Lok Sabha Debates
Discussion On The Protection Of Plant Varieties And Farmers’ Rights Bill, 2000 ... on 12 March, 2001
14.48 hrs. Title: Discussion on the Protection of Plant Varieties and Farmers’ Rights Bill, 2000 (Not Concluded).
MR. CHAIRMAN (SHRIMATI MARGARET ALVA): We will now take up the legislative business—Protection of Plant Varieties and Farmers’ Rights Bill.
THE MINISTER OF AGRICULTURE (SHRI NITISH KUMAR): I beg to move:** "That the Bill to provide for the establishment of an effective system for protection of plant varieties, the rights of farmers and plant breeders, to encourage the development of new varieties of plants, as reported by the Joint Committee, be taken into consideration. "महोदय, पौधों की नयी किस्म के विकास को प्रोत्साहित करने के लिए पौधा किस्म, कृषकों और पौधा संवर्धकों के अधिकारों के संरक्षण के लिए, प्रभावी प्रणाली स्थापित करने हेतु उपबंध करने वाले विधेयक, संयुक्त समति द्वारा यथाप्रतिवेदित, पर विचार किया जाये।
SHRI ANIL BASU (ARAMBAGH): Madam, what about the amendments to the Bill?
MR. CHAIRMAN : The amendments have to be moved after the Minister’s speech.
श्री नीतीश कुमार : प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैराईटीज एंड फॉर्मर्स राइट्स बिल १९९९ यह लोकसभा में १४ दिसम्बर १९९९ को इंट्रोडयूस किया गया था और इसके बाद इसे संसद के दोनों सदनों की संयुक्त संसदीय समति को विचार करके अपनी रिपोर्ट देने के लिए सौंप दिया गया था।
संयुक्त संसदीय समति ने अपना प्रतिवेदन इस सदन में २५ अगस्त, २००० को रखा । इस समति ने १५ राज्यों का दौरा किया । इस दौरान किसानों, किसानों से संगठनों, विशेषज्ञों व राज्यों से विचार करके, जितने भी लोग इसमें स्टेट होल्डर हो सकते हैं, सब लोगों के साथ चर्चा की । उनको १३२ ज्ञापन भी प्राप्त हुए । उन सभी ज्ञापनों पर पूरी तरह से विचार-विमर्श करने के बाद संयुक्त समति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी । पहले के बिल की अपेक्षा इसमें काफी संशोधन किए गए हैं । पहले के बिल की अपेक्षा इस नए बिल में कुछ खास बातें दीखती हैं । संयुक्त समति ने जो रिपोर्ट दी है, उसमें फार्मर्स राइट्स को और ज्यादा महत्व * Published in the Gazette of India,Extraordinary,Part-II,Section-2 dt.12.3.2001 ** Introduced with the recommendation of the President.
दिया गया है । इसके लिए अलग से एक चैप्टर दिया गया है । पहले के बिल में भी व्यवस्था थी, लेकिन उस पर और ज्यादा जोर डालने के लिए, किसानों के अधिकारों के लिए अलग से चैप्टर दिया है । इस बिल में, पहले जो भ्रान्ति फैली कि किसानों के अधिकार छिन गए हैं, किसानों के अधिकारों के लिए अलग से एक चैप्टर है । किसानों को आज जो भी अधिकार प्राप्त हैं, वे सभी अधिकार इस बिल के पारित होने के बाद बरकरार रहेंगे । किसी प्रकार का इसमें कोई परिवर्तन नहीं होगा । कोई भी किसान नई किस्म को लगाएगा, उसके बीज का आगे इस्तेमाल करेगा, जो उत्पादन होगा, उसके बीज को रख सकेंगे। इस बीज को फिर बो सकेंगे । किसी दूसरे किसान के साथ आज की तरह अदान-प्रदान कर पायेंगे । इस बीज को दूसरे किसानों को बेच सकेंगे । उस रूप में नहीं, जिस ब्रान्ड नेम में कोई बीज बिकता है, उस ब्रान्ड नेम के रूम में नहीं, उस तरह से नहीं बेचेंगे । लेकिन आम तौर पर जैसा ग्रामीण अंचल में होता है, वह किसानों को बेच सकते हैं। खास करके हमारे किसान जो जैनेटिक रिसोर्सेस के संरक्षण में लगे हुए हैं, उनको भी यह बिल मान्यता देता है और उनको पुरस्कृत करने का भी प्रावधान इस बिल में रखा गया है । साथ ही किसान अगर अनजाने में कोई गलती कर बैठता है, तो वह सजा का भागीदार नहीं बनेगा । इस लिए किसी प्रकार से भी किसानों के हितों पर कोई भी खतरा नहीं होने वाला है ।
दूसरी तरफ, यह बिल इसलिए भी जरूरी है कि हमारे यहां नई किस्में विकसित होनी चाहिए । हमारी अपनी जो राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली है, आईसीएआर और दूसरी युनिवर्सिटीज - इन सबके जरिए काफी कुछ काम हुआ है । करीब २६०० नई वैरायटीज निकाली गई हैं । आईसीएआर सिस्टम के द्वारा कोई भी नई चीज निकलती है, नए किस्म के बीज विकसित करते हैं, उसको रिलीज करते हैं, वर्तमान समय में उसको जो चाहे इस्तेमाल करे, दूसरे देशों में भी इस्तेमाल करे, चाहे तो उसको अपने देश में ले जाकर प्रोटैक्शन ले ले, इस प्रकार से हमारे यहां जो रिसर्च हुई है, उसको किसी प्रकार का संरक्षण नहीं है । लेकिन यह बिल अपने रिसर्च सिस्टम को भी संरक्षण प्रदान करेगा । इसके अलावा प्राइवेट सैक्टर, पब्लिक सैक्टर बीज उत्पादन के क्षेत्र में, नए बीजों के विकास के क्षेत्र में, रिसर्च के क्षेत्र में पूंजी निवेश होना चाहिए, नए किस्म के बीजों का विकास होना चाहिए,। इससे किसानों को लाभ हो सकेगा । उस द्ृष्टिकोण से जो ब्रीडर है, उसके भी अधिकारों की रक्षा जरूरी है। इसलिए उनके अधिकारों की रक्षा की भी व्यवस्था की गई है । इस प्रकार से देश के कृषि की उन्नति के लिए यह बिल बहुत आवश्यक है और संयुक्त समति ने जो सिफारिशें की हैं, उनके आधार पर इस बिल में जो कुछ कानूनी संशोधन आवश्यक हैं, वे किए गए हैं । इसके बाद यह बिल वभिन्न विभागों और मंत्रालयों में सक्र्युलेट किया गया था । आईसीएआर की तरफ से कुछ सुझाव आए हैं। उनको ध्यान में रखते हुए, संयुक्त समति के सुझावों के अलावा, अपनी तरफ से भी दो संशोधन किए हैं । बिल में प्रावधान है, कोई भी चीज डवेलप करेगा, कोई ब्रीडर डवेलप करेगा नई वैरायटी तो उसको बताना पड़ेगा कि वह मूल बीज जिस पर आगे रिसर्च चली, वह कहां से मिली और जहां इस एलीमेंट का इस्तेमाल करेंगे, प्लान्ट रिसोर्सेस इस्तेमाल करेंगे, उस पर उनको लाभ देना होगा । बैनफिट शेयरिंग का कन्सैप्ट लाया गया है । बैनफिश शेयरिंग का लाभ इस देश के नागरिकों को ही मिले या इस देश में जो फार्मिंग करते हैं, उनको मिले । एक संशोधन इस संबंध में लाया गया है । दूसरे, इस बिल के जिरए प्लान्ट वैरायटीज प्रोटैक्शन एंड फार्स राइट अथोरिटी का निर्माण होगा और इस अथारिटी को समय-समय पर पब्लिक इन्टरैस्ट में सरकार को किसी भी प्रकार का डायरैक्टिव देने का अधिकार होगा ।
यह जो ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी की सिफारिश है, उसके अलावा दो संशोधन भी इस बिल में प्रस्तावित हैं। इन्हीं शब्दों के साथ मैं आग्रह करूंगा कि इस पर विचार किया जाए।
MR. CHAIRMAN : Motion moved:
"That the Bill to provide for the establishment of an effective system for protection of plant varieties, the rights of farmers and plant breeders, to encourage the development of new varieties of plants, as reported by the Joint Committee, be taken into consideration. "
SHRI SHIVRAJ V. PATIL (LATUR): Madam, may I have your permission to read out my speech rather than speaking so that I can save time?
Some months back the Parliament passed the Information Technology Bill, 1999. The Government has introduced the Biological Diversity Bill, 2000, which would be taken up for consideration and passing within a few months by Parliament. Today, we are discussing the Protection of Plant Varieties and Farmers’ Rights Bill, 2000.
All these Bills have international connotations. They are being moved and passed to meet the international obligations under WTO and other agreements. That does not mean that they are not going to help the people who live in other countries and not going to help us who live in India. In fact, they should primarily help us in the country and also the process which is started world over to encourage and give help to the producers, to consumers and the traders also. Therefore, we cannot object to the Bill blindly or accept it also without trying to understand, if it is going to help or create difficulties for us. The Bill should, therefore, be examined very carefully. Unfortunately, for Bills of this nature, time available for discussions is less than what is made available for the unlisted business in which there is no structured agenda, no considered report given by the Parliamentary Committee is available to help us to debate and deliberate meaningfully. … (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : Shri Shivraj V. Patil, four hours have been allotted for this Bill.
SHRI SHIVRAJ V. PATIL : In other countries, there are no restrictions put on the discussion on the Bills whereas we are fixing four hours’ for this Bill and Bill of this nature. In our country, we do put such restrictions on the ground that enough time is not available. We should make enough time available for debates on Bills of this nature. If necessary, the number of days for which Parliament works should be increased. Otherwise, full justice would not be done. In Bills of this nature, which is relevant to the country and our transaction with other countries, there are provisions, which have very serious implications, which should be clearly understood before we say `Yes’ or `No’ to them. I hope this matter may be discussed by the leaders of the political parties in Parliament and in the interest and efficiency of democracy and parliamentary system, appropriate discussions should be allowed.
Fortunately, all the Bills that are introduced in Parliament are referred to the Departmentally Related Standing Committees, and are considered in detail by the Members of the Committees, and Reports on their views and suggestions are submitted to the Executive and the Legislature for proper actions. It is quite heartening to note that the suggestions given by the Committees are not brushed aside or lightly taken, but they are considered seriously, which has happened in this case also. This is more so with respect to the Bills, which have national and international relevance, and are of new types.
The protection of Plant Varieties and Farmers’ Rights Bill was also referred to the Standing Committee and was carefully examined by it.
SHRI NITISH KUMAR: It was referred to the Joint Parliamentary Committee.
15.00 hrs. SHRI SHIVRAJ V. PATIL :Many of its recommendations are incorporated in the Bill. Some of the recommendations can easily be accepted but about others, the Members may have different views. The views of the Members can be scrutinised carefully. I would come to the provisions of the Bill and the amendments that are introduced by the Executive as per the recommendations of the Committee one by one. I would request the Minister to keep his mind open and consider the views expressed by the Members, and make them part of the law, if he thinks that the views of the Members are valid and do not stand on any formality and make his sticking to the official version a prestige issue.
This is a Bill which deals with new issues. The experience available with us about the issues is limited. Hence, all that we are doing now may or may not be sufficient and fully correct. The experiences of other countries and the ground rules given by the WTO may or may not be helpful. So, mentally we should be ready to experiment with it and as time passes, modify the provisions to suit the real requirements and the situations prevailing in India and the world. It would be very difficult to be very strict and dogmatic about it. All the same, efforts and attempts should be made to make it as perfect as is possible in the present circumstances.
My first submission relates to the Title of the Bill. While speaking about the Title of the I.T. Bill, I had made my submission on this point. The Information Technology Act, 1999 does not fully convey what it contains. We have the Prevention of Untouchability Act and we have the Prevention of Corruption Act. The Titles of these laws convey what their contents are. But the I.T. Act does not convey that kind of meaning; the I.T. Act is meant to facilitate the transactions through electronic instruments. One could have called it ‘Facilitation of Trade and Transaction and Governance through Information Technology Act, 1999’ or some other Title could have been selected. But that was not done. It was not done because I think, no mind was applied to this aspect. The Biological Diversity Bill, 2000 is pending in the Parliament. The Title of this Bill also does not convey the full meaning of the law intended to be framed. It could be ‘The Biological Diversity Protection and Utilisation Bill, 2000’. It can convey a better meaning of the contents of the Bill. In respect to this Bill also, the Title was framed and used without proper application of mind by those who have drafted it. The Minister and the Government should have detected the defect and should have rectified the mistake. But it seems that they have also not paid attention to this aspect. These laws are going to be used in India and abroad. If these defects are detected by the users in the country and the world, it would not add prestige to the drafting agencies, the Government and the Parliament also. The Title of the Bill, we are considering at present, is not as defective as the Titles of other Bills were. But it is not without any defect also. It gives a wrong impression that the Bill is meant to protect the rights of the farmers and the plant varieties and not the plant breeders. Here is the catch. In fact, the Title would have been more appropriate if it had been like this: ‘The Protection of Plant Varieties and Farmers and the Plant and Seed Breeders Rights Bill, 2000’. This kind of a Title would have been more authentic and honest. In India, there are a few farmers who are in the business of breeding plants and producing seeds. In fact, this is being done by those who are not farmers by profession.
There are either traders or industrialists and they are Indians and foreigners also and no doubt, their right should be protected and preserved. The agricultural universities are also responsible for producing different varieties of seeds and plants. Their number is quite handsome. What they do is valuable. Their rights should also be protected. There are other institutions and national laboratories which are helpful in producing new qualities and varieties of seeds and plants. Their rights also should be protected. Therefore, it would be proper to add the words "breeders of plants and producers of seeds" in the title.
The Government would expose to the charge that it wants to get this Bill passed in the name of farmers, but mainly for the breeders which would not be very just. Why is the Government not paying attention to these details? Do they think that the Bill or Act by any name would do the same as the rose may smell, by any name, the same?
I sincerely feel that they should be more careful about these matters also to present the best laws to the country and the world. I am not sure if I have made my point quite forcefully to see that it registers with the concerned authority. Let me hope that it has been received rightly by the hon. Minister, the Ministry, the drafting agencies and the Government.
Why are we dropping these two words? Why is the word ‘breeder’ being dropped? Are we afraid that this would be misunderstood by others and it is not necessary that it should be understood by others? The word ‘breeder’ is to be included in the title because it is not only the traders and the industrialists who are breeders, but the universities and the national laboratories are also the breeders.
That is why, I think, it would be right and just and correct to have a correct kind of title for this Bill. I do not know whether the hon. Minister is in a position to accept this suggestion at this point of time. But I am making it not simply because I should criticise sitting on the Opposition Benches but I do feel that a title which gives a wrong connotation, a wrong meaning to the law should not be adopted. We should not be appearing to be deceiving the people. That is my intention.
The authority consists of officers of the Departments and institutions which have something or the other to do with the plants and farmers and breeders. However, in my opinion, representatives of two more organisations and some experts from outside the Government working in the concerned fields should be included. We have created the Protection of Plant Varieties in the Farmers’ Rights Authority. I am talking about that.
The CSIR laboratories are carrying on research in plant breeding and producing new varieties of seeds. The national laboratory at Jorhat in Assam is in the process of separating genes from the plants in deserts, in oceans and in Himalayas and introducing them in seeds used to grow fruit plants and food grains. The genes, which are separated from the desert plants, would help the fruit trees and the food crops having them to grow, even in drought conditions. The genes from the ocean plants would help the fruits and the food crops to grow when there are excess of rains and in marshy areas. There are plants in Himalayas, in Eastern and Western Ghats, in Andaman and Nicobar which have pest-resistant qualities. The genes, which make them pest-resistant, are separated from them and are introduced in fruit-bearing trees, seeds and food crops. They are trying to do genetic engineering to make the food grains and the fruits to have more retentive capabilities and better nutritive value.
The National Chemical Laboratory, Pune is in the process of producing new varieties of plants through tissue culture. The National Molecular biology Laboratory at Hyderabad is also doing some research in these areas. All these laboratories belong to CSIR.
1510 hours (Shri Devendra Prasad Yadav in the Chair) The Bhabha Atomic Research Centre is in the process of doing genetic engineering through radiation to produce new varieties, better varieties of seeds. These organisations and national laboratories can contribute a great deal to help to produce better varieties of seeds and plants. It would be, therefore, very useful to have the representatives of CSIR and Bhabha Atomic Research Centre in the Authority. It should not be difficult for us to have a few more members who can really contribute towards better enforcement of the law and better development in this area. I hope, the Government would heed to this suggestion and add some more members to the authority.
If we look to the composition of the Authority, we get an impression that all of them are government servants. There are private persons who are experts in the field and who are dedicated to the cause. Why should they not be made the members of the Authority? If good private persons outside the Government who represent the progressive, educated, research-minded farmers, traders or industrialists in the area are included in the framework of the Authority, the prestige and status of it would go up.
In India, mainly the agricultural research and development, education and extension and development of practices of cultivation and new varieties of seeds and plants are done by agricultural universities, colleges and institutions. It would be a right thing to have one or more members. I think, this has already been done. The representatives of agricultural universities are included in the Authority. Thus, the number of members of the Authority can be increased to make it representative and fully equipped and to make use of the facilities available in the country.
The Authority is not only an instrument for regulating the activities; it has to function as promotive agency also. Hence, the new composition suggestion would be beneficial. The task of this Authority is to have the register to regulate the activities, and at the same time, to promote and inspire the people to breed new plants, to produce new seeds, and if only the Government officials are sitting in the Authority, they would be very good at controlling the things, but they may not be good at promoting and inspiring the people .
Now, if the intention is to see that this Authority not only controls but also promotes and inspires also, it would be right to have some people who can really contribute in this respect. I am making this submission with a view to see that this Authority really transacts the business which is given to it.
"The Chairperson shall be the Chief Executive of the Authority and shall exercise such powers and perform such duties as may be prescribed. "The Chairperson, the Chief Executive is very pivotal person in the Authority for implementation and enforcement of this law. Clause 7 says that what he should do would be decided by the rules of the Executive. Why should it be done by the Executive? Why should it not be done by Parliament? Is not the Executive clear at this stage as to what would be his rights and duties? Has it not considered this aspect? Should it not come before Parliament with its suggestions? Law making by the Executive is not envisaged by the Constitution of India. The law should not be made by the Executive. In all the new laws, this is being done. It is not correct. It should not be done. The law may leave a great scope for enlarging or restricting the discretionary powers, and rights and duties of the key persons in the Authority. It should not be difficult to do it. My view is that the Government should not usurp this right. It should not trespass in the area of legislation, in the field of law making. This is going to create very bad precedents.
The executive should not make laws, they can initiate law-making; they should not leave to the judiciary to pass executive orders by not itself doing its duty. The Legislature should not pass executive orders and judgments. The executive should not pass the laws and the budget, and no scope should be left to the judiciary by the inactive and timid attitude of the executive to pass the administrative and executive orders. This exactly appears to be happening which is against the words and the spirit of the Indian Constitution and should be avoided by all concerned very scrupulously.
Why should we give authority to the Chief Executive through rules? Rule-making power is certainly available to the executive, but the law-making power is not available to the executive. Law-making power lies within the jurisdiction of the Legislature. And here, we are making this kind of comprehensive law and yet we are not defining what are going to be the rights and duties of the Chief Executive Officer. Now, this is not a correct thing to do. I think, we should have paid more attention to this aspect. You could have decided what kind of rights and duties he will be having and you could have also decided that in certain circumstances he would have wider discretion so that he is not bound down by the provisions of the laws. That would have been proper, but this has not been done. I think, this is a flaw, which is a lacuna in the law we are going to make.
The Bill intends to protect the rights of the farmers. The original Bill has some provisions which could achieve this objective to some extent, but what is provided in the original Bill fell short of providing full protection to the farmers. The Committee has made some suggestions which can protect the rights of the farmers in a better fashion. The suggestions made by the Committee in this respect have been incorporated in the Bill. It would be necessary to experiment with these provisions and see if they create problems for the farmers. If that becomes obvious, it should not be difficult to change the relevant provisions to free the farmers from difficulties. They should be able to produce the seeds and plants they need for using them in their fields, and with others in their neighbouring fields. They may be allowed to produce the seeds and the plants to sell in the market as per the law and the rules, which should not be very restrictive and obstructive. The law should not protect only breeders and traders; it should protect the farmers and the users of the seeds and the plants in productive activities. This is a grey area. It creates doubts and apprehensions in the minds of farmers. Those genuine doubts and apprehensions should be removed. The farmers should be assured that they would not suffer. This has mainly to be done because the farmers are not the persons who would control seed and plant production in India. They would help in the process, but they would not be the main players. The law appears to protect the main players more than the supporting actors. In India, supporters are numerous and the main players are only a few. The law should not do justice to a few at the cost of justice to the overwhelming majority. The Bill does give an impression that it helps the main players. The Committee Report has reduced this aspect to a great extent, yet, the clouds of doubts are not fully cleared, which must be done. If it is not done, the market may flourish but the farmers may suffer and the consumers would also suffer. The Government and the law should protect the interests of the producers, consumers and users of foodgrains, new varieties of seeds and plants.
If it fails to do that, then it would fail in achieving its objective. The law should not be made only to meet the requirements of the agreements made by the WTO. It should be made to do justice, to protect the interests of the farmers, the consumers, the breeders and the traders also. I am not fully dissatisfied with what has been suggested by the Committee and what has been incorporated in the Bill.
श्री नीतीश कुमार : कमेटी ने रिपोर्ट में जो सजेशन्स दिये हैं, वह हमने इनकारपोरेट किये हैं।
SHRI SHIVRAJ V. PATIL : That is right, but I have doubts in my mind. Whatever has been suggested by the Committee on this point, you have incorporated and, yet, I have the doubts.
(q2/1520/snb-nsh) Yet, I feel that what has been done may create problems. I am not in a position to explain here in which of the areas it could create problems, but if there is an opportunity, then we can sit together and discuss it later on. I am expressing my doubts here. I am saying that let us have the provisions, as has been suggested by the Committee, incorporated in the Act. Let us experiment with them. Yet, I have a doubt in my mind that the interest of the farmers would not be fully protected by this. I have a feeling that this law appears to be more for protecting those who are not farmers, but who are the traders. Plant breeders are not really the farmers. At least in India, they cannot be classified as farmers. A farmer who has 50 acres of land at his disposal is not in a position to produce seeds or breed plants and market them. That is the difficulty of our farmers who are small and who do not have the financial capacity to fund breeding of plants and create new varieties. That is going to create problems.
