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Lok Sabha Debates

Shri Arjun Ram Meghwal Raised A Discussion On Points Arising Out Of The Answer ... on 21 May, 2012

> Title: Shri Arjun Ram Meghwal raised a discussion on points arising out of the answer given by the Minister of Agriculture on 13.03.2012 to Starred Question No. 1 regarding "Agricultural Profession”.

श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर):सभापति जी, दिनांक 13 मार्च 2012 को तारांकित प्रश्न संख्या 1 जो हमारे माननीय सदस्य श्री ए.टी.नाना पाटील जी द्वारा पूछा गया था, उसका विषय यह था कि कृषि व्यवसाय पर इतना घोर अन्याय क्यों हो रहा है, लोग कृषि व्यवसाय क्यों छोड़ रहे हैं। इस पर माननीय कृषि मंत्री शरद पवार जी ने जो जवाब दिया, उसके बाद सदन में यह बात तय हुई कि इस पर चर्चा कराई जाए। इसके लिए माननीय अध्यक्ष जी ने आधे घंटे की यह चर्चा स्वीकृत की, उसके लिए मैं सबसे पहले मैडम स्पीकर का आपके माध्यम से बहुत्- बहुत धन्यवाद करना चाहता हूँ।

          सभापति जी, विगत वर्षों में खेती किसानों के लिए लाभकारी कार्य नहीं रहा है। भारत सरकार के एनएसएसओ की रिपोर्ट के अनुसार 41 परसेंट किसान कमाई का उचित विकल्प मिलने पर खेती का कार्य छोड़ने के लिए तैयार हैं। 41 परसेंट बहुत बड़ा परसेंट है। इसके मुख्य कारण  हैं- कृषि उपज का उचित मूल्य न मिलना, खेती के काम आने वाले इनपुट्स जिनमें खाद, बीज और पेस्टीसाइट्स की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होना, बिजली की कीमत में बढ़ोतरी होना, मजदूरी में बढ़ोतरी होना, प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसल खराब हो जाना, फसल ठीक हो जाए तो बाज़ार में फसल लाने के लिए बारदाना उपलब्ध न होना, समर्थन मूल्य न मिलना और अगर सब कुछ ठीक हो जाए तो एफसीआई द्वारा खरीद न करना, अनाज का सड़ जाना और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद भी अनाज को गरीबों में नहीं बांटना, ये कुछ ऐसे कारक रहे हैं, जिनकी वजह से किसान आत्महत्या करने पर विवश हुआ है। यदि आप आत्महत्या के आंकड़े देखें तो करीब ढाई लाख किसानों ने आत्महत्या की है। यह राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो बोल रहा है, मैं नहीं बोल रहा हूं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने वर्ष 1995 से किसानों की खुदखुशी के आंकड़े भी दर्ज करना शुरू कर दिया है। वर्ष 1995 से 2010 तक ढाई लाख किसानों ने आत्महत्या की है। मैं यह जानना चाहता हूं कि यह परिस्थिति क्यों पैदा हुई? इस देश का किसान अन्नदाता है। इस देश में जब खाद्यान्न का संकट आया और हमें लगा कि अमेरिका पर निर्भर रहना होगा तो उस समय के देश के प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने किसानों का आह्वान किया कि ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करो, अन्यथा हमें अमेरिका की शर्तें माननी होंगी। इस देश के किसानों ने श्री लाल बहादुर शास्त्री की अपील को स्वीकार किया और देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया। इसके लिए श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने एक नारा दिया था "जय जवान, जय किसान "। उस नारे में अटल जी ने और जोड़ा "जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान "। इसके बावजूद किसानों की दुर्दशा हो रही है जो कि पिछले चार-पांच सालों में तो स्थिति और विकट हो गई है।  नीतियों में कहां गड़बड़ है? इस पर विचार करने की जरूरत है। आज देश की 62 प्रतिशत आबादी को कृषि आजीविका दे रहा है। लेकिन आज तक हमारी कोई राष्ट्रीय कृषि नीति नहीं है। फ्रेग्मेंटिड मैनर में नीतियां हैं बागवानी मिशन, कपास मिशन या कोई राष्ट्रीय कृषि नीति हो सकती है। लेकिन एक होलियस्टिक वे में हमने आज तक कोई राष्ट्रीय कृषि नीति नहीं बनायी है। वर्ष 2007 में कृषि वैज्ञानिक श्री एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में किसान आयोग बना, जिसने एक राष्ट्रीय नीति बनायी और उसे संसद में प्रस्तुत भी किया गया, लेकिन उसे आज तक लागू नहीं किया गया। हमारी प्राथमिकता क्या है? हमारी प्राथमिकता किसान हैं या हमारी प्राथमिकता वे लोग हैं, जो किसान को लूट रहे हैं? इस पर गम्भीर चिंतन करने की जरूरत है। मैं एक बात आपको और बताना चाहता हूं कि वर्ष 1987 में सरकार कुल बजट का 27 प्रतिशत कृषि पर खर्च करती थी, अब वह मात्र पांच प्रतिशत ही रह गया है। कृषि पर प्रायोरिटी घटी है। सरकार किसानों के साथ पक्षपातपूर्ण रवैया अपना रही है।  

          कभी कॉटन की फसल ज्यादा हो जाती है, कभी आयात-निर्यात नीति के ठीक न होने से किसान परेशान रहता है। कभी आलू ज्यादा हो जाता है, वह बाजार में लाता है तो लोग कहते हैं कि आलू बहुत सस्ते में बेचो। कभी टमाटर ज्यादा हो जाता है तो कहा जाता है कि आप उसे सस्ते में बेचो। हम क्यों नहीं एग्रो प्रोसेसिंग यूनिट के ऊपर प्राथमिकता देते हैं? आज पैदा करने वाला भूखा है और बेचने वाला मालामाल है। यह कौन-सी व्यवस्था है?

