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Lok Sabha Debates

Further Discussion On The Supplementary Demands For Grants In Respect Of Budget ... on 13 December, 2012

> Title: Further discussion on the Supplementary Demands for Grants in respect of Budget (General) for 2012-13 (Discussion not concluded).

MR. DEPUTY-SPEAKER: Item no. 15. Shri Ananth Kumar to continue his speech.

श्री अनंत कुमार (बंगलौर दक्षिण):महोदय, मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे सप्लीमैंट्री डिमांड्ज़ फॉर ग्रांट्स के ऊपर बहस शुरू करने का अवसर दिया।सप्लीमैंट्री ग्रांट्स के बारे में बहस शुरू करने से पहले जो 12 साल पहले हमारी इस पार्लियामेंट के ऊपर एक आतंकवादी हमला हुआ था और उस आतंकवादी हमले से पार्लियामेंट को, पार्लियामेंट के सभी सदस्यों को और भारत के लोकतांत्रिक नेतृत्व को बचाने के लिए जिन्होंने शहादत दी, उनको श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

          महोदय, सप्लीमैंट्री डिमांड्ज़ फॉर ग्रांट्स के बारे में चर्चा शुरू करने से पहले मैं यह बात भी सरकार के सामने रखना चाहूंगा क्योंकि जो माननीय वित्त मंत्री चिदम्बरम जी यहां बैठे हैं, वे पहले गृह मंत्रालय संभालते थे और वे यूपीए सरकार के एक प्रमुख मंत्री भी हैं। वर्ष 2001 में जो हमला हुआ था, उस हमले के पीछे जो ब्रेन था, अफजल गुरू, उन्हें फांसी देने के बारे में उच्चतम न्यायालय ने कई बार आदेश दिया है।...( व्यवधान)

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):सप्लीमैंट्री डिमांड्ज़ फॉर ग्रांट्स में यह विषय कहां से आ गया?

श्री अनंत कुमार : उसके बारे में जरूर बात करेंगे।...( व्यवधान) मैं वित्त मंत्री जी से, सरकार से पूछना चाहूंगा, वे आज तो आश्वासन दे सकते हैं।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : किसी की भी बात रिकॉर्ड में नहीं जायेगी।

(Interruptions) … * श्री अनंत कुमार : महोदय, मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि अफजल गुरू को फांसी की सजा सुनाने के बाद आज तक उन्हें फांसी पर क्यों नहीं चढ़ाया गया?...( व्यवधान) बाद में जो मुंबई का कांड हुआ, उसमें जिसने भाग लिया था, कसाब को फांसी पर चढ़ा दिया, अफजल को क्यों नहीं चढ़ाया?...( व्यवधान) इसके बारे में आज केंद्र सरकार पूरे देश की जनता को वक्तव्य दे।...( व्यवधान) यही मैं दरख्वास्त करना चाहूंगा।...( व्यवधान)

श्री विलास मुत्तेमवार (नागपुर): महोदय, यह कैसे रिकॉर्ड में जा सकता है?...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : वे बोल रहे हैं।

…( व्यवधान)

श्री अनंत कुमार : मैं उन सभी शहीदों को श्रद्धांजलि भी अर्पित करूंगा।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप विषय पर बोलिये।

…( व्यवधान)

श्री अनंत कुमार : वर्ष 2004 में जब यूपीए सरकार ने अपना कार्यकाल शुरू किया।...( व्यवधान)

DR. MIRZA MEHBOOB BEG (ANANTNAG): Sir, it should not go on record. It has nothing to do with the subject. … (Interruptions)

श्री अनंत कुमार :  उपाध्यक्ष जी, मैं सप्लीमैंट्री डिमांड्ज़ पर बोल रहा हूँ। 2004 में जब इस सरकार ने अपना कार्यकाल शुरू किया तो लोग समझ रहे थे कि इस सरकार में तीन अर्थशास्त्री हैं। प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जी खुद एक अर्थशास्त्री हैं, दूसरा हम सबके और आपके वित्त मंत्री चिदम्बरम जी भी एक अर्थशास्त्री हैं और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मॉन्टेक सिंह आहलूवालिया भी एक अर्थशास्त्री हैं। लेकिन पिछले आठ सालों में भारत की अर्थव्यवस्था की स्थिति ऐसी विकट परिस्थिति में है कि यदि जीडीपी का ग्रोथ देखें, इनफ्लेशन के बारे में सोचें, महंगाई के बारे में सोचें, फिस्कल डैफिसिट के बारे में सोचें, तो भारत की अर्थव्यवस्था रसातल में पहुँच गई है। इसलिए देश की आम जनता कहती है कि ये तीनों अर्थशास्त्री नहीं हैं, देश के लिए ...* हैं। चिदम्बरम जी की गलत आर्थिक नीतियों के कारण, जो जनता के खिलाफ है, किसानों के खिलाफ है, आम आदमी के खिलाफ है, महंगाई बढ़ रही है। इसलिए चिदम्बरम जी ने भारत की पूरी अर्थव्यवस्था को ... * बना दिया है। ...( व्यवधान)

एक माननीय सदस्य : यह क्या होता है? …( व्यवधान)

श्री अनंत कुमार : जब 2004 में यूपीए ने देश की बागडोर संभाली, तब अटल जी के छः साल के कार्यकाल के बाद ऐसी अच्छी स्थिति थी जिसको मैं पढ़ना चाहूँगा। ...( व्यवधान)

SHRI K. BAPIRAJU (NARSAPURAM): Sir, it should not go on record. … (Interruptions)

श्री अनंत कुमार : इकोनॉमिक सर्वे को पेश करते हुए सभापटल पर रखते हुए चिदम्बरम जी ने उस इकोनॉमिक सर्वे में कहा -

 

I quote:

