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Lok Sabha Debates

Shrimati Sushma Swaraj Raised A Discussion On Statement Made By Finance Minister ... on 27 August, 2011

> Title: Shrimati Sushma Swaraj raised a discussion on statement made by Finance Minister on issues relating to setting up of Lok Pal (Discussion concluded).

   

MADAM SPEAKER: Thank you, hon. Leader of the House.  The hon. Leader of the House, in his statement, has proposed certain issues for consideration by the House.  Is it the wish of the House that we may now immediately take up the discussion on the statement made by hon. Leader of the House?

SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.

MADAM SPEAKER: I would also request the House to allot time for this discussion.

कुछ माननीय सदस्य: महोदया, सब बोलेंगे।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Some time.

… (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Yes, but some time.

… (Interruptions)

अध्यक्ष महोदया : आप सब बैठ जाइए। आप सब से ही पूछ रहे हैं।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: I have requested the House to allot the time.  Please take your seats.  I am not deciding on it. 

… (Interruptions)

MADAM SPEAKER: I have requested the House.

… (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record.

(Interruptions) …* MADAM SPEAKER: Please take your seats.  Yes, Advani Ji.  Nothing else will go on record.

(Interruptions) …*   श्री लाल कृष्ण आडवाणी (गांधीनगर):  मुझे प्रसन्नता है कि सदन के नेता ने जो वक्तव्य सदन के सामने विचार के लिए रखा है, उसमें वह प्रश्न स्पष्ट रूप उल्लिखित है जिसके उत्तर के आधार पर श्री अन्ना हजारे अपना उपवास छोड़ें या न छोड़ें, यह अवलंबित रहेगा। इसलिए मेरा निवेदन है कि हम चर्चा दिन भर करें लेकिन आज शाम तक इसके बारे में सदन की राय...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बोलने दीजिए। आडवाणी जी खड़े हैं। आप बैठ जाइए। आडवाणी जी सुझाव दे रहे हैं।

…( व्यवधान)

श्री लाल कृष्ण आडवाणी : सदन की राय श्री अण्णा हजारे  जी तक पहुंचेगी तो आज ही वह निर्णय हो जायेगा। मैं आपसे निवेदन करूंगा कि अधिक से अधिक लोगों को समय दें और हम भी चाहेंगे कि सब लोग बोलें...( व्यवधान) लेकिन यह बात सही है कि लोक पाल विधेयक पर ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : श्री आडवाणी जी बोल रहे हैं, आप बैठ जाइये।

श्री लाल कृष्ण आडवाणी : लोक पाल विधेयक आगे बढ़ेगा और भ्रष्टाचार के विरुद्ध अनेक कदम उठाने पड़ेंगे। लेकिन आज की चर्चा बहुत सार्थक होगी, अगर उसके परिणामस्वरूप कल प्रधान मंत्री जी ने, विपक्ष ने, आपने और तीनों के द्वारा पूरे सदन ने जो अपील की है, उस अपील के उस उत्तर में श्री अण्णा हजारे अपना उपवास समाप्त करें।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : ऑनरेबल मिनिस्टर, आप बोलिये।

…( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद (सारण):मैडम, मेरी बात भी सुन ली जाए। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप इनके बाद बोलिये।

…( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद : आप एक मिनट मेरी बात सुन लें।

अध्यक्ष महोदया : लालू प्रसाद जी, आप इतना क्रोधित मत हुआ कीजिए। आप क्रोधित हुए बिना बोलिये।

श्री लालू प्रसाद : मेरी बात सुन ली जाए।

अध्यक्ष महोदया : हां, हम सुन रहे हैं।

श्री लालू प्रसाद : मैडम, प्रणव बाबू ने पूरे मूवमैन्ट पर सरकार के एटीच्यूड की हिस्ट्री बताई और अभी इनका कंक्लूडिंग रिमार्क आया कि संविधान और सुप्रीमेसी ऑफ पार्लियामैन्ट के दायरे में ही कोई बात होगी। हम जानना चाहते हैं कि क्या इनके बयान पर हम लोग डिस्कशन करें, अपनी राय दें और स्टैंडिंग कमेटी में या संविधान के दायरे में आने की जो बात हुई है, क्या सरकार यह वॉयलेट नहीं कर रही है?

अध्यक्ष महोदया : आप अभी समय की बात बताइये।

श्री लालू प्रसाद : मेरी बात सुनी जाए।

अध्यक्ष महोदया : आप फिर गुस्सा हो रहे हैं। आप इतना गुस्सा क्यों हो रहे हैं? आप समय के बारे में बताइये।

श्री लालू प्रसाद : जो मामला स्टैंडिंग कमेटी में हैं, उस कमेटी को बाइपास मत कराइये, बल्कि इस पर आप खुली बहस कराइये। आप वॉयलेट कर रहे हैं। स्टैंडिंग कमेटी में जो मैटर है और उस पर जिन्हें कुछ कहना है, वे स्टैंडिंग कमेटी में आकर कहें और जिनका मैटर है, वहां रेफर करिये। यही मुझे कहना है।

संसदीय कार्य मंत्री तथा जल संसाधन मंत्री (श्री पवन कुमार बंसल):  अध्यक्ष महोदया, मैं श्री एल.के.आडवाणी जी की बात से सहमत हूं कि इस मुद्दे की अहमियत के मद्देनजर इसमें ज्यादा से ज्यादा सदस्य बोल पायें और इसलिए मैं यह सुझाव देता हूं कि दोपहर में जो लंच ब्रेक होता है, हम उसे भी न करें, बल्कि हाउस को शुरू रखें। लेकिन शाम को जितना जल्दी हो पाये, उस लक्ष्य को मन में रखते हुए कि वहां भी बात पहुंचे और आज हम दिन में इसे कम्पलीट कर पायें। यदि छः बजे तक हम सभी अपनी बात कह लें तो अभी से लेकर शाम छः बजे तक सात घंटे हो जायेंगे, नार्मल डिबेट चार घंटे की होती है, लेकिन इसे सात घंटे हो जायेंगे और सभी पार्टियों के कुछ सदस्य इस पर बोल पायेंगे। ...( व्यवधान)

श्री शरद यादव (मधेपुरा):महोदया, मैं एक मिनट बोलना चाहता हूं।

अध्यक्ष महोदया : शरद जी, आप समय से संबंधित बात बोलिये।

श्री शरद यादव : मैं दो सैन्टेन्स में बात खत्म करूंगा। अभी श्री आडवाणी जी ने जो कहा, मैं संसदीय मंत्री, श्री पवन कुमार बंसल जी से भी निवेदन करूंगा कि आज जो बहस होगी, उसमें समय की बहुत जरूरत है। इस बात का ख्याल जरूर रखा जाए कि हाउस में जो पार्टियां हैं, उनका टाइम अलाटेड है। लेकिन इस मामले में आज जो बहस हो, वह गहराई से हो और हर तरह से हो। मेरा निवेदन है कि आज की बहस को पूरा करने के लिए भले ही हमें रात तक समय बढ़ाना पड़े, हमें वैसा करना चाहिए। ...( व्यवधान)

श्री रेवती रमण सिंह (इलाहाबाद):माननीय अध्यक्ष जी, मैं आपसे आग्रह करूंगा कि अभी प्रणव दादा, श्री आडवाणी जी और शरद जी ने जो कहा, यह बहुत महत्वपूर्ण मामला है। महोदया, चार बिल हैं।

इन चारों बिल पर चर्चा होगी या सिर्फ जनलोकपाल बिल पर चर्चा होगी?...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : ठीक है अभी समय से संबंधित बात बोलिए।

श्री रेवती रमण सिंह : समय के अनुसार, जो उन्होंने मांग की है कि तीन मामले ...( व्यवधान) इन पर अगर सदन सहमत हो जाए तो वे अपना उपवास तोड़ देंगे। हमारा आग्रह होगा कि उनसे यह आग्रह किया जाए कि वे उपवास तोड़ दें। पूरे सदन की तरफ से यह मांग रखी जाए कि सदन उस पर पुनर्विचार करेगा। ...( व्यवधान) विचार करने के बाद सर्वसम्मति से निर्णय लेगा।

MADAM SPEAKER: Hon. Members, I have requested the House to tell me the time that should be allotted for this discussion. 

… (Interruptions)

MADAM SPEAKER: In my opinion, initially - I am emphasising the word ‘initially’ – seven hours will be sufficient.

… (Interruptions)

अध्यक्ष महोदया : बैठ जाइए, बात को सुन लीजिए। Since, so many hon. Members want to participate in the discussion, later on, if required, the time may be extended.

 

श्रीमती सुषमा स्वराज (विदिशा):अध्यक्ष महोदया जी, आज नेता सदन ने लोकपाल के गठन से संबंधी पिछला सारा विवरण देते हुए एक विस्तृत वक्तव्य सदन के सामने रखा है। मैं उसी पर चर्चा करने के लिए खड़ी हुई हूँ। अपनी बात शुरू करने से पहले मैं सदन के सभी साथियों से एक निवेदन करना चाहती हूँ कि आज यह सदन बहुत ही ऐतिहासिक चर्चा कर रहा है। चर्चा सात घंटे की हो, आठ घंटे की हो, दस घंटे की हो या बढ़ा कर बारह घंटे की कर दी जाए, लेकिन चर्चा शांति से हो। मैं अपनी तरफ के तमाम साथियों से भी कहना चाहता हूँ कि हो सकता है कि मेरी कोई बात उन्हें नागवार गुजरे, जिसके कारण वे थोड़ा उत्तेजित होने लगें तो भी आप शांति बनाए रखें। मैं आपसे भी यह कहना चाहती हूँ कि अगर मेरी कोई बात पसंद न आए तो आपके वक्ता जो बोलने वाले हैं, वे उसका जवाब दें, जितनी मर्जी आक्रामक भाषा में जवाब दें, लेकिन कम से कम आज इस देश को दिखा दें कि आपने इस संसद के व्यवधानों को तो देखा है, लेकन यह संसद इतनी शांति और संजीदगी से भी चर्चा कर सकती है, यह भी आज देखे।

          अध्यक्ष जी, मैं सबसे पहले सदन को एक जानकारी देना चाहूँगी कि चार अगस्त 2011 को इस सरकार के द्वारा प्रस्तुत किया गया यह विधेयक लोकपाल का पहला विधेयक नहीं है। लोक सभा में 9वीं बार लोकपाल विधेयक आया है। इससे पहले आठ बार लोकपाल विधेयक अलग-अलग लोक सभाओं में प्रस्तुत किए जा चुके हैं। शायद कुछ लोग यह जानकार हैरान होंगे कि पहला विधेयक सन् 1968 में आया, उसके बाद सन् 1971 में आया, सन् 1977 में आया, सन् 1985 में आया, सन् 1989 में आया, सन् 1996 में आया, सन् 1998 में आया और सन् 2001 में आया। आठ बार आए ये विधेयक किसी न किसी कारण से पारित नहीं हो सके। पिछले 43 वर्षों से यह बिल हिचकोले खा रहा है। लोक सभा का कार्यकाल समाप्त हो जाता है और बिल निरस्त हो जाता है और फिर दोबारा किसी अन्य लोक सभा में आने की प्रतीक्षा करता है। हमारे समय में भी यह विधेयक दो बार सन् 1998 और सन् 2001 में आया। हम भी उसे पारित नहीं करा सके।

          यूपीए के सात वर्ष के कार्यकाल में यह विधेयक पहली बार आया है। इसलिए इस बार मेरा विनम्र निवेदन यह है कि जो बार-बार टीम अन्ना आपको समय सीमा दे रही है, जिसे सुनकर शायद कुछ लोगों को बुरा लग रहा है कि कोई हमें डिक्टेट कैसे कर सकता है, कोई कैसे कह सकता है कि चार दिन में पारित करो, कोई कैसे कह सकता है कि इसे इसी सत्र में पारित करो। उसके पीछे यह पृष्ठभूमि है कि 43 वर्षों से हम इस बिल को पारित नहीं कर सके हैं। मैं अपने कार्यकाल को भी दोषी मानती हूं। हम भी दो बार वर्ष 1998 में और वर्ष 2001 में इस बिल को लाये, लेकिन उसे पारित नहीं करा सके। आज देश हमारी तरफ देख रहा है और इसीलिए अंदर से मेरा एक विश्वास यह कह रहा है कि that every idea has a time.  हर विचार का एक समय होता है और आज इस विचार का समय आ गया है। यह सदन इतिहास रचेगा और यह इतिहास बिल को निरस्त नहीं होने देगा बल्कि यह सदन हिन्दुस्तान को एक प्रभावी लोकपाल, एक मजबूत लोकपाल इस देश को देने का काम करेगा। इस विश्वास का एक कारण है। वह कारण यह है कि यह बिल एक जन आन्दोलन बन गया है।

          महोदया, आज से पहले जितने भी विधेयक आये, वे चंद बुद्धिजीवियों तक सीमित रहे। बिल आता था, दो-चार सेमिनार्स हो जाती थीं, बिल कब आया, कब गया, कहां गया, इसके बारे में आम जनता को पता नहीं होता था। पहली बार जन लोकपाल बिल के आन्दोलन के नाम से अण्णा हजारे जी ने इस बिल को नीचे जनता तक पहुंचा दिया। जनता ने इसे अपना भी लिया और इसे पारित कराने का बीड़ा भी उठा लिया। इसीलिए जो दृश्य हमें देखने को मिलते हैं, लाखों-लाख लोग हाथ में तिरंगा पकड़े भारत माता की जय बोलते, एक-दूसरे को जय-हिन्द कहते, वन्दे-मातरम का उद्घोष लगाते हुए एक ही बात कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार मिटाओ, जन लोकपाल लाओ। यह एक जन आन्दोलन बना है और यह जन आन्दोलन भी अकारण नहीं बना। एक दिन पहले अपनी बात कहते हुए मुझे केवल दो ही मिनट मिले थे तो मैंने कहा था कि इसका कारण पिछले दो वर्षों में उजागर हुए भ्रष्टाचार के कांड हैं। बीते समय में भी भ्रष्टाचार के विषय आते रहे हैं। कभी देश भ्रष्टाचार मुक्त रहा हो, ऐसा नहीं है, लेकिन पिछले दो वर्षों में भ्रष्टाचार के कांडों ने हदें पार कर दीं। एक के बाद एक भ्रष्टाचार उजागर हुए और राशि इतनी बड़ी-बड़ी कि सुनकर मन बौखला जाये। आरोप विपक्ष के नहीं, जिसके ऊपर कोई मोटिव लगाया जा सके, कहा जा सके कि ये ऐसा विरोध के कारण कर रहे हैं, सारे के सारे आरोप सीएजी की रिपोर्ट के आधार पर हैं।

          महोदया, सीएजी वह संवैधानिक संस्था है, जो सरकार का लेखा-जोखा देखती है। जिसका नाम ही है- कम्प्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल, सरकार के लेखा-जोखा का महालेखा परीक्षक और नियंत्रक। अगर सीएजी कहता है कि 2जी में 1 लाख 76,000 करोड़ रूपये का घोटाला हुआ, सीडब्ल्यूजी में 70,000 करोड़ रूपये का घोटाला हुआ, एयर इंडिया में हजारों-हजार करोड़ रूपये का घोटाला हुआ, के.जी.बेसिन में हजारों-हजार करोड़ रूपये का घोटाला हुआ और कितनी ही रिपोर्टें पाइप-लाइन में हों तो लोग क्या करें? लोग बौखला गये, लोग उत्तेजित हो गये, लोग गुस्सा हो गये।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  आप लोग शांत हो जाइये। आप शांत होकर सुनिये।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  आप शांत हो जाइये।

…( व्यवधान)

श्रीमती सुषमा स्वराज :महोदया, लोगों को गुस्सा आता है कि एक तरफ तो हमें दो वक्त की रोटी दाल की भरी कटोरी के साथ नसीब नहीं होती, हमारी थाली से सब्जी गायब हो रही है, हमारी चाय से चीनी गायब हो रही है और दूसरी तरफ उच्च पदों पर बैठे हुए लोग लाखों-करोड़ों की लूट मचा रहे हैं। लोगों को गुस्सा आता है कि एक तरफ देश का करोड़ों रूपया विदेशी बैंकों में जमा है और दूसरी तरफ गांव में हम एक हैंडपम्प के लिए तरस रहे हैं। इसीलिए लोग क्रोधाग्नि में जल उठे, लेकिन उस क्रोध में घी डालने का काम उस बिल ने किया, जिसे सरकार लेकर आयी। लोग पूछते हैं कि जिस सरकार की नाक के नीचे भ्रष्टाचार हो रहा है, उसके नेता कहते हैं कि हम भ्रष्टाचार हटाने के लिए कटिबद्ध हैं तो वह प्रतिबद्धता दिखाकर एक ऐसा हथियार तो लाओ, एक ऐसा बिल तो लाओ, जिससे यह लगे कि वह भ्रष्टाचार से लड़ सकेगा। प्रणव दा जो बिल आया, वह कुंद था, उसमें धार नहीं थी और इसीलिए लोगों को यह लगने लगा कि क्या वाकई सरकार कटिबद्ध है?  क्या वाकई सरकार प्रतिबद्ध है, भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए? प्रणब दा अभी चले गए, प्रधानमंत्री जी बैठे हैं, उन्होंने पूरा ज़िक्र किया, पूरा विवरण यहां दिया, लेकिन उस विवरण में थोड़े-थोड़े गैप्स हैं। आज 12वें दिन में अन्ना जी का अनशन प्रवेश कर गया है, 11 दिन पूरे हो चुके हैं। 74 वर्ष का व्यक्ति वहां बैठकर लड़ रहा है। लोग उसके साथ जुड़े हैं। उमड़-घुमड़ कर आंदोलन में आ रहे हैं। परिस्थितियां असामान्य हैं। उस असामान्य परिस्थितियों में से रास्ता निकालने के लिए प्रधानमंत्री जी ने अपने आवास पर सर्वदलीय बैठक बुलाई। उस बैठक में से जो प्रस्ताव निकला, उसका ज़िक्र प्रणब दा ने अपने वक्तव्य में किया। मैं भी उसे पुनः पढ़ना चाहती हूं। चार लाइनों का प्रस्ताव है- “The meeting of all political parties in Parliament request Shri Anna Hazare to end his fast.  The meeting was also of the view that due consideration should be given to the Jan Lok Pal Bill so that the final draft of the Lokpal Bill provides for a strong and effective Lokpal,  which is supported by a broad national consensus.” इस प्रस्ताव से क्या पता चलता है कि उस मीटिंग के दो लक्ष्य थे। एक लक्ष्य, अन्ना जी का अनशन खुलवाना और दूसरा लक्ष्य, देश को एक प्रभावी और मज़बूत लोकपाल देना। इस प्रस्ताव के बाद हमें लगता था कि सरकार और अन्ना के प्रतिनिधियों के बीच में जो बात होगी, वह समाधान कारक होगी। हम आगे बढ़ेंगे, कल कुछ संसद में होगा, लेकिन हैरानी हुई, इसी बैठक के दो घंटे बाद जब अन्ना के प्रतिनिधि ने आकर मीडिया से बात की तो उन्होंने कहा कि सरकार का सुर तो बदला हुआ था। कल सरकार जिस तरह से हम से बात कर रही थी, हमें सुन रही थी। आज वह हमें सुना रही थी और पीछे से किसी ने कहा कि हमें तो डांट रही थी। मुझे यह समझ में नहीं आया कि सर्वदलीय बैठक की भावना क्या थी और उसके बाद वे जो इप्रेशन लेकर गए, वह क्या था? उसमें इतना गैप क्यों था? जो बात सर्वदलीय बैठक से निकली थी, उससे तो रास्ता समाधान की तरफ बढ़ना चाहिए था, लेकिन हुआ उलटा और जब यह बात उन्होंने जाकर रामलीला मैदान में कही तो स्थिति भड़क उठी, लोग भड़क गए। ख़ैर मुझे अच्छा लगा, रात 12 बजे के क़रीब प्रणब जी का एक बयान आया “My words were twisted.” साढ़े 12 बजे सलमान खुर्शीद जी का इंटरव्यू आया, जिसमें उन्होंने कहा कि बात टूटी नहीं है। बात कल भी हुई थी, बात आज भी हुई है और बात आगे भी होगी। थोड़ा सा समाधान हुआ। अगले दिन मैंने स्वयं प्रश्नकाल स्थगन का नोटिस देकर के प्रश्न पूछा, जिसमें प्रणब दा ने समाधान किया कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा था, तो भी वह इप्रेशन कैसे गया, मुझे नहीं मालूम। लेकिन उस बात को बाद में प्रधानमंत्री जी ने बनाया। वह सदन में भ्रष्टाचार पर बहस का उत्तर देने आए, उन्होंने स्वयं प्रसंग चलाया और प्रसंग चलाकर यह कहा कि अन्ना के प्रयासों की सराहना करते हुए “I applaud him; I salute him.” उन्होंने कहा कि मैं उनसे अनशन तोड़ने की अपील करता हूं और उन्हें आश्वासन दिलाया कि हम एक प्रभावी और मजबूत लोकपाल बनाएंगे। प्रधानमंत्री जी की भावना सदन की भावना बन जाए, इसलिए विपक्ष की ओर से मैंने खड़े होकर स्वयं को संबद्ध किया और आपने स्वयं खड़े होकर पीठ की गरिमा जोड़ दी। उसके बाद तो लगता था कि ज़रूर समाधान निकल आएगा।...( व्यवधान) हां, उन सब बिलों की चर्चा होगी, उन्होंने कहा और हाउस में होगी, यह भी कहा। लेकिन मुझे समझ में नहीं आया कि उसके आधार पर जो प्रधानमंत्री जी ने कहा था, अगले दिन सरकार कोई मोशन लाने वाली थी, कोई रेज़ोल्यूशन लाने वाली थी या किस तरह से वह पहल करने वाली थी, क्योंकि उस रात अन्ना जी के प्रतिनिधि पहली बार हम से मिलने आए और उन्होंने हम से कहा कि सरकार एक मोशन लाएगी, जो रेज़ोल्यूशन की शक्ल में होगा, जिसमें अन्ना की तीनों मांगें होंगीं और हम आपसे समर्थन मांगने आए हैं। हमारी कुछ आशंकाएं थीं, हमारे कुछ प्रश्न थे। हमने उनसे बात की। कहीं उन्होंने हमारी बात समझी, कहीं हमने उनकी बात समझी और हमारे बीच में उन प्रश्नों पर एक आम सहमति बनी। मैंने संसदीय कार्य मंत्री से संपर्क साधा कि क्या कोई रिजोल्यूशन या मोशन आप ला रहे हैं? उन्होंने कहा अभी तक तय नहीं हुआ। अगले दिन सुबह मैंने फिर संपर्क साधा कि क्या कोई रिजोल्यूशन आप ला रहे हैं? उन्होंने कहा अभी भी तय नहीं हुआ, मैं दस बजे बता पाऊंगा। मैंने दस बजे फिर संपर्क साधा तो उन्होंने कहा कि सोच रहे हैं कि नियम 193 के कुछ नोटिस ले लें और उस पर चर्चा करा दें। अध्यक्ष जी, मैं अवाक रह गयी। समय हो रहा था, मैं सीधे सदन में आई। मुझे श्री गुरूदास दासगुप्त जी और श्री बसुदेव आचार्य जी मिले। उन्होंने कहा कि क्या आपसे भी सरकार ने कहा है कि नियम 193 के नोटिस दे दे। मैंने कहा कि कहा तो है। उन्होंने कहा कि सरकार पलट कैसे गई? हम क्यों नोटिस दें? पहल सरकार ने करनी थी, मोशन सरकार का आना था, रिजोल्यूशन सरकार की तरफ से आना था। यह हमारे कंधों पर डालकर और सांसदों का एक नोटिस आ जाए, उस पर चर्चा हो जाए, यह बात तो समझ में नहीं आई। श्री गुरूदास दासगुप्त जी ने मुझे बताया कि इफ़्तार पार्टी में पहले दिन उन्होंने एक सुझाव दिया था कि सरकार की तरफ से मोशन नहीं तो एक स्टेटमेंट आ जाए, हम उस स्टेटमेंट पर चर्चा कर लेंगे। लेकिन समझ नहीं आया कि सरकार अपने पैर पीछे क्यों हटा रही थी? इतने में करीब 11.30 बजे मेरे चीफ व्हिप ने आकर मुझे बताया कि मीडिया पर एक खबर चल रही है कि श्री राहुल गांधी अन्ना हज़ारे पर एक वक्तव्य देंगे। सुबह से खबर आ रही थी कि श्री राहुल गांधी, कांग्रेस के महासचिव इसमें कोई प्रमुख भूमिका निभाने वाले हैं। जब उन्होंने आकर मुझे यह खबर दी तो मुझे लगा कि शायद वह बात सही है। इतने में मैंने पीछे की तरफ देखा कि क्या श्री राहुल गांधी सदन में बैठे भी हैं क्योंकि वे आते ही बहुत कम हैं। मैंने देखा कि वे बैठे थे। मुझे उस बात की पुष्टि होती नजर आयी। मुझे लगा मगर श्री राहुल गांधी किस पर बोलेंगे? मुझे लगा कि उन्हें शून्य प्रहर में बोलना होगा। यह किसी भी मेम्बर का अधिकार है। मैंने  शून्य प्रहर की सूची, जो मेरे टेबुल पर आती है, देखी। उसमें उनका नाम नहीं था। मुझे लगा कि कोई बात नहीं। इसी सदन में बहुत बार जिन लोगों का नाम इस लिस्ट में नहीं आता बैलट के कारण वे स्पीकर से उनके  विशेषाधिकार के तहत अनुमति मांग लेते हैं और आप अनुमति देती हैं, काफी उदारता से देती हैं। उन्होंने मांगी होगी, आपने भी दे दी होगी। शायद उसके तहत बोलें और वही हुआ। जैसे ही पेपर्स लेइंग खत्म हुई,  आपने उनको अनुमति दी। वे बोलने लगे, हम सुनने लगे। इतनी देर में मैंने देखा कि दौड़ते-दौड़ते प्रधानमंत्री जी भी आए और सदन में बैठ गए सुनने के लिए। मुझे लगा कि शायद कोई बहुत बड़ी बात श्री राहुल गांधी कहने वाले हैं। प्रधानमंत्री जी स्वयं चलकर आए हैं। अब श्री राहुल गांधी कांग्रेस महासचिव हैं, लेकिन इस सदन के तो दूसरी बार के जीते हुए सदस्य ही हैं। आपने उन्हें अनुमति दी। आप अनुमति देती हैं अध्यक्ष जी, बहुत बार देती हैं। लेकिन, शून्य प्रहर में कोई विषय उठाने की अनुमति देती हैं आप, प्रवचन करने की अनुमति नहीं देती हैं। तीन मिनट की अनुमति देती हैं आप।..( व्यवधान) मैं कुछ ऐसा नहीं कह रही...( व्यवधान)

          अध्यक्ष जी, आप तीन मिनट की अनुमति देती हैं जिसे खींचकर हमें पांच मिनट तक ले जाना पड़ता है, जिसमें बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। तीन मिनट से पांच मिनट तक ही होते हैं। लेकिन पांच पन्नों का एक लिखा हुआ वक्तव्य, जो उन्होंने यहां पढ़ा, पन्द्रह मिनट तक। ...( व्यवधान) मैं सिर्फ एक बात कहना चाहती हूं। मैं चेयर के डिसीज़न को चैलेंज नहीं कर रही हूं। मैं यह कह रही हूं कि हमारी बाध्यता है उस निर्णय को मानना और हमने माना। ...( व्यवधान)

          अध्यक्ष जी, चूंकि प्रणब दा ने एक विवरण दिया और मैंने प्रारंभ में कहा कि विवरण में कुछ गैप्स हैं। मैं उन गैप्स को भर रही हूं, इसलिए मैं कोई चीज़ अप्रासंगिक नहीं कह रही हूं। मैंने यह कहा कि हम ये सोच रहे थे कि प्रधान मंत्री जी ने जो पहले दिन बोला, सरकार पैर पीछे क्यों हटा रही है, मैं उस पर आ रही हूं। श्री राहुल गांधी जी, जो इस सदन के माननीय सदस्य हैं, उन्होंने यहां खड़े होकर कहा - I believe we need more democracy within our political parties. हंसी आती है। I believe in Government funding of our political parties. I believe in empowering our youth in opening the doors of our closed political system in bringing fresh blood into politics and into this House. I believe in moving our democracy deeper and deeper into our villages and our cities. Let us commit ourselves to truth and probity in public life. We owe it to the people of India. … (Interruptions)

          अध्यक्ष महोदया, वे राष्ट्र के नाम संदेश दे रहे थे या जीरो ऑवर का इंटरवेंशन कर रहे थे, यह मैं आपसे पूछना चाहती हूं।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्री पवन कुमार बंसल :  आज सुषमा जी ने शुरू में डिबेट को ऊंचे स्तर पर रखने की बात कही थी। मैं समझता हूं कि वही हम रख लें तो बहुत अच्छा है।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

SHRIMATI SUSHMA SWARAJ : Madam Speaker, was his speech an address to the nation or a Zero Hour intervention? I am asking you … (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Please, sit down. Nothing will go in record.

(Interruptions) … * अध्यक्ष महोदया: आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: कांग्रेस की तरफ से बात हो जाएगी, इसके बाद कांग्रेस के माननीय सदस्यों की बोलने की बारी है। आप बैठ जाइए।

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF CHEMICALS AND FERTILIZERS (SHRI SRIKANT JENA): I am on a point of order.

MADAM SPEAKER: What is the Rule?

SHRI SRIKANT JENA: I am only quoting from the Rule Book. It is about the authority of the Speaker. Can any Member in this House, whoever he or she may be, raise any question about the decision of the hon. Chair? This is my question.

… (Interruptions)

श्रीमती सुषमा स्वराज :अध्यक्ष महोदया, इस पर आप क्या रूलिंग देंगी, क्या जीरो ऑवर का कांटैक्ट आप तय करेंगी?...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: जगदम्बिका पाल जी, आप भी बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Please, sit down. Nothing will go in record.

(Interruptions) …*  श्रीमती सुषमा स्वराज :अध्यक्ष जी, हमें बाद में समझ में आया कि वास्तव में वे कहना क्या चाहते थे। उन्होंने कहा - It is not the matter of how the present impasse will resolve; it is a much greater battle. There are no simple solutions. तब पता चला कि वे वास्तव में कांग्रेस पार्टी की लाइन यहां बताने के लिए आए थे। मुझे उस समय समझ में आया कि सरकार दुविधा में क्यों थीं। सरकार पैर पीछे क्यों खींच रही थी। अब आपको पता चला कि मैं यह बात क्यों कह रही थी, मैं वह गेप भर रही हूं। उस समय समझ में आया कि सरकार रास्ते क्यों तालाश रही थी, सरकार ऐसा रास्ता क्यों तालाश रही थी, जहां उसे कुछ कमिट न करना पड़े, बल्कि किसी एक मेम्बर के माध्यम से या 193 का नोटिस दिलवा करके, वह चर्चा करवा कर एक रस्म अदायगी पूरी कर दें, यह बात मैं आपसे कहना चाह रही थी।

12.00 hrs. और मैं कहना चाह रही थी कि प्रधानमंत्री जी ने इसी सदन में खड़े होकर एक दिन पहले जो स्टेट्समैनशिप दिखाई थी, उस पर कांग्रेस पार्टी के महासचिव ने पानी फेरने का काम किया। इसीलिए हमें समझ में आ गया कि कोई मोशन, कोई रैजोल्यूशन कांग्रेस की तरफ से नहीं आयेगा, सरकार की तरफ से नहीं आयेगा। तब सारे विपक्ष ने आपत्ति जताई, गुरुदास दासगुप्त जी, शरद यादव जी, बसुदेव आचार्य जी, दारा सिंह चौहान जी, सारे लोग हमारे साथ थे, हम सारे लोग मिले और हमने कहा कि नियम 193 पर चर्चा नहीं होगी। सरकार को या तो एक स्टेटमेंट देना होगा या हम एक नियम 184 का नोटिस देंगे, जिस पर चर्चा होगी। मुझे खुशी है कि प्रधानमंत्री ने दोबारा बागडोर अपने हाथ में ली है, मुझे खुशी है। आज मैं आपका अभिनन्दन करती हूं कि प्रणव मुखर्जी जी ने आज जो बयान दिया है, उस बयान में उन्होंने वे तीनों मुद्दे सदन के सामने रख दिये।

          सरकार कमिट नहीं कर रही, ठीक है, लेकिन अगर उस पर कोई सेंस ऑफ दि हाउस आएगी तो वोटिंग के समय पता चलेगा कि सरकारी पक्ष क्या चाहता है, लेकिन जो बात प्रधानमंत्री जी ने कही थी, वे तीनों मुद्दे, जो अन्ना हजारे जी की मांगें हैं, आज उन्होंने अपने वक्तव्य के अन्दर सदन के सामने रख दिये और सदन को कहा कि संविधान और संसदीय मर्यादा के तहत इसमें से रास्ता निकालिये, इसमें जवाब दो।

          अब मैं उन मुद्दों पर आती हूं। अध्यक्षा जी, हम बहुत दिनो से यह बात कह रहे हैं कि एक प्रभावी लोकपाल बिल होना चाहिए, सशक्त और स्वतंत्र लोकपाल बिल होना चाहिए, लेकिन उसका स्वरूप क्या होगा, कौन से बिल को हम प्रभावी कहेंगे, कौन से बिल को हम सशक्त कहेंगे, देश पूछेगा, देश जानना चाहता है और इसीलिए उसके प्रभावीपन को तय करने के जो मुद्दे हैं, उनमें पहला मुद्दा है कि क्या उसके अधिकार क्षेत्र में प्रधानमंत्री होंगे कि नहीं होंगे। आपको याद होगा कि जिस समय यह बिल इण्ट्रोडय़ूस किया जा रहा था, मैंने इस पर उस समय भी आपत्ति की थी, यह कहकर कि इस बिल के अधिकार क्षेत्र में प्रधानमंत्री को नहीं रखा गया है, यह संविधान का उल्लंघन है, यह हमारे क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम का उल्लंघन है। मैंने आपसे कहा था कि हमारा संविधान नागरिकों में फर्क नहीं करता, छोटे-बड़े का भेद नहीं करता। हमारा क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम प्रधानमंत्री और एक आम झुग्गी वाले आदमी के बीच में किसी तरह का कोई भेद नहीं करता। हमारा आई.पी.सी., हमारा प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट सब को बराबर मानता है तो आज के समय में, जब भ्रष्टाचार से लड़ाई का एक हथियार हम ला रहे हैं, अगर उसकी व्यवस्था में से हम प्रधानमंत्री को अलग कर देंगे तो देश को क्या संदेश जायेगा? अगर प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट में प्रधानमंत्री हैं, आई.पी.सी. में प्रधानमंत्री हैं, लेकिन लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री नहीं हैं और खास तौर पर ऐसे समय में, जब कि ऐसे मुकदमे चल रहे हों, जहां एक मंत्री कहता हो कि मेरा किया धरा सारा प्रधानमंत्री को पता था, दूसरा मंत्री कहता हो कि मैंने सब कुछ उन्हें बताकर किया था। कोर्ट में वकील यह कह रहे हों कि हम प्रधानमंत्री को गवाह के तौर पर बुलाएंगे। ऐसे समय में अगर आप लोकपाल के दायरे में से प्रधानमंत्री को अलग रखेंगे तो क्या देश ऐसे लोकपाल को प्रभावी मानेगा?

          यह चर्चा हमारे समय में भी आई थी। 1998 में और 2001 में जब हमने बिल पेश किया, तब यह बहस आई थी कि प्रधानमंत्री को इसके दायरे में आना चाहिए या नहीं आना चाहिए। लेकिन मैंने पहले ही दोष स्वीकार कर लिया कि हम उसे पारित नहीं कर पाये, लेकिन मैं बिल के कंटेंट की बात कर रही हूं। तब अटल जी ने स्वयं आगे बढ़कर उस चर्चा को रोक दिया।...( व्यवधान) अटल जी ने कहा कि इस बहस को रोक दो, मैं कह रहा हूं कि मैं इसके दायरे में आऊंगा और आप प्रधानमंत्री को उसके दायरे में लेकर आओ। जितने भी विरोधी थे...( व्यवधान) मैं आ रही हूं। मैं उसी पर आ रही हूं।...( व्यवधान)

श्री पवन कुमार बंसल:  हम लोग यही कह रहे हैं कि आपने भी पारित नहीं किया।...( व्यवधान)

श्रीमती सुषमा स्वराज :सुनो तो।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: आप बैठ जाइये। Nothing will go on record.

(Interruptions) …* श्रीमती सुषमा स्वराज :मैं इसी पर आ रही हूं। मेरा अगला वाक्य यही है कि अटल जी ने यह बात कही और हमने तुरन्त मान ली।   

 

लेकिन आज भी प्रधानमंत्री यह बात कह रहे हैं, यह मैं कह रही हूं कि आज के वर्तमान प्रधानमंत्री भी यह बात कह रहे हैं कि मैं उसके दायरे में आना चाहता हूं, लेकिन कोई इनकी बात नहीं मान रहा है, इसीलिए मैं यह कह रही हूं। ...( व्यवधान)  अध्यक्ष जी, मैं यह कह रही हूं कि वैसे तो हमारे प्रधानमंत्री बोलते ही कम हैं और जब बोलते हैं तो उनकी कोई सुनता नहीं है।  मैं कह रही हूं कि उनकी बात सुनो।  प्रधानमंत्री तो आना चाह रहे हैं, मैं आपको कह रही हूं कि उनकी बात सुनो।  वह सही कह रहे हैं, उनकी बात मानो।  ...( व्यवधान) इसलिए मैं कहना चाहती हूं कि प्रधानमंत्री जी स्वयं आगे बढ़कर इन कयासों पर अंतिम वाक्य कह दें, रोक लगा दें और हम तय करें कि प्रधानमंत्री पद लोकपाल के दायरे में आना चाहिए, मगर दो अपवादों के साथ - नेशनल सिक्योरिटी और पब्लिक आर्डर।  ये दो ऐसे विषय हैं जिन पर बहुत सी चीजें प्रधानमंत्री को करनी होती हैं, जो सार्वजनिक हित में पब्लिक डोमेन में नहीं आ सकतीं।  एक जिम्मेदार विपक्ष के नाते बोल रही हूं, सस्ती लोकप्रियता लूटने के लिए नही बोल रही हूं।  एक जिम्मेदार विपक्ष के नाते बोल रही हूं कि प्रधानमंत्री इसमें आने चाहिए, मगर दो अपवादों के साथ।

          अध्यक्ष जी, दूसरा विषय है - न्यायपालिका का, जुडीशियरी लोकपाल के दायरे में आए या न आए।  मेरा नाता जुडीशियरी से बहुत पुराना रहा है।  मात्र 21 वर्ष की उम्र में वर्ष 1973 में मैं सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने आयी थी।  उस समय सुप्रीम कोर्ट में कुल 13 जजेज होते थे।  मेरा सौभाग्य है कि मैंने जस्टिस भगवती, जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस कृष्णा अय्यर जैसे जजेज को देखा।  उनकी कोर्ट में एपीअर होने के मुझे मौके मिले। जस्टिस भगवती की फेयरवेल स्पीच में उन्होंने मुझे बुलाया था।  मैंने उन्हें गरीबों का मसीहा कहकर संबोधित किया था, क्योंकि मैंने वह दृश्य देखा था, जब एक पोस्टकार्ड पर एक गरीब की लिखी हुयी पीड़ा को उन्होंने याचिका मानकर स्वीकार किया था और उस पर नोटिस लिया था।  जस्टिस कृष्णा अय्यर की जजमेंट पीस आफ लिटरेचर हुआ करती थी, साहित्यिक कृतियां। जस्टिस चंद्रचूड़ के कक्ष में ताजा बयार बहती  थी।  वो विभूतियां हम लोगों ने देखी हैं।  जस्टिस कृष्णा अय्यर की पत्नी के निधन के बाद उन्होंने मुझे  शारदा मेमोरियल लेक्चर देने के लिए केरल बुलाया था।  तब मैंने देखा था कि कितना मान-सम्मान उनका अपने गृह प्रदेश में था।  यहां कबिल सिब्बल जी बैठे हैं, मुझे नहीं मालूम कि आप उस दृश्य के साक्षी हैं या नहीं।  जिस समय जस्टिस वेंकट चलैय्या का फेयरवेल हो रहा था, चार सौ वकील लाइन लगाकर उनके चरण छूने के लिए खड़े थे, मैंने वह जुडीशियरी देखी है।  ...( व्यवधान) लेकिन आज गिरावट यह आ गयी कि हिंदुस्तान की सुप्रीम कोर्ट के एक सीनियर एडवोकेट ने बंद लिफाफे में, खड़े होकर चीफ जस्टिस को लिफाफा पकड़ाते हुए कहा कि इसमें आठ मुख्य न्यायाधीशों के नाम हैं, ये सभी भ्रष्ट आचरण के दोषी हैं।  जब बाहर चर्चा में वे नाम निकले तो बजाय किसी के यह कहने कि इसमें कोई नाम गलत जुड़ गया, लोगों ने कहा कि इसमें से एकाध नाम छूट गया।  यह दुर्भाग्य है।  न्यायपालिका शब्द तो संविधान का दिया हुआ नाम है।  वास्तव में ये न्याय के मंदिर हैं, जहां एक व्यक्ति आस लगाकर, उम्मीद लगाकर जाता है।  हमारे यहां पंच को परमेश्वर माना जाता है। न्यायालय में बैठा हुआ न्यायाधीश तो भगवान की मूर्ति होता है, लेकिन अगर वह भ्रष्ट आचरण के दोषी हो जाएं, तो क्या करें?  उन्हें लोकपाल के दायरे में लाना समस्या का समाधान नहीं है।  जुडीशियल एकाउंटिबिलिटी बिल जो सरकार ला रही है, वह अकेला भी समाधान नहीं है।  हमने अपनी ओर से उसमें एक सुझाव दिया है - नेशनल जुडीशियल कमीशन का।  मैं आपको कहना चाहूंगी कि इस लोकपाल बिल के ऊपर एक राउंड टेबल वार्ता हुयी थी, जिसमें जस्टिस वेंकटचलैय्या थे, जस्टिस कृष्णा अय्यर थे, जस्टिस जे. एस. वर्मा थे।   उन्होंने इस नेशनल जूडिशल कमीशन को मानते हुए, मान्यता देते हुए यह कहा था। पहले उन्होंने आज की जुडिशीएरी की जो दुर्दशा है उस पर जो कहा मैं वह पढ़ना चाहती हूं -

“Recent Distortions in Judiciary:  Certain distortions and glaring inadequacies are endangering the credibility of higher judiciary. In recent years, several credible allegations have been leveled against individual Judges. While the judiciary on the whole is conducting itself with admirable dignity and propriety, the actions of a few black sheep are damaging the entire institution. Now is the time to press for genuine judicial reform. An honest judiciary enjoying full public confidence is clearly the need of the hour.”   उसके बाद उन्होंने जूडिशल कमीशन की बात की। नेशनल जूडिशल कमीशन के दो छोटे-छोटे पैराग्राफ मै पढ़ती हूं।

“Creation of a National Judicial Commission for transparent appointments in the Supreme Court and High Courts: this mechanism would combine the impact from the elected branches of the Government and the judiciary and chaired by the Vice President.”   यह पहली रेकमेन्डैशन है और दूसरी है-

 “Replacing the present cumbersome and unsatisfactory constitutional mechanism of impeachment under Article 124 (4) with a more effective mechanism for removal of errant Judges functioning under the NJC framework.”   इन दोनों चीजों को कहते हुए उन्होंने कन्क्लूशन दिया-

“The above proposals mesh harmoniously and synergistically with the provisions contained in the Judicial Standards and Accountability Bill, 2010 now in the Parliament. Together they create a permanent, independent and empowered body to ensure judicial accountability in the form of National Oversight Committee and Scrutiny Panels.”             प्रधानमंत्री जी, यह हमारा सुझाव है कि जहां तक न्यायपालिका का सवाल है उसे लोकपाल के नीचे करने की बजाय एक नेशनल जूडिशल कमीशन बनाइए जो जजों की नियुक्तियों पर भी  और उनके पद मुक्त होने के तरीके भी तय करे, प्रावधान तय करे और हिन्दुस्तान के अंदर ऐसी न्यायपालिका आए जिस पर कोई प्रश्न चिन्ह न लग सके।...( व्यवधान)यह बचाने का नहीं, ज्यादा प्रभावी तरीका है।

          अध्यक्ष जी तीसरा विषय सीबीआई का है। जनलोकपाल बिल कहता है सीबीआई के एंटीकरप्शन विंग को लोकपाल के नीचे कर दिया जाए। बहुत दिनों से हम और शरद जी सीबीआई को स्वायत्त बनाने की बात कर रहे हैं कि ऑटानमस  इंस्टिटूशन होनी चाहिए। हमने बहुत बार आप के पास नोटिस दिया कि हम सीबीआई के दुरूपयोग पर चर्चा करना चाहते हैं लेकिन किसी न किसी कारण से वह चर्चा टलती रही। लेकिन सीबीआई का दुरूपयोग देखने के लिए हमें बाहर जाने की जरूरत नहीं है। यहां उसके बहुत भुक्तभोगी बैठे हैं जो सीबीआई के हाथ देख चुके हैं। मेरे बराबर में यहां के सबसे वरिष्ठ सांसद आडवाणी जी बैठे हैं। इन पर हवाला का केस बना दिया। सार्वजनिक जीवन में  शुचिता की पराकाष्ठा दिखाते हुए उन्होंने कहा कि मैं संसद के परिसर में तब तक प्रवेश नहीं करूंगा जब तक मैं इससे बरी नहीं हो जाता। मेरे पीछे यशवंत सिन्हा जी बैठे हैं। इन पर सीबीआई ने हवाला का केस बना दिया। शरद यादव भी यहां बैठे हैं। जिन्दगी लगा दी, सीबीआई ने हवाला का केस बना दिया लेकिन क्या निकला-जीरो। मदनलाल खुराना दुबारा कभी मुख्यमंत्री नहीं बन सके, इन पर सीबीआई ने हवाला का झूठा केस बना दिया। सारे विपक्ष के नेताओं को देख लीजिए और उधर देख लिजिए। सारे विपक्ष के नेता कहीं न कहीं सीबीआई के शिकंजे में फसाए जा चुके हैं। लालू यादव जी, मुलायम भाई, जय ललिता...( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद : आप लोग फसाए थे।...( व्यवधान)

श्रीमती सुषमा स्वराज :हम नहीं फसाए।...( व्यवधान)असत्य भाषण मत करिए।

अध्यक्ष महोदया :  बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्रीमती सुषमा स्वराज :दक्षिण पार्टियों में देखिए मैडम जयललिता। एक जगह से प्रारंभ हो जाइए। पंजाब जाओ तो बादल परिवार। हरियाणा जाओ तो चौटाला परिवार, यूपी जाओ तो दोनों भाई मुलायम जी  भी एवं बहन मायावती भी। सारा भ्रष्टाचार विपक्ष में हो रहा है। सारे के सारे दूध के धुले हुए उधर बैठे हैं।

          अध्यक्षा जी, एक ताजा उदाहरण श्री जगन मोहन रेड्डी का इतना भयावह है। वे कल तक कांग्रेस के सांसद थे। उनके पिता श्री वाई.एस.आर. रेड्डी आंध्र प्रदेश के कांग्रेस के मुख्य मंत्री थे। कांग्रेस नेतृत्व के बहुत चहेते मुख्य मंत्री थे। नज़दीक थे, सबसे प्यारे थे। लेकिन जैसे ही कांग्रेस छोड़ी, ले सीबीआई की रेड और ले सीबीआई का केस।...( व्यवधान) मैं पूछना चाहती हूं।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  कृपया आप सब बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record.

    (Interruptions) …* श्रीमती सुषमा स्वराज : अध्यक्षा जी, मरने के बाद भी नहीं छोड़ा।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  बैठ जाइए।

   …( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record.

(Interruptions) …* श्रीमती सुषमा स्वराज :अध्यक्षा जी, जीते-जी संबंध इतने अच्छे और मरने के बाद अभियुक्त बना दिया। मरने के बाद ऐक्यूज़्ड के कॉलम में डाल दिया। मैं केवल एक बात पूछना चाहती हूं कि यह कांग्रेस कौन सी पवित्र गंगा है जिस में जब तक डुबकी लगाते रहो तब तक साफ-सुथरे, दूध के धुले और बाहर निकले नहीं कि भ्रष्टाचार के पुतले।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER:  This will not go in record.

(Interruptions) … * श्रीमती सुषमा स्वराज :लोग कहते हैं कि सीबीआई कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इनवैस्टीगेशन है। मैं कहती हूं नहीं। जैसे ही हाउस में कोई वोट की विधा आ जाए, शरद भाई मुझे कहते रहते हैं, सुषमा जी, वोट की विधा में चर्चा मत करवाया कीजिए। मैंने कहा, क्यों। बोले, हमारे कई भाई-बहनों पर तलवार लटक जाती है। मैंने कहा, हां। सीबीआई कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वैस्टीगेशन नहीं, सीबीआई कांग्रेस बचाओ इंस्टीटय़ूशन बन जाती है।...( व्यवधान) इसका सबसे बड़ा उदाहरणअब सामने आया है। अभी कैश फॉर वोट का कैस बना। श्री अमर सिंह चार्ज शीटेड, श्री सुधीन्द्र कुलकर्णी चार्ज शीटेड, हमारे दो एक्स-एमपी चार्ज शीटेड। लेकिन जो डायरैक्ट बैनीफिशियरी थे, जिनकी सरकार बची थी, वे सारे बरी। यह है सीबीआई।...( व्यवधान)अगर श्री अमर सिंह कर रहे थे तो किसके लिए कर रहे थे?...( व्यवधान) जिन्होंने व्हिसल ब्लोअर का काम किया, हम लोकपाल में व्हिसल ब्लोअर की बात कर रहे हैं, वे दोषी, वे अपराधी और जिनकी सरकार बची, जो लाभार्थी हुए, जो बैनीफिशियरी बने, वे बरी। यह है सीबीआई का कन्डक्ट। इसलिए हम चाहते हैं कि कांग्रेस बचाओ इंस्टीटय़ूशन की बजाए एक स्वायत्त संस्था बने और अगर जन लोकपाल चाहता है कि एंटी करप्शन विंग लोकपाल के नीचे कर दिया जाए तो हम उससे सहमत हैं।

          अध्यक्षा जी, अधिकार क्षेत्र में फिर एमपीज़ की बात आती है। अभी नेता, सदन ने बात करते हुए कहा कि हम जो बात करें, कौन्सटीटय़ूशन के अंदर करें। हम जब यहां आते हैं तो संविधान की शपथ लेकर आते हैं। हम कोई भी सुझाव संविधान के बाहर नहीं करेंगे। संविधान की धारा 105 सांसदों को हाउस के अंदर के व्यवहार और आचरण के लिए इम्युनिटी देती है। वह इम्युनिटी बनी रहनी चाहिए। यह हाउस सुप्रीम है। मैं यह भी कहना चाहती हूं कि इस हाउस ने अपनी सुप्रीमेसी दिखाते हुए अपनी स्ट्रैन्थ भी  दिखाई है।  इस हाउस ने प्रश्न पूछने के बदले मात्र पांच हजार रुपये की राशि के आरोप में, मैं आरोप कह रही हूं क्योंकि इन्वैस्टीगेटिव एजैंसी से कोई बड़ी जांच नहीं हुई। हाउस कमेटी ने केवल जांच की थी। लेकिन मात्र 5000 रुपये की राशि लेने के आरोप में इन दोनों सदनों ने मिलकर ग्यारह सांसदों को राजनैतिक सदस्यता से, इस सदन की सदस्यता से निष्कासित कर दिया। उनके राजनैतिक कैरियर खत्म कर दिये। यह ताकत इस हाउस के अंदर,  इस सदन के अंदर है। लेकिन जहां तक बाहर के आचरण का सवाल है, तो हम बाहर आर्डिनेरी सिटीजन है, साधारण नागरिक हैं। हम पर बाहर  प्रिवैंशन ऑफ करप्शन एक्ट लागू है। श्री नरसिम्हा राव की जजमैंट के बाद हमारा बाहर का आचरण पब्लिक सर्वेंट बन गया, इसलिए बाहर का आचरण लोकपाल के घेरे में आये, उसमें हमें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन अंदर के आचरण के लिए हाउस उसमें सुप्रीम होना चाहिए।

          अध्यक्ष महोदया, इसके बाद मैं इसकी कम्पोजिशन पर आती हूं, क्योंकि प्रभावी लोकपाल के लिए यह सबसे बड़ी जरूरत है कि वह चुना कैसे जाये? सलैक्शन कमेटी की कोई भी कम्पोजिशन अगर ऐसी होगी, जिसमें सरकारी पक्ष का बाहुल्य होगा, तो उसमें से सरकारी लोकपाल निकलेगा, क्योंकि इसका मेरे से ज्यादा प्रत्यक्ष अनुभव किसी को नहीं है कि जिस कमेटी में सरकारी लोग बाहुल्यता में होते हैं, वहां क्या होता है। ...( व्यवधान) मैं एक-एक करके बताऊंगी। ...( व्यवधान) मैं कुछ विषय आपके लिए भी छोड़ रही हूं। ...( व्यवधान) अभी मैं अधिकार क्षेत्र में आती हूं।

          अध्यक्षा जी, सीवीसी की कमेटी में सरकारी पक्ष का बाहुल्य केवल एक का होता है। उसमें प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और नेता प्रतिपक्ष होती हैं, यानी टू और वन। लेकिन वहां विमत को किस तरह से दरकिनार करके अपना निर्णय थोपा जाता है, इसकी मैं प्रत्यक्ष अनुभवी हूं।  मैं अपनी बात कहती रह गयी, लेकिन मेरी बात सुनी नहीं गयी। यह तो ईश्वर ने मुझे साहस दिया कि मैं अकेली इन दोनों से भिड़ गयी और वहां अपनी असहमति लिखित में दर्ज कराकर उठी। उसी के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में वह मामला तार्किक परिणति तक पहुंचा। लेकिन उसने मुझे यह अनुभव दे दिया कि जिस कमेटी में सरकारी पक्ष बाहुल्यता में होता है, वहां कैसा चयन होता है। इसलिए मेरा यह कहना है कि कमेटी जो भी बने, उसमें सरकारी पक्ष के लोग कम और गैर सरकारी ज्यादा होने चाहिए, तभी एक स्वतंत्र और निष्पक्ष लोकपाल हम निकाल पायेंगे। लेकिन इसकी एक दूसरी अति हमने कल गुजरात के लोकायुक्त की नियुक्ति  में देखी। उस सरकार को पूरी तरह बाईपास कर दिया। लोग कहते हैं कि गुजरात में लोकायुक्त क्यों नहीं बना? ...( व्यवधान)

          अध्यक्षा जी, गुजरात मे लोकायुक्त क्यों नहीं बना, यह पूछते हैं? ...( व्यवधान) गुजरात के मुख्यमंत्री ने चीफ जस्टिस द्वारा दिये गये नाम को नेता प्रतिपक्ष के साथ सहमत होकर गवर्नर को भेजा। छः साल तक फाइल तात्कालिक गवर्नर ने नहीं निकाली। उसके बाद उसी व्यक्ति को बाद में महाराष्ट्र के एनएचआरसी में लगा दिया गया, लेकिन गुजरात का लोकायुक्त नहीं बनाया। उसके बाद मीटिंग बुलायी, तो नेता प्रतिपक्ष उसमें आये नहीं। उन्होंने उसका बायकाट कर दिया। अब कल क्या घटा? कल पूरी सरकार को बाईपास करते हुए गवर्नर ने स्वयं नियुक्ति कर दी। यह दूसरी एक्सट्रीम है। ...( व्यवधान) इसलिए मैं कहना चाहती हूं कि कम्पोजिशन के समय यह  संतुलन बनना बहुत जरूरी है कि न तो सरकार का बाहुल्य हो और न सरकार की पूरी तरह अनदेखी हो, तब हम एक संतुलित चयन समिति निकाल पायेंगे और एक संतुलित चयन प्रक्रिया इसमें रख पायेंगे।

          अध्यक्षा जी, इसके बाद वे तीन प्रश्न आते हैं, जो नेता सदन ने हमारे विचार के लिए अपने वक्तव्य में उठाये हैं। एक विषय है कि क्या एक ही एक्ट से लोकपाल और लोकायुक्त बन सकता है? यहां पर बहुत संविधान विशेषज्ञ बैठे हैं। वे कहेंगे कि जो स्टेट सर्विसेज हैं, वे स्टेट का विषय है, स्टेट की एंट्री है। लेजिस्लेटिव कॉम्पीटैंस का विषय उठेगा। हम कैसे एक ही एक्ट से दोनों बना दें, तो मैं उन्हें बताना चाहती हूं की वर्ष 1968 और 1971 के जो लोकपाल बिल आए थे, उनका शीर्षक था - लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम। इसलिए यह कोई नई बात नहीं है।  दूसरे, जो संविधान यह प्रावधान देता है कि यह स्टेट एंट्री है और दूसरा सेंट्रल एंट्री है, वही संविधान अनुच्छेद 252 में हमें यह अधिकार भी देता है कि दो राज्यों के समर्थन यह लोक सभा एक इनेबलिंग प्रॉविजन के साथ ऐसा कानून बना सकती है जिसे बाद में राज्य स्वीकार कर सकें। मैं कहना चाहती हूं कि अनुच्छेद 252 को हम देख लें। उसमें यह लिखा है:  

