State Consumer Disputes Redressal Commission
Lic vs Nasheem on 9 September, 2022
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/2673/2014 ( Date of Filing : 22 Dec 2014 ) (Arisen out of Order Dated 17/11/2014 in Case No. c/133/2013 of District Baghpat) 1. LIC Baghpat Baghpat UP ...........Appellant(s) Versus 1. Nasheem Baghpat Baghpat UP ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. SUSHIL KUMAR PRESIDING MEMBER HON'BLE MR. Vikas Saxena JUDICIAL MEMBER PRESENT: Dated : 09 Sep 2022 Final Order / Judgement
(सुरक्षित) राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग , उ0प्र0 , लखनऊ।
अपील सं0 :- 2673 / 20 14 (जिला उपभोक्ता आयोग, बागपत द्वारा परिवाद सं0- 133/2013 में पारित निर्णय/आदेश दिनांक 17/11/2014 के विरूद्ध) Branch Manager, Life Insurance Corporation of India, Branch at Baghpat, Delhi-Saharanpur Road, Baghpat. Divisional Manager, Life Insurance Corporation of India, Prabhat Nagar, Meerut.
Through the Assistant Secretary, Z.O. Legal Cell, Life Insurance Corporation of India Hazratganj, Lucknow.
Appellants Naseem S/O Shareef R/o Village & Post Katha, Thana Tehsil, Distt- Baghpat.
Respondent समक्ष मा0 श्री सुशील कुमार, सदस्य मा0 श्री विकास सक्सेना, सदस्य उपस्थिति:
अपीलार्थीगण की ओर से विद्वान अधिवक्ता:- श्री वी0एस0 बिसारिया प्रत्यर्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता:- श्री नितिन कुमार मिश्रा दिनांक:-21.10.2022 माननीय श्री विकास सक्सेना , सदस्य द्वारा उदघोषित निर्णय जिला उपभोक्ता आयोग, बागपत द्वारा परिवाद सं0- 133/2013 नसीम बनाम शाखा प्रबंधक भारतीय जीवन बीमा निगम व अन्य में पारित निर्णय/आदेश दिनांक 17/11/2014 के विरूद्ध यह अपील प्रस्तुत की गयी है।
संक्षेप में वाद के तथ्य इस प्रकार हैं कि विपक्षी सं0 1 भारतीय जीवन बीमा निगम के बीमा एजेण्ट द्वारा प्रत्यर्थी/परिवादी को भारतीय जीवन बीमा निगम की इन्डोमेंट एश्योरेंस पॉलिसी विद प्रोफिट के विषय में बताया गया तथा विपक्षी सं0 1 बीमा निगम के शाखा प्रबंधक बागपत द्वारा उक्त पॉलिसी के संबंध में परिवादी को समझाया गया, जिसके फलस्वरूप प्रत्यर्थी/परिवादी ने अपनी पत्नी के लिए उक्त दो बीमा पॉलिसी सं0 256831679 अंकन 2,00,000/- रू0 की दिनांक 24.03.2011 को तथा पॉलिसी सं0 256831678 अंकन 3,00,000/- रू0 थी। दिनांक 22.03.2011 को प्राप्त की। उक्त दोनों पॉलिसियों के संबंध में प्रत्यर्थी/परिवादी ने प्रथम किश्त दिनांक 24.03.2011 एवं दिनांक 22.03.2011 को अपीलार्थीगण की शाखा बागपत मे जमा करायी। उक्त दोनों बीमा पॉलिसियों में परिवादी को नॉमिनी/उत्तराधिकारी नामित किया गया। परिवादी द्वारा उक्त दोनों पॉलिसियों के संबंध में द्वितीय किश्त दिनांक 27.08.2011 को तथा तीसरी किश्त दिनांक 28.01.2012 को जमा की गयी। दिनांक 27.07.2012 को प्रात: 9:30 बजे परिवादी की पत्नी की मृत्यु दुर्घटनावश बाथरूम में फिसलने के कारण हो गयी, जिसकी सूचना परिवादी द्वारा तत्काल बीमा एजेण्ट को दी गयी चूंकि परिवादी की पत्नी की मृत्यु दुर्घटनावश हुई थी। अतएव परिवादी द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट भी दर्ज नहीं करायी गयी और परिवादी की पत्नी का पोस्टमार्टम भी नहीं हुआ। परिवादी ने बीमित धनराशि दिलाये जाने हेतु विपक्षी सं0 1 जीवन बीमा निगम के कार्यालय में क्लेम हेतु सम्पर्क किया तथा जांचोपरांत विपक्षी सं0 1 भारतीय जीवन निगम शाखा बागपत को एक पत्रदिनांकित 08.04.2013 परिवादी को प्राप्त हुआ, जिसमें विपक्षीगण द्वारा क्लेम धनराशि देने से इंकार कर दिया गया। इस प्रकारविपक्षीगण द्वारा गलत ढंग से बीमित धनराशि परिवादी को अदा नहीं की गयी है। जिसके कारण परिवादी को मानसिक व शारीरिक क्षति पहुंची है अत: क्षुब्ध होकर परिवादी द्वारा जिला फोरम के समक्ष परिवाद बीमित धनराशि का अनुतोष् दिलाये जाने हेतु प्रस्तुत किया गया है।