“The economic fundamentals appear strong and balance of payments is robust. Although there are short term pressures on prices, the outlook for the year is benign and the Government is fully alert. The growth will be sustained by increase in production and value addition in agriculture, a marked improvement in industrial production and continued buoyancy in the performance of the service sector. ”   यह स्टेटमैंट इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक माननीय चिदम्बरम जी ने 2004 में देश के सामने रखा। उपाध्यक्ष महोदय, आठ साल बीत गए लेकिन इन आठ सालों में इन्होंने देश की आर्थिक व्यवस्था की क्या स्थिति बनाई, इस बारे में मैं कुछ नहीं कहना चाहूँगा, लेकिन माननीय प्रधान मंत्री जी का संबोधन मैं आपके सामने रखना चाहूँगा। माननीय प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जी ने 22 सितम्बर को देश को संबोधित किया और देश को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा -
 “Where would the money for this have come from? Money does not grow on trees.”   I want to tell the hon. Prime Minister that definitely money does not grow on tress. Nowadays under the UPA Government, it grows in coal mines;  कोयला खदानों में, पाताल में होता है। It grows in Aasmaan, aakaash as the hon. Members of the Trinamool Congress said, in 2G; and it also grows in Wal-Mart!   He continued saying that if we had not acted it would have meant a higher fiscal deficit.  That means the hon. Finance Minister is agreeing that the fiscal deficit is getting higher and higher.  Expenditure vis-à-vis Government income is un-checked.  This would lead to further steep rise in prices and a loss of confidence in our economy which has already happened.  The prices of essential commodities would rise faster. Both domestic as well as foreign investors would be reluctant to invest in our economy.  Interest rates would rise.  Our companies would not be able to borrow from abroad. Unemployment would increase.  Unfortunately, Sir, बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने कहा कि देश वर्ष 1991 की आर्थिक स्थिति में पहुंच रहा है।  “The last time we faced this problem was in 1991.  Nobody was willing to lend us even small amounts of money then”.  I would like to ask the hon. Finance Minister while debating on this Supplementary Demand if the entire economy has reached a situation or inching towards the situation of 1991 bankrupcy,  आपको भारत के सोने को विदेशी बैंकों में गिरवी रखना पड़ा, यदि आज वह स्थिति वापस आ रही है तो उसका कारण क्या है? पिछले आठ साल से इस देश पर कौन हुकूमत कर रहा है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? इसके लिए जिम्मेदार कांग्रेस है, श्रीमती सोनिया गांधी हैं, क्योंकि नेशनल एडवाइज़री काउंसिल की वह चैयरपर्सन हैं। ज़िम्मेदार मनमोहन सिंह जी हैं, वित्त मंत्री जी आप खुद हैं, मोंटेक सिंह आहलूवालिया जी हैं और यूपीए सरकार है। मैं यह भी कहना चाहूंगा SHRI K. BAPIRAJU : I am also quite old, 35 years old in politics.  You are knowledgeable also.  Please exhibit your knowledge so that we enjoy listening to you.  Why are you speaking so low?… (Interruptions)
SHRI ANANTH KUMAR : Sir, I am not yielding.… (Interruptions) I would like to quote from the Prime Minister’s speech.  I do not know why my dear friend is so agitated.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please do not interrupt.
… (Interruptions)
SHRI ANANTH KUMAR : What has happened to the inflation, price rise, fiscal deficit and the economic situation of the country?  Sir, the hon. Prime Minister in his address has misled the entire country.  I directly charge, they are not ready to face the truth.  The Prime Minister said, “We raised the price of diesel by just Rs.5 per liter instead of Rs.17, what was needed to cut all losses on diesel. Much of diesel is used by big cars, SUVs, owned by the rich factory owners and business houses.”  This is the understanding of our Congress friends. They cannot face this truth. They have forgotten that diesel is being used in irrigation pump-sets.  I do not know in Andhra Pradesh whether they are using petrol for their irrigation pump-sets, generators, tractors or State transport buses!  The hon. Prime Minister says that diesel is used only by rich people.  Similarly, Shri Kapil Sibal was giving his comments on Walmart.  This is the new argument they are giving.             Therefore, I charge that the hon. Prime Minister, through his address, has totally misled the country. 
          Sir, what are the three basic premises of good economy?   One is GDP, another is fiscal deficit and third is inflation.  I want to discuss them one-by-one.  In the last few years, what has happened to the GDP? If I remember and I think the whole House remembers, Shri Pranab Mukherjee -- who is now Mahamahim Rashtrapatiji and earlier he was the Finance Minister – and Chidambaramji day-in and day-out used to tell us that India will have a robust growth rate of eight per cent and a robust growth rate of nine per cent and that we will be having two-digit growth rate.  But what is the situation today?  I do not want to refer to any of the media reports but your own analysis is telling you that in the last quarter the growth rate was 5.7 per cent.   It has dipped to 5.7 per cent and in this quarter it has reduced to 5.2 per cent and it is going further down. 
If  I go to details, what has happened to manufacturing?  According to your own reports, in manufacturing from 3.5 per cent you have come to 0.8 per cent.  Is this the growth of GDP percentage?  You take any sector in the economy the situation is same.  For your kind information, India’s real GDP grew by 5.3 per cent during July-September 2012; agriculture, forestry and fishing grew by 1.2 per cent which had registered a growth of 3.1 per cent a year ago; and mining and quarrying activity grew by 1.9 per cent against a fall of 5.4 per cent. Growth in manufacturing output slipped to mere 0.8 per cent from 2.9 per cent; electricity, gas and water supply grew by 3.4 per cent in September compared to 9.8 per cent  a year ago.  This is the fall in GDP. 
          I entirely agree with Narendrabhai Modi, our hon. Chief Minister of Gujarat who is going to have a resounding and record victory once again because of his performance in development and infrastructure and for giving a good governance in the State of Gujarat.  He asked the Congress Party what is GDP.  For the entire economy and the Bharatiya Janta Party, GDP is increase in Gross Domestic Product but for the Congress Party and the UPA, GDP is nothing but increase in the rates of gas, diesel and petroleum products. That is your GDP.  That is the difference. 
          What about fiscal deficit?  You have completely failed in making India a growing economy.  During Atalji’s period, the Indian economy was the fifth fastest growing economy in the world.   Today, we have slipped from that position and our rating across the world has also slipped… (Interruptions).  It is a fact.  It has slipped definitely.  From 9 per cent, you have slipped to 5.3 per cent… (Interruptions) 
MR. DEPUTY-SPEAKER: Let him speak. माननीय सदस्य, श्री अनंत कुमार को बोलने दीजिए। जब आपकी बारी आएगी तो आप बोलिएगा।
SHRI ANANTH KUMAR : What has happened to fiscal deficit?  Another important parameter is fiscal deficit. What is the difference between the total revenue and total expenditure? What is the difference in the total income and total outgo? Our Finance Minister as also the economic pandits in the Government would know that the fiscal deficit has to be kept at less than 2.5 per cent to 2 per cent. It was at 2.5 per cent three years back, under the same UPA Government but today it is touching the roof top – it is at 6 per cent.
          Sir, to begin with, in this fiscal year, during the Budget, the total equivalent of the fiscal deficit was Rs. 2 lakh crore. The Government started the Budget of the year with a deficit of Rs. 2 lakh crore. How is the Government going to manage their finances? That is a big question. Why is there a fiscal deficit? Why is growth limping? There is only one reason for it. There is only expenditure, consumption expenditure. There is no investment at all.
          Sir, during our times, I want to say this with a sense of great pride in this august House that, Shri Atal Bihari Vajpayee, the then Prime Minister came out with projects like Golden Quadrilateral, Pradhan Mantri Gram Sadak Yojana, Cold Storages and various other projects for electrification of the country. There was investment and there was no consumptive expenditure. Therefore, the economy grew.
          Sir, I want to give an example and I think, the hon. Finance Minister would appreciate that. What was the prime lending rate during the NDA regime? The Prime Lending Rate in the manufacturing sector was 11.25 per cent. What is the interest rate today? This Government has no answer to that. The current interest rate under this UPA Government is 16.5 per cent in the manufacturing sector. There is an increase of five per cent in the interest rates. What was the PLR in the housing sector during NDA? I was the then Minister for Urban Development and I can claim, supported by Government records, that our Government could construct 70 lakh houses for people belonging to the poorer sections of the society in those six years. How many houses have this Government constructed? How many houses have this Government financed? What is the target of this Government? Why have this Government not been able to provide home loans to the people belonging to the economically weaker sections of society, to the people living below the poverty line, the aam admi? The only one reason for that is that for home loans the interest rate is 12.5 per cent under this UPA Government. Under the NDA regime, the interest on home loan was 7.25 per cent. There has been an increase of 5 per cent over these years.
          Sir, recently, the Chairman of the State Bank of India has said, if the hon. Minister is willing to listen, I am ready to read the newspaper report here, but I am putting it just like that here. The Chairman of the State Bank of India said, `we have a lot of liquidity’. The State Bank has an accumulated deposit of Rs. One lakh crore, but they have disbursed credit only to the extent of Rs. 40,000 crore. Then, how much of surplus capital is lying with the State Bank of India? A sum of Rs. 60,000 crore is lying idle with them. The Chairman, State Bank of India is telling the country that nobody is borrowing because of the high interest rates and therefore, they are not able to advance loans to the tune of Rs. 60,000 crore which is  available with them. 
That means, due to high interest rates, people are unable to borrow to construct their own houses, to buy their own utensils and other things, unable to borrow for their business.   Bigwig industries are unable to borrow, small and medium scale entrepreneurs are unable to borrow for their industrial units and therefore, economy is limping. There is no growth rate.  Why is GDP not growing?   This is the reason for it.
I urge the Finance Minister to clarify one point.  According to news reports, there is a cold war going on between the Reserve Bank of India and the Ministry of Finance.  Who is dictating whom?  The Finance Minister is telling the Reserve Bank Governor to reduce the Prime Lending Rate but the Reserve Bank Governor is saying that he is not ready to reduce the PLR. If there is a turf war going on between the economic Ministry and the RBI, then what will happen to the economy of the country?
          Another major issue that is facing the country is inflation. कांग्रेस का हाथ, आम-आदमी के साथ, आज कमरतोड़ महंगाई है, आपका हाथ कहां है, आम-आदमी के साथ? आपने आम-आदमी के साथ विश्वासघात किया है। । It is very simple.  सब के सामने है, यानि चावल हो, गेहूं हो, चीनी हो, तेल हो, जीवन की हर आवश्यक वस्तुओं के दाम आज आसमान छू रहे हैं.… (Interruptions) I will come to LPG.
          When I speak of inflation, during our period of six years, the rate of inflation was constantly below four per cent.  Today, before coming to this House, I checked up the inflation rate of essential food commodities.  It is 20 per cent. I do not know how do you explain this?  From four per cent of inflation, if there is a raging inflation of 20 per cent, how do you explain it?  Why is this inflation?  This inflation is because of your own wrong policies.
          I want to read out what the Member of the Planning Commission, Shri Abhijit Sen, has said. He has conceded that the Government policies had a significant impact on food inflation.  This is what your own Planning Commission Member is saying. He has said: “ In the case of rice and wheat, it is absolutely clear that it is Government stocking which is the main problem.”  How much of essential commodities have you stored in various godowns across the country?  It amounts to 42 million tonnes. What is the buffer stock requirement? Buffer stock  requirement is only 14 million tonnes.  That means, you have stored more than three times of the buffer stock requirements. Why have you stored them? The prices of rice, sugar and wheat are increasing. रोटी का भाव बढ़ रहा है, चावल का भाव बढ़ रहा है, चीनी का भाव बढ़ रहा है, उसका एक ही कारण है, चूंकि आपने होर्डिंग की है।Now I want to allege that this Government is indulging in hoarding of food grains. You are indulging in hoarding of liquidity. आपने बैंक के तहत पैसों को होर्ड कर रखा है और फूड कारपोरेशन के गोदामों के तहत आपने अनाज की जमाखोरी करके रखी है और वहां सारा अनाज सड़ रहा है। उसका ठीक तरह से प्रबंधन नहीं किया, इस कारण इन्फ्लेशन है। इन्फ्लेशन कितना है?  आम तौर पर इन्फ्लेशन नौ फीसदी है, लेकिन फूड ग्रेन्स का इन्फ्लेशन बीस फीसदी है।  What is the solution for this? What is the solution of the Government of India led by the UPA Government towards controlling price rise, towards controlling inflation and towards reducing the fiscal deficit? What is your proposal to give boost to the GDP growth? I do not think they have any plan.  They do not have a plan.  Whenever we speak on all these things, our UPA friends and our hon. Prime Minister say that it is because of the oil pool account. The hon. Prime Minister said that in his address to the nation. We require Rs. 2,00,000 crore towards meeting oil deficit. This year it has been Rs.1,60,000 crore.
I want to place some of the facts regarding the oil economy. We want to know the truth.  They should come out with the truth before the nation.  I want to place the comparative petrol prices of India and the neighbouring countries in rupee terms. In India the price of petrol is Rs. 73; in Pakistan it is Rs.61.50; in Bangladesh it is Rs. 62; and in Sri Lanka it is 61.70.
Now, I will come to the oil economy. What is the petrol pricing structure? I want this august House to understand how the petrol is priced. When we understand how the petrol is priced, we can understand how much is the real cost of the crude oil, how much is the real cost of litre of petrol, how much Central taxes is loaded on that, and how much money the Government of India is going to get because of those Central taxes. They have to answer a straight question as to where that money is going. In the petrol pricing structure, fuel component is 52 per cent; customs duty is four per cent; excise duty is 25 per cent; sales tax and VAT is 17 per cent; and dealers’ commission is two per cent. That means, nearly 46 per cent is the tax component of it.
Now, I want to place before the hon. House more details. As on today the price of per barrel of petrol is 108 US dollars. One barrel is equal to 159 litres. The exchange rate of one US dollar is Rs. 54.70.  The price of one litre crude is Rs. 37.35.  The refining cost, according to the oil manufacturing companies, is six per cent of the rate of crude.  That is Rs. 2.25 per litre. Therefore, petrol is available to the dealer for further distribution at Rs. 39.60. But in Delhi you are selling petrol at the rate of Rs. 67.40.  You are selling petrol in your own States, that is the States ruled by the Congress Party at high rates.  In Tirupati the rate of one litre of petrol is Rs. 74. In Maharashtra also it is sold at Rs. 74. The total money that is available to the Government through Central taxes alone is nearly Rs. 30 per litre.