 “Power of Parliament to legislate for two or more States by consent and adoption of such legislation by any other State”           इसके तहत हम एक ही बिल से लोकपाल और लोकायुक्त बना सकते हैं, दो राज्यों के समर्थन से बना दें और बाकी राज्यों के लिए एक इनेबलिंग प्रॉविजन बना दें जिससे राज्य सरकारें उसको एडॉप्ट कर सकें ताकि कोई राज्य सरकार यह न कह सके कि हमारे पास कोई मॉडल बिल नहीं है।
          दूसरा विषय है ग्रीवांस रीड्रेसल मैकेनिज्म। मुझे आज यहां यह बात कहते हुए खुशी होती है कि भारतीय जनता पार्टी की दो राज्य सरकारों ने और एनडीए की एक राज्य सरकार ने इस ग्रीवांस रिड्रेसल मैकेनिज्म को पहले ही स्थापित कर दिया है। मध्य प्रदेश सरकार ने एक बिल बनाया है - लोकसेवा प्रदाय गारन्टी विधेयक। बिहार ने एक ऐसा ही बिल बनाया और कल ही मुझे जानकारी मिली है हिमाचल प्रदेश ने भी लोकसेवा प्रदाय गारन्टी विधेयक बना दिया है।...( व्यवधान) पंजाब में भी बना दिया है। ...( व्यवधान) जहां तक ग्रीवांस रीड्रेसल मैकेनिज्म का सवाल है, बहुत ही प्रभावी लोकसेवा प्रदाय विधेयक बने हैं जिनमें यह तय किया गया है, यह प्रावधान किया गया है कि अगर कोई पटवारी 15 दिन के अंदर गिर्दाबरी नहीं देता, अगर कोई तहसीलदार एक महीने के अंदर नामांतरण नहीं करता, तो उसको जो जुर्माना लगेगा, वह उसकी तनख्वाह से काटा जाएगा और वह जुर्माने की राशि उस व्यक्ति को दी जाएगी, जिसका काम 15 दिन या एक महीने में नहीं किया गया है। सिटीजन्स चार्टर को सामने रखकर ये विधेयक बनाए गए हैं। जन-लोकपाल बिल जिस डीम्ड करप्शन की बात करता है, उससे हम सहमत नहीं हैं क्योंकि डीम्ड करप्शन में सीधे 15 दिन में काम न करने पर सजा का प्रावधान है।  हम कहते हैं कि इनएफिशिएंसी और डीम्ड करप्शन को एक चीज नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन मुझे लगता है कि अन्ना हजारे जी के प्रतिनिधि भी इस बात को मानने को तैयार हैं कि जो हमारे लोकसेवा प्रदाय गारन्टी विधेयक हैं, वे सिटीजन्स चार्टर का एक बहुत अच्छा स्वरूप लेकर आए हैं, सारी राज्य सरकारें और केन्द्र सरकार उस तरह के सिटीजन्स चार्टर के साथ पब्लिक सर्विस गारन्टी एक्ट्स बना सकती हैं, ताकि आम आदमी को यह पता चले कि उसका काम इतने दिन में होगा ही होगा और नहीं होगा तो उस अधिकारी पर जुर्माना लगेगा और जुर्माने की राशि उसे मिलेगी, जिसका नुकसान होगा।
          इसके बाद तीसरा बिषय लोअर ब्यूरोक्रेसी का है। जहां तक लोअर ब्यूरोक्रेसी का सवाल है, मैं कहना चाहती हूं कि कुछ चीजें मनोवैज्ञानिक असर भी डालती हैं। इसके  विरोध में केवल एक तर्क है कि अनविल्डी बॉडी हो जाएगी, लेकिन अगर हम बैलेंस करें कि उसका मनोवैज्ञानिक असर क्या होगा। आज आम आदमी किसी बड़े आदमी के भ्रष्टाचार से क्रोधित है, लेकिन उतना परेशान नहीं है क्योंकि उसका उससे वास्ता ही नहीं पड़ता। वह जब उसके बारे में अखबार में पढ़ता है, तो उसे गुस्सा आता है, उसे लगता है कि यह मेरी गाढ़ी कमाई के पैसे से भरे गए टैक्स को क्यों लूट रहा है। वह क्रोधित होता है, लेकिन परेशान नहीं होता है। वह तंग होता है छोटे अफसर से। राशन कार्ड बनवाने जाता है, वह नहीं बनता, लाइसेंस बनवाने जाता है, लेकिन लाइसेंस नहीं बनता है। कहीं न कहीं जन-लोकपाल बिल ने यह आकांक्षा जगा दी है कि हम जो यह जो हथियार ला रहे हैं, वह हमें उससे बचाएगा, छोटे भ्रष्टाचार से बचाएगा। जो उमड़-घुमड़कर लोग आ रहे हैं, ये उन बड़े भ्रष्टाचारों के खिलाफ नहीं आ रहे हैं, ये यह उम्मीद लेकर आ रहे हैं, आशा लेकर आ रहे हैं, मन में आस लेकर आ रहे हैं कि यह जन-लोकपाल बिल मेरे मर्ज का इलाज होगा। क्योंकि उसके अंदर छोटी ब्यूरोक्रेसी आएगी इसलिए मैं कहना चाहती हूं कि मैकेनिज्म बनाया जा सकता है, एपेलेट अथोरिटी बनाई जा सकती है। लोकपाल के नीचे और 11 लोकपाल बनाए जा सकते हैं। लेकिन अगर हमने छोटे अधिकारी को लोकपाल के दायरे में नहीं रखा तो आम आदमी अपने को कहीं ठगा हुआ महसूस करेगा, आम आदमी यह महसूस करेगा कि मेरे भ्रष्टाचार का इलाज नहीं हुआ, इन लोगों ने केवल बड़े भ्रष्टाचार का इलाज किया। इसलिए यह जो लोअर ब्यूरोक्रेसी की बात है, उस पर भी हमारी पार्टी सहमत है। ये तीनों विषय जो विचारार्थ नेता सदन ने अपने वक्तव्य में रखे हैं, इन तीनों विषयों पर मैं अपनी पार्टी की सहमति इस सदन में दर्ज कराती हूं।
          अध्यक्ष जी, मैं फिर अपनी उसी बात पर आती हूं कि आज का दिन एक इतिहास का दिन है। हमारी पीढ़ी ने बहुत भ्रष्टाचार भोगा है, हमारी पीढ़ी उसका शिकार बनी है। लेकिन हमारी भावी संततियां इस त्रास को न भोगें। हमारी भावी पीढ़ियां इस भ्रष्टाचार का शिकार न बनें, इसके लिए आज इतिहास ने हमें मौका दिया है। इस मौके को हम चूके नहीं, इसे तरह-तरह की तकनीकियों में हम न डालें। पूरा देश आज उद्वेलित है, पूरा देश आज हमारी तरफ देख रहा है। इस बिल का वह हश्र न हो जो पुराने आठ बिलों का हुआ है, 43 बरस तक यह बिल घूमता रहा है। लेकिन इस बार, आज हम बिल पास करने के लिए खड़े नहीं हुए हैं, परंतु आज हम सरकार को एक सुझाव और संकेत देने के लिए खड़े हुए हैं। इस सदन से देश को एक संदेश देने के लिए खड़े हुए हैं। आज इस सदन से सरकार को यह संदेश जाए कि प्रभावी, सशक्त, स्वतंत्र और निष्पक्ष लोकपाल इस देश में आए, जो आम आदमी को उसके भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाए।
 
श्री सन्दीप दीक्षित (पूर्वी दिल्ली): अध्यक्ष महोदया, आदरणीय प्रणब मुखर्जी साहब के बयान के बाद नेता प्रतिपक्ष ने जब अपना भाषण शुरू किया, तो सबसे प्रथम बात जो उन्होंने कही, वह यह कि आज एक ऐतिहासिक दिन है। शायद ही कोई सदस्य होगा इस पूरी संसद का जो इसे ऐतिहासिक दिन नहीं मानेगा।...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया: कृपया शांत रहें।
श्री सन्दीप दीक्षित : मुझे केवल एक निराशा हुई कि इस ऐतिहासिक दिन पर बड़े प्रभावी ढंग से हमारी नेता प्रतिपक्ष ने जो ऐतिहासिक भाषण की बात की, मुझे कम से कम यह उम्मीद थी कि जिस तरह उन्होंने कहा कि हम शुरुआत करेंगे कि उनकी तरफ से भी उन विषयों पर चर्चा होगी, जिन विषयों के कारण हम यहां आज इकट्ठा हुए हैं। उनके बोलने का तरीका बहुत प्रभावी है। उन्होंने अपनी तरफ से तर्क दिए और बड़ी बखूबी से उन्होंने अपनी बात रखी। निराशा मुझे केवल यह हुई कि इस ऐतिहासिक दिन में उनकी तरफ से एक साधारण दिन का भाषण आया। आप विपक्षी पार्टी पर हमला करें कोई दिक्कत नहीं है। आप हमारी गलतियों को दिखाएं, कोई दिक्कत नहीं है। हम भी यह काम कर सकते हैं। मेरे सामने आज दोराहे हैं, मैं क्या बोलूं। क्या मैं यह बोलूं कि अगर हमारे ऊपर सीएजी की रिपोर्ट आने से यह माहौल बना, तो और राज्यों में क्या-क्या हो रहा है। क्या यह आज के लिए महत्वपूर्ण है? क्या मैं यह कहूं कि जब उन्होंने हवाला केस के लोगों की बात बताई थी, तो आदरणीय श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया जी के पिता जी को नाम क्यों भूल गईं, उनका नाम भी डाल सकते थे।
          जब इस बात पर बात हो रही थी कि वह रात की मीटिंग में टीम अण्णा के लोग क्यों नाराज होकर चले गए, तो क्या किसी मीटिंग के अंदर जो लोग बैठकर बात करते हैं, उसकी गरिमा को तोड़कर मैं आज बता दूं कि उस मीटिंग में क्या हुआ था। जब इन्होंने कहा कि मैं सस्ती लोकप्रियता की बात नहीं करती हूं, क्या मैं उस सस्ती लोकप्रियता की तरफ जाने की बात रखूं या आज उन विषयों के लिए खड़ा हूं, जिनके लिए देश का एक महान नेता बाहर अनशन कर रहा है। मैं केवल यह समझता हूं कि इस तरफ अगर मैं जाऊंगा तो आज कम से कम जिस कारण मैं इस सदन में बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं, मैं उसके प्रति ऑनेस्ट काम नहीं करूंगा। इसलिए मानते हुए कि कभी भी किसी वक्ता को उन चीजों को नहीं छोड़ना चाहिए, जिससे सीधे-सीधे उस पर या उसकी पार्टी पर प्रहार होते हैं। मैं आज उस फील्ड को छोड़ रहा हूं, क्योंकि आज देश की जनता और अण्णा हमसे केवल वह सुनना चाहती है कि उन लोकपाल बिल के प्रावधानों पर, जिस पर उन्होंने आग्रह किया है कि संसद अपनी बात उनके सामने रखे, हम उस पर अपनी बात रखें।
           स्पीकर महोदया, मैं विनम्रतापूर्वक एक निवेदन करना चाहूंगा कि आज हमारे सामने दो महत्वपूर्ण चीजें हैं। एक, उन चीजों पर अपनी बात रखना जिसके लिए माननीय अन्ना जी हमारी बात सुनने के लिए रामलीला ग्राउंड में बैठे हुए हैं और दूसरा, बाकी तमाम इश्यूज, जो भ्रष्टाचार और लोकपाल बिल से संबंधित हैं। मुझे मालूम है कि यहां सारे वक्ता, तमाम बातों पर अपनी बात रखना चाहते हैं। सदन ने जो बात तय की है उसके विरोध में मैं बात नहीं कर रहा हूं लेकिन एक छोटा सा सुझाव दूंगा कि क्या हम इस बात को कर सकते हैं कि कम से कम पहले कुछ राउंड्स की चर्चा के बाद अगर इन विषयों पर एक सेंस ऑफ हाउस निकल जाता है, अगर नेता प्रतिपक्ष और नेता सदन इस बात को मान लें, तो कम से कम अन्ना जी को हम अपनी बात कह सकें, जिससे उनके अनशन तोड़ने का मार्ग प्रशस्त हो सके और बाद में बाकी बातचीत हम अपनी कर सकें।
श्री हरिन पाठक (अहमदाबाद पूर्व): आपका सुझाव मान लिया।...( व्यवधान)
श्री सन्दीप दीक्षित :  मेरा एक छोटा सा सुझाव है कि इन दोनों को हम पैरलल रखें, क्योंकि बहुत से विषय हैं। आज कई बातें बिल के बारे में कही गयी हैं। उन पर हम सोमवार को भी चर्चा कर सकते हैं, मंगलवार को भी चर्चा कर सकते हैं, पूरे इतवार उन पर चर्चा कर सकते हैं। आज हमारा एक सीमित लक्ष्य है क्योंकि एक ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हुई है जिसमें एक जन-नेता भूख हड़ताल पर बैठा है और उसने हमारे सामने केवल तीन बातें रखी हैं, तमाम और चीजों के बावजूद भी कि इन तीन चीजों पर आप अपना मत बता दीजिए, फिर मैं तय करुंगा कि मैं अपना अनशन छोड़ूंगा या नहीं छोड़ूंगा।...( व्यवधान)
श्री अनंत कुमार (बंगलौर दक्षिण):   हमने आपका सुझाव मान लिया...( व्यवधान) हम तैयार हैं ऐसा विपक्ष की नेता ने कह दिया है।...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया : ठीक है, सुन लीजिए। आप बैठ जाइये।
श्री सन्दीप दीक्षित :  आप मेरी बात सुन लीजिए। ...( व्यवधान) अध्यक्ष महोदया, मुझे पता नहीं लग रहा है कि मेरी किस बात पर इतनी आपत्ति हुई है, मैं तो एक सुझाव दे रहा हूं। आप मेरी बात सुन लीजिए।
श्री गोपीनाथ मुंडे (बीड): हमें कोई आपत्ति नहीं, समर्थन है।...( व्यवधान)
श्री सन्दीप दीक्षित :  अध्यक्ष महोदया, इस लोकपाल बिल पर मैं दो-तीन बातें संसद के समक्ष रखना चाहूंगा। माननीय सुषमा जी ने इस बात को माना है कि लोकपाल बिल संसद में 6-7 बार आया है और संसद में इसे स्वीकार नहीं किया गया। उन्होंने पिछले महीनों के इतिहास को भी गिनाया। मैं इसमें पड़ना नहीं चाहता था लेकिन एक बात जरूर कहूंगा कि लोकपाल बिल के लिए एक माहौल बना, लेकिन लोकपाल बिल की चर्चा की शुरुआत तब हुई जब राष्ट्रीय सलाहकार समिति ने उसके प्रारूप पर सबसे पहले चर्चा प्रारम्भ की। मैं कहना चाहता हूं कि सरकार की कटिबद्धता उस मीटिंग से ही सिद्ध होती है।...( व्यवधान)
श्री गणेश सिंह (सतना):संविधान के बारे में बात करो...( व्यवधान)
श्री सन्दीप दीक्षित :  संविधान के बारे में बात नहीं होती...( व्यवधान) बात होती है किसी भी प्रक्रिया को बताने की। ...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइये, आप बीच में क्यों बोल रहे हैं।
श्री सन्दीप दीक्षित :  स्पीकर महोदया, संविधान की बात यहां कहां से आ गयी, मुझे समझ में नहीं आया। बात तो प्रक्रिया की हो रही है, प्रक्रिया में तमाम मीटिंगों का उल्लेख किया गया है। अगर मीटिंगों का उल्लेख किया जा सकता है तो राष्ट्रीय सलाहकार समिति की भी मीटिंग का उल्लेख किया जा सकता है। उसी मीटिंग में टीम अन्ना के कुछ सदस्य बुलाए गये थे। कुछ कारण हो सकते हैं कि उनका जो रुख था, जिस तरीके से चर्चा हुई, उस पर उन्हें आपत्ति हुई हो और उसके अगले दिन से अन्ना जी के साथ उन्होंने अपना अनशन प्रारम्भ किया और तमाम प्रक्रिया, जिसके बारे में सभी को मालूम है, वह चालू हुई।
          जन-लोकपाल बिल के बारे में मैं कुछ बताना चाहता हूं। सबसे पहला खाका जो जन-लोकपाल बिल का बना, वह काफी समय पहले बना था। अन्ना जी की टीम के सदस्य और अन्ना जी पूर्ण रूप से इस बिल की तमाम जो प्रक्रियाएं थीं, उससे सहमत नहीं थे और उन्होंने अपने ही बिल को 10-12 बार संशोधित किया। आज उसका वर्जन 2.3 है, उसमें अनेक वर्जन्स हैं, 2.1 है, 2.2 है, 2.2(1) है, ऐसे करके अनेक वर्जन्स हैं। मैं इसका उल्लेख इसलिए करना चाहता हूं कि जो अभी देश में एक फीलिंग है कि सिर्फ यह बिल या कोई और बिल नहीं, टीम अन्ना ने भी इस बात को समझकर कि और लोगों से बातचीत करके हमने भी ज्ञान प्राप्त किया है, अपने ही बिल का 10 से 12 बार संशोधन किया है। इसलिए मैं कह रहा हूं कि वह बिल भी अपने में सैंक्रोसेंट नहीं है और लोगों की भी उसमें बातचीत आ जाती है, सरकार का मत आ जाता है, विपक्ष का मत आ जाता, तमाम राजनैतिक पार्टियों का मत आ जाता है तो वह बिल ज्यादा सशक्त और प्रभावी बनकर सामने आयेगा। अन्ना जी की टीम ने खुद अनेकों बार अपनी बात का संशोधन किया है, इसलिए इस बात को कहना कि वही बिल अपने में सशक्त होगा, मैं बड़ी विनम्रता से कहूंगा कि हम लोगों की भी बात सुन ली जाए, उसके बाद जिस तरीके का बिल आता है। वह बिल जनलोकपाल बिल पर सवाल नहीं उठाता है। जब हम कहते हैं कि इसमें कुछ नया संशोधन कर दीजिए, क्योंकि यह आपकी बनाई प्रक्रिया है और आपने 12 बार अपने बिल में संशोधन किया है। हम केवल यह बात कहते हैं कि हमारी भी बात मान लीजिए। इस बिल को और सशक्त बनाने के लिए सम्पूर्ण संसद और राष्ट्र के विशेषज्ञों तथा जनता की राय ले लीजिए, इसलिए इसमें संशोधन की बात कही जा रही थी। यह बात नहीं थी कि एक परफेक्ट बिल बन गया था, उसके बारे में अगर कोई अपना सुझाव दे, तो वह बिल के प्रारूप के खिलाफ है। कोई व्यक्ति उस बिल के प्रारूप के खिलाफ नहीं था। आज कल उस बिल के बारे में जनता के बीच में कोई बात कहना सम्भव नहीं हो पाता है, क्योंकि जनता के मन में उत्तेजना है इसलिए कोई भी बात कहना सम्भव नहीं है। हम जैसे केवल संसद में अपनी बात कह पाते हैं, इसलिए मैंने सोचा कि आज संसद में अपनी बात जरूर रखूं।
          सरकार ने अपना बिल प्रस्तुत किया और नेता प्रतिपक्ष ने उस बिल को लचर बताया, कमजोर बताया, पिलपिला बताया। सरकार का जो सबसे पहला बिल था, सम्भवतः उसमें कई कमजोरियां रही होंगी। प्रणब दादा ने अपने वक्तव्य में कहा कि तीस से चालीस के करीब मुद्दे ज्वायंट ड्राफ्टिंग कमेटी में तय किए गए थे, जो दोनों बिलों के बीच में अंतर था। स्वयं उन्होंने कहा कि 40 में से 34 ऐसे प्रावधान हैं, जो उसमें माने गए। मैं तो सात साल से संसद में हूं, मुझसे बहुत वरिष्ठ सांसद सदन में बैठे हैं, शायद संसदीय इतिहास में पहली बार था कि ग़ैर सरकारी लोगों के 40 में से 34 संशोधन मान लिए जाएं। यह भी हो सकता था कि जो पांच या छह संशोधन रह गए थे, वे भी मान लिए जाते या नहीं भी माने जाते, वह बाद की बात है। आज माहौल ऐसा बना हुआ है कि केवल सरकार पर ही नहीं, बल्कि संसद पर सवाल उठ रहे हैं, जैसे संसद एक बहुत बड़े राक्षस की तरह जनता और इस बिल के बीच में खड़ी हुई है। मैं बहुत विनम्रता से कहना चाहूंगा कि यह बात पूर्णतः सही नहीं है। आपकी सरकार ने भी 40 में से 34 चीजें मानी हैं। आज जिस तरीके से सरकार का मूड बन रहा है, नेता प्रतिपक्ष ने उन चीजों पर जो सरकारी बिल में नहीं थीं, अपनी बात व्यक्त की है और साफ तौर पर कहा है कि सारे दल और सारे लोग इसमें जुड़ना चाहते हैं। अगर नेता प्रतिपक्ष दो रात पहले की मीटिंग की बात कहती हैं कि दो रात पहले हमारे बीच में टीम अन्ना आई थी और हमारे जो संदेह थे, उन्हें उन्होंने दूर किया, तो मेरी बहुत विनम्रता से अपेक्षा है कि एक महीने पहले आ कर वे हमारे संदेह दूर कर सकते थे। हमें इस प्रक्रिया से जो अलग मान लिया गया, उसमें मुझे थोड़ी-सी आपत्ति है। यह संसद है और कानून बनाने के लिए आप लोग चुन कर आते हैं। अगर आप कोई प्रभावी कानून लाए हैं, तो जिस तरीके से नेता प्रतिपक्ष और उनके मित्रों को जाकर दो दिन पहले अपनी बात कही, उसी तरह और पार्टियों के नेताओं को जा कर अपनी बात बता देते, तो शायद आज जिस हश्र पर हम पहुंचे हैं, हम नहीं पहुंचते और इसके कई समाधान पहले ही हो जाते।
          मैं पिछले दिनों जो बातचीत होती रही, उससे भी जुड़ा रहा। जितनी बातें अन्ना जी ने रखी हैं, उन तीन बातों में मैं अपना मत, सम्भवतः उसमें पार्टी का भी कहीं न कहीं निहित होगा, उस बारे में मैं अंत में कहूंगा। तीन-चार महत्वपूर्ण बातें नेता प्रतिपक्ष ने कहीं, उसके बारे में भी मैं अपनी बात कहना चाहूंगा। सबसे पहले प्रधानमंत्री जी की बात आती है। मुझे लगता है, उस समय भी जब प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि मुझे कोई दिक्कत नहीं है कि मैं अपना नाम इसमें डालूं। जैसा कि मुझे याद है उस समय सरकार ने कहा था कि इस समय हम तय कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री को इस दायरे से बाहर रखा जाए, उसके अपने तर्क थे, लेकिन उस समय कहा था कि स्थायी समिति या संसद जिस तरह का निर्णय लेगी, वह निर्णय हमारे लिए स्वीकार्य होगा। आज नेता प्रतिपक्ष ने एक उदाहरण दिया कि हमने उस समय अटल जी की बात मान ली थी। अगर मैं भी सस्ती लोकप्रियता की बात कहूं, तो सीधे-सीधे बात मानने में क्या होता है, बात तो बिल पास करने में होती है। आपने अटल जी को खुश कर दिया, लेकिन बिल पास नहीं किया । यह आज की बात नहीं है और मुझे यह बात कहते हुए बुरा भी लग रहा है, लेकिन मैंने यह बात इसलिए कही, क्योंकि समय बदलता है और आदमी अपनी सोच बदलता है। किसी भी व्यक्ति की, किसी भी दल की, किसी भी संस्था की परिपक्वता की निशानी होती है कि समय को समझे, समय की जरूरत को समझे और अपने विचारों को बदले और मेरे खयाल से महात्मा गांधी जी से ज्यादा किसी ने किसी दूसरे को सीख नहीं दी और सार्वजनिक रूप से कहा कि समय बदला है, परिस्थिति बदली है, मेरी सोच बदली है, मेरे अनुभव बदले हैं और मैंने जाना है कि पहले मैंने गलती की थी, लेकिन बड़प्पन इसमें है कि मैं आज अपनी गलती सुधारूं। सरकार भी आज उन संशोधनों पर विचार कर रही है, जो शायद आज से तीन महीने पहले सरकार को लगते थे कि वे प्रेक्टिकल नहीं होंगे या उनकी आवश्यकता नहीं होगी। इस बात को मानते हुए कि संसद के दायरे में एक प्रभावी और सशक्त, लेकिन एक प्रेक्टिकल बिल लाने के लिए हम सब को जुड़ना चाहिए।
          बात सीबीआई को लोकपाल के अंदर डालने की आई थी। हमारे सामने दो विकल्प हैं। आज नेता, प्रतिपक्ष ने कहा कि उसकी जो इंवेस्टीगेशन विंग है, उसको इसमें डाल सकते हैं। बहुत लोगों का आज भी मत है और मैं इस बात को कहना चाहता हूं तथा अन्ना जी के लोगों का भी यह मत है कि अगर सीबीआई को सरकार नहीं डालना चाहती है तो सीबीआई की वे ताकतें या उसके अंदर के वे प्रावधान प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट या उससे संबंधित लॉज जो उसके अंदर आ रहे हैं, मैं कोई अधिवक्ता नहीं हूं कि आपको सही सही बता सकूं कि क्या वे चाहते हैं, उनको केवल अगर हमारे लोकपाल के अंदर डाल दिया जाए और ऐसे कुछ कैबिनेट्स बना दिये जाएं कि सीबीआई अंत में उनमें हस्तक्षेप न करें तो भी यह बात उस रूप में बन सकती है। लेकिन यह डॉयलॉग की बात है, डिजाइन की बात है और यह डिटेल्स में बड़े आराम से चल सकते हैं।
            बात सलेक्शन प्रोसैस की आती है कि क्या क्या उसके मैम्बर्स होने चाहिए। नेता प्रतिपक्ष ने अपना अनुभव बताया। उस अनुभव में भी कुछ सच्चाई है। जो सरकार ने बिल प्रस्तुत किया था, उसमें शायद सरकारी मैम्बर हैं और बाकी मैम्बर उसमें कम हैं लेकिन इसमें भी अन्ना जी की टीम के साथ और बाकी जो लोग इसमें हैं, अरुणा राय जी ने इसमें अपना योगदान दिया है, हमारे डा. जयप्रकाश जी ने अपना योगदान दिया है, दलित समाजों ने कुछ अपना योगदान दिया है, सबकी बात को सम्मिलित करके सलेक्शन प्रोसैस की भी और उस कमेटी की भी एक नयी प्रक्रिया बनाई जा सकती है जो बैठकर लोकपालों को तय करेगी। यह एक ऐसा मुद्दा नहीं है जिस पर अन्ना जी की टीम में और हमारा आपस में कोई मतभेद है। यह ऐसी चीज है जिसे बातचीत करके बड़े आराम से तय किया जा सकता है। ...( व्यवधान)मैं हां कह रहा हूं। आप सुन तो लीजिए। आपने भी हां नहीं की। आपने भी यही कहा कि सरकार के मैम्बरों की संख्या कम होनी चाहिए। उसके आगे न आपने डिटेल दिये और न मैं दे रहा हूं।
          अब बात मैम्बर्स ऑफ पार्लियामेंट की आती है। यह बात सत्य है कि सैक्शन 2 (आर्टिकल 105) के तहत हमें कुछ अधिकार दिये गये हैं। यह अधिकार केवल इसीलिए हमें दिया गया है कि हम स्वच्छंद होकर इस संसद में अपनी बात रख सकें। हम कभी कभी अपने यहां के लोगों की पीड़ा रखते हैं, कभी कभी अपने इलाकों के लोगों की पीड़ा यहां लाकर रखते हैं और उसको कहते समय हमारे बीच में कई ऐसी बातें हो सकती हैं कि हम कभी कभी किसी पर आरोप भी लगा देते हैं, हम कभी कभी किसी की तारीफ भी कर देते हैं यह न जानते हुए कि हो सकता है कभी कभी इसके ऐसे परिणाम हों जो बाहर जाकर दूसरे परिणाम बनते हों। लेकिन अगर हर बार हम अपने परिणामों को देखने लगेंगे तो शायद स्वच्छंद रूप से सांसद अपनी बात नहीं कर पाएंगे या कभी कभी वोट नहीं दे पाएंगे। इसीलिए नेता, प्रतिपक्ष की भी जो बात है और सरकार की भी बात है, वह यह है कि सांसदों के इस अधिकार की सुरक्षा करनी चाहिए। आर्टिकल 105 के अंदर सांसदों को जो सुरक्षा मिली है, उस सुरक्षा को मेनटेन करके रखना चाहिए और बाद में जो प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट तो सांसदों पर वैसे भी एप्लाई करता है, वह एक ऐसी बात है जिसे लेने में कोई दिक्कत नहीं है।
          अब बात उन तीन महत्वपूर्ण मुद्दों की आती है जिसके लिए अन्ना जी भी इंतजार कर रहे हैं कि यह संसद क्या सोचती है और अपनी तरफ से हमें क्या बात बताएगी। बात लोकायुक्त की आती है कि  जिस तरीके से लोकपाल बिल आएगा, क्या उसी तरीके से राज्यों में भी लोकायुक्त की स्थापना की जाएगी? सुषमा जी ने अपनी तरफ से बात बताई कि अनेबलिंग प्रोविजन कर दें जो अगर संविधान में किसी रूप में नहीं मिल सकता है तो क्या मॉडल बिल की तैयारी हो सकती है? ये दोनों ऑप्शंस की बात हो रही है। यह बहुत सरल बात है। इसमें नेता मिल सकते हैं, हमारे कानून मंत्री यहां बैठे हैं, आप 4-6 संविधान विशेषज्ञों को बुला लीजिए। जिस रूप में भी हो सकता है क्योंकि सरकार अनेबलिंग प्रोविजंस की बात  पहले से ही कर रही है,  इस बात को भी मैं स्पष्ट करना चाहूंगा। अगर यह राज्यों में जिस तरीके से एप्लाई हो सकता है, यह हो। कुछ राज्य हो सकते हैं जो इस पर आपत्ति करें। वो राज्य जानें, उनका काम जानें। वहां के स्वयंसेवी संगठन होंगे, वहां का सभ्य समाज होगा, वहां के लोग होंगे, मुझे नहीं लगता कि माहौल में कोई भी राज्य जब उसके सामने मॉडल बिल बनेगा तो वह पीछे रह पाएगा लेकिन वह उस राज्य सरकार की और वहां के नागरिकों के बीच की बात है। मैं उसमें नहीं पड़ना चाहता। लेकिन अगर यह लोकायुक्त बिल जब बनता है, अगर अनेबलिंग प्रोविजन इसमें डल सकता है तो उसे डाला जाए नहीं तो उसके साथ साथ सरकार बताए कि हम एक मॉडल बिल भी लाएंगे और जो राज्यों में लोकायुक्त प्रतिनिधियों पर एप्लाई करने के लिए है और यह बात अगर हम अन्ना जी के समक्ष रखते हैं तो मुझे उम्मीद है कि शायद इस बात से वह संतोष करेंगे।
          दूसरी बात ग्रीवांसेज की आती है। बड़ी खूबी से नेता, प्रतिपक्ष ने अपने राज्यों की बात कही। यह बात वह भूल गईं कि खुद अन्ना जी की टीम ने इस बात को सबसे पहले रखा था। मैं राज्यों का नाम नहीं लूंगा। उन्होंने जब खुद सबसे पहले अपने राज्यों का नाम रखा था और कहा था कि कहां कहां मॉडल पब्लिक डिलीवरी ग्रीवांस सिस्टम है तो उन्होंने कांग्रेस राज्यों का नाम भी लिया था। मैं इसलिए नाम नहीं लूंगा क्योंकि मैं कांग्रेस वर्सिज़ बीजेपी नहीं बनाना चाहता। ...( व्यवधान) लेकिन उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के राज्यों का नाम लिया। हमने कहा, नहीं और पार्टी के राज्यों ने भी आदर्श...( व्यवधान)नहीं, मैं उसमें पड़ना ही नहीं चाहता हूं, ग्रिएवेंसिस रिड्रेसल मेकेनिज्म बनाएंगे। ...( व्यवधान)मैं आपको बाहर बता दूंगा लेकिन यहां नहीं बताऊंगा।...( व्यवधान) मैं आपको जान कर नहीं बता रहा हूं।...( व्यवधान) मैं इसलिए नहीं कहना चाहता क्योंकि जिस राज्य में आप बैठे हैं, उस राज्य के सिस्टम को आदर्श सिस्टम माना है।...( व्यवधान)आप इसे कुछ भी कह लीजिए।...( व्यवधान) मैं इसलिए नहीं बताना चाहता था।...( व्यवधान) यह मैंने उनके अपने दस्तावेजों से लिया है, मेरे दस्तावेजों से नहीं है।...( व्यवधान) लेकिन ग्रिएवेंस रिड्रेसल सिस्टम के साथ जो बात बनती है, एक यह है कि सबको मालूम है कि सरकार एक प्रभावी ग्रिएवेंस रिड्रेसल सिस्टम को लाने का प्रयास कर रही है और एक्ट फार्मूलेशन स्टेज पर है। मेरे मित्र मिलिंद जी यहां बैठे हैं जो अभी मुझे बात रहे थे कि किस तरह से इलेक्ट्रानिक्स का इस्तेमाल करके ग्रिएवेंस रिड्रेसल बेहतर रूप में बन सकता है। इसके बारे में कई राज्यों के भी अनुभव हैं और भारत सरकार इन अनुभवों को अपने एक्ट में ला रही है। सिर्फ बात सिटिजन चार्टर बनाने की नहीं होगी जो इस बिल के बाद भारत सरकार के तमाम कार्यक्रमों के लिए बनेगा, बात उस ग्रिएवेंस रिड्रेसल मेकेनिज्म की भी नहीं है जो बनेगा। लेकिन एक छोटा सा पेच फंसता है कि इससे अगर कोई क्रिमिनल या करप्शन की बात उत्पन्न होती है तो उस पर ज्यूरिक्डिक्शन किसकी होगी? इसमें यह बात कहनी जरूरी है कि हर चीज में पब्लिक ग्रिएवेंस में जरूरी तो नहीं है कि करप्शन का एंगल सामने आए। अगर हम हर चीज पर करप्शन का एंगल देखने लगेंगे तो कभी भयानक स्थिति भी बन सकती है। इसका यह मतलब नहीं है कि इसमें करप्शन का एंगल नहीं आता है। यहां करीब 750 सांसद हैं, एक सामान्य दिन में हमारे पास कम से कम सात, आठ या दस ऐसे केस आते होंगे जो पब्लिक ग्रिएवेंस से संबंधित हैं। इसका मतलब है कि आमूमन सामान्य दिन में कुल मिलाकर 7000 ऐसे केस आते हैं। अगर हम 300 दिन का काम करते हैं तो 7000/300 से देखें तो  20 से 21 लाख के करीब केस आ जाएंगे। इस तरह से इतने सारे केसिस पर हर चीज में हर बार क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन करना शायद संभव नहीं होगा। मेरा बड़ा विनम्र निवेदन है कि सिटिजन चार्टर आ रहा है, अन्ना जी ने मांग की है, पब्लिक ग्रिएवेंस रिड्रेसल सिस्टम बन रहा है जिसकी अन्ना जी ने मांग की है, केवल क्रिमिनल इंटेंट या करप्शन से उसे जोड़कर प्रक्रिया जो वे कह रहे हैं, इसे लोकपाल से अगर जोड़ना चाहते हैं तो इसके लिए कोई मॉडल तैयार करना होगा क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि लोकपाल इसके प्रभाव में दब जाए। हम चाहते हैं कि यह सिस्टम हो। सरकार की आज की प्रणालियों में भी यह सिस्टम डाला जा सकता है, इसे जिस तरह से लिंक करना चाहें कर सकते हैं। लेकिन मूलतः मेरी बात वही है जो नेता प्रतिपक्ष ने कही है। मेरे ख्याल से बाकी सदन भी शायद अपना मत भी वैसा ही रखेगा।
          महोदया, तीसरी बात जो सबसे महत्वपूर्ण कही गई है और अन्ना जी ने शायद सबसे बड़ी बात कही वह लोअर ब्यूरोक्रेसी के बारे में है। लोअर ब्यूरोक्रेसी से ज्यादातर आदमी जूझते हैं। थानेदार से लेकर गश्ती हवलदार तक, डिस्ट्रिक्ट फॉरेस्ट अफसर से लेकर तहसील के अफसर तक, तहसीलदार से लेकर पटवारी तक, पटवारी का नाम ही लोगों के दिल में डर पैदा कर देता है, यही नहीं कभी अस्पताल जाते हैं तो अस्पताल के सामने जो सेवक होते हैं उनसे कई बार हम लोगों को दो-दो हाथ करने पड़ते हैं। मेरे मन में है कि लोअर ब्यूरोक्रेसी को किसी ऐसे सिस्टम से अलग रखना जनहित में नहीं है। लेकिन इसे लाने के लिए क्या प्रक्रिया बनाई जाए, क्या मॉडल बनाया जाए? एक मॉडल है जैसे सैंट्रल विजिलेंस कमीशन की बात कही जा रही है। कई लोग कह रहे हैं कि सीएजी टाइप मॉडल की बात कर सकते हैं और इसे तमाम संस्थाओं से लिंक कर सकते हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है कि इंस्टीटय़ूशनल फ्रेमवर्क बनाएं। इसे कानून की तरफ से शक्ति दें, शक्तिशाली बनाएं, शक्तिवान बनाएं। अन्ना जी का कहना कि लोअर ब्यूरोक्रेसी को निरंकुश न छोड़ें और मेरे ख्याल से इसे हम सब लोग स्वीकार करते हैं। उनका सुझाव करप्शन को कम करने के लिए सबसे प्रभावी कदम है तो शायद यह सबसे प्रभावी कदम होगा। इसे क्रियान्वित करने के लिए संस्थाओं को कैसे जोड़ा जाए, किसका क्या रोल हो, इसे देखने के लिए थोड़ा समय देने की आवश्यकता है। मैं पूरे सदन की राय नहीं जानता लेकिन अपनी तरफ से हाथ जोड़कर अन्ना जी से निवेदन करूंगा, अगर वे मेरी बात सुन रहे हैं, इतना मानें कि आज हम लोग आपके पूरी तरह से साथ हैं, इसकी प्रक्रिया में बनाने और संस्थागत रूप में इसे कैसे रखा जाए, इस पर थोड़ा सोचने की बात है। आपकी टीम से भी जो विचार-विमर्श चल रहा है, उसमें भी ये चर्चा के मुख्य बिन्दु हैं। इसलिए यदि आप समय दें तो इसे बेहतर और प्रभावी रूप से बना सकेंगे।
          महोदया, मेरे ख्याल से जो तीन-चार मुख्य मुद्दे थे, वे तय हुए। इस बात को कहकर कि आज ज्यूडिशियरी की एक बात बताई गई है, ज्यूडिशियरी पर...( व्यवधान) मैं उस पर आ रहा हूं।...( व्यवधान)
MADAM SPEAKER: Please do not do this.
…( व्यवधान)
MADAM SPEAKER:  Nothing will go on record. Shri Dikshit, please address the Chair.
(Interruptions) … * अध्यक्ष महोदया : अब आप शांत हो जाइये। आप बोलिये। बस बहुत हो गया, इतना ज्यादा मत कीजिए।  
…( व्यवधान)
श्री सन्दीप दीक्षित : मैं उस पर आ रहा हूं। ...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया : बैठ जाइये, आप भी बैठिये। आप यह क्या कर रहे हैं?
श्री सन्दीप दीक्षित: जो चार-पांच महत्वपूर्ण चीजें सांसदों ने कहीं हैं, इसमें यह बात आती है कि जो ज्यूडिशियरी की बात थी, मेरे ख्याल से यह सब जगह अब तय हो गया है कि ज्यूडिशियरी को लोकपाल के तहत न रखा जाए, बल्कि एक सशक्त, प्रभावशाली ज्यूडिशियल एकाउन्टेबिलिटी बिल में उसे डाला जाए। जो बिल तैयार भी है। यदि उस बिल में भी कुछ कमजोरियां हैं तो सरकार इस बात के लिए तैयार है कि श्री अण्णा हजारे की टीम के जो सुझाव हैं और तमाम लोगों के भी जो सुझाव हैं, उन्हें जल्द से जल्द उस बिल में डाला जाए, जिसमें एक सशक्त ज्यूडिशियल एकाउन्टेबिलिटी की बात हो। लेकिन मैं एक निवेदन जरूर करूंगा कि ज्यूडिशियरी का इतिहास चाहे कुछ भी हो, ज्यूडिशियरी की इंडिपेन्डेन्स पर कम से कम हम लोगों को अंकुश नहीं लगाना चाहिए। हमारी कुछ ऐसी संस्थाएं हैं, जिनकी इंडिपेन्डेन्स को हम लोगों को प्रोटैक्ट करना चाहिए, इस मामले में कम से कम मेरा ऐसा मत है।...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया : शांत हो जाइये। आप लोग क्या कर रहे हैं?
श्री सन्दीप दीक्षित : महोदया, बस दो-तीन चीजें बचती हैं, चूंकि मैंने स्वयं कहा था कि जो चर्चा है, वह तीन मुख्यतः तीन बिंदुओं पर रखी जाए और जो भ्रष्टाचार के बाकी चेहरे हैं, वे भी उतने ही भयानक हैं। मुझे नहीं लगता कि उन पर आज चर्चा हो सकती है। ...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया : आप लोग क्या कर रहे हैं, कम से कम ऐसे मत कीजिए। उन्हें बोलने दीजिए, आप इस तरह से मत करिये। आप ऐसा क्यों कर रहे हैं, कृपया ऐसे मत करिये। शांत हो जाइये। लालू जी, आप बैठ जाइये। उन्हें बोलने दीजिए। आप बोलिये।
…( व्यवधान)
MADAM SPEAKER:  Nothing else will go on record except the speech of Shri Sandeep Dikshit.
(Interruptions) …* अध्यक्ष महोदया : आप चेयर को एड्रैस कीजिए, आप इधर-उधर मत देखिये।
श्री सन्दीप दीक्षित : महोदया, भ्रष्टाचार के जो तीन भयानक चेहरे हैं, मुझे नहीं लगता कि उसमें एक लोकपाल बिल में शायद कवर हो सकता है या नहीं। लेकिन उसके लिए भी आने वाले समय में सरकार को और सबको मिलकर सोचना चाहिए कि कारपोरेट्स का भ्रष्टाचार से किस तरह से संबंध बनता है। ...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया : कुछ भी रिकार्ड में नहीं जायेगा।.
..( व्यवधान)   * श्री सन्दीप दीक्षित : अब हम एनजीओ सैक्टर पर आते हैं। यह एक ऐसा सैक्टर है, जिससे मैं 15 सालों तक जुड़ा रहा हूं और इस सैक्टर में अगर अच्छे लोग हैं, अगर ऐसी संस्थाएं हैं, जो सेवा के लिए काम करती हैं, अगर ऐसी संस्थाएं हैं, जिन्होंने देश के विकास में अपना योगदान दिया है तो ऐसी संस्थाएं भी हैं, जिन्होंने पूरे के पूरे क्षेत्र पर कालिख पोती है। इसमें ऐसे भी लोग हैं। यह बात मैं बहुत गम्भीरता से कह रहा हूं। इसमें मेरे मित्र हैं, ये वे लोग हैं, जिनके साथ मैंने 15 साल जिंदगी काटी है। मैं बहुत गम्भीरता से सदन में कह रहा हूं कि अगर एनजीओ सैक्टर पर आपने अंकुश नहीं लगाया तो यह निरंकुश हो जायेगा।

13.00 hrs. मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि हमारी इन्टेंशन्स पर कभी गलती है। ...( व्यवधान) लेकिन कोई भी समाज ...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: This is not done.

… (Interruptions)

श्री सन्दीप दीक्षित : अध्यक्षा जी, मैं सिर्फ एनजीओ सेक्टर की ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : बैठ जाइए, जब आपकी पार्टी बोलेगी तब बोल लीजिएगा।

श्री सन्दीप दीक्षित : अध्यक्षा जी, मैं जो ये दो-तीन बातें हैं, जिनके बारे में, मैं फिर से कहना चाहूंगा कि मेरा मानना यह नहीं है कि इन्हें लोकपाल के अंदर लाया जाए। लोकपाल को इतना बड़ा और इतना इप्रैक्टिकल ...( व्यवधान) संस्था आप नहीं बना सकते। इनके लिए और आयामों की आवश्यकता होगी।...( व्यवधान) लेकिन मैं यह कह रहा हूँ ...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing else will go on record.

(Interruptions) …* श्री सन्दीप दीक्षित : अध्यक्ष महोदया, ...( व्यवधान) आप दो मिनट मेरी बात सुन लें, मैं बैठने वाला हूँ। ...( व्यवधान) महोदया, मैं एनजीओ सेक्टर के लिए इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इस सेक्टर का एक अलग प्रभाव पड़ता है। इसलिए इसे किसी न किसी दायरे में लाना आवश्यक है। ...( व्यवधान) इसके अंदर जो लोकपाल में है...( व्यवधान) सरकार के जो ...( व्यवधान) सर, एक सैकेंड ...( व्यवधान) आप सुन तो लीजिए ...( व्यवधान) सरकार के जो ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : यहां बहुत महत्वपूर्ण बहस हो रही है। शुरू में ही कहा गया था कि आज ऐतिहासिक दिन है, ऐतिहासिक बहस है और उसे पूरी गंभीरता से करना है। हर एक को मौका मिलने वाला है। बहुत लंबी बहस चलेगी, सबको मौका मिलेगा। आपके जो भी विचार हैं उनको रखिएगा। लेकिन अभी माननीय सदस्य को अपने विचार शांतिपूर्वक रखने दीजिए। अब आप लोग बिल्कुल शांत हो जाइए।

…( व्यवधान)

श्री सन्दीप दीक्षित : अध्यक्ष महोदया, सरकार का जो बिल है, जिसको हम लोकपाल बिल कह रहे हैं। ...( व्यवधान) उसमें जो स्वयंसेवी संस्थाएं है ...( व्यवधान)

 MADAM SPEAKER: Shri Dikshit, kindly address the Chair.

… (Interruptions)

श्री सन्दीप दीक्षित : शायद, सांसदों को मालूम नहीं हैं, सरकार के बिल में स्वयंसेवी संस्थाएं है। ...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Shri Lalu Prasad, please do not interrupt.

… (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record.

(Interruptions) … * श्री सन्दीप दीक्षित : अध्यक्ष महोदया, मैं यह कहना चाहूंगा कि ...( व्यवधान) सिर्फ एक प्रावधान जो इसमें है कि तमाम एनजीओज़ को इसमें कवर किया जा रहा है। मेरा विनम्रता से निवेदन यह है कि ऐसे संगठन जो केंद्र सरकार से या राज्य सरकारों से धन नहीं ले सकते हैं या नहीं ले रहे हैं, क्या उनको लोकपाल के दायरे में डालना जायज़ है या नहीं? यह सिर्फ एक बात है जिस पर सरकार पुनर्विचार करे। ...( व्यवधान) मैं किसी और चीज़ पर विशेष टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा, मैं फिर से आग्रह करूंगा कि हम यहां थोड़ा बहुत भ्रष्टाचार पर और लोकपाल बिल पर बोलने आए हैं। लेकिन इन तीन महत्वपूर्ण मुद्दों पर, जिन पर अण्णा जी ने हमसे अपनी बात कही है, हम उस पर अपना मत व्यक्त करने आए हैं। लेकिन इन तीन चीजों के साथ हमको क्या कैविएट्स डालने चाहिए। वह सिर्फ इसलिए कि वे उन चीजों को प्रभावी ढंग से जनता के बीच में प्रैक्टिकल रूप में कर सकेंगे। उन बातों को हम स्वीकार करें, पूरा सदन उसमें अपना मत व्यक्त करे और हम अण्णा जी से यह प्रार्थना करें कि आपने हमको एक दिशा दिखाई है। इसी राष्ट्र से अगर छह महीने पहले पूछते तो उसके कई नागरिक यह सवाल पूछते कि कौन हैं अण्णा जी। आज यही राष्ट्र कह रहा है कि कौन नहीं हैं अण्णा। इस व्यक्ति ने इस देश में, इस देश की जनता के बीच में अपनी जगह बनाई है।

उनका जो आग्रह है, कम से कम मेरे लिए तो यह बहुत इज्जत की बात है कि उन्होंने संसद से एक आग्रह किया और हमने उसे रिस्पेक्ट दी। इन बातों को मानते हुए एक सशक्त और प्रभावी लोकपाल बिल की तरफ हम अग्रसर हो रहे हैं। मैं सरकार से यह निवेदन भी करूंगा कि इस बिल को जितनी जल्दी हो सके स्टैंडिंग कमेटी में भेजें, लालू जी बैठे हैं, वे जानते हैं कि उसकी प्रक्रिया क्या होगी, उसे पूरा करें। जो सपना आज देश देख रहा है, वह सपना साकार करने के लिए हम पूरा प्रयास करें।

 

श्री रेवती रमण सिंह (इलाहाबाद):महोदया, आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  जरा शांत रहिये। अगर आपको बाहर जाना है तो जरा शांतिपूर्वक जाइये।

…( व्यवधान)

श्री रेवती रमण सिंह :  महोदया, यह देखिये कि ये कितने गंभीर हैं?

अध्यक्ष महोदया :  आप बोलिये। थोड़ी देर में शांत हो जायेंगे।

श्री रेवती रमण सिंह : महोदया, सुषमा जी कह रही थीं कि यह ऐतिहासिक क्षण है। मैं इन्हें याद दिलाना चाहूंगा कि जरा ये अपने पीछे देख लें। अब इन्हें कोई मतलब नहीं है।

          महोदया, आज हम जन लोकपाल बिल पर चर्चा करने के लिए सदन में आये हैं। जन लोकपाल बिल के साथ तीन और बिल भी हैं। मैं चाहूंगा कि सदन में चारों बिलों, जन लोकपाल बिल, श्रीमती अरूणा राय जी का बिल, जय प्रकाश नारायण जी का बिल और सरकारी लोकपाल बिल इन सब पर एक सामूहिक चर्चा होनी चाहिए। मेरा आपसे आग्रह है कि आपने सात घंटे का समय रखा है। माननीय सदस्य चाहे इधर के हों, चाहे उधर के हों, सब सदस्य इस पर बोलना चाहते हैं। मैं चाहूंगा कि ऐसे अहम मसले पर ज्यादा से ज्यादा सदस्यों को बोलने का मौका दिया जाये, चाहे यह डिबेट दो या तीन दिन चले, लेकिन सभी को मौका देना चाहिए। यह मेरा आपसे आग्रह है।

          महोदया, आज यह स्थिति उत्पन्न क्यों हुई? इस असामान्य परिस्थिति के लिए सरकार का हर निर्णय और उसका लचर रवैया ही जिम्मेदार है। अगर सरकार ने पहले से ही पूरे सदन को विश्वास में लिया होता तो शायद यह नहीं होता। माननीय प्रणव दादा ने विपक्ष के सभी नेताओं को बुलाया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अगर सिविल सोसायटी की जगह विपक्ष के सभी नेताओं को बुलाते और बात कर ली गयी होती तो शायद यह स्थिति पैदा नहीं होती। यह स्थिति पैदा करने की पूरी जिम्मेदारी सरकार की है।

          महोदया, मेरा कहना है कि यह सदन सार्वभौम है।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER:  Hon. Member, please do not turn your back to me.

श्री रेवती रमण सिंह :  महोदया, संविधान के तहत लोक सभा को जो शक्तियां प्रदत्त हैं, उन शक्तियों को कोई चुनौती नहीं दे सकता, चाहे वह कोई भी हो। ये शक्तियां संविधान के द्वारा प्रदत्त की गयी हैं। मैं कहना चाहूंगा कि पूरे देश में आज एक मजाक बन गया है कि सांसद क्या होते हैं? सांसदों को तरह-तरह के अपमानजनक शब्दों से परिभाषित किया जा रहा है।

          महोदया, यह बहुत ही निन्दनीय कार्य है। मैंने गांधी जी के सत्याग्रह आन्दोलन के बारे में पढ़ा है। गांधी जी के किसी भी आन्दोलन में, कहीं पर भी इस तरह की भाषा का प्रयोग नहीं हुआ। सांसदों के बारे में आज इस तरह की भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। मुझे ताज्जुब है कि तमाम सांसद अभी भी लाइन लगाकर यह सुनने के लिए जाते हैं। मैं आपसे आग्रह करूंगा कि सांसदों की एक गरिमा है, इस संसद की एक गरिमा है। यह संसद केवल दीवार और गुम्बद से नहीं बनी है, यह संसद माननीय सदस्यों के द्वारा बनी है। यह संसद है। लेकिन इसको आज हाइजैक करने की कोशिश की जा रही है। सुषमा जी बोल रही थीं, मुझे ताज्जुब हो रहा था कि आप इतने दिनों से लोक सभा और राज्य सभा में हैं, संसद की गरिमा का आपको थोड़ा भी ख्याल नहीं आया। आपने एक बार भी नहीं कहा कि सांसदों के साथ इस तरह से व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। आज सभी सांसदों को क्या परिभाषित करके कहा जा रहा है, जो-जो शब्द कहे जा रहे हैं, वह मैं इस सदन में कहना नहीं चाहता हूं।...( व्यवधान) कहा गया कि सांसदों का इम्तिहान लीजिए और जब वे 60 प्रतिशत नंबर लाएं, तब उनको इम्तिहान में पास कीजिए और तभी वे सांसद बन सकते हैं। उनको शायद मालूम नहीं है कि 15-16 लाख लोग इम्तिहान लेकर ही इस संसद में सांसद को भेजते हैं। ऐसे ही कोई संसद में बिना इम्तिहान के नहीं आता है। दोनों तरफ के सांसद बैठे हैं, सब इम्तिहान में पास होकर ही आते हैं। इस तरह से मज़ाक करना कहां तक उचित है? जितने सांसद आए हैं, वे देश की इच्छाशक्ति के परिचायक हैं। एक छोटे समुह द्वारा जिस तरह से यह बात कही जा रही है, मैं नाम नहीं लेना चाहता हूं, यह शर्मनाक भी है और अपमानजनक भी है।

          महोदया, देश की जनता के साथ यह अन्याय न किया जाए। सब की बात सुनकर के, सब पर विचार करके सदन एक निर्णय पर पहुंचे और वह निर्णय सबको मान्य होना चाहिए। यह जो चार बिल आए हैं, आज जन लोकपाल पर चर्चा है। मैं यह कहना चाहता हूं कि जन लोकपाल बिल में भी अच्छी बातें हैं। उसको पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता है, लेकिन यदि प्रधानमंत्री जी को, सुषमा जी ने पहले का ज़िक्र किया, लेकिन मुझे याद है कि वर्ष 1968 में लोकपाल बिल पहली बार आया था, इसके बाद वर्ष 1977 में चौधरी चरण सिंह जब गृह मंत्री थे, तब वे लेकर आए। दिनेश गोस्वामी न्याय मंत्री थे, वह लेकर आए। उसके बाद के बारे में आपने बताया। लेकिन यह सत्य है कि कभी भी इस सदन ने यह बिल पास नहीं किया। कारण चाहे जो रहे हों, चाहे इनकी सरकार रही हो, चाहे उनकी सरकार रही हो, दोनों तरफ की सरकारें रही हैं...( व्यवधान) हम भी उसमें रहे हैं। आप लोग ज्यादा समय तक रहे हैं, हम लोग बहुत कम समय तक रहे हैं। इसलिए मैंने उसका विवरण नहीं किया।

          महोदया, यदि आप इतिहास देखें तो भ्रष्टाचार से लड़ने का समाजवादियों का इतिहास रहा है। जितना समाजवादियों का इतिहास रहा है, उतना किसी का नहीं रहा है। मैं बताना चाहूंगा कि डॉ. लोहिया ने पहली बार चर्चा में कहा था कि एक रुपया विकास के लिए जाता है, लेकिन उसमें से आम आदमी के पास केवल दस पैसे पहुंचते हैं। मुझे याद है कि पंडित जवाहर लाल जी जो कि तत्कालीन प्रधानमंत्री थे, उन्होंने कहा कि दस पैसा नहीं चार आना जाता है।...( व्यवधान) डॉ. लोहिया के समय में राजीव गांधी कहां थे?...( व्यवधान) उस समय पूरे देश में यह चर्चा हुई और यह चर्चा गांव तक पहुंची कि विकास के पैसे में...( व्यवधान) वह हिसाब पूछा जाना चाहिए। दस पैसा केवल पहुंचा और बाकी पैसा नहीं पहुंचा, देश के प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया।...( व्यवधान) बेनी प्रसाद जी, पहले आप भी यहीं थे, अब आप गलती करके उधर चले गए हैं।

          महोदया, मैं यही बताना चाहता हूं कि सबसे बड़ा आंदोलन किसी ने पूरे देश में किया तो वह जयप्रकाश नारायण जी ने किया था। इतना बड़ा आंदोलन कि एक चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करने का काम किया। इतना बड़ा आंदोलन इस देश में किसी नेता ने करने का काम नहीं किया। वह भी समाजवादी थे।मैं आपको यह बताना चाहूंगा कि समाजवार्दी पार्टी हमेशा ...( व्यवधान) समाजवादियों का अपना एक अलग इतिहास रहा है।

          मान्यवर, जो जन लोकपाल बिल में प्रधानमंत्री को लाने की बात है, उसमें मैं चाहूंगा कि कुछ संशोधन होने चाहिए। जैसे विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय या आंतरिक सुरक्षा, ये ऐसे विषय हैं कि कोई प्रधानमंत्री अगर इस पर निर्णय लेगा और अगर वह जन लोकपाल के दायरे में आएगा तो कोई भी काम वह नहीं कर पाएगा। इसलिए प्रधानमंत्री को इन तीन बातों से अलग रखें और तब उसके दायरे में रखा जाए।  

  13.16 hrs. (Dr. M. Thambidurai in the Chair)           मान्यवर, मैं आपके माध्यम से यह चाहूंगा कि अनुच्छेद 105 में, जो सांसदों को यहां पर इम्युनिटी है, वह बरकरार रखी जाए। जन लोकपाल बिल में यह मांग है। उसमें यह रखा गया है कि सांसद जो भी लोकसभा में बोलेंगे, वे सब इसकी परिधि में आएंगे। यह नहीं होना चाहिए। यह इसलिए नहीं होना चाहिए क्योंकि सांसद चाहे जिस पार्टी के हों, वे अलग-अलग अपनी राय यहां रखते हैं। वे बहुत-सी बातें कहते हैं। किसी को भी नागवार गुजर सकता है। यहां पर कोई सांसद निष्पक्ष रूप से कोई बात कहने में सक्षम ही नहीं होगा। इसलिए मेरा आपसे यह आग्रह है कि सांसदों को इस परिधि में कतई नहीं रखा जाए। इसी के साथ-साथ मान्यवर मैं यह भी कहना चाहूंगा कि जो जन लोकपाल बिल की धारा 4 की उपधारा 17 है, उसमें निम्न वाक्य जोड़ दिए जाएं। शर्त यह है कि लोकपाल के लिए चयनित किए जाने वाले व्यक्तियों में अल्पसंख्यक, दलित, और पिछड़े वर्ग के व्यक्तियों को उनकी आबादी के अनुपात में चयनित किया जाए। यह मेरा मानना है। लोकायुक्त वाले मुद्दे पर हम बाद में आएंगे। मान्यवर, यह मैं चाहूंगा कि उसमें यह बात जरूर जोड़ दी जाए। अन्य नेता बोल रहे थे, उन्होंने इसका उल्लेख भी किया था। मैं चाहूंगा कि इसको भी संशोधित करके इसे जोड़ना अत्यंत आवश्यक है।

श्री लालू प्रसाद : यह तो उस समय संशोधन दीजिएगा।

श्री रेवती रमण सिंह : इसी में आएगा। क्या उसमें संशोधन अलग से होगा? ...( व्यवधान) मान्यवर, एक धारा 6 की उपधारा-सी है। इसमें यह है कि डिसमिसल और रिमूवल शब्द को हटा दिया जाए। इस धारा की उपधारा-एक्स को हटा दिया जाए क्योंकि जन प्रतिनिधियों के शपथ पत्र की जांच निर्वाचन आयोग भी करता है, आयकर विभाग भी करता है। जो जन लोकपाल में दिया गया है कि इनको उसके अंतर्गत रखा जाए, उसको हटा दिया जाना चाहिए क्योंकि जांच तो पहले ही हो जाती है, चाहे निर्वाचन आयोग करता है, चाहे आयकर विभाग करता है।

          मान्यवर, इसी के साथ मैं यह भी कहना चाहूंगा ...( व्यवधान) मान्यवर, मैं इस बात से भी सहमत हूं कि जो तीन बातें कही गयी हैं- लोअर ब्यूरोक्रेसी, जिसमें सबसे ज्यादा आम जनता से उन्हीं का ताल्लुक होता है। तमाम जगह तहसील दिवस में तहसीलों में जिलाधिकारी जाते हैं। लेकिन किसी भी गरीब आदमी की वहां सुनवाई नहीं होती। वे प्रार्थना पत्र दे देते हैं। वह रद्दी की टोकरी में चला जाता है। वह आम आदमी के लिए जिम्मेदार और उत्तरदायी हों। जो आदमी एप्लीकेशन देगा, उसका पन्द्रह दिनों के अन्दर निपटारा आवश्यक है। यदि निपटारा नहीं करें तो उनके ऊपर ज़ुर्माना होना भी आवश्यक है।  तभी उनकी समझ में आएगा कि एक आम आदमी शटलकोक की तरह यहां से वहां तक घूमता रहता है, उसकी बात कोई सुनता नहीं है। मैं चाहूंगा कि अगर आपको सशक्त लोकपाल बनाना है तो सशक्त लोकपाल में सभी दवा विक्रेता कम्पनियां, कार्पोरेशन, खाद बनाने वाली कम्पनियां, निजी कम्पनियां, खाद्य पदार्थों का व्यापार करने वाले सभी व्यापारी, इलैक्ट्रोनिक एवं प्रिंट मीडिया लोकपाल के दायरे में आने चाहिए। इसी के साथ-साथ जितने एनजीओज़ हैं, वे भी इसके अंतर्गत आने चाहिए, क्योंकि अभी तक एनजीओज़ के बारे में किसी ने नहीं कहा, न इधर से किसी ने कहा और न ही उधर से किसी ने कहा कि एनजीओज़ को भी इसके अंतर्गत रखा जाए। यह बड़ी विडम्बना की बात है कि कोई भी यह कहने को तैयार नहीं है कि एनजीओज़ को भी इसके अंतर्गत रखा जाए।

          सभापति महोदय, मेरी आपके माध्यम से मांग है, सदन की यह भावना है कि जितने एनजीओज़ हैं, उन्हें भी इसके अंतर्गत रखा जाए। जितने कार्पोरेट घराने हैं, बड़े औद्योगिक घराने हैं, उन सब को भी इसके अंतर्गत रखना चाहिए। इसी के साथ-साथ मैं यह भी चाहूंगा कि जो लोकपाल चुनने की प्रक्रिया है, चयन पारदर्शी होना चाहिए और चयन समिति के अध्यक्ष प्रधान मंत्री जी होंगे तथा उसके सदस्य लोक सभा एवं राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष होंगे। प्रधान मंत्री जी जिस सदन के नेता हों, उन्हें छोड़ कर दूसरे सदन का नेता भी, सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीश, देश के दो बड़े उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश, भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक इसके सदस्य होंगे। अगर इस तरह का आप बनाएं तो उससे उसकी धार भी रहेगी और सार्वभौमिकता भी रहेगी। पूरे देश के चुने हुए ज्यूडिशयरी के लोग भी आएंगे। आप बुद्धिजीवी तो हैं ही, आप वकील हैं, बुद्धिजीवी तो होंगे ही। ...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : There are many Members who want to speak. So please be brief.