Sir, I am one with the hon. Minister when he says that new varieties of plants are required and new varieties of seeds are required. If a farmer can produce them, then we would welcome them. If a farmer cannot produce them, then let anybody produce the new varieties of seeds and make it available to the farmers so that they could produce more from the land. That is the correct approach. I cannot find any fault with this kind of an approach. Yet, I am saying that if there is somebody who is trying to take advantage of it, then he can take advantage of it. The Government is proposing to protect them under this law. If a breeder breeds a plant and prices go up and then he wants to see that the prices again go up and does not breed plants any more, then it would create a scarcity. If a seed producer produces seeds and gives it to the farmers and captures the market and then reduces the production of seeds, then the farmers would suffer. The Government has rightly provided for in this Bill that if a breeder of plants or seeds does not produce the required number of plants or the amount of seeds, then the Government would give directions or would take corrective steps. The Government has rightly put this clause in the Bill. But still I have doubts and we can discuss it later on. It is not possible here -- in this kind of a Bill -- within four hours time, while making one speech and particularly when you are sitting in the Treasury Benches and I am sitting here in the Opposition Benches. We shall have to co-operate and co-ordinate in our thinking and then only it would be possible. I have my doubts and I have expressed them here. The Government has verified it and has tried to see that the interests of the farmers are protected. The Committee also has done well and the Government also has done well. There are some good provisions in the Bill. Let those provisions be there in the Bill. But this is the area that has to be carefully examined later on.
Sir, next I come to the appeals. Against the orders of the Authority, it has been provided in the Bill that an appeal would lie to the High Court. It is also provided that a single judge of the High Court may hear an appeal and that against that order of the single judge, another appeal could be made to a Bench of the High Court. These provisions of the Bill are not very happily worded. It would have been better if the mention of the second appeal to a Bench of the High Court would have been avoided. It is good that there are provisions for appealing against the orders of the Authority. But providing for too many appeals is not good. Now, against the orders given by the Bench of the High Court, some interested persons may appeal to the Supreme Court on a legal point. Thus, there would be available for interested persons the right to appeal three times. That would consume time and delay justice. Nothing in excess of what is required is good and should be avoided. The Standing Committee has recommended that there should a Tribunal against the order of the Authority. The appeal should be made to the Tribunal. The Committee has also mentioned that a Member of the Tribunal should have enough judicial experience.
It is also provided that one of the members can be a member of the administrative machinery. It means, the judicial member need not be a person who has the qualification to be the judge of the High Court. He could be a district judge or a civil judge. This kind of dilution of the qualification of the member of the appellate authority is not useful to protect the interests of the farmers and others. This, in my opinion should not be done. If good seeds are not provided to the farmers, many farmers would suffer. Hence, the legal provisions should not be thus diluted. The tribunal should not be amenable to the suggestions of the executive authority. The principle of separation between the judicial authority and the executive authority should not be given a go by. Therefore, with all respect, I would like to submit that the recommendations of the Standing Committee do not appear to be very sound and justified and need not be adopted and incorporated in the Bill.
Here, I am speaking against the recommendations of the Committee. If the authority says, ‘let it go to the High Court, and against the decision given by the High Court let there be an appeal to the Supreme Court,’ what is going to happen? The authority decides first, the matter goes to a single-judge-bench of the High Court, after that it goes to a bench, the decision of the bench then goes to the Supreme Court. By this what are we doing? We are creating a procedure which will delay the decisions and delaying the decisions will not be good. The Committee had made a suggestion very rightly. In my opinion the original Bill has suggested that the person sitting in the tribunal should be a person who could have been appointed as a High Court judge. But here we are diluting that provision. The wording of the Act now is such that you can appoint even a district judge or even any lawyer who is not a district judge and the things would become very difficult. Why should we dilute this provision? Why is it necessary to do it? Is it to see that he becomes amenable to the suggestions of somebody? In my opinion, this should not be done because the interest of thousands of millions of farmers is involved. That is why this authority should be given independent authority, should be manned by people who are not easily amenable, by the people who have clear understanding not only of the provisions of law but also of the knowledge of agricultural science. That would help. But here, I may be allowed to say that I differ a little with the suggestion made by the Standing Committee.
On offences and penalties also, there is a suggestion by the Committee. I find it difficult to agree with the suggestions of the Committee on this point also. Others are very good. I agree with protecting the farmers’ interest and adding a new chapter and all those provisions. But I disagree with these details.
The Bill provides that for offences committed by the interested persons, penalties of imprisonment and fine can be imposed. The penalty of imprisonment is provided to see that the plant varieties are protected, the farmers are protected, the breeders are protected, and nobody should play false with others. These provisions should be passed, as they are provided. The Standing Committee has suggested that either the imprisonment, or the fine should be awarded.
Why should we do that? If there is a clause in the law which says, ‘either imprisonment or the fine’ - some of us who have practised in the courts know - the tendency is to carry on with it. Why should we delay the punishment which can be awarded to the person who has committed a mistake? If we say, ‘imprisonment and fine’, that clause itself becomes very effective and people will think twice before committing an offence. They are not afraid of paying fine but they are afraid of going to the jail. By making it ‘imprisonment or fine’, we are diluting this penal provision. In my opinion, it is not in the interest of the farmers.
The Bill appears to protect the breeders more than the farmers. In fact in India, farmers are not breeders. The task of planning, breeding and marketing the plant varieties and seeds is done by non-farmers. It is done by the companies formed for the purpose. They should be allowed to do that, and encouraged to produce good varieties of plants and seeds.
But I think, that the farmers also should be helped. They should be helped to have the cooperative societies. Separately, they cannot do it. In this respect, universities should also be increased and if it is possible, the Government should not shy away from this kind of activity because depending on the persons who are not amenable to the directions of the Government, it is creating problems for the farmers.
The agricultural universities, colleges and other institutions are also doing it. They have lands and expertise, and vision.The agricultural universities are the best institutions in the country for producing plant varieties. They have thousands of acres with them and fortunately for us, we have a large number of agricultural universities in our country. In some States, there are four or five or even more agricultural universities, and there would be more agricultural colleges also under these universities. And, the land available would be there to have new varieties of plants and the special seeds produced. That is why, I think, they should be helped.
The farmers are, in fact, the persons who work in the field and produce the new varieties of plants and seeds. But they lack funds, knowledge and sometimes vision. For providing new varieties of seeds, they should be helped and encouraged to do better than what they are doing now. At times, they do not need vast tracks of land. They need guidance and funds, and marketing facilities. That should be made available to them through cooperatives or Governmental agencies. It appears that this aspect is not highlighted. It finds a place in the Bill. But it is in neglected corners, it is not good. Law is being made to help the farmers. It helps the trader and the breeder. This tilt should be corrected. Otherwise, the charge that it is being done to help the non-farmer rather than the farmer, under some internal and external pressure would stick.The Bill suggests that the National Gene Fund would be created. The idea is laudable. It should be supported and strengthened. It is mentioned in Chapter XII of the Bill. But the Committee appears to have diluted it. One does not know why it was done and suggested. Here also, I am not agreeing with the Committee.
There was a separate Chapter in the original Bill. It could have been or it could not have been made part of the Bill itself. The Genetic Engineering is going to be the most important thing for helping the farmers and agriculture in our country. Fortunately for us, India is very rich genetically. Take for example, the foothills of Himalayas, the Western Ghats, the Eastern Ghats and Lakshadeep. We have a lot of genetic wealth. Fortunately, the climatic conditions in India are such that everything multiplies, the plants multiply, the animals multiply and human beings also multiply, and that is why the problem of population in our country is there. A large varieties of lands are there; a large varieties of animal species are there and a number of human beings is increasing by leaps and bounds in our country.
Now, some of these things are creating problems but some of these things are going to help us really. If he wants to see that agriculture in India flourishes, there is nothing more important than using the genetic wealth which is available with us. Unfortunately, for the world where there is genetic wealth, there is no genetic technology and where there is genetic technology, there is no genetic wealth. In the countries of Northern Hemisphere which are covered under the snow, there is no genetic wealth. The variety of plant is limited. The genetic wealth is not there but genetic technology is there. But fortunately for the countries which are in tropical areas of the globe, the genetic variety is there. We shall have to use it. I think that they have done very well in providing for creating a Fund for developing the genetics in India. It would have been better if it would have been left in a separate Chapter. Something could have been done.
Well, I think, this Bill is good as far as helping those who want to breed the plants and produce the seeds in larger numbers and larger quantities.
But the ultimate aim should be that of using knowledge as the common heritage of mankind. If you do not allow people to use knowledge that is available with the plant breeders and if you do not freely encourage him to use that knowledge, ultimately all of us are going to suffer. Putting restrictions on knowledge is not good.
This law is being passed because we want to protect the plant breeders. We are saying that we are trying to protect the plant varieties by protecting the plant breeders and by restricting the knowledge available with some people who can breed the plants. We are not protecting the plants; we are protecting the plant breeders. You cannot help it; we cannot help it; India alone cannot help it. The situation is such in the world that knowledge is not treated as a common heritage of mankind. Knowledge is patented and sold. By selling knowledge, some people might get money but ultimately the entire humanity is going to suffer. If knowledge becomes a commodity to be sold and purchased, all of us are going to suffer. I do not know when this kind of an understanding would develop in the world, when knowledge would freely flow from one country to another. We are asked to allow the commodities, the goods and services to flow from one country to another freely but we are not given the freedom to take technology from countries where it is available. We are not allowing knowledge to flow freely from one country to another. What is obstructing this is the profit motive. If people want money or profit, they would not allow knowledge and technology to flow because the costliest things in the world today are technology and knowledge. Nothing is as costly as knowledge and technology. By creating laws, we are putting restrictions on the explosion of knowledge. This, ultimately, will not be good, but we, as countries at the receiving end, cannot do much in this respect. We have to keep on saying that we could co-operate with them to a certain extent but let us have the vision of the future, a distant future and let us free knowledge from the bonds of profit.
श्री प्रहलाद सिंह पटेल (बालाघाट): महोदय, मैं भारत सरकार के कृषि मंत्री और भारत सरकार को यह विधेयक लाने के लिए धन्यवाद देता हूं। इसका जो मूल स्वरूप था, पौधा किस्म कृषक अधिकार संरक्षण विधेयक १९९९, के बारे में भी मैंने बिन्दुवार देखा है। संसदीय समति की रिपोर्ट के सुझाव भी मैंने देखे हैं और अब पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण विधेयक, २००० को भी चर्चा के लिए इस सदन में प्रस्तुत किया गया है, उसको भी मैं देख रहा हूं। हमारे पूर्ववक्ता एक अनुभवी एवं वरिष्ठ सांसद भी हैं। वह अपनी बात कह रहे थे। मैं उनकी बात का खंडन नहीं कर रहा हूं लेकिन एक बात मुझे इसमें आपत्तिजनक लगती है कि संयुक्त संसदीय समति की रिपोर्ट भी माननीय सदस्यों के द्वारा गठित एक राय थी। हम यदि उसमें कुछ कमियां देखना चाहते हैं तो मैं महसूस करता हूं कि हमें वह बात यहां बिन्दुवार रखनी चाहिए कि हमें यहां पर शंका है। मुझे लगता है कि वह बात सरकार लेकर आई है जिसकी जरूरत हमें बीस वर्ष पहले थी। हम इतने विलम्ब से इसके लिए जागे हैं कि शायद इसकी हानि का अनुमान हमें नहीं है। यदि किसान के द्ृष्टिकोण से हम देखें और जो हमारी मूल सम्पत्ति है जिससे इस राष्ट्र की हम रक्षा कर सकते हैं, राष्ट्र का विकास कर सकते हैं और राष्ट्र की आर्थिक दशा को सुधार सकते हैं तो निश्चित रूप से हमें यह विधेयक इस सदन में दो दशक पहले लाना चाहिए था पर हमने तब इस बारे में विचार नहीं किया। जब हम पौधा किस्म की बात करते हैं तो हमारा नजरिया सिर्फ कृषि उत्पादन की तरफ या खेती के लायक जो बीज हैं, वहीं पर ठहर जाता है।
पूर्ववक्ता के भाषण में भी जैव प्रोद्यौगिकी शब्द का प्रयोग किया गया है । बायो-डाइवर्सिटी बिल अभी चर्चा में है, वह अलग बात है । प्लान्ट वैरायटी की बात हम करते हैं, तो खुले नजरिए से हमें देखना होगा । मैं दो-तीन बातों की ओर मंत्री जी का ध्यान दिलाना चाहता हूं । प्राधिकरण का गठन हो रहा है । किसानों से संबंधित बिल नाबार्ड पिछले सत्र में आकर चला गया । यह किसानों के हकों से जुड़ा हुआ बिल था । यह ठीक है कि उसमें पूंजी बढ़ा दी गई है, लेकिन मैं उस बोर्ड के गठन से सहमत नहीं हूं । उसमें अधिकारियों की भागीदारी की तुलना में किसानों की भागीदारी कम से कम है । कमोबैश वही गलती इस बिल में भी दोहराई गई है । मैं प्राधिकरण के बारे में कहना चाहता हूं। विशेषज्ञ ऐसा नहीं है कि जो सरकारी क्षेत्र में काम करते हैं, वही विशेषज्ञ हैं । बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जो कृषि विशेषज्ञ भले ही न हों, लेकिन उनको उपाधियां मिली हुई हैं । उनको जानकारियां हैं, उनका एकत्रीकरण वास्तव में ज्यादा है । मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि मैं कृषि विश्वविद्यालयों में गया हूं । जबलपुर में कृषि विश्वविद्यालय है, दिल्ली में है। मेरे पास तीन जगहों के आंकड़े उपलब्ध हैं । जहां पर पौधों की किस्में पुरानी से पुरानी हैं और उनके द्वारा उत्पन्न की गई नई किस्में भी हैं, जो पूरी तरह से संरक्षित हैं । मैं मानता हूं कि ऐसी किस्में जहां कृषि विज्ञान क्षेत्र हों, कृषि वैज्ञानिक के अनुसंधान केन्द्र हों और कृषि विज्ञान केन्द्र सरकारी भी हैं और निजी संस्थान भी चला रहे हैं और इसके अलावा कुछ समर्थ किसान भी कृषि विज्ञान केन्द्र स्थापित कर रहे हैं । वे नए सिरे से काम करना चाहते हैं । मैं इन तीनों संस्थाओं के बारे में कहना चाहता हूं । मैं उन्नत किस्मों की बात कह रहा हूं । कृषि विज्ञान केन्द्र के नाम पर नई किस्मों को संशोधित करने या उनमें नई किस्मों के पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं । मैं इन कृषि विज्ञान केन्द्रों और कृषि अनुसंधान केन्द्रों का भी जिक्र करना चाहता हूं, जिनके पास वास्तव में इस दुनिया में उपलब्ध बहुत सारी वैरायटीज के नमूनें हैं, जिनको वे संरक्षित किए हुए हैं और उनसे नई किस्में पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, मैं इनके बारे में बात करना चाहता हूं । मैं उनके बारे में भी बात करना चाहता हूं, जो वास्तव में स्वतन्त्र क्षेत्र में कृषि वैज्ञानिक का काम कर रहे हैं । मैं सरकार का ध्यान इससे भी हठकर दिलाना चाहता हूं । आप थोड़ा आदिवासी अंचलों में जायें, तो वहां जाकर देखेंगे, तो पायेंगे कि जिन पौध किस्मों के वैज्ञानिक नाम कुछ और हैं, जिनकी औषधियों के नाम कुछ और हैं, ग्रामीण क्षेत्रों मे ऐसे पौधे हैं, उनकी जानकारियों गांव वालों के पास ही हैं । उनकी जानकारियां आदिवासियों को है । उदाहरण के तौर पर मैं कह सकता हूं, बायो-डायवर्सिटी बिल पर चर्चा हो रही थी, तब भी मैंने यह बात जोर देकर कही थी, आप कानून बनाने के लिए बैठे हैं, लेकिन हमारे पास संचित पूंजी कितनी है और बौद्धिक सम्पत्ति को ध्यान में रखकर कदम उठाने चाहिए । फसलों के ग्रन्थ नहीं है, लेकिन ऐसे ग्रन्थ हैं, जिनमें फूल-पत्ति, डंठल से लेकर तमाम उपयोगी बातें मौजूद हैं । उनमें इस बात के दिशा-निर्देश हैं, फसलों के बीज किन क्षेत्रों में बाहुल्य में पाये जाते हैं ।
मैं सरकार से निवेदन करना चाहता हूं, आपने इस बिल में पंजीकरण का एक प्रखण्ड रखा है । इस संबंध में पाटिल जी ने जो कहा है, मैं उनकी बात से सहमत हूं । हम किसानों को संरक्षण देना चाहते हैं । बीज पैदा करने वाले लोग किसान होंगे, इस बात की कोई गारन्टी नहीं है । कृषि क्षेत्र बहुत बड़ा है, जहां पर बीज को संरक्षित करते हैं और बीजों की पैदावार को बढ़ाते हैं और दुनियाकी प्रतिस्पर्धा से बचाकर रखना चाहते हैं । हम किसानों के संरक्षण की बात कहते हैं, तो मैं इतना जरूर कहना चाहूंगा कि पंजीयन की व्यवस्था रखनी चाहिए और सामूहिक पंजीकरण की व्यवस्था हमें पूर्ण रूप से संरक्षित करनी चाहिए । हमारे वर्तमान कृषि विज्ञान के संस्थान, सरकारी या गैर सरकारी, जो कृषि के क्षेत्र में काम करते हैं, वे बौद्धिक सम्पत्ति की रक्षा कर सकते हैं । मैं यह निवेदन करना चाहता हूं कि सरकार सामूहिक रूप से पंजीकरण की व्यवस्था कराए । जब मैं यह बात कहता हूं, तो मैं इस बात को भी जोर देकर कहना चाहता हूं कि चरक संहिता को लें, आयुर्वेद को लें, जिनके फूल पत्ती और चित्र हों, जिनका भूगोल हिन्दुस्तान की सीमा के अन्दर हो ।
हम उनकी पहचान कर लें। मेरी जानकारी के अनुसार अभी भी पुरातन प्राचीन ग्रंथों में फूल, पत्तियों और पौधों की किस्मों का उल्लेख है। उनकी पहचान के नमूने हमारे पास मिलें, अगर हम उनकी पहचान, उनका पंजीकरण करा लें तो राष्ट्र की बहुत बड़ी पूंजी का संरक्षण करेंगे। यह जो कानून आया है, इसके लिए हम धन्यवाद देते हैं।
महोदय, मैंने पुराने बिल को पढ़ा है और उसमें इस बात को देखा है कि निश्चित रूप से पुराने मूल बिल में और नये बिल में जो संशोधन लेकर आए हैं, उसके लिए मंत्री जी और सरकार बधाई के पात्र हैं। मैंने पुराने अध्याय को भी देखा है और जो वर्तमान नया अध्याय है उसे भी देखा है। इसमें कहा जाता है क अगर आप कोई चीज पैदा कर लेते हैं तो जब तक उसका पंजीयन न हो जाए तब तक आप न उसे उगा सकते हैं और न ही उसका विस्तार कर सकते हैं। यहां आपने पूरे चेप्टर को अलग कर दिया और अलग से किसानों के हित में एक पूरा खंड लेकर आए। मैं निश्चित रूप से इसकी सराहना करता हूं और आपसे निवेदन करना चाहता हूं कि इन सब के बावजूद यदि कोई किसान या कोई किस्म पैदा करने वाला व्यक्ति दुनिया के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में जाता है, आपने कहा कि सरकार उसके लिए वनियम बनाएगी, मुझे लगता है कि जब विवाद पैदा होगा तो हम वनियम बनाएंगे। मेरा यह कहना है कि उसके पहले हमें उन वनियमों की भी तैयारी करनी चाहिए। मैं जानता हूं कि आप सजग मंत्री हैं, खास कर पौध की किस्म के बारे में। इसके बाद बायो-डायवर्सिटी का बिल आने वाला है। यह सिर्फ कृषि मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र का मामला नहीं है, इसमें वन और पर्यावरण मंत्रालय भी शामिल है तथा बाकी अन्य मंत्रालयों के सहयोग की भी आवश्यकता है। मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं कि इसका केन्द्र बिन्दू सिर्फ कृषि मंत्रालय का क्षेत्र होगा, इसलिए आपको इन बातों का ध्यान रखना होगा कि हम कहां से कानून की इन धाराओं को सुनिश्चित करें, जो अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में हमें संरक्षण दे सके। जब यह बात आती है तो किसान होने के नाते मेरा एक छोटा सा तर्क है। सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से निवेदन करता हूं कि अपनी उपलब्ध पौध किस्मों की पहचान करके उनके पंजीयन की व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए। इतना कह कर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। बहुत-बहुत धन्यवाद।
SHRI SAMAR CHOUDHURY (TRIPURA WEST): Mr. Chairman, Sir, the Bill has been brought before the House with certain amendments, after it had been examined in different places, after it had been discussed with different people, and after it had been examined by the Joint Parliamentary Committee. Though it had been discussed widely, yet it has to be clarified from many angles and corners.
In our country, an overwhelming majority of farmers are small and marginal. They are not only the cultivators, but they also keep the seeds for the next season. This is the practice and that accounts for 70 to 80 per cent of the seed supply in our country.
The World Bank which had financed the growth of the public sector for supply of seeds in India in sixties and seventies, now demands its dismantling and recommends shifting to the private sector and entry of MNCs in the seeds sector of this large rural based country. The impact of the new policies of the so-called liberalisation adopted by the Government is felt even in the seeds sector. There is a change towards privatisation, concentration of the seed industry and displacement of farmer varieties. The policy of giving seed companies a free hand through privatisation and de-regulation resulted in increased costs of seeds and agri-chemicals, increased farm debts and increased crop failure.
Globalisation is leading to the emergence of a new kind of monopolised corporate exploitation, convergence of global market forces with forms of feudal control over the peasantry masses. Farmers’ suicides are the extreme results of these policies of market freedom. Instead of changing these wrong policies, the Government directly extends its supportive measures to the global corporate forces against the peasantry of India. Having ratified the agreement of trade-related aspects on Intellectual Property Rights, the Government tried to start reform by bringing legislation for giving effect to the provisions of the agreement. Uniformity and stability criteria for registration will lead displacement in supply of farmers’ seed and the monopoly of the traders will be strengthened. All over India, the kisans want to know why the Government does not resist the attacks against the peasantry. Why has agriculture been included in the WTO agenda?
The Protection of Plant Varieties and Farmers’ Rights Bill has been examined by the Select Committee and many amendments have also been made. But the Government is friendly with the Marrakech Agreement and is following the dictates of the World Bank, IMF and WTO. What can we expect from them? The Select Committee as also the Joint Parliamentary Committee could not come to a consensus. There are dissent notes on the recommendations. In the original draft of the Bill, the farmers were recognised as only the cultivators and not the breeders. We know that in most of the industrialised countries most farmers depend on the seed industry. Monopolists are ruling the market in those countries. They are involved with merchandise farming and with advanced technology with capitalist mode of production. In our country, landlordism still exists and the peasantry who are tilling the land are generally marginal and small farmers and sharecroppers. I would like to quote some of the points from the dissent notes. It says:
"….. Seventy per cent of the seeds supply is still farmers’ seeds supply in our country."
"….. The impact of the new seed laws to be amended in the context of monopolies already there in places in industrialised countries."
"….. The PVP Bill would prove to be an effective tool through which the consolidation of Seed companies over Indian agriculture would be accomplished. ‘Monosanto’, multinational seed company official Robert Farely has stated, "What you are seeing is consolidation of entire food chain."
