ भी मिलेगी और लोग वोटिंग के प्रति प्रेरित भी होंगे।
मैं पोजीटिव पनिशमेंट के सिद्धांतों की बात कहता हूं। उसके हमें सदन में या समिति बनाकर चर्चा करनी चाहिए। अगर ऐसी व्यवस्था करेंगे, तो मेरा मानना है कि अनिवार्य मतदान के लिए जो बिल लाया गया है, इससे देश का भला होगा।
सभापति जी, आपने मुझे बोलने की अनुमति दी, इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं अनिवार्य मतदान बिल का समर्थन करता हूं और हमारी पार्टी भी इसका समर्थन करती है।
SHRI ADHIR CHOWDHURY (BAHARAMPUR): Sir, our esteemed colleague, Shri J.P. Aggarwal has introduced this Bill under the nomenclature, The Compulsory Voting Bill, 2009. I must appreciate the honest intention of the hon. Member. In the legislative document, the end is defined. The Legislative document intends to cast more votes for the growth of our democratic system but the means that have been suggested, I think, still are not advisable in the context of our country. India always pleads the persuasive policy in all concerned problems of our country. But the name - Compulsory Voting Bill is clearly smacking of a tinge of autocracy. So, here I am compelled to disagree with the means of the legislative document as has been enunciated. If we peep into our Constitution, we will find that Article 326 enshrines:
“Elections to the House of the People and to the Legislative Assemblies of States to be on the basis of adult suffrage – The elections to the House of the People and to the Legislative Assembly of every State shall be on the basis of adult suffrage; that is to say, every person who is a citizen of India and who is not less than eighteen years of age on such date as may be fixed in that behalf by or under any law made by the appropriate Legislature and is not otherwise disqualified under this Constitution or any law made by the appropriate Legislature on the ground of non-residence, unsoundness of mind, crime or corrupt or illegal practice, shall be entitled to be registered as a voter at any such election.” Therefore, it is clearly prescribed in our Constitution that voting is our right. It is a civic right nonetheless and if we try to make it our civic duty, I think we will be landing in conflict with the basic tenets of our Constitution which advocates equality before the law.
There is compulsory voting in some of the countries in the world. They are pursuing the practice of compulsory voting. It does not mean that we are to mimic the practices of foreign countries because we have to understand the culture, the index of education, the fabric of our society and the ambience under which we are brought up before deciding any policy.
Sir, in our country, when the first election was held in some places, common voters had put up the symbol whom they were suppose to vote. On the top of a tree, the symbol was put to display their support to a particular party. This was the level of maturity that Indians had at that time. But we have journeyed a long and come to the first decade of the 21st century. Still, we are to take into cognizance of whether we will pursue any coercive policy or we will pursue the persuasive policy. Our objective must be to turn out more and more voters in our electoral mechanism because we are belonging to a representative democracy.
MR. CHAIRMAN : Hon. Members, the allotted time for discussion on Compulsory Voting Bill, 2009 is over. I have six more Members to speak on the Bill. If the House agrees, the time for discussion of the Bill may be extended by one hour.
SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.
SHRI ADHIR CHOWDHURY : Sir, we are living in a country which preaches representative democracy. Sir, representative democracy is founded on the principle of elected individuals representing the people of our country as opposed to autocracy or direct democracy. Sir, representatives are chosen by the plurality of those who are able to cast vote and who are eligible to cast vote and doing the same. It does not mean that majority of votes are to be earned before being elected. A winning candidate needs to derive the highest number of votes among the contestants. This is the policy we are abiding since the electoral system of our country has been established.
Sir, representative democracy emphasizes individual liberty and that is why, we can say that India is a country which believes in liberal democracy. The liberty of any individual is mentioned in and is regulated by our Constitution. Our Constitution has framed up various measures, hundreds of articles, schedules, etc. to build a checks and balance mechanism in our democracy.
MR. CHAIRMAN: Mr. Chowdhury, do you feel that the craze for voting is coming down day by day?
SHRI ADHIR CHOWDHURY : Yes, Sir. You have raised a very valid question. It is a problem of representative democracy. Sir, the major problem with representative democracy is voter apathy.
You are absolutely right in saying this. It is the apathy of the voter, it is the indifferent attitude of the voter which is really a matter of great concern. Sometimes, it seems that Governments are being run not by the mandate. They do not have any electoral legitimacy, right to rule. It is often seen. But, Sir, now, we need to have an introspection into the fact as to why the electorate are getting indifferent to the electoral system. Why are they becoming apathetic? Why are they not participating in the electoral process? It needs to be dealt with.
Sometimes, it is found that people are reluctant to cast their votes, to exercise their franchise for or against any of the candidates because they do not like any one contesting the elections. It is also noteworthy to say that more and more people are getting interested, especially those people till now are considered under-privileged section of our society, in the participation of any election.
The Bill is suggesting a number of penal measures so that people could be forced to cast their votes. Even, the hon. Members are referring to some countries of the West. But it is also true that a number of countries where compulsory voting system was in vogue till the other day are now withdrawing it because they find the untenability of compulsory voting. I can refer, Belgium, the oldest country in the world which, is pursuing the compulsory voting practice. It is called Baton Ballot. Some members also referred to Gujarat in the context of compulsory voting, but we cannot simply go by this way as has been proposed by the Gujarat Government. I would pray to the Gujarat Government to keep the citizens of Gujarat in peace and tranquillity. The Government which cannot afford security to the common citizen cannot ask for compulsory voting for the sake of democracy. I must say that.
MR. CHAIRMAN : Shri Adhir Chowdhury, if you make your speech short, we can take up the other Bill. The next Bill is yours. Otherwise, you will be missing the chance.
SHRI ADHIR CHOWDHURY : I will try to be brief. Even in the year 1983, the Supreme Court affirmed that voting is a formal expression of will or opinion by the persons entitled to exercise the right on a subject or issue in question. Right to vote means the right to exercise the franchise. It is right in favour or against any issue in question or any Resolution. Such a right implies the right to remain neutral as well. Therefore, by this definition, it clearly vindicates that if we ask one to vote compulsorily, then, it will be tantamount to an infringement upon the freedom of an individual.
I must argue that intense mobilisation, more competitive electoral arena, arousal of interest in the elections are now being palpable in the aftermath of the assertion of regional parties.
Sir, I would like to draw your attention to the fact that the electoral turn out in Assembly Elections is found to be more than the National Election. Our voters are mature, they are sensitive and they are conscious. Otherwise, how have the voters of your State, voters of Jammu and Kashmir and voters of Arunachal Pradesh exercised their franchise? It clearly points out to the fact that without adopting any coercive measures, we can have a democratic upsurge in our country where more and more Dalits, minorities, women and under-privileged classes are sucked into the electoral process. They are taking more and more interest in the electoral process now.
So, we need to make a further introspection into the reason as to why the common voters are getting reluctant to cast their votes and the percentage of voting is declining, without resorting to any coercive measures. By the sheer dint of persuasion, by the dint of argument and by the dint of giving avenues for more freedom and more expression, we can increase the voting percentage in our country.
With these words, I conclude.
श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):सभापति महोदय, आपने मुझे अनिवार्य मतदान विधेयक, 2009, जिसे हमारे साथी श्री जयप्रकाश अग्रवाल ने रखा है, पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। इस बिल पर बल देते हुए, मैं अपने कुछ सुझाव रखना चाहूंगा।...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : शैलेन्द्र कुमार जी आप पक्ष में हैं या विपक्ष में हैं।
श्री शैलेन्द्र कुमार : महोदय, मैं दोनों तरफ हूं। ये अच्छा काम करेंगे, तो इनके साथ हूं और अगर बुरा काम करेंगे, तो इनके विरोध में हूं। विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भारतवर्ष है, जिसकी आबादी 100 करोड़ से भी अधिक है। अनिवार्य मतदान करने की जहां तक बात है, दोनों पक्षों के सम्मानित सदस्यों ने सुझाव रखे हैं। मैं वर्ष 1998 में जब 12वीं लोक सभा में चुनकर आया था तो मेरे यहां मतदान 34 प्रतिशत हुआ था। मैं 21 हजार वोट से जीत कर आया था। बड़े अफसोस की बात है कि आज हिन्दुस्तान का 50 प्रतिशत मतदाता उदासीन है, वह मतदान करने नहीं जाता। उसे चुनाव से घृणा हो गई है, उसका लोकतंत्र के प्रति विश्वास उठ गया है। अब अनिवार्य मतदान के लिए जागरुकता की जरूरत है। सफेद कुर्ते-पायजामे से भी लोग हेट करने लगे हैं, यह स्थिति आ गई है और यही कारण है कि मतदान का प्रतिशत दिन-प्रति-दिन गिरता चला जा रहा है। हम लोग वित्त विधेयक में कागज पर लिखे आंकड़ों पर लड़ रहे थे, बस उतना ही रह गया है। मैंने पहले भी कहा था कि आप ग्रामीण इलाकों में जाकर हकीकत देखिए तो असली भारत की तस्वीर आपको समझ में आएगी।
सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि अगर हम अनिवार्य मतदान कराने के लिए बिल लाए हैं तो वहीं पर अनिवार्य मतदान कराने के लिए हमें सुविधाएं भी देनी पड़ेंगी। लोगों में जागरुकता लानी पड़ेगी, तभी हमारा यह मकसद पूरा हो पाएगा। मैं डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी का शुक्रिया अदा करना चाहूंगा कि संविधान में हम लोगों को भारतवर्ष के सबसे बड़े संवैधानिक देश में उन्होंने वोट ऑफ राइट का अधिकार दिया, चाहे कोई बड़ा, मध्यम वर्ग या छोटा गरीब आदमी भी हो, सब को यह अधिकार दिया है। राजीव गांधी जी जब प्रधान मंत्री थे तो उन्होंने 18 वर्ष किया। इससे युवाओं में एक नया उत्साह आया कि हम मतदान दे सकते हैं, यह बहुत बड़ी बात है। मैं पर्सनल पब्लिक ग्रिवेंस लॉ एंड जस्टिस का भी सदस्य था, इलैक्ट्रो रिफार्म पर हम लोगों ने चर्चा की थी। मुझे चुनाव खर्च के बारे में कुछ नहीं कहना है, क्योंकि इस बारे में यहां पर बहुत जिक्र हो चुका है।
सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि चुनाव का खर्च पूरे तरीके से सरकार को अपने हाथ में लेना चाहिए। जिस प्रकार से चुनाव आयोग का चुनाव आचार संहिता सख्ती से इस समय चल रहा है, उस हिसाब से चुनाव का पूरा खर्चा सरकार को वहन करना चाहिए और सब को बराबर देना चाहिए। दूसरी बात यह है कि अनिवार्य मतदान में छूट की बात कही गई है। जो लोग मतदान के दिन गंभीर बीमारी से ग्रस्त हैं, अगर वे रजिस्टर्ड मेडिकल ऑफिसर का मेडिकल सर्टिफिकेट देते हैं तो उन्हें छूट दी जानी चाहिए। खास कर हर मतदाता के लिए उसके अपने मताधिकार के प्रयोग के समय सिक्योरिटी की भी व्यवस्था हमें करनी पड़ेगी। हमारे यहां मतदान का स्वरूप धीरे-धीरे बिगड़ता जा रहा है, उस हिसाब से हर मतदाता को सुरक्षा देने की आवश्यकता है। सरकार को इस बात को अपने हाथ में लेना चाहिए। आज भी हम देखते हैं, जब क्षेत्र का दौरा करते हैं तो लोग हमसे मांग करते हैं कि साहब, हम लोगों को वोट डालने के लिए बहुत दूर जाना पड़ता है। हमें देखना चाहिए कि जहां हमारी आबादी ज्यादा है, मेरे ख्याल से अब दो सौ या ढाई सौ लोगों के लिए एक बूथ सेट किया गया है। बूथ भी नजदीक होने चाहिए, क्योंकि अगर कोई बीमार, असहाय या गरीब आदमी है, वह आसानी से पैदल चल कर अपना वोट डाल सके, यह व्यवस्था करनी चाहिए। बूथ तक जाने के लिए कम से कम दूरी होनी चाहिए। हमने एक अनिवार्यता यह रखी कि जिस गांव में मज़रे में जहां पक्के मकान हों, वहीं पर मतदाता बूथ बनाने की बाध्यता है, उसे भी समाप्त करना चाहिए। मेरे ख्याल से अब हर गांव में तमाम प्राथमिक विद्यालय, जूनियर विद्यालय या प्राईवेट विद्यालय ऐसे हैं, जिसमें बूथ बना देने चाहिए, वहां मतदान केन्द्र बना देने चाहिए ताकि उससे लोगों को सहूलियत मिले।