          सभापति जी, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि इस तरह की चीजें पिछले कई सालों में रही हैं, इसके लिए बहुत-सी परिस्थितियां जिम्मेदारी रही होंगी। लेकिन, हमने उस परिस्थिति के ऊपर कोई गंभीर चिंतन नहीं किया। हर बार मॉनसून सत्र में हम चर्चा करते हैं और चर्चा करके छोड़ देते हैं। कभी उस पर कोई निर्णय नहीं आता। इसलिए किसान हमेशा परेशान होता रहता है। किसानों के खिलाफ अलग-अलग लॉबी भी काम करती रहती है। हम उस लॉबी के पक्ष में आ जाते हैं और किसान लुटता- पिटता रहता है।

          यहां से हमने कई बार वित्त मंत्री जी, कृषि मंत्री जी को कहते हुए सुना कि हमने किसानों का इतना कर्ज़ माफ किया। वे 68 हजार करोड़ रुपए की कर्ज़ माफी की बात करते हैं। पर, आज भी 37 प्रतिशत किसान कृषि ऋण के लिए सरकारी बैंकों से लोन लेता है। किसी और कार्य के लिए तो वह लोन साहूकारों से लेता है। किसान के घर में अगर शादी है तो उसे बैंकों से लोन नहीं मिलता, उसे साहूकारों से लोन लेना पड़ता है। अगर उसके घर में उसे अपनी बहन के घर में भात भरना है तो उसकी जो भी आवश्यकताएं हैं, वे बैंक से पूरी नहीं होती, उसे साहूकारों से लोन लेना पड़ता है। इस तरह वह साहूकार के चंगुल में फंस जाता है। साहूकार 18 से लेकर 36 प्रतिशत तक उस किसान से ब्याज वसूलता है। ...( व्यवधान)

सभापति महोदय :  यह आधे घंटे की चर्चा है। आपके अलावा और चार-पांच माननीय सदस्यों को बोलना है।

श्री अर्जुन राम मेघवाल : सभापति महोदय, आज कृषि कार्य में बदली हुई परिस्थितियों में उत्पादन में लागत मूल्य, बाजार व गुणवत्ता, प्रतिस्पर्द्धा, बिजली, सिंचाई, खाद, दवा, भंडारण, पैकेजिंग आदि से संबंधित अनेक जटिल समस्याओं का निराकरण किया जाना अति आवश्यक है क्योंकि भारत की 70 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है और वह कृषि व्यवसाय पर निर्भर है।

          सभापति जी, मेरी आपके माध्यम से मांग है कि सभी किसानों के कर्ज़ माफ हों। जो बैंक से कर्ज लेते हैं और जो कर्ज़ साहूकारों से लिए जाते हैं, दोनों कर्ज़ माफ हों। अगर साहूकारों से लिए गए कर्ज़ माफ नहीं होंगे तो किसान फिर आत्महत्या करेगा। मध्य प्रदेश के झाबुआ के सत्रह हजार किसानों ने राष्ट्रपति को एप्लीकेशन लिख कर दी कि हम आत्महत्या करने जा रहे हैं। पंजाब एग्रीकल्चर में धनी राज्य कहलाता है। यहां के भी कई जिलों के लोगों ने राष्ट्रपति को एप्लीकेशन लिखकर दिया कि हम आत्महत्या करना चाह रहे हैं। हमारे यहां राजस्थान में जिनके कुएं फेल हो गए, उन्होंने बैंक से लोन लिया और इस तरह उन पर दस-दस लाख रुपए बैंक के कर्ज़ हो गए। वे भी आत्महत्या करना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार कोई हॉलिस्टिक पॉलिसी क्यों नहीं लाती है? यहां किसान की कोई गलती नहीं और उनकी फसल और कुएं खराब होते हैं। उसमें रिकवरी के सिस्टम को ठीक करके सभी किसानों के कर्ज़ माफ किए जाएं।

          महोदय, कृषि ऋण चार प्रतिशत की ब्याज दर पर हो। अभी यह सात प्रतिशत है और समय पर चुकाएंगे तो चार प्रतिशत है। मेरा यह कहना है कि कृषि ऋण चार प्रतिशत के ब्याज दर पर ही मिलना चाहिए। किसान देश के अन्नदाता हैं। उसमें कोई किन्तु-परन्तु नहीं होना चाहिए। फसल उगाने के दौरान कई विपरीत परिस्थितियां आती हैं। कभी शीत लहर पड़ जाती है, कभी पाला पड़ जाता है जिसके कारण वह समय पर नहीं चुका पाता। आप इसे आपदा प्रबंधन में नहीं मानते और परिस्थितियां उसके हाथ से बाहर होती हैं। इसलिए यह किन्तु-परन्तु नहीं होना चाहिए।

          किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी सीधे किसानों को मिले। कृषि के लिए बिजली की कोई कटौती न हो। इंडस्ट्रियल एरिया के लिए, फैक्ट्रियों के लिए डेडिकेटेड फीडर होता है। उनकी बिजली नहीं कटती और किसानों की बिजली कटती रहती है। उनके लिए डेडिकेटेड फीडर क्यों नहीं हो सकता? उनके लिए भी डेडिकेट फीडर होना चाहिए।

          महोदय, नदी जोड़ो परियोजना लागू करके हर खेत को पानी दिया जाना चाहिए। किसानों को आमदनी की गारंटी देने वाली एक इंश्योरेंस स्कीम, फार्म इन्कम टैक्स गारंटी इंश्योरेंस स्कीम लागू की जानी चाहिए।  किसानों को वृद्धावस्था पेंशन दी जानी चाहिए, सभी फसलों का न्यूनतम मूल्य ऐसा घोषित हो, जो रीजनेबिल हो और उत्पादन की लागत पर 50 प्रतिशत लागत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जाना चाहिए। स्वामीनाथन आयोग आपने ही बनाया था, इसी सरकार ने बनाया था, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि उसकी रिपोर्ट को शीघ्र लागू करना चाहिए।...( व्यवधान)

सभापति महोदय : अब कृपया कन्क्लूड करिये।

श्री अर्जुन राम मेघवाल : सभापति जी, मैं कन्क्लूड कर रहा हूं।

          12वीं पंचवर्षीय योजना प्रारम्भ हो गई है। हमारी 11 पंचवर्षीय योजनाओं में केवल एकमात्र पंचवर्षीय योजना में कृषि को प्रधानता थी। इससे सिद्ध होता है कि कृषि को कितनी पंचवर्षीय योजनाओं में प्रधानता दी गई है। पंचवर्षीय योजनाओं में हर बार कृषि की विकास दर का लक्ष्य चार प्रतिशत रखा जाता है, जो आज तक पूरा नहीं हुआ। उसकी भी कोई मोनेटरिंग करता है या नहीं करता है, यह व्यवस्था भी हमको देखनी पड़ेगी।

