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Lok Sabha Debates

Discussion On The Motion Of Thanks On The President’S Address Moved By Sh. ... on 20 February, 2006

> Title : Discussion on the Motion of Thanks on the President’s address moved by Sh. Madhusudan Mistry and seconded by Shri Jyotiraditya M. Scindia (Discussion not concluded).

 

MR. DEPUTY-SPEAKER: Now we will take up Item No.10.

 

SHRI MADHUSUDAN MISTRY I beg to move:

“That an Address be presented to the President in the following terms:-
 
‘That the Members of the Lok Sabha assembled in this Session are deeply grateful to the President for the Address which he has been pleased to deliver to both Houses of Parliament assembled together on February 16, 2006’.”   माननीय उपाध्यक्ष महोदय, संसद के दोनों सदनों को राष्ट्रपति जी द्वारा संबोधित करने पर मैं उनके प्रति आभार व्यक्त करता हूं। मैं उनके द्वारा दिए गए अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को मूव करने के लिए ख़ड़ा हुआ हूं। यदि राष्ट्रपति जी के अभिभाषण को पढ़ा जाए, तो उससे हमारी सरकार आने वाले दिनों में क्या करना चाहती है, उसकी क्या-क्या प्राथमिकताएं हैं और उसकी क्या स्ट्रैटजी रहेगी, ये सब बातें स्पष्ट होती हैं। हम इस देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं, राष्ट्रपति जी का अभिभाषण उस दिशा को दिखाता है।
महोदय, मैं कहना चाहता हूं कि जब से सत्र प्रारम्भ हुआ है, यानी पिछले सप्ताह के अंतिम दो दिनों में और आज भी मैं समझता हूं कि केवल दो मुद्दे उठाए गए। माननीय प्रतिपक्ष और एन.डी.ए. के दूसरे लोग, जो बहुत छोटे इश्यूज हैं या नॉन-इश्यूज हैं, उन्हें बहुत बड़े इश्यू बनाने में ही अपनी सारी शक्ति लगा रहे cé[rpm18]  ,मुझे इस बात का खेद है। राष्ट्रपति जी के अभिभाषण के अन्दर इस देश के अन्दर यू.पी.ए. की सरकार ने करोड़ों लोगों को काम देने वाला कानून पास किया, वह शायद इनको नजर नहीं आ रहा है। यह हिस्टोरिकल पीस ऑफ लेजिस्लेशन है। पूरे देश की नजर इस कानून के ऊपर लगी हुई है कि हम किस तरह उस पर अमल करवा रहे हैं।
        मैं मानता हूं कि शायद अब देश के अन्दर इस कानून के बाद जो इस देश के २०० जिलों के अन्दर रहने वाले जो गांवों के लोग हैं, जो जब भी काम मांगेगा, तब उनको काम मिलेगा और शायद इससे ऐसी परिस्थिति पैदा होगी कि अब इस देश में कोई मौत भूख से नहीं होगी। लोगों के पास पैसे आएंगे, उनकी परचेजिंग पावर बढ़ेगी, रूरल इकोनोमी बढ़ेगी। मुझे यह कहते हुए खेद है कि जब यह कानून यहां पास हो रहा था तो सामने से ऐसी दलीलें दी जा रही थीं कि इसके लिए पैसा कहां से आयेगा, यह कानून कहां-कहां लागू होगा, सरकार इसको लागू करवा सकेगी या नहीं। लेकिन यू.पी.ए. की सरकार कटिबद्ध थी और है। यह कानून पास हुआ और इस बार २०० जिलों के अन्दर लागू हो रहा है। शायद इस साल के अन्दर और २०० जिले इसके अन्दर एड किए जाएंगे। मुझे इनको याद दिलाते हुए भी खुशी हो रही है कि इसी हाउस के अन्दर वित्त मंत्री और दूसरे मंत्री ने कहा था कि इस योजना में कभी भी पैसे की कमी महसूस नहीं होने दी जायेगी। यह केन्द्र का ऐसा कानून है जिसमें राज्य सरकारें अपने आप स्कीमें बनाएंगी। इस कानून को इम्प्लीमेंट कराने के लिए राज्य सरकारों में अपने आपमें जो एक एन्थ्यूसियाज्म होना चाहिए, वह कम दिखाई दिया है, वह भी जहां एन.डी.ए. और उनकी सहयोगी सरकारें हैं। वहां शायद इस कानून को वे बहुत दिलचस्पी से लागू करना नहीं चाहतीं, ऐसी मेरा इम्प्रेशन है।
मैं जिस राज्य से आता हूं, उस राज्य के अन्दर केन्द्र के रूरल डैवलपमेंट डिपार्टमेंट के बार-बार कहने के बावजूद सिर्फ एक हफ्ते पहले इसकी तैयारियां की गई थीं और जिस तरह से मेरे राज्य के अन्दर राज्य सरकार का एक ऐसा अभिगम रहा है, एक एटीटयूड रहा है, शायद वैसा ही एटीटयूड राजस्थान, मध्य प्रदेश और जहां पर एन.डी.ए. पार्टनरों की सरकारें हैं, वहां पर उनको डर लगता है कि एम्पलायमेंट गारण्टी एक्ट लागू करने की केन्द्र सरकार की जो योजना है, इसके कारण सारा का सारा यश या सारा का सारा श्रेय केन्द्र सरकार को जाएगा। इससे शायद आने वाले चुनावों में उनको खतरा हो सकता है, ऐसा मानकर वे सरकारें इसको बहुत सुरुचि से लागू करना नहीं चाहतीं, ऐसा मेरा इम्प्रैशन है।
मैं यह कहना चाहता हूं कि इस हाउस के अन्दर अगर ऐसा हुआ तो यह सबसे बड़ी लोगों के प्रति कुसेवा होगी। इसको जान-बूझकर कैसे कम से कम लागू किया जाये, ऐसा एटीटयूड जो दिखाई दे रहा है, उसको मैं डिप्लोर करना चाहता हूं और माननीय प्रतिपक्ष से कहना चाहता हूं कि इसके अन्दर राजकीय बात को एक बाजू में रखकर इस देश के करोड़ों लोग, जो काम करना चाहते हैं, जो राज्य सरकारों को केन्द्र सरकार ने पैसा भेज दिया है, उसको दिल से लागू करवाया जाये और लोगों को काम दिया जाये, गांवों के अन्दर पैसे जायें, जिससे देश के गरीब लोगों की परचेजिंग पावर बढ़े, और उससे उनकी नीड्स पूरी हों।
यूपीए सरकार ने राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में कहा है कि यह सरकार गरीब, शैडयूल्ड कास्ट्स, शैडयूल्ड ट्राइब्स, ओबीसी, माइनॉरिटीज़ और वीकर सैक्शन की औरतों और बच्चों की वेल्फेयर के लिए कमिटेड है। इसमें वह किसी भी जाति के प्रति कम्प्रोमाइज़ नहीं करना चाहती। मैं यह बात बार-बार याद दिलाना चाहता हूं क्योंकि हमारे सामने वाले दोस्त चाहते हैं कि इन मुद्दों से किसी तरह देश का ध्यान हटे और दूसरे मुद्दों पर ध्यान जाए। यह दो-तीन दिनों से उनका प्रयत्न दिखाई दे रहा है। मैं इन्हें बताना चाहता हूं कि यह सरकार एससी, एसटी, ओबीसी और आदिवासियों के वेल्फेयर के प्रति कमिटेड है। जब एससी, एसटी के लोगों के लिए नौकरियों में जगह या इम्प्लॉयमैंट पोटैंशियल कम हो रहा है, तब उसे किस तरह प्राइवेट सैक्टर में लागू किया जाए, इंडस्ट्रीज़ में लागू किया जाए, यह सरकार उसके लिए सभी प्रयत्न कर रही है।
एससी, एसटी के पूरे तबके में करीब ८ प्रतिशत शैडयूल्ड ट्राइब्स और १६ प्रतिशत से ज्यादा शैडयूल्ड कास्ट्स के लोग हैं। इसके अलावा दूसरा गरीब तबका ओबीसी का है, जिनके पास जमीन नहीं है। उनको सिर्फ काम से मुख्य आय मिलती है। उन्हें ज्यादा से ज्यादा काम मिले, सरकार की अभी तक ऐसी नीति रही है और आगे भी रहेगी।
इस सरकार ने बहुत बड़ा टाइम बाउंड प्रोग्राम हाथ में लिया है जिसका नाम भारत निर्माण दिया गया है। हर गांव में टेलीफोन की व्यवस्था, सड़क की व्यवस्था, बिजली की व्यवस्था हो, हर गांव में जो लोग रहते हैं, उन्हें मकान मिले, काम मिले, भारत निर्माण का यही ध्येय है। आने वाले समय में सरकार एक लाख ७४ हजार करोड़ से भी ज्यादा रुपया इसमें खर्च करना चाहती है। मैं आउटलाइन करना चाहता हूं कि इसमें स्ट्रेटजी यह है कि गांवों को पूरा रीजनरेट किया जाए, जहां से उसकी शक्ति रिलीज़ हो, जो देश में ज्यादा से ज्यादा काम पैदा करे, पैसा पैदा करे, वैल्थ पैदा करे और इस देश के जो गांव अभी तक नैगलैक्ट हुए थे, उन्हें सबसे ज्यादा अग्रिमता यूपीए सरकार ने राष्ट्रपति के अभिभाषण द्वारा दी है।
जब प्रतिपक्ष के सदस्य इस तरफ थे, तब इंडिया शाइनिंग की बात चली थी। हमने भी कहा था और कहते हैं - Yes, India is now shining but shining for all. गांवों में जो करोड़ों लोग रहते हैं, उन्हें अच्छी से अच्छी सुविधा मुहैया कराई जाए, उनकी इम्प्लॉयमैंट पोटैंशियल बढ़ाई जाए, गांव का इन्फ्रास्ट्रक्टर बढ़े जिससे उन्हें ज्यादा से ज्यादा सहूलियत हो और इस देश में उनकी सबसे ज्यादा तरक्की हो।
        भारत निर्माण कार्यक्रम में इस देश में जो अर्बनाइजेशन हो रहा है, सरकार ने उसकी तरफ भी ध्यान दिया है। उसके बारे में भी राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में कहा गया है। इस देश में कितने राज्य ऐसे हैं जिनके करीब ३४ से ३५ प्रतिशत लोग शहरों में रह रहे हैं। आज शहरों में सबसे बड़ी समस्या रहने की पैदा हो रही है, बेसिक सर्विसेज, बेसिक एमीनिटीज़, इन्फ्रास्ट्रक्चर की समस्या है और अगर अर्बन रेट ऑफ ग्रोथ इसी तरह बढ़ता रहा तो इस देश के शहरों में बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है।
यूपीए सरकार ने अर्बन रिनुवल मिशन द्वारा ६५ से भी ज्यादा शहरों में, बढ़ती हुई आबादी को ध्यान में रखते हुए, अर्बन इन्फ्रास्ट्रक्चर अच्छे से अच्छा बने और रोड और ट्रांसपोर्ट की सुविधा अच्छी हो[R19] । शहरों में जो गरीब बस्तियां हैं, उन बस्तियों में पानी मिले, बिजली मिले, आरोग्य और ट्रांसपोर्ट की सुविधाएं मिले, इसी उद्देश्य से अर्बन रिन्युअल मिशन शुरू किया गया है। इसके तहत राज्य सरकारों को उन शहरों के लिए पैसा आवंटित किया जा रहा है। इस देश में कई ऐसे शहर हैं जहां ६५ से ७० प्रतिशत लोग झुग्गी-झोंपड़ियों में रह रहे हैं। यह हमारे लिए बहुत बड़ा चैलेंज है। बहुत बड़े पैमाने पर लोगों को दस बाय दस जगह भी नहींमिलती।, ऐसा भी दिखाई देता है कि करोड़ों लोग फुटपाथों पर रह रहे हैं। मेरी सरकार से दरख्वास्त है कि बड़े-बड़े शहरों के आजू-बाजू की जमीन ली जायें और झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाले लोगों को उस जमीन का मालिकाना हक दिया जाये। रूरल एरियाज में इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत जिन लोगों के पास जमीन नहीं है, जो एग्रीकल्चर लेबर्स हैं, उऩको रहने के लिए मुफ्त में प्लाट दिया जाता है। मैं यूपीए सरकार से मांग करना चाहता हूं कि इस देश में झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाले लोगों की जो समस्याएं हैं, उन समस्याओं को सुलझाने के लिए सरकार शहरों के आजू-बाजू की जमीन को एक्वायर करके या खरीदकर, करोड़ों लोग जो झुग्गी-झोंपड़ियों में रहते हैं, उनको रहने के लिए जगह मुहैया कराई जाये।
आज शहरों में जिंदगी बहुत बदतर है। यहां आदमी मर जाता है लेकिन वह जिस मकान में रहता है, उस मकान की जमीन उसकी खुद की नहीं होती। जो लोग जमीन में रह रहे है, उनकी लाइफ बिल्कुल अनसर्टेन होती है। अगर एक बार किसी को शहर में रहने का हक मिलता है तो वह उस जमीन पर मकान बनाना चाहेगा। उसके लिए उसे बैंक से लोन भी मिल जायेगा जिससे वह मकान अच्छी सहूलियतें वाला बनवा सके। इससे शहरों की क्वालिटी ऑफ लाइफ इम्प्रूव होगी।
        मैं कहना चाहता हूं कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में पूरी स्ट्रेटेजी है। एक तरफ इम्प्लायमैंट पोटेंशियल बनाओ, जिसकी वजह से करोड़ों लोगों को काम मिले और दूसरी तरफ गांव में इन्फ्रास्ट्रक्चर दो, जिससे गांव के लोग अपने आप काम करना शुरू करें। इससे शहरों की जो क्वालिटी ऑफ लाइफ है, उनका इन्फ्रास्ट्रक्चर है, वह इम्प्रूव होगा जिससे पूरे देश के शहरों में रहने वाले लोगों की जिंदगी अच्छी बन सकेगी।
राष्ट्रपति महोदय ने अपने अभिभाषण में बहुत सारे मुद्दे टच किये हैं। मैं उनके बारे में कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि मेरे बाकी साथी उस पर बोलेंगे। राष्ट्रपति महोदय ने अपने अभिभाषण में वूमैन और चिल्ड्रन, जम्मू कश्मीर, नार्थ ईस्ट में डेवलपमैंट के कामों का उल्लेख किया गया है। नैशनल रूरल हैल्थ मिशन, अनआर्गेनाइज्ड सैक्टर, रूरल डेवलपमैंट, फूड एंड न्यूट्रीशियन, एजुकेशन आदि सभी मुद्दों को राष्ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में कवर किया है। उस पर उन्होंने सरकार का नजरिया रखा है। उन सभी बातों को मेरे साथी उजागर करेंगे।
मैं एक बात और कहना चाहता हूं कि इस सरकार ने बहुत से हिस्टोरिकल काम किये हैं। भाई-बहन, दोनों का प्रापर्टी में समान अधिकार हो, यानी औरत का भी उतना ही अधिकार है जितना भाई का है, ऐसा लेजिस्लेशन यहां से पास हुआ है। सालों से इस देश की सविल सोसायटी वाले लोग राइट टू इन्फोर्मेशन की बात कर रहे थे। वह एक्ट इस सरकार ने पास किया है। मुझे यह बताते हुए खेद है कि छत्तीसगढ़ की सरकार या किसी दूसरी सरकार ने ऐसा कानून पास किया है जिसमें वह अनलॉफुल एक्टिविटी के तहत किसी भी संस्था को डिक्लेयर कर सकते हैं कि यह अनलॉफुल काम कर रही है। इसके तहत वह उसकी पूरी प्रापर्टी जब्त कर सकते हैं[r20] ।
             सर, यह फ्रीडम ऑफ स्पीच है, फ्रीडम ऑफ एक्सप्रैशन है और राइट टू ऑरगेनाइज है। उसके ऊपर फंडामेंटल राइट्स हैं। उसके ऊपर एक और राइट मिल रहा है लेकिन राइट टू इंफॉर्मेशन के अंदर भी कितनी राज्य सरकारें किस तरह से इस पर अमल कम से कम हो, कम से कम इंफॉर्मेशन कैसे लोगों को दी जाए, ऐसा रुख अपना रही है। यह डॉयक्टॉमी है। केन्द्र सरकार ने जितने भी कानून बनाए हैं, वे अपने आप में एतिहासिक और प्रोग्रेसिव कानून हैं लेकिन इन पर अमल राज्य सरकारों को जिस रूप से करवाना चाहिए, उसमें बहुत बड़ा गैप मुझे दिखाई देता है जिसकी वजह से यह एतिहासिक कानून है जिसके अंदर देश के हरेक नागरिक को राइट टू इंफॉर्मेशन दिया गया है कि वह अपने देश की सरकार को एकाउंटेबल बना सकता है। लेकिन ऐसे कानून पर कम से कम इम्पलीमेंटेशन कैसे हो, इस तरह का रुख पिछली राज्य सरकारों ने अपनाया है। मुझे कहने में कुछ हिचकिचाहट नहीं है कि एनडीए की सरकारें जहां-जहां हैं, वहां ऐसा रुख मुझे दिखाई देता है।
यहां बहुत बड़ा हल्लागुल्ला उस दिन सेना के अंदर माइनॉरिटी के बारे में हुआ। माइनॉरिटीज इस देश के नागरिक हैं। इस देश के हरेक नागरिक का एक साथ विकास हो, सबका अच्छी तरह से विकास हो, कोई एक सैक्शन ऑफ सोसाइटी लिम्प न करे और कोई एक सैक्शन ऑफ सोसाइटी बहुत आगे न चला जाए ऐसा अगर लिम्िंपग डैवलपमेंट होगा तो यह देश कभी तरक्की नहीं कर सकता।
मैं यहां याद दिलाना चाहता हूं कि हमारी ऐसी कमनसीबी है कि सामने से हमें कहा जाता है कि आप माइनॉरिटीज का अपीजमेंट करते हैं, वहां से कहा जाता है कि आप ईरान के विरुद्ध वोट दे रहे हैं। दोनों चीज पर वे बोल रहे हैं कि आप बहुत ज्यादा माइनॉरिटीज को आगे कर रहे हैं। अगर कर रहे होते तो यहां ऐसी परिस्थिति कैसे पैदा होती? ये दोनों बातें एक-दूसरे के विरुद्ध जा रही हैं। मैं कहना चाहता हूं कि इस देश की सरकार ने आज तक जो भी निर्णय किये, मैं रिपीट करना चाहता हं कि इस देश की सरकार ने जो निर्णय किये, कानून पास किये, उसके अंदर नेशनल इंटरेस्ट के सिवाए दूसरा कुछ नहीं देखा है। अगर उसमें नेशनल इंटरेस्ट नहीं दिखाई देता है तो आप बताइए कि क्या माइनॉरिटीज देश के सिटीजन्स नहीं हैं। आप उसमें देख लीजिए कि एक डॉटा लेने के खिलाफ जैसे पूरा संसद खड़ा हो जाए, एक इंफॉर्मेशन मांगने के लिए। मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि कल इस देश के वीमन्स ग्रुप खड़े होंगे और वे कहेंगे कि सेना के अंदर कितनी औरतें हैं, उसका डॉटा दीजिए तो आप मना करेंगे। क्या औरतें सेना में नहीं जानी चाहिए ? क्या हम उन्हें ईक्विलिटी के तहत नहीं ले जाएंगे ?  माइनॉरिटीज की बात आने के बाद एकदम से सामने से पूरा रुख बदल जाता है। मैं इन्हें जानता हूं। इनके पास माइनॉरिटीज के अलावा वोट लेने के लिए दूसरा कोई एजेंडा नहीं है। सिर्फ फीलिंग्स एसपाउज करो। जर्मनी में जो टैक्नीक अपनाई गई, जर्मनी के अंदर हिटलर ने जिस तरह का अभियान चलाया था कि Minority is the only evil of all the causes. इसी तरह की परिस्थिति सामने वाला जो प्रतिपक्ष है, वह पैदा कर रहा है।…( व्यवधान) 
श्री खारबेल स्वाईं (बालासोर) : जो कमांडर-इन-चीफ…( व्यवधान) 
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please sit down.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Not to be recorded.
(Interruptions) … * SHRI MADHUSUDAN MISTRY  : When I am not yielding, they why is he speaking?
MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Swainji, that is not going to be recorded.  आपकी बात रिकार्ड में नहीं जा रही है।
… (Interruptions)
SHRI MADHUSUDAN MISTRY : Sir, I am not yielding .… (Interruptions)
उपाध्यक्ष महोदय: आपकी बात रिकार्ड में नहीं जा रही है। You are speaking without my permission. That is not going to be recorded.
(Interruptions) …* SHRI MADHUSUDAN MISTRY : I am not yielding.  I am not supposed to answer him.… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please sit down. जब आपकी बारी आएगी तब आप ब्ाोलिएगा[R21] ।
श्री मधुसूदन मिस्त्री : कोई भी बात हो, इनके पास दूसरा कोई एजेंडा नहीं है। ये हर समय माइनोरिटी की ही बात करते रहते हैं। अभी हाल ही में गुजरात के अंदर डांग में एक बहुत बड़ा मेला लगाया गया। ये बोलते हैं कि कंवर्शन हो रहा है, उन्हें भी कंवर्ट करो। डांग के अंदर उस मेले के लिए स्पेशल झाड़ काटे गए और यह सब गुजरात सरकार के प्रैटोनाइज के अंदर हुआ। इनके पास विकास का एजेंडा सिर्फ प्रैस के सामने दिखाने के लिए है। इनका हिडन एजेंडा हमेशा माइनोरिटीज के खिलाफ रहा है। मेरा इन पर चार्ज है कि ये बताएं कि गुजरात में जो दो हजार लोग, खासकर माइनोरिटी के लोग मारे गए थे, क्या इनमें से कोई आज तक उनके कैम्प में औरतों के आंसू पोंछने के लिए गया है? मेरा इन पर यह चार्ज है और मैं जानता हूं कि इनके पास इसका कोई जवाब नहीं है। इनके द्वारा शासित राज्यों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ, वेलेंटाइंस डे के खिलाफ आंदोलन होते हैं और विरोधी रुख अख्तियार किया जाता है। इस देश की प्रजा बहुत सयानी है, वह सब जानती है इसलिए इससे आपको वोट नहीं मिलेंगे।
मैं जानता हूं आप यहां से वहां गए हैं, वह आपको रास नहीं आ रहा है। मैं तो यही कहना चाहता हूं कि आप वहीं रहेंगे, इधर आने वाले नहीं हैं,क्योंकि आपका रोल तय हो चुका है।…( व्यवधान) 
 