सभापति महोदय, दूसरी बात मैं कहना चाहता हूं कि जो वरिष्ठ नागरिक हैं, जो बहुत बुजुर्ग हैं, जो शारीरिक रूप से निशक्त हैं अथवा जो प्रैग्नेंट महिलाएं हैं, जिन्हें मतदान करने में दिक्कत हो, उनके लिए मोबाइल मतदान केन्द्रों की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि वे उनके घरों के निकट जाकर या गांव में किसी एक स्थान पर आ कर मोबाइल बूथ खड़ी हो जाएं, जहां आकर वे अपना मतदान कर सकें। यह व्यवस्था हमें करनी चाहिए। इस विधेयक के अनुसार जो मतदान न करे, उसके ऊपर 500 रुपए जुर्माना लगाने एवं दो दिन की कैद, राशनकार्ड जब्त और 10 वर्ष तक चुनाव नहीं लड़ने देने की बाध्यता दर्शाई गई है। दूसरी ओर उसे जो सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाओं में सहूलियत मिलती है, जैसे मकान या भूखंड के आबंटन में उसे अपात्र घोषित कर दिया जाए। जिस व्यक्ति ने वोट नहीं डाला है, यदि वह ऋण लेने जाता है, तो उसे अपात्र घोषित कर दिया जाएगा। इस प्रकार से तमाम योजनाओं से उसे वंचित रखने की बात कही गई है।
महोदय, अभी श्री अर्जुन जी बोल रहे थे। गुजरात में भी इसी प्रकार का एक प्रस्ताव पारित हुआ, जिसके बारे में उन्होंने सफाई दी कि वह तो लोकल या पंचायत के चुनाव के लिए किया गया था। मैं कहना चाहता हूं कि इस दिशा में गुजरात से एक पहल हुई थी। इसे करना चाहिए। हम भी इस पक्ष में हैं कि अनिवार्य मतदान होना चाहिए। हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और हमें इस पर नाज है कि हम भारत के नागरिक हैं। हम यहां 30, 32, 34 और 35 परसेंट पर चुनकर चले आते हैं, यह ठीक नहीं है। मैं चाहता हूं कि विश्व में सबसे बड़े लोक तंत्र के रूप में हमारे देश पर कम मतदान के आधार पर कोई बट्टा न लगे। जब हम इतने कम मतों से चुनकर आते हैं, तो बाकी जो 70-75 परसेंट लोग बचते हैं, उनसे कोई मतलब ही न रहे, यह उचित नहीं है। मैं चाहता हूं कि मतदान के अधिकार को अनिवार्य बनाया जाए, लेकिन इसमें थोड़ा सुधार कर दिया जाए ताकि इतनी बाध्यता न हो और जो पनिश्मेंट की व्यवस्था है, वह थोड़ी कम-ज्यादा हो सकती है, इस पर हम विचार कर सकते हैं।
महोदय, इस विधेयक में यह भी बताया गया है कि जो सरकारी सर्विस में हैं, उन्हें डाक से वोट देने का अधिकार है। इसमें भी कहा गया है कि 10 दिन के वेतन की जब्ती, पदोन्नति में दो वर्ष का विलम्ब हो। यदि ऐसा होगा, तो उसका प्रमोशन ही नहीं होगा। इस प्रकार की तमाम बातें विधेयक में कही गई हैं। मैं इसके ज्यादा विस्तार में नहीं जाना चाहता हूं। जैसा मैंने पहले कहा, इसके लिए और सुविधाएं दीजिए और सुविधाएं देने के बाद, कुछ कम ज्यादा कर के, थोड़ी बहुत जागरुकता और मतदान के प्रति अनिवार्यता करनी चाहिए।
महोदय, इलैक्ट्रोरल रिफॉर्म्स के बारे में दिनेश गोस्वामी समिति की सिफारिशें 1990 में आई थीं। उनके ऊपर भी हमें गौर करने की जरूरत है। मैं इन्हीं शब्दों के साथ, आपने मुझे इस विधेयक पर बोलने का मौका दिया, इसके लिए आपका धन्यवाद करते हुए पुनः इस विधेयक पर बल देते हुए, अपनी बात समाप्त करता हूं।
सभापति महोदय : शैलेन्द्र कुमार जी, एक बार हमारे एक मित्र जीते थे, उनके बारे में लिखा था कि elected but deposit forfeited. वोटिंग इतनी कम हुई कि जीत गए, लेकिन जमानत जब्त हो गई, ऐसा भी होता है।
श्री सतपाल महाराज (गढ़वाल):सभापति महोदय, मैं सम्मानित सदस्य, श्री जय प्रकाश अग्रवाल द्वारा लाए हुए प्रस्ताव, अनिवार्य मतदान विधेयक, 2009 के समर्थन में खड़ा हुआ हूं। वोटर लिस्ट बनाते समय जो सर्वेक्षण होता है, उसमें घरों में रहने वाले बहुत से लोग छूट जाते हैं। कभी-कभी तो यह होता है कि इसमें रुचि रखने वाली पार्टियां एक पार्टी विशेष के जो वोटर होते हैं, उनके नाम ही गायब करा देती हैं। इसलिए वोटिंग लिस्ट से नाम गायब होने की बड़ी शिकायतें आती हैं। मैं माननीय मंत्री जी को सुझाव दूंगा कि यदि वोटर लिस्ट से जो नाम गायब होते हैं, तो जिस अधिकारी का सर्वे करने और वोटर लिस्ट बनाने का काम होता है, उसे भी दंडित करना चाहिए, क्योंकि जो लोग वोट देना चाहते हैं, उनके नाम वोटर लिस्ट से गायब होने के कारण वे वोट नहीं डाल पाते हैं।
महोदय, मैं उत्तराखंड से आता हूं और उत्तराखंड के अंदर बहुत सैनिक मतदाता हैं। लगभग 40 हजार मतदाता हैं। इसी प्रकार से हिमाचल प्रदेश में भी बहुत सैनिक मतदाता हैं। इन पहाड़ी राज्यों में बहुत ज्यादा सैनिक मतदाता होते हैं। आप जानते हैं कि सेना, हमारे देश की रक्षा करने के लिए तैनात होती है। अब आप कल्पना कीजिए कि जो सैनिक राइफल लिए दुश्मन की तरफ ताक रहा हो, वह वोट कैसे दे पाएगा?
अगर वह रेकी करने गया है और सीमा पर रेकी कर रहा है, देख रहा है कि दुश्मन है या नहीं और शाम को उसको रिपोर्टिंग करनी है तो वह देश की सीमा की रक्षा करेगा या जहां वह तैनात हुआ है, उस स्थान को छोड़कर वोट देने जायेगा? इसके लिए पोस्टल बैलेट का प्रावधान किया गया है, पर मैं नहीं समझता हूं कि पोस्टल बैलेट इसमें कारगर हुआ है। जो भी ट्रंसपेरेंसी वोटिंग में रखी गई है, जो चुनाव लड़ रहे होते हैं, उनके एजेण्ट होते हैं, इस प्रकार की कोई भी ट्रंसपेरेंसी पोस्टल बैलेट के अन्दर नहीं होती है। यहां तक कि जो पार्टी का मैनीफैस्टो होता है, वह मैनीफैस्टो भी सीमा पर तैनात सैनिकों तक पहुंच नहीं पाता। उन्हें यही नहीं मालूम कि कौन पार्टी है, क्या पार्टी का मैनीफैस्टो है, कौन केंडीडेट चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसी स्थिति के अन्दर वे कैसे सही ढंग से मतदान कर पाएंगे। यह एक बहुंत बड़ी धांधली पोस्टल बैलेट की हो जाती है। मैं मंत्री महोदय से गुजारिश करूंगा कि इस पूरी धांधली को समाप्त करें और प्रॉक्सी वोटिंग का प्रावधान करें।
एक समय नेहरू जी का गला एक पठान ने पकड़ा और कहा कि तुम कहते हो कि हमें आजादी मिल गई है तो हमें आजादी के बाद क्या मिला। नेहरू जी ने कहा कि तुम प्राइम मिनिस्टर का गला पकड़े हुए हो, यह सबसे बड़ा अधिकार मिला। आजादी का सबसे बड़ा अधिकार, लोकतंत्र का सबसे बड़ा अधिकार यह है कि हमें वोट देने का अधिकार मिला है और यह अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को इस्तेमाल करना चाहिए।
अन्त में मैं यह कहूंगा कि:
रावी की रवानी बदलेगी, सतलुज का मुहाना बदलेगा, गर शौक में तेरे जोश रहा, तस्वीर का जामा बदलेगा।
बेजार न हो, बेजार न हो, सारा फसाना बदलेगा, कुछ तुम बदलो, कुछ हम बदलें, तब तो ये जमाना बदलेगा।।
मैं चाहता हूं कि अनिवार्य वोटिंग हो और इसमें जो विसंगतियां हैं, वे दूर हों, भारत का लोकतंत्र मजबूत हो और हम पूरी दुनिया के अन्दर विश्व गुरू के रूप में स्थापित हों, यह हमारी कामना है। SHRI S. SEMMALAI (SALEM): Mr. Chairman, Sir, I would like to express my thanks to you for giving me this opportunity to speak on the Compulsory Voting Bill. At this juncture, I would like to appreciate Shri J.P. Agarwal for bringing this Bill at the appropriate time with a novel idea. I endorse the concept of compulsory voting in principle. Democracy flourishes not only with the full participation of the people but also with the flawless electoral system. 16.59 hrs. (Shri Arjun Charan Sethi in the Chair) Sir, before enacting legislation for compulsory voting in the election, necessary spadework should be made to make the concept really workable. It needs to be further improved so that the existing defects and faults are removed, and a perfect system is put into practice. Defective and faulty system results in erosion of the democratic values.
During the Diamond Jubilee Celebrations of the Election Commission, the Chairperson of the UPA and the President of the Congress Party, Madam Sonia ji has lamented over the growing money power, muscle power and criminalization of politics. I appreciate the Congress President for the outright condemnation of the growing evils. If this is the laudable principle of the Congress Party, if it is the worthy idea of the Congress President, I wonder how the Congress Party will be going to fight against these evils … * 17.00 hrs. In all the bye elections held in Tamil Nadu, the ruling party is adopting the same formula. If the Congress party wants to follow the said principles, what Congress President strongly suggested, there is no meaning in continuing alliance with the DMK. They should come out of the clutches of the DMK. It is good for the Congress party and for the country as a whole.
Most of the cadres in the Congress party silently realise the need for breaking away from this … *. It is up to the Congress High Command to decide its own course of action… (Interruptions) I am telling the fact. It is up to the Congress High Command to decide its own course of action. There is nothing more. It is up to you whether you are continuing alliance with the DMK or not. I am not in your way.
Another aspect I want to touch upon is the electoral roll system. Though we have conducted so many elections during the last 60 years, still we have not yet developed an electoral roll system free from defects. More particularly, in Tamil Nadu, the voters’ list is full of defects. Thousands and thousands of voters who are otherwise eligible were not included in the voters’ list. En block deletion of voters’ name in a particular area is a common feature. The worst part of it is that voters having identity cards did not find their names in the electoral rolls. All this happened under the direction of the ruling party with the connivance of officials. The Election Commission is helpless. In Tamil Nadu every election is being conducted through the defective electoral rolls… (Interruptions)
SHRI J.M. AARON RASHID (THENI): Sir, he is misleading the House… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : Hon. Member, please sit down.
… (Interruptions)
SHRI S. SEMMALAI : So, the Election Commission should take effective measures for cent per cent inclusion of all eligible voters through scientific verification. I would urge upon the Election Commission to utilize the services of the Central Government employees and the employees working in the public sector undertakings for this task. Only after ensuring defect free electoral system, we can think of introducing compulsory voting in the country… (Interruptions)
SHRI N.S.V. CHITTHAN (DINDIGUL): Sir, he is misleading the House and this should not go on record… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Hon. Members, I will go through the proceedings. If there is anything unparliamentary or derogatory, I will expunge it from the records. Now, please sit down.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Mr. Semmalai, this is a Private Member’s Bill. Please do not enter into controversial politics.
SHRI S. SEMMALAI : I am not accusing anybody. The voters’ list has not been prepared properly. That is my point… (Interruptions) Let the Chairman go through the speech. If I have used any unparliamentary word, he is at liberty to remove it.
MR. CHAIRMAN: I have already given my ruling that if there is anything unparliamentary or derogatory, I will certainly expunge it.
SHRI S. SEMMALAI : If I have used any unparliamentary words, the Chairman is at liberty to delete it.
MR. CHAIRMAN: Mr. Semmalai, you have a very little time. Please confine yourself to the speech.
SHRI S. SEMMALAI : Let me also draw the attention of this august House regarding electronic voting machines (EVMs). Though the Election Commission says that the EVMs are tamper proof, there are instances where the EVMs have failed during the polling process. Electronic machines are liable to fail and the EVMs are no exception. Are we not receiving wrong calls in our cell phones? Day before yesterday also, the electronic voting system had failed in this very august House during the voting on Cut Motions, and our hon. Speaker directed the Members to use hand slips for voting? To avoid any ambiguity and enable the voters to feel sure that their votes have been rightly recorded, we would call upon the Government to discard the EVMs system and revert back to the old ballot system.
My revered leader, the former Chief Minister of Tamil Nadu, Puratchi Thalaivi J. Jailalitha has time and again urged the Government and the Election Commission to resort to the ballot system of voting for fair elections.