          मैं कन्क्लूड ही कर रहा हूं। मेरा ऐसा मानना है कि सबजैक्ट बहुत इम्पोर्टेंट था और मुझे बहुत बोलना था, लेकिन आपने चूंकि मुझे टोक भी दिया है, इसलिए मैं यह कहना चाहता हूं कि आज देश में क्या परिस्थितियां बनी हैं कि डॉक्टर का बेटा डॉक्टर बनता है, इंजीनियर का बेटा इंजीनियर बनता है, आई.ए.एस. का बेटा आई.ए.एस. बनता है, वकील का बेटा वकील बनना चाहता है, लेकिन किसान का बेटा किसान नहीं बनना चाहता, क्यों? मैं आपके माध्यम से बताना चाहता हूं कि किसान का बेटा किसान इसलिए नहीं बनना चाहता कि किसान की जो खेती है, किसान का जो व्यवसाय है, वह प्रोफिटेबल नहीं रहा। वह करीब 2-3 हजार रुपये प्रतिमाह कमाता है तो किसान का बेटा किसान क्यों बनेगा। अगर किसान का बेटा किसान नहीं बनेगा तो मैं यह कहना चाहता हूं कि यह देश भूखा हो जायेगा। बच्चों को पूरा पोषाहार नहीं मिलेगा, पोषण नहीं मिलेगा, अगर यही हाल रहा। इस सम्बन्ध में एक शेर है;

          “यही हाल रहा तो दुनिया में, भारत की कहानी क्या होगी, जिस देश का बचपन भूखा हो, उस देश की जवानी क्या होगी।” सभापति महोदय: धन्यवाद। मेघवाल जी, शेर के बाद भाषण नहीं दिया जाता है। बस अब बैठ जाइये।

          नियम 55 के अनुसार आधे घण्टे की चर्चा शुरू करने वाले सदस्य के अतिरिक्त जिन चार अन्य सदस्यों ने 10 बजे से पहले नोटिस भेजा हो, उनको केवल एक प्रश्न पूछने की अनुमति दी जाती है। केवल श्री शैलेन्द्र कुमार जी ने ही 10 बजे से पहले नोटिस भेजा था। मैं मंत्री जी को बुलाना चाहता हूं, आप उनसे एक प्रश्न पूछ लें।

श्री जगदीश शर्मा (जहानाबाद):महोदय, मेरा भी नोटिस था।...( व्यवधान)

सभापति महोदय: आपने दस बजे से पहले नोटिस नहीं भेजा।

…( व्यवधान)

सभापति महोदय: अच्छा, मैं देखता हूं। शैलेन्द्र जी, आप पहले बोल लें, फिर मैं देखता हूं।

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी): आपने मुझे आधे घंटे की चर्चा, जो श्री अर्जुन राम मेघवाल जी ने उठाई, बहुत अच्छा मुद्दा किसानों से सम्बन्धित, उनकी सुविधाओं से सम्बन्धित मामला उन्होंने उठाया और अन्त में जो शायरी उन्होंने कही, वाकई आज के समय में वह बिल्कुल सामयिक है।

          मैं आपके माध्यम से सरकार से पूछना चाहूंगा, यहां पर कृषि मंत्री जी को जवाब देना चाहिए, लेकिन वे हैं नहीं। यह बात सत्य है कि आज चाहे वह अनाज का उत्पादन हो, चाहे वह फलों का उत्पादन हो या सब्जियों का हो और दूसरा, जो मेघवाल जी भूल गये हैं, किसान दूध का भी उत्पादन करता है। दूध के बारे में भी आपको बोलना चाहिए था। आज अगर देखा जाये तो इस सदन में कई बार चर्चा हुई है कि जो अनाज किसान उत्पादन करता है, उसका वाजिब मूल्य उसको नहीं मिल पा रहा है। यहां तक कि जो खरीद होती है, कांटों पर उसको ले जाने के लिए बहुत दिक्कत है। दूसरी बात जो अनाज सड़ा है, सुप्रीम कोर्ट के भी निर्देश हैं कि इसको गरीबों में, खासकर बी.पी.एल. वालों में बांट दिया जाये।

          एक सुझाव मैं देना चाहूंगा कि गोदाम संरक्षण, अनाज रखने की व्यवस्था, मैं चाहूंगा कि सरकार इसमें भरपूर तरीके से किसानों को सब्सिडी दे दे, उनको कह दे कि आपके यहां जो उत्पादन होता है, उसका भण्डारण आप करें तो मेरे ख्याल से हर किसान सक्षम है, वह गोदाम बनाकर अपने यहां उसको संरक्षित भी कर सकता है, गोदाम भी बना सकता है। किसान को पूरी छूट देनी चाहिए कि सीधे एक्सपोर्ट करे, उसका सीधे पैसा उसके पास आये, तभी जाकर देश का किसान खुशहाल होगा।    

          दूसरी बात मैं आज फलों के मामले में कहना चाहूंगा कि आज किसान फलों का भी उत्पादन करता है।  वह बागों में रात-दिन रहता है, हर मौसम को झेलता है।  आज फलों के संरक्षण के लिए, अभी मैं एक किताब में पढ़ रहा था कि 6,000 करोड़ रूपए से ज्यादा का नुकसान केवल महाराष्ट्र में अंगूर की खेती पर हुआ है।  

          दूसरी बात, जहां तक सब्जियों की बात है, सभापति महोदय, मैं आपको याद दिलाना चाहूंगा कि चाहे दूध हो, चाहे सब्जी हो या फल हो, आप बिहार में, उत्तर प्रदेश में या किसी भी स्टेट में चले जाइए और देखिए कि उनके क्या भाव हैं, लेकिन वहीं दिल्ली की मंडियों में आप जाइए, दिल्ली में अगर आप दूध खरीदें, चाहे सब्जी खरीदें, चाहे फल खरीदें या अनाज खरीदें, दोगुना दाम यहां बढ़-चढ़कर लिया जाता है। आज एक तरीके से किसान के उत्पादन की पूरी लूट मची हुयी है।  किसान को वाजिब मूल्य नहीं मिल पा रहा है।  मैं चाहूंगा कि सरकार इस पर जवाब दे, चाहे दूध हो, चाहे सब्जी हो, चाहे फल हो या अनाज हो, किसान को उनका उचित मूल्य मिले।  इन्हीं शब्दों के साथ आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, मैं आपको धन्यवाद देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।

सभापति महोदय :  माननीय सदस्यगण, विषय की गंभीरता को देखते हुए मैं तीन अन्य माननीय सदस्यों को जिन्होंने सबसे पहले नोटिस भेजे थे, एक-एक प्रश्न पूछने की अनुमति देता हूं।

