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Lok Sabha Debates

Problems Being Faced By Farmers In The Country. on 9 December, 2002

NT> 16.00 hrs. Title: Problems being faced by farmers in the country.

MADAM CHAIRMAN: Now, the House will take up further Discussion under Rule 193. Shri Jaswant Singh Bishnoi, Shri K.S.Sangwan, Dr.Ramkrishna Kusmaria. फारमर्स प्रॉब्लम पर हाउस में बहुत इंटरेस्ट है।

श्री राम टहल चौधरी आप बोलिये।

श्री राम टहल चौधरी (रांची) : सभापति महोदया, आपने मुझे कृषि नीति पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। आज कृषि संबंधी किसानों की समस्याओं पर सदन में चर्चा चल रही है, यह अच्छी बात है। भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां ७० प्रतिशत किसान रहते हैं।

१६.०२ hrs. (Shri P. H. PANDIAN in the Chair) आजादी के ५५ वर्ष के बाद भी किसानों की हालत में जितना सुधार होना चाहिए था, नहीं हो पाया है, बल्कि किसानों की हालत दिन-प्रतदिन बिगड़ती जा रही है। जब एन.डी.ए. की सरकार बनी तो किसानों की समस्याओं की तरफ विशेष ध्यान दिया गया और सरकार ने ५८ प्रतिशत राशि ग्रामीण विकास के लिए देने का काम किया। लेकिन इतनी बड़ी राशि से भी किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया है। दुख की बात यह है कि आज किसानों के सामने जितनी समस्याएं हैं, यदि इन पर पहले से ध्यान दिया जाता तो धीरे-धीरे उनकी बहुत सी समस्याएं हल हो जातीं। कृषि नीति भी किसानों के हित में नहीं रही। अनेक माननीय सदस्यों ने कहा कि किसानों की समस्याओं के बारे में यहां बार-बार चर्चा होती है, घोषणाएं होती हैं, मगर ईमानदारी से उनका पालन नहीं हो पाता है। आज जरूरत इस बात की है कि राजनीति से ऊपर उठकर ईमानदारी से किसानों की समस्याओं को हल करने की जरूरत है, तभी हमारा देश मजबूत हो सकता है और आगे बढ़ सकता है। अगर इसी तरह से किसानों की उपेक्षा होती रही तो देश आगे नहीं बढ़ेगा, बल्कि बर्बादी की ओर जायेगा, ऐसा मैं महसूस करता हूं।

सभापति महोदय, आज पूरे देश में पैसा कमाने की होड़ मची हुई है। लेकिन लोग यह नहीं समझते कि कोई कितना ही पैसा कमा ले, कितना ही पैसा बटोर ले, यदि किसान खेतों में अन्न पैदा नहीं करेगा तो बिना अन्न के कोई जिंदा नहीं रह सकता है। इसलिए किसानों के प्रति जो उपेक्षा का रवैया है, उसे समाप्त करना पड़ेगा।

सभापति महोदय, किसानों की बहुत सी समस्याएं है, जिनमें सड़कों की समस्या, पुलों की समस्या आदि प्रमुख हैं। किसान जो खेत में पैदा करता है उसे उसका उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। चूंकि आवागमन की उचित सुविधा नहीं है और सारी कमाई बिचौलिये खा जाते हैं। इसलिए इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है कि किसानों का पैसा बिचौलिये न खायें, इसके लिए हर जगह, हर प्रखंड स्तर पर आवश्यकता के अनुसार कोल्ड स्टोरेज बनाने की आवश्यकता है। तभी किसान अपनी उपज को वहां रखेगा और उचित मूल्य मिलने के समय बेचने पर उसे ज्यादा पैसा मिलेगा, ऐसा मैं मानता हूं।

इसलिए उस पर ध्यान देने की जरूरत है और किसानों की जरूरत की जो चीजें हैं जैसे खाद, कीट-नाशक दवाएं, खेती का सामान औजार आदि महंगे होते जा रहे हैं। किसान की जरूरत की जो चीजें हैं, वे उन्हें सस्ती कीमत पर मिलनी चाहिए। किसानों को डीजल और मिट्टी का तेल महंगे दाम पर खरीदना पड़ता है। किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिलना तो दूर रहा उसे अपना सामान कभी-कभी फेंकना पड़ता है। इसलिए किसान द्वारा उत्पादित हर माल का जो समर्थन मूल्य सरकार द्वारा तय किया जाता है वह सख्ती से लागू होना चाहिए और किसान को दिलाना सुनिश्चित करना चाहिए। इसलिए इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

सभापति महोदय, यहां चर्चा की गई है और हम सभी जानते हैं कि देश में बड़े-बड़े लोगों पर अरबों-खरबों रुपए सरकार के कर्ज के रूप में बकाया हैं और उन्हें वसूल करने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की जाती, लेकिन अगर किसान खेती के लिए छोटा-मोटा कर्ज लेता है और यदि उसे समय पर नहीं चुका पाता है तो उसे जेल में डाल दिया जाता है। किसानों के साथ सरकार द्वारा ऐसा व्यवहार किया जाना ठीक नहीं है। हम लोग बोलते कुछ और हैं और व्यावहारिक तौर पर हम कुछ और करते हैं। मेरा निवेदन है कि किसानों को परेशान करने का काम नहीं होना चाहिए।

सभापति महोदय, सरकार ने किसानों के फायदे के लिए एक अच्छा काम किया है और वह यह है कि किसानों का फसल बीमा योजना लागू किया गया है और क्रेडिट कार्ड इश्यू किया गया है। इन दोनों योजनाओं से किसानों को बहुत लाभ पहुंचा है, लेकिन इन योजनाओं का कुछ ही किसानों को लाभ मिल रहा है, मेरा सरकार से निवेदन है कि इन योजनाओं का लाभ पूरे देश के छोटे-बड़े सभी किसानों को मिले, ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए।

महोदय, आज किसान की हालत बहुत जर्जर है। देश में आज भी ९० प्रतिशत ऐसे किसान होंगे जो अपने बच्चों को न पढ़ा पाते हैं और न उनकी दवा-दारू कर पाते हैं और न ही अपने बच्चों की विवाह-शादी ठीक ढंग से कर सकते हैं। किसानों को उनकी आर्थिक दशा सुधारने के लिए सबसे अच्छा काम जो करना चाहिए वह यह है कि किसानों को आवागमन की सुविधा उपलब्ध करा दी जाए। इसके लिए देश के गांव-गांव को सड़कों से जोड़ दिया जाए। गांवों में बिजली उपलब्ध करा दी जाए। किसानों के बच्चों को पढ़ने के लिए अच्छे स्कूल उपलब्ध करा दिए जाएं, चकित्सा की व्यवस्था करा दी जाए और सिंचाई की सुविधा उपलब्ध करा दी जाए तो मैं समझता हूं कि किसानों का बहुत भला हो सकता है।

सभापति महोदय, अभी किसान जो उत्पन्न करता है उसे गांव के बाजार में ही एक-दो रुपए प्रति किलो के भाव पर बेच देता है क्योंकि गांव से शहर के बाजार तक सड़क नहीं होने के कारण वह अपना माल शहर के बाजार में बेचने नहीं जा सकता है। यदि सडकें उपलब्ध करा दी जाएं, तो वह अपने माल को जिसे वह गांव के बाजार में एक-दो रुपए किलो में बेच देता है उसे शहर के बाजार में १५-२० रुपए किलो बेचने जा सकता है। अभी तो क्या होता है कि गांव में ही बिचौलिया उसके माल को एक-दो रुपए किलो खरीद लेता है और बिचौलिया शहर में जाकर १५-२० रुपए किलो बेच देता है। किसान की कमाई को बिचौलिया खा रहे हैं। यह स्थिति किसानों के लिए अच्छी नहीं है। हम चाहेंगे कि गांवों में सड़कों, बिजली, आवागमन, स्कूलों और स्वास्थ्य की व्यवस्था होनी चाहिए। अगर आप ऐसा कर दें और वहां चकित्सा व्यवस्था हो जाए तो हम समझते हैं कि किसानों का बहुत बड़ा लाभ होगा। अभी गांव में या प्रखंड स्तर पर जो गांव हैं, उसमें कौन लोग रहते हैं?हम किसानों की बात करते हैं। वहां सभी छोटे-बड़े वर्ग के किसान रहते हैं। उन किसानों को कहीं कोई चकित्सा की व्यवस्था नहीं मिलती। अगर वहां स्कूल है तो बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक की व्यवस्था नहीं है या कहीं स्कूल भवन ही नहीं है। ऐसी वहां की स्थिति है। समाज में जो दबे और कुचले लोग हैं, उनको हम यहां उठाने की बात करते हैं। वहां उनके लिए ये सब व्यवस्थाए नहीं हैं। प्रखंड में पांच-छह डाक्टरों का पदस्थापन है मगर आप देखेंगे कि वहां एक भी डाक्टर नहीं रहता। यह आज की व्यवस्था है।

इसलिए मेरा सरकार से आग्रह है कि जब हम उनकी समस्याओं के ऊपर यहां पर ईमानदारी से चर्चा करते हैं वैसे इस पर बार-बार चर्चा होती है। बाढ़ और सुखाड़ पर तो बराबर चर्चा होती है। हमारा कहना है कि जब तक इस समस्या का समाधान नहीं होगा तब इस चर्चा से क्या लाभ होगा ? अगर सही मायने में किसानों की हालत सुधारने की जरूरत है या उनके लिए नीति बनाने की जरूरत है तो उसे आप बनाइये तभी सही मायने में किसान के हित में काम होगा। यह काम हमें ईमानदारी से करना चाहिए।

मैं प्रखंड क्षेत्र से आता हूं। हमारे यहां काफी जंगल है। वह एक तरह का कारखाना है जिससे लोगों को रोजी-रोटी मिलती है। वे जंगल आज उजड़ते चले जा रहे हैं। उस जंगल से लोग लकड़ी या पत्ता बीनकर अपना जीवनयापन करते हैं। साल का बीज खाकर जीवनयापन करते हैं। साल की लकड़ी मजबूत होती है, उसे बेचकर अपना जीवनयापन करते हैं। मेरा कहना है कि दिनोंदिन जंगल खत्म होते जा रहे हैं। बरसात के दिनों में जब पेड़ों से पत्ते गिरकर खेतों में आते हैं तो उससे किसानों को लाभ होता है। आज वे जंगल उजाड़ने का काम हो रहा है। मैं जंगल की बात इसलिए कर रहा हूं क्योंकि वह सीधे किसान से जुड़ा हुआ है इसलिए जंगल को भी बचाने की जरूरत है। यदि आज ईमानदारी से जंगल को बचाना है तो उसे गांव को दे दीजिए। जो जंगल गांव के जिम्मे है, उसकी गांव वाले रक्षा कर रहे हैं लेकिन जहां सरकारी व्यवस्था है, वहां लोग जंगलों को काट कर उसे उजाड़ रहे हैं। यह स्थिति आज किसानों की है। …( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Hon. Members, there are 20 Members more who want to speak.

SHRI THAWAR CHAND GEHLOT (SHAJAPUR): Sir, so many Members are absent also. So, you give more time.

MR. CHAIRMAN: You must ensure that all the Members are present. Nobody is taking interest in the farmers’ issue.

SHRI THAWAR CHAND GEHLOT : Sir, I agree.

MR. CHAIRMAN: I had told the Minister to see that attendance is in full on both the sides.

श्री राम टहल चौधरी:मैं एक मिनट में खत्म कर रहा हूं। मुझे दुख के साथ कहना पड़ता है कि पूरे एशिया में जितना अनाज पैदा होता है, उतना भारत में सड़ जाता है। आज अनाज का भंडार भरा हुआ है, लेकिन फिर भी लोगों की भूख से मरने की चर्चा होती है। केन्द्र सरकार को दोष दिया जाता है मगर केन्द्र सरकार बार-बार कहती है कि जितना चाहे उतना ले जाओ। यदि राज्य सरकार न ले जाये या सही तरह से वितरण न करें तो इसमें केन्द्र सरकार का क्या दोष है?इसमें कहीं-कहीं लगता है कि प्रक्रिया में गड़बड़ी है जिसकी वजह से वे अनाज नहीं ले जा पाते इसलिए इसमें भी सुधार होना चाहिए।

मैं अंत में इतना ही कहना चाहूंगा कि अगर किसान बचेगा तो देश बचेगा। यहां पर किसानों के संबंध में जो चर्चा होती है या बातें होती हैं, उसे हमें ईमानदारी से लागू करने की आवश्यकता है।

श्रीमती प्रभा राव (वर्धा):सभापति महोदय, श्री बसुदेव आचार्य जी द्वारा जो प्रस्ताव यहां लाया गया है, उसके लिए मैं उनको धन्यवाद देती हूं। इसी के साथ आपने इस विषय पर मुझे बोलने का मौका दिया, उसके लिए मैं आपको भी धन्यवाद देती हूं। अगर मेरी हिन्दी में कुछ कमी हो तो मुझे माफ कीजिएगा। सबसे पहले मैं यह कहूंगी कि मैं एक किसान हूं और किसान होने के नाते मैंने किसान का जीवन बहुत नजदीक से देखा है। मैं उसे देखकर यह महसूस करती हूं कि दिन-ब-दिन हम लोग और नीचे स्तर पर जा रहे हैं।

इसके क्या कारण हैं। ऐसा बोलना ठीक नहीं है कि इसका कोई एक कारण है। जब तक हमारे पॉलिसी मेकर्स सवार्ंगसम द्ृष्टिकोण नहीं लेगे, हम लोग एक-एक विषय पर वाटर टाइट कम्पार्टमैंट की तरह अलग-अलग सोचेंगे तो स्थिति में ठीक से सुधार नहीं कर सकेंगे। इसलिए मैं कहना चाहूंगी कि अगर हमको कोई उपाय करना है तो उसके लिए हम जब तक किसानों का जीवन समृद्ध नहीं करेंगे तब तक किसी दूसरे क्षेत्र में समृद्धि नहीं ला सकेंगे। शायद यही कारण है कि अभी हमें इसे युद्धस्तर जैसे देखना पड़ेगा। हम हमेशा बोलते आए हैं कि हमारा देश कृषि प्रधान देश है, मतलब हमारे ७० प्रतिशत लोग आज भी ग्रामीण इलाकों में रह रहे हैं और कृषि पर निर्भर हैं। हम अपने बजट का कितना हिस्सा इसके लिए रखते हैं, यह भी देखने की जरूरत है। मैं मंत्री जी से विनती करूंगी कि बजट तैयार करते समय वे इस बात का ख्याल जरूर रखें।

हमारी आर्थिक व्यवस्था में आज ऐसा द्ृश्य है कि व्यापार करने वाले और ज्यादा ऊपर उठ गए हैं। दो प्रतिशत लोग जो व्यापार करने वाले हैं, जिस अर्थ नीति को शायद हम कार की अर्थ नीति समझेंगे, ये सब लोग पन्द्रह बड़े शहरों में बसते हैं, गांवों में नहीं बसते, मैंने ऐसी रिपोर्ट पढ़ी है। मैंने ऐसा भी पढ़ा है कि पन्द्रह प्रतिशत लोग, बाइसिकल इकोनोमी, मध्यम वर्ग के आज भी मौजूद हैं और सबसे ज्यादा, जो सबसे कम आर्थिक व्यवस्था की एक मिसाल है, वे ८३ प्रतिशत लोग हैं। इसमें भी ज्यादा से ज्यादा संख्या, यानी ६५ से ७० प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र में रह रहे हैं। मैं मंत्री जी से यह जरूर कहूंगी कि यदि हम ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों की तरफ देखें तो श्रम करने वाले लोगों की जो संख्या आज है, दस साल में दस लक्ष श्रमिक खेती पर निर्भर करने वाले और ज्यादा बढ़ जाएंगे। सौ मलियन लेबर के बारे में हम क्या सोचने जा रहे हैं, मुझे नहीं मालूम लेकिन मुझे विश्वास है कि जब आपकी नीति बनेगी तब आप इस मुद्दे की ओर भी ध्यान देंगे। दुर्भाग्यवश हमारे खाद्यान के गोडाउन भरे हुए हैं लेकिन किसी कारणवश वितरण नहीं हो पाने से भुखमरी की रिपोर्ट भी हमारे पास आती हैं। इसे भी सुधारना होगा क्योंकि आज जो २०८ मलियन टन अनाज की जरूरत है, दस साल के बाद वह बढ़ कर २६६ मलियन टन होने जा रही है।

इसके अलावा हमारी जमीन की होल्िंडग्स जो सन् १९६० में २.७ हैक्टेयर थी, १९९० में कम होकर १.६ हैक्टेयर पर आ गई है। इस वजह से हम चाहें भी तो न स्मॉल स्केल इकोनौमी कर सकेंगे और न ही बिग स्केल इकोनौमी का फायदा उठा सकते हैं। इसलिए हमारे सहकारी क्षेत्र, आजकल कारपोरेट और कार्पोरेशन क्षेत्र इकट्ठा मिलाकर चलने की चर्चा चल रही ही, उसकी ओर ध्यान देकर कृषि मंत्री इसमें सुधार लाएंगे, ऐसी मैं अपेक्षा रखती हूं।

इसके अलावा जब तक हमारा नाता हम अपने उद्योग क्षेत्र के लोगों से नहीं जोड़ेंगे, तब तक हम कितनी भी अच्छी खेती करें या उद्योगों में कितना भी आगे बढ़ें, हमारा देश आगे नहीं बढ़ पाएगा। इसीलिए जैसा हमने देखा कि हमारा नाता नहीं जुड़ने से टैक्सटाइल इंडस्ट्री पूरी बर्बाद हो गई, कपास का किसान रास्ते पर आ गये और गन्ने का किसान भी रास्ते पर आ गया है। इसके अलावा तेल, बीज, जूट आदि के सब कारखाने भी बीमार हो गये हैं। जब तक इंडस्टि्रयल बेस हमारे किसानों के साथ हम नहीं जोड़ेंगे, कितनी भी हम प्रगति करना चाहें तो वह करना हमारे लिए नामुमकिन है, मुश्किल है। इसका भी आप ख्याल रखेंगे, ऐसी मैं आपकी तरफ से अपेक्षा रखती हूं।

दूसरा हमारा एक और महत्व का क्षेत्र है, जो कृषि से जुड़ा है, वह इर्रीगेशन का क्षेत्र है। एक तरफ बाढ़ आने से हमारी क्राप्स बह जाती हैं, दूसरी तरफ सूखा होने से हमारी क्राप्स जल जाती हैं और तीसरी तरफ हमारी जो जमीन काश्त में आती है, उस जमीन का ४० प्रतिशत हिस्सा ही इर्रीगेटिड लैंड है। मैं आपको यह जरूर कहना चाहूंगी कि जिस जमीन पर पहले १९५० में ५४०० क्यूबिक मीटर ताजा पानी मिलता थी, अब उसी जमीन में १३०० क्यूबिक मीटर पानी मिल रहा है और वर्ष २०२५ में कुछ रहेगा या नहीं रहेगा, यह भगवान जाने। अगर हम लोग जान पाएंगे तो हम भी जानेंगे, इसलिए मैं आपसे यह विनती करना चाहती हूं…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Please conclude now.

SHRIMATI PRABHA RAU : Sir, I would like to speak for some more time.

MR.CHAIRMAN: There are four more speakers from your party.

SHRIMATI PRABHA RAU : Sir, otherwise I would have spoken in my Mother tongue and then I would have taken half the time. But I want to speak in Hindi. I would like to request the other speakers from my party to please bear with me. एक बात मैं कृषि मंत्री जी को यह बताना चाहूंगी कि हमारे देश का किसान खुद के बल पर आत्मनिर्भर हो, दूसरे देशों के किसानों के ऊपर हमारी प्रगति नहीं हो पाएगी। हमने डब्लू.टी.ओ. की मैम्बरशिप ली, ठीक है, मगर उसके बाद हमने यह कायदा भी पास किया कि हमारे किसानों का कोई इण्टरैस्ट हार्म नहीं हो। वह बड़ा अच्छा कायदा हमने पास किया है, लेकिन वह लागू नहीं हुआ है। उसके लागू होने के पहले ही हमारी सरकार ने यू.पी.ओ.वी.(Union for Protection of Plant Variety) का सदस्य बनने का विचार कर लिया। यह विचार करने की जरूरत इसलिए नहीं है कि यह जो यूनियन बन रही है, वह सब जितने भी बड़े देश हैं, विकसित देश हैं, उनमें सीड प्रोडक्शन करने वाले जितने भी बड़े-बड़े कारपोरेशंस हैं, यह बात उनके फायदे की है। यह किसी के लिए भी जरूरी नहीं है कि हमने अगर डब्लू.टी.ओ. की सदस्यता ले ली है तो इसकी भी लें। मैं आपसे यह कहूंगी कि अगर आप अपने डिपार्टमेंट से चर्चा करेंगे तो वे लोग यह कहेंगे कि ऐसी कोई जरूरत नहीं है। हमारे जो अनुसंधार या दूसरे क्षेत्र में उसका फायदा उठाना जरूरी है, वह लगता है तो वह भी जरूरी नहीं है।

हमारा पावर का जो सैक्टर है, उसके बारे में बड़ी मुश्किलात हमारे सभी मंत्रीगण फेस कर रहे हैं और उसके बहुत सारे रास्ता निकालने का प्रयास कर रहे हैं, मगर मैं बड़ी ही विनम्रता से यह कहूंगी कि प्रगति मैदान में हमारी जो एग्जीबिशन लगी थी, वहां हमने देखा कि चाइना का जो स्टाल लगा था, वहां उन्होंने हर गांव के लिए अपना पावर प्रोडैक्शन का प्लांट लगाने का प्रयास किया, क्योंकि इसमें ट्रांसमिशन नहीं लगता। अगर इसका प्रयास आपने किया है तो क्यों ने हम इसी तरीके से अपने देश में भी सोचें।

दूसरी बात जो मैं कहना चाहती हूं, वह दुख की बात है। मैंने मंत्री जी को और इनके पहले वाले मंत्री जी को भी कहा है कि जब कभी पावर सेक्टर की बात होती है और उसमें पावर चोरी की बात होती है, तो उसका एक ही हैड रहता है, जिसका नाम कृषि है। क्या इस देश में सिर्फ किसान ही चोरी करते हैं, नहीं ऐसी बात नहीं है। सबसे ज्यादा बिजली की चोरी तो शहरों मेंहोती है, उद्योग वाले करते हैं। इसलिए इस हैड को और इस सोच को शीघ्र ही बदलने की जरूरत है और जितनी जल्दी हम इसको बदलेंगे, उतना ही हमें सुकून मिलेगा।

रूरल व्यवस्था के बारे में भी हमें अपने नजरिए में बदलाव लाने की आवश्यकता है। हमारे जितने भी बैंकों के अधिकारी हैं, रिजर्व बैंक के अधिकारी हैं और ग्रामीण व्यवस्था से जुड़े हुए लोग हैं, उनका नजरिया किसानों के प्रति ठीक नहीं है, गलत है। ये सभी ऐसा समजते हैं कि किसान चोर हैं। लेकिन मैं कहना चाहती हूं कि किसान ने न कभी चोरी की है और न ही करेगा। उसकी चोरी की मन:स्थिति जन्म से ही नहीं है। उसके पास जो है, वह वापस करना चाहता है। उसके ऊपर जो भी ऋण है, वह चुकाना चाहता है। जिस तरह से उद्योगों को लोन दिया जाता है, वैसे किसानों को नहीं दिया जाता। जब कोई इंडस्ट्री सिक हो जाती है तो उसको खड़ा करने के लिए और लोन देकर बूस्ट अप किया जाता है। लेकिन किसान अगर दो-तीन साल मुश्किल में आ जाए और ऋण वापस न कर सके तो उसी जमीन नीलाम करके उसको इस तरह रास्ते पर लाया जाता है। यह नजरिया जब तक नहीं बदलेगा, तब तक किसान कभी सुखी नहीं हो सकता। क्रॉप लोन का बीमा का पैसा काटा जाता है, लेकिन हमें कभी बीमा नहीं मिलता। सहकारी संस्थाओं में भी ब्याज का पैसा काटा जाता है। कृषि उपज समति है। उसके बारे में जो आज के नियम हैं, उनके बावजूद भी बिचौलिए, जिनको हम दलाल कहते हैं, वे रुमाल के नीचे हाथ डालकर किसान को फंसाते हैं। उस तरफ भी सरकार को ध्यान देना चाहिए और इसको रोका जाना चाहिए।

आज साइंटफिक क्षेत्र बहुत विकसित हो गया है। सूचना और प्रौद्योगिकी में बहुत डवलपमेंट हो गई है। ज्ञान का फैलाव हुआ है। हम चाहते हैं कि कृषि से संबंधित जो सूचना, ज्ञान और प्रौद्योगिकी है, वह गांवों तक जाए और सबको इसकी सूचना मिले। इसी तरह से कम्प्यूटर का लाभ भी किसान को मिलना चाहिए और उसको इसकी जानकारी देनी चाहिए। हमने इकोनॉमी के लिए सभी दरवाजे खोल दिए हैं। आज जो दुनिया में हो रहा है, उसकी जानकारी हमें उसी समय मिल जाती है। वह जानकारी भी किसान को तुरंत मिलनी चाहिए।

डेयरी, भेड़ पालन, कुक्कुट पालन और मत्स्य पालन आदि जो छोटे-छोटे कुटीर उद्योग धंधे हैं, इनसे काश्तकार को कैसे जोड़ा जाए और इन धंधों में उसकी कैसे आमदनी बढ़े, इस बारे में सरकार को प्रयास करना चाहिए।

आजकल कॉस्मेटिक का प्रचलन बहुत ज्यादा है। उसके लिए बहुत सारी वनस्पतियां हमारे देश में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, लेकिन उनका प्रचार-प्रसार नहीं है। सुगंधित द्रव्य, फूल आदि चीजें हैं, जिनसे मेडिसन बन सकती हैं। अगर हम इनका प्रचार-प्रसार करेंगे, तो किसान की मदद होगी। किसानों के खेत में कई बार वाइल्ड एनिमल आ जाते हैं और खड़ी फसल को बर्बाद कर देते हैं। हमें कहा जाता है कि उनको हाथ नहीं लगाना चाहिए, कोई तकलीफ नहीं पहुंचानी चाहिए, जबकि वे किसान की फसल खराब कर देते हैं। आप इस तरह की सीख इनसान को जरूर दें, लेकिन अगर इनसान की बर्बादी उनसे हो तो फिर उसकी सुरक्षा के लिए भी सरकार को आवश्यक प्रबंध करना चाहिए। इतना कहकर मैं अपनी बात समाप्त करती हूं।

DR. RANJIT KUMAR PANJA (BARASAT): I thank you, Mr. Chairman, Sir for giving me this opportunity.