Even in developed countries, this type of EVM system has been given up, and they are conducting the elections through the ballot system. So, without standing on prestige, the Election Commission and the Government should come forward to conduct the elections through ballot voting system in future.
In short, the principle of Compulsory Voting Bill is good but possibility is less. So, at this juncture, I appreciate Mr. J.P. Agarwal for bringing this Bill.
डॉ. प्रभा किशोर ताविआड (दाहोद):सभापति महोदय, आपने मुझे इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देती हूं। मैं गुजरात से आती हूं और दाहोद मेरा इलाका है। It is a tribal belt. वह बहुत गरीब इलाका है। मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से कहना चाहती हूं कि हमें जीने के लिए तीन चीजों की जरूरत होती है - पहला, हवा जो हमें मुफ्त में मिलती है। यह खुशी की बात है कि हमें अच्छी तरह हवा मिलती है। हम ग्रीन ट्राइबुनल बिल द्वारा पर्यावरण को बचाकर अच्छी हवा लेने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरा, पीने का पानी है। गुजरात के दाहोद के आदिवासी लोगों को, हमारी बहनों को पीने का पानी लेने के लिए तीन-तीन किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। वहां पीने का पानी नहीं होता। आप समझ सकते हैं कि इरीगेशन की क्या फैसीलिटी होती होगी। गुजरात में अभी तक जो रूलर्स आए हैं, उन सबने ट्राइबल बैल्ट को इरीगेशन से छोड़ दिया है। नर्मदा की कैनाल केवल 40 किलोमीटर दूर से जा रही है, लेकिन हमें उस कैनाल से पीने का पानी नहीं मिल रहा है। कडाना डैम दाहोद के कैचमैंट एरिया से बना हुआ है। हमारे आदिवासी भाइयों को अपनी सोने जैसी जमीन छोड़कर कहीं और जाकर, जहां पानी नहीं है, वहां बसना पड़ा है। हमारे इलाके में पानी होते हुए भी कडाना और संतराम पुर, जो 15 किलोमीटर के करीब एरिया है, वहां के लोगों को पीने के लिए पानी नहीं दे पाए। वह पानी 400-500 किलोमीटर महसाणा में जाकर सुजलाम, सुफलाम कर रहा है। मैं अपने प्वाइंट पर आ रही हूं। मेरे भाई, दाहोद के ट्राइबल लोग सौराष्ट्र के महसाणा में जाकर, यहां से जो पानी जाता है, उसी में से वहां सुजलाम, सुफलाम करते हैं। वहां समर सीजन में पैडी पकवाते हैं। How can the poor tribal people come and vote regularly in their constituency?
सभापति महोदय : आप कम्पलसरी वोटिंग बिल पर बोलिए।
…( व्यवधान)
डॉ. प्रभा किशोर ताविआड : मैं उसी प्वाइंट पर आ रही हूं। अभी सतपाल महाराज जी बोल रहे थे कि जो सिपाही सरहद पर देश की रक्षा कर रहा है, वह मतदान के लिए नहीं आ सकता। जो मजदूर 400-500 किलोमीटर दूर जाकर मजदूरी कर रहे हैं, they cannot come regularly in each and every by-election, Tehsils election and Gram Panchayat election. They cannot come. My request is, first give us water for irrigation and livelihood in my constituency. वहां कोई उद्योग भी नहीं है। मैं चाहती हूं कि हमें पहले वहां कुछ कमाने के लिए दीजिए, कुछ खाने के लिए दीजिए, पीने का पानी दीजिए, बाद में इसे लाइए। I am not against the compulsory voting. I am not against the apathy. But we have to motivate them. We have to give something to them. So, a day will come and they will spend Rs.500 to come and vote. That is also not possible now. मैं अपने सब भाइयों से विनती करती हूं कि please cooperate with me. मैं पानी के लिए तरस रही हूं। I am asking for water for my territory.
श्री गोरखनाथ पाण्डेय (भदोही): माननीय सभापति महोदय, अनिवार्य मतदान बिल, 2009 जो माननीय जल प्रकाश अग्रवाल जी द्वारा लाया गया है, उस पर आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं। भारत वर्ष विश्व के लोकतांत्रिक देशों में से सबसे बड़ा आबादी वाला देश है। हमें यहां आने का अवसर उस वोटिंग व्यवस्था से मिलता है, जहां से सब लोग चुनकर आते हैं। लेकिन बड़े अफसोस के साथ यह कहना पड़ रहा है कि इस बड़े लोकतंत्र में, जहां हम कानून बनाने, कानून की रखवाली करने की व्यवस्था का निर्णय लेते हैं, वहां आज सिर्फ 30-35 परसेंट जनता ही मतदान कर रही है। लोग मतदान नहीं कर रहे, इसके कई कारण हैं। मैं सबसे पहले हृदय से भारत रत्न स्वर्गीय अम्बेडकर साहब का आभार व्यक्त करना चाहूंगा, क्योंकि जब कानून का निर्माण उनके संरक्षण में हो रहा था, तो उन्होंने इस देश को एक व्यवस्था दी। संविधान में चाहे गरीब व्यक्ति हो, राजा हो या सामान्य व्यक्ति हो, सबको वोट देने का समान अधिकार है। देश राजतंत्र की दुर्व्यवस्थाओं से तंग आकर इस लोकतंत्र की तरफ आस्था भरी निगाहों से बढ़ा। हम आपका ध्यान इस तरफ भी ले जाना चाहेंगे कि यह अनिवार्य वोटिंग क्यों जरूरी हुई, इसका बिल लाना क्यों जरूरी हुआ? हम गांव में रहने वाले लोग हैं, पूर्वांचल से आते हैं और भदोही लोक सभा क्षेत्र हमारा ग्रामीण अंचल है। हमें यह कहने में संकोच नहीं कि आज से पहले जब वोटिंग करने के लिए सामान्य, गरीब, दलित, झुग्गी-झोंपड़ी का परिवार मतदान तक जाता था, तो उसे यह कहकर वापिस भेज दिया जाता था कि आप जाओ, आपकी वोटिंग हो गयी है। वह वोटिंग होती नहीं थी, लेकिन उन्हें वोट देने नहीं देने दिया जाता था और धनबल और बाहुबल का प्रयोग करने वाले ऐसे लोग भी हुआ करते थे, जो पैसों के बल पर, अपनी ताकत के बल पर वोट खरीद लिया करते थे, वोट डलवा लिया करते थे। लेकिन चुनाव आयोग की सख्ती और वोट की व्यवस्था ने परिणाम बदले हैं। उसी का परिणाम है कि उत्तर प्रदेश में आज लोकतंत्र की व्यवस्था में एक साफ सुथरी सरकार बहन मायावती, जो दलित परिवार की बेटी हैं, को काम करने का अवसर मिला है। अगर यह चुनाव आयोग की सख्ती न हुई होती, तो शायद यह व्यवस्था न आ पाती।
सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा कि माननीय जय प्रकाश अग्रवाल जी ने अपने बिल में जो कुछ बातें रखी हैं, उस तरफ भी मैं आपका ध्यान ले जाना चाहूंगा। यदि हम मतदान नहीं करते हैं, तो जुर्माने के तौर पर 500 रुपये या दो दिन का कारावास, राशन कार्ड की जब्ती या ऐसे लोगों को जो किसी भूखंड या मकान के मालिक हैं, उससे बेदखली या वे किसी वित्तीय संस्था में ऋण प्राप्त कर रहे हैं, तो उस पर प्रतिबंध लगाया जाये। इसमें कुछ सुधार की आवश्यकता है। लेकिन इसके साथ-साथ मैं आपके माध्यम से सरकार का ध्यान एक तरफ और ले जाना चाहूंगा कि ऐसे भी कुछ तत्व होते हैं, जो सामान्य, गरीब या निर्धन परिवार के लोगों का नाम वोटिंग लिस्ट से बाहर कर देते हैं। वह व्यक्ति वोट के लिए दो-तीन या पांच किलोमीटर चिलचिलाती धूप में, बरसात में चलकर बूथ पर पहुंचता है, तो यह कहा जाता है कि आपका नाम ही नहीं है। यह नाम शरारतन कटवा जाता है। ऐसे लोगों पर अंकुश लगाने के लिए कड़े कानून होने चाहिए। यदि वोट देने के लिए लोग नहीं आते हैं, तो उन पर हम इस तरह का कानून ला रहे हैं, तो साथ ही साथ ऐसे लोग जिनको वोटिंग लिस्ट से बाहर करने का कुचक्र किया गया है, उन पर भी अंकुश लगाने के लिए कड़े कानून आने चाहिए, ताकि हमारा जो संवैधानिक, नैतिक और मूलभूत अधिकार है, उससे हम वंचित न रह जायें।
महोदय, मैं आपके माध्यम से दो-तीन बिन्दुओं की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा। आज लोग वोटिंग करने के लिए क्या नहीं आ रहे हैं? कहीं न कहीं गड़बड़ी हुई। ग्रामीण अंचलों में, शहरी अंचलों में त्रिस्तरीय चुनाव होते हैं, उन चुनावों में प्रतिशत अधिक है। विधानसभा चुनावों में भी प्रतिशत अधिक है, लेकिन लोक सभा के चुनाव में मतदान प्रतिशत कम होता है। इसकी वजह कुछ तो राजनीति में आई हुई गिरावट, कुछ ऐसे एंटीसोशल एलिमेंट्स का प्रयोग और कुछ ऐसे लोग जो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, उनकी वजह से सफेदपोश पर आज एक प्रश्नवाचक चिन्ह लग गया है। कभी नेता जी सम्मान का शब्द हुआ करता था, लेकिन आज नेता शब्द लांछित हो गया है। किसी का अपमान करना है, किसी का मजाक बनाना है, किसी को तिरस्कृत करना है, तो लोग कहते हैं आइए नेता जी। ऐसा लगता है कि गाली दी जा रही है, लेकिन यह शब्द कभी सुभाष चन्द्र बोस के लिए प्रयोग होता था, देश के मूर्धन्य लोगों के लिए प्रयोग होता था, कभी संविधान की व्यवस्था के तहत मतदान के द्वारा चुनकर इस सदन में चुनकर आए हुए लोगों के लिए यह शब्द अलंकृत माना जाता था। लेकिन आज इस शब्द को लोग बहुत गिरी हुई नजर से देख रहे हैं। इसके कारण वही है जिनके बारे में हम कल और आज क्रिकेट की फिक्सिंग के बारे में डिसकस कर रहे थे। कभी मैच में हेराफेरी की बात करते हैं, कभी उसमें संरक्षण की बात करते हैं, यह भी उसका एक फैक्टर है। जहां तक पोलिंग बूथ का सवाल है,वह भी इसका एक फैक्टर है। गांवों के लोग जो गांवों से तीन-चार किलोमीटर दूर वोटिंग करने जाते हैं, उन पर चुनाव आयोग ने यह प्रतिबंध लगा दिया है कि आप किसी सवारी या साधन का प्रयोग नहीं कर सकते हैं। वह गरीब आदमी चिलचिलाती हुई धूप में जाता है, वह बूढ़ा, बीमार और अशक्त आदमी किस तरह से बूथ तक पहुंच पाएगा, इसके लिए भी कुछ प्रावधान करने की आवश्यकता है जिससे उन्हें बूथ तक ले जाया जा सके। ऐसी व्यवस्था है कि अगर आप सवारी का प्रयोग करेंगे, तो आप पर कानूनी प्रतिबंध लगाया जाएगा। इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। गांवों में ऐसे लोग है, जिन्हें बूथ तक जाने में कठिनाई होती है, इसकी वजह से भी मतदान का प्रतिशत कम हुआ है। चुनाव आयोग ने यह व्यवस्था दी है कि 250 से 300 आबादी के अंतराल पर बूथ बनाए जाएंगे, लेकिन वह भी कम है क्योंकि जो पहाड़ी अंचल में रहने वाले लोग हैं, जिनकी बस्तियां बहुत दूर-दूर हैं, उनकी आबादी कम है, लेकिन उन्हें चार-पाच किलोमीटर और कभी-कभी दस से बीस किलोमीटर दूर तक जाना पड़ता है। उन लोगों के भी वोटिंग की व्यवस्था हो, इसलिए सचल मतदान केन्द्र की व्यवस्था की जाए। जो गांव का गरीब व्यक्ति है, जिसका मतदान स्थल 250-300 की आबादी की सीमा की वजह से दो-तीन या चार किलोमीटर दूर होता है, उनके गांव में एक अनिवार्य व्यवस्था कर दी जाए कि हर बस्ती में बूथ बनाए जाएं, हर बस्ती में मतदान केन्द्र बनाए जाएं, तभी यह व्यवस्था कामयाब हो पाएगी। इससे धनबल-बाहुबल का प्रयोग करके दलितों और वंचितों को वोटिंग से रोकने की जो व्यवस्था थी, उस पर अंकुश लगा है, लेकिन और भी कड़ा कानून बनाने की आवश्यकता है। मैं इस बिल का पुरजोर समर्थन करता हूं।
डॉ. विनय कुमार पाण्डेय (श्रावस्ती):महोदय, मैं आपकी अनुमति से इसी स्थान से बोलना चाहता हूं।