"…. The TRIPS Agreement of the WTO is the global instrument that the Biotech industry has used for monopoly control over seed supply."Some specific measures have been provided for protection of the Indian farmers in the Bill. But I could not find them on the points raised in the Joint Parliamentary Committee. We have to be aware of the dangers of food security of our country. Seed is the first link in the food chain. Though the Plant Bill has come to us with some modifications, yet it suffers with basic weakness of friendship with international monopoly, and the corporate bodies. Therefore, I maintain my reservation to give support to this Bill.
PROF. UMMAREDDY VENKATESHWARLU (TENALI): Mr. Chairman, Sir, I rise to support the Bill. This is one Bill which has been brought about by the hon. Minister at the right time, though this was long over due. After its initial introduction, it was referred to the Joint Parliamentary Committee. This Committee, which was headed by Shri Sahib Singh, has done a really good job. It has gone through this entire Bill letter-by-letter, word-for-word, provision-by-provision, and chapter-by-chapter. It had very lengthy discussions which were spread over a few months. It visited a number of institutions in the entire country, taken suggestions from various experts in the field, and had very good interaction with the officers of the Government. After all this hard work, a very good piece of legislation has been brought out. I should congratulate both the hon. Minister, for having brought the Bill, as also Shri Sahib Singh for having headed this Joint Parliamentary Committee to examine the whole Bill.
Sir, I myself being the Member of this Committee, had the opportunity of going… (Interruptions)
श्री राजो सिंह (बेगूसराय): सभापति जी, जो इसकी समति में सदस्य रहे हैं, उनको तो यहां भाषण नहीं देना चाहिए।
PROF. UMMAREDDY VENKATESHWARLU : Sir, I was just mentioning that I had the benefit of seeing several things and the outcome of those discussions as I was also one of the Members of this Committee. Sir, a new chapter, namely, The Farmers’ Rights and Protection has been added to the original Bill. In the earlier Bill, this particular chapter was not there.
16.00 hrs. When we were discussing about the Protection of Plant Varieties and the Farmers"" Rights Bill, the second part of the Bill pertaining to farmers"" rights was not finding a place in the caption separately.
MR. CHAIRMAN : The hon. Member may continue his speech on the next occasion.
*t18 16.02 hrs. Title: Discussion regarding problems being faced by farmers. (Not concluded.) MR. CHAIRMAN: The House shall now take up Discussion under Rule 193 regarding problems being faced by farmers. Shri Ramjilal Suman to initiate the discussion. The time allotted for this discussion is six hours.
श्री रामजीलाल सुमन (फिरोजाबाद): सभापति जी, मुझे प्रसन्नता है कि नियम १९३ के अधीन माननीय सदन में मुझे किसानों के विषय पर महत्वपूर्ण चर्चा प्रारंभ करने का अवसर मिल रहा है।…( व्यवधान )
श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी (खजुराहो): माननीय सभापति जी, जहां तक मुझे ज्ञात है, आप इसे दिखवा लें, बिजनैस एडवाइजरी कमेटी में यह चर्चा हुई थी कि इस पर दो दिन पूरी बहस हो जाए क्योंकि यह किसानों से जुड़ा हुआ मुद्दा है। किसानों के लिए देश के वभिन्न हिस्सों में अनेक समस्याएं पैदा हुई हैं। इसलिए उनकी समस्याओं पर विस्तार से चर्चा सदन में हो, इसके लिए यदि हमें देर रात तक भी बैठना पड़े, तो हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए। अत: मेरा निवेदन है कि इस विषय पर सदन में विस्तार से चर्चा कराई जाए।
कुंवर अखिलेश सिंह (महाराजगंज, उ.प्र.) : सभापति महोदय, बी.ए.सी. के हम भी सदस्य हैं। उसकी बैठक में जब इस विषय पर चर्चा हुई थी, तब यह निष्कर्ष निकला था कि इस विषय पर पूरे दो दिन चर्चा कराई जाएगी। आज देश के ७० करोड़ किसान परेशान हैं। वे बहुत त्रस्त एवं गंभीर संकटों का सामना कर रहे हैं। इसलिए मेरा निवेदन है कि इस विषय पर विचार-विमर्श के लिए समय-सीमा नहीं बांधी जाए बल्कि विस्तार पूर्वक चर्चा चलनी चाहिए। इसके लिए यदि हमें देर रात तक भी बैठना पड़े, तो हम तैयार हैं।
श्री रामजीलाल सुमन : सभापति महोदय, मुझे प्रसन्नता है कि नियम १९३ के अधीन जो किसानों की परेशानी है. जो किसानों की समस्याएं हैं, उन पर मैं चर्चा प्रारंभ कर रहा हूं। इस सदन में कोई ऐसा सत्र नहीं गया है जबकि किसानों की समस्याओं के ऊपर चर्चा नहीं हुई हो बल्कि यह सम्मानित सदन एक बार नहीं अनेकों बार किसानों की बेबसी, लाचारी और परेशानी पर चर्चा करता रहा है। लोक सभा गरीबों, मजदूरों, आम व्यक्ति और किसानों की वकालत करने के लिए हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी पंचायत है, लेकिन जो बहस यहां होती है, जो चर्चा यहां होती है और चर्चा के बाद समस्याओं के निदान की जो अपेक्षा सरकार से होती है, उस दिशा में कोई सार्थक कदम नहीं उठाया जाता। यदि मैं यह कहूं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस मामले में संसद कुछ हद तक अपनी सार्थकता खोती जा रही है।
सभापति महोदय, आज पूरे देश के किसान परेशान हैं। चारों तरफ त्राहि-त्राहि मची हुई है। आए दिन अखबारों में खुदकुशी के समाचार छपते हैं और कोई भी किसान ऐसा नहीं है, चाहे वह किसी भी प्रकार का उत्पादन करने वाला किसान हो, जिसे खुशहाल कहा जा सके। १९५० में जो हमारा सकल घरेलू उत्पाद था उसमें कृषि का योगदान ५५ प्रतिशत था। में यह योगदान सिर्फ ३० प्रतिशत रह गया। आज सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान सिर्फ २४ प्रतिशत है। इसका सीधा मतलब यह है कि कृषि पर जितनी तवज्जोह दी जानी चाहिए, कृषि को जितना संरक्षण मिलना चाहिए था, नही मिला । हिन्दुस्तान में जो ६५-७० फीसदी लोग खेती करते हैं, उनकी हालत को सुधारने का जो व्यवस्थित प्रयास होना चाहिए था, वह व्यवस्थित प्रयास हमारे देश में नहीं हुआ। १९९५-९६ में हमारे देश में कृषि उत्पाद का मूल्य अंतर्राष्ट्रीय बाजार से कम था लेकिन आज वह ज्यादा हो गया है। उसी का परिणाम है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हमारा उत्पाद बिक नहीं रहा है ।सभापति जी, वर्ष २००१-२००२ के बजट में कृषि पर ३,३८० करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान किया गया है जबकि पूरे देश का बजट ३,७५,२२३ करोड़ रुपये का है। जिन लोगों का संबंध कृषि से है, उनकी संख्या ६५-७० फीसदी है। मैं कह सकता हूं कि निश्चित रूप से उन लोगों की उपेक्षा हुई है। १९७१ से अब तक गेहूं का समर्थन मूल्य आठ गुना बढ़ा है जबकि उत्पादन खर्च १५ गुना बढ़ा है। कोई परस्पर उत्पादन लागत एवं भाव का अनुपात हमारे देश में नहीं है। आज किसान जिन चीजों को पैदा कर रहा है और उन्हें पैदा करने में जिन चीजों का उपयोग कर रहा है, उसमें बेतहाशा वृद्धि हो रही है।
अभी कुछ समय पहले प्रधान मंत्री जी ने मुख्य मंत्रियों का सम्मेलन बुलाया था। उसमें स्वयं प्रधान मंत्री जी का यह सुझाव था कि कृषि पर जो बिजली प्रयोग की जाती है, उसकी कीमत बढ़ाई जाये। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में आपका उत्पाद कोई खरीदने वाला नहीं है। डीजल का दाम आपने बढ़ा दिया, खाद का दाम आपने बढ़ा दिया, ऐसी परिस्थिति में आप किसान पर बिजली के दाम बढ़ाने की बात कर रहे हैं। क्या उनको मार डालने का यह व्यवस्थित प्रयास नहीं है ? सही मायने में बिजली सुधार के नाम पर राज्य विद्युत बोर्डों के घाटे को पूरा करने के अलावा और कोई मकसद नहीं है। राज्य विद्युत बोर्ड के जो घाटे हैं हैं, उनका प्रमुख कारण भ्रष्टाचार, अकुशलता, कुप्रबंधन, उचित और आधुनिक तकनीक का अभाव है। इन सब अभावों से इस देश में ५० प्रतिशत बिजली की हानि हो रही है।
सभापति जी, पिछले चार-पांच वर्षों में यह हानि और बढ़ी है। उड़ीसा में पिछले चार पांच वर्षों में २३ प्रतिशत से बढ़कर ५१ प्रतिशत, आंध्रा प्रदेश में २५ प्रतिशत से बढ़कर ४३ प्रतिशत, हरियाणा में ३२ प्रतिशत से बढ़कर ४७ प्रतिशत और राजस्थान में २६ प्रतिशत से बढ़कर ४३ प्रतिशत हुई है। यहां पर साहिब सिंह वर्मा जी बैठे हुए हैं। वे दिल्ली के मुख्य मंत्री रहे हैं। दिल्ली में भी यह हानि ५० प्रतिशत है। इस प्रकार राज्य विद्युत बोर्डों का जो घाटा है, वह २४,००० करोड़ रुपये से लेकर ३०,००० करोड़ रुपये के बीच में है।
ऐसी परिस्थिति में जब किसान त्राहि-त्राहि कर रहा है, किसान खुदकुशी करने को विवश है, उस समय किसान पर बिजली के बोझ को और डाल दिया जाए, मैं समझता हूं कि इससे ज्यादा शर्मनाक बात कोई दूसरी नहीं हो सकती। हमारे देश में रासायनिक खादों का दाम बढ़ा है जबकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में रासायनिक खादों का दाम घटा है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार की परिभाषा भी हम अपनी सुविधानुसार कर लेते हैं। जब हमने पैट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए थे तब एक ही बात कही थी कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का दाम बढ़ गया है। जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में रासायनिक खादों के दाम घटे हैं फिर हमारे देश में बढ़े हैं, इसका मुझे कोई औचित्य समझ में नहीं आता। यूरिया का दाम हमारे देश में १९९७-९८ में ३,६६० रुपये प्रति टन था जो अब बढ़ कर ४,६०० रुपये प्रति टन हो गया है। डी.ए.पी. का दाम १९९७-९८ में ८,३०० रुपये प्रति टन था जो अब बढ़ कर ८,९०० रुपये प्रति टन हो गया है, एम.ओ.पी. का भी १९९७-९८ में दाम ३७०० रुपये प्रति टन था जो बढ़ कर ४,२५५ रुपये प्रति टन हो गया है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जो खादों के दाम कम हुए हैं - यूरिया १९९७ में १८१ डालर प्रति टन था जो जनवरी, २००१ में घट कर १४० डालर प्रति टन रह गया है। डी.ए.पी. का दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार में १९९७ में २४० डालर प्रति टन था जो अब घट कर १९३ डालर प्रति टन रह गया है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में खादों के दाम गिरे हैं जबकि हमारे देश में बढ़े हैं।
मैं आपके मार्फत एक निवेदन और करना चाहूंगा। जो सबसिडी है, उस सबसिडी का प्रयोग कैसे हो रहा है और फर्टिलाइजर उत्पादकों को दी जाने वाली सबसिडी की क्या स्थिति है, इसकी जांच के लिए खुद भारत सरकार ने डा. वाई.के. अलख के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई थी और उस कमेटी की सिफारिशें आ गई हैं। उस कमेटी ने २७ परियोजनाओं की जांच करके पाया कि निजी क्षेत्र की प्राय: सभी परियोजनाओं ने उत्पादन अधिक दिखाया है और उन्हीं फर्जी आंकड़ों के सहारे सबसिडी ली है। इंडो-गल्फ फर्टिलाइजर, जगदीशपुर, टाटा कैमिकल, बबराला, इनमें उत्पादन की १३५० टन क्षमता है जबकि इन्होंने जो फर्जी आंकड़े प्रदर्शित किए हैं, वह १,७४५ और १,७७८ प्रति टन हैं। मैं कृषि मंत्री जी से जरूर निवेदन करना चाहूंगा कि सबसिडी के नाम पर जो घोटाला हुआ है और जिस समति ने इसकी जांच करके अपनी संस्तुति दी है, जिन लोगों ने फर्जी आंकड़े प्रदर्शित करके सबसिडी हजम कर ली है, उनके खिलाफ अवश्य कार्यवाही होनी चाहिए। विश्व व्यापार संगठन की जो शर्ते हैं, उन शर्तों को सामने रख कर हम रोज एक राग अलापते रहते हैं कि सबसिडी कम की जाए। लेकिन अमेरीका जैसा देश, जो आर्थिक उदारीकरण और खगोलीकरण का पक्षधर है, वह एक साल में अपने किसानों को लाखों-करोड़ों रुपये की सबसिडी दे रहा है। १९९८ में अमेरीका के किसानों को ४,१८,४०० करोड की सबसिडी दी गई।
भारत में सब्सिडी को निरन्तर कम करने की बात कही जा रही है। मैं निवेदन करना चाहूंगा कि पिछली बार जब पैट्रोल और डीजल के दाम बढ़े थे, तब सरकार ने एक ही बात कही थी कि अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का दाम बढ़ गया है, इसलिए पैट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाया जाना हमारी मजबूरी है। उस समय ३७ डालर प्रति बैरल क्रूड ऑयल का दाम हो गया था। जो थोड़ी बहुत मुझे जानकारी है, उसके मुताबिक अब अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का दाम २१-२२ डालर प्रति बैरल हो गया है।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री (श्री राम नाईक): अब २७ डालर है।
श्री रामजीलाल सुमन : कहां ३७ और कहां २६ डालर है, १०-११ डालर प्रति बैरल कम हुआ है, आपका तेल पूल का घाटा भी कम हुआ है। जब तेल पूल का घाटा कम हो गया और अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का दाम कम हो गया तो फिर आप डीजल पर पैसा क्यों नहीं कम कर देते। खतरा यह लगता है कि ये दाम बढ़ाने वाले हैं। जो बात आपने आधार मानकर कही थी कि हमारी मजबूरी है, अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का दाम बढ़ गया है, इसलिए हमको पैसे बढ़ाने पड़ रहे हैं, जब अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का दाम कम हो गया तो मैं समझता हूं कि सरकार को उसके दाम घटाने चाहिए, लेकिन इस मामले में यशवन्त सिन्हा जी और राम नाईक जी में परस्पर कोआर्डीनेशन नहीं है, क्योंकि अखबार में जो बयान छपे हैं, वे दोनों के अलग-अलग हैं, विरोधी हैं।
यह भारतीय रिजर्व बैंक का २७ जुलाई, २००० का एक सर्कुलर है। इस सर्कुलर में यह है कि ५ करोड़ रुपये तक के ऋण किसी भी काम के लिए लिया गया हो, चाहे उद्योग के लिए, चाहे कृषि के लिए, ३१ मार्च, १९९७ के पूर्व के ऋण का मूलधन देकर ब्याज देने की जरूरत नहीं है, लोग मूलधन देकर मुक्ति पा सकते हैं। जो लोग तिकड़मबाज हैं, चालाक हैं, पढ़े-लिखे हैं, वे तो जल्दी चीजों को समझ लेते हैं, क्योंकि ये जो खबरें छपती हैं, दिल्ली और देश के बड़े-बड़े अंग्रेजी के अखबारों में छपती हैं, जिससे किसानों का कोई सम्बन्ध नहीं होता। जो ग्रामीण बैंक हैं, क्षेत्रीय बैंक हैं, उन्होंने इस आशय की कोई जानकारी किसानों को नहीं दी, न वहां कोई स्थानीय अखबारों में उनकी भाषा में कोई खबर छपी, न बैंक ने कोई इश्तहार छापा, न तहसीलदार ने किसानों को कोई जानकारी दी, न कलैक्टर के यहां से उनको कोई जानकारी मिली। उसका नतीजा यह है कि रोज किसान तहसील की जेल में बन्द हो रहे हैं, रोज उनके घर पर छापा पड़ता है और रिजर्व बैंक के सर्कुलर का कोई लाभ किसानों को नहीं मिला। इस लाभ की अन्तिम तारीख ३१ मार्च है। किसान भी इससे लाभान्वित हों, उसके पास सही जानकारी पहुंचे, इसलिए मेरा सरकार से विनम्र आग्रह है कि रिजर्व बैंक के सर्कुलर की समयावधि कम से कम छ: महीने किसानों के लिए और बढ़नी चाहिए। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि देश के किसान का बहुत बुरा हाल है और सरकार की तरफ से जो संरक्षण और सहयोग किसान को मिलना चाहिए, वह संरक्षण और सहयोग नहीं मिल रहा है। आलू किसान परेशान है। सरकार ने पिछली बार धान का जो समर्थन मूल्य ५१० रुपये घोषित किया था, खरीद केन्द्र न खोलने की वजह से उसको धान २५०, ३०० और २७५ रुपये क्िंवटल तक बेचना पड़ा। किसान की उत्पादन लागत आसमान को छू रही है।
किसान का उत्पादन नहीं बिक रहा है। गन्ना किसानों का अरबों रुपया सरकार पर बकाया है। इस सदन में बार-बार चर्चा होने के बावजूद भी देश की इस ७०-७५ प्रतिशत आबादी के लिए सरकार की तरफ से जो राहत दी जानी चाहिए, वह नहीं दी जा रही है। हिन्दुस्तान का बजट जब तक कृषि पर आधारित नहीं होगा, तब तक इस देश का भला किसी भी कीमत पर नहीं हो सकता। किसान आज संकट में है, उसका उत्पादन नहीं बिक रहा है। उसके उपयोग आने वाली चीजें खाद, बिजली आदि के दाम बढ़ रहे हैं। यह किसानो को बर्बाद करने के अलावा और कुछ नहीं है। मैं सरकार से पुरजोर निवेदन करूंगा कि अगर हिन्दुस्तान का अर्थतंत्र वाकई में पटरी पर लाना है तो इस देश के किसान की हालत को सुधारने के अलावा और कोई जरिया नहीं है। इस सार्थक चर्चा के बाद भारत सरकार और विशेषरूप से कृषि मंत्री जी किसानों की हालत सुधारने का सार्थक प्रयास करेंगे। यही कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री साहिब सिंह (बाहरी दिल्ली) : सभापति जी, किसान परेशान है, इसमें कोई संदेह की बात नहीं है। यह देश किसानों का देश है, यह देश गांवों का देश है, यह बात सही है। पिछले दिनों प्रधान मंत्री जी ने भी, सरकार ने भी और इस माननीय सदन के सदस्यों ने भी इस पर चिंता जताई है। लगातार किसान के उत्पादन की लागत बढ़ रही है। प्रधान मंत्री जी ने भी आज कहा है कि लागत कम होनी चाहिए। आज भी किसान के पास बिजली की ठीक व्यवस्था नहीं है। उसको खेत में पानी देने के लिए बिजली की जरूरत होती है। कई-कई राज्य तो ऐसे हैं जिनमें दो-तीन घंटे मुश्किल से बिजली मिलती है।
१६२३ ण्द्ध. (डॉ. लक्ष्मीनारायण पाण्डेय पीठासीन हुए) डीजल के भाव बढ़े, इसमें भी कोई संदेह नहीं है। जब हमारे कांग्रेस के मित्रों की सरकार ने डब्ल्यू.टी.ओ. पर हस्ताक्षर किए थे, उसके बाद से लगातार किसानों की परेशानी बढ़ती चली गई। किसान इतना परेशान हो गया कि उसको उत्पादन लागत भी नहीं मिली। मैं जानता हूं मेरे एक मित्र, जिन्होंने पिछले साल आलू बोया था, उस वक्त उसका बाजार भाव ११० रुपए प्रति क्िंवटल था। उन्होंने सोचा कि सस्ता है, मैं इसको कोल्ड स्टोरेज में रख देता हूं और जब दाम बढ़ेगा तो बेच दूंगा। साल भर में उसका किराया ही ८० रुपए के करीब आया और एक साल बाद बाजार में उसका भाव ८० रुपए प्रति क्िंवटल भी नहीं रहा। इस कारण वह अपना आलू उठाने कोल्ड स्टोरेज में भी नहीं गया, क्योंकि किराया देने के लिए भी उसके पास पैसे नहीं थे। जबकि उसने वहां आलू इस आशा में रख दिया था कि उसको अधिक पैसे मिलेंगे और वह जो पहले मिल रहे थे, उसे भी गंवा बैठा।
देश में किसान बहुत परेशान है। जिस तरह से सरसों का भाव गिरा, वह सब जानते हैं। उसका गेहूं गोदामों में रखा हुआ है। देश में पानी की कमी नहीं है। मैं अपने लोक सभाध्यक्ष जी के साथ उनके क्षेत्र में गया था। उनके क्षेत्र में महानदी बहती है। उन्होंने बताया कि इस नदी का पानी, नदी के साथ वाले खेतों में नहीं मिलता, करीब ८० प्रतिशत पानी समुद्र में जाता है। पिछले ५० साल में इस देश में अगर पानी का ठीक प्रबंध किया होता तो आज कहीं पर जो बाढ़ और सूखा आता है, वह नहीं आता। क्या ५० साल में इंतजाम नहीं हो सकता था, लेकिन गम्भीरता से किसान की समस्याओं के समाधान के लिए प्रयास नहीं किया गया। आज भी ८० प्रतिशत किसानों के खेत में पानी नहीं पहुंचता। मैं एक गांव में गया।
मैं वहां एक गांव में गया था जो पहले मध्य प्रदेश में था लेकिन अब छत्तीसगढ़ राज्य में है। वहां नदी पानी से भरी हुई है और मैंने किसानों से पूछा कि आप पानी क्यों नहीं ले सकते तो उन्होंने कहा कि हमारे पास पंप खरीदने के लिए पैसे नहीं है, टयूबवैल लगाने के लिए पैसे नहीं है। इस तरह की जो समस्याएं हैं, वे पिछले पचास वर्षों से किसानों के साथ रही हैं और जिन्होंने किसानों को बर्बाद करके रख दिया है। किसानों के नाम से जो सरकारें यहां रहीं, वे वोट तो लेती रहीं, ढोंग भी करती रही और अच्छे-अच्छे नारे भी देती रहीं और किसानों के ऊपर राज भी करती रहीं। पिछले दिनों जो मैंने सदन में कुछ बातें कही और जब इस माननीय सदन में विपक्ष की नेता भी थी, उप नेता भी थे, मैंने जब कहा कि किसानों के नेताओं ने कुछ बातें कही हैं, तब बड़ा शोर मचा था और ठीक मचा था। वे अब मानते हैं कि वे किसानों के मित्र नहीं हैं, ये अब मानने लगे हैं कि हमने किसानों के बारे में कभी ईमानदारी से नहीं सोचा, हमने किसानों का साथ कभी नहीं दिया। वे अब मानते हैं कि हमने किसानों के लिए न कभी पानी और न कभी बिजली का इंतजाम किया। किस किसान को कौन सी फसल कब बोनी चाहिए, क्या इसके बारे में कभी किसान को एजुकेट किया गया? जितनी टैक्नॉलोजी और रिसर्च हुई है, क्या वे कभी किसान तक पहुंचाई गई? मैं जानता हूं कि जो किसान सौ वर्ष तक जिस खेत में गेहूं बोता था, आज भी वहीं बोता है, जिस खेत में जवाहर बाजरा बोता था, आज भी वहीं बोता है। आज हमारे देश के अंदर जिन चीजों की आवश्यकता है, वे बाहर से मंगानी पड़ती हैं।…( व्यवधान )मुझे इस बात की खुशी है कि जब से यह सरकार आई है, इस सरकार ने आने के बाद किसानों के लिए जो कभी पचास साल तक किसान नीति नहीं बनी, इस सरकार ने कृषि नीति बनाने का फैसला किया है और उसकी घोषणा की है। जो किसान क्रैडिट कार्ड की बात पचास साल से होती रही, पचास साल के बाद इस सरकार ने किसानों के लिए क्रैडिट कार्ड इश्यू किये। न केवल क्रैडिट कार्ड इश्यू किये हैं बल्कि एक करोड़ से ज्यादा किसानों को कार्ड भी दे दिये गये हैं और तीन साल में जितने और भी किसान इसके लिए एलजिबल होंगे, उन सबको कार्ड दे दिये जाएंगे। न केवल क्रैडिट कार्ड ही दिये गये हैं बल्कि इस बजट में इसके बाद की भी व्यवस्था कर दी है कि अगर वह कार्डधारी, जिसको कार्ड मिला हुआ है, अगर कोई हादसा हो जाता है या किसी दुर्घटना में उसकी मौत हो जाये या वह अपंग हो जाये तो उसके लिए बीमे की भी व्यवस्था की गई है। ऑटोमैटिकली अगर वह अपंग हो जाता है तो उसे २५,००० रुपये मिलेंगे और दुर्भागय् से अगर उसकी डैथ हो जाती है तो ५०,००० रुपये मिलेंगे और उसके लिए उसे अलग से कोई किश्त या कोई प्रीमियम नहीं देना पड़ेगा ताकि अगर कार्ड लेकर यदि किसान के ऊपर कोई कर्जा चढ़ा हो तो वह किसी घरवाले को नहीं देना पड़ेगा बल्कि घर वालों को कुछ पैसा मिलेगा।…( व्यवधान )
श्री अनिल बसु (आरामबाग): बैंक के प्राइवेटाइजेशन के बाद क्या होगा? किसान को क्या मिलेगा?