I would like to say a few words on the farmers’ plight. My Constituency is mainly rural covering about 70 per cent to 75 per cent of the rural population. So, 70 per cent to 75 per cent votes to the MPs and MLAs of my Constituency come from the rural area.

The farmers of my Constituency produce fruits, cereals, vegetables, meat, fish, eggs and milk. They also produce fibres like cotton and jute. But we are totally at the receiving end. So, it is high time that we should think about the betterment of the lives of these people by giving them just the basic requirements for survival. Most of the people of my Constituency are poor and they are living below poverty line.

They produce to keep us -- the middle-class and the rich -- alive. But paradoxically, they still remain poor, as they have, so far, not been given the standard of living they deserve. There is hardly any electricity. There are no proper roads, drinking water, primary education and primary health care. All these amenities are not there even after 50 years of our Independence, and this is due to, I think, a lack of system all through since our Independence.

Sir, it is heartening to note that our hon. Prime Minister has started some yojnas so that in the next few years we will be having some important things viz., roads, electricity, primary health care and primary education system to give a better life for these poor people.

Sir, most of these rural people are farmers but they do not own any farm. Most of them do not even own any land. They plough and toil but they do not even get the proper supporting prices. They have no adequate warehouses or cold storages for preserving their crops. They have no co-operatives to help them. Due to lack of these facilities including the lack of proper roads and transport, whatever they sell is done under distress, to the middlemen who make the entire profit. I have seen it in my Constituency. They are producing a lot of jute. Two years ago, they were selling jute at Rs. 400 per quintal. Being a doctor, I had some patients in the jute farms. So, I know it. They were buying it in the jute industry at Rs 1200 per quintal. A difference of Rs. 800 was there from the farmers to the jute manufacturing concerns.

There have been many high level talks. We heard today that there was a National Seminar on fixation of Minimum Support Price. But how far the farmers have been benefited from these deliberations and decisions, raises a little doubt.

Sir, I suggest that the MSP should be declared in time, that is, before the sowing season, taking into account all the criteria, specially of the cost of production, natural calamities, to see that the farmers are aware of the MSP so that they get the proper price.

Bank loans and insurance for all deserving farmers should be done.… (Interruptions)

SHRI ANIL BASU (ARAMBAGH): They are selling the JCI.

DR. RANJIT KUMAR PANJA: There are a lot of thing which can be said about JCI, FCI etc. There should be a proper system to organise all these things so that the farmers get the benefit.

Small cooperative, I believe, is an absolutely essential thing. Small warehouses and cold storage should be run through panchayats. They should also look for the means of transport for sending produce to the market. In my constituency, a lot of vegetables grow. The poor farmer sells it at Rs.1 or Rs.2 per Kg. while about 50 kms away they are being sold at Rs.10 or at Rs.20 per Kg. Due to lack of cooperatives as also the transport facility, they sell their produce to the middlemen who get all the benefit.

Along with this supporting system for the farmers, there should be proper primary education and primary health care to create awareness among the people and to save the progeny so that they have a better life in future. The farmers who are toiling hard in the field can have better health through these health centres.

   

*SHRI RANEN BARMAN (BALURGHAT): Hon. Chairperson, I thank you for giving me this opportunity to speak on an important issue. The issue of agriculture is an important one in our country. Our country is an agriculture dominated country and without improvement of agricultural sector, the country cannot progress – it is a simple thing to understand. But unfortunately, even after 55 years of our independence, agriculture sector has not developed to the desired level. The late Prime Minister Lal Bahadur Shastri had raised the slogan – Jai Jawan, Jai Kisan – the jawans save us from the attack of enemy and the farmers save the country by growing food grains for people. We see that the emphasis was unfortunately not on agriculture, so the farmers are disappointed. They do not get proper price for the produce after investing in farming tools and other pesticides. Therefore, they lose their interest in farming. Different newspapers report suicide cases by farmers – this should be looked into. They depend solely on rainfall so that they can continue with rainwater. Irrigation could not be provided everywhere and the Teesta canal project is lying incomplete due to lack of funds. If this project could be completed, the farmers could work on single yield plots and reap advantage accordingly. I appeal to the hon. Agriculture Minister to complete the Teesta canal project expeditiously. The Government has been regularly withdrawing the subsidies provided to the farmers on fertilizers and farming tools. The farmers face the danger of drought and flood these days. The 12 States of our country that are facing drought these days have not been given proper assistance by the Government, and the farmers were not given the said assistance. The Prime Minister had assured them of relief but in reality that did not happen. After buying the fertilizers and investing in other materials, the farmers cannot have the profit margin by selling their products and are unable to sustain their family. They are compelled to sell wheat, jute, sugarcane at a much lower price. They could protect __________________________________________________________________*Translation of the speech originally delivered in Bengali.

their harvest if there were adequate arrangement for cold storage. Cold storages were not constructed in most of the villages thus indicating utter neglect of agricultural sector. Our country can only prosper if the lot of the farmers and agriculture are improved. I would appeal to the Minister of Agriculture to bear this in mind. I would also appeal that the loans incurred by the farmers for their profession and due to the situations arising out of drought should be waived and steps should be taken for over all development of the farmers. In view of the general disappointment that has engulfed our farmers, more emphasis should be given on agriculture and the farmers should be protected if only we want to save our country. I would like to say that the Agriculture Ministry has not affected the measures that should have been taken to ameliorate the plight of farmers. If the situation prevails like that of now, the future of our country will be threatened. Once again I like to point out that to save the country we should first protect the farmers and the agricultural sector. This is my sincere appeal to the hon. Minister of Agriculture.

                                       

श्री रामजीवन सिंह (बलिया, बिहार) : सभापति महोदय, पिछले कई दिनों से कृषि एवं कृषकों की समस्याओं पर चर्चा चल रही है। मैंने अधिकांश सदस्यों के भाषणों को सुना, उन्होंने आज जो कृषि व्यवस्था और कृषकों की चिन्ता जताई, निश्चित तौर पर मैं भी उसे एक कृषक और कृषि विभाग का प्रभारी होने के नाते महसूस करता हूं।

जिन बातों का उल्लेख किया गया - चाहे बिजली हो, पानी हो, ऋण की व्यवस्था हो या दूसरी तमाम चीजें हों, अधिकांश चीजें कृषकों के लिए जरूरी हैं लेकिन कृषि विभाग का अपना दायित्व नहीं है और कृषि विभाग उसमें कुछ नहीं कर सकता है। वह किसानों को न पानी, न बिजली, न ऋण दे सकता है, न भूमि सुधार कर सकता है और न ही खाद भंडारण की व्यवस्था कर सकता है। वह कृषकों के जीवन से जुड़ी समस्याओं का निदान नहीं कर सकता है।

कई माननीय सदस्यों ने इन समस्याओं के बारे में चर्चा की थी। मैं उन्हें दोहराना चाहता हूं और उस पर अपनी हामी भरता हूं। जब हम कृषि एवं कृषकों से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा करते हैं तो निश्चित तौर पर इनसे जुड़े सभी विभागों के मंत्रियों को यहां पर रहना चाहिए। चर्चा हो जाती है और यह मान लिया जाता है कि यह मात्र कृषि विभाग से जुड़ा मामला है और कृषि विभाग के प्रभारी मंत्री संबंधित मंत्रियों तक वह संदेश पहुंचा देंगे। इससे इनका कोई निदान नहीं हो सकता है।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): सिंचाई, खाद और प्रक्योरमैंट आदि चीजों को देखने वाले मंत्री कहां हैं? आप उन मंत्रियों को बुलाइए। माननीय सदस्य ठीक सवाल उठा रहे हैं। …( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : It is better that all the Ministers concerned be present. Otherwise what is the use of having the debate?

SHRI ANIL BASU : MSP for jute is the responsibility of the Textile Minister. FCI is the responsibility of the Food Minister and Food Ministry is the nodal Ministry; Agricultural Minister has nothing to do with it. He only takes care of the production.

MR. CHAIRMAN: Convey the mood of the hon. Members to the Ministers concerned.

THE MINISTER OF AGRICULTURE (SHRI AJIT SINGH): I would convey this to the other Ministers. But I am going to reply on behalf of the Government.

MR. CHAIRMAN: The Ministers who are dealing with the Ministries concerned should be present. They only know the matter.

SHRI ANIL BASU: Hon. Agricultural Minister himself is unhappy because the Planning Commission has slashed down his allocation.

MR. CHAIRMAN: He should be helped by other Ministers. This is a long debate. The debate on farmers’ issue is an important issue. This is the second day of the debate.

श्री रामजीवन सिंह : महोदय, देश में कृषि विभाग ने अपना पार्ट अदा किया और बहुत बड़ी भूमिका निभायी। जो देश खाद्यान्न के मामले में घाटे में था, उसने उत्पादन और उत्पादकता बढ़ा कर देश को आत्मनिर्भर बनाया। अब देश निर्यात करने की स्थिति में है। कुछ मित्रों ने चर्चा करते समय कहा कि देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर तो बन गया लेकिन किसान गरीब क्यों है? जो मित्र चर्चा करते हैं कि किसानों के लिए सिंचाई की व्यवस्था कर दो, उनसे मैं कहना चाहता हूं कि पंजाब में सिंचाई की अच्छी व्यवस्था है और हरियाणा में भी बिजली की व्यवस्था है। हरियाणा और पंजाब के कृषक जिन को हम मानते हैं कि वे प्रति व्यक्ति आय में सबसे ज्यादा आगे हैं लेकिन वहां के कृषक भी कर्ज में डूबे रहते हैं और गरीब हैं। मुझे याद है कि हरियाणा में १९८८ में चुनावों के दौरान स्वर्गीय देवीलाल जी ने कहा था कि कृषकों तुम हमें वोट दो, हमारी पार्टी अगर जीतती है तो दस हजार रुपए तक के कर्जे माफ कर देगी।

इतने ज्यादा कृषकों ने उन्हे वोट दिये कि उन्हें ८५ परसेन्ट सीटें मिल गई। लेकिन हरियाणा का किसान भी कर्ज में डूबा रहता है, यह सोचने की बात है। आखिर इसमें कहां कमी है। आज तक कृषकों की समस्याओं का जो समाधान ढूंढा गया वह टुकड़ो-टुकड़ों में, पीसमिल में ढूंढा गया। यदि इसे सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के साथ नहीं जोड़ेंगे तो किसानों की समस्याएं हल होने वाली नहीं है। सरकार पर दवाब पड़ता है, किसानों द्वारा मांग की जाती है कि हमारी उपज की कीमतें बढ़ा दो। हमारे आलू, प्याज, गन्ना और चीनी की कीमतें बढ़ा दो। लेकिन हकीकत यह है कि जब आलू, प्याज और चीनी की कीमतें बाजार में बढ़ती हैं तो सरकार बदल जाती है। चाहे लाखों मीटरिक टन आलू सड़ जाए, कहीं कोई आवाज नहीं उठती है। हजारों एकड़ में लगी हुई गन्ने की फसल जला दी जाए, कहीं कोई आवाज नहीं उठती है। यह व्यवस्था किसके लिए है। आलू और चीनी की कीमत बढ़ जाए तो सरकारें बदल जाती हैं और लाखों मीटरिक टन आलू सड़ जाए, गन्ने को जलाना पड़े तो भी कहीं कोई आवाज नहीं उठती है, कोई सिहरन सरकार, मीडिया या अन्यत्र कहीं पैदा नहीं होती है। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि जब यह चर्चा होती है कि किसानों की सब्सिडी बढ़ाओ, सपोर्ट प्राइस बढ़ाओ तो मैं कहता हूं कि सपोर्ट प्राइस घटाओ। लेकिन जो तय करो, उतना किसान को मिलना चाहिए। इसे घटाने में कोई हर्ज नहीं है। किसी ने बहुत अच्छा कहा है - "सरकार ने कीमत बढ़ा दी मंडी में धान की, फिर भी अनब्याही रह गई बेटी किसान की"। ऐसा क्यों होता है ? आप कीमत बढ़ा देते हैं और कहते हैं कि हमने इतना कर दिया, लेकिन जब कीमत बढ़ती है तो इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यह इससे जुड़ा हुआ मामला है।

सभापति महोदय, फिर से कोई वेतन आयोग बनेगा, जो एसेंशियल कोमोडिटीज के प्राइस इंडैक्स के आधार पर वेतन निर्धारित करता है, महंगाई तय करता है। वह कहेगा कि इतनी कीमत बढ़ गई, इसलिए इतनी महंगाई बढ़नी चाहिए, महंगाई भत्ता बढ़ना चाहिए, वेतन में इतनी बढ़ौतरी होनी चाहिए। इसलिए मैं कहता हूं कि जब आप सब्सिडी पर बात करें तो सम्पूर्ण देश की अर्थव्यवस्था को सामने रखकर सोचें। इसलिए मैं कहता हूं कि अब सब्सिडी बढ़ाने का सवाल नहीं उठता है, नहीं तो यह सिलसिला चलता रहेगा।

सभापति महोदय, फर्टिलाइजर पर सब्सिडी की बात की जाती है।

MR. CHAIRMAN : The time given to you is three minutes but I have given you seven minutes. So, please conclude.

श्री रामजीवन सिंह : सर, मैं आपकी मजबूरी महसूस करता हूं। आज फर्टिलाइजर का सवाल है। फर्टिलाइजर पर जितनी सब्सिडी दी जाती है, उसमें से पचास परसेन्ट किसानों तक पहुंचती है और पचास परसेन्ट फर्टिलाइजर के उत्पादकों के पास चली जाती है या मडिलमैन तक पहुंच जाती है। सब्सिडी का लाभ किसानों को नहीं मिल पाता है। इसलिए मैं मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि आप दो काम करें - प्रथम फर्टिलाइजर के लिए कोई ऐसा मैकेनिज्म बनायें जिससे वह डायरेक्टली किसानों को मिले। दूसरा कृषि जगत में एक दूसरा विचार आया है, क्योंकि कैमिकल फर्टिलाइजर के इस्तेमाल के दुष्परिणाम अब सामने आ रहे हैं। दुनिया में कई ऐसे कृषि उत्पादक देश हैं जो इसका इस्तेमाल कम करते चले जा रहे हैं। यह ठीक है कि कहीं-कहीं पर २५५ कि.ग्रा. प्रति हैक्टेअर तक इस्तेमाल होता है। हमारे देश में पंजाब में ज्यादा से ज्यादा १५५ कि.ग्रा. प्रति हैक्टेअर तक होता है और दूसरे प्रदेशों में कहीं इससे भी कम है। हालांकि दुनिया की तुलना में हमारे यहां बहुत कम है। लेकिन पंजाब में आज उत्पादन में स्टैगनेशन शुरू हो गया है। इसलिए अब एक दूसरा विचार आया है कि अब फर्टिलाइजर के यूज को कम करो। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि भविष्य के खतरे को देखते हुए क्या आप कोई ऐसी योजना बनाने जा रहे हैं या सोच रहे हैं या कृषि वैज्ञानिकों से कह रहे हैं कि पांच वर्षों के बाद फर्टिलाइजर के यूज को कंप्लीटली बंद कर दें। अब हम इसका यूज नहीं करेंगे, इसके यूज की अब कोई आवश्यकता नहीं है।

सभापति महोदय, मैं एक उदाहरण देना चाहता हूं कि १७८३ में जब ईस्ट इंडिया कंपनी आई तो उसने आंध्रा प्रदेश के आठ सौ जिलों का सर्वे कराया ,और पाया कि उस समय बिना केमीकल फर्टीलाइजर के, क्यों कि तब तक केमीकल फर्टीलाइजर देश में आया नहीं था, ८६ मन एक एकड़ में धान पैदा होती थी। उस समय हमारी जमीन में उर्वरा शक्ति थी और आज वह शक्ति नहीं है। प्रथम पंचवर्षीय योजना से ले पहले, १९४७ से पहले, आजादी से पहले हमारी जमीन की यह स्थिति थी। हमारे देश में केमीकल फर्टीलाइजर का प्रयोग होता ही नहीं था। १९४७ के बाद के ५० वर्षों में यह आया है और इसके सारे दुष्परिणाम निकल रहे हैं। उसी तरह से पैस्टीसाइड की स्थिति है। हमारे देश में तो इसका प्रचलन बढ़ रहा है। फिलीपीन्स में पैस्टीसाइड का प्रयोग जीरे रह गया है। मेरा आपसे निवेदन है कि आप इंटीग्रटेड पैस्ट मैनेजमेंट को खत्म करें।

महोदय, उत्पादन बढ़ा, लेकिन हम फ्रूट्स, वैजीटेबल की प्रौसेसिंग और हारवेस्ट की टैक्नौलौजी नहीं अपना सके जिसके कारण हमारे देश का ५० करोड़ रुपए से अधिक का प्रति वर्ष लॉस हो रहा है। उसको पूरा करने के लिए क्या इस देश में कुछ सोचा जा रहा है ?इस बारे में सोचने की बहुत आवश्यकता है।

महोदय, अभी उधर से एक माननीय सदस्य ने ठीक कहा कि इस देश में जोत अलाभकर होती जा रही हैं। अनइकनौमिक होल्िंडग्स हो गई हैं। उसको दूर करने के लिए आप किसानों को अपनी तरफ से कुछ बैनफिट्स दीजिए कुछ इंसेंटिव की घोषणा कीजिए जिसके चलते छोटे-छोटे किसान अपने छोटे-छोटे टुकडों को मिला दें। मेरा तो यह कहना है कि आप भाई का बंटवारा करो, उपज का बंटवारा करो, धन का बंटवारा करो, लेकिन जमीन को टुकड़ों में मत बांटों क्योंकि यह बात देश की इकनौमी के साथ जुड़ी हुई है। आज स्थिति यह है कि अनइकनौमिक होल्िंडग्स होती जा रही हैं। इसे रोकने की दिशा में कृषि विभाग को चाहिए कि वह ऐसी घोषणा करे कि ५ एकड़ के टुकड़ों को यदि एक प्लाट में लेकर किसान आते हैं, तो उन्हें एक ४ इंच की बोरिंग मुफ्त दे दी जाएगी। अगर मान लो, २५ या ५० परसेंट भूमि को ही हम छोटी जोतों से बड़ी जोतों में ला सकें, तो उससे बहुत लाभ देश को होगा।

महोदय, आज हमारी खेती बिलकुल मैकेनाइज्ड होती जा रही है। बिहार में जो किसान हैं, जो लैंडलैस हैं, वे बड़े लोगों की जमीन बंटाई पर लेकर खेती करते हैं, लेकिन पंजाब में बड़े किसान छोटे किसानों की जमीन को बंटाई पर लेकर खेती कर रहे हैं क्योंकि जो बड़े फार्मर हैं, उन्हें जमीन लाभकर नहीं हो रही है क्योंकि मैकेनाइज्ड खेती है। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि आज जो मैकेनाइज्ड खेती होती जा रही है, वह ठीक नहीं है। आज ट्रैक्टर ३-४ लाख रुपए का हो गया है। इसको लेकर छोटे किसान अपनी खेती नहीं कर सकते हैं। स्माल ट्रैक्टर्स बनाने की व्यवस्था करनी चाहिए जिससे छोटे किसान भी उसे खरीद कर अपनी खेती कर सकें।

महोदय, इसी प्रकार से वाटर मैनेजमेंट की व्यवस्था करनी चाहिए। इर्रीगेशन की व्यवस्था से शायद ज्यादा इम्पौर्टेंट आज वाटर मैनेजमेंट की व्यवस्था करने की आवश्यकता है। इस हेतु स्िंप्रकलर्स और डीप इर्रीगेशन की व्यवस्था करनी चाहिए। इन चीजों को आप कम से कम कीमत पर किसानों तक पहुंचाने की व्यवस्था करनी चाहिए।

महोदय, इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं और आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया, उसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं।

श्री श्रीप्रकाश जायसवाल (कानपुर) : सभापति महोदय, आज एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा चल रही है। इस चर्चा को श्री बसुदेव आचार्य जी ने उठाया है। प्रति दिन सदन में जिन समस्याओं पर चर्चाएं होती हैं वे सारी समस्याएं ही महत्वपूर्ण और गम्भीर कही जाती हैं।

17.00 hrs. लेकिन मैं मानता हूं कि एक समस्या महत्वपूर्ण होती है और एक गंभीर होती है। महत्वपूर्ण समस्याएं उठाने के मामले में भी लोग कह देते हैं कि अत्यंत गंभीर समस्या है। जब गंभीर समस्या को उठाया जाये तो माननीय कृषि मंत्री जी यह बतायें कि उस गंभीर समस्या को क्या कहा जाये क्योंकि दिन में छह बार यह कहा जाता है कि अत्यंत गंभीर समस्या है। इसे गंभीरतम समस्या कहा जायेगा। सारे देश के किसान चाहे वह गन्ने का किसान हो, गेहूं का किसान हो, चावल का किसान हो, नारियल की खेती करने वाला किसान हो या तिलहन की खेती करने वाला किसान हो, यानी देश के कोने-कोने में रहने वाला हरेक किसान आज परेशान है। उसकी परेशानी का सबसे बड़ा सबब एक ही है कि उसे उसकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता। पानी की समस्या है, बिजली की समस्या है, सिंचाई की समस्या है, खाद की समस्या है, यानी बहुत सारी समस्याएं हैं लेकिन अगर समस्याओं की जड़ में देखा जाये और गंभीरता के साथ उसका अध्ययन किया जाये कि आज किसान की परेशानी का सबसे बड़ा कारण क्या है तो उसका एक ही जवाब मिलेगा कि किसान की परेशानी का सबसे बड़ा सबब उसकी उपज का उचित मूल्य न मिलना है।