महोदय, एक अति महत्वपूर्ण अनिवार्य मतदान विधेयक जो माननीय जय प्रकाश अग्रवाल जी द्वारा इस सर्वोच्च सदन में प्रस्तुत किया गया है, उसे बल देने के लिए मैं खड़ा हुआ हूं और आपने मुझे इस पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं पीठ का और आपका आभार व्यक्त करता हूं।
मान्यवर, संविधान में मतदान स्वतंत्र भारत में एक मौलिक अधिकार है। यह सर्वोच्च पीठ, जिस पर आप विराजमान हैं, यह स्वतंत्र भारत की एक अरब से भी ऊपर आजाद हिन्दुस्तानियों के जन-गण-मन की सर्वोच्च पीठ है। लोकतंत्र और संविधान की संरक्षक भी यह सर्वोच्च पीठ है। लोकतंत्र का यह सर्वोच्च मंदिर हमारी स्वतंत्रता और हमारा संविधान न केवल पूरे विश्व में लोकतंत्र का द्योतक है, बल्कि पूजनीय मंदिर भी है। जिसे विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में एक अरब से ऊपर का जन-गण-मन अपना पूजनीय स्थल भी मानता है।
मान्यवर, वैदिक काल के भारतवर्ष की जो व्यवस्था रही है, वह भी गणतंत्र और प्रजातांत्रिक व्यवस्था रही है। यह अलग बात है कि कालान्तर में आकर हिन्दुस्तान को, भारत माता को गुलामी की बेड़ियों में जकड़ना पड़ा और गुलामी के सैंकड़ों वर्ष झेलने पड़े। आजादी की लड़ाई के बाद इस पवित्र और लोकतंत्र की सर्वोच्च पीठ का निर्माण करने के समय विश्व की आंखें लगी हुई थीं। इस सर्वोच्च और पवित्र मंदिर के निर्माण में हमारे एक अरब से भी ज्यादा हिन्दुस्तानियों के न जाने कितने पूर्वजों की शहादत के बारे में इतिहास के शिलालेख में उल्लेख विद्यमान है। उनके अतिरिक्त भी न जाने कितने ही हमारे पूर्वजों ने शहादत दी, जिनका इतिहास में कहीं उल्लेख नहीं है।
आज मैं एक अरब से भी अधिक हिन्दुस्तानियों की तरफ से, इस पवित्र मंदिर के अपने सभी माननीय सदस्यों की तरफ से, अपने निर्वाचन क्षेत्र की महान जनता की तरफ से लोकतंत्र की इस सर्वोच्च पीठ के मंदिर की आजादी की लड़ाई में शहीद हुए लोगों, स्वतंत्र भारत के निर्माण में अपनी आहुति देने वाले अपने पूर्वजों की शहादत को सच्ची श्रद्धांजलि देता हूं और प्रणाम करता हूं। मैं प्रणाम करता हूं पूरे विश्व की इस सर्वोच्च पीठ को और इस पवित्र मंदिर को। मैंने वैदिक काल की बातें कहीं, लेकिन आज आजादी के 62 वर्ष बाद भी इस सर्वोच्च मंदिर के, लोकतंत्र की इस सर्वोच्च पीठ के अंदर आजाद हिन्दुस्तान का जो गौरवमयी इतिहास रहा है, वहां अनिवार्य मतदान विधेयक पर चर्चा करनी पड़ रही है, तो यह कहीं न कहीं खेद का विषय है और विचारणीय विषय भी है हम आजाद हिन्दुस्तानियों के लिए।
मैं अपने पूर्व वक्ता और इस विधेयक को इस सर्वोच्च सदन में पेश करने वाले माननीय सदस्य श्री जय प्रकाश अग्रवाल जी से अपने को संबद्ध करना चाहूंगा।
सभापति महोदय : समय कम है इसलिए आप संक्षेप में अपनी बात कहें।
श्री जय प्रकाश अग्रवाल (उत्तर पूर्व दिल्ली): आधा घंटा समय और बढ़ा दें, क्योंकि बहुत महत्वपूर्ण विधेयक है।
सभापति महोदय: अभी वह समय नहीं आया है। मैं तो पांडेय जी को कह रहा हूं कि संक्षेप में अपनी बात कहें।
डॉ. विनय कुमार पाण्डेय : सभापति महोदय, मेरे से पहले पूर्व वक्ताओं अधीर रंजन चौधरी जी, सतपाल महाराज जी और अन्य माननीय सदस्यों ने यहां पर आंकड़े रखे, संविधान के अनुच्छेदों की चर्चा की। स्वतंत्र भारत के संविधान के नियमों और अनुच्छेदों पर यहां चर्चा हुई, मैं उससे अपने आपको समबद्ध करते हुए अपनी बात रखना चाहता हूं। उससे अपने आपको पूर्णतः सम्बद्ध करते हुए अपनी बात रखना चाहता हूं।
मान्यवर, आज बहुत क्षोभ के साथ, भारी मन से इस पीठ और महान सदन के समक्ष यह कहना पड़ रहा है कि “ बढ़ गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए, अब हिमालय से नयी गंगा निकलनी चाहिए।” आज इस महान सदन में हम 62 वर्षों की आजादी के बाद हम अनिवार्य मतदान पर चर्चा कर रहे हैं, इसलिए यह बात बर्बस दिल से निकली है।
मान्यवर, आज चर्चा का विषय यह है कि अनिवार्य मतदान में दंड का प्रावधान होना चाहिए या नहीं होना चाहिए। आज विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्रीय देश का कानून मंत्री यहां बैठा है, उसके समक्ष ये बातें हो रही हैं, यह बड़ी क्षोभ की बात है। पहले शिक्षा का स्तर बहुत ही कम था, न्यून था, जिसके तहत हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान की संरचना की, मतदान की व्यवस्था की तथा देश, काल और समय के अनुरूप उसमें परिवर्तनों की भी व्यवस्था की गयी। आज आजाद हिंदुस्तान में शिक्षा का स्तर बढ़ा है, यह हमारे लिए गर्व की बात है। परन्तु लोकतंत्रीय व्यवस्था में यह कहते हुए बहुत क्षोभ होता है कि जिस अशिक्षित, गरीब और गांव की बात हम करते हैं, जिस गरीबी और पिछड़ेपन की बात हम करते हैं और कहते हैं कि भारत गांव में बसता है, जहां शिक्षा का स्तर कम है, वहां तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में जागरुकता कुछ बढ़ी है और वहां के मतदान का प्रतिशत शिक्षित समाज और शहर में रहने वाले लोगों से ज्यादा है। यहां चर्चा हुई है कि मतदान का स्तर कम रहता है लेकिन आज भी अगर लोकतंत्र का झंडा ऊंचा है, आज भी अगर जन गण मन अधिनायक जिंदा है तो निश्चित रूप से उस समाज की देन है जो आज भी लोकतांत्रिक व्यवस्था और हिंदुस्तान के संविधान में अपनी पूर्ण आस्था रखते हैं।
मान्यवर, शिक्षित समाज के लोग जो अपने अधिकार की बात करते हैं, लेकिन अपने कर्तव्यों के प्रति उनसे कुछ न कुछ चूक हुई है, इसीलिए उनकी जवाबदेही और कर्तव्यपरायणता की तरफ भी यह व्यवस्था उंगली उठाती है। मान्यवर, त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में स्वर्गीय राजीव गांधी ने 18 वर्ष में मतदान का अधिकार दिया, यह हिंदुस्तान उनका आभारी है, आज का नौजवान उनका आभारी है। त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में हर वर्ष या हर दूसरे वर्ष कोई न कोई चुनाव होता ही रहता है। लेकिन बड़े खेद का विषय है कि आज भी हमारी मतदाता सूची त्रुटिपूर्ण है और हम उसे पूरा और सुदृढ़ नहीं कर पाए हैं।
MR. CHAIRMAN : Hon. Members, the extended time for the discussion on this Bill is over. I have two more speakers to speak on this Bill. If the House agrees, the time for this discussion may be extended by another one hour.
SOME HON. MEMBERS: Yes.
MR. CHAIRMAN: All right, the time on this discussion is extended by one hour.
Dr. Vinay Kumar Pandey to continue his speech.
डॉ. विनय कुमार पाण्डेय : सभापति महोदय, मैं आपको धन्यवाद करता हूं कि आप मुझे बोलने के लिए और समय दे रहे हैं। शिक्षित वर्ग में जागरुकता का लोप कहीं न कहीं अपनी कर्तव्यपरायणता की तरफ उंगली इंगित करती है। अगर हम एक उंगली दूसरे की तरफ उठाते हैं, अपने अधिकारों की तरफ उठाते हैं, तो उसी हाथ की चार उंगलियां हमारी स्वयं की तरफ उठती हैं कि हमें चूक कहां हुई है, शिक्षित समाज से कहां चूक हुई है, जिसने अपना डंका पूरे विश्व में बजाया है, चाहे प्रबंधन तंत्र की बात हो, चाहे टेक्नीकल शिक्षण की बात हो। आज हिंदुस्तान का शिक्षित समाज और हिंदुस्तान का दिमाग पूरी दुनिया में अपना डंका बजा रहा है।
मैं आपसे कहना चाहता हूं कि भारत का वोटर आई कार्ड त्रुटिपूर्ण है। मैंने श्री नंदन नीलेकणि जी को पढ़ा है। उससे मैं समझा हूं कि एक स्मार्ट कार्ड की व्यवस्था लागू हो रही है। हिंदुस्तान में लाइसेंस की व्यवस्था, आई कार्ड की व्यवस्था, सम्पत्ति का ब्यौरा या पैन कार्ड हो, बहुत कार्ड बन जाते हैं। मैं सदन में आपके माध्यम से सुझाव देना चाहता हूं कि जो स्मार्ट कार्ड बनाया जा रहा है, वह अपने आप में परिपूर्ण सिलिकोन चिप में बनाया जाए, जिसमें सम्पत्ति का ब्यौरा भी हो, पहचान पत्र भी हो, लाइसेंस भी हो, पैन कार्ड हो, हैल्थ कार्ड हो या इनवेस्टमेंट कार्ड हो, शिक्षा का कार्ड, रोजगार का कार्ड सभी कार्ड सिंगल सिलिकोन चिप में होना चाहिए। हमारी टेक्नोलोजी जिस स्तर पर पहुंच चुकी है, यह किया जा सकता है। जितना पैसा हम अलग-अलग कार्डों को बनाने में खर्च करते हैं, अगर उन्हें संकलित करके एक दिशा में कार्य करें, तो निश्चित रूप से सिंगल स्मार्ट कार्ड बनाया जा सकता है।
अनिवार्य मतदान की बात कही गई है, अगर सिंगल स्मार्ट कार्ड लागू हो जाएगा, तो आज हम इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन का हम यूज कर रहे हैं। इस मशीन को हम परिष्कृत करके, कई माननीय सदस्यों ने कहा, सतपाल महाराज जी ने भी कहा कि नौकरी के लिए या अन्य कार्य के कारण हमारा मतदाता बाहर है या बार्डर पर है, तो यह संभव नहीं है कि वह अपने मतदान केंद्र से वोट कर सके। उस दिशा में आगे बढ़ते हुए इस परिष्कृत वोटिंग मशीन में कहीं से भी वोट डालने की व्यवस्था की जा सकती है। श्री शैलेन्द्र जी कह रहे थे कि गांवों में जो पक्के भवन होते हैं, वही मतदान केंद्र होते हैं। विद्यालय के अलावा आंगनबाड़ी केंद्र, ग्राम सचिवालय, पंचायत भवन, सरकारी भवन आदि हैं, यहां हम इलेक्ट्रोनिक मशीन से वोटिंग की व्यवस्था निश्चित रूप से कर सकते हैं, इससे मतदान के प्रतिशत में निश्चित तौर पर बढ़ोतरी होगी। कई माननीय सदस्य बोल रहे थे, उन्हें यूपीए चेयरपरसन सोनिया गांधी जी का शुक्रिया करना चाहिए, जिनकी बदौलत इनकी बहुमत की सरकार उत्तर प्रदेश में आई है। अभी यह उस चुनाव में बोगस और प्रॉक्सी वोटिंग के बारे में बात कर रहे थे। अगर उस चुनाव में यूपीए चेयरपर्सन के दिशा-निर्देशन में यूपीए की सरकार ने वह व्यवस्था नहीं की होती तो निश्चित रूप से परिणाम कुछ और होता। इन्हें सच्चे हृदय से इस बात को मानना चाहिए।
सभापति महोदय, मैं एक अंतिम बात और कहना चाहता हूं। अभी हमारी बहन ने कहा कि उस गुजरात में जहां पानी के लिए इस सर्वोच्च सदन में चर्चा हुई हो, अनिवार्य मतदान के विषय पर चर्चा के दौरान हमारी बहन ने भारी हृदय से यह बात कही है कि जहां पानी के लिए जनजाति तरसती हो, जनजातीय व्यवस्था में रहने वाले लोग तरसते हों, वहां अनिवार्य मतदान पर दंड का प्रावधान किया जाना निंदनीय कार्य हैं, उसका मैं विरोध करता हूं। निश्चित रूप से इस लोकतंत्र में कहीं न कहीं इनकी नीतियों में कमी है, कहीं न कहीं इनकी व्यवस्था नाजीवादी और फासिस्टवादी है, जिसका परिणाम यह है कि आज अनिवार्य मतदान के गंभीर विषय पर लोकतंत्र के इस सर्वोच्च मंदिर में चर्चा हो रही है और इनकी उपस्थिति यह दर्शाती है कि इनकी कथनी और करनी में कितना अंतर है। ये खाली बैंचेज इस बात का द्योतक हैं।