          श्री गोविन्द प्रसाद मिश्र :उपस्थित नहीं।

          श्री हरीश चौधरी : उपस्थित नहीं।

          श्री जगदीश शर्मा।

श्री जगदीश शर्मा : सभापति महोदय, आज मुझे जिस चर्चा पर विचार व्यक्त करने का मौका दिया है, यह बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है।  मेरा यह मानना है कि जीवन की सबसे बड़ी बुनियादी जरूरत पानी है और पानी के बाद रोटी है।  अगर सृष्टि का जीवंत रखना है, तो दो जो बुनियादी जरूरतें हैं, रोटी और पानी, उनके बाद ही किसी दूसरी चीज की बात आती है।  आज चर्चा बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन किसान के प्रति केंद्र सरकार कितनी जागरूक है, कितनी संवेदनशील है, यह सदन को देखने से पता चल जाता है।  किसान का मामला केवल एक विभाग का मामला नहीं है। पूरी केंद्र सरकार, सभी विभाग इससे जुड़े हुए हैं और प्रधानमंत्री का जब तक इसमें विशेष रोल नहीं होगा, तब तक हम लोग रोते रहेंगे, सांसद चिल्लाते रहेंगे और हिंदुस्तान के किसान मरते रहेंगे।  हम आपके माध्यम से निवेदन करना चाहते हैं कि एक स्पेशल सैशन किसानों के सवाल पर हो।  वह सैशन पांच से दस दिन तक चले।  हम समझते हैं कि केंद्र सरकार यदि संवेदनशील है, किसानों के प्रति उसे हमदर्दी है, तो एक सप्ताह का स्पेशल सैशन केंद्र सरकार बुलाए।   

सभापति महोदय : आप प्रश्न पूछिए।   

श्री जगदीश शर्मा : महोदय, मैं प्रश्न पूछ रहा हूं।  हम आपके माध्यम से सरकार से यह मांग करना चाहते हैं कि जो राष्ट्रीय एग्रीकल्चर प्राइस कमीशन है, उसमें हिंदुस्तान के किसान के प्रतिनिधि को रखेंगे या नहीं?  दूसरा, जो गेहूं की आज खरीद हो रही है, उसका मूल्य कम से कम 1,700 रूपए प्रति क्विंटल रखें, धान का मूल्य कम से कम 1,400 रूपए प्रति क्विंटल रखें, के.सी.सी. दो परसेंट पर दें और जो वाटर बॉडीज हैं, परंपरागत साधन हैं और जलाशय हैं, उनका जीर्णोद्धार करें और इसके लिए पैसा केंद्र सरकार सीधे राज्य सरकार को दे।  किसानों का जो पूरा आउटस्टैंडिंग ऋण है, उसे केंद्र सरकार माफ करे।  मेरी आपके माध्यम से यही मांग है।

 

श्री के.डी. देशमुख (बालाघाट):माननीय सभापति महोदय, आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।  मैं स्वयं किसान हूं और मैं समझता हूं कि किसान होने के बाद ही सांसद हूं।  मैं खेती करता हूं।  अभी कृषि पर चर्चा हुयी।  मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से संक्षेप में कुछ कहना चाहता हूं।  धान की खेती और गेहूं की खेती, दो ही खेती हमारे यहां होती है। आज किसानों को आसानी से पहचाना जा सकता है। गांव में जिसका चेहरा मुरझाया हुआ हो उसको आसानी से पहचाना जा सकता है कि वह किसान है। कोई अगर दुखी आदमी दिखे तो आप समझ जाइएगा कि यह किसान है। मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं, बारबार लोक सभा में चर्चा होती है कि यह कृषि प्रधान देश है। हम किसानों की उन्नति करना चाहते हैं। हम किसानों की भलाई करना चाहते हैं। आज मैं आपको तस्वीर बताना चाहता हूं कि आज बहुत महंगाई बढ़ गई है। आज किसान को समय पर यूरिया और डीएपी नहीं मिलता है। उन्हें बिजली नहीं मिलती है। कृषि यंत्र महंगे हो गए हैं। बहुत परेशानियां झेलते हुए जब किसान अपनी उपज को बेचने जाता है तो उसे समर्थन मूल्य नहीं मिलता है। जैसे - धान का समर्थन मूल्य 1080 रूपये है। मैं 1080 रूपये देता हूं, कोई एक क्विंटल धान पैदा कर के बताए।

सभापति महोदय :   कृपया आप प्रश्न पूछ लीजिए।

श्री के.डी. देशमुख :  प्रश्न यही है। ...( व्यवधान) केन्द्र सरकार द्वारा धान और गेहूं का समर्थन मूल्य तय करते समय वहां किसान का प्रतिनिधि रहना चाहिए, जिस वक्त धान और गेहूं का समर्थन मूल्य तय करने जा रहे हैं। धान का समर्थन मूल्य दो हजार रूपये प्रति क्वींटल होना चाहिए। गेहूं का समर्थन मूल्य दो हजार रूपये प्रति क्वींटल होना चाहिए वरना, किसान आत्म हत्या करने से नहीं रूकेंगे। ...( व्यवधान) अब गांव का किसान खेती करने से तंग आ गया है। ...( व्यवधान) केन्द्र की सरकार गेहूं और धान  का समर्थन मूल्य इस बार दुगुना करे तभी किसानों की दशा और दिशा सुधर सकती है।

SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): Sir, I would like to draw your attention and through you, the attention of this House and the hon. Minister, to the fact that we have several Ministries, but there is no exclusive Ministry to look after the welfare of the farmers. Farmers constitute about 70 per cent of the population. We have Ministry to look after the welfare of the children, to look after the welfare of women, to look after the welfare of Scheduled Castes and Scheduled Tribes; we have Ministry to look after commerce and industry, and also labour.  But we have no Ministry exclusively to look after the welfare of the farmers. So, I demand that the situation has now come when we should have a separate Ministry to look after the welfare of farmers. The hon. Minister should think about setting up a special Ministry exclusively to look after the welfare of the farmers.

          In addition to this, we have three sectors – industry, service and agriculture. There is a provision to give pension to industrial sector, to services sector, but there is no provision to give pension to agricultural sector, to the farmers. So, I demand that all the farmers should be provided with adequate pension and responsibility should be shouldered both by the Union Government and the State Governments. I hope that the hon. Minister will respond to these two demands.

सभापति महोदय :  अगर सभा की अनुमति हो तो सभा का समय इस चर्चा व जीरो अवर की समाप्ति तक बढ़ा दी जाए।

कई माननीय सदस्य :   जी, हां।

सभापति महोदय : आप क्या कहना चाहते हैं?