* Not Recorded.
MR. DEPUTY-SPEAKER:   Shri Madhusudan Mistry, you are requested to address the Chair and not the individual Members.
SHRI MADHUSUDAN MISTRY : Sir, I am addressing you.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please proceed.
श्री मधुसूदन मिस्त्री : क्या करूं मेरी आंख कभी-कभी उस तरफ चली जाती है और इनसे लड़ जाती है। मैं फिर कहना चाहता हूं कि इस सरकार के पास अगर गाइडिंग कोई फोर्स है तो वह नेशनल इंटरेस्ट की फोर्स है। उसे लेकर हम सारे काम करना चाहते हैं, भले ही ये छोटे-मोटे इश्यूज को बड़ा बनाते रहें, लेकिन इस देश की जनता सब जानती है। यूपीए सरकार का जो यश है, जो उसके काम है, उसका एडमायरेशन उसे हमेशा मिलता रहेगा।
मैं ज्यादा समय नहीं लेना चाहता हूं। वैसे मुद्दे तो बहुत से हैं, लेकिन मैं अपने साथियों के लिए उन्हें छोड़ रहा हूं। मेरे साथी जब बोलेंगे तो उन मुद्दों का जिक्र करेंगे।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं राष्ट्रपति जी द्वारा दिए गए अभिभाषण पर धन्यवाद का प्रस्ताव मूव करता हूं।
MR.DEPUTY-SPEAKER: Now, I would request Shri Jyotiraditya M. Scindia to second  the Motion. You have to second the Motion.
SHRI  JYOTIRADITYA M. SCINDIA At the outset, I would like to thank you, Mr. Deputy-Speaker, Sir, for giving me this opportunity.
            I rise in favour of seconding the Motion of Thanks on the President’s Address. We thank the President for delivering a visionary and inspiring Address. The country today is aware of how the President, year after year, is pushing us forward to push new frontiers, to break new barriers, to move faster and to raise the quality of growth in our country. I am sure that when our Government completes its full term, Mr. Deputy-Speaker, Sir, we would have moved very rapidly towards accomplishing those goals.… (Interruptions)
            The policy Statement as reflected in the mandate of the President’s Address is a mandate that has been received by the Congress-led coalition. We are a welfare State where we cannot abdicate our responsibility towards the weaker sections. Our focus, therefore, is on the farmers, on the under-privileged, on the physically-handicapped, on the workers, on the women and children and on the marginalised people in our country. This reaffirms our slogan to be on the side of the common man, the teeming millions that constitute the rural India.
            India today is moving very rapidly in place of taking its rightful place in the Comity of Nations. Over the last two years, the sensex has risen by over 80 per cent but India’s stock in the global fora has risen manifold. The spotlight is on us. We are the cynosure of all eyes and that is because India today is seen as a country of numerous opportunities and no longer perceived as a country of myriad problems[R22] .
This was also very evident in the recently held World Economic Forum in Davos where the consistent byline was ‘India everywhere’.  But the world is taking note of India today because we have consistently given and delivered high growth –  greater than 7 per cent.  What matters is not necessarily only a blip of high growth, whether it is in a quarter or in a particular year, but what matters is we have to discover the magic of compounding.  I want to give you an example, Mr. Deputy-Speaker, Sir. 
The US, which today is a world economic super power, over the last hundred years has grown only at 3 per cent.  But it has compounded that growth which is why today it is an economic super power. The task of sustaining high growth is difficult and this is an example which my friends in the NDA know very well. Of the last six Budgets that they presented, almost all of them resulted in low growth.  The NDA record is not one that any person in this country can be proud of.  Agriculture grew at only 2.1 per cent, industry at only 5.4 per cent and GDP only at 5.5 per cent. There are only two periods in the country when GDP growth rate has been greater than 7 per cent on a sustainable basis and both periods were under Congress Governments.  The first was from 1988 to 1991, under the stewardship of Shri Rajiv Gandhiji.  The second was from 1994 to 1997, when we delivered 7-½ per cent GDP growth under the able stewardship of both Dr. Manmohan Singh and Shri Chidambaram, who were Finance Ministers at that point of time.  Therefore, the dream team has done it again.  The growth, this time around, which is very reassuring, has been on the basis of high manufacturing rates.  Normally, when there is an agricultural slowdown, it affects manufacturing not only in that year but in the next year as well.  Therefore, this is evident that today the Indian economy has drought-proofed itself.  Investment rates have grown by 500 basis points to almost 31 per cent.  Savings rates have reached a new record of 29 per cent.  Therefore, we are on the cusp of a new paradigm of growth, a cusp of growth that is fuelled by high investment rates and high savings rates.  Therefore, the UPA Government has made the Indian economy more confident, more resilient and more strident.  It is an economy that is confident, resilient and strident based on fundamentals and not a Mayajaal, not an illusion. But acceleration of growth is only a part of the story.  What is important, which this Government is trying to do, is to make this growth more inclusive, to make sure that it reaches every part of our country. Under the NDA Government, the country witnessed and had to go through two huge gross inequities.  The first, that growth was limited only to the high crust of society, and second, that you saw regional inequalities were on the rise. The UPA Government today is putting in place a slew of policies that will redress these imbalances.  We require growth, but growth that takes everyone along.  The centrality of focus is on the aam aadmi and, therefore, there are five pillars that buttress the centrality.  The first is the right to employment, which is guaranteed through the National Rural Employment Guarantee Act.  This re-affirms the Congress’ understanding that India will only shine when the dignity of every human being is present, and dignity is connected directly to work and employment.  Jobless growth is the major issue today.  उपाध्यक्ष महोदय, रोजगार और प्रगति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।एक के बिना दूसरा इस देश में और इस सरकार के बिना नहीं चल सकता है। A historical programme is in place today, one that is directed at instilling self-pride and confidence in the ordinary Indian, breaking the shackles of exploitation and of poverty.   This is a programme, Mr. Deputy-Speaker, Sir, that will not only result in greater employment but will also create sustainable durable assets[a23] .  
I [r24] have no qualms in saying that the single credit for this programme, for this Yojana, goes to none other than Sonia Gandhi Ji, who had conceptualised it and made sure that it has been executed.  This programme is one of the most significant legislations since Independence. It is a programme, that if it succeeds, it can bridge the gap between political equality and economic equality.
            The second pillar is the right to education, which is guaranteed through the Sarva Shiksha Abhiyan and the Mid-day Meal Scheme, which covers over 12 crore children.  Education is a fundamental promise and through our increased allocations in education, we are hopeful that we would be able to secure a brighter tomorrow for the children of the future.
            The third pillar is the opportunity to a better quality of life, that is guaranteed through the Bharat Nirman Programme and the Jawaharlal Nehru Urban Renewal Mission, which covers 63 cities.  This is the first time in the history of the country that a visionary approach with bold and very clear cut targets for 2009 have been set out. This is the first time that the Panchayati Raj Institutions have been involved in this programme to translate Rajiv Gandhi’s dream of grassroot empowerment to the people. 
            There are six facets to this programme.  The first is the irrigation, bringing one crore hectares of land under irrigation through Accelerated Irrigation Benefit Programme, through the Restoration of Water Bodies Programme and the National Rainfed Area Authority. 
The second aspect of this policy is connectivity for ensuring that every village of a thousand population has a road, making sure that Rs. 1,75,000 crore is devoted to the National Highways Programme, Rs. 20,000 crore to two new rail freight corridors, ensuring that Bangalore and Mumbai get metros, insuring that a new Civil Aviation Policy comes into place.
            The third aspect of this policy is for ensuring drinking water to 74,000 habitation, electrification  to  1.26 lakh villages that are still non-electrified.  This is through the Rajiv Gandhi Gram Vidyutikaran Yojana.  इसमें केवल ट्रांसमिशन का सवाल नहीं है, यह सरकार किसानों के खेतों और गरीब के घरों तक बिजली डिस्ट्रीब्यूशन के साथ पहुंचाएगी - ऐसा इस सरकार का विश्वास है। Provision of telecom connectivity to the remaining 68,000 villages; and opportunity of better health care through the National Rural Health Mission with a budget allocation of Rs.8,420 crore, that will take our primary health centres and community health centres upgrade them and provide quality medical attention according to local needs.
            The UPA Government has accorded the highest priority to the rural areas and to the farmers.  There have been reductions in the Central Plan Outlay in the past  during NDA Government, for rural development, irrigation and  agriculture  close to 36 per cent.  Public investment in agriculture has declined from 33 per cent to close to about 24 per cent in 2004.  This has led to a widening of the gap between the urban and the rural areas. Sixty per cent of population gets sustenance from agriculture.  Twenty-three per cent of our GDP comes from agriculture, yet public and private investment are close to only 1.3 per cent of the GDP.  The country needs a third Green Revolution and this third Green Revolution has been thought of and executed by the UPA Government with five bold steps. 
Rural credit has already been increased from Rs. 80,000 crore to Rs.135,000 crore, namely, sixty per cent in two years.  A National Horticulture Mission has been put in place with Rs.2,300 crore that will give value addition to the farmers.  A common market for agriculture produce has been thought of by bringing reforms in the Essential Commodities Act and the Agriculture Produce Marketing Act, which would transform the lives of the rural farmers; crop insurance through the National Agriculture Insurance Scheme of Rs.14,000 crore package for the cooperative sector.  This will unleash millions of jobs in the rural sector.
 It was late Indira Gandhi Ji that came up with the Green Revolution.  We could hold our heads high in the World stage because of that Green Revolution and because of the sweat and toil of our Annadata in our Khets.  Rajivji took that forward with a Technological Mission, that resulted, in 1989, the highest agricultural growth in the history of India at 16.3 per cent resulting in GDP growth  of close to ten-and-a-half per cent[r25] .
Therefore, Mr. Deputy-Speaker, Sir, the farm sector is critical to our growth.  No less daunting is the problem of implementation.  Today, if we introspect and see as to what is the problem that is facing our country, it is the problem of execution, it is the problem of implementation.  The previous Government announced numerous schemes but did precious little to ensure that they reach those whom they were intended to benefit. Therefore, we have attacked this problem frontally.
            Talking about the issue of outcomes versus outlays, our Prime Minister Dr. Manmohan Singh has developed a policy whereby we will reform the delivery mechanism, and reform the delivery process.  The President in his Address has talked about not only the economic reforms but also reforms of the administrative system, reform of the judicial system and reform of the electoral system.  This, along with the Right to Information Act, will transform and make our Government much more transparent and much more accountable.  This is the first time that any Government has looked at reshaping the instrument of change and reforming the delivery system.  If India wants to march ahead and get its place in the comity of nations, then we must bring the change from within.  The Prime Minister has put in place those building blocks of change.  The inequality that marks our society today cannot be removed from economic measures alone; we need social cohesiveness, social integration; we need to end all forms of social divisiveness, social discrimination or religious discrimination. 
Mr. Deputy-Speaker, Sir, 50 per cent of our country is made up of women.  We need to involve women in our society and in our economy.  We will only be able to do that if we educate our women, if we empower our women and if we imbue them with skills and the confidence that they can lead a self-reliant life.  We know from our experience that when women are empowered, they have the ability to transform society and transform the destiny of our country. We may look at the example of Annie Besant; we may look at the example of Sarojini Naidu; we may look at the example of Indiraji, or we may even look at our today’s example of Sonia Gandhiji.  There have been policies that have been put in place to make sure that we empower women, whether we look at the creation of a new Ministry of Women and Child Welfare which is also being administered by a lady, whether we look at the fact that the Hindu Succession Act has been changed to ensure that women get greater and fuller rights of inheritance of ancestral properties.  We thought of creating more than a thousand Kasturba Gandhi Balika Vidyalayas in educationally backward districts for women. The fact is that our Party and our Government is still committed to 33 per cent reservation for women in Parliament and in the State Legislatures.  A Bill has been passed historically  for protection of women from domestic violence.  A Bill is under consideration  for prevention of sexual harassment and registration of marriages. Therefore, Mr. Deputy-Speaker, Sir, our Government is committed to the cause of women and bringing them to participate in the society.
In addition, the Government is also committed to ensure that the Scheduled Castes, Scheduled Tribes, Backward Classes and minorities also form a part of our growth story.  Therefore, it is imperative that each Indian feels as much stakeholder in the process to transfer our dream of an enlightened and empowered India.  Look at the steps that we have taken.  We have created a new Ministry of Minority Affairs.  The historical Constitutional amendment was passed in the last Session where minorities, SCs, STs as well as backwards were given reservation in privately-aided educational institutions. There is a 15-Point Programme for minorities to empower them to increase their social development and to even fund them on entrepreneurship programmes.  The Bill for prevention of communal violence will also take care of the rehabilitation of those victims.  Let us contrast this, Mr. Deputy-Speaker, Sir, with the track record of the past NDA Government.  During that period, minorities were subjected to violence and to killings. In the NDA Government there was a concerted programme to ensure that they were treated as second-class citizens. The steps taken to accelerate our economic progress and to include every Indian in our vision will result in transforming this country into a socially cohesive, economic powerhouse in the world. The reality is that it is not ‘India shining’, it is not ‘feel good’, it is ‘India awakening’.  The NDA Government by emphasising the ‘India shining’ slogan played an ironic joke on the poor, deprived and indebted people.[r26]   . 
            The UPA Government, Mr. Deputy-Speaker, Sir, stands here today to right those wrongs, to redefine those priorities of growth and to lead India once again into a proud and determined future.
            Mr. Deputy-Speaker, Sir, Jawaharlal Nehruji used to keep a flag on his desk, which had engraved on it, etched on it the words of Robert Frost, and I take your permission to quote that.
“The woods are lovely, dark and deep.
 But I have promises to keep,  and miles to go before I sleep, and miles to go before I sleep. ”               This, Mr. Deputy-Speaker, Sir, is exactly the President’s mandate. Our pledge to the people is that we must be tireless in our efforts, committed in our resolve, unflinching in our aim and steadfast in our purpose. We should ensure that the India of our dreams come alive, her brightness and warmth radiates to the last hutment of every village. We must wipe every tear from every eye. That is our goal.
            The mandate that this Government has been given is not different from what the world community expects from us. It is a mandate for economic growth but economic growth along with equity. It is a mandate for social harmony, our slogan of Unity in Diversity. It is a mandate for our age-old lesson that we give the world, a lesson of  वसुधैव कुटुम्बकम.  It is a mandate for communal harmony and peace. These are the solutions that the entire world is looking for today and these are the values and the principles that this country has espoused for thousands of years. It is a mandate for empowering every Indian, and when every Indian is on the move, this country will take its rightful place in the world stage.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Motion moved:
“That an Address be presented to the President in the following terms:--
       
 ‘That the Members of the Lok Sabha assembled in this Session are deeply grateful to the President for the Address which he has been pleased to deliver to both Houses of Parliament assembled together on February 16, 2006’.”   Before I would request the next hon. Member, I would like to make an announcement.
            Hon. Members whose amendments to the Motion of Thanks have been circulated may, if they desire to move their amendments, send slips to the Table within 15 minutes indicating the serial numbers of the amendments they would like to move. Those amendments will only be treated as moved.
A list showing the serial numbers of amendments treated as moved will be put up on the notice boards shortly thereafter. In case any Member finds any discrepancy in the list, he may kindly bring it to the notice of the Officer at the Table immediately.
            Now, I would request Prof. Vijay Kumar Malhotra to speak.
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा उपाध्यक्ष महोदय, राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर अभी यहां धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। राष्ट्रपति जी का अभिभाषण राष्ट्रपति जी का अपना लिखा हुआ नहीं होता, वह अभिभाषण मंत्रिमंडल तैयार करता है, इसलिए उसकी आलोचना करने पर राष्ट्रपति जी की व्यक्तिगत आलोचना का प्रश्न नहीं उठता। राष्ट्रपति जी का अभिभाषण पूरी तरह से मिथ्या दावों और खोखले वायदों से भरपूर था। वह अभिभाषण कलरलैस, टेस्टलैस, ओडोरलैस तथा इतना उबाऊ भाषण था कि मंत्रिमंडल को वहां अपनी उपलब्धियां भी प्रस्तुत करने का अवसर ठीक प्रकार से प्राप्त नहीं हुआ। पिछले एक वर्ष में इस सरकार ने इतने कुकृत्य किये हैं, इतनी भयंकर भूलें की है, इतने अपराधपूर्ण कार्य किये हैं, देश के हितों पर इतने कुठाराघात किये हैं और कितनी बार संविधान की धज्जियां उड़ाई हैं कि यदि मैं उन सबका ब्यौरा प्रस्तुत करूं तो उसके लिए बहुत समय चाहिए।
First, I charge this Government with jeopardizing the country’s defence. Second, I charge this Government with weakening national security. I charge this Government with willfully wrecking social harmony. I charge this Government with subverting the secular character of our educational system. I charge this Government with destroying probity in administration and in public life[m27] . 
15.00 [R28]  hrs. “… I charge this Government with increasing unemployment.  I charge this Government with causing untold suffering to our kisans and to our khet mazdoors. I charge this Government with denigrating key institutions of parliamentary democracy.  Finally, Mr. Speaker, Sir, I charge this Government with blatantly undermining the independence of our foreign policy.   Our indictment is comprehensive, just as their failures are complete. ”                उपाध्यक्ष जी, ये मेरे शब्द नहीं हैं, जब श्रीमती सोनिया गांधी जी ने पिछले वर्ष भाषण दिया था, यह उनके शब्द हैं और उनमें केवल एनडीए सरकार को निकाल कर यूपीए सरकार यदि लिखा जाए तो इससे ज्यादा उपयुक्त इनके खिलाफ चार्जशीट नहीं हो सकती। अभी इस बार हमें उनका भाषण सुनने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ, चाहे वह लखित ही हो।…( व्यवधान) 

MR. DEPUTY-SPEAKER: Silence please.   This is not a meeting place. Please do not interrupt the hon. Member.

… (Interruptions)

प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा : उपाध्यक्ष जी, यहां पर जब आडवाणी जी ने यह कहा कि यह प्रधानमंत्री जी देश की सबसे कमजोर प्रधान मंत्री हैं तो प्रधान मंत्री जी को बहुत नाराज़गी हुई, बहुत गुस्सा आया। उन्होंने कहा कि Judge me by my works. मुझे मेरे कामों से जज करिए। मेरा मूल्यांकन, मेरी परख मेरे कामों से होनी चाहिए। संसार इस बात को देखेगा कि मैं कमजोर प्रधान मंत्री हूं या नहीं। इकोनोमिस्ट पत्र की ये पंक्तियां प्रधान मंत्री जी का पूरा मूल्यांकन करती हैं। उसने लिखा है -

“Shri Manmohan Singh is a Prime Minister who is in office but not in power – someone to be pitied rather than admired”. ” उनके ऊपर तरस खाना चाहिए, उनकी लाचारी, बेबसी और मजबूरी पर तरस खाया जा सकता है और यह बात उन्होंने उस समय लिखी थी। मैं एक अन्य समाचार-पत्र का कोट करना चाहता हूं -

“The most shocking moment in the second Press Conference held by Prime Minister on Wednesday 1st February, 2006, at Vigyan Bhavan in the capital stared on our face when a journalist in the full glare of the domestic and international media asked the most obvious question about the authority he was able to exercise as the Prime Minister of India.  Although the Prime Minister tried to belittle the gravity of the question by trivial argument, the country has been debating the issue of Shri Manmohan Singh’s political authority (or lack of it) in governance. ”   MR. DEPUTY-SPEAKER: This is not to be recorded. Shri Jai Prakash, please take your seat.   Nothing will go on record except the speech of Prof. Vijay Kumar Malhotra.

(Interruptions) …* उपाध्यक्ष महोदय : जय प्रकाश जी, आपका कुछ भी रिकार्ड नहीं हो रहा है।

…( व्यवधान) 

MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing to be recorded, except the speech of Prof. Vijay Kumar Malhotra.

(Interruptions) …*   * Not Recorded.

 

उपाध्यक्ष महोदय : जय प्रकाश जी, आप मेरी एक बात सुन लीजिए, मैंने इस तरफ से किसी को नहीं बोलने दिया।

PROF. VIJAY KUMAR MALHOTRA : “No Prime Ministers in the history of independent India, including those who had come as stop-gap arrangement, namely S/Shri Chandrasekhar, Deve Gowda and Gujral, had to face such embarrassing question.  It is a blot on the prestige of the Nation. ”              उपाध्यक्ष महोदय, इसके तुरंत बाद, प्रैस कांफ्रेंस खत्म होते ही “टाइम्स नाऊ”  एक टी.वी. चैनल ने उन पत्रों को प्रकाशित किया, जो पत्र प्रधान मंत्री कार्यालय से सब मंत्रालयों को लिखे गए थे। उनमें से मैं उन दो पत्रों का ही केवल हवाला दे रहा हूं। “While one letter written by the Principal Secretary to the Prime Minister, TKA Nair, to various Ministries narrated that “The Prime Minister has observed that occasionally important policy decisions are taken by ministries and departments without giving prior intimation to the PMO[R29] ”.

            In the latest one, now written in November, 2005, the Cabinet Secretary is stated to have repeated the same complaint. … (Interruptions)

            Sir, I quote :