मैं सिर्फ इतना और कहना चाहता हूं कि अनिवार्य मतदान में कहीं न कहीं अपने कर्तव्य का बोध होना चाहिए और जब स्वतंत्र भारत में हमें अपने कर्तव्य का बोध हो जायेगा, तभी हमारे पुरखों की शहादत कामयाब होगी और उनके द्वारा गुनगुनाया गया यह गीत ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा’ कामयाब होगा।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं।
श्री राजाराम पाल (अकबरपुर) : माननीय सभापति जी, माननीय सदस्य, श्री जे.पी.अग्रवाल द्वारा जो कम्पलसरी वोटिंग बिल सदन में लाया गया है, ऐसे गंभीर और महत्वपूर्ण विषय पर आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं। मैं कहना चाहता हूं कि इस देश को आजाद कराने वाले लोगों ने आजादी की लड़ाई में कुर्बानी देते समय एक सपना देखा था कि हमारी कुर्बानी के बाद इस देश की तस्वीर कैसी होगी। उन्होंने सोचा था कि आजाद भारत में हर हाथ को काम मिलेगा, हर खेत को पानी मिलेगा, अब कोई भूखा नहीं सोयेगा, अब कोई नंगा नहीं घूमेगा, अब कोई फुटपाथ पर नहीं सोयेगा, अब कोई दवा के अभाव में नहीं मरेगा और अब कोई अपने को असुरक्षित महसूस नहीं करेगा। जो मनुष्य की न्यूनतम जरूरतें हैं, वे न्यूनतम जरूरतें आजाद भारत के प्रत्येक नागरिक की पूरी हो जायेंगी और इसी उद्देश्य से संविधान निर्माताओं ने रानी और मेहतरानी की वोट की कीमत बराबर की थी। सबको वोटिंग का राइट दिया था। लेकिन दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आजादी के 63 सालों के बाद, साठवें गणतंत्र के बाद भी इस देश में 70-80 फीसदी लोग लोकतंत्र का अर्थ ही नहीं जानते। सौ में से देहात में साठ प्रतिशत लोग और शहरों में 75औ लोग वोटिंग में हिस्सा नहीं लेते। उनका मानना है कि हम वोट क्यों डाले, हमें क्या मिलेगा? नेता की जेब भरेगी, नेता का पेट भरेगा, नेता का घर भरेगा, परंतु हमें क्या मिलेगा। जिस देश में सौ में से साठ लोग वोट डालने के लिए नहीं जाते हों, वहां मिनिमम चार जगह वोट बंटता है। जिसे 11 वोट मिलते हैं, वह देश और प्रदेश की सत्ता में आ जाता है, एमपी या एमएलए बन जाता है। जिस देश में सौ में से 11 लोगों के मतों से सरकारें बनती हों, उसे मजबूत लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता है।
इसलिये संविधान निर्माता डा. अम्बेडकर ने कहा था कि देश में तमाम कानून बना दिये जाएं, किसी देश का कानून, किसी का संविधान कितना भी बढ़िया क्यों न हो, अगर लागू करने वाले की मंशा अच्छी नहीं होगी तो वह संविधान और कानून बेकार साबित होगा। अनिवार्य मताधिकार की व्यवस्था करने से पहले हमें सोचना होगा कि क्या अनिवार्य मताधिकार कानून के बाद वोटिंग का प्रतिशत बढ़ेगा? अगर नहीं बढ़ेगा तो और हम नया क्या कर सकते हैं? डा. अम्बेडकर ने कहा था कि हमने मताधिकार दे दिया है। तुम प्रधान से प्रधानमंत्री बना सकते हैं लेकिन जिसमें हिम्मत होगी, वह प्रधान या प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच ही जायेगा। डा. अम्बेडकर ने कहा था कि इससे सब का भला होने वाला नहीं है। सामाजिक आजादी के लिये और आर्थिक आजादी के बिना यह राजनैतिक आजादी अधूरी है। इस आर्थिक और सामाजिक आजादी के लिये हमें देश के लिये एक और लड़ाई लड़नी है लेकिन हमें मत का अधिकार दे दिया गया है औऱ इसके जरिये हमें सामाजिक और आर्थिक आजादी प्राप्त कर लेनी है। मैं कहना चाहता हूं कि प्रत्येक बालिग को मत देने के पीछे यह मंशा थी कि समूचे भारत में सभी बालिग लोगों को, चाहे वह पंचायत हो, विधानसभा हो या संसद हो उसमें सब की आम सहमति मानी जायेगी। इसलिये उन्होंने व्यवस्था दी थी कि भारत की सकल घरेलू आय वह आय होगी जिसमें प्रत्येक आदमी को न्यूनतम जरूरतें प्राप्त होंगी। आज भी जिसकी बात हो रही है कि फूड सिक्यूरिटी बिल लायेगा। तमाम चीजों पर कानून बनाते चले जा रहे हैं लेकिन मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि मताधिकार शतप्रतिशत बढ़े, लोकतंत्र मज़बूत हो, राष्ट्रीयता बढ़े। मत का प्रयोग 60औ करने नहीं जाता है तो उससे राष्ट्रीयता नहीं आ सकती है। आजादी से पहले राष्ट्रीयता थी जब पंजाब में कांटा गड़ता था तो उत्तर प्रदेश तलवे देखता था। इतनी संवेदना थी लेकिन आजादी के बाद जिस भारत में वसुधेव कुटुम्बकम की बात कही गई थी, उस भारत में भारत के प्रति सोच नहीं रही है, प्रदेश की सोच नहीं रही है। हमारी एक बहिन कह रही थी। यह बड़े दुख की बात है कि आज 63 साल की आजादी के बाद आप इस देश के लोगों को स्वच्छ जल मुहैया नहीं करा पाये हैं। इसलिये मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि केवल कानून बना देने से काम नहीं चलेगा। हमें जिम्मेदार बनाना होगा।
मैंने कहा था कि आप देश के प्रति, प्रदेश के प्रति, जिले के प्रति, तहसील के प्रति, ब्लाक के प्रति, गांव के प्रति, पड़ोसी के प्रति, खानदान के प्रति नहीं सोच रहे हैं। एक मां-बाप से पैदा सगे भाई के प्रति सोच नहीं रही है। मेरा भारत, मेरी बीवी, मेरे बच्चे से ज्यादा भारत नहीं बचा है। अगर यह स्थिति बनी रही तो इस राष्ट्र और समाज को टूटने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती है। अगर कोई रोक सकता है तो हमें फिर से चौपाल लगानी होगी। हमें फिर से अलाव जलाने होंगे। हमें फिर से संवाद करना होगा कि जिस देश में 63 साल की आजादी के बाद करोड़ों भूखे हों, नंगे हों, फुटपाथ पर हों, दवा के अभाव में मर रहे हों, असुरक्षित हों, अशिक्षित हों, वह भारत सारे जहां से अच्छा भारत नहीं कहा जा सकता है। सारे जहां से अच्छा भारत उस दिन होगा जिस दिन भारत में कोई भूखा नहीं सोयेगा, कोई आदमी नंगा नहीं घूमेगा, कोई आदमी मजबूर होकर फुटपाथ पर नहीं सोयेगा, कोई अंगूठा छाप नहीं रहेगा, कोई दवा के अभाव में नहीं मरेगा, कोई असुरक्षित नहीं रहेगा, उस दिन भारत को सारे जहां से अच्छा भारत माना जायेगा। इसलिये मैं कहना चाहता हूं कि माननीय जय प्रकाश अग्रवाल जी अनिवार्य मतदान के लिये जो विधेयक लाये हैं, हम निश्चित तौर पर उससे सहमत हैं। अगर इस आई-कार्ड को मल्टी परपज के लिए बना दिया जाये तो वोटिंग प्रतिशत बढ़ेगा, लेकिन इससे भी नहीं बढ़ेगा। हम लोगों ने, 14वीं लोकसभा में 110 मेंबर्स ने, जो सभी दलों के थे एक वोटर पेंशन वोटरशिप जैसी याचिका दाखिल की थी। उसमें सकल घरेलू उत्पाद से जो आय होगी, जो नेशनल इनकम होगी उसका आधा देश के विकास के लिए और आधे में वोटरशिप वोटर पेंशन जैसा कानून बनाकर, सीधे उनके खाते खुलवाकर, सीधे बैंकों में पैसे डालकर, उन्हें एक पहचान पत्र देकर, पहली तारीख में इस देश का वोटर जाये और अपनी इनकम का हिस्सा निकाले और रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा, सुरक्षा जैसी चीजें बिना बिचौलियों के खुद पूरी करे। मैं पूरे भरोसे के साथ कहना चाहता हूं कि सौ में से सौ प्रतिशत लोग वोट डालने के लिए जाएंगे। वे अपने को देश और समाज के प्रति जवाबदेह भी महसूस करेंगे। मैं आपके माध्यम से मांग करता हूं कि इस देश के लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए, वोटिंग प्रतिशत शत-प्रतिशत करने के लिए, राष्ट्रीयता बढ़ाने के लिए जो हमने तमाम चीजें वेलफेयर की दे रखी हैं, जो वास्तव में जरूरतमंद लोगों के पास नहीं पहुंच रही हैं, उन बिचौलियों का बिचौलियापन खत्म करने के लिए, भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए, सीधे वोटर इंसेंटिव देने के लिए वोटरशिप जैसा कानून बनाने का प्रावधान करेंगे तो निश्चित तौर पर वोट का प्रतिशत बढ़ेगा। लोकतंत्र मजबूत होगा तो राष्ट्र मजबूत होगा, लोग राष्ट्र के प्रति जवाबदेह होंगे। इसी के साथ मैं इस बिल का पुरजोर समर्थन करते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूं।
श्री प्रेमदास (इटावा): महोदय, जे.पी.अग्रवाल जी द्वारा प्रस्तुत अनिवार्य वोटर बिल पर चर्चा हो रही है। मैं आपसे कहना चाहूंगा कि आजादी के 62 साल के बाद भी आज गांव पिछड़े हुए हैं। वहां गरीबी है, लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं, वहां दवा के लिए व्यवस्था नहीं है, सिंचाई की व्यवस्था नहीं है। हमारे सम्मानित मेंबर जे.पी.अग्रवाल जी ने यह कहा कि अनिवार्य वोटर, जब हर व्यक्ति को वोट डालने का अधिकार है तो लोग वोट डालने क्यों नहीं जाते हैं? इसके पीछे कोई न कोई वजह होगी। मैं कहना चाहूंगा कि आज बहुत अनियमितताएं हैं। यह बजट करीब 11 लाख करोड़ रूपए का पास हुआ है, लेकिन गांव तक कुछ नहीं है। हमारे तमाम साथियों ने कहा है कि लोग नेताओं से गाली देकर बात करने लगे हैं। ऐसा क्यों है, इस पर सरकार को और हमें, आपको सोचना है? मैं कहना चाहूंगा कि हिन्दुस्तान सबसे बड़ा लोकतात्रिक देश है। अभी राजाराम पाल जी बोल रहे थे कि हमारे प्रति लोगों की धारणा बनती जा रही है कि हम अर्थ में बढ़ते जा रहे हैं, हर जगह अर्थ है, राजनीति में अर्थ है, बिजनेस में तो अर्थ होता ही है। हमारा पूरा देश कृषि से चल रहा है, फिर भी हम कृषि के मामले में पीछे हैं। कृषि के लिए कुछ नहीं है। मैं इस बिल का समर्थन करता हूं। जब यह इतना बड़ा लोकतात्रिक देश है और इसमें साठ, सत्तर, अस्सी प्रतिशत वोट नहीं पड़ता है तो इसके लिए हम और आप जिम्मेदार हैं। मैं कहना चाहूंगा कि हर आदमी को वोट डालना चाहिए, चाहे वह किसी को भी वोट दे, लेकिन वोट जरूर देना चाहिए। गांव में बड़े लालच से, बहुत मेहनत से हम लोग वोट डलवा पाते हैं, लेकिन उसमें अनियमितताएं भी हैं। पंचायत वोटर लिस्ट अलग है, विधान सभा की वोटर लिस्ट अलग है, लोक सभा की वोटर लिस्ट अलग है। सरकारों को इस बारे में सोचना चाहिए कि जब निर्वाचन प्रक्रिया इतनी अच्छी है, तो कम से कम एक वोटर लिस्ट होनी चाहिए। जब तक ये अनियमितताएं रहेंगी, गांव में जब वोट पड़ते हैं तो एक हजार वोट हैं, पांच सौ वोट हैं तो उसके लिए वे लाइन लगाते हैं।
दो घंटे, चार घंटे वोट देने के लिए गांव का आदमी खड़ा नहीं हो सकता है। जब उससे कहा जाता है कि वोट डाल कर आओ, तब वह कहता है कि वोट डालने से हमें क्या मिलेगा। इसलिए इस प्रक्रिया को भी सरल करने की आवश्यकता है। समय की व्यवस्था, वोट डालने के लिए सहूलियत वोटर को देनी पड़ेगी और गांव तक लोकतंत्र का असली चेहरा पहुंचाने के लिए हमें और आपको प्रयास करना पड़ेगा।
श्री जे.पी. अग्रवाल जी ने जो प्रस्ताव रखा है, मैं उसका पूरा समर्थन करता हूं। यह प्रयास करना बहुत जरूरी है, अन्यथा वोट का प्रतिशत और कम होता जाएगा। यह सोचने का विषय है।
*SHRI J.M. AARON RASHID (THENI): Mr. Chairman, Sir, I thank you for giving me an opportunity to speak on the Compulsory Voting Bill moved in this august House by my esteemed colleague Shri J.P. Agarwal. I extend my support to this Private Members’ Bill moved by Shri J.P. Agarwal and I would like to second the same.