श्री रेवती रमण सिंह : सभापति महोदय, मैंने स्पीकर साहब से आग्रह किया था कि इसे टाइम लिमिट में न बांधिए। इस पर पूरी चर्चा कराइए और जितने सदस्य बोलना चाहें, उन सब को इस पर बुलवाएं और श्री बेनी वर्मा को तो जरूर बुलवाएं। ...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : We can give opportunity to all Members if they cooperate with the Chair and make brief submissions. Otherwise, it cannot be done.

श्री रेवती रमण सिंह : सभापति महोदय, ज्यूडिशयरी को इसके अंतर्गत लाने के लिए मैं चाहता हूं, मुझे याद है कि एक बार सोमनाथ दादा उस आसन पर बैठे थे, उन्होंने तत्कालीन कानून मंत्री जी से एक सवाल पूछा, Can you tell me as to whether anywhere in the world a judge himself appoints another judge? तब कानून मंत्री जी खड़े होकर बोले, This happens nowhere else in the world, Sir, except in India. उसके लिए यह जरूर होना चाहिए। पहले यह अधिकार एग्ज़ीक्यूटिव को था, लेकिन बाद में यह बदल कर सुप्रीम कोर्ट में चला गया, उसमें हम चाहते हैं। मैं सुषमा जी की बात से सहमत हूं कि ज्यूडिशियल कमीशन बनना चाहिए। ...( व्यवधान) जो ज्यूडिशियल कमीशन है,...( व्यवधान) ज्यूडिशियल कमीशन किसी के अंडर नहीं रहेगा, यह इनडिपेंडेंट बॉडी है। वह जजों के एपाइंटमेंट से लेकर इनके क्रियाकलापों पर पूरी निगरानी रखे। यह एक अच्छा सुझाव है, इसका मैं समर्थन करता हूं।

श्रीमती सुषमा स्वराज :धन्यवाद, रेवती रमण सिंह जी।

श्री रेवती रमण सिंह : मान्यवर, मैं यह भी चाहता हूं कि जो तीन शर्तें हैं, मैंने तीनों शर्तों पर अपना पक्ष बता दिया है, लेकिन आज सुषमा जी से मैं खास तौर से आग्रह करूंगा कि ये आज जाकर सदन की भावनाओं से अवगत कराकर उस भूख हड़ताल को तुड़वा दें और यह कहें कि सदन आपको इन प्रिंसीपल मान गया है और बाकी निर्णय आते रहेंगे। सदन इन प्रिंसीपल मान गया है, इसलिए आप भूख हड़ताल आज समाप्त कर दीजिए।

          तीन बड़े-बड़े लोगों ने, श्री श्री रविशंकर जी ने, स्वामी अग्निवेश जी ने और संतोष हेगड़े, जो कर्नाटक के लोकायुक्त थे, यह मांग की है कि उनको अपना अनशन देशहित में तत्काल तोड़ देना चाहिए। यह समय की मांग भी है और इसे पूरा सदन चाहता भी है।

          मैं इन्हीं बातों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं।

                                                                                                               

MR. CHAIRMAN : Hon. Members, before I call the next speaker, I have to make an announcement.  Those hon. Members who want to lay their written speeches may do so.

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):कोई लिखित में भाषण नहीं देगा, इस पर सब लोग बोलेंगे। हाउस को आप चार दिन चलने दीजिए।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: We are not insisting.  We are allowing all the hon. Members.  It is for the hon. Members.  So, those hon. Members who want to lay their written speeches, they can do so.  Those will form part of the proceedings.

श्री दारा सिंह चौहान (घोसी): सभापति जी, आज सदन के नेता के द्वारा लाये गये प्रस्ताव पर यह चर्चा शुरू हुई। चर्चा शुरू होने से पहले ही, मैं समझता हूं कि सदन के लगभग सभी सांसद इस पर चर्चा करना चाहते हैं। उसके पीछे कारण है। चूंकि जिस संविधान की दुहाई दी जा रही है, मय सदन के नेता, नेता प्रतिपक्ष की तरफ से भी, हम संविधान की कसम खाकर यहां आते हैं और आज पूरी संसद में सभी दलों के, चाहे पक्ष हो, विपक्ष हो, सारे सांसद अपनी बात कहना चाहते हैं, उसके पीछे भी कारण होंगे। जिस तरीके से जनता के द्वारा चुने गये सांसद देश के संविधान की बुनियाद पर खड़ी इस संसद में अपने क्षेत्र की बेहतरी की, विकास की बात करते हैं, ईमानदारी से अपना काम करते हैं, उनकी ईमानदारी पर ही उंगली उठाई जा रही है। जिस तरीके से बात की जा रही है, जिन शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है, इसी नाते आज इस संसद के सांसद आहत हैं, इसलिए मांग कर रहे हैं कि इसमें कोई समय सीमा नहीं होनी चाहिए और सब को अपनी बात कहने का अधिकार होना चाहिए।   

          आज जो नया प्रस्ताव लाया गया, इस पर चर्चा हो रही है, उनके वक्तव्य पर चर्चा हो रही है। आज पूरा देश, मैं समझता हूं, कल से ही देश के लोग व्याकुल थे कि कल पार्लियामेंट में क्या होने वाला है। वे सुनना भी चाहते थे, लेकिन कल चर्चा न होकर आज शुरू हुई है और आज भी देश के लोग जो देश के संविधान में आस्था और विश्वास रखते हैं, वे लोग आज बड़े ध्यान से इस देश की संसद की कार्यवाही को गम्भीरता से देख रहे होंगे। यहां भ्रष्टाचार को लेकर पता नहीं कितने लोकपाल, जन-लोकपाल बिल किस-किसके द्वारा लाये गये, उनकी नीयत पर हम सवाल नहीं खड़ा करना चाहते। मैं इतना जरूर कहना चाहता हूं कि डॉ. भीमराव अंबेडकर साहब ने संविधान का दस्तावेज हमें सौंपा, जिसकी कसम खाकर हम यहां आते हैं और संसद चलायी जा रही है।  आज मैं समझता हूं कि उस पर भी कुछ लोग सवाल खड़ा करना चाहते हैं।  

          महोदय, जहां तक आर्थिक भ्रष्टाचार का सवाल है, देश का संविधान जिसे बाबा साहब ने बनाया है, मैं समझता हूं कि वह अपने आप में परिपूर्ण है।  उसमें सारे अधिकार निहित हैं।  जब संविधान नहीं रहा होगा, उसके पहले चाहे जिस तरीके की संस्थायें काम करती रही होंगी, लेकिन जब से हमें संविधान मिला, तब से हमें संविधान के दायरे में रहकर काम करने का अवसर मिला। मैं इस बात को जरूर कहना चाहता हूं कि कोई ऐतिहासिक नहीं, एक नया इतिहास रचने की कोशिश हो रही है, मैं उसे साजिश नहीं कहूंगा, आर्थिक भ्रष्टाचार को लेकर कोशिश हो रही है।  इस देश में केवल आर्थिक भ्रष्टाचार ही नहीं सामाजिक भ्रष्टाचार का भी सवाल खड़ा होगा।  आने वाले दिनों में इस देश में आर्थिक-सामाजिक गैर-बराबरी के लिए जो संविधान में व्यवस्था की गयी, आज उस सामाजिक भ्रष्टाचार पर कोई बोलने वाला नहीं है, इसीलिए कि वे बेबस लाचार लोग अपनी बात बड़ी मुश्किल से कह पाते हैं।  आज से दस-पन्द्रह साल पहले सिर्फ कुछ लोग जिनके अंदर राजनीतिक जागरूकता पैदा हुयी, उसी के नाते आज उन्हें विधानसभा और लोकसभा में पहुंचने का अवसर मिल रहा है, इसके पहले मैं समझता हूं कि लोकसभा और विधानसभा में उनके लिए पहुंचने का कोई अवसर नहीं था।  इसलिए आज वह उस पर भी चर्चा चाहते हैं, उस पर भी संसद की कार्यवाही को देखना और सुनना चाहते हैं।  इस देश में आजादी के 63 सालों के बाद जो सामाजिक भ्रष्टाचार है, उस पर क्यों नहीं चर्चा हो रही है?  मैं इस बात को इसलिए कह रहा हूं कि आज जो तमाम लोग आहत हैं, चाहे वह किसी क्षेत्र से आते हों, उनकी एक ही मांग है कि चाहे जो भी चर्चा हो, जो भी बिल आए, चाहे जिसका भी बिल हो, वह संविधान के दायरे में होना चाहिए।  संविधान से ऊपर कोई नहीं है, संसद के ऊपर कोई नहीं है, इसलिए संविधान के दायरे में इसकी सुप्रीमैसी को बरकरार रखते हुए जो भी बिल आएगा, हम उस पर विस्तार से बिंदुवार चर्चा करेंगे।   

          आज रामलीला मैदान में जो कुछ भी हो रहा है, मैं समझता हूं कि हमारे मीडिया के साथियों ने भी काफी साथ दिया।  ऐसा हो सकता है।  यह ठीक है कि मीडिया को लाया जा सकता है, अगर संसद चाहेगी   ...( व्यवधान)  जो भी हो, वह तो बाद में बिंदुवार तय होगा, अभी तो दूसरे विषय पर चर्चा हो रही है। ...( व्यवधान) यह हो सकता है।  मैं स्पष्ट बात करूंगा।  हो सकता है कि हमारी मीडिया के कुछ साथी टीआरपी के चक्कर में गए हों।  बहुत लोगों के साथ वहां जाने के बाद भी धोखा हुआ, इसलिए मैं उस पर चर्चा नहीं करूंगा।  मैं इतना जरूर कहूंगा कि आज नीयत का सवाल पैदा होता है।  बाबा साहब ने संविधान जब इस देश को सौंपा, तो उन्होंने एक बात कही थी कि नीति चाहे कितनी भी अच्छी हो, अगर हमारी नीयत में खोट है, तो इस देश की जनता को इंसाफ नहीं मिल सकता है।  यही कारण है कि आजादी के 63 सालों में, जो बाबा साहब ने नीति बनायी और नीति को चलाने वाले की अगर मंशा साफ होती, तो इस मुल्क में इस तरीके का व्यवधान पैदा न होता।  ..( व्यवधान)

          सभापति महोदय, मैं इसलिए इस बात को जरूर कहना चाहूंगा क्योंकि हमारा संविधान धर्मनिरपेक्ष है, उसकी बुनियाद पर है, इसलिए सारे लोगों को अपनी बात कहने का अधिकार है।  इसलिए मैं चाहता हूं कि जो भी बने, जिस तरीके का भी बिल आए, लोकपाल जिस तरीके का भी हो, उसमें इस देश मे रहने वाले जो गरीब हैं, इस देश में रहने वाले चाहे दलित समाज के हों, पिछड़े हों, अल्पसंख्यक हों ऐसे सारे समाज के वंचित लोगों का समावेश जब तक नहीं होगा तब तक इस मुल्क में ऐसे लोकपाल से इंसाफ नहीं मिल सकता है। ...( व्यवधान) सारे वर्गों को मैं कह रहा हूं। जबतक गैरबराबरी सामाप्त नहीं होगी...( व्यवधान) हमारी बात थोड़ी कड़वी लग सकती है लेकिन यह सच्चाई है। हम सच्चाई से बहुत दिनों तक इंकार नहीं कर सकते हैं। इसलिए सभापति महोदय जी, हम आप के संज्ञान में जरूर लाना चाहेंगे कि चाहे जिस तरीके के तीनों प्वाइंट्स पर राज्यों में लोकपाल को लेकर चर्चा हो रही थी, लेकिन यह तो संविधान के मुताबिक यह राज्य के क्षेत्राधिकार में आता है। उनसे राय ली जानी चाहिए कि वे क्या चाहते हैं? जिस प्रदेश से मैं आता हूं उस प्रदेश में लोकायुक्त पहले से है। वह वहां काम भी कर रहा है और ईमानदारी से काम भी हो रहा है। सिटीजन चार्टर की चर्चा, छोटे कर्मचारियों को इसके अंदर लाने की हो रही थी । मैं तो बहन मायावती जी को बधाई देना चाहता हूं कि चर्चा से पहले ही उत्तर प्रदेश की सरकार ने उत्तर प्रदेश गारंटी अधिनियम ला कर ऐसे तमाम जो छोटे-छोटे अधिकारी जिन पर आशंका की जाती हैं उसमें शामिल करने का काम किया। उनको टाइमबाउंड कर समयबद्ध तरीके से 15 दिन, 20 दिन या 25 दिन में अगर आपने काम नहीं किया तो दंड दिया जाएगा और  उनको आर्थिक दंड भी दिया जाएगा।

          सभापति महोदय, जहां तक प्रधानमंत्री और न्यायपालिका का सवाल है, हम इतना जरूर कहना चाहेंगे कि संसद से ऊपर कुछ भी नहीं है। संविधान से बड़ा कुछ भी नहीं है। जिस संविधान के आधार पर हम संसद को चला रहे हैं अगर संसद एक मत से प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को शामिल करना चाहती, तो निश्चित रूप से हम उस पर विचार करेंगे, उसका समर्थन करेंगे। ...( व्यवधान) अगर संसद लोकपाल लाना चाहती है, हमें कोई ऐतराज नहीं है। ...( व्यवधान) लेकिन हम ऐसे बिल का तभी समर्थन करेंगे जब उसमें अनुसूचित जाति के लोग, पिछड़े समाज के लोग, अकलियत के लोग रखे जाएंगे। हम सारे लोगों की भागीदारी की बात करते हैं। इस देश में जिसकी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। लेकिन आजादी के 63 सालों में वह भागीदारी, इंसाफ नहीं मिल पाया है। इसलिए ऐसे बिल में वैसे लोगों को शामिल किया जाएगा तो निश्चित रूप से हम उस का समर्थन करेंगे।...( व्यवधान) दिखता तो बहुत कुछ नहीं है।

          इसलिए सभापति महोदय, मैं ज्यादा चर्चा न करते हुए, समय की सीमा में रहते हुए क्योंकि हमारे तमाम सांसद अपनी बात को कहना चाहते हैं, सात घंटा समय आपने दिया है, इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करना चाहता हूं। संविधान से ऊपर कुछ भी नहीं है, संविधान के दायरे में रह कर संसद की गरिमा बनाए रखने के लिए जो भी बिल आएगा उसमें ऐसे गरीब समाज के सारे वर्गों को शामिल किया जाए। हम ऐसे बिल का समर्थन करेंगे।

   

श्री शरद यादव : सभापति जी आज प्रणब बाबू ने इस चर्चा का शुभारंभ किया। विरोधी दल की नेता बहन सुषमा जी, रेवती रमण जी और संदीप दीक्षित जी ने जो कहा मैं उन सब बातों को नहीं दुहराऊंगा। आज फिर मेरे मन में जो देश में हो रहा है वह अच्छा है उसे हम लोग नमन करते सिर झुकाते हैं। हमने जिंदगीभर आंदोलन किए। इस सदन में कोई आदमी ऐसा नहीं है जिसकी सज़ा हमारे से ज्यादा हो। हम साढ़े चार साल तक जेल में बंद रहे।...( व्यवधान) लेकिन जो हालात हैं, उन्हें भी देखा जाए। मैं कहना चाहता हूं कि सुषमा जी ने जिन तीन बातों की सहमति दी है, उसे मैं फिर नहीं दोहराना चाहता। सम्पूर्ण कर्मचारी इसके दायरे में आने चाहिए। एक लोकपाल में आए, दो लोकपाल में आए, आप जो तय करेंगे। सिटीजन चार्टर में कोई दिक्कत नहीं है, सरकारी पक्ष और विपक्ष भी। ...( व्यवधान) बिहार में लागू है, बिहार में बाद में आएंगे। इसमें कोई एतराज नहीं है। लोकायुक्त और लोकपाल साथ आएं, यह भी ठीक है। ठीक सहमति है, बन जाए, कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन जिन्हें दायरे में ला रहे हैं, उन्हें जरूर इंसाफ मिलना चाहिए। ऐसा न हो कि उनका तंगी और तबाही का दौर शुरू हो जाए। इसमें यह भी देखना है। रिड्रैसल मकैनिज़्म बिल्कुल सख्त, ठीक और दुरुस्त होना चाहिए।

          सभापति जी, मैंने आज और कल जो देखा, मैं फिर इस सदन के हक में खड़ा होना अपना फर्ज ही नहीं मानता बल्कि सम्पूर्ण चेतना से इसके हक में खड़ा हूं। इस सदन का श्याम पक्ष भी है, उजला पक्ष भी है, अंधेरा भी है और उजाला भी है। कुछ लोगों ने पैसा ले लिया था, जो जेल में जाने वाले हैं। मैं उनका नाम लेना बेकार मानता हूं। लेकिन उसमें कुछ लोग बेकार ही फंस रहे हैं। उन गरीब लोगों का कोई दोष नहीं है। उन्होंने इस सवाल को यहां बेपर्दा किया। गेहूं के साथ घुन पिसता है, ऐसा हो रहा है। यहां आपकी जगह श्री रबि राय बैठते थे। ज़ीरो आवर उन्होंने ही शुरू किया। जसवंत जी और हम साथ थे, पार्टी टूट गई थी। चंद्रशेखर जी हम लोगों के नेता थे। बंटवारा हो गया था। मंडल लगा था तो उससे पूरे देश में बड़ी तबाही मची थी। लोगों ने यह तय किया कि हम तुम्हारे सिर में बैठेंगे और नहीं बैठने देंगे तो हम आग लगाकर मर जाएंगे। ऐसा हुआ था। पूरे देश में सबसे ज्यादा दिक्कत हमें हो रही थी। हम जहां जाते थे, वहां लोग घेर लेते थे। लेकिन घेरने वाले लोगों ने हमारे साथ कभी ऐसा नहीं किया कि हमारे सम्मान को ठेस लगे, बदसलूकी नहीं की। अभी इसी सदन में सुषमा जी ने याद कराया लेकिन अधूरी बात याद करवाई।

ग्यारह सांसद ...( व्यवधान) बारह नहीं, ग्यारह सांसद थे। ...( व्यवधान)

श्री शैलेन्द्र कुमार :  लोक सभा और राज्य सभा, दोनों के  12 सांसद थे। ...( व्यवधान)

श्री शरद यादव : नहीं, दोनों के मिलाकर ग्यारह सांसद थे।  ...( व्यवधान) दुनिया का कोई न्यायालय, दुनिया का कोई सदन, 20, 25 और 30 हजार, जब आडवाणी जी ने कहा कि सदन में क्या हो रहा है, उस समय मैं इस सदन में नहीं था। मैं राज्य सभा, यानी ऊपरी सदन में था। श्री जेठमलानी और अरूण जेटली जी ने उनके हक में बोलना शुरू किया, तो मैंने खड़े होकर घंटे भर उनकी काफी क्लास ली थी। ...( व्यवधान) उस दिन पूरे सदन को तैयार किया कि इससे बड़ा मौका इतिहास में नहीं आयेगा। इसमें पैसा कितना है, चवन्नी है, दुवन्नी है या कौड़ी है, यह ऐसा मौका है जब देश में इस सदन की गरिमा, पुरुषार्थ और सिर को ऊंचा उठाने का सबसे बड़ा मौका है। तेरह दिन में ग्यारह सांसदों को हटा दिया गया। उन्हें हटा नहीं दिया गया, बल्कि मैम्बरशिप ही चली गयी। उन पर केस चले। अभी भी उन पर केस चल रहे हैं।  ...( व्यवधान)

          सभापति जी, आप चुनाव लड़ते हैं, इसलिए जानते हैं कि एक सांसद को कितनी लड़ाई करनी पड़ती है। उसके बाद ही वह सांसद बनता है। उनकी जिंदगी पूरी तबाह हो गयी जो इस सदन ने की। जब हवाला लगा, अभी सुषमा जी ने उस बारे में बात याद दिलायी। आडवाणी जी सदन के नेता थे। उस समय श्री वी.पी. सिंह जी हट गये थे। मैं भी सदन का नेता था। इस बारे में जयपाल रेड्डी जी जानते हैं। मैंने कोई गुनाह नहीं किया था। चमन भाई के साथ पांच लाख रुपये लेकर कोई आदमी आया था। मुझे क्या मालूम कि वह हवाला वाला है, घोड़े वाला है या ऊंट वाला है। वह बलवा है या बलवा का बाप है, यह मुझे नहीं मालूम। जब मेरे पास पूछने आये, तो जस्टिस वर्मा ने यह काम किया कि हवाला में बंद करो। वे जबलपुर के हैं और हम भी वहीं के हैं। वे हमारे चुनाव का साइकिल से काफी प्रचार करते थे। हम उनके घर खाना खाने जाते थे और रात को वहीं सो जाते थे। ...( व्यवधान) जी हां, जस्टिस जे.एस. वर्मा। वे बड़े शानदार आदमी थे। वे देश के मुख्य न्यायाधीश रहे हैं। हवाला में हमें, आडवाणी जी आदि सबको बंद किया गया। उनकी बेटी अमेरिका से आयी, तो उसने मुझे घर खाना खिलाने के लिए बुलाया। उस समय उन्होंने कहा कि तुमने क्यों मान लिया? मैंने कहा कि मिला था, तो मान लिया। हमें जो पैसा मिला, उसे हमने दूसरे दिन मध्य प्रदेश को दे दिया। शरद पवार जी जानते हैं कि चुनाव में पैसा इकट्ठा करके हमें बांटना पड़ता है। क्या हमारे यहां कोई कारखाना चल रहा है? क्या हमारे बाप-दादा कौड़ी रखकर गए हैं? हम चंदा लेते हैं। हमने जज से कहा कि आप हवाला कह रहे हैं, हमें आप फांसी पर चढ़ा दो। हम इसी कोर्ट से बाहर निकलेंगे और हमे कोई चंदा देगा, तो फट से ले लेंगे। हमें सब तरह की दिक्कत है। लाठी चलाना है।  उत्तर भारत के लोग तो ऐसे ही हैं। जो साउथ के लोग हैं, शरद पवार जी, मुत्तेमवार जी, ...( व्यवधान) मुंडे जी हैं, ये मालदार लोग हैं।...( व्यवधान) ये कारखाना भी चलाते हैं और अपना कोआपरेटिव भी चलाते हैं। यह अच्छी बात है, खराब बात नहीं है। ...( व्यवधान) श्री विलास राव देशमुख भी हैं। ...( व्यवधान) नहीं, विंध्या के नीचे आप लोग तैयारी करके रखते हैं, प्रॉफिट आदि सब तरह की चीजें बनाते हैं।    चीनी मिल चलाते हैं, लेकिन हम लोग जो विंध्य के ऊपर बैठे हैं, हमें रोज सवेरे-शाम कमाना पड़ता है फिर खाना होता है। हम लोग बंदर हैं, हमको किसी चीज का ज्ञान नहीं है, हम न कारखाना चला सकते हैं, न हम रचनात्मक काम कर सकते हैं। यह हमारा दुर्गुण है। इन लोगों में यह गुण है कि ये चुनाव के साथ-साथ संस्थाओं को खड़ा करते हैं, कोई स्कूल चलाता है, कोई अस्पताल चलाता है, कोई चीनी मिल चलाता है। जब आडवाणी जी ने इस्तीफा दे दिया तो उसके एक घण्टे बाद मैंने जयपाल रेड्डी जी से ही पत्र लिखवाया। उस समय आप थे और स्वर्गीय सुरेंद्र मोहन जी थे, आप जानते हैं, अब मुझे याद नहीं है कि आपसे लिखवाया था या उनसे लिखवाया था। अंग्रेजी मैं समझ सकता हूं, लिख सकता हूं, लेकिन बोल नहीं सकता। सीधी बात है कि मैंने लोक सभा से इस्तीफा दे दिया। आडवाणी जी ने भी इस्तीफा दिया था, सुषमा जी ने उनका नाम लिया, लेकिन मेरा नाम भूल गयीं। मेरा नाम देश ही भूल गया।...( व्यवधान) 70 आदमियों का मैं लीडर था, 90 आदमियों के लीडर आडवाणी जी थे, उनके बारे में पूरा देश जानता है कि आडवाणी जी ने इस्तीफा दिया। इमरजेंसी लगी, तो जयप्रकाश जी ने मुझे खड़ा किया था, मैंने फिर इस्तीफा दिया और जब वी.पी. सिंह का आंदोलन चला, तो मैंने फिर इस्तीफा दिया। ...( व्यवधान) कुछ लोग बगैर बोले मान नहीं सकते हैं।...( व्यवधान) सीधी बात है। मैं कहना चाहता हूं कि आज जो आंदोलन है, अन्ना जी के हक में सबसे बड़ा ट्रिब्यूट देने का काम किसने किया, मनमोहन सिंह जी ने आज ट्रिब्यूट दिया है, मैंने ही सबसे पहले दिन उनको ट्रिब्यूट दिया था कि वह ईमानदार आदमी है, जितने लोग यहां हैं, आप सभी जानते हैं। लेकिन अकेले ईमानदारी काम नहीं करती। उसके साथ सम्पूर्ण दृष्टि भी काम करती है। उनके बारे में हम सभी लोगों की सहानुभूति जुड़ी है। जिस समय वह पांच अप्रैल को जन्तर-मन्तर पर बैठे थे, उन लोगों ने मुझे कहा कि पांच मिनट के लिए यहां आना चाहिए, तो मैं वहां गया था और भाषण करके आया। उसके बाद चौटाला जी गए, फिर उमा भारती जी चली गयीं, तो कहा गया भागो, भागो और वहां भागमभाग हो गयी।...( व्यवधान) घेरो, मारो, खदेड़ो, भगाओ। अब वहां कोई नहीं जा रहा है।...( व्यवधान) उसका क्या नतीजा है।...( व्यवधान) क्या यह कोई इतनी बड़ी बात है।...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Please don’t disturb him.

          Sharad Ji, please address the Chair.

श्री शरद यादव : यह कोई इतनी बड़ी बात नहीं है कि मुझे याद नहीं है और आपको याद है कि वहां कौन गया था। विलासराव देशमुख जी के जमाने में उन्होंने कभी भूख हड़ताल नहीं की। इन्होंने ऐसी उस्तादी की है, तो गए होंगे यह भी।...( व्यवधान) हमारे यहां उस्ताद हैं श्री गोपीनाथ मुंडे जी। यह भी कोई मामूली आदमी नहीं हैं। यह गए होंगे, महाराष्ट्र के हैं, तो गए होंगे। मैं यह बात नहीं कह रहा हूं, लेकिन बाकी राजनीतिक लोग नहीं जा रहे हैं। लेकिन वहां क्या-क्या हो रहा है। एक आदमी है फिल्म वाला, उसका नाम मुझे याद नहीं है। एक ओम पुरी राज नारायण जी के साथ था, तो मैं समझा कि राजेन्द्र ओम पुरी है। लेकिन यह कोई और ओम पुरी है। वह कह रहा था कि दारू की बोतल लो, नोट ले लो, लेकिन वोट मत दो। कह रहा है कि यदि कोई एमपी है, जाने दीजिए, और पता नहीं क्या-क्या कह रहा है। मुझे किसी ने बताया कि खुद  ...  *           सभापति जी, मैं बता रहा था...( व्यवधान) ये दो बीवियां बता रहे हैं...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Sharad Yadavji, please address the Chair. We are discussing the very serious issue.

श्री शरद यादव : मेरी बीवी तो एक है और छोटी है,...  *  और वह बोल रहा है कि जो लोग यहां बैठे हैं उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है। इसी तरह एक पुलिस की अधिकारी रह चुकी हैं। मै घर पर बैठा लोगों से मिल रहा था कि मेरी पत्नी आई और कहा कि देखो क्या हो रहा है। टीवी में दिखाया जा रहा था कि उसने ओढ़नी ओढ़ रखी है और न जाने क्या-क्या कह रही थीं।...( व्यवधान) ये बता रहे हैं कि पहले वह एडवरटाइज़मेंट में आती थीं। उससे पहले पुलिस में थीं और अच्छी अधिकारी थीं। वह कह रही थीं कि राजनैतिक लोग इधर से उधर और उधर से इधर देखते हैं। जिंदगी भर तुम पुलिस में रहीं, हम लोग जिंदगी भर सड़क पर रहे। हमें वह क्या सिखाएंगी राजनीति। तुम तो पुलिस में रहकर रिटायर हुईं, हमने लोक सभा से तीन बार इस्तीफा दिया है और साढ़े चार साल हमें सजा हो चुकी है। लेकिन यह सब हमने अपने घर के लिए नहीं किया, बल्कि देश के गरीब, बेबस और लाचार लोगों के लिए लड़ाई लड़ते हुए किया था।

          अण्णा हज़ारे जी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं। यही पार्लियामेंट है, जहां बैठने वालों में से 27 लोग बंद हुए हैं और इसी पार्लियामेंट ने किए हैं। यही पार्लियामेंट है जिसने सत्यम को जेल में डाला। यही पार्लियामेंट है जिसने मधु कोड़ा को जेल में डाला। यही पार्लियामेंट है जिसने ए. राजा को, चाहे बलवा हो या घोड़े वाला हो या हसन अली हो, उन्हें जेल में बंद कराया है। यह संसद है और यही सदन है, कोई बाहर की बात नहीं है। और ये लोग हमारे बारे में जाने क्या-क्या कह रहे हैं। आंदोलन जय प्रकाश नारायण जी का भी हुआ था। उन्होंने जिंदगी में कभी चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन किसी चुनाव लड़ने वाले से कम नहीं थे। सन् 1942 में वह जेल तोड़ कर भागे थे, अपनी जान हथेली पर रखकर भागे थे, तो देश के लिए और उसकी आजादी के लिए उन्होंने यह किया था। मैं और ज्यादा नाम नहीं लेना चाहता, अरुणा आसिफ अली, डॉ. राम मनोहर लोहिया आदि भी उनमें से हैं, जिन्होंने समाजवादी आंदोलन के जरिए इस देश की आजादी के लिए संघर्ष किया और आजादी के आंदोलन को अपने हाथ में लिया, क्योंकि कांग्रेस के सब लोग उस समय बंद हो गए थे।

          यहां बहुत लोग हैं, जो संघर्ष से यहां आए हैं, कुछ लोग पालने से आए हैं। आजकल उनके बारे में कहा जाता है कि जैनरेशन चेंज हुआ है। वह क्या चेंज हुआ है कि जिनके बाप नेता रहे हैं, उनके बेटे यहां नेता हैं। एक अखबार रोज लिखता है कि जैनरेशन चेंज वालों ने क्या-क्या बोला।

          सभापति जी, इसी तरह युवा तुर्क यानि यंग टर्क, जैसे चन्द्रशेखर जी थे। यह अजीब तरह का टर्क है। लेकिन इन समाजवादियों ने बहुत लम्बा संघर्ष किया है। मैं यहां यह बात भी कहना चाहूंगा कि हां, इस पार्लियामेंट ने खराब काम भी किया है, वह यह कि इसी सदन में...* लेकिन यही सदन है, जिसमें हिन्दुस्तान के शानदार लीडर, हमारा बहुत वक्त अटल जी के साथ बीता है। इसी सदन में मात्र एक वोट से प्रधान मंत्री के पद से, अटल जी की सरकार चली गई थी। उनके ईमान को यदि याद नहीं करोगे, ए. राजा को याद करोगे, मैं इस पर एतराज नहीं कर रहा, ए. राजा को भी याद करो, लेकिन लोक सभा एक ऐसी जगह है कि अटल बिहारी वाजपेयी जैसा आदमी जो जिंदगी भर अनवरत इस देश के गांव-गांव, कस्बे-कस्बे में घूमा है, वह आदमी एक वोट का इंतजाम नहीं कर सका, सिद्धांत और नीति के चलते। अटल जी ने मुझे बुलाया और कहा कि शरद तुम्हें आज साथ देना चाहिए।

  14.00 hrs. (Mr. Deputy Speaker in the Chair) जिंदगी भर हमने तुम्हें मौहब्बत दी है, मैंने उनकी बात का जवाब नहीं दिया और वोट भी नहीं दिया। मुझे तकलीफ होती है कि सिद्धांतों की मजबूरी के कारण मैंने उन्हें वोट नहीं दिया। इसी सदन में देश का सबसे बड़ा पद जो प्रधानमंत्री का होता है, एक वोट के कारण चला गया।

          यहीं माननीय रविराय जी ने सात एमपीज, जो चंद्रशेखर जी के साथ थे, उनकी मैम्बरी ले ली थी। ...( व्यवधान) हां, यहां झारखंड वाला कांड भी हुआ है, उनको जेल में किसने बंद किया? माननीय प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव जी को घेरने का काम किसने किया? इसी सदन ने किया। इतना भला आदमी था लेकिन सरकार बचानी थी तो हो गया उपद्रव। झारखंड वाले बिना पैसे के मानते नहीं थे, क्या करते, हो गया उपद्रव। आप उपाध्यक्ष जी उनको अच्छी तरह जानते हैं। ...( व्यवधान) वहां देश के सब थैलीशाह पहुंचते हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा के पास सबसे ज्यादा पैसे वाले लोग पहुंचते हैं। उसमें भी यही गोलघर है जिसने खेल किया है। इसलिए जो वहां बैठे हैं उनसे मेरी विनती है कि जब हम मर्यादा को मानते हैं तो आपको भी मर्यादा में रहना चाहिए। आपने नारा दिया और सब एमपीज का घेराव किया, लेकिन हमने कोई गरम बात न करके नरम बात ही की है। माननीय सुषमा जी भी नरम बात कर रही हैं, माननीय रेवती रमण सिंह जी भी नरम बात कर रहे हैं, इसलिए आंदोलन करने वालों का फर्ज है कि भाषा की गरिमा बनाए रखें।

          याद रखना गोली लग जाती है तो आदमी मर जाता है लेकिन बोली जब लगती है तो आदमी को जिंदगी भर याद रहती है। इस देश में गोली का नहीं बोली का राज है, बहस का राज है, इसलिए बोली आप भी ठीक रखिये, हम भी ठीक रखेंगे। हम तो आपके लिए दूर से ही चिंतित हैं। हमें आपने अकेले बुलाया था बाकी किसी को नहीं बुलाया था, लेकिन सभी लोग चिंतित हैं। चिंता ऐसी है कि इस पूरे सदन ने आपसे विनती की, सलाम किया कि आप भूख-हड़ताल छोड़िये। हम तो आपकी इतनी इज्जत करते हैं, वहां के आंदोलन की इज्जत करते हैं, अकेले व्यक्ति अन्ना की इज्जत करते हैं, हम तो इस आंदोलन के पीछे जो लोगों की भावना है उसकी इज्जत करते हैं। हम तो आपका सम्मान और इज्जत करते हैं लेकिन आप इस सदन को घेरते हैं, एमपीज को घेरते हैं। एक एमपी ट्रेन में चढ़ा, उसे धक्के देकर, जैसे गांधी जी को साउथ अफ्रीका में निकाला गया था, इस सदन का वह सम्मानित सदस्य है, धक्के देकर बाहर निकाला गया। वह ट्रेन चली गयी, वह दूसरी ट्रेन से आया। ...( व्यवधान) आप इतना सब कुछ कर रहे हैं, घेराव कर रहे हैं, लेकिन हमारे सहने की ताकत देखिये कि हम तब भी आपसे मौहब्बत से, प्यार से, इज्जत से सलाम करके चल रहे हैं। लेकिन एक बात जान लीजिए कि यह सलाम एक-तरफा नहीं चलेगा, वहां जो लोग मीटिंग में बैठे हैं उनका काम है कि हम मर्यादा में हैं तो वे भी मर्यादा में रहें। यह बात माननीय दारासिंह जी ने ठीक कही है कि हम संसद की मर्यादा में हैं तो आपको भी मर्यादा में रहना चाहिए। घुंघट-दुपट्टा डालकर हमारा मजाक मत उड़ाइये, हम आपका मजाक उड़ाने  खड़े हो गये तो फिर हमारे पास तो ज्यादा जुबान है। हम तो इस काम को करते रहे हैं कि किसकी पगड़ी उछालनी है या किसकी पगड़ी नहीं उछालनी है। हमने तो कई लोगों की पगड़ी उछाली है और कई लोगों की पगड़ी उतारी है। हम तो आदतन पगड़ी उछालने वाले हैं। ट्रेज़री बैंच पर बैठने वालों की जब मन आता है, तब इनकी पगड़ी उछालते हैं। अगर हमारी पगड़ी पर कोई हाथ डालेगा, तो ठीक नहीं है।

          महोदय, मैं एक बात कहना चाहता हूं। अमरीका की नकल करने में आप एकदम समर्पण किए हुए हैं। उनकी सभ्यता, बोली, भाषा, पहनावा सभी के सामने आपने समर्पण किया है। उनके रंग रूप के सामने भी आपका समर्पण है। वे गोरे हैं, तो हम गोरी लड़की छांट रहे हैं। हमारा भगवान काला है, राम और कृष्ण काले हैं, लेकिन हम गोरी लड़की छांट रहे हैं। मार्टिन लूथर किंग को आज से लगभग 40 साल पहले रंग भेद के कारण गोली मारी गई थी। गोरे लोगों ने राष्ट्रपति भवन का नाम व्हाइट हाउस रखा हुआ है, लेकिन आज उस व्हाइट हाउस में ब्लैक को बिठाया है। उनका दिल बहुत बड़ा है। यहां लोकपाल बिल बन रहा है, सर्च कमेटी बन रही है, मैं कहना चाहता हूं कि हमारे देश में किसी में भी दर्द को सहने की क्षमता नहीं है। मुझे कोई बैकवर्ड न माने, मैं तो न जात मानता हूं, न भगवान मानता हूं और न ही मैं किसी मंदिर या मस्जिद में गया हूं। मैं तो मानता हूं कि जो जिंदा आदमी है और समाज है, उसकी इबादत और पूजा ही मंदिर-मस्जिद जाने के समान है। अन्ना जी तो रामलीला मैदान में 11 या 12 दिन से भूख हड़ताल कर रहे हैं, लेकिन देश का अस्सी फीसदी आदमी हर दिन नागा करता है, कभी सुबह का खाना नहीं खाता, कभी दोपहर का खाना या रात का खाना नहीं खाता। ये सभी जाति के अनुसार नीची जाति के लोग हैं। भारतीय समाज खंड-खंड है। आप लोग याद रखिए कि पानी जब पोखर या तालाब में जमा हो जाता है, तो गंदगी निकलती है, लेकिन जब नदी बहती है, तो पानी निर्जल, निर्मल होता है, इसलिए भारतीय समाज खंड-खंड है। मैं सदन के लोगों से, क्योंकि बाहर के लोग तो मानेंगे नहीं, ऊपर के लोग भी नहीं मानेंगे और ये बेचारे स्वतंत्र भी नहीं हैं। इनके लिए तो वहां कोई बैठा हुआ है कि क्या करना है या क्या नहीं करना है। चार महीने से डिब्बा बज रहा है। पहले बाइस्कोप रहता था। हम लोग देखते थे कि ताजमहल देखो, कुतुब मीनार देखो। मैं इसके आगे नहीं कहूंगा, लेकिन चार महीने से जो डिब्बा चल रहा है, एक डिब्बे वाला जो बंगाली मौसा है, वह तो लगता है कि मुं नोच लेगा। कोई अपनी राय देता है, तो वह अपनी टेढ़ी गर्दन करके देखता है और अपने बाजू में वह एक आदमी को और बैठा लेता है और कहता है कि बताओ और इसका जवाब दो। यह जो पायलट है, इसे कहता है कि उठ, उठ नहीं तो, इसे हुदियाता है। यह बेचारा बैठा हुआ है। इसे हुदियाता है कि बोल, इसका जवाब दे। अब यह जवाब कैसे दे? टीवी में कांग्रेस की तरफ से जो जा रहे हैं, इनकी बहुत बुरी हालत है। पता नहीं ये क्यों वहां बंगाली मोशाय के पास चले जाते हैं? ...( व्यवधान) कौन इनको देख रहा है? कौन इनके चलते चल रहा है? ये देश में नेता बनाने का काम कर सकते होते और आदमी कोई बन जाए तो फिर उसको मिटाने का काम नहीं कर सकते। ये बनाने में सहायता कर सकते हैं। लेकिन वहां क्यों इस डिब्बे में माथा मारते हैं? इस डिब्बे में कोई बैठा है, क्या उसे कोई अनुभव है? जो सचिन पायलट को अनुभव है, जो शरद पवार को अनुभव है, जो फारुख अबदुल्ला को अनुभव है और इसी सदन में जयपाल रेड्डी तो गजब की चीज है।...( व्यवधान) सब तरह से सम्पन्न हैं। यहां मधु लिमये को लोग चलती फिरती पार्लियामेंट कहते थे। इसलि जितेन प्रसाद, वहां गाली खाने क्यों जा रहे हो? मैं दस साल से कहीं नहीं जा रहा हूं। अमरीका में जैसे कहते हैं कि मिस्टर शरद यादव।...( व्यवधान) मिस्टर चंद्रशेखर। अब मिस्टर भी नहीं लगाते। कहते हैं कि अंग्रेजी भाषा में रिवाज है। लेकिन भारतीय धरती का तो यह इतिहास नहीं है। यह संस्कृति नहीं है।...( व्यवधान)

एक माननीय सदस्य:उसका भी आचार संहिता बनना चाहिए।...( व्यवधान)

श्री शरद यादव : किस-किस की बनाओगे? ...( व्यवधान) इसलिए मैं कह रहा हूं कि अंत में आप जो कह रहे हैं कि समय हो गया है। मैं अंत में एक ही बात कहना चाहता हूं।...( व्यवधान) उनकी मेहरबानी हो जाए तो मैं कुछ समय और बोलता हूं।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : ये सब लोग आपको भड़का रहे हैं। आप उतना ही बोलिए।

…( व्यवधान)

श्री शरद यादव : मैं कहना चाहता हूं कि मैंने मार्टिन लूथर किंग का नाम लिया था।...( व्यवधान) अमरीका के व्हाइट हाउस का नाम लिया था। ...( व्यवधान) मैं डिब्बे पर यह कहूंगा कि यह डिब्बा और कोई दूसरी खबर ही नहीं दे रहा।...( व्यवधान) रामलीला मैदान में क्या हुआ, फलानी जगह क्या हुआ? कोई यहां घुस आया, वहां क्या हुआ? ...( व्यवधान) चारों तरफ ये ही खबर है। कोई बाबा खड़ा है तो कोई श्री श्री 108 खड़ा है।...( व्यवधान) और ये देश चला रहे हैं। ...( व्यवधान) एक आदमी पता नहीं कहां से आया है, बिल्कुल हीरो लगता है।...( व्यवधान) उनका नाम पता नहीं क्या है?...( व्यवधान) भय्यू जी।...( व्यवधान) हमारे यहां तो भैय्या जी कहते हैं।...( व्यवधान) भैय्यू जी मैंने पहली बार सुना।...( व्यवधान) अब ये करेंगे। अब ये मुल्क में रेल चलाएंगे।...( व्यवधान) अरे कांग्रेस पार्टी के भाइयों और बहनों, आपको क्या हो गया है?...( व्यवधान) आप लोग क्या कर रहे हो? ये जो बातचीत का सिलसिला है, इसमें सुषमा जी कहीं नहीं दिख रही है? इसमें ये गोपीनाथ मुंडे जी गये तो वे लोग इनको हूट करते हैं। इनके लिए वहां कहा जा रहा है कि ये आकर चुपचाप यहां बात करते हैं और वहां विरोध करते हैं। ये बेचारे पता नहीं क्यों वहां चले गये?...( व्यवधान) वो तो ये बच गये। नहीं तो वे इनको पकड़ लेते, इनके कपड़े फाड़ देते।...( व्यवधान) हम तो खुद ही डरे हुए हैं। अपने घर में बैठे हुए हैं।...( व्यवधान) हमको भी लगता है कि कहीं आकर घेर न लें।...( व्यवधान) क्योंकि ऐसी सरकार आपने बनाकर रखी है कि दिल्ली में जिसको आना है आए, खाए, पीए, मौज करे। बाइसिकल पर दो चक्के पर ये नहीं चल रहे हैं, एक चक्के पर चल रहे हैं, एक उठाकर चल रहे हैं।...( व्यवधान) और झंडा भी हाथ में लिये हुए हैं। झंडा अकेले दिन में नहीं लिये हैं। मैं तो पहली बार जब मंत्री बना था तो मैंने देखा कि मेरा ड्राईवर चाहे जहां खड़ा हो जाए अगर शाम हो जाए तो मुझे झटका लगता था। अरे भई क्यों? बोला कि साहब, झंडा बंद करना है और यहां झंडा रात भर धुंआ उड़ा रहे हैं।...( व्यवधान) ऐसा मत कहिए।  वे कोई आंदोलन वाले लोगों के साथी नहीं होंगे। दुनिया में, समाज में अपने यहां कई तरह के लोग हैं।  

बोट क्लब पर चॉकलेट खाते थे, कुत्ता लेकर आते थे, गोलगप्पे खाते थे और अब कहते हैं कि रामलीला मैदान है, वहीं चलते हैं। ...( व्यवधान) लोग वहां पहुंच रहे हैं।...( व्यवधान) मेरे शहर में 20-50 आदमी परमानेंट हैं, जिसका जलूस निकलता वे उसमें शरीक होते हैं यानी कि वे परमानेंट रिवाल्यूशनरी हैं। जो महफिल लगा दे, उसमें हो जाते हैं।

          मैं प्रणब जी और सुषमा जी की बात से सहमत हूं कि तीन बातें वाजिब है, मेरा कहना है आप इसे मान जाइए क्योंकि यह डिब्बा सोने नहीं दे रहा है। इस डिब्बे को तो बंद कराओ। न देश की बात है, न आदिवासी की बात है, देश में कहां बाढ़ आई है, कहां तबाही मची है, कोई बात नहीं है। गंगा और कोसी नदी में बाढ़ है, पानी-पानी है, पूरे देश में तबाही मची हुई है लेकिन डिब्बे को फुर्सत नहीं है, इसे फुर्सत दिलाओ। आपने ठीक काम किया है कि तीन सुझाव दे दिए, आप इसे अभी मान लो। कहां झंझट करते हो? नारायणसामी जी, अभी तैयार हो जाओ। हम भी तैयार हैं और डिब्बे से कहते हैं कि ये तू ले ले।...( व्यवधान) तू रख ले और हमारी जान छोड़। ...( व्यवधान) बंगाली मोशाए को लाकर गारलैंड कर देंगे। ...( व्यवधान) बंद हो जा। तूने पूरे भारत को ज्ञान बांट दिया, तेरा ज्ञान हमें सोने नहीं दे रहा है। तू 12 बजे भी चिल्ला रहा है, तू एक बजे भी बोल रहा है।...( व्यवधान) कोई बोल नहीं रहा है, जो रामलीला मैदान के खिलाफ गड़बड़ बोल गया ...( व्यवधान) जरा इनको जवाब दो, यानी मुंहतोड़ जवाब दो, वह कह नहीं रहा लेकिन मुंह तोड़ जवाब दिलवा रहा है। आप क्या समझ रहे हैं? ये जो चर्चा करवा रहे हो, क्या आपकी चर्चा से देश चल रहा है? इस सदन से देश चल रहा है, जो लोग जानते हैं कि गांव, खेत और खलिहान क्या है, दर्द, तकलीफ, लाचारी, बेबसी और गुरबत क्या है। तुम तो बंगलों में बैठे हो, एसी में बैठो हो और बैठकर सबक दे रहे हैं कि देश को क्या करना चाहिए। कभी कहते हैं कि ये कुछ चीज ही नहीं है, ये सब बेकार है, इनकी परीक्षा कराओ, एग्जाम लो।

          महोदय, मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि गांधी जी के जमाने में राजगोपालाचारी जी ने बहस चलाई कि पढ़े लिखे लोग और जिनके पास जमीन है, उन्हें वोट मिलना चाहिए। महात्मा जी, बुड्ढे ने जो कलम उठाई और इनके धुर्रे उड़ा दिए, उन्होंने कहा कि देश का जो आदमी पढ़ने नहीं गया, वही अच्छा इंसान है, सच्चा इंसान है। उन्होंने साफ-साफ कहा कि विद्या बुद्धि की बेटी है, किसान पढ़ालिखा नहीं है लेकिन उसके अनुभव को कैसे एजुकेशन नहीं मानते? महात्मा जी ने कहा कि वह अपने पैर के अंगूठे से बता देता है कि कब अनाज बोना है। क्या कोई एमए, पीएचडी और इंजीनियर पढ़ा हुआ आदमी यह बता सकता है? गांधी जी ने सबको वोट दिलाया और इसलिए सबको वोट मिला। मैं सोचता हूं कि उनकी सोच बड़ी थी कि इस देश में गरीब आदमी जो कालेज और स्कूल नहीं गया, उससे बड़ा इंसान कोई नहीं है। इंसानियत से बड़ा कोई है तो वही इंसान है। हम तो कई तरह के लालच में फंसे हुए हैं, वह दिन भर मेहनत करता है, सेवा करता है। लेकिन मानवता और इंसानियत का कोई भी काम आता है तो वही फंसता है, वही सटता है।  इसलिए मैं आपसे निवेदन करूंगा कि अण्णा जी तो 11-12 दिन से भूखे अनशन पर बैठे हैं। श्री अर्जुन सेन गुप्ता ने कहा है कि इस देश के 80 फीसदी आदमी 20 रुपये रोजाना पर जी रहे हैं। कभी न कभी उनके खाने की भी नागा होती है, कभी न कभी उनकी शाम या सुबह भूखे कटती है और वही छोटी जाति हैं, वही शूद्र हैं, वही अति शूद्र हैं, वही गरीब हैं, वही पिछड़े हैं, वही किसान हैं। मैं जानना चाहता हूं कि यह जो लोकपाल बिल बनेगा, जो सर्च कमेटी बनेगी, क्या उसमें उनके लिए कोई जगह होगी या नहीं होगी? सरकार और सदन क्या मेरे इस दर्द और पीड़ा को समझेंगे? आप यह जान लीजिए कि मैं कोई पिछड़ी जाति का आदमी नहीं हूं, मेरे बाप-दादा कभी पिछड़े नहीं रहे और न कभी मेरा एडमिशन किसी डोनेशन से हुआ। मेरे पिता जी और माता जी जेल में थे। मेरे दादा 1857 में झांसी की रानी के समय वहां थे। इसलिए मैं उनके हक में नहीं बोल रहा हूं। जो सबसे ऊंचे लोग हैं, उनके जैसा मेरा स्वभाव और दिमाग है। लेकिन जो गरीब लोग हैं, आप उनके बारे में भी सोचिये। यानी 40 साल में मार्टिन लूथर किंग की शहादत रंग लाती है। लेकिन हजारों वर्ष हो गये, यहां कोई रंग नहीं आता है। जो हमारी वेदना है, उसे आप हमारी संख्या में गिनते हो। जब हमने कहा कि जाति के अनुसार सबकी संख्या गिन लो तो यह सरकार उसे पांच हिस्सों में बांट देती है। कहती है कि इसे स्टेट्स करेंगे, रूरल डैवलपमैन्ट डिपार्टमैन्ट करेगा, अर्बन डैवलपमैन्ट डिपार्टमैन्ट करेगा, यह करेगा, वह करेगा। यानी हम लोग बदलने के लिए तैयार नहीं है। लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि यदि इन्हें साथ में लेकर आपने देश को बदला तो पूरी दुनिया में इस धरती पर इस देश का कोई मुकाबला नहीं कर सकता है, सही सदी तब शुरू होगी।

          इसलिए अंत में मैं आपसे यही कहूंगा कि यह जो लड़ाई है, इस लड़ाई में जितनी जगह भी चाहे सुषमा जी हों, चाहे हम हों और चाहे बसुदेव आचार्य जी हों, शरीक रहते हैं। हमे लड़ाई ऐसी लगती है कि जैसे गंगा स्नान हो। उस लड़ाई का हम अभिवादन करते हैं। बहुत से नौजवानों को इन्होंने बाहर निकाला है, हम उनका अभिवादन करते हैं। लेकिन उन्होंने कभी सामाजिक विषमता के सवाल को वहां नहीं उठाया। श्री अण्णा हजारे के गांव से पुणे कितनी दूर है?

श्री गोपीनाथ मुंडे (बीड): सवा सौ किलोमीटर दूर है।

श्री शरद यादव: सवा सौ किलोमीटर में महात्मा फुले, शिवाजी का नाम लिया, मैं खुद शिवाजी का सबसे बड़ा फैन हूं। मेरा बचपन का नाम शिवाजी है।...( व्यवधान) मैं वही कह रहा हूं, आप चुप तो रहो। इस देश में जितने राजा हुए, उनमें शिवा जी सबसे ज्यादा स्टेट्समैन थे। मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं। अण्णा जी भी उनका सम्मान करते हैं। लेकिन महात्मा फुले जो बाबासाहब अम्बेडकर के गुरु थे, एक बार भी उनकी याद रामलीला मैदान में नहीं आई। बाबा साहब अम्बेडकर की याद एक बार भी नहीं आई। महात्मा गांधी का नाम ले रहे हैं, लेकिन महात्मा जी ने इन लोगों के लिए जिंदगी लगा दी। वह खुद सफाई मजदूर बन गये। उन्होंने झाड़ू लगाई...( व्यवधान) अण्णा साहब तो जानते हैं। वह गांव के आदमी है, अच्छे आदमी हैं, सच्चे आदमी हैं, आंदोलन के आदमी हैं। लेकिन अण्णा साहब यह तो जानते हैं कि महाराष्ट्र बाबा साहब अम्बेडकर, साहूजी महाराज और महात्मा फुले की धरती है। यदि वहां तिलक और शिवाजी हुए हैं तो ये लोग भी हुए हैं, जिन्होंने देश भर में बेजुबान लोगों के हक में खड़ा होने का काम किया है। लेकिन उन बेजुबान लोगों की इस लोकपाल बिल में कहीं जगह होगी या नहीं होगी? हम आपकी सब बातें मान गये। लेकिन इन वीकर सैक्शन के लोग, कमजोर तबके के लोगों के बारे में आप सोचेंगे या नहीं सोचेंगे? यदि पूरा सदन सोचे तो अच्छा रहेगा। आप हजारों वर्ष से जो कहते हो, हम वह मानते आये हैं। लेकिन कभी-कभी हमारे दर्द, तकलीफ और वेदना को भी सुन लिया करो। इन्ही बातों के साथ मैं सुषमा जी के तीन प्रस्ताव जिनका उन्होंने समर्थन किया है, का समर्थन करता हूँ। इस आंदोलन में बहुत नौजवान लगे हुए हैं। आज अण्णा जी के अनशन को 12 दिन हो गए हैं, उनका स्वास्थ्य नाजुक दौर में है। हम लोगों को इसकी चिंता है। इसलिए हम पूरी तरह से तीनों सवालों का समर्थन करते हैं। जल्दी से जल्दी इस मामले का समापन और समाधान किया जाए। अण्णा साहब से हमको दिक्कत नहीं है, लेकिन यह जो डिब्बा है, इससे देश भर को दिक्कत हो गई है। इन्हीं बातों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हँ।

 

ओश्री हरिन पाठक (अहमदाबाद पूर्व): सम्माननीय अध्यक्ष महोदय मैं परम श्रद्धेय  अन्ना जी के अनशन और उनके द्वारा जो देशभर में आंदोलन शुरू हुआ है ।  उसके चलते देश भर में जो क्रंति का ज्वाला जली है उसे नमन करता हूँ ।

          मेरी परम आदरणीय नेता प्रतिपक्ष माननीय सुषमा जी ने वक्तव्य के साथ में अपना सूर मिलाता हूँ।

श्रीमान् मैंने गांधी जी को नहीं देखा मगर आज श्रद्धेय अन्ना जी को देखकर मुझे आनंद होता है कि गांधी जी कैसे होंगे ।  मैं अन्ना जी के चरणों में नमन करते हुए अपनी बात संक्षिप्त में रखना चाहता हूँ। जो तीन मुद्दों पर आज संसद एकमत होने जा रही है और मेरी पार्टी के आरणीय नेता श्रीमती सुषमा जी ने उन तीनों मुद्दों को जोरदार समर्थन दिया है उसे मैं भी समर्थन देता हूँ ।

          मैं मानता हूँ कि यह तीन मुद्दें (1) राज्यों में लोकायुक्तों का गठन हो । (2) सीटीजन चार्टर का गठन हो । (  3) सभी वर्ग के कर्मचारी को लोकपाल या लोकायुक्त के दायरे में लाया जाए, इन तीनों मुद्दों का मैं समर्थन  करता हूँ  और संसद से आग्रह करता हूँ कि संसद श्रद्धेय अन्ना जी के अनशन को समाप्त करने के लिये सर्व सम्मति से उपरोक्त तीन मुद्दों को समर्पन करे  और श्रद्वेय श्री अन्नाजी से प्रार्थना करता हूँ कि वह अपना अनशन तुंत समाप्त करें । राष्ट्र को आपकी बहुत जरूरत है ।

          मैं एक और बात रखना चाहता हूँ कि अब यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर श्रद्धेय अन्ना जी को भेजा जाए और सरकारी लोकपाल बिल वापस लेकर जन लोकपाल तुंत संसद में सरकार पेश करें और उसे स्टैंडिंग कमिटी को न भेजते हुए अगले सप्ताह सरकार जन लोकपाल बिल पर चर्चा शुरू कराये और उस पर चर्चा कर संसद पारित करे ।

                       

* Speech was laid on the Table     THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF HEALTH AND FAMILY WELFARE (SHRI SUDIP BANDYOPADHYAY): Hon. Deputy-Speaker, Sir, I stand here to announce the stand which will be taken by my party Trinamool Congress on this issue. You are well aware that our party is the second largest party in the UPA Government. So, we have observed with care the situation prevailing in the country.

          I would like to begin with the statement made by Hon. Shri Pranab Mukherjee, the Leader of the House who very categorically at the last part of his speech narrated in what terms this debate will continue and will give its opinion. The three issues are mainly: (1) whether the jurisdiction of the Lokpal should cover all employees of the Central Government, (2) whether it will be applicable to the institution of Lok Ayuktas in all the States; and (3) whether the Lokpal should have the power to punish all those who violated the laws, and redressal mechanism to be put in place.

          The spirit of the House today when Sushma Swaraji and Sandip Dixitji spoke was that the House is of the opinion that the fasting of Anna Hazare be withdrawn without further delay. If we linger on with our debates and discussions for many days or even for many hours, it may cause some damage to Anna Hazareji’s health condition and we should certainly debate along this.

          The political party which I represent, the Trinamool Congress, has from the very beginning fought against corruption. It has it in its motto also. We have no hesitation to say that hon. Prime Minister, Dr. Manmohan Singh is an extremely honest Prime Minister of the Country. With his transparency, he can rise to the occasion whenever necessary. Dr. Manmohan Singh in his speech on the floor of the House did not hesitate to describe Anna Hazare’s fasting by saying that, “I applaud him. I salute him”. These are the comments that were made by the hon. Prime Minister, which according to us, are really very acceptable and praiseworthy. The Resolution adopted in the all party meeting is a direction, that some steps are to be taken immediately, by which Shri Anna Hazare withdraws his fast.

          Sir, I was shocked to hear that a leader like Shrimati Sushma Swaraj was criticising Shri Rahul Gandhi for the statement which he made yesterday. What was the harm in it, if the hon. Speaker calls a Member of the House to raise a ‘Zero Hour’ matter, and if he makes any comment or gives any direction? It may be accepted or may not be accepted by others. But I must say that what Shri Rahul Gandhi delivered yesterday during ‘Zero Hour’, was certainly a new idea; the Government of India should look into this thought-provoking idea and try to implement it in reality. What he said? He said that the Lokpal should be made a Constitutional body, accountable to Parliament, like the Election Commission. It is a very positive idea; it has emerged from a young leader of the country; we should certainly try to see that the Government takes this decision, giving priority.