Out of the Rs.30 per litre, how much of money are you getting every year?  I want to read out their own Statement. According to their own Statement, the Government of India has got, last year, Rs.1,40,000 crore. You are saying that you are cross-subsidising diesel. You are saying that you are cross-subsidising LPG. You are saying that you are cross-subsidising kerosene. I understand that during our period also, we cross-subsidised. But, at the same time, why should the hon. Prime Minister of India Dr. Manmohan Singh mislead the entire nation? While addressing the nation,  he mentioned about diesel prices, petroleum prices. While making that Statement of Oil Pool Account, he said that money will not grow on trees, on plants. My dear Sir, he said that there is a deficit of Rs.1,60,000 crore. He said that there is the possibility of having Rs.2,00,000 crore deficit. But, at the same time, your own Statement says that you have accrued Rs.1,46,000 crore last year through the Central tax on petroleum.  Whatever money you got through the Central taxes is to the tune of Rs.1,46,000 crore. When you subtract Rs.1,46,000 crore from Rs.1,60,000 crore, then your deficit is only to the tune of Rs.14,000 crore. It is not Rs.1,60,000 crore; it is not Rs.2,00,000 crore. I cannot say that you are telling  untruth; I cannot say you are telling falsehood because it is not parliamentary. I can only say the Prime Minister is misleading the nation, misleading the Parliament. He is making a Statement which is far from the truth.… (Interruptions) That is the parliamentary way of telling it. The point is that  you make a statement which is far from the truth.
          There is another chart given by you only about the State’s share. Shri Meena ji, you can reply. But, at the same time, I want to bring to your notice through the hon. Deputy-Speaker, that the State’s share is accrued on the dealers’ price if it is Rs.67.40 but if it is Rs.74, on that, there should be a sales tax. Therefore, that money, at the dealers’ point, whatever taxes are levied, will come to you. That money is Rs.1,40,000 crore. When it is Rs.1,40,000 crore and Rs. 1,46,000 crore, the deficit is only Rs.16,000 crore and Rs.20,000 crore respectively and not Rs.1,60,000 crore, not Rs.2,00,000 crore. That is the argument. Therefore, I urge upon the Union Government   to present a Status Paper, to present a White Paper before the nation on the entire Oil Pool Account. We do not want any opaque thing, any curtain  put on the Oil Pool Account. Unfortunately, in the last 8 years of the UPA Government, there is an enigma, there is a mystery surrounding the Oil Pool Account. They show the Oil Pool Account and levy the taxes from the people. They show the Oil Pool Account and they tax the people.
          Yesterday, our hon. Minister of Petroleum and Natural Gas Shri Veerappa Moily, while speaking in the CII, said that he is going to raise the cap from six cylinders to nine cylinders. I welcome that because the first time in the last Session, my leader Shrimati Sushma Swaraj raised this issue. Then, my other friends have also supported this. Why is there rationing on LPG cylinders? There should not be any cap or any rationing. … (Interruptions)
SHRI SUDIP BANDYOPADHYAY(KOLKATA UTTAR):  We are not satisfied with nine cylinders. … (Interruptions)
उपाध्यक्ष महोदय : सिर्फ अनंत कुमार जी की बात रिकार्ड में जाएगी।
...( व्यवधान)* SHRI ANANTH KUMAR : We don’t want any cap; we don’t want any rationing. During our period, , during Shri Atal Behari Vajpayee’s  period, there was no rationing, no cap, no queue. It was surplus. Actually, gas dealers used to go around, every mohalla, everywhere and ask - Do you want cylinders? Do you want gas connection? Our economy was a Government of surplus; your economy is not an economy of surplus; it is an economy of scarcity.
उपाध्यक्ष महोदय :  कृपया शान्त रहिए।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : वे बता रहे हैं। आप हल्ला क्यों कर रहे हैं?
…( व्यवधान)
SHRI ANANTH KUMAR : Shri Veerappa Moily, our hon. Minister for Petroleum & Natural Gas, has gone to the town saying that they are going to increase the cap. About three months back, when we raised this issue, there was no response from the Government.
उपाध्यक्ष महोदय : अनंत कुमार जी, आप थोड़ा संक्षेप में बोलिए।
…( व्यवधान)
SHRI ANANTH KUMAR :  We have got 50 minutes time. and I am the only speaker.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Your party was allotted only 48 minutes. You have already spoken for 40 minutes.
… (Interruptions)
SHRI ANANTH KUMAR :  I am the only speaker. … (Interruptions) मेरे साथी ठीक कह रहे हैं कि दुर्दशा इतनी खराब कर दी है कि उसका पूरा वर्णन देना पड़ रहा है। ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : ठीक है, आप विषय पर बोलिए।
…( व्यवधान)
श्री अनंत कुमार : महोदय, वीरप्पा मोइली जी ने कौनफैडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज़ के सभागार में कहा है कि हम सिलेंडर के कैप ऊपर करने वाले हैं और छ: के बदले नौ देने वाले हैं। इन्होंने ऐसा पहले क्यों नहीं कहा। उसका एक ही कारण है। They eyeing on Gujarat elections. It is very unfortunate. यानी आम आदमी के बारे में कोई संवेदना नहीं है। यदि संवेदनशीलता होती तो आप कैप ही नहीं लगाते, राशनिंग नहीं करते।...( व्यवधान)You want votes. You don’t look at people as human beings. ...( व्यवधान) ठीक है, इतना क्षमा कीजिए। मैं कर्नाटक का हूं। मैं हिन्दी में बोलने का प्रयास कर रहा हूं।...( व्यवधान)They don’t treat people as human beings; they treat people as voters. They look at the people as votes. It is very unfortunate. Not only that in the lalach of votes, Shri Veerappa Moily has also thrown into the winds the parliamentary propriety of announcing outside Parliament when the Parliament is in Session. If he has any concern to the people, commitment to Parliament, he should have come here. Today he should have announced here that he is going to raise the cap. That means, he has no commitment or concern to the code of conduct; he has no concerns towards the propriety of parliamentary proceedings. I also want to state that the Election Commission has given notice to them. … (Interruptions)
उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य को बोलने दीजिए। वे इतना बढ़िया बोल रहे हैं, लेकिन आप बीच-बीच में शोर करते रहते हैं। इस तरह तारतम्य टूट जाता है।
…( व्यवधान)
श्री अनंत कुमार :  उपाध्यक्ष महोदय,  छः गैस सिलेंडर से जो नौ गैस सिलेंडर कर रहे हैं, वे भी पर्याप्त नहीं हैं। ...( व्यवधान) सुषमा जी कह रही हैं कि ऊंट के मुंह में जीरा। ...( व्यवधान) इतना कम हो जायेगा, इसलिए वह भी पर्याप्त नहीं है। सिलेंडर की कोई कैप नहीं होनी चाहिए, कोई राशनिंग नहीं होनी चाहिए। ...( व्यवधान) आप उसे मुक्त रखो। लेकिन अनफार्चुनेटिली यह सौतेला व्यवहार भी करते हैं, भेदभाव भी करते हैं। ...( व्यवधान) Wherever Congress Party Governments are there, there you are ready to give 9 cylinders, wherever BJP and other party Governments are there, there you are giving only 6 cylinders. It is very unfortunate. यह भेदभाव का व्यवहार क्यों? यह अन्याय क्यों? ...( व्यवधान) During our period there was no cap. हमने अपने समय में सिलेंडर की कोई कैप नहीं  रखी थी। ...( व्यवधान) एक महीने में दो-दो सिलेंडर मिलते थे। ...( व्यवधान)
          Sir, we had brought one important tool to control all these things. The tool was the Fiscal Responsibility and Budget Management Act, the FRBM Act, 2002. Today, compared to 6 per cent of fiscal deficit of the Government of India, the fiscal deficit of the States put together is only 2.4 per cent. I was just discussing this matter with our former Finance Minister Yashwant Sinhaji to get more enlightened about it. He said, there is an incentivised programme for the States and if they follow their own FRBM Acts, they will be incentivised and they will be provided more funds. Therefore, they are managing their budget in a more proper manner.
          I want to ask one question. Hon. Chidambaramji has walked out of this august House because he is not ready to listen to the citizen’s voice about his management of the finances in the last eight years.
THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF FINANCE (SHRI NAMO NARAIN MEENA): He has gone to the other House.
SHRI ANANTH KUMAR: I know he has to go to the other House. We expected that he would be listening to all these things.
          I want to ask one straight question. The FRBM Act was passed in 2002. But in 2005, the hon. Finance Minister Chidambaramji took leave of this House to go out of the targets of that FRBM Act. He said, ‘No, I cannot fulfill, I cannot meet and I cannot take as the benchmark the various targets given in the FRBM Act.’ That means, he was not in a position to maintain the economy of the country, he was not in a position to maintain the rate of inflation, maintain the rate of growth, maintain the fiscal deficit and the targets given in the FRBM Act. If there are targets, then you have to move with a discipline. To move with a discipline, you require a vision, you require a roadmap, you cannot continue with consumptive expenditure, you have to invest and to invest you have to reduce the PLR, the prime lending rate. For that, you have to do fiscal management. After doing the fiscal management and after doing the investment, then you can create infrastructure.
          Where is your Bharat Nirman? Nothing is happening except doling out of money and preparing to dole out more money for the next year because next year you think is the Election Budget. You are going to go in for more populist schemes like you did last time. This time also you are going in for more populist schemes. You want to hold the money and you want to hold the foodgrains. There is a shocking news item in The Times of India. What is that shocking news item? The shocking news items is that the Government is also increasing the contribution from the individual employee’s provident fund. Why?  They want to stock up the money in the provident fund also.  That means during this period of price rise and inflation महंगाई के इन दिनों में वह अपनी तनख्वाह में, अपनी पगार में कम पैसे लेकर जाएगा। In his salary, he will take less money.  Why are they holding so much of money? Why are they holding so much of food grains?  What is the idea?
          There is one malafide intention.  I am sorry, I am alleging in this august House about the intention of the UPA Government, the Congress-led Government, whatever may be the distress to the common man, whatever may be the distress to the farmers, downtrodden, dalits, whatever may be the distress to the people below the poverty line, they want to hoard all these things, they want to accumulate all these things to give one push next year before the elections.  That is the devious idea.  Therefore, the entire scheme of economy of the country is going haywire.
          There is no conviction, there is no commitment, there is no concern, and there is no credibility.  Instead of commitment, they are for compromise.  They did compromise in Nuclear Deal, they did compromise in FDI in multi-trade retail.  There is no concern.  Instead of concern, actually the price rise is galloping   Not only price rise is galloping, I was studying the details of NSSO, in the NSSO, this year they have announced that they are not going to do the survey of unemployment in the country, but unemployment is also on the rise. They are not going to do the survey as to how much unemployment is there in the country. 
          Why are they not going to do the survey?  It is because for one simple reason.  They know that people are getting retrenched.  They are getting retrenched in IT sector.  They are getting retrenched in manufacturing sector.  They are getting retrenched everywhere.  They are losing jobs. India has become an economy where people are losing jobs.  No investment, no infrastructure, no GDP growth, high inflation, abundant liquidity, no utility of liquidity, therefore, there is no employment generation and because there is no employment generation, there is glaring unemployment.  Every month, lakhs and lakhs of youth are losing employment and the Government does not want to make the survey, of loss of jobs, loss of employment, to put before the people of the country.
          Therefore, NSSO has written a letter to the Planning Ministry. I would request the hon. Finance Minister to verify that.  I have got all the records that they have written a letter to the Planning Ministry that because they do not have man force,  they do not have finances, they will not make any survey regarding unemployment in the country.  They have stopped. यानी आपने उस पर पर्दा डाल दिया, ढक दिया उसको क्योंकि देश के सामने आएगा कि महंगाई बढ़ रही है, महंगाई के साथ बेरोजगारी बढ़ रही है।
          Sir, that means they have no concern.  They are callous, they are insensitive and ultimately there is no credibility of the Government.  How will the investors come?  Even with regard to this FDI, there is a big talk of commission of Rs. 125 crore. 
          Sushma Ji says that in the last eight years, कॉमनवेल्थ गेम्स का स्कैंडल किया, टू-जी का स्कैंडल किया। अभी बीएसपी वाले यहां खड़े थे, "कोल गेट", "मोटा माल" बोला गया।...( व्यवधान) When we raised the issue of Coalgate,, तब वे रेडी नहीं थे, वहीं बैठे थे। कभी-कभी लगता है कि वे देर से जग जाते हैं, उठ जाते हैं और वेल में पहुंच जाते हैं। यदि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में कुछ भी संवेदनशीलता होती तो वे एफडीआई रिटेल सेक्टर प्रस्ताव पर हमारे साथ सरकार के खिलाफ वोट देतीं।
श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी): आप हिन्दी में बोल रहे हैं हम आपका सम्मान करते हैं।
श्री अनंत कुमार : मैं प्रयास कर रहा हूं। लेकिन आपसे एक ही निवेदन है कि हम जैसे हिन्दी बोलने का प्रयास कर रहे हैं, वैसे ही आप देशहित में वोट डालने का भी प्रयास करें।
श्री शैलेन्द्र कुमार : देशहित में ही लोग हमें वोट डालते हैं और हम चुनकर आते हैं।
श्री अनंत कुमार : देशहित में गलत लोगों की संगत छोड़िए। जब तक यूपीए की संगत में रहोगे, कांग्रेस पार्टी की संगत में रहोगे, तो मुश्किल में पड़ोगे। इसीलिए आप भारतीय जनता पार्टी के साथ, एनडीए के साथ, हमारे साथ आ जाइए और नया देश, नया भारत बनाने में हमें सहयोग दीजिए।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय: कृपया अपनी बात समाप्त करें।
...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय: बीच में टोका-टाकी न करें, नहीं तो इनका भाषण और लम्बा होगा।
श्री अनंत कुमार : अलटीमेटली यह सरकार विश्वसनीयता खो चुकी है। There is no credibility.  They have lost credibility because of corruption and scams.  There is commitment, no concern, no credibility. When there is no commitment, when there is no concern to the aam aadmi and when there is no credibility because of corruption and scams, then they cannot handle the economy of the country.  They cannot run the Government.  Forget running the economy and the Government, they cannot lead the nation.  Therefore, the people of India want a change.
While participating in this debate on the Demands for Supplementary Grants, I urge through this House that at the earliest opportunity the people of India should rise and teach a lesson to UPA and Congress and remove them and bring a change and bring Bharatiya Janata Party led Government in the country for a better economy, for better India. 
श्री शीश राम ओला (झुंझुनू): उपाध्यक्ष जी, मैं ज्यादा बात न कहकर, केवल वास्तविकता कहूंगा। आपने मुझे सप्लीमेंटरी डिमांड्स फार ग्रांट्स, (जनरल) पर बोलने का मौका दिया है। मैं अपने विचार प्रस्तुत करते हुए इन अनुपूरक अनुदानों की मांगों का हृदय से समर्थन करता हूं। ...( व्यवधान) सच्चाई इसी में है। हृदय से कहने का मतलब सच्चाई से होता है यानि मन की बात कहना। मैं यूपीए सरकार द्वारा जो विकास कार्य किए गए हैं...( व्यवधान) देखिए, मैं कभी किसी के भाषण में दखल नहीं देता। कृपया मुझे सुनने की कोशिश करें। मैं अपनी बात कह रहा हूं।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय: बीच में व्यवधान न डालें और इन्हें आराम से बोलने दें।
श्री शीश राम ओला : मैं यूपीए सरकार द्वारा किए जा रहे विकास कार्यों के बारे में कुछ कहना चाहता हूं। ये विकास कार्य सबके लिए हैं, चाहे गरीब व्यक्ति हो, साधारण व्यक्ति हो, मजदूर हो, मध्यम श्रेणी के व्यापारी हों, सबके लिए विकास कार्य हुए हैं।
15.00 hrs.  सबके लिए बहुत विकास हुआ है जिसका लाभ सभी को मिला है, लेकिन विकास का कभी अंत नहीं होता, विकास की प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए।...( व्यवधान) माननीय अर्जुन मेघवाल जी सुनिये। मैं आपकी बहुत इज्जत करता हूं, मेहरबानी से मुझे बोलने दीजिए, मैं किसी के भाषण में दखल नहीं देता हूं। आप मुझे सुनिये, मैं आपको सुनता हूं। क्या मैं नहीं बोल सकता, क्या मुझे अपनी बात कहने का अधिकार नहीं है। ...( व्यवधान) माननीय अर्जुन जी बैठिये। मैं आठ बार एमएलए, पांच बार एमपी रहा हूं और कभी हारा नहीं हूं। मैं ठगी करके नहीं आता हूं, काम करके आता हूं। वर्ष 1957 की 17 फरवरी को मैं एमएलए डिक्लेयर हुआ था और आज तक नहीं हारा हूं। आप मुझे तसल्ली से सुनिये। मैं कहना चाहूंगा कि मैंने इस राष्ट्र को देखा है, जहां सड़क का नामोनिशान नहीं होता था। माननीय अर्जुन मेघवाल के यहां तो काले सांप होते थे, पानी का लेना-देना नहीं था। इनके राजा गंगासिंह जी जब हनुमान गढ़ में हिमालय के पहाड़ों से घघ्घर नदी आती थी, वे उसकी पूजा करने जाते थे कि मेरे राज्य में पानी आये, ये वहां के रहने वाले हैं। यहां सड़कें नहीं होती थीं, पानी की व्यवस्था नहीं होती थी और पानी जो पीने को मिलता था वह कुंडों से मिलता था जिसमें बकरी और भेड़ की मींगनी, गाय-भैंस का गोबर, ऊंट के मींगने और चूहे भी कुंड में चले जाते थे, वह पानी पीने को मिलता था। यह मेघवाल जी के क्षेत्र में था। हम उससे वंचित नहीं है। मैं यही कहने जा रहा था कि जल्दबाजी मत करो।
उपाध्यक्ष महोदय :     ओला जी, आप ये सब बातें उनसे घर पर कर लीजिए।
श्री शीश राम ओला :  क्या मैं बैठ जाऊं। आप उन्हें रोक नहीं सकते, मुझे बैठा रहे हो।
उपाध्यक्ष महोदय :  नहीं, आप बोलिये। आपको बोलने के लिए ही बोल रहे हैं। ...( व्यवधान)
15.04 hrs                         (Shri Francisco Cosme Sardinha in the Chair) श्री शीश राम ओला :  सभापति महोदय, मैं आपसे कहना चाहता हूं कि ...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Hon. Members, please maintain order in the House.