I find people living in the remotest part of the country, in distant hamlets and villages do not cast their votes in big number. When they are forced to walk considerably long distances, they do not prefer to do that and fail to cast their vote. It is not easy to traverse 5 kms. or longer stretches of 10 kms. or more in the hilly terrains walking through hilly tracts. My constituency has got so many hillside villages and remote villages in both Periyakulam and Theni district area. There are 205 small villages and hamlets situated on the hilltops in my constituency. A Polling Booth is to be set up even in a place that has got a mere 250 voters. Police personnel and officials on election duty must be sent to every booth to ensure that all our people cast their votes during the election. Only then, we would have succeeded in establishing a sense of participation in the minds of our people when they take part in the electoral process which is like a festival of democracy. We must instill confidence in the minds of the people and bring about a spirit of oneness and togetherness thereby we must create hope in their hearts towards democracy.
Some of our youth today go astray as misguided youth and go away from the path of democracy and embrace extreme organizations like naxal and maoist movements. I am very particular about hilly areas because this modern day menace in the form of naxalism and Maoism is more patronized in the hilly regions of our country. This venom is spreading fast. Such students and youth must be brought to the mainstream in the path of democracy. We must give them hope for democracy and we must encourage them to participate in our electoral process casting their votes without fail. I think my good friend Shri J.P. Agarwal has thought about it and brought forth this Bill as a good move.
In our election we find many of our Government officials are not casting their votes. We must ensure that all the employees of both the Central and State Governments exercise their franchise during the elections. If they do not vote, considering it as a democratic duty, then certain disincentives must be there. There must be cut in the ration, there must be cut in increment and curtailment in promotion. Many police officials do not vote, many staff in the rural areas fail to vote. Hence it must be made the primary duty on the part of the Government employees to vote compulsorily. We must effectively monitor as that will have its salutary effect on the remaining part of the population.
Wherever we have Reserved constituencies, we must encourage Independent candidates to contest. This is my personal view. For instance, Tenkasi is a neighbouring constituency. I have many of my kith and kin there. Since it has got many hillside villages, road facility is not there in an adequate fashion. Even after 60 years of Independence, there are considerable number of villages that have not seen metal roads. Only when a person from the majority community contests, most often the Government extends all the basic facilities to that constituency. In the city of Chennai, in the Assembly constituencies like Mylapore, T. Nagar and Triplicane, though two of them are Reserved constituencies consisting of majority community people in good number, we find the marginalized people and people from the Scheduled Caste communities come in good number to cast their votes. This augurs well for our democracy. Then only this inclusion of people, that has been reiterated by our leaders like Rajiv Gandhi and Indira Gandhi and now Sonia Gandhi, will become a reality. It is the visionary step of our late lamented leader Rajiv Gandhi to have brought down the voting age to 18. This is to ensure that youth and students are tempered to uphold democracy and begin to cast their vote when they are still young. He won them the right to vote in their teens. We must preserve the spirit of democracy by way of encouraging more of Independents to contest in Reserved constituencies. Rotating the constituencies ensures the spread of true democratic spirit. It should not be like a candidate from a majority community alone shall stand a chance to win an election from a constituency full of such community people in the electorate. Even the minorities should be able to contest and win the votes of the majority. This will augur well for the democracy.
I hail from a minority community and I represent a constituency that has got the electorate from the majority community living in majority. Democratic spirit helps us to rise above the caste and community. Theni Lok Sabha Constituency is not dominated by the minority community like that of mine. People belonging to major religion live in majority there. But still, the people of my constituency living there perform their democratic duty rising above caste and communal lines. I would like to thank the electorate of my constituency who have elected me though I hail from a minority community. It only vouchsafes their spirit of oneness, togetherness and democracy participating in the election which is like a democratic festival. No nation was raised on caste lines. No nation can remain united just because same community of people live there. There could not have been two Pakistans, two Germanys and two Vietnams if race and religion are to decide the unity of a country. But it is only the democratic spirit that can keep a country united. The spirit of democracy inculcated in us by Mahatma Gandhi and later on by Shrimati Indira Gandhi and Shri Rajiv Gandhi and now by Shrimati Sonia Gandhi help us to rise above caste and community and uphold the democracy with a spirit of oneness and brotherhood.
People living in the remotest part of the country like hilly areas must be given enough of care and attention. Such people living in forest areas are vacated without prior notice. They must be given priority in our governance. They are deprived of their voting rights to elect their democratic representatives. We must create a conducive atmosphere. We must facilitate them to cast their votes wherever they live.
My esteemed colleague Shri J.P. Agarwal has moved this Bill with a visionary approach to ensure that all the people participate in the election making use of their democratic rights. Only then people will have the level of confidence increase, they will have more faith and confidence in democracy and the nationality. It is only people who have come from the Congress background can think of such a move to include all the people in the ambit of democracy.
Shri Agarwal wants to have one booth for every 500 metres. But I feel it is enough to have one booth per kilometer because in my constituency, I find only 5 booths for a vast stretch of 32 kms. In the hill areas in my constituency, there are only 60 booths. For instance, Vellimalai which is 18 kms. atop the hills, has got a booth sufficiently kept apart. They have to walk 5 kms. and more to cast their vote. That is why they fall a prey to certain electoral malpractices. This must be checked. In order to avoid money changing hands during such time, we must ensure that more booths are set up to cover almost the entire population thereby involving all our people in the democratic exercise.
This Bill has been brought with a spirit of nationalism by a Congress Member. Our Congress Party headed by Shrimati Sonia Gandhi, the Chairperson of the United Progressive Alliance accords greater importance and prominence to youth. Our young Lieutenant Shri Rahul Gandhi extols the youth to come forward to participate in the process of democracy. More and more of people participating in the elections and casting their vote without fail in the hustings which are like festival of democracy will strengthen our spirit of togetherness and unity.
Hence, I, once again, congratulate my esteemed colleague Shri J.P. Agarwal who have brought this Compulsory Voting Bill in this august House. Extending my support, once again, to this move, let me conclude.
श्री विजय बहादुर सिंह (हमीरपुर):सभापति महोदय, मुझे बोलने का समय देने के लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। मैं इस विषय पर ज्यादा समय नहीं लूंगा, क्योंकि इस विधेयक का क्या रिजल्ट होने वाला है, यह मुझे मालूम है। मैं आपका ध्यान सिर्फ दो बातों की तरफ आकर्षित करना चाहता हूं। अग्रवाल साहब ने जो विधेयक प्रस्तुत किया है, इसका समर्थन करते हुए, मैं इसमें दो बातें एड करना चाहता हूं। इसकी फिलॉसाफी आप देखें। भारत के संविधान के प्रिएम्बल में जो लिखा है, अगर आप इजाजत दें, तो मैं पढ़ना चाहता हूं-
“We, the people of India, having solemnly resolve to constitute into a sovereign, socialist, secular, democratic Republic and to secure to all citizens…” The emphasis is on `all citizens’. हर नागरिक को यह अधिकार दिया गया है। दूसरी बात जो कही गई है, वह मैं पढ़कर सुनाना चाहता हूं। समय के कारण मैं स्किप कर रहा हूं- “Fraternity, assuring dignity of the individuals.” How this direction of the Preamble `to secure to all its citizens’ can be achieved? यह कांस्टीटय़ूशन का प्रिएम्बल है, मैंडेट है। यह एक प्रकार से डायरैक्टिव प्रिंसिपल्स की ओर जा रहा है। सवाल इस बात का है कि अगर 30 और 35 परसेंट वोटिंग होती है, तो how this direction of the Preamble `to secure to all its citizens’ can be achieved?
MR. CHAIRMAN : Hon. Members, we started the Private Members’ Business at 4 p.m. Time allotted is two and a half hours. So, if the House agrees, I am extending the time of the House till 6.30 p.m. श्री विजय बहादुर सिंह : मैं इस पाइंट पर था कि प्रीएम्बल में लिखा है कि “Secure to all citizens dignity of the individual”.
सभापति महोदय, इस वन वोट के राइट के ऑथर या जन्मदाता डॉ. भीमराव अम्बेडकर थे, क्योंकि जो उनका एजूकेशन कैरीयर था, जब उन्होंने सब यातनाएं देखीं, तो हमें मालूम है कि पुरानी भाजपा की सरकार भी केवल एक वोट से उलट गई थी। यह कितनी गम्भीर बात है। हम लोग कहते हैं और मैं आपकी इजाजत से कहना चाहता हूं कि अब जो राजा है, वह रानी के पेट से न निकल कर, बैलट बॉक्स से निकलता है। वोट की इतनी ज्यादा पॉवर है कि कोबाल्ट भी इसके मुकाबले में पीछे है।
सभापति महोदय, जिस टॉपिक पर मैं वास्तव में आना चाहता था, उसके बारे में मैं कहना चाहता हूं, माननीय लॉ मिनिस्टर साहब बैठे हुए हैं, यह रेस्पांसिबिलिटी इलैक्शन कमीशन की है। लगातार इलैक्शन कमीशन आते रहे, बदलते रहे, वे अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहे कि इलैक्शन कमीशन का एक मैम्बर होगा या दो मैम्बर होंगे, पूरी लड़ाई हम लोगों ने देखी। अगर कांस्टीटय़ूशन का पार्ट 15 देखा जाए, तो उसमें एक आर्टीकल 324 है। मैं उसकी एक लाइन पढ़ना चाहता हूं।
Article 324 says :
“Superintendence, direction and control of elections to be vested in the Election Commission.” The entire right of superintendence, direction and control has given to the Election Commission. हमें अफसोस है कि इलैक्शन कमीशन ने अपने अधिकारों पर तो बहुत ध्यान दिया, लेकिन उन्होंने सुपरिंटेंडेंस के लिए प्रयास क्यों नहीं किया कि जो मैजोरिटी या इलैक्ट्रोरल रोल 100 में है, उस पर केयर करे? चूंकि वे इस पृष्ठभूमि में फेल हो गए हैं, इसलिए हमारे अग्रवाल साहब ने जो यह प्रयास किया है, यह सराहनीय है।
सभापति महोदय, इसके बाद मैं बताना चाहता हूं कि पूरी पार्लियामेंट क्या है, यदि भारत की जनता 120 करोड़ है, तो इतनी संख्या में तो वह यहां बैठ नहीं सकती, रिप्रजेंटेटिव डैमोक्रेसी में जो डिसकशन हुआ है, कांस्टीटय़ूशन असैम्बली में एज ए लॉयर जो हमने कोट किया है, वह है कि भारत रिप्रजेंट हो रहा है सांसदों और विधायकों से। यह कैसा रिप्रजेंटेशन है जो 30 या 35 परसेंट से हो रहा है? इसे बहुत गम्भीरता से लेना है। गम्भीरता से इसलिए लेना चाहिए, क्योंकि आजकल क्या हो रहा है, नॉर्थ इंडिया में और अब तो साउथ इंडिया में भी कास्ट का वायरस, रिलीजन का वायरस चल रहा है। लोग कहते हैं कि मध्य प्रदेश काऊ बैल्ट है, यादव बैल्ट है। अगर 100 परसेंट वोटिंग हो, अगर सब लोग वोट डालें, तो ऑटोमेटीकली यह जातिवाद, रिलीजन और अन्य बुराइयां समाप्त हो जाएंगी।
महोदय, अग्रवाल साहब ने जो फूड फॉर थॉट दिया है, इसके लिए मैं उन्हें फिर से मुबारकवाद देना चाहता हूं। इन्होंने बहुजन समाज ही नहीं, सर्वजन समाज और सर्वजन हिताय की बात कही है और हमें लग रहा है कि अग्रवाल साहब हमारी फिलॉसाफी से आकर्षित हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एक जजमेंट दिया है, एक बहुत बड़ा फूड एडल्ट्रेशन हुआ तो उस पर एक हजार रुपये का जुर्माना कर दिया, जस्टिस कृष्णा अय्यर ने लिखा है: The Madras High Court has erred, by the side of leniency, by a flee or by a fine. बल्कि यह जो 2-2 सौ या 500 रुपये लिखा है, यह बहुत कम है। मैं तो चाहूंगा कि जो वोट न दे, उसको जो पनिशमेंट दिया जाये, उसको थोड़ा और बढ़ाइये, तो डैमोक्रेसी में रिप्रेजेण्टेशन ज्यादा हो जायेगा। इसीलिए मैं छोटे राज्यों के भी पर्सनली खिलाफ था, क्योंकि बहुत सी मैल प्रैक्टिसेज़ का इससे जन्म होता है। जब मैजोरिटी बोलती है, जब पांच लोग बोलते हैं तो लोग कहते हैं कि भगवान बोलते हैं। उसकी एक बहुत बढ़िया कहावत है, उसे पंडित जी बताएंगे। वे पंच-परमेश्वर हैं। जब पंडित जी ने इसे आदि काल से एडॉप्ट किया तो हमने सोचा कि इसमें कुछ है, यह भगवान राम से आगे बढ़ेगा।
मैं अपनी बात ज्यादा न कहकर यही कहना चाहता हूं कि यह जो विधेयक है, इसको गम्भीरतापूर्वक लिया जाये। अगर यह विधेयक प्राइवेट मैम्बर्स बिल न होकर यू.पी.ए. सरकार से आता तो बहुत अच्छा होता, लेकिन यू.पी.ए. सरकार वूमेन रिजर्वेशन बिल पर एक्सरसाइज़ इन फ्यूटेलिटी न करे। मैं दोनों हाथों से, अपने दिल और दिमाग से इस बिल का पूरी तरह से समर्थन कर रहा हूं और फिर संक्षेप में कहना चाहता हूं कि In the Preamble of the Constitution, the dignity of the individual is mentioned and article 326 of the Constitution provides the Election Commission’s power of direction and superintendence, इस लाइन पर बहुत गम्भीरतापूर्वक सोचना चाहिए। हमारे जो लॉ मिनिस्टर हैं, यह तो हमारा सौभाग्य है, मैंने 35 साल से वकालत की, लेकिन ए.के. सेन के बाद इतने विद्वान हमें लॉ मिनिस्टर मिले हैं। हम उनसे यह अर्ज करना चाहते हैं कि वे इस पर सोचें और सोचने के बाद कोई रास्ता निकालें तो बड़े भारी डैमोक्रेटिक सैट अप में इनकी सर्विस होगी। आस्ट्रेलिया में अगर कोई वोट न दे तो 100 डॉलर जुर्माना हो रहा है, इसीलिए मैं इसे चाहता हूं। यह तो हमारी फिलोसॉफी है कि सब लोग अगर पहुंचेंगे तो प्रजातंत्र बढ़िया बनेगा। मैं इस बात के लिए अग्रवाल साहब को धन्यवाद देता हूं और पुनः कहना चाहता हूं कि वे जो बिल लाये हैं, वह बहुत अच्छा बिल है।
MR. CHAIRMAN : आप बोल चुके हैं। As an exception and request made by Shri Lal Singh, I allow Shri Lal Singh to speak only for five minutes.