…( व्यवधान )
श्री साहिब सिंह : मैं यह निवेदन कर रहा था कि अगर किसी ने किसानों की चिंता की है तो वह अब किसानों की चिंता शुरु हुई है। आपमें से कोई बता दें, यहां सभी पार्टी के सदस्य बैठे हैं, किसानों के नेता और किसानों के हमदर्द भी बैठे हैं, कुछ सच्चे और कुछ मिथ्या बैठे हैं, यहां एक बात भी बता दें कि क्या कभी किसी ने किसानों के लिए क्रैडिट कार्ड और फसल बीमा योजना के संबंध में कभी कोई प्रस्ताव पास किया है या कभी आज तक किसानों के बोर में कोई कार्यवाही की है या कृषि नीति की घोषणा की है? कोई भी एक काम किया हो तो बता दें। आज हमने गरीबों के लिए, खेतिहर मजदूरों के लिए बीमा योजना बनाई है और खेतिहर मजदूरों के लिए तो यह भी किया है कि यदि उसका बच्चा स्कूल नहीं जाता तो तीन बच्चों तक सौ रुपये महीना दिया जाएगा ताकि किसान के बच्चे पढ़ सकें। यह बात सही है कि इस देश में साक्षरता नहीं है। इस देश में अगर तरक्की नहीं है तो पढ़ाई के कारण से नहीं है और पढ़ाई इसलिए नहीं हो रही है कि देश में गरीबी है। अगर गरीब के बच्चे को पढ़ा दिया जाये और वह स्कूल जाने लगे तो खेती में कंट्रोल आ जाएगा और कृषि की जानकारी उसे ज्यादा होगी। इस सरकार ने बहुत कुछ काम किया है, मैं इसके लिए सरकार को बधाई देना चाहता हूं और मैं अपने मित्र को कहना चाहता हूं कि जितनी भी योजनाएं हैं, यह बात सही है कि पिछले पचास सालों के अंदर, समाज में, गरीबी, असमानता और बेरोजगारी बढ़ी है।
गरीब भी बढ़ी है, असमानता भी बढ़ी है, बेरोजगारी भी बढ़ी है । क्यों बढ़ी है? क्योंकि उसके अन्दर भ्रष्ट राजनीतिक थे, बेईमान आफिसर थे और समाज विरोधी व्यापारियों को पैदा किया । इस कारण ये सारी चीजें बढ़ी है । अगर भ्रष्ट राजनीतिक नहीं होते, तो बेईमान आफिसर नहीं होते और समाज विरोधी व्यापारी भी नहीं होते । ये सारी समस्यायें पैदा हुई हैं । गरीब और गरीब होता चला गया है, अमीर और अमीर होता चला गया है । …( व्यवधान )अगर आपने कोई दोष नहीं किया है, आपका कसूर नहीं है, तो आप क्यों बोल रहे हैं । आप शान्त रहिए…( व्यवधान )कुछ दिन पहले आप कह रहे थे कि भारत के अन्दर बहुत सारी चीजें आती हैं और इस कारण किसान परेशान हैं। आपने इस बजट में देखा होगा कि किस तरह से चाय, काफी, कोकोनट, सोयाबीन, सनफ्लावर और आयल आदि चीजों पर इतनी ज्यादा डयुटी बढ़ा दी गई है कि कोई व्यक्ति इन चीजों को बाहर से लाने की हिम्मत नहीं कर सकता है। इससे किसानों को उनके उत्पादन की कीमतें मिलेंगी। यह बात सही है कि जो सपोर्ट प्राइस दी जाती है, उसको चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत है, क्योंकि किसानों को दिक्कते पैदा होती हैं । राज्यों में वभिन्न दलों की सरकारें हैं, कांग्रेस दल की भी सरकारें हैं, सीपीआई और सीपीएम की मिली-जुली सरकारें भी हैं, राज्यों को अधिकार दे दिया गया है कि वे सामान को प्रोक्योर करें, गोडाउन्स में डालें और बांटें । इसमें कोई सन्देह नहीं है कि पिछले पचास वर्षों में पीडीएस द्वारा जितनी धांधली हुई, उसके लिए पिछली सरकारें दोषी हैं, जहां बेईमानी के बगैर काम ही नहीं चलता था । उसको ठीक करने के लिए यह बात जरूर है, हम जिस किसान को, जिस गरीब को राशन देते हैं, वह उसको नहीं मिलता है । कैरोसिन आयल २५ प्रतिशत ही गरीब आदमी के पास पहुंच पाता है और ७५ प्रतिशत कैरोसिन आयल इधर-उधर चला जाता है और मिलावट पैदा कर दी जाती है। इससे बहुत सारी दिक्कतें पैदा होती हैं, जिनको चुस्त-दुरुस्त करने की आवश्यकता है ।
महोदय, मैं एक बात और कहना चाहता हूं, पिछले काफी दिनों से किसान परेशान रहा है, किसान दुखी रहा है, इसके पीछे कारण यह रहा है कि नेताओं ने किसानों के कभी संगठित नहीं किया, बल्कि किसानों को बांट दिया । अगर किसानों को संगठित किया होता और स्टेट के अन्दर जो संगठित रहते हैं, वे सब चीजों का लाभ ले लेते हैं, किसान संगठित नहीं रहे, तो उनको भी कोई लाभ नहीं मिला । मैं एक शेर अर्ज करना चाहता हूं - शिकवा सैयाद का ए बुलबुले नौशाद न कर, तू गिरफ्तार हुई है अपनी सदा के बाइस । किसान अपनी शराफत के कारण, अपनी ईमानदारी के कारण, अपने भोलेपन के कारण किसान परेशान हुआ है । हम सभी सांसदों को चाहिए कि किसानों को संगठित करें । उनको उनके अधिकारों के बारे में बतायें । जिस बिल पर सदन में चर्चा हो रही थी, उस बिल के माध्यम से किसानों को पहली बार अधिकार दिया गया है । उस बिल के माध्यम से पूरे अधिकार दिए गए हैं। किसानों के अधिकारों को कोई छीन नहीं सकता है । यह बात सही है कि टि्रप एग्रीमेंट के कारण अगर जांच की जाए, अगर ठीक प्रकार से कानून बनायेंगे, तो कोई किसान को मार नहीं सकेगा । प्रधान मंत्रीजी ने ठीक कहा है कि हमें पलायन नहीं करना है, बल्कि हमें चेलेंजेज का मुकाबला करना है । चैलेंज का मुकाबला करने के लिए, जो WTO से एग्रीमेंट हुआ है, टि्रप एग्रीमेंट हुआ है, जो कानून बनाने जा रहे हैं, उन सबको हमें देखना होगा। हमने कस्टम डयुटी बढ़ाई है, उससे आयात नहीं होगा, लेकिन हमें इस स्थिति को रोज-रोज देखना होगा । हमारे वित्त मंत्री जी ने कहा है कि स्थिति को रोज देखेंगे और हमें कोई मैकेनिज्म बनाना होगा । जब मैकेनिज्म बन जाएगा, व्यवस्था बन जाएगी, जहां कहीं भी किसानों के साथ नुकासन हुआ है, डयुटी बढ़ाने का काम करना है, तो हम तुरन्त करेंगे । किसानो को ठीक प्रकार से शक्षित करने के लिए मैं चाहता हूं कि टेलीविजन में किसान चैनल होने की आवश्यकता है, ताकि किसानों को पता चले कि क्या बोना चाहिए और क्या नहीं बोना चाहिए । कहीं कोई बीमारी पैदा होती है, तो उसको ठीक करने के लिए किस चींज की आवश्यकता है ।
महोदय, मैं कहना चाहता हूं कि हमने फसल बीमा योजना की बात भी कही है ।
किसान का पशु भी किसान के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, जितनी फसल महत्वपूर्ण है। जो किसान डेरी फार्मिंग वगैरह करते हैं, उनके लिए पशु बहुत महत्वपूर्ण है और जो बैलों से खेती करते हैं, उस किसान के लिए पशु महत्वपूर्ण है। हमने जो यह बात की है कि हम फसल का बीमा करेंगे, उसके साथ-साथ हमें पशुओं का बीमा करने की योजना भी बनानी चाहिए। आज देश में जो लैंड एक्वीजिशन एक्ट है, वह १८९४ का है। आजादी से ५०-५५ साल पहले का कानून है, जो अंग्रेजों के बनाए हुए कानून थे, उन्हें बदलने की जरूरत है। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि आज हिन्दुस्तान की राजधानी में डीडीए के पास जो हजारों-करोड़ों रुपए हैं, वे किसान के पैसे हैं। आज किसान की जमीन एक-दो रुपए गज में डीडीए ने एक्वायर की, उसे एक्वायर करके हजारों-लाखों रुपए गज बेचा, उससे हजारों-करोड़ों रुपए प्राप्त हुए। उस पर किसान का कोई हक नहीं है लेकिन जिस प्लाट को किसान से एक्वायर करके डीडीए ने लिया था, अगर वह प्लाट किसी दूसरे को बेचता है तो उस पर जो मुनाफा होता है, उसमें ५० फीसदी डीडीए लेता है। हालांकि जमीन आर्जिनली किसान की थी, लेकिन किसान को एक पैसा भी नहीं मिलता। किसान को एक बार दिया, उसके लिए भी किसान को धक्के खाने पड़े थे। एक बार देने के बाद किसान को पैसा नहीं दिया जाता, इसलिए ऐसे कानून में परिवर्तन करने की आवश्यकता है।
महोदय, दिल्ली की सरकार, जिसकी सरकार के नुमाइंदे, जिनकी पार्टी की सरकार हमारे सामने विपक्ष में बैठी है, आप ताज्जुब करेंगे कि जब से सरकार बनी है यह घोषणा की गए, एक सम्मेलन किया गया और उसे किसान सम्मेलन का नाम दिया गया। किसानों के विरोधियों ने किसानों का सम्मेलन किया और वहां मुख्य मंत्री ने घोषणा की कि हमारी पार्टी के नेता ने कहा है इसलिए मैं किसान का मुआवजा २३ लाख रुपए एकड़ घोषित करती हूं। उस दिन से अभी तक फाइल नहीं बनी। मुख्य मंत्री को किसान का मुआवजा बढ़ाने की पावर नहीं है। लेफ्टिनेंट गवर्नर को प्रपोज़ल पुटअप करना होता है। जिस दिन घोषणा की, मैं दावे के साथ कहता हूं कि तब से कोई प्रपोज़ल पुटअप नहीं किया और २३ लाख रुपए का जो हमने प्रोविजन किया था, जब मैं मुख्य मंत्री था तो हमने यह प्रोविजन किया था कि किसानों को धक्के नहीं खाने पड़ेंगे। हर साल १२ प्रतिशत मुआवजा पहली अप्रैल से अपने आप बढ़ जाएगा। जब तक मैं मुख्य मंत्री रहा तब तक बढ़ा, उसके बाद नहीं बढ़ा। सन् २००१ में कहा गया है कि हम २३ लाख रुपए कर देंगे, जब कि १२ प्रतिशत बढ़ाने से २४ लाख बनता है। वे कहते हैं कि हमने २३ लाख रुपए मुआवजा कर दिया। उन्हें जानकारी नहीं है या गिनती नहीं आती। इस तरह के अन्याय किसानों के साथ हो रहे हैं।
महोदय, हमने दिल्ली में तय किया था, क्योंकि किसान की होर्डिंग छोटी होती जा रही है और आबादी बढ़ती जा रही है तो किसान खेत पर निर्भर रहता है। वह भूखा मरता है। आधे काम करते हैं और आधे बेकार हो जाते हैं। हमने यह तय किया था कि किसान को एक ३०० गज इंडस्टि्रयल प्लाट, उसी की अपनी जमीन में से ३०० गज के प्लाट को इंडस्ट्री के लिए मार्क करेंगे। जहां किसान के बच्चे छोटे-मोटे उद्योग-धंधे करेंगे। कॉटेज इंडस्ट्री बनाएंगे। इस सरकार ने आने के बाद उस ३०० गज के प्रोविजन को पूरी तरह से खत्म कर दिया और ये कहते हैं कि हम किसानों के हितैषी हैं। हम उन्हें रहने के लिए और पशुओं के लिए २२ सौ गज का प्लाट देते थे, इन्होंने उसे खत्म करके एक हजार गज कर दिया। दिल्ली की सरकार की एक भी नीति ठीक नहीं है। आप दिल्ली की सरकार की नीतियां देख लो तो आपको पता चल जाएगा कि कांग्रेस क्या चाहती है और क्या कहती है। कांग्रेस के दांत खाने के ओर हैं और दिखाने के ओर हैं। ये लोग किसान के नाम पर सम्मेलन करते हैं, लेकिन ये सारी किसान विरोधी नीतियां बनाते हैं। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि जो पार्टियां कहती हैं कि हम किसान की, मजदूरों की पार्टियां हैं, जो कम्युनिस्ट या किसी दूसरे के नाम पर प्रदेशों में राज करती रही हैं, आज वे नहीं बता सकते कि उन्होंने कौन सा चमत्कार करके दिखाया कि उस प्रदेश के किसान फले-फूलें हों, उनकी तरक्की की हो। इस देश के शहरों के विकास का अगर कहीं से रास्ता होकर गुजरता है तो वह गांवों से होकर गुजरता है। अगर गांवों में विकास होगा तो शहरों में लोग नहीं आएंगे, इसलिए हमें गांवों में विकास करने की जरूरत है।…( व्यवधान )
अगर वहां छोटे-मोटे उद्योग-धंघे चलाएंगे तो गांवों से शहरों में कोई नहीं आएगा। इसलिए शहरों की समस्या का समाधान करना है तो गांवों, किसानों और मजदूरों का विकास करना होगा। दुनिया में इन चीजों की बहुत अच्छी मार्केट है।
दुनिया के अंदर कॉटेज इंडस्ट्रीज, हैंडीक्राफ्ट्स, हाउस होल्ड इंडस्ट्रीज की चीजों की बहुत डिमांड है।
सभापति महोदय, आज इस बात की आवश्यकता है कि इसके लिए सरकार को और कदम उठाने पड़ेंगे, चूंकि यह कृषि और ग्रामीण विकास का मामला है। केन्द्र सरकार ने इसके लिए बहुत पैसे का प्रावधान किया है। सब राज्यों को पैसा दिया जा रहा है। जिस-जिस की भी सरकार जिस प्रदेश में हैं, उन्हें उसमें अधिक काम करने की आवश्यकता है, वहां के गांवों के लिए काम करने की आवश्यकता है। अगर वे इनके लिए काम करेंगे तो किसानों की समस्या हल होगी। निश्चित रूप से हम सब सोचें, विचार करें, हम पार्टीबाजी की बात छोड़ दें। जहां किसान की बात आती है वहां सबको मिलकर किसान के विकास की बात सोचनी चाहिए। आज तक किसान जिस वजह से मरता रहा, उसके बारे में हम सबको गंभीरता से सोचना चाहिए।
सभापति महोदय, इकबाल ने एक शेर कहा था -
"जिस खेत से दहकां तो मयस्सर न हो रोटी, उस खेत के हर गोशा-ए-गंदुम को जला दो।" यह बात अगर कहने की नौबत आई थी तो इसलिए आई थी क्योंकि किसानों की हालत बहुत खराब थी और आज भी किसानों की हालत बहुत खराब है। हालांकि उसमें बहुत सुधार किये गये हैं, उनके लिए बहुत काम किये गये हैं। यह सरकार किसानों के लिए बहुत काम कर रही है। आज प्रधान मंत्री जी ने भी स्वीकार किया है कि अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है, किसानों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। यदि किसानों की हालत ठीक होगी तो देश की हालत ठीक रहेगी। किसान स्वस्थ रहेगा तो देश स्वस्थ रहेगा। किसान मजबूत होगा तो देश मजबूत होगा। यदि किसान अच्छे होंगे तो देश अच्छा होगा। इसलिए हम सब इस पर मिलकर विचार करें औऱ इसके लिए काम करें।
श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी :माननीय सभापति महोदय, किसानों की समस्याओ को लेकर आज हम यहां चर्चा करने के लिए उपस्थित हुए हैं। मुझे स्मरण आता है कि यह वही देश है जहां चंद्रगुप्त मौर्य के जमाने से लेकर सारा इतिहास गवाह है कि इस देश को दुनिया के लोग सोने की चड़िया मानते थे और तब इस सम्पन्न भारत के लिए किसी अम्बानी, किसी टाटा, किसी बिरला किसी उद्योगपति की जरूरत नहीं पड़ी थी। उस समय इस देश का कर्णधार अगर कोई था तो वह इस देश का किसान था। रात-दिन मेहनत, मजदूरी करके उसने अपना खून और पसीना लगाकर इस देश को बढ़ाया था। किसान इस देश का संबल था।…( व्यवधान )
श्री दिलीप संघाणी (अमरेली): कांग्रेस ने पूरा नष्ट कर दिया।…( व्यवधान )
सभापति महोदय : आप डिस्टर्ब मत करिये, बैठे-बैठे रनिंग कमेन्ट्री मत करिये।
कुंवर अखिलेश सिंह: आप लोग तो देश को बेच रहे हैं।
सभापति महोदय : आप डिस्टर्ब मत करिये, उन्हें बोलने दीजिए। बैठे-बैठे रनिगं कमेन्ट्री करना ठीक नहीं है, इस तरह से बोलना ठीक नहीं है।
श्रीमती भावनाबेन देवराजभाई चिखलिया (जूनागढ़) : कांग्रेस की गलत नीतियों के कारण किसानो की यह हालत हुई है।…( व्यवधान )
श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी :माननीय सभापति महोदय, १९४७ में यह देश आजाद हुआ। मैं अपेक्षा कर रहा था वर्मा जी अपनी बातें कह गये हैं तो जरा सुनने के लिए भी बैठते, परंतु उनकी कोई मजबूरी रही होगी। मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं, इस नाते नहीं कि वर्मा जी मुख्य मंत्री रहे हैं, बल्कि इसलिए कि वे किसान परिवार से आये हैं, किसान के बेटे हैं, इसलिए मेरे मन में उनके लिए बहुत सम्मान है। यह बात अलग है कि उनकी मजबूरी थी और उनकी मजबूरी को हम सब समझ सकते हैं। ह्ृदय के भीतर वह इस पीड़ा को महसूस कर रहे हैं। लाख छिपाने के बावजूद उनकी भाषा से भी यह छलक पड़ा कि वह महसूस करते हैं कि इस देश के किसान दुखी हैं, पीड़ित हैं, आहत हैं।
सभापति महोदय, १९४७ में जब देश आजाद हुआ था तो इस देश की आबादी ३६ करोड़ थी।
३६ करोड़ की आबादी का पेट भरने के लिए इस देश में जिस दुर्दशा में हमें अंग्रेज़ छोड़कर गए थे, इस देश की जो दशा थी -- किसानों की, खेत की, लैन्ड रिफ़ॉम्र्स की, उन सबका यह परिणाम था कि पेट भरने के लिए हमें बाहर के देशों से अनाज मंगाना पड़ा। वर्मा जी ने यहां पर ऐसे सब कुछ कहा जैसे कांग्रेस ने ही किसानों का सत्यानाश किया हो।…( व्यवधान )
श्री प्रहलाद सिंह पटेल :अगर बुंदेलखंड का हिसाब देखें आज़ादी के बाद का तो मुझे लगता है कि वर्मा जी ने गलत नहीं बोला।
श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी : आप कृपया विराजें। जब आपका बोलने का अवसर आए तो पूरी तरह से अपनी बात कहें। सभापति जी, मैं अनुरोध करूंगा कि मैं अमूमन दूसरों के बोलने में हस्तक्षेप करने का आदी नहीं हूं। थोड़ा सा कृपा करके मुझे बोलने दें।
माननीय सभापति महोदय, इसी देश में आज सौ करोड़ की आबादी है और इस सौ करोड़ की आबादी में आज भी इस देश के अंदर…( व्यवधान )
माननीय सभापति महोदय, १९७० के दशक में इस देश के अंदर हरित क्रांति लाने का एक सपना देखा गया। योजनाबद्ध तरीके से इस देश के अंदर नए रिफॉम्र्स लाए गए और अनुसंधान को बढ़ावा दिया गया। नई तकनीकों को लाया गया, नए बीजों को लाया गया, किसानों के लिए सिंचाई के साधन उपलब्ध कराए गए, विद्युत पहुंचाने का काम गांव-गांव में व्यापक पैमाने पर किया गया और इन सब कृषि विस्तार के कामों को गांवों तक पहुंचाने के लिए पूरा तंत्र विकसित किया गया। यह एक रात में, एक दिन में, एक साल में या दो साल में नहीं हुआ, लेकिन कुछ वर्षों के अंदर ही हुआ और यह वही देश था जो पी.एल.४८० के लिए दूसरों के सामने कटोरा लिए खड़ा होता था। इस देश में आज सौ करोड़ की आबादी होने के बावजूद भी एफ.सी.आई. के गोदामों में अनाज इतना भरा पड़ा है कि हमारे पास नए साल की फसल रखने के लिए जगह नहीं है। …( व्यवधान )लाखों टन अनाज हमारे गोदामों में सड़ रहा है। आज ही प्रधान मंत्री कह रहे थे और ठीक बात कह रहे थे तथा मैं उनकी बात से सहमत हूं कि आज क्राइसेज़ इस बात का नहीं है कि कमी है। आज समस्या इस बात की है कि इफरात से हम कैसे निपटें। और यह सब केवल दो सालों में हो गया, भारतीय जनता पार्टी की सरकार के जमाने में हो गया? अगर ऐसा क्लेम आप करना चाहते हैं, अगर ऐसी खुशफहमी में आप रहना चाहते हैं तो मुझे उस पर कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि सारा विश्व और सारा देश जानता है कि इन दो वर्षों में यह सब कुछ नहीं हुआ। जो कुछ भी अच्छा हुआ पिछले पचास वर्षों में चाहे वह कृषि के क्षेत्र में, विज्ञान के क्षेत्र में, विकास के क्षेत्र में, शिक्षा के क्षेत्र में, जो कुछ भी अच्छा हुआ, वह पिछले दो साल के अंदर हो गया और जो कुछ भी नहीं हो पाया, वह सारे का सारा दोष कांग्रेस का है, ऐसी मान्यता अगर कुछ लोगों की है तो उस मान्यता को सुधारने में उनकी कुछ सहायता मैं कर पाऊंगा, मुझे नहीं लगता। क्योंकि सोते को जगाया जा सकता है लेकिन जागे हुए जो सो रहे हैं, उनको नहीं जगाया जा सकता। मैं आज की स्थिति के बारे में यह कह रहा हूं।
