State Consumer Disputes Redressal Commission
I.C.I.C.I Bank Ltd. vs Deepak Verma on 9 August, 2023
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/538/2021 ( Date of Filing : 25 Oct 2021 ) (Arisen out of Order Dated 10/09/2021 in Case No. C/2018/45 of District Hapur) 1. I.C.I.C.I Bank Ltd. Shalimar Tower M.G. Hajratganj Lucknow ...........Appellant(s) Versus 1. Deepak Verma S/o Sri Omveer Singh R/o House No. 102 Raghuveer Ganj Dist. Hapur ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. JUSTICE ASHOK KUMAR PRESIDENT PRESENT: Dated : 09 Aug 2023 Final Order / Judgement
राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।
(मौखिक) अपील संख्या:-538/2021 आई0सी0आई0सी0आई0 बैंक लिमिटेड, शालीमार टावर, एम0जी0, मार्ग, हजरतगंज लखनऊ-226001, जिसकी एक शाखा हापुड़ गढ़ रोड, जिला हापुड़ द्वारा ऑथराइज्ड सिग्नेचरी।
........... अपीलार्थी/विपक्षी बनाम दीपक वर्मा पुत्र श्री ओमवीर सिंह, निवासी मकान नं0-102, रघुवीर गंज, जिला हापुड़।
........ प्रत्यर्थी/परिवादी समक्ष :-
मा0 न्यायमूर्ति श्री अशोक कुमार, अध्यक्ष अपीलार्थी की अधिवक्ता : श्रीमती सुचिता सिंह प्रत्यर्थी के अधिवक्ता : कोई नहीं।
दिनांक :- 09.8.2023 मा0 न्यायमूर्ति श्री अशोक कुमार , अध्यक्ष द्वारा उदघोषित निर्णय प्रस्तुत अपील, अपीलार्थी/ आई0सी0आई0सी0आई0 बैंक लिमिटेड द्वारा इस आयोग के सम्मुख धारा-41 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के अन्तर्गत जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, हापुड़ द्वारा परिवाद सं0-45/2018 में पारित निर्णय/आदेश दिनांक 10.9.2021 के विरूद्ध योजित की गई है।
संक्षेप में वाद के तथ्य इस प्रकार है कि प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा दिनांक 30.4.2014 को 1,98,776.00 का गोल्ड लोन अपीलार्थी/विपक्षी से लिया गया था। प्रत्यर्थी/परिवादी को कस्टमर आई0डी0 नम्बर-541825300 व खाता सं0-245805000121 है। उपरोक्त गोल्ड लोन के विरूद्ध अपीलार्थी/विपक्षी द्वारा प्रत्यर्थी/परिवादी के सोने की तीन चूडियॉ वजनी 47.4 ग्राम तीन हार वजनी 71.2 ग्राम दो कानों के कुण्डल वजनी 7.4 ग्राम व 01 चैन वजनी 9.4 ग्राम अर्थात कुल 09 नग वजनी -2- 135.04 ग्राम गिरवी रखा था। उपरोक्त ऋण प्रत्यर्थी/परिवादी को 14 प्रतिशत साधारण ब्याज की दर से दिनांक 30.4.2016 तक अदा करना था एवं उपरोक्त तिथि पर प्रत्यर्थी/परिवादी, अपीलार्थी/विपक्षी के पास गया और उपरोक्त अदा करने वाली धनराशि के बारे में मालूम किया जो प्रत्यर्थी/परिवादी को बताया गया कि बैंक क सर्वर डाउन है और प्रत्यर्थी/परिवादी को पुन: बैंक आने को कहा, तत्पश्चात अक्टूबर, 2016 में प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा पुन: अपीलार्थी/विपक्षी से सम्पर्क किया तब भी अपीलार्थी/विपक्षी द्वारा वाजिब धनराशि के बारे में अवगत नहीं कराया गया। तीसरी बार दिसम्बर, 2016 में उपरोक्त ऋण की अदायगी के लिए बंधक के रूप में रखे गये गोल्ड को मिलाकर गोल्ड लोन की रिकवरी कर ली गई एवं नीलामी करने से पूर्व अपीलार्थी/विपक्षी द्वारा न तो प्रत्यर्थी/परिवादी को किसी संचार माध्यम से और न ही किसी लिखित सूचना के द्वारा अवगत कराया कि प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा बंधक के रूप में रखे गये गोल्ड की नीलामी करके गोल्ड लोन को वसूल कर लिया जायेगा। प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा गोल्ड लोन अदा करने के लिए कभी मना नहीं किया गया प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा बन्धक के रूप में रखे गये गोल्ड को नीलाम करके अपीलार्थी/विपक्षी द्वारा प्रत्यर्थी/परिवादी के साथ अमानत में खमायत व धोखाधड़ी तथा सेवा प्रदान करने में असावधानी बरती गई है एवं बंधक के रूप में रखा गया गोल्ड प्रत्यर्थी/परिवादी व उसकी पत्नी को शादी के अवसर पर गिफ्ट के रूप में मिला था जिससे प्रत्यर्थी/परिवादी व उसकी पत्नी को विशेष लगाव था एवं अपीलार्थी/विपक्षी के अपकृत्य से प्रत्यर्थी/परिवादी को मानसिक वेदना व संताप हुआ है जिसकी क्षतिपूर्ति के लिए विपक्षी जिम्मेदार है उक्त के सम्बन्ध में प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा विभिन्न तिथियों पर अपीलार्थी/विपक्षी को अवगत कराया गया इसके बावजूद अपीलार्थी/विपक्षी यह बताने के -3- लिए तैयार नहीं है कि कितनी धनराशि नीलामी के समय प्रत्यर्थी/परिवादी पर वाजिब थी और कितनी धनराशि में प्रत्यर्थी/परिवादी के बंधक के रूप में रखे गये गोल्ड को नीलाम किया गया, अत्एव क्षुब्ध होकर परिवाद जिला उपभोक्ता आयोग के सम्मुख प्रस्तुत किया गया है।
अपीलार्थी/विपक्षी की ओर से जिला उपभोक्ता आयोग के सम्मुख प्रतिवाद पत्र प्रस्तुत कर परिवाद पत्र के कथनों से इंकार किया गया तथा यह कथन किया गया कि प्रत्यर्थी/परिवादी को ऋण सुविधा के लिए लागू नियमों और शर्तों के बारे में विधिवत सूचित किया गया था एवं प्रत्यर्थी/परिवादी के अनुरोध स सहमति पर 14 प्रतिशत ब्याज की दर पर 1,98,000.00 रू0 ऋण सुविधा गिरवी रखी, जिसकी संख्या-09 थी एवं वजन 135.4 ग्राम था, जिसकी परिपक्वता और चुकौती तिथि दिनांक 30.4.2016 पर प्रत्यर्थी/परिवादी सहमत था। यह भी कथन किया गया है कि गिरवी रखे गये सोने के आभूषण की नीलामी उचित सूचना के बाद की गई, जो प्रत्यर्थी/परिवादी की जानकारी में थी। यह भी कथन किया गया कि परिवाद सोच समझकर एवं अपीलार्थी/विपक्षी को परेशान करने के लिए प्रस्तुत किया गया है। अपीलार्थी/विपक्षी द्वारा न तो उपभोक्ता संरक्षण अधिनिमय के किसी प्रविधान का उल्लंघन किया गया है न ही कोई सेवा में कमी की गई है। प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा दिनांक 30.4.2016 तक कोई भुगतान नहीं किया है। यह भी कथन किया गया कि वर्ष-2016 में बैंक द्वारा दिनांक 06.5.2016 को हिन्दी व अंग्रेजी दोनों में डिमाण्ड नोटिस जारी किया गया, जिसमें प्रत्यर्थी/परिवादी को 15 दिन का और समय दिया गया था। यह भी कथन किया गया कि प्रत्यर्थी/परिवादी को ऑनलाईन नीलामी के बारे में सूचित किया गया था कि दिनांक 08.7.2016 को दोपहर 12.30 से 3.30 बजे तक गिरवी सोने के आभूषण की नीलामी बेवसाइट पर की जावेगी, साथ ही अंग्रेजी -4- व हिन्दी दैनिक अखबार आज व मेल टूडेय के दिनांक 28.6.2016 को गिरवी रखे सोने के आभूषण के नीलामी के संबंध में प्रकाशन करवाया गया तथा प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा कोई जवाब न देने पर अन्त में रू0 3,04,002.00 राशि के लिए गिरवी रखे गये। सोने के आभूषण की नीलामी की गई। अतिरिक्त राशि 70,287.00 रू0 प्रत्यर्थी/परिवादी के खाते में जमा है। यह भी कथन किया गया कि परिवाद असत्य एवं झूठे कथनों पर आधारित है, जो कि निरस्त होने योग्य है।
विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा उभय पक्ष के अभिकथन एवं उपलब्ध साक्ष्य पर विस्तार से विचार करने के उपरांत परिवाद को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निम्न आदेश पारित किया है:-