१७.०१ hrs. ( Dr. Raghuvansh Prasad Singh in the Chair) वह जितनी लागत लगाता है, जितना इन्वेस्टमैंट करता है, आज से दस साल पहले तक इन्वेस्टमैंट का जितना हिस्सा या लाभ मिलता था, आज उसका न्यूनतम लाभ भी उसको नहीं मिल पा रहा है।

मैं आपके सामने अध्ययन की रिपोर्ट रखूंगा। स्ट्रेटेजिक फॉर साइड ग्रुप अध्ययन करने की एक कम्पनी है। उसके अध्यक्ष श्री संदीप वास्लेकर हैं। उन्होंने अपनी अध्ययन रिपोर्ट में बताया है कि दस वर्ष तक वर्तमान कृषि नीति जारी रही तो भारतवर्ष का किसान भुखमरी पर पहुंच जायेगा। उन्होंने अपनी अध्ययन रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि आज २०८ मलियन टन अनाज की आवश्यकता है तो अगले दस वर्षों के बाद यह आवश्यकता २६६ मलियन टन हो जायेगी। इसी तरह उन्होंने आगे लिखा है कि आज सब्जी की आवश्यकता ८० मलियन टन है लेकिन अगले दस वर्षों में यह आवश्यकता बढ़कर ११७ मलियन टन हो जायेगी। इसी तरह आज दूध की आवश्यकता ८४ मलियन टन है, वह दस वर्षों में बढ़कर १६३ मलियन टन हो जायेगी यानी आवश्यकताएं बढ़ती चली जायेंगी और किसान खेती की ओर अपना रूझान नहीं करेगा क्योंकि उसे उसकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता है।

जाहिर है कि दस-बारह वर्षों के बाद अगर यही स्थिति जारी रही तो भारत का किसान न सिर्फ भूखों मरेगा, न सिर्फ आत्महत्या करेगा बल्कि खेती की ओर से मुंह भी मोड़ लेगा। हिन्दुस्तान जैसे देश में जहां आज भी ७० फीसदी लोग खेती करते हैं, जिसे कृषि प्रधान देश कहा गया है, अगर वहां किसान खेती की ओर से मुंह मोड़ लेगा तो हमारे देश की क्या स्थिति होगा ? क्या स्थिति हमारे देश की कानून व्यवस्था की होगी ? क्या स्थिति हमारी देश की अर्थव्यवस्था की होगी, इसकी कल्पना आप कर सकते हैं । इसका मूल कारण यह है कि सारे छोटे-छोटे कारण, जैसे बिजली, पानी, खाद आदि संकटों को अलग कर दें या सूखे के संकट को अलग कर दें तो आज सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि सारा अनाज, सारा दलहन, सारा तिलहन, शक्कर आदि विदेशों से आकर हमारे पास पड़े हुए हैं जो मूल्यों को बढ़ाने ही नहीं देते। जिस दर से महंगाई बढ़ती है, जिस दर से खाद की कीमतें बढ़ती हैं, जिस दर से बिजली की कीमतें बढ़ती हैं, जिस दर से पानी की कीमतें बढ़ती हैं, उस दर से किसानों की उपज की कीमत बढ़ना तो दूर रहा, उसकी कीमतें या तो स्थिर रहती है और घटती चली जाती है ,फिर कैसे किसान खेती की ओर अग्रसर होगा, खेती की तरफ आकर्षित होगा। उसका मूल कारण है कि डब्ल्यू.टी.ओ. से हमारा जो समझौता है, हम आपके माध्यम से कृषि मंत्री जी से एक बात जानना चाहते हैं, हमारी मजबूरी थी कि हमने विश्व व्यापार संगठन से समझौता किया लेकिन उन समझौतों में बहुत सी ऐसी शर्तें हैं जिनका अगर उपयोग किया जाए तो आज किसानों की जो स्थिति बन रही है, कम से कम ऐसी स्थिति तो नहीं बन पाती। मैंने जिन्सों में देखा है कि पचास प्रतिशत कस्टम डयूटी लगाई जाती है और हमें तीन सौ प्रतिशत तक कस्टम डयूटी लगाने का अधिकार है, फिर जिन जिन्सों की कमी हमारे मुल्क में नहीं है, हम क्यों नहीं दो सौ प्रतिशत, ढाई सौ प्रतिशत कस्टम डयूटी लगा कर उन जिन्सों के आयात को रोकते हैं, क्यों हम उन जिन्सों के आयात को ऐलाऊ करते हैं। कहा जाता है कि डब्ल्यू.टी.ओ. से हमारा समझौता है। समझौते की सारी शर्तों का पालन क्या यह सरकार कर रही है? अगर उन समझौतों की शर्तों का पालन करने के बाद भी हमारी समस्या का समाधान न हो, तो हमें डब्ल्यू.टी.ओ. में अपील करनी चाहिए। यह कृषि प्रधान देश है जहां ७० प्रतिशत लोग किसानी करते हैं। अगर किसान का मुंह खेती की तरफ से मुड़ गया तो सारी पोलीटिक्स खत्म हो जाएगी, सारा देश भुखमरी के कगार पर पहुंच जाएगा।

सभापति महोदय, यह कोई मामूली समस्या नहीं है। हो सकता है किसी दूसरे देश में परिस्थितियां दूसरी हों लेकिन भारत जैसे देश में जहां एक अरब से ऊपर की आबादी रहती है और यहां आबादी पर जितना अंकुश लगाया जाना चाहिए, अभी तक हम नहीं लगा सके हैं, वहां की परिस्थितियां बड़ी भिन्न हैं। इसलिए हमको सबसे पहले यह काम करना चाहिए कि जो अधिकार, जो शर्तें हमें विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत मिली हैं, उन शर्तों का भरपूर उपयोग करके हम आयात पर अंकुश लगाएं जिससे जिन चीजों की हमारे यहां कमी हो, उन चीजों पर तो हम कस्टम डयूटी कम रखें लेकिन जिन चीजों की कमी नहीं हो, उन चीजों पर इतनी कस्टम डयूटी बढ़ा दें ताकि वे चीजें हमारे देश में इकट्ठी न हो सकें।

दूसरी, गन्ना किसान की बात है। रगन्ना किसान की स्थिति यह है कि आधी से ज्यादा चीनी मिलें आज भी कम से कम उत्तर प्रदेश में बंद पड़ी हैं। सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री महोदय से जानना चाहता हूं कि ऐसी स्थिति में रबी की बुआई कैसे होगी। किसान गन्ना काटता है, गन्ना बेचता है और उसी खेत में गेहूं बोता है। आज उसका सारा गन्ना खेत में पड़ा है। उसके पास दो ही विकल्प हैं - या तो वह गन्ना जला दे या इस बार वह गेहूं की बुवाई न करे। उत्तर प्रदेश में किसान का करोड़ो रुपया गन्ना मिलों पर बकाया है, कोई उसे देने को तैयार नहीं है। तिराई जो नवम्बर में शुरू हो जानी चाहिए, उत्तर प्रदेश में नवम्बर के प्रारंभ में गन्ने की तिराई शुरू हो जाती थी, आज तक गन्ने की तिराई शुरू नहीं हुई है। हमको ऐसा लगता है कि शायद यह किसी पॉलिसी के तहत हो रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि सरकार ने यह सोच लिया हो कि हमारे देश में चीनी उद्योग ही समाप्त कर दिया जाए और सारी चीनी विदेशों से आयात की जाए क्योंकि जिस तरह सरकार कान में अंगुली डाल कर, तेल डाल कर बैठी रहती है, न ही केन्द्र सरकार इस पर कोई खास इनीशिएटिव लेती है, न ही राज्य सरकारें लेती है। किसान चिल्ला रहा है, किसानों के प्रतनधि चिल्ला रहे हैं, कोई इनीशिएटिव लेने वाला नहीं है - सबके गले बंद हैं। उनका बकाया आज भी वैसे का वैसा पड़ा है। इसीलिए मुझे संदेह है और हो सकता है कि अन्य देशों के साथ मिल कर यह साजिश की जा रही हो कि हिन्दुस्तान से चीनी उद्योग ही समाप्त कर दिया जाए।…( व्यवधान)मैं कभी-कभी बोलता हूं, थोड़ा बोलने दीजिए।

मेरा तीसरा बिन्दू है कि आज विशेष कर किसानों के मामले में बड़ा दर्द है। खाद की आज क्या हालत है। पिछले आठ वर्षों में खाद की कीमत डयोढ़ी से ज्यादा हो गई है। बिजली की कीमत, एक तिहाई बिजली मिलती है, आठ घंटे से ज्यादा हमारे उत्तर प्रदेश के किसी भी गांव में ज्यादा बिजली नहीं मिलती, मुन्नू बाबू, आपके यहां शायद ज्यादा मिलती हो और वह भी आठ सालों के अन्दर डयौढ़ी कीमत हो गई है। पानी कहां से मिलेगा, डीजल की कीमत डयौढ़ी हो गई है, कृषि यंत्रों की कीमत डयौढ़ी हो गई है और आप आठ वर्षों की मूल्य की तालिका उठाकर देख लीजिए या तो अनाज का वही भाव होगा या अनाज की कीमतें और गिरी होंगी। कैसे किसान खेती करेगा, जब उसे उसकी उपज का उचित मूल्य ही नहीं मिलेगा तो वह खेती कैसे करेगा। यही कारण है कि धीरे-धीरे करके किसान खेती की ओर से मुंह मोड़ता जा रहा है। कभी नौजवान बेरोजगारी की ओर जाते थे तो उनके दिमाग में यह बात आती थी कि हमारे बाप-दादा की खेती है, अगर हमें नौकरी नहीं मिली, हमें रोजगार नहीं मिला तो हम खेती करने लगेंगे। लेकिन आज स्थिति यह है कि नौजवान जूते पर पालिश करने को तैयार हैं, लेकिन गांव जाने को तैयार नहीं हैं। इसका कारण है कि वे अपने बाप-दादा की स्थिति देख रहे हैं कि जब उनकी यह हालत हो रही है, उनकी यह दुर्गति हो रही है तो हमारी क्या दुर्गति होगी।

इसी तरह से सूखे के मामले में उत्तर प्रदेश में जो भी सूखे का कोष गया होगा, सारे के सारे सूखा राहत कोष का ८० फीसदी बेईमानी और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है, किसी किसान को सूखे की राहत के नाम पर कोई भी मदद नहीं मिल पा रही है।

स्थिति यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को धान की फसल आने के पहले, गेहूं की फसल आने के पहले सरकार घोषित कर दिया करती थी, लेकिन इसके लिए हमारे दो मुख्यमंत्रियों को अनशन करना पड़ा, तब कहीं जाकर धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित हुआ। समर्थन मूल्य तो घोषित हो गया, लेकिन मैं आपके माध्यम से सरकार को चेलेंज करना चाहता हूं कि उत्तर प्रदेश मेंधान का एक भी खरीद केन्द्र अभी तक नहीं खुला। इसके पहले थोड़े बहुत गेहूं के खरीद केन्द्र खुले थे, उनमें भी क्या होता था कि कम से कम १०० रुपये क्िंवटल का भ्रष्टाचार, बेईमानी की रकम किसानों को बिचौलियों को देनी पड़ती थी, तब उसका गेहूं खरीदा जाता था। चाहे धान की खरीद हो, चाहे गेहूं की खरीद हो, जब भी फसल आती थी, जब खरीद केन्द्र खुलते थे तो खरीद केन्द्रों पर कोई न कोई बहाना करके किसानों को वापस कर देते थे और किसान जब बिचौलियों के पास जाता था तो उसका जो माल ५५० रुपये में बिकनाचाहिए, वह माल वह मजबूर होकर ४००, ४२५ या ४५० रुपये में बिचौलियों के हाथ बेचता था। इस वर्ष तो रिकार्ड ही टूट गया है, हमारे यहां खरीद केन्द्र ही नहीं खुले। धान का खरीद केन्द्र अभी तक नहीं खुला। इन परिस्थितियों में मेरा आपसे अनुरोध है कि सरकार कृषि को सबसे ज्यादा महत्ता दे।

आप विश्व व्यापार संगठन से आपके जो करार हैं, उन करारों को मेज पर सबसे ऊपर रखा करिये। हमारे पास अगर किसी जिंस की कमी है तो हम उसकी कस्टम डयूटी तुरन्त घटा दें और जिस जिंस की बहुतायत हो, उसकी कस्टम डयूटी कम से कम ५०, ७५ और ३०० परसेंट तक ले जायें और उसके बाद भी अगर हमारा काम न चले तो हमारा यह दायित्व बनता है कि हम विश्व व्यापार संगठन में इसकी अपील करें, लड़ाई लड़ें, धमकी दें कि हम आपका संगठन छोड़ देंगे। हमारा देश अमेरिका और ब्रिटेन के तरीके का देश नहीं है। वे हम पर दबाव डालते हैं कि सब्सिडी घटाई जाये और खुद चार गुना, छ: गुना, आठ गुना और १० गुना सब्सिडी अपने किसानों को प्रति किसान देते हैं। चाहे अमेरिका हो, चाहे अमेरिका के दूसरे देश हों, हमसे १०-१० गुना तक ज्यादा सब्सिडी देते हैं और भारत जैसे गरीब देश के ऊपर यह दबाव डालते हैं कि आप सब्सिडी घटाइये। इन सारी चीजों पर गम्भीरता से चिन्तन किया जाये, सरकार कितनी गम्भीर है, यह मुझे नहीं पता, क्योंकि मैं देख रहा हूं कि न ग्रामीण विकास मंत्री यहां बैठे हैं, न ही फूड एण्ड सविल सप्लाईज मनिस्टर यहां बैठे हैं।

१७.१५ hrs. ( Dr. Laxminarayan Pandeya in the Chair) माननीय कृषि मंत्री जरूर बैठे हैं, इनको थोड़ा सा दर्द है, वह दर्द इनका संस्कारिक है, पैतृक है, मैं जानता हूं चौधरी साहब के पुत्र हैं इसलिए निश्चितरूप से आपके दिल में दर्द होगा। आप इस तरह की व्यवस्था करें कि पूरे देश में और खासतौर से उत्तर प्रदेश में किसान इस बात से आश्वस्त हों कि आजीवन खेती करते रहें। उनकी आने वाली पीढि़यां भी खेती करती रहेंगी। जब तब किसान आश्वस्त नहीं होगा, तब तक हिन्दुस्तान की एक अरब जनता आश्वस्त नहीं हो सकती। इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपको धन्यवाद देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली):सभापति महोदय, हम किसानों की समस्या पर बहस कर रहे हैं। सभी माननीय सदस्यगण किसानों की पीड़ा से चिंतित हैं। उन्हीं की पीड़ा और उनकी पीड़ा का हरण कैसे हो, उस पर सभी लोगों ने सुझाव दिए हैं। किसान पर तो बहस होती रहती है और होगी। लेकिन तात्कालिक विषय जो किसानों से सम्बन्धित है, वह गन्ना है। किसानों ने गन्ना पैदा किया, लेकिन अब उसको लेकर आंदोलन शुरू हो गया है, क्योंकि उसका भाव तय नहीं हो रहा है। पिछले पचास वर्षों से स्टेचुटरी मिनीमम प्राइस तय होता रहा है। यह प्राइस केन्द्र सरकार तय करती थी, बाद में राज्य सरकार मिल-मालिकों और किसानों के प्रतनधियों के साथ मिलकर नेगोशिएटिंग प्राइस यानी वार्ता मूल्य का निर्धारण करती थी। यह सभी की राजी-खुशी से तय होता था। हरियाणा भी करता था, पंजाब भी करता था और उत्तर प्रदेश में भी यह होता था। वहां पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक रुपए का अंतर पुराने जमाने से था। केन्द्र सरकार ने स्टेचुटरी मिनीमम प्राइस ६४-६५ रुपए प्रति क्िंवटल तय किया, उसके पुराने हिसाब से जो पिछले पचास वर्षों की परिपाटी थी, नैगोशिएटिंग प्राइस ८९ रुपए प्रति क्िंवटल होता है। इसमें कुछ .१ प्रतिशत वगैरह की रिकवरी के हिसाब से यह तय होता है। लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला दिया और राज्य सरकार के नैगोशिएटिंग प्राइस निर्धारण करने पर रोक लगा दी। इस कारण अब वार्ता मूल्य तय नहीं होगा। मिल वाले कह रहे हैं कि हम स्टेचुटरी मिनीमम प्राइस देंगे। किसानों को जहां ८९ रुपए प्रति क्िंवटल के मिलते थे, अब ६४ रुपए ही मिलने वाले हैं। इस पर किसानों में बड़ा भारी आक्रोश पैदा हो गयाहै। किसान अपना गन्ना नहीं दे रहे हैं। सीतामढ़ी में रीगा चीनी मिल के आसपास के क्षेत्र के किसानों ने अपने गन्ने को गन्ना क्रय सेंटर पर ले जाकर उसे जलाने का काम किया है। अभी कई चीनी मिलें शुरू नहीं हुई हैं। इस पर भारत सरकार को तुरंत मिल-मालिकों को बुलाकर हस्तक्षेप करना चाहिए। लेकिन मैं नहीं जानता कि केन्द्र सरकार क्यों चुप्पी साधे बैठी हुई है। यहां शरद यादव जी नहीं हैं, गन्ना किसान बहुत ज्यादा आंदोलित हैं। उत्तर प्रदेश के किसानों को भी हम चाहते हैं कि ८९ रुपये प्रति क्िंवटल मिलने चाहिए। हरियाणा में तो सुना है कि ११० रुपए प्रति क्िंवटल का भाव तय हुआ है ।अब ११० रुपए तय हो गया लेकिन उत्तर प्रदेश में ६४-६५ रुपए मिलेगा - अब कितना भारी अन्याय किसान के साथ हो रहा है। यहां सब लोग जय किसान कर रहे हैं लेकिन वास्तव में क्षय किसान हो रहा है। किसान मर रहा है। किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। इससे ज्यादा तकलीफ औऱ क्या हो सकती है? इसलिए सरकार स्पष्ट रूप से बताए कि सरकार क्या कार्रवाई करने जा रही है?

श्री महेश्वर सिंह (मंडी):आप इतना अच्छा बोलते हैं लेकिन एकदम टेम्परेचर आपका बढ़ गया। बिहार में क्या भाव है?…( व्यवधान)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :बिहार क्या हिन्दुस्तान से बाहर है? बिहार में भी तो एनडीए की सरकार है। आप गवर्नमेंट ऑफ इंडिया हैं या गवर्नमेंट ऑफ एनडीए हैं?यह सरकार गवर्नमेंट ऑफ इंडिया की तरह काम नहीं कर रही है, बल्कि यह सरकार गवर्नमेंट ऑफ एनडीए की तरह काम कर रही है।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : रघुवंश बाबू, आप चेयर को एड्रैस करके कहें।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : इसीलिए इस सरकार को तुरंत निर्णय करने की जरूरत है। मिल मालिकों को इसी समय में कितना लाभ हो रहा है, यह बात भी सरकार बताए। यह भेद मैं खोल देता हूं कि चालीस फीसदी लेवी से घटाकर १५ प्रतिशत हुई और उसे भी समाप्त करने की बात हो रही है। मिल मालिकों को कितने करोड़ों का लाभ हो रहा है ? कितने करोड़ों रुपये की हेराफेरी हुई है?

यह बफर स्टॉक क्या है?बफर स्टॉक नाम्र्स अनाज में होता है। अब चीनी का भी आयात होने लग गया है। चीनी का मूल्य नीचे जा रहा है तो यह हुआ कि बफर स्टॉक ५ लाख टन पहले किया गया था, अब उसे खत्म किया गया है। बीस लाख टन बफर स्टॉक चीनी लॉबी के दवाब में किया गया। इससे कितने करोड़ रुपये सरकार पर खर्च बढ़ेगा?सरकार यह बताए। एक तरफ एपीएल के पीडीएस में कटौती की गई कि नहीं देंगे और दूसरी तरफ मिल मालिकों को, चीनी लॉबी को लगातार फायदा हो रहा है। किसान के सवाल पर निराशाजनक परिचय यह सरकार दे रही है। इसीलिए हम बराबर कहते हैं कि यह किसान विरोधी सरकार है। किसान के साथ अन्याय हो रहा है। राम जीवन बाबू ने भी यह सवाल उठाया था कि किसान का संबंध १४-१६ विभागों से है। स्टैंडिंग कमेटी मैम्बर ऑफ पार्लियामेंट की होनी चाहिए। हालांकि कृषि की तो स्टैंडिंग कमेटी है लेकिन उनका दायरा सीमित है। किसान का संबंध खाद, बिजली, सिंचाई, फूड और व्यापार विभाग से है। १६ विभागों से किसानों का संबंध है लेकिन किसान विरोधी सरकार ने सहमति दी थी कि हमें कोई एतराज नहीं है कि किसानों के लिए स्टैंडिंग कमेटी बनाई जाए लेकिन किसान विरोधी शक्तियां लगी हुई है और वे इसमें रुकावट पैदा कर रही है। लेकिन मैं खोज रहा हूं कि कौन सी शक्तियां हैं जो किसान से संबंधित स््टैंडिंग कमेटी बनाने में अड़चन और रोक पैदा कर रही हैं। गन्ना उत्पादक किसानों का मामला है। उसके बाद पैडी का प्रोक्योरमेंट है। हम लोगों का प्रतनधि मंडल फूड मनिस्टर से मिला था। उन्होंने कहा था कि बिहार में सौ सेन्टर्स खुलेंगे। पिछले साल ४० थे। इस साल ६० सेन्टर्स बढ़ाए जाएंगे। सौ सेन्टर्स पैडी के खोले जाएंगे। उड़ीसा में २० सेन्टर्स बढ़ाए जाएंगे। जायसवाल साहब ठीक कह रहे थे कि एक भी सेंटर नहीं खुला। कहीं-कहीं कपड़ा टांग देते हैं कि यह क्रय केन्द्र है। उसमें कैश क्रैडिट जाता है, उसका आदेश नहीं गया। तौल के लिए तराजू नहीं है। कहीं बोरे नहीं हैं। सौ सेन्टर्स जो खुलने थे, उसमें से कितने खुले और कितना धान खरीदा गया?