चौधरी लाल सिंह (उधमपुर): सर, मैं कहना चाहता हूं कि सरकार की मेहरबानी से जो किसान क्रेडिट कार्ड मिल रहा है और जब उसकी फसल नहीं बिकती है तो जो क्रेडिट देते हैं, वह इंतजाम करें कि वही उनकी फसल है। मैं यही कहना चाहता हूं।

श्री जगदीश शर्मा (जहानाबाद):  यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है इस पर प्रधानमंत्री जी को जवाब देना चाहिए। ...( व्यवधान)  

 

  18.00 hrs. MR. CHAIRMAN :  Nothing, except what Shri Harish Rawat says, will go on record.

(Interruptions) … * सभापति महोदय :  आप सब सीनियर मैम्बर्स हैं। यह मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी होती है। आप प्रैस नहीं कर सकते कि फलाना मंत्री आए या वह फलाना मंत्री आए। इसलिए कृपया अपनी सीट पर चले जाएं और माननीय मंत्री जी के भाषण को सुनें।

…( व्यवधान)

श्री जगदीश शर्मा:  सभापति महोदय, हम इसके विरोध में सदन से बहिष्कार करते हैं।

  18.01 hrs. At this stage Shri Jagdish Sharma and some other  hon. Members left the House कृषि मंत्रालय में राज्य मंत्री, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय में राज्य मंत्री तथा संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री हरीश रावत):  सभापति महोदय, मैं आपका बहुत शुक्रिया अदा करना चाहता हूं कि आपने इस महत्वपूर्ण विषय पर अर्जुन राम मेघवाल जी को आधे घंटे की चर्चा प्रारंभ करने की अनुमति दी। मेघवाल साहब बहुत ही ब्रिलिएंट पार्लियामेंटेरियन हैं। उन्होंने बहुत शिद्दत के साथ कुछ सवालों को उठाया। इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसान के मामले में यह सदन, यहां तक कि सदन से बाहर भी कभी राय नहीं बंटी। फार्म और फार्मर्स दोनों एक-दूसरे के इंटीगरल पार्ट हैं। यह अलग बात है कि हमारे मित्र पांडा साहब पता नहीं उनमें क्यों डायवोर्स कराना चाहते हैं। उन्होंने कहा कृषि अलग रहे और कृषक अलग रहे। कोई और मंत्रालय उसकी बेहतरी को देखे।...( व्यवधान)

  18.02 hrs. (Dr. M. Thambidurai in the Chair) कोई और मंत्रालय उसकी बेहतरी को देखे। मैं बहुत विनम्रता से कहना चाहता हूं कि कृषि मंत्रालय ने देश के प्रति दायित्व को बहुत निष्ठा से पूरा किया है। उसमें हम किसानों के योगदान को हमेशा आगे रखकर चल रहे हैं। हम आज अपने देश की अन्न सुरक्षा के प्रति आश्वस्त हैं। उसमें हमारे किसानों का बहुत बड़ा योगदान है। पिछले 3-4 सालों से लगातार रिकार्ड अन्न उत्पादन हो रहा है।...( व्यवधान) इस साल 252 मिलियन टन अन्न उत्पादन होने जा रहा है।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Only hon. Minister’s reply will go on record.

(Interruptions) … * SHRI HARISH RAWAT: I will come to that point also. आप कोई भी बिन्दु उठा लीजिए, उस पर सरकार के दृष्टिकोण को मैं आपके सामने रखूंगा। आप जरा धैर्य रखिए। मैं समझता हूं कि जब मैं इसका श्रेय किसानों को दे रहा हूं कि पिछले 3-4 वर्षों से लगातार रिकार्ड उत्पादन हुआ, तो उसमें आप भी मुझे ज्वाइन करना चाहेंगे। कुछ वर्षों पहले तक हम अपनी जरूरत का आधे से ज्यादा दलहन बाहर से आयात करते थे और आज हम ऐसी स्थिति में हैं कि 75 से 80 प्रतिशत दलहन अपने देश में उत्पादित करते हैं। हमारे किसानों ने उस चुनौती को अपने हाथ में लिया। हम आगे और आशावान हैं।

          हमारे मित्र ने कहा कि किसान खेती क्यों छोड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसान दूसरे प्रोफैशन की तरफ जाना चाहते हैं। इस विषय में उन्होंने नैशनल सैंम्पल सर्वे आर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट का उल्लेख किया। मैं उनसे बहुत अदब के साथ इस बात को कह रहा हूं कि एनएसएसओ के जो आंकड़े हैं, आप उन्हें जरा गौर से पढ़िए। उन्होंने कहा है कि 27 प्रतिशत किसान इसे नान- प्रॉफिटेबल मानते हैं। इस तथ्य को हमने कभी नहीं छुपाया। जिस देश में परम्परागत कारणों से खेती में लगातार फ्रैगमैंटेशन हो रहा हो, जोतें छोटी हो रही हों, जिस देश में 80 प्रतिशत से ज्यादा जोतें दो हैक्टेयर से नीचे हों, मैं समझता हूं कि हमें अपने वैज्ञानिकों और किसानों को धन्यवाद देना चाहिए। उसमें एग्रीकल्चरल एडमिनिस्ट्रेटर्स भी सम्मिलित हैं, राज्यों के लोग सम्मिलित हैं, राज्य सरकारें भी सम्मिलित हैं। उन्होंने अब भी हमारी खेती पर 52 प्रतिशत लोगों की निर्भरता को बनाकर रखा है। यदि हमारी डायवर्सिफाइड इकोनॉमी के अंदर लोग दूसरे नये सैक्टर्स की तरफ जाना चाहते हैं, जैसे यदि किसान का बेटा इंजीनियर, मैनुफेक्चरर, बिजनसमैन बनना चाहता है,  why should we block his way? हमें उसे एनकरेज करना चाहिए। इसके बावजूद जो आंकड़े हमारे पास हैं, मैं उनके आधार पर कह रहा हूं कि 27 परसेंट ने कहा कि हम इसे नॉन प्रॉफिटेबल मानते हैं, 8  परसेंट ने कहा कि यह रिस्की है और 2 परसेंट लोगों ने कहा कि यह लैक ऑफ स्टेटस है। जो प्रोफैशन समानजनक नहीं रह जाता, लाभदायी नहीं रह जाता, लोग उसे स्टेटस की बात नहीं मानते। आज भी किसान होना हमारे देश में गर्व का विषय है और हम में से बहुत सारे लोग अपने आपको किसान का बेटा कहलाने में गर्व महसूस करते हैं।