          I should repeat that this is for the ninth time that this Bill is coming up for discussion. For eight times, it has been discussed. They were tabled, but not finally passed. I hope that this Bill, after getting the opinion from all the sides, will go to the Standing Committee. The Standing Committee will get all the details as to what we observed here or expressed our opinion here; they will be placed before the Standing Committee. But there should be a time-limit. We should see that it does not lapse again, as had happened during the last eight times. The Standing Committee should come back to the House, within 90 days from today; after which we can take a positive decision on the Lokpal Bill, along with all the other four Bills which are there – one is Government’s Lokpal Bill, second is Jan Lokpal Bill, third is Ms. Aruna Roy’s NCPRI mechanism and the fourth is J.P. Narayan’s Bill. All are to be taken together by the Standing Committee. Every political party must give its opinion before the Standing Committee and they have to be discussed there.

          About the policies, there are three major points which has still kept Shri Anna Hazare on fasting. We very categorically want to express our opinion. The first is, whether the jurisdiction of the Lokpal Bill should cover all the employees of the Central Government. We have no objection to that. This can be incorporated into the proposed Bill and can be sent to the Standing Committee for consideration. The second is, whether it will be applicable to the institution of Lokayukta in all the States. We are in favour of Lokayukta. But let the State Governments have their own discretion to set up their own Lokayuktas. On principle, Lokayukta is a positive proposal, which we do not decline to accept.  We have no hesitation to a Lokpal having the power to punish all those who violate the law and also putting in place a grievance redressal mechanism.  It can also be adopted with some amendments.  We believe that the Government’s response to three major issues, which Anna Hazare and his team had placed before the Government and wanted a positive reply, is given today itself so that we see Anna Hazare ending his fast.

Besides this Lokpal Bill, which had come up before this House eight times earlier, there are other important issues.  I hope that one more Anna Hazare has to come up to tackle other few important issues like Price Rise and Unemployment and we are waiting for that day.  There is no denying that we Parliamentarians have enough power and our supremacy should be given all priority but the problem is we discuss a number of issues inside the Parliament which actually do not produce any result. People have started becoming frustrated over the functioning of the Parliamentarians.  That is the other part of the story. 

As Sharad Yadav Ji has said, the Parliament is supreme.  Today, when the Debate was to start the House was packed and all the Members wanted to speak and now only one-tenth of the total strength is present in the House.  So, we need not worry that the debate may continue for eight hours.  It will certainly end within its allotted time of seven hours.  We certainly want, at least when a sentimental or a catchy issue which involves each and every person is taken up in the House, mass involvement of the House. In a debate like this, we can call it as the cancer of corruption, mass involvement of the House is a must.

 The way people are gheraoing the MPs or abusing the MPs in different manners, like throwing them out of the train, are not the proper ways to tackle any issue.  People should restrain themselves, in fact, restrain from both the sides is necessary.  I think the Government is very cautiously tackling this issue.  The way the Prime Minister is making Statement, calling all-Party meetings and adopting the Resolution, it is all in the right direction. All is well that ends well.  We can interact among ourselves, discuss and reach the target.  Anna Hazare’s weight has been reduced by 7 kgs. and doctors say that he needs more protein as he is taking only drinking water. 

Certainly we are in the Government and also not less than the second largest Party in the UPA Government.  We fully believe that the Government of India should not hesitate any further and see that this problem is sorted out.  We have full faith, full confidence, in our Prime Minister, Dr. Manmohan Singh.  People are not in a mood to accept any direct or indirect criticism against Dr. Manmohan Singh.  People believe that his honesty, his transparency is beyond question.  He has certainly tried his best to discharge his responsibilities with commitment and sincerity. 

We want to see the end of Anna Hazare’s fast and the Lokpal Bill to be brought before the House after being routed through the Select Committee and is finally accepted within 90 days from today.  That should be the time limit. 

   

SHRI T.K.S. ELANGOVAN (CHENNAI NORTH): Thank you hon. Deputy Speaker, Sir, for having given me the opportunity to speak on this subject. 

At the outset, on behalf of the DMK Party, my first request to Shri Anna Hazare is to stop his fast. He should protect himself with good health so that there may be issues in the future where he has to involve himself and fight for the downtrodden people who need somebody to lead them. So, my first request to Anna Hazare Ji is to end his fast. 

          Time and again, there were agitations in various parts of the country to which the Government had responded. I can quote one agitation, which was held in Tamil Nadu and led by Shri Thanthai Periyar, Shri Arignar Anna and the late leader Shri K. Kamaraj.  They had fought for the inclusion of reservation provisions in the Constitution of India for the sake of the downtrodden people.  It was well received by the Government of India and the first amendment to the Constitution of India was made in the same House.  I can even quote another incident where only two Members of the DMK Party were elected to this House in the year 1957. The DMK wanted that Hindi should not be imposed on the non-Hindi-speaking States.  Here, late Shri Pandit Jawaharlal Nehru gave an assurance that Hindi will not be imposed on non-Hindi-speaking States until they wish to have Hindi as their official language.  So, even small requests, if reasonable, had been accepted by the Government.  

          Now, Shri Anna Hazare’s demand was accepted by this Government.  When Shri Anna Hazare was on fast, in the month of April, 2011, the Government readily met him, spoke to him, sat with him and prepared a Lokpal Bill, which had been introduced in this House and was sent to the Standing Committee.  Now, the question is that there are three more issues which the Civil Society is raising.    Our hon. colleague Shri Sharad Yadav was speaking about the media. Earlier this issue was shown as a fight against corruption.  Then, the media turned it as a fight against the Ruling Party.  Thirdly, the media converted it as a fight against the Parliament.  Now, it has become a fight against the Constitution of India.  It is the work of the media. 

The Parliament has certain powers.  It has its own supremacy and it has its own inherent powers.  We are here to enact laws in this country.  There may be demands but it is for the Parliament to decide whether these demands are right or otherwise.  It is because after two and a half years from now on, the Members of this House have to go to the people to seek their votes; tell them what we have done; tell them how we have acted; and tell them what steps we have taken against corruption. We have to go to the people.  It is the responsibility of not only the Ruling Party but also of the opposition parties.  The people will judge us. 

Then, it is left to the Civil Society to go to the people and say that this Government has not acted against corruption.  So, you need not to vote for them.  That is democracy.  In a democracy, the people are the judges and not the media.  So, it should be like that.  This Government is willing to legislate the Lokpal Bill.  There are certain differences.        There are a few differences.  I can say that there are three substantive issues which the hon. Leader of the House has pointed out.  They are public grievances and citizens’ charter, Lokayukta and lower bureaucracy. 

          Firstly, I will deal with Lokayukta.  I, from the DMK Party, am fighting for the State autonomy. So I do not want this House to do anything against the autonomy of the States.  We should not force anything on the States.  The RTI Act is different.  That is the constitutional right.  But this is not a constitutional right.  This is for the States to decide whether to have Lokayukta or not.  It is because there are many laws and many institutions to punish people for corruption and punish people for any criminal activity.   Shri Sharad Yadavji was telling how this same House had acted against corruption and how people were arrested and put in jail.  So Lokayukta has to be left to the States to decide.

          As regards lower bureaucracy, there is a system and it has stages.  There are Section Officers, there are Joint Secretaries and there are Secretaries. So, these people should be made to act against any wrong doings.  If this power is taken by Lokpal, with lakhs and lakhs of Government employees in this country, it will become another adjudicator where cases are piling, a lot of cases are pending before them without being disposed of and people are suffering for want of justice.  So, we should not burden the Lokpal by including the lower bureaucracy in it. But the Lokpal could have the powers to instruct the officers and instruct the higher bureaucrats and look into the issues. It can give directions and see that criminals and corrupt people are punished. 

          Coming to public grievances and citizens’ charter, the hon. Leader of the House has asked the question whether the Lokpal should have the power to punish all those who violate the grievance redressal mechanism to be put in place.  The Lokpal should have the power to punish but before that they should investigate into the issue and see as to what is the reason for not doing it and why the public redressal system has failed.  Why has it been violated?  So, before punishing the officer proper inquiry should be made into that issue. 

          Fourthly, a letter has been written by Mr. Kejriwal which says:

“If the Government can agree to introduce Jan Lokpal Bill after removing those items on which we have differences, after clearing by the Ministry of Law within four days and also provide a commitment that the Bill will not be referred to the Standing Committee…”             I do not understand the meaning of this.  The Civil Society members cannot come to this House and speak on the subject, whereas they can go before the Standing Committee and present their views. General public can go before the Standing Committee and present their views… (Interruptions)
MR. DEPUTY-SPEAKER: This will not go on record.
(Interruptions) …* SHRI T.K.S. ELANGOVAN : This is a very good opportunity for the Civil Society, for all other interested parties like Ms. Aruna Roy and everybody as they can go before the Standing Committee and explain their position.  The Standing Committee also can amend as many provisions as possible. So, this is wrong.  This is not a proper stand.  Maybe, Mr. Anna Hazare is not properly advised in this matter.
          Sir, the sending the Bill to the Standing Committee will definitely do good to the Bill. We are against demeaning the powers of Parliament in any way. This is a higher institution. Today this party is here, tomorrow the other party would come to power. But this institution should not be belittled. The DMK will not allow this. The DMK has already raised this issue that the office of the Prime Minister should also be included within the purview of the Lokpal. We are for including all political offices, whatever it may be, within the purview of the Lokpal Bill.
          Sir, with these words, I thank you for this opportunity.
   
SHRI BASU DEB ACHARIA (BANKURA):  Mr. Deputy-Speaker, Sir, this is a rare and a historic occasion because for the first time during the last 42 years since the time when the first Lokpal Bill was introduced in this House in the year 1966, this House is getting an opportunity to discuss about the setting up of a Lokpal.
          Sir, today we are discussing this subject as the entire country is agitating. Whatever is happening outside the House is a reflection of the anger of the people. Corruption in India has grown to alarming proportions because of the policies that have been formulated and pursued by successive Governments have only given enormous incentives for the proliferation of corruption and it is also because there is lack of an institutional mechanism or an institution to investigate and prosecute.
          Sir, what has been happening during this period after the Government of India adopted the policy of liberalization and privatization? Thousands and thousands of acres of land, mineral rich lands, have been leased out to the corporate houses, both Indian and foreign. Our natural resources are being allowed to be looted by these people. Even forest land, tribal land has been leased out. Tribal people have been evicted out, displaced, dispossessed and it was because of the policy being pursued by the Government of India for two decades. We also see the proliferation of corruption. The corporate houses are grabbing land and their profit is to the extent of 90 per cent.  We have seen the report of the former Lokayukta of Karnataka, Shri Santosh Hegde who said in his report that the profit from mining is to the extent of 90 per cent, whereas the State Government is getting only one per cent. The demand here is for an effective, strong and a credible Lokpal. There was an agitation when Shri Anna Hazare was on fast on 5th April, 2011. Then, as stated by the Leader of the House in his statement, after five days, the Government agreed to form a Joint Drafting Committee with five representatives from the Team Anna and five representatives from the Government and they started discussing about the drafting of the Bill.  They had the Jan Lokpal Bill; five Ministers also prepared the draft and the meeting continued.  There have been eight sittings of the meeting and afterwards, when there was no agreement, a meeting of all the political parties was called. We all attended it on 3rd July, 2011.  We made various suggestions in it.  When the Bill was introduced, we found that none of the suggestions made in the meeting of the leaders of political parties held on 3rd July was incorporated in the Bill.  All we wanted was an effective, strong  and credible Lokpal.   And for that, an effective and strong Lokpal Bill is required.
          The Bill that has been introduced by the Government is useless.  It will not be an independent institution.  This will be like any other investigating agency.  If the selection procedure which is there will not be a broad-based one, then it will not have any independent role.
Today, what is required?  Today, multi-pronged measures are required to be taken to curb corruption. And it is most important to have a credible, strong, functional and independent Lokpal.
The second problem that we face today and which is also a source of corruption is the money power which is issued in elections.  Sir, in the recent past or in the last ten to twelve years, the expenditure in election has increased enormously.  To contest in Assembly elections, if a candidate has to spend Rs. 10 to Rs. 15 crore, then how will the poor, down-trodden and people from the backward sections be able to contest elections?   Where from the money comes?  We have the experience of the recent Assembly elections in West Bengal. 
There is a need for electoral reforms and for that, there is a need for State funding of elections.
     

15.00 hrs.           So, in order to curb corruption, along with Lokpal, there is a need for State funding of elections. Giving donations to the political parties by companies has been legalised.  It should be stopped.  Donations by the companies to the political parties should be stopped. 

          Third point is corruption in judiciary.  There is a need for a Judicial Commission. The fourth important thing which is required to be done in order to curb corruption is to break the nexus between the corporate houses, corrupt politician and bureaucrats. In the Commonwealth Games we have seen how corruption took place. So, there is a need to break the nexus between the corporate houses, corrupt politicians and bureaucrats.

There is a need to review our tax system. Thousands of crores of rupees are not being realised because of tax evasion.  We have seen that both Hasan Ali and Kashinath Tapuriah had evaded taxes to the extent of Rs. 50,000 crore. 

In order to unearth the black money, certain measures have to be taken. According to Global Financial Integrity Report, Rs. 16,00,000 crore of black money is lying in the foreign banks, in tax havens.  … (Interruptions)  So, there is a need for reforms in the tax system.  There is a need for multi-pronged measures to curb corruption in our country.  It is rather an all-pervasive corruption in our country.

          The demand is for an effective, credible and strong Lokpal. There is a saying in Bengali, parbater musik prasab.  It means mountains delivering mouse.  It is exactly the same. Now, the Prime Minister has not been included. The Prime Minister has been kept out of the ambit of the Lokpal.  I remember, in 1985 when Shri Rajiv Gandhi was the Prime Minister – I was the leader of the Party – he called a meeting to discuss about the Lokpal. When we came to know that the Prime Minister was kept out of the ambit of the Lokpal, we, Members belonging to the Opposition Parties, objected to it. That Bill was withdrawn and never introduced.  The Prime Minister can be enquired under the Prevention of Corruption Act.  What is the rationale behind keeping Prime Minister out of the purview of the Lokpal?

          Then, Sir, the definition of corruption should also be expanded.  It should be widened to include giving any undue benefit wilfully to any person or entity or obtaining any undue benefit from any public servant in violation of laws and rules.    So, the definition of corruption should also be expanded so that the Lokpal can be more effective. … (Interruptions)  Sir, I have spoken for ten minutes.  Let me finish.  I have not come to three conditions.  I will come to them. Please give me some more time. There should not be any time limit. … (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: You have spoken for 16 minutes and not 12 minutes.

SHRI BASU DEB ACHARIA :   Please give me some more time. 

श्री शत्रुघ्न सिन्हा (पटना साहिब): महोदय, आप पांच मिनट रुकिए, ये एक घंटे में अपनी बात समाप्त करेंगे।...( व्यवधान)

श्री बसुदेव आचार्य : आप अभी सुनिए। घंटी मत बजाइए।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  हम सुन रहे हैं, इसीलिए बोल रहे हैं।

…( व्यवधान)

SHRI BASU DEB ACHARIA :  Please give me some more time. … (Interruptions) इतना बड़ा करप्शन हो रहा है और क्या हम बोल नहीं पाएंगे? मुझे अपने सुझाव देने दीजिए।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  आज लोकपाल पर चर्चा हो रही है।

…( व्यवधान)

SHRI BASU DEB ACHARIA :  Then, the National Judicial Commission should be constituted. One Bill regarding Judicial Accountability has been introduced.   That is not sufficient. It should cover the setting up of the National Judicial Commission to enquire into the allegation of corruption in higher judiciary. That should not be under the Lokpal.  I have a suggestion that MPs enjoy immunity inside the Parliament. They have the freedom of speech.  … (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, you are going to conclude.

SHRI BASU DEB ACHARIA : No, Sir. I have many more points.  

उपाध्यक्ष महोदय : आचार्य जी, अभी बहुत से माननीय सदस्य और बोलने वाले हैं और समय कम है।

श्री बसुदेव आचार्य : हम जानते हैं। Sir, this is a very important issue. Let me explain my points of view. If Members of Parliament indulge in corrupt practices within their functioning in the House, then they should come within the purview of Lokpal.  For this, a suitable amendment can be made in Article 105.

          Then, Sir, I will come to one important provision of the Jan Lokpal Bill.… (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER:  Please address the Chair.

SHRI BASU DEB ACHARIA :            Sir, there is a provision in the Jan Lokpal which is not there in the official Lokpal Bill.  I suggest that there should be a provision in the Bill for the Lokpal to take steps against companies and business houses which indulge in corrupt practices with public servants. There is a provision in the Jan Lokpal Bill where if  found they are adopting or indulging in corrupt practices, they will be blacklisted and if  found they are beneficiary of this, then also, there is a provision to impose fine on such business houses, companies for indulging in corrupt practices. This should be included in the official Bill.

          Regarding the Lokayukta, I would like to say that we have a federal structure in our Constitution. This federal structure should not be disturbed. During these periods, we have seen the erosion of subjects in  the State List. We have seen how gradually many of the subjects in the State List, which were there at the time of adoption of the Constitution,  have been taken away by the Centre. The  broad framework can be framed in this legislation. But one legislation for the Lokpal as well as the Lokayukta will disturb the basic structure of the Constitution and the federal structure of the Constitution. We can have a model Act. A model Act, a model legislation  can be enacted and that can be adopted by all the States on the same lines. We have seen how effective is the Karnataka Lokayukta. Because of their Report, a Chief Minister had to go. When there was a reshuffle, when the Chief Minister formed the Cabinet, many of the Ministers who were indicted by the Lokayukta, were dropped. So, there should be an effective Lokpal at the Centre. Similarly, on the same lines, an effective Lokayukta should also be there in the States.… (Interruptions)

          Regarding the lower judiciary and the lower bureaucracy, I will give my suggestion. There is a system now. The vigilance machinery is there. Article 311 is also there in the Constitution. Our suggestion is: let the  lower bureaucracy be under the vigilance machinery but the power of supervision should be with the Lokpal or the Lokayukta – the Lokpal at the Centre and the Lokayukta at the States.

          In regard to the Citizens’ Charter, my suggestion is that there should be a separate law.

          It should address the grievances of the common citizens.  If the entire bureaucracy is brought under the Lokpal, it would be unwieldy. Similarly,  thousands of complaints are received every day. It will not be possible if the entire grievances are brought under the Lokpal. So, there should be a separate machinery to deal with the grievances of the citizens and it should not be under the Lokpal.

MR. DEPUTY-SPEAKER:  Please conclude.

SHRI BASU DEB ACHARIA :  Bills have been introduced – Public Interest Disclosure and Protection of Information. Same needs to be strengthened and passed expeditiously. What is needed today is multi-pronged measures. Lokpal is very important to deal with corruption in regard to public servants but several measures are required today. The way the country is facing this problem – people are on the streets; people are agitated. I appeal to Shri Anna Hazare. His fast has reached the 12th day. We appeal to Shri Anna Hazare now. He has been fighting because of his sincere efforts; because of his fight, today, thousands and thousands are coming; and because of his efforts, the issue of corruption has found a place today. The livelihood of the common people, aam aadmi,  is at stake. So, there is a need to curb corruption; there is a need to have multi-pronged measures to tackle this corruption. There is a need for an effective, credible and strong Lokpal.  … (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER:  Nothing will go on record.

… (Interruptions)

  SHRI BASU DEB ACHARIA :  Sir, I am just concluding.

          For that, I demand that the Government should withdraw the Bill that have been introduced; revise the Bill incorporating all the important suggestions, and bring a revised Bill in the House.

   

*SHRI JOSE K. MANI (KOTTAYAM): This august House is seriously engaged in weighing the pros and cons of its Lokpal Bill 2011, (now referred to the Standing Committee) in comparison with other versions brought out by civil society and social activists and immediately to find a solution that would facilitate calling off indefinite fast by Shri Anna Hazare now on his twelfth day. This House had earlier this week expressed its deep concern over the deteriorating health conditions of Shri Hazare and had pleaded for his calling of the fast on the Centre's assurance to bring a strong Lokpal Bill incorporating most of the demands made in the Jan Lokpal Bill version and other versions of the civil society: The Hon'ble Prime Minister has clearly expressed the Government's commitment to honour the aspirations of the civil society. Since the Parliament has to function within the constitutionally laid down procedures and time honoured precedents, it would be too optimistic to expect the Government take a rash decision under pressure.

The present attempt to resolve the tangle should act as a catalyst for host of changes and amendments needed in our systems of governance. Let the adoption of a strong Lokpal Bill be an initiative to many such enactments of laws converging, in effect to give more substance and support to the objectives of the Bill, by constitutional amendments if called for.

Prime Minister is the Head of Cabinet. He is the pivotal figure of the executive overseeing the day-to-day governance and there cannot be any vacuum in his existence or interregnum. Inclusion of PM in the ambit of Lokpal Bill will therefore lead to constitutional crises. As rightly provided for in the official Lokpal Bill, the conduct of the Prime Minister during his tenure can be challenged after he demits the office.

Already there is a consensus and joint efforts to enact a legislation to enforce judicial accountability in higher judiciary under proposed Judicial Standards and Accountability Act. Therefore in my view to include the higher judiciary within Lokpal ambit is redundant.

In principle this is a welcome measure but the role of Centre should be confined only to drafting a model legislation, for each state to enact and implement, as the centre-state relations under the Constitution revolves around Federal character and thus Centre-State relations should be respected and state's prerogatives should not in any case be infringed upon by the Centre.

It is a welcome move and under the existing RTI Act this concept is working very well by mandating each government department/ institution/ organization/ undertaking to make the public aware of their rights to call for any information as per laid procedure.

     

For effective and transparent governance the functions involve employees jointly from lower to higher tiers. Since the common citizen seeks access to redress the grievances, only through lower level employees, so it is necessary that the lower level employees,  should also be included although there is a risk of Lokpal's office being overburdened with such unwieldy nature. However we have to evolve some workable mechanism to monitor the functions of lower level employees for meeting the overall objectives envisaged in creation of Lokpal.

The next question is whether the conduct of the MPs on the floor of the House be brought within Lokpal's purview. At the outset such conduct is rightly governed by the powers of Parliament vested in the Speaker in Lower House and the Chairman in the Upper House and such powers are sacrosanct to be challenged elsewhere. Therefore MPs conduct in their personal and individual capacity outside could only be probed by the Lokpal.

Even though we feel proud of Indian democracy and the economic growth of the country, efforts of march towards progress will become meaningless unless we are able to prevent corruption and cut out its roots.

I would therefore hope towards immediate culmination of the present conflict between the Government and the civil society emerging there from a strong resolve to abandon the path of confrontation and to fight jointly the menace of corruption.

*श्री देवजी एम. पटेल (जालौर):  अन्ना हजारे का सत्याग्रह इस बार 16 अगस्त से शुरू हुआ है।  इस समय भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन की लहर है।  हर शहर कस्बे से लेकर गांवों तक में इस आन्दोलन के समर्थन में लोगों का हुजूम उमड़ रहा है।  इस आन्दोलन से सरकार के लिए ढेर सारे सबक हैं।  पहला यह कि जन आन्दोलनों को नकार कर कोई लोकतांत्रिक सरकार नहीं चलाई जा सकती। सख्त नियमों की सहायता से कोई प्रोजेक्ट पूरा किया जा सकता है, शासन नहीं चलाया जा सकता।  लोकपाल की शुरूआत बहुत पहले से हो चुकी है।

        सबसे पहले 1962 में पहली बार डॉ. लक्ष्मीमल सिंघवी ने लोकपाल जैसी संस्था की स्थापना का सुझाव दिया था।  इसके बाद 1966 में प्रशासनिक सुधार आयोग में भ्रष्टाचार के प्रश्न पर विस्तार से विचार किया था।

        1969 में लोक सभा ने "लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक, 1968 पारित किया था " किंतु जब ये विधेयक राज्य सभा के अधीन विचारधीन था तभी लोक सभा का विघटन हो गया।

        जनता सरकार ने 1977 में इसका नाम लोकपाल विधेयक, 1977 रखा।  संयुक्त समिति ने अपनी रिपोर्ट 1978 में दी, विधेयक पर पूर्ण विचार होने से पहले लोक सभा का विघटन हो गया। क्रमशः 1989, 1996, 1997 व 1998, 2001 में विधेयक तो आया परन्तु पास न हो सका।  

        15 अगस्त 1947 के अखबार में पहले पृष्ठ का शीर्षक था, "शताब्दियों की दासता के बाद भारत में स्वतंत्रता का मंगल प्रभात"।  करीब 50 साल बाद 27 अगस्त, 1997 के अखबार के पहले पेज के मुख्य समाचार का शीर्षक था, "राजनीति के अपराधीकरण और भ्रष्टाचार पर संसद में चिंता"।  15 अगस्त, 2011 तक 27 राजनीतिक लोग तिहाड़ और देश के विभिन्न जेलों में बंद हैं।

        1948 में जीप घोटाला, आजादी के बाद का पहला घोटाला माना जाता है।  एक साल के बाद भारत सरकार के ब्रिटेन में हाई कमिश्नर वी.के. कृष्ण मेनन प्रोटोकॉल तोड़ते हुए आर्मी जीप खरीदने के लिए वहां की एक कम्पनी से 80 लाLा रुपए का समझौता किया।  उस कम्पनी की विश्वसनीयता संदिग्ध पाई गई।  पूरा पैसा देने के बावजूद 2000 जीपों के आर्डर में से केवल 155 जीपें ही भारत पहुंच सकी।  1955 में इस घोटाले की फाइल बंद कर मेनन को नेहरू मंत्रीमंडल में मंत्री बना दिया गया।

        1950 में मंदूडा केस घोटाले का पर्दाफाश करने में फिरोज गांधी की अहम भूमिका थी।  कोलकाता के व्यापारी हरिदास मंदूडा को वित्तीय संकट से बचाने के लिए केन्द्र सरकार के दबाव में भारतीय जीवन बीमा निगम ने उनकी कम्पनी के 1.2 करोड़ के शेयर खरीदे थे, वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णामाचारी को इस्तीफा देना पड़ा।

        इन दोनों मामलों ने कांग्रेस सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया था।  तब भारत के तात्कालिक प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू आधिकारिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक सख्त लोकपाल बनाना चाहते थे।

 

भ्रष्टाचार के चर्चित मामले वर्ष घोटाला रुपए करोड़ 1948 जीप घोटाला 0.80 1956 बी.एच.यू. फंड 0.5 1957 मुंधरा घोटाला 1.25 1960 तेजा लान घोटालाः 22 1976 कुंआ तेल मामला घोटाला 2.2 1987 एच.डी.डब्ल्यु. कमीशन घोटाला 20 1987 बोफोर्स मामला घोटाला 65 1989 एस.टी. किट्स 9.45 1990 एयर बस घोटाला प्रति सप्ताह 2.5 1992 सुरक्षा मामला घोटाला 5000 1992 भारतीय बैंक आर.आई.पी. ऑफ 1300 1994 चीनी आयात घोटाला 650 1995 झा.मु.मो. रिश्वत कांड 1.2 1996 आपदा प्रबंधन घोटाला 0.10 1996 दूर संचार घोटाला 1.6 1996 चारा घोटाला 950 1996 यूरिया घोटाला 133 1997 सी.आई.बी. घोटाला 1000 1998 बेनिसिंग कँपनी घोटाला 330.78 1999 वृक्षारोपण घोटाला 2563 2001 केतन पारेख घोटाला 137 2001 स्टॉक मार्केट घोटाला 1,15,000 2002 आंतरिक व्यापार घोटाला 600 2003 स्टांप पेपर घोटाला 30,000 2005 आई.पी.ओ. डिमेट घोटाला 146 2005 बिहार खाद्य सहायता घोटाला 17 2005 पनडुब्बी घोटाला 18,978 2006 पंजाब सिटी सेंटर घोटाला 1500 2006 ताज कोरिडार मामला 175 2008 हसन अली खान टैक्स मामला 50,000 2008 सत्यम घोटाला 10,000 2008 आर्मी राशन घोटाला 5,000 2008 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला 1,76,000 2008 स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र 95 2008 स्विस बैंक में काला धन 71,00,000 2009 झारखंड स्वास्थ्य सामग्री घोटाला 130 2009 चावल निर्यात घोटाला 2500 2009 ओडिसा माइंस घोटाला 7000 2009 मधु कोड़ा माइनिंग घोटाला 4000 2010 कॉमनवेल्थ गेम घोटाला 40,000 2010 आदर्श सोसाइटी घोटाला 3000 कुल बानवे लाख करोड़ रुपए का घोटाला है।

 

        श्री राजीव गांधी, तात्कालिक प्रधानमंत्री ने 1985 में कहा कि विकास कार्यों के लिए मैं केन्द्र से एक रुपया भेजता हूं लेकिन जरूरतमंद तक 15 पैसे ही पहुंच पाते हैं।

        श्री राहुल गांधी ने जनवरी, 2008 में कहा कि मेरे पिता राजीव गांधी ने एक बार कहा था कि एक रुपया में से 15 पैसे ही आम आदमी तक पहुंच पाते हैं।  मैंने कई जिलों का दौरा किया है। ऐसा नहीं लगता कि पांच पैसे भी गरीब तक पहुंचते होंगे। इन 25 वर्षों में 1985 से 2011 तक हालत और बिगड़ गई है।

        विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्रीय देश भारतवर्ष में पिछले 63 वर्ष में भ्रष्टाचार काफी हद तक बढ़ा है।  भ्रष्टाचार के बारे में लोक सभा में दिए गए प्रश्नोत्तर के अनुसार विश्व में भ्रष्टाचार में भारत का 87वां रैंक है।

        भ्रष्टाचार की परिभाषा भारतीय दंड संहिता (आई.पी.सी.) की धारा 161 में की गयी है।  कानून की दृष्टि में यह परिभाषा की परख है कि जो व्यक्ति शासकीय कर्मचारी होते हुए या होने की आशा में अपने या अन्य किसी व्यक्ति के लिए विधिक पारिश्रमिक से अधिक कुछ घूस लेता है या स्वीकार करता है अथवा लेने के लिए तैयार होता है या लेने का प्रयास करता है या किसी कार्य को करने या न करने के लिए उपहारस्वरूप या अपने शासकीय कार्य को करने में किसी व्यक्ति के प्रति पक्षपात या उपेक्षा करता है, तो उसे तीन वर्ष तक के कारावास का दंड या अर्थ दंड या दोनों दिए जा सकेंगे।  

        भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1947 के प्रावधानों की पकड़ मजबूत करने के लिए सन् 1988 में संशोधन किया गया।  लोक सेवक की परिभाषा भी अब अधिक विस्तृत कर दी गई।  मंत्री सांसद भी लोक सेवक हैं।

        वास्तव में भारतवर्ष को कुशल तथा अपेक्षाकृत ईमानदार लोक सेवा विरासत में प्राप्त हुई।  स्वतंत्रता के पश्चात् लोगों की सच्चरित्रता में गिरावट आई है।  आज सम्पूर्ण प्रशासन में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं।

        ट्रंसपेरेंसी इंडिया ने वर्ष 2007 में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों (बी.पी.एल. कार्डधारी) को आधार बनाकर अध्ययन किया।  जून, 2008 में जारी सर्वे रिपोर्ट के अनुसार बी.पी.एल. परिवारों को मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं में भ्रष्टाचार पाया है।

        हालांकि किसी भी राज्य में ऐसा कोई विभाग नहीं है जहां भ्रष्टाचार शून्य हो।  देश में किसी राज्य में एक-चौथाई बी.पी.एल. परिवार तो किसी में 44 प्रतिशत परिवार बिचौलिया के जरिए ही देय सुविधाओं का लाभ उठाते हैं।

        स्वतंत्रता के बाद प्रशासनिक अकर्मण्यता कदाचार कुप्रशासन आदि के रूप में भ्रष्टाचार सर्वव्यापी हो गया है।  कुप्रशासन से होने वाले भ्रष्टाचार से बचने के लिए नागरिकों के पास प्रभावपूर्ण साधनों का अभाव है।  भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1947 के प्रावधानों व संसोधनों के बाद व्यापक भ्रष्टाचार पर रोक नहीं लग रही है।

        गुप्तचर विभाग के पूर्व निदेशक अरुण भगत के अनुसार "मजाक में ही सही, भारतवर्ष के लोग भ्रष्टाचार को भी शिष्टाचार कहने लगे हैं। "  सुविधा शुल्क या कहे घूस के इस लेन-देन की जड़ें बहुत गहरी हैं, वक्त है संभल जाये हम ऐसा न हो कि आने वाली पीढ़ी भ्रष्टाचार के इस दलदल में ऐसी धंस जाये कि न वह उबर सके, न देश।

        जनलोकपाल, सरकारी लोकपाल या ऐसा कठोर कानून बने जिससे भ्रष्ट व्यक्ति जेल में रहे।  भारत का प्रत्येक नागरिक डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, व्यापारी, प्रशासनिक अधिकारी, कॉरपोरेट जगत के लोग भ्रष्टाचार करने से पहले हजार बार सोचें। भ्रष्टाचार से कमाई हुई सम्पत्ति को राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित किया जाए।

 

        सदियों की ठंडी बुझी राख सुगबुगा उठी         मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है         दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो         सिंहासन खाली करो की जनता आती है।

 

*SHRIMATI POONAM VELJIBHAI JAT (KACHCHH): Respected Sir, today is a historic day that the Parliament is having a discussion on the Lokpal Bill because the Lokpal Bill has shuffled in Parliament and has not been passed in the Parliament for 43 years.  It is high time that it should be passed now.  But it is surprising that why the Government is against the 3-point put forward by Shri Anna Ji.  I believe that by bringing a strong Lokpal, we will not do any harm to the democracy, but will make it more stronger by truly bringing the views of the people in running a Government by the people, of the people, for the people.  But, the Bill brought by the Government does not define the exact meaning of corruption. So, I think the definition of corruption should be defined first like in the Jan Lokpal Bill.  A person coming to office late by two hours is also corrupt somewhere as he is doing harm to his official work.  So, I think it should be defined properly.  I believe that the Committee that will nominate Lokpal should also have some representations from the SC and ST communities, because a large number of people in India come from these communities and they should not be left behind.  Recently, it has come to my notice that the fund allocated for SC and ST is not used for the welfare of these communities but used in different works.  Such instances have come to notice of many States.  So, I feel that this is also a type of corruption against SC and ST communities, because after many complaints, the Central Government has not taken any action against even the Delhi Government for using funds meant for SC and ST communities.  I even feel the need to bring NGOs and the Media under the Lokpal as many instances of corruption in NGOs and even the Media have been coming in the news now and then.  So, I feel the 3-point demand should be accepted and Shri Anna Ji should put an end to his fast.  We should work together to bring a strong and good Lokpal Bill for the  benefit of  people  and free  the  people from  the agony of years of   * Speech was laid on the Table suffering under corruption from influential people.  So it is high time the people are heard and a law is brought for the people like Singapore.

   

*SK. SAIDUL HAQUE (BARDHMAN-DURGAPUR): The question of formation of Lok Pal comes mainly in order to check corruption.  In fact the attempt to form Lokpal has been initiated from 1968.  Many times draft Bill come, the last one in 2001, but that did not materialize.  In August 2011, this Government has placed draft Lokpal Bill which is under consideration of Standing Committee.  Recently because of widespread corruption going on, particularly in last two years, the question of formation of Lokpal has got momentum.

          It is not that corruption was not there in the past. But now in UPA-2 regime it has reached its peak with so many scams and people are directly suffering as a result of that price inflation has risen much and prices of essential commodities have gone beyond the reach of the common people.  On the other hand, some people working in high office and the corporates are looting the country, that is why agitation against corruption becomes so vital.  That is why present movement of Anna Hazare is getting much response, particularly from middle class and the youth.  Hence the need for formation of Lokpal has become so important.  Right, it is that Lokpal is not the only solution to stop all the corruption.  Nonetheless, it can play an important role to check corruption.

          There are to dimensions to the issue of fighting corruption. The first is the immediate context where the aim should be to persuade Anna Hazare to end his fast.  The Government must give the assurance that the Bill that it had introduced in the Parliament will be withdrawn and a new Bill incorporating the suggestions from the Jan Lokpal Bill and other quarters will be brought before the Parliament.  The Mechanism for drafting this new Bill, must be worked out by Government and, on the basis of this assurance, Anna Hazare must withdraw his hunger strike. In the Interests of the country, the Constitution and Parliamentary Democracy, the Government must immediately bring a new Bill that will be both strong and effective.

          With regard to the larger issue of fighting corruption, my party, the CPI (M), while seeking an effective Lokpal, had submitted a detailed note on various other measures that are required to be simultaneously undertaken if the battle against corruption has to succeed.  My party is of the opinion that the Prevention of Corruption Act, 1988 needs to be amended to widen the definition of corruption from the existing one that narrowly restricts this by defining corruption as the misuse of public power for private gain or enrichment.

          In many cases, power is misused to benefit an entity like a private company which is not a “person” as required under PCA 1988. Often, there may be no traceable kickbacks or embezzlement but there may be a huge loss to the public exchequer and breach of public trust for example through sale of PSUs due to a willful misuse of power.

          The definition of corruption has to be widened to include “willfully giving any undue benefit to any person or entity or obtaining any undue benefit from any public servant in violation of laws or rules”.

          On the inclusion of Prime Minister in its ambit, my suggestion is that this should be done with adequate safeguards. Complaints about corruption against the judges of the Supreme Court and the High Courts should be handled by a separate body, the National Judicial Commission.  This Commission should take care of the appointments in the higher judiciary and oversee their conduct and enquire into the complaints of corruption. For this, necessary legislation will have to be passed.  The Judicial Standards and Accountability Bill, 2010 is woefully inadequate for this purpose.

          At present he scrutiny of the conduct of Members of Parliament with regard to any corrupt practice is weak and unsatisfactory. For Members of Parliament, Article 105 of the Constitution provides protection with regard to freedom of speech and voting.  The real issue is how to ensure that this freedom and protection does not extend to acts of corruption by members of Parliament.

          This can be done through an amendment to Article 105, on the lines recommended by the National Commission to Review the Working of the Constitution.

          Alternatively, if feasible, there can be legislation that if any Member of Parliament indulges in any act of corruption that motivates his or her action in Parliament (voting, speaking etc.), then this act falls within the purview of the Prevention of Corruption Act and the IPC.

          Whistleblowers must be protected in order to combat corruption.  Monitoring and ensuring protection of whistleblowers can be a part of the mandate and Lokpal, but this needs a comprehensive statutory backing. The provisions of the Public Interest Disclosure (Protection of Information) Bill, 2010 needs to be strengthened and the Bill enacted expeditiously.

          In addition to the establishment of a strong and effective Lokpal, I put forward the following six suggestions that need to be implemented simultaneously, if the issue of combating corruption is to be taken up in right earnest.

(1)          Setting up of a National Judicial Commission to bring the conduct of judiciary under its purview.
(2)          Law to protect citizens charter for redressal of public grievances.
(3)          Amendment of Article 105 of the Constitution, if necessary, to bring MPs under anti-corruption scrutiny.
(4)          Electoral reforms to check money power and role of criminals in elections.
(5)          Setting up of Lok Ayuktas in the States to cover public servants at the state-level.
(6)          Steps to unearth black money and confiscate the funds illegally stashed away in tax havens.

The Government must move urgently in order to resolve this impasse by accepting these suggestions for safeguarding and upholding the Constitutional scheme of things of the Indian Republic.  And for that reason establish a strong and effective Lok Pal.

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I stand here today, which is evolving itself as a historic day for this House, to speak on the statement that has been delivered by the Leader of the House and the Finance Minister of this country relating to setting up of Lokpal.

15.19  hrs                        (Shrimati Sumitra Mahajan in the Chair)           At the outset, I am reminded of a news item that was published very recently in “The Economist” and the title says “Graft in India rotten to the core, coping with the aftermath of a massive scam.” In the first line, it says, Sonia Gandhi, the head of the ruling Congress Party laments  that India’s moral universe “is shrinking” as newspapers filled with ever more galling cases of political corruption. The second line mentions -  Manmohan Singh,  the Prime Minister says, he feels like a school boy facing a series of agonizing tests as scandals break  one after another.

          I need not read the other sentences that follow in the famous news magazine The Economist. But I am reminded here of the history of the Bills that have been moved in this House since 1968. Shrimati Indira Gandhi became Prime Minister a number of times and during her tenure three Lokpal Bills were introduced. The first of such Bills was introduced in 1968 when a Committee went into those aspects and 10 Dissent Notes were also attached to the Report of that Committee. Then, in 1970 another Bill was also moved which lapsed and again in 1971 another Bill was moved which also lapsed in 1977. Subsequently, in 1985, about which Shri Basu Deb Acharia mentioned, another Bill was moved during Rajiv Gandhi’s tenure which was withdrawn in the aftermath of Bofors. So, four Lokpal Bills went dead. Then, one more Lokpal Bill was moved during V.P. Singh’s tenure in 1989 which also lapsed. Later in 1996, during the tenure of Shri Devegowda as the Prime Minister, who is an hon. Member of this House, another Bill for the creation of Lokpal was moved which also lapsed. During Atalji’s time, two Lokpal Bills were moved, one in 1998 and another in 2002 and both these Bills also lapsed. I am giving a history of this because this is the reason why subsequently an opinion has spread among the people of this country that, perhaps, the law makers are actually not interested to have a Bill of this nature.

          Sir, I am reminded of one instance of Mahabharata. Vidhur says in Mahabharata that in judging a ruler’s action, he looks to the results. If it benefits the people, it is an act of dharma; if it harms them, then it is adharma. Very humbly I would like to ask, how many of us have read those red letters which are above the Chair. It says: धर्मचक्र प्रवर्तनाय. There are other lines as well. We are all here. This is the House of the People and the first line of the Constitution says: ‘We, the people of India’. The people are represented in this House. Anybody can create a crowd on the street, but you do not make a law on the street, you make the law here, in this House.

          Therefore, I would appeal to Shri Anna Hazare to end his fast. I have respect for him, for the work he has done for the last so many decades for the welfare of the downtrodden, for the rural masses. He has empowered a number of people and he has travelled a lot throughout this country, as far as I know. He comes from a very humble background. But at the same time, I would say that Shri Anna Hazare’s crusade against corruption is unique in many aspects. His movement is significant for a number of reasons. Shri Anna Hazare has re-established the relevance of Gandhiji and his ideals to the present day India. He has also drawn the younger generation into public issues. His life is precious for humanity. By observing his fast, he has already made his point. He has already shaken all of us; all of us not only mean the Members who are sitting in this House, all of us means the citizens of this country and he has shaken them from slumber to fight against corruption.

Enactment of Lokpal Bill is one weapon to fight against corruption, there is a need for many more weapons and Anna can guide the younger generations to achieve that.

We are in favour of a strong and effective Lokpal Institution.  Anna Hazare’s movement against corruption has brought together those who want to see the system change for better, but disdain for Parliament will have tremendous repercussions. 

This country is governed by theConstitution and the rule of law.  We are in favour of bringing the Prime Minister in the ambit of Lokpal; excluding the incumbent Prime Minister is a mistake.  He is the head of the Cabinet and first amongst equals.  He is a Minister who is as liable to scrutiny as his peers.  My Party, Biju Janata Dal, therefore, is of the view that the Prime Minister should be under the purview of Lokpal’s jurisdiction but there should be some rider or restriction for greater national interest.  The Prime Minister should not be investigated at all in any matter relating to national security and public order.

On judiciary, our view is that it should not come under the purview of Lokpal.   The Judicial Standards and Accountability Bill should be expedited. Sadly many High Courts are facing charges of corruption.  The cases involving Justice Soumitra Sen of Calcutta High Court, Chief Justice P.D. Dinakaran of Sikkim High Court, Justice Nirmal Yadav of Uttrakhand High Court are all at various stages.  There is also the Rs.23 crore Ghaziabad Provident Fund Scam in which a Supreme Court judge, since retired, seven Allahabad High Court judges, 12 judges of the Subordinate courts and six retired High Court judges are allegedly involved.

I would, therefore, urge upon the Government to bring the Judicial Accountability Bill at the earliest opportunity.  There is a need to drastically overhaul the judiciary which has become imperative in view of the increasing cases of corruption involving High Court judges.  However, the independence of the judiciary must be respected and Lokpal cannot meddle with the judiciary.  In any conflict the courts will be the final arbiter not the Ombudsman.

Including the Members of Parliament in the Lokpal is another issue which needs to be deliberated here, Madam.  The exclusion of Members of Parliament from the Lokpal Bill is a necessity keeping the constitutional provisions in view under article 105 of the Constitution which clearly narrates the necessity for having such provisions.  Whatever an hon. Member says or votes in Parliament or any Committees thereof shall not be liable nor can be prosecuted in any court of law. 

However, his conduct inside the House is the prerogative of the Parliament. Any action outside the House, if criminal in nature, is bound to attract criminal procedure and Lokpal can go into some such matters.  But no interference be allowed by the Lokpal relating to the conduct of any hon. Member inside the House or in other respective Committees.  The hon. Speaker is armed with enough powers to keep the order.

          India’s federal structure needs to be protected at any cost.  India is a union of States. The States should have separate laws for creating Lokayuktas.  Our Party, Biju Janata Dal, would like a strong institution of Lokayukta.  We would be prepared to emulate a Central model but the actual Lokayuktas, men or women, should be chosen by the State laws. Lokayukta for a State should not be chosen by the Central Lokpal, and directions should not be given by the Central Lokpal or any Central agency to the State Lokayukta.  Both aspects can be looked after by the respective State. No attempt should be made to thrust any centralised law on the States.  We will resist it to our utmost capacity. 

          Madam, the Government should keep in mind that Central Government employees should come under the Central Government Lokpal and State Government employees should be under the purview of the State Lokayuktas. No attempt should be made in any manner to encroach upon the State by the Centre.  The State Assemblies are there to frame their own law.  We are for the retention of the federal character of the nation.  When experience has shown that by delegating power one imparts better governance and accountability is ensured, why should there be an attempt to create a monolithic structure at the Central level? 

          The other point relates to the Citizen’s Charter. Citizen’s Charter is the call of the day.  It is a necessity to make the executive Government machinery accountable.  Right to Service must be enforced.  Every developed society expects its public functionaries to deliver the goods and thereby become accountable for their deeds.  We are of the opinion that respective Governments should make their departments’ personnel concerned to declare a Citizen’s Charter and for each work there should be a specified time limit.  This will further the Right to Information provisions also.

          Many Members also mentioned about the General Secretary of Congress Party, Mr. Rahul Gandhi’s statement which he had made yesterday during the ‘Zero Hour’. 

MADAM CHAIRMAN : Please conclude now.

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : I would like to draw your attention only to two issues.  One is that in his four-page statement, he mentioned about Government funding of elections and political parties.  I have a difference of opinion.  I saw it two-three days back and I also concur to that view.  The Election Commissioner has come out with a statement.  People are not worried; we are not worried.  A person who wants this society to be free from corruption is worried because of lot of money being pumped into during the election.  I think that has troubled him and he mentioned that it should be Government funding of elections. In a country like ours where we have a multi-party system, every year, a number of political parties are formed.  It is unthinkable and it is unadvisable to have Government funding.  Rather we are not concerned how much money is being spent on account; we are more concerned and disturbed of the unaccounted money that is actually being utilized during the elections.  How to tap that?  How to control that?  A suggestion is there that you allow the corporate sector funding or donations and make it legal.   That will help to a great extent to curb this illegal money that is being spent. 

I think, perhaps he was misled or he was not aware about it.  I will not say that he was not aware of it.  It is a mistake which needs a little bit of correction.  His friends may tell him that. In his third page he mentions:

“Madam Speaker, why not elevate the debate and fortify the Lokpal by making it a constitutional body accountable to Parliament like the Election Commission of India?”             The Election Commission of India is not accountable to Parliament.  It is only accountable to the Constitution of India. Perhaps, he had in his mind the C&AG.  The Election Commission is not accountable to us.  It is only accountable to the Constitution of India.  We do not need a Lokpal to be accountable only to the Constitution of India. 
Madam, here I may refer to The Hindustan Times, which has very rightly mentioned the comparison of the Office of Ombudsman in some countries. I am not going into every details. I am not mentioning about Sweden which has Ombudsman for the last many years, but I will mention here about the United Kingdom.  What power does it has?  I quote:
“The Commissioner shall send his investigation report to the Member of the House of Commons and the principal officer of the department under investigation.  Also can lay a special report to the House if the Commissioner feels that a person failed to perform his duty and such a failure will not be remedied”             The sum total is this.  The report will be placed before the House of Commons… (Interruptions)
MADAM CHAIRMAN : Please conclude.
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : I am talking substance.
MADAM CHAIRMAN: Many hon. Members have to speak in the discussion.
SHRI BHARTRUHARI MAHTAB: I am talking on specifics. I may be allowed to speak.
           I am not talking about Hong Kong or New Zealand or Finland.  I am talking about a friendly country like Indonesia, which has recently been converted to a democratic country.  Here the powers of the Ombudsman are:
“The Ombudsman may after investigation issue recommendations.  It shall be sent to the complainant, the person against whom complaint was made and his person’s superior.  The recommendation has to be complied with.  If the superior does not comply with the Ombudsman may send the report to the House of Representatives and the President”             So ultimately it is the House of Representatives; the House of Commons; the House of People, which will take action. 
So these are certain suggestions.  Ultimately it is the House which will take action, and I think the Standing Committee will go into those aspects. 
          Pranab babu has mentioned three points. Madam, I would like to mention here the last point that is, whether the Lokpal should have the power to punish all those who violate the grievance redress mechanism to be put in place.  If we say ‘yes’, as has been said by the Leader of Opposition, as has been supported by Shri Sharad Yadavji, I have my doubt. You are allowing him to investigate. You are allowing him to prosecute.  You are allowing him to punish.  We had debated these three aspects in the Constituent Assembly.  A person who will prosecute should not be the person to punish.  I think, this House should deliberate on that.  We cannot rush through like this. When a Resolution will be moved, all these aspects should be deliberated. 
Do not empower a person or a group of persons to such a level that he can play havoc, if desires.  God forbid that does not happen. 
In the energy that has been released by Anna Hazare’s stir, specially among the youth, there are great signs of hope.
          But that energy needs to be channelized watchfully and constructively. 
          Poet Faiz Ahmed Faiz once sang beautifully on the ‘crop of hope’ -  yeh fasl ummeedon ki humdum – but hinted darkly that it could also wither away as quickly as it grew: 'ghaarat jaayegi'  were his words.  These were his words which he used.
          Madam, before that happens, there is a need to nurture that crop with care and help it turn into a harvest of gold. 
          I conclude with the line of the English thinker, Jeremy Bentham, in the 19th Century, in Utilitarian Slogan had said: “The greatest good of the greatest number”. 
          I would only appeal to the wise men of this House and outside that good politics is about prudence, not morality alone.
          With these words, I conclude.
                                                                                                   
*डॉ. किरीट प्रेमजीभाई सोलंकी (अहमदाबाद पश्चिम)ः  भारत के प्रशासन में भ्रष्टाचार का मामला ठीक आजाद होने के बाद ही उजागर हुआ था।  इस पर स्व. श्री मोरारजी देसाई की अगुवाई में भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए एक समिति का गठन किया गया था और ऐसे कई विचार-विमर्शों के बाद भ्रष्टाचार को निपटाने के लिए "लोकपाल" जैसी स्वतंत्र संस्था का ख्याल रखा गया था।  पिछले चार दशकों से अधिक समय में कई लोकपाल बिल को रखा गया, मगर मुझे इस बात का गौरव है कि श्री अटल जी के कार्यकाल के दौरान एनडीए के शासन में जो लोकपाल बिल प्रस्तुत हुआ वह सबसे मजबूत, सशक्त एवं प्रभावी था।  इस बिल के तहत प्रधानमंत्री को भी उसके दायरे में रखा गया था।
        मुझे यह कहते हुए दुख होता है कि पिछले सात वर्षों के यूपीए एक और दो सरकारों के कार्यकाल में भ्रष्टाचार ने अपनी सभी सीमाओं को पार कर दिया।  मुझे स्मरण है कि 64 करोड़ के घोटाले वाले बोफोर्स कांड के तहत उस वक्त की कांग्रेस सरकार को सत्ता से बाहर होना पड़ा था। मगर इस सरकार के कार्यकाल को सिर्फ घोटालों, भ्रष्टाचार और कुशासन के लिए इतिहास में याद किया जाएगा।  आज पूरे देश में यह सरकार भ्रष्टाचार के पर्याय के रूप में उभर आई है।
        अपना देश एक सोने की चिड़िया कहलाता है, जहां विपुल मात्रा में कुदरती सम्पदा है।  लहलहाते हुए खेत हैं, जगत में श्रेष्ठ वैज्ञानिक एवं विद्वान हैं, सबसे अच्छे श्रमजीवी और किसान हैं।  समग्र दुनिया में सबसे ज्यादा ऊर्जावान युवाओं का समूह है।  मगर सरकार की भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाली नीतियां और राजकीय इच्छाशक्ति के अभाव के तहत यह सब दुर्दशा हुई है और भ्रष्टाचार से उत्पन्न हुआ देश का कालाधन परदेशी और स्विस बैंक में जमा होने लगा है।
        हमारे नेता श्री लाल कृष्ण आडवाणी जी ने विदेशों में स्थित रूपए के कालेधन के खिलाफ 2009 के लोक सभा के चुनाव में जंग छेड़ दी थी।
        आज सरकार की ऐसी विफलता के तहत देश के युवाओं से लेकर बड़े वर्ग में उसके प्रति आक्रोश है।  मैं श्री अन्ना हजारे जी को सलाम करना चाहता हूं कि उन्होंने देश के अहम मुद्दे की अगुवाई की, और आज बड़ा जन सैलाब उनके साथ खड़ा है।  मैं समझता हूं कि अन्ना जी की मुहिम के मद्देनजर उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए "जन लोकपाल बिल" को केन्द्रीय बेस बनाकर उस पर नया एक सशक्त एवं प्रभावी बिल बनाना चाहिए।  यह कम नसीब की बात है कि सरकारी लोकपाल एक निप्राण और कमजोर बिल प्रस्तुत हुआ था।  इसी वक्त नेता प्रतिपक्ष श्रीमती सुषमा जी ने उन पर कड़ी आपत्ति जताते हुए उसकी निंदा की थी और मजबूत बिल लाने की बात सदन में रखी थी।  मुझे खुशी है कि देर आया दुरूस्त आया के तहत सरकार अपनी जिद छोड़कर, दबाव में ही सही मगर सम्मत हुई है।
        जन लोकपाल बिल को आधार बनाकर आगे बढ़ने में कोई हर्ज नहीं है।  मगर मैं अपनी ओर से कुछ प्रमुख बिन्दु रखना चाहता हूं।  इस बिल में संविधान को सर्वोच्च रखते हुए आगे बढ़ना चाहिए। संसद और संसदीय परम्परा को ऊपर रखकर आगे बढ़ा जाना चाहिए।  जन लोकपाल बिल के तहत इस संस्था में कुल 10 सदस्य और एक चेयर पर्सन रहेगा।  मेरा यह स्पष्ट मंतव्य है कि इस संस्था में समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए।  खासकर दलित, वनवासी, किसान एवं श्रमजीवियों को प्रतिनिधित्व देने का ठोस प्रावधान रहना चाहिए।  समाज के पिछड़े वर्गों और दलितों के लिए आवंटन की गई धनराशि को कई अन्य जगह पर ट्रंसफर करना भ्रष्टाचार के तहत लाना चाहिए और इस बिल के प्रावधानों के तहत कार्य करना चाहिए।  जन लोकपाल को स्वतंत्र संस्था (ऑटोनोम्स बॉडी) बनाना चाहिए और उनके प्रशासन के लिए धनराशि, कर्मचारी और अधिकारियों की उपलब्धि होनी चाहिए।  सांसदों को सदन में लोकहित की आवाज को उठाने का विशेषाधिकार दिया है, वह बरकरार रहना चाहिए।  जन लोकपाल के दायरे में एनजीओ मीडिया (इलेक्ट्रानिक एवं प्रिंट), सेवानिवृत्त आईएएस, आईपीएस, अफसरों को भी लाना चाहिए।  जन लोकपाल की कार्यवाही के दौरान प्रथम दृष्टि दोषी पाए गए व्यक्तियों के लिए भ्रष्टाचार के केसों के लिए अलग न्याय प्रणाली का गठन करना चाहिए और सबसे अहम, जनलोकपाल पर निगरानी के लिए कुछ ठोस और पारदर्शक प्रावधानों वाली व्यवस्था का गठन करना चाहिए।  
                                 
*SHRI S.S. RAMASUBBU (TIRUNELVELI): Sir, I am first of all bestowing my thanks to hon. Speaker for giving me an opportunity to express my opinion regarding Lokpal Bill which is going to be drafted shortly as a strong one.
          A powerful Lokpal Bill is expected by all the people in order to put an end to the corruption through all walks of life – all the Government machinery, corporate bodies, NGOs, Judiciary, political representatives and media groups.
          The constitutional supremacy, constitutional framework and the vested power should not be damaged and perturbed because of Lokpal Bill, Right to Information Act was passed.  Even the layman can understand and know the fact of what is going on in anyone Department of the Government undertaking.
          My opinion is that the Prime Minister should not come under the purview of Lokpal.  The Parliament is represented by the elected Members from various areas of the country.  The people give their mandate to represent them.  Both the Houses of Parliament are having the power to enact a law.  The Head of the institution is the Prime Minister. If the Prime Minister and the Members of Parliament are brought under the purview of Lokpal, how is it possible to control and enact an effective law?
          We are enacting a law to control all the machinery of the Government.  The Judiciary follows only the Act of Parliament.
          The Lokpal can be established to monitor all the sectors of Government machinery and public representatives to findout whether they are functioning properly.  The Lokpal can discuss and find out the fault of anybody.  If there is any fault, then action can be taken against him.  Such power can be provided to the Lokpal. 
     
* Speech was laid on the Table             So, we have to be very cautious enough to bring such a Lokpal which should not in any way damage our democratic set up.  Good and necessary provision must be there to eradicate corruption from our society in all walks of life.
             