इस तरह से किसानों के साथ धोखाधड़ी और अन्याय हो रहा है। खेती के काम में आने वाली सभी चीजों के दामों में वृद्धि हो गई है, लेकिन कोई उपाय सरकार द्वारा नहीं किया जा रहा है। किसान को न्यूनतम मूल्य भी नहीं मिल रहा है। इसके संबंध में श्री अजीतसैन गुप्त की रिपोर्ट को सरकार ने दबाया हुआ है। तीन राज्यों में प्रोक्योरमेंट अच्छा होता है, लेकिन बाकी राज्यों में नहीं होता है और इन राज्यों में बिचौलिए प्रोक्योर करके ले जाते हैं। मैं सरकार से कहना चाहता हूं कि यह तात्कालिक विषय है और इसका समाधान नहीं किया गया तो कोलाहल होगा, संघर्ष होगा और संसद तक मार्च होगा। आज ही श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव जो एक पार्टी के नेता हैं और सासंद हैं, उनके साथ किसानों ने संसद तक मार्च किया, लेकिन उनको लाठी के पीट कर खदेड़ा गया। इस मार्च में केसरी यादव जी भी थे, उनको भी चोटें आईं हैं और अस्पताल में पड़े हुए हैं। कम से कम एक सौ प्रदर्शनकारियों को चोटें आई हैं। किसानों पर लाठी बरसाने का काम इस सरकार ने किया है। इसी प्रकार साबरमती आश्रम, जहां से गांधी जी पैदल मार्च शुरु किया था, वहां से मुक्ति आन्दोलन शुरु किया गया था। हिन्दुस्तान में अन्तरराष्ट्रीय नदियों से भी हर साल तबाही होती है और किसान बरबाद होते हैं। बाढ़, सूखाड़, जल-जमाव और कटाव - इन चार समस्याओं से हर किसानों की १२०० से १५०० करोड़ रुपए की बरबादी होती है। किसानों की फसले बरबाद हो जाती हैं और उनके घर बह जाते हैं। मवेशी मर जाते हैं और आदमियों की जानें भी जाती हैं। कंवरसैन गुप्ता जी की रिपोर्ट के अनुसार नेपाल सरकार से केन्द्रीय सरकार बात कर सकती है, क्योंकि यह राज्य सरकारों के बस की बात नहीं है। अन्तरराष्ट्रीय नदियों से जो बरबादी होती है, उसके लिए केन्द्रीय सरकार जिम्मेदार है, लेकिन इस दिशा में कदम उठाने के लिए भारत सरकार मौन है। पिछले ५५ वर्षों से हमारे साथ अन्याय हो रहा है। पहले १५९ करोड़ रुपए की लागत का एक प्रोजैक्ट बना था, लेकिन उसको बदल दिया गया और अब वह दूसरे राज्य में चला गया है। इसकी वजह से बिहार अभी तक बरबाद होता रहा है। किसानों के सवाल पर हम एकजुट हो गए हैं और अगर किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तो किसान विरोधी सरकार जाएगी।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : अब आप अपनी बात समाप्त करिए।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : महोदय, मैं अंत में डब्ल्यूटीओ के बारे में कहना चाहता हूं। हमने माननीय श्री देवगौड़ी जी, हम्बल फार्मर, धरती पुत्र का भाषण सुना। डब्ल्यूटीओ के खतरे से किसानों को बचाने का काम नहीं हो रहा है। इसके माध्यम से हम एक देश से दूसरे देश में सामान ले जाने पर सोच रहे हैं, लेकिन अपने ही देश में अनाज एक राज्य से दूसरे राज्य में सामान ले जाने में कठिनाई हो रही है। हमारे देश में बैलों की खरीद के लिए मेले लगाए जाते हैं, जिनकी कीमत पांच हजार से लेकर २० हजार तक होती है। राजस्थान के नागौड़ जिले से किसान बैल बनाने के लिए बछड़ा ले जाते हैं। बछडों को ले जाने पर रोक है, वभिन्न संस्थायें इस दिशा में काम कर रही है। श्रीमती मेनका गांधी जी की भी संस्था भी इसी काम में लगी हुई है। मैं सरकार से कहना चाहता हूं कि सरकार किसान विरोधी नीति को खत्म करे और किसान की प्रगति की नीति अपनाये, नहीं तो किसान विरोधी सरकार जाएगी और किसानों के अनुकूल सरकार आएगी।

इन शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

श्री किशन सिंह सांगवान (सोनीपत):सभापति महोदय, काफी समय से किसानों की समस्याओं पर नियम १९३ के अंतर्गत बहस चल रही है। हर वर्ष और हर सत्र में किसी न किसी रूप में किसानों की समस्याओं पर चर्चा होती रहती है। आजादी के बाद से लेकर आज तक पता नहीं कितनी बहस किसानों की समस्याओं पर हुई है, लेकिन जो स्थिति किसानों की आज है, लगभग सभी वक्ताओं ने अपने-अपने ढंग एवं तरीके से किसनों की बात को सदन में रखा है।

महोदय, सब को मालूम है और आप स्वयं भी जानते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। हमारी अर्थव्यवस्था खेती पर निर्भर करती है। खेती हमारा व्यवसाय ही नहीं, अपितु यह हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक दिशा को भी निर्देशित करता है। आजादी के बाद किसानों की और खेती की उपेक्षा होती रही है। आजादी के बाद उद्योग नीति सन् १९५१ में बना दी गई, लेकिन कृषि नीति नहीं बनी। केवल दो साल पहले माननीय अटल जी की सरकार ने कृषि नीति बनाई। १९५०-५१ साल के बाद अगर उद्योग नीति की तरह कृषि नीति शुरू में ही आजादी के बाद बन जाती तो आज हम सब लोग, जो किसानों की समस्याओं पर चर्चा कर रहे हैं, उसकी इतनी नौबत नहीं आती और किसानों की इतनी दुर्दशा न होती। यह भी सभी को मालूम है कि हमारे देश की ज्योग्राफीकल स्थिति ऐसी है कि कहीं बाढ़ आती है, कहीं सूखा पड़ता है, कहीं पहाड़ हैं, कहीं समुद्र हैं और कहीं पथरीली या समतल जमीन है। हर जगह किसान हैं। हम यहां जितने प्रतनधि बैठे हैं, शायद ही कोई हम में से ऐसा प्रतनधि हो, जो किसानों की सहायता के बगैर यहां आया हो, क्योंकि ८० प्रतिशत वोटर आबादी इस देश की किसान हैं। किसानों का इतना बड़ा प्रतनधित्व है, उनकी समस्याएं लगातार चर्चा में रहती हैं, लेकिन उनका कोई समाधान नहीं होता, यह बड़े दुख की बात है।

महोदय, माननीय अटल जी ने चंद दिन पहले एक बयान दिया था। जैसे पानी की समस्या है, जगह-जगह प्रदेशों के झगड़े हैं। कावेरी का मुद्दा सुलझ भी गया था, लेकिन फिर उलझ गया। हमारा हरियाणा एवं पंजाब का झगड़ा ३५-३६ साल से चल रहा है। कोर्टों ने भी फैसला कर लिया, लेकिन वह इम्प्लीमेंट नहीं हो रहा। पाकिस्तान में पानी जाना मंजूर है लेकिन हरियाणा को देना मंजूर नहीं है। इस तरह से कई समस्याएं उलझी हुई हैं, इन समस्याओं को लेकर प्रधानमंत्री जी का जो बयान आया, वह बड़ा स्वागत योग्य है कि सभी नदियों का पानी, नदियों का राष्ट्रीयकरण किया जाए, समान बंटवारा किया जाए, सभी नदियों को मिलाया जाए ताकि समान द्ृष्टि से पानी का बंटवारा हो सके, क्योंकि पानी पूरे राष्ट्र की धरोहर एवं संपत्ति है। अगर इस तरीके से शुरू से ही पानी, बिजली, किसानों से संबंधित जो भी समस्याएं हैं, उन पर ध्यान दिया जाता तो आज किसानों की स्थिति दूसरी होती।

महोदय, हर व्यक्ति किसानों की समस्य़ाओं को जानता है। किसान की आज सबसे बड़ी समस्या यह हो गई है कि यह बहुत छोटा किसान रह गया है। आज देश में २२ प्रतिशत किसान ऐसे हैं, जिनके पास केवल एक एकड़ जमीन है। ५९.४ प््रसैंट किसान ऐसे हैं जिन के पास २.५ एकड़ जमीन है। १८.६ परसैंट किसान ऐसे हैं जिन के पास केवल ५ एकड़ जमीन है। इतनी छोटी-छोटी लैंड होल्िंडग रह गई है। ऐसे में किसान का गुजारा कैसे होगा जबकि महंगाई इतनी अधिक हो गई है। इस बारे में रघुवंश प्रसाद जी और दूसरे कई माननीय सदस्यों ने बताया। हर आदमी मानता है कि किसान की और खेती की आजादी के बाद से अब तक उपेक्षा हुई है। किसान कर्ज में इतना डूब गया है कि किसान ट्रैक्टर और खाद के लिए लोन लेता है तो उस पर इंटरस्ट इतना ज्यादा लिया जाता है कि वह देने लायक नहीं रहता। वह कर्ज भी थोड़े टर्म के लिए दिया जाता है और वह उसे ६ महीने में अदा करना पड़ता है जबकि ६ महीने में एक फसल आती है। अगर कुदरत की मार पड़ जाए और फसल खराब हो जाए तो उसे भरने के लिए उसके पास पैसा नहीं होता है। अगली फसल फिर आ जाती है और पिछली फसल पर ब्याज पर ब्याज लगता है। वह इतना हो जाता है कि लाचार हो जाता है। आज एक ट्रैक्टर चार लाख रुपए में आता है लेकिन उसकी सालाना ब्याज की किश्त पचास हजार रुपए होती है। जो ६-७ एकड़ की जमीन वाला किसान होगा, वह उस पर पचास हजार रुपए ब्याज देगा तो अपने बच्चों को कैसे पालेगा और दूसरे खर्चे कैसे निकालेगा? इस प्रकार किसान से ब्याज ज्यादा लिया जा रहा है। कृषि मंत्री बैठे हैं। उनसे निवेदन है कि किसान की लौंग टर्म ऋण की किश्तें बनाई जाएं, उसका इंटरस्ट कम किया जाए ताकि वह इस मार से बच सके।

राम जीवन सिंह जी ने ठीक फरमाया कि आज देश में पंजाब और हरियाणा के किसानों को सबसे साधन सम्पन्न माना जाता है। हरियाणा के बारे में हम जानते हैं। ठीक बात है कि किसान मेहनती है और प्रोडक्शन बहुत करता है लेकिन हमारे आधे प्रदेश में सूखा और आधे में बाढ़ आती है। किसान इतना कर्ज में डूब चुका है कि वह लाचार हो चुका है। हरियाणा और पंजाब के किसानों के मैं आंकड़े दे रहा हूं। पंजाब और हरियाणा के किसानों पर प्रति एकड़ ७६०० रुपए का कर्ज है। कमर्शियल बैंकों के ये आंकड़े हैं। जब किसान पेमेंट नहीं करता है और रिकवरी की बात आती है तो चाहे पाच सौ या एक हजार रुपए का कर्जा हो किसान को जेल मं डाल दिया जाता है। उसका रहने, खाने-पीने का खर्चा उसमें डाल दिया जाता है। कोई बड़ा सेठ पकड़ा नहीं जाता है और उसके ऊपर कोई फाइन भी नहीं होता है। मैं इंडस्टि्रयल फाइनैंशियल कारपोरेशन ऑफ इंडिया सैक्टर २७, चंडीगढ़ का उदाहरण देना चाहता हूं। अविनाश अरोड़ा और उनके भाई ने ५० करोड़ रुपए लोन लिया और भाग गए। उन्हें न पुलिस पकड़ पाई और न दूसरा कोई पकड़ पाया। उसके रिश्तेदारों में वह पैसा बंट कर व्यापार हो रहा है। ५० करोड़ रुपए वाले को कोई पकड़ता नहीं है लेकिन पांच सौ और हजार रुपए वाले किसान को जेल में बंद कर दिया जाता है। यह व्यवस्था किसान और देश के हित में नहीं है। सरकार को यह देखना पड़ेगा।

यहां सबसिडी की बात आई। हमारे देश में किसानों को सबसिडी विकसित देशों के मुकाबले बहुत कम मिलती है। जब सबसिडी की बात आती है तो बहुत लोग चिल्लाते हैं और कहते हैं कि किसानों की सबसिडी खत्म करो। किसान विरोधी लॉबी इसका विरोध करती है। रघुवंश बाबू ने सबसिडी के बारे में ठीक कहा। जो खाद की शक्ल में किसानों को सबसिडी दी जाती है, वह किसानों को नहीं दी जाती है। वह सीधे उद्योगपतियों को दी जा रही है। केवल नाम किसानों का है लेकिन वह उद्योगपतियों को जा रही है। एफआईसीसी नाम की जो एजेंसी है, इस महकमे की जो कमेटी है, जो रिटैंशन प्राइस तय करती है …( व्यवधान)

महोदय, प्राइवेट सैक्टर में वे १२० प्रतिशत प्रोडक्शन दिखाकर सरकार से सबसिडी ले लेते हैं और कोआपरेटिव सैक्टर के कारखाने, जैसे इफ्को, कृभको और एन.एफ.सी.एल. आदि में चूंकि प्रोडक्शन कम होता है, इसलिए वे सबसिडी कम ले पाते हैं और प्राइवेट सैक्टर के खाद कारखाने कोआपरेटिव सैक्टर के खाद कारखानों से ज्यादा सबसिडी ले जाते हैं। मैं यही कहना चाहता हूं कि सबसिडी किसान को नहीं मिलती। अभी हमारे माननीय रामजीवन सिंह जी ने ठीक ही कहा कि आप बेशक सबसिडी कम कर दीजिए, लेकिन जितनी सबसिडी सरकार दे, वह किसान तक पहुंचनी चाहिए। मैं कहना चाहता हूं कि जितनी सबसिडी सरकार किसान को देती है वह उस तक नहीं पहुंचती है और बिचौलिए ही आधी सबसिडी खा जाते हैं। इसलिए मेरा सुझाव है कि जो भी और जितनी भी सबसिडी सरकार किसान को दे, वह उस तक पहुंचे, यह सुनिश्चित करना चाहिए।

महोदय, अब मैं मिनीमम सपोर्ट प्राइस के बारे में निवेदन करना चाहता हूं। आज भी प्रश्न-काल में इस बारे में सवाल था और अब भी आप बार-बार बैठने के लिए कह रहे हैं तथा मंत्री जी भी कह रहे हैं कि बाद में डिसकस कर लेंगे, लेकिन मैं संक्षेप में निवेदन करना चाहता हूं कि आज नहीं, ५० सालों से किसानों की मांग रही है कि सपोर्ट प्राइस कास्त होने से पहले डिक्लेयर होनी चाहिए, लेकिन वह आज तक नहीं हो पाई और न इस पर आज तक इम्पलीमेंटेशन हो पाया है। अगर पहले यह पता लग जाए कि फलां फसल की न्यूनतम कीमत सरकार ने घोषित कर दी है, तो किसान अपना अपना नफा-नुकसान देखेगा कि उसे उसके बोने में दो पैसे बचते हैं, तो वह बोएगा, नहीं तो नहीं बोएगा। किसान इस हेतु अपने आपको मैंटली प्रिपेयर कर लेते हैं। इसलिए यह सबसे जरूरी है कि फसल बोने से पहले उसकी मिनीमम सपोर्ट प्राइस घोषित कर दी जाए क्योंकि न तो राष्ट्रीय और न अंतरऱ्ाष्ट्रीय मार्केट किसान के हाथ में है। इसलिए यदि फसल बोने से पहले सरकार एम.एस.पी. घोषित कर दे, तो किसान को बहुत सुविधा होगी। कृषि मंत्री जी यहां उपस्थित हैं। मैं उनसे निवेदन करना चाहता हूं कि वह ऐसा कर सकते हैं। अगर ऐसा हो जाए, तो आप किसान का सबसे ज्यादा और सबसे बड़ा भला करने का काम करेंगे।

महोदय, बस अन्त में, मैं केलकर समति के बारे में निवेदन करना चाहता हूं कि अखबारों में, मीडिया में बराबर आता रहता है कि केलकर समति ने किसानों पर टैक्स लगाने की बात कही है। महोदय, यदि ऐसा होता है, तो यह बड़े दुर्भाग्य की बात होगी। आज भी किसानों की दुर्दशा पर यह सदन विचार कर रहा है और आज भी किसान भूख से मर रहा है। हमारे देश में अनाज के भंडार भरे हैं, फिर भी किसान मर रहा है, लेकिन केलकर समति यह रिपोर्ट दे रही है कि किसानों पर टैक्स लगाया जाए। यदि किसानों पर टैक्स लगाया जाएगा, तो इस देश के लिए, इस सरकार के लिए और किसानों के लिए यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात होगी।

महोदय, अन्त में, मैं वाटर लैवल के बारे में कहकर अपनी बात समाप्त करता हूं। देश में आज वाटर लैवल नीचे जाने की विकट समस्या खड़ी हो गई है। पानी का स्तर इतना नीचे चला गया है कि सारे देश के किसानों के टयूब वैल फेल हो चुके हैं, लेकिन इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है और किसानों का पैसा बर्बाद हो रहा है। आने वाले तीन-चार साल में यदि यही स्थिति रही, तो सारे देश का पानी इतना नीचे चला जाएगा कि सब जगह डैजर्ट ही डैजर्ट होगा। इतना कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।

SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): Thank you hon. Chairman, Sir. At the very outset, I must thank the hon. Member, Shri Basu Deb Acharia who has raised this matter for discussion. The problems of farmers of our country, who constitute around 80 per cent of the population, have assumed serious multi-dimensional proportions in the recent years.

Sir, the departed former Prime Minister Shri Lal Bahadur Shastri raised the slogan ‘jai jawan, jai kisan’, but the kisan could not achieve jai and kisan could not advance. The departed Prime Minister, Shrimati Indira Gandhi gave a clarion call ‘garibi hatao desh bachao’, but still, garibi persists and our desh is suffering. Our Government has taken up the programme to eliminate the poverty of our country. Now, they are searching the poorest of the poor while they left the poor.

Sir, I am not saying that ‘farmers’ means ‘farm owners’. I am talking mainly about the farmers and in particular, the small farmers, the marginal farmers and even the agricultural labourers.

They are considered to be poor in our country. They are producing agricultural commodities, they are achieving success and as a result, there is surplus production; they are feeding the nation as a whole, but they are being considered poor. I think, this term should go. Do not refer to them as ‘poor’, but refer to them as small farmers, marginal farmers, agricultural labourers and so on and so forth. Tagore considered them as the "lamp-stand of civilisation". They give light to the civilisation and to the nation, but they remain in dark. Therefore, do not call them poor. They are having rich traditional experiences, but they are distressed. This term is most insulting to them. This type of discrimination -- below the poverty line (BPL) and above poverty line (APL) -- should go. This sort of discrimination is very much confusing; it is not only insulting, but also is being misused. A person who is earning Rs. 1,500 per month is considered to be below the poverty line. He is earning only Rs. 1,500 and it is hardly sufficient to meet his basic necessities. This sort of criterion should go. Please refer to them as small farmers, marginal farmers and so on and so forth.

Last Friday and even today, most of the hon. Members raised the problems concerning the farmers and the farmers’ plight. In the course of the last Budget Session, our former Finance Minister boastfully proclaimed that his Budget would bring "kisan ki azadi" which means ‘freedom to the farmers’. In recent times, our country is witnessing incidents of suicides. Therefore, it is nothing but a freedom to commit suicides. The number of suicides is mounting like an epidemic. This is the reflection of the crisis.

Many points have been raised. There are instances of starvation deaths, debt burden, and also the question of minimum support price. The parameter for fixing the minimum support price is itself defective. Therefore, it should be amended. Our peasants are not getting the minimum support price.

As most of the hon. Members have already pointed out, the FCI in West Bengal is non-existent because they are not procuring anything. I would request that there should be a proper discussion in regard to procurement policy of our country. There is the question of availability of agricultural inputs at cheaper rates.

Sir, issues like subsidy, irrigation, marketing, storage facilities, rural electrification, transport facilities, disaster owing to natural calamities, crop insurance and issuance of credit cards to farmers have been raised by several hon. Members here. The present Crop Insurance Act should be amended. A mention has also been made about the necessity of having advanced bio-technology, genetic engineering, tissue culture and so on and so forth. The issue of taxation of farmers has also been raised. I do support all these points that have been raised by the hon. Members here. I would like to pose a few questions, the answers to which would probably help in addressing the issues that have been raised.

Firstly, would our country be guided absolutely by the dictates of the WTO, the IMF and the World Bank, or would we make an effort to proceed mostly on our strength? Our rulers now are searching for markets in Europe, USA and in such other countries. What about our own market? Our own market is not a small one. Is the Government thinking about our own market? They are thinking about competitive markets but not thinking about our distressed people. What should be the priority of the Government? Our Government should take the initiative to mobilise the opinion of the developing countries to fight out the pressure of the developed countries.

Our Government is rendering service to the G-8 nations. They have lifted the Quantitative Restrictions at a time when there is a domestic surplus. This is unfortunate. The Government is curbing subsidy when the developed countries are providing huge subsidies to agriculture. Today, our traditional knowledge and rich experience are being pirated through the system of Intellectual Property Rights. We have heard of so many Boxes in international fora like the Blue Boxes, Green Box etc. But what about having a `Livelihood Box’! There should be a Box for food security. Our Government should at least try to fight for this within the ambit of the WTO.

I would like to know whether our Government would proceed based on the democratic and federal essence of our Constitution or not. Agriculture is a State subject. But Government often brings in legislation without having a proper consultation with the State Governments and then they do not take responsibility in matters of irrigation and loss due to natural calamities thereby putting more financial burden on the States, as has been the case in crop insurance. The allocation of the Government in the Budget in areas of rural development, rural employment, irrigation and flood control is only 2.6 per cent. That is the attitude of the Government towards this sector. Agriculture supports 70 per cent of our population and it accounts for one-third of our exports. But credit flow to the farming sector from the nationalised banks is not even 18 per cent.

What has been the attitude of the Government towards the Land Reforms Policy?

In most of the States this is neglected. There should be a National Commission to assess the situation. The Union Government should take measures to set that up. So far, there has been no comprehensive legislation to take care of the interests of agricultural labourers.

Lastly, I raise the point of the National Agriculture Policy. They have brought out one National Agriculture Policy but that is not in the interest of the toiling peasants of our country. That is mostly in the interest of the corporate sector and the multinational companies.

Sir, through you, I would request the Minister that, before the commencement of the next Budget Session of Parliament, he should invite the representatives of peasants’ organisations in our country, and try and arrive at a consensus in order to unanimously solve the burning problems the peasants are facing at the present juncture.

                   

*SHRI G. PUTTASWAMY GOWDA (HASSAN): Mr Chairman Sir, I thank you for giving me an opportunity to speak on this vital issue. In fact, we have raised the problems of farmers in this august House on several occasions. Unfortunately, the Government of India has done nothing to find out solution for the burning problems of the farmers. The hon. Minister is the son of former Prime Minister and great leader of farmers Chaudhury Charan Singh. He is fully aware of the problems of farmers in our country. But it is not clear whether the hon. Minister is getting the required support from the Government to solve the problems of farmers.

The Government is shedding crocodile tears and it does nothing for the betterment of the farmers. The total investment of the Government of India for farmers is only 2.6%. This fact itself makes it clear that the Centre is not at all interested in the welfare of our farmers. If this trend continues there will be no future for the farmers and the country cannot dream of any progress in any field.

MR CHAIRMAN : Shri G. Putta Swamy Gowda, one minute please.

Hon. Members, there are still 10 more speakers. If the House agrees, we can extend the time of the House till the discussion on this subject is over.

SHRI J.S. BRAR (FARIDKOT) : Yes, Sir We want to get it extended.

कुंवर अखिलेश सिंह (महाराजगंज, उ.प्र.) : यह एक पूर्ण विषय है, जब तक सदस्य बोलना चाहें, तब तक के लिए सदन का समय बढ़ा दें।

SEVERAL HON. MEMBERS : Yes, Sir, the time can be extended.

MR CHAIRMAN: So, the time of the House is extended till the discussion on the subject is over.

__________________________________________________________________*Translation of the speech originally delivered in Kannada.

   

* SHRI G. PUTTASWAMY GOWDA: The most shocking news is the increase in the number of suicides by farmers. Several farmers, particularly cotton growers, tobacco growers and others have committed suicide. The sugarcane growers are not able to find buyers for their produce and if the Government purchases it, it never makes the payment on time, as it is happening in Uttar Pradesh at present.

Even after 55 years of independence the living conditions of our farmers have not improved. The farmers are self-reliant in developed countries. Unfortunately, in our country they are struggling for survival. There are many instances where the farmers have burnt their produce like sugarcane, cotton etc. because there were no buyers.

