State Consumer Disputes Redressal Commission
Dr. Sunil Kumar Agrawal vs Asit Pratap Singh on 12 April, 2022
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/1774/2014 ( Date of Filing : 05 Sep 2014 ) (Arisen out of Order Dated in Case No. of District State Commission) 1. Dr. Sunil Kumar Agrawal Muzaffar Nagar ...........Appellant(s) Versus 1. Asit Pratap Singh Mainpuri ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. Vikas Saxena PRESIDING MEMBER HON'BLE MRS. DR. ABHA GUPTA MEMBER PRESENT: Dated : 12 Apr 2022 Final Order / Judgement
उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग , उ0प्र0 , लखनऊ।
(सुरक्षित) अपील सं0 :- 1195 / 20 14 (जिला उपभोक्ता आयोग, मैनपुरी द्वारा परिवाद सं0- 87/2009 में पारित निर्णय/आदेश दिनांक 01/03/2014 के विरूद्ध) Chief Medical Officer, District-Mainpuri.
Appellant Asit Pratap Singh S/O Late Sri Maharaj Singh R/O Village-Nagla Naya, Post-Jauhri Nagar, District Mainpuri. Dr. Govind Singh Kushwaha, Medical Officer, Primary Health Centre, Ghiror, District Mainpuri. Dr. S.K. Agarwal, Health Centre, Kishni, District-Mainpuri Dr. Mithlesh Pratap, Health Centre, Kuchela, District Mainpuri. The Oriental Insurance Co. Ltd through Divisional Manager, Divisional Office-II, Sanjai Place, LIC Building, Agra.
...............Respondents अपील सं0 :- 1774 / 20 14 Dr. Sunil Kumar Agarwal, S/O Late G.S. Agarwal Addi. Chief Medical Officer, Muzaffar Nagar.
Appellant Asit Pratap Singh S/O Late Sri Maharaj Singh R/O Village-Nagla Naya, Post-Jauhri Nagar, District Mainpuri. Chief Medical Officer Distt Mainpuri.
Dr. Govind Singh Kushwaha, Medical Officer, Primary Health Centre, Ghiror, District Mainpuri. Dr. Mithlesh Pratap, Health Centre, Kuchela, District Mainpuri. The Oriental Insurance Co. Ltd through Divisional Manager, Divisional Office-II, Sanjai Place, LIC Building, Agra.
...............Respondents समक्ष मा0 श्री विकास सक्सेना, सदस्य मा0 डा0 आभा गुप्ता, सदस्य उपस्थिति:
अपीलार्थी/चीफ मेडिकल आफिसर की ओर से विद्वान अधिवक्ता:-श्री मोहन अग्रवाल, एडवोकेट प्रत्यर्थी सं0 1 की ओर से विद्वान अधिवक्ता:-श्री उमेश कुमार शर्मा, एडवोकेट प्रत्यर्थी सं0 5 की ओर से विद्धान अधिवक्ता:- श्री वकार हासिम, एडवोकेट दिनांक:-24.05.2022 माननीय श्री विकास सक्सेना , सदस्य द्वारा उदघोषित निर्णय यह अपील अंतर्गत धारा 15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम जिला उपभोक्ता आयोग, मैनपुरी द्वारा परिवाद सं0- 87/2009, आसित प्रताप सिंह बनाम मुख्य चिकित्साधिकारी व अन्य में पारित निर्णय/आदेश दिनांक 01/03/2014 के विरूद्ध के विरूद्ध योजित की गयी है, जिसके द्वारा विद्धान जिला उपभोक्ता फोरम ने परिवाद विपक्षी सं0 1 लगायत 4 के विरूद्ध पृथक व संयुक्त रूप से रूपये 1,75,000/- के लिए एवं विपक्षी सं0 5 के विरूद्ध 2,00,000/- रूपये क्षतिपूर्ति एवं अन्य अनुतोष के लिए आज्ञप्त किया।