          वर्ष 1951 में हमारे टोटल कल्टीवेटर्स 70 मिलियन्स के करीब थे। आज वह संख्या 127.3 मिलियन है। जो एग्रीकल्चरल लेबरर हैं, मैं वर्ष 71 को लेता हूं, क्योंकि वह हमारी पहली कृषि क्रंति का आधार वर्ष था, उसमें 78.2 मिलियन कल्टीवेटर्स थे और जो एग्रीकल्चरल लेबरर 47.5 परसेंट थे। आज हमारे कल्टीवेटर्स की संख्या 127.3 मिलियन है और एग्रीकल्चरल लेबरर की संख्या 106.8 मिलियन है। उसी तरीके से हमारे जो लैंड यूज डाटा हैं, वे हमे बताते हैं कि जो खेती उसके अंदर आयी है, वह वर्ष 1951 में 131.89 मिलियन हैक्टेयर थी। वह बढ़कर वर्ष 2008-09 में 195.10 मिलियन है । ऐसा नहीं है कि खेती करना लोगों ने छोड़ दिया है और वे इस पेशे में नहीं जाना चाहते हैं। यह भी एक सत्यता है कि हम अपनी बढ़ती हुई इकोनॉमी में यह चाहते हैं कि लोगों में दक्षता आये। आम सैक्टर में भी दक्षता आये और दूसरे सैक्टर्स में भी दक्षता आये। दूसरे सैक्टर्स खेती के भार को अपने कंधों पर लें। इसके लिए पॉलिसीज को सरकार ने हमेशा उसी तरीके से री-ओरियेन्ट करने का काम किया है।

          सभापति महोदय, यहां पर हमारे मित्र ने बताया कि किस तरीके से हम किसानों को एमएसपी देते हैं। उस विषय में दो बातें कही गयीं। एक बात यह कही गयी कि इसके लिए हमारा जो सीएसीपी है, उसका कम्पोजिशन ऐसा है कि उसमें फार्मर्स का रिप्रैजेंटेशन नहीं है। उसमें और रिप्रैजेंटेशन हो, मैथोडोलॉजी को और स्ट्रैंदेन किया जाये और पार्टीसिपेटरी कल्चर सीएसीपी में इनकलकेट किया जाये। इसमें कहीं कोई दो राय नहीं है। वह सुझाव आता है, मगर जो तथ्य है, वह यह है --

The CACP is composed of a Chairman, a Member Secretary, two official Members and three Non-official Members.  The Non-official Members are representatives of the farming community. यह कहना कि फार्मिंग कम्यूनिटी का इसमें रिप्रेजेंटेशन नहीं है।...( व्यवधान) उचित नहीं है।

MR. CHAIRMAN : Nothing else will go on record.

(Interruptions) …* श्री हरीश रावत:  अधिष्ठाता जी, पिछले कुछ वर्षों से इसमें लगातार किसान संगठनों के दबाव ने बहुत काम किया है, पार्लियामेंट के सवालों ने भी मदद की है। सीएसीपी ने अपनी वर्किंग में अब किसानों को और किसान संगठनों के बराबर इनवाल्व किया है और मैं समझता हूं कि यदि और इनवाल्वमेंट के लिए हमारे मेंबर्स केस बना रहे हैं, वह जस्टीफाइड है, लेकिन यह कहना कि इसमें किसान का हित बिल्कुल इग्नोर हो रहा है, उचित नहीं है। एक बात बराबर उठती है- मिनिमम सपोर्ट प्राइस। यदि मार्केट में अच्छा प्राइस मिल रहा है, तो किसान पर कोई रोक नहीं है, जैसे पिछले साल कपास का मूल्य ज्यादा था, तो किसान बाहर ले गया। लेकिन जब मूल्य कम होता है, उस समय सपोर्ट प्राइस किसान को स्ट्रेंथ देने के लिए होता है। मैं बहुत अदब से कहना चाहता हूं कि वर्ष 2004-05 की तुलना में यदि हम धान का समर्थन मूल्य देखें, तो उसमें लगभग 93 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Nothing else will go on record.

(Interruptions) …* श्री हरीश रावत:  ज्वार में वर्ष 2004-05 के मुकाबले 90.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसी प्रकार रागी या मंडुआ, जो गरीब आदमी का भोजन है, में 103.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अरहर के दामों में 130.2 प्रतिशत, उड़द के दाम में 134 प्रतिशत, मूंग के दाम में 148 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसी प्रकार गेहूं के दाम में 101 प्रतिशत वृद्धि हुई है, बारले के दाम में 81.8 प्रतिशत, चने के दाम में 96.5 प्रतिशत और शुगरकेन में 110.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। कुल मिलाकर यह जो आर्ग्यूमेंट दिया जा रहा है कि यह सरकार  एमएसपी के प्रति संवेदनशील नहीं है, ऐसा कहना ठीक नहीं है। मैं समझता हूं मैंने जो आंकड़े आपके सामने रखे हैं, मैं अपने मंत्रालय की तरफ से साफ शब्दों में कहना चाहता हूं कि कृषि मंत्रालय का प्रत्येक व्यक्ति यह चाहता है कि किसान को ज्यादा से ज्यादा मिले, मगर हमारे जैसी लार्ज कंज्यूमर बेस इकोनोमी में आपको एक संतुलन रखना पड़ता है। उस संतुलन को बनाए रखते हुए सरकार ने निरंतर इस बात का प्रयास किया है कि एमएसपी मिले। खरीद के संबंध में जो मैकेनिज्म है, सभी को मालूम है, अर्जुन जी इसको मुझसे बेहतर तरीके से जानते हैं कि खरीद के मामले में हम राज्य सरकारों की मशीनरी पर अवलंबित हैं। एफसीआई लॉजिकल सपोर्ट देता है, मॉनेटरी सपोर्ट देता है, पॉलिसी बनाने में सपोर्ट देता है, बाकी काम राज्यों को करने होते हैं। हम राज्यों के बहुत आभारी हैं। इस साल बारदाने की थोड़ी परेशानी आई है, लेकिन उस दिक्कत को भी ओवरकम कर लिया गया है। स्टोरेज के बारे में कुछ माननीय सदस्यों ने कहा है, मैं बताना चाहूंगा कि ग्रामीण भंडारण की योजना में इस साल का हमारा आउटले लगभीग 800 करोड़ रुपये है। एफसीआई ने एक बड़ी संख्या में, जो उनकी स्कीम थी जिसमें उन्होंने प्राइवेट सेक्टर को इंसेन्टिव दिया है, वह बहुत अच्छा काम कर रही है। हमने 151 मिलियन टन स्टोरेज कैपेसिटी क्रिएट करने की बात उसमें की है। कुल मिलाकर जो भंडारण की चुनौती है, एक ऐसी परिस्थिति बनी है, जो स्वस्थ परिस्थिति है।