The farmers are not able to improve their living conditions because the Government of India is least bothered about them. Even drinking water is not available to most of the villages in remote areas of our country. Water is not available for irrigation and the cost production of fertilizers and pesticides has gone up. There is drastic reduction in the subsidies. The total irrigation land in the country is only 27%. Therefore, the Centre should come out with a clear-cut new agriculture policy to save the farmers.

18.02 hrs. (Dr. Raghuvansh Prasad Singh in the Chair) Another most important aspect is the marketing facility that is available to our farmers. I can go to the extent of saying that there is absolutely no marketing facility for the farmers in our country. A coconut is sold for Rs 2 in our villages and the same coconut fetches Rs 12 to the seller in Delhi. This is how the middleman is making money and the farmer (producer) hardly gets his cost price. The trend should change and the Centre should come forward to provide modern storage facilities and marketing facilities to the farmers such that they can get remunerative prices for their produce. Mr Chairman Sir, you have rightly stated while participating in this debate that the condition of the farmer in our country is * Translation of the speech originally delivered in Kannada.

deteriorating day by day. The facilities provided in some foreign countries like Japan, America, China, etc., have enabled their farmers to capture the international market. The Government of India should also provide more subsidies such that our farmers could become self-reliant. Agricultural sector has been neglected by the Centre. The other sectors like industry, education, etc., have got some encouragement by the Central Government. The step motherly attitude of the Centre to agricultural sector should come to an end immediately. This is the only solution for the amelioration of our farmers.

Kaveri water dispute has not been solved till today. There is no sincere effort by the Centre in this regard and the sufferers are the Karnataka farmers. Kaveri water dispute has become political game. The farmers of Karnataka are not allowed to utilise their share of water from Krishna river also. It is very essential to stop politicalising such vital issues. There is an urgent need to check playing politics in the name of farmers. The percentage of rainfall is coming down every year and the ground water level is going down. There is shortage of electricity in most of the States particularly in Karnataka. Under these circumstances the Government of India should come out with new plans and programmes to encourage our farmers to develop the land and make it suitable for dry farming.

The hon. Minister’s father late Shri Chaudhury Charan Singh, former Prime Minister of India, wanted to do a lot for uplifting the farmers of this country. I hope that his son, the hon. Minister will make all efforts to converse his father’s dreams into realities.

Sir, once again I thank you for giving me this opportunity and with these words, I conclude my speech.

                       

डॉ.रामकृष्ण कुसमरिया (दमोह) : सभापति महोदय, किसान को अन्नदाता, भूमि पुत्र, धरती पुत्र, किसान भगवान - ये सब तमाम विशेषताएं हमने दी हैं और उसने भी स्वीकार किया - पुत्रो अहम् प्रतिज्ञाम्् - यानी मैं धरती माता का पुत्र हूं लेकिन उसके बाद बड़ा अजीब लगता है कि जब हम सुनते हैं कि फलां जगह, फलां प्रदेश में किसान ने आत्महत्या कर ली। किसान को क्या चाहिए?किसान की बहुत सीमित मांगें हैं। उसको फसल का लाभकारी मूल्य प्राप्त हो जाए, सिंचाई की सुविधा मिल जाए, समय पर बिजली उपलब्ध होती रहे और प्राकृतिक प्रकोपों के द्वारा जब फसल नष्ट हो तो मुआवजा प्राप्त हो। इतनी व्यवस्था यदि कर दी जाए तो हमारा किसान कभी दुख में नहीं रहेगा।

चर्चाएं बहुत होती हैं। आज के विकास पर चर्चा होती है कि कब हुआ, कैसे हुआ?लेकिन जिस मूल्य के ऊपर हमें काम करना चाहिए, उसके ऊपर हम क्या कर रहे हैं, सरकार को ऐसी योजना बनाने की आवश्यकता है। फसल खड़ी है और पानी मांग रही हैं लेकिन बिजली नहीं है और खेत में पानी नहीं जा रहा है।

आदरणीय प्रधान मंत्री जी ने किसानों की प्रगति के लिए जो व्यवस्थायें की हैं, उनकी मैं प्रशंसा करता हूं। केन्द्रीय सरकार द्वारा फसल बीमा योजना लागू की गई है, लेकिन इस योजना को कई राज्यों ने लागू नहीं किया है। मध्य प्रदेश में इस योजना को लागू नहीं किया गया है। इस योजना में भी एक समस्या यह है कि रकबे को आधार माना जाता है, जिले को आधार माना जाता है और तहसील में देखा जाता है कि वास्तव में नुकसान हुआ है या नहीं हुआ है, इस आधार पर आंकड़े तैयार किए जाते हैं, जबकि किसान बीमा का पैसा जमा कराता है। इस ओर मंत्री जी को ध्यान देना चाहिए।

महोदय, इसी प्रकार हमारी सरकार ने क्रैडिट कार्ड की सुविधा किसानों को दी है और इससे किसानों को लाभ हुआ है। मेरा सुझाव है कि क्रैडिट कार्ड के संबंध में कैम्प लगाए जायें और उनमें जनप्रतनधियों को बुलाया जाए। मेरे विचार से यह सुविधा अधिकारियों के सहारे नहीं छोड़नी चाहिए। बिजली राज्यों का विषय है, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि किसानों को सुविधा देने के लिए केन्द्रीय सरकार को नियंत्रित करना चाहिए। यदि हम किसानों को मूलभूत आवश्यकतायें उपलब्ध करा देंगे, तो किसान खुशहाल हो जाएगा।

मैं एक बात पशुधन के बारे में कहना चाहता हूं। पशुधन हमारी कृषि का आधार है। भगवान कृष्ण की लीलाओं में हम गऊ पालन और गऊ सेवा के बारे में देखते हैं। इस वजह से ही कृष्ण का नाम गोपाल पड़ा। लेकिन आज हमने समाचार पत्रों में पढ़ा है कि अमरीका ने गोमूत्र पेटेंट करा लिया है।

कुंवर अखिलेश सिंह: यह सरकार बैठी रहेगी, तो अमरीका सब पेटेंट करा लेगा।

डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया: यह उनकी गलती है, जिन्होंने डब्ल्यूटीओ में जाकर सब कुछ गिरवी रख दिया, लेकिन आज हम उससे निकलने की कोशिश कर रहे हैं। …( व्यवधान)जो गलतियां हुई है, पुराने पाप हैं, उनका फल तो भोगना ही पड़ेगा।

कुंवर अखिलेश सिंह: कब तक भोगेंगे? …( व्यवधान)

डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया:हमारे माननीय मंत्री, श्री मुरासोली मारन जी ने दोहा में जाकर समस्या से बाहर निकलने का काम किया है।

श्री मणि शंकर अय्यर (मइलादुतुरई): उसके बाद ही गोमूत्र को हो गया है। …( व्यवधान)

डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया:महोदय, मैं कहना चाहता हूं, हमारे देश में सन् १९५२ में एक हजार आदमियों के पीछे ४५२ पशु थे और १९९२ में एक हजार आदमियों के पीछे २३२ पशुधन थे। इससे पता चलता है कि लगातार पशुधन की संख्या घट रही है। आज हम जैविक खाद की बात करते हैं। फर्टिलाइजर के उपयोग से जमीन ऊसर हो रही है। कैचुआ जमीन में नीचे चला गया है या मर गया है और उसे बाहर से आयात करने की बात कह रहे हैं …( व्यवधान)मैं निवेदन करना चाहता हूं कि हमें २५-३० सालों से लगातार फर्टिलाइजर के उपयोग से जमीन बरबाद हो रही है…( व्यवधान)इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि हमें अपनी पुरानी पद्धति पर लौटना होगा और गौ पालन को प्रोत्साहन देना होगा। गोबर की खाद का उपयोग करेंगे, तो स्थिति को ठीक कर पायेंगे। गुजराल जी के समय में ४० हजार टन अनाज का आयात किया गया था। खाद और अनाज दोनों आयात किए थे, लेकिन आज हम उसे निर्यात कर रहे हैं।…( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह:५० रुपए डीएपी पर अलग से सब्सिडी दी थी, आप रिकार्ड उठा कर देख लीजिए।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : कुसमारिया जी, आप इधर देख कर बोलिए, उधर देख कर मत बोलिए।

   

…( व्यवधान)

 

डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया: महोदय, आज हम निर्यात कर रहे हैं - ११००० करोड़ रुपए का हमने निर्यात किया है। १७,००० करोड़ रुपए का चावल निर्यात किया है और ३० देशों को अनाज निर्यात कर रहे हैं।…( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह:फिर भी किसान मर रहा है, आत्महत्या कर रहा है।…( व्यवधान)

डॉ. रामकृष्ण कुसमरिया: महोदय, ये आज की हमारी उपलब्धियां हैं। सिंचाई की जो योजना है, हमारा पानी का लेवल नीचे जा रहा है। अभी हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने जो योजना लागू की है - ग्रामीण सड़क योजना, मैं चाहता हूं कि इसी तरह सिंचाई योजना भी लागू करें।

महोदय, मैं उनसे निवेदन करता हूं कि जहां सिचाई के साधन नहीं हैं, वहां बढ़ाएं ताकि हर खेत को पानी मिले और हर हाथ को काम मिले। आज गांव उजड़ रहे हैं, लोगों का पलायन हो रहा है, इसलिए इसे रोकने की आवश्यकता है। मैंने जिन चीजों के बारे में निवेदन किया है - मुख्य रूप से बिजली, पानी और किसान को लाभकारी मूल्य मिले ताकि उसकी हालत सुधारी जा सकती है, इस तरफ आप ध्यान दें। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

SARDAR SIMRANJIT SINGH MANN (SANGRUR): Mr. Chairman Sir, thank you very much.

कुंवर अखिलेश सिंह:किसान हिन्दी समझता है, अंग्रेजी नहीं समझता।…( व्यवधान)

SHRI SIMRANJIT SINGH MANN : I do not speak Hindi. I speak Punjabi and English. Now I will speak in English.

श्री थावरचन्द गेहलोत (शाजापुर):आप पंजाबी में बोलिए।

सरदार सिमरनजीत सिंह मान : पंजाबी में बोलने के लिए पहले बताना पड़ता है, हमने लिख कर नहीं दिया है। मैं तो पंजाबी में बोल दूंगा।

सभापति महोदय : आप अंग्रेजी में बोलिए।

*SARDAR SIMRANJIT SINGH MANN : Sir, I am grateful to you that today you have allowed me to speak on the problems faced by the farmers. 80% of the MPs have been elected by farmers but we champion the cause of businessmen and industrialists. That is why, only the Tourism Minister is sitting here today whereas the Agriculture Minister is conspicuous by his absence. Hon. Chairman Sir, today the farmers are in a miserable condition. Punjab has been plagued by drought. The farmers are neck-deep in debt. If immediate steps are not taken to ameliorate their plight, the farmers will be ruined. Injustice is being done to the farmers. If an influential businessman fails to repay his loan, no action is initiated against him. On the other hand, if the poor farmer fails to repay his loan, he is thrown into prison. Sir, it is a well known fact that European countries and the United States of America are providing enough subsidies to their farmers, whereas we are expected to do away with subsidies to our farmers.

Sir, there is an urgent need to have an open border at Wagah between India and Pakistan. This will provide the products of our farmers easy access to the markets of Islamic countries. Our farmers will be able to sell their products in Iran, Iraq, the Gulf countries, Saudi Arabia and the Central Asian countries. In return, we will be able to get oil, electricity and natural gas from these countries. Sir, Punjab needs an atomic power grid and the Central Government should take immediate steps to fulfil this demand of Punjab. Floriculture should be given a boost by the Government.

Sir, Amritsar, Gurdaspur and Ferozepur are the three border districts of Punjab. Sir, due to Indo-Pak tension, the farmers cannot cultivate their fertile land there. Army has planted landmines in the fields. The farmers have not been given any compensation. Sir, I demand that the affected farmers be given adequate compensation for both rabi and kharif crops. Mr. Chairman Sir, the farmers should be guided properly so that they may go in for diversification of crops, vegetables and fruits and floriculture. Marketing facilities should be made available to the farmers.

Sir, we have an international airport at Amritsar. If available infrastructure is further developed there, all these agricultural products of Punjab can have easy access to the European markets. Thus, the entire region comprising of Punjab, Haryana, Himachal Pradesh and Jammu & Kashmir will benefit from it. Sir, this Government wants to do away with minimum support price. The Government also wants to impose income tax on the farmers. Unemployment is on the rise among the sons of farmers. Sir, you too hail from the family of farmers. I also belong to the family of farmers. Sir, if the Government succeeds in its aim, the condition of farmers will further deteriorate. My party is totally against the anti-farmer policy of this Government. Sir, I also demand that more agro-industries should be opened in Punjab. Sir, the Prime Minister had recently offered to link all major rivers of the country. We are totally opposed to this concept. This is against the Constitution. The river water issue is a State subject. According to article 246, we cannot take the water of a river into another State. To please the Central Government, our Chief Ministers had agreed to the sharing of river water with Haryana and Rajasthan in the past. Executive orders were issued in this regard. Sir, I want to categorically state that we will not give even a single drop of water to any other State. The canals that supply water to Haryana and Rajasthan can carry our blood instead. But we will not allow even a single drop of water to be given to any other State. Sir, the sub-soil water level is diminishing. As per Indus Water Treaty, India and Punjab are entitled to the use of water of rivers Sutlej, Beas and Ravi. We want that dams should be constructed on these rivers so that all the water does not go to Pakistan and our area should get adequate water for irrigation. Sir, the sugar mills are facing closure. Centre has levied excise tax on them. The Punjab Government has levied 24% excise tax on molasses….. (Interruptions)

Mr. Chairman Sir, you wanted me to speak in Punjabi. Had I spoken in English, I would have ended my speech by now.

Sir, there is a saying in English: Don’t kill the goose that lays the golden egg. We must see to it that sugar mills are not closed. The Government too, has a lot to gain from these sugar mills. Excise duty should be reduced, and minimum support price for sugarcane should be increased so that the farmers get remunerative price for their crops. Sir, the Sikhs are not being allowed to purchase land in Himachal Pradesh, Rajasthan and Jammu & Kashmir. This goes against the concept of secularism enshrined in our Constitution. Sir, I request the Central Government to end this discrimination against Sikhs in a secular country like ours. Sikh farmers should be allowed to purchase land in Jammu & Kashmir, Himachal Pradesh and Rajasthan.

Sir, I am thankful to you for giving me this opportunity to voice my concern regarding the plight of farmers.

                       

DR. C. KRISHNAN (POLLACHI): Mr. Chairman, Sir, thank you very much for giving me this opportunity to speak on the issues of farmers in India. I am coming from Pollachi constituency which covers Erode and Coimbatore.

I am speaking on behalf of MDMK, which is headed by Thiru Vaiko, Member of Parliament who is presently in prison, in the Vellore jail, due to misuse of Prevention of Terrorism Act, the POTA. Thiru Vaiko, Member of Parliament, conducted a big rally of farmers including coconut growers on 28th June, 2002 in my constituency, Pollachi. They have all gathered behind us and it was a very big rally in Pollachi which caused a speculative look at Thiru Vaiko, MP and the Party led by him, the Marumalarchi Dravida Munnetra Kazhagam. On seeing the crowd of farmers behind MDMK and Thiru Vaiko, the Tamil Nadu Government could not tolerate and paved a way to arrest him by the misuse of Prevention of Terrorism Act, POTA. … (Interruptions)

The main demands of the farmers are as follows: First of all they are all dead against the removal of free electricity enjoyed by the farmers for the past more than ten years. Now, the Government of Tamil Nadu is under the plan to charge Rs. 600 for one HP motor or 50 paise per unit of electricity from the farmers. The farmers certainly cannot bear this and cannot add this extra expenditure while selling their farm products. This burden of electricity to be paid by the farmers will be as good as throwing the farmers into a deep dry well with big stone, that is electricity tariff, tide around their neck. Further, if this electricity tariff is to be paid by the farmers as stipulated by the Tamil Nadu Government, most of the farmers will throw the lands without any farming as they are already a loss to them.

Farmers should be encouraged to involve in farming with more enthusiasm by helping them with easy bank loans, by providing fine variety of seeds, enough of water facility and regular advice regarding the technological improvements that take place then and there in the field of farming.

Joining of big rivers like the Ganga, the Cauvery, the Mahanadhi, the Godavari and the Krishna with other parts of the country where water scarcity persists is a very good scheme and it will help to solve the water problem once for all in the country.

While the fertilizer rate is fixed and it goes on rising then and there, while the daily coolies are raising their wages on a par with the increase in the daily expenditure of the common man (per capita expenditure), the farmer is worried because his products’ price does not go to the level of earning profit by farming. Due to the failure of monsoon, the water level in the ground has gone up to 1000 feet below and many bore-wells have dried up. As a result of this, there is scarcity of water for both drinking and farming. As a result of it, the farmers are tied up with heavy bank loans, private loans and the dead coconut trees are a burden for the poor and the medium farmers to cut them and remove them from the field. Hence both Coimbatore and Erode Districts, which are in my constituency, should be declared as drought-hit areas and all the loans from the cooperatives and banks should be waived off.

Lifting of free electricity to the farmers is going to create a grave situation and will lead to a financial crisis among them which may not be a favourable situation for farming in my constituency and the whole of Tamil Nadu.

With these words, I conclude. Sir, I thank you very much for giving me this opportunity to speak.

   

श्री चन्द्र भूषण सिंह (फर्रुखाबाद):माननीय सभापति जी, बड़ी मुश्किल से मुझे इस विषय पर बोलने का वक्त मिला, लेकिन चलिए कोई बात नहीं, वक्त तो मिला।

महोदय, सदन में श्री बसुदेव आचार्य जी द्वारा नियम १९३ के अधीन प्रस्तुत किए गए किसानों की समस्याओं से संबंधित विषय पर चर्चा चल रही है। मैं इस पर अपने विचार व्यक्त करना चाहता हूं। हमारे माननीय सदस्यों ने बहुत प्रमुख विचार रखे हैं। उन्हीं के तहत मैं किन्ही खास बिन्दुओं पर मंत्री जी से निवेदन करना चाहता हूं। सर्वप्रथम मेरा एक ही सवाल है कि विगत चार वर्षों से कंट्री के एग्रीकल्चरल प्रोडक्शन में स्टैगनेशन क्यों है। विगत चार वर्षों से देश का कृषि उत्पादन लगभग एक सा ही चला आ रहा है, इसके क्या कारण हैं ?

मैं इस संबंध में निवेदन करना चाहता हूं कि किसानों को जो फर्टिलाइजर मिल रहा है उसमें मिलावट है, पैस्टीसाइड में मिलावट है, इंसैक्टीसाइड में मिलावट है और जो सीड किसानों कों मिलता है उसमें भी मिलावट है। इसके साथ-साथ जो सबसे बड़ी विकट समस्या है मैं उसके बारे में बताते हुए कहना चाहता हूं कि जहां कैनाल और दूसरी सिंचाई की सुविधाएं हैं, वहां के लिए तो यह बात लागू नहीं होती है, लेकिन मैं ऐसे क्षेत्रों की बात कर रहा हूं जहां सिंचाई टयूबवैलों द्वारा की जाती है या जहां सिंचाई का एकमात्र साधन टयूबवैल ही हैं वहां लगातार पानी का स्तर नीचे जाने की समस्या उत्पन्न होती जा रही है। टयूबवैल के क्षेत्रों में पानी लगातार नीचे गिरता जा रहा है जिसकी वजह से किसान को पानी निकालना बहुत महंगी समस्या बन गई है। जहां पहले ५-१० हॉर्स पॉवर का इंजन काम करता था जो डीजल से चलता था वहां आज उस जगह २० हॉर्स पॉवर का इंजन काम करता है जिसमें डीजल भी ज्यादा लगता है और किसानों की लागत भी बढ़ जाती है।

महोदय, हर प्रदेश की समस्या अलग-अलग हो सकती है, लेकिन मैं उत्तर प्रदेश के बारे में बताना चाहता हूं कि वहां किसानों को चार घंटे भी अनवरत बिजली उपलब्ध नहीं हो पाती है जबकि मिनीमम चार्ज के नाम पर उससे पूरी बिजली का चार्ज किया जाता है। मैं यह भी दुर्भाग्य मानता हूं कि इस देश की ६०-७० प्रतिशत जनसंख्या खेती पर आधारित है और आज भी टोटल हिन्दुस्तान के मुनाफे का ३२ फीसदी रुपया एग्रीकल्चर से आता है और सेंट्रल बजट में एग्रीकल्चर के नाम पर केवलमात्र कुछ प्रतिशत आबंटित होता है।

दुर्भाग्य इसके साथ और जुड़ा हुआ है। फर्टिलाइजर में मिली हुई कोई चीज आये, वहां तक तो ठीक है लेकिन हिन्दुस्तान में फर्टिलाइजर का दुरुपयोग हो रहा है। यहां फर्टिलाइजर इतने बुरे तरीके से इस्तेमाल हुआ है जिसके कारण जमीनों की ऊसर जैसी स्थिति हो गई है। जो नयी पद्धति मैं पिछले पांच-छह साल से महसूस करता हूं कि आरगेनिक फर्टिलाइजर के नाम से बहुत से कम्पनियां आई हैं। मैं आपके माध्यम से निवेदन करना चाहता हूं कि शुगर मिलों का जो वेस्टेज होता है जिसको उठाने के लिए पैसा दिया जाता था यानी मिल वालों के पैसे लगते थे, उसी को आरगेनिक मैटर के नाम से उसमें कुछ छोटी मोटी अमोनियम सल्फेट जैसी फर्टिलाइजर मिलाकर आज किसानों को आरगेनिक मेन्योर के नाम से बेचा जा रहा है।

मैं दावे के साथ कहता हूं कि सिवाय थोड़े से कार्बोहाइड्रेट्स के अलावा उसमें ऐसी कोई रेजीडयू नहीं हैं या कोई भी ऐसा सब्सटेंस नहीं है जिसकी वजह से उसकी क्वालिटी या क्वांटिटी में किसी किस्म का कोई इजाफा हो। अब समस्या इस बात की आती है कि हमारे वैज्ञानिकों ने बड़ी-बड़ी चीजें निकाली हैं, अनवरत् निकाले हैं, सीड निकाले हैं, नये-नये इम्प्लीमेंट्स निकाले हैं लेकिन मैं रूट्स लेवल पर, माननीय मंत्री जी, मैं निश्चित तौर पर यह मानकर चलता हूं कि आप उस कृषक परिवार से आते हैं जिसने हिन्दुस्तान का नेतृत्व किया। आज निश्चित ही उनकी पीड़ा आपके दिलो-दिमाग पर होगी लेकिन आप ऐसी सरकार से संबद्ध हैं कि उन योजनाओं के कार्यान्वयन में आपको परेशानी आ रही हो, इससे मैं मना नहीं कर सकता। …( व्यवधान)

मैं आज भी दावे के साथ एक बात कहता हूं कि वैज्ञानिकों द्वारा नये-नये चीजें ईजाद की गई हैं, वे हमारे कृषकों तक नहीं पहुंचती। आज भी उनका सही तरीके से इस्तेमाल जिनको मिलना चाहिए, उन तक वे चीजें नहीं पहुंचती। जो सबसे बड़ी दिक्कत हिन्दुस्तान के आगे है, वह जमीन का फ्रेगमेंटेशन है। कुछ न कुछ इसके ऊपर गौर करना चाहिए। यदि इस पर आपने गौर नहीं किया तो जैसे मैं महसूस करता हूं कि इससे पर कैपिटा होल्िंडग अबाउट वन प्वाइंट समथींग हैक्टेयर रह गयी है। आपकी इकोनामिक तभी बढ़ सकती है जब तक होल्िंडग कुछ बेहतर स्थिति में हो। अगर यह फ्रेगमेंटेशन लैंड होती जायेगी, जमीन के ऊपर लगातार आदमी का दबाव बढ़ता जायेगा तो निश्चित तौर पर मानकर चलिये कि आपका प्रोडेक्शन जो स्टेगनेट हुआ है, जो आपका प्रोडेक्शन रूका है, उसके पीछे यह भी एक कारण है कि हमारी जमीन का लगातार विभाजन हो रहा है।