परिवाद पत्र इन अभिकथनों के साथ प्रस्तुत किया गया कि परिवादी के पत्नी श्रीमती मंजू यादव का नसबंदी सिविल में ऑपरेशन परिवार कल्याण कार्यक्रम के अंतर्गत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, मैनपुरी में हुआ था। परिवादी के अनुसार ऑपरेशन के दौरान उक्त मंजू यादव की मृत्यु हो गयी, जिसके लिए क्षतिपूर्ति की मांग करते हुए परिवाद प्रस्तुत किया गया।
विपक्षी सं0 1 लगायत 4 की ओर से संयुक्त प्रतिवाद पत्र प्रस्तुत किया गया, जिसमें परिवादी की पत्नी का नसबंदी ऑपरेशन में किसी प्रकार की लापरवाही होने से इंकार किया गया एवं स्वाभाविक रूप से उनकी मृत्यु होने का कथन किया गया। वादोत्तर में यह कथन भी आया कि उक्त ऑपरेशन परिवादी एवं मरीज की सहमति से बिना कोई शुल्क लिए हुए किया गया था। इस आधार पर विपक्षी सं0 1 लगायत 4 चिकित्सकगण के विरूद्ध परिवाद खारिज किये जाने का कथन किया गया।
प्रत्यर्थी सं0 5/बीमा कम्पनी की ओर से वादोत्तर में यह कथन प्रस्तुत किया गया कि परिवादी को परिवाद का कोई कारण उत्पन्न नहीं होता है। परिवादी द्वारा पोस्टमार्टम रिपोर्ट अथवा प्रथम सूचना रिपोर्ट आदि आवश्यक दस्तावेज दाखिल नहीं किये हैं यदि परिवादी की पत्नी की मृत्यु चिकित्सकों की लापरवाही के कारण हुई है तो मुआवजा देने के लिए चिकित्सक ही उत्तरदायी है। बीमा कम्पनी द्वारा यह भी कहा गया है कि केन्द्र सरकार द्वारा नसबंदी ऑपरेशन के दौरान मृत्यु की सूचना व निर्धारित प्रपत्र क्लेम संबंधी नहीं भेजे जाते तब तक बीमा कम्पनी क्लेम की अदायगी हेतु उत्तरदायित्व नहीं रखती है। इसके अतिरिक्त केन्द्र सरकार द्वारा नसबंदी ऑपरेशन के दौरान होने वाली मृत्यु के लिए जो बीमा पॉलिसी ली गयी है। उसमें बीमा कम्पनी का सीमित उत्तरदायित्व होता है। दिनांक 08.03.2007 को मरीज की मृत्यु होना बताया गया किन्तु 02 वर्ष तक बीमा कम्पनी को कोई सूचना प्रेषित नहीं की गयी थी। ऐसी स्थिति में परिवाद भी कालबाधित है। विद्धान जिला उपभोक्ता फोरम ने विपक्षी सं0 1 लगायत 4 चिकित्सकगण के विरूद्ध रूपये 1,75,000/- मय ब्याज क्षतिपूर्ति हेतु रू0 5,000/- एवं वाद व्यय हेतु रू0 2,000/- आज्ञप्त किया। इसके अतिरिक्त बीमा कम्पनी के विरूद्ध रूपये 2,00,000/- मय ब्याज क्षतिपूर्ति एवं वाद व्यय पृथक से आज्ञप्त किये गये, जिससे व्यथित होकर यह अपील प्रस्तुत की गयी है। यह अपील सीएमओ जिला मैनपुरी द्वारा प्रस्तुत की गयी है।
अपील सं0 1195/2014 में मुख्य रूप से यह आधार लिये गये हैं कि प्रश्नगत निर्णय विधि एवं तथ्यों के विरूद्ध है। अपीलार्थी द्वारा प्रश्नगत ऑपरेशन के संबंध में कोई शुल्क अथवा फीस नहीं ली गयी थी। अत: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अनुसार परिवादी या उसकी मृतक पत्नी उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं आती है। परिवार कल्याण योजना के अंतर्गत प्रत्यर्थी सं0 5 बीमा इंश्योरेंस कम्पनी को केन्द्र सरकार द्वारा बीमा पॉलिसी ऑपरेशन के दौरान दुर्घटना के संबंध में ली गयी थी। अपीलार्थी द्वारा कोई प्रीमियम नहीं लिया गया था। परिवादी की मृतक पत्नी की मृत्यु के संबंध में बीमे का क्लेम ओरियंटल इंश्योरेंस