          रमेश बैस जी मध्य प्रदेश के पड़ोसी राज्य से आते हैं। वह भी जानते हैं कि मध्य प्रदेश सरकार को इस वर्ष यह उम्मीद नहीं थी कि गेहूं का उत्पादन इतना ज्यादा हो जाएगा। यह राज्य सरकार के सामने एक चुनौती बन गई है। हम भी जितना सोच रहे थे, उत्पादन उससे ज्यादा हुआ है। अनाज का जो ऑफटेक था, वह घटा है, हमारा रिजर्व करीब तीन गुना है। भंडारण की जो स्थिति है, उस बारे में आपको आलोचना का अधिकार है, लेकिन जो सरकार की दिक्कतें हैं, कठिनाइयां हैं, अर्जुन जी आप अपने साथियों से कहें कि उसे भी देखें और हमारे अच्छे काम को एप्रिशिएट करें।

          जहां तक किसानों द्वारा आत्महत्या करने की बात अर्जुन मेघवाल जी ने उठाई और एनसीबीआर की रिपोर्ट का जिक्र किया। मैं कहना चाहता हूं कि एनसीबीआर डेटा कलेक्ट कर रही है। उसे मैं चुनौती नहीं दे रहा हूं। किसान किसी भी कारण से मर रहा है, उस सबको वे लोग सूचीबद्ध कर रहे हैं। हमें जो आंकड़े राज्यों ने दिए हैं, हम राज्यों द्वारा दिए गए आंकड़ों और सूची पर विश्वास न करें, यह ठी नहीं है। हमारे यहां संघात्मक ढांचा है। राज्य जो कहते हैं, उसे हम डिनाई नहीं कर सकते। मैं बताना चाहता हूं कि आंध्र प्रदेश में 2006-2007 में 557 केसेज़ थे आत्महत्या के जो एग्रेरियन सेक्टर में मुआवजे के लिए पात्र माने गए थे। इसमें ऋण की समस्या थी, सब सम्मलित है, लेकिन 2011-2012 में 109 रिपोर्ट्स ही दर्ज हुई हैं। इसी तरह कर्नाटक में 2006-2007 में 176 केसेज आए थे, 2011-2012 की रिपोर्ट के अनुसार 77 केस ही दर्ज हुए हैं। महाराष्ट्र में 2006-2007 में 1031 केस थे, अब वहां से 123 रिपोर्ट ही आई हैं। केरल में निल है। केरल ने अपने पैकेज का पूरा इस्तेमाल किया है। तमिलनाडु में भी निल है। पंजाब में 2006 से 2011 तक के आंकड़ों में थोड़ा बहुत अंतर आया है। कुल मिलाकर ये आत्महत्याएं कृषि कार्यों में हुई हैं और इनमें कमी आई है। लेकिन एक भी किसान की कृषि कारणों से मौत हमारे लिए चुनौती है।

          मैं प्रधान मंत्री जी, यूपीए की अध्यक्ष सोनिया जी, कृषि मंत्री और वित्त मंत्री जी धन्यवाद देना चाहूंगा कि जो ऋण माफी को अमल में लाया गया, उसका भी यह परिणाम है। उसने किसानों के उत्साह को बढ़ाने का काम किया है। जो ऋण माफी की योजना को 2008 में लागू किया गया, उससे 369 लाख किसान लाभांवित हुए और 65,318 करोड़ रुपए के करीब ऋण माफी हुई। मैं समझता हूं दुनिया में और कहीं इतनी बड़ी ऋण माफी नहीं हुई है। जो स्पेशल पैकेज चार राज्यों कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल और महाराष्ट्र को प्रधान मंत्री जी की तरफ से दिया गया, उस पैकेज ने भी किसानों की काफी मदद की। उस बात का कई इंडिपेंडेंट एजेंसीज ने सेम्पल सर्वे भी किया है, लेकिन मैं उसमें नहीं जाना चाहता।

          मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि इन चीजों ने काफी असर किया है और उसका लाभ किसानों को और अन्य लोगों को मिला है। मैं अर्जुन भाई का धन्यवाद करना चाहता हूं कि उन्होंने किसानों के ऋण की बात यहां उठाई और कहा कि जो ऋण सरकारी संस्थाओं और बैंकों द्वारा दिया जाता है, उसे बढ़ाया जाए। सरकार ने उनके दिल की भावना को पहले से ही अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है। सन् 2003-2004 में 86981 करोड़ रुपए का ऋण किसानों के लिए कृषि क्षेत्र में था।   वह बढ़कर वर्ष 2010-2011 में 4,68,299 करोड़ रुपये हुआ। मैं गणित में जरा कमजोर हूं, जल्दी से प्रतिशत नहीं निकाल पा रहा हूं, उधर वाले तेज हैं वे प्रतिशत निकाल लेंगे कि कितने प्रतिशत का क्वांटम जम्प है।  बैंकों को साफ तौर पर कहा गया है कि इसे प्रीओरिटी लैंडिंग एरिया मान करके, उनके लिए टार्गेट निर्धारित करने का काम किया गया है और बैंक्स उस टार्गेट को पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं।

          आपने ब्याज-दर कम करने की बात कही है तो उस पर भी अमल किया जा रहा है। अब प्रभावी ब्याज दर 4 प्रतिशत की है। यह ठीक है कि आपको उसमें एतराज है और उसमें कुछ इफ और बट्स आपने लगा रखे हैं। आप जानते हैं कि किसान को आखिर ऋण की समय पर अदायगी के लिए प्रेरित भी तो करना पड़ेगा, बैंक्स भी तो हमारे ही संस्थान हैं। हमें दोनों के बीच में तालमेल रखना पड़ेगा। यदि किसान ज्यादा समय तक अपने ऋण को नहीं निपटाये रखेगा तो आगे के ऋण उसे कहां से मिल पायेंगे? इसलिए मैं समझता हूं कि जो सशर्त ब्याज दर में अंतर लाया गया है वह सोच-विचार करके लाया गया है। आपको जानकर खुशी होगी कि 90 परसेंट किसान इस पैटर्न को अपना रहे हैं। हम उम्मीद करते हैं कि अगर हम और उत्साहित करेंगे तो वे इसे और अपनाएंगे और आगे के लिए क्रेज बढ़ेगा।