प्रधान मंत्री जी ने विगत वर्ष एक बात कही ती जो मुझे पूरी तरह से याद है कि हिन्दुस्तान के किसानों को गेहूं और चावल की खेती करना बंद करना चाहिए। यह ठीक बात है और आपका कहना भी ठीक है क्योंकि आपके पास स्टाक अभी इतना है कि आज कुछ भी पैदा न हो तब भी आपके पास ढाई लाख मीटि्रक टन का कन्जम्पशन है और साढ़े सात लाख मीटि्रक टन आलरेडी आपके पास स्टोर है। इसमें मैं एक ही बात आपसे कहना चाहता हूं कि जब तक प्लानिंग फॉर कल्टीवेसन ऑफ क्राप्स अगर कंट्री की नहीं होगी, इसके लिए कृषि नीति आवश्यक है। हर डिस्टि्रक्ट के लिए चीज एलॉट की जाये कि इतना क्राप पैदा करना है, गेहूं पैदा करना है, आलू पैदा करना है या शुगर केन लगाना है तब तक हम प्राइस में बढ़ोत्तरी नहीं कर सकते।

आज स्थिति यह है कि आलू कभी साढ़े सात सौ रुपये क्िंवटल बिकता है तो कभी ऐसा भी होता है कि ५० रुपये क्िंवटल भी हिन्दुस्तान के बाजारों में नहीं बिकता। इसके लिए प्लानिंग की आवश्यकता है। यह तभी संभव है जब कृषि नीति हिन्दुस्तान में बने। राष्ट्रीय कृषि नीति का बनना परम आवश्यकीय है। छोटे-छोटे देशों ने बना ली है लेकिन हमारा इतना बड़ा कृषि प्रधान देश है, इसमें आज तक कृषि नीति नहीं बन पाई है। यह निश्चित ही हम सबके लिए एक दुखद स्थिति है। जैसे कि मैं देख रहा हूं कि एक्सपोर्ट के लिए गुणवत्ता की आवश्यकता है। क्वालिटीवाइस वह चीज अच्छी होनी चाहिए। हमारा कंसाइनमैंट जैसे ही चैकिंग के लिए जाता है तो चैकिंग के दरम्यान कोई न कोई कंटामीनेशन हो जाता है वह चाहे वायरल कंटामीनेशन हो या बैक्टीरियल कंटामीनेशन हो। वह पूरा का पूरा कंसाइनमैंट वापिस आ जाता है।

आपकी चीज़ का खरीददार कौन है, वही अंडर-डैवलप्ड कंट्रीज़ हैं जो पैसे देने की स्थिति में नहीं हैं।…( व्यवधान)मेरा यह भी निवेदन है कि आपका अपना इन्फ्रास्ट्रक्चर है। अगर डब्ल्यू.टी.ओ. के तहत आपको विश्व व्यापार संगठन में कम्पीटीटिव बनना है तो आपको क्वालिटी अच्छी करनी ही पड़ेगी और गुणवत्ता को संभालने के लिए प्रयास करने ही चाहिए।

बहुत दिनों से बात चल रही है कि कृषि को इंडस्ट्री का दर्जा क्यों नहीं दिया जाता। सरकार के आगे ऐसी क्या परेशानी है जो उसे इंडस्ट्री का दर्जा नहीं मिलता। आज यदि उसे इंडस्ट्री का दर्जा दे दिया जाए तो हमारे कृषक अपाहिज नहीं रहें, आपके आगे झोली नहीं फैलाएं। जहां तक मेरी जानकारी है, कमेटी जरूर बनाई हुई है। उसका क्रियान्वयन हो, उसे जल्दी से जल्दी इंडस्ट्री घोषित करें, यह मेरा आपसे निवेदन है।

प्राइस के बारे में बहुत बात होती है। यदि क्रॉप बोने से पहले प्राइस फिक्स हो जाए तो काश्तकार के दिमाग में भी यह बात रहेगी कि हमें कौन सी फसल में पैसा अच्छा मिल सकता है। अगर पहले से प्राइस डिक्लेयर करेंगे तो निश्चित ही आज आपके पास जो बहुत सारा बफरस्टॉक है, उसमें कमी आएगी। उस कमी को दूर करने का एकमात्र तरीका यह है कि उसके प्राइस पहले घोषित करें।

जहां तक डब्ल्यू.टी.ओ. की बात है, डब्ल्यू.टी.ओ. की तीन बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं - क्वालिटी, क्वांटिटी और उसकी कॉस्ट कम होनी चाहिए। आज सबसिडी कम होने से लगातार कीमतें बढ़ती जा रही हैं। मेरा आपके माध्यम से मंत्री जी से अनुरोध है कि वे पुन: कृषि नीति पर विचार करें ताकि बहुत सारे झंझट अपने आप ही दूर हो जाएं।

SHRI BIR SINGH MAHATO (PURULIA): Sir, we have been discussing the problems being faced by the farmers and also their plight. It is a fact that the crisis in agriculture is deepening. The middle and poorer sections in the peasantry are getting perished. The indebtedness among the farmers is also growing. The steep fall in the prices of certain agricultural commodities is also causing a great hardship to the farmers. Natural calamities like drought and flood also cause great hardships to the farmers. Such calamities affect them every year.

Many types of pests are also causing heavy damage to the crops of the farmers. The wages of agricultural labourers are also falling. The public investment in the agricultural sector and the irrigation sector is declining. The uncertainty of agricultural production is also continuing. Therefore, in order to enable our farmers to compete with their counterparts in foreign countries - in the global agricultural market - the subsidies, as are available in other countries, should also be provided to our farmers.

The profession of farming has now become unprofitable. The Government should see to it that it could be made a profitable one. The farmers are not getting remunerative prices. Everyone has spoken on this issue. They are not even getting the support price that is announced every year by the Government. The Plan investment in agriculture is also decreasing every year.

Therefore, the Government should ensure that farmers get their price and the guidelines of crop insurance scheme are modified so that all the farmers who are affected by the natural calamities get the facilities. I would also urge the hon. Minister that public investment for agricultural and irrigation sector, including banks, should also be increased. The Government should also ensure that credit facilities are made available to the farmers so that they can avail them whenever in need.

*SHRI MANI SHANKAR AIYAR (MAYILADUTURAI): Hon. Chairman, I thank you for giving me an opportunity to participate in this discussion on the problems faced by the farmers of our country. I have got several opportunities earlier to dwell at length on agricultural issues but today I would like to devote my speech entirely to highlight the problems faced by the Cauvery Delta farmers.

Failure of monsoon, drought conditions, vagaries of weather and natural disasters have given rise to problems faced by the farmers to carry on their agricultural occupation in several States. But the problems faced by the farmers of the Cauvery Delta region are man-made. This havoc has been wrought by human callousness. We have to ponder over this. In 1998, our Prime Minister constituted Cauvery River Water Authority involving all the Chief Ministers of the riparian States with the objective to evolve a lasting solution to this vexing issue and to resolve the dispute in sharing the river water. When this Authority was set up, the case that was pending with the Supreme Court was sought to be withdrawn or stayed. The proceedings before the highest court of the country were preferred to be kept in abeyance to enable the functioning of this Cauvery River Water Authority. I would like to lay stress on this important issue. Till April 1997, the plea by the Government of Tamil Nadu was heard by the Supreme Court of India. In 1998, the Solicitor General of the Union Government went before the apex court with the submission that the court may not proceed with the case any further as the Centre would prefer the CRA to be ceased of the matter. On the premise that Cauvery Tribunal was set up in June 1991, a decade ago, the Union Government gave an assurance to the apex court that they would implement the award given by the Tribunal. Thus Cauvery River Water Authority was established on the basis of this promise the Centre had given to the apex court. In all these four years the Centre never bothered to implement the Tribunal Award or __________________________________________________________________*Translation of the speech originally delivered in Tamil.

fulfill its promise it gave as a solemn assurance before the highest court of the country. Nothing was done during any part of this 4 year period. What was this Prime Minister doing? I fail to understand as to why this Union Government went before the Supreme Court to give a false promise. The authority was set up. All are aware of the repeating problems repeated annually during every successive year. There are no two opinions that the problem persisted and crisis came to the fore every time. What is the crux of the problem? Till 1974, Tamil Nadu was getting every year about 600 tmc of water from Karnataka that reached the Cauvery Delta region without fail. In 1991, when it was said that Tamil Nadu would be given only 205 tmc of water instead of 600 tmc, the Government of Tamil Nadu accepted the offer that came with an assurance that 140 tmc out of this 205 tmc would be released during the 4 months of June, July, August and September every year. It is only because of the assurance that 140 tmc of water would be released during these 4 months the Government of Tamil Nadu readily accepted the proposal mooted then. We may not get 600 tmc any more. We are not even concerned about the 205 tmc of water promised. But, we are very much in need of sufficient water during the crucial 4 months to carry on agricultural activities to raise Kuruvai crops. This is very important. Somehow, we would be able to carry on cultivation during that season. It is only because of that guarantee that was spelt out we accepted the proposal. The Government of Tamil Nadu readily agreed to it without any delay considering the needs of the farmers on both sides. They believed that the assured quantity of river water would flow. Not even a day was delayed in our accepting the proposal from the Centre. We believed that the Authority headed by the Prime Minister of the country would fulfill its assurance and render us justice. We had a fervent hope. But we were in for a great disappointment. We thought that we would get justice when Prime Minister himself was at the helm of the Authority. I would like to emphasize and record our anguish. In the last 4 years we did not get anything that was assured. In no year, in no month, in no week the water was released as promised. Till date we have not got justice. How can we repose faith in them? The Prime Minister did not even bother to convene the meeting of the Cauvery River Water Authority. In 1998, in the month of November when the Authority convened its first meeting we raised just one question. This Authority was set up in September 1998. Its first meeting was in November 1998. We wanted to know how much of Cauvery water was released to Tamil Nadu. We asked for the amount of water as we wanted to know the exact quantity of water released by Karnataka to Tamil Nadu. Karnataka Government said that 16 tmc of water was released in September that year. But Tamil Nadu contested it saying that they received only 8 tmc of water. This was raised in the very first meeting of the CRA. Even today no one is knowing what had happened. No one including the Centre knows how much of water was released and received. What happened to 8 tmc ofwater is still a mystery. Hon. Chairman Sir, we all know how much of water would be there if it is 8 tmc of water. T means thousand, m means million, c means cubic. It is eight thousand million cubic feet. That is 8 billion cubic feet. That much of water has not reached Tamil Nadu. What does it mean? The water claimed to have been released in Karnataka did not reach Tamil Nadu. The amount of water that reaches Tamil Nadu is measured near Hogenekkal. Till date no proper reply has been given as to what had happened to that. I have raised this question many times. I raised the question in the House of the people. Whether the water was received or not has not been answered as yet. Then why should this Government be there; why should there be a Cabinet; why should there be a Prime Minister? In July 1997, this Authority met. Just once that year. In the way alms were shared among the beggars, advice was given to accept a meagre quantity. It was like saying take little and keep quiet with that. In 2000, the authority did not meet even once. Not even once in that year. Is it called justice? Is this the way to administer the country? Having failed to convene even once the meeting of this authority in 2000, the Centre convened the CRA meeting in September 2001 when there was a grave crisis. Similarly, in this year also, the proposal to convene the meeting of the authority was considered only when the problem assumed a grim and grave dimension. Whenever the CRA is convened they do not go into the basic issue, neither the bone of contention nor the basis for an amicable solution. They come out with piece meal offers.

Through the Chair, I would like to ask this Government as to why you have not evolved a distress sharing formula in the last 4 years. When nature fails, there must be some viable formula available to share the water among all the Cauvery basin States. Have you ever thought of it even once? Now you are coming out with an announcement about linking Ganga with Cauvery. Without resolving the basic problem on hand, even without showing small mercy, your talking big is meaningless. This Prime Minister who told the Court that talks would be held had only failed to hold talks taking it to its logical end. What did you do in these 4 years? Has the Prime Minister spent even a single minute to think about evolving a solution to this vexing problem? Has he done anything to arrive at a lasting solution in these 4 years? What did he do? Only when there is grave crisis the authority would meet and there again only piece meal solution would be offered. If the CRA meets when there is no pressing problem and when the crisis is not at its boiling point, they can think coolly to draw a long term strategy. Some solution could have been evolved by now. But unfortunately that has not happened. Without doing any such thing you have only been disappointing all leading to despair.

You have now started talking about linking Ganga and Cauvery. Is it so simple? Do you know its magnitude? About 35 years ago, Dr K.L. Rao came out with this proposal. Even before we could win independence our leaders of the freedom struggle have thought about it. Freedom fighters like Mahakavi Subramania Bharathi dreamt about this, envisioned this as a developmental plan for an emerging country.

But you have suddenly caught hold of this idea. Since you have nothing to offer you are talking of linking Ganga with Cauvery. There is no timely help. There is no immediate solution. You are talking of a plan that would be a distant dream. You cannot solve the problems of Cauvery Delta farmers now. So we have lost faith in this Prime Minister.

I am not speaking on behalf of my party the Congress Party. I speak now on behalf of the Cauvery Delta’s farming community, the people of my constituency who are finding it increasingly difficult to surmount the problem due to the scarcity of irrigation water in that once perennial river Cauvery. Our farmers living there are now facing extinction. I speak for them.

We have lost all faith in this Prime Minister. We have also lost faith in this Cauvery River Authority. To seek justice we have no other means except to go before the Supreme Court again. The Prime Minister who says that we should not knock at the doors of the court of justice must have the courage to accept before the same court that he could not keep his word to find an amicable solution to resolve the dispute. Can he still assure that the Centre would implement the award of the Tribunal? Will he come forward to accept that he failed in his responsibility? I challenge him whether he can still ensure an amicable mechanism to evolve a solution. Can he do it?

Even 205 tmc of water could not be released in time. When there is heavy rain in the catchment areas and when they cannot store any water and when they face flood threat, Karnataka releases all such storm drain water. What is the use? The water that cannot be released at a needy time is of no use when it is let out in abundance during off season. Our humble prayers to release water for commencing in time the Sambha cultivation and Kuruvai cultivation go unheeded. Even for a drop of water we have to beg or led to that state? At that point of time we do not find any initiative from our Prime Minister, or our Agriculture Minister or our Irrigation Minister. Do you have any sympathy for the Cauvery Delta farmers? You do not find time to study seriously the basic problems that affect the farmers. Without understanding the immensity of the problem faced by the Cauvery Delta farmers you are going about in your own way.

I have pleaded many a times. Shri Ajit Singh was in our party once. When he was a Minister in our Government he had come forward at least to listen to us to hear our problems. Now that he has changed his camp, he does not find time to visit our Cauvery Delta region even after my repeated requests. He has not visited our area. Of course he had sent a Central team. But that team came only up to Nagapattinam. When they had come up to Nagapattinam what prevented them from coming further up to Mayiladuthurai in the same Cauvery Delta region? They did not visit the much affected Mayuram. They had written their report sitting elsewhere. How can they do so? Major part of the Cauvery Delta region is in my Mayiladuthurai Lok Sabha constituency. Without visiting my Parliamentary constituency they went to some other district headquarters and prepare a report sitting there. Is it not meaningless? During every session, I take pains to invite repeatedly the Agriculture Minister to our Cauvery Delta region. He does not find time to visit our place though he has been visiting many other places. Why is it so? We want justice. Shri Ajit Singh cannot render us justice. Our Water Resources Minister Shri Arjun Sethi also cannot extend justice to us. Even from the Prime Minster Shri Atal Bihar Vajpayee we are not going to get any kind of justice. At this juncture, we have only one opportunity. We can go to Supreme Court again. We can reopen the case there and seek justice. Hope of getting justice is there. At the hands of the Centre we are getting a raw deal. We have lost faith in this Government. In order to show that I have lost faith in this Government let me walk out of this House of the people.

Since the Government has failed to evolve a lasting solution to the vexing problems of the Cauvery Delta farmers, I walk out.

           

19.00 hrs.     (At this stage, Shri Mani Shankar Aiyar left the House.)   कृषि मंत्री (श्री अजित सिंह) : माननीय सभापति जी, किसानों की परिस्थति सोचनीय है। बुधवार और आज करीब ३० माननीय सदस्यों ने अपने विचार रखे हैं। डब्ल्युटीओ, यूपोव से लेकर गन्ना किसान, सैरी कल्चर और कोकोनट फार्मर्स से संबंधित, सभी समस्याओं को यहां पर रखा गया है। किसानों द्वारा आत्महत्या के प्रश्न को भी यहां उठा गया है। आर्गेनिक फार्मिंग से संबंधित जो समस्यायें हैं, उनको भी चर्चा के दौरान सदन में उठाया गया है। पार्टी के दायरे से बाहर निकल कर सभी माननीय सदस्यों ने किसानों के संबंध में अपने मन की व्यथा और चिन्ता को प्रकट किया है। खास तौर से सूखे की मार से जो किसान व्यथित हैं, उनके बारे में भी सदन में चर्चा हुई है। कुछ आंकड़े और सुझाव भी माननीय सदस्यों द्वारा दिए गए हैं, क्योंकि ६५ प्रतिशत से ज्यादा लोग कृषि पर आधारित हैं। लेकिन मुझे दु:ख इस बात है कि हर एक सदस्य अपना भाषण देने के बाद सदन में उपस्थित नहीं है। सदन में एकजुटता दिखनी चाहिए तथा कम से कम जिन्होंने भाषण दिया है, वे सदस्य सदन में मौजूद रहें। …( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह:मैं आपकी बात से सहमत होते हुए कहना चाहता हूं कि सरकार में बैठे हुए लोग भी गम्भीर नहीं है।

श्री अजित सिंह : आपने सवाल पूछा था कि सब मंत्री मौजूद नहीं है। मैं यह कहा रहा हूं कि अगर इस प्रपोर्शन में देखा जाए कि जितनी संख्या में मंत्री मौजूद हैं, उतने ही संख्या में सदस्य मौजूद हैं, तो शायद आप शिकायत नहीं करते। मुझे चिन्ता यह है कि इतने सदस्यों की चिन्ता के बावजूद और हर दल के सदस्यों की चिन्ता के बावजूद, यह भावना हर एक सदस्य के मन में क्यों पैदा हुई कि शायद कुछ नहीं हो रहा है, शायद कुछ करना संभव नहीं है। यह चिन्ता मुझे भी है और आप सब को चिन्ता होनी चाहिए तथा दो-तीन घन्टे ज्यादा रुक कर ५४१ सदस्यों में से ५०० सदस्य यहां उपस्थित होते, तो जरूर कहीं-न-कहीं अफसरशाही के मन में प्रभाव पड़ता कि हमारे देश के कर्ताधर्ताओं के मन में जरूर कहीं दवाब है कि यह समस्या वास्तव में सीरियस है और इसके समाधान के लिए कोई कदम उठाया जाना चाहिए। यह भी कारण हो सकता है कि सदस्य शायद भाषण देकर इसलिए चले गए कि सबको समस्याओं का पता है। समस्यायें सरकार को भी मालूम हैं। समस्यायें पिछली सरकार को भी मालूम थी और शायद वह महसूस करते हैं कि किसी दूसरे सदस्य को ज्यादा बताने के लिए कुछ नहीं है। हम सब को समस्यायें मालूम हैं।

श्री सुनील खां (दुर्गापुर): पता नहीं था कि सदन ७ बजे तक चलेगा।

श्री अजित सिंह : सदन यदि आठ बजे तक भी चलता, तो यहां रहने की जरूरत थी, क्योंकि यह समस्या बहुत बड़ी है।

महोदय, मेरा कहना यह है कि कृषि का स्वरूप आज हमारे देश में बदल रहा है। जोत छोटी हो गई है। एवरेज जोत करीब १.५ हैक्टेयर के करीब है और ८० प्रतिशत किसान छोटे या मार्जिनल दो हैक्टेयर से कम हैं। मेरा कहना यह है कि यदि हम आंकड़ों को देखें, तो राजस्थान में ५ हैक्टेयर के फार्मर्स स्माल या मार्जिनल ही गिने जायेंगे और इस द्ृष्टि से देखें, तो ८० प्रतिशत से ज्यादा किसान छोटे और मार्जिनल हो गए हैं। दूसरे यह बात भी सही है कि कृषि के क्षेत्र में हमारी समस्या बदली हैं। हमारे यहां उत्पादन की कमी नहीं है, हमारे यहां समस्या यह है कि हमारे पास हर एक चीज ज्यादा है। पहले जो मार्केटिंग की समस्या नहीं थी, हमारे देश में अब मार्केटिंग की समस्या आ गई है।

अब कृषि में साइंस और टैक्नोलॉजी का योगदान बहुत ज्यादा हो गया है और बायो-टैक्नोलॉजी का सबसे ज्यादा योगदान कृषि में ही होना है, क्योंकि अब जोत छोटी हो गई हैं। इनटेंसिव क्रोपिंग है, इसलिए फर्टिलाइज़र्स का इस्तेमाल भी बढ़ा है। अब माइक्रो न्यूट्रीएंट का उपयोग खेती में हो रहा है और नये-नये तरह के बीज आ रहे हैं। पानी की कमी की वजह से डि्रप इरीगेशन और स्प्रींकलर इरीगेशन की बात भी आ रही है। इन सब का नतीजा यह है कि किसानों की लागत बढ़ी है और जब किसानों की लागत बढ़ी है तो उसे ज्यादा कर्ज लेने की जरूरत भी पड़ी है। तीन क्षेत्रों में समस्याएं हैं - इनपुट में, क्योंकि लागत बढ़ी है। किसानों को नयी-नयी चीजें कम से कम ऐवेलेबल हैं। उसे जानकारी है या नहीं, वह प्राप्त कर सकता है या नहीं, यह भी एक समस्या है। इसके साथ ही जोत छोटी हैं, इनपुट्स कास्ट बढ़ी है, इसलिए उसे क्रेडिट की भी जरूरत है। आज भी किसानों को सिर्फ ६० प्रतिशत क्रेडिट इंस्टीटयूशंस से मिलता है और ४० प्रतिशत के लिए साहूकार पर निर्भर रहना पड़ता है। इन बातों की सब को जानकारी है।

मैं इस संबंध में एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि कृषि राज्यों का विषय है। कंकरेंट लिस्ट में भी नहीं है हम परिवर्तन कृषि में लाना चाहते हैं - जैसे मार्केटिंग की समस्या है। हम बहुत से कानूनों में परिवर्तन लाना चाहते हैं। बहुत से लोगों ने कहा है कि जोतें छोटी हो गई हैं, उन्हें फ्रेगमेंटेशन से रोका जाए। हमारे देश की जो सामाजिक स्थिति है, उसमें यह संभव नहीं है। हमारा मानना है कि अगर उसके पास एक बीघा जमीन भी है तो उसको प्राइड ऑफ ऑनरशिप है। आपने उसे कहा कि तुम्हें हम डिसप्लेस कर देंगे, क्योंकि बड़ी जोत की जरूरत है तो सामाजिक परिस्थिति बहुत ही कठिन हो सकती है। अगर किसान को इस परिस्थिति में मार्केटिंग करनी है, उसे नये-नये ट्रेक्टर खरीदने है और नये-नये बीजों का इस्तेमाल करना है तो मेरा मानना है कि कोआपरेटिव्स को सुद्ृढ करें। आज हमारे गांव का हरेक किसान कोआपरेटिव्स से संबंधित है, लेकिन समस्या यह है कि यह स्टेट सब्जैक्ट है। इसमें कानून को बदलने की जरूरत है। आप बुरा न मानें तो मैं कहना चाहूंगा कि बहुत से राज्यों में सहकारिता लोगों का मूवमेंट नहीं है, सरकार का एक विभाग है।…( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह:यह भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया है।…( व्यवधान)