माननीय सभापति महोदय, हम विरोधी दल के सदस्य होने के नाते कुछ कहें तो शंका उठाई जा सकती है कि मुमकिन है कि राजनीतिक कारणों से हम कोई बात कर रहे हैं, लेकिन इस देश का मीडिया जो निष्पक्ष रूप से सारे देश के वभिन्न घटनाक्रमों की जांच करता है, नज़र रखता है और एक स्तंभ माना जाता है हमारे लोकतंत्र का, आज इस देश का मीडिया किसानों की स्थिति के बारे में कहता है, मैं चंद उदाहरण आपके सामने पेश करता हूं। एक राष्ट्रीय पत्रिका है, मैं उससे उद्धरण देना चाहता हूं।
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): उसके मुखपृष्ठ पर क्या लिखा है, वहां से शुरू करें।
श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी : इसके मुखपृष्ठ पर लिखा है ‘ खेती करे सो मरे।’ …( व्यवधान )
माननीय सभापति महोदय, मैं कोट करता हूं-
"पिछले कछ महीनों में स्वतंत्र भारत को सबसे बड़े और रहस्यपूर्ण कृषि संकट का सामना करना पड़ा। सबसे बड़ा इसलिए कि पंजाब से केरल और गुजरात से असम तक हर प्रदेश को ही नहीं बल्कि अनाज, तिलहन और फलों तक की फसलों को अपनी चपेट में लिया है और रहस्यपूर्ण इसलिए कि अप्रत्याशित रूप से लगातार १२ सामान्य मानसूनों के बाद यह स्थिति बनी है और उपज में गिरावटों के साथ कीमतों के गिरने से यह विकट स्थिति उत्पन्न हुई है। "यह इस देश का मीडिया कह रहा है।
माननीय सभापति जी, राष्ट्रीय सहारा नाम का एक अखबार है। उसके कुछ उद्धरण मैं देना चाहता हूं। उन्होंने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। वह अखबार कहता है कि "यह बजट उद्योगपतियों का, उद्योगपतियों द्वारा, उद्योगपतियों के लिए लाया गया बजट है। इसलिए उद्योंगों के अलावा कृषि की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया है।" मैं चन्द और उद्धरण अथवा देश के वभिन्न हिस्सों की कुछ झलकियां आपके सामने रखना चाहता हूं- आंध्राप्रदेश के वल्लभनेनि वेंकटेश्वरराव, गांव का नाम जम्मल मुडुगू ने कर्ज चुकाने के लिए एक साथ सात एकड़ जमीन बेच दी। फिर भी ४०,००० रुपए बिजली के बकाया रहे। ५० वर्षीय श्री राव ने तंग आकर २ जनवरी को फांसी लगा ली। आत्महत्या कर ली। पंजाब में लुधियाना जिले के श्री ज्वाला सिंह जी ने साफ तौर पर कहा कि हर फसल के साथ हम कर्ज लेते हैं। श्री एस.एस. जवाहर नामक कृषि वैज्ञानिक का कहना है कि धान का संकट एक बड़ी त्रासदी की चेतावनी मात्र है॥ लुधियाना में कृषि विश्वविद्यालय के अध्यापक श्री जोगेन्द्र सिंह का कहना है कि बढ़ती लागत और स्थिर उपज के कारण अनाज किसानों का मुनाफा मारा जा रहा है।
माननीय सभापति महोदय, गुजरात के गामा भाई कर्जन भाई की स्थिति यह है कि वे १० साल से सात एकड़ में अपने फॉर्म पर खेती कर रहे हैं। पिछले तीन सालों में लगातार उनकी खेती की लागत चार गुनी बढ़ी और मुनाफे में केवल दो गुना इजाफा हुआ है। यह जो अन्तर बढ़ता जा रहा है यह उनकी दुर्दशा का कारण है। दक्षिण भारत के प्रान्त की स्थिति बताऊं । केरल के चेरूवरकोन्नम के ७३ वर्षीय जैकब का कहना है कि उन्हें उनके नारियल के ५ रुपए से १० रुपए प्रति नग के हिसाब से मिलते थे, लेकिन अब वे कहते हैं कि उन्हें ढाई रुपए प्रति नग के हिसाब से मिल रहे हैं। यह स्थिति आज नारियल की है। चाय की हरी पत्ती की कीमत १९९८ में एक दिन १८ रुपए प्रति किलो थी और आज ५ रुपए प्रति किलो है।
…( व्यवधान )
माननीय सभापति महोदय, मैने ये बातें इसलिए कही हैं कि सारे देश में, चाहे असम हो, दक्षिण भारत हो, उत्तर भारत हो, किसानों की यही स्थिति है। किसान पर दो तरफा मार पड़ रही है। वह दो पाटों के बीच में पिस रहा है। एक तो उसे मौसम की मार का सामना करना पड़ रहा है। बंगाल, बिहार और असम में बाढ़ के कारण उसकी करोड़ों रुपए की फसल नष्ट हो रही है, तो दूसरी तरफ लगातार तीन साल से राजस्थान, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और झारखंड में सूखा पड़ रहा है। आन्ध्रा प्रदेश के कुछ हिस्सों में लगातार दो-तीन साल से सूखा पड़ रहा है। उसके कारण उनकी फसलें नष्ट हो रही हैं। एक तरफ तो उसे मौसम की, प्रकृति की मार, प्राकृतिक आपदाओं की मार, अल्पवर्षा, सूखे की मार झेलनी पड़ती है …( व्यवधान )
श्री रामानन्द सिंह (सतना): सभापति महोदय, मध्य प्रदेश में वहां की सरकार ने किसानों के ऊपर गोली चलवा दी। उसका भी उल्लेख माननीय सदस्य करें और उसकी भी चर्चा यहां करें, तो बेहतर रहेगा।
…( व्यवधान )
सभापति महोदय : रामानन्द जी, आप बैठिए।
श्री रामानन्द सिंह : सभापति महोदय, मध्य प्रदेश की सरकार का भी उल्लेख आवश्यक है।
…( व्यवधान )
श्री लक्ष्मण सिंह (राजगढ़): यदि मध्य प्रदेश में ऐसी गड़बड़ी होती, तो वहां दूसरी बार कांग्रेस की सरकार नहीं बनती।…( व्यवधान )
श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी :सभापति महोदय, मैं सारे देश के किसानों की स्थिति यहां सदन के सामने रखना अपना कर्त्तव्य मानता हूं। हिमाचल प्रदेश में पिछले वर्ष बाढ़ के कारण इतना नुकसान हुआ कि धान और सेब जो कि वहां की मुख्य पैदावार है खासकर कालपा घाटी, सांगला घाटी और किन्नौर के क्षेत्र में विश्व प्रसिद्ध सेब पैदा होते हैं, उस क्षेत्र से सेब का आवागमन नहीं हुआ। १० लाख से लेकर १२ लाख तक सेब की पेटी हर वर्ष वहां से निकलती थी, उसका आवागमन नहीं हुआ और वह वहां पर पड़ा-पड़ा सड़ गया। इस संबंध में बार-बार सरकार का ध्यान आकर्षित किया गया लेकिन यह सरकार कोई रास्ता नहीं निकाल पाई। पिछले दिनों हमने और कई माननीय सदस्यों ने पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, आंध्रा प्रदेश, उड़ीसा आदि इन सारे राज्यों के बारे में यहां चर्चा की थी कि एफ.सी.आई. उनकी फसल को खरीद नहीं रही तथा उसने वहां कोई केन्द्र नहीं खोले। जब उनकी खरीद नहीं हुई तब किसान मजबूर होकर उन्हें औने-पौने दामों में बड़े व्यापारी को बेचने के लिए मजबूर हो गये। उनकी धान और अन्य फसलों की लागत भी नहीं निकल पाई। नतीजा यह हुआ कि उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई, उसकी कमर टूट गई। राजस्थान और खासकर मध्य प्रदेश क्योंकि आप मध्य प्रदेश के बारे में पूछ रहे थे, वहां सोयाबीन की सर्वाधिक पैदावार होती है। कुछ हिस्से महाराष्ट्र और राजस्थान के भी हैं जहां सोयाबीन की फसल पैदा होती है। इस सरकार के आने से खाद्य तेलों के आयात के ऊपर ६० से ६३ प्रतिशत तक आयात शुल्क होता था लेकिन आज वह घटकर १० प्रतिशत कर दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि मलेशिया, इंडोनेशिया, ब्राजील और अन्य देशों का सस्ता तेल, जो वहां के किसान को २०० प्रतिशत सबसिडी मिलती है, उनके सस्ते खाद्य तेल हमारे देश के अंदर आकर डम्प होने शुरू हो गये और हमारे देश का जो तिलहन किसान है, वह टूट गया। सोयाबीन, सरसों, तिल, अरण्डी और अन्य जितने भी तिलहन के जिन्स हैं, उन सबका किसान पूरी तरह से टूट कर सड़क पर आ गया। यह स्थिति वहां की हुई। १३ वर्षों में न्यूनतम कीमतें आज जिसकी मिल रही हैं, वह सोयाबीन की मिल रही हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र की आज यह स्थिति है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश आदि ये सारे क्षेत्र गेहूं उत्पादक क्षेत्र माने जाते हैं। हरियाणा में गेहूं उत्पादन की लागत में भारी वृद्धि हुई। उसी के साथ-साथ हमने बिजली की कीमतें बढ़ा दीं, डीजल की कीमतें बढ़ा दीं। उसके बाद रासायनिक खादों की कीमतें बढ़ा दीं। आज इन तमाम चीजों पर सबसिडी विदड्रा करने पर परिणाम यह हुआ कि किसान की लागत बढ़ती जा रही है और उसकी लागत के अनुपात में आज उसको मार्केट में जो मूल्य मिल रहा है, वह लाभकारी मूल्य नहीं मिल रहा है। यही कारण है कि आज किसान आत्महत्या करने पर उतारू है। केरल, कर्नाटक, तमिलनाडू आदि दक्षिण भारत राज्यों में नारियल, काफी, रबड़, सुपारी और चाय काफी मात्रा में पैदा होती है। आयात शुल्क में भारी कमी होने की वजह से बाहर के देशों से सस्ते दामों पर फसल यहां आने लगी। उसका नतीजा यह हुआ कि नारियल और चाय से लेकर हर चीज की कीमत आज नीचे चली गयी। आज दक्षिण भारत का किसान बिल्कुल सड़क पर आने की स्थिति में खड़ा हो गया है।
सभापति जी, यही हालत गन्ना किसानों की है। मैं हर चीज के बारे में बताऊंगा। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में गन्ने की पैदावार होती है। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में भी होती है। शक्कर मिलों ने किसानों का गन्ना औने-पौने दामों में खरीद लिया। इससे उनकी लागत भी नहीं निकलती थी। आप स्वयं जानते है, बहुत से माननीय सदस्य भी जानते हैं कि इससे किसानों ने अपनी खड़ी फसलों पर आग लगा दी क्योंकि इससे किसानों की कटाई भी पूरी नहीं पड़ती थी। शुगर मिल वालों ने गन्ना लेकर उन्हें पर्चियां दे दीं। वे पर्चियां छह महीने या साल भर से लेकर फिर रहे हैं लेकिन उनके पैसों का भुगतान नहीं हो रहा। उनकी बेटी का विवाह होने को है और वे पर्चियां लेकर घूम रहे हैं। उनकी इन पर्चियां को इनकैश नहीं किया गया, पैसा नहीं दिया गया। करोड़ों-करोड़ रुपये किसानों के उन शुगर मिलों के पास पड़े हुए हैं और शुगर मिल वाले किसानों का पैसा वापिस नहीं दे रहे। एक तो सस्ते दाम पर दिया, उस पर वह पैसा भी उनको नहीं मिल रहा। इसकी चर्चा यहां इस सदन में भी हुई। इस प्रश्न को यहां एक बार नहीं बल्कि अनेक बार उठाया गया लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ।
17.00 hrs. आज भी वही पर्ची लिए किसान घूम रहा है।…( व्यवधान )मैं अपनी पार्टी की तरफ से इनीशिएट कर रहा हूं।
सभापति महोदय : आपके दल से काफी लोग बोलने वाले हैं। मुझे कोई आपत्ति नहीं है अगर आप पूरे दल का समय ले लें। आपके बीस मिनट हो चुके हैं।
श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी : अभी दस मिनट हुए हैं।
सभापति महोदय : मैंने नोट किया है।
श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी : दस मिनट तो हो-हल्ले में निकल गए।…( व्यवधान )
कारण क्या हुआ। यह गिरावट क्यों आई? को राजनैतिक बात नहीं करना चाहता है। जरा ठंडे दिमाग से सोचें। हुआ यह कि केन्द्र सरकार ने एक फैसला लिया कि हम जो पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के माध्यम से सस्ता गल्ला गांवों में किसानों, छोटे वर्ग के लोगों, मजदूरों को देते थे, हमने उसकी कीमत बढ़ा दी। उस गल्ले की कीमत नौ रुपये किलो हो गई। ...(व्यवधान)
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : वह महंगा गल्ला हो गया, सस्ता गल्ला नहीं है।
श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी : जो पी.डी.एस. से मिलता था, वह तो महंगा हो गया और बाजार में किसान का गल्ला सस्ता हो गया। जब बाजार में सस्ता है तो आपके पी.डी.एस. से कौन खरीदेगा। नतीजा यह हुआ कि एफ.सी.आई. के गोडाउन में पिछले साल का जो भंडार भरा था, वह भरा रहा, उठा नहीं वर्ना हर साल वह भंडार पी.डी.एस. के माध्यम से बिक जाता था। जब वह नहीं उठा तो एफ.सी.आई. ने इस साल, उनकी कैपेसिटी पूरी थी, खरीद नहीं की। यह विसंगति चक्र है। जब खरीद नहीं की तो किसान का गल्ला फिर सस्ता हो गया। अब आप पी.डी.एस. के माध्यम से कीमतें बढ़ाए रहेंगे। बाजार में कीमतें कम होंगी तो स्वाभाविक है कि एफ.सी.आई. कभी गल्ला नहीं खरीद पाएगा। मैं तो यह सुन रहा हूं कि एफ.सी.आई. से यह सरकार गल्ले की खरीद पूरी तरह बंद कराने वाली है। यह तो सीधा-सीधा किसान के सिर पर चोट करने वाली बात होगी।
आयात शुल्क कम कर दिया गया, क्वान्टीटेटिव रिस्टि्रक्शन्स हटा दी गईं। उसकी वजह से पिछले साल यह सारी स्थ्ित बनी। गेहूं के समर्थन मूल्य में १९७१ से २००० तक आठ गुना इजाफा हुआ। लेकिन गेहूं के लागत मूल्य में पन्द्रह गुना इजाफा हुआ। समर्थन मूल्य और लागत मूल्य के बीच में जो अंतर है, अगर उस अंतर को नहीं घटाया गया, अगर कोई निश्चित लाभांश सुनिश्चित नहीं किया गया तो यह अंतर इस देश के किसान के लिए घातक सिद्ध होने वाला है, मैं इस बात को कहना चाहता हूं।
१७.०३ ण्द्ध. (श्री पी.एच. पांडियन पीठासीन हुए) मैं चंद चीजों के उदाहरण देना चाहता हूं। इससे स्थिति बिल्कुल साफ हो जाएगी, दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। यह आंकड़े हैं जो मैंने इकट्ठे किए हैं। अक्टूबर १९९८ में चावल की कीमत ९६८ रुपये प्रति क्िंवटल थी, अक्टूबर १९९९ में ९६८ से ८६२ हो गई और अक्टूबर २००० में ८६२ से ८०० रुपये प्रति क्िंवटल हो गई। यह किसान की फसल की कीमत है। गेहूं - अक्टूबर १९९८ में ७५९ रुपये प्रति क्िंवटल, अक्टूबर १९९९ में ७४० रुपये हो गई और सितम्बर २००० में ६०५ रुपये रह गई। यह स्थिति गेहूं की बनी है। अरहर - अक्टूबर १९९८ में २,३८० रुपये प्रति क्िंवटल थी जो अक्टूबर १९९९ में घट कर १,९२५ रुपये रह गई, सितम्बर २००० में १,४०० रुपये प्रति क्िंवटल रह गई। और जनवरी २००१ में १,३३० रुपये प्रति क्िंवटल रह गई। २,३८० से १,३३० पर आ गई। नारियल - १९९७ में ५१० रुपये प्रति सौ नग, १९९८ में ४१७ रुपये प्रति सौ नग, १९९९ में ५५५ रुपये बढ़ा और सन् २००० में २५० रुपये प्रति सौ नग की कीमत रह गई है। ५५५ रुपये से २५० रुपये पर आने पर मजबूर हुआ। यह नारियल के किसान की हालत है। चाय - १९९९ में ६१.६ रुपये प्रति किलो औसत कीमत है। १९९८ में ७३.४ रुपये प्रति किलो बढ़ी है, १९९९ में घट कर ६२ रुपये पर आ गई और २००० जनवरी में ५१.५ रुपये रह गई है।
यह फिर घटकर नीचे पहुंच गया है। रबड़ १९९७ में ४९ रुपये प्रति किलो थी, १९९८ में ३८.०६ रुपये, १९९९ में २९.०२ रुपये और २००० में २८०० रुपये प्रति क्विटल रह गई। ४९ रुपये से घटकर २९ रुपये पर आ गई। इसकी कीमत में यह गिरावट इस तेजी से हुई। यही हाल काफी का है। सुपारी की स्थिति तो यह थी कि १९९७ में १५ से लेकर १८ हजार रुपये प्रति क्िंवटल इसका बाजार भाव था और आज की स्थिति में घटते-घटते यह ४५०० से लेकर ५५०० रुपये के भाव पर आ गई है। वही हाल आलू का है, आलू १८० से २०० रुपये प्रति क्िंवटल इसकी कीमत होती थी और अब ९३ रुपये प्रति क्िंवटल और उससे से नीचे अब ८० रुपये प्रति क्िंवटल पर आ गया। नतीजा यह हो रहा है कि आलू सड़कों पर फिंका है। आलू सूअर खा रहे हैं, किसान उसको लेकर मंडी तक ले जाने की स्थिति में नहीं रह गया। सरसों की भी १९९० में प्रति हैक्टेयर मुनाफा सवा लाख रुपये था और आज २००० में प्रति हैक्टेयर मुनाफा घटकर केवलमात्र २५ हजार रुपये रह गया, वह भी अगर सामान्य मानसून और फसल हो जाये। वही स्थिति टमाटर की है, वही हालत फलों की, वही हालत सब्जी की, किसान की हर जिंस की यह दुर्दशा है। उसका आर्थिक ग्राफ कहां जा रहा है, उस तरफ मैं आपका ध्यान दिलाना चाह रहा हूं कि यह सब क्यों हुआ। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि, इस सरकार ने किसान पर नीतियां लागू करनी शुरू किया। मैं कोई गैरजिम्मेदार इल्जाम नहीं लगा रहा हूं, मैं फैक्ट के आधार पर आपके सामने कहना चाहता हूं, चुनौती देकर कह रहा हूं। इस बात से इन्कार किया जाये, इसमें अगर एक बात भी गलत हो। इस बजट के अन्दर विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक और मुद्रा कोष के दबाव में आकर और जो स्थानीय बड़े-बड़े व्यापारी हैं, उनके दबाव में आकर जो नीतियां अपनाई गईं, उसका परिणाम यह है कि कृषि के क्षेत्र में इस साल के बजट में जो साधन जुटाये गये हैं, वे २८.७६ करोड़ से २९ करोड़ किये गये हैं, २८.७६ करोड़ से २९ करोड़ राउंड फीगर कर दिया गया है, वही स्टेगनेशन है। अगर पैसे का अवमूल्यन लगायें तो दरअसल यह निगेटिव ग्रोथ है, पोजटिव ग्रोथ नहीं है। दूसरी बात सहकारिता के क्षेत्र में आप स्वयं जानते हैं कि सहकारिता एक बहुत बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर है, बहुत बड़ी आधारभूत संरचना है, जिसके माध्यम से कृषि के तमाम कामों को अंजाम देने में मदद मिलती है। सहकारिता के क्षेत्र में…( व्यवधान )सभापति महोदय, यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। पिछले वर्ष के १२८.३५ करोड़ रुपये से १३२.७५ करोड़ किया गया। मात्र चार करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है और अगर उसमें भी मुद्रास्फीति का अवमूल्यन है, अगर उसका मान जोड़ लिया जाये तो यह भी निगेटिव ग्रोथ है, पोजटिव ग्रोथ नहीं है।
आगे देखिये, सहकारी साधनों के माध्यम से कृषि क्षमता के लिए कपूर समति का गठन किया गया था। डिप्टी गवर्नर, आर.बी.आई. ने लागू करने के लिए अपनी सिफारिशें दीं। वित्त मंत्री के पास बार-बार कोआपरेटिव सैक्टर के लोग गये, सारी चर्चा हुई, येरननायडू जी आज याहं मौजूद नहीं हैं, उनके साथ हमने कोआपरेटिव सैक्टर की एक पूरी मीटिंग की थी।…( व्यवधान )
MR. CHAIRMAN : There are 13 more Members from your side, and one-hour time has been allotted for your Party.