कम्पनी को भुगतान हेतु प्रेषित कर दिया गया था। अत: अपीलार्थी का कोई सेवा में त्रुटि इस संबंध में नहीं है। स्वयं परिवादी प्रत्यर्थी सं0 1 ने यह स्वीकार किया है कि अपीलार्थी एवं अन्य चिकित्सकगण ने सभी आवश्यक टेस्ट किये थे। मुख्य चिकित्साधिकारी द्वारा किसी लापरवाही किये जाने का कोई आक्षेप परिवादी ने नहीं लगाया है। परिवादी ने चिकित्सकगण प्रत्यर्थी सं0 2 लगायत 4 के विरूद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करायी थी, जिसमें संबंधित थाने में चार्जशीट लगायी जो विचारण हेतु संबंधित न्यायालय के समक्ष लम्बित है। अपीलार्थी मुख्य चिकित्साधिकारी के विरूद्ध किसी सेवा में कमी या लापरवाही का कोई अभियोग नहीं लगाया गया था। अत: अपीलार्थी का कोई उत्तरदायित्व इस संबंध मे नहीं बनता है। पॉलिसी के अनुसार बीमा कम्पनी प्रत्यर्थी सं0 5 को रूपये 2,00,000/- की क्षतिपूर्ति देने का उत्तरदायित्व बनता है। अपीलार्थी के विरूद्ध जो क्षतिपूर्ति का आदेश दिया गया है वह दोषपूर्ण एवं अनुचित है। इस आधार पर अपील स्वीकार किये जाने एवं प्रश्नगत निर्णय व आदेश अपास्त किये जाने की प्रार्थना की गयी है।
अपील सं0 1774/2014 में प्रश्नगत ऑपरेशन करने वाले चिकित्सक डॉक्टर सुनील कुमार अग्रवाल द्वारा अपील प्रस्तुत की गयी है, जिन्होंने अपील में मुख्य रूप से विपक्षी एवं मरीज के उपभोक्ता होने से इंकार किया है एवं अपनी बात मरीज के मध्य उपभोक्ता एवं सेवा प्रदाता के संबंध से इंकार किया है। अपील में मुख्य रूप से यह आधार लिये गये हैं कि अपीलकर्ता चिकित्सक द्वारा मरीज श्रीमती मंजू यादव का नसबंदी ऑपरेशन दिनांक 08.03.2007 को प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, मैनपुरी में परिवार कल्याण योजना के अंतर्गत किया गया था। मरीज द्वारा शल्य क्रिया के उपरान्त डॉक्टर की हीनता का पालन नहीं किया गया, जिस कारण उसकी तबियत खराब हुई एवं अंतत: उसकी मृत्यु हो गयी, जिसका कारण स्वयं मरीज की लापरवाही थी। अपीलार्थी के अनुसार प्रत्येक नसबंदी का ऑपरेशन नहीं होने वाली मृत्यु का बीमा रूपये 2,00,000/- का आवरण दिया गया है यदि ऑपरेशन के 07 दिन के भीतर मृत्यु हो जाती है। विपक्षी/प्रत्यर्थी सं0 2 इस योजना के अंतर्गत बीमा कम्पनी से लाभ पाने की दावेदारी कर सकता है। अपीलार्थी का कथन है कि उसके द्वारा अपनी चिकित्सीय कर्त्तव्यों का पूर्ण एवं तत्परता से पालन किया गया एवं कोई लापरवाही नहीं की गयी थी। अपीलार्थी द्वारा अपील में मुख्य रूप से यह आधार लिये गये हैं कि अपीलार्थी एक लोक सेवक है तथा राज्य के क्लेम योजना के अंतर्गत कार्य कर रहा है। प्रश्नगत मामले में मरीज को बिना किसी शुल्क अथवा धनराशि प्राप्त किये हुए उसका शल्य क्रिया की गयी थी इसलिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत मरीज उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं आता है। इस आधार पर वाद खारिज किये जाने और अपील स्वीकार किये जाने की प्रार्थना की गयी है।