… (Interruptions)

श्री शीश राम ओला :  मैं यूपीए सरकार के जो विकास के कार्य हुए हैं उनकी तारीफ करता हूं, उनकी सराहना करता हूं और इस बिल में जो छोटी सी रकम की स्वीकृति देनी है और जोकि बहुत आवश्यक है, जिसे करना चाहिए, उसका संपूर्ण समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। अगर वित्त मंत्री जी होते तो मेरा विचार था कि मैं कुछ बातें कहूं।  

MR. CHAIRMAN: Hon. Member, please address the Chair.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : Please do not get disturbed.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN:  Nothing will go on record except what Shri Sis Ram Ola says.

(Interruptions) … * श्री शीश राम ओला : मैं वह पत्थर हूं, जिस पर चिकनाई का असर नहीं होता है।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN:  Shri Sis Ram Ola ji, please address the Chair.  Otherwise, I will call the next speaker.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Hon. Members, please do not disturb him.           

… (Interruptions)

श्री शीश राम ओला : महोदय, सभी मेरे दोस्त हैं। आप चिंता मत कीजिए, मैं जरूरी बात ही अर्ज़ करूंगा। बिल का समर्थन करने के बावजूद भी लोगों की जरूरतें पूरी नहीं हुई हैं। आज भी अनगिनत गांव ऐसे हैं, जहां पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं करा पाए हैं। गांव और शहर का गैप बहुत बढ़ गया है। यह गैप तभी पूरा होगा जब हम सभी एक विचारधारा बनाकर आगे बढ़ेंगे कि गांवों का विकास भी होना चाहिए। आज गांवों में सड़क नहीं है और यदि कहीं बनी भी हैं, तो दो-दो फीट के गहरे गड्ढे हैं। वहां ट्रक आते हैं, तो उसके एक्सल टूट जाते हैं। छोटी गाड़ियों के तो चलने का सवाल ही नहीं है। अस्पतालों का तो जिक्र ही नहीं है। अगर किसी को सांप काट जाए, तो अस्पताल पहुंच नहीं पाता है और रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो जाती है। बीस-बीस किलोमीटर तक अस्पताल नहीं हैं। शिक्षा की उचित व्यवस्था नहीं है। ऐसी सूरत में हमें गांवों की तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है। आज हिंदुस्तान की 75 प्रतिशत आबादी, जो कि पहले 80 प्रतिशत थी, खेती पर निर्भर है और गांवों में रहती है। हमने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया और उनकी आर्थिक दृष्टि से विकास करने के लिए उचित धनराशि खर्च नहीं की, तो उनका विकास कैसे हो सकता है?

          मैं गांव से आता हूं और गांव की दशा जानता हूं। शहरों में हजारों की तादाद में गाड़ियां हैं। सड़क टूट जाए, तो हल्ला मच जाता है। गांवों में अगर सड़क नहीं है या सड़क बनने के बाद टूट जाती है या उसका मलबा भी गायब हो जाता है, तो भी कोई बोलता नहीं है। उनकी आवाज को सुनने वाला कोई नहीं है। हमें जरूरत है कि गांवों के विकास की तरफ ध्यान दिया जाए। गांवों का विकास होना बहुत जरूरी है। राष्ट्र की रक्षा करने के लिए गांवों से लोग आते हैं। अधिकारी शहरों के हो सकते हैं, लेकिन लड़ाई लड़ने वाले नौजवान गांवों के होते हैं। ऐसी सूरत में हमारी रक्षा भी कमजोर हो जाएगी और गांव भी कमजोर हो जाएंगे। ऐसा होना राष्ट्र के हित में नहीं है। हमें गांव के बच्चों की अच्छी पढ़ाई की व्यवस्था करनी चाहिए। गांवों में तकनीकी एजुकेशन जाए, इस तरफ ध्यान देना चाहिए। गांवों में सड़क हो, हॉस्पिटल हो। आज एम्स हॉस्पिटल जैसे ही कई हॉस्पिटल खुलें हैं।  पिछली बार जोधपुर में खुल गया। जोधपुर में पहले भी चिकित्सा की अच्छी व्यवस्था थी लेकिन अब और अच्छी कर दी गई है। गांवों को क्या मिला? गांवों में जब तक चिकित्सा और तकनीकी शिक्षा की अच्छी व्यवस्था नहीं होगी तब तक गावों के नौजवान लड़के, लड़कियां, हमारे बच्चे और बच्चियां कैसे अच्छी शिक्षा ग्रहण करेंगे? आज 65 वर्ष की आजादी के बाद भी गांवों में स्वच्छ पेयजल नहीं मिल रहा है तो कब मिलेगा? विकास के मामले में हमने गांवों के साथ कितना अंतर रखा है? इसको देखने की अत्यंत आवश्यकता है। इसलिए गांवों की तरफ ध्यान देना जरूरी है। जिस पार्टी का बहुमत होगा, वह आएगी औऱ राज करेगी और यदि बहुमत नहीं मिलता है तो वह विपक्ष में बैठे।

           हमारे संविधान की प्रक्रिया डैमोक्रेसी की है और फिर राजाओं का राज वापस कोई थोड़े ही आना है। डैमोक्रेसी डैमोक्रेसी ही है। इसकी जो प्रक्रिया है, इसका पालन करने के तहत वोट पड़ते हैं और वोट का नतीजा आने के बाद राज आता है लेकिन विकास की प्रक्रिया बहुत जरूरी है। वह सुचारू रूप से चलती रहनी चाहिए और ग्रामीण क्षेत्र को भी उसका समुचित लाभ मिलना चाहिए। शहरी क्षेत्र को जो मिला है, उसको मैं कम नहीं करवाना चाह रहा हूं लेकिन शहरी क्षेत्र के साथ साथ ग्रामीण क्षेत्र का भी एक लम्बी सोच के साथ संपूर्ण विकास होना चाहिए। इसके लिए वित्त मंत्री जी से मैं निवेदन करूंगा कि गांवों की तरफ भी अधिक मदद दें ताकि गांवों का भी अच्छा विकास हो सके। गांवों में रहने वाली जनता भी इस महान राष्ट्र की जनता है। जो आबादी 75 प्रतिशत है, उसको भी हमको एक तरफ करके नहीं चलना चाहिए और मैं पुन: माननीय वित्त मंत्री जी को धन्यवाद दूंगा। वह लम्बे समय से वित मंत्री रहे हैं और अच्छा कार्य किया है तथा विकास के लिए अच्छा धन जुटाया है। हमारे पास एक माइनिंग सैक्टर है और यह सैक्टर इस राष्ट्र की धरोहर है। यह कभी एक गोंडवाना लैंड होता था। हिंदुस्तान, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, और साउथ अफ्रीका। समुद्र ने कई वर्षों पहले इसको दो हिस्सों में बांट दिया। आस्ट्रेलिया, ब्राजील, साउथ अफ्रीका एक तरफ चले गये और हम एक तरफ चले गये। जो माइनिंग इन तीनों देशों में है वही हमारे राष्ट्र में है। ऐसी स्थिति में इस राष्ट्र की यह धरोहर है। सरकारें आती रहेंगी, जाती रहेंगी। हम स्वतंत्र हैं। उसमें एक सरकार इस धरोहर को समाप्त कर देगी तो दूसरी सरकार को क्या मिलेगा? इसलिए जो राष्ट्रीय  धरोहर है, इसको न बेचा जाए और न प्राइवेट किया जाए। अगर आपकी कोई कंपनी ऐसी है जिसमें नुकसान होगा तो सरकारी माध्यम से उसमें सरकार के निर्णय चाहिए, प्राइवेट के निर्णय न हो।  

          अगर आप प्राइवेट को 51 परसेंट शेयर दे देंगे तो वह आपकी कंपनी नहीं रहेगी। मैं छोटा सा उदाहरण देना चाहता हूं, राजस्थान का बांसवाड़ा जिला गुजरात और मध्य प्रदेश से मिला हुआ है, यहां सर्वे करके 2008 में एक सोने की पहाड़ी ढूंढी गई। उस समय इसकी कीमत 40,000 करोड़ रुपए थी। आज क्या कीमत होगी, आप इसका अंदाजा लगा सकते हैं। इसी प्रकार 18 क्विंटल सोने की छोटी सी चट्टान आंध्र प्रदेश में भी मिली थी। खेतड़ी कॉपर प्रोजेक्ट का वर्ष 2008 में 400 करोड़ रुपए का लाभ था। यहां 200 वर्ष तक के लिए तांबा है। अगर 200 वर्ष कारखाना चलेगा तब भी यहां तांबा खत्म नहीं होगा। कॉपर प्रोजेक्ट में कभी 11,000 मजदूर काम करते थे। उनके रहने के लिए कितने मकान बने हैं, कितने अधिकारियों के मकान बने हैं, कितनी मशीनें हैं, इन सबको क्या हम यूं ही दे देंगे? भारत सरकार के कितने रुपए खर्च हुए हैं। यह राष्ट्रीय धरोहर है। खेतड़ी कॉपर प्रोजेक्ट को बंद नहीं करना चाहिए। यहां सब मैटीरियल मौजूद है। खेतड़ी के पास सीकर जिले में रूपनाथगढ़ पहाड़ है जो हरियाणा खेतड़ी से मिलता है। यहां बहुत सोने का डिपोजिट है। इसका सर्वे कराया जाना चाहिए। इससे हमारी गरीबी भाग जाएगी। आज अगर कहीं से धन मिलेगा, आर्थिक लाभ होगा तो जमीन में माइनिंग से ही होगा। टैक्स लगाने से उतना लाभ नहीं होगा। हमें दूसरे जरिए से धन मिलेगा। आस्ट्रेलिया, ब्राजील और साउथ अफ्रीका में जो मशीनरी और तकनीक है, हम उस तरफ ध्यान ही नहीं देते हैं। हम दबे हुए धन को निकालना ही नहीं चाहते हैं क्योंकि इस तरफ हमारा ध्यान ही नहीं है।

          मैं निवेदन करूंगा कि दबे धन को निकालने के लिए माइनिंग पर अधिक से अधिक खर्च करना चाहिए। सर्वे  करना चाहिए। यह राष्ट्रीय संपत्ति है, यह प्राइवेट को नहीं देनी चाहिए। कभी हम आएंगे, कभी बीजेपी और कभी दूसरी पार्टी आएगी। राष्ट्रीय धरोहर को नहीं बेचना चाहिए।