SHRI SATYAVRAT CHATURVEDI : There are two full days for discussion. I will try to complete my speech in a few minutes. उन सिफारिशों को सरकार को लागू करना चाहिए। फसल बीमा नधि की अभी यहां पर वर्मा जी बहुत बात कर रहे थे, अब वे यहां पर नहीं हैं। इस साल के बजट में २७९ करोड़ से घटाकर इसे २६१ करोड़ कर दिया गया है, बढ़ाने के बजाय घटाया गया है। २८ करोड़ रुपये की कटौती की गई है। कृषि विकास कार्यक्रमों के लिए १०० करोड़ रुपये की कटौती पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष की गई है। आप अपने बजट को देख लीजिए, मैं आपको चुनौती देता हूं, यह बात गलत निकलती हो तो मुझे बताइयेगा।
मृदा एवं जल संरक्षण, जो एक सबसे महत्वपूर्ण कम्पोनेंट है, उसके अन्दर ३२ करोड़ से घटाकर, एक तो वैसे ही यह कम था, और ज्यादा होना चाहिए था, लेकिन उसे ११ करोड़ कर दिया गया।
इस वर्ष उसमें २१ करोड़ रुपए यानी दो तिहाई की कटौती की गई है। कृषि मंत्रालय ने शरद जोशी जी की अध्यक्षता में एक समति बनाई थी। शरद जोशी जी ने सुझाव दिया कि देश के वभिन्न राज्यों के बीच जो कृषि उत्पाद है, उसकी आवाजाही के ऊपर पूरी तरह से नियंत्रण समाप्त कर देना चाहिए। सारा देश एक है, अगर एक क्षेत्र में बहुत उपज हुई है तो वहां का किसान दूसरे राज्य में मुनाफे में अपना उत्पाद बेच सकता है। यह एक यूनीफार्म पालिसी बनाने की बात कही थी, लेकिन उनकी इस सिफारिश पर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। कोआपेटिव सेक्टर को भी बंद करने की योजना है। साहिब सिंह जी क्रेडिट कार्ड की बात कर रहे थे। इस देश में दस करोड़ किसान परिवार हैं, आपकी सरकार ने सिर्फ १.१० करोड़ को ही ये कार्ड दिए हैं यानी कुल दसवां हिस्सा बनता है। इस पर भी आप बहुत जोरशोर से इस बात को कह रहे हैं।
मैं अंत में दो-तीन सुझाव देकर अपनी बात समाप्त करूंगा। मेरा एक निवेदन है कि आपका जो समर्थन मूल्य घोषित करने की प्रक्रिया है, वह दोषपूर्ण है। जिस तरह आपने तेल पूल घाटे को खत्म करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मूल्यों से तेल पूल को जोड़ दिया, उसी सिद्धांत के आधार पर लागत मूल्यों से समर्थन मूल्य को जोड़ने का काम किया जाना चाहिए। उसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि कम से कम २० प्रतिशत लाभांश किसान को अपनी उपज और पैदावार का जरूर मिले। यह सबसे जरूरी है। जब तक यह नहीं होगा, उसकी लागत बढ़ती चली जाएगी। बिजली की लागत, सिंचाई की लागत, मजदूरी की लागत, पम्प की लागत करीब १५ गुना तक बढ़ गई है। पैदावार की लागत चार-पांच गुना बढ़ गई है। उसका नतीजा यह हुआ है कि वह आर्थिक रूप से कमजोर होता चला जा रहा है।
यह सरकार उद्योगपतियों के बजट बनाना बंद करे। इस देश का किसान भी आदमी है, उसके हित में बजट बनाया जाए। अगर यह नहीं हुआ तो किसान और गांव कमजोर होगा। अगर किसान और गांव कमजोर हुआ तो देश मजबूत किसी भी हालत में नहीं हो सकता। इसलिए जरूरी है कि सरकार अपनी प्राथमिकता को बदले और वास्तव में हकीकत तथा ईमानदारी से किसान की भलाई के लिए प्रयास करे।
श्री महबूब ज़हेदी (कटवा): सभापति महोदय, मैं आपका शुक्रगुजार हूं कि आपने मुझे इस बहस में भाग लेने का मौका दिया। यह कोई मामूली चर्चा नहीं है। यहां हम पूरे हिन्दुस्तान के किसानों की आंखों में आए आंसुओं के हिसाब की चर्चा कर रहे हैं। यहां केवल बातें ही नहीं की जा रही हैं, किसान की हकीकत बताई जा रही है। इस देश में ७५ फीसदी किसानों की आबादी है। किसानों के साथ ही देश की और हमारी जिंदगी जुड़ी हुई है। हमें आजाद हुए ५४ साल हो गए। पहली बार देश में १६२ किसानों ने खुदकशी की। हमारे यहां ६५ प्रतिशत वर्क फोर्स है, वह काम करती है। उनकी हालत बहुत खराब है। प्रधान मंत्री जी ने भी आज बोला है। अगर १०० करोड़ आदमियों को दो वक्त खाना खिलाना है तो ३० करोड़ टन अन्न हमें चाहिए, चावल चाहिए।
हम आत्मनिर्भर हो गए हैं- ये आंकड़े मेरे नहीं हैं, सरकारी हैं। वह ही बात करते हैं कि १९ से २१ करोड़ टन हो गया है। बाहर के भाव और राशन के भाव एक कर दिये गये हैं और करीब-करीब तीस से ३५, ३५ से ३६ प्रतिशत गरीबी रेखा के नीचे किसान और गांव के आदमी रह रहे हैं। चार करोड़ टन अनाज या गेहूं गोदामों में सड़ रहा है। एक बार उसे कम दाम में भी कहीं बाहर बेचने की कोशिश भी की गई थी और फिर वह कोशिश पूरी नहीं हुई, फिर एक बार कोशिश की गई कि इसे यहीं बेच दें लेकिन वह कोशिश भी पूरी नहीं हुई तब फरमान आया कि उसे समुद्र में फेंक दें और जरा गोदाम खाली कर लें ताकि बाजार में जो अनाज आ रहा है,उसके रखने के लिए जगह हो सके। अभी प्रधान मंत्री जी ने कहा है कि दो-तीन रुपये में अनाज दिया जाये और उसे ‘अन्तयोदय अन्ना’ योजना का नाम दिया था। एक जगह ३५-३६ प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के लिए खाना नहीं है और एक जगह चार करोड़ टन खाना मौजदू है और सड़ रहा है। ऐसी हालत क्यों हुई? भाव कहां है और बेचने की तथा रखने की जगह कहां है? वर्मा जी अभी बोल रहे थे और वह चले गये हैं नहीं तो हम उनसे पूछते कि वह कौन सी जगह है? चावल ६५० रुपये क्िंवटल है और बाहर ४५० रुपये क्िंवटल बिक रहा है। ग्राउंड-नट, मूंगफली १५०० रुपये है और ४६० रुपये अभी बिक रही है। सूखी मिर्ची ६००० से २००० रुपये है। कॉफी जो केरल या सब जगह होती है, ५८ रु. कि.ग्रा. से ३० रु. कि.ग्रा. है। कोकोनट दस रु. से दो रुपये और रबड़ ६० रुपये कि.ग्रा. से २२ रुपये कि.ग्रा. और कच्ची पत्ती चाय दस रुपये से पांच रुपये कि.ग्रा. है। बाकी जूट. पोटैटो, टोमैटो, सोयाबीन काजू और गोल मिर्ची है। उस दिन माननीय वित्त मंत्री जी ने मजाक किया था और शायद मुलायम सिंह जी ने बोल दिया था कि मेरे आलू का क्या होगा तो वित्त मंत्री जी ने बोला था कि आलू का चोखा बना देंगे। नहीं नहीं, वित्त मंत्री जी, आपका बजट आलू का चोखा नहीं बनाएगा, आलू पैदा करने वाले का चोखा बनेगा। आगे कैसे करेंगे?
नेशनल पालिसी को देखिए । कहते हैं कि उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन हम पीछे हट रहे हैं । कहते हैं कि डब्िंलग होगा, तो उत्पादन इतना ज्यादा हो जाएगा कि डबल हो जाएगा । मैं आपके समक्ष कुछ आंकड़े प्रस्तुत करना चाहता हूं । हालत यह है कि १९९० में घाटा ०.७ प्रतिशत था, जो २०००-२००१ में ३.६ प्रतिशत का घाटा हुआ है । एग्रीकल्चर में मछली है, फारैस्ट है, १९९१-९२ में ३.९ प्रतिशत था, जो घट कर २०००-२००१ में ३.७ प्रतिशत हो गया । खरीफ में १९९१-९२ में उत्पादन ३.४ प्रतिशत था, जो अब २.२ प्रतिशत हो गया है। इसके लिए मंत्री जी ने कहा है कि हम इसको ४.५ प्रतिशत करेंगे । मैं पूछना चाहता हूं कि कैसे करेंगे? फूडग्रेन्स की स्थिति भी यही है । १९९६-९७ में १९९.४ मी. टन था, अब यह घटकर १९९मी. टन है । इसमें भी घाटा हो गया है । अभी खरीफ की पैदावार १०३.९ मटि्रक टन पैदावार थी, जो घट कर १०२ मटि्रक टन रह गई है । गन्ने का उत्पादन बढा है । पूरा हिसाब देखा जाए, कुल मिलाकर २.३५ प्रतिशत से ३.७२ प्रतिशत एवरेज डिक्लाइन हुआ है । डब्ल्यू.टी.ओ. ने कहा कि आप ऐसा अनाज उगायें जो खाने लायक न हो और उसके स्थान पर फूल उगायें, मगर गेहूं छोड़ दें, धान छोड़ दें। जमीन में आप ऐसी चीजें पैदा करें जो पैसा कमाने वाली हों। फूड ग्रेन्स क्रॉप शिफ्िंटग की हालत यह है कि १९५०-५१ में उत्पादन ९७.३ मलियन हैक्टेअर था जो अब १२३.१ हैक्टेअर हो गया है। आप ऐसी चीजें पैदा करें, जिन्हें बाहर भेजा जा सके और मुनाफा भी ज्यादा हो। कमर्शियल क्रॉप १९९६-९७ में. २४.४ मटि्रक टन थी, जो अब १८.६ मटि्रक टन है।
खाली शुगरकेन में २७७.६ से ३००.६ होगा, थोड़ा सा बढ़ेगा। मेरा यह कहना है कि केपिटलाइजेशन की बात आपने बोली थी कि और भी करो। उसकी क्या हालत है। १९९३-९४ में १३,५२३ करोड़ रुपए लगते थे, उसका एक-तिहाई पब्लिक इनवेस्टमेंट था, वह प्राईवेट इनवेस्टमेंट नहीं था। १३,५५३ में एक-तिहाई पब्लिक इनवेस्टमेंट था। अब क्या हालत हुई कि १९९९-२००० में १८,६९७ करोड़ रुपए इनवेस्ट हो रहा है।… पब्लिक इनवेस्टमेंट में २५ प्रतिशत घटा है । ( व्यवधान )
महोदय, इन्होंने कहा है कि बड़ा-बड़ा फार्मिंग होगा, भूमि सुधार नहीं होगा। हम एक टुकड़ा जमीन गरीब को दे नहीं पाएंगे। आपने दूध के बारे में कहा है। हम दूध का सबसे ज्यादा उत्पादन करते हैं, लेकिन यह बाहर से आ रहा है। हमने पहले दूध का उत्पादन ९८ हजार मीटि्रक टन किया था, उसकी अब क्या हालत है। आज ४० हजार टन दूध बाहर से आता है।…( व्यवधान )
MR. CHAIRMAN : Please conclude.
SHRI MAHBOOB ZAHEDI : Mr. Chairman, Sir, I have a request to make. I am not participating in every discussion. I have been participating very rarely in discussions in Parliament. So, please give me the chance to make my points.
This is the cry of the peasantry. हम आपसे कहना चाहते हैं कि ४० हजार टन दूध बाहर से आ रहा है। मक्खन, दूध और अन्य कई चीजें हैं, जो बाहर से आ रही हैं। मंत्री जी ने बजट में कह दिया कि हम जरा सी डयूटी बढ़ाते हैं- राइस में ८०, गेहूं में ५०, सोयाबीन में ६५, पाम ऑयल में ४५, शुगर में ६० और खोपरा में ८० डयूटी बढ़ाते हैं। इनकी सब्सिडी कितनी है। किसान का खाद का सब्सिडी जा रहा है, बिजली का डबल होगा। प्रधान मंत्री जी ने कहा कि बिजली का रेट डबल होगा और खाद में दूसरी जगह भी यही हो रहा है, जहां से हम ले रहे हैं। जहां हमने डब्ल्यूटीओ का दरवाजा खोल दिया है, वहां क्या हालत है। युनाइटेड, यूरोपियन कंट्री और अमेरिका में ७६० डालर पर टन, ७०६ डालर पर टन, ये सब्सिडी दे रहे हैं और वे लोग कम दाम में यहां अनाज भेज रहे हैं तो क्या हम रहेंगे, किसान रहेगा? किसान मर नहीं जाएगा, खत्म नहीं हो जाएगा? इसलिए हमने कहा है कि इस तरफ ध्यान देना चाहिए। उस तरफ भी भाई साहब बैठे हैं। All of you are representing the peasantry. आप किसान हैं, आपका मिट्टी के साथ संबंध है। आपको समझना पड़ेगा कि हम कितनी खतरनाक जगह पहुंच गए हैं।
यह इनकी पालिसी है। मैं रवीन्द्र नाथ टैगोर की बंगाली में लिखी कुछ पंक्तियों सुनाना चाहता हूं :
हेथाय बिथा कान्दा, देवा लेते बाधा, कांदन फिर आसे आपन धरे।
इसका मतलब यह है कि मेरे दर्द भरे टपकते हुए आंसू यहीं बेदर्दी दीवाल में धक्का खाकर फिर मेरे पास वापस न आ जाएं।
मैं यहां किसान के बारे में बोल रहा हूं। आप किसान को बचा लीजिए और उसकी जिन्दगी को बचाइए, नहीं तो सदन भी नहीं बचेगा और यह भी नहीं बचेंगे। बहुत धन्यवाद।
श्री अनंत गंगाराम गीते (रत्नागरि) :सभापति महोदय, इस सदन के हर सत्र में हम एक बार किसानों की समस्याओं के बारे में चर्चा करते हैं। हर साल किसी न किसी प्राकृतिक आपदा की समस्या किसानों पर पड़ती है। कभी ज्यादा वर्षा से फसल नष्ट होती है और कभी कम वर्षा के कारण फसल जल जाती है। आज हमारे देश के किसानों को प्रकृति के ऊपर निर्भर रहना पड़ता है।
आज सुबह सदन में राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के समय प्रधान मंत्री जी जवाब दे रहे थे। उस समय उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि देश में अनाज काफी मात्रा में है। गेहूं और चावल की आज देश में कमी नहीं है, इसलिए किसान अनाज की खेती करने की बजाय फल, सब्जी, दलहन और तिलहन की खेती करें। किसान चाहे फल, अनाज, दलहन या तिलहन की खेती करें उनकी तरफ से सबसे पहली मांग समर्थन मूल्य की आती है। जब तक हम किसानों को उनकी उपज का समर्थन मूल्य नहीं देंगे, उसे तय नहीं करेंगे, तब तक किसान हर वर्ष घाटे में रहेंगे और उन्हें सारी मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा।
देश के अलग-अलग राज्यों में ज्यादातर अलग-अलग फसलें होती हैं। पश्चिमी महाराष्ट्र में गन्ने की खेती ज्यादा होती है।
महाराष्ट्र में कपास की खेती ज्यादा होती है और मैं जिस क्षेत्र से आता हूं, वह तट क्षेत्र है। वहां पर चावल की खेती ज्यादा होती है। मेरे कोंकण क्षेत्र में किसान बागबानी की ओर बढ़ने लगे हैं। मेरे क्षेत्र में आम और काजू की खेती सबसे ज्यादा होती है। हम अखबारो में पढ़ते रहते हैं कि जो किसान गन्ना पैदा करते हैं, उन्होने गन्ना जला दिया। महाराष्ट्र में गन्ना भी इतना ज्यादा पैदा होता है कि यदि किसानों को उनके गन्ने का उचित दाम मिल जाये तो अच्छा हो। गन्ना ज्यादा होने के कारण वहां चीनी का उत्पादन भी ज्यादा होता है। गत कई वर्षों से महाराष्ट्र में यह मांग होती रही है कि चीनी निर्यात करने का अधिकार राज्य को मिलना चाहिये। यदि राज्य को यह अधिकार मिल जाये तो किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिल सकता है। इसके साथ ही कपास का उत्पादन अधिक होने के कारण इसके निर्यात की बात आती है। कुछ हद तक राज्य को यह अधिकार दिया जाता है लेकिन आज गोदामों में कपास और चीनी का भंडारण जमा किया हुआ पड़ा है। यदि इसके लिये भी निर्यात का अधिकार राज्यों को दे दिया जाये तो किसानों को बहुत फायदा मिल सकता है। केन्द्र सरकार को इस बारे में गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है।
सभापति जी, जब हम बागबानी की बात करते हैं तो फल-सब्जी का जिक्र किय़ा जाता है। फल और सब्जी के हमारे पास भंडारण नहीं हैं जिससे हम फल और सब्जियों को कई महीनों तक जमा कर सकें। इसके अलावा सब्जी और फल का बाजार भी नहीं है। मेरे क्षेत्र कोंकण में अलफांजो आम बहुत होता है जिसे दुनिया के कई देशों में निर्यात किया जाता है। चाहे यह आम महंगा है लेकिन फिर भी किसानों को परेशानी होती रहती है। जब कभी बेमौसम की बरसात हो जाती है तो सारी आम की फसल नष्ट हो जाती है। जब आम की पैदावार अधिक हो जाती है तो उसके दाम गिर जाते हैं। बीच में जो दलाल होते हैं, वे किसान को चूस जाते हैं। ज्यादा पैदावार होने से किसान का नुकसान है और कम पैदावार से भी किसान का नुकसान है।
सभापति जी, मेरा केन्द्र सरकार से अनुरोध है कि वह इस जिम्मेदारी को उठाये और किसानों को सलाह दे कि अनाज की ज्यादा खेती न करके बागबानी को बढ़ावा दे।
जब हम देश के किसानो को इस सदन के माध्यम से संदेशा देने जा रहे हैं तो इस जिम्मेदारी को हमें उठाना चाहिए। उसके लिए हमें नये रास्ते ढूंढने चाहिए। मैं यह कहना नहीं चाहता हूं कि इसके लिए ज्यादा सब्सिडी देनी चाहिए। मैं यह भी नहीं कहना चाहता हूं कि किसान का सारा उत्पादन भारत सरकार को खरीदना चाहिए। लेकिन इसके लिए मार्केट कहां से मिलेगा, उसकी तलाश तो करनी चाहिए। किसान की फसल को रखने के लिए भण्डारण की आवश्यकता है तो भण्डारण खड़े करने के लिए जो भी सहायता है, उसे ज्यादा करने की आवश्यकता है। जो बीच के एजेन्ट्स हैं, वे किसानों को चूस लेते हैं। उन एजेन्ट्स को हम हटा सकते हैं। यदि उन एजेन्ट्स को भी हम हटा पायेंगे तो भी हम किसानों को राहत दे पायेंगे।
सभापति महोदय, हम सहकारिता को बढ़ावा दे सकते हैं। यदि हम सहकारिता को बढ़ावा देते हैं तो भी किसानो को उससे फायदा हो सकता है। इसलिए सदन के माध्यम से हम देश के किसानों को संदेशा दे रहे हैं तो कुछ जिम्मेदारियां तो हमें उठानी पड़ेंगी। कुछ रास्ते हमें इसके लिए ढूंढने पड़ेंगे और ज्यादा से ज्यादा राहत हम किसानों को कैसे दे सकते हैं, चाहे सहकारिता के माध्यम से हो या सरकार के माध्यम से हो, किसानो को हम उसके उत्पाद का समर्थन मूल्य कैसे दे सकते हैं, किस प्रकार उसे उचित प्रकार से तय कर सकते हैं। यदि हम ऐसा करने की कोशिश करते हैं और किसानों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं यदि दे सकते हैं तो देश का किसान सरकार को धन्यवाद देगा। यदि देश का किसान खुशहाल होगा तो देश खुशहाल होगा। मैं यहां ज्यादा भाषण नहीं करना चाहता, लेकिन मैंने जो यहां सुझाव दिये हैं, उनके तहत यदि सरकार की ओर से किसानों को राहत देने का प्रयास होता है तो वह हमें जल्दी से जल्दी करना चाहिए। यही कहते हुए मैं अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं॥ *m06 श्रीमती रमा पायलट (दौसा) : आदरणीय सभापति जी, मुझसे पहले सदन के बहुत से माननीय सदस्यों ने किसानों की हालत पर अपने विचार व्यक्त किये हैं और इससे पहले भी पिछले तीन सालों से हर बजट सैशन में किसानों के ऊपर, कृषि के ऊपर चर्चाएं होती रही हैं। आज भी हम उसी संदर्भ में चर्चा कर रहे हैं। मैं सब माननीय सदस्यों की बातें सुन रही थी। लेकिन मुझे समझ में नहीं आया कि इन्हीं सब बातों को पिछले सैशन के दौरान सभी माननीय सदस्यों ने कहा और अब फिर से इसी बात पर चर्चा हो रही है और मैं समझती हूं कि आगे जो मांगे आयेंगी, तब भी शायद कृषि पर चर्चा होगी। वही शब्द, वही दुख, वही किसानों की हालत, वही कृषि के लिए हम सबकी चिंता या तो यूं कहिये कि दिल से सिर पीट-पीट कर सभी रो रहे हैं या यूं कहिये कि उसका राजनीतिकरण कर रहे हैं। हर माननीय सदस्य सदन के बाहर और अंदर दोनों तरफ किसानों के लिए कभी आंदोलन कर रहे हैं और कभी किसानों की बात कहकर मीडिया के साथ वार्तालाप कर रहे हैं और कभी यहां इन सब बातों को दोहराया जाता है। मैं समझ नहीं पा रही हूं कि इतनी बार इन सब चीजों को दोहराने के बावजूद क्या कोई ऐसा आश्वासन सरकार की तरफ से आया, या कोई ऐसी नीति या कोई आशा की किरण नजर आती है कि इन सब बातों पर गौर करके एक नई बात लाई जाए।
सभापति महोदय, अभी हाल ही में और आज भी प्रधान मंत्री जी ने हाउस में कहा, मैंने टी.वी. पर भी देखा, लेकिन उन्होंने खुद भी कहा पंजाब और हरियाणा में उन्होंने किसान सम्मेलन किये और किसान सम्मेलन में उन्होंने वहां किसानों से कहा कि वे अपनी खेती, अपना चावल और अपना गेहूं उगाना कम कर दें। मैं प्रधान मंत्री जी की बहुत इज्जत करती हूं और प्रधान मंत्री जी से बहुत आशाएं भी रखी थीं, जब उन्होंने इस पद को ग्रहण किया था। लेकिन यह बात सुनकर अफसोस हुआ कि प्रधान मंत्री जैसे पद पर आसीन रहते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐसा कहा। पिछले सत्र के दौरान जब उन्होंने अपने आपको अटल कहा तो इस तरफ आगे से आवाज आई कि मैं बिहारी भी हूं और मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि आज बिहार के किसानों की हालत सबसे ज्यादा बदतर है।