“The situation seems to have remained unchanged as far as the deplorable status of Prime Minister Manmohan Singh as head of this UPA Government is concerned. The nation is, therefore, becoming increasingly concerned whether the Prime Minister is being transgressed or ignored by the real power behind the thrown. Is he leading the Government without any authority?”   उपाध्यक्ष जी, मैं आपसे जो कहना चाहता था, वह यह है कि संविधान के अनुसार देश को प्रधान मंत्री चलाते हैं परन्तु प्रधान मंत्री को कौन चला रहा है। पिछली बार आडवाणी जी ने जिक्र किया था कि वह ‘इनव्ज़िबल प्रधानमंत्री’  हैं। एक अखबार ने भी लिखा था। वह सब से कमजोर प्रधान मंत्री हैं, इस बात का भी जिक्र किया गया। प्रधानमंत्री जी किस रूप में कार्य कर रहे हैं, क्या ‘खड़ाऊ प्रधानमंत्री’  हैं, जो खड़ाऊ लेकर राजपाठ चला रहे हैं? जब भगवान राम ने भरत को राज्य दे दिया था, उसके बाद उन्होंने उस तरफ देखा तक नहीं था लेकिन यहां तो ‘क्वीन-बी’ विद्यमान हैं। उनके पास पूरी ताकत है जबकि बाद में कहा गया कि पूरी ताकत प्रधानमंत्री के पास है। जब आडवाणी जी ने जिक्र किया तो उस समय उन्हें गुस्सा क्यों आया, मुझे इस बात पर आश्चर्य हुआ। आज भी प्रधान मंत्री जी के समय में इतने बड़े काम हुये हैं जिनमें भ्रष्टाचार सब से बड़ा कार्य है। उस संबंध में प्रधान मंत्री जी का उत्तर आता है कि उन्हें नहीं मालूम।
उपाध्यक्ष जी, हमारे देश के एडीशनल सोलिस्टर जनरल क्वात्रोची का खाता खुलवाने के लिये लंदन जाते हैं। दुनिया के इतिहास में ऐसा कभी नहीं देखा गया कि आदमी, जिसके खिलाफ ‘ रैड अलर्ट’ घोषित हुआ हो, जिसके लिये इंटरपोल ने कह रखा हो कि वह व्यक्ति जहां कहीं भी मिले, उसे गिरफ्तार कर लिया जाये, जिसे हिन्दुतान लाने के लिये हमारी सरकार ने इतना प्रयास किया हो, उसके लिये यहां का एडीशनल सोलिस्टर जनरल लंदन जाये, खाता खोले जिसकी उस आदमी ने मांग भी न की हो, करोड़ो रुपए उसके खाते से निकालकर उसे दे दिये जायें, तब प्रधानमंत्री कहते हैं कि उन्हें इस बारे में कुछ मालूम नहीं है। क्या हिन्दुस्तान का एडीशनल सोलिस्टर जनरल बिना प्रधानमंत्री की इजाजत के देश से बाहर जा सकता है? उसे आवश्यक रूप से प्रधान मंत्री की परमीशन लेनी होती है। इतना भंयकर भ्रष्टाचार हो, देश का नुकसान हो, एक ‘रेड अलर्ट’ में पड़ा अपराधी, जिस पर सी.बी.आई. ने हिन्दुस्तान लाने के लिये मुकदमा चला रखा हो, उसका खाता लंदन में खोल दिया जाये और प्रधानमंत्री कहें कि उन्हें मालूम नहीं, यह सब क्या हुआ?
उपाध्यक्ष जी, केवल इतनी ही बात नहीं है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री जी ने घोषणा की कि देश में अन्न के भंडार हैं, बेइन्तहा अनाज है, कोई चिन्ता की बात नहीं है। ठीक उसी समय कृषि मंत्री श्री पवार यह घोषणा करते हैं कि सरकार पांच लाख टन अन्न का बाहर से इम्पोर्ट कर रही है। क्या प्रधानमंत्री को मालूम नहीं कि बाहर से पांच लाख टन अनाज का इम्पोर्ट किया जा रहा है? इस इम्पोर्ट में कितना घपला किया गया है किं सटोरियों ने और धन्ना सेठों ने अनाज ६६८ रुपये क्िंवटल के भाव खरीद लिया लेकिन बाजार में जाकर १२००-१३०० रुपये के हिसाब से बेचते रहे। पिछले साल सरकार ने किसानों से अनाज नहीं खरीदा लेकिन इस बीच में पांच लाख टन गेहूं के आयात की घोषणा कर डाली और प्रधानमंत्री जी कहते हैं कि उन्हें मालूम नहीं और यह बात उनकी जानकारी में नहीं है।
उपाध्यक्ष जी, जब एन.डी.ए. सरकार श्री वाजपेयी जी चला रहे थे, उस समय गेहूं का बफर स्टॉक ६ करोड़ ४५ लाख टन हो गया था जो आज घटकर दो करोड़ टन रह गया है। यह स्टॉक १.२.२००६ को घटकर केवल ४५ लाख टन रह गया है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिये हर महीने १४ लाख टन गेहूं का आवश्यकता होती है, चाहे कैसी भी हालत पैदा हुई हो[RB30] । एक समय ऐसा आया था, यहां हमारे मित्र मौजूद हैं और उनकी कमेटी थी, जिसने कहा था कि इतना अनाज हो गया है कि रखने की जगह नहीं है। इस अनाज को समुद्र में फेंक देना चाहिए। आपकी स्टैंडिंग कमेटी ने यह पास किया था। सभी राज्यों से कहा था कि मुफ्त में अनाज ले जाओ और फूड फार वर्क के तौर पर इस्तेमाल करो। आज हालत यह है कि अनाज इम्पोर्ट करना पड़ रहा है। मैं यह कहना चाहता हूं कि प्रधानमंत्री जी को मालूम नहीं है कि कितना अनाज इम्पोर्ट किया जा रहा है। गोवा, झारखंड और बिहार के राज्यपालों ने संविधान की धज्जियां उड़ाई हैं। उन्होंने अल्पसंख्यकों की सरकार बना दी। विधानसभा भंग कर दी और गैर-जिम्मेदराना तथा असंवैधानिक काम किया। इस पर भी प्रधानमंत्री जी ने कहा कि मुझे पता नहीं कि वहां क्या हो रहा है।
संयुक्त राष्ट्र संघ की जांच समति वोल्कर कमेटी ने अनाज के बदले तेल योजना में भयकर भ्रष्टाचार के लिए श्री नटवर सिंह और कांग्रेस पार्टी को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन प्रधानमंत्री कहते रहे कि उन्हें मालूम नहीं कि वहां पर कौन गया था, क्या हुआ और उसके बारे में क्या स्थिति है। प्रधानमंत्री जी को नहीं मालूम है और जैसा प्रधानमंत्री लगातार कहते रहे कि श्री नटवर सिंह दोषी नहीं हैं, तो आज कल उनकी परिवर्तन निदेशालय में बुलाकर रोजाना पूछताछ क्यों की जा रही है। उस समय भी प्रधानमंत्री जी ने कहा कि इसके बारे में मुझे मालूम नहीं है।
सबसे भंयकर बात है कि कि सेना में सर्वेक्षण कराने का काम किया गया। इसका उल्लेख कल हो गया है, इसलिए इसकी डिटेल में नहीं जाऊंगा। यह सर्वेक्षण का काम देश को तोड़ने का काम, देश की एकता और अखंडता को समाप्त करने का काम, देश की सुरक्षा को खतरे में डालने का काम मुस्लिम सर्वेक्षण के माध्यम से किया जा रहा है। प्रधानमंत्री कार्यालय से कहा गया कि प्रधानमंत्री जी को इसकी जानकारी नहीं है। उन्होंने इस बारे में कुछ नहीं कहा है। प्रधानमंत्री जी कहते हैं- मुझे नहीं मालूम, आई डोंट नो, पंजाबी में कहते हैं- मैनु की पता। ये ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्हें कुछ पता नहीं है और आप यहां कह रहे हैं कि उन्हीं के हिसाब से यह सारा कामकाज चल रहा है।
सभापति महोदय, पिछले १८-२० महीने से यह सरकार सत्ता में है। चार-चार मंत्री बर्खास्त किए गए। …( व्यवधान) 
MR. DEPUTY-SPEAKER: Mr. Mistry, please do not disturb the hon. Member when he is speaking.
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा चार मंत्रियों को जाना पड़ा। In this period four Ministers had to go.  सबसे पहले श्री शिबु सोरेन का इस्तीफा हुआ। प्रधानमंत्री जी उन्हें क्लीन चिट देते रहे और कई दिन यहां पर शिबु सोरेन क्लीन चिट होता रहा और आखिर में उनका इस्तीफा ले लिया। उन्हें बलि का बकरा बना दिया। उसके बाद यहां पर श्री नटवर सिंह का इस्तीफा हुआ। मेरे पास सारे कागज मौजूद हैं, जिनमें प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि मुझे श्री नटवर सिंह पर पूरा भरोसा है, उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया और उन्हें लगातार बचाते रहे। उनका भी इस्तीफा हो गया। फिर श्री टाइटलर जी का इस्तीफा हुआ और उनके बाद श्री जय प्रकाश यादव जी का इस्तीफा हुआ उसके बाद श्री बूटा सिंह का इस्तीफा हुआ। चार मंत्री और एक राज्यपाल का इस्तीफा हुआ। प्रधानमंत्री जी उन सबको क्लीन चिट देते रहे और उसके साथ-साथ उन्होंने जिन-जिन को भी क्लीन चिटी दी थी, उन सब का उल्लेख यहां करना आवश्यक नहीं है। यह प्रधानमंत्री क्लीन चिट प्रधानमंत्री हैं। मिस्टर क्लीन हैं। सबको क्लीन चिट दे-दे कर इन्होंने अपने चेहरे पर कालिख पोत ली है, इस बात का इन्हें ध्यान रखना चाहिए। हर एक भ्रष्टाचारी को क्लीन चिट दी है। हर बार खुले तौर पर कहा कि कुछ नहीं है और आखिर तक बचाते रहे, लेकिन जब देखा कि सत्ता पर बात आ रही है, सब को बलि का बकरा बना दिया। सत्ता को बचाने के लिए उन्होंने यह काम किया।
अभी मेरे एक दोस्त श्री सिंधिया जी ने उल्लेख किया था कि यह सरकार गरीबों के लिए काम कर रही है और पहले की जो सरकार थी, वह केवल अमीरों के लिए काम कर रही थी। इस बात को उन्होंने यह उदाहरण दे कर बताया कि सैंसेक्स बहुत चढ़ रहा है।…( व्यवधान) 
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please do not disturb the hon. Member by giving running commentary.
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा यह गरीब आदमियों का सैंसेक्स चढ़ रहा है[i31] ।
महोदय, ये गरीब आदमी की बात कर रहे हैं, लेकिन विदेशी पूंजी यहां धड़ाधड़ आ रही है। उससे ब्लैक मनी पैदा हो रही है। उससे प्रॉपर्टी की कीमतें चढ़ी हैं। संपत्ति की कीमतें बढ़ने से गरीब आदमी का क्या फायदा होगा ? सस्ती क्या हुई है, थोड़ी कारें सस्ती हुई होंगी और मोबाइल फोन सस्ते हो गए होंगे। गरीब आदमी के लिए कुछ भी सस्ता नहीं हुआ है। किसी को अगर थोड़ी-बहुत भी गरीबों के प्रति सहानुभूति है, तो देखना चाहिए कि महंगाई कितनी बढ़ी है। आए दिन अखबारों में आ रहा है कि “मनमोहन के सत्ता संभालने के बाद महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी” महोदय, पिछले तीन-चार महीनों में महंगाई तेजी से बढ़ी है। यू.पी.ए. सरकार के २० महीने के शासनकाल ने गरीब आदमी की कमर तोड़ दी है। महंगाई ने विकराल रूप धारण कर लिया है। गेहूं, चावल, आटा, दाल, तेल, घी और गुड़ आदि में ३० से ४० प्रतिशत की वृद्धि यू.पी.ए. सरकार के समय में हुई है। कई चीजों में २०० प्रतिशत की वृद्धि हुई है। मैं बताना चाहता हूं कि गेहूं दड़ा जो एन.डी.ए. सरकार के समय ६६० रुपए प्रति क्िंवटल था वह अब ९९० रुपए प्रति क्िंवटल हो गया है। जो आटा हमारे समय में रु.७.१० प्रति किलो मिलता था आज वह १३ रुपए किलो मिल रहा है। थैली में मिलने वाला आटा १३ रुपए किलो मिल रहा है। चीनी जो १५०० रुपए प्रति बोरी मिलती थी, वह २१०० रुपए प्रति बोरी हो गई है और रिटेल में चीनी २३ रुपए प्रति किलो बिक रही है। हमारे समय में उड़द १७०० रुपए प्रति क्िंवटल थे, जो अब ४१०० रुपए प्रति क्िंवटल मिल रहे हैं। ये इनके सरकारी आंकड़े हैं। जो दाल १७५० रुपए प्रति क्िंवटल उस समय थी वह अब ४००० रुपए प्रति क्िंवटल बक रही है। राजमा २७०० रुपए प्रति क्िंवटल था अब ३२०० रुपए प्रति क्िंवटल बिक रहा है। बासमती चावल में ३०० रुपए प्रति क्िंवटल की बढ़ोत्तरी हुई है। सीमेंट में कितनी बढ़ोत्तरी हुई है, यह किसी ने देखा ? ये कहते हैं कि कांग्रेस का हाथ, गरीबों के साथ, आम आदमी के साथ। मैं कहता हूं कि कांग्रेस का हाथ अमीरों के साथ।
महोदय, एक जमाना था, जब लोग राशन कार्ड भूल गए थे। खुले बाजार में इतना सस्ता सामान मिलने लगा था कि राशन कार्ड की जरूरत ही नहीं रह गई थी। ऐसा नहीं है कि वर्षा नहीं हुई अथवा कोई ऐसी बात हो गई जिससे महंगाई बढ़ी। वर्षा भरपूर हुई है, लेकिन कांग्रेस सरकार की नीतियां ऐसी हैं, जिनके कारण महंगाई बढ़ रही है। ये चीनी १२०० रुपए क्िंवटल मंगाते रहे और बाजार में २२०० रुपए क्विटंल बेचते रहे। इस प्रकार कई हजार करोड़ रुपए का घोटाला हुआ। इसी प्रकार गेहूं इम्पोर्ट करने का पहले से ही तरीका निकाल लिया। अपने किसान को ६६८ रुपए क्िंवटल नहीं देंगे, लेकिन बाहर से मंगाने पर १००० रुपए प्रति क्िंवटल खर्च कर देंगे और कहा जा रहा है कि कांग्रेस का हाथ गरीबों के साथ।
महोदय, कांग्रेस द्वारा कहा जा रहा है कि हमने रोजगार गारंटी बिल पास कर दिया। मैं बताना चाहता हूं कि यह बिल सैशन शुरू होने से १० दिन पहले लागू किया है। मैं बताना चाहता हूं कि एन.डी.ए. सरकार ने जितना पैसा सारी योजनाओं में रखा था, उसे इन्होंने वभिन्न योजनाओं में बांट दिया है और रोजगार गारंटी योजना में हमारे मुकाबले १/१० हिस्सा ही धन रखा है। बेरोजगारी की हालत यह है कि देश में हजारों कारखाने बन्द हो गए। स्माल स्केल इंडस्ट्रीज बड़े पैमाने पर बन्द हो गईं। बड़ी इंडस्ट्रीज में से लोगों को निकाला जा रहा है। आज स्थिति यह है कि देश में लगभग १ करोड़ लोग बेरोजगार हैं। ये क्या कर रहे हैं, ये एफ.डी.आई. इन रिटेल को ला रहे हैं। ये खुदरा व्यापार में मल्टी नैशनल्स को ला रहे हैं। इससे देश के ४ करोड़ लोगों के बेकार होने का अंदेशा है और काम नहीं देंगे ५० लाख लोगों को भी। मल्टी नैसऩल्स के आने से देश के चार करोड़ लोग बेकार हो जाएंगे। मल्टी नैशनल कंपनियां अपने मॉल खोलेंगी। उनसे बेरोजगारी बढ़ेगी।
महोदय, ये कह रहे हैं कि इन्होंने रोजगार के बहुत अवसर पैदा कर दिए और रोजगार गारंटी स्कीम चला दी जिसके लिए ये सोनिया जी को बहुत क्रेडिट दे रहे हैं। मैं शहरों के बेरोजगारों और स्लम बस्तियों में रहने वाले लोगों के बारे में पूछना चाहता हूं कि उनके लिए सरकार क्या कर रही है। उनके लिए तो कोई कानून भी नहीं है[rpm32] । कितने लोग रिक्शा चलाने वाले, स्लम में रहने वाले या झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाले हैं, किसी शहरी आदमी के लिए कोई रोजगार योजना है? पहले थी, लेकिन आपने उसको खत्म कर दिया और इस रोजगार योजना को भी चलाया नहीं। क्या शहरों के अन्दर गरीब आदमी नहीं बसता है, कस्बों में गरीब आदमी नहीं बसता है, लेकिन उसकी कोई योजना नहीं है। उसके बारे में कोई विचार नहीं किया गया। इसलिए मैंने कहा है कि जहां तक गरीबी का सवाल है, उसके बारे में मैंने आपके सामने भी जिक्र किया है।
सबसे ज्यादा जो भयंकर बात है, वह यह है, जो यह सरकार करने जा रही है या कर रही है, जिस एक ही बात का क्रेडिट लेने के लिए राष्ट्रपति जी का अभिभाषण भी भरा पड़ा है और जिसका हर रोज़ जिक्र होता है, वह अल्पसंख्यकवाद का, मुसलमानों को खुश करने का है। मैंने देखा, सोनिया जी का मैंने अखबार में पढ़ा, वह ठीक ही होगा कि सोनिया जी ने सब को, अपने सारे आफिस बियरर्स को और चीफ मनिस्टर्स को एक पत्र लिखा है कि Muslims are our natural allies. इस बात का सब ध्यान रखें कि मुसलमान हमारे स्वाभाविक एलाइज़ हैं और इस बात का सब को ध्यान रखना चाहिए। क्या हिन्दू जो हैं, वे दुश्मन हैं और जो दूसरे अल्पसंख्यक हैं, वे नैचुरल एलाईज़ नहीं है। इस बात को लिखने की क्या जरूरत महसूस हुई? आप देखें, इस सरकार ने…( व्यवधान) 
SHRI MADHUSUDAN MISTRY : This is totally distorting.
उपाध्यक्ष महोदय  जब आपकी पार्टी का टाइम आएगा तो आप कह लेना। डिस्टर्ब न करें। मैंने इनको एलाऊ नहीं किया।
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा यू.पी.ए. सरकार बनने के बाद इस सरकार में पहली बार हुआ कि मुस्लिम लीग के एक प्रतनधि को मंत्री बनाया गया। नेहरू जी ने नहीं बनाया, इन्दिरा जी ने नहीं बनाया, राजीव गांधी जी ने भी नहीं बनाया, किसी कांग्रेसी प्रधानमंत्री ने नहीं बनाया, परन्तु मुस्लिम लीग को क्रेडेबलिटी देने की, जिनका टू नेशन थ्योरी पर विश्वास था और है, देश के विभाजन के जो जिम्मेदार थे, उनको केबिनेट में लाकर मंत्री बनाकर उनको जिस प्रकार से क्रेडेबलिटी दी, यह पहला काम उन्होंने यहां पर किया है। अब ये बड़ा भारी क्रेडिट ले रहे हैं कि इन्होंने पहली बार अल्पसंख्यकों का एक मंत्रालय बनाया।…( व्यवधान) 
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में राज्य मंत्री (डॉ. शकील अहमद) : ई. अहमद साहब इण्डियन यूनियन मुस्लिम लीग के मैम्बर हैं, जिन्ना की टू नेशन थ्योरी को मानने वाली मुस्लिम लीग के मैम्बर नहीं हैं। I want this on record.…( व्यवधान) 
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please sit down. Not to be recorded.
(Interruptions) …* MR. DEPUTY-SPEAKER: Only Mr. Malhotra’s speech will be recorded. मैंने एलाऊ नहीं किया।
(Interruptions) … * प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा उपाध्यक्ष जी, दूसरा काम इन्होंने किया, जो पहले कभी नहीं हुआ कि अल्पसंख्यकों का एक मंत्रालय बनाया गया। अभी तक यह काम अर्जुन सिंह जी के पास था और वे इस काम को भी इस ढंग से कर रहे थे, जो बहुत बखूबी तो नहीं कहना चाहिए, वे भी देश के साथ बहुत अन्याय कर रहे थे, परन्तु एक अल्पसंख्यकों का नया मंत्रालय बना दिया गया। क्या किसी और मंत्रालय में डिपार्टमेंट के तौर पर यह काम नहीं चल सकता था? यह इन्होंने दूसरी बात की। तीसरे, इन्होंने अल्पसंख्यक आयोग को संवैधानिक दर्जा देने की बात कर दी। दुनिया में किसी भी मुल्क में अल्पसंख्यक आयोग नहीं है। मानवाधिकार आयोग है, लेकिन अल्पसंख्यक आयोग नहीं है, परन्तु यहां पर बनाया गया था, जिसे अब संवैधानिक दर्जा देंगे। उसके लिए यह करेंगे, जो दुनिया के २०० मुल्कों में से किसी मुल्क में नहीं है। इन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय हो या आन्ध्रा प्रदेश का हो, जिसमें रिजर्वेशन और यह सब करने की बात की। अल्पसंख्यकों के नाम पर उन सब की भी इस समय उल्लेख करने की जरूरत नहीं है, परन्तु इन्होंने कितनी कमेटियां बनाईं। पहली बार कुछ कमेटियां बनीं। आप देखें कि किस सीमा तक जा रहे हैं। एक कमेटी बनाई, Socially and Economically Backward Sections among Religious and Linguistic Minorities. Chief Justice Ranganath Mishra is the Chairman. प्रो. डॉ. ताहिर महमूद, अनिल विल्सन, मोहिन्दर सिंह, संजीव खन्ना, ये उसके मैम्बर हैं। Socially and Economically Backward Sections among Religious and Linguistic Minorities. ये बन गई, उसके बाद एक और कमेटी बनाई, यह कमेटी भी चलेगी। High-Level Committee to   * Not Recorded.
Prepare a Report on Socially, Economical and Educational Status of  Muslims in India. यानी पहले तो अल्पसंख्यकों के लिए कमेटी इन्होंने काम के लिए बनाई, उसमें से भी मुसलमानों के लिए अलग कमेटी और उसके लिए डॉ. राजिन्दर सच्चर, सैयद हमीद, टी.के. ओमन, एम.ए. बसीथ, राकेश बसन्त, अख्तर माजिद और अबू सलेह, ये सब नाम उसमें डाल दिये। [i33]  उन्हें लगा कि इससे लोग संतुष्ट नहीं हैं तो तीसरी कमेटी नेशनल मौनिटरिंग कमिशन फॉर माइनॉरिटी एजूकेशन बनाई गई। एचआरडी मनिस्टर उसके चेयरमैन हैं। उसमें ४५ मैम्बर्स हैं जिनमें लोक सभा के सदस्य भी हैं। एक कमेटी रंगनाथ मिश्रा की, एक कमेटी सच्चर साहब की और फिर यह कमेटी बनाई गई। फिर पांचवी कमेटी नेशनल कमिशन आन माइनॉरिटी एजूकेशनल इंस्टीटयूशन्स बनाई गई, जिसके चेयरमैन जस्टिस एम.एस.ए. सिद्दीकी हैं। यह क्या हो रहा है, आप किस सीमा तक जाएंगे? पागल अंधी दौड़ में माइनॉरटिज़्म के काम के लिए ही पांच-पांच कमेटियां बनाई गईं जो एक-दूसरे में ओवरलैपिंग काम करेंगी। क्या आपको अपने शिक्षा मंत्री जी या हयूमन रिसोर्सेज मनिस्टर, जिनके अंतर्गत यहकाम हो रहे थे, पर कोई भरोसा नहीं था कि वे इस काम को कर लेंगे? नैचुरल एलीज़ हैं, किस तरह उनके वोट लेने हैं और उनके वोट बैंक में किस तरह प्रवेश किया जाए, इसकी कोशिश की जा रही है। जो माइनॉरटिज़्म किया जा रहा है, उसके बारे में मुझे और ज्यादा कहने की आवश्यकता नहीं है।
आज क्या हालत पैदा कर दी गई है? आज यह हालत हो गई है जैसे पार्टीशन से पहले रेलवे स्टेशनों पर आवाजें आती थीं हिन्दू पानी, मुसलमान पानी। अब हिन्दू स्कूल, मुसलमान स्कूल, हिन्दू शिक्षा संस्थान, मुसलमान शिक्षा संस्थान, हिन्दू सेना, मुसलमान सेना। देश का हिन्दू और मुसलमान के नाम पर पूरा विभाजन कर देंगे। आखिर देश को किस स्थिति में ले जाना चाहते हैं? सेना में देखा जाएगा कि यह हिन्दू सेना है, यह मुस्लिम सेना है। स्कूलों में माइनॉरिटी एजूकेशनल इंस्टीटयूशन्स अलग होंगे। हिन्दू बस्तियां अलग होंगी, मुसलमान बस्तियां अलग होंगी, आप इस देश को ऐसा बनाएंगे। क्या यह देश की एकता का प्रतीक है? चाहिए यह था कि सब भेदभाव भूलकर उनको मेरिट पर यहां लाने की कोशिश की जाती। परन्तु उसे कैसे तोड़ा गया।…( व्यवधान) 
MR. DEPUTY-SPEAKER Hon. Members, do not make running commentaries.
...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आपकी पार्टी का समय है। आप उस समय बोलिए।
...( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please sit down.
...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : जब आपकी बारी आएगी, उस समय बोलिए, उस समय इन्हें नहीं बोलने देंगे।
...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आपको जरूर बुलाया जाएगा।
...( व्यवधान)
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा : जो राजेन्द्र सच्चर कमेटी बनाई गई, उसकी भूमिका कहां से शुरू हुई। खालिदी साहब हैदराबाद में पैदा हुए थे, बाद में यूएस चले गए। उन्होंने जमायत-ए-इस्लामी वीकली में अपना एजैंडा दिया। क्योंकि उन्होंने मनिस्टर साहब को लिखा था, उससे यह सारी चीजें शुरू हुईं। एजैंडा है - We need Muslim-majority districts for three reasons. First, concentrated areas provide security.  Second, they provide an environment that is conducive to our cultural independence.  Third, they provide a political base through which our people can be elected.  He suggested a Deccan province by merging Hyderabad, Rangareddy and Gulbarga districts, an Urdu-speaking State covering Kishanganj, Katihar and Purnea districts in Bihar.
यह एजैंडा था जिसके अंतर्गत सच्चर कमेटी बनाई गई। देश में यह किस तरह की साजिश हो रही है। इसी के अंतर्गत बंगलादेशी घुसपैठ, जो डेढ़ करोड़ के करीब हैं, हिन्दुस्तान आ गए। देश में डेढ़ करोड़ बंगलादेशी आ गए और उन्हें देश में बनाए रखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह नेकेड एग्रैशन है, देश पर हमला है और अपने देश में किसी विदेशी को आने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। परन्तु कांग्रेस ने क्या किया - फॉरेनर्स एक्ट को अमैंड कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने आईएमबीटी एक्ट रद्द कर दिया क्योंकि यहां से बंगलादेशियों को निकालना चाहिए। यह बंगलादेशियों को बनाए रखेंगे। हम कह रहे थे कि आईएमबीटी एक्ट खत्म करें और इसे फॉरेनर्स एक्ट के अंतर्गत सारे देश में करें। यह फॉरेनर्स एक्ट को ही अमैंड कर रहे हैं ताकि जो आना चाहे, इस धर्मशाला में आ जाए, यहां आकर पूरी तरह बस जाए और उसे यहां बसाने का पूरा इंतजाम किया जाए। आप किस सीमा तक जाएंगे, किस सीमा तक देश को तोड़ा जाएगा? जब यह कहा जाता है तो मुझे दुख होता है, तकलीफ होती है[R34] ।   यहां लोग बोल रहे हैं कि यह सर्वे जरूर करना चाहिए क्योंकि मुसलमानों के साथ बड़ा अन्याय हुआ, मुसलमानों का नरसंहार हो रहा है। मुस्लमान को यहां अधिकार प्राप्त नहीं है। उनको हर जगह से खदेड़ दिया जाता है। पहली बात तो यह है कि हिन्दुस्तान को आजाद हुए ५९ साल हो गये हैं। इन ५९ सालों में से ५० साल तो कांग्रेस ने राज किया है। श्री लालू जी ने १५ साल तक बिहार में राज किया लेकिन बाकी जगह पर कांग्रेस का शासन रहा, फिर मुसलमानों की हालत ऐसी क्यों है जैसी आप बता रहे हैं। क्यों कांग्रेस ने काम नहीं किया ?  आप पहले वाले नेताओं को कटघरे में खड़े कर रहे हैं, यह आपको मुबारक हो।
मैं एक छोटी सी बात पूछना चाहता हूं कि जहां नरसंहार होता है, जहां लोगों के साथ अन्याय होता है, वहां से लोग बाहर जाते हैं या आते हैं ?  यहां पर मुस्लिम पापुलेशन १९५१ में आठ प्रतिशत थी लेकिन अब वह १३-१४ प्रतिशत है। बंगलादेश से डेढ़ करोड़ लोग आये हैं। पाकिस्तान से वीजा लेकर डेढ़ लाख लोग हिन्दुस्तान में आये और यहां से वापस नहीं गये। क्या जहां नरसंहार होता है वहां लोग आते हैं ? नरसंहार बंगालादेश में हुआ है। वर्ष १९५१ में वहां ३० प्रतिशत हिन्दू थे लेकिन वह आज कम होकर पांच या छ: प्रतिशत ही रह गये हैं। यह नरसंहार है। जब पार्टिशन हुआ तब जम्मू-कश्मीर में हिन्दूओं की संख्या ३५ से ४० प्रतिशत थी। वहां से पूरे पांच लाख कश्मीरी पंडितों को भगा दिया गया। सभी पंडितों को निकाल दिया गया। जबकि यहां कहा जा रहा है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है। यह कैसा अन्याय है ? …( व्यवधान)   I am not yielding. मेरी बात सुनी जाये।
उपाध्यक्ष महोदय :  जब आपकी पार्टी का बोलने का समय आयेगा, तब आप बोलिये।
...( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please sit down.
श्री राम कृपाल यादव (पटना) : आप लोग दस साल तक सत्ता में थे। जब डेढ़ करोड़ मुसलमान अवैध रूप से आ रहे थे तब आपने उन्हें क्यों नहीं निकलवाया ? …( व्यवधान) 
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा : हम निकाल रहे हैं। …( व्यवधान) 
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record except the speech of Prof. Malhotra.
… (Interruptions)
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा : मेरा यह कहना है कि इस तरह से सर्वे करके अपने देश को दुनिया भर में बर्बाद करना, अपने देश को लांछित करना क्या ठीक है ?  क्या आप वोट बैंक की पोलटिक्स के लिए इस सीमा तक जायेंगे ?  दुनिया में सबसे ज्यादा, मैजोरिटी से कहीं ज्यादा अगर माइनोरिटी हो जाये, मुसलमान हो जायें तो वह सिर्फ हिन्दुस्तान में है। दुनिया में कोई मुल्क हज के लिए सब्सिडी नहीं देता। २०० मुल्कों में से एक भी मुल्क ऐसा नहीं है जो हज के लिए सब्सिडी देता हो। कोई मुसलमान देश भी नहीं देता। अगर कोई अकेला मुल्क सब्सिडी देता है, तो वह हिन्दुस्तान है। यहां अल्पसंख्यक आयोग है। …( व्यवधान)   अकेला हिन्दुस्तान है  जहां कानून के अंदर सबको बराबर रखा गया है। …( व्यवधान) 
MR. DEPUTY-SPEAKER: Why are you speaking without my permission?
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा : उपाध्यक्ष महोदय, इस तरह से यह बीच में बोलेंगे तो मेरा बोलना मुश्किल है। …( व्यवधान) 
उपाध्यक्ष महोदय :  आपके बोलने की जब बारी आयेगी तब आप बोलिये। आप उनको बोलने दीजिए।
...( व्यवधान)
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा : मैं इसलिए कह रहा था कि यहां पर अपने देश को लांछित करने, सेना के टुकड़े कर देनी जैसी स्थिति पैदा करना बहुत ही अनुचित है, बहुत ही गलत है। मैं एक बात का और उल्लेख करना चाहूंगा। यहां पर और बातों के अलावा एक नयी परम्परा चलाई गयी। जहां भी सावरकर जी का नाम लिखा गया है, वहां से उसे हटा दिया गया। इसी तरह श्री दीन दयाल उपाध्याय जी के नाम से जितने आयोजन थे, उन सबसे उनका नाम समाप्त कर दिया गया। श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के नाम पर सड़क योजना आदि जो कुछ भी था, उन सबसे उनका नाम बदल दिया गया। अब क्या हो रहा है ?  हरियाणा में चौधरी देवी लाल जी की जो मूर्तियां थीं, उन सबको हटाया जा रहा है। इसी तरह उनके नाम से जो सड़कें पार्क आदि थे, उनमें से उनका नाम हटाया जा रहा है। केवल एक आदेश निकाल दिया गया। क्या इस देश में यह होगा कि जिसकी सरकार आयेगी, वह आकर जिसको बदलना चाहे, उसे बदल देगी ? क्या इस तरह से किया जायेगा ?  मैं आपको पढ़कर बताता हूं कि इन्होंने एक साल में राजीव जी के नाम पर कितनी योजनाएं चलाई हैं। श्री राजीव गांधी जी के नाम पर तकरीबन २० योजनाएं इऩ दो सालों में शुरू की गय्ाीं[r35] । इन दो सालों में नेहरू जी के नाम पर और गांधी जी के नाम पर भी जो पुरानी योजनाएं थीं, वे सब खत्म हो गईं। अब बीस योजनाएं केवल राजीव गांधी जी के नाम पर हैं। मैं तो कहूंगा कि यहां एक रिजोल्यूशन पास कर दिया जाए कि केवल एक ही परिवार के नाम पर स्मारक रहेंगे और बाकी किसी के नाम पर स्मारक नहीं होगा तो संभवत: कांग्रेस पार्टी का तुष्टीकरण हो जाएगा और उनकी चाटुकारिता पूरी तरह सेसंभव हो जाएगी। अभी मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि सिंधिया जी ने इसका भी जिक्र किया कि बहुत जल्दी हम महिला आरक्षण बिल यहां पर लाएंगे। दो साल बीत गये। महिला आरक्षण बिल के बारे में यूपीए के एजेंडा में भी लिखा हुआ था। लेकिन महिला आरक्षण बिल पर कोई मीटिंग तक नहीं हो रही है क्योंकि यूपीए के घटक दल मीटिंग नहीं होने देते और वे घटक दल इसलिए मीटिंग नहीं होने देते क्योंकि पिछली बार सोनिया गांधी जी ने जब भाषण दिया था तो उसमें कहा था कि अगर विल हो तो काम हो सकता है। अगर एनडीए गवर्नमेंट चाहे तो हम दोनों मिलकर पास कर सकते हैं। मत परवाह करो लालू जी की और मत परवाह करो मुलायम सिंह जी की। तब फिर आप क्यों नहीं इसे करते ? अगर आप चाहें तो मैं यहां पर इसे कोट करूं लेकिन मैं इनसे पूछना चाहता हं कि अब क्या हुआ ? इन दो सालों में आपको क्या तकलीफ हुई ? हमने तो कहा था कि इसे पास करो। आप महिलाओं के नाम पर क्यों दिखावा कर रहे है ?
राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में भी कहा गया है क ‘मेरी सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लए अनेक कदम उठाए कि राष्ट्रीय सांझा न्यूनतम कार्यक्रम में महिलाओं को पूर्ण समानता दिलाने का वचन पूरा हो, सम्पत्ति में महिलाओं को समान विरासत के अधिकार देने के लिए हिन्दु दत्तक अधनियम १९५६ मे संशोधन किया। सरकार संरक्षण व प्रतिपालन अधनियम १८९० में हिन्दू दत्तक और भरण पोषक अधनियम और अप्राप्तव्यता संहिता अधनियम में भी प्रावधानों को हटाने के लिए विचार कर रहे हैं।’  मैं सिर्फ पूछना चाहता हूं कि हिन्दू कानून में ही वे क्यों परिवर्तन कर रहे हैं ?क्या मुस्लिम महिलाओं को अधिकार नहीं चाहिए ?  उनको भी विरासत में अधिकार मिलने चाहिए। विरासत के अधिकार में भी भेदभाव और वह भी केवल हिन्दुओं पर लागू होगा ? क्यों नहीं आप सबके लिए एक बराबर कानून लाते ? क्यों केवल हिन्दू अधनियम में ही परिवर्तन होगा ? यहां पर किसी को एडॉप्ट करना है, उसमें भी अलग-अलग कानून चाहिए। अगर यह न्याय की बात है, जैसे कि आप कह रहे हैं तो मेरी सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए हैं कि यहां पर महिलाओं को पूर्ण समानता दिलाने का वचन पूरा हो, सम्पत्ति में महिलाओं को समान विरासत अधिकार मिले तो बाकी महिलाओं को क्यों नहीं अधिकार मिलने चाहिए ? अगर हिन्दू महिलाओं के लिए यह न्याय की बात है तो मुस्लिम महिलाओं के लिए यह अन्याय की बात बन जाती है। आप मुस्लिम महिलाओं के लिए इसे नहीं करना चाहते क्योंकि आपको लगता है कि अगर ऐसा करेंगे तो शाह बानो की तरह देश भर में बड़े-बड़े प्रदर्शन होंगे और यहां पर एक हंगामा खड़ा हो जाएगा। इसलिए इसे न किया जाए।
इसीलिए मैं आपसे कहना चाहूंगा कि यह केवल एक दिखावा है जो आप महिलाओं के साथ करना चाहते हैं। यहां पर मुस्लिम महिलाओं पर फतवे जारी होते रहे, वहां महिला का बलात्कार कोई करे, उस पर आप चुप्पी साध लेते हैं। एक शब्द तक नहीं बोलते हैं और उसके बारे में यह कहा जाए कि ये उनके अपने कानून हैं। हिन्दुस्तान में दो कानून नहीं चलने चाहिए। क्रमिनल कोड अगर एक रह सकता है तो फिर सविल कोड भी एक हो सकता है और हम यह मांग करना चाहेंगे कि सबको न्याय देने के लिए To make everybody equal before the law,  यहां पर एक कॉमन सविल कोड होना चाहिए। बड़े आश्चर्य की बात है और मैं सारे विस्तार में नहीं जाना चाहता हूं।…( व्यवधान) 
श्री सन्दीप दीक्षित उपाध्यक्ष जी, ये जो कह रहे हैं क…( व्यवधान) 
MR. DEPUTY-SPEAKER:  Silence, please.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing would go on record except the speech of Prof. Malhotra.
(Interruptions) …* MR. DEPUTY-SPEAKER: Mr. Sandip Dikshit, whatever you are speaking is not going on record.  Please, keep quiet.
… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER:  Prof. Malhotra, please continue.
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा उपाध्यक्ष जी, अभी ऐसी घटना हुई कि किसी डेनिश अखबार में एक कार्टून छपा और हम स्पष्ट रूप से कहना चाहते हैं कि वह गलत था। किसी की धार्मिक आस्था पर प्रहार नहीं होना चाहिए[R36] । उसने गलत किया, उसने माफी मांगी या क्या कहा, वह अलग बात है, लेकिन किसी की भी धार्मिक आस्था का सबको सम्मान करना चाहिए। मैंने देखा कि सोनिया जी ने भी इस बारे में एक पत्र लिखा और उसकी निंदा की है, ठीक किया है, करनी चाहिए। हमारी सरकार ने भी निंदा की है, ठीक किया है, करनी चाहिए। परंतु दूसरी बात आती है तो सबको सांप सूंघ जाता है। दुर्गा की नग्न मूर्ति, उसके सिंह की पूंछ को लेकर अश्लील ढंग से दिखाना, जबकि हिन्दुस्तान में करोड़ों लोग दुर्गा को माँ मानते हैं, उनकी आस्था पर यह कुठाराघात है। ...* ने जो चित्र बनाया, उसे यहां सबने डिफेंड किया था। लेकिन जब कुछ लोगों ने ...* की प्रदर्शनी में जाकर इसका विरोध करने की कोशिश की तो कहा गया कि यह व्यक्ति के विचारों की स्वतंत्रता की बात है। इसी तरह से सीता को नग्न दिखाया गया। रावण ने भी सीता को नग्न करने का काम नहीं किया था, वह यहां पर ...* ने किया। उन्होंने सीता को नग्न दिखाया, भारत माता की नग्न मूर्ति बनाई, तो ऐसे व्यक्ति को जिसे आप सब जगह अपने साथ लिए रहते हैं, आप कहते हैं कि सबके साथ बराबरी का काम करते है, यह इस बात को उजागर करता है कि आप सबको कितना बराबर   * Not Recorded.
समझते हैं। उनके द्वारा बनाई गई भारत माता मूर्ति को ८० लाख रुपए में बेचा गया और वह काम किसने किया…( व्यवधान) 
उपाध्यक्ष महोदय कार्यवाही से नाम हटा दिए जाएं।
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा  ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस पार्टी की उम्मीदवार ...* ने अपनी वेब साइट में डालकर उस मूर्ति को बेचा और फिर यहां इस तरह की बातें इनके द्वारा की जाती हैं। सोनिया जी ने एक शब्द भी नहीं कहा। दुर्गा के बारे में सीता की नग्नता के बारे में उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा। यहां पर अर्जुन सिंह जी ने जहां सीता-राम को बहन-भाई बताकर उनके, बहन-भाई के ब्याह की बात को उचित ठहराया और उसे प्रदर्शनी में लगे रहने दिया, क्या उससे हिन्दुओं की भावनाएं आहत नहीं होतीं? आज भले ही कोई मंत्री ५१ करोड़ रुपए का इनाम उस कार्टून के बनाने वाले का सिर कलम करने वाले को देने की घोषणा करे और सब जस्टिफाई करने की कोशिश करें और इधर यह सब होता रहे, तो कोई भी उसके खिलाफ कुछ न कहे, यह सबको बराबरी से देखने की बात कहना तर्क संगत नहीं लगता है।
इस देश के अंदर धमार्ंतरण पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगना चाहिए। मैं बताना चाहता हूं कि दोनों में कितना अंतर है। गुजरात में धमार्ंतरण होता है तो कहा जाता है कि इसके खिलाफ क्यों आवाज उठाई जा रही है। दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर में जब भूकम्प आया, उस समय वहां रिलीफ देने के लिए कुछ ईसाई मिशनरीज भी गए, लेकिन वहां की सरकार ने उन पर प्रतिबंध लगा दिया और कहा कि ये रुपया-पैसा बांटकर वहां के लोगों का धमार्ंतरण कर रहे हैं इसलिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया और उनके खिलाफ केस चलाया। जम्मू-कश्मीर में किसी मुसलमान का धमार्ंतरण होता है तो उसके खिलाफ एक कानून भी बना दो, गिरफ्तार भी कर लो, सब कुछ कर लो, लेकिन गुजरात में अगर धमार्ंतरण हो तो उसके खिलाफ आवाज उठाई जाए तो वहां पर शबरी कुम्भ हो, तो आपको लगता है कि बड़ा भारी साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाया जा रहा है। पैसा देकर गरीबों का धर्म परिवर्तन करना एक अभिशाप है और पाप है। यहां पर मध्य प्रदेश में और उड़ीसा में नेहरू जी के समय में ऐसा कानून बना था। इसलिए हमारी मांग है कि धमार्ंतरण सारे देश मे बंद होना चाहिए।
इसी तरह से गोरक्षा के लिए गोहत्या पर भी पूरे देश में प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी गोहत्या बन्द होनी चाहिए, इस पर जजमेंट दिया है कि वह कानूनन सही है और संविधान के मुताबक   * Not Recorded.
है। इसलिए उस पर भी तुरंत प्रतिबंध लगना चाहिए।
राम मंदिर का विषय राष्ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में नहीं रखा है। राम मंदिर बनना चाहिए। अगर बातचीत से बनाया जाए तो अच्छा है और न्यायालय के निर्णय से बनाया जाए तो भी अच्छा है, लेकिन राम मंदिर वहीं बनने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती, राम मंदिर तो बनेगा ही। वह जितनी जल्दी बन जाए, उतना अच्छा है।…( व्यवधान)
मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जब-जब कांग्रेस पार्टी सत्ता में आती है महंगाई लाती है, भ्रष्टाचार लाती है। मैं इनसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। सोनिया जी ने पिछले लोक सभा चुनाव के दौरान हर जगह यह बात अपने भाषणों में कही थी कि यह सरकार पूरी तरह से भ्रष्ट है, पूरी तरह से भ्रष्टाचार में लिप्त है, इसको माफ नहीं किया जा सकता। दो साल इस सरकार को बने हो गए हैं, लेकिन क्या इसने एक भी केस पकड़ा है? मुझे एक केस बताएं जो इन्होंने पूर्व की सरकार पर चलाया हो? उस समय न जाने क्या-क्या कहा कि यह सरकार कफन चोर है, फलाना चोर है, लेकिन चुनाव के बाद सब खत्म। हमारी सरकार के किसी भी व्यक्ति पर एक भी केस इन्होंने भ्रष्टाचार का साबित किया हो, तो ये बताएं…( व्यवधान) 
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing is to be recorded, except the speech of Prof. Malhotra.
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा  कांग्रेस पार्टी की जब भी सरकार आती है वह महंगाई लाती है, भ्रष्टाचार लाती है[R37]  ।यहां पर आने के बाद तो यूपीए सरकार ऐसी है, जैसे पुराने जमाने में किसी को कोई यंत्रणा देनी हो, किसी को टार्चर करना हो, तो उसका एक और तरीका होता था कि किसी व्यक्ति के पैर और हाथ चारों तरफ घोड़ों से बांध देते थे और बांधने के बाद घोड़ों को दौड़ाया जाता था और उसके टुकड़े-टुकड़े हो जाते थे। यह सरकार भी ऐसे ही चल रही है।चारों तरफ से कभी कम्युनिस्ट हैंड ब्रेक और इनफुट ब्रेक सब लगाते रहते हैं। ये अभी टुकड़े नहीं हुए…( व्यवधान)   वह इसलिए नहीं हुए कि घोड़े चारों दिशाओं में पूरी तरह से नहीं चल रहे हैं और अगर वे पूरी तरह से चले, तो यह सरकार जिस तरह से चल रही है और जैसा कि मैंने शुरू में कहा था …( व्यवधान) 
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing except what Prof. Malhotra says will go on record.
(Interruptions) …*   * Not Recorded.
प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा : उपाध्यक्ष जी, भारत की सुरक्षा को उन्होंने समाप्त किया है, इन्होंने भारत में भ्रष्टाचार को फैलाया है, इन्होंने भारत में गरीबों की कमर पूरी तरह से तोड़कर रख् दी है और मैं समझता हूं कि इस सरकार का २० माह का कार्यकाल लज्जाजनक है और यह जितनी जल्दी समाप्त हो जाए, उतना अच्छा है।…( व्यवधान) 
उपाध्यक्ष महोदय :  आपकी पार्टी के पास बहुत समय है।
...( व्यवधान)
MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record.
(Interruptions) …*                                 Not Recorded.
  AMENDMENTS TO MOTION OF THANKS ON  PRESIDENT’S ADDRESS     श्री संतोष गंगवार मैं प्रस्ताव करता हूँ :
१. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में सीमा पार से घुसपैठ और आतंकवाद की बढ़ती हुई घटनाओं को रोकने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
२. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में पड़ोसी देशों में आईएसआई के आतंकवादी प्रशिक्षण शविरों को बंद किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । " ३. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में आईएसआई के निरंतर बढ़ते हुए नेटवर्क को तोड़ने हेतु उचित कदम उठाए जाने की आवश्यकता के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । " ४. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- किन्तु खेद है कि अभिभाषण में श्रीलंका के अवैध प्रवासियों की समस्या हल किए जाने की आवश्यकता के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । " ५. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में जम्मू-कश्मीर से विस्थापित लोगों के पुनर्वास हेतु किसी योजना के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । " ६. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ रही अलगाववादी और आतंकवादी गतवधियों को रोकने हेतु किसी योजना के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
७. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में धनी और गरीब लोगों के बीच बढ़ती हुई खाई को कम करने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
८. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में ग्रामीण क्षेत्रों से प्रतिभा पलायन और प्रवास को रोकने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
९. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति बढ़ाए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
१०. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में कृषि उत्पादन बढ़ाने तथा और अधिक क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराए जाने हेतु कदम उठाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
११. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में निर्धारित समय सीमा में सभी को पेयजल उपलब्ध कराने हेतु किसी ठोस योजना के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
१२. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में चकित्सा व्यवसाय के तेजी से व्यवसायीकरण को रोकने हेतु किसी योजना के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
१३. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में जनसंख्या वृद्धि को रोकने हेतु किसी योजना के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
१४. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में सरकारिया आयोग की सिफज्ञरिशों को लागू किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
१५. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का सरकार के साथ हिन्दी में पत्राचार अनिवार्य किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
१६. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में घाटे में चल रही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को पुनरुज्जीवित करने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
१७. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं के कारण किसानों को हो रहे भारी घाटे को रोकने तथा उन्हें राहत दिए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
१८. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में खेल और अन्य समारोहों के दौरान पड़ोसी देशों में राष्ट्रीय ध्वज का प्रदर्शन किए जाने के विरुद्ध सरकार द्वारा दर्ज किए गए विरोध के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
१९. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में सशस्त्र सेना के तीनों अंगों में मुस्लिमों की गिनती रोके जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
२०. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश के वभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण रोकने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
२१. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में सभी नागरिकों को राष्ट्रीय पहचान पत्र दिए जाने की योजना के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
२२. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में लोकपाल विधेयक को अधनियमित किए जाने तथा इसके अंतर्गत लोकपालों की नियुक्ति कर भ्रष्टाचार रोकने हेतु किसी योजना के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
२३. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में थल सेना में एक रैंक एक पेंशन के कार्यान्वयन के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
२४. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में भारी ऋण जाल के कारण देश में किसानों की आत्महत्या की निरंतर बढ़ रही घटनाओं को रोकने की किसी योजना के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
२५. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश की सभी नदियों को परस्पर जोड़ने की योजना फिर से शुरू किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
२६. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में भविष्य नधि योजना सहित लघु बचत पर मिलने वाली ब्याज दर बढ़ाकर ९.५ प्रतिशत किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
२७. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में बंधुआ मजदूर विशेष रूप से बाल श्रमिक के उन्मूलन हेतु किसी समयबद्ध कार्यक्रम के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
२८. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में किसानों को दिए गए ऋण की ब्याज दर ९ प्रतिशत से घटाकर ६ प्रतिशत किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
२९. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में चल रही स्वर्णिम चतुर्भुज राजमार्ग योजना के शीघ्र समापन के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
३०. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में छोटे व्यापारियों के हित में खुदरा क्षेत्र में ५१ प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति संबंधी निर्णय वापस लिए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
३१. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में जरूरतमंदों को रोजगार दिए जाने के उद्देश्य से देश में लागू की जा रही ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के सुद्ृढ़ एवं प्रभावी कार्यान्वयन के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