चौधरी लाल सिंह (उधमपुर):सभापति जी, आप बड़े दयालु हैं, बड़े मेहरबान हैं। आप हमें बहुत आशीर्वाद देते हैं। आप पांच मिनट को तीन बार जरब कर देना, बाकी सब ठीक है।
मेरी जनाब के माध्यम से विनती है कि अग्रवाल साहब ने जो कम्पलसरी वोट की बात की है, मैं यह कहना चाहूंगा कि यह बहुत अच्छी सोच है, तजुर्बे की बात है, एक्सपीरिएंस का सवाल है। सारे पार्लियामेंटेरियंस अच्छी तरह से जानते हैं, हर बन्दा जानता है कि कितनी तकलीफें वोटर्स को होती हैं, किस तरह से वोट पड़ते हैं और किस तरीके से सरकारें बनती हैं। इसमें थोड़ी सी बात करने का मसला है। मैं यह कहना चाहता हूं कि सबसे महत्वपूर्ण बात आप देखें कि जो देश का इलैक्शन कमीशनर है, उसको कभी पूछें कि तूने और तेरी घरवाली ने कभी वोट डाला है। मैं ईमानदारी से कह रहा हूं और उसके बाद आप उसके नीचे वाले बन्दे से पूछें, जिसको रिटर्निंग आफिसर कहते हैं, उससे कभी पूछें कि तूने कभी वोट डाला है, कभी प्रीज़ाइडिंग आफिसर से पूछें कि तूने वोट डाला है। मैं हैरान हूं कि इस डैमोक्रेटिक सिस्टम को चलाने के लिए अनडैमोक्रेटिक तरीके जो एडॉप्ट किये हैं, इनको चेंज करना पड़ेगा।
आप मेरी बात सुन लें, आपने अपनी बात बोल ली। मेरे कहने का मकसद यह है कि जब मैं एक्सपीरिएंस से नहीं गुजरा हूं, जब मैं तजुर्बे से नहीं गुजरा हूं, जैसे आप गुजरे हैं, जैसे चेयरमैन साहब गुजरे हैं, ये लोग गुजरे हैं क्या? वोटर को इन लोगों की तरफ से कितना परेशान किया जाता है, वह आप सोच भी नहीं सकते। कभी उसकी वोटर लिस्ट देखी, वह वोट डालने जाता है तो उसको कहता है कि तेरा वोट इधर नहीं है, तेरा वोट उधर है। Parliamentarians know it very well इसके बाद वह इधर से उधर चला जाता है। आपके प्लेन इलाकों में तो इधर का उधर चला गया, लेकिन मेरे पहाड़ी इलाके का बंदा चार किलोमीटर उतरकर आया, फिर तीन किलोमीटर उसको कहीं और चढ़ा दिया गया, फिर उधर जब वह पहुंचा तब समय हो रहा है, फिर उधर कहा गया कि आपका नाम इधर भी नहीं है। इस तरह से घूमते-फिरते वोटर की जो हालत बनती है, उसके बाद वे वापस चले जाते हैं। लोग कहते हैं कि इतने प्रतिशत वोट पड़ रहे हैं। पर्सेंटेज आफ वोट कम क्यों हो रहा है? यह गलत तरीके की वजह हो रहा है। आप एक बंदे की इज्जत ही नहीं करते, जब आप उसकी रेस्पेक्ट नहीं करते, तो वह वोट डालने क्यों जाएगा?
दूसरी बात, उसका नाम लिखा है, उसके नाम का एक वर्ड ए, बी, सी या क, ख, ग किसी वर्ड में अगर थोड़ी सी भी गलती है, आजकल अगर एसएमएस करते हैं, तो वाईओयू नहीं लिखते, यू लिखते हैं, उसमें कोई गलती नहीं है, वाईओयूआर की जगह यूआर लिखते हैं, तो कोई गलती नहीं, लेकिन जब वोट डालने जाता है, तो उसके नाम में गलती क्यों होती है?
तीसरी बात, मैं कहना चाहूंगा कि अभी वोटर कार्ड बनने का कोई सीजन नहीं है। हम यहां आ गए हैं, तो लगातार हर वर्ष वोटर कार्ड क्यों नहीं बनते हैं? इसके लिए लगातार कांटीन्युअस प्रोसेस क्यों नहीं है। जब बंदा 18 वर्ष का हो जाता है, उसका वोट उस दिन बनना चाहिए। वह इलेक्शन के दिनों में ही क्यों बनता है? क्यों गलत समय में ही बनता है? ये बातें सोचने की हैं। ये गलत चीजें गलत पालिसी की वजह से हैं। जो पालिसी मेकर हैं, वह हम हैं, लेकिन वह बन कोई और गया है। उसको सुधारने की जरूरत है। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि जो दो डिग्रियां आपने आईएएस और आईपीएस की हैं, इन्हें आपने क्यों रखा है? अंग्रेजों ने हिंदुस्तानियों का खून निचोड़ने के लिए ये बनायी थीं। आज उसकी जरूरत नहीं है। इन सब चीजों को खत्म करो। मेरी जनाब से विनती है, न बंदा एक्सपर्ट है, न उसने पांच साल इंजीनियरिंग की, न लॉ किया, न उसने डिग्री की, न कोई और डिग्री की, बस एक इंटरव्यू दिया तो वह हमारा आफीसर बन गया। वह आफीसर बन गया तो उसको क्या पता कि वोट क्या चीज है? चौधरी लाल सिंह को पता है कि वोट क्या चीज है? मैं जानता हूं। हम इलेक्शन के दिनों में जब रात में सोते हैं, तो कई बार हाथ में चुन्नी बांध लेते हैं कि कहीं सपने में वोटर न आ जाए। ...( व्यवधान) सपने में वोटर आ जाए, तो वह यह न कहे कि इस बंदे ने हाथ नहीं जोड़ा हुआ है। आप हमारी हालत देखें। मैं बताना चाहता हूं कि इस सिस्टम में कितनी गिरावट आयी है। कितने लोग शराब के धंधे में हैं, उन दिनों दुकानें खुली है, सब जगह बहुत चेकिंग है। इलेक्शन कमीशन ने बड़ा भारी ड्रामा किया हुआ है। शराब ट्रकों के ट्रक आ रही है और पैसा धड़ाधड़ खर्च होता है और जिसने कभी मीट नहीं देखा वह मच्छी तलकर खा रहा है। मुझे बताइए कि यह कौन सा वोट पड़ रहा है? अग्रवाल साहब, जितने लोग क्वालीफाइड हैं ...( व्यवधान) मेरी बात सुनिए। जनाब मैं आपके मन की बात कह रहा हूं। मुझे पता है।
मैं अमीर आदमी की हालत सुनाता हूं। एक क्वालीफाइड और पढ़े-लिखे व्यक्ति की बात सुनाता हूं। वह बहुत पढ़ा-लिखा है, उसने बड़ी क्वालिफिकेशन ली है, लेकिन सबसे कम अगर वोट कोई डालता है, तो वह ही डालता है। जो पढ़ा-लिखा है, वह वोट नहीं डालता और बाहर बैठकर बकवास करता है कि ये पालिटिशियन गलत हैं, ये फलाना गलत है, ये गलत लोग हैं तो वह वोट डालकर ठीक क्यों नहीं करता है? जब तू वोट ही नहीं डालता, तो तुझे किसी को क्रिटिसाइज करने का क्या अधिकार है? पालिटिशियन गलत हैं, यह कहता है, लेकिन जो वोट नहीं डालता, जिन लोगों ने इस देश के लिए कुर्बानी दी थी, एक-एक वोट के लिए लोग मरे हैं। इस देश को फ्रीडम दिलवाई, इस देश को आजादी दिलवाई, अगर कोई डीसी की कुर्सी पर बैठा है, तो सिर्फ उनकी वजह से बैठा है, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरू सुखदेव, नेता जी सुभाष चंद्र बोस, नेहरू, गांधी, पटेल इन लोगों की मेहरबानी से वहां वह बैठा है, अदरवाइज क्या ये लोग इन कुर्सियों के काबिल हैं? ये कुर्सियों पर बैठकर हिंदुस्तान के कांस्टीच्यूशन में वोट डालने नहीं जाते। इसका कारण क्या है? इन्होंने ठीक कहा है, जो अनपढ़ है, जो नासमझ है, जो कुछ नहीं जानता है, वह गलती करे, कोई बात नहीं, लेकिन यहां पढ़ा-लिखा गलती कर रहा है। जब गरीब आदमी लाइन में खड़ा होता है, तो वहां धूप है, बारिश है, लेकिन कोई इंतजाम नहीं है। इनको वहां जाना है, जहां आफीसर छाता लेकर चेक करने आ रहा है। उसके लिए छाता है। 10-20 पुलिस वाले हैं। अगर कोई व्यक्ति लाइन में थोड़ा सा टेढ़ा खड़ा होता है तो वह डंडा चला देता है कि इसे मारो। मुझे बताइए कि वे क्यों वोट डालेंगे? क्या लाठी खाने के लिए, मार खाने के लिए, धक्के खाने के लिए, बेइज्जत होने के लिए वोट डालेंगे? इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि जो कमियां हैं, उन्हें सुधारना पड़ेगा। अगर वोट डालना कम्पलसरी हो तो सबसे पहले उन लोगों के लिए हो जो अमीर हैं, पढ़े-लिखे हैं, क्वालीफाइड हैं, उसके बाद बाकी लोगों को लिए हो। ये सारे लोग गरीब लोगों से बने हैं।...( व्यवधान) मेरी विनती है कि बड़ा आदमी, जिसकी मैं बात कर रहा था, उस दिन आता है जब चौधरी लाल सिंह, मैम्बर ऑफ पार्लियामैंट कभी मंत्री बन गया, लम्बी सी गाड़ी में आता है। ड्राई फ्रूट, बर्फी का स्पैशल डिब्बा लेकर ऐसा आता है जैसे सगन लेकर आ रहा हो। उसकी गाड़ी डिब्बा लेकर सीधे अंदर घुस जाती है।...( व्यवधान) गरीब आदमी जिसने बनाया, वह दो रुपये का हार लेकर खड़ा होता है। मेरी विनती है कि उस गरीब की जो हालत होती है, जिसने वोट नहीं डाला, उसका इंट्रोडक्शन पहले दिन ही हो गया। मेरी सबमिशन है कि कम्पलसरी वोट करवाइए लेकिन पढ़े-लिखे, क्वालीफाइड और अमीरों के लिए करवाइए। जय हिन्द।
SHRI B. MAHTAB (CUTTACK): Mr. Chairman, sir, my only concern is that the opportunity of taking up the next Bill of Shri Adhir Chowdhury should not be taken away because it has already been placed before the House twice and it cannot come for the third time in the Bulletin.