 

श्री शैलेन्द्र कुमार : माननीय सभापति महोदय, आपने मुझे अनुदान की पूरक मांगें वर्ष 2012-13 पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। बीजेपी की तरफ से हमारे मित्र अनंत कुमार जी हिंदी में बोल रहे थे। मैं उनको धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने बहुत प्रयास किया और हमें बहुत अच्छा लगा। दूसरी तरफ से बुजुर्ग और हमारे नेता शीशराम ओला जी बोले, मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं। अर्जुन जी, आपको ख्याल रखना चाहिए था, आप गलत कर रहे थे।बाद में आप मिलकर खेद व्यक्त कीजिएगा। वह आपके राज्य से आते हैं, आपको इसका ख्याल रखना चाहिए।

श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर):मैं नहीं बोल रहा था, अनुराग जी बोल रहे थे, मेरा नाम ऐसे ही ले लिया गया।

श्री शैलेन्द्र कुमार : मैं बोल रहा हूं, हमारे विद्वान मंत्री चिदम्बरम साहब बैठे हैं, जिन्हें मुझे पिछली तीन लोक सभा में लगातार सुनने का मौका मिला. वह विभिन्न मंत्रालयों में रहे और खासकर वित्त मंत्री के रूप में और एज ए वकील के रूप में मैंने इन्हें जाना है। उनके पीछे स्टेट मिनिस्टर आदरणीय नमो नारायण जी बैठे हैं, मैं उनका भी बड़ा आदर-सम्मान करता हूं। यहां जितने भी हमारे सम्मानित सदस्यों ने अपने विचार रखे हैं. यदि उनका कोई पाजिटिव जवाब आये तो मेरे ख्याल से बहुत अच्छा होगा।

          अभी बात हो रही थी कि किस प्रकार से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो, यह चिंता का विषय है और इस पर बहुत लोगों ने अपने उद्गार व्यक्त किये। आज जरूरत इस बात की है कि हमें इसका मूल्यांकन करना होगा कि हम कहां पर खड़े हैं। मैं जानता हूं कि जब अर्थव्यवस्था गड़बड़ होती है तो पूरे विश्व में होती है, लेकिन जब हम अपने देश की बात करें तो हमारी अर्थव्यवस्था किस तरह से मजबूत हो, हमें इस बात का मूल्यांकन करना होगा। आज हम कहां पर खड़े हुए हैं। मेरे से पूर्व वक्ताओं ने भी यह बात कही है कि अगर हम प्रगति और विकास की ओर आगे या पीछे जाकर देश की आजादी से लेकर अब तक का मूल्यांकन करें और विकास का मूल्यांकन करें तो हम काफी आगे बढ़े हैं। हालांकि बहुत सारी दिक्कतें और रुकावटें आई हैं, लेकिन उन बाधाओं को भी पार करते हुए हम आगे बढ़े है। लेकिन जिस ओर हमारा पाइंट होना चाहिए, जहां हमारा एक लक्ष्य होना चाहिए, मेरे ख्याल से उस लक्ष्य़ के हिसाब से अभी हम पीछे हैं। यहीं कारण है कि उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हम विकसित देशों की कड़ी में नहीं खड़े है, बल्कि हम विकासशील देशों की कड़ी में हम खड़े हुए हैं। आज जो भी सरकारें आती हैं, चाहे एनडीए आये या यूपीए-2 आये, चूंकि यूपीए-2 को इस देश में शासन करने का ज्यादा मौका मिला है। सबने जनता की बात की, किसानों की बात की, नौजवानों की बात की, गरीबों की बात की, आम जनता की बात की कि हम यह करते हैं, यह कर रहे हैं और यह करेंगे, लेकिन सरकारें हमेशा बदलती रही हैं। हमेशा से एक ही बात रही है रोटी,कपड़ा और मकान। उस ओर हम विशेष ध्यान देते हैं और विशेष जनरल बातें हैं। लेकिन दूसरी तरफ हमें यह भई देखना होगा कि हमारे देश में रोजगार के अवसर कैसे बढ़ें। स्वास्थ्य के क्षेत्र में हम कहां खड़े हुए हैं। विदेशों से भी एड आती है, तमाम मदद मिलती है। लेकिन हम कहां पर खड़े हुए हैं। सिंचाई की व्यवस्था आप देख लीजिए। मेरे ख्याल से बहुत सारी ऐसी उपजाऊ जमीन है, जिस पर हम अभी सिंचाई की व्यवस्था नहीं कर पाये हैं। पेयजल के बारे में अभी श्री शीशराम ओला जी बोल रहे थे कि आज तक ऐसे भी रिमोट एरियाज हैं, जहां हम शुद्ध पेयजल उन्हें मुहैया नहीं करा पाये हैं, आज यह स्थिति है।

          दूसरी तरफ बिजली के बारे में अभी अनन्त कुमार जी बोल रहे थे कि हमारे पास इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत है। चाहे वह थर्मल पावर हो, हाइड्रो पावर हो, परमाणु या गैस प्लांट हो, इस ओर हमने कितनी प्रगति की है। हमारा जो लक्ष्य था, मैं आंकड़ों में नहीं जाना चाहूंगा, अगर आंकड़े देने लगूंगा तो अभी आप घंटी बजायेंगे। इसलिए अभी मैं जनरल बोल रहा हूं। हम उस लक्ष्य को भी प्राप्त नहीं कर पाये हैं। हमें विशेष ध्यान देना होगा, क्योंकि ये अनुदानों की अनुपूरक मांगे हैं और यह भी जरूरी है कि हमें इसे पास भी कराना है, यह कम्पलसरी भी है। लेकिन उसके साथ-साथ हम लोग यहां अपनी जो बातें कहते हैं, वे सुझाव के तौर पर कहते हैं, ताकि माननीय मंत्री जी उन पर गौर करें। चूंकि हंमारा देश कृषि प्रधान देश है और हमारी पूरा अर्थव्यवस्था कृषि पर ही निर्भर है, यह किसी से छिपा नहीं है। आज भी गांवों में 70 फीसदी लोग कृषि पर आधारित हैं। लेकिन आज हमें मूल्यांकन करना होगा कि हम उस क्षेत्र में किसानों के लिए क्या कर पाये हैं। आज यही कारण हैं कि किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं और यही कारण है कि यहां जब पार्टियां अपनी बातें रखती हैं तो किसानों और खेती की तरफ उनका ज्यादा झुकाव होता है, ताकि वे उस पर सरकार का ध्यान आकर्षित करा सकें। अभी शीश राम ओला जी प्राकृतिक संपदा के बारे में कह रहे थे कि हमारे पास अपार भण्डार है। लेकिन उस प्राकृतिक संपदा का भी जो दोहन हम कर रहे हैं, किस रेश्यों में हमें करना चाहिए, कितना हमें लक्ष्य प्राप्त करना चाहिए, कितना विकास करना चाहिए, वह हम अभी तक नहीं कर पाए हैं। मैं किसानों की बात कर रहा था। आज अगर आप कृषि की तरफ देखें तो हमने किसानों को क्या दिया है? खाद, चाहे यूरिया हो, डीएपी हो, एनपीए या अन्य जो भी खाद है, जिसको हम अपने उत्पादन को बढ़ाने के लिए डालते हैं, आज उनके मूल्यों की तरफ देखा जाए तो सौ से ले कर दो सौ फीसदी तक उनके दाम बढ़े हैं। आज किसान की कमर बिल्कुल टूट रही है। हमारी जमीन सिकुड़ती जा रही है और हमारी आबादी बढ़ती जा रही है। हमारे संसाधन सीमित हैं। इस ओर भी सरकार को ध्यान देना होगा कि अपने सीमित संसाधनों और पूंजी में हम कैसे विकास कर सकते हैं। हम विकसित देश कैसे बन सकते हैं। इस ओर हमें गंभीरता से सोचना होगा। अभी मंहगाई के बारे में कहा गया है। कभी-कभी किसान के पास पैसे नहीं होते हैं कि वह डीज़ल कैश में खरीद सके, ट्रैक्टर चलाने के लिए या पंपिंग सैट लगा कर सिंचाई करने के लिए किसान को डीज़ल की आवश्यकता होती है। एक लीटर डीजल खरीदने के लिए किसान को पांच से छह किलो गेहूं बेचना पड़ता है। एक लीटर पैट्रोल के लिए कम से कम आठ-दस किलो गेहूं बेचना पड़ता है। आज किसान के सामने यह स्थिति है। यह रेश्यो बताता है। मंहगाई बढ़ी है। हम हर सत्र में, चाहे मानसून सत्र हो, चाहे शीतकालीन सत्र हो, जो भी सत्र चलता है, उसमें मंहगाई, बाढ़ और सुखाड़ पर भी चर्चा करते हैं, लेकिन फिर भी हम कहीं न कहीं मंहगाई को रोकने में असमर्थ हैं। हम मंहगाई को रोक नहीं पा रहे हैं। दिन प्रति दिन मंहगाई बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि कई बार तमाम समाजवादी विचारधारा के लोगों ने इस बात को रखा है कि डॉ. राम मनोहर लोहिया जी ने कहा था कि दाम बांधों की नीति अपनानी चाहिए। कोई भी वस्तु जिसका प्रयोग हम रोज़मर्रा के जीवन में करते हैं, जब तक उनके दाम नहीं बांधे जाएंगे तब तक हम मंहगाई पर कभी भी काबू नहीं पा सकते हैं। दूसरी तरफ डीज़ल और पैट्रोल के दाम हमेशा बढ़ते हैं। जब तक सत्र चलता है तब तक तो ये दाम नहीं बढ़ते हैं, लेकिन जैसे ही सत्र समाप्त होता है, कई बार तो ऐसा हुआ है कि सत्र के बीच में भी दाम बढ़े हैं, लेकिन विपक्ष ने सरकार को इतना मजबूर किया कि कुछ दाम घटे भी हैं। लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं। अभी आंकड़े बता रहे थे कि अन्य देशों में पैट्रोल और डीजल के क्या दाम हैं और हमारे यहां क्या दाम हैं? जब ट्रंस्पोर्टेशन चार्ज बढ़ता है, तो मेरे ख्याल से आवश्यक वस्तुओं के दाम भी बढ़ते हैं। यही कारण है कि हम किसान को उसका समर्थन मूल्य भी नहीं दे पाते हैं। आज देश के कोने-कोने में देखिए, हमारे उत्तर प्रदेश से लेकर तमाम राज्यों में देखिए, किसान को समर्थन मूल्य पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। धरना प्रदर्शन करना पड़ता है, यहां तक कि लाठी-डण्डा और गोली तक भी खानी पड़ती है। लेकिन जो उसकी लागत लगती है, प्रति एकड़ लागत के अनुसार हम उसको सुविधाएं नहीं दे पाते हैं। हम उनको इमदाद नहीं दे पाते हैं। हम उनको सब्सिडि नहीं दे पाते हैं।

           महोदय, यहां पर बीपीएल की बात होती है। जो रोज़ कमाने खाने वाले लोग हैं, जो गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले लोग हैं, उनकी तरफ सरकार को ध्यान देना चाहिए। अगर स्थिति को देखें तो हिंदुस्तान के बीपीएल के सही फिगर्स हमारे पास नहीं हैं। यह बड़े दुर्भाग्य की बात है। अंदाजे से हम बजट का बंटवारा कर देते हैं। मेरे जनपद में तीन विधानसभाएं हैं। मेरे ख्याल से वहां डेढ़ लाख के करीब लोग बीपीएल में आते हैं। लेकिन हम उनको सुविधाएं नहीं दे पाते हैं। जब हम लोग गांवों में घूमते हैं, वहां जाते हैं  तो किसान भी खड़े हो जाते हैं, मज़दूर भी खड़े जाते हैं, गरीब भी भी खड़े हो जाते हैं, सब खड़े हो जाते हैं। हमारे सामने बहुत ही विकट स्थितियां हैं। तमाम सरकारी योजनाएं चलती हैं, लेकिन उन तक नहीं पहुंच पाती हैं। यही कारण है कि आज गरीबी भी परेशान है। किसान भी परेशान है। मज़दूर भी परेशान है। नौजवान भी परेशान है, क्योंकि उसको रोज़गार नहीं मिल पाता है।  

          जहां तक रूपये के अवमूल्यन की बात है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अगर देखा जाये तो रूपये की कीमत प्रतिवर्ष गिर रही है, अगर प्रतिवर्ष कहा जाये तो यह मेरे ख्याल से बहुत बड़ी बात है, रूपये की कीमत प्रतिदिन गिरती चली जा रही है। आज डॉलर के मुकाबले में किस प्रकार से हमारे देश के रूपये का मूल्य बढ़े, हमारा रूपया मजबूत हो, यह हमें सोचना पड़ेगा। विदेशी पूंजी हम अपने देश में कैसे लायें, हमें यह सोचना पड़ेगा कि विदेशी पूंजी को कैसे देश में लाकर हम देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं?