अपील सं0 1195/2014 में अपीलार्थी के विद्धान अधिवक्ता श्री मोहन अग्रवाल तथा अपील सं0 1774/2014 मे प्रत्यर्थी सं0 2 के विद्धान अधिवक्ता मोहन अग्रवाल, अपील सं0 1195/2014 में प्रत्यर्थी सं0 1 के विद्धान अधिवक्ता श्री उमेश कुमार शर्मा तथा उपरोक्त दोनों अपीलों में प्रत्यर्थी सं0 5 के विद्धान अधिवक्ता वकार हासिम को सुना गया। पत्रावली पर उपलब्ध समस्त अभिलेख का अवलोकन किया। तत्पश्चात पीठ के निष्कर्ष निम्न प्रकार से हैं:-
उपरोक्त दोनों अपीलों में मुख्य आधार यह लिया गया है कि अपीलार्थीगण द्वारा शल्य क्रिया में कोई लापरवाही नहीं की गयी है। अपील सं0 1195/2014 में अपीलार्थी मुख्य चिकित्साधिकारी, मैनपुरी का यह कथन आया है कि उनके द्वारा न तो शल्य चिकित्सा की गयी और न ही अपीलार्थी की ओर से मुख्य चिकित्साधिकारी पर किसी प्रकार की लापरवाही किये जाने का कोई आक्षेप लगाया गया है अत: अपीलार्थी/मुख्य चिकित्साधिकारी का कोई उत्तरदायित्व उक्त दावेदारी के संबंध में नहीं बनता है। अपीलार्थी के उपरोक्त तर्क में बल प्रतीत होता है। परिवाद के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि मुख्य चिकित्साधिकारी, मैनपुरी पर व्यक्तिगत रूप से कोई लापरवाही करने का आक्षेप नहीं लगाया गया है। अत: मुख्य चिकित्साधिकारी पर उक्त नसबंदी के ऑपरेशन में क्षतिपूर्ति के संबंध में किसी उत्तरदायित्व का होना परिलक्षित नहीं होता है।
अपील सं0 1774/2014 में डॉक्टर सुनील कुमार अग्रवाल के द्वारा यह स्वीकार किया गया है कि उनके द्वारा मरीज की शल्य चिकित्सा में भाग लिया गया था किन्तु मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया है कि यह चिकित्सीय शल्य क्रिया मरीज को बिना किसी शुल्क के एवं निशुल्क दी गयी थी। अत: धारा 2(1) (0) उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अंतर्गत मरीज उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं आता है एवं मरीज एवं चिकित्सक के मध्य सेवा प्रदाता एवं उपभोक्ता के संबंध नहीं होते हैं। अत: अपीलार्थी के विरूद्ध क्षतिपूर्ति का यह परिवाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत पोषणीय नहीं है। उक्त तर्क के संबंध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय इंडियन मेडिकल एसोसिएशन प्रति वी0पी0 शांथा व अन्य X-1995(3) CPR PAGE 412 इस संबंध में उल्लेखनीय है। इस बिन्दु को निर्णीत करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्णय के प्रस्तर 42 में निष्कर्ष दिया गया है:-
Service rendered to a patient by a medical practitioner ( except where the doctor renders service free of charge to every patient or under a contract of personal service), by way of consultation, diagnosis and treatment, both medicinal and surgical, would fall within the ambit of 'service' as defined in Section 2 (1) (0) of the Act.
Service rendered at a Government hospital/health centre/dispensary where no charge whatsoever is made from any person availing the services and all patients (rich and poor) are given free service-is outside the purview of the expression 'service' as defined in Section 2 (1) (0) of the Act. The payment of a token amount for registration purpose only at the hospital/nursing home would not alter the position.