"परिवादी का वाद आंशिक रूप से स्वीकार किया जाता है तथा विपक्षी को निर्देशित किया जाता है कि वह परिवादी को उसके 09 स्वर्ण आभूषण वजन 135.4 ग्राम 18 कैरेट के आज दिनांक 10.9.2021 के बाजारू मूल्य में से वसूली राशि रू0 2,33,713.00 समायोजित कर शेष धनराशि आदेश के दिनांक से 30 दिन के अन्दर भुगतान कर दे तथा उक्त भुगतान पर आदेश की दिनांक से वास्तविक भुगतान की तिथि तक 06 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा। मानसिक व शारीरिक क्षतिपूर्ति हेतु रूपया 5,000.00 तथा वाद व्यय के रूप में 3,000.00 विपक्षी, परिवादी को अदा करें। विपक्षी के भुगतान करने में असफल रहने पर परिवादी जरिय विधिक प्रक्रिया भुगतान प्राप्त करने का अधिकारी होगा।'' जिला उपभोक्ता आयोग के प्रश्नगत निर्णय/आदेश से क्षुब्ध होकर अपीलार्थी/विपक्षी की ओर से प्रस्तुत अपील योजित की गई है।-5-
अपीलार्थी की विद्वान अधिवक्ता द्वारा कथन किया गया कि जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा पारित निर्णय/आदेश पूर्णत: तथ्य और विधि के विरूद्ध है।
यह भी कथन किया गया कि प्रत्यर्थी/परिवादी को ऋण के नियमों एवं शर्तों के बारे में विधिवत सूचित किया गया था और प्रत्यर्थी/परिवादी की सहमति के आधार पर 14 प्रतिशत ब्याज की दर से 1,98,000.00 रू0 ऋण सुविधा प्रदान की गई थी, जिसकी परिपक्वता/चुकौती तिथि दिनांक 30.4.2016 निश्चित थी।
यह भी कथन किया गया कि प्रत्यर्थी को एक वर्ष के अन्दर प्रश्नगत लोन की धनराशि मय ब्याज सहित रू0 2,25,000.00 की अदायगी अपीलार्थी बैंक को करनी थी, परन्तु प्रत्यर्थी द्वारा उपरोक्त आभूषण के सम्बन्ध में ऋण की अदायगी नहीं की गई और न ही अपीलार्थी बैंक से कोई सम्पर्क किया गया।
यह भी कथन किया गया कि गिरवी आभूषण के संबंध में प्रत्यर्थी द्वारा दिनांक 30.4.2016 तक कोई भुगतान नहीं किया गया, तत्पश्चात वर्ष-2016 में अपीलार्थी बैंक द्वारा हिन्दी व अंग्रेजी भाषा में डिमाण्ड नोटिस प्रत्यर्थी/परिवादी को जारी किये गये, जिसका कोई जवाब प्रत्यर्थी द्वारा नहीं दिया गया। यह भी कथन किया गया कि गिरवी रखे गये सोने के आभूषण की नीलामी प्रत्यर्थी/परिवादी को दी गई उचित सूचना के बाद ही की गई है।
यह भी कथन किया गया कि प्रत्यर्थी/परिवादी को ऑनलाइन नीलामी के बारे में सूचित किया गया था कि दिनांक 08.7.2016 को दोपहर 12.30 से 3.30 बजे तक गिरवी सोने के आभूषण की नीलामी बेवसाइट पर की जावेगी। यह भी कथन किया गया कि अतिरिक्त -6- धनराशि रू0 70,000.00 अपीलार्थी बैंक प्रत्यर्थी को देने के लिए तैयार है।
अपीलार्थी की अधिवक्ता द्वारा यह भी कथन किया गया कि प्रत्यर्थी द्वारा अनुचित लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से गलत एवं असत्य कथनों के आधार पर परिवाद प्रस्तुत किया गया है।
यह भी कथन किया गया कि अपीलार्थी द्वारा किसी प्रकार की सेवा में कमी नहीं की गई है, इसलिए अपील को स्वीकार कर जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा पारित निर्णय/आदेश को अपास्त किया जावे।
मेरे द्वारा अपीलार्थी की ओर से उपस्थित विद्वान अधिवक्ता श्रीमती सुचिता सिंह को विस्तार पूर्वक सुना गया तथा प्रश्नगत निर्णय/आदेश तथा पत्रावली पर उपलब्ध समस्त प्रपत्रों का अवलोकन किया गया।
मेरे द्वारा अपीलार्थी की विद्वान अधिवक्ता के कथनों को सुनने के पश्चात तथा विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा पारित प्रश्नगत निर्णय/आदेश एवं पत्रावली पर उपलब्ध समस्त अभिलेखों के परिशीलनोंपरांत यह पाया गया कि प्रत्यर्थी/परिवादी को उसके सोने के 09 आभूषण, जिनका वजन 135.4 ग्राम था, की नीलामी बकाया की वसूली हेतु सूचना प्राप्त हुई अथवा नहीं, इसका कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, जबकि नियमानुसार अपीलार्थी बैंक को नीलामी की सूचना प्राप्ति होने के बाद ही प्रत्यर्थी/परिवादी के सोने के आभूषण नीलाम करना चाहिए था।
यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि अपीलार्थी बैंक द्वारा नीलामी के बाद भी कोई सूचना प्रत्यर्थी/परिवादी को इस आशय की कि उसका आभूषण बकाया की वसूली हेतु नीलाम कर दिया गया है तथा नीलामी -7- की शेष राशि बैंक द्वारा समायोजित कर अवशेष राशि कितनी है, के सम्बन्ध में भी कोई सूचना देने का प्रमाण पत्रावली पर दाखिल नहीं है।
यह भी उल्लेखनीय है कि सोने के आभूषण की नीलामी की प्रक्रिया तथा नीलामी में भाग लेने वाले व्यक्ति तथा सोने की न्यूनतम बोली क्या निर्धारित की गई थी तथा कितने वजन के आभूषण की नीलामी की गई, ऐसा कोई कथन या प्रमाण अपीलार्थी बैंक द्वारा प्रस्तुत नहीं किया गया है। अपीलार्थी बैंक द्वारा नीलामी मीमो या उससे सम्बन्धित कोई प्रपत्र पत्रावली पर दाखिल नहीं किया गया है तथा उक्त नीलामी किन उच्च अधिकारियों द्वारा स्वीकृत की गई ऐसा भी कोई प्रमाण अपीलार्थी बैंक द्वारा दाखिल नहीं किया गया है।
यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि आभूषण की नीलामी के सम्बन्ध में जो प्रकाशन समाचार पत्रों में कराया गया उनका वितरण हापुड़ जिले में होने का स्पष्ट प्रमाण भी प्रस्तुत नहीं किया गया है, न ही नीलामी के दिन का सोने का मूल्य अथवा नीलामी में शामिल क्रेतागण के नाम भी उल्लिखित नहीं किये गये हैं।
अपीलार्थी की अधिवक्ता द्वारा इस तथ्य को भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि उपरोक्त नीलामी किस व्यक्ति के पक्ष में की गई तथा नीलामी के क्रेता/क्रेतागण का क्या नाम था, उपरोक्त कृत्य अपीलार्थी बैंक की दूषित मंशा को उजागर करता है तथा अपीलार्थी बैंक द्वारा जो नीलामी की प्रक्रिया अपनायी गई वह पारदर्शी प्रतीत नहीं हो रही है और इस कारण से नीलाम की प्रक्रिया दूषित है।
उपरोक्त समस्त तथ्यों पर विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा बिन्दुवार विस्तृत विवेचना करते हुए जो निर्णय/आदेश पारित किया गया है उसमें किसी प्रकार कोई अवैधानिकता अथवा विधिक त्रुटि -8- अपीलीय स्तर पर नहीं पायी गई, तद्नुसार प्रस्तुत अपील निरस्त की जाती है।
चूंकि अपीलार्थी बैंक द्वारा नीलामी की प्रक्रिया में लापरवाही की गई है, इसलिए अपीलार्थी बैंक का यह कृत्य सेवा में कमी की परिधि में आता है अत्एव उक्त के संबंध में अपीलार्थी बैंक, प्रत्यर्थी/परिवादी को हर्जाने के रूप में रू0 1,00,000.00 (एक लाख रूपये) की अदायगी हेतु उत्तरदायी है। साथ ही वाद व्यय के रूप में प्रत्यर्थी/परिवादी को अपीलार्थी/बैंक द्वारा रू0 20,000.00 (बीस हजार रूपये) की अदायगी भी की जावेगी।
अपीलार्थी को आदेशित किया जाता है कि वह उपरोक्त आदेश का अनुपालन 45 दिन की अवधि़ में किया जाना सुनिश्चित करें। अंतरिम आदेश यदि कोई पारित हो, तो उसे समाप्त किया जाता है। उपरोक्त समयावधि में धनराशि की अदायगी न किये जाने की दशा में अपील योजन की तिथि से भुगतान की तिथि तक प्रत्यर्थी/परिवादी को अपीलार्थी/विपक्षी बैंक द्वारा 10 प्रतिशत ब्याज भी देय होगा।
प्रस्तुत अपील को योजित करते समय यदि कोई धनराशि अपीलार्थी द्वारा जमा की गयी हो, तो उक्त जमा धनराशि मय अर्जित ब्याज सहित सम्बन्धित जिला उपभोक्ता आयोग को यथाशीघ्र विधि के अनुसार निस्तारण हेतु प्रेषित की जाए।
आशुलिपिक/वैयक्तिक सहायक से अपेक्षा की जाती है कि वह इस निर्णय/आदेश को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दें।
(न्यायमूर्ति अशोक कुमार) अध्यक्ष हरीश सिंह वैयक्तिक सहायक ग्रेड-2., कोर्ट नं0-1 [HON'BLE MR. JUSTICE ASHOK KUMAR] PRESIDENT