डॉ० लक्ष्मीनारायण पांडेय मैं प्रस्ताव करता हूँ :

३२. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में खाद्यान्न एवं आवश्यक सामग्रियों के मूल्य में निरंतर अनियंत्रित वृद्धि, जिसके कारण आम आदमी की कठिनाइयां बढ़ रही हैं, को रोकने हेतु किसी वशिष्ट योजना के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "
८५६. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में वभिन्न विकासात्मक योजनाओं के लिए पिछड़े राज्य मध्य प्रदेश को केन्द्र सरकार से किसी आर्थिक पैकेज के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

८५७. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में समान चकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की तर्ज पर अस्पताल स्थापित किए जाने वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के निर्णय, जिसके अंतर्गत मध्य प्रदेश में भी एक अस्पताल खोला जाना था, के कार्यान्वयन के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

८५८. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में सभी नदियों, जिनमें मध्य प्रदेश की नदियां भी शामिल हैं, को आपस में जोड़ने के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के निर्णय को कार्यान्वित किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

८५९. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में सभी व्यक्तियों को रोग निदान और उपचार की पर्याप्त चकित्सा सुविधाएं प्रदान करने के लिए देश में पर्याप्त संख्या में आयुर्विज्ञान और आयुर्वेदिक कॉलेजों की स्थापना किए जाने तथा मध्य प्रदेश में ऐसे कॉलेजों की स्थापना के लिए अनुमोदन प्रदान किए जाने में हो रहे विलंब को दूर करने के लिए उठाए जा रहे कदमों के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

८६०. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में जनजातीय बहुल क्षेत्रों में नर्सरी, प्राइमरी और मडिल स्तर की शिक्षा के लिए प्रभावी शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए कोई प्रभावी योजना बनाये जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

८६१. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में जनसंख्या बहुल राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में वांछित दूरसंचार सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए कोई प्रभावी योजना बनाये जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

८६२. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में राजस्थान और मध्य प्रदेश को जोड़ने वाले नसीराबाद-माहु राष्ट्रीय राजमार्ग का शीघ्र निर्माण किए जाने की योजना बनाये जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

८६३. कि प्रस्ताव के अंत में यह जोड़ा जाये, अर्थात्:- " किन्तु खेद है कि अभिभाषण में सरकारी घोषणा के बावजूद ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए कोई प्रभावी योजना बनाये जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

८६४. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश के जनजाति बहुल पिछड़े क्षेत्रों में पेयजल उपलबध कराने के लिए कोई प्रभावी योजना बनाये जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

८६५. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में मध्य प्रदेश के पिछड़े क्षेत्रों में रेल और सड़क सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए कोई योजना बनाये जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

८६६. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में उद्योगों के विकास की संभाव्यता को ध्यान मे रखते हुए देश में उद्योगों के विकास के लिए मूल अवसरंचना सृजित करने के बारे में कोई उल्लेख है । "

८६७. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में मध्य प्रदेश में कुछ हवाई अड्डों को अन्य हवाई अड्डों से जोड़ने के लिए उनहें विकसित किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

८६८. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश राज्यों को पर्याप्त जल और बिजली उपलब्ध कराये जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

८६९. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में पड़ोसी देशों के साथ की सीमाओं पर सुरक्षा व्यवस्था सुद्ृढ़ किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

८७०. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में रक्षा उपकरणों के क्षेत्र में देश को आत्म निर्भर बनाये जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

८७१. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश से आतंकवाद को शीध्रा समाप्त करने के लिए उठाए गए कदमों पर पुनिर्विचार किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

श्री बची सिंह रावत बचदा मैं प्रस्ताव करता हूं :

३३. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-
" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में उत्तर पूर्व परिषद की तरह मध्य हिमालय क्षेत्र विकास परिषद के गठन के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

३४. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में पहाड़ी क्षेत्र के पिछड़े और दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में मोबाईल, वायरलेस इन लोकल लूप, बेसिक और सेटेलाईट टेलीफोन सेवाएं उपलब्ध कराए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

३५. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में उद्योगों, केन्द्रीय सेवाओं और सैन्य बलों में दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों विशेषकर उत्तरांचल राज्य के बेरोजगार युवकों को रोजगार प्रदान करने का विशेष उपबंध करने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

३६. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में पेयजल की भारी किल्लत को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाने जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

३७. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में विशेषकर उत्तरांचल राज्य और हिमालयी क्षेत्र में सरकार द्वारा नवोदय विद्यालय के पैटर्न पर नए शैक्षणिक संस्थाएं खोले जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

३८. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में लघु बचत और भविष्य नधि पर विद्यमान ब्याज की दर को बढ़ाए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

३९. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में सीमा पार आतंकवाद को समाप्त करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

४०. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में पेट्रोल और पेट्रोलियम उत्पाद की बढ़ रही कीमतों को रोकने के लिए प्रभावी प्रणाली स्थापित किए जाने के लिए कोई प्रयास किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

४१. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में काम के अधिकार को मूल अधिकार बनाए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

४२. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में सैन्य बलों में उत्तरांचल राज्य के लोगों को आरक्षण प्रदान किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

४३. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में उत्तरांचल राज्य के सवार्ंगीण विकास के लिए विशेष वित्तीय पैकेज प्रदान किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

४४. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में सबके लिए आवास सुविधाएं उपलब्ध कराए जाने के लिए समयबद्ध योजना आरंभ किए जाने केबारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

४५. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में उत्तरांचल राज्य में जहां पर्यटन के लिए बहुत से स्थान है वहां पर्यटन को प्रोत्साहनदिए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

४६. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में घाटे में चल रहे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के पुनरूज्जीवन के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

४७. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में गैर उत्पादनकारी व्यय को रोकने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

४८. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में युवाओं में नशीले पदार्थों के सेवन और आपराधिक गतवधियों की बढ़ रही प्रवृत्ति की घटनाओं को रोकने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

४९. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में पब्लिक स्कूलों, इंजीनियरिंग कॉलेजों, प्रबंध संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों की फीस को कम किए जाने की आवश्यकता के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

५०. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में भीक्षावृत्ति उत्सादन के लिए उठाए जाने वाले कदमों के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

५१. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में बाल श्रम सहित बंधुआ श्रम को समाप्त करने के लिए समयबद्ध कार्यक्रम तैयार किए जाने की आवश्यकता के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

५२. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में केन्द्रीय सहायता से नए उद्योगों को स्थापित किए जाने की आवश्यकता के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

५३. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में उत्तरांचल के पिथौरागढ़ जिले के धारचूला और मुंस्यारी क्षेत्रों को जनजातीय क्षेत्र के रूप में घोषित किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

५४. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में समान नागरिक संहिता लागू किए जानेके बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

५५. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में कच्चे माल, उपकरण और मशीनरी खरीदने के लिए दस्तकारों/शिल्पकारों को ऋण सुविधा प्रदान करने के लिए क्रेडिट कार्ड योजना आरंभ किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

५६. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में विद्युत की भावी मांग को पूरा करने के उपाय किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

५७. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में उत्तरांचल के रानीखेत छावनी क्षेत्र को नगरपालिका का दर्जा दिए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

५८. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में पिथैरागढ़, उत्तरांचल में नैनी-सैनी हवाई पट्टी विकसित करके विमान सेवा आरंभ किए जाने के लिए कदम उठाए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

५९. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में हिमालयी राज्यों विशेषकर उत्तरांचल राज्य में वृक्षों के कटान पर प्रतिबंध लगाए जाने के पश्चात् वैकल्पिक ईंधन के रूप में एलपीजी पर पूर्ण राजसहायता प्रदान किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

६०. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में वन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले लोगों और उनकी फसलों को जंगली जानवरों से बचाने के लिए उठाए जाने वाले कदमों के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

६१. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में बढ़ रही आबादी को नियंत्रित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

६२. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में धर्म के आधार पर धर्म आधारित आरक्षण, प्रोत्साहन और सर्वेक्षण का निषेध करने के लिए संवैधानिक प्रावधान किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

६३. कप्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में भय और प्रलोभन द्वारा धार्मिक संपरिवर्तन पर प्रभावी रूप से रोक लगाए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

६४. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में संविधान के अनुच्छेद ३७० जो जम्मू और कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करता है, का लोप किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

६५. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में वैज्ञानिकों, सरकारी संस्थाओं और वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं को सुरक्षा प्रदान किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

६६. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और कमजोर वर्ग पर हो रहे अत्याचार और यौन संबंधी अपराध को रोके जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

६७. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में हो रही बेतहाशा वृद्धि को रोकने के लिए ठोस उपाय किए जाने के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

६८. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुचारू बनाकर आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं को पर्याप्त कम दाम पर उपलब्ध कराए जाने की कार्य योजना के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

६९. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में देश मे दस्तकारों, बुनकरों और शिल्पकारों द्वारा वनिर्मित पारंपरिक उत्पादों के उत्पादन और विक्रय के संरक्षण के बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

७०. क प्रस्ताव के अंत में निम्नलखित जोड़ा जाये, अर्थात्:-

" किन्तु खेद है कि अभिभाषण में सभी नदियों को आपस मे जोड़े जाने की महत्वाकांक्षी योजना आरंभ किए जाने के लिए समयबद्ध कार्यक्रमके बारे में कोई उल्लेख नहीं है । "

SHRI SUKHDEV SINGH DHINDSA  I beg to move:

71.            That at the end of the motion,  the following be added, namely:-

                      “but regret  that there is no mention in the Address about the reasons for the Government’s decision to import wheat when sufficient stock is available in the country.”

72.            That at the end of the motion,  the following be added, namely:-

“but regret  that there is no mention in the Address about  any concrete time-bound programme to improve the plight of farmers.”

73.            That at the end of the motion,  the following be added, namely:-

“but regret  that there is no mention in the Address about Government’s desire to supply free water and electricity to farming community in the whole country.”

74.            That at the end of the motion,  the following be added, namely:-

“but regret  that there is no mention in the Address about any remedial measures to be adopted by Government to prevent increasing incidents of suicides being committed by farmers in the country.”

75.            That at the end of the motion,  the following be added, namely:-

“but regret  that there is no mention in the Address about  Government’s desire to provide interest free loans by Banks and other financial institutions to farmers whose crops are damaged by natural calamities.”

76.            That at the end of the motion,  the following be added, namely:-

“but regret  that there is no mention in the Address about any plan of the Government for transfer of Chandigarh to Punjab.”

77.            That at the end of the motion,  the following be added, namely:-

“but regret  that there is no mention in the Address about the steps to be taken by the Government to increase the strength of minority Sikh community the armed forces.”

78.            That at the end of the motion,  the following be added, namely:-

“but regret  that there is no mention in the Address about Governmment’s desire to hand over all the documents pertaining to Sikh history alleged to be in the possession to Shiromani Gurudwara Prabandhak Committee.”

79.            That at the end of the motion,  the following be added, namely:-

“but regret  that there is no mention in the Address about Government’s intention to follow up the matter relating to ban on wearing of Turban by Sikh students in France with Government of France.”

80.            That at the end of the motion,  the following be added, namely:-

“but regret  that there is no mention in the Address about providing Indian citizenship to thousands of Indian born refugees whose parents migrated from Afghanistan and have been living in India since long.”

81.            That at the end of the motion,  the following be added, namely:-

“but regret  that there is no mention in the Address about  any decision of the Government about granting of dual citizenship status to NRIs and people of Indian origin.”

82.            That at the end of the motion,  the following be added, namely:-

“but regret  that there is no mention in the Address about any plan of the Government to improve the dilapidated condition of historical Sikh Gurudwara in Pakistan.”   SHRI B. MAHTAB I beg to move
120.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
 
“but regret that there is no mention in the Address about providing gainful employment to the youths of Orissa.”  
121.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
                      “but regret that there is no mention in the Address about any plan for  expansion of women education in the country.”  
122.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
                      “but regret that there is no mention in the Address about waiving of the loan granted to Orissa Government.”  
123.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
 
                      “but regret that there is no mention in the Address about declaring Orissa as a Special Category State.”  
124.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
 
                      “but regret that there is no mention in the Address about strengthening the Health Services in Orissa.”  
125.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
 
                      “but regret that there is no mention in the Address about providing healthcare to all expectant mothers and newly born children in Orissa.”
126.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
   
                      “but regret that there is no mention in the Address about providing adequate funds to Orissa for development of rural roads under Prime Minister Gram Sadak Yojana.”  
127.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
 
                      “but regret that there is no mention in the Address about increasing allocation of funds for Central Sponsored Accelerated Rural Water Supply Programme in Orissa.”  
128.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
                      “but regret that there is no mention in the Address about inclusion of the remaining eleven districts of Orissa in the National Rural Employment Guarantee Scheme.”  
129.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
 
                      “but regret that there is no mention in the Address about increasing labour intensive projects to provide employment to the rural poor in Orissa.”  
130.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
 
                      “but regret that there is no mention in the Address about increasing the irrigation potential in the State of Orissa.”          
131.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
 
                      “but regret that there is no mention in the Address about any plan to connect river Mahanadi with river Rishikulya in Orissa.”  
132.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
 
                      “but regret that there is no mention in the Address about any plan to connect river Bansadhara with river Rishikulya.
 
133.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
 
                      “but regret that there is no mention in the Address about opening of Indian Institute of Technology in Orissa.”  
134.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
 
                      “but regret that there is no mention in the Address about declaring University of Orissa as a Central University.”  
135.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
 
                      “but regret that there is no mention in the Address about opening of National Institute of Science in Bhubneshwar.”  
136.    That at the end of the motion, the following be added, namely :-
 
                      “but regret that there is no mention in the Address about giving a special economic package for the overall development of Orissa.”     SHRI BASU DEB ACHARIA  Sir, in the last Lok Sabha elections people of our country voted for a change.  The people of our country did not support any political formation. The people of our country wanted that there should be a change in the policy, outlook and in the attitude because of the experience of the people of our country during six years of NDA regime. During this NDA regime the agriculture of our country was ruined and there had been agrarian crisis.  The crisis was accentuated and the marginal farmers became poorer and poorer.  The number of agricultural workers was increased. The unemployment in rural areas was increased.  Industries were closed and public sector undertakings were disinvested and sold at a throw away price.  That is why the people of our country voted for a change and they voted for a secular Government.  They prayed that in future there should not be any incident like Gujarat or Manohar Pur in our country.  Rashtrapati Ji also, in his Address to both the Houses of Parliament assembled together referred to this.  I would like to quote him.
“This Government was voted to Office to effect this precise change.  Only for change in the policy, outlook and attitude, the people of our country voted for this Government. ”   But what is our experience during these 20 months of this Government?  Rashtrapati Ji has said a lot about the problems being faced by the agriculture and the programmes being launched by the UPA Government.  I would like to quote him.
“My Government has given the highest priority to the welfare of our farmers and to the development of our rural economy.  There has been 60 per cent increase in the credit to the agricultural sector.  Long-term measures for the revival of cooperative credit institution, as recommended by the Vaidyanathan Committee, are being implemented[R38] . ” What is our experience?  The farmers of our country are committing suicide.  Why are they committing suicide?  Thousands and thousands of the farmers of Maharashtra, particularly Vidharbha area, Karnataka, Andhra Pradesh and even the farmers of your State, Punjab also are committing suicide.  More than 30,000 farmers have committed suicide so far.  During the last several years, the income of the farmers has come down.  It is all because of the policy of liberalisation and globalisation.  It has an adverse impact on the agrarian sector of our country. There has been reduction in the subsidy.  If you see the prices of the fertilisers, during the last several years there has been steep rise in the prices of the fertilisers.  The subsidy was being provided to keep the prices of fertilisers at a lower level. Now the subsidy has been reduced. With the result, the prices of fertilisers have increased.  Due to the reforms in the power sector, the tariff for the agricultural sector has increased.  Our market was opened up during the NDA regime.  They had opened our doors and they had removed quantitative restrictions.  Now there is no restriction and 1439 items can be imported from various countries.  Moreover, the capital formation and public investment in agriculture has also been reducing gradually.  It was 14 per cent during Eighties and it came down to only 07 per cent in Nineties and thereafter.  As a result of this, there has been stagnation in the agriculture sector and there is stagnation in the expansion of irrigated area also. 
The institutional credit also has been reduced and now the farmers have to depend on the moneylenders.  That problem has not been properly addressed.  The cost of inputs is  also rising and because of these factors, there are crisis in the agrarian sector and the farmers are committing suicide.  In the Rashtrapatiji’s Address, there is no mention about the crisis.  He has just stated some measures which the government is now taking.  But how to overcome the crisis being faced by the agrarian sector has not been mentioned here.  Around 80 per cent of the people of our country are dependent on agriculture. 
Another factor is the rise in the prices of essential commodities[r39] .
            Sir, the poorer sections of our country are being affected adversely because of this. The prices of foodgrains, particularly that of wheat has been increased. The price of wheat has been increased to Rs. 15/-. Not only there has been an increase in the prices of foodgrains, but also in the prices of other commodities. The gap between rich and poor has increased. There has been no attempt made to reduce this gap.
15.56 hrs.                  (Shri Girdhar Gamang in the Chair)             A promise had been made in the National Common Minimum Programme to strengthen the Public Distribution System. During the NDA regime this was restricted to only targeted groups. The prices of foodgrains distributed through the Public Distribution System were also increased. The prices of the foodgrains to be supplied through the Public Distribution System to the people living above the poverty line were increased to such extent that such foodgrains available in the market were lower in prices to those supplied through the Public Distribution System. It was done with an intention only to weaken the Public Distribution System. There is not only need to strengthen the Public Distribution System but also to universalise the Public Distribution System. To do this, all that is required is spending a few thousand crores by the Government. Three years ago commodities like wheat and rice were exported at a cheaper price. It was exported one rupee cheaper than what was available to people living below the poverty line. How much did the Government spend on export subsidy then? It was to the extent of Rs. 15,000 crore. Now, if for export subsidy the Government could spend Rs. 15,000 crore, could the Government not spend a few thousand crore for universalising the Public Distribution System in order to make available foodgrains at cheaper rates to around 80 per cent of the population of our country? No attempt has been made either to strengthen or to universalise the Public Distribution System.

            There has also been stagnation in production. There is a negative growth in the agricultural sector. Growth is less as compared to growth in population. The situation is such today that the per capita consumption of foodgrains has been reduced. It has gone back to the level of what it was at the time of the Second World War. As a result of this there is hunger, there is starvation in the rural areas. During these 20 months of existence of this UPA Government, this problem has not been addressed, rather it has got further accentuated. This is evident more in rural areas[snb40] .