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से यह निष्कर्ष दिया गया है कि हॉस्पिटल में यदि निशुल्क सुविधा दी गयी है तो मरीज व चिकित्सक के मध्य उपभोक्ता एवं सेवा प्रदाता के संबंध स्थापित नहीं होती और चिकित्सक के विरूद्ध दावा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत पोषणीय नहीं होता है और माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस निर्णय में यह भी अंकित किया गया है कि सरकारी सेवक चिकित्सक वेतन प्राप्त करके सेवायें प्रदान करता है एवं ऐसी सरकारी संस्था में यदि निशुल्क उपचार किया जाता है तो मरीज उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं आयेगा। प्रस्तुत मामले में मुख्य चिकित्साधिकारी मैनपुरी पर एक ओर तो कोई आक्षेप लापरवाही अथवा चिकित्सीय चूक का नहीं लगाया गया है। दूसरी ओर अपीलार्थी मुख्य चिकित्साधिकारी एवं मरीज के मध्य उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत उपभोक्ता व सेवा प्रदाता की सेवा स्थापित नहीं होती है। अपीलार्थी डॉक्टर सुनील कुमार अग्रवाल के संबंध में भी माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित उपरोक्त निर्णय इंडियन मेडिकल एसोसिएशन प्रति वी0पी0 शांथा व अन्य X-1995(3) CPR PAGE 412 लागू होता है क्योंकि अपीलार्थी के अनुसार राजकीय चिकित्सालय प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में चिकित्सीय सेवा निशुल्क दी गयी है तथा इस कथन का प्रत्यर्थी/परिवादी की ओर से खण्डन नहीं किया गया है न ही परिवाद पत्र में चिकित्सीय सेवा में किसी प्रकार का शुल्क दिये जाने का कोई उल्लेख किया गया है। अत: अपील अपीलार्थीगण एवं मरीज के मध्य सेवा प्रदाता के संबंध नहीं माने जा सकते है और उपभोक्ता के रूप में मरीज के लाभार्थी परिवादी को इस तर्क से उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत अनुतोष प्रदान नहीं किया जा सकता है एवं वाद उपभोक्ता फोरम में पोषणीय नहीं है।
विद्धान जिला उपभोक्ता फोरम ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय को नजरअंदाज करते हुए अपीलार्थीगण के विरूद्ध बीमे के क्लेम का जो निर्णय पारित किया है, वह उचित प्रतीत नहीं होता है। अपीलार्थीगण अर्थात मुख्य परिवाद के विपक्षी सं 1 मुख्य चिकित्साधिकारी तथा विपक्षी सं0 3 डा0 एस0के0 अग्रवाल के विरूद्ध प्रश्नगत निर्णय खण्डित किया जाता है। अपील तदनुसार स्वीकार किये जाने योग्य है।
अपील सं0 1195/2014 के अपीलार्थी/विपक्षी सं0-1 चीफ मेडिकल आफिसर एवं अपील सं0 1774/2014 के अपीलार्थी/विपक्षी सं0-3 डा0 एस0के0 अग्रवाल के द्वारा प्रस्तुत अपीलें स्वीकार की जाती है तथा जिला उपभोक्ता आयोग, मैनपुरी द्वारा परिवाद सं0-87/2009 में पारित निर्णय/आदेश अपील सं0 1195/2014 के अपीलार्थी/विपक्षी सं0-1 चीफ मेडिकल आफिसर एवं अपील सं0 1774/2014 के अपीलार्थी/विपक्षी सं0-3 के विरूद्ध अपास्त किया जाता है।
इस निर्णय/आदेश की एक प्रमाणित प्रतिलिपि अपील सं0 1195/2014 की पत्रावली पर भी रखी जाये।
अपील में उभय पक्ष अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।
आशुलिपिक से अपेक्षा की जाती है कि वह इस निर्णय/आदेश को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दें।
(विकास सक्सेना) (डा0 आभा गुप्ता) सदस्य सदस्य संदीप, आशु0 कोर्ट नं0-3 [HON'BLE MR. Vikas Saxena] PRESIDING MEMBER [HON'BLE MRS. DR. ABHA GUPTA] MEMBER