विपक्षीगण की ओर से जिला फोरम के समक्ष प्रतिवाद पत्र प्रस्तुत कर परिवाद पत्र के कथनों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह कथन किया गया कि परिवादी द्वारा प्रस्तुत परिवाद भ्रामक तथ्यों के आधार पर योजित किया गया है जो कि निरस्त होने योग्य है। परिवादी द्वारा अपनी पत्नी की मृत्यु का कारण बाथरूम में फिसलना बताया गया है जो स्वयं में संदिग्ध है चूंकि बाथरूम में फिसलने से मृत्यु संभव नहीं है। परिवादी द्वारा बीमित की मृत्यु के संबंध में कोइ्रप्रथम सूचना रिपोर्ट दर्जनहीं करायी गयीहै और न ही बीमित का पोस्टमार्टम कराया गया है जिससेकि मृत्यु का कारणस्पष्ट हो सके। परिवादी द्वारा अपनी पत्नी को किसी डॉक्टर को भी नहीं दिखाया गया है। यह संभव नहीं है कि फिसलने पर किसी व्यक्ति को चोट न लगे। इस प्रकार बीमित की मृत्यु पूर्णता संदिग्ध है। परिवादीने स्वयं की पॉलिसी के संबंध में किश्त जमा नहीं की जबकि अपनी पत्नी की बीमा पॉलिसियों केा जारी रखा इस प्रकार यह साबित है कि परिवादी ने किसी षडयंत्र के तहत स्वयं को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से अपनी पत्नी की पॉलिसयों को जारी रखा। यह भी कथन किया गया है कि मृतक की जीवन बीमा पॉलिसी पर धारा 4(बी) के उपबंध लागू होते हैं जिसके अनुसार यदि बीमित की मृत्यु सार्वजनिक स्थल में दुर्घटना से अतिरिक्त दुर्घटना में होतीहै तो ऐसी दशा में बीमा कम्पनी का उत्तरदायित्व केवल भुगतान की गयी किश्तों की कुल राशि बिना ब्याज भुगतान का होगा। इस प्रकार परिवादी का कोई वाद कारण विपक्षीगण के विरूद्ध उत्पन्न नहीं होता है अत: परिवाद निरस्त किये जाने योग्य है।
अपील में मुख्य रूप से यह आधार लिये गये हैं कि प्रश्नगत आदेश व निर्णय दिनांकित 17.11.2014 के विरूद्ध प्रस्तुत बीमा कम्पनी की अपील मेमो के रूप से यह आधार लिया गया है कि प्रश्नगत बीमा पॉलिसी सं0 256831678 तथा 256831679 जो दिनांक 30.03.2011 को जारी की गयी, उनमें स्पष्ट रूप से महिला के संबंध में क्लॉज 4(बी) का उल्लेख था तथा बीमित एवं नॉमिनी तथा बीमे की दावेदारी उस क्लॉज से बंधे हुए हैं। बीमित की मृत्यु दिनांक 27.07.2012 को 9:30 बजे सुबह बाथरूम में गिरकर होने का कथन किया गया है किन्तु इस संबंध में कोई भी प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं की गयी है। पॉलिसी के 4 (बी) क्लॉज में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि दुर्घटना की दशा में महिला के बीमित संदर्भ में उसकी मृत्यु दुर्घटना में होने पर यदि घटना सार्वजनिक स्थल पर हुई है तभी बीमे का क्लेम देय होता है अन्यथा सभी दिये गये प्रीमियम बिना ब्याज के वापस किया जायेगा। विद्धान जिला उपभोक्ता फोरम ने इस आधार पर परिवाद स्वीकार किया है एवं बीमा की धनराशिपरिवादी को दिलवायी है यह पॉलिसी संबंधित एजेण्ट द्वारा भरे गये हैं जिस पर बीमित के अंग्रेजी में हस्ताक्षर हैं। क्लॉज 4(बी) पर अलग से हस्ताक्षर कराये गये हैं जब तब कि बीमा की शर्तों को बीमित व्यक्ति को समझा न दिया जाये तब तक वे उस पर लागू नहीं होगी यह निष्कर्ष देते हुए परिवाद आज्ञप्त किया गया है जो उचित नहीं है बीमित एवं परिवादी क्लॉज 4(बी) से बंधे हुए हैं। अत: बीमित को धनराशि दिलाये जाने से अधिक नहीं है एवं परिवाद अस्वीकार किये जाने योग्य है किन्तु गलत रूप से परिवाद स्वीकार किया गया है। अत: प्रश्नगत निर्णय अपास्त होने योग्य एवं अपील स्वीकार किये जाने योग्य है।