16.00 hrs.             Sir, the condition of the people in the rural areas is becoming worse.  Rashtrapatiji has referred about modernisation of our airports in his Address. He has stated:

“My Government intends to create world class airports in India.  A comprehensive Civil Aviation Policy is on the anvil.  The process of modernisation and expansion of the Delhi and Mumbai Airports through public-private partnership has already commenced.”   We are not objecting to modernisation of airports.  But how can this be done?   The Mumbai and Delhi Airports are the two important airports of our country and 60 per cent of the revenue comes from these two airports.  Where is the need for their privatisation?  One year back, we, the Members from the Left Parties, met the Prime Minister and submitted a proposal prepared by the Unions of Airports Authority of India.  They have formed a Joint Forum.  The proposal was that, without taking a single paisa from the Government, these two important airports could be modernised and upgraded to the international standard.  The Prime Minister assured us that the Government would examine it seriously.   But when the Government has decided to privatise, there is no other alternative except to hand over these two important airports to the private sector without seriously considering the alternate proposal submitted jointly by the Unions of Airports Authority of India and the Joint Forum of the Unions of Airports Authority of India .  In spite of the fact that the Airports Authority of India is capable to modernise them, is capable of investing funds and it earns profits, why did the UPA Government decided to hand over these two airports?  It goes against the National Common Minimum Programme.  Sir, it has been stated that the profit-making public sector undertakings will not be privatised.  It goes against what has been committed in the National Common Minimum Programme. Rashtrapatiji has also stated:
“My Government is committed to doing so through the National Common Minimum Programme.”   That is what Rashtrapatiji has stated.  But what the Government has done in the case of the two airports is contrary to what has been stated in the National Common Minimum Programme[bru41] . We have no objection to green field airports.  Plans are being made to modernise and develop Kolkata and Chennai airports. We would like to know whether the same system will be applied for the modernisation of Kolkata and Chennai airports also.  We would like to know whether the same route of public private participation will be adopted. 
Last Session, there was a debate in this House.  We demanded that all the materials relating to the tender should be placed on the Table of the House as it was done in a very dubious manner.  An Expert Committee was appointed under the Chairmanship of Shri Sreedharan, the Chief of Delhi Metro Corporation.  What has this Expert Committee recommended? This Expert Committee recommended that one airport should be modernised and upgraded to international standards by the Government under the Government control. For another airport this Committee recommended that fifty per cent of the share should be with the Government. But the Government went contrary to the recommendations of the Expert Committee.  I demand that all the papers, including the Expert Committee's Report, must be made public so that people of our country would know what has happened.  Since we have the right to information now, people of our country should know what has happened behind the curtain. 
In regard to separate freight corridor, we have been told that there would be two separate freight corridors. One is Kolkata--Delhi and another is Mumbai --Delhi.  But in the President's Address it is mentioned:
“The Government has  decided to build two dedicated high capacity freight corridors -- the Eastern Corridor from Ludiana to Sonnagar”   There is no mention of Kolkata. It further says that there will be a Western Corridor from Jawaharlal Nehru Port Trust to Dadri.  Then, why is it called Kolkata--Delhi Corridor?  If it starts from Sonnagar, how can the traffic coming through Kolkata and Haldia Port come to northern parts of our country?  
The RITES prepared a Report. It recommended a freight corridor from Kolkata to Delhi.  Why has it been changed from Kolkata to Sonnagar? Tram route is already saturated. It has reached 117 per cent. There is a need for a separate corridor because we have to increase our freight traffic. 
The hon. President has also referred to improvement in power situation in our country[r42] .
            While referring to improvement in the power situation in our country, he has mentioned about Dabhol Power Corporation.  You know, Sir, there was an agreement with the Enron. They started the construction of it. They started generation. The first unit started generating power but the unit cost of power was too high, it was Rs. 6 per unit. After two years or three years of generation, it was closed down. The Enron did not bring a single paisa from the United States of America. They took money, the loan from our financial institutions like the IDBI and the State Bank of India. Now, the Government of India has decided to revive it. By spending how much, would it revive the Project? It is spending about Rs.10,000 crore. Government can spend Rs.10,000 crore for the revival of a sick company; dole out the money. This fund is coming from the financial institutions and the public sector undertakings like the NTPC and the Gas Authority of India Limited. But the Government has  no money when we ask for the revival of our own sick public sector undertakings. In the National Common Minimum Programme, it has been stated that attempts should be made to revive the sick public sector undertakings. It has been stated:
“All privatisation will be considered on a transparent and consultative case-by-case basis. The UPA will retain existing “navaratna” companies in the public sector, while these companies raise resources from the capital market. While every effort will be made to modernise and restructure sick public sector companies and revive sick industry, chronically loss-making companies will either be sold-off or closed after all workers have got their legitimate dues and compensation…”             So, Sir, a Board for revival of sick public sector undertakings was constituted. The Board recommended the revival of certain sick public sector companies. But the Government is not providing financial assistance for the revival of such companies. The Government has no money for the revival of its own company but the Government has money to revive the Dabhol Corporation. It is spending Rs.10,000 crore for the revival of a dead company, a private company. The  money was taken away by the Enron company. They closed down the unit and left the country. They are not being penalised. Moreover, the public sector undertakings and the financial institutions are forced to provide fund for the revival of the Dabhol Power Plant. For whose interest is it done?
            We have been opposing the Foreign Direct Investment in certain sectors. We are not opposed to the Foreign Direct Investment per se.  We will welcome the Foreign Direct Investment if it helps to bring new technology, the technology which is not available in our country.  We will welcome the Foreign Direct Investment if it helps to generate employment, if it helps to increase the productivity and production. Why are we opposing the FDI in the retail sector? The Government is bent upon opening our retail sector also. The earlier Government decided about it but they could not do it. Now, the UPA Government, in the name of brand product,  has decided to open the retail sector also[R43] . They [r44] will allow the FDI in retail sector in the name of brand.  In the name of brand how many products will come to our country?  What will happen to our small traders? I want to know whether the FDI in the retail sector will be able to generate employment? Or will the FDI in retail sector throwaway lakhs and lakhs of the people who are engaged in the small trades?  Without considering its serious impact, the Government decided to open, in the name of brand product, the retail sector to FDI.
            Sir, in regard to Foreign Policy, I quote what has been stated in the National Common Minimum Programme:
“Even as it pursues closer engagement and relations with USA, the UPA Government will maintain the independence of India’s Foreign Policy position on all regional and global issues.”   The earlier Government changed the Foreign Policy.  They surrendered to the dictates of US Imperialism.  That is why the Left Parties wanted that we should have our independent Foreign Policy.  Why do we want independent Foreign Policy?  We want the independent Foreign Policy to protect the interest of our country.
            What has happened in the case of Iran?  The Prime Minister has made a statement.  He has not mentioned about United States of America. Nowhere he has mentioned it. Hon. Rashtrapatiji has also not mentioned about Iran.  Why? The Government of India took such a position and has lined up with the United States of America. 
            Today, during ‘Zero Hour’ we raised the issue on the statement made by the US Ambassador, David C. Mulford.  We have very categorically stated that the remark or statement made by US Ambassador was not a personal statement.  This is not the question of whether Iran will continue to develop nuclear weapons or not, but the question is whether the United States of America will dictate others.  
            After Afghanistan, before attacking Iraq, George W. Bush said: ‘excess of evils’.  Which countries are ‘excess of evils’?  They are Iran, Iraq, Syria and North Korea.  I had been to Iraq 15 days before Iraq was attacked by the United States of America[r45] . I went in the corners of this country.  I had been to Babylon and Karbala.  Shri N.N. Krishnadas also went along with us. It is such a beautiful country.  It is a secular country. For ten years, during sanction, how the people of Iraq suffered?  We have seen the children suffering in the hospitals without medicines.  … (Interruptions)  what did Mr. George Bush say before attacking?  He said that they have Weapons of Mass Destruction (WMD).  Without taking permission from UNO, without caring for UNO, they started attacking Iraq.  After three years of occupation, not a single part or particle of weapons of mass destruction could be found in Iraq.  Thousands and thousands of innocent people were killed.  Sanction was imposed for more than ten years. What was the fault of the people of Iraq?  Now, Sir, the same method would be applied in the case of Iran, whether Iran is complying with the safeguards that is there.  It is because Iran is a member, it is a signatory to NPT, the question as to whether they are complying or not can be resolved in International Atomic Energy Agency (IAEA).  But, from day one, even before September meeting US President is saying that it has to be referred to the Security Council.  We were never told; only we came to know on the day of voting.  We were surprised that our Government, our representative there, voted along with USA and EU-3 without caring, without taking into confidence the Parliament, the people of our country, and without taking into confidence the parties who are extending support from outside. 
This Government is dependent on our support.  Without taking us into confidence, the Government took unilateral decision to support USA and to follow the line or line up with USA and EU-3.  Then, we demanded that the mistake which was committed in the month of September should be corrected. It is because we would get another opportunity.  We discussed here and the same thing happened when there was another voting on 6th of March in Vienna.  Our representative, the Government of India, lined up with USA and EU-3.  Other countries, smaller countries, non-aligned countries like South Africa, Venezuela, Cuba either abstained themselves or opposed resolution referring Iran to the Security Council.[r46]              Sir, if it is referred to the Security Council and sanction is imposed, which is the motive and intention behind referring Iran to the Security Council, the United States of America is preparing to attack Iran. On the borders of Iraq, they have 1,20,000 forces. They are ready to attack Iran.
            How can we define our independent foreign policy? What is the meaning of independent foreign policy?
16.26 [m47]  hrs.                              (Shri Varkala Radhakrishnan in the Chair)             I quote what the Prime Minister in his statement has stated. He has stated, “The House will agree that the stance taken by the Government has been consistent.” It may be consistent with the stance taken by the earlier NDA Government but not consistent with the stance we took in the past. The statement says: “It is consistent in keeping with the well considered independent judgement of national interest.” What is the national interest? By supporting the United States of America, will our national interest be protected? Then why did the Government of India take such a stance? Is it not contrary to what has been stated in the National Common Minimum Programme? Is this programme only to form the Government? After formation of the Government, they will forget about what is there in the National Common Minimum Programme and they will pursue their own course.

            We know that there is no difference in regard to the economic policy between this Government and the earlier Government. The only difference with this Government is that this Government is depending on the support of the Left parties. Why are we extending support? Our support should not be taken for granted. Why we are extending support is that we want that there should be a change in the policy which was being pursued by the earlier Government.

MR. CHAIRMAN : Mr. Basu Deb Acharia, you have taken about 40 minutes. There are four speakers after this. So, it will be better if you conclude.

SHRI BASU DEB ACHARIA : Sir, I will finish it in five minutes. Our Party has another three speakers to speak.

MR. CHAIRMAN: There are four speakers to speak and you have taken more or less 40 minutes. It is altogether 58 minutes. It is better to conclude.

SHRI KHARABELA SWAIN (BALASORE): Sir, you allow him to threaten the Government more.

SHRI BASU DEB ACHARIA  : In Rashtrapatiji’s Address, there is no mention about the restoration of democracy movement which is going on in the neighbouring State of Nepal. All the political parties have formed an alliance and they are fighting against the monarchy. The people of Nepal need the support and assistance from the people of our country. Why we are extending support to this Government is that this Government should undo the wrong which was done by the earlier NDA Government. But during the 20 months of its existence, this is our experience!             What Rashtrapatiji has stated in his speech is that this Government was voted to office to effect this precise change[m48] . [R49]  The Government should seriously think of it. Some bold measures are to be taken to arrest the crisis which is there in the agricultural sector.  The poor sections are  becoming poorer and poorer.  Unemployment is growing in the rural economy and if it has not been arrested, the crisis in the rural sector cannot be solved.  The condition of the agricultural labourers, poor farmers, marginal farmers and middle class people is gradually becoming worse.  

            The Government has committed in the National Common Minimum Programme that they would bring in a legislation for the unorganised workers. Today, in our country there are 37.5 crore people in the unorganised sector.  The Government is committed to provide social security to these 37.5 crore people who are in the unorganised sector.  There are 22 crore agricultural labourers in the country and there is no law for them.   In the National Common Minimum Programme it has been stated that the interests of the agricultural labourers would be protected.   But nothing has been done so far for these agricultural labourers and for the workers who are there in the unorganised sector.

            The Government has reduced EPF interest rate.   We raised this issue on the floor of the House during the last Session also.  Earlier, it was 11 per cent and even 12 per cent.  During the NDA regime, it was reduced to 8.5 per cent.  Last year it was increased to 9.5 per cent.   Again, this year the Government has reduced it to 8.5 per cent. What is the argument of the Government?  If 9.5 per cent is given as an interest rate for Employees Provident Fund, then the Government will have to provide Rs. 765 crore as subsidy.    For how many workers that this Rs. 765 crore will go?  It is for 17 crore people of our country.  They say that they do not have money of Rs. 765 crore for 17 crore people of our country. How much is the amount the Government not getting because of tax evasion?   Today, how many people are paying tax whose income is more than Rs. 10 lakh?  Their number is only 80,000.  In a country of 104 crore people, there are only 80,000 people whose income is more than Rs. 10 lakh.   The tax evasion is to the extent of Rs. 1,20,000 crore.  Can the Government not realise that amount?   I am not talking of NPA and the bad debts etc.  We have suggested as to how the resources can be mobilised, how the poorer and middle class people can be given relief and how the richer sections, who can afford, can be taxed.   The need of the hour is that unless there is a change in the outlook and in the approach and unless the Government feels for the poor and the middle class who are about 80 per cent of the people, the people will not say that there is change[R50] .

            Sir, we demand that they should learn from our relations with them. If they continue to commit the mistakes which the earlier Government committed, then this Government will also face the same consequences and the people will not pardon them. Time is still there and the Government should think seriously on these issues.

            The basis for formation of this Government is the National Common Minimum Programme on which this Government has been formed. They should stick to it sincerely and try to implement what has been committed and promised in the National Common Minimum Programme particularly the programmes which are for the agricultural labourers, poor sections of the people of our country and for the working class and middle class people of our country.

            I thank you, Sir, for giving me the opportunity.

श्री रामजीलाल सुमन  सभापति जी, महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा १६ फरवरी को संसद के संयुक्त अधिवेशन में दिये गये अभिभाषण पर यह सदन चर्चा कर रहा है। सब लोग जानते हैं कि राष्ट्रपति जी महज एक औपचारिकता पूरी करते हैं। सही मायनों में राष्ट्रपति जी का अभिभाषण सरकार का नीति वक्तव्य होता है। सरकार की कमजोर वर्गों के प्रति प्रतिबद्धता, गरीबों के लिए, किसानों के लिए सरकार के क्या इरादे हैं, ये सब चीजें राष्ट्रपति का अभिभाषण दर्शाता है।

सभापति महोदय, अभी हमारे कांग्रेस के मित्रों ने जो भाषण दिये, उसमें उन्होंने अपनी उपलब्धियां गिनाईं। महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार जो कुछ करती है, उसकी सीधी प्रतक्रिया जनता पर होती है। हम कितने चले हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है। उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि हम किस दिशा में चले हैं। अगर कोई सरकार गांव, गरीब, किसान, मजदूर और बेरोजगारों का भला नहीं कर सकती तो निश्चित रूप से कहा जायेगा कि उस सरकार के चलने की दिशा ठीक नहीं है।

सभापति महोदय, सरकार भाषणों से नहीं चलती। सरकार का काम बोलता है और सरकार कैसा काम कर रही है, इसकी आवाज खेत-खलिहान और चौराहों से आती है, सड़क से आती है। राष्ट्रपति जी का जो अभिभाषण हुआ, उससे कम से कम समाजवादी पार्टी बहुत निराश है। हम यह अपेक्षा नहीं करते थे कि यह सरकार बिल्कुल दिशा भ्रमित हो जायेगी और अपने फर्ज को पूरा नहीं करेगी। निश्चित रूप से यह अभिभाषण किसी भी कीमत पर संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। सबसे बड़ी समस्या भूख की होती है। नवम्बर, २००५ में हमारे देश में १४८ लाख टन गेहूं था जबकि हमारे देश में गेहूं की अधिकतम मासिक आवश्यकता १२ लाख टन से लेकर १४ लाख टन है। भारतीय खाद्य निगम के अध्यक्ष श्री वी.के. मल्होत्रा स्वीकार करते हैं कि देश को जितने खाद्यान्न की आवश्यकता है, उतना खाद्यान्न हमारे पास cè[r51] ।

 इसके बावजूद भी राज्य सरकारों को कहा गया कि वे चाहें तो खुले बाजार से गेहूं खरीद लें और इतना ही नहीं पहली जनवरी को सरकार ने निर्णय ले लिया कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली से एक परिवार को एक महीने में जो ३५ कि.ग्रा. गेहू मिलता था, वह घटाकर २० कि.ग्रा. कर दिया गया और जो कीमत पहले ६ रुपये १० पैसे थी, उसे बढ़ाकर ७ रुपये ५ पैसे कर दी गई। इसका परिणाम यह हुआ कि गेहूं के दाम आसमान छू गये। हमारे लिए यह समझना बहुत मुश्किल है कि पांच लाख टन आयात का फैसला सरकार ने कैसे कर लिया गेहूं का आयात अगर सरकार करना चाहती है, अगर यह आयात हो भी जाए तो अप्रैल और मई से पहले यह आयातित गेहूं देश में नहीं आ सकता। अप्रैल और मई में तो हमारी फसल तैयार हो जाएगी। मेरी जानकारी के अनुसार आयातित गेहूं का मूल्य ७ रुपये ६० पैसे होगा। यह सरकार जो काम कर रही है, यह काम सरकार का न्यायसंगत नहीं है। आज किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, अभी कांग्रेस के मित्र ने भाषण दिया कि अब इस देश में कोई भूख से नहीं मरेगा। कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब तथा आन्ध्रा प्रदेश इन राज्यों में बड़े पैमाने पर किसानों ने आत्महत्याएं की हैं और यह सदन इस पर चर्चा भी कर चुका है। पहले तो सरकार यह मानती ही नहीं थी कि आत्महत्याएं हुई हैं लेकिन ६ दिसम्बर २००५ को महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री ने स्वीकर किया कि किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं और महाराष्ट्र में भी हजारों किसान ऐसे हैं जिन्होंने आत्महत्याएं की हैं।

यह राष्ट्रपति जी का अभिभाषण है और इसका जो बिन्दु ११ है, उसमें कहा गया है कि मेरी सरकार ने हमारे किसानों के कल्याण तथा हमारे ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। कृषि क्षेत्र में दिये जा रहे ऋण में ६० प्रतिशत की वृद्धि हुई है। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि कृषि क्षेत्र में कितनी वृद्धि हुई है बल्कि उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि किसान जो ऋण लेता है, उसे अदा करने की हालत में क्या वह कभी आ सकता है ? आज किसानों की आत्महत्याओं का अगर कोई कारण है तो यही कारण है कि खेती अलाभकारी हो गई है। किसान जो ऋण लेता है, उसे वापस करने की उसकी क्षमता नहीं है। इसलिए बुनियादी सवाल यह है कि जब तक खेती लाभकारी नहीं बनेगी तब तक किसान का संकट दूर नहीं हो सकता। उसकी तरफ हमारा कोई ध्यान नहीं है। खाद, बिजली, पानी इत्यादि सहूलियतें किसानों को मिलनी चाहिए। उसकी ओर सार्थक प्रयास हमारे देश में नहीं किये जा रहे हैं।

जहां तक देश की सुरक्षा का सवाल है, वह चाहे आंतरिक सुरक्षा हो या बाहरी सुरक्षा हो, दोनों ही द्ृष्टि से इस देश की स्थिति संतोषजनक नहीं है। आज हमारे देश में १३ प्रांत ऐसे हैं जो नक्सलवादी गतवधियों से प्रभावित हैं। यह सरकार खुद स्वीकार करती है, केन्द्रीय गृह सचिव श्री दुग्गल जी स्वीकार करते हैं कि वर्ष २००४ की तुलना में २००५ में ४ प्रतिशत नक्सलवादी गतवधियों में बढ़ोतरी हुई है और देश के गृह मंत्री कहते हैं तथा वे खुद स्वीकार करते हैं कि नक्सलवाद से निपटने के उपायों पर जो धनराशि व्यय की जानी चाहिए थी, वह व्यय नहीं हो पाई। मैं यह मानता हूं कि नक्सलवाद की समस्या निश्चित रूप से हमारे सामाजिक, आर्थिक कारणों से जुड़ी है[R52] । इस सदन में चर्चा हुई और मैं आरोप लगाना चाहता हूं कि एक सार्थक चर्चा के बाद भी सरकार को जो युद्ध स्तरीय प्रयास करने चाहिए थे, वे नहीं किए। हमारे देश में बुनियादी समस्या गरीबी, बेबसी और लाचारी की है। जब रोजगार के सब दरवाजे बंद हो जाते हैं, तो लोगों के पास हथियार उठाना ही माध्यम रह जाता है। इन तरफ जितनी गम्भीरता से ध्यान दिया जाना चाहिए था, वह नहीं दिया गया।

हमारी स्थिति क्या है, १४ जनवरी, २००६ को समाचार पत्रों में सेना के प्रमुख जे.जे. सिंह का बयान छपा कि कश्मीर घाटी से सेना को नहीं हटाया जाएगा। उसके बाद ७ फरवरी को समाचार पत्रों में छपा कि तीन हजार सैनिकों को घाटी से हटा लिया गया है। समाचार पत्रों में यह भी छपा कि सीमा पार से आतंकवादियों के प्रशिक्षण शविर पुन: चालू हो गए हैं। हम जानना चाहेंगे कि वे कौन से हालात थे, जिनके चलते कश्मीर घाटी से इन सैनिकों को वापस बुलाने का काम सरकार ने किया?

आजकल राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना के बड़े-बड़े इश्तेहार छप रहे हैं और उसमें बताया गया है कि २ फरवरी से इसे लागू कर दिया गया है। राष्ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में इसका जिक्र भी किया है, लेकिन सरकार ने यह खुलासा नहीं किया कि २०० जिलों में तो यह योजना शुरू हो गई है, देश के बाकी दो तिहाई जिलों में यह योजना कब तक चालू होगी? इस सरकार का क्या लक्ष्य है, यह सरकार क्या सोचती है, इस सरकार के पास कितने संसाधन हैं, क्या इरादा है और कब तक सम्पूर्ण देश में यह योजना लागू हो जाएगी, इसके बारे में भी सरकार चुप है और राष्ट्रपति जी का अभिभाषण भी चुप है। इस योजना के तहत लोगों को साल में १०० दिन काम मिलेगा और ६० रुपए रोज मजदूरी मिलेगी। सरकार को यह भी इंतजाम करना चाहिए कि बाकी के २६५ दिनों में अगर उसे काम नहीं मिलेगा तो वह क्या करेगा, आज जबकि चीजों के दाम आसमान पर हैं, दूध २० रुपए प्रति लिटर और आटा १५ रुपए प्रतकिलो हो गया है। इसलिए जीवन की दूसरी सुविधाएं उसे कैसे मिलेंगी, इसका अंदाजा आप सहज ही लगा सकते हैं। सरकार कहती है कि हम रोजगार दे रहे हैं, लेकिन योजना आयोग खुद स्वीकार करता है कि रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं। इस देश में बेरोजगारी का क्या हाल है, इसका अंदाजा एक घटना से लगाया जा सकता है। जम्मू-कश्मीर में वभिन्न श्रेणियों के लिए पांच हजार भर्तियां होनी थीं। उसके लिए आवेदन पत्र मांगे गए, उनकी संख्या तीन लाख तक थी। हम किस दुनिया में जी रहे हैं, हम किस गलतफहमी के शिकार हैं, हम कहां जा रहे हैं, इससे पता चल जाता है। देश में बेरोजगारी दिन-ब-दिन बढ़ रही है। आर्थिक उदारीकरण के चलते और सरकार की गलत नीतियों के चलते मजदूरों के लिए, किसानों के लिए और शक्षित बेरोजगारों के लिए जो प्रयास होना चाहिए, उसका कोई नक्शा-खाका इस सरकार के पास नहीं है।

जहां तक ईरान का सवाल है, सब जानते हैं कि राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में दुनिया के तमाम देशों के साथ हमारे क्या रिश्ते बने हैं, हमारे प्रधान मंत्री कहां-कहां गए और किस-किस देश के राष्ट्र प्रमुख हमारे यहां आए, उन सबका खुलासा इसमें करने की कोशिश की गई है, लेकिन ईरान के बारे में एक शब्द भी इस अभिभाषण में नहीं है। पता नहीं क्या सूझा प्रधान मंत्री जी को कि उन्होंने तत्काल अभिभाषण के दूसरे दिन ही ईरान पर वक्तव्य दिया। मैं बगैर किसी लाग-लपेट कर सीधे-सीधे कहना चाहूंगा और मेरा इस सरकार पर आरोप है कि यह सरकार आजकल अमेरिका की गुलामी करने के अलावा कुछ नहीं कर रही है। हमारी ईरान से हजारों वर्षों से दोस्ती रही है। उससे हमारे पुराने रिश्ते रहे हैं। पंडित नेहरू, मार्शल टीटो और नासिर ने मिलकर गुट निरपेक्ष की नीति बनाई थी और हम गुट निरपेक्ष देशों के नेता रहे हैं। हम अपने दिल पर हाथ रखकर पूछें कि क्या हम आज उससे भटक नहीं रहे हैं। आज सुबह चर्चा हुई कि अमेरिका के राजदूत हमें धमकाते हैं और सरकार को कहते हैं कि या तो हमारे हक में जाओ, वरना उसके परिणाम भुगतने को तैयार रहो[R53] । वह पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री को पत्र लिखता है। अगर आपकी नीयत साफ है, तो आप शुरूआत कीजिए, अमेरिका के राष्ट्रपति से अपना विरोध दर्ज कर दीजिए और कहिए कि और चीजें तो बाद में हो जाएंगी, कम से कम इस राजदूत को बुलाने का काम करें। यह भी सरकार की नीयत नहीं है। मैं कहना चाहूंगा कि सही मायने में जो आज स्थिति है, अफगानिस्तान और इराक में जो कुछ अमेरिका ने किया, अमेरिका वही ईरान में करना चाहता है। अभी आप लोगों ने देखा होगा कि इराक की जेलों में अमेरिकी सैनिकों ने जो अमानुषिक अत्याचार इराकियों पर किए, उसकी तस्वीरें पूरी दुनिया में दिखायी गयीं। कोई क्रूर संस्था या देश ही ऐसा कर सकता है।अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के संचालक मंडल की बैठक में भारत समेत २७ देशों ने ईरान के विरोध में मत दिया और यह मामला सुरक्षा परिषद के हवाले चला गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका यह आरोप बार-बार लगाता है कि ईरान परमाणु शक्ति बना रहा है। अब इससे बड़ी बात क्या होगी कि अमेरिका के प्रमुख परमाणु विशेषज्ञ श्री डेविड अल्ब्राइट ने कहा है कि ईरान के कथित परमाणु हथियार बनाने के बारे में अमेरिकी खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट गलत है और इसका सत्यता से कोई संबंध नहीं है। इतना बड़ा आदमी, जो विशेषज्ञ है, जो कह रहा है कि यह खुफिया रिपोर्ट गलत है, इसके बावजूद भी अमेरिका बराबर आरोप लगाता है कि वह सीमा उल्लंघन कर रहा है।अंतराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के अध्यक्ष मो. अल बेर देई ने कहा है कि ईरान की परमाणु गतवधियों से कोई आसन्न खतरा नहीं है। इससे बड़ा सबूत और क्या होगा? जहां तक परमाणु कार्यक्रम का संबंध है, उसकी नीयत ठीक नहीं है और एक बार नहीं बार-बार ईरान ने कहा है कि जो परमाणु संयत्र है, इसका प्रयोग हम बिजली बनाने के लिए करेंगे, इसके अलावा हम कुछ नहीं करना चाहते। सही मायने में जो अमेरिका का रवैया है वह ईरान में वही सब कुछ करना चाहता है, जो उसने अफगानिस्तान और इराक में किया। श्री जार्जबुश ने कहा है कि ईरान पर हमला ही आखिरी रास्ता है। अमेरिका ईरान पर हमला करने के लिए मानसिक रूप से तैयार है और सब बहानेबाजी हो रही है। उसका जो काम करने का इरादा है और जो काम करने का तरीका है, वह इस प्रकार का है, " न तड़पने की इजाजत है न फरियाद की है, घुट के मर जाऊं यह मर्जी मेरे सैय्याद की है।"इसलिए हम कहना चाहते हैं कि समाजवादी पार्टी का द्ृष्टिकोण बिल्कुल साफ है। अभी हमारे सीपीएम के मित्र अपना भाषण कर रहे थे, हम इनके साथ २ मार्च को प्रदर्शन भी करेंगे, लेकिन मैं सदन में कहना चाहूंगा कि ईरान के सवाल पर अगर भारत की सरकार ने अपना रवैया नहीं बदला, तो समाजवादी पार्टी के पास इस सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। यह सरकार कुछ भी कहे, लेकिन हमारी जो गुट-निरपेक्षता की नीति है, उससे यह सरकार हटी है। पेट्रोल और डीजल के दाम जब चाहे बढ़ा दिए जाते हैं और कहा जाता है कि हमारी मजबूरी है, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड आयल का दाम बढ़ गया है, तो हम क्या करें? जब क्रूड आयल का दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ६७ डालर प्रति बैरल हो गया था, तो सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दामों में बेतहाशा वृद्धि कर दी, लेकिन मैं पूछना चाहता हूं, जब ५२ डालर प्रति बैरल क्रूड आयल की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी, तो सरकार ने दाम क्यों नहीं कम किए?इससे ज्यादा अफसोस की बात क्या होगी कि सरकार की कोई नीति नहीं है और जो रंगराजन समति बनायी गयी, मैं समझता हूं कि उसका काम यह था कि वह कमेटी मूल्य निर्धारण के लिए कोई नियम बनाती, कायदे-कानून बनाती, लेकिन अखबारों में अटकलें छप रही हैं कि इस बार गैस का दाम फिर बढ़ने वाला है, सिलेंडर का दाम बढ़ने वाला है, पेट्रोल का दाम बढ़ने वाला है, डीजल का दाम बढ़ने वाला है। इससे बड़ी और कोई बात नहीं हो सकती कि इतना बड़ा संस्थान, एक ऐसी चीज जिसका आम-आदमी से रोजाना का रिश्ता है, उसके बारे में सरकार की कोई नीति नहीं है[c54] । इस सरकार को तत्काल पैट्रोल और डीजल के संबंध में अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए।

मैं अंत में एक निवेदन और करना चाहूंगा कि राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में लिखा गया कि हमने यह काम किया, वह काम किया। केवल घोषणा करना काफी नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि आप जो काम बता रहे हैं, वह किस हद तक हुआ है। सर्व शिक्षा अभियान को सुद्ृढ़ बनाया गया है। इसे मिड-डे मिल कार्यक्रम से जोड़ा गया है। मुझे इस बात का फख्र और खुशी है कि वभिन्न प्रदेशों में भारत सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान के लिए जो राशि भेजी है, उनमें से अकेले उत्तर प्रदेश ने ९८ फीसदी पैसा सर्व शिक्षा अभियान पर खर्च किया है। मैं कांग्रेस के मित्रों से कहना चाहता हूं कि दिल्ली जहां आपकी सरकार है, वहां केवल २५ फीसदी पैसा दिल्ली सरकार ने खर्च किया है। आपने किसी कार्यक्रम के लिए दौलत आवंटित की लेकिन उस दौलत का सही इस्तेमाल हो रहा है या नहीं, यह देखना आपका काम है। आपने यह देखने का काम नहीं किया है। आप गलत आंकड़े दिखा कर सरकार चला नहीं सकते । जनता में विश्वास पैदा नहीं कर सकते हैं। ये आंकड़े जब तक धरातल पर और वास्तविक स्थिति में नहीं जाएंगे, लोगों को जब तक दिखायी नहीं देंगे कि आप जो दौलत सही मायने में आवंटित कर रहे हैं, वह खर्च हो रही है या नहीं, तब तक उसके अच्छे नतीजे नहीं आ सकते हैं।