श्री अजित सिंह : भ्रष्टाचार तो और भी बहुत सी चीजों में है, लेकिन यह एक सरकार का विभाग है। आज कोआपरेटिव्स की जरूरत है, क्योंकि मार्केटिंग के लिए, जैसा मैंने कहा कि अब एक-दो हैक्टेयर का किसान, खास तौर पर जब हम उसे कह रहे हैं कि गेहूं और चावल से अलग हटो, जिसकी मार्केटिंग में फर्क है तो उसके लिए किसान अपनी अलग मार्केटिंग नहीं कर सकता है। उसे किसी न किसी संस्था की मदद की जरूरत है। मेरा मानना है कि वह संस्था कोआपरेटिव के अलावा अन्य कोई नहीं हो सकती। हमने केन्द्र में कानून बदल दिया है, इसमें हमने सरकार की हिस्सेदारी, भागीदारी और जो कंट्रोल है, वह एक तरीके से खत्म कर दिया है। हमारे देश में मल्टी स्टेट कोआपरेटिव्स सिर्फ ३०-३५ हैं। लाखों कोआपरेटिव्स प्रदेश के कब्जे में हैं और कोई भी प्रदेश उस कानून को बदलने के लिए तैयार नहीं हैं। हमने कितनी ही मीटिंग बुलाई हैं और कहा है, वे हां कर देते हैं लेकिन उसे बदलना नहीं चाहते हैं, क्योंकि पावर देना बड़ा मुश्किल काम है, वह आसानी से नहीं हो सकता है।

महदोय, मैं सभी पार्टी के माननीय सदस्यों और नेताओं के कहूंगा कि शायद हमें कोआपरेटिव्स के लिए भी संविधान में संशोधन करना पड़े, जैसे पंचायती राज के लिए किया गया था, जिससे इसमें एक समान कानून सारे देश में हो सके, कोआपरेटिव्स आगे बढ़ सकें वरना किसान बचने वाला नहीं है। खाली मार्केटिंग की बात नहीं है। आज भी बहुत से माननीय सदस्यों ने सवाल उठाया कि अगर किसान ५००० रुपए भी वापिस न करें तो उसे जेल में डाल देते हैं। हमने स्टेट्स को कई बार लिखा कि इन कानूनों को बदलें।…( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह:आदरणीय सभापति जी, प्रधानमंत्री जी की घोषणा के बाद आज भी उत्तर प्रदेश के सूखा प्रभावित इलाकों में किसान के कर्जे की वसूली नहीं रोकी गई है और उनके लड़कों को जेलों में बंद किया जा रहा है।…( व्यवधान)

श्री अजित सिंह : मैंने कहा कि मार्केटिंग और क्रेडिट की समस्याके लिए कोआपरेटिव्स को स्ट्रेंथन करना बहुत जरूरी है। सबसे पहले उसके कानून बदलने की जरूरत है।

इसी तरह के बहुत से कानून हैं। सदस्यों ने भ्रष्टाचार की बात कही। किसान क्यों आत्महत्या कर रहे हैं? …( व्यवधान)इस मामले में उनकी भाषा आपसे फर्क नहीं है। आज देश में सभी लोग यह मानते हैं कि देश की आर्थिक रीढ़ कृषि है। मैं कुछ अलग हट कर कहना चाहूंगा कि जो २४ परसैंट जीडीपी कृषि क्षेत्र से है उसमें चीनी, मक्खन जोड़ दें और कृषि आधारित इंडस्ट्री जैसे फर्टिलाइजर, कैमिकल्स, अल्कोहल, ब्यूटी इंडस्ट्री, ट्रैक्टर्स, फार्म इम्लीमैंट्स जोड़ दें तो दूसरी स्थिति सामने आएगी क्योंकि ये भी कृषि पर आधारित हैं। हमारे देश की अर्थव्यवस्था काफी हद तक कृषि पर टिकी है। इसमें कानून बदलने की बात है। यहां भ्रष्टाचार की बात कई लोगों ने उठायी। किसान क्यों आत्महत्या कर रहे हैं? पहली बात यह है कि उसे क्रैडिट ६० परसैंट इंस्टीटयूशन्स से मिलता है और ४० परसैंट साहूकारों से लेता है। जहां इंटरेस्ट रेट २५ परसैंट से १०० परसैंट तक है। यदि उसकी एक फसल नष्ट हो गई या उसे फसल का उचित दाम नहीं मिला तो उसे बहुत घाटा होता है। एमएसपी भी आज बड़ी चर्चा में है। उनसे किसान परेशान होकर आत्महत्या करते हैं चाहे वह कॉटन का किसान हो या अन्य किसान हो। कॉटन का किसान चूंकि वह सबसे गरीब है इसलिए आत्महत्या कर रहा है। हर प्रदेश में हर किसान चाहे किसी प्रकार की खेती करता हो उसने समस्या महसूस की है। वह कहीं न कहीं मजबूरी में आत्महत्या कर रहा है। मैं इसे भ्रष्टाचार से इसलिए जोड़ रहा था क्योंकि उसे स्पूरियस सीड्स, फर्टिलाइजर और पैस्टिसाइड्स मिलते हैं जो एक बहुत बड़ा कारण है। केन्द्र सरकार कानून बना सकती है लेकिन उसका कार्यान्वयन प्रदेश सरकार के हाथ में है। पैस्टिसाइड्स का लॉ हम चेंज करने जा रहे हैं। इस बारे में सदस्यों ने बहुत से सुझाव दिए और कहा कि इसकी सजा बढ़ा दी जाए। मेरा मानना है कि यह खत्म होने वाला नहीं है। हमने कृषि विज्ञान केन्द्र बनाए हैं, तथा हम प्राइवेट इंटरप्राइसेज को एनक्रेज कर रहे हैं कि वे आएं और किसानो को जानकारी दें। अगर वहां सुविधा दी जाए, सर्विस सैंटर बनाए जाएं जहां किसान अपने पैस्टिसाइड्स को ले जाएं और कहें कि इसके असली या नकली की जांच की जाए चाहे इसके लिए १० या २० रुपए ले लीजिए, अगर यह पता लगता है कि वह नकली है तो वह उस दुकान पर कभी नहीं जाएगा। कानून यहां से बहुत बदल रहे हैं। हम फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर खत्म कर रहे हैं। उसमें डीलर्स के लिए भ्रष्टाचार था। सभी कानूनों का इम्पलीमैंटेशन प्रदेश सरकार के हाथ में है।

जो मार्किटिंग की समस्या है, उसमें कोआपरेटिव और कारपोरेट्स का आना जरूरी है लेकिन कारपोरेट्स के कॉन्ट्रैक्ट्स कैसे बनें, इसमें सावधान रहने की जरूरत है। इस बारे में एक कमेटी बनायी गई थी। टास्क फोर्स की रिपोर्ट आ चुकी है। एक स्टैडिंग कमेटी बनायी है जिस के एमओएस इंचार्ज हैं। स्टेट के मनिस्टर्स सदस्य हैं। उस मार्किटिंग की रिपोर्ट को कैसे इम्पलीमैंट किया जाए? समस्या यह है कि इसमें एग्रीकल्चरल प्रोडयूस मार्किटिंग लॉ है जो स्टेट्स के द्वारा बनाए गए हैं। उसे बदलने की जरूरत है। उसमें कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को कहीं न कहीं एलाऊ किया जाए। साथ ही साथ मंडी समति सिर्फ टैक्स वसूलने के अलावा कोई काम नहीं कर रही है। ग्रेडिंग, पोस्ट हारवैस्िंटग मार्किटिंग मैनेजमैंट होना चाहिए। इसमें जो सुधार होना चाहिए, तथा क्वालिटी कंट्रोल होना चाहिए यह मंडी समति का काम है । उसमें भी हम प्रयास करें कि वह कानून बदले और उसमें किसान सीधा किसी प्रोसैसर को बेचना चाहे तो बेचे। हम मंडी समति को सुविधा दे रहे हैं, वित्तीय सहायता कर रहे हैं जिससे मार्किटिंग के लिए फैसलिटी बढे, उससे लिए वह ग्रेडिंग के सुधार का काम करे। इसी तरह भंडारण की समस्या है। उसमें भी एक कानून नैगोशिएबल इंस्टूमैंट्स का है। उसके बारे में भी हम प्रयासरत हैं जिससे कानून बदले। किसान अपना सामान भंडार में रख कर रसीद लेकर बैंक से ८० या ९० परसैंट जो गन्ना के किस्म पर निर्भर होगा, वह पैसा ले सकें। उस कानून को बदलने के लिए हम प्रयासरत हैं।

क्रैडिट के मामले में, मैं सही कहूंगा कि जहां आप सभी सदस्यों ने चिंता जताई है, आपकी चिंता उचित है। जब सब बैंक्स नैशनलाइज्ड हुए थे, तब सरकार ने कहा था कि १८ परसेन्ट आपको कृषि पर देना है। यह प्रायोरिटी सैक्टर है। लेकिन आज तक १८ परसेन्ट किसी बैंक ने नहीं किया है। हालांकि उससे जो पैसा बचता है, नाबार्ड के अंदर उसका एक अलग फंड आई.आर.डी.एफ. बनाया गया है जो इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर उसे खर्च करता है। लेकिन मेरी तथा आप सभी सदस्यों की चिंता उससे भी बड़ी है कि जब डिपॉजिट रेट्स कम हो रहे हैं और ७० परसेन्ट डिपॉजिट्स गांवों से आते हैं, उसे भी आप समझ लीजिए कि डिपाजिट रेट्स कम हो रहे हैं, लेकिन किसानों पर जो ब्याज का रेट है, वह नीचे आने का नाम नहीं ले रहा है। उसके बारे में हमें फिर आप सबके सहयोग की जरूरत है। ११ तारीख को हमने कृषि मंत्रियों, कोऑपरेटिव मंत्रियों, नाबार्ड और आर.बी.आई. सबकी मीटिंग बुला रखी है कि किस तरह किसानों के ब्याज की दर कम की जाए यह दर कम से कम १२ परसेन्ट तक हो। मेरा मानना है कि ज्यादातर १४ परसेन्ट से लेकर २० प्रतिशत तक दर है और इसमें भी कोऑपरेटिव ही ५० प्रतिशत क्रैडिट गांवों में देती है। अगर वह छ: परसेन्ट नाबार्ड से ले भी लें, तीन परसेन्ट स्टेट लैवल, दो परसेन्ट डिस्टि्रक्ट लैवल और दो परसेन्ट विलेज लैवल इस तरह वह १३-१४ परसेन्ट तक हो ही जाती है। मेरा मानना है कि इसमें टीयर्स को कम करने की जरूरत है।

उसी तरह से किसान जो पैदा करता है और खरीददार जो पैसा खर्च करता है, उसमें बड़ा भारी अंतर है। जो किसान को मिलता है, जो खरीददार पैसा देता है उसमें पांच, छ: और सात गुना तक अंतर है क्योंकि पांच, छ:, सात इंटरमीडियरीज हैं। इसमें मंडी समति में फिर यह चीज आती है। इसमें कई राज्यों ने बड़ा अच्छा काम किया है। क्यों नहीं हम नेबरहुड मंडी खोलें। कम से कम छोटे कस्बों में, बड़े गांवों में, जहां कम से कम फल-फूल वाले किसान,सब्जी वाले और सीधे कंजूमर्स आयें, इस तरह से बीच में से इंटरमीडिएरीज को हटाया जा सकता है और कृषि क्षेत्र में बहुत सुधार हो सकते हैं।

सभापति महोदय, हम अभी तक १२ साल से इंडस्ट्रीज में सुधारों की बात कर रहे हैं, फिस्कल सुधारों की बात कर रहे हैं जबकि कृषि क्षेत्र में सुधारों की बहुत जरूरत है। सुधार और उदारीकरण कोई खराब शब्द नहीं है, यह भी हम अपने मन में समझ लें। वरना बहुत लोगों की भावना है कि उदारीकरण का मतलब है कि हम बेच रहे हैं, कृषि में गड़बड़ कर रहे हैं, किसानों को बचाने का काम नहीं कर रहे हैं। ऐसी कोई बात नहीं है। बल्कि जब हम कांट्रैक्ट फार्मिंग की बात करते हैं तो हमारा सुझाव है कि ए.पी.एम.सी. में जरूर कांट्रैक्ट को देखा जाए। क्योंकि गरीब किसान से किसी बड़े कारपोरेट ने कांट्रैक्ट कर लिया तो उसमें जो फाइन प्रिंट होगा, उसे हम और आप नहीं पढ़ते हैं, किसान क्या पढ़ेगा। इसलिए मार्केटिंग और कोऑपेरिटव में उदारीकरण की जरूरत है तथा जो नये तरह के इनपुट्स आ रहे हैं, जो साइंस और टैक्नोलोजी आ रही है, उसके बारे में ऐसा कहें कि हम बॉयो-टैक्नोलोजी का इस्तेमाल नहीं करेंगे। मेरे ख्याल से जब भी कोई फ्रंटियर साइंस, नई तरह का साइंस आता है तो उसके बारे में कई सवाल उठते हैं। जब भाखड़ा नांगल डैम बना था, तब भी सवाल उठे थे कि क्या पानी से बिजली निकालने के बाद इसमें कोई दम रह गया है या नहीं। इसलिए जो बॉयो-टैक्नोलोजी और नई तरह की चीजें आ रही हैं, उनके बारे में पहले किसानों को जानकारी कैसे दी जाए और अगर जानकारी दी जाए तो किस तरह से उन्हें वह उपलब्ध कराई जाए। इसके लिए सरकार हर जिले में कृषि विज्ञान केन्द्र खोलने की कोशिश कर रही है। …( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह:आप घोषणा कर दीजिए कि हर जिले में खोला जायेगा।

श्री अजित सिंह : कुछ राज्य जिले बढ़ाते चले जाते हैं तो मुश्किल आ जाती है, वरना अभी तक यह हर जिले में हो गये होते। लेकिन उससे भी काम चलने वाला नहीं है। मेरा मानना है कि जो एक्सटैंशन का काम है इसमें जब तक प्राइवेट इनीशिएटिव नहीं होगा, जब तक प्राइवेट एंटरप्राइज नहीं आयेंगी, हमारे देश में एग्रीकल्चर के इतने ग्रेजुएट्स बन रहे हैं और आजकल नौकरी किसी को मिलने वाली नहीं है। उनके लिए यह बहुत अच्छी बात है क्योंकि वे ग्रामीण क्षेत्र से आते हैं, वे ग्रामीण क्षेत्र में रह सकते हैं और किसानों को बता सकते हैं, उन्हें ट्रेनिंग दे सकते हैं, वे सब चीजें उपलब्ध करा सकते हैं तथा उसी से उनकी आजीविका भी चल सकती है। हमने एग्रो-क्लीनिक और एग्रो-बिजनेस सैन्टर्स की स्कीम भी खोली है। इसमें बहुत सी प्राइवेट कंपनीज भी आई हैं। जैसा मैंने पहले कहा कि हम कृषि विज्ञान केन्द्र को एक सर्विस सैन्टर बनाना चाहते हैं।

सभापति महोदय, जैसा सभी जानते हैं कि पहले एक बहुत पुरानी स्टडी हुई है कि अगर कोई ग्रामीण क्षेत्र, गांव सड़क के ऊपर है तो वहां इंकम अपने आप १५ परसेन्ट बढ़ गई है। यह स्टडीज हुई है।

इसलिए खाली कृषि का मतलब यह नहीं है कि केवल यहीं तक सीमित रहें। अगर हम स्थिति सुधारना चाहते हैं, खाली यही नहीं है कि हम नए बीज दें, बल्कि यदि इन्फ्रास्ट्रक्चर गांवों में बढ़ेगा, अगर किसान को पता होगा कि किस मंडी में क्या भाव है और वहां ले जाने के लिए उसे वह सुविधा उपलब्ध हो, तभी उसे उचित दाम मिल सकता है। उसके लिए भी हम प्रयासरत हैं। हम सब मंडियों को इन्फर्मेशन टैक्नौलौजी द्वारा जोड़ना चाहते हैं जिससे कि हर मंडी में क्या भाव है, किस चीज की कितनी बिक्री हो रही है, इस सबके बारे में भी जानकारी होने की जरूरत है।

महोदय, डब्ल्यू. टी. ओ. के बारे में मैं कहना चाहूंगा कि बहुत लोगों को इसके बारे में चिन्ता है।

१, जनवरी, १९९५ से डब्ल्यू.टी.ओ. शुरू हुआ। उससे जो आशाएं थीं कि एग्रीकल्चर में व्यापार बढ़ेगा और उसमें हिन्दुस्तान का हिस्सा बढ़ेगा, डॉमैस्टिक सबसिडीज डैपलप्ड कंट्रीज में कम होंगी, एक्सपोर्ट सबसिडीज कम होंगी, तो एग्रीकल्चरल प्रोडयूस का दाम बढ़ेगा और इससे भारत जैसा गरीब एवं डैवलपिंग कंट्रीज का व्यापार बढ़ेगा क्योंकि आज भी हमारा किसान, दुनिया के किसानों से मुकाबला कर रहा है, इन सारी कमियों के बावजूद, यहां के किसान का फायदा होगा, डब्ल्यू.टी.ओ. पर साइन करते समय भारत के लोगों की यह मंशा थी। जिन लोगों ने डब्ल्यू.टी.ओ. पर साइन किए उसके पीछे यही भावना थी, लेकिन साफ बात यह है कि जो फायदा सोच रहे थे कि मिलेगा, वह डब्ल्यू.टी.ओ. के साइन करने से नहीं हुआ है। डैवलप्ड कंट्रीज ने अपनी सबसिडी कम नहीं की हैं। मार्केट एक्सैस डैवलपिंग कंट्रीज के लिए नहीं बढ़ाया है, लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि जो चिन्ता माननीय सदस्यों को थी कि डब्ल्यू.टी.ओ.की वजह से नुकसान हो रहा है, वह चिन्ता भी सही नहीं है। क्या आप समझते हैं कि डब्ल्यू.टी.ओ. नहीं होता, तो क्या अमरीका अपने किसानों को सबसिडी नहीं देता, क्या यूरोपियन यूनियन सबसिडी नहीं देती। बायलैटरल एग्रीमेंट तब भी करते। अब कम से कम १४४ देश एक जगह बैठकर आपस में बातचीत कर सकते हैं।

महोदय, अब जो नया राउंड शुरू हो रहा है उसके प्रति हम जागरुक हैं। हमने सब पार्टीज के किसान संगठनों की एक मीटिंग पिछले महीने बुलाई थी जिसमें हमने उन्हें बताया था कि अगले डब्ल्यू.टी.ओ. के राउंड में हमारा क्या स्टेंड होना चाहिए। हमने हर प्रदेश के कृषि मंत्री को भी बुलाया था और उनसे भी पूछा था कि हमारा क्या स्टेंड होना चाहिए। एक कंसैंसस हमने पैदा किया है। जो यह नया राउंड शुरू होने वाला है उसमें हम पूरी कोशिश करेंगे कि किसानों के हितों की रक्षा के लिए हमारे पास जो भी हथियार हैं,…( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह:मंत्री जी, इसमें मेरा एक सुझाव है कि इसके लिए एक जाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी का गठन हो जाए, तो बेहतर होगा। जाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी भी अपनी रिपोर्ट दे देगी।

श्री अजित सिंह : मेरे ख्याल से कामर्स मनिस्ट्री की पार्लियामेंट्री स्टेंडिंग कमेटी है, एक संसदीय सलाहकार समति भी है। वहां पर इस विषय में जरूर डिसकशन हुआ होगा। यदि नहीं हुआ है, तो मैं कामर्स मनिस्टर साहब से निवेदन करूंगा कि वहां इस बारे में डिसकशन हो क्योंकि वहां सभी पार्टियों के माननीय सदस्य होंगे।

हमने सब पार्टियों और सब प्रदेश सरकारों से इस बारे में बातचीत की है और इसे हम जारी रखेंगे क्योंकि यह डिसकशन बहुत लम्बा है और इसमें ज्यादा समय लग सकता है। जो हथियार हमारे पास हैं- टैरिफ बाउंड रेट्स के, कस्टम डयूटीज के, एस.पी.एस. के, इनको इस्तेमाल कर के हम किसानों को बचाए रखेंगे और अभी तक बचाया है।

महोदय, यह लोगों की धारणा है कि बहुत इम्पोर्ट होने लगा है। मेरे पास बिजनैस एग्रीकल्चर ट्रेड बैलेंस के आंकड़े हैं। १९९०-१९९१ से २००१-२००२ तक हर वर्ष वह हमारे पक्ष में रहा है। कभी २० हजार करोड़ रुपए भी हो गया है और कभी ६ हजार करोड़ रुपए भी रहा है। कभी एग्रीकल्चर इम्पोर्ट बढ़े भी हैं और कभी घटे भी हैं, लेकिन यह कहना सही नहीं है कि डब्ल्यू.टी.ओ. पर हस्ताक्षर करने के बाद से हमारे इम्पोर्ट बढ़ते ही चले गए हैं क्योंकि १९९५-९६ में करीब-करीब ६ हजार करोड़ था, १९९९ में १२ हजार करोड़ रुपए था और २००१-२००२ में अनुमानित १६ हजार करोड़ रुपए है और अगले साल और बढ़ेगा। वर्ष २००१-२००२ के अभी फायनल फिगर्स नहीं हैं, लेकिन हमें आशा है कि हमारा इम्पोर्ट ३० हजार करोड़ रुपए होगा। इस प्रकार से देखें तो बैलेंस आफ पेमेंट हमारे फेवर में है।

महोदय, बहुत लोगों को चिन्ता है कि सेब विदेश से बहुत आ रहा है। यहां दिल्ली में लोग देखते हैं कि बड़े-बड़े बाजारों में सेब आ रहा है, लेकिन उसको खरीदने वाले बहुत कम हैं। कुछ ही लोग उसे खरीदते हैं। कुछ लोग तो जब यहां नहीं मिलता तब बाहर से भी मंगाते हैं। आम लोग तो क्या आप और हम भी उसे नहीं खरीदते। जो पिछले साल के फीगर्स हैं, २ जुलाई के फिगर्स से यदि हम उन्हें कंपेयर करें तो फ्रूट्स एंड नट्स का इम्पोर्ट कम हुआ है, बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। वहबहुत कम संख्या में आ रहा है। जितनी संख्या में हम सेब पैदा करते हैं, अगर आप इम्पोर्ट की क्वांटिटी देखें तो वह नेगलीजिबल है। मैं कहना चाहूंगा कि डब्ल्यू.टी.ओ. से हमें फायदे की जो संभावनाएं थीं, वे नहीं हुईं। लेकिन डब्ल्यू.टी.ओ. से कोई बहुत बड़ा नुकसान हो गया है, यह चिंता माननीय सदस्यों को अपने दिल से निकाल देनी चाहिए। यह जरूर है कि अब नये राउंड में जो डिसकशन होने जा रही है, उसमें हमें सावधान रहना है कि हमने अपने किसानों को बचाने के लिए जो प्रावधान डब्ल्यू.टी.ओ. में किये है, उनको किस तरह से बरकरार रखें। यह चिंता हमको है। इसके लिए हमने आप सबके सुझाव भी मांगे हैं। जैसे-जैसे डिसकशन होगा, ये लंबे डिसकशन होंगे, वहां डिसीजन कन्सेन्सस से होते हैं, मैजोरिटी या माइनोरिटी नहीं होते हैं, हम इस संबंध में आपको अवगत कराते रहेंगे और आपसे सुझाव भी लेते रहेंगे।

अंत में मैं यही कहूंगा कि किसानों की समस्या आज पूरे देश में है। …( व्यवधान)वह प्रस्ताव भी मिला है कि एक बाक्स फूड सिक्योरिटी का भी होना चाहिए। …( व्यवधान)फसल बीमा योजना के बारे में कई सदस्यों ने सवाल उठाये हैं। आज फसल बीमा योजना १९ राज्यों और दो यूनियन टैरीटिरीज में लागू है। मैं कहना चाहूंगा कि बहुत सी राज्य सरकारों ने इसका फायदा उठाया है। अभी तक हमने जितना पैसा दिया है, जितना इंश्योरेंस का प्रीमियम मिला है, उससे कहीं ज्यादा पैसा राज्य सरकारों ओर केन्द्र सरकार ने किसानों को देने का काम किया है, जहां यह इंश्योरेंस स्कीम लागू हुई है। लेकिन साथ ही मैं यह भी मानूंगा कि इसमें अभी बहुत कमी है, जैसे पूरा एरिया तालुका का है, उसमें वह प्रावधान है। …( व्यवधान)मैं जानता हूं और उसमें प्रावधान है कि अगले दो-तीन साल में हम उसको पंचायत लैवल पर लायेंगे। हमारे पास टेक्नोलॉजी भी ऐवेलेबल है कि हम उसे प्रति एकड़ भी ला सकते हैं क्योंकि हमारे पास सेटेलाइट्स है, इमेजरी है, सब कुछ है।

कुंवर अखिलेश सिंह: अगर आप प्रति एकड़ ला दें तो किसान का भला हो जायेगा।

श्री अजित सिंह : हमारे पास टेक्नोलॉजी है। …( व्यवधान)मैंने कहा कि इसकी टेक्नोलॉजी तो है लेकिन उसकी इकोनामिक्स का भी आपको ध्यान रखना चाहिए। खरीफ फसल के लिए तो टेक्नोलॉजी भी काम नहीं करने वाली है क्योंकि वहां बादल वगैरह बहुत रहते हैं। इंश्योरेंस स्कीम का फायदा बहुत से प्रदेशों, खासकर उड़ीसा, आंध्रा प्रदेश, गुजरात जहां कई सालों से प्राकृतिक आपदायें आती रही हैं, ने भी उठाया है। इसमें इस समय जो कमियां हैं, उसको हम समझ रहे हैं। …( व्यवधान)

श्री प्रबोध पण्डा (मिदनापुर):स्टेट का प्रीमियम पहले वन थर्ड था लेकिन अब फिफ्टी-फिफ्टी हो गया है। …( व्यवधान)

श्री अजित सिंह : इंश्योरेंस स्कीम में अभी यह प्रावधान है कि ५० परसेंट किसान और ५० परसेंट में आधा-आधा केन्द्र सरकार और प्रदेश सरकार प्रीमियम दे लेकिन जो पैमेंट है, उसमें प्रदेश सरकार और केन्द्र सरकार का बराबर हिस्सा है। प्रीमियम के पैमेंट में जैसा मैंने अभी कहा कि जो प्रावधान है, उसे हम धीरे-धीरे कमर्शियल लैवल पर लाना चाहते हैं जिससे कि जो इंश्योरेंस करा है, उसी को उसका भार उठाना पड़े। इसमें जितने सुधार की जरूरत है, फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि जहां प्राकृतिक आपदायें आती रही हैं लेकिन वहां इसका फायदा किसानों ने उठाया है। कई प्रदेश, जैसे राजस्थान में सूखे की स्थिति है, अगर इसका वे इंश्योरेंस करें। …( व्यवधान)

SHRI J.S. BRAR (FARIDKOT): Mr. Chairman, Sir, we would like to ask one or two questions after the hon. Minister’s reply is completed.