अपीलार्थीगण की ओर से विद्धान अधिवक्ता श्री वी0एस0 बिसारिया एवं प्रत्यर्थी की ओर से विद्धान अधिवक्ता श्री नितिन कुमार मिश्रा को विस्तृत रूप से सुना गया। तत्पश्चात पीठ के निष्कर्ष निम्नलिखित प्रकार से हैं:-
अपीलार्थी बीमा कम्पनी की ओर से मुख्य रूप से इस बिन्दु पर बल दिया गया है कि मृतका तथा बीमित श्रीमती नसीम की मृत्यु सार्वजनिक स्थल पर न हो करके घर के बाथरूम में फिसलकर होना बतायी गयी है, जिसके लिए बीमा की पॉलिसी के साथ विशेष क्लॉज 4(बी) बीमित श्रीमती नसीम से हस्ताक्षरित प्राप्त किया गया था एवं मृतका बीमित ने इस क्लॉज को स्वीकार करते हुए बीमा पॉलिसी ली थी। अत: मृतका का नॉमिनी बीमा की धनराशि प्राप्त करने का अधिकारी नहीं है।
इस संबंध में एलआईसी इंटरनेशनल द्वारा जारी प्रपत्र का अवलोकन किया गया जो निम्नलिखित प्रकार से है:-
Clause 4 (b).: It is hereby declared and agreed that in the event of my death the Life Assured accuring as a result of intentional self injury, Suicide or Attempted suicide, Insanity accident other than an accident in a public place or murder at any time on or after the date on which the policy has commenced but before the expiry of three years from the date of this policy, the Corporations liability shall be limited to the equal to the total amount of premium (exclusive of extra premiums if any), paid under this policy without interest. Provided that in case the life assured shall commit suicide before the expiry of one year reckoned from the date of this policy, the provisions of the clause under heading Suicide printed on the back of policy, shall apply. I agree to the above terms and conditions for the policy.
इस पत्रावली पर श्रीमती नसीम के हस्ताक्षर किया हुआ उपरोक्त प्रपत्र दिया गया है जिसमें ''विशेष स्त्री का उपबंध 4(बी)'' के अंतर्गत उक्त सहमति दी गयी है, जिस पर साक्षी श्री सतेन्द्र सिंह के हस्ताक्षर भी है। उक्त प्रतिबंध के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि केवल सार्वजनिक स्थान पर बीमित महिला की मृत्यु होने पर मात्र दी गयी प्रीमियम की पॉलिसी की धनराशि बीमा कम्पनी द्वारा देय होती है तथा बीमा की धनराशि देय नहीं होती है। प्रश्नगत पॉलिसी के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि यह पॉलिसी दिनांक 28.12.2010 से आरंभ है, जैसा कि पॉलिसी में अंकित है इसी प्रकार पॉलिसी सं0 256831679 अंकन 2,00,000/- रू0 की दिनांक 24.03.2011 को तथा पॉलिसी सं0 256831678 अंकन 3,00,000/- रू0 22.03.2011 को प्राप्त की गयी है। मृतका की मृत्यु दिनांक 27.07.2012 को अर्थात पॉलिसी लेने के लगभग 01 वर्ष 04 माह बाद हुई है। जबकि उपरोक्त क्लॉज 4(बी) की परिणीय जो 03 वर्ष के भीतर है एवं उपरोक्त क्लॉज 4(बी) जो महिलाओं की सुरक्षा के उद्देश्य से बनाये गये हैं उसके अनुसार मृतका की मृत्यु पॉलिसी लेने के 03 वर्ष के भीतर हुई है अत: उपरोक्त क्लॉज 4(बी) के अनुसार केवल प्रीमियम की धनराशि देय है।
इस संबंध में अपीलकर्ता की ओर से माननीय राष्ट्रीय आयोग द्वारा पारित निर्णय लाइफ इंश्योरेंस कारपोरेशन ऑफ इंडिया प्रति गनेश लाल II (2013) CPJ page 362 (N.C.) प्रस्तुत की गयी है। इस निर्णय में बीमित महिला द्वारा पॉलिसी ली गयी थी, जिसमें क्लॉज 4 (बी) पर महिला के हस्ताक्षर थे। उक्त बीमित महिला की मृत्यु आत्महत्या के कारण हुई। माननीय राष्ट्रीय आयोग द्वारा यह निर्धारित किया गया कि नॉमिनी अथवा बीमित के उत्तराधिकारी केवल बीमा पॉलिसी के प्रीमियम की धनराशि प्राप्त करने के अधिकारी हैं तथा बीमा की धनराशि उन्हें प्रदान नहीं की जायेगी।