मैं कांग्रेस पार्टी के मित्र माननीय मानवेन्द्र सिंह जी से कहना चाहता हूं कि उत्तर प्रदेश सरकार ने जो बजट पेश किया है, वह उसकी एक-एक कापी अपने साथियों को दें। गांवों और गरीबों का भला करना है, शिक्षा पर ध्यान देना है तो उत्तर प्रदेश का बजट पढ़ना बहुत आवश्यक है। हिन्दुस्तान के किसी प्रान्त में वह काम नहीं हुआ है जो वहां हुआ। १२वीं पास लड़की, उसकी जाति क्या है हम नहीं जानते लेकिन वह गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवार की है, उस लड़की को २० हजार रुपए देने का काम उत्तर प्रदेश सरकार ने किया। अभी बजट के द्वारा मुख्यमंत्री जी ने फैसला किया कि ३१.०३.२००५ तक जो स्नातक, जो स्नातकोत्तर बेरोजगार लोग हैं, उनको ५०० रुपए प्रति-माह बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा। हमने लड़कियों की शिक्षा मुफ्त करने का काम किया है। इसलिए लोगों में विश्वास पैदा करना बहुत आवश्यक है। उनकी समस्याओं पर सकारात्मक कार्रवाई हो।

श्री विजय कुमार मल्होत्रा चले गए। मैं उनसे भी एक बात बहुत अदब के साथ कहना चाहता हूं कि वह जो बार-बार कहते हैं कि राम मंदिर वहीं बनेगा, यह सब को कहना छोड़ दें। वह जब तक सत्ता में बैठे थे, उन्हें कभी राम मंदिर याद नहीं आया। अयोध्या में क्या बनेगा, यह एक अलग सवाल है। हिन्दू-मुसलमान या तो दोनों बैठ कर फैसला करें या अदालत फैसला करे। क्या यह जबरन राम मंदिर बना देंगे? किसी के जजबात या लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का काम या मौका या अधिकार उन्हें नहीं दिया जा सकता। उस पर दोनों वर्गों की सहमति होनी चाहिए। …( व्यवधान)   आप यहां विपक्ष में बैठ जाते हैं तो आपको राम मंदिर याद आ जाता है। …( व्यवधान)     मैं अपने मित्रों से निवेदन करना चाहूंगा कि राजनीति का संबंध नीति सिद्धांत और कार्यक्रम से होता है, भूख, प्यास और लाचारी से होता है। एक बार लोग आपके चक्कर में फंस गए। अब नहीं फंसेंगे। जितनी संख्या अभी दिखायी दे रही है, अगली बार दिखायी नहीं देगी। इनका क्या होगा, वह अलग बात है, लेकिन आपके साथ तो यही होने वाला है। अगर बीजेपी की ताकत में इजाफा उसूलों, सिद्धांतों पर होता तो मैं मानता लेकिन वह जजबाती था, खत्म हो गया। …( व्यवधान)  आप अब हमारी बात छोड़ दीजिए। दुनिया में कोई आपके ऊपर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं है। आपका जो कुछ होने वाला है, वह आप भी जानते हैं। …( व्यवधान)   नीतिगत सवालों पर खास तौर पर आर्थिक सवालों पर हम बीजेपी और कांग्रेस पार्टी में कोई फर्क नहीं मानते। विदेश नीति के मामले में दोनों एक ही हैं। शुरू में एक राग अलापा, फिर तीन-चार दिन बाद यही कहना शुरू कर दिया कि ईरान के सवाल पर सरकार ने बिल्कुल ठीक किया। हमने इनको रोकने के लिए आपका थोड़ा बहुत साथ दिया था। आपके जो कर्म है, उनके चलते मैं कह सकता हूं कि बहुत निराशा हुई है। इनका काम किसी भी कीमत में संतोषजनक नहीं है।

17.00 hrs. श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव सभापति महोदय, आज महामहिम राष्ट्रपति महोदय के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव सदन के सामने है, मैं उसका समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। ५८ वर्ष के बाद पहली बार ग्रामीण इन्फ्रा स्ट्रक्चर बनाने के लिए यू.पी.ए. सरकार ने भारत निर्माण योजना का शुभारंभ किया है। भारत निर्माण तभी हो सकता है जब गांवों का निर्माण हो। आज भी गांवों की जो हालत है, आज भी गांव कहने के बाद गरीबी कहने की जरूरत नहीं है, गांव कहने के बाद बेरोजगारी कहने की जरूरत नहीं है, गांव का पर्यायवाची फटेहाली और अभाव है। गांव कहने का मतलब है बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, यह गांव और गरीबी पर्यायवाची शब्द हो गए हैं। आज गांव में जो गरीबी और बेरोजगारी है, यदि उस दिशा को यू.पी.ए. सरकार बदलना चाहती है, तो यह अच्छा प्रयास है। मैं समझता हूं इसीलिए भारत निर्माण की कल्पना की गई है। महात्मा गांधी जी ने भी एक सपना देखा था “सही आजादी का सबूत, गांव हमारा हो मजबूत”  गांव मजबूत होने की दिशा में जो पहल यू.पी.ए. सरकार ने की है, मैं उसकी तारीफ करता हूं और इस तरह की पहल का स्वागत करता हूं। यह एक ऐतिहासिक पहल है क्योंकि इस योजना के तहत समयबद्ध और पारदर्शी तरीके के काम किया जाएगा। देश के महामहिम राष्ट्रपति जी के अभिभाषण के दरम्यान, जो वह यू.पी.ए. सरकार की अभिव्यक्ति है, कहा गया है कि इसे समयबद्ध और पारदर्शी बनाया जाएगा।गांव की बुनियादी समस्या, चाहे सड़क हो, बिजली हो, यातायात हो, पेयजल हो, सिंचाई हो, आवास हो, टेलीफोन सेवा हो, इन सब के समाधान के लिए भारत निर्माण योजना लाई गई है। इन योजनाओं की बजट के समय में तो घोषणा होती ही है, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के कॉमन मनिमम प्रोग्राम में भी इस बात का स्पष्ट संकेत है।

भारत के अधिकांश राज्यों में एक मूल समस्या किसानों की जमीन की सिंचाई है। अभी इसकी ऑल इंडिया एवरेज ४० प्रतिशत है और ६० प्रतिशत जमीन असिंचित है। यह हमारे गांवों की फटेहाली है। गांव की आर्थिक दशा का बुनियादी तौर पर जो सुधार नहीं हो रहा है उसका एक कारण सिंचाई है।

17.03 hrs.                              (Shrimati Sumitra Mahajan in the Chair) भारत निर्माण के तहत कहा गया है कि एक करोड़ हेक्टेयर की अतरिक्त सिंचाई क्षमता सृजित की जाएगी, जो एक अच्छी पहल और अच्छी सोच है लेकिन यह बात जमीन पर कितनी उतरेगी? एक करोड़ हेक्टेयर जमीन पर अतरिक्त सिंचाई क्षमता का सृजन करने, सिंचाई की व्यवस्था करने और खेतों में पैदावार बढ़ाने के लक्ष्य से कृषि उत्पादन में इज़ाफ़ा होगा। इससे किसानों की हालत में तब्दीली हो सकती है, उनकी हालत बदली जा सकती है। भारत निर्माण योजना देश के कृषि उत्पादन को बढ़ाने वाली और गरीबों को भोजन देने वाली है। मैं समझता हूं कि इससे देश के किसानों को खुशहाल करने और असली भारत निर्माण का एक सपना संजोया गया है। यह सपना धरती पर कैसे उतरेगा क्योंकि भारत कृषि प्रधान देश है। जब तक किसानों की आर्थिक दशा नहीं बदलेगी तब तक देश की आर्थिक बदहाली में सुधार नहीं हो सकता है ,भले ही हम जो भी स्लोगन दे दें।

आपको मालूम है कि काम के अधिकार को मौलिक अधिकार देने की काफी चर्चा हो रही है। इसकी चर्चा सभी पोलटिकल पार्टीज़ और हम लोग बराबर करते हैं। अभी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट पास किया गया था। पिछली बार यह विधेयक आया था और हम लोगों ने उसे पारित किया था जो गरीबों और गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोंगो के हित में है। इससे खास तौर से इस देश के खेतिहर मजदूरों और अनस्किल्ड लेबर को लाभ ÉÊàÉãÉäMÉÉ[c55]  ।क्योंकि अभी फरवरी माह की तीन तारीख को पंजीकरण की घोषणा हुई है और जगह-जगह गांवों में पंचायत समति के जरिये गरीब लोगों का रजिस्ट्रेशन कराया जा रहा है। देश में कितने गरीब लोग हैं, जिन्हें सौ दिन का काम दिया जायेगा। वृहत् रोजगार योजना चलाने की यह एक अच्छी पहल है। गांवों के गरीब लोगों को इसमें काम दिया जायेगा और जिन्हें काम नहीं दिया जायेगा, उन मजदूरों को भत्ता देने का कार्यक्रम बनाया गया है। यह कार्यक्रम अभी पूरी तरह से धरातल पर नहीं आ पाया है, चूंकि अभी इसकी शुरूआत हुई है। जब इसे सम्पूर्ण देश में लागू किया जायेगा तब यह गरीबी उन्मूलन की दिशा में एक अच्छी पहल होगी, ऐसा हम मानते हैं।

इस तरह के कई कार्यक्रमों के बारे में महामहिम राष्ट्रपति जी के अभिभाषण के माध्यम से सरकार की अभिव्यक्ति आई है, जैसे - राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन योजना, राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना, राष्ट्रीय बागवानी मिशन और दूरसंचार के क्षेत्र में भी वन इंडिया प्लान बनाया गया है। इसके अलावा आपको मालूम है कि सरकार ने रेल के क्षेत्र में बिना भाड़ा बढ़ाये भारी मुनाफा कमाया है। सरकार ने बीस हजार करोड़ रुपये से अधिक का निवेश करके उच्च क्षमता वाले दो समर्पित माल कारीडोर बनाने का निर्णय लिया है, जिसके बारे में सी.पी.एम. के माननीय नेता श्री बसुदेव आचार्य चर्चा कर रहे थे। मैं समझता हूं कि यह एक अच्छा प्रयास है।

सभापति महोदया, पिछले सदन में इस विषय पर हमने काफी बहस की थी और इस पर एक सैन्ट्रल लॉ भी बना था । इस देश में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओ.बी.सी. जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग है, उनके छात्र और छात्राओं का नामांकन गैर-सहायता प्राप्त या निजी शैक्षणिक संस्थाओं में सुनिश्चित करने के लिए एक संविधान संशोधन लाया गया था। मैं समझता हूं कि यह भी एक बहुत अच्छा कदम है। टैक्निकल एजूकेशन के क्षेत्र में, जो इस देश में वंचित वर्ग है, जिसमें ५४ प्रतिशत ओ.बी.सी. हैं और २४ प्रतिशत एस.सी. और एस.टी. के लोग हैं, उन लोगों को भी इसमें मौका मिलेगा। इस सदन से यह एक अच्छा और प्रगतिशील कानून पास हुआ है।

जहां तक अल्पसंख्यकों का सवाल है, उनके लिए सरकार द्वारा अलग से अल्पसंख्यक मामलों संबंधी मंत्रालय बनाया गया है। अभी माननीय मल्होत्रा जी माइनोरिटीज के संदर्भ में बहुत चिंता व्यक्त कर रहे थे। हमने पिछली बार भी कहा था, हमें बी.जे.पी. के दोस्त माफ करेंगे कि जब कभी पिछड़े वर्ग, अत्यंत पिछड़े वर्ग, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से जो पिछड़े वर्ग हैं, जो सोशली और एजूकेशनली देश में बैकवर्ड क्लासेज हैं, जब कभी उन्हें ऊपर उठाने की बात होती है तो बी.जे.पी. के पेट मे दर्द होने लगता है। यह दर्द क्यों होता है। जब किसी वंचित क्लास को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास सरकार के द्वारा किया जा रहा है तो इस पर उन्हें प्रसन्नता जाहिर करनी चाहिए। मैं समझता हूं कि जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछडे हुए लोग हैं, उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए विशेष अभियान चलाना होगा।

यहां जनगणना के मामले पर बहुत चर्चा हुई। सच्चर कमेटी के जरिये माइनोरिटीज की आर्थिक और सामाजिक परिस्थिति क्या है, इसे मालूम करने के लिए सिर्फ एक प्रश्नावली भेजी गई, जिस पर बड़ा भारी हो-हल्ला मचाया गया। मैं समझता हूं कि इस तरह की मानसिकता से राष्ट्र सबल नहीं हो सकता। जब तक राष्ट्र की मुख्य धारा में सभी वर्ग, अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग, एस.सी. और एस.टी. के लोगों को समान रूप से अवसर नहीं मिलेगा, बल्कि जिन्हें अभी तक कोई अवसर नहीं मिला है, उन्हें विशेष अवसर देना चाहिए। आजादी के ५७ सालों बाद भी, इसके लिए कौन दोषी रहा है, उसके बारे में मैं नहीं कहता कि किस सरकार का दोष रहा है, लेकिन वर्ष २००६ में इस पर पुनर्विचार करना चाहिए। जब हमने कहा था तो यहां बहुत से माननीय सदस्यों को अच्छा नहीं लगा था।

यहां सेना का सवाल उठाया गया। यह एक संवेदनशील मामला है। हमारे देश की सेना पर हमें गर्व है, फख्र है। सेना कभी भी जाति या धर्म के आधार पर काम नहीं करती। सेना हमेशा मुसीबत के समय में, चाहे बाढ़ हो, सुखाड़ हो, तूफान हो, साइक्लोन हो, ऐसे कठिन समय मे हमारी सेना कोई भेद नहीं करती है। सेना निष्पक्ष होकर तथा अपनी जान लगाकर देश के लोगों की हिफाजत करती है[R56] । ये लोग सरहद पर तो हिफाज़त करते ही है, दुख के समय में आपातकाल में भी मदद करते हैं। जब पाकिस्तान के साथ लड़ाई हुई थी, तो अब्दुल हमीद ने अपनी जान न्योछावर करते हुए. पाकिस्तान के टैंक तोड़ कर हिन्दुस्तान में देशभक्ति की मिसाल कायम की थी। हम जानना चाहते हैं कि क्या इस पर आप ऊंगली उठाएंगे? आप कैसा और किस तरह का देश बनाना चाहते हैं? देश बनाने के लिए आपको दिल को चौड़ा करना पड़ेगा। दिल चौड़ा नहीं है, इसलिए पेट में दर्द हो जाता है। आप दिल को चौड़ा करे, माथा बड़ा करें तो कोई दिक्कत नहीं होगी, आपको परेशानी नहीं होनी चाहिए। यदि किसी वर्ग को मुख्य धारा में लाने के लिए, किसी वंचित वर्ग, अल्पसंख्यक, माइनोरिटी, पिछड़ा वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग, एससी, एसटी को जोड़ा जा रहा है, उनके लिए कोई विशेष कार्यक्रम चलाया जा रहा है, उसका सब को समर्थन करना चाहिए। इस देश में हर दस साल बाद जनगणना होती है। आर्थिक और सामाजिक स्थिति का पता लगाने के लिए सच्चर समति ने कोई प्रश्नावली तैयार की है तो उसमें कौन सा पहाड़ टूट गया।

महोदय, यहां सेना को बांटने की बात हो रही है। सेना कभी भी नहीं बंट सकती। हमारे देश की सेना ऐसी है, यहां जिस तरह की रिक्रुटमेंट पॉलिसी है, उसमें समानता है, इसलिए उसे बंटने का कोई सवाल नहीं उठ सकता। जिनके दिमाग में बांटने की मानसिकता घुसी हुई है, वही बांटने की बात कर सकता है। यह देश बहुत महान है, हमारा राष्ट्र बहुत मजबूत है और हम सेन्यशक्ति के मामले में दुनिया में माने जाते हैं - उस पर कोई उंगली उठे, इसलिए मैंने निवेदन किया था। यहां हर दस साल में जनगणना होती है और वह जनगणना जाति और धर्म के आधार पर की जाती है। देश में सन् २००१ में सेंसस हुआ था। यहां बीपीएल के प्रोग्राम से लेकर सोशल रिफार्म और वेलफेयर जैसे अऩेक कार्यक्रम चलते है, उसमें जनगणना को आधार बनाया जाता है। इसमें कौन सी बड़ी बात है, जिसे इतना बड़ा मुद्दा बना दिया गया - इसलिए मैं निवेदन कर रहा था।

यहां खास तौर से मैं एक सवाल जल प्रबंधन का उठाना चाहता हूं। नदियों को जोड़ने की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए के शासन काल में बड़े जोरों से हुई थी, फील गुड की बात हुई, लेकिन मैं समझता हूं कि जो आज मूल बुनियादी मसला वाटर मैनेजमेंट का है, जो देश अपने जल प्रबंधन, पानी का सही उपयोग नहीं कर पाएगा, वह देश कभी सम्मुनत नहीं हो सकता। क्योंकि हमारे पास वाटर बहुत है, नदियों का जल, भू-गर्भ जल, वर्षा का जल, कई तरह के हमारे पास जल हैं, लेकिन हम एक युनिट बना कर, कोई मास्टर प्लान नहीं बना पा रहे, जिसके चलते जल का सदुपयोग देश में नहीं हो रहा है। यह बहुत ही बेसिक सवाल है। जब तक जल का सदुपयोग नहीं होगा, हम ठीक से उसका सही इस्तेमाल नहीं करेंगे, तो यह विश्व की लड़ाई बन जाएगी। यहां बहुत से प्रोग्राम वाटर कंजरवेशन के चल रहे हैं। यह केवल भारत के लिए ही नहीं, या केवल कावेरी जल डिसप्यूट का सवाल नहीं है, पूरी दुनिया में जल का सवाल उठेगा। हमें लगता है कि पानी को लेकर कहीं विश्व युद्ध न हो जाए। इसलिए पानी के सवाल पर सरकार को संवेदनशील होना चाहिए। यह बहुत चिन्ता का विषय है कि जल प्रबंधन हमारा नहीं है, जो भू-गर्भ, नदियों का जल है, सागर या वर्षा का जल है, उसे एक युनिट बना कर, एक मास्टर प्लान तैयार करना चाहिए - यह मैं सरकार को सुझाव देना चाहता हूं और इस दिशा में प्रयास होना चाहिए - चाहे वाटर रिसोर्सेस मंत्रालय हो या अन्य कोई मंत्रालय हो।

अभी जैसे बाढ़ एवं सुखाड़ का मामला आया, नेपाल से निकलने वाली कितनी नदियां हैं। मैं उत्तर-बिहार से आता हूं, हमारी झंझारपुर पार्लियामेंट कांस्टीटयूएंसी है। नार्थ-बिहार से सटा हुआ नेपाल है। उत्तर-बिहार के छ:  करोड़ लोग हर साल छ: महीने बाढ़ से और छ: महीने सुखाड़ से प्रभावित होते हैं। हर साल दस हजार करोड़ रुपए पूरे देश में बाढ़ और सुखाड़ से राहत के नाम पर सरकार खर्च करती है। इससे समस्या का कोई समाधान नहीं हो सकता। मैं इसके खिलाफ हूं। यह जो रिलीफ दी जाती है, टेम्परेरी मेजर्स के लिए, राहत रिलीफ आप देते हैं, लेकिन इससे देश के लोगों को पुरुषार्थहीन बनाया जा रहा है। इस तरह रिलीफ का काम चला कर देश को पुरुषार्थहीन बनाना अच्छा नहीं होगा[R57] । इससे राष्ट्र मज़बूत नहीं होगा। बाढ़ और सुखाड़ के स्थायी समाधान के लिये कोई प्लान होना चाहिये - चाहे इस कार्य के लिये २५ हजार करोड़ रुपया लग जाये। आज हर साल दस हजार करोड़ रुपया इस मद में खर्च होता है। जब लोगों के घर ध्वस्त हो जाते हैं तो पांच हजार करोड़ रुपया घरों के निर्माण के लिये दिये जाते हैं। अगर किसी को पानी में सांप काट जाये तो उसे ५० हजार रुपया नकद रूप से दिया जाता है, यह रुपया ब्लाक अधिकारी बंटवाते हैं - यह क्या हो रहा है? इस प्रकार की राहत से क्या होगा? इससे समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पायेगा।

सभापति महोदया, पिछले कई सालों से नेपाल-भारत वार्ता चल रही थी, यह २००१ से चल रही है लेकिन आज ठप्प पड़ी हुई है। यह फैसला किया गया था कि नेपाल के विराटनगर, कुरेले, जनकपुर सहान और काठमांडू शहरों में ७ जे.पी.ओ. खोले जायेंगे, जिनमें ४० प्रतिशत इंजीनियर्स नेपाल के और ६० प्रतिशत भारत के होंगे। इस कार्य हेतु १०वीं पंच वर्षीय योजना में जे.पी.ओ. के लिये भारत सरकार ने बजट में मात्र ३० हजार करोड़ रुपया तनख्वाह के तौर पर रखे थे, लेकिन इस बजट में क्या होगा - वह सामने आने वाला है। अभी दो साल से कहा गया कि था कि डिटेल्ड प्रोजैक्ट रिपोर्ट बनेगी और बाढ़ तथा सुखाड़ के स्थायी समाधान के लिये बहुउद्देश्यीय हाई लैवल डैम बनेंगे जिनसे पानी पर नियंत्रण होगा। हर साल जो बाढ़ आती है और किसानों की करोड़ों रुपये की फसल बरबाद हो जाती है, उनमें उत्तर बिहार, असम और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से शामिल हैं। इनके अलावा और कई राज्यों में भी बाढ़ की समस्या है। नदियों की जो स्थिति है, उनसे हर साल करोड़ों रुपये की फसल बर्बाद हो जाती है तथा जान-माल का खतरा बना रहता है। हैलीकाप्टर से राहत के लिये पाव-रोटी, सत्तू, चूड़ा और पैकेट बांटे जाते हैं - मैं जानना चाहता हूं कि इन सबसे क्या होने वाला है? इसलिये मेरा कहना है कि डी.पी.आर. बनाई जाये। इसके बनने से हाई पावर्ड डैम बनाकर पानी पर नियंत्रण किया जा सकता है।

बिहार में कोसी नदी बहती है। सन् १९५२ में इसके लिये प्लान था, जैसे पंजाब के लिए भाखड़ा बांध बनाया गया, उससे खेती में प्रगति हुई और अनाज का उत्पादन बढ़ा, उसी प्रकार कोसी नदी के लिये भी १९५६ में स्टडी की गई थी और जापान की एक टीम वहां गई थी। स्टडी टीम ने बताया था कि केवल कोसी नदी के माध्यम से ३३०० मेगावाट पनबिजली पैदा हो सकती है। इसी प्रकार बिहार की कमला बालान, बागमती और अदवाड़ा समूह की नदियो को लिया जाये। इसी प्रकार पश्चिमी चम्पारण जिले में गंडक नदी है। यदि उसे ले लिया जाये तो तो हर साल १० हजार मेगावाट बिजली पैदा होगी और किसानों को सस्ते दर पर बिजली मिल सकती है और जो उपभोक्ता हैं, उन्हें १७ पैसे यूनिट की दर से बिजली उपलब्ध हो सकती है। आज बिजली तैयार करने की कीमत ३ रुपये प्रति यूनिट है जो बहुत महंगी है। अगर वहां बिजली तैयार होगी तो वह १७ पैसे प्रति यूनिट बिजली मिल सकेगी। आज पूरे हिन्दुस्तान में जो बिजली की खपत है, नेपाल से जो पनबिजली मिलेगी, वह देश के कई हिस्सों को दी जा सकती है। इसलिये इस ओर ध्यान देना आवश्यक है। अगर उत्तर भारत में बिजली की दशा को सुधारना है तो उसके लिये इनफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होगा। बिजली विकास की कुंजी है। इससे पनबिजली सस्ते दर पर मिल सकती है। अगर सभी नदियों पर हाई लैवल डैम बनाये जायें तो सभी डैम से १० हजार मेगावाट बिजली मिल सकती है। अगर नेपाल के किसी भाग में डैम प्रस्तावित है या कमला बालान में है तो उससे शीशापानी में पानी मिलेगा। इसी प्रकार कोसी नदी का बांध बैराज में प्रस्तावित है, उसके ६० किलोमीटर पर, जिसका कुछ भाग नेपाल में है उस पर भारत के साथ समझौता हो चुका है। इसलिये मैं कहना चाहूंगा क इस समस्या के स्थायी समाधान के लिये उस दिशा में पौज़टिव संकेत होना चाहिये।

सभापति महोदया, अब मैं किसानों के बारे में कुछ कहना चाहूंगा। आज किसानों की क्या हालत है। हालांकि यू.पी.ए. सरकार के बजट का काफी हिस्सा किसानों पर खर्च हो रहा है लेकिन किसान आज भी गांवों में दुखी है। अगर कोई वर्ग सब्से ज्यादा पीड़ित है तो वह किसान ही हैङव्५८ट। 

        सबसे ज्यादा मेहनत करने वाले लोग हमारे देश में हैं। आज गेहूं की कैसी स्थिति पैदा हो गई है - हालत यह है कि गेहूं आयात करने की स्थिति पैदा हो गई है। हमारे किसानों की हालत क्या है - किसानों को कृषि के लिए लोन लेने पर १३ से १९ परसेंट तक ब्याज देना पड़ता है। कृषि, खाद, बीज, फर्टिलाइजर के लिए किसान लोन लेगा, तो उसे इतना ज्यादा ब्याज देना पड़ता है। यह देश कृषि प्रधान देश है और यहां ८५ प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर करते हैं। इंडिया में कुछ विकास हुआ है, लेकिन भारत में कुछ विकास नहीं हुआ है। भारत की आत्मा गांवों में बसती है और ८५ प्रतिशत लोगों के लिए, किसानों के लिए लोन लेने में इतनी जटिलताएं हैं, जिन्हें आसानी से पूरा नहीं किया जा सकता। ब्लॉक आफसिस में किसान जाते हैं, अपनी दर्खास्त देते हैं, लेकिन कुछ नहीं होता है। हम गांव से आते हैं। कई-कई बार चक्कर मारने पड़ते हैं कि लोन मिलेगा या नहीं, क्या स्टेटस है। बार-बार कहा जाता हे कि यह कागज लेकर आओ, यह सर्टफिकेट बनवा कर लाओ, यानी बहुत ज्यादा परेशानी होती है। बैंकों ने बहुत जटिल व्यवस्था बनाई हुई है। अभी तक बैंकों में लोन देने की व्यवस्था का सरलीकरण नहीं किया गया है और १३ से १९ परसेंट तक किसानों के लिए ब्याज दर रखी गई है।

मैं आपसे यह भी निवेदन करना चाहूंगा कि जो बड़े लोग हैं, शहरों में रहते हैं, उनके लिए ब्याज की दर ६ से ७ परसेंट रखी गई है। कोई घर बनाना चाहे या कार खरीदना चाहे, तो उसके लिए उन्हें ६ से ७ परसेंट ब्याज दर पर पैसा आसानी से दे दिया जाता है, किसी-किसी को तो जीरो परसेंट पर भी पैसा दे दिया जाता है। यह भारत की स्थिति है। बड़े लोगों के लिए ऋण देने की व्यवस्था अलग है और किसानों के लिए - सीमांत किसानों के लिए, लघु किसानों के लिए, छोटे किसानों के लिए और गरीब किसानों के लिए ऋण देने की व्यवस्था अलग है। कृषि कार्य के लिए १३ से १९ परसेंट ब्याज पर पैसा मिलता है। इसलिए मैं कहता हूं कि इंडिया और भारत में बहुत अंतर है। जब तक इस अंतर को नहीं मिटाया जाएगा, तब तक अमीरी और गरीबी की खाई को नहीं पाटा जा सकता है।

17.22 hrs.                              (Shri Varkala Radhakrishnan in the Chair) आर्थिक विषमता को अगर हमें दूर करना है तो इस खाई को मिटाना पड़ेगा। देश तब तक आत्मनिर्भर नहीं हो सकता है, देश तब तक आर्थिक रूप से सुद्ृढ़ नहीं हो सकता है, देश इकोनौमिकली तब तक स्ट्राँग नहीं हो सकता है, जब तक इस देश का किसान खुशहाल नहीं होगा। जब तक खेती करने वाला किसान आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होगा, तब तक खेती जो देश की आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है, वह मजबूत नहीं होगी। इसी कारण मैंने इस बात की चर्चा की कि इस ऋण व्यवस्था का सरलीकरण करना अत्यंत आवश्यक है।

आज आरबीआई की क्या हालत है? मैं एक राज्य का उदाहरण देना चाहता हूं। आम तौर पर जो पैसा गरीब लोग, रिक्शा चलाने वाला या छोटा किसान बैंकों में जमा करता है, वह पैसा सिर्फ १५ परसेंट ही उस राज्य में रहता है और बाकी ८५ परसेंट दूसरे राज्यों में चला जाता है। मैं उड़ीसा राज्य की बात कर रहा हूं, बिहार की बात कर रहा हूं॥ उस राज्य की आर्थिक बदहाली कैसे दूर होगी, क्योंकि गाडगिल फार्मूले के तहत, जिस राज्य में जितने आंतरिक संसाधन होंगे, उस राज्य के उतने ज्यादा प्लान बनाए जाएंगे। उड़ीसा के अंदर आर्थिक संसाधन कहां से आएंगे? मैं जानना चाहूंगा कि साइक्लोन से कितने ही आदिवासी इलाके उजड़ जाते हैं, वहां कैसे आंतरिक संसाधन उन्नत होंगे? वहां नदियों का जाल बिछा हुआ है लेकिन बाढ़ से सारा अनाज बरबाद हो जाता है फिर वहां आंतरिक संसाधन कैसे आएंगे? गाडगिल फार्मूले को यूपीए सरकार को बदलना चाहिए। यह फार्मूला जरूरत के आधार पर, गरीबी के आधार पर, जनसंख्या के आधार पर, प्राकृतिक आपदा के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए[i59] ।