          अगर आयात और निर्यात की स्थिति देखें तो जो हमारे यहां उत्पादन होता है, हम उसका भी आयात करते हैं और निर्यात की तरफ हमारा विशेष ध्यान नहीं है। यही कारण है कि विदेशी पूंजी हमारे देश में कम है और हम बहुत पीछे होते चले जा रहे हैं। जहां तक विकास दर की बात है, पांच से छह, फ्लक्चूएशन कर रहा है, फ्लक्चूएट कर रहा है। जीडीपी की दर, सकल घरेलू उत्पाद की दर की बात करें तो अभी इसके बारे में बड़े विस्तार से बताया गया कि हम बढ़ नहीं पा रहे हैं, वह दर घटती ही चली जा रही है। इस ओर भी हमें बहुत गंभीरता से सोचना पड़ेगा। चाहे सरकारी सेक्टर हो या निजी सेक्टर हो, आप कहीं भी देखें, किसी भी वस्तु की ओर देखें, आज हर क्षेत्र में एक तरीके से गिरावट आयी है। हम अपने लक्ष्य की प्राप्ति नहीं कर पा रहे हैं। यही कारण है कि आज तमाम घोषणायें, सरकारें बहुत सी घोषणायें करती हैं, बहुत सी परियोजनायें हैं, कृषि से लेकर तमाम अन्य विभागों की परियोजनायें हैं, जो लंबित पड़ी हुई हैं। हमने घोषणा कर दी, प्रतिवर्ष हम बजट का प्रावधान करते हैं, लेकिन जो विकास होना चाहिए, वह आज भी बाट जोह रहा है, हम विकास की प्रगति की ओर नहीं बढ़ रहे हैं और यही कारण है कि आज हम बहुत पीछे हैं।

          जो भी उत्पाद करते हैं, उसकी लागत ज्यादा है, लेकिन उसकी तरफ हमारा विशेष ध्यान नहीं है कि कैसे हम उत्पाद की लागत को कम करें? जो हमारा नीचे से इंफ्रास्ट्रक्चर है, तमाम लोग उत्पाद करते हैं, कैसे उन्हें उचित समर्थन मूल्य मिले, इस ओर हम नहीं सोच पा रहे हैं। आज अभी हमारे साथी ने पीएमजीएसवाई की बात की, जब तक सड़कों की स्थिति ठीक नहीं होगी, उनकी कनेक्टिविटी ठीक नहीं होगी, तब तक मेरे ख्याल से किसी भी क्षेत्र का, गांव का विकास नहीं हो सकता है। जब कभी मंत्री लोगों से बात होती है तो वे कहते हैं कि साहब हम बिजली दे रहे हैं, आप प्रदेश से प्रस्ताव भिजवाइये, हम आपको सड़क दे रहे हैं, हम राजीव गांधी विद्युतीकरण में पैसा दे रहे हैं, मनरेगा में पैसा दे रहे हैं, जेएनयूआरआरएम में शहरों के विकास के लिए पैसा दे रहे हैं। लेकिन मेरे ख्याल से वहीं की वहीं बात रह जाती है, तमाम ऐसी परियोजनाये हैं, जो प्रदेशों से प्रस्तावित होकर केंद्र में लंबित पड़ी हुई हैं, लेकिन यहां से बजट नहीं दिया जाता है। तमाम प्रदेश देखते रहते हैं कि किसी प्रकार से हमें कुछ बजट मिल जाये ताकि हम विकास करें, लेकिन कुछ नहीं हो पाता है। मैं कहना चाहता हूं कि राज्यों की भी अपनी एक स्थिति है, राजस्व पूंजी इकट्ठा करने में उनकी एक सीमा है, इतनी राजस्व पूंजी उनके पास नहीं है कि वे अपने प्रदेश का विकास कर सकें। आप मनरेगा में ही देख लीजिए, मनरेगा पर अगर यहां चर्चा हो जाये तो मेरे ख्याल से हर सदस्य उस पर बोलेगा। आज उसकी स्थिति बहुत खराब है। मेरे यहां प्रतापगढ़ के तमाम ब्लॉकों में एक मानक है कि गांव सभाओं को पैसा जाता है। क्षेत्र पंचायतों को भी 25 परसेंट जाना चाहिए, लेकिन क्षेत्र पंचायत को पैसा नहीं जा पा रहा है। हमारे प्रतापगढ़ के एक ब्लॉक के प्रमुख श्री बी.एन.िंसह जी हैं, वे अक्सर यह जिक्र करते हैं कि साहब क्षेत्र पंचायतों में मनरेगा का पैसा नहीं जा रहा है। ये तमाम बातें हम लोग मंत्री जी से कहते रहते हैं, मंत्री जी को लिखते रहते हैं, सदन में भी उठाते हैं, लेकिन कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है।

          आज बैंकों की ब्याज दरें भी बढ़ी हैं। यही कारण है कि जब कभी किसान लोन लेने की कोशिश करता है तो वह डर जाता है कि कैसे हम इसे चुकता कर पायेंगे। जब एक बिल के बारे में सदन में चर्चा हो रही थी तो यह कहा गया कि देश के बड़े-बड़े घराने, जो पूंजीपति हैं, उनको तो आप लोन दे देते हैं। आप उनसे वसूली भी नहीं कर पाते हैं। यहां तक कि वे बाउन्स चेक भी आपको देते हैं, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती है और किसान के ऊपर आप कार्रवाई कर देते हैं। मैं उत्तर प्रदेश की बात कहकर अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा। इस वर्ष उत्तर प्रदेश में पर्याप्त मात्रा में धान की पैदावार हुई है। एफसीआई ने पंजाब से चार लाख टन धान लेकर डम्प कर दिया है। अब बताइए उत्तर प्रदेश का किसान जिन्होंने धान का उत्पादन किया है, उनके धान को रिजैक्ट किया जा रहा है कि आपके धान में नमी है, जबकि पंजाब से ज्यादा अच्छा धान हमारे उत्तर प्रदेश में है। आज जाँच कराने की आवश्यकता है कि एफसीआई में किन ऐसे बड़े घरानों का आधिपत्य है, कहाँ पर उनकी सांठ-गांठ है, कहां पर उनकी डील हुई है, यह जाँच का विषय बनता है। अगर राज्य विकास कर रहा है तो उसमें आपको योगदान करना चाहिए, सहयोग करना चाहिए। यह नहीं कि वहाँ के उत्पाद को आप रिजैक्ट कर दें। अगर धान की बिक्री न हो, किसान अगर धान न बेच पाया, आज हम कांटे भी नहीं लगा पा रहे हैं। मिलर्स सब स्ट्राइक पर हैं, तमाम एफसीआई के कर्मचारी स्ट्राइक पर हैं। स्थिति बहुत बदतर है। इसलिए इसमें सुधार करने की आवश्यकता है।

MR. CHAIRMAN: Please conclude now. I have given you extra time to speak.

श्री शैलेन्द्र कुमार : एक बात कहकर मैं समाप्त करना चाहूँगा कि सांसद निधि जो दी गई है, उसको दो करोड़ रुपये से बढ़ाकर पाँच करोड़ रुपये किया गया है। आज स्थिति यह है कि पहले से बदतर पोज़ीशन हो गई है, समय से पैसा नहीं मिल पा रहा है, न हम खर्च कर पा रहे हैं। दूसरी किस्त के लिए हम लोग लिखा-पढ़ी करते रहते हैं, राज्य के कलैक्टर और जिलाधिकारी भी उपेक्षा कर रहे हैं, सहयोग नहीं कर रहे हैं। यही कारण है कि आज ग्रामीण क्षेत्रों का विकास रुका हुआ है। जो बेचारे गरीब किसान हैं, गंभीर बीमारियों से ग्रसित हैं, उनके इलाज के लिए अगर हम प्रधान मंत्री जी को पत्र लिखते हैं तो पता लगता है कि लिमिट बांध दी गई है कि 23 से 24 से ज्यादा सहायता नहीं मिल पाती है। तो जो किसान ज़रूरतमंद है, गरीब है, जिसके लिए सरकार सोचती है, उस ओर अगर हमने विशेष ध्यान नहीं दिया तो देश कभी विकास नहीं कर सकता। मैं ज्यादा कुछ न कहकर, चूँकि बार बार आप टोक रहे हैं, समाप्त करने के लिए इंगित कर रहे हैं, इन्हीं शब्दों के साथ अनुपूरक बजट का समर्थन करते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।

                                                                                                   

श्री गोरखनाथ पाण्डेय (भदोही): माननीय सभापति जी, अनुदानों की अनुपूरक मांगों 2012-13 पर आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, मैं आपका आभारी हूँ।

          महोदय, आज देश में महंगाई बढ़ी है, बेरोज़गारी बढ़ी है, शिक्षा में असमानता बढ़ती जा रही है। माननीय वित्त मंत्री जी अनुपूरक मांग की बात लेकर आए हैं, उस पर कुछ बिन्दुओं पर आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी का ध्यान मैं आकृष्ट करना चाहूँगा।

          यह देश किसानों का देश है, गाँवों में बसता है। 70 प्रतिशत से अधिक आबादी गाँवों में रहती है और लगभग वही 70 प्रतिशत देश के लोग किसानी पर निर्भर हैं।  महोदय, मुझे कहते हुए बड़ा दुख होता है क्योंकि हम भी गाँव से आते हैं, पेशे से हम भी किसान और अध्यापन जीवन से जुड़े रहे हैं। मुझे सीधा अनुभव है गाँव की गरीबी का, गांव के किसानों की दुर्दशा का और गाँव की अस्त-व्यस्तता और दुर्व्यवस्था का। जहाँ महंगाई बढ़ रही है, उसके कई कारण हैं। गाँव का किसान, गाँव का मज़दूर, गाँव का वह रहने वाला झुग्गी-झोपड़ी का इंसान, जो इस देश की तस्वीर है, जो इस देश की वास्तविक स्थिति को दर्शाता है, अगर वहाँ हम जाएं तो हमें सीधा सीधा अनुभव होगा कि हमारा देश कहाँ जा रहा है। हम विकासशील देश हैं, हम विकसित नहीं हैं। हम विश्व के सबसे बड़े बाज़ार हैं, हम अनेक मुद्दों पर अपने देश को विश्व के उस खाके पर स्थापित करना चाहते हैं लेकिन मैं माननीय मंत्री जी का ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा कि उन गाँवों में रहने वाले किसानों की स्थिति पर, खेती के लिए उनको समय से खाद नहीं मिलती और अगर खाद मिलती भी है तो  तेज़ी से उसके दाम बढ़ रहे हैं वह आप देखें। ...( व्यवधान)

 MR. CHAIRMAN: Prof. Saugata Roy, you can whisper, but do not talk loudly.