फिर वह कहते हैं कि आप गेहूं और चावल उगाना बंद कर दीजिए। अगर किसान गेहूं और चावल उगाना बंद कर दे तो किसान के पास या सरकार के पास कोई ऐसा ज़रिया है कि वह किसी दूसरे साधन से अपने बच्चों का पेट पाल सके? क्या कृषि को इस तरह से बंद किया जा सकता है कि कोई व्यवसायी है कि वह चावड़ी बाज़ार जाएगा और वहां बड़े-बड़े गल्ले और आढ़तियों की दुकानों से कुछ उठा लेगा और छोटे बाज़ारों में बेच देगा और अपने बच्चों का पेट भरेगा।…( व्यवधान )व्यवसायी लोग दो महीने में या एक महीने में और दस दिन में अपना व्यवसाय जमा लेते हैं लेकिन किसान खेती के साथ ऐसा नहीं कर सकता। आयात-निर्यात के दौरान अगर कृषि मंत्री जी या सरकार की तरफ से कोई नई खोज हुई हो जैसे आजकल नए-नए बीज आ रहे हैं तो मेरा मानना यह है कि हो सकता है कि ऐसा कोई रिसर्च करके इनके पास कोई पॉइंट आया हो कि उसमें बीज डालते ही फसल एकदम पैदा हो जाती हो। आज विदेशों से जो बीज लेकर हम अपनी ज़मीन में उगा रहे हैं, हमने उसमें सुना है कि भौतिक तरीके से भी उसकी ग्रोथ को बढ़ाया जाता है। हो सकता है कि ऐसा कोई पॉइंट सरकार के पास आया है, इसी वजह से प्रधान मंत्री जी ने कहा है कि गेहूं और चावल की खेती बंद कर दें और तरकारी उगाएं, फल उगाएं, लेकिन मैं नहीं समझती कि तरकारी और फल दस दिन या एक दिन में उग जाएंगी। पहले खेत को तैयार करना पड़ेगा जिसमें महीनों लग जाते हैं। उसमें मेहनत-मशक्कत करनी पड़ेगी क्योंकि फिर उऩको बेचकर गोदाम में जाना है। खाद के लिए जाना है, फिर पानी की तरफ देखना होगा, नहरें तो खत्म हो गई हैं। फिर बिजली की तरफ देखेंगे। सब इस बात से परचित हैं कि बिजली की हालत हमारे देश में क्या है। खुद प्रधान मंत्री जी ने भी इस बात पर चिन्ता जताई। ऐसा कोई बीजमंत्र कृषि मंत्री जी के पास आया हो तो कृपया मुझे भी बताएं क्योंकि मैं भी किसान हूं और मैं भी गेहूं और चावल की खेती को बंद करके उस बीज को जहां कहीं वह मिलता हो, वह कृपया इस सदन को बताएं ताकि हम सब लोग बाहर जाकर अपने किसान भाइयों को बताएं और वह उस तरह के बीज को ले लें ताकि वह बीज ज़मीन में डालें और एकदम से फसल उग जाए और वह बाज़ार में बिक जाए। लेकिन बावजूद इसके उसकी बिक्री के लिए प्रावधान करने पड़ेंगे। आपको बाज़ार में ले जाने के लिए कुछ ऐसे साधन जुटाने पड़ेंगे जहां किसान अपने माल को लेकर जाए और उसको आगे ऐसे केन्द्र मिलें जहां उसको खरीद लिया जाए। ऐसा नहीं करना पड़े कि उसको केन्द्र में जाकर रख दिया और किसान परेशान है। मैंने खुद भी अपने गोदाम में आलू डाल दिया लेकिन इतनी कीमत उसकी नहीं मिल रही है कि हम उसका किराया दे सकें और आलू को निकालकर अपने आप प्रयोग कर लें या बाज़ार में बेच दें। ऐसा कोई केन्द्र होना चाहिए ताकि उसकी खपत उसमें हो जाए। यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हर किसान की फसल की खरीद की जिम्मेदारी ले और हर किसान को ऐसा आश्वासन दे कि अगर उसकी फसल को किसी तरह से प्राकृतिक आपदा से नुकसान होता है या उसको कीड़ा खा जाता है तो किसान को उसको इतना प्रतिशत मुआवज़ा मिल जाएगा।
सभापति जी, बीमा योजनाएं तो हैं, ऋण योजनाएं तो हैं और योजनाएं तो और भी अच्छी हैं लेकिन दुख इस बात का है कि इन योजनाओं का कार्यान्वयन नहीं हो रहा है। अगर व्यक्तिगत रूप से आप देखने जाएं तो हर तरह से किसान मरता है -- कृषि में, बीज में, खाद में और पानी में मर रहा है। और तो और उसके पास जो थोड़ी बहुत ज़मीन होती है उस ज़मीन पर अगर कोई सरकार अपने देश में विकास करना चाहती है तो उसी गरीब की ज़मीन जाएगी। बिजली का कोई कारखाना लगता है, कोई पुल बनता है, कोई सड़क बनती है तो उस गरीब किसान की ज़मीन जाती है। एन.टी.पी.सी. ने नौएडा में किसनों की ज़मीन ली थी और उसका मुआवज़ा उसे नाममात्र के लिए मिला था। लोग चिल्ला रहे हैं। पहले भी चिल्लाए। मेरे पास लोग अभी भी आ रहे हैं कि मुआवज़ा बढ़े। पायलट साहब ने भी बढ़वाने की कोशिश की थी और मात्र कुछ प्रतिशत बढ़ाकर उनको मुआवज़ा दिया गया। ५० रुपये ४३ रुपये प्रति गज के हिसाब से उनकी ज़मीन ली गई थी।
सभापति महोदय, अभी साहब सिंह जी वर्मा बहुत जोर-जोर से भाषण कर रहे थे। मैं उनके भाषण को बहुत ध्यान पूर्वक सुन रही थी। मैं पूछना चाहती हूं कि किसान की जमीन जब ली जाती है, तो उसको ५० रुपए प्रति गज का मुआवजा दिया जाता है और जब उद्योगपति की बात आती है, तो उसे करोड़ों रुपए दे दिए जाते हैं। इस प्रकार से सरकार दोहरा व्यवहार करती है। किसानों को किसी और नजर से तथा व्यवाइयों को किसी दूसरी नजर से देखती है। प्रधान मंत्री जी कह रहे थे कि उनकी सरकार सबको समान द्ृष्टि से देखती है, लेकिन मैं समझती हूं कि ऐसी बात नहीं है। मुझे तो सरकार के व्यवहार को देखकर ऐसा प्रतीत होता है और शंका होती है कि सरकार किसानों को टेढ़ी नजर से देखती है और व्यवसाय को उच्च दर्जा तथा खेती को निचला दर्जा देती है।
सभापति महोदय, मैं कहना चाहती हूं कि जब तक किसानों और व्यवसाइयों को समान द्ृष्टि से नहीं देखा जाएगा, तब तक देश तरक्की नहीं कर सकता है। किसान और व्यवसाई एक गाड़ी के दो पहिए हैं और उन्हें सरकार को ऐसा समझकर दोनों को समान द्ृष्टि से देखना पड़ेगा। व्यवसाय को ऊपर रखकर और कृषि को निचले तले पर रखकर यदि सरकार चलेगी, तो देश प्रगति नहीं कर पाएगा। हमारा देश कृषि प्रधान देश है। बिना किसानों को तरजीह दिए यदि इस देश की उन्नति की बात सोची जाती है, तो वह मेरी समझ से बाहर की बात है। मैं मंत्री महोदय से उस मंत्र को जानना चाहती हूं जिससे किसानों की तरक्की किए बिना देश की तरक्की की जा सके।
सभापति महोदय, आज हर तरफ किसानों के ऊपर मार पड़ रही है। बरसात तो देश में जैसे खत्म ही हो गई है। उसका कारण है कि पेड़-पौधे नहीं लगाए जा रहे हैं। बिजली की चोरी हो रही है, वनों की कटाई हो रही है, पानी की चोरी हो रही है। जब नहर निकलती है, तो उसे बीच में ही काट दिया जाता है। जो नहर के टेल पर रहने वाले किसान हैं, वे पानी से वंचित रह जाते हैं। जो जबर लोग हैं वे पानी ले लेते हैं और गरीब किसानों को पानी नहीं मिलता। स्थिति यह हो गई है कि जैसे अजगर छोटों को निगल जाता है, वैसे बडे लोग छोटे किसान को निगल रहे हैं। छोटा किसान हर तरफ से मारा जा रहा है।
सभापति महोदय, कृषि मंत्री महोदय, यहां बैठे हैं। मुझे मालूम है कि मेरी बातें उन्हें अच्छी नहीं लग रही होंगी, लेकिन मैं उनसे चाहती हूं कि मेरे द्वारा उठाई गई बातों का वे अपना जवाब देते समय अवश्य उल्लेख करें। यदि वे ऐसा करेंगे, तो मैं उनकी आभारी रहूंगी। मैं उनसे यह भी जानना चाहूंगी कि चकित्सा एवं बीमा का जो प्रावधान किसानों के लिए किया गया है, उसका कितना फायदा उनको मिल रहा है। मैं कहना चाहती हूं कि किसानों को फायदा पहुंचाने के लिए जो भी नीतियां अपनाई जाती हैं उनका उन्हें फायदा नहीं पहुंच रहा है। यहां से जो एक रुपया किसानों को जाता है उसका ग्रामों में एक पैसा पहुंचता है और उसके लिए भी दलाल बीच में बैठे रहते हैं। वे हड़प जाते हैं किसान को कुछ भी नहीं मिलता है क्योंकि किसान अशक्षित है। सबसे पहले सरकार को किसानों को शक्षित करने की योजना चलानी चाहिए। बिना किसानों को शक्षित किए देश प्रगति की राह पर नहीं बढ़ सकता। मैं कहना चाहती हूं कि देश में चाहे कोई भी बड़ी से बड़ी ताकत आ जाए, बिना किसानों को शक्षित किए देश उन्नति नहीं कर सकता है। इसलिए किसानों को शक्षित करने के लिए सरकार को विशेष कदम उठाने चाहिए।
सभापति महोदय, कृषि में अनुसंधान के लिए बड़े-बड़े अनुसंधान केन्द्र कार्य कर रहे हैं, लेकिन क्या कभी किसी डायरैक्टर ने जाकर देखा है कि कृषि अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिक वाकई अनुसंधान कर रहे हैं या किसी किसान के घर जाकर भैंस का दूध पीकर दिन बिताकर शाम को घर चले जाते हैं। सूखे पर सरकार का कोई वश नहीं है, यह मैं मानती हूं। इसके लिए सरकार जिम्मेदार नहीं है, यह भी मैं समझ सकती हूं, लेकिन इसके अलावा किसान को पानी, बिजली, बीज, खाद एवं अन्य अनेक प्रकार की सुविधाएं देना सरकार का दायित्व बन जाता है। मैं तो कहना चाहती हूं कि जिस प्रकार से सरकार विदेशों के साथ अपने हर प्रकार के संबंध सुधार रही है, उस प्रकार से किसी देश से जल मुहैया कराने के साधन अपनाने हेतु साइंटिस्ट्स, एक्सपट्र्स या टैक्नीशियन्स भी हमारे देश में बुलाए जो हमारे देश में आकर देख सकें कि हमारे यहां किस प्रकार से अंडरग्राउंड वाटर को ऊपर लाया जा सकता है और किस प्रकार से हमारे देश में पानी की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है। आज इतने साल बीतने के बाद भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं हुई है और राजस्थान में ऐसी स्थिति बनी हुई है कि वहां हर साल अकाल पड़ता है।
उससे हर साल अकाल पड़ता है और उस अकाल में कितने व्यक्ति और जानवर मरते हैं, उसका कोई हिसाब किताब नहीं है। इस साल जनसंख्या की गणना की जा रही है। मैं समझती हूं कि अगर वह गणना पिछले साल से कम निकले तो उसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं है।
इसी के साथ मैं यह भी कहना चाहती हूं कि आपने किसानों के ऊपर रिस्ट्रक्शन लगाई हुई है कि किसी जानवर को गोली से मत मारो क्योंकि यह पर्यावरण को गंदा करता है। मैं मानती हूं कि देश के लिए पर्यावरण बहुत आवश्यक है लकिन यह भी देखना चाहिए कि यहां ऐसे कुछ जानवर पैदा हो गये हैं जो किसानों की फसलों को खराब करते हैं। मेरा कहना है कि वहां नीलगायों की संख्या बढ़ती जा रही है। वह एक गुणा से १० गुणा हो जाती हैं। वे नीलगाय हर किसान की फसल को नष्ट कर देती हैं लेकिन किसान बेचारा हाथ बांधकर बैठा है क्योंकि सरकार के आर्डर हैं कि आप उनको मार नहीं सकते। वे अगर आपकी फसल को खा रही हैं तो खा जायें, उजाड़ रही हैं तो उजाड़ दें लेकिन आप उनको मार नहीं सकते। यहां पर श्रीमती मेनका गांधी जी नहीं हैं। मै चाहूंगी कि वे अगर थोड़ा सा ध्यान इस तरफ दें तो अच्छा होगा। वे जानवरों की रक्षा कर रही हैं, उसके लिए मैं उनकी तारीफ करती हैं और मैं उनकी इज्जत भी करती हूं लेकिन मैं यह भी उम्मीद करती हूं कि वे जानवरों से पहले इंसानों की रक्षा करें, इन गरीब किसानों की रक्षा करें, तो बहुत अच्छा होगा। यदि इन नीलगायों को जिनको रोजड़ी भी कहते हैं, को मारने का प्रावधान सरकार कर दे तो किसानों को इससे बहुत राहत मिलेगी। महाराष्ट्र सरकार ने सबसे पहला कदम इन नीलगायों को मारने के लिए उठाया है। मैं चाहूंगी कि देश के अन्य राज्यों में भी इस बात को लागू किया जाये।
इसी के साथ मैं यह भी कहना चाहती हूं कि ऐसे कुछ बीज बाहर से आ रहे हैं जिनको अगर खेती में इस्तेमाल किया जाये तो पहले जहां किसान की पांच मन फसल एक बीघे में होती थी, वही अब १० से १५ मन होने लगी है। उनको यह देखकर लालच होने लगा है और सरकार ने भी उनको यह बीज देना शुरू कर दिया है। कृषि मंत्री जी से मैं कहना चाहूंगी कि यह वही हाल होगा जिस तरह से अंग्रेजों ने हमको मुफ्त में चाय पिलाकर आज उसका एडिक्ट कर दिया है। कोई भी हिन्दुस्तानी चाहे वह गांव में रहता हो, पहले जब हम वहां जाते थे, तो वह दूध के लिए पूछते थे लेकिन आज वे कहते हैं कि चाय का कप चाहिए। हम चाय के इसलिए इतने आदी हो गये हैं क्योंकि वह पहले हमें मुफ्त में मिलती थी। आज वही हाल किसानों का है। उनको इस किस्म के बीज कम पैसे में दिये जा रहे हैं जिससे उनकी फसल पांच मन के बदले १५ मन हो रही है।…( व्यवधान )इसलिए इन बातों पर हमें ध्यान देना है कि जो बीज हम खेती में प्रयोग करके ज्यादा पैदावार कर रहे हैं, वह कल हमारे लिए काम नहीं आ सकते। यह बहुत ही सीरियस मैटर है। इस बीज के लिए हमें विदेशों के ऊपर डिपेंड करना पड़ेगा। अगले साल जब हमें खेती के लिए उन बीजों की जरूरत होगी तब वे बीज हमें नहीं मिलेंगे। इसके लिए हमें विदेशों पर डिपेंड करना पड़ेगा। इस तरह की व्यवस्था की जाये जिससे अपने देश का गेहूं अपने देश में रखें और उसी का बीज हम प्रयोग में लायें। …( व्यवधान )
अभी प्रधान मंत्री जी ने आत्मविश्वास की बात कही है। मैं इस बात से सहमत हूं लेकिन किसान का आत्मविश्वास तब होगा जब उसका पेट भरेगा।…( व्यवधान )
श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज, बिहार) : सभापति जी, छह बजने वाले हैं।…( व्यवधान )
कुंवर अखिलेश सिंह: आप सदन का समय दो घंटे और बढ़ा दीजिए।
…( व्यवधान )
MR. CHAIRMAN : The Business Advisory Committee has decided to have the discussion till 9 p.m. If there is any revised programme, let it be informed. As it stands, the discussion will go upto 9 p.m. श्री रघुनाथ झा (गोपालगंज): सभापति जी, इतने महत्वपूर्ण सवाल पर आप रात में बहस करा रहे हैं। न तो इसकी न्यूज जाती है और न ही लोगों को इसके बारे में कुछ पता चलता है इसलिए आप इस पर आज बहस न कराकर कल कराइये। …( व्यवधान )
श्री प्रभुनाथ सिंह : आप आज की बहस यहीं समाप्त करके तीन दिन तक लगातार इस पर बहस कराइये।…( व्यवधान )
कुंवर अखिलेश सिंह: इस सवाल पर बहुत सदस्य बोलने वाले हैं इसलिए आप इसे दो घंटे और चलने दीजिए। …( व्यवधान )
श्री प्रभुनाथ सिंह : आप इस पर कल १२ बजे से फिर बहस शुरू कराइये। रात के नौ या दस बजे तक चलाकर क्या होगा ?इतने महत्वपूर्ण सवाल पर रात को बहस कराने का कोई मतलब नहीं है इसलिए आप इस बहस को यहीं समाप्त करके कल १२ बजे से फिर शुरू कराइये। …( व्यवधान )
THE MINISTER OF ENVIRONMENT AND FORESTS (SHRI T.R. BAALU):
Sir, the Minister for Parliamentary Affairs has gone to meet the hon. Speaker. He will come and intimate the House on this point.
MR. CHAIRMAN: If there is any fresh intimation, I will inform the House.
श्रीमती रमा पायलट: सभापति जी, मैं एक बात बहुत दुख के साथ कहना चाहती हूं कि इस सदन की एक गरिमा होती है। मैं कृषि मंत्री जी से अपील करती हूं, करबद्ध प्रार्थना करती हूं कि आप अपनी गरिमा को कृपया बनाये रखें और अगर मंत्री जैसा व्यवहार हमें दिखायेंगे तो हम जो नये आने वाले सदस्य हैं, वे आपसे कुछ सीखेंगे। इस सदन में बहुत अव्यवस्था होती है। मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगी कि उसके ऊपर गौर किया जाये।
18.00 hrs. इस सदन की गरिमा जैसी थी वैसी ही रखी जाए। माननीय सदस्य और मंत्रिगण इस तरह आपस में बातें करते हैं तो हम पर तो बुरा अफैक्ट पड़ता ही है लेकिन विदेशों में भी खबर जाती है। प्रधान मंत्री जी उस दिन खड़े होकर बहुत गुस्से में बोल रहे थे और कह रहे थे कि आप लोगों ने जो विरोधी बातें कही हैं, वह मीडिया ने पिक-अप की हैं और मीडिया में विदेशों में उसकी हैडलाइन आई है। क्या इस बात की हैडलाइन नहीं जाती होगी, क्या यह बात मीडिया में नहीं जाती होगी कि हम किस तरह सदन की गरिमा में सहयोग देते हैं? बहुत अफसोस के साथ कहना पड़ता है और सच मानिए तो इस सदन के अंदर आने की तबियत नहीं करती जब हमारे माननीय सदस्य इस तरह व्यवहार करते हैं। बहुत अफसोस है इस बात का।
…( व्यवधान )
श्री प्रभुनाथ सिंह : नए-नए आए हैं, सब जान जाएंगे।…( व्यवधान )
श्रीमती रमा पायलट: मैं अपनी बात खत्म करना चाहूंगी क्योंकि कोई भी माननीय सदस्य शायद सुनने में रूचि नहीं ले रहे हैं। मैं हाउस में चैलेंज करती हूं कि अगर हाउस में इस तरह चर्चा होगी, …( व्यवधान )
कृषि मंत्री (श्री नीतीश कुमार): आप समझ नहीं रही हैं। चेयर कह रही है कि हाउस नौ बजे तक चलना है, कुछ माननीय सदस्य कह रहे हैं कि छ: बज रहे हैं, इसे खत्म किया जाए। …( व्यवधान )
श्रीमती रमा पायलट: इस बात को बी.ए.सी. में पहले रखा जाए।…( व्यवधान )इस बात को पहले से तय करके चेयर के सामने रखना चाहिए। बीच-बीच में जो कह रहे हैं, वह गलत है।…( व्यवधान )
श्री नीतीश कुमार : मैं आपकी बात सुन रहा हूं।…( व्यवधान) Shrimati Rama Pilot, why are you accusing me?… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : The point is that the Business Advisory Committee has already decided to have it till Nine of the Clock. If there is any revision of programme, I will inform you.
… (Interruptions)
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव (झंझारपुर) : हम हाउस के विषय में बोल रहे हैं।…( व्यवधान )मेरी आपसे रिक्वैस्ट है कि इतने गंभीर इश्यू पर चर्चा हो रही है, फार्मर्स की प्रौब्लम्स पर चर्चा हो रही है और यदि सदन इसे गंभीरता से नहीं लेगा,…( व्यवधान )यह समय नहीं है गंभीरता से लेने का।…( व्यवधान )
MR. CHAIRMAN: The Leaders of the Parties have discussed it in the Business Advisory Committee.
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव: हम बी.ए.सी. में हैं। यदि सब लोग सहमत हैं तो इस पर गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए।…( व्यवधान )
MR. CHAIRMAN: They discussed it with the hon. Speaker. The hon. Speaker has taken a decision to have it till Nine of the Clock.
देवेन्द्र प्रसाद यादव: सदन जो चाहेगा होगा, सदन सर्वोपरि है।…( व्यवधान )यदि आपकी पार्टी तैयार है तो हम सब तैयार हैं। बी.ए.सी. के हम लोग ही मैम्बर हैं।
MR. CHAIRMAN: Shri Yadav, the Business Advisory Committee cannot meet in the House. It meets inside the Chamber of the hon. Speaker.
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव: मैं चाहता हूं कि डिस्कशन को गंभीरता से लिया जाए।…( व्यवधान )
MR. CHAIRMAN: The hon. Speaker will come and he will inform you about this.