  महोदय, जब तक इंटर्नल रिसोर्सेस को आधार बनाकर प्लान का आकार बनाया जाता रहेगा, तब तक पिछड़ा राज्य, सदा पिछड़ा रहेगा और जो ऊपर उठा राज्य है, वह ऊपर रहेगा। इससे कभी सन्तुलन नहीं बन सकेगा। इसलिए पिछड़े राज्य सात जन्मों में भी ऊपर नहीं उठ सकते हैं, स्लोगन हम भले ही कुछ भी देते रहें। मैं विशेषरूप से पूर्वान्चल राज्यों, सेवन सिस्टर स्टेट्स के बारे में कहना चाहता हूं कि आप इन स्टेट्स की हालत देखिए। इनके लिए हम लोग १० प्रतिशत फायनेंश्यल असिस्टेंस की बात करते हैं। फायनेंस मनिस्ट्री का सर्कुलर निकलता है। यहां मुझसे पहले बोलने वालों में श्री रामजीलाल सुमन, श्री बसुदेव आचार्य और प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा ने भी पूर्वान्चल राज्यों की तरक्की की चर्चा की थी। मैं बताना चाहता हूं कि ‘नीडी पीपुल’ को, जो बिलो पॉवर्टी लाइन लोग हैं, जिनमें मुख्यत: एस.सी. और एस.टी. के लोग आते हैं, उन्हें केवल ३५ प्रतिशत अनाज पहुंचता है और ६५ प्रतिशत अनाज रास्ते में ही गायब हो जाता है - यह सच्चाई है। चूंकि मैं खाद्य, उपभोक्ता मामले और सार्वजिनक वितरण संबंधी संसदीय समति का चेयरमैन हूं, इसलिए मैं यह बता रहा हूं।

महोदय, अरुणाचल प्रदेश के बारे में हमारी समति को ४०० करोड़ रुपए के घोटाले की गंध मिली है। हमने केन्द्र सरकार से आग्रह किया और मैं केन्द्र सरकार का आभारी हूं कि उसने समति के आग्रह को स्वीकार कर लिया और अब इस मामले की जांच सी.बी.आई. करेगी। मैं बताना चाहता हूं कि अनाज की हैंडलिंग के नाम पर, अनाज के ट्रांसपोर्टेशन के नाम पर ४०० करोड़ रुपए का घोटाला हुआ है। पूर्वोत्तर राज्यों को अनाज हवाई जहाज से भेजा दिखाया गया, रेल से भेजा गया दिखाया, घोड़े, खच्चर और आदमी द्वारा ढोया दिखाया गया, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं हुआ। यह सब कागजों पर ही दिखाया गया। जब समति ने हवाई जहाज एवं ट्रेनों के नंबर, स्टेशन, ट्रांसपोर्टेशन के स्थान जानने चाहे, तब यह खुलासा हुआ कि यह केवल कागजों पर ही है, वास्तव में अनाज पहुंचाया ही नहीं गया। ट्रांसपोर्टेशन के नाम पर ट्रांजैक्शन हो गया। यह ताजा घटना है। यह मुश्किल डेढ़-दो साल पुरानी बात है जिसकी अब सी.बी.आई. जांच करेगी।

महोदय, देश में पछड़े राज्यों की जब ऐसी स्थिति है, तो पिछड़े राज्य चाहे वे पूर्वान्चल के राज्य हों या कोई और, कैसे ऊपर उटेंगे। मैंने केवल यह एक उदाहरण दिया है। ऐसे न जाने कितने और मामले होंगे। पिछड़े राज्यों का अगर हमें अपलिफ्टमेंट करना है, तो वहां सड़क एवं अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना होगा, लेकिन उसमें भी न जाने कितने और कैसे घोटाले होंगे। मैं बताना चाहता हूं कि पूर्वान्चल राज्यों में इंसर्जेंसी के चलते गोदाम बनाने का काम पी.डब्ल्यू.डी. करती है, लेकिन गोदाम का निर्माण तीन-तीन साल तक पूरा नहीं होता। तीन साल में ईंट, लोहा और सीमेंट सभी के दाम कितने बढ़ जाते हैं जबकि सेंट्रल गवर्नमेंट की ओर से केवल १० प्रतिशत राशि दी जाती हैं। इस प्रकार से यदि राशि देते रहेंगे तो काम कभी पूरा नहीं होगा क्योंकि कास्ट बहुत बढ़ जाएगी।

महोदय, गाडगिल फार्मूले का जो सूत्र है, उस पर निश्चित रूप से पुनर्विचार करना चाहिए। जो स्टेट गरीब है, जिस राज्य के प्लान का आकार केन्द्र निर्धारित करता है, प्लानिंग कमीशन बनाता है, उसकी जो नीड्स हैं, उसकी जो प्रायर्टीज हैं, उसकी जो आवश्यकताएं हैं, उसकी जो पॉपुलेशन है, जो गरीब लोगों का स्टेटस है, उसके आधार पर यदि गरीब राज्य के प्लान का आकार तय किया जाए, तो छोटे राज्यों का उन्नयन हो सकता। यदि परम्परागत गाडगिल फॉर्मूले पर ही आप चलते रहे, तो उनका उन्नयन कभी नहीं हो सकता है। इसलिए मेरी प्रार्थना है कि गाडगिल फार्मूले पर पुनर्विचार करने की जरूरत है।

महोदय, बैंकों से जो आप ऋण अभी तक गरीब लोगों को, किसानों को देते हैं, उसकी वसूली कैसे होती है, वह भी मैं बताना चाहता हूं। इस देश में नॉन-परफॉरमिंग असैट ६५ हजार करोड़ से लेकर ८५ हजार करोड़ रुपए तक है, जिन्हें राइट ऑफ कर दिया जाता है। राइट ऑफ इसलिए कर दिया जाता है क्योंकि वह पैसा बड़े-बड़े लोगों ने, देश में बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज लगाने के लिए लोन के रूप में लिया और वापस नहीं किया। उनके नाम ब्लैक लिस्ट तक में नहीं आते। उनके बारे में सरकार कभी कोई खबर नहीं देती, लेकिन किसान ने यदि ५ हजार या १० हजार रुपए बैंक से ऋण लिए हैं, तो उसकी भूमि के कागज बैंक में जमा होने के बावजूद बैंक के लोग आते हैं और उसके बैल खोल ले जाते हैं। जिन बैलों से वह खेती करता है, उन्हें बैंक वाले ले जाते हैं। आज किसान की यह हालत है। उनसे वसूली होती है, लेकिन जिन बड़े-बड़े उद्योगपतियों ने ऋण लेकर वापस नहीं किया, उनसे वसूली नहीं होती, बल्कि उनके ऋण माफ कर दिए जाते हैं और उनके नाम तक नहीं बताए जाते। ६५ हजार से ८५ हजार करोड़ रुपए के ऋणों को राइट ऑफ कर दिया जाता है, उनके नाम तक डिक्लेयर नहीं किए जाते। उसके लिए कमीशन बना हुआ है कि किन-किन लोगों ने लोन लिया, उन्हें कभी ब्लैक लिस्ट नहीं किया जाता, उनके नाम नहीं दिए जाते। इस प्रकार आज भी देश में जिन पर ऋण के रूप में ६५ हजार करोड़ रुपए बकाया हैं, उनसे वसूली नहीं होती है[rpm60] , उनसे पैसा वसूल नहीं होता है जबकि किसानों की वसूली दनादन होती है, लेकिन उनके लिए कोई प्रयास नहीं होता है। मैं इसीलिए कह रहा हूं कि असली भारत इंडिया गेट के भीतर है। मुम्बई में गेटवे ऑफ इंडिया से भीतर जो है, वह इंडिया है। यह शब्द मैं दर्द से बोल रहा हूं, मैं किसी दल पर नहीं बोल रहा हूं। यह इस देश का दुर्भाग्य है। इंडिया गेट के इधर जो है, वह इंडिया है और इंडिया गेट के उधर जो है, वह भारत है। मुम्बई के अन्दर गेटवे ऑफ इंडिया जो है और जितने बड़े-बड़े शहरों में गेट के अन्दर जो अर्बन इलाका है, सब इंडिया में है। इंडिया में पानी, बिजली, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य का सब उपाय है, सारी व्यवस्था है, आप देख लीजिए। यहां रैड लाइट भी लगी हुई है, गाड़ी में गाड़ी नहीं टकराएगी। लेकिन इंडिया के बाहर आप भारत में चले जाइये, असली भारत, जिसका इसमें जिक्र किया गया है, उस असली भारत के निर्माण करने के लिए बहुत परिश्रम की जरूरत है, कठोर संकल्प की जरूरत है, विल पावर की जरूरत है। यदि इंडिया को भारत में तब्दील करना चाहते हैं, भारत को रोजगार से जोड़ना चाहते हैं, भारत के किसान को ऊपर उठाना चाहते हैं, भारत के जो खेतीहर मजदूर हैं, जिनका पलायन हो रहा है। आज बड़े पैमाने पर खेतीहर मजदूरों का पलायन हो रहा है, अकेले बिहार से, और राज्यों से भी, असम से भी, सभी राज्यों से जाते होंगे। अकेले बिहार से अभी २० लाख से भी ऊपर खेतीहर मजदूर एग्रीकल्चर लेबर का पलायन हो रहा है। दूसरे राज्यों में गया और दूसरे राज्यों से बीमारी लेकर चला जाता है। वहां यह होता है कि अफीम खिलाकर उनकी पूरी कार्यक्षमता का इस्तेमाल हो जाता है। जब वह घर लौटता है तो रिक्शा चलाने लायक भी नहीं रहता है और ऐसा बीमार पड़ता है कि पूरा परिवार उसी की बीमारी को ठीक करने में लगता है। यह मैं प्रैक्टिकल बात बता रहा हूं। मेरे पास कई उदाहरण हैं, लेकिन समय नहीं है, नहीं तो मैं पूरे डाटा के साथ बताता कि किन-किन लोगों को कौन सी बीमारी अफीम खाने के बाद किस-किस तरह की दवा खिलाकर उस मजदूर के श्रम का शोषण होता है, लेबर का एक्सप्लायटेशन होता है। लेबर के एक्सप्लायटेशन का मतलब हुआ कि जिस राज्य का वह लेबर है, वहां के नेशनल प्रोडक्शन पर, कृषि उत्पादन पर उसका कुप्रभाव पड़ेगा। हमारे यहां नेशनल फूडग्रेन प्रोडक्शन का क्यों डिक्लाइन हो रहा है, अभी इकोनोमिक सर्वे में आयेगा, आप देख लीजिए। यही कारण है कि खास श्रम का शोषण किया जा रहा है। हमारा जो मजदूर ५० साल तक मजदूर उत्पादन करता, उसकी इतनी जल्दी कम उम्र में ही, १० साल में ही उसको सिट्ठी बनाकर छोड़ दिया जाता है। वह ५० साल के काम के लायक नहीं रहता है। अपनी औसत उम्र से पहले अपनी जान छोड़ जाता है, मर जाता है, उसे अपने प्राण छोड़ने पड़ते हैं। यह देश के लिए एक बड़ा समस्या है। आज यदि कहीं हमला होता है, कहीं खून होता है तो लोगों को बहुत गुस्सा आता है। मैं हिंसा की, वायलेंस की बात इसलिए कह रहा हूं कि कुछ दर्द की बात आपको कहना चाहता हूं।

आज क्या हाल है? आज पांच प्रतिशत लोग ३५ हजार फीट की ऊंचाई पर चलते हैं। हम लोग भी जनता के लाइसेंस से चलते हैं। एम.पी. लोगों को फ्लाइट में ३५ हजार फीट पर चलने का अधिकार है। यह जो एवरेज पांच फीट का इन्सान है, इन दोनों के बीच में ३५ हजार फीस का अन्तर हो गया। पहले इतना अन्तर नहीं था। प्राचीन काल में हम सुनते थे, पहले जो दूरी थी, आर्थिक विषमता थी, इकोनोमिक डिस्पैरिटी थी, वह १२ फीट की थी। उस समय कोई बड़े से बड़ा धनी आदमी, पूंजीपति आदमी हाथी पर चलता था। अगर पांच फीट का इन्सान हाथी पर चढ़ेगा और १२ फीट का भी हाथी होगा तो १० फीट का अन्तर होगा। पहले गरीबी और अमीरी का अन्तर १० फीट का था, जो अब ३५ हजार फीट का हो गया है, इसीलिए ए.के.४७ देश के अन्दर चल रही है। मैं नक्सलवाद का पक्ष नहीं लेता, मैं नक्सलवाद के खिलाफ हूं, क्योंकि आतंक लोकतंत्र में समाधान नहीं है। लेकिन मैं समझता हूं कि खासकर देश के अन्दर जो इण्टरनल मामला है, देख के अन्दर जो देखते हैं, नक्सली गतवधि हो रही है, जो हिंसा है, वायलेंस है, यह इसी आर्थिक विषमता के कारण है। मैं इस बात को यहां प्रोसीडिंग्स में दर्ज करा देना चाहता हूं कि यह हिंसा तभी रुकेगी, जब आर्थिक विषमता का गैप कम होगा। आर्थिक विषमता जो ३५ हजार फीट की है, उसे थोड़ा कम करना होगा। यदि आर्थिक विषमता कम नहीं हुई तो हिंसा इस देश में नहीं रुकेगी और ए.के.४७ वाली संस्कृति चलेगी। इस देश में चारों तरफ अमन-चैन भी आम लोगों का छिन जाएगा।[i61]    इन्हीं शब्दों के साथ मैं अंत में यही निवेदन करना चाहता हूं कि इस देश में किसानों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है, खेतीहर मजदूरों की दशा सुधारने की जरूरत है और सरकार जो प्लान बना रही है, उसे धरती पर उतारने के लिए कठोर संकल्प शक्ति रखने की जरूरत है। …( व्यवधान) 

वाटर मैनेजमैंट की बात कही गई। जल प्रबंधन बहुत जरूरी है। बाढ़ और सुखाड़ को प्राकृतिक आपदा न बनाया जाए। आज जब चर्चा होती है तो लोग कहते हैं कि यह प्राकृतिक आपदा है, नेचुरल डिज़ास्टर है। यह नेचुरल डिज़ास्टर नहीं है, यह मैनमेड प्राब्लम है, आदमी द्वारा क्रिएटेड प्राबल्म है। हम इसके बारे में प्लान नहीं करते, प्लान करके इसका कोई परमानैंट सौल्यूशन नहीं निकालते और कहते हैं कि यह प्राकृतिक आपदा है।…( व्यवधान) हर साल कोई न कोई प्राकृतिक आपदा आती है। हमें इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए लॉग टर्म योजना बनानी चाहिए।

गरीबों की दशा सुधारने के लिए एक लेबर कमीशन बनना चाहिए। जो पलाय़न हो रहा है, उसे रोकने के लिए और किसानों की दशा सुधारने के लिए प्लान में, उनके ऋण का सरलीकरण करना चाहिए। जिस तरह दूसरे यूरोपीय देशों में एग्रीकल्चर सैक्टर पर २०० प्रतिशत सबसिडी है, उसी तरह हमारे यहां भी एग्रीकल्चर सैक्टर पर बजट का ज्यादा भाग खर्च करना चाहिए। जब तक बजट कृषि को प्राथमिकता देते हुए नहीं बनाया जाएगा, तब तक उनकी आर्थिक स्थिति नहीं सुधर सकती। आर्थिक स्थिति की रीढ़ केवल एग्रीकल्चर है। इसलिए किसानों को प्रोत्साहन दिए बिना यह देश कभी भी …( व्यवधान)  खुशहाल नहीं हो सकता है।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

श्री इलियास आज़मी सभापति महोदय, महामहिम राष्ट्रपति के खुतबे को मैंने सुना था और गहराई से उसका अध्ययन भी किया। राष्ट्रपति जी की ज़ुबान से वे शब्द निकले हैं, लेकिन यह सब जानते हैं कि वे शब्द राष्ट्रपति जी के नहीं हैं, सरकार ने जो उन्हें लिखकर दिया, राष्ट्रपति जी ने उसे ही पढ़ दिया। इसलिए यह परम्परा बदलनी चाहिए कि उसे राष्ट्रपति का अभिभाषण या खुतबा कहा जाए। आप उसका अध्ययन कीजिए। अगर सरसरी तौर पर पढ़ते चले जाएंगे तो आपकी तबियत खुश हो जाएगी। उन्होंने जो नक्शा खींचा है, जो नीतियां किसी होशियार व्यक्ति ने, कोई ब्यूरोक्रेट होगा, जिसने यह खुतबा लिखा है, राष्ट्रपति जी ने किसी और का लिखा हुआ. सिर्फ पढ़ा है। उसमें शुरू की कुछ बातें सही हैं, उनसे हम क्या पूरा देश सहमत है।

पैरा ४ में गरीबी और गरीबों के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। बिना शुबह इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस सरकार ने गरीबों के लिए कई नई योजनाएं बनाई हैं और भारी-भरकम रकम जिलों तक भेजी हैं, चाहे काम के बदले अनाज योजना हो, चाहे सम विकास योजना हो, चाहे नई रोजगार गारंटी योजना हो, आदर्श जिला योजना हो, सब में पैसा बहुत दिया गया है, इसमें कोई दो राय नहीं है, लेकिन यह हमारे सिस्टम की कमजोरी है कि भारत सरकार गरीबों का खून निचोड़कर पैसा वसूलती है और फिर ऐसे लोगों के जरिए लुटेरों को बांट देती है जिन पर उसका कोई कंट्रोल नहीं है और वह पैसा देने के बाद राज्यों से पूछ भी नहीं सकती कि आपको इतने हजार करोड़ रुपये मिले हैं, उनका आपने क्या किया। मैं इस बारे में बाद में कुछ बातें रखूंगा।

सारी योजनाएं भ्रष्टाचार, लूट और डकैती की नज़र होती जा रही हैं। यहां लाख चिल्लाया जाए, मगर भारत सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगती। अगर लिखकर भी दिया जाए तो जिस तरह अमरीका के आगे लोग जी-हजूरी और घघियाकर बातें करते हैं, उसी तरह राज्य सरकारों से भी, जिन्हें आप पैसा देते हैं, घघियाकर बात करते हैं। अमरीका महाजन है और महाजन के आगे जिस तरह आसामी बात करता है, उसी तरह अमरीका से बात करते हैं। भारत सरकार महाजन है, राज्य सरकारें उसके पैसे से चलती हैं, लेकिन अपने दिए हुए पैसे के बारे में पूछते हुए इन्हें डर लगता है।

सभापति महोदय, बहुत लम्बी बात हो जाएगी। मैं जानता हूं कि आप थोड़ी देर में घंटी बजाना शुरू कर nåMÉä[R62] ।

काम के बदले अनाज योजना भ्रष्टाचार के दलदल में डूबकर खत्म हो गयी। सारा पैसा डाकुओं और लुटेरों ने लूट लिया। अनाज तक खत्म हो गया। खैर, उस योजना को समय से वापस ले लिया गया जो बहुत अच्छी बात हुई। पीने के पानी की योजना का भी यही हाल है। राष्ट्रपति महोदय ने अपने अभिभाषण में इंदिरा आवास योजना का बहुत फख्र से जिक्र किया है। अगर उस योजना का सर्वे कराएं, तो एक भी गरीब आदमी को चार-पांच हजार रूपये रिश्वत दिये बगैर वह आवास नहीं मिला होगा। मैं जिले के कुछ विकलांगों को जानता हूं। उन विकलांगों को जरूर पैसा दिये बगैर इंदिरा आवास मिले हैं, लेकिन ९६-९७ परसेंट उन्हीं लोगों को इंदिरा आवास मिले हैं, जो चार-पांच हजार रुपये देने के लायक होते हैं। वह पैसा कलैक्टर तक बंटता है। जब आपके पास ऐसी कोई मशीनरी नहीं है कि गरीबों को आवास देने या और जो दूसरी योजनाएं हैं, उनको आप अपने नियंत्रण में रख सकें तो राष्ट्रपति महोदय के अभिभाषण में उसका बखान करने का कोई फायदा नहीं है।

ग्रामीण विद्युतीकरण की अब मैं बात करना चाहता हूं। यह बहुत अच्छी योजना है। इसके लिए मैं भारत सरकार को धन्यवाद देना चाहता हूं कि आपने बहुत बड़ी रकम खर्च करके एक महत्वाकांक्षीयोजना बनाई है। इसके तहत आप पांच साल में भारत के हर गांव का विद्युतीकरण कर देंगे। मैं पावर मंत्रालय की परामर्शदात्री समति में होने के नाते जानता हूं कि पहले एक गांव में १० बड़े लोगों के घर में बिजली दे दी जाती थी और कागजों में दिखा दिया जाता था कि यह विद्युतीकरण गांव है, जबकि ९० परसेंट गांव में बिजली का पता ही नहीं होता। इस सरकार ने तय किया कि जब पूरे गांव का विद्युतीकरण होगा तभी वह गांव विद्युतीकृत माना जायेगा। इसके लिए एक साल पहले बहुत बड़ी रकम राज्यों को दी गयी। मैं उत्तर प्रदेश खासकर मध्यांचल के बारे में कह सकता हूं। उत्तर प्रदेश ने आपसे पूछे बगैर, वह सारा पैसा … * के हवाले कर दिया। उन्होंने उससे कहा कि तुम विद्युतीकरण करो। अगर उनके अंदर पैसा लेने की ताकत नहीं थी, तो यह काम अपने हाथ में क्यों लिया? मैंने यहां की परामर्शदात्री समति में इस बात को रखा था कि उत्तर प्रदेश का पूरा विद्युतीकरण भारत सरकार खुद कराये। यह पैसा भारत सरकार का है। अब किसी भी राज्य में भारत सरकार के पावर सैक्टर में इंजीनियरों की कमी नहीं है। बिहार ने मान लिया, इसलिए वहां भारत सरकार विद्युतीकरण का काम करा रही है, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने डांट दिया कि आठ जिलों में तुम करो, बाकी हम करेंगे क्योंकि उन्होंने लुटेरे पूंजीपतियों को पैसा देना था।

 

* Not Recorded.

17.43  hrs.                 (Shri Devendra Prasad Yadav in the Chair) * अभी तक एक गांव का भी विद्युतीकरण नहीं हुआ जबकि उनको पैसा दिये हुए लंबा समय बीत गया है। जब कोई काम आपके बस में नहीं है तो आप उसका बखान क्यों करते हैं?  मैं मानता हूं कि यह योजना अच्छी है, आप सारे गांव का विद्युतीकरण करना चाहते हैं लेकिन जब आपके हाथ में टैक्स लगाने, गरीबों का खून निचोड़कर लुटेरों को बांट देने के अलावा कुछ नहीं है, तो आप उसका बखान क्यों करते हैं?

             सभापति महोदय, अब मैं हवाई अड्डों पर आता हूं। हवाई अड्डों को सजाने के नाम पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों में बेचा जा रहा है। हवाई अड्डों का ताल्लुक सिर्फ चमक-दमक से नहीं है, इनका ताल्लुक आतंरिक सुरक्षा से है। हवाई अड्डे वाघा सरहद से ज्यादा सेंसटिव हैं। इनसे कस्टम का काम भी होता है और माइग्रेशन भी होता है। मैं समझता हूं कि सरहदों को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले कर देना देश के लिए शर्मनाक और खतरनाक है। मैं कहूंगा कि आपने उसे बेशक बेच दिया, लेकिन उस निर्णय पर पुनर्विचार करें। किसी विदेशी को हवाई अड्डों के मामले में कोई ताकत मत दीजिए। जब आप उन्हें बेच देंगे तो आपके पास क्या रह जायेगा?  खासकर मुम्बई और दिल्ली के हवाई अड्डों को आपको वाघा और खोखरापार सरहद से ज्यादा सेंसटिव सरहद मानकर सोचना चाहिए। एनडीए सरकार ने तो पहलेइसका एक मंत्रालय ही बना दिया। बेशक उस मंत्रालय का कितना ही खूबसूरत नाम दिया हो[r63] [r64] ।

मैं उसे पहले भी बेचो-खाओ मंत्रालय कहता था। आपने बेचो खाओ मंत्रालय खत्म कर दिया। अब हमारे अरुण शौरी जी नहीं रहे लेकिन उनकी आत्मा उससे ज्यादा ताकत के साथ यूपीए सरकार में प्रवेश कर गई है। हमारे हिन्दू भाई पुनर्जन्म के कायल हैं और अरुण शौरी जी की आत्मा पूरी तरह से काम कर रही है और उससे बचने की जरूरत है। अगर यूपीए सरकार उस आत्मा से बच गई तो मैं समझता हूं कि इससे इनका और देश दोनों का का भला होगा लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता है। वह इसलिए कि चाहे भारत हो या पाकिस्तान हो, मैं प्रधान मंत्री जी को भारत का सबसे शरीफ और नेक इंसान मानता हूं। लेकिन इसके बावजूद यह एक सच्चाई है कि चाहे भारत हो या पाकिस्तान हो, दोनों देश के प्रधान मंत्री आईएमएफ से भेजे हए हैं। वहां उन्होंने अपनी जिन्दगी बितायी हुई है। यह उनकी एक सोच बन गई है और उसी सोच का नतीजा आज हमारी प्रदूषित विदेश नीति के रूप में ज़ाहिर हो रहा है और बेचो खाओ मंत्रालय अरुण शौरी जी के रूप में …( व्यवधान) 

 

* Not Recorded.