*श्री राम सिंह कस्वां (चुरू)ःइस देश में लोकपाल के लिए 42 सालों से इंतजार चल रहा है।  किसी भी कौम के लिए 42 साल का समय बहुत लम्बा वक्त होता है।  9वीं बार यह बिल इस सदन में आ रहा है, अब जाकर इसके लिए ठोस हलचल हुई है।  स्वतंत्र भारत में पहली बार किसी कानून के लिए इतना बड़ा जन समुदाय उठ खड़ा हुआ है।  वन्दे मातरम, भारत माता की जय हो, ये स्वतंत्रता आन्दोलन के नारे थे, आज फिर ये नारे लगाते देश के लोग एक बार फिर सड़कों पर उमड़े चले आ रहे हैं।  क्या सचमुच इन्हें अन्ना के बहाने खोई हुई आजादी की तलाश है।
        भ्रष्टाचार के मौजूदा प्रकरणों ने भ्रष्टाचार विरोधी व्यवस्था से लोगों का विश्वास हिला दिया है।  पिछले कुछ वर्षों में भ्रष्टाचार के रिकार्ड कायम हुए हैं। स्वाधीन भारत के 64 वर्षों में भ्रष्टाचार पंख लगाकर उड़ा है।  देश को खूब लूटा गया है।  अन्ना ने देश की जनता को भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट कर दिया है।  पहली बार भ्रष्टाचार की समस्या को राष्ट्रीय मंच पर लाया गया है।  भ्रष्टाचार आम आदमी का मुद्दा है।  पहले यह सबकी पीड़ा थी, आज यह सबका साझा गुस्सा है।  यह बात सिद्ध हो चुकी है कि जो वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था है वह भ्रष्टाचार रोकने में नाकाम रही है।  उलटे इस व्यवस्था से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है।  कानून ऐसा हो जो पूरी व्यवस्था के प्रति जवाबदेह हो।  अन्ना हजारे की मौजूदा मुहिम को मिल रहे जन समर्थन से एक बात साफ हो गई है कि जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त हो चुकी है। सरकार की नीयत पर उनका भरोसा नहीं है।  सार्वजनिक जीवन में शून्य पैदा हो गया है।  इतिहास में जन शक्ति की जीत का नया अध्याय जुड़ गया है।  अभूतपूर्व घटनाओं से ही इतिहास बनता है।
        आज जनता हर राजनेता को एक ही निगाह से देख रही है, लेकिन काफी ऐसे राजनेता भी हैं जो ईमानदार हैं, जो भलाई व ईमानदारी के रास्ते पर चलना चाहते हैं लेकिन मौजूदा व्यवस्था ने सबको दागदार कर दिया है।  हमने अपने रवैये की यह कीमत चुकाई है कि लोग हम पर भरोसा नहीं करते।   आज हम आदर्शवाद से कोसों दूर हैं।  
        हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा लोकपाल विधेयक लेकर आए, जिससे भ्रष्टाचार की चुनौतियों से निपटने के लिए हमारे सरोकार का पता चले व हम एक मजबूत और प्रभावी विधेयक तैयार कर सके, जिसका देश में व्यापक जन समर्थन हो।
        मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के साथ हूं।  मेरी मांग है कि प्रधानमंत्री को इसमें शामिल किया जाए, न्यायपालिका के लिए नेशनल ज्यूडिशयल कमिशन बनाया जाए, सीबीआई को स्वायत्त संस्था बनाया जाए, ताकि इसका दुरूपयोग न हो, सांसदों का सदन के बाहर का आचरण लोकपाल बिल में शामिल किया जाए।  लोकपाल बिल में ही राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति की जावे, वर्तमान में लोकायुक्त राज्यों के कानून से नियुक्त होता है, लेकिन व्यवहार में यह कितना प्रभावशाली है, हम जानते हैं।  हर सरकारी कर्मचारी को लोकपाल के दायरे में लाया जाए, क्योंकि आम आदमी इनसे ज्यादा परेशान है।  हर विभाग में जन समस्याओं के लिए नागरिक सहिंता (सीटिजन चार्टर) बनाया जाए।  जिसको न मानने पर संबंधित अधिकारी को दंडित किया जाए।  ये इस तरह की मांगें हैं, जो देश की करोड़ों जनता की रोजमर्रा की जिन्दगी से जुड़ी है।  आखिर आम आदमी को यह जानने का हक क्यों नहीं होना चाहिए कि उसका काम कितने दिन में और किस तरह होगा।  इस कानून के दायरे में पूरी सरकारी मशीनरी को लाया जाए।  शीर्ष पदों पर भ्रष्टाचार जितना बुरा है, इससे अधिक घातक इसका निचले स्तर पर फैलने वाला यह जहर है, जिसकी चपेट में आम आदमी और गरीब आता है।  निचले स्तर की नौकरशाही का भ्रष्टाचार आम आदमी को रोज काटता है, व्यावहारिक तौर पर उसे कैसे लोकपाल के घेरे में लाए, इस पर विचार होना चाहिए, लेकिन आम आदमी खासकर गरीब और गांव का आदमी, वह कोर्ट-कचहरी थानेदार और पटवारी के भ्रष्टाचार से परेशान है। अन्ना की यह बात बिल में जरूर आनी चाहिए।  हर सरकारी विभाग को आम आदमी के प्रति जवाबदेह होना चाहिए और सेवाएं देने का समय तय होना चाहिए।  अन्ना की आवाज उस आदमी का दर्द है, जो    तिल-तिल कर भ्रष्टाचार की आग में जलने को मजबूर है।  हमें दलगत राजनीति से ऊपर  उठकर भारत की पुकार के अनुसार ऐतिहासिक बदलाव करना चाहिए।  हमें ऐसे लोकपाल की तलाश करनी चाहिए, जो संविधान और संसदीय लोकतंत्र को सदमा पहुंचाए बना आम जनता के लिए फायदेमंद साबित हो व संविधान के प्रति उत्तरदायी हो। विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को लोकतंत्र के प्रति जवाबदेह बनाते हुए एक प्रभावी और मजबूत लोकपाल देश को दिया जाए।
                           
*डॉ. किरोड़ी लाल मीणा (दौसा):  किसी ने गणना की थी कि इस दुनिया में करीब 3 करोड़ 30 लाख कानून है।  अगर दुनिया के लोग बाईबल के टेन कमाण्डमेन्टस या गीता का निष्काम कर्म या कुरान की कुछ आयतों को मानने लगे, तो शायद एक भी कानून की जरूरत न पड़े।  लेकिन हमने ना तो पवित्र ग्रंथों से कुछ सीखा, ना ही इतने सारे कानूनों के बावजूद अपराध  रुक पाये।
        भ्रष्टाचार दरअसल नैतिक प्रश्न ज्यादा है।  कानूनी पक्ष भ्रष्टाचारी को केवल हतोत्साहित करने की ही भूमिका निभा सकता है।  जब भ्रष्टाचार जन-जन में व्याप्त हो, तो केवल कानून बनाकर इसे खत्म करने का दावा संशय पैदा करता है।  बाल-विवाह का कानून आया, कानून प्रभावी था किंतु आज स्थिति क्या है?  औपचारिक संस्थाओं को विकसित करके या कुछ और कानून बनाकर इसका पूरा समाधान ढूँढना रेगिस्तान में जल ढूंढने जैसा होगा।  गांधीवादी आन्दोलन एक विदेशी हुकूमत के खिलाफ था।  इसके बावजूद महात्मा गांधी ने लगातार यह कोशिश की कि इस आन्दोलन के साथ ही समाज में आत्मोत्थान का एक सूक्ष्म संदेश जाता रहे।
        गांधीजी ने हरिजन में 22 फरवरी, 1942 को ट्रस्टीशिप की व्याख्या करते हुए लिखा था, "अहिंसा का प्रयोग करते समय हमें यह विश्वास रखना चाहिए कि हर व्यक्ति को मानवीय संदेश देकर परिष्कृत किया जा सकता है।  हमें मानव में अन्तर्निहित अच्छाई को जगाना होगा। "  अतः देश में चरित्र निर्माण पर जोर देना होगा। आदर्शवादी एवं सिद्धांतवादी लोग तैयार करने होंगे, जिससे राजनीति में शुचिता आये।  नैतिक मूल्य वाले लोग आयें जिससे मूल्य आधारित राजनीति का महत्व बढ़े।  सबसे पहले हमें इस बात को समझना होगा कि भ्रष्टाचार है क्या और इसके कारण व स्रोत क्या हैं?  भ्रष्टाचार की जड़ में व्यवस्था सर्वोपरि है और व्यवस्था को बदले बिना हम भ्रष्टाचार से लड़ाई नहीं लड़ सकते, यही अन्ना जी कह रहे हैं जो स्वागतयोग्य कदम है।  इस व्यवस्था में बदलाव के लिए जो सबसे पहला कदम है वह दोषपूर्ण राजनीतिक दल व्यवस्था और निर्वाचन प्रक्रिया में तत्काल सुधार लाना है। इसके अलावा हमें संसदीय, प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था में भी बड़े स्तर पर बदलाव करने होंगे, जिसके लिए अधिक बड़े प्रयास की आवश्यकता है।
        लोकपाल की नियुक्ति जरूर होनी चाहिए और लोकपाल को प्रभावशाली भी बनाना चाहिए।  लोकपाल को अधिकार देने चाहिए ताकि वह भ्रष्ट लोगों पर अंकुश लगा सके।  भ्रष्टाचार को जितना संभव हो सके खत्म किया जाना चाहिए, लेकिन लोकपाल को कितने अधिकार हों और लोकपाल स्वयं किसके प्रति जवाब देय हो, ये बाते भी बिल बनाते समय ध्यान में रखनी होंगी।  यदि कभी कोई गड़बड़ व्यक्ति लोकपाल नियुक्त हो जाता है और अपने अधिकारों का दुरूपयोग करता है तो उसे कैसे हटाया जायेगा? लोकपाल पर अंकुश कैसे लगाया जायेगा और लोकपाल पर अंकुश कौन लगायेगा, आदि सभी बातें स्पष्ट रूप से बिल में आनी चाहिए।  लोकपाल के रूप में हमें एक युद्धिष्ठिर की तलाश करनी होगी।  हम सभी जानते हैं कि पूरे महाभारत काल में युद्धिष्ठिर एक ऐसा पात्र था जिस पर भगवान कृष्ण की कूटनीति भी नहीं चल सकी थी और अश्वस्थामा की मृत्यु की सूचना देते समय कृष्ण को संचार व्यवधान उत्पन्न करना पड़ा था। क्या कलयुग में ऐसा सत्यवादी लोकपाल मिल सकेगा।  अतः इतने असीमित अधिकार देते समय उसे मर्यादित करना पड़ेगा जिससे वह लोकतांत्रिक ढांचों की सीमाएं नहीं लांघ सके।
        अब प्रश्न उठता है कि किसी व्यक्ति विशेष को जनलोकपाल बनाकर कितने अधिकार देने चाहिए? यदि उसे न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायी संस्थाओं जैसे संसद व विधानसभाओं के ऊपर नियुक्त किया जाता है और प्रधानमंत्री, मंत्री, अफसरों, जजों आदि की नकेल उसके हाथ में दे दी जाती है तथा उसकी जवाबदेही किसी के प्रति नहीं होती है तो क्या होगा?  वह व्यक्ति किसी को भी कभी भी हटा सकता है अथवा उसके पीछे जांच बिठा सकता है?  फिर क्या गारंटी है कि वह व्यक्ति स्वयं में तानाशाह नहीं बन जायेगा? भ्रष्ट लोगों को बचाने लग जाये।  इस प्रश्न पर देशव्यापी बहस होनी चाहिए, तथा ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि वह तानाशाह नहीं बने। उसे बांधना चाहिए, इस बात का ध्यान रखा जावे।
        लोकपाल बिल बनाने के लिए दुनिया के इतिहास में आज तक कभी, कहीं, किसी भी देश में ऐसी समिति नहीं बनी, जिसमें सरकार के पांच मंत्री हो और पांच तथाकथित सिविल सोसायटी के सदस्य रहे हों।  सरकार की इस कारगुजारी ने संसद की गरिमा को घटाया है।  दुनिया के इतिहास में यह भी पहली घटना है कि एक गांधीवादी अहिंसात्मक तरीके से आन्दोलन करे और उसे बेवजह गिरफ्तार कर चन्द घंटों में रिहा कर दिया जाये और वो जेल से बाहर नहीं निकले।  बाहर निकले तो अपनी शर्तों के साथ।  पूरी संसद उन्हें अनशन तोड़ने की अपील करे, यह भी पहली घटना है।  ऐसे सभी इतिहास यू.पी.ए. सरकार की अनिर्णय की स्थिति के कारण रचे गये। सरकार में सूझ-बूझ की भारी कमी है।  सरकार दिभ्रमित है।  सरकार की साख पूरी तरह से गिर गई है।  इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले दो दशकों में राजनीतिक दलों और राजनेताओं की साख में भारी कमी आई है।  उनके प्रति जनता का आदर, आम लोगों की आस्था और विश्वास में गिरावट आई है।  लेकिन इसका कारण मूलतः व्यवस्थाजन्य है।  इसमें सबसे महत्वपूर्ण है निर्वाचन और राजनैतिक दलीय व्यवस्था है।  यही व्यवस्था देश और विदेश में कालेधन की जिम्मेदार है।  इसी के कारण आपराधिक पृष्ठभूमि वाले और करोड़पति लोग संसद में पहुंचते हैं।  इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि सबसे पहले निर्वाचन और राजनीतिक दलों की व्यवस्था बदली जाये ताकि सही, सक्षम और जनहित में निष्ठा रखने वाले लोग संसद में पहुंचे और जनहित में सही कानून बनायें ताकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके।
        इस परिभाषा को बदलने के लिए हमें निर्वाचन व्यवस्था को बदलना होगा।  वर्तमान व्यवस्था में बाहुबली, माफिया, धनबल एवं भुजबल के वर्चस्व को समाप्त करना होगा, यह भ्रष्टाचार की जड़ है इसे सुखाना होगा।
        जनलोकपाल विधेयक के कुछ प्रावधान ऐसे हैं जिसे उनके वर्तमान स्वरूप में पारित करना दिक्कतपूर्ण हो सकता है, जैसे यह विधेयक सांसदों के द्वारा सदन में किए गए व्यवहार को भी लोकपाल के अंतर्गत लाने का विचार करता है, जबकि संविधान उन्हें इस सम्बन्ध में छूट नहीं प्रदान करता है।  संविधान का अनुच्छेद 105(2) कहता है कि संसद में या उसकी किसी समिति में संसद के किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिये गये किसी मत के सम्बन्ध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जायेगी। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि लोकपाल किसी सांसद के विरुद्ध उसके द्वारा सदन में किये गये आचरण की जांच करता है तो वह अनुच्छेद 105(2) के विरुद्ध होगा, जिसमें न्यायपालिका और संसद में संसदीय विशेषाधिकारों को लेकर टकराव होने की संभावना बनेगी।  अतः यदि अन्ना का विधेयक इसी रूप में पारित करना है, तो पहले संविधान के अनुच्छेद 105(2) में संशोधन करना होगा।
        इसके अतिरिक्त वर्तमान स्वरूप में अन्ना के जनलोकपाल विधेयक को पारित करने में उसके संविधान के मूल ढांचे से टकराव संभव है।  सर्वोच्च न्यायालय ने 1973 में संसदीय अधिकारों पर एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि संसद किसी भी कानून को पारित करने और संविधान में कोई भी संशोधन करने के लिए सक्षम है।  वह मौलिक अधिकारों में भी संशोधन कर सकती है, लेकिन संसद संविधान के मूल ढांचे को नहीं बदल सकती। यद्यपि माननीय न्यायालय ने निश्चित तौर पर नहीं स्पष्ट किया कि संविधान का मूल ढांचा क्या है, पर माननीय न्यायाधीशों ने अलग-अलग मूल ढांचे की सूची देने की कोशिश की।  तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश श्री सीकरी ने संसद, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति पृथककरण को मूल ढांचा माना, वहीं विख्यात विधि विशेषज्ञ नानी ए पालखीवाला ने भी संसद, कार्यपालिका और न्यायपालिका के मध्य संतुलन को मूल ढांचा माना। सांसदों में संसदीय मतदान एवं व्यवहार को लोकपाल के दायरे में लाने से यह शक्ति पृथककरण एवं शक्ति संतुलन पर प्रतिकूल रूप से प्रभावी होगा।
        जनलोकपाल बिल में अन्ना टीम ने तमाम सरकारी मुलाजिमों को अनुशासित करने का अधिकार अपने हाथों में रखना चाहता है।  इसके लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा, क्योंकि मौजूदा स्थिति में एक सरकारी कर्मचारी का कार्यकाल संविधान के अनुच्छेद 311 से संरक्षित है।  इसके अतिरिक्त, एक सिविल सरवेन्ट की सजा तय करने का अधिकारी केन्द्रीय संघ लोक सेवा आयोग का है, जो संविधान के अनुच्छेद 320(3) (C) के तहत अनुशंसा के बाद इसे तय करता है।  संविधान के इन अनुच्छेदों में संशोधन की स्थिति में ही जनलोकपाल के पास केन्द्र सरकार के तमाम कर्मचारियों को अनुशंसित करने के अधिकार होंगे।  जाहिर है, यह वर्तमान संवैधानिक ढांचे से बिल्कुल अलग दिशा में कदम रखना होगा, पर इसमें यह भी देखना होगा कि सरकारी कर्मचारी अनुशासनात्मक कार्यवाही की आशंका से ग्रस्त होकर प्रशासनिक अधिकारियों के आदेश टालने की कोशिश करने लगेंगे और फिर अपनी निजी रंजिश निकालने के लिए भी वे एक दूसरे के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने लगेंगे।  इस स्थिति को कैसे अमली जामा पहनाया जा सकता है, इसकी पुख्ता व्यवस्था करनी होगी।  अधिकारी कर्मचारियों में अनुशासन बना रहे, प्रशासनिक अधिकारी का नियंत्रण बना रहे, इसकी व्यवस्था करनी चाहिए।
        सिटीजन चार्टर हो हरहाल में मान्यता दी जानी चाहिए, इससे प्रशासनिक तंत्र में सक्रियता आयेगी तथा जनता की तकलीफों का निराकरण समय पर हो सकेगा।  लोकपाल में गैर सरकारी लोग ज्यादा होने चाहिए।  नियुक्ति प्रक्रिया में वोटिंग नहीं, सर्वसम्मति होनी चाहिए।  इन्हें हटाने के लिए महाभियोग प्रक्रिया होनी चाहिए।  जैसी सुप्रीम कोर्ट के जजों को हटाने में होती है।  चुनाव सुधारों की दिशा में पहल की जाए।  जजों का जवाबदेही, सप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्टों के जजों के चयन की प्रक्रिया, अदालतों मे न्यायिक कार्यवाही में सुधार जरूरी है।
        राज्यों में लोकायुक्त का गठन महत्वपूर्ण कदम है, यह होना ही चाहिए।  कई राज्यों में लोकायुक्त हैं, किंतु वो दंतविहीन हैं।  प्रभावशाली लोकायुक्त व्यवस्था बने, किंतु इस बात का भी ध्यान रखा जाये कि संघीय ढांचे पर असर नहीं पड़े।  संविधान का मूल ढांचा बना रहे।
        लोकपाल बिल में अरबों-खरबों रुपए बचाने वाले धार्मिक नेता, विभिन्न ट्रस्ट, डॉक्टर, वकील, कार्पोरेट घराने, टेपिंग करने वाले और टेपों को पैसे लेकर खबरें छापने प्रसारित करने वाले मीडिया, प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करने वाले लोगों, सरकारी व गैर-सरकारी एन.जी.ओ., विभिन्न निजी संस्थानों, खनन, सामाजिक विषमताएं आदि को भी प्रभावी लोकपाल के दायरे में लाकर भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण किया जाये।
 
*SHRI ANTO ANTONY (PATHANAMATHITTA)- I take this opportunity to congratulate the UPA Government in introducing the historic Lok Pal Bill in the Parliament. The Government once again proved its commitment to uproot corruption from our society and ensure transparency in governance. Corruption has become one of the disturbing issues in the country. As per the recent report, more than half of the Indians have had bitter experience of paying bribes to our public offices for various reasons. A study conducted in 2010 revealed that India was ranked at 87th position in terms of the Corruption Perceptions Index.
Corruption is deep-rooted in almost all the sections in our country. This shows that we have to have an effective mechanism to uproot corruption. Therefore, all public offices and civil society institutions should  come under the ambit of the proposed Lok Pal.
We are proud to be the largest democracy in the World and it is true in its all sense. The essence of its success lays in our democratic values based on mutual respect and the institutional mechanism we have since independence. Therefore, the proposed Lok Pal should also be framed in accordance with this spirit. I take this opportunity to congratulate the Government in introducing the Bill to uproot corruption without harming our democracy.
The Lok Pal Bill envisages to establish a vigilant watch dog against corruption. The Bill respects the basic tenets of democracy by sustaining the concept of checks and balances without harming the concepts of independent legislature, executive and judiciary. However, it re-emphasizes the accountability of these institutions by adequate provisions. It never encroach the vested powers of these institutions. The Bill never allows concentration of power into a single body. Rather, it admits that the sovereignty should be vested in the hands of people in this great nation. The Bill never intends to create a bottleneck in governance by creating unhealthy competitions among the democratic institutions.
I take this opportunity to state that we have to sustain the very spirit of democracy in its letter and spirit. I feel great pride to mention that, India is a among few countries in the world that could successfully prevent the menace of autocracy and military rule than that of the most other countries in the World. It is through the mechanism of separation of power as well as checks and balances. I gratefully acknowledge the role of the Parliament in this regard.
Let me share my concern about the dreadful consequences of the proposed Jan Lok Pal. Apart from the spirit of our democracy, the Jan Lok Pal tries to set forth a supreme body, comprising of the bureaucrats in the country. It is not responsible to anyone in this country. Rather, it can nullify any democratic institutions in the country. It is the concentration of power including executive, and judiciary into a single body. No doubt, the existence of Jan Lok Pal will herald the decline of Indian democracy. If all the powers are vested in the hands of a few, then it may turn into an autocratic and most corrupted institution.
Let me conclude that democracy should not be sacrificed at the pretext of eliminating corruption. Corruption, indeed, is a menace and should be totally eliminated from all spheres in our society. But the basic tenets of democracy should be protected. Therefore, I request the Government to proceed with the Bill that is abiding by the basic tenets of democracy.
*SHRI PREM DAS RAI (SIKKIM): I would like to express my views on the three issues that have become the bone of contention between the Anna Team and the Parliament.  We are constrained to debate this because of the situation that has been obtained.  Everyone has also said that this a historic occasion.  I certainly agree.
          I have been listening very carefully trying to get the sense of the House.  The Leader of the Opposition has given a very detailed account of the situation that has arisen.  I support whole-heartedly her’s and the Leader of the House, Shri Pranab Mukherjee’s call for a considered debate on the statement of Shri Pranab Mukherjee.
          My Party, the Sikkim Democratic Front Party, has on all the occasions repeated that we have to respond to the nation’s call for probity in public life.  We are for the enactment of a very strong and robust Lok Pal Bill.  All the good points of all the proposed Bills that have come before the Government should be incorporated.
          In so far the three points, the bridge that is to be crossed, are concerned we have no objection.  However, the greater wisdom of more consultation with wider section of our nation will make these more practical.  The Citizen’s charter and grievance redressal are mechanism which has to be there.  This along with bringing the lower bureaucracy within it’s ambit is important and we fully agree.  The officials of the Central Government can be brought under the Lok Pal.
          The State of Sikkim has already enacted a Lok Ayukta.  We have no issue to strengthen the same when the Lok Pal is enacted and indeed directions will be received from the Centre.  However, the federal structure cannot be allowed to be tampered with.  A model Act can be adopted.
          Finally, I would like to state that my party will continue to work toward making of nation that believes in democratic principles, probity in public life and continuous improvement in the way public goods and services are delivered to the aam admi.
*श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय (गिरिडीह)ःलोकपाल के गठन के बारे में नियम 1933 के तहत अपनी बात रखने के लिए मौका देने के लिए आपका आभारी हूं।  जैसाकि सदन के प्रतिपक्ष नेता और हमारी पार्टी की नेता श्रीमती स्वराज ने इस लोकमहत्व के मुद्दे पर अपनी राय प्रभावशाली ढंग से सदन में रखी है तथा सदन को विश्वास दिलाया है कि हम एक सशक्त, प्रभावी और निष्पक्ष लोकपाल संस्था की स्थापना के पक्ष में हैं। मैं स्वयं को इससे संबंधित करता हूं तथा उन (3-4) मुद्दों पर जिनको लेकर सरकार तथा सिविल सोसायटी के बीच टकराव है, अपनी पार्टी के स्टैंड पर कायम हूं।  आशा है कि चर्चा के अंत में इस सदन में विवादित बिन्दुओं पर एक राय बन सकेगी तथा एक प्रभावशाली लोकपाल बनाने का रास्ता खुल सकेगा तथा गांधीवादी नेता श्री अन्ना हजारे अपना अनशन समाप्त कर सकेंगे।  
        सबसे पहले मेरा मानना है कि सरकार के सभी विभागों में जहां पर प्रतिदिन आम आदमी का अपने दैनिक कार्यों के लिए आना-जाना पड़ता है वहां समयबद्ध सीमा में जनता के कार्यों का निष्पादन हो तथा कार्य न करने वाले अधिकारी अथवा बिना कारण देरी करने वाले अधिकारी को विलंब शुल्क जमा करने का प्रावधान हो।  इसका मुख्य रूप से अन्ना के सिटीजन चार्टर की मांग से संबंध है।  इसीलिए ऐसा प्रावधान करने में सरकार को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
        इसमें कोई विवाद नहीं है कि भ्रष्टाचार का अंत होना चाहिए, चाहे वह विधायिका के बारे में हो या सरकार के तंत्र में हो या न्यायपालिका के क्षेत्र में हो।  इस सदन के बाहर सभी सांसद एक सामान्य नागरिक की तरह जन सेवक की श्रेणी में आते हैं।  अतः उन पर भी कानून उसी तरह से लागू होता है जैसा कि एक आम नागरिक पर। अतः संसद के अंदर सांसद द्वारा बोलने या वोट देने की स्वतंत्रता पर कोई समझौता न हो।  इसकी मैं पैरवी करता हूं ताकि संसद की सर्वोच्चता पर कोई आंच न आए।
        सरकार भी इस बिंदु पर सहमत है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार रोकने के लिए एक अलग से कानून लाने की जरूरत है जैसाकि नेता प्रतिपक्ष ने अपनी बातों में   Judicial Accountability Commission  की बात कही, मैं उससे सहमत हूं तथा इसका समर्थन भी करता हूं।
        एक विवादित बिंदु कि क्या प्रधानमंत्री को लोकपाल की परिधि में लाया जाए।  जैसाकि नेता प्रतिपक्ष श्रीमती स्वराज ने कहा है कि कुछ अपवादों  साथ प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के तहत लाया जा सकता है।  देश की सुरक्षा (National Security) के संबंध में अपवाद बनाए जा सकते हैं लेकिन प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए।  इसके अलावा सभी अधिकारियों को भी लोकपाल के तहत लाने से किसी प्रकार का कोई विवाद नहीं है।  लेकिन जहां तक निचले स्तर पर कार्यरत कर्मचारियों का मुद्दा है उनके लिए कुछ प्रावधान किए जा सकते हैं जैसा कि माननीया श्रीमती सुषमा स्वराज ने सुझाव दिया है कि लोकपाल में एक अन्य प्रावधान करके इन कर्मचारियों को लोकपाल के तहत लाया जा सकता है।
        इसके अलावा अहम मुद्दा लोकपाल की नियुक्ति को लेकर है।  मेरा मानना है कि लोकपाल की नियुक्ति के लिए गठित की जाने वाली समिति में सरकार तथा सरकार के बाहर से लिए जाने वाले सदस्य समान संख्या में होने चाहिए ताकि लोकपाल की  नियुक्ति करते हुए सरकार के प्रतिनिधियों तथा अन्य प्रतिनिधियों के बीच समान रूप से महत्व दिया जा सके, ताकि लोकपाल की नियुक्ति करने वाली समिति पर कोई प्रश्न चिह्न न लग सके तथा एक निष्पक्ष एवं प्रभावशाली व्यक्ति को ही लोकपाल नियुक्त किया जा सके।
        अंत में मैं सरकार से आग्रह करता हूं कि सदन की राय के अनुरूप व सिविल सोसायटी एवं भारतीय जनमानस की आशाओं के अनुरूप एक सशक्त एवं प्रभावशाली लोकपाल बिल लाकर सदन द्वारा पारित कराया जाए।
        जैसाकि सभी सांसद चाहते हैं कि अन्ना हजारे अनशन तोड़े, मैं भी इसका समर्थन करता हूं।  
श्री अनंत गंगाराम गीते (रायगढ़): महोदया, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, मैं इसके लिए आपका आभारी हूं। आज पूरे देश में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है। भ्रष्टाचार हर सीमा को लांघ गया है। समाज का कोई वर्ग भ्रष्टाचार से नहीं बचा है और न कोई क्षेत्र भ्रष्टाचार से बच पाया है। गरीब से गरीब व्यक्ति जिसे बीपीएल कहते हैं, गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले व्यक्ति को यदि बीपीएल कार्ड भी बनाना है तो घूस देनी पड़ती है। गरीब से गरीब व्यक्ति के बच्चे को स्कूल या कालेज में एडमिशन चाहिए तो भी घूस देनी पड़ती है। यदि इन पर अत्याचार या अन्याय हो और थाने में शिकायत करने जाते हैं तो भी घूस देनी पड़ती है। इस देश के गरीब और पिछड़े तबके की आज जो स्थिति है वही देश के मध्यम वर्ग की भी है। इसलिए हम कह रहे हैं कि कोई वर्ग इससे बचा नहीं है। भ्रष्टाचार के मामले एक के बाद एक उजागर होने लगे हैं, विशेषकर पिछले दो साल में बड़े मामले उजागर हुए, टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला और कॉमन वैल्थ गेम्स घोटाला हुआ।...( व्यवधान) आप मुझे सुन लीजिए, बाद में कमेंट कीजिए।...( व्यवधान)
          मैं पिछले दो साल की बात कर रहा हूं, टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला, कॉमन वैल्थ गेम्स घोटाला, महाराष्ट्र में आदर्श सोसाइटी घोटाला आदि के बाद इस देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जाग्रत्ति पैदा हो गई और इसका नेतृत्व अन्ना हजारे जी कर रहे हैं। पिछले 12 दिन से वे अनशन पर हैं। पूरा देश उत्तेजित है। शिव सेना हमेशा भ्रष्टाचार के खिलाफ रही। हम अन्याय, भ्रष्टाचार और अत्याचार के खिलाफ रहे।हम कल भी भ्रष्टाचार के खिलाफ थे, आज भी भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं और कल भी भ्रष्टाचार के खिलाफ रहेंगे। इसलिए 23 तारीख को शिवसेना प्रमुख, श्री बाला साहब ठाकरे जी ने अण्णा हजारे जी को एक चिट्ठी लिखी और उस चिट्ठी में उन्होंने अण्णा हजारे जी की सेहत के प्रति चिंता जताई। उन्होंने उनसे प्रार्थना की है कि आपकी सेहत का ख्याल करने की आवश्यकता है, चिंता करने की आवश्यकता है। देश को आपकी जरूरत है और आप इसके आगे अपना अनशन मत बढ़ाइये, आप अपना अनशन तोड़ दीजिए। लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ जो आपका आंदोलन है, इस आंदोलन को आप जारी रखिये। इसके आगे उन्होंने यह भी कहा कि आपके बाद श्रीमती किरण बेदी, श्री केजरीवाल या श्री प्रशान्त भूषण को आप अनशन पर बैठाइये। ...( व्यवधान) शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे जी ने जो चिट्ठी लिखी है, वह लिखित चिट्ठी है, इसलिए उसे कोई नकार नहीं सकता। कल बाला साहब ठाकरे जी के पोते, श्री उद्धव ठाकरे जी के बेटे आदित्य ठाकरे दिल्ली आये थे। वह कल रामलीला मैदान में जाकर श्री अण्णा हजारे से मिले। उन्होंने भी उनकी सेहत के प्रति चिंता जताई और पूछताछ की। वह वहां करीब 20-25 मिनट रहे। उन्होंने सेलफोन पर श्री अण्णा हजारे और बाला साहब ठाकरे जी के बीच 10-12 मिनट बात कराई और आदित्य ठाकरे जी ने भी उन्हें यही कहा कि देश को आपकी जरूरत है, इसलिए इस अनशन को तोड़ना उचित होगा, श्री बाला साहब ठाकरे जी ने लिखित रूप में आपको इस प्रकार की रिक्वैस्ट की है। प्रधान मंत्री, डा.मनमोहन सिंह जी ने इस सदन के माध्यम से और स्वयं स्पीकर महोदया ने भी सारे सदन की भावना के साथ श्री अण्णा हजारे जी से अनशन तोड़ने की रिक्वैस्ट की है। आज जब सदन में इस पर चर्चा चल रही है तो जब से श्रीमती सुषमा स्वराज जी ने इसकी शुरूआत की है, तब से हर वक्ता ने अण्णा हजारे जी से अनशन तोड़ने की प्रार्थना की है। मैं भी सदन के माध्यम से अण्णा हजारे जी से प्रार्थना करूंगा कि इस सदन का सम्मान करते हुए आप अनशन तोड़ दीजिए।
          महोदया, भ्रष्टाचार आज पूरे देश में फैला हुआ है और हमें इसके खिलाफ लड़ना है। हमें भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करना है और उसके लिए एक सशक्त कानून की आवश्यकता है। अब जो लोकपाल विधेयक सरकार ने सदन के सामने रखा है, चाहे वह विधेयक हो, श्री अण्णा हजारे का जन लोकपाल विधेयक हो, जो सुझाव जयप्रकाश नारायण ट्रस्ट ने दिये हैं, वे हों, अरुणा राय ने जो सुझाव दिये हैं, वे हो या इस सदन में चर्चा के माध्यम से माननीय सदस्य जो अलग-अलग सुझाव दे रहे हैं, इन सारे सुझावों पर विचार करके एक सशक्त लोकपाल का गठन होने की आवश्यकता है। आज इस लोकपाल को कोई नकार नहीं रहा है। लेकिन लोकपाल का गठन करते समय जैसे मेरे पूर्व वक्ता, श्री भर्तृहरि महताब जी ने यहां चिंता जताई है। मैं उनसे सहमत हूँ। कहीं ऐसा न हो कि यह लोकपाल बीमारी से इलाज भारी न हो, इस प्रकार की कोई स्थिति न बने नहीं तो नई बीमारी हो जाएगी। इसलिए मैं कह रहा हूँ कि हम एक सुपर पॉवर सेंटर बनाने जा रहे हैं। जब हम सुपर पॉवर सेंटर बनाने जा रहे हैं तो जल्दबाजी करने की आवश्यकता नहीं है। काफी सोच-विचार कर, हमारी जो संस्थाएं हैं, हमारी जो संसद है, जो राजव्यवस्था हमने स्वीकार की है जो कि लोकतंत्र है, इन सबकी गरिमा को बनाए रखते हुए हमें लोकपाल का गठन करना चाहिए। सख्त कानून की आवश्यकता है। हमारा संविधान, संसद और जिस लोतांत्रिक व्यवस्था को हमने स्वीकार किया है, उस लोकतांत्रिक राजव्यवस्था के सम्मान को बनाए रखते हुए हमें लोकपाल को बनाना चाहिए।
          सभापति महोदया, हम एक लोकपाल कानून बनाने जा रहे हैं। भ्रष्टाचार को रोकने लिए और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए कई कानून आज हमारे देश में हैं। उन कानूनों के तहत हम भ्रष्टाचार को रोकने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन आज वे कानून भ्रष्टाचार को रोकने के लिए शायद कमज़ोर पड़ रहे हैं। इसलिए मांग उठ रही है कि आज एक सशक्त कानून की आवश्यकता है। भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सशक्त कानून की आवश्यकता है। मैं इस बात को इसलिए सदन के सामने रख रहा हूँ कि कानून अपराधी को सजा दे सकता है, लेकिन अपराध को रोक नहीं सकता है। लोकपाल बनने के बाद भी जो भ्रष्टाचार होगा, लोकपाल उस भ्रष्टाचारी को सजा दे सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भ्रष्टाचार खत्म हो जाता है। यदि भ्रष्टाचार को खत्म करना है तो हमें समाज में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। हमें नीतिमान समाज की रचना करने की आवश्यकता है। हमें यह स्वयं करना है। आज बाहर जो माहौल है, उसकी चिंता हम सदन में कर रहे हैं।
          सभापति महोदय, जब अण्णा हजारे जी का आंदोलन शुरू हुआ, तब तक तो सरकार के खिलाफ आंदोलन था, धीरे-धीरे यह लगने लगा कि यह आंदोलन संसद के खिलाफ जा रहा है। आज यह स्थिति बनी है कि शायद हम सभी के ऊपर से विश्वास उठ जाएगा। यदि हम सब और इस संसद के ऊपर से विश्वास उठ जाता है तो शायद हमारा लोकतंत्र भी खतरे में आ सकता है। इसलिए हमें गंभीरतापूर्वक सोचने की आवश्यकता है। केवल आंदोलन को आंदोलन की निगाह से देखने की आवश्यकता नहीं है।
सभापति महोदया :  अब आप समाप्त करें।
श्री अनंत गंगाराम गीते (रायगढ़): सभापति महोदया, अभी तो मैंने शुरूआत की है।...( व्यवधान) अभी तो मैंने सिर्फ भूमिका ही बताई है। सभापति महोदया, इतनी महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक बहस है। ...( व्यवधान)
 महोदया, मैंने शुरू में ही कहा है कि आज समाज का कोई भी वर्ग भ्रष्टाचार से बचा हुआ नहीं है या कोई भी क्षेत्र भ्रष्टाचार से बचा हुआ नहीं है। यह जो 2जी स्पेक्ट्रम का घोटाला हुआ, जो आज न्यायालय में लंबित है, हमारे एक मंत्री जेल के अन्दर हैं, कई अन्य आरोपी उस घोटाले में जेल में हैं।...( व्यवधान) वह एक अलग बात है, जो कानूनी प्रक्रिया है, वह चल रही है। इस घोटाले में केवल सरकार या सरकार के मंत्री ही नहीं, कितने बड़े उद्योग घराने इस घोटाले में हैं, जिनका नाम आया है। जो देश का नम्बर वन उद्योग घराना है, उसका नाम भी इस घोटाले में आया है।
  15.57 hrs. (Shri Basu Deb Acharia in the Chair)           महोदय, उनका नाम भी इस घोटाले में आया है और इसीलिए यह अधिक चिंता का विषय बना है। इसका मतलब है कि भ्रष्टाचार से कोई भी मुक्त नहीं रहा है। बड़े-बड़े उद्योग घराने भी इसमें लिप्त हो गये हैं। ऐसी स्थिति में यदि देश की जनता उत्तेजित हो तो आश्चर्य करने की कोई बात नहीं है। इसमें अचरज मानने की कोई बात नहीं है। जब यह आन्दोलन चला, इस आन्दोलन को जिस प्रकार से समर्थन मिल रहा है, जिस तरीके से इस आन्दोलन से जनता उत्तेजित हुई है, हमें इन सारी बातों से कुछ सीख लेने की आवश्यकता है। यहां पर मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है। शरद यादव जी बोल रहे थे, जब उनका भाषण समाप्त हो गया तो इस सदन के हर सदस्य ने उनका अभिनन्दन किया।

सभापति महोदय : कृपया समाप्त कीजिये।

…( व्यवधान)

श्री अनंत गंगाराम गीते : महोदय, जब शरद यादव जी यहां बोल रहे थे तो इस देश का जो गरीब आदमी है, जो इस देश में पिछड़ा है, दलित है, उपेक्षित है, उनके दर्द का दुख शरद यादव जी के मुख से इस सदन के सामने प्रतीत हुआ। उसी प्रकार इस सदन की जो भावना है, उस भावना को भी उन्होंने अपने मुख के द्वारा इस सदन के सामने रखा। इसीलिए सारे सदस्यों ने यहां पर उनका अभिनन्दन किया।

          महोदय, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री… * के ऊपर पेड न्यूज को लेकर एक मुकद्मा चल रहा है। वह मुकद्मा कोर्ट में चल रहा है, मैं उसकी मेरिट पर यहां पर कुछ नहीं बोलूंगा।

सभापति महोदय : आप नाम मत लीजिये। आप पूर्व मुख्यमंत्री बोल सकते हैं।

श्री अनंत गंगाराम गीते :  महोदय, ठीक है, मैं आपके आदेश का पालन करता हूं। मैं उनका नाम नहीं लूंगा। महाराष्ट्र के एक पूर्व मुख्यमंत्री जी के ऊपर पेड न्यूज का एक मामला न्यायालय में लंबित है, न्यायालय में मामला चल रहा है। यह जो पेड न्यूज है, यह भी एक भ्रष्टाचार ही है।  

16.00 hrs. यह भी भ्रष्टाचार ही है। आज भ्रष्टाचार बहुत नीचे की हद तक पहुंच गया है। हम चुनाव के समय जगह-जगह जाते हैं। गरीब आदमी, मजदूर है, बेरोजगार है, भूखा है, जब हम चुनाव के समय उनके पास जाते हैं, तो यह शिकायतें सामने आती हैं कि नोट के बदले वोट मिलते हैं। कई बार चुनाव आयोग उम्मीदवार के पीछे कैमरा ले कर जा रहा है कई उम्मीदवार पकड़े भी जाते हैं। जो गरीब लोग हैं, वे वोट के बदले नोट ले रहे हैं। उन्हें पता नहीं कि वे किस पाप के भागीदार बन रहे हैं और न ही वे इस बारे में सोच सकते हैं कि उनकी जरूरत अनाज है। जब सदन के अंदर वह मामला आया और नोट के बदले वोट हो गया, तो आज वह मामला भी न्यायालय में लम्बित है। मैं इन सारी बातों का जिक्र इसलिए कर रहा हूं...( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप अपनी बात समाप्त कीजिए। अभी 50 माननीय सदस्य इस पर बोलने बाकी हैं।

श्री अनंत गंगाराम गीते : महोदय, आप मुझे पांच मिनट का समय दीजिए। भ्रष्टाचार से कोई क्षेत्र बचा नहीं है। न हमारा कारपोरेट क्षेत्र बचा है, न मीडिया और न ही एनजीओज़ भ्रष्टाचार से बचे हैं। हम जो सुपर पावर बनाने जा रहे हैं, उसे बनाने की आवश्यकता है और हम उसके समर्थक हैं। मैं सुषमा जी से सहमत हूं और जो तीन मांगे अन्ना जी ने की हैं, पब्लिक ग्रीवेंसिज और सिटीजन चार्टर, लोकायुक्त और लोअर ब्यूरोक्रेसी को लोकपाल के दायरे में लाने के लिए उन्होंने कहा है। सुषमा जी ने यहां इस बात को स्वीकार किया है। हम एनडीए के घटक दल हैं, हम भी उनसे इस बात में सहमत हैं। प्रधानमंत्री जी के बारे में सुषमा जी ने जो कहा है, उससे मैं और मेरी पार्टी सहमत हैं कि प्रधानमंत्री जी को भी इसके दायरे में कुछ राइडर्स के साथ लाना चाहिए। सांसदों को संविधान की धारा 105 (2) के तहत जो अधिकार मिला है, उस पर किसी प्रकार का आक्रमण नहीं होना चाहिए और उनका यह अधिकार रहना चाहिए।

          महोदय, हम भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए खड़े हुए हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग सदन के बाहर है और सदन के अंदर भी है। संसद के अंदर इस जंग में सारा सदन एक हो कर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना चाहता है। हम भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ेंगे। लोकपाल बिल की आवश्यकता है और लोकपाल बिल ले कर आइएगा, लेकिन किसी प्रकार की जल्दबाजी नहीं करिएगा। हमारा संविधान हमारी संसद और हमारी लोकतंत्र की गरिमा कायम रखते हुए हम लोकपाल बिल का स्वागत करेंगे।

 

*श्री वीरेन्द्र कुमार (टीकमगढ़):  जनलोकपाल बिल से जुड़े प्रमुख रूप से तीन मुद्दों पर सदन में चर्चा हो रही है।  राज्यों में लोकायुक्त की  नियुक्ति सिटीजन चार्टर तथा कर्मचारी लोकपाल के दायरे में शामिल होने चाहिए।  आज समूचे देश का जनमानस भ्रष्टाचार के विरुद्ध एकजुट हो गया है, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक बच्चे युवा, वृद्ध, व्यापारी, कर्मचारी जो जहां है वहां के लोगों के साथ स्थानीय स्तर पर चलाये जा रहे भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से जुड़ गया है।  लोकनायक जयप्रकाश नारायण के द्वारा चलाये गये आन्दोलन के बाद देश में यह अवसर पुनः आया है जब सारे देश में अभूतपूर्व परिवर्तन का दृश्य दृष्टिगोचर हो रहा है।  रामलीला मैदान में तो 12 दिन से लगातार अनवरत लोगों की भीड़ कम ही नहीं हो रही है। लोग तरह-तरह के तरीके अपनाकर अलग-अलग तरीके से भजन, कीर्तन, गीत, नुक्कड़ नाटक, कविता, नारेबाजी से भ्रष्टाचार के विरुद्ध अलख जगा रहे हैं। पिछले 2 वर्षों से देश में लाखों करोड़ों रुपए के जो भ्रष्टाचार उजागर हुए हैं उससे जनता पूरी तरह इसके विरुद्ध प्रतिबद्ध हो गयी है।  यह घोटाले चाहे के.जी., स्पेक्ट्रम टूजी, आदर्श सोसायटी के हो,  राज्यों में जनहित की योजनाओं में होने वाले घोटाले हों, अन्ना हजारे के रूप में लोग महात्मा गांधी की छवि देख रहे हैं तथा आम आदमी को विश्वास होने लगा है कि लोकपाल बिल पारित होने से जहां एक ओर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा वहीं अधिकारी, कर्मचारी भी भयभीत होंगे।  देश में लोक सभा में 9वीं बार 1968 से 2011 तक इस बिल को लाया जाता रहा है किंतु किसी भी बिल के प्रति जनता में ऐसी उत्सुकता नहीं देखी गई कब बिल आते थे, पारित होते थे, चले जाते थे। किंतु इस बार इस बिल के सम्बन्ध में बच्चों से लेकर बूढ़े तक सभी जागृत हो गये हैं, सभी को उत्सुकता है कि यह बिल शीघ्र पारित होना चाहिए।  एन.डी.ए. की सरकार के समय जब बिल आया था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री माननीय अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वयं पहल करके कहा था प्रधानमंत्री को भी लोकपाल बिल के दायरे में शामिल करना चाहिए।  वर्तमान प्रधानमंत्री जी ने भी इसके पक्ष में ही बात कही है।  अतः प्रधानमंत्री पद को लोकपाल बिल में शामिल करना चाहिए, इससे जनता के दिलों में पद के प्रति विश्वास और भी सुदृढ़ होगा।

        राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति की जो बात कही जा रही है तथा इसके अधिकार भी लोकपाल की तरह होने चाहिए।  देश के कई राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति पहले से ही की गई है।  शेष राज्यों में भी लोकायुक्त की नियुक्ति होनी चाहिए।  सिटीजन चार्टर संबंधी जहां तक बात है कई राज्यों में लोक सेवा गारंटी प्रदाय अधिनियम बनाये गये हैं,  जिसमें प्रत्येक विभाग के कार्यों की समय सीधा निर्धारित की गई है। इस अवधि में कार्य नहीं होने पर संबंधित अधिकारी, कर्मचारी के विरुद्ध दंड का प्रावधान किया गया है तथा वसूली गयी जुर्माने की राशि आवेदनकर्ता को देने की व्यवस्था की गई है।  अतः केन्द्र सरकार के विभागों के लिए सिटीजन चार्टर अवश्य ही बनाया जाना चाहिए।  कर्मचारियों को लोकपाल बिल में शामिल करने की जो बात कही जा रही है, बड़े घोटालों एवं बड़े भ्रष्टाचारों में बड़े-बड़े लोग शामिल होते हैं किंतु आम आदमी का कार्य तो छोटे स्तर पर छोटे-छोटे कर्मचारियों एवं क्लर्कों से होता है जो लोगों को अनावश्यक रूप से परेशान करते रहते हैं और  बगैर सुविधा शुल्क के कार्य नहीं करते हैं।  अतः आम आदमी को राहत दिलाने, कर्मचारियों को लोकपाल बिल में अवश्य ही शामिल किया जाना चाहिए।  अन्ना हजारे के आन्दोलन में यही आम आदमी देश के कोने-कोने से आकर खड़ा हो गया है।

        लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद का सर्वोच्च स्थान है, उसकी एक गरिमा होती है, उसका मान सभी को करना चाहिए तथा संसदीय मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए एक सशक्त एवं प्रभावी लोकपाल बिल लाना चाहिए तथा इस मुद्दे पर पूरे सदन मे चर्चा होते समय आपस में इतनी सहृदयता एवं संवेदनशीलता होना चाहिए कि देश की जनता को लगे यहां केवल व्यवधान ही नहीं होता है, गंभीर मामलों से संपूर्ण सदन की राय भी एक होती है।

        सांसद देश के नागरिक होते हैं तथा जनता के प्रतिनिधि भी होते हैं।  अतः उनकी ओर पूरे समाज की नजरें होती हैं।  सदन के बाहर भी एवं अन्दर भी उनका व्यवहार आचरण मर्यादित होना चाहिए तथा सभी सांसद जब अंतःकरण से भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठ खड़े होंगे तभी सशक्त एवं प्रभावी लोकपाल बिल बन सकेगा।

        है मजाक कितना यह गंदा         जिसको देखा फूल रहे हैं         खा-खाकर जनहित का चंदा         चारागाह है देश समूचा         है स्वछंद यहां चौपाए         अंधा पीसे स्वस्थ चबाये।

                       

*श्री हंसराज गं. अहीर (चन्द्रपुर)ःपिछले कई दिनों से देश में भ्रष्टाचार के विरोध में आदरणीय अन्ना हजारे जी के नेतृत्व में जनआंदोलन चल रहा है।  सरकार द्वारा लाया गया लोकपाल विधेयक भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने में नाकाफी होने के कारण अन्ना हजारे जी के जनलोकपाल विधेयक में शामिल उपबंधों के आधार पर एक सशक्त लोकपाल बनाने की भावना सारे देश में बलवती होती जा रही है।  आज आदरणीय अन्नाजी के अनशन का 12वां दिन है।  अन्ना जैसे ऋषि तुल्य व्यक्तित्व के आवाहन पर सारा देश भ्रष्टाचार के विरोध में चल रहे इस आंदोलन में संगठित होकर प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष योगदान देने के लिए तैयार बैठा है।  ऐसे समय में हम इस जनभावना का निरादर नहीं कर सकते।  सरकार द्वारा एक सशक्त लोकपाल बिल लाने की केवल कोरी बातें की जा रही हैं, लेकिन विपक्ष और जन आंदोलन के दबाव के कारण सरकार को अपना मंतव्य स्पष्ट करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है।  माननीय नेता सदन आदरणीय प्रणब मुखर्जी द्वारा सदन में जनलोकपाल के संदर्भ में जो तीन बातों का माननीय अन्ना हजारे जी द्वारा पूरजोर तरीके से आग्रह किया था, सदन में रखकर अपना वक्तव्य रखा है।  उस पर आज सदन में जो चर्चा हो रही है उसे ऐतिहासिक संदर्भ के रूप में देखा जाना चाहिए।  आज हम उस ऐतिहासिक प्रसंग के सांक्षी बनकर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं।  

        नेता सदन के वक्तव्य पर आधारित चर्चा की शुरूआत करते हुए नेता प्रतिपक्ष आदरणीय सुषमा जी ने विस्तार से अपनी भूमिका रखी जो आज के संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण कही जा सकती है।  इससे अन्ना हजारे जी  द्वारा जनलोकपाल के संदर्भ में अपेक्षाओं की पूर्ति करने में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है।  सरकार द्वारा पल-पल अपनी भ्रष्टाचार आंदोलन और जनलोकपाल के बारे में राय बदलने से इस बारे में शुरू किए अन्नाजी का अनशन लंबा होता जा रहा है।  सरकार पक्ष की तरफ से अन्ना की सेहत की केवल चिंता दिखाई जा रही थी, लेकिन उन्होंने उपस्थित किए मुद्दों के बारे में सरकार की तरफ से स्पष्टीकरण नहीं मिलने से अन्ना के अनशन खत्म करने में जो गतिरोध निर्माण हो रहा था, मेरी राय है कि वह आज समाप्त हो जाएगा।  जनलोकपाल विधेयक को पारित कर भ्रष्टाचार के विरोध में लड़ने के लिए एक स्वतंत्र और सशक्त मंत्रणा खड़ी करने के लिए सर्वसम्मत प्रयास करने के अंतर्गत इस सदन को एक प्रस्ताव पारित कर आदरणीय अन्नाजी को भेजना चाहिए।  दलीय प्रतिबद्धता होने के बावजूद भ्रष्टाचार के विरोध में हम सभी के एक होने के कारण ऐसा सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित करने से कोई अड़चन नहीं आएगी, ऐसी मैं आशा व्यक्त करता हूं।

        अन्ना जी ने लोकपाल की तरह राज्यों में लोकायुक्त, दूसरा नागरिकों से संबंधित कामों के निपटान हेतु समयबद्ध सीमा का निर्माण, तीसरा नीचे कार्यरत नौकरशाहों को लोकपाल के दायरे में लाने के तीन सुझाव दिए और इस पर आम राय होने के बाद अपना अनशन तोड़ने की बात कही है।  अभी तक जो चर्चा हुई है उसमें अधिकतर दल मोटा-मोटी इससे सहमत दिखाई पड़ते हैं।  हमारी भारतीय जनता पार्टी ने सदन के बाहर और सदन में भी भ्रष्टाचार से लड़ने में प्रतिबद्धता जताकर हमारे जनलोकपाल के साथ होने की बात कही है।  भ्रष्टाचार के खिलाफ पिछले 24 अगस्त को सदन में की गई चर्चा में भी सबने इसके बढ़ते फैलाव पर चिंता जताकर इसको मिटाने के लिए कारगर उपाय करने की बात कही थी।  फिर अब इस पर संभ्रम निर्माण कर इसे चर्चा में उलझाना ठीक नहीं है।  एक 74 साल का वृद्ध जो देश में भ्रष्टाचार के खात्मे को लेकर जन लोकपाल के माध्यम से देश का नेतृत्व कर रहा है, ऐसे असाधारण व्यक्तित्व का जीवन हमारे के लिए महत्वपूर्ण है।  इसलिए इस सदन में हो रही चर्चा को भी सीमित रखकर हम आदरणीय अन्नाजी का अनशन जल्द से जल्द खत्म हो, ऐसा प्रस्ताव सहमति से पारित करें।

                                                   

DR. SANJEEV GANESH NAIK (THANE):  Mr. Chairman, Sir, on behalf of my Party, NCP, and on behalf of my leader, Sharad Pawar-ji, today I rise here to support the need for a strong law to eliminate corruption in the country. I also strongly support the need to have a Citizens Charter so that citizens’ requirements are addressed in a time-bound manner by the government machinery.

          We need to ensure that the Central and the State Government employees are made accountable to the citizens of the country. In the recent past the Government has taken many initiatives to ensure that public servants are made more and more accountable. The Right to Information Act is one such example. Recently, the Central Government and several State Governments have taken many reforms in the delivery mechanism by tapping the power of information technology to increase transparency and eliminate corruption. It shows that the Government is sincere in its efforts to provide better citizen services and reduce corruption.

          While supporting the need for a strong Lokpal at the Centre, we must also ensure an equally strong Lokayukta in the States. In order to facilitate the constitution of Lokayukta in the States, we must take the State Governments on board and prepare a model draft on the lines of the provisions of the Central Act, which can be circulated to State Governments for early enactment. It will be our shortsightedness if we assume that only the government system is corrupt. In fact, a citizen faces the brunt of corruption in various fields of life. We need to take a massive awareness campaign against corruption against bribe-taking as well as bribe-giving.

          It is a harsh fact that today the common man is being harassed even to address his day to day needs such as getting a ration card, distribution of foodgrains, land records, driving licence, etc. Many of these issues are to be addressed by the lower bureaucracy. We must ensure a foolproof system to address the issue of corruption at this level.

          However, I must emphasize that while today the entire government machinery is being painted with the same brush and is being branded as corrupt, we must not ignore the fact that in the same system there are hundreds and thousands of honest and sincere employees who are working day and night to address the citizens’ needs. We must ensure that all our initiatives should have enough safeguards to ensure that honest and sincere officers are able to deliver their best for the country.

          One of the most important aspects is the electoral reforms in the country. It is true that the current system of conducting elections in the country is also one of the reasons for corruption. While appreciating the role of the print and the electronic media in public life, I must also express my concern about the system of the paid news and the paid package for support during elections adopted by a section of the media.

Today the entire country is talking about the need for a strong Lokpal. I appreciate and thank Shri Anna Hazare for creating a massive awareness about the issue of corruption in public life and for bringing it to the forefront. The NCP while giving its full support to bring a strong Lokpal through constitutional and parliamentary procedure, we also need to work hard to bring back faith in the parliamentary system.

To conclude, my Party, NCP, and my leader, Sharad Pawar-ji, sincerely request Shri Anna Hazare to withdraw his fast. We will also seek his continued guidance on various issues facing the country, including developmental issues. With these words, I conclude my speech. .

 

*श्री वीरेन्द्र कश्यप (शिमला): सभापति जी, मैं अपनी बात लिखित रूप से इस सदन के पटल पर रख रहा हूं क्योंकि सभी को बोलने का मौका आज नहीं मिल रहा है। आज हमारे देश में भ्रष्टाचार पर चर्चा चल रही है और इस चर्चा को जनता तक ले जाने में अन्ना हजारे जी द्वारा संचालित आन्दोलन के द्वारा एक नई दिशा मिली है। अन्ना जी व सिविल सोसाईटी द्वारा जो  “जनलोकपाल बिल” पेश किया गया है तथा सरकारी लोकपाल बिल व अन्य लोगों ने इस तरह के विभिन्न लोकपाल बिल आज जनता के पास खुली बहस के लिए दे रखे हैं।  मेरा यह मानना है कि भ्रष्टाचार को तो समाज व प्रशासन से समाप्त करना ही चाहिए क्योंकि आज हमारे समाज में भ्रष्टाचार हर क्षेत्र में कैंसर की तरह फैल चुका है। लोकपाल बनाने पर हम इसे कितना समाप्त कर पायेंगे यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, परन्तु यदि इसमें लिए गए प्रावधानों को सख्ती से न लागू किया गया तो इसका कोई लाभ नहीं मिलने वाला है। कानून तो भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए आज माकूल है परन्तु क्या उन्हें हम ठीक तरह से लागू कर रहे हैं। कानूनों को सख्ती से लागू न करने के कारण भ्रष्टाचार फैलता है। अन्ना जी द्वारा अनिश्चितकालीन अनशन के जरिए आज सभी स्थानों पर भ्रष्टाचार को निर्मूल खत्म करने का वातावरण बना है। संसद में भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए लोकपाल की नियुक्ति पर चर्चा चल रही है। लोकपाल में, मैं चाहता हूं कि इसके गठन के समय इस बात का ध्यान तो रखा ही जाए कि वह लोग जो इसमें लिए जाएं उनका चयन सही प्रकार से अच्छा आचरण करने वाले होने चाहिए। परन्तु मैं यह भी कहना चाहता हूं कि हमारे देश में इस लोकपाल में उनको भी शामिल किया जाए जो कि इस देश का बहुजन है यानि दलितों, पिछड़ों व वंचित लोगों में से भी लिया जाए ताकि उनको भी लगे कि इस प्रकार की सर्वोच्च स्थानों पर उनका भी सम्मान  है। आज इस समाज में काफी बुद्धिजीवी लोग भी हैं जो ईमानदार व राष्ट्र के प्रति समर्पित हैं। लोकपाल में भ्रष्टाचार का भी व्यापक स्तर पर डेफनेशन होना चाहिए। आज समाज में दलितों व पिछड़ों के साथ किस प्रकार का अन्याय हो रहा है उन्हें मिलने वाली सरकारी सहायता को किस प्रकार से अनुचित तरीके से दुरूपयोग किया जाता है। प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा इस वर्ग के लोगों की पदोन्नति में किस प्रकार के अड़ंगे फंसाए जाते हैं। इन सभी बातों को भी इसमें शामिल करना ठीक रहेगा ताकि इस प्रकार की कोताही करने वाले  वरिष्ठ अधिकारियों को गलती करने पर उसकी भुगतान का भी डर रहे और अन्याय न कर सके।

          इसलिए मेरा सुझाव है कि एक सशक्त लोकपाल बिल आना चाहिए ताकि हम इस भ्रष्टाचार को पूरी तरह से समाप्त कर सकें।

)   * Speech was laid on the Table DR. M. THAMBIDURAI (KARUR): Mr. Chairman, Sir, I thank you very much for giving me an opportunity to speak on the issue of Lokpal.

          Sir, in the morning, our hon. Finance Minister gave a statement for setting up Lokpal. He has also given the whole history. He also mentioned that the Prime Minister had to call two all-party meetings for this purpose. The first all-party meeting was held on 3rd July, 2011 and the second one on 24th August, 2011. In both the meetings, I represented my party, AIADMK. In that, the Finance Minister said that he has received suggestions from various Chief Ministers and also political leaders. My leader, hon. Chief Minister of Tamil Nadu, Dr. J.  Jayalalithaa, has also written a letter stating her opinion.  She has very clearly stated that she is not against the Lokpal Bill. At the same time, she has also stated that Parliament and democracy are supreme and we have to respect them. We have to see how we are going to bring Lokpal Bill within the system.

Many hon. Members also mentioned about the contents of the Lokpal Bill. They said that Prime Minister must be included, and at the same time, they are also saying that we have to put some riders. They are telling that Prime Minister has to be included, and at the same time, they also want to put riders. That is why, my leader said that it should not include Prime Minister. That is our party’s stand. Our party’s stand is that the Office of the Prime Minister is the highest institution, which is running the Government. After all, there are so many provisions in the Prevention of Corruption Act to deal with the Prime Minister. Afterwards, you can use them and take action. According to the opinion of the leader of my party AIADMK, the Prime Minister must not be included in the Lokpal Bill. That is our stand. All the other political parties, including the NDA, are telling that it should include Prime Minister, but also want to put some riders. Then, what is the purpose of putting him under the ambit of Lokpal? That is why, we say that this is our stand.