          सदन में हम लोग इस बात को कहेंगे कि ब्याज दर को चार प्रतिशत से तीन प्रतिशत लाने की कोशिश की जाए। इससे हम प्रभावी-रिटर्न को इंश्योर करने का काम सकेंगे तथा कोओपरेट्व्ज जिनके ऊपर माइक्रो-लेवल पर लेंडिंग की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, कुछ राज्यों में वे बहुत अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन कुछ राज्यों में अच्छा काम नहीं कर पा रहे हैं। हमने जो संशोधन इस सदन में पारित किया है कि कोओपरेटिव्ज को मूल अधिकार में सम्मिलित किया गया है और यह एक लैंड-मार्क फैसला संसद का था। हम यह समझते हैं कि वैद्यनाथन कमेटी के आधार पर जो सुझाव और सुधार हम कोओपरेटिव्ज में ला रहे हैं, उसके बाद जो हमारा रूरल क्रेडिट सिस्टम है वह और मजबूत होगा और किसानों की निर्भरता प्राइवेट लैंडर्स पर कम हो सकेगी।

          पिछले कुछ वर्षों के अंदर आपने इस बात को बहुत उठाया कि हमने कृषि को मजबूती देने के लिए प्रयास नहीं किये हैं। एक कृषि विद्यार्थी के नाते मैं समझता हूं कि जितना एलोकेशन इस सरकार के समय में इस क्षेत्र के अंदर हुआ है उतना पहले नहीं हुआ।  कुल मिलाकर के देखेंगे तो कृषि क्षेत्र के अंदर बहुत ज्यादा इंवैस्टमेंट हुआ है। ...( व्यवधान)

          दो-तीन पाइंट यहां पर रेज किये गये हैं। एक पाइंट यह है कि हम लोगों ने कोई नये इनीशिएटिव नहीं लिये हैं। इसके लिए हमने नेशनल पॉलिसी फॉर फार्मर्स को लिया, एनएफएसएम और आरकेवीवाई के तहत लिया तथा जिस तरीके से राज्यों को मदद दी है उससे अब राज्य कृषि के सेक्टर में ज्यादा एलोकेशन कर रहे हैं। उसके कारण एग्रीकल्चर के अंदर पब्लिक इंवैस्टमेंट बढ़ा है और आज उसी का कारण है कि कुछ जगहों पर सूखा और बाढ़ के बावजूद साढ़े तीन परसेंट की ग्रोथ-रेट हम कृषि क्षेत्र में बनाए रखने में सफल हुए हैं। हमें उम्मीद है कि 12वीं पंचवर्षीय योजना के प्रारम्भिक एक-दो वर्षों के अंदर,  4 प्रतिशत की जो ड्रीम ग्रोथ-रेट कृषि में है उसे हम प्राप्त कर लेंगे।  यह तब सम्भव हो रहा है, जब इसके लिए कई योजनाएं जैसे नेशनल हार्टिकल्चर मिशन, स्पोर्ट टू स्टेट  एक्सटेंशन प्रोग्राम फार एक्सटेंशन रिफार्म्स, नेशनल एग्रीकल्चर इंश्योरेंस स्कीम शामिल है। हम इसे मोडिफाइड इंश्योरेंस स्कीम ले कर आ रहे हैं और इस पर अमल हो रहा है। मेरे समझ से सौ से ज्यादा जिलों के अंदर उस स्कीम को प्रारम्भ किया गया है। यदि आंकड़ों को ठीक करने की जरूरत पड़ेगी तो मैं ठीक कर लूंगा लेकिन मेरी समझ से काफी चीजें हैं, जिन्हें हमने कृषि क्षेत्र के अंदर नए-नए इनिशिएटिव ले कर पूरा कर लिया है। आप देखेंगे कि पिछले साल के बजट प्रस्तावों के अंदर वित्त मंत्री जी ने कई नए एरियाज को ओपन-अप किया है, जिनमें से हमारी दूसरी हरित क्रंति, हमारे ईस्टर्न स्टेट्स के लिए विंडो प्रोजेक्ट्स हैं, मगर हमने पूर्वोत्तर राज्यों में एग्रीकल्चर का एक्सटेंशन करने के लिए एक सब्सटांशियल एमाउंट निर्धारित करने का काम किया है। साठ हजार से ज्यादा गांवों को पल्स विलेजिस के रूप में सिलेक्ट किया है, ताकि दलहन में हम आत्मनिर्भर हो सकें। सब्जियों के लिए शैलेन्द्र जी ने चिंता जाहिर की थी कि बाहर कुछ दाम होते हैं और अंदर कुछ दाम होते हैं, उसे बैलेंस करने का काम किया है, ताकि सप्लाई चेन के कारण दाम एकदम से न बढ़ पाएं और खेती दबाव में न आए। इसके लिए हमने सब्जियों के उत्पादन के लिए योजना प्रारम्भ की है, उसका लाभ मिलेगा। हमने दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने के लिए, क्योंकि दूध हमारे पास सरप्लस है और बड़ी-बड़ी कम्पनियां के पास दूध का इतना पाउडर है कि उन्होंने एक्सपोर्ट के लिए मांग कर रहे हैं, लेकिन हमने उसके बावजूद भी 12वीं पंचवर्षीय में उसके लिए अलग से मिशन तैयार किया है। फूड प्रोसेसिंग एरिया के अंदर नया मिशन लांच करने का काम किया है, ताकि प्रोसेसिंग को भी बढ़ाने का काम हम कर सकें। नेशनल हार्टिकल्चर मिशन में नेशनल हार्टिकल्चर बोर्ड के माध्यम से तथा दूसरे माध्यमों से हम स्टोरेज कैपेसिटी को बढ़ाने की बात कर रहे हैं, बल्कि एफडीआई जो रिटेल में लाना चाहते थे, उसका मकसद भी जो फूड प्रोसेसिंग का एरिया है, कोल्ड चेन सिस्टम है, उसे और मजबूत करने के लिए स्टोरेज को मजबूत करने के लिए इन सब चीजों को हम लाने की कोशिश कर रहे हैं। हमें उम्मीद है कि इसमें सदन का बराबर समर्थन मिलेगा और हमें अच्छा लगेगा कि आप आलोचना करें और हम तथ्यों के आधार पर दूसरी बार और ज्यादा इप्रूवमेंट के साथ आपके सामने आ सकें। आप हमारे इरादे पर संदेह मत कीजिए, क्योंकि हमें आपके इरादे पर कोई संदेह नहीं है। हमें आपके इरादे पर भरोसा है। हम यह मान कर चलते हैं कि सरकार बेहतर परफोर्म करेगी, इसलिए आप आलोचना करने के नए विषय ढूंढ़ते हैं। हम आपके इस प्रवृत्ति को सैल्यूट करते हैं, लेकिन सरकार की तरफ से जो कुछ किया जा रहा है, उसे आपके सामने रख रहा हूं। यह आफ एन आवर डिस्कशन है, इसलिए मैं सभापति जी के कहने से अपनी बात समाप्त कर रहा हूं।