श्री सुनील खां : पहले जैसे स्टेट का वन थर्ड शेयर था लेकिन अब फिफ्टी-फिफ्टी हुआ है। इससे स्टेट को …( व्यवधान)

श्री अजित सिंह : आप प्रीमियम की बात कर रहे हैं या पैमेंट की बात कर रहे हैं। …( व्यवधान)

श्री सुनील खां : मैं प्रीमियम की बात कर रहा हूं। …( व्यवधान)

श्री अजित सिंह : प्रीमियम में अब यह प्रावधान है। उसमें धीरे-धीरे बढ़ता जायेगा। इस साल ६० परसेंट जो इंश्योर कर रहा है, उसे देना होगा और बाकी के ४० परसेंट में फिफ्टी-फिफ्टी परसेंट का हिस्सा है। प्रदेश सरकारों की चिंता प्रीमियम को लेकर नहीं है। प्रदेश सरकारों की चिंता है कि जब किसानों को पे करना पड़ेगा, किसान की जब फसल नष्ट हो जायेगी तो उसमें जो पैसा देना पड़ेगा, उसमें बहुत से प्रदेश सरकार अपनी वित्तीय परिस्थितियों के चलते हुए चिंतित हैं। उन्हें प्रीमियम के बारे में ज्यादा चिंता नहीं है, जैसा मैं कह रहा हूं कि कृषि प्रदेश का सब्जैक्ट है इसलिए आधी जिम्मेदारी उनको भी इसमें लेनी चाहिए।

श्री महेश्वर सिंह (मंडी): प्राकृतिक आपदा का संबंध है, उससे निपटने के लिए सरकार ने प्रावधान किया है। प्रांतों में जो राजस्व मैन्युअल है, उनमें बहुत भिन्नता है। क्या मंत्री महोदय इस बात का प्रयास करेंगे कि जितने भी कृषि मंत्री आते हैं, उनसे चर्चा करके आप इसमें समानता लाने की कोशिश करें। …( व्यवधान)

श्री सुनील खां : डिस्ट्रीब्यूशन की जहां तक बात है, जैसे एक स्टेट को देते हैं, वैसे ही वैस्ट बंगाल को नहीं दिया।…( व्यवधान)पिछले साल वहां इतनी क्षति हो गई कि नौ डिस्टि्रक्ट बर्बाद हो गए। उसमें जैसे उसे चौदह सौ कुछ करोड़ रुपये मिलने थे, वे नहीं मिले।…( व्यवधान)वैसे भी डिस्क्रिमिनेशन हो रहा है। जहां तक दूसरे स्टेट्स की बात है, वे ज्यादा देते हैं। इसके बारे में थोड़ा बताइए।…( व्यवधान)

श्री अजित सिंह : ये आरोप पिछले छ: महीने से काफी लग रहे हैं कि प्राकृतिक आपदा में राजनीति हो रही है। मैं कहना चाहूंगा कि प्राकृतिक आपदा के लिए जो प्रावधान बनाए गए हैं, वे इलैवन्थ फाईनैंस कमीशन द्वारा बनाए गए हैं, केन्द्र सरकार द्वारा नहीं बनाए गए हैं और उसमें जो मापदंड हैं, उसकी सहमति प्रदेश सरकारों से लेने के बाद ही, निश्चित सलाह लेने के बाद ही की गई है।…( व्यवधान)

श्री सुनील खां : यह सही नहीं है।

श्री अजित सिंह : अगर आप मुझे अलग से आकर बताएं तो मैं आपकी बात जरूर सुनुंगा। आप अपनी खबर दीजिए लेकिन जहां तक हमारी जानकारी है, यह प्रावधान इलैवन्थ फाईनैंस कमीशन ने बनाया था। स्टेट्स प्राकृतिक आपदा में जो डिमांड करते रहे हैं, उनमें बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो उन मापदंडों के बाहर हैं। हम यहां से टीम भेजते हैं, वे मापदंड के अनुसार तय करते हैं और प्रदेश सरकारों को प्राकृतिक आपदा के लिए हर साल जो पैसा दिया जाता है, मैं कहना चाहूंगा, बहुत सी सरकारों ने अभी उस पैसे को खर्च नहीं किया है। यह भी हो सकता है कि उन्होंने खर्च कर दिया हो लेकिन वे हमारे पास रिपोर्ट नहीं भेजते हैं। जब तक उसका यूटीलाइजेशन सर्टीफिकेट नहीं आ जाए, हम नेशनल कंटींजैंसी फंड से पैसा नहीं दे सकते। अभी हमने जो दो हजार करोड़ रुपये सूखे की वजह से प्रदेश सरकारों को दिया है, उसमें बहुत सा पैसा अभी कैलेमिटी रिलीफ फंड में प्रदेश सरकारों के पास है।…( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह:उसकी मौनीटरिंग भी करवाइए कि वह पैसा सही जगह पर खर्च हो रहा है या नहीं। राज्य सरकारें उस पैसे को सही जगह खर्च कर रही हैं या नहीं।…( व्यवधान)

श्री अजित सिंह : हम नीतियों और किसानों की परिस्थितियों की बात कर रहे थे लेकिन वैस्ट बंगाल के माननीय सदस्य ने जो सवाल उठाया है कि उनको मदद नहीं मिलती, पिछले दो सालों में उन्होंने प्राकृतिक आपदा के अंदर मदद की मांग ही नहीं की। इसलिए यह कहना कि हम उनको मदद नहीं दे रहे हैं, उचित नहीं है।…( व्यवधान)

श्री सुनील खां : यह सही नहीं है।

श्री अजित सिंह : आप आइए, मैं आपसे बात करूंगा। अगर आप कह रहे हैं कि सही नहीं है, अगर आपके पास डॉक्यूमैंट हैं, अगर स्टेट गवर्नमैंट कहती है कि हमने मांग की थी और हमें कोई मदद नहीं की गई तो हम आपकी मदद जरूर करेंगे। यह आपदा बहुत बड़ी है, इसमें कोई राजनीति करने की जरूरत नहीं है। मैं फिर कहना चाहूंगा कि हमारे पास कोई इम्प्लीमैंटिंग एजैंसी या कोई मौनीटरिंग एजैंसी नहीं है। जो हमारा संविधान है, उसमें प्रदेश सरकारों का अधिकार है। यह हमने जरूर किया है कि इसके लिए अलग ऐकाउंट खोला जाए जिससे उस पैसे का दुरुपयोग न हो। जहां तक हम कोशिश कर सकते हैं, की है लेकिन उसका खर्च किस तरह हो, यहां किस तरह रिपोर्ट भेजी जाए, उसका आकलन हम जरूर करते हैं। लेकिन जो प्रदेश सरकारों के अधिकार हैं, माननीय सदस्य यह न कहें कि हम यहां मौनीटरिंग करें या कौन कैसा काम कर रहा है, उसे देखने का काम करें।…( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह:मैंने इसलिए कहा कि केन्द्र जिस मद में पैसे दे रही है…( व्यवधान)मैं जानकारी के आधार पर कहना चाहता हूं कि राज्य उस पैसे का दुरुपयोग कर रहे हैं और उनको सही तरीके से खर्च नहीं कर रहे हैं।…( व्यवधान)

श्री अजित सिंह : हम हरेक मुख्य मंत्री और कनसन्र्ड मनिस्टर्स को बार-बार लिखते रहते हैं, बार-बार यहां मीटिंग बुलाते हैं, उनको बताते हैं कि यह प्रावधान है, इसमें पैसा खर्च होना चाहिए। हम उनसे रिक्वैस्ट करते हैं। हमने यह भी लिखा था कि माननीय संसद सदस्यों की एक मौनीटरिंग कमेटी भी डिस्टि्रक्टवाइज़ बनाइए। लेकिन इस सबको लागू करने का काम प्रदेश सरकारों का है।…( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह:आप उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। उत्तर प्रदेश में ही लागू नहीं हो रहा है।…( व्यवधान)

श्री अजित सिंह : मैं आखिर में कहना चाहूंगा कि जिन समस्याओं की आज चर्चा हुई है, इसमें हरेक पार्टी के सदस्यों ने समस्या बताई है, अपने तरीके से कहीं न कहीं समाधान भी बताया है लेकिन इस प्रश्न पर सब सहमत हैं कि यह समस्या बहुत बड़ी है। आगे पांच-दस सालों में क्या होगा, यह चिन्ता जताई है। कृषि की परिस्थितियां बदल रही हैं। इन बदलती परिस्थितियों में किस तरह हम उनकी मदद कर सकते हैं। मैं सब पार्टियों का सहयोग भी चाहता हूं। हरेक स्टेट में अलग पार्टी की सरकार भी है, इसलिए उनके सहयोग की भी जरूरत है। चेयरमान साहब, आपने मुझे इतना समय दिया, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

कुंवर अखिलेश सिंह : सभापति महोदय, कृषि मंत्री जी ने गन्ना किसानों के सवाल पर कुछ नहीं कहा।ह्ल( व्यवधान) उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान अपनी समस्या से जूझ रहे हैं।...( व्यवधान)

श्री अजित सिंह : गन्ना के किसानों की बहस लोक सभा और राज्य सभा दोनों में हो चुकी है। उनकी चर्चा हो चुकी है, सब बातें हो चुकी हैं।...( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह:चूंकि कृषि मंत्री जी ने गन्ना किसानों की समस्या पर एक शब्द भी नहीं बोला, इसलिए हम और हमारी पार्टी सदन का बहिर्गमन करती है।

१९.३५ hrs.     (Kunwar Akhilesh Singh and some other hon. Members then left the House)   SHRI H.D. DEVE GOWDA (KANAKPURA): I do not want to take much time of the House. I know the difficulty the hon. Minister of Agriculture is facing. The only issue is, there is no coordination between the Ministries of Finance, Commerce and Agriculture. It is not an allegation which I want to make. There is no coordination between these three Ministries which are vital to safeguard the interest of the farmers.

The Ministry of Commerce had recommended to reverse the proposal so as to have import duty from 30 per cent to 40 per cent. The Commerce Minister, Shri Maram had himself told it but the Ministry of Finance did not accept that. It does not mean that you have no interest in it. I heard your speech very patiently. I do not want to make a speech here. Will the Government come forward to accept the proposal made by the Ministry of Commerce on import of raw silk? Why have they brought it down? What was the import duty during the last year? In the same House the Commerce Minister had told that a proposal in this regard had been sent. You may not be able to answer it right now. I would say that there is no coordination between these three Ministries.

I met the hon. Prime Minister in a delegation. Fortunately, you are also equally concerned with the problems of the farmers. I will not walk out of the House or blame you. When I initiated the debate, I told that politics should not be brought in here. Everybody, who spoke in the House, showed concern for the farmers. When I demanded of the Prime Minister to waive the penal interest on all types of loans - whether it is bank loan or cooperative society’s loan - for the current year, the hon. Minister of Agriculture supported this idea and told that the matter was under consideration of the Government. He had told that a proposal was already there before the Government and the Cabinet would take a decision on it. I do not want to mix politics here. Will the Government take a final decision to waive the interest and the penal interest, at least for this year, for all the farmers? There is no question of selecting this or that crop. Almost all the crops, whether it is horticulture, plantation crop or traditional crop, are affected. All farmers are suffering due to so many reasons. I do not want to list those reasons here. You, yourself, have made a suggestion. There must be a powerful lobby for the farmers. Fortunately, all Members cooperated in this. Will the Minister pursue the matter and take up the issue with the hon. Prime Minister? He is not here. I know he has gone to Gujarat. Will the proposal before the Cabinet be considered and for this year at least one-time concession be given to the farmers for the commercial bank loans, nationalised bank loans or cooperative societies’ loans?

The last point is regarding the tobacco growers. In Karnataka, they have to pay penalty for the first time. I am unable to understand this. If there is excess growth of any crop, will they have to pay penalty? They have given Rs.15 crore as penalty for having grown excess tobacco. It is one of the best quality tobacco. I pleaded before yourself as also the hon. Prime Minister to waive this as it is not proper. This matter has to be considered. I raised this issue. That is why, I said that inter-Ministerial coordination is not there. There is no need to constitute a separate committee. I am not going to demand for it. Is there any coordination among these three Ministries? Will there be any concrete decision on the proposal sent by the Ministries of Commerce or Textiles or Agriculture. I do not know whether this Government functions in a very cooperative manner and with a proper understanding among the Ministries. I do not know this because things are going on as there is no Opposition. It is also divided. They have all gone. Nobody is interested. There is no question of blaming the people. They are suffering. What can you or I do? You are also a son of a farmer and I am also a son of a farmer.

So please clarify these three issues. One is regarding penalty for unlicensed crop. That should be removed. The purchase of 16 lakh tonnes of tobacco – licensed or unlicensed – should be made this year. The import duty should be reduced from 40 per cent to 30 per cent as proposed by the Ministry of Commerce. Are they going to accept it? Are you going to waive the penal interest on all loans? These are the suggestions. They are before the Cabinet.

श्री अजित सिंह : जहां तक आपने कोआर्डिनेशन की बात उठाई है, उसके लिए कमेटी आफ सेक्रेट्रीज है, जिसके कामर्स सेक्रेट्री हैड होते हैं। उस कमेटी में एग्रीकल्चरल मनिस्ट्री के सेक्रेट्री और अदर्स भी होते हैं। जब भी कस्टम डयूटी की बात आती है, उसके सुझाव आते हैं, तो वह कमेटी उसको कंसिडर करती है। ऐसा नहीं है कि उसमें कोआर्डिनेशन नहीं है। जहां तक सैरीकल्चर का सवाल है, वह टैक्सटाइल मनिस्ट्री के अंदर आता है। हो सकता है उन्होंने यह सवाल उठाया भी हो। ऐसा नहीं है कि फाइनेंस मनिस्ट्री अलग काम कर रही है, कामर्स मनिस्ट्री अलग काम कर रही है। जो कस्टम डयूटी का सवाल है, हम वाच कर रहे हैं, उसमें हरेक मंत्रालय के प्रपोजल आते हैं। कमेटी आफ सेक्रेट्रीज तय करती है और अगर जरूरत पड़ती है तो उसके ऊपर भी उठाया जाता है।

श्री जे.एस. बराड़ : सभापति महोदय, मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं। चौधरी अजित सिंह जी ने सारे सवालों के जवाब दे दिए हैं, कांग्रेस पार्टी की तरफ से मैंने इस डिबेट में इनीशिएट किया था, मैं संक्षेप में दो बातें पूछना चाहूंगा। पहली बात तो यह है कि मंत्री जी ने राज्यों के काफी अहम मुद्दों पर पोजटिव और नेगेटिव आस्पेक्ट का जिक्र किया है। पंजाब ने २८,००० एकड़ डाइवर्शन का प्रोजेक्ट बनाया है। उसमें केन्द्र सरकार क्या कोई मदद देगी या नहीं?दूसरी बात यह है कि जैसा मैंने अपनी स्पीच में भी ६००० करोड़ रुपए से ऊपर का मुद्दा उठाया था कि पंजाब को इतनी राशि का नुक्सान ड्राउट से हुआ है। उसमें एक नया पैसा भी केन्द्र सरकार की तरफ से मदद के तौर पर नहीं मिला है। इस सम्बन्ध में एग्रीकल्चर मनिस्टर साहब के पास मेमोरंडम है और वहां सेंट्रल टीम ने भी दौरा किया है। क्या पंजाब को उसका हक मिलेगा या नहीं ?

SHRI K.H. MUNIYAPPA (KOLAR): Sir, the former Prime Minister has put some important questions relating to silk and other crop producers of Karnataka as also regarding waiving the interest. All these are very important and vital points. I hope he will consider them.

I would like to ask one more question. Most of the States in this country are facing drought. It is not Karnataka or Bihar or Andhra Pradesh or Uttar Pradesh alone. For this problem, a comprehensive programme has to be prepared for six months. There is drinking water problem in most of the villages of Karnataka. The Food for Work Programme is there. It is because they have not been able to sow even 20 per cent seeds in the whole State.

People of the entire State are suffering on account of no ‘food for work’ programme and also due to drinking water problem. Earlier, the Chief Minister had requested for eight lakh tonnes of foodgrains. The hon. Minister visited Karnataka and after witnessing the situation himself, released two lakh tonnes of foodgrains. This quantum has already been utilised. Thereafter, after studying the situation, the Government of Karnataka made a request for twenty lakh tonnes of foodgrains. But till today nothing has been released.

May I know from the hon. Minister what is the programme for the country for another six months to save the farmers and the workmen? Talking particularly about Karnataka, when are you going to release the foodgrains? Your concern regarding the farmers’ problems is well known. You have made your commitment to do something for the farmers. The entire Congress Party is with you in the interest of the farmers. We have to form a farmers’ forum in Parliament to fight out the issues and find a solution to their problems. I hope the Chairman also is all for forming a farmers’ forum in Parliament. Then only we can solve their problems.

SHRI S. MURUGESAN (TENKASI): The hon. Minister has not touched the problem being faced by farmers in the Tamil Nadu Cauvery delta. They are very much affected. We want a reply from the Minister on this issue.

श्री अजित सिंह : सभापति महोदय, सूखे के बारे में अलग से बहस हो चुकी थी लेकिन फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि जैसे पंजाब के हमारे माननीय सदस्य ने सवाल उठाया है कि पंजाब को कोई मदद नहीं मिली है, जो बीस रुपये प्रति क्िंवटल हमने पैडी का दाम बढ़ाया था, जहां प्रोक्योरमेंट होता है, उन स्टेट्स में क्योंकि किसानों की इनपुट कॉस्ट बढ़ गई थी, इसीलिए बढ़ाया गया था। हो सकता है कि जितनी मदद आप ओवरऑल चाहते थे, वह नहीं हो पाई लेकिन यह न कहिए कि सूखे की वजह से इनपुट कॉस्ट किसान की बढ़ गई थी, जो पंजाब के किसान ने मेहनत करके सिंचाई के लिए बिजली का इस्तेमाल किया, इसलिए उसकी इनपुट कॉस्ट बढ़ गई थी। इसीलिए हमने सिर्फ एक साल के लिए सूखे की वजह से बीस रुपये प्रति क्िंवटल दाम बढ़ाया है।

जहां तक डाइवर्सफिकेशन का सवाल है, हम सब स्टेट्स को कह रहे हैं कि डाइवर्सफिकेशन करो और भी लोगों से बातचीत हुई है तथा जल्दी हम बातचीत करेंगे। वित्तीय सहायता हम कितनी किस स्टेट को दे सकते हैं, यह अलग सवाल है। लेकिन डाइवर्सफिकेशन में बहुत सी योजनाएं यहां से चला रहे हैं। इसीलिए हमने पिछले कई सालों में मस्टर्ड का प्रोक्योरमेंट दाम काफी बढ़ाया है। इसीलिए हमने भंडारण की योजना चलाई हुई है। कोल्ड स्टोरेज में हम मदद कर रहे हैं जिससे वृद्धीकरण में मदद मिल सके।

जहां तक कावेरी की जो आपकी समस्या है, उसमें कावेरी का ट्राईब्यूनल भी है। उसमें सुप्रीम कोर्ट भी इंवाल्व है। मैं माननीय सदस्य से कहना चाहूंगा कि तमिलनाडु एक ऐसी स्टेट है जिसको सूखे में इंटर मनिस्ट्रीयल ग्रुप ने ज्यादा पैसा दिया है। उस सिफारिश से ज्यादा पैसा दिया है जो वहां पर सेंट्रल टीम ने की थी। तमिलनाडु एक अकेली स्टेट है जिसमें सेंट्रल टीम ने जो रिकमेंडेशन की थी, इंटर मनिस्ट्रीयल ग्रुप ने कहीं न कहीं उसको काटा है लेकिन तमिनलाडु को ज्यादा पैसा दिया गया है।…( व्यवधान)कर्नाटक में जो अभी तक मदद हमने की है, वह ३१ जनवरी तक है। उसके बाद हम विचार करेंगे और जहां तक अन्न की और जरुरत है, टास्क फोर्स की बात है, जैसे-जैसे और कोई रिक्वेस्ट आएगी, जैसे अभी उनकी आई थी, उतना हमने अन्न दे दिया है और कोई रिक्वेस्ट जिस किसी स्टेट से आएगी, टास्क फोर्स मिलेगी औऱ उस पर विचार करेगी।

MR CHAIRMAN: Now the House stand adjourned till Eleven of the Clock tomarrow.

19.48 hrs. The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Tuesday, 10th December, 2002/Agrahayana 19, 1924(Saka)        

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