          We are having faith in democracy. The present situation is not because of only the UPA Government’s handling of this issue. We can go to the genesis of the whole corruption in this country. You can see that corruption is prevailing in all walks of life. If you go for an admission to a school, you have to give money. If you have to purchase a ticket, you have to give money. If you have to get a licence, you have to give money. As many hon. Members said, the corporates are also giving money for election purposes, through scams like 2G, CWG. Therefore, there is corruption in all spheres of life. Hon. Member, who was speaking just now, mentioned that even crores of rupees are being spent in the election campaign. Where does the money come from? Then, you are tempting the voters also to get money. Therefore, corruption starts at the lower level and then spreads to the higher levels. In this issue of corruption, everything is involved like price rise and so many other things. It is because of that when Shri Anna Hazare started his movement, everybody started supporting it because in all walks of life, people are feeling the pinch of corruption That is why, we are seeing that kind of wrath.  That is the situation.

          The first all-party meeting was called by the Prime Minister. When did he call it? It was called after he had constituted a Drafting Committee comprising of five Cabinet Ministers and five persons from Shri Anna Hazare’s team. Before that, they had never consulted other political parties. This is the first blunder that the UPA Government did. They had faith in Shri Anna Hazare and therefore, they did it. Afterwards, when the problem started, they called all of us, asking for the suggestions of other political parties. What is the point in it, after you have done everything?  Why did they call another meeting now? It was because Shri Anna Hazare went on an indefinite fast and the problem started to become bigger. They do not know how to solve it now. That is why, they called us once again.

Afterwards, now they have given us the chance to discuss it here. At the same time, this is a new situation that they have created. Therefore, this tense situation is created by the UPA Government and not by others.

          One person cannot dictate terms. This is our democracy. He can have his own views. Every citizen has the right to speak his views. It is because we, the people of this sovereign country, have constituted this Parliament. We know about it, and we have to respect the feelings of the citizens. If one is not respecting the feelings of the citizens, then one has this kind of a situation where some sections of the people come out from their houses onto the streets. They are raising the issue of corruption, and saying that it is the bounden duty of the Government and the Parliament to take up the sense of the people and to see how we can solve this problem. Hence, we have this discussion, to see how to solve the problem. In spite of this, we are having full faith in democracy, and I have already mentioned this.

          Most of the Congress friends are here. Now, they are mentioning about Shri Anna Hazare. Our Party Founder was Perarignar Anna. He was also called Anna, and our Anna had faith in democracy. The Congress could not get majority in Tamil Nadu from 1952 onwards when the first election took place. It was only Shri Rajagopalachari who formed a coalition Government at that time. Afterwards, Shri Kamraj took over; he ruled well; and we had no objection. At that time, we were students, and we thought whether we will be able to defeat the Congress as nobody thought that it was an easy task to defeat the Congress at that time. We thought like this, but our Perarignar Anna had faith in democracy. From 1947 onwards, he made campaigns about our Tamil culture, feelings of the people, the common man’s issues, price rise, and corruption. He targeted everything. Thereafter, he won in 1967 and formed the DMK Government. Actually, our Party was one together at that time, and that was the first Government. Till now, the Congress cannot dream of capturing power in Tamil Nadu. This is the ground politics. They tried in 2006, when they thought that they had got an opportunity to have a coalition Government, but they missed the opportunity. Therefore, they thought that this time they will try to capture that opportunity. Hence, DMK had contested only in 119 seats in the election and the remaining were given to other Parties. Definitely, they could not form the Government even if the DMK would have won. They could not have formed a separate Government, and they would have formed only a coalition Government. What did the people do? They have voted in favour of the AIDMK’s leader Dr. J. Jayalalitha. Hence, I am mentioning that from 1967 onwards the Congress is making an attempt to capture Tamil Nadu, but they are not able to do so. It is a democracy, and we have faith in democracy.

          Our founder Leader, Perarignar Anna, developed this kind of movement; the people have voted for us; and we have come to power. Therefore, I am mentioning this. Therefore, we could not fully support Shri Anna Hazare’s movement, and cannot accept his demand of passage of the Bill, by by-passing the established Parliamentary procedures. We can take certain facts from all that he is suggesting, but it is not the final thing. He cannot dictate terms on our Parliamentary system. The Parliament is supreme. Hence, we are discussing it here. We are elected people. We have a term of five years only, and then we have to go, once again, to the people; meet the people; and get the mandate from the people. This democracy must be preserved, and this is the most important thing. He can say whatever he thinks; he can have his own movement; and there is nothing wrong in it, but he cannot dictate terms.

          As regards election reforms, I was also a Law Minister from 1998-1999, when Shri Vajpayee’s Government was in power. At that time also, the Lokpal issue came up. I also introduced the Bill on Women Reservation sitting at Seat No. 5. I remember in those days what I have done. At that time also, we tried to bring electoral reforms. We formed a Committee under the leadership of late Shri Inderjit Gupta. He took over, and he made an attempt to see how to control the finances or funds; whether the Government can give funds to the candidates; and how to conduct elections. He made certain suggestions, which were not up to the expectations, and he could not do it. Afterwards, I also, as the Law Minister, tried to bring a National Judicial Commission Bill. We all made an attempt as there are so many irregularities going on in the judiciary, and we had to take action. Hence, we tried to do it. At that time, as Law Minister, I tried to do it, but there was a dispute between the President of India and the Chief Justice.

They know how the judicial authorities have been appointing the Judges. I have the bitter experience in this regard. I know how they have treated the Law Minister and how they have been doing all these things. There also there were some irregularities and we had tried to rectify it. However, Vajpayee Ji, at that time, kept quiet because of the controversy between the President of India and the Chief Justice of India. Otherwise, at that time, he had tried to form the National Judicial Commission.

          Why I am saying these things is because we are always fighting saying that we want some reservation. We are saying that the Dalits and the OBCs do not have sufficient representation in the judicial system. Therefore, through National Judicial Commission, we thought that we could recruit efficient people and ensure that other communities find representation through appointment as Judges. We had tried it at that time, but we had failed.

          On the question of the setting up of Lokayukta institution in all the States and whether it should be made applicable in all States, our opinion on this issue is that as some of our friends said, we have a federal set up. Our Constitution is based on a federal set up. Most of the States which were formed at that time were based on linguistic character, giving importance to the local culture, etc. Though we are an integrated lot as Indians, at the same time, we have to give respect to the feelings of the people. Our Constitution is like that.

          Slowly, what is happening now? The Centre is taking away all the powers of the State in one way or the other. Why do you want to give that power to the Centre? It is something that I could not understand. In the States, the Assembly is there, elected representatives are there, and they have every right to run the Government locally. Even when you have the powers, what are you doing? You are again delegating everything back to them only. The money that you are collecting through taxes, comes to the Central exchequer, you are giving it back to them. After constituting the Finance Commission, based on their recommendations, you are finding ways to give it back to them.

          Yesterday also, we discussed one Private Member’s Bill wherein it was demanded that the State must be given some kind of a special package. Everybody has been asking for money. Then why can you not give more powers to the States to raise their own funds through taxes and run their Governments? Why are you taking all those powers? That is what is happening now – you are taking all the powers. Then, the Chief Ministers have to come and beg here requesting the Centre to please give some fund or some power. You have to believe the people. We are all elected representatives. The MLAs are also elected representatives and they are having their own system. Why are you taking and keeping all the powers here at the Centre?

          In the same way, the constitution of Lokayukta from here is against the will of the people. Do not thrust anything on the States. Let the States have their own system. In Karnataka, for example, the Lokayukta is there. When a scam came to light, based on his recommendation, the Chief Minister had to resign. Therefore, let the States have their own Lokayukta, if they want, but my suggestion is do not thrust it from here because preserving our federal structure is very important.

          Sir, these are the facts that I wanted to place before the House. First of all, we are not against the Lokpal Bill; we are for it. At the same time, we have to respect the federal structure. You cannot thrust the Lokayukta from here. Also, on the issue of inclusion of the Prime Minister, I have made it very clear that his name need not be included in that because it is of no use when you are putting some riders. You ought to preserve the federal structure and you should not spoil that.

With these words, I thank you very much for giving me the opportunity to participate in the debate.

 

*श्री महेन्द्रसिंह पी. चौहाण (साबरकांठा):  आज देश में भ्रष्टाचार उन्मूलन हेतु "जनलोकपाल " की रचना करने की मांग के साथ आदरणीय अन्ना जी अनशन पर बैठे हैं।  पूरा देश उनके समर्थन में खड़ा हो रहा दिखाई दे रहा है।  गांव-गांव, गली-गली, शहरों में, सड़क से संसद तक जन-आंदोलन की बुलन्द आवाज सुनाई दे रही है।  बूढ़ा हो या युवा हो, मां हो या बच्ची देश के सभी वर्ग के लोग इस आंदोलन के साथ जुट गए हैं।  आजादी के बाद, जे.पी. आंदोलन को छोड़ दिया जाये तो पहली बार इतना बड़ा अहिंसक जन-आंदोलन खड़ा हो गया है।

        आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?  क्यों लोग सड़कों पर आ गये हैं?  क्यों लाखों की संख्या में लोग हाथ में तिरंगा, मशाल व कैंडल लेकर "वंदे मातरम " "इंकलाब जिंदाबाद " जैसे नारों के साथ सड़क पर चल रहे हैं?  रामलीला मैदान क्यों मानव सागर बन गया है?  क्या अन्ना जी का ये प्रभाव है?  तो महोदय जवाब है "ना "।

        अन्ना तो एक प्रतीक है, वास्तव में ये आन्दोलन जनता के आक्रोश का परिणाम है।  सच्ची बात तो यह है कि आज आदमी हैरान-परेशान है।  सुबह से शाम तक घूस एवं भ्रष्टाचार का शिकार बन रहा है।  उनकी सहन करने की मर्यादा पूर्ण हो चुकी है।  अन्ना ऐसे पीड़ित एवं दुखी लोगों का आवाज बन गये हैं।  पीड़ित को अपनी समस्या का समाधान अन्ना में दिखाई दे रहा है।  

        हम कहते हैं कि संसद सर्वोपरि है,  "पार्लियामेंट इज सुप्रीम " । कानून बनाने का अधिकार संसद एवं सांसदों का है।  कोई बाहरी लोग हमारे ऊपर कोई कानून बनाने के लिए दबाव डाले वो ठीक नहीं है।

        हम सब जानते हैं कि लोकपाल की रचना भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए जरूरी है। पिछले 42 सालों में 8 बार लोकपाल बिल  संसद में लाया गया, लेकिन पारित नहीं हुआ।  इस  विफलता को हमें स्वीकार करना पड़ेगा।  जनता पूछती है कि कानून बनाने का आपका अधिकार है तो आपने भ्रष्टाचार उन्मूलन हेतु लोकपाल क्यों नहीं बनाया?  "हम तो आपको रोकने नहीं आये थे।  आपको पूर्ण अधिकार के साथ संसद में जनहित के लिए कानून बनाने के लिए तो भेजा है, तो अपने 42 साल तक क्या किया?  अपने फर्ज का पालन क्यों नहीं किया?  और आज जब जनता लोकपाल की मांग करती है तो क्यों तकलीफ होती है?

        हम सब जनता के प्रतिनिधि के रूप में संसद में आये हैं?  हम जनता के सेवक हैं, जनता हमारी मालिक है।  लोग अच्छी तरह से अपना जीवन जी सकें, किसी को अभाव न हो, किसी का शोषण न हो, समाज का सर्वांगीण विकास हो, ये हमारा लक्ष्य रहना चाहिए।  लेकिन आज जनता का विश्वास हमारे ऊपर से उठ रहा है।  लोग हमें शंका की नजर से देख रहे हैं।  सभी सांसद खराब नहीं हैं फिर भी जनता का भरोसा कम हो रहा है।  जो हमारे लिए शर्मनाक घटना है।

        लोगों का विश्वास प्राप्त करने हेतु हमें आगे आना होगा, नैतिकता, प्रमाणिकता व निष्ठा के साथ अपने धर्म का पालन करते हुए हमें आगे आना पड़ेगा। खोए हुए विश्वास की पुनः स्थापना के लिए प्रयास करने पड़ेंगे।

        अच्छा, प्रभावी, मजबूत जनलोकपाल बिल पारित हो ऐसी मेरी मांग है। पूरा सदन एकजुट होकर भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिये आगे आये और प्रभावी कार्यवाही करे।  जरूरत पड़ने पर और अधिक ठोस कानून बनाये।  इसी मांग के साथ मैं इस जनलोकपाल के साथ-साथ अन्ना जी की तीन शर्तों का समर्थन करता हूं।

       

ओश्री राधा मोहन सिंह (पूर्वी चम्पारण): भ्रष्टाचार पर अंकुश  से संबंधित लोकपाल जैसे महत्वपूर्ण विषय पर मुझे अपना मत रखने की इजाजत के लिए मैं आपका आभारी हूँ ।  देश आज विकट परिस्थितियों से गुजर रहा है ।  अन्ना हजारे का आंदोलन अभूतपूर्व है ।  इस आंदोलन में गाँधी की प्रेरणा और परंपरा है साथ में जे.पी. आंदोलन का लड़ाकूपन भी है ।  किसी को भी ऐसे जनरोष के प्रकटीकरण की उम्मीद नहीं थी। बेशक जन लोक पाल ही इस आंदोलन की मुख्य मांग है, किंतु मूलभूत कारण दूसरे हैं ।

          आजादी के 64 वर्षों में भ्रष्टाचार ने सुरसा की तरह मँह फैलाया है किंतु दो वर्षो के अंदर इस देश की सरकार ने इसे संस्थागत बनाया है ।  मुंडा कांड, जीप घोटाला कांड, घर्मतेजा कांड, नागरवाला कांड, अंतुले कांड, चुरहट लाटरी कांड, बोफोर्स कांड, चारा घोटाला, शेयर घोटाला, आवास घोटाला, सत्यम घोटाला, यूरिया घोटाला, चीनी घोटाला, टेलीफोन घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, आदर्श सोसाइटी घोटाला, एयर इंडिया जैसे घोटालों के भारत के राष्ट्र जीवन के आंतरिक मर्म को तोड़ा है।

          पंचायतों, प्रखंडों, थानों, तहसीलों से लेकर राज्यों एवं भारत सरकार के कार्यालयों के भ्रष्टाचार ने तो आम आदमी को जीना मुश्किल बना दिया है ।  महँगाई की मार से त्रस्त आदमी जब देश के ही लोगों द्वारा आजादी के बाद से देश को लूट-लूट कर विदेशों के बैंकों में जमा कालेधन की खबरें सुनता है तो उसके सामने भ्रष्ट राजनेताओं, भ्रष्ट नौकरशाहों एवं भ्रष्ट व्यवसायियों के चेहरे  मुगलों और अँग्रेजों के रूप में दिखायी देने लगते हैं ।

महोदय,           संसद सर्वोच्च् जन प्रतिनिधि संस्था है, यही आम आदमी के हर्ष-विषाद का दर्पण है ।  हम सब जन प्रतिनिधि हैं और हम सबों ने यानी इस संसद ने आम जन को सर्वाधिक हताश किया है ।  हमने इसके पहले आठ बार लोकपाल इस सदन में लाया - किन्तु इसे अमलीजामा नहीं पहना पाये ।  आमजन ने हमें सत्तावादी समझा।   राजनीति की विश्वसनीयता खत्म होने लगी है ।  र्सावजनिक जीवन में शून्य पैदा हो रहा है ।  हमलोगों पर उँगलिया उठ  रही है, विरोधभाव निर्माण हो रहा है ।  हममें से बहुत लोग प्रतिक्रिया में अपनी कुछ बातें भी कह रहे हैं -- किन्तु ध्यान रहे जो राजनीतिक शून्यता समाज को दिखाई दे रहा है ।  उसी का परिणाम है कि जनता इस राजनीतिक शून्यता की भरपायी के रूप में अन्ना हजारे की टकटकी लगाये - सड़कों पर दौड़ रही है ।  भ्रष्टाचार से आजिज आ चुकी जनता अन्न के साथ है ।  सभी   * Speech was laid on the Table   लोग जन लोक पाल की बारीकियों को नहीं समझते हैं लेकिन यह जरूर समझ रहे हैं कि इसे लागू होने पर भ्रष्टाचार में कमी आयेगी ।

          आज इस सदनृ में जो चर्चा हो रही है - पूरा देश इसे सुन रहा है - हमारी भाषा को समझ भी रहा है ।  हमारी नेता आज सुषमा जी ने जो बातें कही है, जिस प्रकार से बिंदुवार अपनी बातें रखी है - वह स्पष्ट है कि हम जन लोकपाल की भावनाओं के साथ हैं ।

          माननीय प्रधानमंत्री जी, माननीय वित्त मंत्री जी , माननीय कानून मंत्री जी की बातों से भी यह प्रकट होता है कि वे भी इससे अलग नहीं है किंतु जब काँग्रेस के अन्य वक्ता बातों को घुमाने लगते हैं, काँग्रेस पार्टी के युवा नेता और महा मंत्री दूसरे तीसरे मुद्दों पर प्रवचन शुरू करते हैं तो यह साफ-साफ संदेश होता है कि वे मामले को उलझाना चाहते हैं ।  वे नहीं चाहते कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई वाली जनलोक पाल की भावनाएँ शीघ्र देश में प्रभावी बनायी जायें ।

          महोदय, काँग्रेस पार्टी, एवं उसे सहयोग देनेवाली पार्टियां एवं सरकार इस बात को अच्छी तरह समझ ले कि आज देश के कोने-कोने में राष्ट्र सर्वोपरि का भाव जगा है ।  फिल्मी गानों में मस्त रहने वाला युवा भारत माता की जय और बंदे मातरम के जयघोष में व्यस्त है ।  राष्ट्र ध्वज के प्रति श्रद्वा बढ़ी है ।  राजनीति और राजकोष की निगरानी पर जनता की दृष्टि धारदार हुई है ।  भ्रष्टाचार आम आदमी का मुद्दा बना है ।  पहले यह सबकी पीड़ा थी, अब सबका साझा गुस्सा है ।  अन्ना के आंदोलन से राष्ट्रीय एकता का भाव उमड़ा है ।  सत्ताधारीयों के इशारों पर इस आंदोलन को इस्लाम विरोधी बताने वाले, राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ एवं भाजपा प्रायोजित बताने वाले एवं तरह तरह के हथकंडे अपना कर गुमराह करने वाले भी अब लज्जित हो रहे हैं ।          महोदय मैं अंत में सरकार से एक निवेदन करना चाहता हूँ कि पिछले कुछ दिनों के अंदर सरकार ने जिस प्रकार से ढुलमुल रवैया अपनाया है उसका संदेश अच्छा नहीं गया है । आज लोक पाल के गठन से संबंधित मुददों पर माननीय वित्त मंत्री द्वारा जो वक्तव्य दिया गया है  उसमें यह साफ कहा गया है कि अन्ना जी के प्रतिनिधियों ने  जन लोक पाल बिल के अंदर तीन मुद्दों को शामिल करने पर जोर दिया है ।  जो मुद्दें हैं जनशिकायत एवं नागरिक चार्टर, लोकायुक्त और निचले स्तर के अधिकारी इन मुद्दों पर लगभग सभी पार्टियों में अपनी सहमति दी है । यदि सरकार सचमुच चाहती है कि भ्रष्टाचार से निपटने के लिए वह प्रतिबद्व है जो हमारी शासन व्यवस्था के मूल तत्वों को नष्ट कर रहा है । तो इसे अमली-जामा पहनाने की कृपा करें और  देश के करोड़ों लोगों की आवाज अन्ना की प्राण रक्षा करे ।

   

*श्री ए.टी. नाना पाटील (जलगांव)ःअभी तक मैं सभी साथियों के भाषण सुन रहा था और सभी ने इस गंभीर विषय पर अपने महत्वपूर्ण एवं गंभीर विचार व्यक्त किए हैं।  इस विषय पर मैं अपने कुछ विचार रखना चाहता हूं- जैसा हमारे नेता प्रतिपक्ष श्रीमती सुषमा जी ने कहा कि लो-ग्रेड आफिसर को इस विधेयक में शामिल करना चाहिए। यह बहुत जरूरी है क्योंकि आम आदमी का सरोकार इस लोग्रेड आफिसर के साथ ही होता है।  यदि इन अधिकारियों को इस बिल में शामिल किया जाता है तो हमारे देश के बीपीएल और मिडिल क्लास को पूरा-पूरा लाभ मिलेगा।  जैसा कि भाजपा के वैचारिक आधार एकात्म मानवतावाद के दिग्दर्शक पं. दीनदयाल उपाध्याय जी कहा करते थे कि विकास   की अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति की समस्याओं का समाधान जब तक नहीं होगा देश का विकास तब तक संभव नहीं है। आज डीएम के कार्यालय से राशन की दुकान तक, पासपोर्ट के कार्यालय से सरकारी अस्पताल तक, स्थानीय थाने से न्याय के मंदिर तक भ्रष्टाचार का बोलबाला है।  इससे सर्वाधिक पीड़ित आम आदमी है। इसकी समस्याएं और इसका समाधान लोअर लेबल के अधिकारी से ही संभव है।  इस विषय को लेकर भ्रष्टाचार मिटाने के लिए श्री हजारे जी जनलोकपाल विधेयक लाने का प्रस्ताव लेकर रामलीला मैदान में पिछले 12 दिन से अनशन पर बैठे हैं।  भ्रष्टाचार देश के विकास में एक बहुत बड़ी रूकावट पैदा कर रहा है।  इसके विरुद्ध आम आदमी का आक्रोश अन्ना जी के नेतृत्व में पूरे देश में दिखाई दे रहा है।  भारत सरकार में कैंसर की तरह फैल रहे भ्रष्टाचार का उन्मूलन करने के लिए कोई मजबूत प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है।  तकनीक की आधुनिकता के दौर में जैसे कोई एंटीवायरस पूरे सिस्टम को नष्ट कर देता है उसी प्रकार भ्रष्टाचार ने भारतीय सामाजिक जीवन को नष्ट और पथभ्रष्ट कर दिया है, इसलिए इसके नष्ट करने के अन्ना के जनआंदोलन बिल से उपजे जनलोकपाल नामक एंटीवायरस डालकर इसको ठीक किया जाना जरूरी है।  

        इस यूपीए सरकार के कार्यकाल में इतने घोटाले एक के बाद एक उभर कर सामने आ रहे हैं।  कई मंत्री जेल में बंद हैं, सत्तारूढ़ दल के सांसद जेल में हैं, बड़े-बड़े कार्पोरेट घरानों के अधिकारी जेल में हैं।  केन्द्र सरकार इस विषय पर चिंतित नहीं लग रही हैं, सरकार की मंशा ठीक नहीं है।  देश आज संसद की ओर देख रहा है। यह समय निर्णायक है और ऐतिहासिक अवसर पर दलों की बाधाएं तोड़कर हमको निर्णय करने की आवश्यकता है।

        अन्ना जी 12 दिन से अनशन पर बैठे हैं और भारतीय लोकतंत्र में ऐसा मौका कम ही देखने में आता है जब देश की आम जनता सड़कों पर निकलकर पुरजोर तरीके से दुख का इजहार करती है।  आज ऐसा ही वातावरण पूरे देश में बना हुआ है।  मगर इसका मतलब यह नहीं है कि आम जनता की भावनाओं का लाभ इस हद तक उठाया जाए कि उसका सब्र का बांध टूटने लगे।  इन जनभावनाओं को समझते हुए ऐसे भी विषयों को शामिल किया जाना चाहिए।  

        आज संसद भवन में ऐसी आवाज आम आदमी तक जाए जिसे सुनकर आम आदमी ऐसा महसूस करे कि हमारे देश के सर्वोच्च मंदिर  "संसद" को ऐसे ही नहीं कहा जाता।  अतः यह अवसर देश की राजनैतिक परिवर्तन की दिशा तय करने वाला है।  जनता के आक्रोश को, युवाओं के विरोध को, वृद्धों की हुंकार को, बच्चों के भविष्य को और महिलाओं की ललकार को सुनते हुए एक ऐसे सशक्त लोकपाल को बनाने की दिशा में यह संसद निर्णय करे, जो इन सारी समस्याओं के निराकरण का आधार बनकर स्वर्णिम भारत को बनाने की ओर अग्रसर हो।

        गांधी जी  पहले आजादी की चाहत में जगह-जगह अपने तरीके से आंदोलन चला रहे थे।  गांधी जी ने इन सभी आंदोलनों को एक सूत्र में पिरोकर एक बड़े सूत्र में खड़ा किया।  उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने आजादी के लिए पूरे देश में एक जज्बा पैदा किया।  इस समय यही काम अन्ना हजारे कर रहे हैं।  यदि इस दौर में समाज को अन्ना में एक गांधी दिखाई दे रहे हैं तो यह अकारण नहीं है।  इसलिए मैं सरकार से मांग करना चाहता हूं कि न्यायपालिका के भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए अलग से आयोग बनाया जाए।  जिससे आम आदमी का न्याय प्रणाली में विश्वास बना रहे।  दूसरा, जिस प्रकार से आज केन्द्र सरकार सीबीआई का दुरूपयोग कर रही है। सीबीआई आज सेन्ट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन न रहकर कांग्रेस बचाओ इंस्टीटय़ूशन बन कर रह गई है।  अतः यह भी अत्यंत आवश्यक है कि सीबीआई को आवश्यक रूप से लोकपाल के दायरे में लाया जाए।

        मुझे विश्वास है कि सरकार इस संबंध में शीघ्र आवश्यक कदम उठाएगी।    

                       

*SHRI N. KRISTAPPA (HINDUPUR) :  Thank you, chairman Sir, for giving me this opportunity to speak  on Lokpal Bill.  We have the biggest and strongest democracy in our country and I am proud that I am an Indian.  The serious ailment, which is affecting our country today is corruption.  After independence, if we look at our legislative bodies, we find both educated as well as illiterate representatives.  Today after 54 years of independence, we find almost all the representatives are educated consisting of lawyers, doctors, engineers and intellectuals.  In today’s democratic system, we have multiple means of communication.  We could know what is happening in a remote village within minutes.  We had witnessed major changes in our democracy and legislated very effective laws for our country.  If we question, whether corruption has increased of decreased after 64 years of independence,  we all agree that it has only increased.  When we have literate and intellectual representatives, who are striving hard to serve people, why corruption is on the rise?  Who are responsible for this corruption?  What can be done by us collectively? We should ponder over these questions.  If we look at present levels of corruption, we can see 2G Spectrum scam worth Rs. 1,76,000 crores.  The present Government claims that they were only following policies made by the previous Government.  The Government should generate more revenue and spend for the welfare of the people, but, we see that some individuals or companies, fund election expenditure of political parties.  In return, those political parties, when they come to power, give away our National wealth to these individuals or companies.  Big contractors donate huge amounts as donation to political parties and in return they get favours from those parties and our people are betrayed. In Andhra Pradesh, we are witnessing new form of corruption.  Those companies and individuals, who were benefitted by the *English translation of the Speech originally delivered in Telugu.

     

Government, are investing in the companies of those leaders who favoured them.  Some companies invested in Jagati publications and companies like Emaar indulged in land scams. Schemes like ‘Jalayagnam’ are being misused for new form of corruption.  In this manner, when our National and state’s wealth is being given away to few companies and individuals, we won’t be mute spectators.  In these situations, we should root out corruption by brining an effective Lokpal Bill.  Yesterday, Shri Rahul Gandhi made a statement in the House and he said that Lokpal is only an instrument in checking corruption.  He wants Lokpal to be a constitutional body. We don’t oppose his views.  But first, let us bring that instrument.  Today, thousands of people are following and supporting Shri Anna Hazare.  I request the Government to include three points mentioned by Shri Anna Hazare in Lokpal Bill.  We should run an effective Government.  We should work for people and protect our National wealth.  We should wipe out corruption.  I demand on behalf of Telugu Desam party, to bring an effective Lokpal Bill by including three points suggested by Shri Anna Hazare. Hailing Shri Nara Chandra Babu Naidu’s leadership, I conclude. 

   

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*श्री भास्करराव बापूराव पाटील खतगांवकर (नांदेड़):इस देश में चारों तरफ भ्रष्टाचार को लगाम लगे। भ्रष्टाचार करने वालों को कड़ी कानूनी सजा हो। इसलिए कारगर कानून बने, यह देश के सभी नागरिकों की मंशा है। इसी विचारधारा को लेकर आदरणीय श्री अण्णा हज़ारे जी अनशन कर रहे हैं, सत्याग्रह कर रहे हैं। श्री अण्णा जी ने भ्रष्टाचार के विरोध में जन जागरण किया और हजारों लोग इस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शरीक हुए।

          मैं महाराष्ट्र राज्य से आता हूं। श्री अण्णा हज़ारे जी मेरे राज्य से आते हैं। श्री अण्णा जी प्रामाणिक और सच्चे गांधीवादी विचार के नेता हैं, गांव से जुड़े हुए हैं। उनके 90 प्रतिशत प्रावधानों से मैं और मेरा पंत  सहमत है। कुछ विषयों पर चर्चा होकर रास्ता निकल सकता है। मुझे दो-तीन बिन्दुओं पर अपने विचार रखना है। जिन-जिन बिन्दुओं पर जन लोकपाल विधेयक में चर्चा हो रही है, वे महत्वपूर्ण हैं। लेकिन गांवों में, शहरों में रहने वाले जो गरीब खेतीहर और झुग्गी में रहने वाले मजदूर हैं, जिनका बड़े भ्रष्टाचार या सरकारी दफ्तर में चात्ररहै छोटे-छोटे दफ्तरी भ्रष्टाचार से कोई संबंध नहीं है।

          जिस गरीब की दिन भर की आमदनी बीस रूपए से 30 रूपए है, जो दिन भर पसीना बहाता है, लेकिन उसे दो समय का पेट भर भोजन नहीं मिलता। उस गरीब से जुड़े भ्रष्टाचार पर भी कारगर कानून होना चाहिए। इन वर्गों की संख्या देश में बहुत बढ़ी है। श्री तेंदूलकर कमेटी ने देश में बी.पी.एल. के नीचे के लोगों की संख्या 42 प्रतिशत बताई है। मैं उन लोगों की बात कर रहा हूं।

          इन गरीब, पिछड़े लोगों के लिए वृद्धा पेंशन योजना, महाराष्ट्र में इन्दिरा गांधी महिला पेंशन योजना, संजय गांधी निराधार योजना, श्रावण बाढ़ पेंशन योजना है, लेकिन इन गरीब लोगों को इस योजना में भ्रष्टाचार के कारण समय पर लाभ नहीं मिलता। बी.पी.एल. की सूची बनाते समय गांव का गरीब छूट जाता है और धनी आदमी सूची में आता है। यह गरीब आदमी के लिए 2जी स्पेक्ट्रम के कांड से ज्यादा नुकसान देता है। गरीब आदमी का नाम बी.पी.एल. सूची में नहीं आना उसके लिए मौत की यातना पाने जैसा है।

          हमने गरीबों के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली से उसे जीवन की आवश्यक वस्तु जैसे गेहूं, चावल, चीनी, खाने का तेल और मिट्टी का तेल देने की व्यवस्था की है।

          बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि ये वस्तुं गरीबों तक नहीं पहुंचती है। इसमें बहुत बड़ा भ्रष्टाचार होता है। इसका सीधा प्रभाव गरीबों के जीवन पर पड़ता है। इसलिए मैं आपके   * Speech was laid on the Table माध्यम से सरकार को आग्रह करता हूं कि लोकपाल बिल पर चर्चा होते समय इन बिंदुओं पर भी चर्चा हो। गरीबों के रोज़मर्रा के जीवन से जुड़े भ्रष्टाचार पर भी इस बिल में कारगर उपाय हो।

          हमारे नेता श्री राहुल जी गांधी ने कल इस सदन में इस विषय पर अपने बहुत-से विचार रखे। श्री राहुल जी के मुद्दों को मैं दोहराकर सदन का समय नहीं लेना चाहता। लेकिन, मैं जोर देकर कहना चाहता हूं कि श्री राहुल गांधी जी ने बहुत ही महत्वपूर्ण बिन्दु हम सबके सामने रखा है।

           मैं आपके माध्यम से सदन से दरख्वास्त करता हूं कि इस विधेयक को मंज़ूरी देते समय श्री राहुल गांधी ने ने जो महत्वपूर्ण विचार रखे हैं, उस पर भी गंभीरता से विचार करे।

          मैं सदन से आग्रह करता हूं। भारत रत्न डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी ने इस देश का जो संविधान बनाया है, यह डॉ. अम्बेडकर जी का संविधान है जिसने इस देश की आज़ादी के 65 साल बाद भी लोकतंत्र को मज़बूत बनाए रखा है। इसलिए सभापति, आपके माध्यम से सदन को मेरा आग्रह है कि लोकपाल बिल मंज़ूरी की चर्चा भारत रत्न डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर जी के बनाए संविधान के दायरे में ही हो।

           मैं आपके माध्यम से आदरणीय अण्णा जी से दरख्वास्त करता हूं कि इस सर्वोच्च सदन के सभी सदस्यों की भावनाओं को, देश के प्रधानमंत्री, देश के विपक्ष की नेता और सभी पार्टियों के नेताओं के दरख्वास्त को मद्देनज़र रखे हुए अपना अनशन रोकें।

             

श्री जयंत चौधरी (मथुरा): सभापति महोदय, इस बात में अब कोई शक नहीं रह गया है कि भ्रष्टाचार का दुप्रभाव हमारे देश में, लोकतंत्र में, गरीबी उन्मूलन और क्षेत्र को विकसित करने के लिए जितनी योजनाएं बन रही हैं, उन पर पड़ रहा है। सवाल यह भी नहीं रहा कि जो लोग आज बाहर सड़कों पर उतरे हैं, वे एक नई चेतना का प्रतीक हैं। समाज के प्रति हर नागरिक की जो जिम्मेदारी होती है, आज लग रहा है कि देश के नौजवान को जिम्मेदारी का एहसास है। यह एक ऐतिहासिक वक्त है। आज के दिन लोक सभा टेलीविजन की व्यूअरशिप काफी ज्यादा है। मेरे मन में बस एक इच्छा है कि मीडिया की ओर से यह समर्थन इस सदन को आगे भी मिलता रहे, लोग इसी तरह, इसी नजर से सदन को आगे भी देखते रहें, यह भी बहुत जरूरी है।

          अब तक जो हुआ, मैं अपने शब्दों में कुछ विवरण जरूर देना चाहूंगा कि मेरे इस पूरे प्रकरण पर क्या विचार हैं। मुद्दा बहुत बड़ा है। जब भी कोई क्रान्तिकारी विचार आता है, जब राजनीतिक सोच वाला व्यक्ति, सरकार में शामिल व्यक्ति कोई नया परिवर्तन करना चाहता है, तो उसका विरोध किया जाता है। यह इंसान की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। परिवर्तन हमें पसन्द नहीं है। जो पुरानी लय है, हम उसमें चलना चाहते हैं। मैंने देखा है, अनुभव है कि कई बार जो अफसरशाही है, वह डौमीनेट करती है, वे परिवर्तन नहीं चाहते। इसलिए जब एक नया क्रान्तिकारी विचार, विचार नया नहीं कह सकते, बहुत समय से है, लेकिन अब उसके क्रियान्वयन के लिए एक नैतिक दबाव लोग बना रहे हैं, देश की जनता बना रही है। जब हम उस पर चर्चा करते हैं तो एक बहुत बड़ी ताकत है जो उसका विरोध करती है। शुरूआत से सरकार का जो रवैया रहा, वह एक ब्यूरोक्रेटिक रिस्पौंस रहा, राजनीतिक नहीं था। जो रैज़िस्टैंस टू चेंज ब्यूरोक्रेसी दिखाती है, वही रैज़िस्टैंस टू चेंज सरकार ने दिखाया। क्या कारण था कि जो इस्टैबलिशमैंट है, उसने पूरे आंदोलन को नहीं अपनाया? अपनी मोहर नहीं लगाई। यह नहीं कहा कि अन्ना जी, आप जो कह रहे हैं, यह हमारी आवाज है, यह हमारी लड़ाई है, यह हमारा मुद्दा है। इस सदन के सभी सदस्यों के अंदर एक चिन्ता है, मैं जानता हूं। मैं व्यक्तिगत तौर पर अपना अनुभव बताना चाहता हूं। जब शुरूआत में यह घोषणा हुई कि एक आंदोलन होगा, मैंने भी बहुत चिंतन किया। मैं भी विचलित हो रहा था। मेरे अंदर भी चिन्ता थी कि क्या होगा। मैंने अपने दल के नेता से बात की। वे स्पष्ट थे। शुरू से कह रहे थे, बल्कि ऑल पार्टी मीटिंग में हमारी पार्टी ने स्पष्ट कहा कि सरकारी बिल नाकाम है। जहां फाउंडेशन इतनी कमज़ोर हो तो वहां आप छोटे-मोटे परिवर्तन कर लें, लेकिन उस कानून का सिद्धान्त ठीक नहीं हो पाएगा। उसे आप वापिस लें, हमने यह खुलकर कहा।

          चौधरी साहब ने मुझे शुरूआत से स्पष्ट कहा कि चिन्ता मत कीजिए, यह अलोकतांत्रिक नहीं है। यह उन लोगों का अधिकार है। मैंने बहुत सोचा। याद करें जब गन्ना किसानों का आंदोलन दिल्ली में हुआ था। यहां तमाम पार्टी के लोग मौजूद हैं। कई बार विपक्ष में रहते हैं, कई बार हम सरकार में रहते हैं। हमारी पार्टी प्रदेश में विपक्ष में है और यहां भी हम विपक्ष में हैं। तमाम प्रदर्शन, आंदोलन हम लोग आयोजित करते हैं। जब हम गांवों में जाते हैं तो कहते हैं कि कानून में ये खामियां हैं कि देश की संसद को देश की आजादी से देश के गरीब के लिए जिस तरह काम करना चाहिए, वह नहीं कर रही है। क्या हम नहीं कहते? हम भी आलोचना करते हैं। देश के संविधान ने अगर हमें अधिकार दिया है तो देश के एक साधारण नागरिक को भी वही अधिकार दिया है। मैंने यह समझ लिया, जब मैंने सोचा, दिल की गहराइयों में देखा, कि मै विचलित क्यों हो रहा हूं। इसलिए विचलित नहीं हूं कि मैं नहीं चाहता कि भ्रष्ट पर नज़र रखी जाए और भ्रष्ट को जेल की सलाखों के पीछे किया जाए।  मैं यह नहीं सोच रहा था। मैं इसलिए विचलित हो रहा था, क्योंकि कहीं न कहीं मुझे मालूम था कि इस व्यवस्था में सबको भागीदारी नहीं मिल रही है। कहीं न कहीं मुझे अहसास था कि देश के गरीब जो बस्तियों में रहते हैं, उनके मन में सवाल उठ रहे हैं। उन सवालों का जवाब शायद हम इस सदन के सदस्यों के पास भी नहीं है।

          मैं जानता हूं कि बहुत से सांसदों ने यह चिंता व्यक्त की है कि वहां से आपत्ति जनक भाषण हो रहे हैं। सवाल वह नहीं है। छोटी-मोटी बातों को आप भूल जाइये। हमें उससे ऊपर उठना होगा। यह मुद्दा व्यक्तियों से जुड़ा हुआ नहीं है। अन्ना जी पर सरकार ने प्रहार किया। सवाल उनका नहीं है, उनसे बड़ा है।  आप देखें कि वे 74 साल के व्यक्ति हैं और उसमें उनका क्या स्वार्थ है? वे अनशन पर बैठकर जो कर रहे हैं, मैं नौजवान हूं, मेरे अंदर ऊर्जा है, आत्मविश्वास है, मैं समझ सकता हूं कि अगर मैं कुछ चाहूं, तो मैं कर सकता हूं। लेकिन क्या मैं किसी भी महत्वपूर्ण मुद्दे को लेकर 12 दिन तक अनशन पर बैठूंगा? यह साहस का काम है, और वह हमारे लिए कर रहे हैं। यह हमारा मुद्दा है, जिसे वे उठा रहे हैं। इसलिए मैं कह रहा हूं कि यह सवाल व्यक्तियों का नहीं है। हो सकता है कि आपत्तिजनक बातें रखी गयी हों, लेकिन सवाल उससे बड़ा है। मुझे इस देश की लोकतांत्रिक परम्पराओं पर विश्वास है, यह कहने की जरूरत नहीं है, आवश्यकता नहीं है। कुछ लोग कह रहे हैं कि यह एक खतरनाक मिसाल है। यह खतरनाक मिसाल कैसे है? आज भी तमाम कानून देश में बनते हैं। आपकी एनएससी है, वहां आप किसी भी सोसायटी को नियुक्त करते हैं। मैं सही और गलत का सवाल नहीं कह रहा। मैं यह नहीं कह रहा कि नहीं होनी चाहिए। इस व्यवस्था में अब उसके लिए एक जगह बनायी गयी है। उसे मैं स्वीकार करता हूं। इसी तरह योजना आयोग है। कितनी बार योजना आयोग की बनायी हुई पंचवर्षीय योजनाओं पर हम यहां चर्चा करते हैं। उसमें सांसदों का क्या दखल है?...( व्यवधान)

श्री अवतार सिंह भडाना (फ़रीदाबाद):  वहां ओमपुरी जी क्या कह रहे हैं, उस बारे में आप बोलिये?...( व्यवधान)

श्री जयंत चौधरी :   उसमें दखल बहुत कम है, लेकिन सवाल वह नहीं है। ...( व्यवधान)  मैं सिर्फ यह कह रहा हूं। ...( व्यवधान) मै कह चुका हूं। ...( व्यवधान) मैं कह रहा हूं कि उन व्यक्तियों पर आप मत जाइये। हम  उनसे ऊपर हैं। ...( व्यवधान) बात यह है कि आज की मौजूदा व्यवस्था में भी ...( व्यवधान) मैं जो कुछ कह रहा हूं, वह कुछ लोगों को खराब लग रहा होगा। लेकिन जो टीस आपके मन में है, वह सभी के मन में है। ...( व्यवधान)

 हमें कभी न कभी स्वीकार करना होगा कि हमसे कमियां हुई हैं, हम गलतियां हुई हैं, इसलिए यह स्थिति बनी।

सभापति महोदय : कृपया आप लोग बीच में मत बोलिये, उन्हें बोलने दीजिए।

…( व्यवधान)

श्री जयंत चौधरी :   मैं कहना चाहता हूं कि आज भी योजना आयोग है, एनएससी है, जहां सिविल सोसायटी को ड्राफ्टिंग का मौका मिलता है। आप इस बात को भी स्वीकार करें कि अगर सरकार किसी बिल को अपना लेती है, आप फूड सिक्योरिटी बिल, कम्युनल वायलेंस बिल, लैंड एक्वीजिशन का ड्राफ्ट ले लीजिए, आपने एनएससी के 70, 80 और 90 प्रतिशत तक सुझाव अपनाये हैं। अगर सरकार कोई बिल टेबल करेगी, तो थोड़े बहुत इधर-उधर संशोधन हो जायेंगे, लेकिन उसे यह हाउस पारित करेगा, क्योंकि बहुमत सरकार के पास है। इसलिए जब वह जगह आपने समाज को दी है, तो क्यों नहीं एक नागरिक जो सड़क पर खड़ा है, अन्ना हजारे ने ड्राफ्ट किया, उनको क्यों नहीं वह जगह मिली? क्या उनका अधिकार नहीं बनता? बनता है। सब तरह की राय आयेंगी, आप उन्हें सुनें। उनका अधिकार बनता है। मैं यह कहना चाहता हूं कि जिस  ढंग से इस मामले में सरकार ने दखल दिया है, प्रयास किये हैं, उसका प्रभाव यह पड़ा है कि आम आदमी अब यह सोच रहा है कि सिर्फ सरकार हमारे खिलाफ नहीं है, पूरी संस्था हमारे खिलाफ क्यों खड़ी हुई? इसलिए एक स्वर में जब हम खड़े होकर कहते हैं कि पार्लियामैंट की सुप्रीमेसी है, यह कहने की आवश्यकता नहीं है। लोगों की आस्था आपसे जुड़ी हुई है, इसलिए आप मैम्बर के तौर पर यहां आये हैं। यह आपको बार-बार कहने की आवश्यकता नहीं है। ...( व्यवधान) यह किसी को कहने की आवश्यकता नहीं है। उनका लोकतांत्रिक प्रणाली में, परम्पराओं में, व्यवस्था में विश्वास है। वे वोट देते हैं, लेकिन हमारे कहने से सुप्रीमेसी इस्टेबलिश नहीं हो जाती। ...( व्यवधान) हमारी सुप्रीमेसी के बारे में कहने से उनके अधिकारों का हनन नहीं होता। ...( व्यवधान)

सभापति महोदय :  कृपया आप सब बीच में मत बोलिये।

…( व्यवधान)

सभापति महोदय :  आप सब बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

श्री जयंत चौधरी :  देखिये, सवाल कई उठ रहे हैं, लेकिन मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि इस आंदोलन को सभी सांसदों को अपनाना चाहिए। जो बातें उठ रही हैं, वे जायज हैं। मैं याद दिलाना चाहूंगा, गोपाल कृष्ण गांधी जी ने  एक आर्टिकल लिखा था, मैं उसे पढ़ रहा हूं: 1948 में सेवाग्राम में महात्मा गांधी जी के निधन के बाद चर्चा हो रही थी, समाज के विशेषज्ञ थे, सरकार के प्रतिनिधि वहां थे, जयप्रकाश नारायण जी थे, पंडित जवाहर लाल नेहरू थे, वहां चर्चा हो रही थी कि अब क्या करें। जब नेहरू जी से पूछा गया कि आप क्या समझते हैं, अब सिविल सोसाइटी का क्या रोल होना चाहिए? इस पर उन्होंने कहा फ़िज़ा इस फ़िजा की नई रोशनी में इन सवालों पर हम सोचें।

          मैं यह महसूस कर रहा हूं कि जो एक नई राजनीतिक चेतना आई है, इतने विस्तार से किसी बिल के हर क्लॉज पर आम आदमी क्या हमसे सवाल पूछता है? नहीं पूछता है। इसलिए हमें इस आंदोलन की अच्छाइयों को स्वीकार करना चाहिए और हमसे जो कमियां हुई हैं, उनको स्वीकार करना चाहिए। भ्रष्टाचार बहुत बड़ा मुद्दा है। आज जो लैण्ड माफिया है, हमने देखा है कि एक नेक्सस है सरकार, ब्यूरोक्रेसी, पॉलिटिशियन्स और कारपोरेट्स के बीच, जिसके तहत लगातार बहुत बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण हो रहा है, वह भी भ्रष्टाचार से जुडा मुद्दा है। कई चीजें हैं। लोकपाल कानून भी आपको जल्द से जल्द लाना चाहिए। लोकपाल से संबंधित कुछ छोटे-मोटे विवादास्पद मुद्दे हैं। एक सवाल उठता है कि क्या-क्या चीजें इसके दायरे में आनी चाहिए। प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट है, सरकारी ड्राफ्ट में सिर्फ उसको रखा गया है, कुछ विशेषज्ञ यह कहते हैं कि आईपीसी में जो धाराएं हैं, उनको भी इससे जोड़ें। मैं एक कदम आगे जाकर कह रहा हूं कि आपके पास जो मनी-लाँड्रिंग से संबंधित एक्ट है, उसको भी इससे जोड़ें। बेनामी ट्रंजैक्शन्स के लिए कानून बनाएंगे, उसे भी इससे जोड़ें और जो भी ऐसी कानून बनाते हैं, जिनकी धाराएं भ्रष्टाचार से संबंधित हों, उनको भी आप लोकपाल के दायरे में लाइए। एनजीओज का सवाल उठ रहा है, सरकारी ड्राफ्ट में सभी एनजीओज को जोड़ा है और कई सांसदों की ओर से भी यह मांग रखी गयी कि नजर सब पर रहनी चाहिए। मैं इस सिद्धांत को स्वीकार करता हूं कि नजर सब पर रहनी चाहिए, पारदर्शिता रहनी चाहिए, कहीं न कहीं कोई रिपोर्टिंग और एकाउण्टिंग की व्यवस्था होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि एक आप कह रहे हैं कि लाखों एनजीओज को जोड़ दो, दूसरी तरफ आप कह रहे हैं कि जो निचले स्तर की ब्यूरोक्रेसी है, उसे मत जोड़ो। इस बात में कंसिस्टेंसी नहीं है। आम जनता के लिए सरकार का प्रतिनिधि वह अधिकारी है जो प्रमाण पत्र बनाता है, पटवारी है, आम आदमी के दिमाग में भ्रष्टाचार में टूजी नहीं है। वह इन चीजों को लेकर दुखी और चिंतित हो रहा है, लेकिन जब वह किसी सरकारी दफ्तर में जाता है, तो वहां सबसे पहला कांटैक्ट जो सरकार का होता है, वह छोटा अधिकारी है। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह जी कहा करते थे कि भ्रष्टाचार पानी की तरह ऊपर से नीचे की ओर बहता है, अगर आप ऊपर का भ्रष्टाचार रोक दें, तो बहुत बड़े पैमाने पर परिवर्तन होगा। उस सिद्धांत को मैं जानता हूं, लेकिन आज स्थिति यह है कि नीचे तक भ्रष्टाचार पहुंच गया है और यह बात भी व्यावहारिक नहीं होगी कि आप कहें कि केंद्र में हम बना लेंगे केंद्रीय इम्प्लाईज के लिए, लेकिन स्टेट लोकायुक्त का क्या करें। यह बात व्यावहारिक नहीं होगी कि कोई एक प्रदेश में सेंट्रल इम्प्लाईज के खिलाफ इनक्वायरी के लिए कह सकता है, लेकिन प्रदेश के इम्प्लाई के खिलाफ कोई संस्था नहीं है। यह सही नहीं होगा, लेकिन इसे करना कैसे है, यह आपको सोचना है। संविधान के प्रावधानों को मद्देनजर रखते हुए इसे करें। कई चीजें ऐसी हैं जो कनकरेंट लिस्ट में आती हैं और आपने उनके लिए सेंट्रल लेजिस्लेशन बनाया है। रिवर बोर्ड अथारिटी आपने बनाई है। आप इसे इनेबलिंग प्रॉविजन के तहत करें या मॉडल एक्ट के तहत करें, यह आपको देखना है।...( व्यवधान)

सभापति महोदय : आपको बोलते हुए 15 मिनट हो गए हैं। अब समाप्त कीजिए।

श्री जयंत चौधरी : महोदय, प्रधानमंत्री इसके दायरे में हों या नहीं, मैं जानता हूं कि यह भावना है  कि यह सबसे ऊंचा पद है, डेमोक्रेटिक ट्रेडिशन्स से उस व्यक्ति को चुना जाता है, सारी बातें ठीक हैं, लेकिन अगर मौजूदा व्यवस्था में भी उनको प्रिवेंशन ऑफ करप्शन के तहत उनको इसमें जोड़ा जाता है और जब सरकार मान गयी कि सीबीआई को स्वतंत्र करेंगे, सीबीआई की एंटी करप्शन विंग को हम दे देंगे, तो लोकपाल के अंतर्गत एंटी करप्शन एक्ट के तहत अगर प्रधानमंत्री के खिलाफ इनक्वायरी का सवाल आता है, तो फिर क्या होगा। मतलब अगर आप सीबीआई की एंटी करप्शन विंग को आलरेडी लोकपाल को दे चुके हैं, जब मौजूदा धाराओं में भी प्रधानमंत्री उसके दायरे में आते हैं, तो प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। यह बात सेकंड एआरसी ने भी कही थी और 1989 के एक्ट में भी यही बात थी।

सभापति महोदय : आपने काफी समय ले लिया है, अब आप अपनी बात समाप्त करें।

श्री जयंत चौधरी: सभापति जी, मैं अपनी बात समाप्त ही कर रहा हूं। जिस राजनितिक मंच से मैं हूं और एक सदस्य के रूप में यहां खड़ा हूं, मैं इस आंदोलन का समर्थन करता हूं, इसका स्वागत करता हूं। मैं अपील करना चाहता हूं उन 74 साल के बुजुर्ग से कि सदन की भावना भी आपके साथ है और इच्छा रखता हूं कि इस चर्चा के बाद यदि कोई रिज़ोल्यूशन सरकार बनाकर पेश करती है, उस पर आप वोटिंग करा लें, हम वोटिंग के लिए तैयार हैं। हम संदेश देना चाहते हैं उन लोगों को कि यह सदन, लोक सभा के सांसद, आपकी लड़ाई जो करप्शन के खिलाफ है, सब आपके साथ हैं और करप्शन के खिलाफ हैं। हमारी पार्टी भी उन मुद्दों का समर्थन करती है।

*श्री रामसिंह राठवा (छोटा उदयपुर):  पिछले कुछ समय से देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो जनाक्रोश सामने आया है, उससे साफ है कि देश की जनता भ्रष्टाचार मुक्त समाज में जीना चाहती है।  इस मुद्दे पर सिविल सोसायटी के एक समूह ने जिस तरह भ्रष्टाचार के लिए मुख्य रूप से राजनेताओं को जिम्मेदार ठहराया है और जनलोकपाल विधेयक को लेकर एक ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की है जिससे यह संदेश गया है कि अगर संसद जनलोकपाल विधेयक को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेती है तो देश से भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा।  इस दावे से देश के बहुसंख्यक समझदार और अनुभवी लोग असहमत हैं।  क्योंकि सिर्फ कानूनी उपायों से सर्वव्यापी भ्रष्टाचार का समाधान खोजने की उम्मीद केवल भ्रामक है।

        आज देश में गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के कारण बढ़ रही है।  एक पूर्व प्रधानमंत्री ने स्वीकारा कि सरकार द्वारा विकास के लिए दी गई राशि में से मात्र 15 प्रतिशत ही पहुंच पाती है,  यानि विकास की धनराशि में से 85 प्रतिशत भ्रष्टाचार का महानिवाला बन रही है।  देश में ऐसा संदेश देने की कोशिश की है कि जो लोग इस आने वाले विधेयक के समर्थन में नहीं हैं, वे भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में साथ नहीं है।  यह बात गलत है।  आज भ्रष्टाचार पर राजनैतिक बयानबाजी नहीं ठोस समाधान और सक्रिय योगदान और देश विकास के रास्ते पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

        चाणक्य ने कहा था कि जिस तरह अपनी जिव्हा पर रखे शहद या हलाहल को न चखना असंभव है, उसी प्रकार सरकारी कोष से संबंधित व्यक्ति राजा के धन का उपयोग न करे, यह भी असंभव है।  जिस प्रकार पानी के अंदर मछली पानी पी रही है या नहीं, जानना कठिन है, उसी प्रकार राज कर्मचारियों के पैसा लेने या न लेने के बारे में जानना भी असंभव है।  आज जबकि चहूं ओर भ्रष्टाचार की चर्चा है, लोकपाल एवं जनलोकपाल बिल को लेकर समूचा देश विचार मग्न है।  

        जनलोकपाल बिल को लेकर आदरणीय अन्ना जी हजारे अनशन पर हैं और उनके अनशन को लेकर सभी चिंतित है।  मेरी दृष्टि में भ्रष्टाचार एक ऐसी समस्या है जिसका समाधान  एक लम्बी प्रक्रिया है, हमें इस समस्या के समाधान की जड़ तक जाना होगा।  कोरे पत्तों और डालियों को सींचने से कभी कोई पौधा नहीं पनपता, जड़ों को सींचना होता है।  हमारी विडम्बना है कि हम समस्या की जड़ तक जाना ही नहीं चाहते और केवल पत्तों और डालियों में उलझे हैं।  भ्रष्टाचार की समस्या का समाधान कोरे लोकपाल या जनलोकपाल में ढूंढना जड़ की बजाये कोरे पत्तों और डालियों में उलझना होगा।  मेरी दृष्टि से भ्रष्टाचार की समस्या के मूल कारणों पर ध्यान केन्द्रित करना होगा।  इस समस्या की जड़ है मंहगाई, बेरोजगारी और बढ़ती आबादी।

        भारत विकास या आगे बढ़ने के दृश्यों के बीच में कितना पीछे होता जा रहा है, सहज ही मंहगाई, भ्रष्टाचार, सामाजिक-आर्थिक अन्याय एवं बेरोजगारी की विभीषिका से अन्दाज लगाया जा सकता है।  प्रधानमंत्री ने हाल ही में भ्रष्टाचार को मुद्रास्फीति के साथ भारत की विकास दर में सर्वोच्च रुकावट माना है।  यह देश के सर्वोच्च कार्यकारी द्वारा भारत में गिरती नैतिकता की महत्वपूर्ण स्वीकारोक्ति है।  उनके अनुसार सरकार का हर स्तंभ अभी भी भ्रष्टाचार की काली छाया से ग्रस्त है।

        भ्रष्टाचार को केवल आर्थिक अनियमितता मानने से भी स्थितियां बहुत बिगड़ी हैं।  भ्रष्टाचार एक सामाजिक अपराध भी है।  महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ने अपने पांच साल पूरे किये हैं।  मनरेगा भी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है।  अगर देश के निर्धनतम समुदाय के हिस्से का निवाला छीनने में भी तंत्र को शर्मिदंगी महसूस नहीं होती है तो इससे घटती नैतिकता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

        आज नैतिकता को भी राजनीतिक दल अपने-अपने नजरिये से देखने को अभिशप्त हैं।  राष्ट्रमंडल खेलों का "भ्रष्टाचार " तो खेलों के शुरू होने से पहले ही प्रकाश में आ गया था।  इसके बावजूद देश के राजनीतिज्ञों ने इतना साहस नहीं दिखाया कि वे इसके कर्ताधर्ताओं को तुंत पदच्युत करते और भ्रष्टाचार की नींव पर खड़े इन खेलों का आयोजन रद्द कर देते।  रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है - क्या कोई सभ्यता नैतिक स्वास्थ्य के कानून की उपेक्षा कर सकती है और भौतिक वस्तुओं को भकोसते रहकर स्फीति की अंतहीन प्रक्रिया को जारी रखे रह सकती है? इस सवाल का जवाब ही आज की समस्याओं का हल है।

        स्थितियां सन् 1974 में जयप्रकाश नारायण द्वारा प्रारंभ किए गए आन्दोलन के समय से भी हजारों गुना बदतर हो चुकी हैं।  यही भ्रष्टाचार केवल भारत की समस्या नहीं है बल्कि समूची दुनिया इससे आक्रंत एवं पीड़ित है। सारी दुनिया में बदलाव की नई लहर उठ रही है।  टय़ूनीशिया और मिस्र इसके ताजातरीन उदाहरण हैं।  भारत की स्थितियां इससे भिन्न नहीं हैं।  शोषित एवं वंचित वर्ग के बढ़ते असंतोष को बलपूर्वक दबाने के प्रयास छोड़कर भ्रष्टाचार मुक्त एवं सामाजिक समरसता वाले भारत के निर्माण की दिशा में प्रयत्न किये जाने की आवश्यकता है।  हम सभी का यही पवित्र दायित्व है तथा सभी प्रतिनिधि भगवान और आत्म की साक्षी से इस दायित्व को निष्ठा व ईमानदारी से निभाने की शपथ लें।  भ्रष्टाचार के मामले में एक दूसरे के पैरों के नीचे से फट्टा खींचने का अभिनय तो सब करते हैं पर खींचता कोई भी नहीं।  रणनीति में सभी अपने को चाणक्य बताने का प्रयास करते हैं पर चन्द्रगुप्त किसी के पास नहीं है।  घोटालों और भ्रष्टाचार के लिए हल्ला उनके लिए राजनैतिक मुद्दा होता है, कोई नैतिक आग्रह नहीं।  कारण अपने गिरेबान में तो सभी झांकते हैं वहां सभी को अपनी कमीज दागी नजर नहीं आती है, फिर भला भ्रष्टाचार से कौन निजात दिलायेगा।

                                                   

*डॉ. निर्मल खत्री (फैजाबाद):  लोकपाल व्यवस्था की स्थापना के संदर्भ में माननीय वित्तमंत्री व नेता सदन श्री प्रणब मुखर्जी जी के वक्तव्य के संदर्भ में संक्षेप में अपना मत रखना चाहता हूं।  भ्रष्टाचार से आज जनता त्रस्त है, नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार की जकड़न से व्यवस्था जकड़ी हुई है।  समय-समय पर इस पर रोक लगाने हेतु बने कानून संभवतः पर्याप्त साबित नहीं हो रहे हैं, अतः यह जरूरी है कि लोकपाल की स्थापना केन्द्र व राज्यों में हो व इसे एक संवैधानिक सत्ता केन्द्र के रूप में पूरे अधिकार दिये जायें।

        मुख्य वे बिन्दु जिन पर आज चर्चा केन्द्रित है मेरी राय में न्यायपालिका को संविधान में जो सर्वोच्च स्थान मिला है उसे देखते हुए उसे लोकपाल के दायरे में लाना ठीक नहीं।  निचले स्तर के सभी सरकारी अधिकारी, कर्मचारी निश्चित रूप से दायरे में लाये जायें।  संसद की सर्वोच्चता, संवैधानिक प्रावधानों की रक्षा हम सभी करें।  लोकपाल के गठन में समाज के गरीब शोषित पिछड़े वर्ग के योग्य, निष्ठावान, निष्पक्ष लोगों को भी जोड़ा जाये।

        मैं अन्ना हजारे जी से अनुरोध करना चाहूंगा कि वे अपना अनशन समाप्त करें।  संसद उनकी भावनाओं का सम्मान करती है और यकीनन यह संसद देश से भ्रष्टाचार को समाप्त करने हेतु अपनी संसदीय प्रक्रियाओं को पूरा करते हुए एक मजबूत लोकपाल बिल भविष्य में देश को देगी।  अंत में, मैं वित्त मंत्री जी के द्वारा प्रस्तुत वक्तव्य की सराहना करते हुए अपने आपको उससे सम्बद्ध करता हूं।

       

SHRI GURUDAS DASGUPTA (GHATAL): Sir, at the beginning I must say that whatever people might be speaking from anywhere, from any platform, the supremacy of Indian Parliament cannot be diluted in any case.  Whatever people might be saying from any rostrum, any platform, I do not believe that Parliament and Members of Parliament are all tainted.  I do not believe that a single person is fighting corruption in the country.  I believe there had been fights against corruption and there are people to fight against corruption and there will be people who will be fighting corruption. Nobody should take the pride of fighting corruption alone wherever his situation may be.