मा0 राष्ट्रीय आयोग द्वारा निर्णय एलआईसी बनाम धर्मवीर आनंद प्रकाशित (1998) 7 (एससीसी) पृष्ठ 348 पर आधारित किया गया है इस निर्णय मे मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह निर्णीत किया गया है कि इस मामले के सदृश क्लॉज 4(बी) यदि भारतीय जीवन बीमा निगम की पॉलिसी में हस्ताक्षरित एवं स्वीकार किया गया है तो इस दौरान 03 वर्ष के भीतर मृत्यु होने पर केवल बीमा की पॉलिसी ही देय होगी।
इसी प्रकार माननीय राष्ट्रीय आयोग द्वारा पारित निर्णय किरनजीत कौर तथा अन्य प्रति एचडीएफसी स्टेण्डर्ड लाइफ इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड प्रकाशित II (2018) CPJ page 149 (N.C) तथा एलआईसी प्रति चन्द्रशेखर प्रकाशित II (2014) CPJ PAGE 210 (N.C.) में भी माननीय राष्ट्रीय आयोग द्वारा इसी बिन्दु पर यह निर्णीत किया गया है कि क्लॉज 4(बी) बीमित द्वारा स्वीकार किये जाने पर केवल बीमा की धनराशि के स्थान पर जो प्रीमियम के माध्यम से दी गयी है, प्राप्त होगी, सम्पूर्ण बीमित धनराशि नॉमिनी अथवा विधिक उत्तराधिकारी को देय नहीं होगी।
विद्धान जिला उपभोक्ता मंच द्वारा राष्ट्रीय आयोग द्वारा पारित एक अन्य निर्णय ओरियंटल इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड प्रति सतपाल सिंह व अन्य प्रकाशित II (2014) CPJ page 374 (N.C.) पर आधारित किया गया, जिससे यह निर्णीत किया गया है कि यदि यह सिद्ध नहीं होता है कि बीमा की पॉलिसी के साथ क्लॉज 4(बी) बीमित व्यक्ति को प्रेषित की गयी है। ऐसी दशा मे क्लॉज 4(बी) उस बीमा पॉलिसी पर लागू नहीं होगा, किन्तु माननीय राष्ट्रीय आयोग के उपरोक्त समस्त निर्णयों को दृष्टिगत करते हुए जिला उपभोक्ता मंच का उपरोक्त निष्कर्ष उचित नहीं माना जा सकता है क्योंकि मृतका नसीम के हस्ताक्षर क्लॉज 4(बी) में अंग्रेजी में किये हुए हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि वह पढ़ी-लिखी महिला थी और क्लॉज 4(बी) पर हस्ताक्षर करते समय उसे ज्ञान था कि पॉलिसी ऐसी दशा में केवल प्रीमियम की धनराशि देयता के लिए वैध होगी जबकि उसकी मृत्यु किसी गैर सार्वजनिक स्थल पर होती है। अत: नॉमिनी/मृतका के विधिक उत्तराधिकारी बीमा की सम्पर्ण धनराशि प्राप्त करने के अधिकारी नहीं है बल्कि प्रदान की गयी प्रीमियम की धनराशि प्राप्त करने के अधिकारी है अत: विद्धान जिला उपभोक्ता फोरम ने गलत प्रकार से बीमा की समस्त धनराशि दिये जाने के निर्देश दिये हैं। अत: अपील आंशिक रूप से स्वीकार किये जाने योग्य है।
आंशिक रूप से स्वीकार की जाती है, जिला उपभोक्ता मंच द्वारा पारित निर्णय एवं आदेश इस प्रकार संशोधित किया जाता है कि केवल बीमा की धनराशि क्लॉज 4(बी) के अनुसार अपीलार्थी द्वारा प्रत्यर्थी/परिवादी को प्राप्त करायी जाये। इस धनराशि पर 06 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज वाद योजन की तिथि से अंतिम अदायगी तक अदा करें।
धारा 15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत अपील में जमा धनराशि मय अर्जित ब्याज सहित जिला उपभोक्ता आयोग को नियमानुसार वापस किया जाये।
आशुलिपिक से अपेक्षा की जाती है कि वह इस निर्णय/आदेश को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दें।
(विकास सक्सेना)(सुशील कुमार) सदस्य सदस्य , आशु0 कोर्ट 3 [HON'BLE MR. SUSHIL KUMAR] PRESIDING MEMBER [HON'BLE MR. Vikas Saxena] JUDICIAL MEMBER