… (Interruptions)

श्री गोरखनाथ पाण्डेय : आज खाद और रासायनिक उर्वरकों के दाम 100 प्रतिशत से 200 प्रतिशत तक बढ़े हैं। बुवाई में प्रयोग होने वाली खादों के दाम दोगुने से भी ज्यादा हो गए हैं। महंगी  तो हुई ही हैं, लेकिन सहकारी केन्द्रों पर मिल नहीं रही हैं। किसान मजबूर हैं। आज बुवाई के लिए उसे खाद की ज़रूरत है तो उसे खाद नहीं मिल रही है। उन्हें मजबूर होकर दोगुने और तिगुने दामों पर बाज़ार से नकली खाद खरीदनी पड़ रही है। उधर ध्यान देने की ज़रूरत है। उन्हें खेती के लिए अच्छे बीज नहीं मिल रहे हैं, उन्नतशील बीज नहीं मिल रहे हैं। बहुत सारे अनुसंधान केन्द्र खोले जा रहे हैं, बहुत सारी व्यवस्थाएं तो की जा रही हैं, लेकिन क्या गांवों को वह  मुहैया हो पा रही है? उधर आपका ध्यान जाना चाहिए। देश में ग़रीबी और महंगाई बढ़ रही है। मज़दूरों और मज़बूरों की आवश्यक वस्तुओं की आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पा रही हैं। उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और रहन-सहन  का स्तर गिरता जा रहा है। यह सारी स्थितियां सरकार की ग़लत आर्थिक नीतियों की वजह से हुई हैं। हम जीडीपी की बात करते हैं, वह घट रही है। हम पेट्रोल की बात करते हैं। हम अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार की बात करते हैं। अगर हम उस पर ध्यान दें तो जहां हमारे देश में 73 रुपये से अधिक पर पेट्रोल प्रति लीटर है, वहीं पाकिस्तान में 61 रुपये प्रति लीटर है, बांग्लादेश में 62 रुपये प्रति लीटर है तो हमारे पड़ोसी देश में 61.70 पैसे है, यह स्थिति है। अगर पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़ रहे हैं तो स्वाभाविक रूप से महंगाई बढ़ेगी, क्योंकि सारी चीज़ें यातायात पर और इनके दामों पर निर्भर करती हैं। महंगाई बढ़ने का यह भी बहुत महत्वपूर्ण कारण है। आज गांवों में किसान, मज़दूर और झुग्गी-झौपड़ी में रहने वाले व्यक्ति भी लकड़ी के अभाव में रसोई गैस का उपयोग करते हैं। रसोई गैस के किस तरह से दाम बढ़े हैं और उस की किस तरह से कटौती की गयी है, इस बारे में मैं मंत्री जी से पूछना चाहता हूं कि अगर परिवार की परिभाषा को ही आप ध्यान में रखें तो क्या जो गैस सिलेण्डरों की आपूर्ति की जा रही है, उससे किसी परिवार की पूरे महीने भर की रसोई चल पाएगी? दाम तो बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन आपूर्ति घटती जा रही है। हमारे पूर्व वक्ता माननीय सांसद जी बोल रहे थे। इसके पहले भी देश की स्थितियां रही हैं। गांवों में सिलेण्डर पहुंचाए जाते थे, उनके कनैक्शन के लिए और आपूर्ति के लिए कोई कठिनाई नहीं होती थी, लेकिन दुर्भाग्य है कि आज गांव का वह मजबूर और ग़रीब परिवार गैस के लिए लाइन में लग रहा है और मजबूरी में घटतौली का वह सिलेण्डर लेकर जा रहा है। दाम तो वह उसके दुगुने-तिगुने दे रहा है...( व्यवधान) वही बात मैं कह रहा हूं कि इसके पहले आपूर्ति भी थी और उपलब्धता भी थी। आज आपूर्ति तो कम है ही, दाम भी आसमान छू रहे हैं और उसको पाने के लिए लाइन लगानी पड़ रही है। मजबूरी में कम वज़न यानी घटतौली में उसको लेने पर मजबूर हैं। उस तरफ आपका ध्यान जाना चाहिए और जो मांग है कि कम से कम 12 सिलेण्डर प्रति परिवार को और उचित दाम पर, कनसैशनल रेट पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जानी चाहिए।

          महोदय, शिक्षा जो कि सबसे अहम व्यवस्था है और किसी भी विकास का प्रथम सौपान शिक्षा है। शिक्षा पर उस दिन बहस हो रही थी। माननीय शिक्षा मंत्री जी बैठे थे और हम लोग भी यह पूछना चाहते थे कि आप मॉडल स्कूल्स दे रहे हैं, केन्द्रीय विद्यालय दे रहे हैं, आप तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था कर रहे हैं, लेकिन क्या उन गांवों की तरफ आपकी नज़र जा रही है, जहां शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े हुए लोग हैं। हम भी सुदूर गांव से आते हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में भदोही लोक सभा क्षेत्र से हम आते हैं। शिक्षा की दृष्टि से हम लोग पिछड़े हुए हैं। पेशे से हम अध्यापक रहे हैं। हमें पता है कि गांव का वह मज़दूर, गांव का वह किसान, गांव का वह ग़रीब मज़बूरी में उन शिक्षालयों में अपने बच्चों को भेजता है, जहां किताबों की जगह थालियां और गिलास लेकर बच्चे जाते हैं और दिन भर वह इस प्रयास में रहते हैं कि कौन सा खाना मिलेगा और किस स्तर का मिलेगा? मुझे कहते हुए दुख हो रहा है कि माननीय मंत्री जी और यह सरकार अपनी पीठ थपथपाती है कि पौष्टिक भोजन दिया जा रहा है। हम लोग गांव में रहते हैं और वहां जाकर देखते हैं कि उन बच्चों को किस तरह से खिचड़ी और कभी-कभी तो उन में विषैले जीव-जन्तु गिर जाते हैं, जिसके कारण कई बच्चे बीमार हो जाते हैं और कहीं-कहीं तो मर भी जाते हैं। ऐसी घटनाएं सुनने में आयी हैं। यह स्थिति है बच्चों को भोजन देने की व्यवस्था में। उनको पढ़ाई देने की व्यवस्था नहीं है। स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं। वहां लोग पढ़ाने के लिए नहीं आते हैं। वहां दिन भर यह व्यवस्था दी जाती है कि बच्चों को पौष्टिक भोजन दिया जाए। क्या पौष्टिक भोजन मिलेगा? जो भूखा है, उसको जो मिला, वही उसको पौष्टिक समझ में आता है।

           शिक्षा की यह स्थिति है, जहां मॉडल स्कूल की बात की जाती है। आज गांव में अगर प्राईवेट स्कूल न होते तो पढ़ाई-लिखाई भी न हो पाती क्योंकि सरकारी स्कूल की बहुत दुर्दशा है। चाहे वह प्राथमिक स्कूल हो, माध्यमिक स्कूल हो, चाहे इंटर कॉलेज हो, वहां तो मास्टर है ही नहीं। डिग्री कॉलेज तो बहुत कम हैं। तकनीकी शिक्षा तो लोग शहरों में जाकर प्राप्त कर पाते हैं। वह भी एक प्रतिशत, दो प्रतिशत। वहां भी इतनी मारामारी है, इतनी ज्यादा फी है, इतना ज्यादा डोनेशन है कि लोग वह शिक्षा भी नहीं ले पाते। यह मैं गांव की असली तस्वीर मैं बयां कर रहा हूं।

          हम तो मिनरल वाटर पीते हैं। हमें तो यह लगता है कि हमें स्वच्छ जल मिले ताकि कहीं से कोई बैक्टीरिया न जाए। पर, गांव का वह किसान, गांव का वह मजदूर, गांव का वह व्यक्ति पानी पीने के लिए मोहताज़ है। लोग एक किलोमीटर - दो किलोमीटर दूर से पानी लेकर आते हैं। गांव की तस्वीर देखें। जब हम लोग ग्रामीण क्षेत्र में जाते हैं तो हमसे लोग कहते हैं कि हमें तो हैण्ड पम्प चाहिए, हमें तो पीने के लिए पानी चाहिए। 62-65 साल की आज़ादी के बाद भी हम स्वच्छ जल मुहैया नहीं करा पा रहे हैं। हम पीने के लिए पानी नहीं दे पा रहे हैं। यह हमारे देश की तस्वीर है। हम आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी से मांग करते हैं कि हम सांसदों को गांवों को व्यवस्थित करने के लिए जो सांसद निधि दी जाती है, उसमें कुछ कटौती कर लें और हमें कम से कम 1000-1000 हैण्ड पम्प अपने क्षेत्र के गांवों में उन गरीबों को, उन निरीहों को जो एक-दो किलोमीटर दूर से अपने सिर पर घड़ा भरकर लाते हैं और सुबह उठकर सबसे पहले पानी की व्यवस्था करते हैं, हम उन्हें पीने का पानी तो मुहैया कर दें। यह हम आपसे मांग करते हैं।

          महोदय, आज देश के विकास की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बिजली है। हम लोग गांवों में रहते हैं। जब हम गांवों में जाते हैं तो हमसे लोग मिलने के लिए आते हैं। वे कहते हैं कि आज भी 65 साल की आज़ादी के बाद भी हम तो अंधेरे में रहते हैं, हमें बिजली चाहिए। राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना चली, असफल हो गयी। यह कागज़ों में तो सफल है। लेकिन, गांवों में सफल नहीं है। बिजली के खंभे लगे। उस पर तार झूल रहे हैं। लेकिन, उसमें बल्ब नहीं जल रहे हैं। उसमें करेन्ट की सप्लाई नहीं हो रही है। उधर आपका ध्यान जाना चाहिए। अगर आप गांवों को नहीं उठा पाएंगे तो देश को नहीं उठा पाएंगे। अगर आप गरीबी को, बेरोज़गारी को समाप्त नहीं कर पाएंगे तो भारत की तस्वीर और बिगड़ती जाएगी।

          महोदय, मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी का ध्यान और एक-दो बिन्दुओं की तरफ दिलाना चाहूंगा। हमारे देश में बैंक ऐसी संस्था है जहां से हम लोन लेते हैं, पैसा जमा करते हैं। बड़े घराने, उद्योगपतियों के लिए तो सारी व्यवस्थाएं हैं। मगर, गांव का गरीब, गांव का झुग्गी-झोपड़ी का व्यक्ति अगर लोन के लिए जाता है, चाहे वह कृषि का लोन हो, चाहे शिक्षा का लोन हो, चाहे कृषि यंत्र लेने के लिए लोन हो, चाहे खाद, बीज, बिजली-पानी के लिए लोन हो, उसे बैंक में चक्कर लगाने पड़ते हैं। उसे बिचौलियों का सहारा लेना पड़ता है। उन्हें कमीशन देकर वे लोन प्राप्त करते हैं और जब वसूली की बात आती है तो बड़े घरानों के साथ तो सारी व्यवस्थाएं हैं। मगर, गरीबों को आर.सी. जारी कर दी जाती हैं। उनको जेलों में बंद कर दिया जाता है। उनसे दो हजार रुपये, पांच हजार रुपये की वसूली के लिए इस तरह से प्रताड़ित किया जाता है कि वे अपमानित महसूस करते हैं। उधर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

          गरीबी दूर करने के लिए क्या प्रयास किए गए हैं? माननीय मंत्री जी, मैं आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा। द्वितीय विश्व युद्ध हुआ था। इसमें कुछ देशों की सारी अर्थव्यवस्था विनष्ट हो गयी थी और वह उठा तो उसमें जापान था। वह डेवलप हुआ। अगर वह उठा और डेवलप हुआ तो वह सूक्ष्म, लघु, मध्यम उद्योगों के माध्यम से उठा, कुटीर उद्योगों के माध्यम से उठा। आज हमारे देश के सारे उद्योग समाप्त हो रहे हैं। सूक्ष्म उद्योग, मध्यम उद्योग, लघु उद्योग, कुटीर उद्योग समाप्त हो रहे हैं।

          महोदय, मैं ऐसे क्षेत्र से आता हूं जो कालीन उद्योग के नाम से जाना जाता है। भदोही हमारा लोक सभा क्षेत्र है। वहां हथकरघा उद्योग है। कभी हम बनारस से लगे हुए जिले थे। अब तो हम उससे अलग हुए हैं और भदोही के नाम से हमारा जिला जाना जाता है। बनारस की साड़ियां विश्व प्रसिद्ध थीं। वहां कपड़े की बुनाई होती है। भदोही का कालीन उद्योग विश्व प्रसिद्ध रहा है। लेकिन आज वह कराह रहा है, वह टूट रहा है। वह गांव में फैला हुआ उद्योग था। गांव के स्त्री-पुरुष मिलकर कताई-बुनाई किया करते थे। वह उद्योग हज़ारों करोड़ रुपये विदेशी मुद्रा का अर्जन किया करता था। लेकिन, अपने देश की गलत नीतियों की वज़ह से वह कराह रहा है, टूटने के कगार पर आ गया। उसमें लगे हुए लोग आज दूसरे उद्योगों में भाग रहे हैं। आपका ध्यान उधर जाना चाहिए। अगर देश का विकास करना चाहते हैं तो लघु, सूक्ष्म, मध्यम उद्योगों को भी आपको विकसित करना पड़ेगा। ...( व्यवधान)