MR. CHAIRMAN : I take your point. Please take your seat.
श्री जय प्रकाश अग्रवाल : मैं यह नहीं कहता कि वह नहीं होना चाहिए, लेकिन इतनी लम्बी बहस के बाद हम मंत्री जी की बात सुनेंगे और मैं भी बोलूंगा।...( व्यवधान)
श्री बदरुद्दीन अजमल (धुबरी): सभापति महोदय, मैं सबसे पहले अपने भाई श्री जय प्रकाश अग्रवाल, जो प्रस्ताव लाए हैं, सिर्फ इसलिए कि इस प्रस्ताव को जय प्रकाश अग्रवाल जी लाए हैं, मैं इसका सौ प्रतिशत समर्थन करता हूं। यह आज की बहुत सख्त जरूरत है, लेकिन मेरा सिर्फ इतना कहना है, जिसकी तरफ सदन के सारे सदस्यों ने ध्यान दिलाया है, सबसे बड़ी बात यह है कि विश्वास की कमी हो रही है। आज लोगों की नेताओं पर, हमारे ऊपर, हमारी व्यवस्था के ऊपर से आस्था उठती जा रही है। दिन-ब-दिन लोग वह देख रहे हैं जो हम किताबों में देख रहे हैं। जो हमने अपने बड़ों के बारे में सुना और जो संविधान में देखा, वह आज प्रैक्टिकल लाइफ में कहीं नहीं मिल रहा है। कहां खो गईं हमारी वे कद्रें, क्या हो गया है हमारे लोगों को? ऐसा लगता है जैसे हम इंसान के चेहरे हैं लेकिन हमारे अंदर एक धड़कता हुआ दिल भी नहीं है। ऐसी आंखें नहीं हैं जिनके अंदर गरीबी को देखकर आंसू निकल पड़ें। मेरी बहन ने पानी भरने वालों की जो बात कही, वह मंजर जब आदमी टेलीविजन में देखता है, उसके घड़े में कितना पानी है, मुझे नहीं मालूम, लेकिन उससे ज्यादा उसकी आंख से पानी निकलना चाहिए, मगर ऐसा नहीं होता। आज हिन्दुस्तान में 60 साल के बाद 5-5 किलोमीटर दूर से पहाड़ों में बहनें पानी लाती हैं। लोगों को इस व्यवस्था के ऊपर कैसे भरोसा होगा? कैसे इस देश की तरक्की के नारे पर हम भरोसा कर लेंगे? अभी मेरे भाई लाल जी ने जो बात कही, मैं आदर के साथ कहना चाहता हूं, आपने देखा होगा कि शहर में 40 प्रतिशत से ज्यादा लोग वोट नहीं डालते। शहर में पढ़े-लिखे लोग होते हैं, वे पहले से फिल्मों के प्रोग्राम बनाते हैं , कैसेट मंगवाकर रखते हैं और उस दिन हॉलिडे मनाते हैं। लेकिन क्या उनको नहीं मालूम कि हमारा भारत का संविधान क्या कहता है?
आज के दिन के वोट की हमारी क्या हैसियत है? क्या पूरी दुनिया में हमारे मुल्क का वकार जाने वाला है? आज हमारे वोटर्स कितने निकल कर आ रहे हैं? इसका बहुत बड़ा संबंध है, लेकिन गांव के जो वोटर्स हैं, वे हकीकत में 70 से 80 परसेंट तक वोट देते हैं। वे आज टेलीविजन देखते हैं। जब वे देखते हैं कि जो लोग 40 परसेंट भी वोट नहीं देते हैं, जबकि हम 80 और 90 परसेंट वोट देते हैं। लेकिन जब सरकार के फायदे की चीजें आती हैं, तो वे 40 परसेंट वाले ही नहीं, बल्कि जो एयरकंडीशनर में सोते रहते हैं, टेलीविजन देखते हैं, वे सबसे आगे रहते हैं और उन्हें 90 परसेंट सुविधाएं मिलती हैं। जो 90 परसेंट वोट देते हैं, वे बेचारे महरूम रहते हैं। कैसे इस संस्था के ऊपर लोगों को भरोसा होगा? कैसे लोग भरकर आयेंगे?
अभी रामपाल जी ने बड़े अच्छे सुझाव दिये कि अगर कोई ऐसा सुझाव नहीं निकलेगा, डायरेक्ट वोटर को फायदा नहीं पहुंचेगा, गांवों में सड़कें नहीं बनेंगी, तब तक कुछ नहीं होगा। आज हम बीपीएल की बात करते हैं। बीपीएल घराने के लोगों के सामने आज मसर्डीज कारें और बहुत सी जगहें मारुति कारें खड़ी रहती हैं और जो असली बीपीएल वाला है, वह बेचारा भिखारी की तरह लाइन में खड़ा है। अब लोगों को कैसे भरोसा होगा? जब नरेगा की बात आयी, आज गवर्नमैंट ने उसे कई हजार गुना बढ़ा दिया, लेकिन खाली यहां फंड बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। वह ग्रासरूट के लोगों तक पहुंचना पड़ेगा। मैंने कल भी कहा था कि बीच में जो बिचौलियों की लाइन है, जब तक इस करप्शन को बंद नहीं किया जायेगा, जब तक लोगों के अंदर भरोसा नहीं पैदा कराया जायेगा, लोग निकलकर नहीं आयेंगे। फिर गांव-देहातों में जो प्रैक्टिकल बातें हैं, आदमी जब रोड की लाइन पर पहुंचता है, अभी मेरे भाई ने कहा कि बड़ी मुश्किलों से हमारे असम में नाव में, पानी में पता नहीं कैसे-कैसे कष्ट के बाद जब वह पहुंचता है, तो उसे वहीं से कह दिया जाता है कि जाओ, भाग जाओ, सब हो गया है। पूरे वोट केन्द्र में एक लाठी वाला, पुलिस वाला नहीं मिलता और जो मिलता है, तो जिसकी लाठी, उसी की भैंस। वहां गुंडे पहले से खड़े रहते हैं। कौन अपनी जान जोखिम में डालेगा। वह वोट देना चाहता है। वह अपनी जान देकर वोट देना चाहता है, लेकिन जान कौन देने जायेगा? कल उसे कौन पूछेगा? ये सब हालात हैं। इन सब चीजों पर, लोगों के ऊपर, अपने देश की हमारी जो कद्रें थीं, जो हमारे संविधान ने हमें दिया था, मैं समझता हूं कि उसके ऊपर अवेयरनैस की भी जरूरत है। आज हमारे नौजवान बच्चों को टेलीविजन पर दिखाते हैं, तो बड़ा अफसोस लगता है कि गांधी जी कौन है? हमारे बच्चे माशा अल्लाह खेलते हुए दिखाये जाते हैं, क्लबों में नाचते हुए दिखाये जाते हैं, क्या यही बच्चे कल हमारे लीडर बनने वाले नहीं हैं? उनको पूछा जाता है कि गांधी जी कौन हैं, तो वे जवाब नहीं दे पाते हैं। ...( व्यवधान)
सभापति महोदय, मैं एक-दो मिनट में अपनी बात खत्म करूंगा। मेरा यह कहना है कि इन सब चीजों को जब तक हम वापिस जिंदा नहीं करेंगे, हमारी आने वाली नस्लों को इसकी कद्र और इसकी कीमत नहीं समझायेंगे, तो ये कुछ लोग आकर पूरे देश को नहीं बना सकते। मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि इसी पार्लियामैंट में, मैं बहुत आदर के साथ कहना चाहूंगा कि अभी इसी मर्त्तबा हर सदन में लोग कितनी उम्मीदों से टेलीविजन देखते हैं, पूरी दुनिया देखती है, तो वे यह देखते हैं कि हर मामले में एक छोटा सा बहाना लेकर पूरा सदन स्थगित कर दिया जाता है। लोग कैसें-कैसे क्वेश्चन-आंसर भेजते हैं। कितनी इम्पोर्टैंट चीजें होती हैं, लेकिन उनका जवाब नहीं मिलता है और चार-पांच दिन तक हाउस एडजर्न हो जाता है। आज एमपी इम्पोर्टैंट मैटर लेकर घूमते हैं लेकिन उनको कोई सुनने वाला नहीं है। उन्हें हफ्ते-हफ्ते बोलने का मौका नहीं मिलता। पता नहीं कैसे-कैसे नुकसानात हो जाते हैं। इन सब चीजों पर मेरा यह कहना है। मैं सिर्फ यह कहूंगा कि हम लाये हैं तूफान से किश्ती निकालकर, इस देश को रखना, मेरे बच्चो संभाल कर।
इन्हीं बातों के साथ मैं फिर से हमारे भाई अग्रवाल साहब की हन्ड्रैड परसेंट ताईद करता हूं, लेकिन चूंकि इस इंसान के अंदर एक धड़कता हुआ दिल भी है, सिर्फ कानून से नहीं चलेगा, प्यार मोहब्बत से सिखाकर, आहिस्ते-आहिस्ते करप्शन को दूर करके, लोगों का फेथ लेकर आगे बढ़ेंगे, तो जरूर वोटर्स बढ़ेंगे।
MR. CHAIRMAN : Hon. Minister, only a few minutes are left; you cannot finish your speech. So, next time you can reply to the debate.
THE MINISTER OF LAW AND JUSTICE (SHRI M. VEERAPPA MOILY): Next time, I can straightaway start the answer.… (Interruptions)
THE MINISTER OF HEALTH AND FAMILY WELFARE (SHRI GHULAM NABI AZAD): Mr. Chairman, Sir, he can start; let him be on his legs till next time; otherwise, in between, somebody else will get up and speak… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : He will be on his legs.
All right, Mr. Minister, you can just start and speak for a few minutes.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Agarwal ji, already I have already called the hon. Minister.
… (Interruptions)
श्री जय प्रकाश अग्रवाल : महोदय, इसमें रिजिडनेस की क्या बात है। माननीय सदस्य बोलना चाहते हैं, उनको बोल लेने दीजिए।...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Agarwal ji, you are a very senior Member of this House. I have called the hon. Minister to reply. Please do not insist upon.
… (Interruptions)
डॉ. विनय कुमार पाण्डेय : यह लोकतंत्र का विषय है, माननीय सदस्य को बोलने दीजिए।...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Dr. Pandey, please sit down.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: I have already called the hon. Minister; he is on his legs, please.
… (Interruptions)
SHRI M. VEERAPPA MOILY : Mr. Chairman, Sir, the kind of debate which has gone on this Private Members’ Bill has really sanctified the very concept of the Private Members’ Bill. I must compliment and commend the kind of debate which has gone on which commenced from our hon. Member Shri J.P. Agarwal, and, of course, ended up with Shri Ajmal Badruddin.
I have noted down the points from all the speakers who spoke. I must say that it is most illuminating, in fact, enlightening and forward looking. I am very much educated by this. I think it is an ideal situation to have compulsory voting; there is no doubt about it. We need to graduate our country, our electorate. All of us should ultimately graduate ourselves into that kind of a domain where every citizen of this country should exercise his vote. That is why, the kind of support which this Bill obtained from all the Members, by all sections of the people, by everyone starting from Kanyakumari to Kashmir with Chaudhary Lal Singh, and in Assam represented by Shri Ajmal Badruddin, reflected that our democracy is still vibrating and people are at passion to nurture the great democracy of this country.
The elections are the first national festival of democracy. Everyone will have to tribute that kind of sanctity. After all, any democracy will come out successfully by nurturing it; and we have nurtured it. We are proud that today our Parliamentary democracy is the largest and the best in the world. We are a part of it, with all the deficits which have been spoken out by many hon. Members. In our country, yes, we have conflicts. The Constitution of India is a conflict resolution document. We have differences of opinion. Our country is also called ‘argumentative India’. There are contradictions everywhere. From territory to territory, from man to man, we have contradictions. I must say that people say that our body if full of water. But, you know, if there is any infliction of injury to the body, blood comes out. Our heart is full of blood but if any injury is caused to the heart, tears come out, water comes out. This is a contradiction. But we live in this contradiction and we thrive in this contradiction. That is why we have a beautiful concept of a scenario of India with ‘unity in diversity’.
So, Sir, I will continue next time.
MR. CHAIRMAN : Thank you. The House stands adjourned to meet again on Monday, the 3rd May, 2010 at 11 a.m.