कुंवर अखिलेश सिंह: अगर तीन दिन की चर्चा स्वीकार कर ली जाए तो हमें कोई आपत्ति नहीं है वर्ना जो समय निर्धारित हुआ है, तब तक सदन चले।…( व्यवधान )
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव: आप व्यवस्था दीजिए। आपकी रूलिंग होनी चाहिए। सदन की भावना को समझें।…( व्यवधान )
MR. CHAIRMAN: If the Committee agrees, we will have it for three days. It all depends on the decision of the Committee.
कुंवर अखिलेश सिंह: संसदीय कार्य मंत्री अपने विचार सदन के समक्ष रख दें।
…( व्यवधान )
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव: रख दें कि सरकार का क्या स्टैंड है।
MR. CHAIRMAN: We have taken a decision in the BAC. If it has to be revised, the BAC has to meet again. We cannot take a decision.
कुंवर अखिलेश सिंह: मेरा व्यवस्था का प्रश्न है। सदस्यगणों ने कहा है कि देश में बहुसंख्यक वर्ग किसानों का है। किसानों के सवाल पर सदन में चर्चा चल रही है।…( व्यवधान )
MR. CHAIRMAN: If the House is agreeable to any further change in the programme, we will take it up. We will change it.
कुंवर अखिलेश सिंह: हम चाहते हैं कि संसदीय कार्य मंत्री से पूछ लिया जाए कि क्या वे चर्चा करने के लिए तैयार हैं।
MR. CHAIRMAN: Everybody is interested in the farmers’ issue. All Parties are interested in the farmers’ issue.
… (Interruptions)
DR. SUSHIL KUMAR INDORA (SIRSA): Sir, this is a national issue. So, you can take a decision.… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: I know about it. The farmers’ issue is a national issue.
… (Interruptions)
श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव: संसदीय कार्य मंत्री आकर इस बारे में बता सकते हैं।…( व्यवधान )
MR. CHAIRMAN: Till the decision is announced, till such time, we will go on with our business. Let the business continue. Shrimati Rama Pilot, will you conclude?
… (Interruptions)
PROF. UMMAREDDY VENKATESWARLU (TENALI): Sir, I would request you to look at the sentiment, the spirit and the mood of the House.
MR. CHAIRMAN: I know of it.
PROF. UMMAREDDY VENKATESWARLU : Even if a decision has been taken by the BAC, looking at the mood of the House, you can decide about it.… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Now, the House is going to conduct the business till Nine of the Clock. Why are you in a hurry?
… (Interruptions)
SHRIMATI RENUKA CHOWDHURY (KHAMMAM): Sir, I do not understand the sense of what is being discussed in the House. … (Interruptions) It is not enough that we reduce it to a black and white decision of the BAC.
MR. CHAIRMAN: Your party’s representative is also there.
SHRIMATI RENUKA CHOWDHURY : That is all right. But I am expressing my opinion on the floor of this House. I wish to draw your attention to this issue. This is a crisis of a phenomenal magnitude. We do not want to discuss it because it has to be discussed.… (Interruptions) I would like to express my opinion also.… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Let it not be made an issue. If the House is agreeable, we will take it up further. Now, the business is going to be conducted till Nine of the Clock.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : Why are you troubling?
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: The business of the House would be conducted till 9 o’ clock.
… (Interruptions)
SHRIMATI RENUKA CHOWDHURY : If the House conducts the business till 9 o’ clock because it must be conducted till 9 o’ clock, then it defeats the purpose for which we want to speak. … (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: We would see the mood of the House at 9 o’ clock to proceed further. But do you want to see the mood of the house at 6 o’ clock?
कुंवर अखिलेश सिंह: माननीय सभापति महोदय, माननीय सदस्यगण ने यह गम्भीर प्रश्न खड़ा किया है। अभी संसदीय कार्य राज्य मंत्री सदन के अन्दर थे और अभी चले गये। सदन यह चाहता है कि लगातार तीन दिन तक इस गम्भीर विषय पर चर्चा कराई जाये। …( व्यवधान )
MR. CHAIRMAN: You allow the business to go on till 9 o’ clock. We will decide at 9 o’ clock. You allow them to take the agenda.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Please conclude now.
श्रीमती रमा पायलट: माननीय सभापति जी, प्रधान मंत्री जी ने आज सदन को बताया कि वे मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन बुलाने जा रहे हैं। मैं आशा करती हूं कि उसमें वे कोई ऐसा हल निकालेंगे, जिससे देश के किसानों को कुछ राहत मिलेगी, मोहलत मिलेगी।
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: You be here till 9 o’ clock. You can participate in the proceedings. The Parliamentary Affairs Minister would come. All the Members are interested in the welfare of the farmers, not this party or that party. All the parties are being represented in the farming community. Nobody can take an individual credit.
*m07 SHRI A.K.S. VIJAYAN (NAGAPATTINAM): Mr. Chairman, Sir, on behalf of my party, the Dravida Munnetra Kazagham, I rise to put forth the achievements of the Central Government for the past one and a half years and the achievements of the Tamil Nadu Government for the past five years in the field of agriculture.
Farmers are the backbone of our country. Keeping this in mind, the Central Government under our hon. Prime Minister, Shri Atal Bihari Vajpayee has already announced the first ever National Policy in Agriculture. It has also decided to reduce the interest rate charged by NABARD from 11.5 per cent to 10.5 per cent. It has also introduced the Kisan Credit Cards. The Central Government has provided a subsidy of Rs.78 crore for setting up cold storages during 2000-2001. These would, no doubt, help farmers to step up the production and would give much needed relief to produce more.
Tamil Nadu Government under the eminent leader of Dr. Kalaignar M. Karunanidhi has introduced a lot of programmes and schemes for the upliftment of agricultural farmers. It has set up `Vegetable Marketing Centres’ (Uzhavar Sandhai) in all major Municipalities and Town Panchayats of the State to help farmers to sell their produce at a particular place and at a particular price without the intervention of intermediaries. This is definitely an innovative step taken by the Government of Tamil Nadu keeping in view the problems and difficulties faced by the farmers of the State. This has certainly made a break-through in the field of marketing of vegetables in the State. This has helped the farmers to reduce the time, right from the initial stage to the marketing stage. Instead of going from pillar to post and for being at the mercy of the intermediaries, the Government of Tamil Nadu has helped them to sell at a particular place and without any intermediaries. Other State Governments and the Central Government should emulate the innovative efforts taken by the Government of Tamil Nadu in regard to setting up of `Vegetable Marketing Centres’.
After the Chola Dynasty, only the present Tamil Nadu DMK Government has desilted rivers and canals. This is a Herculean task and the Government of Tamil Nadu has done it commendably. It has helped to conserve water and the farmers have benefited with this act of the Government by getting water for cultivation and irrigation all through the year. This too can be taken up in other States.
Recently, the NDA Government has instructed the State Governments to stop supplying free electricity. But the Tamil Nadu Government has expressed strong reservations against this instruction and urged the Central Government to reconsider this announcement.
Tamil Nadu Government has waived the dues of the farmers and this has helped the farmers of Tamil Nadu to a great extent. Unlike in other parts of the country, Tamil Nadu farmers are better placed. Tamil Nadu Government has done a lot of work for easing the tension by extending reliefs at appropriate times.
Tamil Nadu Government under Dr. M. Karunanidhi, with the intervention of the Central Government, found a lasting solution to the Cauvery water dispute that has been there for a long time. Dr. Karunanidhi and Shri Vajpayee have settled this vexed problem with persistent and frequent talks with the respective States, and with the result Tamil Nadu has been getting Cauvery water for a couple of years.
The Government of the day has announced, in 1989-90, a waiver of Rs.10,000 to the farmers. This year, I would plead with the Central Government to enhance this amount to at least Rs.20,000 for the benefit of the farmers of the country in this hour of grief. Under the present circumstances, the farmers will get the much-needed relief by this kind gesture of the Government of India.
The Tamil Nadu Government has released Rs.13 crore for waiving the penal interest. It also gave incentives to the tune of Rs.20 crore to the farmers to safeguard the interests of the farmers of Tamil Nadu.
With this high note and expectation from the Central Government, I conclude.
*m08 श्री रघुनाथ झा : सभापति महोदय, इस सदन में अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर जो खेत और किसानों के सम्बन्ध में है, चर्चा हो रही है। इस सदन में पहले भी कई बार इस विषय पर चर्चा हो चुकी है। सरकार की ओर से भी उसका समुचित उत्तर दिया गया है। लेकिन इतने महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा हो रही है और सदन की उपस्थिति, चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, को देखकर इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितनी रुचि किसानों के बारे में माननीय सदस्यों के बीच है। न सिर्फ सदस्यों के बीच, कृषि से सम्बन्धित जो सिंचाई का विभाग है, बिजली का विभाग है, फूड मनिस्टरी है और अन्य विभाग हैं, अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि सरकार की उपस्थिति भी ठीक नहीं है। यह ठीक है कि कृषि मंत्री जी सक्षम हैं, केबिनेट की जाइंट रिसपांसबलिटी है, वे इस बहस का उत्तर देंगे। लेकिन जितनी जागरूक सरकार इसके प्रति होनी चाहिए, उतनी नहीं है। मैं कृषि मंत्री जी को बधाई देना चाहूंगा कि पहली बार ५० वर्षों की आजादी के बाद देश में कृषि नीति की घोषणा इन्होंने की है।
श्री शिवराज वी. पाटील (लातूर) : अगर आप मुझे बोलने की इजाजत दें तो मैं एक मिनट लूंगा। है कि हम भी कृषि मंत्री जी को कृषि नीति लाने की बधाई देते हैं। लेकिन यह पहली कृषि नीति नहीं है। जाखड़ साहब ने इसी सदन में कृषि नीति की घोषणा की थी। बैंकों से कर्जा दिलाने के लिए भी हमने नीति की घोषणा की थी, जमींदारी खत्म करने के लिए भी नीति की घोषणा हमने की थी और सिंचाई के लिए भी नीति लाने की घोषणा हमने की थी।
श्री रघुनाथ झा : समेकित रूप से कृषि नीति लाने की पहले हमारे कृषि मंत्री जी ने की है। आप लोगों ने ५० सालों में कृषि का नाश कर दिया।
श्री शिवराज वी. पाटील: मैं आपको तारीख दे रहा हूं। १२ अक्तूबर, १९८९ को राजीव गांधी जी ने वहां से कृषि नीति की घोषणा की थी।
डा. रघुवंश प्रसाद सिंह : उस समय ये कांग्रेस में थे।…( व्यवधान )
श्री रघुनाथ झा : इस सरकार ने और कृषि मंत्री जी ने पहली बार समेकित ढंग से कृषि नीति रखने का काम किया है। आपने अपनी सुविधा के मुताबिक कृषि नीति बनाई थी। ५० वर्षों में इस देश में कृषि का और किसानों का आपकी सरकार ने जितना बंटाधार किया, उतना आज तक किसी सरकार ने नहीं किया। यह बात ठीक है कि सारे किसानों की समस्याओं का निदान नहीं हो रहा है। बहुत सी बातें हैं, जिनके लिए कृषि मंत्री जी को और भारत सरकार को काफी मेहनत करने की आवश्यकता है।
आगे किसानों को और सुविधा देने की आवश्यकता है लेकिन जिस बात को डब्ल्यू.टी.ओ. में जाकर, आपने अंगूठा लगाकर, निशान लगाकर देश के किसानों की अनदेखी की है, …( व्यवधान )आपने देश के किसानों के हित को ताक पर रखने का काम किया है। इसके लिए कृषि मंत्री जी को, भारत सरकार को उसमें लगना पड़ेगा और किसानों के हित को देखना पड़ेगा। कृषि मंत्री जी से मैं कहना चाहूंगा कि आप सभी दलों के लोगों को विश्वास में लीजिए और किसानों के हित को, डब्ल्यू.टी.ओ. के कारण से जो नुकसान हो रहा है, आप देखिए कि उसकी कैसे भरपाई हो सकती है, उसके लिए आगे बढि़ए और पूरा सदन आपके साथ है।
मैं बिहार से आता हूं और मुझे गर्व है कि कृषि मंत्री जी भी बिहार से है। जब झारखंड का बंटवारा हो गया और झारखंड के बंटवारे के बाद बिहार की जो स्थिति है, हमारे यहां भोजपुरी में गाना बना दिया गया।" बटगिल, झारखंड और अब खाइए शकरकंद।" आज हमारी स्थिति बिल्कुल दयनीय हो गई है और माननीय कृषि मंत्री जी अच्छी तरह से जानते हैं कि नेपाल से आने वाली नदियों के कारण बाढ़ से भयंकर नुकसान होता है। नेपाल से आने वाली नदियों से पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार का बहुत बड़ा भू-भाग प्रतिवर्ष बर्बाद होता है। सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर सब समाप्त हो जाता है, खेती बर्बाद हो जाती है। इस चीज की भरपाई आज तक नहीं हो सकी। उसे रोकने के लिए नेपाल की सरकार से सार्थक बातचीत नहीं हो सकी जिसके कारण पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों का कल्याण नहीं हो सकता। इसलिए हम चाहते हैं कि जो नुकसान होता है, उसकी भरपाई चाहे भारत सरकार करे या फिर नेपाल की सरकार पर दबाब डालकर वहां समुचित व्यवस्था करे। आज बिजली के बारे में स्वयं प्रधान मंत्री जी ने चिंता व्यक्त की है और इस बात को स्वीकार किया है कि आज बिजली की व्यवस्था ठीक नहीं है और बिहार में बिजली नदारद है। हमारे रघुवंश बाबू जी कह रहे थे कि बिहार बचाओ, देश बचाओ। पटना में रैली हुई थी। रैली तो सुपर-फ्लॉप हो गई। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में गन्ने की कीमत में बहुत जमाने से, पचासों वर्षों से एक रुपये का फर्क होता रहा है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसानों की तुलना में बिहार के किसानों को गन्ने की कीमत में एक रुपया ज्यादा मिलता रहा है लेकिन बिहार की सरकार गन्ने की कीमत लागू नहीं कर सकी, गन्ने की कीमत का फैसला नहीं कर सकी। मैं गोपालगंज जिले से आता हूं। वहां का गन्ना यू.पी. की फैक्टरियों में जाता है। यू.पी. वाले अपने इलाके के लोगों को पाच रूपया अधिक देते हैं और बिहार के लोगों को गन्ने की कीमत कम देते हैं। इस तरह से बिहार के गन्ने के किसानों का शोषण होता है। बिहार में आलू के किसानों का एक बहुत बड़ा इलाका है लेकिन इस बजट में मुझे प्रसन्नता है कि अब उसके भंडारण की व्यवस्था करने की घोषणा वित्त मंत्री जी ने की है और कोल्ड स्टोरेज बनाने की व्यवस्था की है। एक करोड़ किसानों को क्रैडिट कार्ड देने की बात की है और तीन करोड़ लोगों के क्रैडिट काड्र्स अगले तीन साल तक पूरा करने की बात कही गई है, इसके लिए मैं सरकार को बधाई देना चाहता हूं। हमारे यहां बहुत बड़ा फलों का इलाका है। लीची बहुत बड़े एरिया में होती है, केले का बहुत बड़ा एरिया है. आम के फलों का भी बहुत बड़ा इलाका है। इन फलों के रख-रखाव, भंडारण, वितरण और मार्केटिंग की व्यवस्था ठीक नहीं है और न ही बाहर ले जाने की व्यवस्था है। माननीय कृषि मंत्री जी के नेतृत्व में, बिहार के बंटवारे के बाद माननीय प्रधान मंत्री जी को हम लोगों ने मैमोरेंडम दिया था और उसमें मांग की थी कि बिहार से कारगो की सुविधा दी जानी चाहिए ताकि बिहार की फसल को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने की व्यवस्था हो सके लेकिन अभी तक इस संबंध में सरकार की ओर से कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया है।
हम चाहते हैं कि इस बात की व्यवस्था की जाए। धान की खरीद जारी करने के बारे में सदन में कई बार चर्चा हो चुकी है। फूड मनिस्टर सदन में उपस्थित नहीं है। बिहार में गत वर्ष धान का उत्पादन १२३ लाख मटि्रक टन हुआ है। लेकिन एफ.सी.आई. के द्वारा सिर्फ पांच हजार मीटि्रक टन ही प्रोक्योर किया गया। इस बात में बिहार के साथ भेदभाव हुआ । कहा गया कि आंध्रा प्रदेश से लिया गया है, पंजाब से लिया गया है, मुझे इस पर कोई शिकायत नहीं है। किसानों को उनके उत्पादन का मूल्य मिलना चाहिए, लेकिन बिहार में एफ.सी.आई. के अधिकारी इनकी बात को मानने के लिए तैयार नहीं है। कहा गया कि वहां ४० केन्द्र खोल दिये गये हैं, जवाब देते रहे, कहते रहे और बार-बार इस सदन में चर्चा की कि बिहार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, बिहार के पास साधन नहीं हैं कि वह इस दिशा में कदम उठा सके। हमने कृषि मंत्री जी से अनुरोध किया, उन्होंने इसमें रुचि भी ली कि बिहार का धान खरीदा जाए, लेकिन उसकी खरीद नहीं हो पाई। इस विषय में माननीय मंत्री जी पटना बात करने के लिए गये, हम लोग इस सदन के सदस्य हैं, इनके इलाके में विरोधी दल की बात तो छोड़िये, सहयोगी दलों के लोगों को भी नहीं पूछा गया और ये अपने पार्टी दफ्तर में जाकर कार्य करते रहे। लेकिन हम लोगों से बात करना भी इन्हें गवांरा नहीं हुआ। इसलिए इस बात की आवश्यकता है कि हम इन सारी बातों पर ध्यान दे। हम लोगों के नेता डा. राम मनोहर लोहिया जी बार-बार कहते थे कि अनाज का उत्पादन, करखनिया माल का उत्पादन, इन सबकी समुचित रूप से व्यवस्था होनी चाहिए। हमारा अनाज का उत्पादन का मूल्य कछुवे की गति से चल रहा है, जबकि कारखानों का उत्पादन मूल्य खरगोश की चाल से चल रहा है। कारखाने में बना हुआ सामान जैसे ट्रैक्टर, कुदाल, पावर टिलर आदि किसान खरीदते हैं, जो महंगा मिलता है। इसके बीच में भी आज व्यवस्था करने की आवश्यकता है। बीज के दाम, कीटनाशक दवाओं के दाम, जो किसानों की आवश्यकता है, बढ़ रहे हैं। खाघ पर आपने सब्सिडी हटा दी है। डीजल का दाम बढा दिया है ।
जहां तक बी.पी.एल. का प्रश्न है, गत वर्ष इसके अंतर्गत आठ हजार करोड़ रुपये खर्च करते थे और इस साल आप १२ हजार करोड़ रुपया खर्च करने जा रहे हैं। बी.पी.एल.का अनाज जिन लोगों को मिलना चाहिए, मैं पूछऩा चाहता हूं कि क्या वह उन लोगों को तक पहुंच पाता है। स्थिति यह है कि वह सारा सामान चोर-बाजार में चला जाता है। किसानों को डिस्ट्रैस सेल के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, इस पर भी विचार करने की आवश्यकता है और इसकी जाँच होनी चाहिये।
भंडारण के विषय में भी आपने घोषणाएं की हैं, इसके लिए मैं आपको बधाई देता हूं, लेकिन भंडारण व्यापक रूप से करने की जरूरत है। बिहार में जमीन की स्मॉल होल्िंडग की सीमा अधिकतम है, जिसे हम अलाभकर खेती कहते हैं। इस खेती से कोई फायदा नहीं होता है। किसान ठीक से खेती नहीं कर पाते हैं। मेरा सुझाव है कि सरकार किसानों को पम्प सैट आदि की सुविधाएं दे, ताकि चार-पांच किसान मिलकर आपस में एडजस्टमैंट करके, ५-१०-१५ एकड़ के किसान, अपने तरीके से खेती कर सकें और खेती की तकनीक को विकसित कर सकें। प्रधान मंत्री जी ने आज भी और पहले भी अपने भाषण में खेती की तकनीक को बदलने के लिए कहा है। श्रीमती रमा पायलट जी की बात से मैं सहमत हूं, यह ठीक है कि धान, चावल, गेहूं के उत्पादन के बदले में दूसरी तरह की खेती करना चाहते हैं।
आप कौन सी खेती कराना चाहते हैं। इसका एक सर्वे करके, कि कौन से इलाके में कौन सी खेती हो सकती है, कृषि विभाग से एक बुलेटिन निकाल कर, वहां लोगों को प्रशक्षित करके, उन लोगों के बीच में ले जाकर उन्हें बताने की आवश्यकता है ताकि वे लोग ठीक से अपनी खेती कर सकें। आपने कोई अल्टरनेटिव व्यवस्था नहीं की और किसानों को छोड़ दिया। कभी-कभी गन्ने का उत्पादन लोग ज्यादा कर देते हैं और जब गन्ने का उत्पादन ज्यादा कर देते हैं तो फैक्ट्री वाले उसका मूल्य घटा देते हैं। फिर जब उसका मूल्य बढ़ जाता है तो दूसरी तरफ दूसरे साल में वे दूसरी खेती करने लगते हैं। इसलिए एक समुचित विकास के हिसाब से खेती करने की आवश्यकता है। भारत सरकार ने ठोस कदम उठाया है। पहली बार बजट में भी किसानों के ऊपर ध्यान दिया गया है और आगे भी किसानों को मजबूत किया जाए, क्योंकि हमारे देश में ८० प्रतिशत आबादी किसानों और मजदूरों की है, लेकिन किसानों और मजदूरों की आवाज जिस तरह संसद, विधानसभाओं या दूसरी जगहों पर उठनी चाहिए, उस तरह नहीं उठती है, चूंकि हम में एकता नहीं है। हम वोट भी देते हैं तो जाति और पार्टी के आधार पर देते हैं। किसानों की समस्या समझ कर अगर हम इस सवाल को उठाएं तो हम आगे किसानों की मदद कर सकते हैं।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
MR. CHAIRMAN : Now, the hon. Member, Shrimati Renuka Chowdhury.
… (Interruptions)
श्री प्रभुनाथ सिंह : महोदय, अभी रघुनाथ जी कह रहे थे कि किसानों का सवाल मजबूती से नहीं उठता है और इसलिए नहीं उठता है क्योंकि सदन में सब लोग उपस्थित नहीं रहते हैं। इसलिए हमने आपसे कहा कि आज इसे स्थगित कर दिया जाए और कल सब लोग रहेंगे तो उस समय मजबूती से इस सवाल को उठाया जाए।…( व्यवधान )
MR. CHAIRMAN: Is it the sense of the House to continue this discussion tomorrow?
SHRIMATI RENUKA CHOWDHURY : Mr. Chairman, Sir, I will become the first speaker tomorrow. … (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: If the sense of the House is to continue this discussion tomorrow, then we can take it up tomorrow. If the House agrees, then we can continue it tomorrow. Is it the sense of the House to continue this discussion tomorrow?
SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.
MR. CHAIRMAN: Okay. We will continue this discussion tomorrow.
Now the House stands adjourned to meet again tomorrow, 13th March 2001 at 11 a.m. 1828 hrs. The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Tuesday, March 13, 2001 / Phalguna 22, 1922 (Saka).
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