          Sir, having said so, I have listened very carefully to the speech of the Leader of the House.  I appreciate his speech.  For the first time it seems Shri Pranab Mukherjee has been very careful, very cogent and very frank.  He has said that the country is at crossroads.  I have listened this for the first time.  Really, the country is at crossroads.  Only one hour back a senior Minister was asking me whether I can tell him the magic by which a person on fast could rock the country like this.  What is the magic that a man going on fast can rock the country?  These are the questions being asked.  It is right to ask these questions; why we are at crossroads and how can one person being on fast rock the country, including the Parliament. It is for the Government in power, who is there for seven years or more, to explain  हिन्दुस्तान खतरे में क्यों है? आप आज क्यों बोल रहे हैं कि हिन्दुस्तान आज खतरे में है?  We are at crossroads.  आप क्यों कह रहे हैं कि एक आदमी अनशन कर रहा है  and it has rocked the country.  Why it is so?  If you look without any glass or cover, if you look beyond the nose we can see that there are millions of people who are not in Ramlila Maidan but who have identified themselves with the slogan and crusade against corruption.  It has been able to rouse the conscience of the masses to some extent and that should be very frankly admitted.  But may I ask you why it is so?    During this critical juncture, this is a critical hour for the nation and that is why the Minister has said that we are at the crossroads, the Government is speaking in many voices.  सिर्फ एक आदमी नहीं बोल रहा है।   The Government is speaking in many voices.  I believe that my friends on the Left will not be angry if I say that there are more than one power centre within the coalition Government. That is why, you are not speaking in the same voice.  Please agree if I say that the esteemed office of Prime Minister has almost become a post box.  It is not the office of the Chief Executive of the country.  This is unfortunate.  You cannot speak in one voice.  You are having more than one power centre and the Prime Minister is not the sole leader of the Party or leader of the Government, who speaks the truth. There are many more voices. शरद जी, सुनिये, मेहरबानी होगी। You are not speaking in the single voice. 

Kindly permit me to say that the speech that was delivered during the ‘Zero Hour’ by the General-Secretary of the Congress Party is at variance with the tenor of the Statement, which is given by the hon. Leader of the House. It has been interpreted as a hard line speech.  It has been interpreted as a speech of confrontation.  I do not make any comment but that is the interpretation.  That is the interpretation being made outside the House, I am not saying in the newspapers.  … (Interruptions)  भई सुनिये, मेहरबानी।    

MR. CHAIRMAN : Please do not interrupt. 

SHRI GURUDAS DASGUPTA :  Please have a little tolerance.  Democracy means tolerance… (Interruptions) but democracy does not mean speaking in too many voices.

          The point is that why the situation has become so bad in the country.  The situation has become so bad in the country because the Government has made a mess of the situation.  There are one after another scandals and one after another reports of the statutory body.  Please accept the reality. 

I am a Member of Parliament for more than 20 years.  This Government has been found to be the most tainted Government.  Why is it so?  It is not only that.  You will kindly remember that I was a Member of the other House when Bofors scandal broke out.   What was the total quantity of amount?  It was less than Rs.100 crore. But what is the estimated loss of the 2G Spectrum?  Even, the CBI is saying Rs.30,000 crore.  I do not go into the C & AG Report.  Why is there a phenomenal growth of corruption?  That is the point to be answered.  That is the reason why the situation has become so volatile in the country.  It is not only that, please look at the mirror.  None of the investigative agencies is doing its best or doing its job independently. Did Delhi Police do their job on ‘Cash for Vote’ scandal?  Is it not true that when the High Court of Delhi had ordered and after that the charge-sheet had been filed; is it not true that 2G Spectrum case had taken a shape after you had the beating of the Supreme Court?  What is this?  Scandals are taking place but police is not taking action.  Scandals are taking place but CBI is not moving.  The whole thing becomes paralysed.  It is as if the whole apparatus has become political. It is as if those decisions are not being taken on merit.  Decisions are being taken on the basis of signal from the North Block or South Block. If, you reduce the country to this level, then the situation is bound to become volatile like what it is today.        

MR. CHAIRMAN : Please do not interrupt.

SHRI GURUDAS DASGUPTA : Hon. Mr. Chairman, Sir, I find our Ministers more impatient than the general Members of the House.  I have a special liking for him also as he comes from my neighbouring State.  But he does not know one thing. I cannot tell the proceedings of the JPC.  I am a member of the JPC. I know it is not the change of Policy which has resulted into this… (Interruptions).  Mr. Minister of State, I am not yielding.

MR. CHAIRMAN:  You address the Chair.

SHRI GURUDAS DASGUPTA : Sir, it is being said by everybody that 2G spectrum has led to a loss of Rs.30,000 crore.  Everybody is saying this and he is becoming impatient… (Interruptions).  Sir, I am sitting now.  You please control them.

MR. CHAIRMAN:  You continue your speech.  Please do not interrupt him.

SHRI GURUDAS DASGUPTA : A senior Minister is behaving like this and if the whole Opposition behaves like this with him, he will have the same feeling… (Interruptions). सभापति महोदय, सबको बोलने का अधिकार है। I know what Mr. Jag Mohan has said.  I am not referring to Mr. Jag Mohan.  I am not referring to Mr. Vajpayee.  I am not referring to Mr. Narasimha Rao.  I am not referring to Dr. Manmohan Singh.  I am referring to the estimated loss of 2G spectrum and nobody can deny that.  In Bofors, it was less than Rs.100 crore and now it is nearly Rs.1 lakh crore.  This credit goes to you and that is the reason for volatility.  That is the reason why the country is being rocked.  Please understand this.  What is the reason for the situation becoming so volatile?  All the Governments had played with corruption. I do not blame this Government but I blame all the Governments who had come to power.  The Governments one after another played with the issue of corruption, had failed to bring about any law and had not taken the message of the people deep into their heart.  दुनिया में ऐसे ही चलता रहेगा कि हम मंत्री बनेंगे और सीबीआई को बोल देंगे, कुछ नहीं होगा और सब बच जाएंगे। They all believed in this.  That is why, the situation has become so volatile.  Why is the situation so volatile?  It is because the people are so impatient.  People are impatient because there is no money for food; there is no money for health but there is money to steal; there is money to loot; and there is money to be taken away… (Interruptions).  I am coming to that.  I would request you to be patient.  The dissent voice should be allowed. 

          The point is why Anna Hazare’s hunger strike has struck so heavily.  Why Anna Hazare’s hunger strike has provoked the whole nation to rise? क्या कारण है? It is not because of corruption but the Government’s inaction which has been put on focus.  The Government did not do anything.  That is why, the country is so agitated. 

          Sir, I plead for a Lokpal Bill.  Let us, for the first time, adopt an effective Lokpal Bill.  But I agree on one thing with the young Congress leader that by enacting Lokpal Bill, corruption cannot be eradicated.  There has to be a movement.  There has to be public intervention.  There has to be constant pressure of the people.  There has to be multiple action by the whole Government.  I believe there has to be a political will which is missing.

17.00 hrs. Today from this Parliament let us give the message that the Parliament is not oblivious of its responsibilities. Let us give the message that once for all we have taken the first step, enactment of the Lokpal is the beginning and not the end of the step. Let us give the message which will go down in the spines of the corrupt criminals. Let there be a pain in their spines. Let them feel that they cannot do whatever they like.

MR. CHAIRMAN : Please take your seat.

SHRI GURUDAS DASGUPTA : Sir, I am coming to my next point. I will take another two minutes. I want accountability. Without accountability there cannot be democracy – accountability of the Prime Minister; accountability of the Ministers; accountability of the Members of Parliament; accountability of the public servants and also accountability of the Judiciary. There has to be accountability of the Judiciary also… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Please do not interrupt. Let him finish.

SHRI GURUDAS DASGUPTA : What about corporate corruption? जो जनता का पैसा लेकर चोरी करते हैं।...( व्यवधान) Sir, may I ask you, what about the paid news in the media? Permit me two more minutes… (Interruptions) Sir, I am saying with humility that the role that the electronic media is playing about the developments in the Ramlila ground is not conducive to the responsibility that the media owes to the nation. You have seen as to what happened to the media in England?  The Baron of private media has fallen. What has happened to that? Therefore, let the Indian media take lesson from the worldwide experience… (Interruptions) What about the NGOs who are receiving foreign funds and also are receiving money from the Government? They do not submit accounts to the Government? What about them? Lokpal should be for the people in high place. There should be total freedom granted to the investigating agencies, but there should not be any political vendetta. Model law should be prepared for the appointment of Lokayukts for the States. The rights of the States should be respected in a federal structure. There should be special mechanism for the lower level bureaucracy.

While appreciating the hunger strike of Anna Hazare, I must politely tell him with folded hands to please withdraw his hunger strike and also to please ensure that the people who are around him do behave in a way which we expect from every citizen of this country. Lastly, I would like to say that let this Parliament, let this Session see the beginning of a new initiative by way of legislation for fighting against corruption. Let this be the first step and let this Government and the entire Opposition work together for bringing an end to corruption which is making it very difficult for the nation to function.

                       

ओश्रीमती ज्योति धुर्वे (बेतूल):   आज का दिन आने वाले इतिहास  का एक एतिहासिक दिन होगा आज जिस लोक पाल को पूर्ण रूप से शसक्त, स्वतंत्र, स्वच्छ और जन उपयोगी सुदृढ़ रूप दिया जा रहा है निश्चित ही ऐसा दिन आजादी के समय संविधान को बनाते हुए उसमें इसका पूरा स्थान पूर्ण जनउपयोगी जन हिताय के लिए तय कर दिया गया था, लेकिन शायद उसे उस समय से लागू न करना हमारे संविधान को और समाज को न्याय न देने के बराबर या उससे अधिक शायद शब्द की कमी होगी।  सन् 1960 से चलते हुए लोकपाल को लाना और उसकी आवश्यकता की कवायद करना शायद हमारी कार्य को गति, सोच और विचार को साफ साफ देश के सामने लाकर यह सिद्ध कर दिया कि यह आवश्यकता 1960 से हवा ही नही चली  तुंत मांग को पूरा करने उसके रूप को बहुत सारी कमियों को जोड़ कर मजबूत न्याय संगत जनउपयोगी लोकपाल तैयार करना ही एकमात्र उद्देश्य था यह आवाज ही नहीं थी  बारबार 1960, 1966, 1968, 1970, 1980, 1990, 2002, 2005, 2010-11 में क्या कारण था कि संसद की स्थायी समिति से लेकर संसद  तक लोकपाल की माँग पूरे 8 बार होती रही पर इसे आवश्यक महत्वपूर्ण न मानना सरकार की कही न कही कमजोरी एवं भ्रष्टाचार को दूर न करने का कारण साफ नजर आना सिद्ध नहीं होता ।

          संविधान में यह स्पष्ट तय किया गया कि जनता एक पूजा नहीं एक शासक होती है और उसके अधिकार का हनन संविधान के हनन के बराबर होगा ।लेकिन बढते हुए भ्रष्टाचार की अपार सीमा को पार करती हुई शायद यही वह तूफान या भूकंप को उजागर करती है कि लगातार एक के बाद एक होने वाले भ्रष्टाचार और बिगड़ती हुई न्याय व्यवस्था कही न कही आम जन और वह जनता जो बहुत ही दरिद्र गरीब, पीड़ित, असहाय, जिसका सामना उसे न जाने कितनी बार सहना पड़ता है कि शायद उसे इस भ्रष्टतंत्र से उसक विश्वास ही उठ चुका है ।

          आज देश का हजारे, लाखों, करोड़ों, अरबों रूपय देश् के बाहर के बैंकों में भरा  पड़ा है और जिस देश का पैसा है वही आज उस पैसों को वापस यदि लाने की माँग करता है तो फिर यह कैसे गलत सिद्ध किया जा सकता है इस सच को उजागर करना होगा और पूरी कठोरता के साथ् पूरे न्याय के साथ उन पैसे को देश लाना होगा जिससे इस देश का विकास किया जा सके  आज का उद्योगपित इसी भ्रष्टतंत्र को अपने मुनाफे का माध्यम बनाया हुआ है और पूरे देश पर राज कर रहा है हमें संविधान के उस अनुच्छेद   * Speech was laid on the Table का पालन कर हमें देश का इस उद्योगपतियों से मुक्त करना होगा तभी हम एक सशक्त लोकपाल स्वच्छ लोकपाल एवं शक्तिशाली लोकपाल बिल लाने में सफल होंगे ।

 

          हमें देश के विभिन्न राज्यों पूरे राज्यों में लोकायुक्त का गठन करना होगा जिससे हम राज्य से लेकर देश तक भ्रष्टाचार को दूर कर सकेंगें और तभी हम पूरे देश को विमुक्त भ्रष्टाचार से एक स्वच्छ देश का निर्माण करने में हमारी सफल भूमिका सिद्ध होगी ।

          आज चुनाव और चुनाव में होने वाले सभी भ्रष्टाचार वोट के बदले नोट की प्रथा को जड़ से मिटाना होगा ऐसी मानसिकता को पूरी ताकत से दूर करने के लिए हमें जितने संसाधनों की आवश्यकता होगी पूरा का पूरा उपयोग कर स्वच्छ मानसिकता का बीज बोना होगा तभी हम एक स्वच्छ मानसिकता का बीज बोना होगा तभी हम एक स्वच्छ समाज स्वच्छ शिक्षित विकसित देश का नवनिर्माण कर सकेंगे ।  आज हमें लोकपाल के लिए सभी मुद्दों को पूरे महत्वपूर्ण उदेश्यों और पूरी सर्वोच्च्ता के साथ हमें लोकपाल को लाना होगा जिससे संपूर्ण देश का पूर्ण विकास एवं विकसित राष्ट्र के निर्माण के लिए लोकपाल का प्रभावी बनाकर पूरी उद्देश्यों की सर्वोच्च्ता को तय करना होग ।  उन सभी मुद्दों में तीन की प्राथमिकता एवे सर्वोच्च्ता महत्वपूर्ण होगी जिसे पूरा देश स्वीकार कर रहा है और सबकी राय भी एक है क्योंकि वह सभी के लिए प्रभावी सशक्त करने का एक मात्र माध्यम है ।   नेशनल ज्यूडिशियल कमीशन  लोकायुक्त लोअर व्यूरोक्रेसी अर्थात संसद की सर्वोच्च्ता के साथ मैं अपनी सभी के एक निश्चत उद्देश्य के साथ इस लोकपाल बिल स्वच्छ, स्वतंत्र , सशक्त, शक्तिशाली लोक पाल बिल का समर्थन करती हूँ ।

 

*श्री हरिभाऊ जावले (रावेर)ःजैसा आदरणीय सुषमा जी ने कहा है कि देश और संसद की दृष्टि से आज का दिन एक ऐतिहासिक दिन है वैसे मुझे भी आज का दिन उज्जवल भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण लगता है।

        वैसे तो सदियों से हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं।  लेकिन 4-5 सालों से इसमें वृद्धि हुई है और आंकड़े भी ऐसे हैं कि हर एक नागरिक की नींद उड़ जाए।  2जी में 1 लाख 73 हजार करोड़, सीडब्ल्यूजी में 70000 करोड़ ऐसे आकड़ों ने हमारे युवा पीढ़ियों को जागृत कर दिया है।  इसी भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए आदरणीय अन्ना हजारे जी ने 12 दिनों से अपना अनशन शुरू कर दिया है।  अन्ना जी के विचारों से आज तक कई विधेयक सक्षम किए गए हैं और उनसे सामान्य जनता को राहत भी मिल रही है, जिसमें सम्पूर्ण सूचना का अधिकार, ग्रामसभा का अधिकार ऐसे महत्वपूर्ण विधेयक शामिल हैं         आदरणीय अन्नाजी सक्षम लोकपाल बिल (जनलोकपाल) बनाने के लिए सरकार को 6 महीनों से आग्रह कर रहे हैं, लेकिन सक्षम लोकपाल के लिए सरकार का अंदाजा साफ न होने से अन्ना जी ने अनशन शुरू कर दिया है।

        मैं मेरी तरफ से इस सक्षम लोकपाल (जनलोकपाल) जिसमें अन्ना जी ने 3 महत्वपूर्ण मांगें की है उसे सपोर्ट करता हूं।  मुझे लगता है कि इसी सक्षम लोकपाल से संपूर्ण देशभर में हो रहा भ्रष्टाचार समाप्त हो सकता है।  भ्रष्ट नौकरशाही को लगाम लग सकता है।  अच्छे काम करने वाले अधिकारियों को ताकत मिल सकती है और लोक प्रतिनिधियों को भी संस्कारित राजनीति करने की प्रेरणा मिल सकती है।

        आदरणीय सुषमाजी ने हमारी पार्टी की ओर से इस सक्षम लोकपाल बिल के जिस मुद्दे को समर्थन दिया है उसे भी मैं सपोर्ट करता हूं।  मुझे लगता है कि देश में ये सक्षम लोकपाल बिल लागू होना चाहिए।  मैं आज आदरणीय अन्ना हजारे जी को भी नम्र निवेदन करना चाहता हूं कि आप अपना अनशन समाप्त करें।  आपके स्वस्थ जीवन की हमें और देश के लिए भविष्य में और भी जरूरत पड़ेगी।  आप में इस आयु में भी जो प्रचंड इच्छाशक्ति हम देख रहे हैं उससे हमें भी एक अलग ऊर्जा मिल रही है।

        किसानों के लिए देश की गरीब जनता के लिए और भी हमें आपके आशीर्वाद की और प्रेरणा की जरूरत है।  मैं फिर एक बार इस सक्षम लोकपाल (जनलोकपाल) का समर्थन करता हूं।  

                               

*SHRI PRALHAD JOSHI (DHARWAD): -I am very happy that today we are witnessing a glorious history of a Parliamentary Democracy by upholding our constitution and reiterating the institution of Parliament and supremacy of Parliament. I reiterate and vouch for what our leader Sushma ji has already stated in her speech earlier. I also support the stand taken by my party by in principle acceptance of those three important aspects of proposed Lokpal Bill as expressed by Team Anna Hazare. There is not an iota of doubt that we need a strong independent Lokpal to fight corruption in the country. There is nothing wrong in demanding such a law by Civil Society people in spearheading this movement i.e., going on for two weeks with 74 Year Anna Hazare on indefinite fast.

But, what as a Member of Parliament I was concerned was who is to make this law. Is it Civil Society members or the Members of Parliament through the great mechanism of the institute of Parliament as created by our constitution? As is admitted by most of the senior Parliamentarians, Standing Committee, opposition leaders in both in Lok Sabha and Rajya Sabha and most of the senior citizens of the country, it is the Parliament which is supreme. With due respect to Anna Hazare who no doubt became iconic and rallying point for the masses in making this anti-corruption movement a strong voice but I will not be hesitant in saying that just by passing the law against corruption, this cancer of corruption will not be cured. We have already many social reforms enactments like Anti-dowry Act and prevention of untouchability enactment. Whether the dowry system is completely eradicated? Whether the practice of untouchability in the society has completely disappeared? So, what I like to impress upon this August House is that the element of corruption is inherent in the society and it is not the only kind of mechanism developed out of mere political set up as is the case being made out by "Team Anna' now agitating. If this is the stand of agitators, it is not fully correct. What is important is a strong will of the people to end the corruption. In this context, I like to express my deep anguish over some derogatory remarks made by some members of the agitation like all the MPs are thieves and dishonest and so on. This is really terrible and subversive of Parliamentary Democracy. I would like to record in this House my strong protest against such unparliamentary remarks and also urge upon these members of agitation not to resort to such filthy remarks against Parliament Members. I also remind these people that it is our Constitution and parliamentary system that has given the agitators the rights for them to agitate without which they could not have been on Ramlila grounds today to enjoy these rights to agitate.

With this, I once again express my support to what our Leader of the Opposition told with regard to acceptance of the three issues proposed by Team Anna to be included in the Lokpal Bill subject to the following:

(1) The supremacy of the constitution of India has to be maintained. Institutions of democracy cannot be undermined and the checks and balances visualized in the Constitution cannot be adversely affected.
(2) Laws have to be made by the Parliamentarians who are elected representatives of the country. Few nominated members of the Drafting Committee cannot have precedence over elected Members of Parliament.
   

*श्रीमती मीना सिंह (आरा)ःइस महान सदन के एक सदस्य के रूप में अपनी निजी राय रखने जा रही हूं।  जब मैं यहां आज आ रही थी तो मेरे मन में यह सवाल उठा रहा था कि आखिर आज इस विशेष चर्चा की जरूरत क्यों पड़ी?  आखिर माननीय अन्ना हजारे साहब को अनशन क्यों करना पड़ा?  आखिर आज देश इस दोराहे पर क्यों खड़ा है?  मेरे मन में जब यह प्रश्न उठा तो मेरे अन्दर से यह जवाब आया कि कहीं न कहीं हमने अपना कर्त्तव्य सही ढंग से नहीं निभाया, हमने पूर्व में चूक की है, उसी का यह नतीजा है कि आज यह हालात पैदा हुए हैं और हम यहाँ विशेष चर्चा कर रहे हैं।  हालात तो पूछिए मत, आज सभी सांसदों को देश चोर समझ रहा है।  हमें सार्वजनिक मंचों से गालियां दी जा रही हैं।  हमें गंवार कहा जा रहा है। भारतीय परम्परा के अनुसार जब हम सर पर आंचल रख के चलते हैं तो हमारा मजाक उड़ाया जा रहा है।

        यह बहुत ही विस्फोटक स्थिति है।  मैं अन्ना साहब का बहुत सम्मान करती हूं और उनसे कहना चाहती हूं कि यह देश आज जहां खड़ा है, आज हमारे देश में जो विकास हुआ है, वह इसी सदन एवं इसी संसद द्वारा संविधान के मर्यादाओं के बीच रहते हुए हुआ है।  हो सकता है हममें कुछ गलत लोग हों पर आप सबको गाली दीजिए, यह अधिकार अन्ना साहब के समर्थकों को किसने दिया?

        मैं समझती हूं कि हम चाहे जितने गंवार हों, चाहे हमारा जितना मजाक उड़ाया जाए, चाहे हमें जितनी गालियां दी जाएं, पर यह सदन हमारी बात से सहमत होगा कि आज विश्व में हमारे देश का अगर नाम है, अगर यह दुनिया हमारी ओर आशा भरी नजरों से देख रही है, तो वह इस सदन का, इसके सदस्यों की देन है, न की शराब के नशे में इंडिया गेट पर और रामलीला मैदान के पास हुड़दंग मचाने वाले, पुलिस की पिटाई करने वाले, ट्रैफिक नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले लोगों के कारण हुआ है।

        मैं पूरे सदन से यह आग्रह करती हूं कि हम एक ऐसा कठोर एवं प्रभावी लोकपाल बनाएं कि देश फिर से हम पर विश्वास करे।  हमारी संसद की प्रतिष्ठा बहाल हो।  ऐसा लोकपाल बने जिससे इस सदन की, हमारे संविधान की सर्वोच्चता बरकरार रहे।

        इन्हीं शब्दों के साथ, मैं अपनी बात समाप्त करूं , इससे पूर्व माननीय अन्ना साहब से आग्रह करना चाहूंगी कि अपना अनशन समाप्त करें, आपका जीवन बहुमूल्य है।  आप संसद पर, सांसदों पर विश्वास रखें, जरूर एक मजबूत लोकपाल बनेगा।

                               

*SHRI SIVARAMA GOUDA (KOPPAL): Corruption is one of the biggest diseases like cancer, it is increasing day by day, that is the reason today Shri Anna Hazare ji is sitting on fast.  That is why all common people of India has strong backing of Shri Anna Hazare ji.  This is my personal view and urge the Government to make and bring a strong Lok Pal Bill.  This is not the first time we have introduced the Bill, even in the last 43 years we brought this Bill eight times before this House, but unfortunately it was not passed.  Again the Lok Pal Bill has been brought by the force under the leadership of Anna.  Since two years, the country has seen so many scandals, not only in lakhs of rupees it is in the figure of lakh crores.  Common people know from the media and totally in the minds of people, all politicians and bureaucrats are involved in big scandals and scams as per the report of the CAG like 2G spectrum, CWG, G.K., Air India and black money in Swiss Bank. After the independent movement, our country has seen the big protest from the nook and corner of the country, from children’s to old age people, poor to richest persons, students to lecturers and all the intellectual class.  The big protest and hunger strike in Ramlila maidan, Delhi by Shri Anna was supported because everyone is fed up with the corruption.

          The Lokpal should be strong, independent and autonomous body, and the Prime Minister should come under the Lokpal, and it should not be against Constitutional provisions, section of Indian Penal Code and also provisions of Corruption Act.  It should be exempted from National Security and public order. For judiciary, the Judicial Accountability Bill will be introduced in this House, Judicial Commission will also be set up and judiciary cannot be covered by the Lok Pal.  The CBI also comes under this Bill, with autonomous institutions not covered by the Government.  The Constitution has given immunities to the MPs to be protected inside the Parliament.  Governors of States should be covered in the Lokayukta, and also media should come under this Lok Pal.

          With so many years’ wait, the Lok Pal Bill is to be brought as a stronger  and independent Bill.

 

*प्रो. रामशंकर (आगरा)ःआज लोक सभा में लोकपाल के विषय को लेकर चर्चा हो रही है।  हमारी नेता आदरणीय सुषमा जी ने अन्ना जी के आन्दोलन के विषय के साथ उनके तीनों विषयों पर अपनी राय स्पष्ट की है।  मैं भी उनके द्वारा उठाए गए विषयों का समर्थन करता हूं।  आज देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आम आदमी सड़क पर खड़ा होने को मजबूर हुआ है। आज इस भ्रष्टाचार के कारण बढ़ती हुई महंगाई ने आम आदमी को उद्वेलित ही नहीं किया बल्कि आन्दोलन को सड़क पर लड़ने के लिए मजबूर किया है।  पिछले 2-3 वर्षों में लगातार हो रहे घोटालों और उन घोटालों से करोड़ों रुपयों का जो खुलासा हुआ है उससे आम आदमी और वा आदमी जिसको पानी, रोटी और दवाई से अपने आपको जूझता हुआ मानता है फिर भी उसे कोई कहीं राहत नहीं, न ही उसे कोई आशा दिखाई देती है वो आज सड़क पर है।  अन्ना जी ने जो आन्दोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाया है, जो आम आदमी को अपने हकों के लिए लड़ने की और सड़क पर उतर कर ताकत के साथ लोकतांत्रिक तरीके के साथ एकजुट होने की सिद्धता दी है, उसके लिए उन्हें आभार व्यक्त करता हूं।  

        आज आम आदमी और वो आदमी जो आजादी के 64 वर्ष बीत जाने के बाद भी अपने मूल अधिकारों को प्राप्त नहीं कर सका वह आज दुखी है।  केवल भ्रष्टाचार से ही नहीं बल्कि सामाजिक असमानता एवं सभी की समान भागीदारी के विषय पर दुखी है।  आज जो सरकार ने सरकारी लोकपाल प्रस्तुत किया है वह भ्रष्टाचार एवं न्याय से लड़ने में पूरी तरह अक्षम है।  जो जनलोकपाल है उसमें भी आवश्यक है कि जो व्यवहारिक एवं राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे से दूर है उसे पुनः विचार कर देश के हित में शक्तिशाली एवं प्रभावी लोकपाल बिल पास हो।  यह हमारी सरकार से मांग है।  इस लोकपाल बिल के चयन के संबंध में अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं है।  हमारी राय है कि जो समाज आज भी अशिक्षा, अपने अधिकारों और आने हकों से बहुत दूर है उसे न्याय मिले।  इसके लिए आवश्यक है कि जो लोकपाल बिल के सदस्य बनें उसमें उस समाज का जरूर प्रतिनिधित्व हो जो आज पिछड़ा है, उपेक्षित है।   प्रश्न वही न उठे कि उस समाज में उस स्तर का व्यक्ति ही नहीं।  यदि ऐसा होता है तो यह दुर्भाग्य की बात होगी कि आज आजादी के इतने दिनों के बाद भी उस समाज को अवसर नहीं मिला।  यह चित्र इस समाज का यथार्थ दर्पण होगा।  आज प्रश्न उठता है कि न्यायपालिका में कितने अनुसूचित एवं जनजाति के लोग हैं, यदि नहीं, तो क्यों?  कौन जिम्मेदार है?  आज पूरे देश में, विश्वविद्यालयों में कितने प्रोफेसर इस समाज से हैं।  क्यों नहीं अतिरिक्त पदों को अभी तक भरा गया।  इन सभी प्रश्नों का उत्तर समाज चाहता है।

        अन्ना हजारे के आन्दोलन का समर्थन करते हुए आम आदमी को अधिकार और समानता का हक मिले तथा इस भ्रष्टाचार, महंगाई से देश को मुक्ति मिले।  इसलिए देश और देश की जनता के हित में प्रभावी एवं ताकतवर लोकपाल बने, यह मांग करता हूं।  

                   

*श्री राजेन्द्र अग्रवाल (मेरठ) ः जनलोकपाल बिल के मुद्दे को लेकर श्री अन्ना हजारे के अनशन का आज बारहवां दिन है, सम्पूर्ण सदन उनके स्वास्थ्य को लेकर चिन्तित है तथा सदन ने उनसे अपना अनशन समाप्त करने की अपील की है।  पिछले कई घंटों में माननीय नेता, प्रतिपक्ष तथा विभिन्न दलों के माननीय नेताओं तथा सांसदों द्वारा लोकपाल बिल के विभिन्न पक्षों पर चर्चा की गई है तथा जिन तीन बिन्दुओं की चर्चा श्री अन्ना हजारे ने की है उन पर एक आम सहमति सदन की चर्चा में निकलकर आई है।  मैं इसका अभिनंदन करता हूं तथा आशा करता हूं कि आज की इस ऐतिहासिक चर्चा के परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार से लड़ने में सक्षम एक मजबूत एवं प्रभावी लोकपाल देश को प्राप्त होगा तथा श्री अन्ना हजारे भी अपना अनशन समाप्त करेंगे।

        इस आम सहमति को पहले भी प्राप्त किया जा सकता था, परन्तु यूपीए सरकार तथा कांग्रेस पार्टी द्वारा पिछले दिनों किए गए व्यवहार से समस्या उलझती गई। मुझे ऐसा लगता है कि यह सरकार जिसका नेतृत्व कांग्रेस पार्टी कर रही है, भ्रष्टाचार को लेकर एक प्रकार के अपराध बोध से ग्रस्त है जिसके परिणामस्वरूप सरकार तथा कांग्रेस एक दुविधा में दिखाई देती है।  कभी ये आन्दोलन करने वालों से बात करते हैं, कभी उन्हें धमकाते हैं तथा फिर यह बताते हैं कि आप भी हमारे जैसे ही भ्रष्ट हैं, आपको हमारे खिलाफ आवाज उठाने का क्या अधिकार है।

        पिछले दिनों में यही होता रहा है।  स्वामी रामदेव आन्दोलन करते हैं तो पहले सरकार के वरिष्ठतम मंत्री उनका स्वागत करते हैं, उन्हें अपने अनुकूल करने की कोशिश करते हैं तथा वह नहीं होता तो मध्य रात्रि में सरकारी दमन की लाठी उन पर चलती है।  लगभग यही सब अन्न हजारे के साथ भी हुआ है।  उन्हें अनशन के लिए जगह नहीं दी जाती, संख्या व समय पर बंदिश लगाई जाती है, उन्हें भ्रष्ट बताया जाता है तथा सम्पूर्ण आन्दोलन को कुचलने की कोशिश की जाती है।  ये सब बातें सारा देश जानता है तथा सदन में भी ये विषय आए हैं अतः इन्हें मैं दोहराना नहीं चाहता।  कुल मिलाकर इन सब कारणों से देश की जनता में यह संदेश गया है कि यह सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने के प्रति गंभीर नहीं है।  संकट सरकार की विश्वसनीयता का है।  सरकार के प्रति विश्वसनीयता के इस संकट की सीमा में संसद तथा सांसद भी आ गए हैं।  सम्पूर्ण राजनीतिक तंत्र के ऊपर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।  कल कांग्रेस के युवराज पधारे थे।  15वीं लोकसभा को पहली बार उनके अमृत वचन सुनने को मिले, उन्होंने देश का मार्गदर्शन किया तथा फिर वे चले गए।  आज यह बहस हो रही है परन्तु "युवराज" यहां नहीं है।  उनके भाषण पर तालियां बजाने वाले बड़े मायूस हैं, उन्हें यहां होना चाहिए था।  उनकी अनुपस्थिति यह जाहिर करती है कि कांग्रेस का नेतृत्व लोकपाल के संबंध में कितना गंभीर है।  

        आम आदमी भ्रष्टाचार से त्रस्त है। इसके अनेक उदाहरणों का उल्लेख माननीय सदस्यों ने अपने भाषणों में किया है।  आज कदम-कदम पर भ्रष्टाचार है।  निर्धन वर्ग के लोग मेरे पास आते हैं अपनी आय का प्रमाण पत्र बनवाने के लिए।  शुरू-शुरू में मैंने एक से पूछा कि आय का प्रमाण-पत्र तो तहसील के कार्यालय में बनता है, वहां क्यों नहीं जाते?  मैं तुम्हारी आय कैसे प्रमाणित करूं?  उसने बताया, सांसद जी हम तहसीलदार के कार्यालय में जाते हैं तो वहां का 300 रुपए का रेट है, हम कहां से लाएं। अब मैं थोड़ी पूछताछ करके आय प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर कर देता हूं।  इस भ्रष्टाचार के कारण गरीब मजबूर है, अध्यक्ष जी मैं भी मजबूर हूं।  यह स्थिति सब जगह है।  इससे राहत मिलना जरूरी है अन्यथा इस लोकतंत्र का क्या होगा?

        इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि संसद सर्वोच्च है।  अन्ना हजारे भी इनकार नहीं कर रहे हैं परन्तु देश के लिए कानून बनाने वाली संसद की यह भी जिम्मेदारी है कि वह जनता की आवाज को सुने, उसे समझे तथा जनाकांक्षा के अनुरूप कानून का निर्माण करे।  आज मजबूत व प्रभावशाली लोकपाल बिल देश की जरूरत है।  यह लोकपाल बिल कैसा हो, इसकी सीमा में कौन-कौन आए, लोकपाल का चयन कैसे हो, इन सब मुद्दों पर नेता प्रतिपक्ष श्रीमती सुषमा स्वराज ने विस्तार से प्रकाश डाला है।  लगभग सम्पूर्ण सदन ने उनके विचारों से सहमति प्रकट की है।  मेरा आपसे अनुरोध है कि जनलोकपाल बिल के आधार पर देश में मजबूत व प्रभावशाली लोकपाल के सृजन का मार्ग प्रशस्त किया जाए तथा संसद जनाकांक्षाओं की प्रतिबिंब बने।  

                                     

*श्री सी.आर. पाटिल (नवसारी)ःहिन्दुस्तान में कई महीनों से देखा गया है कि भ्रष्टाचार की वजह से जनता तंग आ गई है और इसलिए श्री अन्ना हजारे जी के आंदोलन में देश भर के लोग जुड़ गए हैं।  कुछ दिनों पहले बाबा रामदेव जी ने कालाधन वापस लेने के लिए दिल्ली में अनशन शुरू किया था।  वहां पहले तो कुछ सरकार के मंत्रियों ने उनको समर्थन दिया परन्तु शाम ढलते-ढलते परिस्थितियां बदल गईं और उनकी सरकार के कहने पर पुलिस ने उन्हें जबर्दस्ती उठा लिया तथा उनके समर्थकों को लाठियों से पीटा।  मगर सरकार को जानना चाहिए कि ऐसे आंदोलन लाठी-गोली से दबाए नहीं जाते। पूरी देश की जनता जान गई है कि भ्रष्टाचार की वजह से लोग घर से बाहर सड़क पर उतर आए हैं।

        हम भी अन्ना जी के लोकपाल बिल के साथ सहमत हैं। हमारी नेता श्रीमती सुषमा स्वराज जी ने जो बयान सदन में दिया, जिसका हम पूर्ण रूप से समर्थन करते हैं।  लोकपाल और लोकायुक्त बिल में राज्य के गवर्नर को भी शामिल किया जाना चाहिए।   सिर्फ भ्रष्टाचार ही नहीं किन्तु नियमों को तोड़-मरोड़कर किसको फायदा या नुकसान में पहुंचाने वाले अधिकारियों को भी लोकपाल बिल में सजा और दंड की व्यवस्था की जानी चाहिए।  

             

*श्री हुक्मदेव नारायण यादव (मधुबनी):भ्रष्टाचार के कारण का निवारण होना चाहिए। भ्रष्टाचार के स्वरूप को जानना होगा। आर्थिक, बौद्धिक, प्रशासनिक, व्यावसायिक, सांस्कृतिक और तकनीकी भ्रष्टाचार  पर समग्रता से विचार करना होगा। प्रथम और सबसे बड़ा कारण जाति प्रथा है। जाति प्रथा के गंदे कूड़े पर भ्रष्टाचार के कीड़े जन्म लेते हैं, पलते हैं, बढ़ते हैं और समाज को चाटते हैं। भ्रष्टाचारियों को जाति द्वारा संरक्षण तथा समर्थन मिलता है। इसे कैसे मिटाया जा सकता है? एक उपाय है कि सरकारी नौकरी और सरकारी सुविधा के लिए अंतर्जातीय विवाह को अनिवार्य कर दिया जाए। 100-50 साल में जाति प्रथा का नाश हो जाएगा और एक नया समाज बनेगा जो भारतीय होगा। क्या संसद ऐसा साहस दिखा सकती है। मुझे लगता है कि हम घबरा जाएंगे। जब तक लोग भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहते हैं तब तक अपने निर्णय द्वारा पक्षपातपूर्ण तरीके से राजनीति को लाभ पहुंचाते रहते हैं। लोभ और भय के कारण लोग पाप करते हैं। उन्हें लालच रहता है कि सेवानिवृत्ति के बाद लाभ का पद मिल जाएगा। बड़े औद्योगिक एवं व्यावसायिक घरानों को लाभ पहुंचाते रहते हैं कि सेवानिवृत्ति के बाद उन घरानों द्वारा लाभ का पद मिल जाएगा। आज कैबिनेट सचिव, चुनाव आयोग के आयुक्त, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश राजनीतिक निर्णय का लाभ उठाते हैं। संसद सदस्य बनाए जाते हैं, मंत्री बनाए जाते हैं, राज्यपाल और राजदूत बनाए जाते हैं तथा सरकारी उपक्रमों में निदेशक एवं प्रबंध निदेशक सह अध्यक्ष बनाए जाते हैं। औद्योगिक एवं व्यावसायिक घरानों द्वारा निदेशक और सलाहकार बनाए जाते हैं। पदासीन होने के बाद विभाग के अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा उस घराने को लाभ दिलवाते हैं। मंत्रालय में उनके पक्ष में नीति बनवाने का काम करते हैं। स्वयंसेवी संस्था उनकी पत्नियों और परिवार वालों द्वारा चलाई जाती हैं, जिन्हें काम देकर लाभ पहुंचाते हैं, विदेशों से धन दिलवाते हैं। इस भ्रष्ट तंत्र का नाश कैसे किया जा सकता है? सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी या गैर सरकारी किसी संस्था में नियुक्त न किया जाए, सलाहकार या अवैतनिक पद पर न रखा जाए। इस तरह से प्रशासनिक भ्रष्टाचार का अंत हो जाएगा। सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को भी किसी सरकारी आयोग, बोर्ड या संगठन तथा निजी क्षेत्र में नियुक्त नहीं किया जाए।

          बड़े घरानों द्वारा रंग बिरंगे टीवी चैनल चलाए जाते हैं। इसमें कालाधन लगाया जाता है। अपने चैनल द्वारा अपनी कंपनियों के उत्पादों का प्रचार करवाकर आयकर की चोरी करते हैं, प्रचार करवाकर लोगों का शोषण करते हैं। स्टिंग आपरेशन द्वारा पिछड़े, दलित और निर्बल समाज के सांसदों तथा जन प्रतिनिधियों का चरित्र हनन करते हैं। अभी तक ऐसा ही हुआ है। भयग्रस्त  प्रशासनिक अधिकारियों   * Speech was laid on the Table का शोषण करते हैं। इसलिए इस पर नियंत्रण होना चाहिए तथा भ्रष्टाचार को रोकने का उपाय किया जाना चाहिए। इसी तरह चुनाव के समय समाचार पत्रों में समाचार के नाम पर विज्ञापन कराकर पैसा लेते हैं। विज्ञापन पर टैक्स लगेगा, समाचार बनाकर छापने पर टैक्स नहीं लगेगा, यह भी एक प्रकार का भ्रष्टाचार है।

          देश में स्वयंसेवी संगठनों द्वारा 2005-06, 2006-07, 2007-08 में 28,879 करोड़ विदेशी धन लिया गया और केवल दिल्ली में 5480 करोड़ रुपया आया है। भारत नेपाल सीमा वाले प्रदेशों में शिक्षा के नाम पर 1104 करोड़ तथा भारत बांग्लादेश की सीमा वाले प्रदेशों में 1874 करोड़ रुपए लिए गए। 87 संगठनों के विरुद्ध कार्यवाही की गई। इस तरह से विदेशी धन का प्रभाव बढ़ा है। विदेशी धन, विदेशी संस्कृति और विदेशी गुप्तचर तंत्र भयावह बन गया है। विदेशी शक्तियों खास तौर से आईएसआई ने अपना जाल फैलाकर उग्रवाद और आतंकवाद को फैलाया है। वे उनका पक्ष लेते हैं, इसकी जांच कराई जाए। सरकार श्वेत पत्र जारी करे। एक उच्च स्तरीय आयोग बनाए जो इसकी निगरानी करे और निरंतर उनके कार्यकलापों की जांच करे। इसमें बहुत एनजीओ हैं जो सरकारी अधिकारियों और औद्योगिक एवं व्यावसायिक घरानों द्वारा चलाया जाता है।

          संविधान और संसद के अधिकार की सीमा में रहकर ही बुनियादी परिवर्तन किया जा सकता है। सतत क्रंति के द्वारा ही ऐसा हो सकता है। देश के हर काम में पिछड़े वर्ग, दलित और अल्पसंख्यकों को समान भागीदारी दी जाए। हर पद पर उन्हें बिठाया जाए और अवसर दिया जाए। जब 85 प्रतिशत लोगों को उठाया जाएगा तो देश बलवान बनेगा और भ्रष्टाचार भी रुकेगा।

 

*SHRIMATI YASHODHARA RAJE SCINDIA (GWALIOR): My political life started in the Jai Prakash Narayan People’s Movement of 1975 on my birthday. It was the second time in India after the ‘Satyagraha Movement’ that the common man (aam admi) came out in lakhs to join Hon. Jai Prakash Narayan Ji in his cause.  My mother’s house in Purana Qila Road became the hub of the JP Movement.  I was able to see at very close range, how the people of India could humble the Government on issues that needed to be addressed.  For the 3rd time in Indian history, we are seeing the common man came out in crores to join Anna Hazare Movement against the widespread corruption in India.

          We must first address the root of this present movement. What is the movement addressing – corruption?   It is not that corruption has never been present in this country.  But the last several months have seen a BHOUCHAR of scams -- with no end in sight; waiting in the wings are some more CAG reports where some more Ministers will go to Tihar.

          There is always a ‘time’ for everything.  It is not that corruption was not present.  It is not that CAG was not present.  It is because there is more and more transparency -- that the wheel of probity is turning -- it is not just a corruption of money, but it is also a corruption of mind.  Please do not think that corruption will end with a Lokpal Bill in whatever form it finally comes.

          We have to bring 100 per cent literacy into this country -- only then we can tackle corruption of mind and corruption of society. Parliament passed the Panchayati Raj Bill to give empowerment to the rural India.  But look at the corruption at the lower level.  SARPANCHES, MAHILA SARPANCHES and their SARPANCH PATIS, NAGAR PALIKA ADHYAKSHON,GRAM SABHA SACHIVON -- unless we keep pushing to improve infrastructure, agriculture and   * Speech was laid on the Table     literacy in each and every village -- because of the poverty and the rush of money coming in at the PANCHAYAT level there will be corruption, and because of the Panchayat being flushed with funds, the lower Government officials (the BDO’s, the TEHSILDAR/PATWARIS) all want a slice of the pie.  So one can understand the necessity of bringing the lower Government officers under the purview of the Lokpal or Lokayukta.

          In summation, the situation that is playing out today is only because the Government did not take the necessary steps to curb the money making and the corruption, once the scams started tumbling out.  If the Government had taken the necessary steps early enough all this pressure to eradicate corruption would not have come about.

          The Government has to be humble enough to realize its grave mistakes.  It has to be humble enough to consult with Parliament and with the Opposition much more than what it is doing.  It has to be humble enough to take suggestions during Parliamentary Debates -- from its Members, as we move among the public and are only putting up suggestions that the public wants.

          My Leader of Opposition put out Party’s stand very succinctly in front of Parliament today.  We are all for a corrupt free country but we must take steps keeping in mind the Constitution of our country.  There are no two ways on the issue of making a strong Lokpal Bill – we are all together on this.

          Thank you for giving me the chance to give my views in this august House.

                                                                                                   

*डॉ. संजय जायसवाल (पश्चिम चम्पारण):  पिछले 12 दिनों से जो आन्दोलन चल रहा है उसे लेकर हम सब चिंतित हैं।  माननीय अन्ना हजारे जी ने देश की सबसे ज्वलन्त समस्या को उठाया है और यह पूरा देश उनके साथ है।  चूंकि माननीय प्रणव मुखर्जी जी ने तीन ही प्रमुख मुद्दों पर सदन की राय मांगी है।  अतः मैं उन्ही बिन्दुओं पर बोलूंगा।

        2001 में जब लोकपाल बिल आया था और इस पर चर्चा हुई थी कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में रखा जाए या नहीं, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने स्वयं को इसमें शामिल कर सभी चर्चाओं को विराम दे दिया था।  आज के सदन के नेता माननीय प्रणव मुखर्जी उस समय स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन थे और उन्होंने भी इसका समर्थन किया था।  फिर आज जब हर बड़े घोटाले में प्रधानमंत्री कार्यालय की चर्चा चल रही है और यहां तक कि भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार नेता प्रधानमंत्री को गवाह के रूप में बुलाने की बात करते हैं, प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना सर्वथा अनुचित है।  हां, प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय सुरक्षा एवं अन्य राष्ट्रों से भारत के संबंध जैसे निर्णयों को लोकपाल से अलग रहना चाहिए।

        मेरा यह भी मानना है कि लोकपाल बिल को एक ऐसे मॉडल के रूप में आना चाहिए जिसे लोकायुक्त के रूप में राज्य फॉलो कर सकें।

        आज निचले स्तर पर भ्रष्टाचार से सभी नागरिक पीड़ित हैं।  अतः हर हालत में निचले वर्ग के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में आना चाहिए और इन पर राइट टू सर्विस एक्ट के तहत प्रत्येक काम को  निपटाने हेतु एक नियत समय देना चाहिए तभी आम आदमी को भ्रष्टाचार से छुटकारा मिल सकेगा।  जहां तक न्यायपापलिका का सवाल है उनके लिए एक अलग ज्यूडिशियल रिफार्म बिल लाना चाहिए जो काफी सख्त होना चाहिए। ज्यूडिशियरी  में भी आज भ्रष्टाचार है।  यह बात सभी को मालूम है पर जजों पर कार्यवाही के नियम इस तरह के हैं कि आज तक किसी को भी सजा नहीं मिल पाई है।

        मेरा यह भी मानना है कि लोकपाल बिल के भीतर एन.जी.ओ., कॉर्पोरेट और मीडिया को भी शामिल किया जाना चाहिए।  इनमें भी बहुत ज्यादा भ्रष्टाचार व्याप्त है पर इनके खिलाफ बिल में किसी भी प्रकार के प्रावधान नहीं रखे गये हैं।

        हमें यह भी सोचने की जरूरत है कि अगर लोकपाल भ्रष्ट हो जायेगा तब इसके कितने खतरनाक नतीजे निकल सकते हैं।  अतः लोकपाल बिल में यह भी शामिल होना चाहिए कि लोकपालों के भ्रष्टाचार की जांच किस एजेंसी द्वारा होगी तथा इनके लिए  सजा का प्रावधान आम नियमों से दोगुने कड़े होने चाहिए।  अगर इस प्रावधान को नहीं लाया गया तो मुझे यह भी डर है कि लोकपाल के द्वारा भ्रष्टाचार के एक और काउंटर की वृद्धि हो जायेगी।

        मैं सरकार से यह अनुरोध करता हूं कि माननीय प्रणव मुखर्जी द्वारा उठाये गये तीनों प्रावधानों को लोकपाल बिल में शामिल किया जाये और साथ ही माननीय श्री अन्ना हजारे जी से अनुरोध करता हूं कि आज पूरी पार्लियामैंट उनके आन्दोलन के साथ है।  अतः वह इस देश की संसद पर भरोसा रखें कि एक सशक्त लोकपाल बिल आयेगा और अपना अनशन समाप्त करें।

           

*श्री बाल कुमार पटेल (मिर्जापुर):  यह सच है कि भ्रष्टाचार ने इस देश के आम लोगों का जीना हराम कर दिया है।  आजादी के 64 साल बाद भी इस बीमारी के लिए कोई इलाज हमारे सामने नजर नहीं आ रहा है।  इसके लिए हम सब राजनीतिक व सरकारी लोग जिम्मेदार हैं। इसके साथ-साथ इस देश का नागरिक भी जिम्मेदार है।  इसलिए हम सब मिलकर अच्छी सोच से इस बीमारी का इलाज कर सकते हैं।

        हम लोग एक द्वंद मुद्दे पर इस सदन में चर्चा कर रहे हैं।  क्या अन्ना हजारे टीम द्वारा इस सरकार के सामने रखे तीन अहम मुद्दों को लोकपाल बिल में शामिल किया जाए या नहीं इस विषय में हर पार्टी के अलग-अलग मत है।  लेकिन जो भी किया जाए संविधान के अंतर्गत ही किया जाए और जो भी बिल पास करना हो संसद की संसदीय कार्य प्रणाली के अंतर्गत होना चाहिए नहीं, तो इस देश में अराजकता फैल जाएगी।  इस स्थिति को रोकने का दायित्व हम सबके कंधों पर है।  

        इसलिए, मैं अपने सारे साथियों से अनुरोध करूंगा कि जो भी फैसला लेना हो संविधान के अंतर्गत हो और संसद की संसदीय कार्यप्रणाली के अंतर्गत हो।

        इन्हीं शब्दों के साथ मैं सरकार से अनुरोध करूंगा कि एक मजबूत व सक्रिय लोकपाल बिल इस संसद में पेश किया जाए।  इसमें अन्ना टीम के विचारों और अन्य सामाजिक समितियों के विचारों को ध्यान में रखते हुए इस देश से भ्रष्टाचार दूर करने के लिए हम सब प्रयास करें।

           

SHRIMATI HARSIMRAT KAUR BADAL (BHATINDA):  Madam Chairman,                  जो उठे हैं इंकलाबों के लिए, वो अब न सोएंगे ख्वाबों के लिए,                 जाग उठा है समंदर नींद से, अब हवा भी बन चुकी तूफान है,                  देख खिड़की खोलके बाहर अभी, खड़ा है सवाली हिन्दुस्तान में सभी।

 

Corrupt Government, corrupt politicians not serious about weeding out corruption and lacking in political will are the common refrains on the lips of every Indian today. I must admit that our conduct for the last few days has done nothing to remove this perception from the minds of the people.  Neither have we been able to assess the extent of their anger nor have we been able to address their grievances. In fact, our rigid stand has only worked in a manner that has alienated them further and made them more firm in their resolve to make sure that their demands are met at any cost and their protests do not fall on deaf ears.

          I believe that, first of all, we need to remember that we have been sent here for the people.  We have been sent here by the people and just because we have reached here does not make us any superior or smarter than those very people who have sent us here.  Not one of us would be here without the backing of those millions.  If those millions are making a demand, let their demand be right or wrong, then why should we not voice their demand in this House and then use our Parliamentary right to legislate such a law that will achieve the desired results of their demand? 

          But, unfortunately, instead of doing that, what have we done in the last so many weeks? We have tried to use secrecy, deceit, mishandling, and misconceptions have reigned supreme in the last few weeks to the extent that our people have totally lost faith that any politician here is even interested in weeding out corruption.  In fact, they believe that we are the fountainheads that abet and encourage this very corruption.

           Today, we face this historic challenge because everything we say today is going to send out a message to the people of our nation at a time when our credibility is at an all-time low.  But more important than that is, at the end of the debate, the law that we legislate is probably going to be our final chance to redeem ourselves in the eyes of the people and re-win their trust again. 

          So, I urge everybody here that instead of just doing lip service, let our action speak louder than our words today.  In a time bound manner, with a time limit and date set, let us come out with a strong commitment for a strong, precise and a decisive Lokpal Bill which will root out this cancer of corruption and restore the credibility for which this Parliament actually works honestly to deliver the promises to the people and their demands.

          I salute Shri Anna Hazare and fervently appeal to him to end his fast.  We all stand committed to what he is trying to eradicate.  I specially admire him for his ideals and for awakening the sleeping conscience of this nation.  His convictions are a source of inspiration to me which shows how you must stand on your beliefs when your beliefs are firm.

          While I fully support the spirit of his Jan Lokpal Bill, I hope that a clear and decisive mandate will emerge from this Lok Sabha today.  I would also like to make a few suggestions.

          The Jan Lokpal Bill will work effectively to punish the corrupt and in a way deter corruption, but it will come into being only after a complaint or a corruption is done.  What is necessary today - and it is equally important - is to not only give timely and just punishment to the people who are doing corruption but also address those areas and put in place an important system that weeds out corruption. It is only when a Government addresses those grey areas that breeds corruption, that is when we can enhance our effort by putting a Lokpal Bill which will punish the corrupt and overall corruption can be rooted out.

          Today the billion plus people of our country are not affected by the top level corruption.  What affects them in their daily lives is when they have to get their daily needs, like the ration card or a gas connection or a water connection or get admission in the school or electricity connection, they have to grease somebody’s palms, pay a bribe to get these things.  That is what harasses them.

          That is why it is necessary that when the result of every interaction with the police or bureaucracy or administration is directly dependent on the amount of bribes that person gives, we must make sure that this need of the billion plus people is addressed.  Why should I just say politicians or bureaucrats? Today, be it an educationist or a lawyer or a doctor or business tycoons or NGOs or media houses – every segment at any level – there is corruption.  There is corruption in each and every segment of our society. We cannot just pinpoint anyone because it is there across all sections of our society.  Corruption is there even in Schemes like the Indira Awas Yojana for the homeless or old age pension for the poor or even in MGNREGA.  Even in these Schemes, they do not get their rights without paying bribes. This is the extent of corruption in our country.

          The corrupt get richer using their ill-gotten wealth, tweak the justice system, get judgements in their favour, get favourable Government contracts, get admissions, get their jobs done.  They murder the entire system at the cost of the country. Only if there is a strong political will to change the systems that breed corruption will there be a comprehensive way to end corruption.

          If the Government is committed to rooting out corruption, it must first pinpoint all these grey areas and then take serious action in eradicating these interfaces which lead to corruption.

MADAM CHAIRMAN : Hon. Members, please keep quiet.

SHRIMATI HARSIMRAT KAUR BADAL :   I would like to give you an example. Why did the 2G scam or the CWG scam take place? It took place because the Ministers and the bureaucrats have certain discretionary powers. They use these discretionary powers to tweak the things in such a way that a favoured few could get favours from them. This led to momentous corruption.  What needs to be done is that powers of these Ministers and bureaucrats must be taken away so that these powers are not there which give rise to corruption.

          I would be happy to let you know that in my State of Punjab, we have removed and eliminated all these processes where Ministers and bureaucrats have the power to make these decisions.  We have started a policy of e-tendering for all Government tenders above the limit of Rs. 5 lakh. Any one sitting anywhere in the world can bid for a scheme on-line without having to go to a Minister or a bureaucrat to get a favour. This has eliminated the unnecessary interface between the Executive Engineers, the bureaucrats and the Ministers. The bids have become so competitive that we have almost saved thirty per cent of the amount of the projects.

          On 15th August of this year, the State Government of Punjab has implemented a Right to Service Act 2011 which makes the civil servants and the police accountable to the citizens of Punjab. There are 67 services of the Government, related to the Departments of Revenue, Housing, Police, Transport, etc. where the officer is liable to deliver the services in a limited time frame.  Failing to do so, he has to not only pay a penalty or be penalised, but also will be suspended and lose his job. Thus making the officers, the bureaucracy, accountable to the aam aadmi and making the aam aadmi the king of his rights and giving him the rights as a citizen.

          I will give you a small example, if you would allow me. These are the things which have been implemented, which can be used in the rest of the country.  Today, if you need permission for using even a loud speaker, you have to go to the police; you have to make many trips, and probably bribe someone.  But in Punjab, you can seek this permission on-line and get it via your computer. If you need a driving license or register a vehicle, you have to go DTOs or RTOs.  But in Punjab, the place where you purchase the vehicle, now that dealer can give you the registration.  All the rights of the DTOs and the RTOs have been taken away.

          If anyone wants to get his land records, he has to take umpteen number of trips to either the Tehsildar or the Patwari. You know how corrupt they are. In Punjab we have computerised all land records so that any farmer, any land holder sitting in any part of the world, can go on-line and get his records. … (Interruptions)

सभापति महोदया : हम हाउस में एक बहुत गम्भीर विषय डिस्कस कर रहे हैं, कृपया शांत रहिये। मि.बादल, अब आप वाइंड अप करें।  

SHRIMATI HARSIMRAT KAUR BADAL : The point that I am trying to make is that we need to identify the areas that breed this corruption.  Then, we need to remove the interfaces that create this corruption and after that we need to bring in a very strong Lokpal Bill which punishes the corrupt.

          I welcome the Jan Lok Pal Bill and the three points of the Citizens Charter and the public grievances and including the lower level bureaucracy is already a part of our Right to Services Act which has already been implemented in Punjab.  We already have the Lokayukt Act.

          The only few suggestions which I would like to give for this Lokpal Bill is that let the salaries of these employees be such that they are not tempted to resort to corruption to meet their basic needs in these times of extreme inflation. 

          I also suggest that if Lokpal or their officers are held guilty of any misconduct or dishonest investigations receive severe punishments because with the powers that they are wielding, they are like super policemen, super bureaucrat and super Prime Minister all rolled into one. If they have such powers, then their standards of conduct must also reflect these powers and misuse must be severely dealt with.   Otherwise we are just going to end up creating yet another Supreme Executive Authority of India that has such sweeping powers that they can search, seize, prosecute, trespass into executive, judicial and legislative decisions, making them wield powers to prosecute judges, MPs, Ministers and Prime Minister and the entire bureaucracy.  … (Interruptions)

MADAM CHAIRMAN : Please conclude.