          महोदय, मैं एक मिनट में समाप्त कर रहा हूं। इस देश में बीपीएल की स्थिति कैसी है, यह कहने की जरूरत नहीं है। गांव का गरीब कराह रहा है। आपको पता नहीं है कि हमारे देश में कितने गरीब हैं, गांव की स्थिति क्या है। आप बीपीएल शेयर घारकों, कार्ड धारकों एवं बीपीएल गरीबों को कौन सी व्यवस्था देना चाहते हैं? आपको क्या पता है कि हमारे देश में कितने गरीब हैं, कितने गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोग जीवनयापन कर रहे हैं। जब आपको यही नहीं पता है तो आप व्यवस्था कैसे देंगे। पहले उनकी जानकारी करनी चाहिए। यह कहा गया है कि भारत एक धनी देश है, लेकिन जिसमें निर्धन निवास करते हैं। वास्तविक स्थिति है, हम प्राकृतिक सम्पदाओं से धनी हैं, हमें सारी चीजें प्रकृति ने दोनों हाथों से दी हैं। लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि कभी कोल की बात आती है तो यहां लूट ही समझ में आती है। अगर हम इन सारी व्यवस्थाओं की तरफ ध्यान दें, जो हमारी योजनाएं हैं, वे लटकी हुई हैं। हम विदेशों की बात करते हैं, विदेशी पूंजी यहां आ रही है। जैसे आंकड़े बताते हैं, मैं ऊधर नहीं जाना चाहूंगा। हम कहने के लिए दिनोंदिन पीड़ित होते जा रहे हैं। गरीबों की थालियां महंगी होती जा रही हैं। किसान और मजदूर पीड़ित हैं। छात्राओं को पढ़ने के लिए बिजली नहीं मिल रही है। किसानों को अपने खेतों के लिए खाद एवं पानी नहीं मिल रहा है। अगर उनका उत्पाद तैयार हुआ तो वे ओने-पौने दाम पर बेचने के लिए मजबूर हैं, क्योंकि उन्हें उसका उचित दाम नहीं मिल रहा है। उनकी सब्जी एवं फल सड़ रहे हैं, क्योंकि आपके पास उन्हें रखने के लिए गोदाम नहीं हैं। उनकी एक तरफ लागत बढ़ती जा रही है और   दूसरी तरफ उनको उत्पाद मूल्य नहीं मिल रहा है। गांव की दुर्दशा, स्थिति दिनोंदिन बिगड़ती जा रही है। गांव के लोग गरीब एवं बेरोजगार होते जा रहे हैं। शिक्षा का स्तर  घटता जा रहा  है और असमानता बढ़ती जा रही है। उधर माननीय मंत्री जी का ध्यान जाना चाहिए। इन बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए गांव के किसानों, मजदूरों और गांव के लोगों के रहन-सहन को उठाने के लिए प्रयास करना चाहिए।

          सभापति महोदय, इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपका बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं।

                                                                                                   

श्री अर्जुन राय (सीतामढ़ी):सभापति महोदय, आज वर्ष 2012-13 के सप्लीमेंट्री ग्रांट के लिए प्रथम डिमांड माननीय मंत्री जी ने जो पेश की, उस पर बोलने का मुझे अवसर मिला है, उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। लेकिन वित्त विभाग और ग्रांट डिमांड पर बोलने से पहले जो देश की वर्तमान स्थिति है, उस पर मैं एक मिनट अपनी बात रखना चाहता हूं।

          सभापति महोदय, जो तीन महत्वपूर्ण विषय वित्त विभाग से जुड़े हैं और देश की अर्थव्यवस्था एवं आम लोगों के जीवनस्तर को प्रभावित करते हैं - पहला जीडीपी, दूसरा फिसकल डेफिसिट और तीसरा इन्फ्लेशन। अगर जीडीपी बढ़ता है तो देश की माली हालत ठीक मानी जाती है। लोगों का जीवनस्तर बेहतर होता है और वर्तमान स्थिति में देश का जीडीपी लगातार गिर रहा है। इन्हीं के यूपीए प्रथम में जीडीपी की 2004-08-09 के आसपास जो स्थिति थी, वह लगभग नौ के आसपास थी और वर्तमान में 5.2 के आसपास है, यह लगातार गिरती जा रही है। जो इन्फ्लेशन, महंगाई की दर है, वह लगातार बढ़ती जा रही है। सितम्बर, अक्तूबर में मैं समाचार-पत्र में देख रहा था। अगस्त में 7.55 प्रतिशत था, सितम्बर में 7.81 प्रतिशत हो गया और वर्तमान में नौ प्रतिशत है, यानि इन्फ्लेशन बढ़ रहा है। देश में महंगाई बढ़ रही है। तीसरा फिसकल डेफिसिट, बजटीय घाटा है। सन् 2012-13 में जो यहां मंत्री जी थे, उन्होंने बजट पेश किया। फिज़िकल डेफिसिट का उस समय अनुमान लगाया गया था कि 5.1 प्रतिशत जीडीपी का होगा। लेकिन बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि वह फिज़िकल डेफिसिट आज 5.1 प्रतिशत से बढ़ कर लगभग छ: प्रतिशत के आसपास हो गया है। वर्तमान माननीय मंत्री जी कहते हैं कि फिज़िकल डेफिसिट हम कम करेंगे, हमने योजना बनाई है। केलकर समिति का इन्होंने बनाया, उसकी रिपोर्ट ली। माननीय मंत्री जी बताते हैं कि साल के अंत तक 5.3 प्रतिशत कर देंगे, जिसका कोई आधार नहीं है। लेकिन वर्तमान समय में एक साल के लिए जो अनुमान लगाया गया था, वह 5.1 प्रतिशत से लेकर अभी 6 प्रतिशत के आसपास फिस्कल डैफीसिट आया है, लेकिन मूल विषय पर मैं आना चाहता हूं। मूल विषय यह है कि माननीय मंत्री जी ने जो इस सदन से सप्लीमेंटरी ग्राण्ट्स डिमांड की है, वह 32,119.55 करोड़ रुपये के लिए है। मैं यहां सदन का ध्यान इस ग्राण्ट की ओर दिलाना चाहता हूं। सभापति जी, मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं कि इन्होंने प्रथम खेप में 32,110.5 करोड़ रुपये की जो डिमांड की है, उसमें सबसे हैरान करने का विषय तो यह है कि 29,844.08 करोड़ रुपये इन्होंने गैर-योजना मद में व्यय करने के लिए सदन में डिमांड रखी है। कहने का मतलब यह है कि जितनी इन्होंने डिमांड की, उसमें से लगभग 93 प्रतिशत की डिमांड गैर-योजना मद में खर्च करने के लिए है।

          मंत्री जी, जब 2012-13 का बजट पेश हुआ तो उस समय कुल व्यय का अनुमान 14,90,925 करोड़ रुपये का था, जिसमें गैर-योजना मद में 9,69,900 करोड़ रुपये का प्रावधान था। तब भी गैर-योजना मद में खर्च लगभग दो गुना था, लेकिन वर्तमान में जो आपने ग्राण्ट में डिमांड की है, जो आप सप्लीमेंटरी डिमांड लाये हैं, वह 93 प्रतिशत गैर-योजना मद में है और मात्र सात प्रतिशत के आसपास आप योजना मद में खर्च करना चाहते हैं। कहने का मतलब यह है कि जिससे देश की तरक्की होगी, उद्योग-धन्धे लगेंगे, रोजगार का सृजन होगा, आय में वृद्धि होगी, उस क्षेत्र में आपकी कोई अभिरुचि नहीं है और सरकार कहती है कि बजटीय घाटा बढ़ रहा है, लगातार तेजी से बढ़ रहा है और इस कदर बढ़ रहा है कि यह नियंत्रण के बाहर होता जा रहा है। हम आपसे जानना चाहते हैं कि बजटीय घाटे को पूरा करने के लिए जो उपाय किए जाने चाहिए, माननीय मंत्री जी, आपने इस क्षेत्र में क्या उपाय किये हैं? बजटीय घाटे को पूरा करने के लिए उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है, मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में आप निवेश कर सकते हैं, कृषि के क्षेत्र में निवेश कर सकते हैं, उत्पादन बढ़ा सकते हैं, लेकिन बजटीय घाटे को पूरा करने के लिए आपने एक ही उपाय किया, आपने कर्ज लेकर बढ़ते हुए बजटीय घाटे को पूरा करने का उपाय किया है और देश पर लगातार कर्ज का बोझ आपने बढ़ाने का काम किया है। यह लोक-कल्याणकारी राज्य है। लगातार आप उत्पादन के क्षेत्र में काम नहीं करते, प्लान साइज़ बढ़ाने का काम नहीं करते, नॉन प्लान एक्सपेंडीचर आप लगातार बढ़ाते जा रहे हैं और कर्ज लेकर बजटीय घाटे को पूरा करने का काम करते हैं। हमारे पास आंकड़ा है।

          2007-08 में आपने बजटीय घाटे को पूरा करने के लिए 1.27 लाख करोड़ रुपये कर्ज लेने का काम किया, वहां वर्तमान में 2012-13 में 5.13 लाख करोड़ रुपये कर्ज लेकर आपने बजटीय घाटे को पूरा करने का काम किया है। क्या यह देश केवल कर्ज लेकर बजटीय घाटे को पूरा करेगा, क्या देश में कोई मकेनिज्म डैवलप नहीं हो सकता है, विकास के लिए आप कोई रास्ता नहीं खोल सकते हैं, आन्तरिक रिसोर्सेज़ डैवलप नहीं कर सकते हैं?

          मैं आपको बताना चाहता हूं कि जो आर्थिक मंदी है, सरकार का कहना है कि अमेरिका और यूरोपियन कंट्रीज़ में जो इकोनोमिक स्लो डाउन है, इसका प्रभाव हमारे देश पर पड़ा है और हमारे देश का जो अर्थ तंत्र है, वह नियंत्रण के बाहर होता जा रहा है और आर्थिक स्थिति खराब हो रही है, लेकिन मैं एक उदाहरण देना चाहता हूं, 2011-12 में जो अमेरिका को आपने निर्यात किया, वह कुल निर्यात का 11  प्रतिशत से ज्यादा था, 2010-11 में जो आपने निर्यात किया, वह कुल निर्यात का 10 प्रतिशत के आसपास था, वहीं यूरोपियन कंट्रीज़ में, जहां आप कहते हैं कि वहां इकोनोमिक स्लो डाउन है, जिसका प्रभाव इस देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है तो आपने 2011-12 में यूरोपियन कंट्रीज़ में आपने जो निर्यात किया, वह कुल निर्यात का 18 प्रतिशत था। 2011-12 में लगभग 17 प्रतिशत था, यानि कि यूरोपियन कंट्रीज़ में निर्यात में एक प्रतिशत की कमी हुई, लेकिन जहां तक उसके मूल्य और उसकी कीमत का सवाल है, हम देख रहे हैं कि यूरोपियन देशों में निर्यात में एक प्रतिशत की कमी हुई, लेकिन मूल्य के मामले में अमेरिकन कंट्रीज़ में 2011-12 में आपकी 37 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

  16.00 hrs. यह कैसे?  आपका निर्यात बढ़ रहा है।  

   16.0 ¼ hrs.                               (Shri Satpal Maharaj in the Chair) निर्यात के मूल्य में वृद्धि हो रही है, लेकिन आप कहते हैं कि अमेरिका और यूरोपियन कंट्रीज में जो इकॉनामिक स्लो डाउन है, उसका प्रतिफल है कि हमारे देश में बजटीय घाटा बढ़ रहा है।  वित्त मंत्री जी, समाचार पत्र में मैंने एक खबर पढ़ी।  बिजनेस लाइन में 30 अक्टूबर को आपकी यह खबर आयी कि फाइनेंस मिनिस्टर वांट्स टू कट ...

सभापति महोदय : हम कल यह विषय कांटीन्यू करेंगे। आप बैठ जाइए। अब आइटम नंबर 22 लेना है।

 

          आइटम नंबर 22, श्री शैलेन्द्र कुमार जी।