सभापति महोदय : अरुण शौरी जी कहां गये ? वह तो जिन्दा हैं।

श्री इलियास आज़मी : जिन्दा हैं, लेकिन इस हाउस से चले गये हैं, उनकी सरकार चली गई है।…( व्यवधान)  प्रशासनिक सुधार आयोग की बात राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में कही गई है।…( व्यवधान)  मुझे कांग्रेस के भाई माफ करें। मैं इसे आयोगों की सरकार कहता हूं। जब से यह सरकार आई है, तब से हर राष्ट्रपति के अभिभाषण में आधे दर्जन आयोगों का जिक्र होता है कि हम आयोग बनाएंगे। आयोगों के जरिए सरकार चलानी है, तो फिर हमारी और आपकी यहां क्या जरूरत है ? प्रशासनिक सुधार आयोग बहुत जरूरी है लेकिन सुधार के नाम पर सरकारें जब बिगाड़ करती हैं तो उसका नाम भी सुधार देती हैं चाहे उससे और बिगाड़ पैदा हो।

भ्रष्टाचार के बारे में कम से कम मेरा गला इस सदन में बोलते हुए सूख गया है। सारे सैक्टरों पर मैं पहले रोशनी डाल चुका हूं। लेकिन उस पर जरा भी किसी को यह महसूस नहीं हुआ कि भ्रष्टाचार को रोकने की दिशा में कोई काम करे। अगर आपने भ्रष्टाचार को मान्यता दे दी है तो आप बाकायदा मर्दों की तरह घोषणा कीजिए कि भ्रष्टाचार को मान्यता दे दी गई है अब उसके खिलाफ कुछ मत कहो लेकिन जब आप पन्द्रह हजार रुपये के भ्रष्टाचार के नाम पर दस-दस सांसदों को, करोड़ों इंसानों के प्रतनधियों को और करोड़ों इंसानों के फैसले को एक मिनट में लोक सभा से खारिज कर देते हैं तो फिर अरबों-खरबों रुपयों के भ्रष्टाचार के बारे में इतने गैरजिम्मेवार आप क्यों हैं ?  आपकी अन्तरात्मा कहां सोयी हुई है ? उसके बारे में सबको गौर करना पड़ेगा।

पैरा ३३ में अल्पसंख्यक संस्थाओं के बारे में बहुत खूबसूरत बातें कही गई हैं। अल्पसंख्यक संस्था वह नहीं है जिसे कोई इलियास आज़मी बनाता है और चलाता है। अल्पसंख्यक संस्था सिर्फ वह है जिसे राज्य सरकार मान्यता देती है। सभी सौ प्रतिशत उसके मैम्बर्स अल्पसंख्यक हों, मैंने खुद एक कॉलेज बनाया था, आज एम.पी. होने के बाद मैंने उससे इस्तीफा दे दिया। बहरहाल उसमें मेरी बुनियाद डाली हुई है। उससे मुझे लगन और हमदर्दी है। जब तक मैं एम.पी. रहूंगा, तब तक मैं उसमें नहीं रहूंगा, शायद आगे भी न रहूं, मैं तो अलग हो चुका हूं। ५-६ साल से उसकी फाइल राज्य सरकार के पास पड़ी हुई है कि यह अल्पसंख्यक संस्था है लेकिन आज तक राज्य सरकार ने अल्पसंख्यक की मान्यता नहीं दी है। अल्पसंख्यक संस्था वह नहीं है जिसे अल्पसंख्यक लोगों ने बनाया हो या चला रहे हों बल्कि अल्पसंख्यक संस्था सिर्फ वह है जिसे राज्य सरकार मान्यता देती है। इसलिए खूबसूरत शब्दों का प्रयोग करना बिल्कुल बेमानी बात है[R65] ।

राज्य सरकारें, मैं किसी एक सरकार की बात नहीं कर रहा हूं, राजनीति से बहुत ज्यादा प्रेरित होती हैं और राजनीति से प्रेरित होकर ही किसी संस्था को अल्पसंख्यक संस्था की मान्यता देती हैं। जिसकी मिसाल मैं अपनी खुद की संस्था की दे चुका हूं, जो सात साल पहले चालू हुई थी और उसने इतनी तरक्की की कि आज वह उस एरिया में एक बड़े डिग्री कालेज के रूप में जानी जाती है। लेकिन राज्य सरकार ने आज तक उसे अल्पसंख्यक संस्था की मान्यता नहीं दी।

राष्ट्रपति जी ने अल्पसंख्यकों के मुतल्लिक १५ सूत्री कार्यक्रम का जिक्र जब अपने अभिभाषण में किया तो मेरी हंसी छूट गई थी। आज यहां बोलने के लिए जब मैंने उसका अध्ययन किया तो मेरी हंसी फिर छूट रही है कि १५ सूत्री कार्यक्रम के बारे में हम इंदिरा गांधी जी के जमाने से सुन रहे हैं, लेकिन वह किस पिंजड़े में कैद है और किस पहाड़ की खोह में है, इसका पता नहीं है। लगता है कि उसका कोई वजूद ही नहीं है। असल में नीयत सब कुछ होती है। मुझे कांग्रेस के भाई माफ करेंगे कि अल्फाज की वजह से, शब्दावली ऐसी है कि आज इन्हें साम्प्रदायिक और फासिस्टवादी कहें या और कुछ कहें, लेकिन इनकी नीयत में और आपकी नीयत में मुसलमानों, पिछड़ों और दलितों के मुतल्लिक कोई खास फर्क नहीं है। इस बात को पूरा देश जानता है और यह बिल्कुल सही बात है। राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में इस १५ सूत्री कार्यक्रम का बखान किया गया है। आप २५ साल पहले का अभिभाषण भी अगर लाइब्रेरी से निकालकर देखें तो पाएंगे कि जब-जब कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी, हम इस १५ सूत्री कार्यक्रम के बारे में सुनते आ रहे हैं।…( व्यवधान) यह १५ सूत्री कार्यक्रम अलग है, यह अल्पसंख्यकों के बारे में है। मैं नहीं जानता कि यह कौन सी चड़िया है। इस पर भी राष्ट्रपति जी ने या फिर जिन्होंने भी यह अभिभाषण लिखा है, उसके बारे में पैरा ३४ में बड़े खूबसूरत अल्फाज जड़े हैं। लगता है कि अल्पसंख्यकों को, मैं यूपीए की सरकार न कहकर कांग्रेस पार्टी की सरकार कहता हूं, यह कांग्रेस पार्टी की सरकार गुमराह कर रही है। २५ साल से इस १५ सूत्री कार्यक्रम का बखान ये लोग करते जा रहे हैं - या तो ये लोग खुद को गुमराह कर रहे हैं या फिर करोड़ों अल्पसंख्यकों को गुमराह कर रहे हैं - इसलिए इन्हें अपने दिमाग का थोड़ा इलाज कराना चाहिए, क्योंकि दोनों में कोई न कोई एक जरूर सही नहीं है। इसलिए आप इस १५ सूत्री कार्यक्रम रूपी चड़िया को पिंजड़े से निकालिए, इसे अजायबघर से निकालिए। अगर राष्ट्रपति जी ने इसका जिक्र किया है तो इसे खोह में से निकाल कर लोगों के सामने रखें ताकि ये लोग भी थोड़ा चिल्लाएं कि यह सरकार मुसलमानों को कुछ देने जा रही है।

        मैं अब राष्ट्रपति जी के अभिभाषण के पैरा नम्बर ५० पर आता हूं। उसमें हमारी विदेश नीति के बारे में कहा गया है। ईमानदारी की बात यह है कि हमारी कोई विदेश नीति ही नहीं है। हमारी विदेश नीति गुलामी की है। हजारों साल या १५० साल की गुलामी की आदत हमारे खून में दौड़ रही है। फर्क इतना है कि पहले हमारा आका कोई और था, अब कोई और है। सिर्फ आका बदल गया है और आका बदल जाना कोई विदेश नीति नहीं होती। पहले हमारा आका रूस था, अब अमेरिका है। इसलिए आका बदल गया है, नीति नहीं बदली है। इससे शर्मनाक बात दूसरी नहीं हो सकती। पाकिस्तान और भारत में रिवायती, बदकिस्मती से, दुश्मनी की बात होती है, लेकिन अफगानिस्तान की जनता आजादी के पहले से ही हमारे साथ खड़ी रही है और पाकिस्तान को उसने छोड़ा है। उसी अफगानिस्तान की जनता पर रूस ने जब आक्रमण करके कब्जा किया, तो वहां की जनता उससे लड़ती रही। जब कुछ दिनों के लिए चौधरी चरण सिंह देश के प्रधान मंत्री बने, तब उन्होंने इसका समर्थन नहीं किया, विरोध किया था, लेकिन जब उनकी सरकार गिरी और देश में चुनावों के बाद कांग्रेस पार्टी की सरकार आई, तो उस समय इंदिरा गांधी जी देश की प्रधान मंत्री बनी थीं और प्रधान मंत्री बनते ही, उन्होंने जो पहला काम किया, वह मैं बताना चाहता हूं। अफगानिस्तान की जनता ने, जिसने मजहब पर जरा भी ध्यान नहीं दिया, जो मजहब के बारे में बड़ी सेंसेटिव है, उस अफगानिस्तान की जनता को एक बहुत बड़ी ताकत ने गुलाम बना लिया था और उस पर सैनिक कब्जा कर लिया था[R66] । श्रीमती इंदिरा गांधी ने जब से रूस के कब्जे का समर्थन किया, वहीं से हमारी खुली गुलामी की नीति शुरू हुयी। अब आका बदल गया है, अब रूस पहले वाला नहीं रहा। जिस तरह रूस का सामाज्य अफगानिस्तान के निहत्थे और मजलूम इंसानों से टकराकर पाश-पाश हो गया, उसी तरह कल अफगानिस्तान, ईरान और इराक से टकराकर एक दूसरा बड़ा सामाज्य पाश-पाश होने वाला है। यह अपनी भविष्यवाणी मैं लोकसभा के रिकार्ड में लाना चाहता हूं। आप उसकी गुलामी कर रहे हैं, आप उसे दंडवत कर रहे हैं। उसका शफीर बैठकर हमको गाइडलाइंस देता है, हमारी राज्य सरकारों को दिशा-निर्देश दे रहा है, आपको धमकी दे रहा है कि अगर आपने ऐसा नहीं किया, तो हम यह कर देंगे और अगर आपने यह किया तो हम वह कर देंगे। खुद अमेरिका की सरकार भी कर रही है और आप इसे विदेश नीति का नाम दे रहे हैं। आपने एकदम घुटने टेक दिए हैं। अब ये लोग भी शामिल हो गए हैं - दोनों शामिल हो गए हैं।ये कहते हैं कि पड़ोस में एटमी पावर राष्ट्र हित में नहीं है। नागपुर से जब रिमोट कंट्रोल चला, तो अभी तक आप ईरान के साथ खड़े थे लेकिन नागपुर के रिमोट कंट्रोल पर एकदम से अटेंशन होकर कहने लगे कि पड़ोस में नहीं होना चाहिए - वही बात श्री मनमोहन सिंह जी ने कही और वही बात राष्ट्रपति जी ने कही। उसे किसी और ने लिखा था, राष्ट्रपति जी ने कह दिया कि पड़ोस में एटमी पावर होना राष्ट्र हित में नहीं है। मैं ईरान को पड़ोसी मानता हूं।दुनिया सिकुड़कर बहुत छोटी हो गयी है। दुनिया के सारे देश पड़ोसी हो गए हैं। चीन से हमारी कुदरती सरहद मिली हुयी है। चीन बहुत बड़ा एटामिक पावर है। पाकिस्तान और भारत एक ही देश हैं, जबर्दस्ती हमने नक्शे में गलत ढंग से एक लकीर खींची है।पाकिस्तान भी एटमी पावर है, खुदा न खास्ता जब ईरान कह रहा है कि हमको एटम बम नहीं बनाना है, हमें वैज्ञानिक तरक्की के लिए और बिजली पैदा करने के लिए एटम ताकत की जरूरत है, लेकिन ईरान जो पाकिस्तान फांदने के बाद आएगा, जिससे कहीं पर हमारी सरहद नहीं मिलती, उस ईरान के बारे में ऐसा जवाब देना कि पड़ोस में एटम पावर नहीं होनी चाहिए - पड़ोस में तो हम एटमी पावर से पहले ही घिरे हुए हैं, पश्चिम से भी, उत्तर से भी, पूरब से भी - अब हमें कौन से पड़ोसी चाहिए कि वहां एटमी पावर नहीं होनी चाहिए। मैं कहता हूं कि क्या अमेरिका ने अल्लाह मियां से लिखा लिया कि अमेरिका, ब्रितानिया, फ्रांस और उसके पिछलग्गू ही केवल एटमी पावर रहेंगे और दुनिया में किसी को एटमी पावर बनने का हक नहीं है। अगर ऐसा है तो हमारी संसद को किसी के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। हमको सीधे-सीधे यह कहना चाहिए कि हम अमेरिका के साथ हैं और अमेरिका जो कहेगा, हम वही करेंगे, हमको कोई आपत्ति नहीं होगी और हम उसे मान लेंगे, लेकिन गलत तर्क देना मुनासिब नहीं है। अमेरिका बिल्कुल ब्रितानिया के नक्शे-कदम पर चल रहा है। जिस तरह से ब्रितानिया ने आज से सौ-डेढ़ सौ साल पहले, एक-एक करके पूरी दुनिया के ज्यादातर देशों पर कब्जा किया था, अमेरिका उसी की पुनरावृत्ति कर रहा है। उसने शुरूआत अफगानिस्तान में डायरेक्ट हस्तक्षेप के जरिए की, पहले आर्थिक गुलामी में और दूसरी चीजों में घूमता रहा, लेकिन उसने पहले अफगानिस्तान पर फौजी कब्जा किया, फिर इराक पर किया, अब बीच में ईरान पड़ता है, ईरान पर उसे हमला करना है। हम और आप उसे रोक नहीं सकते और वह दिन हमारे लिए बहुत शर्मनाक होगा, जब उस हमले का भी हमारी संसद और सरकार विरोध नहीं करेगी। हमने आपने आपको जैसे लगता है कि उनके हवाले कर दिया है, लेकिन हमको यह नहीं भूलना चाहिए। उस वक्त मैं पार्लियामेंट में नहीं था। जब रूसी कब्जे का श्रीमती इंदिरा गांधी ने समर्थन किया था, तो वोट-क्लब पर मैंने प्रदर्शन किया था औरकहा था कि दुनिया में जितनी भी सुपर पावर आयी हैं, वे अफगानिस्तान में आयी हैं और अफगानिस्तान में कोई रूका नहीं है, उसके बाद सीधे उसने भारतीय उपमहाद्वीप का रास्ता अपनाया है। अफगानिस्तान के जियाल मुजाहिद, जो अपना खून पत्थरों और पहाड़ों में बहा रहे हैं, हमारी इज्जत और आजादी की रक्षा भी उसी से हो रही है। जिस दिन उनका खून बह जाएगा, जिस दिन वे सुपर पावर के सामने आत्म-समर्पण के लिए मजबूर हो जाएंगे, उसके बाद रूस और अफगानिस्तान में उसके लिए क्या रखा है? वह वहीं नहीं रूकेगा और सीधे पाकिस्तान होते हुए हमारे यहां आएगा। आज मैं फिर कहता हूं कि जिस दिन ईरान पर भी अमेरिका का कब्जा हो गया, इराक से लेकर यहां तक, उस दिन खुदा न ख्वास्ता वह दिन न हो, उसके बाद पाकिस्तान का नंबर होगा[c67] ।

18.00 [R68]  hrs. खुदा-न ख्वास्ता वह दिन न हो, उसके बाद पाकिस्तान का नम्बर होगा। हो सकता है कि वह हम से भी लड़ाने की कोशिश करे। ईरान के मामले में हम खते गुलामी लिख रहे हैं। हमारी हालत यह हो गई है कि डेनमार्क का एक अखबार  रसूलल्लाह सलूअल्लाह व अकयेह वस्सल्लम का कार्टून छापता है, उस कार्टून के खिलाफ दुनिया के इस कोने से उस कोने तक अरबों लोग सड़कों पर है लेकिन हमारी सरकार ने आज तक उसका विरोध नहीं किया। इसलिए कि अमेरिका डेनमार्क का समर्थन कर रहा है। मैं कल लखनऊ में था। वहां की २५ फीसदी आबादी सड़कों पर आ गई। लखनऊ में कोई भी कहीं पैदल नहीं निकल सकता था। हमारी सरकार ने कहीं चूं नहीं की। हिन्दू भाई भी कभी पसन्द नहीं करेंगे। उन्हीं अखबारों में *कार्टून की शक्ल में दिखाया गया था। यह राजनीतिक फायदा उठाने के लिए हिन्दुत्व की बात कर रहे हैं। * हम अहतेजाज कर रहे हैं। कल लखनऊ में एक हजार बैनर्स  रसूलल्लाह सलूअल्लाह व अकयेह वस्सल्लम की तौहीन पर रहे होंगे तो कम से कम सौ बैनर्स * दिखायी गई, उसे लेकर थे। आप लोगों की आत्मा अगर इतनी हल्की पड़ गई है तो सोचिए। …( व्यवधान) 

सभापति महोदय :   आपका समय समाप्त हो गया है।

श्री इलियास आज़मी : मैं कल एक कार्टून बनाऊं जिस में …( व्यवधान) 

श्री खारबेल स्वाईं (बालासोर) : डेनमार्क में जो कुछ हुआ, उसे लेकर हमारी पार्टी के ऑफिस पर क्यों अटैक किया? हमने क्या किया था? …( व्यवधान) 

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF CHEMICALS AND FERTILIZERS AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI BIJOY HANDIQUE): We may extend the time by half an hour and accommodate two speakers.

सभापति महोदय: अगर सदन सहमत है तो सदन की कार्यवाही आधे घंटे के लिए बढ़ायी जाती है।

 

* Not Recorded.

श्री इलियास आज़मी : डेनमार्क से सरकार अपने राजदूत को वापस बुलाए और डेनमार्क के राजदूत को यहां से वापस भेजे। कम से कम कोई प्रोटैस्ट करना चाहिए। मुल्क की आबादी का एक बड़ा भाग कश्मीर से कन्याकुमारी तक अगर सड़कों पर है तो सरकार की कुछ डयूटी बनती है। क्या सरकार बिल्कुल संवेदनहीन हो गई है? मैं प्रेस की आजादी के नाम पर कुछ कहना चाहता था लेकिन आप उसे रिकॉर्ड से निकाल देंगे। यहां मैं प्रैस की आजादी के नाम पर कोई कार्टून बनाऊं और * इस हालत में दिखाऊं कि वह किसी गैर आदमी से लिपटी है, उसके नतीजे में एक औलाद पैदा होती है तो क्या यह प्रैस की आजादी कही जाएगी? वह कतई प्रैस की आजादी नहीं कही जाएगी।

MR. CHAIRMAN: No names will go on record.

(Interruptions) …* MR. CHAIRMAN: Names will not be recorded.

श्री इलियास आज़मी : प्रेस की आजादी का यह मतलब नहीं है कि हम किसी की तौहीन करे और दुनिया के डेढ़ अरब लोगों के दिल को दुख पहुंचाया जाए। प्रेस की आजादी का यह मतलब नहीं है कि पूरी दुनिया में सैंकड़ों इन्सान जिस के नाम को लेकर दो-चार दिन में कई लोग मर गए …( व्यवधान)  क्या प्रैस की आजादी इतनी पवित्र है कि आप डेनमार्क के राजदूत को वापस नहीं भेज सकते या कम से कम अपने राजदूत को वापस नहीं बुला सकते।

सभापति महोदय: अब आप अपना स्थान ग्रहण करें।

श्री इलियास आज़मी : चूंकि समय समाप्त हो गया है इसलिए मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। मैं इस पर अभी और बोलना चाहता था लेकिन आपने समय नहीं दिया।

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* Not Recorded.

     

SHRI B. MAHTAB Thank you, Mr. Chairman, for allowing me to participate in this discussion on the Motion of Thanks on the Address of the hon. President. Hon. President's Address is an annual report of the Government as well as it also throws light on the plan and programme which the Government intends to do. Most of us had heard him with rapt attention the other day when the hon. President gave his Address in the Central Hall[reporter69] .

We would also pass this Motion of Thanks on the President’s Address, but before doing so, our attempt would be to discuss certain issues that were raised in the Address, and if possible to add certain amendments to the Motion of Thanks, which is supposed to be adopted.

Everyone is talking about the exciting growth recorded, that is, 7.5 per cent in 2004-2005. This has also been reflected in the Address of the hon. President, and it is presumed that it is likely to cross 8 per cent in 2005-2006. Who would benefit from this growth? The overwhelming focus on economic growth in the last few years has diverted attention away from other key areas. Hopes have soared with an economy that seems to have taken off, and there is much discussion on how to move further up and to be on a higher orbit of 8 per cent to 10 per cent of the growth. But other vital indications are suffering neglect.

I will come to those aspects later on, but education and health services need more attention. Noble Laureate Dr. Amartya Sen has recently expressed his fears stating that if the current trend continues in our country, then one half of India would be like California and the other half would be like sub-Saharan Africa. More radical critiques even go to the extent of suggesting that at least 10 per cent of India would be like California while the remaining 90 per cent would be reduced to sub-Saharan Africa. Who is to be blamed for this state of affairs? The Leftist critics put the blame for the plight of the poor in India squarely on liberalisation, globalisation, privatisation. Is the critique justified? This is my question. Is the critique justified or is the State rather than the market the principal culprit here?

The truth is that even before liberalisation efforts replaced the old style of central planning in India, India’s performance in either growth or poverty reduction was nothing to talk about. Public Sector Units were producing goods from bread to cars, and in many cases were running in losses. The Government was doing little in areas like developing and maintaining roads, transport, communication -- which is physical in nature -- and the social infrastructure including basic education, health services, sanitation, drinking water and social safety net. The Government was also doing very little in providing a responsive administrative system and speedy justice for all. The people who suffer most were the poor and the underprivileged.

Mr. Chairman, Sir, the market would bypass them as they do not have the purchasing power or the buying power. The State machinery was either ineffective, corrupt or it was busy looking after the affluent and the well connected. For instance, foodgrains were rotting in the FCI godowns while people died of starvation. This was a reality 10 years ago. The public money that used to create rural roads got washed away by rains[ak70] .

            Mostly the contractors, local officials and various middlemen prospered. Subsidies on fertilisers, higher education, bank finances, electricity were usurped by clever people. The quality of services in public hospitals was awful for the poor patients, while the influential people could get far better treatment in special wards. I agree, everyone would agree, that in the post-liberalisation era, the average growth rate of the economy has improved, but the condition of the poor continues to be miserable as before.

            India has had three phases of reforms. The first, rather undeclared, unnoticed, one came starting in the 1980s. It was a half-hearted approach and the existing political opinion, during that time, did not favour it. The second set of reforms initiated in the early 1990s was due to an economic crisis. But the on-going third round of reforms has come from within and not under any sort of compulsion. It has come into existence with sheer power of vote. The public demand has led to many of the reforms. The idea of independence and the power within oneself is growing in the country. Today, we have 30 crore middle class people in this country. However, mere growth is not development; I am again harping on this aspect that mere growth is not development. The rate of growth that has been calculated and being talked about should reach the poor. If the Government does not visit the poor, the poor will visit the Government.

            Nehruvian policies ensured infrastructure development and self-sufficiency in food. The failure in the past should be attributed to the system and not to the policies. The solution lies in entitling the poor people to land and other resources including education and improving the connectivity of villages to the markets through better roads. Some revolutionary steps were taken during the NDA regime under Shri Atal Bihari Vajpayee’s tenure. Attention was given for connecting rural areas. Attention was given for the upliftment and empowerment of the rural folk. PMSRY is one such programme which was introduced; Annapurna Yojana was another; Antyodaya was another. I am just citing these three programmes which were initiated to empower the poor, to bring connectivity to the rural areas. Rural electrification also got a big boost during the NDA regime.

            Due to expansion of telecom network, it revolutionised the total communication network. Telephone connections improved four times between 1998 and 2002. We had a National Telecom Policy during that period. However, today, we all know how miserable the conditions of the poor have become. During the last 20 months of the UPA regime, prices have shot up breaking the backbone of the aam admi.

            The Government in this Address mentioned about five pillars. The Government wants to build, “new architecture, all inclusive development, on the foundations of five pillars.” What are these five pillars? First is, National Rural Employment Guarantee Act; second is, Bharat Nirman; third is, National Rural Health Mission; fourth is, Mission for Urban Renewal named after Jawaharlal Nehru[R71] .

Fifth is the Sarva Shiksha Abhiyan, with a universal mid-day meal programme. I would like to deal with all these five pillars in detail to show how the Government has functioned in the last 20-21 months because these are the five pillars on which an inclusive development is envisaged.

            The National Rural Employment Guarantee Act is a good scheme. We have debated it in the House. It first needs proper implementation, proper identification of beneficiaries and also proper monitoring. We have seen through monitoring how this programme has failed in Maharashtra. No attempt has been made till now, despite the Act coming into force, to check the hera-pheri in that programme, how bungling can be made and funds can be siphoned off.

            I would like to request through this discussion that more Districts need to be included under this programme. You have selected 200 Districts. There are three criteria for selection under this programme. The Planning Commission took note of those three elements and selected these 200 Districts which qualify under that criteria. But, there are another 75 Districts which also qualify to be included in this programme. Why have those 75 Districts not been included?

            In Orissa, for instance, 19 Districts have been included. Another nine Districts qualify the criteria. The three criteria are: population of SCs and STs in the District; per capita income of people in the District; and the agricultural yield per acre in the District. These are the three criteria. That being so, why did the Government select only 200 Districts? There is no commitment in this Address to say that more Districts will be included.

            The second pillar is Bharat Nirman. There is nothing new in Bharat Nirman. No new programme has been included in Bharat Nirman. All the programmes which were going on for the last 25-30 years under different names have been compiled, have been pooled together and termed as the flagship programme of this Government. Providing electricity to every village is a commitment which is nothing new. Providing all-weather roads to every habitation having 1000 population or more has been going for the last five years under PMGSY. Providing safe drinking water to people is also nothing new. This has been going on for the last thirty years.

If the programme had come up with better parameters – say it was a habitation of 250 population which was being provided with a tube well and now you have brought it down to a habitation of 100 population – we could have said that some more areas are going to be included. But that is not the case here.

            We have been hearing of providing telephone facility in every village, for the last many years. We have been discussing it in various forums. Here lies the problem that despite a four-fold increase in telephone connectivity in the country, despite mobile facility, wireless facility, landline facility in the country, despite laying optical fibre networks throughout the country, thousands of people in the villages are yet to be connected with telephones[KMR72] .

            A target was fixed when Shri Ram Vilas Paswan was the Minister for Communications that on such and such a date and year, all villages will be covered.  But we got a technology like MARR technology.  Here, thousands of such villages  were provided with those telephones and those telephones do not work.  No attempt is being made. I should not say no attempt, very little is being made to provide telephone connection to those villages. 

            The Government seeks to provide one crore hectares of land with additional irrigation capacity.  I do not find anywhere, neither it was in last year's Budget nor is there anything in the outcome of the report that was placed here as to where you are going to place the funds and as to where the funds would be made available where you can add one crore hectares of land with additional irrigation capacity.

            Lastly, under Bharat Nirman 60 lakh rural households for the poor would be constructed.  This programme is nothing new but just pooling together all these five programmes and naming it as Bharat  Nirman. Under the programme, you have to identify the poor in the rural area and those in the BPL list.  But the BPL list is not getting updated.  Persons were denied and their names are not being included in the BPL list for certain political reasons. How are you going to provide 60 lakh houses to the poor people?

            The third aspect and the third pillar is the National Rural Health Mission.  This is a very good project.  The idea is good.  Taking certain States and focusing on the health services is also a laudable step.  I do not deny that.  But the National Rural Health Mission has got an allocation of Rs.6,713 crore in 2005-06.  How much of it has been spent?  How much of it has been spent on curative health services? How much of it has been spent on preventive health services?  Who is the affected person for whom this is addressed to?  Who is the targeted person for whom this NRSM is addressed to?  It is the poor.  Those States which are traditionally bereft of health services have been targeted and poor is being provided with curative health services instead of preventive health services. I am making a point clear.  If attempt is being made to invest more on preventive health services, I think, the poor will benefit more than the curative health services because under the curative health services, only the affluent people, the rich people and the influential people will take advantage of the situation.  Today, I would not go into the details of that but here, I would like to mention that a mention has also been made  in the Address about the All India Institute of Medical Sciences (AIIMS) like institutions will be constructed in the country, at least in six places. Already a year has passed by.  We have got a commitment, again.

 

MR. CHAIRMAN : Please conclude.

SHRI B. MAHTAB :  I have some more points to say. 

            The AIIMS-like institutions have not seen the light of the day, neither in Bhubaneswar nor in other places, though the commitment was there.  Already a year has passed but not a single brick has been laid.

            Regarding the Urban Renewal Mission, certain programmes have been made.  It has been launched on 2nd December.  The idea was that all mega cities  will be included.  Cities having population of more than 10 lakhs will be included.  Then, another part also came in that those cities with a population between three lakhs and ten lakhs also will be included[R73] .  The problem lies here. There are 63 cities of this country which are included in this Mission. If the population is the criteria, then all cities which have a population of more than three lakhs should have been included as all mega cities with ten lakhs or 25 lakhs population have been included. They are making a selection between three lakhs and ten lakhs for certain cities. What have they mentioned? They have mentioned about the historicity; they have mentioned about the religious pilgrim centres; and they have mentioned about the Urban Growth Centres. If this is the case, I do not see why Tirupati has been omitted, why Cuttack has been omitted, or why a number of other cities have been omitted. A meeting is being held next month. I hope that a good sense would prevail on this Government. My request would be to include all cities which have a population of more than three lakhs.

            The last pillar is the Sarva Shiksha Abhiyan. I would like to mention here that today in this country, we have 19.63 crore of children between the age-group of 6-11. Out of which around 11 to 12 crores go to formal and non-formal schools and another eight crores of children do not go to any school. Should we not make an attempt to send these children to schools? Under the Sarva Shiksha Abhiyan, things like increasing infrastructure, constructing buildings and posting teachers are being done. This is a good programme. This is one aspect. But, we have to make effort to see that another eight crore children, who are not going to schools, should be sent to schools. They are not included in the formal or non-formal education. Secondly, the secondary education also needs a lot of support from the Central Government. No mention has been made about it in the Address of the hon. President.

            When we talk about the human resource development, there is another aspect.  About the North-East the hon. Minister for Heavy Industries is here, so also the Minister for Parliamentary Affairs, Tripura is getting a National Institute; Kokrajhar is also getting a national institute. There is another management institute that is coming up in the North-East. We welcome that. There is an attempt being made for opening an Indian Institute of Management in Singapore. I would like to know what attempt is being made in those areas where this type of national institutes are not there. The Indian Institute of Management, Ahmedabad was started in 1961. It had the full support of the State Government. Today, respective State Governments are insisting for this. The Orissa Government is insisting for getting a National Institute of Science, but the Government is silent. Rather, they are by-passing the issue. I would again urge upon this Government in this House that attempt should be made for a holistic development of this country which was envisaged during the framing of the Constitution. Chairman, Sir, you yourself had vouchsafed when you were participating in this debate that all States should develop together. It is not that those States which have been progressing should progress at a faster pace and those who have fallen behind, because of historical reasons, should always follow others. We should have a cohesive, holistic approach for the development of this country. Then only this country can march forward.

            Lastly, I will just conclude with these words by mentioning the problems of farmers. More than 30,000 farmers have committed suicides   during the last many years[p74] .

            I would  just like to draw the attention of the House regarding Maharashtra where a large number of farmers have committed suicide, and most of them are from the cotton growing areas of Vidharba.  Andhra Pradesh also is facing a similar problem.  But what is the approach of the Union Government? The approach of the Union Government is: “We will support the grape growers; we will support  the wine cultivation, grape cultivation, but we will not support the cotton growers.  Rather we will import cotton from outside.”  This is the dichotomy with this Government.  This is the problem with the Government.

            Sir, I would conclude with these words that I do not find a single mention of Orissa in this Address.… (Interruptions)…  There is not a single mention for the development of backward States like Orissa. I am not satisfied with this Address. With a heavy heart I would only say that.  This Government should think about the Aam Aadmi if they really think of the common people.

            With these words, I conclude.