SHRIMATI PRENEET KAUR (PATIALA) : Madam, I will conclude within two minutes. … (Interruptions) Without the necessary checks and balances, they might end up in just another Frankenstein that they cannot control and then we will need a Maha Lokpal to control this Jan Lokpal. … (Interruptions)  So, these checks and balances are very important. I also say that a journey of a thousand miles begins with a single step.  This Jan Lok Pal Bill may not address the problem hundred per cent, but it is that single step for that long journey of eradicating this cancer.  Let us take this step and do a great deed to start the end of this rampant corruption. 

          Madam, in the words of my great Guru, शुभ करमन ते कबहूं ना टरों ना डरो, अरि सों जब जाई लड़ों, निश्चै कर अपनी जीत करों।

*SHRI P.T. THOMAS (IDUKKI): Sir, I would like to mention some thing about the proposed Lokpal Bill.  On  4th  of this month the Lokpal Bill introduced in  our August House. Then it is referred to the Standing Committee.  I have the privilege  to be a member of the present Standing Committee i.e. personal public grievance law and justice.  Sir, after the introduction of the Bill in Parliament the Bill came for the consideration of the Standing Committee.  In the first meeting of the Committee itself Anna Hazare  and his team presented their views before the Committee. After the meeting, they  told to the Media people that “We have seen some  hope in  Standing Committee” . But after  two three days Anna hazare and his team declared that they have no faith in Parliament as well as the Standing Committee.  Sir,  I am humbly requesting the Hon. Members of this August House not to allow  any body to lower the standard of our Parliamentary system.  Sir, with out any hesitation I would  like to point out that Anna Hazare  and his team is trying to sabotage the basic  structure of our Constitution.

          Anna Hazare’s movement is nothing but a movement of the  city centric upper class people .These people  are purposefully trying to tarnish the Parliamentary process.

          Sir, I am fully agree that day  by day  the corruption is increasing  in our country.  A strong mechanism is the need of the hour. Sir, in the name of controlling  corruption Anna hazare and his team is propagating against the basic nature of the Parliamentary  systems. We cannot concede with this.  If we will concede to this next time these people will start  agitation against the reservation system which is a constitutional provision for the SC/ST and other down trodden people of our country.

          Sir, I would like to mention one thing that the same Anna Hazare  expressed his  views that Narendra  Modi the CM of Gujarat is the model of this period..  Anna Hazare and his  team is claiming that they are fighting against all evils.

The Anna team is not agreeing to include the so called NGO’s in the perview of this Jan Lokpal. They are claiming that the NGO’s are not receiving  any money from the  State exchequer.  Sir, it is more dangerous.  How can we assert such NGO’s are not receiving any money from terrorist groups anti social elements and  communal  forces.

          Sir, I am requesting that there must be some provisions for including NGO’s  in the ambit of Lokpal Sir in our system there is an open provision before the Parliamentary Committee to give suggestions to anybody.  Why not Anna Hazare and his team is not utilizing the Parliamentary forms? Are they totally rejecting the systems? Are they not  believing the Parliamentary democracy? These are the important questions in which Anna Hazare and his team to Address to the  people of India.  It is not a simple thing.  I am requesting  all the respected political leaders  of this historic House not to support such kind of agitations anymore.  Sir, I am requesting to all that the supremacy of the constitution of  India has to be maintained. Institutions of democracy cannot be undermined and the  checks and balances visualized in the constitutions cannot be adversely affected.

Sir, Laws  have to be made by the Parliamentarians who are elected representatives of the country.  Few nominated members of the drafting Committee cannot have precedence over elected Members of the Parliament. 

                                                                                           

*श्री गणेश सिंह (सतना):आज सदन देश के एक ज्वलंत सवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सशक्त कानून बनाने के लिए लोकपाल में क्या प्रावधान किया जाए, उस पर गंभीर चर्चा कर रहा है। देश की जनता आंदोलित है। आज भ्रष्टाचार अपनी चरमसीमा पर है। यह पाताल तक पहुंच गया है। समाज सेवक अण्णा हजारे जी पिछले 12 दिनों से आमरण अनशन पर हैं और देश के लोग सड़कों पर हैं। मैं सबसे पहले उनसे अपील करता हूँ कि वे अपना अनशन समाप्त करें कयोंकि हम सभी सांसद प्रभावी लोकपाल बनाने के पक्ष में हैं। हालांकि आज तक जो परिस्थित बनी है, इतने दिनों तक आपको अनशन पर बैठना पड़ा यह केंद्र सरकार की नासमझी का परिणाम है। क्योंकि केंद्र सरकार भ्रष्टाचार को फलने-फूलने का पूरा अवसर देती आ रही है और अभी भी दे रही है। जो लोग भ्रष्टाचार खत्म करने की बात या आंदोलन करते हैं उन्हें यह सरकार कुचलने में लगी हुई है। पहले रामदेव बाबा के आंदोलन को कुचल डाला, भाजपा युवा मोर्चा पर लाठी चलाई गई। 16 अगस्त को अण्णा जी को जेल भेजा। मैं अण्णा हजारे जी के प्रति आभार प्रकट करता हूँ क्योंकि उन्होंने देश की आम जनता की तकलीफ जिसका वर्तमान में कोई इलाज नहीं हो पा रहा था, उसके लिए आपने देश को जगाया।

          मैं विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज जी के द्वारा सदन में दिए गए वक्तव्य का पूरा समर्थन करता हूँ। देश भर में अण्णा हजारे जी के समर्थक, मीडिया एवं सत्ता पक्ष यह कहते रहे हैं कि भाजपा अपना रूख स्पष्ट नहीं कर रही है। जबकि भाजपा ने कहा था कि हम अपना दृष्टिकोण सदन में रखेंगे। आज नेता प्रतिपक्ष ने पार्टी का पक्ष जिन तीन मुद्दों पर सदन के नेता ने जो प्रस्ताव सदन में प्रस्तुत किया है, उसके संबंध में उन्होंने अपनी बात जोरदार तरीके से कही और प्रभावी उदाहरण देते हुए अपनी राय देश की संसद के माध्यम से देश के समक्ष रख कर लोगों के मन का भ्रम दूर कर दिया है।

          देश आज भ्रष्टाचार का शिकार हो गया है। इसकी जड़ें पाताल तक पहुंच गई है। कोई क्षेत्र इससे बच नहीं पाया, दिल्ली से लेकर गांव तक, ग्राम पंचायत से पीएमओ तक। दुनिया के 187 देशों में से भ्रष्टाचार में 87वां स्थान भारत का है। सन् 2005 के एक सर्वेक्षण के आधार पर 21068 करोड़ रूपये हर साल आम आदमी को रिश्वत देनी पड़ती है। देश बढ़ते हुए भ्रष्टाचार से देश अत्यंत चिंतित है। हम सभी सांसद भी चिंतित हैं। कई स्थानों पर भ्रष्टाचार शिष्टाचार में बदल गया है। लोग रिश्वत लेना अपना हक समझने लगे हैं। घोषित दलाली चल रही है। चारों तरफ विश्वास का संकट खड़ा हो गया है। पहले हमारे   * Speech was laid on the Table गांव अत्यंत ईमानदार थे। घरों में ताले नहीं लगते थे। जब से पंचायतीराज आया उसने वहां भी भ्रष्टाचार सिखा दिया। आज सच्चा आदमी ढूंढना मुश्किल हो रहा है। पहले ईमानदारी से जीने वालों का समाज में बढ़ा मान होता था। अब गलत तरीके से काम करने वालों का सम्मान होने लगा है। आज देश एक ऐसा लोकपाल चाहता है जिससे ऊपर से लेकर नीचे तक का भ्रष्टाचार खत्म हो जाए। श्री अण्णा हजारे जी ने अपने जन लोकपाल में जितने प्रावधान किए हैं, उनमें अधिकांश मुद्दों पर हमारी पार्टी की सहमति पहले से ही थी। जिन तीन मुद्दों पर, जिन्हें नेता, सदन ने यहां पर विचार हेतु प्रस्तुत किया है, क्या उसमें कोई ऐसा एक भी बिल है जिसमें केन्द्र एवं राज्यों में लोकपाल का प्रावधान किया जा सकता है।

          दूसरा मुद्दा लोअर ब्यूरोक्रेसी का है। उसे भी लोकपाल या लोकायुक्त के दायरे में लाया जा सकता है। सीबीआई स्वायत्त हो अथवा उसे अपराध शाखा से लोकपाल के दायरे में लाया जा सकता है।

          लोयर ब्यूरोक्रेसी जिससे आम आदमी भी सबसे अधिक परेशान है, उसे हम लोकपाल में लाने के पक्ष में हैं। प्रधान मंत्री को प्रमुख स्थितियों को छोड़कर लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए। मैं और मेरी पार्टी इसके पक्ष में  है। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक आयोग बनाया जाये, जो पूर्णतः स्वतंत्र हो। सांसद सदन में जनता के सवालों को उठाते हैं और संविधान की धारा 105(2) के तहत जो अधिकार दिये गये हैं, उन पर रोक लगाया जाना उचित नहीं है। सदन के बाहर सांसद भी आम आदमी है। यदि  कोई अपराध करेगा, तो वह लोकपाल की श्रेणी में आयेगा।

          व्यवस्था में सुधार की अत्यंत आवश्यकता है। हम और हमारी पार्टी भाजपा शासित राज्यों में भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने हेतु लोक सेवा गारंटी एवं आय से अधिक सम्पत्तियों को जब्त करने हेतु कानून बनाकर रखा है और इस कार्य को सबसे पहले मध्य प्रदेश ने आरंभ किया है। आम आदमी की रोज की जरूरत  वाली समस्याओं के समाधान हेतु लोक सेवा गारंटी के अधीन नियम के तहत ला दिया, जो समय सीमा में काम नहीं करेगा, उसे अपने वेतन से पांच हजार रुपये तक जुर्माना देना होगा। पहले जनता की जेब से पैसा जाता था, अब अधिकारी की जेब से पैसा जनता की जेब में जायेगा। इससे भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी। भाजपा हर विभाग में सिटीजन चार्टर लागू करने के पक्ष में है और उसे  लोकपाल के दायरे में लाया जा सकता है। आज भ्रष्टाचार की लपटें सभी जगहें पहुंच गयी हैं। सक्षम, स्वतंत्र तथा प्रभावी लोकपाल की जरूरत है। सरकार पीछे हट रही है। सरकार आगे आये। हम उसके साथ हैं। जब सदन में सरकार लोकपाल विधेयक बहस के लिए लायेगी, उसमें जो आवश्यक प्रावधान होंगे, उन्हें जोड़ने का कार्य किया जायेगा।

          आज सदन सामूहिक रूप से महसूस करता है कि भ्रष्टाचार का इलाज किया जाना जरूरी है। मेरी राय है कि लोकपाल के सदस्यों की जो नियुक्ति का मामला है, उसमें समाज के कमजोर वर्गों के प्रतिनिधित्व का भी स्थान होना चाहिए। लोकपाल सशक्त बने, इसलिए जरूरी है कि सभी पक्षों का गहराई से अध्ययन कर लिया जाये, तभी उसे मूर्त रूप दिया जाये।

          भ्रष्टाचार विकास का बाधक है। इसके चलते अच्छे लोग निराश होने के कारण राजनीतिक क्षेत्र में नहीं आ रहे जबकि अच्छे चरित्रवान एवं ईमानदार लोगों की जरूरत है। आम जनता देश के राजनीतिक दलों तथा नेताओं को शक की नजर से देखती है। मेरा उनसे कहना है कि कुछ लोगों के गड़बड़ हो जाने से सभी के बारे में ऐसा मत सोचें। अभी बहुत लोग ऐसे हैं जो पूरी ईमानदारी के साथ सार्वजनिक जीवन में गलत मुकदमे झेलने के बाद भी काम कर रहे हैं। लोगों ने उसी में जीवन लगा दिया। श्री अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रधान मंत्री ने अपने एक वोट से सरकार गिरा दी, यदि वह चाहते तो सरकार बचा सकते थे। मुझे यह कहने में संकोच नहीं है कि पिछली सरकार ने खरीद-फरोख्त करके अपनी सरकार बचाई थी।

          आज नैतिकता का सबसे बड़ा सवाल है और इसकी जरूरत सभी जगह है, सभी क्षेत्रों में हैं, चाहे वह सिविल सोसाइटी ही क्यों न हो। सबको अपने कर्तव्यों का ध्यान रखना होगा। सबसे पहले सबके मन में राष्ट्रीयता के प्रबल भाव की जरूरत है। जब व्यक्ति अपने लिए नहीं बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए जीने का काम करता है तो अनैतिक कार्य कभी नहीं कर सकता।

          लोकतंत्र में सरकारी मशीनरी पर हमेशा प्रश्नचिह्न लगते रहे हैं। उसके कारण सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन एवं प्रचार-प्रसार के लिए एनजीओज का प्रयोग किया गया। थोड़े दिनों तक कार्य ठीक हुआ, लेकिन उसके बाद वे भी वही करने लगे, जो भ्रष्टाचार की श्रेणी में आने लगा। विदेशों से 28 हजार करोड़ से अधिक की राशि एऩजीओज को दी गई, लेकिन पता नहीं वह राशि किस कार्य के लिए दी गई। क्या इन सबकी जांच नहीं होनी चाहिए?

          इसी तरह से मीडिया लोकतंत्र का चौथा प्रहरी है। उसने भी अपनी मर्यादा तोड़ी है। पेड न्यूज, पैकेज तथा बदले की भावना से काम करना आज आम हो गया है। मैं मानता हूं कि उन्होंने भी अपनी मर्यादा को तोड़ा है। जो प्रैस काउंसिल है, वह प्रभावी नहीं है। अतः लोकपाल के दायरे में इन्हें भी लाना चाहिए।

          देश में देखा जा रहा है कि थोड़े समय में छोटा व्यापारी उद्योगपति बन गया और सरकार को प्रभावित करके अपने पक्ष में कानून बनवाकर राजकोष को नुकसान पहुंचा रहे हैं। अतः उन्हें भी लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए।

          आज देश में जो अविश्वास पैदा हुआ है, उसके पीछे एक ही कारण है और वह यह है कि यूपीए सरकार के घनघोर भ्रष्टाचार एक-एक करके सामने आने लगे। एक तरह से देखा जाए तो कुल बजट से लाखों करोड़ रुपये से अधिक का धन घोटालों में चला जाता है। काला धन विदेशों मे भेजा जाता है और देश महंगाई की मार से त्रस्त है और गरीब एवं मध्यम परिवार के व्यक्ति को पेट भर भोजन न मिल सके, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है।

          केन्द्र सरकार ने मुस्तैदी से भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। प्रधान मंत्री कार्यालय को सब जानकारी होने के बाद भी भ्रष्टाचार होता रहा है। लेकिन अब सदन और अन्य राजनैतिक दलों के दबाव में आकर एक प्रभावी लोकपाल बनेगा, जिससे भ्रष्टाचार पर लगाम लगाई जा सके।

                                                                                         

श्री लालू प्रसाद (सारण):महोदय, मेरा चांस अंत में आता है। अंत भला तो सब भला। यह हम लोगों का दुर्भाग्य नहीं सौभाग्य है कि मेरे दल के चार एमपी जीत कर आए हैं। स्वर्ग में पहुंचाने के लिए चार आदमी ही काफी हैं। किसी को भी हम ही लोग पहुंचाएंगे। हम लोग राजनीति के लोग हैं और किसी के प्रति कोई नफरत नहीं है। लेकिन आज मुझे हैरत हुई कि ठीक दो दिन पहले भ्रष्टाचार पर यहां खुली बहस हुई और भ्रष्टाचार के सवाल पर सभी दलों के नेताओं ने भाषण दिया। पहले की प्रोसीडिंग निकाल लीजिए और आज की भी प्रोसीडिंग निकाल लीजिए, उसमें कोई अंतर नहीं है। सरकारी डॉक्टर नहीं, बल्कि  डॉ. त्रेहन जी जो अच्छे डॉक्टर हैं, उनसे हमारे अच्छे संबंध है, अण्णा हजारे जी को देख रहे हैं। अण्णा जी बहुत ही अच्छे इंसान हैं और बुजुर्ग व्यक्ति हैं। मैंने पहले भी कहा था की भ्रष्टाचार की यह लड़ाई नयी नहीं है। हम लोग लोक नायक जय प्रकाश नारायण जी के आंदोलन से निकले हुए हैं। आडवाणी जी सहित सभी लोग चाहे उधर हैं या बिहार में जो सरकार में बैठे हैं, सभी जेल में थे। मीसा कानून के तहत हम लोग जेल में थे। पहले भी हमने बताया था कि हमारी जो पहली बेटी हुई, सभी की सलाह से हमने उसका नाम मीसा भारती रखा था। हम लोग आंदोलन की कोख से पैदा हुए हैं।  

          हम लोग अपने को नीचे न गिरायें और जो कोशिश हो रही है, जो षड़यंत्र इस देश में हो रहा है, इसी सदन में भ्रष्टाचार और काले धन के सवाल पर 17 दिन तक हाउस को रोका गया। उसमें भारतीय जनता पार्टी का योगदान ज्यादा था, उसमें सब लोग शामिल थे। हम लोग ईमानदारी से कहना चाहते हैं कि उस समय सरकार गठन के समय कांग्रेस पार्टी को हमारे दल का, मुलायम सिंह यादव जी का समर्थन प्राप्त हुआ, आपको रोकने के लिए। भ्रष्टाचार के सवाल पर हमारे सभी एम.पी. खड़े रहे, सब लोग खड़े रहे। यह नयी चीज नहीं है। एक कान्ट्रीब्यूशन आपका है, एक योगदान इस सदन का है। शरद यादव जी ने ठीक कहा, कई सवालों और घटनाओं का जिक्र इन्होंने किया। हम देहात से आने वाले लोग हैं और गाय, भैंस, बकरी चराकर हम लोग आये हैं। वोट का राज है तो छूट का राज होता, गरीब का राज होता, उपवास रखकर हम लोग आये हैं। यह लोकतंत्र है, बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जी ने जो संविधान हमें दिया, उसके तहत हम लोग यहां सांसद बनकर आये हैं, लेकिन सारे लोगों की क्या दुर्दशा की जा रही है। चाहे यह इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के द्वारा हो या अण्णा जी की टीम के द्वारा हो, अण्णा जी भले आदमी हो सकते हैं और वे हैं भी। हम लोगों को अण्णा जी से सीखना चाहिए कि 74 साल की उम्र में 12 दिन तक वे टिके हुए हैं। यह बहुत बड़ा सवाल है। अनशन बड़ा भारी अनमोल अस्त्र है, लेकिन 74 साल का वह इंसान और टनाटन बोलना, यह कहना कि हम तीन किलोमीटर अभी दौड़ जायेंगे, यह हम राजनीति करने वाले लोगों को सीखना चाहिए। डॉक्टर साहब लोगों को इस पर जरूर रिसर्च करनी चाहिए और किताब भी लिखनी चाहिए कि अण्णा जी के इतने लंबे अनशन का राज क्या है? कौन सा तत्व उनके अंदर है, हम लोग किस चीज का पान करें ताकि हम लोगों को भी कभी अनशन पर जाना हो तो जा सकें। उनके द्वारा उठाये गये सवाल पर हम लोग खड़े हैं। भ्रष्टाचार का सवाल कोई भी उठायेगा, यह देश नया बनाना है, जे.पी. का टोटल रिवोल्यूशन, इस पर कोई दो राय नहीं है। हमारा क्या अपराध था, हमने शुरू में ही कहा कि पार्लियामेंट सुप्रीम है। बाहर से कोई आदमी डिक्टेट करे, यह गलती आप लोगों ने की है, इसलिए इसे आप भोग रहे हैं। तब आप हम सब लोगों को बुलाते हैं और संसद को कॉन्फीडेंस में लेते हैं। हमने तो अण्णा जी से पूछा था कि संसद जानना चाहेगी कि सिविल सोसायटी का चुनाव कब हुआ? आप यह बताइये कि इसका चुनाव कब हुआ? आज अरूणा राय जी आ गयीं, फिर कल कोई दूसरे आ जायेंगे, तीसरे आ जायेंगे, यह तो एंडनेस स्टोरी हो गयी। हमें सबकी बात को सुनना पड़ेगा। आपने रिकग्नॉइज़ किया तो मैंने उस दिन भी कहा था कि वे पुराने लोग हैं, वे लोग लंबा-लंबा अनशन करते हैं, उपवास रहते हैं और कोई कारण  भी नहीं रहता है तो भी लोग उपवास करते हैं। बहुत दिन तक तो लोग नमक भी छोड़ देते हैं ताकि हमारा स्वास्थ्य भी ठीक रहे, ओवरहॉलिंग आदि होती रही। आज की बहस का क्या औचित्य है, मैंने कहा कि सत्ता पक्ष पर आरोप लगाया गया कि जब संविधान की सारी संस्थाओं को, मैंने उस दिन भी कहा कि संसद सर्वोच्च है, लॉ मेकिंग बॉडी है। हमारी ज्यूडिशियरी चाहे किसी के भी पक्ष में फैसला होता है। अण्णा हजारे जी के जो मुंशी, मैनेजर लोग हैं, उन्होंने जिस शब्द का इस्तेमाल किया है, महोदया, उस शब्द को मैं यहां बयान नहीं कर सकता हूं। जिन मुकद्मों में हम लोगों को जलील किया गया है, माननीय सुप्रीम कोर्ट से वे ऑक्विटल है। आडवाणी जी पर जो केस हुआ, वह ऑक्विटल है। जिस तरह से डेरोगेट्री शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है, ऐसे आरोप लगाने वाले लोगों का हम लोगों के सामने कोई स्टैटस है। हम सन् 1977 से पार्लियामेंट्री डैमोक्रेसी में लगातार हैं। चीफ मिनिस्टर, लीडर ऑफ अपोजिशन, राज्य सभा में, स्टेट के अपर हाउस में, लोक सभा में सन् 1977 से लगातार हम लोग हैं। देश में लोकतंत्र है, इसीलिए हम हैं।  

          लेकिन जिस ढंग से व्यवहार हो रहा है। उस दिन ऑल पार्टी मीटिंग हुई, मैं असत्य नहीं बोलना चाहता हूं, सभी लोग वहां थे, सीपीआई, सीपीएम के भी थे, प्रणब बाबू अपनी सीट से उठकर गए, आडवाणी जी के पास गए, सुषमा बहन के पास गए, अरुण जेटली जी के पास गए और एम्प्टी रूम में एक घंटे तक गहन समीक्षा करके यह लोग जो प्रस्ताव लाए हैं, जिस प्रस्ताव पर हम लोगों ने अपील की कि अन्ना जी का अनशन टूटना ज़रूरी है। सरकारी लोकपाल बिल में यह बात साफ-साफ स्वीकार की गई है, ऐसी बात नहीं है कि हम लोग नहीं समझते हैं, उसमें लिखा हुआ है कि जो फाइनल ड्राफ्ट होगा, उसमें आपका और नेशनल कनसैन्सिस करके, जिसमें अरुंधति रॉय, अरुणा रॉय और देश भर के विद्वानों की जो राय होगी, उस राष्ट्रीय सहमति पर सशक्त लोकपाल बिल बनाया जाएगा। हम लोगों ने स्वीकार किया है कि बनना चाहिए। अन्ना जी को सही ख़बर नहीं दी जा रही है। वहां पर जो भी जा रहा है, जिनका ज़िक्र शरद भाई ने किया है, हम लोग बारीकी से टीवी में मंच को देख रहे हैं। एक आदमी की बात खत्म भी नहीं हो रही है कि दूसरा माइक खींच लेता है, कभी तीसरा माइक खींच लेता है। किरण बेदी जी आपको चुनाव लड़ना है तो लड़िए, कपिल सिब्बल जी के ख़िलाफ़ सशक्त कैंडिटेट हैं, लड़ाई इसकी है। इसमें अन्ना हजारे जी का कहीं कोई दोष नहीं है। सब उनके कान में जाकर पूंक देते हैं, उनको चढ़ा देते हैं। हम लोग टीवी पर देखते हैं। हम लोग मूर्ख नहीं हैं। हम पॉलीटिकल साइंस के विद्यार्थी हैं। फ़िलासफ़ी और राजनीति में फ़ोरकॉस्ट किया जाता है कि किसका समय कैसा आने वाला है। इसलिए अन्ना जी जब भी कुछ मन बनाते हैं, कोई उस कान में कह रहा है, कोई इस कान में कह रहा है। केजरीवाल जी हमारे मार्गदर्शक बने हुए हैं, हमें टीच कर रहे हैं, हमें पढ़ा रहे हैं, बताइए। प्रधानमंत्री जी ने इस सदन में बोला था कि हम अन्ना जी को सैल्यूट करते हैं। उनके स्वास्थ्य की चिंता करते हैं। सारे दल, सारे लोग, आपकी क्या प्रतिष्ठा बनी, क्या आपकी इज्जत रही, क्या इस संस्था, इस मंदिर की प्रतिष्ठा रही। देश यह जानना चाहता है कि किस बात की बहस हो रही है? आज आप पास कीजिएगा, लेकिन पास क्या करना है, जो भी सदन की प्रोसीडिंग है, स्थायी समिति में भेजिए। यह हम लोगों का बड़प्पन है। स्थायी समिति मिनी पार्लियामेंट है। हम लोगों ने सबसे पहले अन्ना जी को बुलाया था। इसमें सभी पार्टी के लोग हैं। यह कोई आम लोग नहीं हैं, इसलिए हमने उनका सम्मान और इज्जत की। हम लोगों ने उन्हें कहा कि आपको फिर से बुलाएंगे। आपके पास जो भी क़ागज़ है, आप समिति को दे दीजिए। सरकार बोलती है कि हमने बीस मांगों को स्वीकार कर लिया है। इन तीन बिंदुओं के क्या मैरिट्स और डिमैरिट्स हैं, उस पर प्रोपर फोरम में बहस होगी, वहां कमेंट दिए जाएंगे, जिन्हें लेकर हम आपके पास आएंगे।

          सभापति महोदया, वहां अन्ना जी को मिसलीड किया जा रहा है, ठीक कहा शरद भाई ने। कोई उसमें रावण बन के आ रहा है। ऐसा लगता है कि कोई मेला लगा हुआ है। मुझे चांदनी चौक के व्यापारी भाइयों ने जन्माष्टमी पर बुलाया था। वहां मुज़फ्फरपुर के लोग ज्यादा हैं। हम वहां गए, इसमें कुछ कहना भी ठीक नहीं लगता है। वहां सभी के गाल पर टैटू बना हुआ था।  अभी दादा बोल रहे थे कि स्थिति वोलाटाइल हो गयी है, विस्फोटक हो गयी है। महोदया, हम वहां गए। मुझे सब लोग जानते हैं, पहचानते हैं। मुझे छोटे बच्चे ने भी देखा। मैंने देखा कि दस-पन्द्रह आदमी मोटर साइकल लेकर हमको एस्कॉर्ट करने लगे। मैंने कहा कि हम लोग लौट चलें। हम तो भगवान कृष्ण जी की पूजा में जाएंगे और वे लोग तमाशा करेंगे। इससे हम पर उल्टा दोष मढ़ा जाएगा कि लालू यादव ने जाकर गड़बड़ किया। मैंने श्रीकृष्ण भगवान को कहा कि हम आपको प्रणाम करते हैं। आप जानें, आपका काम जाने।

          महोदया, मेरा इसमें सुझाव है। सी.बी.आई. का गठन वर्ष 1946 में हुआ। सी.बी.आई. कोई मामूली संस्था नहीं है। यह सही काम भी करता है। कुछ अफसर गलत भी होते हैं। जो अफसर गलत करते हैं, उनको बंगाल में मंत्री बना दिया गया। हम उनको सैल्यूट करते हैं। मैं वाजपेयी जी को सैल्यूट करता हूं। कुछ साथियों ने कहा कि श्री यू. एन. बिश्वास बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें गवर्नर बना दिया जाए। मैंने दुमका से फोन किया कि सर, इस आदमी को आप गवर्नर बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि लालू जी, आपको भीतर की बातें कैसे पता लग जाती हैं? मैंने कहा कि पता लग जाता है। खुराना साहब हैं न! क्या खुराना साहब नहीं हैं? अच्छा, भगवान के पास स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं। ऐसे-ऐसे तो लोग हैं।

          महोदया, मैं यह बताना चाहता हूं कि खुद अन्ना जी ने कहा है कि इससे भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा, 60-65 प्रतिशत जरूर खत्म हो जाएगा। उन्होंने कहा है कि लोग डरा जाएंगे। कोई कानून आप बना दीजिए। आप बनाइए। आपको बनाना है, लेकिन हम ऐसा गलत काम न करें कि कोई लालच में, कोई इस प्रत्याशा में कि वह गिरेगा तो हम आ जाएंगे, वह हटेगा तो हम आ जाएंगे। हम लोग कालिदास न बने। जिस डाल पर बैठे हैं, उस डाल को नहीं काटिए। यह संस्था रहेगी तो सब कुछ होने वाला है, सबका कल्याण होने वाला है। आपने गलती की। आप लोगों ने श्री अन्ना हजारे को कैद किया। आपने उस डिटेंशन को जस्टीफाई किया। पहले हमें मालूम हुआ कि पुलिस लाइन में ले गए। पुलिस लाइन के बाद मालूम हुआ कि तिहाड़ जेल में ले गए। कम से कम हम लोगों से पूछ लेते। आडवाणी जी से पूछिए। आडवाणी जी को गिरफ़्तार किया तो उन्हें उचित सम्मान दिया। उन्हें गेस्ट हाउस में रखा और हेलिकॉप्टर से भिजवाया। हम  टेलिफोन से बात करते रहे कि सर, कोई दिक्कत होगी तो मुझे बताइएगा। कोई तकलीफ होगी तो हमें बताइएगा। चूकि आप जा रहे हैं बाबरी मस्जिद पर हमला करने, इसलिए हमारी यह मजबूरी है। ये सब काम करने आप मत जाइए। इनकी बेटी हमारी बहन हैं। वे गए और फिर दामाद गए। उनको भी हमने बोला कि आएं-जाएं। लेकिन आप लोगों ने गलती की। उन्हें माइलेज़ मिल गया।

          देहात में तालाब में जो मछली रहती है, वह जल्दी गरीब लोगों से नहीं पकड़ में आती है। हजार आदमी उसे पकड़ने के लिए सिर्फ कीचड़ में हाथ-पैर मारते हैं। जब बोआरी मछली उतराने लगती है तो मजबूत आदमी जाकर उसे जाल से छानकर ले आता है। मछली उतराए आप और छान रहे हैं अन्ना हज़ारे के लोग। "भ्रष्टाचार मिटाना है, नया देश बनाना है। " यह नारा बदल जाता।

 
"धन और धरती बंट के रहेगा, अपना-अपना छोड़ के। "
"दुनिया में आए हैं तो कुछ काम करिए, चंदा के पैसा से जलपान करिए। "
 

हम लोगों को भाषण करते हुए लोग देखते हैं कि उछल-उछल कर क्या करते हैं?

          महोदया, आप आई हैं इसलिए हम काफी कॉन्फिडेंस में हैं। हमें बोलने के लिए काफी ताकत मिल रही है।

सभापति महोदया : बोलने की समय-सीमा है।

श्री लालू प्रसाद : ठीक है, समय-सीमा है तो हम लोग सीमा का उल्लंघन नहीं करेंगे। उल्लंघन करने पर तो सज़ा हो ही जाती है। यह हमारा इतिहास ही है।इसमें अन्ना जी के द्वारा उठाए गए सवाल पर हम और हमारा दल खड़ा है। भ्रष्टाचार का कानून बना दीजिए,  महिला एट्रोसिटी, कितनी महिलाओं के साथ यहां अन्याय हो रहा है, देश में कितना मर्डर हो रहा है, कानून तो बना हुआ है। आप जितना भी कानून बनाएं, हमने आपसे रुपया लिया, आप पोस्ट ऑफिस और घर पर नहीं रखेंगे, इंकम टैक्स में खबर नहीं करेंगे, किसी पूंजीपति को दे आएंगे कि तुम रखे रहना, जब जरूरत होगी तब देना। जब जरूरत होगी तो वह बोलेगा कि आपका पैसा हमारे यहां कहां है। तब वह ठेंगा दिखा देगा। यह जो कानून बन रहा है, यह कानून बने, ठीक है, इसे बढ़िया से ठोक-ठका कर बनाएं, लेकिन इसमें जो लोग कैंडिल जलाने जा रहे हैं, वे फिराक में है कि अब ये कोई लोग पैसे लेंगे तो हमारे यहां जमा करेंगे और हम मालोमाल हो जाएगे। सब खेल एनजीओ का है, आज आप बोल दीजिए कि इसमें एनजीओ नहीं रहेगा तो कल से खत्म हो जाएगा।

          सरकार का जो बिल आया है, उसे हम पूरा नहीं पढ़ पाए हैं, हम उसे पूरा पढ़ेंगे। उसमें इन्होंने एनजीओ को रखा है, सोकॉल्ड जन लोकपाल बिल है, उसमें एनजीओ नहीं हैं, इस बात को जानना चाहिए। हमने उस दिन भी कहा था कि सब भाई, माननीय सदस्यों को कहा था कि इसे माइनूटली पढ़ लीजिए, अध्ययन कर लीजिए। आप बताइए, सोशल जस्टिस, मायावती जी, मुलायम सिंह यादव जी, शरद यादव जी से लेकर सब लोग, गोपीनाथ मुंडे जी मामूली आदमी हैं। इनके पिता जी लोहा काटने वाले मजदूर रामलीला मैदान में गए। इन्हें किरण बेदी ने वहां गलत शब्द बोले और कहा कि इन्हें घेर लो, मत निकलने दो। उस दिन जब वहां ऑल पार्टी मीटिंग की खबर गई तो केजरीवाल ने क्या खबर दी, साथियों, पुलिस ऑफिसर ने हमें फोन किया है कि सुबह चार बजे अन्ना जी को उठा लिया जाएगा। अन्ना जी उठ गए, उन्हें कह दिया। वे बोले कि सुनो, हिंसा मत करना, तुम लोग हमें घेर लेना और सवेरे सब एमपीज़ के घरों को घेर लेना। ये मीडिया के लोगों को कहना चाहिए था, दूसरे दिन पूछना चाहिए था, केजरीवाल, तुमने किस आधार पर देश को मिसलीड किया। आग लग जाती, किसी का बच्चा जला दिया जाता, आप वहां मौन हो जाते। इसलिए इन चीजों को समझने की जरूरत है। देश और राज लुंज-पुंज नहीं चलता है, देश और राज रोब से चलता है, कोई अन्याय नहीं करना चाहिए। इन चीजों को पढ़िए, सुप्रीम कोर्ट और मीडिया के जो लोग हैं, सभी प्रिंट मीडिया नहीं, रिपोर्टर नहीं, रिपोर्टर तो कुछ दिन में अपना लिखना-पढ़ना, रिपोर्टिंग करना भूल जाएगा। इनका जो मालिक है, डिक्टेट करता है, ये लड़के और युवा-युवती क्या करेंगे। एनजीओ को लाइए, आधी रात तक चर्चा के बाद फिर चर्चा और आज की चर्चा में मेरा सुझाव है कि हम सुप्रीमेसी ऑफ पार्लियामेंट, पार्लियामेंट को, संविधान को एक ईंच भी हिलने-डुलने नहीं देंगे।

          मुझे खुशी है कि आज सभी दल के लोगों को और हमें चेतना आई है कि हम एक हैं और एक होकर, जो सवाल है, वह अलग है, लेकिन इस मंदिर को हम ढहने नहीं देंगे, चाहे कोई भी ताकत या कोई भी बात होगी। ये बहुत अच्छी शुरुआत हुई है। आज के प्रस्ताव, कोई प्रस्ताव नहीं, सारे पोलिटीकल पार्टी, जितने भी लीडर बोले हैं, इस पूरी प्रोसिडिंग को स्टैंडिंग कमेटी में भिजवाने का मैं आपसे अनुरोध करता हूं।...( व्यवधान) वोटिंग किस बात की, किस चीज की वोटिंग होगी? गलत मैसेज नहीं जाना चाहिए और राष्ट्रीय सहमति, सुना है कि यहां आज इंडियन एक्सप्रैस में छपा है, सुप्रीम कोर्ट के साल्वे जी ने कहा है, वे बहुत वरिष्ठ एडवोकेट हैं। साल्वे जी का कई दिन से छप रहा है कि क्या हो रहा है। हरीश साल्वे जी  का इस देश में क्या सुपर पावर है, जजों के ऊपर यह लोकपाल, कौन प्रतीक्षा में बैठा हुआ लोकपाल है, किसके लिए लोकपाल की बात फिक्स हो रही है और कौन हमारे ऊपर बनेगा? पार्लियामेंट के मैम्बर को कहा जा रहा है कि पार्लियामेंट के मैम्बर को उसमें लाओ। हम तो अभी जो मैम्बर्स हैं, हम लोग हैं, लेकिन रिटायर्ड एम.पीज़. को भी उसमें लाया जा रहा है, जो बूढ़ा बेचारा बुजुर्ग हो गया और वह गांव में पेंशन पर जी रहा होगा, वहां उससे उसकी नून-रोटी चल रही होगी। यह आपके सरकारी बिल में है। यह गलत आप लोगों ने किया है, यह जो सरकारी लोकपाल बिल में है।...( व्यवधान)

सभापति महोदया : प्लीज़ कन्क्लूड करें।

…( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद : जहां भी है...( व्यवधान) महोदया, आज की चर्चा भी संविधान के खिलाफ है। लेकिन अब हो गई, रिलैक्स कर लिया, आप लोगों को रिलैक्स करने की पावर है तो आपने कर लिया तो कर लिया। हम लोग भी बोल लिए, लेकिन आगे से फिर इस तरह की गलती मत करिएगा, मत करिएगा, नहीं तो आने वाला इतिहास आपको, हमको माफ नहीं करेगा कि जो बाहर से कोई बोले और उसकी डिक्टेशन पर गले से गला लगाकर और जाकर उस उलझन में देश को फंसाकर और नाश करके काम करें। फिर इस संसद की कोई जरूरत नहीं है, यही मैं बोलता रहा हूं।...( व्यवधान) अच्छा बताइये, कोई ओम पुरी है? उसने कहा कि सब गांव के लोग आ रहे हैं, सुना कि सब फिल्मी कलाकार हैं। क्या हम सब लोगों को फिल्मी कलाकार पढ़ा रहा है, देश को पढ़ा रहा है?...( व्यवधान) नहीं-नहीं, कलाकार विशाखा, पिचासा, पता नहीं कौन-कौन कलाकार सब मुम्बई में बैठे हुए हैं।...( व्यवधान) आज भी यह सब क्या बनाकर रखा है?...( व्यवधान) छोड़िये, मनोज तिवारी को तो आपने ही अपनी पार्टी में रखा था, मोबाइल पार्टी में।...( व्यवधान) देखिये, अब आप सुनो न भाई, हम लोग तो कुछ भी चीज़ बोलें, देखिये, अन्ना जी का अनशन ये सब नहीं तोड़ने देंगे, अन्ना जी के जीवन पर वे सब खतरा पैदा करेंगे, इसको बढ़िया से रिकार्ड कर लीजिए। वे सब अन्ना जी को सही बात नहीं बोल रहे हैं। इसी झकाझक में उस महान नेता को, सीधा-सपाटा नेता को ये सब मार देंगे और सारी पार्लियामेंट को फिक्स कर देंगे, सरकार को फिक्स कर देंगे और इसलिए...( व्यवधान)

सभापति महोदया : रिकार्ड में केवल लालू जी की बात जायेगी।

(Interruptions) … * श्री लालू प्रसाद : लाख हम लोग एकता दिखा रहे हैं, लेकिन वे लोग नहीं मानेंगे, वे सब यह नहीं होने देंगे। उसमें सब एन.जी.ओ. के लोग हैं। एन.जी.ओ. इस सरकारी बिल में आया हुआ है। इसमें कारपोरेट हाऊस से लेकर प्रैस-मीडिया सारा है, चलो पूरे सारे देश को लाओ। हम तो यह कहते हैं, ये कम्युनिष्ट लोग हैं, ये नारा लगाते थे। क्या नारा लगाते थे कि सारे देश की प्रोपर्टी, चाहे जिसकी भी हो, खेत हो, लैंड हो, फॉर्म हो, एपार्टमेंट हो, लाल धन हो, पीला धन हो, काला धन हो, आज क्यों नहीं बोल रहे हैं, हमने तो इनको कहा था कि सारी सम्पत्तियों को, चाहे जिसकी भी हो, सब को टेकओवर करके नेशनलाइज़ करो और री-डिस्ट्रीब्यूट करो। इसमें सारे आदमी पकड़े जाएंगे, लेकिन आप लोग चुप हो जाते हैं। अपना नारा छोड़ दिया, लड़ाई छोड़ दी। अब कोई उपाय नहीं है, अगर किसी ने भी गलती की है तो पूछा जाये कि तुम यह कहां से लाये, कागज दिखाओ। सब फ्लैट के पास जाओ, क्यों जमीन की लूट हो रही है, क्यों एक्सटेंशन में टेंशन हो रही है, इन सब लोगों ने तमाशा बनाकर रखा है।इसलिए नारे नहीं बदलना चाहिए, इरादे नहीं चकनाचूर होना चाहिए।  ये नारे नहीं हों, भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार, अन्ना जी, अन्ना जी, अन्ना जी।  जब बांटने के सवाल पर कानून बनने जाता है, तब यह होता है कि धरना-धरती बंट के रहेगा, अपना-अपना छोड़कर।  यही न हो रहा है।  यही हो रहा है।  यह है मेन रूट, यह अन्ना जी को भी हमने कहा था।  हमने कहा था कि हम आपके साथ लाठी लेकर खड़े हो जाएंगे, इसको उठाइए, इसी से बात खत्म होगी।  तब वह बोले कि अब तो हम एनाउंस कर दिए हैं, बाद में इसको देखेंगे।  ...( व्यवधान) यह दिल्ली है, यहां उनकी सुरक्षा से लेकर सब तरह की प्रार्थना उनके लिए हम भी करते हैं।  जो लोग देख रहे हों, तो उनको सब बतायें।  मीडिया के लोग भी देखो, यह देश रहेगा, यह संस्था रहेगी, तो आपका भी रेडियो चलेगा। ...( व्यवधान)  सब न्यूज तो हम ही लोग देते हैं।  वी आर क्रिएटर आफ न्यूज और हम लोगों को ही बुराई दिलवा रहे हो और बुराई दे रहे हो।  डिबेट में इनको बैठाता है, जो डर के मारे टोपी पहन लिए थे, संजय निरूपम जी। ...( व्यवधान) इसमें कहीं भी पिछड़ा, दलित, माइनेरिटी नहीं दिखता है, कोई महिला नहीं दिखती है।  महिला का एमपी के मामले में हम विरोध करते हैं, लेकिन जो भी बिल बने, उसमें वन-थर्ड महिला, बैकवर्ड क्लासेज सिटीजन आफ इंडिया, दलित और मुस्लिम भाइयों को आपको स्थान देना पड़ेगा, नहीं तो जो भी सहमति से बनायेंगे, तो हम लोगों का झंझट जारी रहेगा।  मुंडे जी, आप दबिए मत, जहां हैं, वहां रहिए। ...( व्यवधान)  आडवाणी जी पूछिए, गोविंदाचार्य जी ने कल जाकर भाषण कर दिया कि इस भीड़ में दस प्रतिशत आरएसएस के लोग हैं।  यह नहीं होना चाहिए।  आप नहीं बनेंगे प्रधानमंत्री, बनिएगा, बनिएगा तो बनिएगा।  हम लोग इसीलिए विरोध करते हैं कि आप लोगों का रास्ता गड़बड़ है।  इसलिए इस पर हम सब लोगों को सोच-समझकर पूरी डिबेट करके काम करना चाहिए।  हम लोग नया इतिहास गढ़ने जा रहे हैं।  यह हिस्टोरिकल बहस नहीं है, नयी सोच, नयी संरचना है, इसलिए सबको इन्वाल्व इसमें करना पड़ेगा, सारे लोगों को शामिल करना होगा।  जिन लोगों को भी आना है, उन्हें बुलायेंगे।  हालांकि रामदेव जी का हमने विरोध किया, लेकिन रामदेव जी को भी बुलायेंगे।  ...( व्यवधान)  स्टैंडिंग कमेटी में सब दल के लोग हैं।  इसलिए सब दल के लोगों से मेरी अपील है कि इस संस्था को मिटने न दें।  ऐसा न हो कि कोई आदमी जैसे सांप की नाक रगड़वाता है, यह दुर्दशा मत कराइए। अन्ना जी से हमारी अपील है कि आपके इर्द-गिर्द लगे हुए लोग अपने स्वार्थ के चलते आपको सही राय नहीं दे रहे हैं।  आप अनशन बंद कर दीजिए।  आप जीवन मूल्यवान है।  इसे आप लोग छोड़िए।  बड़े से बड़ा आंदोलन भी पोस्टपोन किया जाता है, सस्पेंड किया जाता है।  गांधी बाबा ने ऐसा ही किया।  गांधी बाबा नहीं बोले कि जाकर घेर लो।  हर एमपी के घर में बाल-बच्चे हैं।  पता नहीं कौन-कौन तत्व वहां घुस गया या साथ में चला गया?  हम नवीन जिंदल जी को धन्यवाद देते हैं कि उन्होंने राष्ट्रीय झंडे के लिए यह सब कुछ किया।  हर घर पर, हर साइकिल पर, हर मोटर में फहराया जा रहा है, यह नवीन जिंदल जी का योगदान है कि तिरंगा झंडा लेकर सब लोग पूरे देश में घूम रहे हैं।  जो लोग कार में जा रहे हैं, एक खिड़की में इधर निकाले हुए हैं, दूसरा उधर निकाले हुए हैं।  किरण बेदी बोली हैं कि पीकर यहां मत आइए, पीकर कोई यहां नहीं आएगा।  जब टीवी चलाया तो यह सब देखा।  इसलिए हे टीवी वाले ओमपुरी लोग, लोकतंत्र को बचाओ।  

संस्था को बचाओ। इस देश को बचाओ। आप भी सही सुझाव दो। आपलोग चौखम्भा में हैं। आप के दुश्मन हम लोग नहीं हैं। आप सब लोग लग कर, बेहतर राष्ट्रीय सहमति से जिसमें एक से एक विद्वानों का इन्वाल्व्मेंट हो और तब हम लोग भी सरकार पर कंपेल करेंगे। सरकार पर क्या कंपेल करना है, हम सब लोग तय करेंगे। यह संसद तय करेगी। यहां से बनेगा। ...( व्यवधान) यहीं से तय होगा। हमारे कहने से तय नहीं करेगा। यही लॉ मेकिंग बडी है और इस पर अंगुली उठाते हैं-बताइए। बच्चियों को कहीं बंडी पहना कर बैठा देता है। नेताओं से क्या कमेंट करवा रहा था और हेट्रेड पैदा करवा रहा था? बोलता है मन है मैला दिल है का, ओ ओ ओ..........( व्यवधान)

सभापति महोदया :  लालू जी, कृपया आप अपनी बात समाप्त करें।

…( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद : इसलिए मेरा पूरा हाउस से अपील है, सभी माननीय सांसदों, नेताओ से अपील है कि जिन दलों का जो भी स्टैंड हुआ, हम तो तीन प्वाइंट वाला पर कोई कमेंट नहीं कर सकते हैं। जूडिशीएरी के ऊपर अंकुश लगाने के हम सख्त विरोधी हैं। बाकी अप्वाइंटमेंट के लिए आप ने जो कहा है, सुषमा जी ने जो कहा है कि कमीशन बने लेकिन जूडिशीएरी को डिमॉरलाइज नहीं करना चाहिए। वह ऐसा न महसूस करें नहीं तो ऐनार्की हो जाएगा। ऐसा नहीं है कि हर जगह सभी बेईमान लोग ही हैं - राजनीति में बेईमान लोग हैं, जजेज बेईमान हैं। सब ऐसा नहीं है। हर तरह के लोग हैं। अच्छे लोगों की बदनामी नहीं होनी चाहिए। हमारा सरकार से और पूरे सदन से अपील है कि सारे प्रोसीडिंग का, सारे लोगों के भाषण को संग्रह कर के स्टैंडिंग कमेटी में भिजवा दीजिए। इस फोरम का आप वायलेशन करते हैं, कांग्रेस के लोग, कांग्रेस सत्ताधारी दल तो मेरा मानना होगा कि आप संविधान और संसद के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। चाहे नतीजा जो भी होगा अनशन तोड़वाइए। अपील तो कर ही रहे हैं अब क्या करें? हड्डी-गुड्डी तो सब बोल दिया, लेकिन माने नहीं। हमने कहा था, वहां बैठी है दीदी सुषमा जी ऑल पार्टी मीटिंग में हम लोग जाएंगे तो लोग भड़केगा। हमने यही कहा था कि सुपरमैसी है पार्लियमेंट। हमने यही कहा था कि इस देश में दूसरा कोई गांधी नहीं हो सकता है, लोकनायक जयप्रकाश नहीं हो सकता है। हम प्रयास कर सकते हैं लेकिन इस बात को लेकर उल्टा-पुलटा, लालू विरोध कर रहा है। ...( व्यवधान) चाहे जो भी हो, हर बात में तो आगे हम ही को खड़ा कर दिया जाता है। इसलिए आप से निवेदन है कि पूरी बात को भेजिए, अन्ना जी सहित उनके और जो साथी हैं छांट कर किसी को भेजेंगे तो हम लोग सुनेंगे। फिर समझ कर आपके पास लाएंगे। आप यह सब पास करिएगा उसके साथ हम लोग सब रहेंगे।

   

सभापति महोदया : कृपया आप सभी शांति से सुने।

…( व्यवधान)

सभापति महोदया : कृपया शांत रहे। बैठ जाइए। हम बहुत गंभीर विषय पर चर्चा कर रहे हैं।

…( व्यवधान)

* SHRI O.S. MANIAN (MAYILADUTHURAI):I am happy to put forth my views on behalf of my party AIADMK about the setting up of a Lokpal. Right from 1968 at least on nine occasions this was taken up in this august House and was given up every time. Now due to the most respected Anna Hazare's fast that has crossed eleventh day and also due to the impact it has had on the youth of the country, all over the country this discussion assumes greater importance.

All the political parties, social activists, try to root out corruption and bribery. There is no difference of opinion on this. The difference comes only on the question of including lower level Government employees and on the question whether to include Prime Minister in the ambit of Lokpal. Our Leader J. Jayalalitha, the Chief Minister of Tamil Nadu has clearly stated that Prime Minister must be spared from Lokpal.

In the recent times the issues of corruption have greatly affected the minds of our countrymen. This has been felt all over the country right from the Himalayas to Kanyakumari as a scandal has been taken up for a legal enquiry under the supervision of the Supreme Court of India which has taken upon itself to  intervene. Aadharsh scam, Commonwealth games scam, huge loss civil to our public sector organisation   in the civil aviation has all appalled our people. Can we get justice in the court enquiries? There is also a question as to whether we can put an end to corruption of this nature.

Corruption has crept into judiciary to and this is the biggest threat to our democratic body polity. So the judiciary must also come under the ambit of Lokpal. Anna Hazare's fast and the support he has got are arising out of the concern and the concerted action to see that democracy does not become a mockery.

 

Parliament alone can legislate. People outside the Parliament can only make appeal for legislation. Instead if anyone threatens saying that he would end his life, if his bill is not legislated is an action against our constitution. Both the ruling party members and the members from the opposition in the parliament have to go to people in the next polls.  It is only people's verdict that is going to rule the country again. So people are the right judges. Their judgement can take the country in the right path. That is the reason why Anna Hazare could draw the attention of the people of the country through his non-violent agitation in the form of fast. When some officers are identified as honest officers and when some political leaders are referred to as non-corrupt honest politicians a question naturally comes as to what about others and who they are?

Though we can take some action against corruption with the existing mechanism available in the form of IPC and Vigilance and Commission and the anti- corruption wing of CBI, they are all found to be inadequate. The people of our country feel that we must take strong and stringent and right actions. AIADMK is of the view that the Lokpal bill that is to be passed accordingly must be a strong one.

Corruption begins with the Elections faced to seek power and it continues in the implementation of Plans and Schemes. We must change it right in the beginning.

          We respect Anna Hazare's initiative. Hence we appeal to him to end his fast. He must continue to serve the people of the country. We need his service and sacrifice. So we urge upon him to give up the fast. Let me thank the Chair for giving me this opportunity to place my views before this House. Thank You. Vanakkam.

   

*SHRI SHIVKUMAR UDASI (HAVERI): Mr. Anna Hazare’s three demands to the Prime Minister includes, Citizen’s Charter, Lokayuktas in all States with Lokpal powers and inclusion of lowest bureaucracy under the ambit of the Bill.       

I am sure, the Parliament will find effective ways and means to discuss the Jan Lokpal Bill, along with the Government version of the Bill, Aruna Roy’s Bill and the paper presented by Jaiprakash Narayan of the Lok Satta.

The Union Government has asked Parliament to consider Mr. Anna Hazare’s three key demands within the Constitutional framework and by preserving Parliament’s supremacy.

I also demand that NGOs, Media groups and Corporate houses should be brought under the purview of the Lokpal. If the Lokpal Institution indulges in corrupt practices, where the complaints should be lodged to investigate and prosecute wrongdoers, Lokpal Bill should take into account the above concerns, while passing the Lokpal Bill.

I personally feel that all political parties should accept the draft of this resolution with some riders.  My Party has already backed these points during the Lokpal debate.  I also appeal Team Anna to persuade the Gandhian to end his fast which has entered its 12th day.

I would like to lay on the Table of the House my views on Lokpal Bill.

                           

SHRI H.D. DEVEGOWDA (HASSAN): Madam Chairperson, only three minutes’ time has been allotted to my Party.  I am not going to exceed that timelimit. I respect the allotment of time by the Chair. 

          Madam, I am waiting from the morning to speak.  I will just take three minutes.  I do not want to make a lengthy speech.  The hon. Leader of the House has made a statement today.  We have been closely watching the outcome of the statement by way of discussions on the floor of the House.  Just day before yesterday, the hon. Prime Minister had made a statement.  Every Member of this House including the Leader of the Opposition has appreciated it; and they have all accepted the points raised by the hon. Prime Minister. The whole House was with him… (Interruptions)

MADAM CHAIRMAN : Please maintain order in the House.

SHRI H.D. DEVEGOWDA : I do not know what happened day before yesterday night and yesterday night as various versions in the media were witnessed.  We are not a party for any discussions.  Today, your good self, in your statement, 40 issues were raised.  Out of 40 issues, we have thrashed out 18  issues; and there were also seven issues, which were controversial and there were divergent views.  Lastly, there are three issues, which we need to discuss.  They are: (i) whether the jurisdiction of the Lokpal should cover all employees of the Central government, (ii) whether it will be applicable through the institution of the Lokayukta in all states, and (iii) whether the Lokpal should have the power to punish all those who violate the 'grievance redressal mechanism' to be put in place.

          I would like to just draw the attention this august to a Bill, which had been passed in Karnataka in 1984 by the Government of Karnataka. It was the Karnataka Lokayukta Bill.  Our former Chief Minister of Karnataka Shri Hegdeji and former Law Minister of India is also sitting here.  The public servants who are covered by that Act include :-

·      The Chief Minister;    

·      All other  Ministers and Members of the State Legislature;   

·      All officers of the State Government;    

·       The  Chairman, Vice Chairman of local authorities, Statutory bodies or Corporations established by or under any law of the State Legislature, including Co-operative Societies    

·        Persons in the service of Local Authorities, Corporations owned or controlled by the State Government, a company in which not less than 50% of the shares are held by the State Government, Societies registered under the State Registration Act, Co-operative Societies and Universities established by or under any law of the Legislature.   

It is a model legislation, which was brought in 1984. How has it been watered down today?  I do not want to drag the names of any party or any party leader.  This was a law enacted by the Janata Party Government in Karnataka in 1984.

So, Sir, I would like to draw the attention  of the hon. Leader, who raised these three main issues; whether to incorporate them in the Lokpal Bill, which is going to be considered by the Standing Committee. I would only say that it is for the Standing Committee to consider what it has been mentioned in the 1984 Loyayukta Bill, which had been passed in Karnataka.

Madam, I do not want to take much of the time of the House. I know my limitations because we are only three Members from our party.  But I had been waiting since morning   from 11 o’clock  for my turn to speak. Yes, we have to bow our head to the Chair.  There is only one thing, which I would like to say. The corruption was also there from the days of Late Pandit Jawaharlal Nehru.  

   

18.00 hrs.           Nobody can deny that. But from 1991 after the economic reforms were introduced, on one side there was the growth of our economy, what you call the GDP growth and on the other side the growth of corruption also simultaneously was going on and we must remember this.

          What is Harshad Mehta’s case? What is Ketan Parikh’s case?

MADAM CHAIRMAN : It is six o’ clock. If the House agrees, we extend the House till 7 p.m. SEVERAL MEMBERS: Yes.

MADAM CHAIRMAN: Please continue.

SHRI H.D. DEVEGOWDA: The hon. Prime Minister has also taken his own decision to bring some of these issues under the Lokpal Bill. The Leader of the House is trying his best to see that the whole atmosphere calms down and Anna Hazare Ji discontinues his fast or breaks his fast. You are doing your best. I must compliment you on behalf of my Party.

          Only one thing I would like to say regarding the corporate houses. What happened to Enron? Advani Ji is here. What happened to Enron? What happened to Satyam? What happened to Bangalore-Mysore Infrastructure Corridor? I must say that today the corporate houses are one of the breeding centres for corruption. Both the officials and the politicians are colluded or in nexus whatever you may call.

          These are some of the issues which everybody has to think over. Your goodself during the period of elections went on agitating throughout the country that the black money which has been deposited in various banks outside India should be brought. That is one of the main issues you have raised. We have no objection. During our period, we declared only one issue, that is, voluntary declaration. The Finance Minister at that time Mr. Chidambaram refused. Our Left Party colleagues had agreed to what I proposed. The total amount of money that had been declared was Rs.33,000 crore and the revenue we had generated was Rs.10,800 crore. I am only mentioning that. I was not responsible for the amount of black money which was generated at that time. I had taken the charge on 1st June 1996. About the amount of black money, my colleague was mentioning that it was of the order of Rs.60 lakh crore. He was commenting that it was Rs.60 lakh crore or Rs.60 million. I do not want to go into these issues. The Opposition Leader mentioned that the amount of black money, according to Wanchoo Committee, was Rs.7,000 crore. There is no need for me to deliberate on all those details in this short time. I do not want to make a long speech.

 I only appeal to the entire House to find out a solution to see that Anna Hazare Ji breaks his indefinite hunger strike. There must be some tolerance. We should all collectively pass a Resolution or whatever the views expressed by the hon. Leader of the House and the Leader of the Opposition should be taken note of and see that the whole atmosphere should be brought down to normalcy.

       

*श्री चंदूलाल साहू (महासमंद)ः मैं जन लोकपाल विधेयक के चर्चा में प्रतिपक्ष नेता माननीय सुषमा स्वराज के वक्तव्य से सम्बद्ध करते हुए कहना चाहता हूं कि देश में आज भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर फैला हुआ है।  हवा में भ्रष्टाचार है, नैतिक मूल्यों में गिरावट आई है।  भ्रष्टाचार, नौकरशाही, राजनीति और अपराधियों के बीच के गठजोड़ का परिणाम है। साथ ही साथ, चुनाव प्रक्रिया, चुनाव में बढ़ते हुए खर्च तथा राजनीति का अपराधीकरण एवं व्यापक निरक्षरता प्रमुख कारण है।  हम सबकी चिन्ता भ्रष्टाचार को खत्म करने का होना चाहिए।

        श्री अन्ना हजारे जी भ्रष्टाचार निरोधक कानून "जन लोकपाल विधेयक "  लिए 12 दिनों से अनशन पर बैठे हुए हैं, लोखों लोग उनके साथ हो गए हैं।  हम उनकी भावनाओं का समर्थन करते हैं और कोई ऐसा कानून बने ताकि भ्रष्टाचार जड़ से खत्म हो, ताकि हमारी नई पीढ़ी को इससे निजात मिले।  आज बड़े-बड़े लोगों के बड़े-बड़े भ्रष्टाचार में लिप्त होने की जानकारी मिल रही है।  नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की  रिपोर्ट में करोड़ों-करोड़ों रुपए के भ्रष्टाचार उजागर हुए हैं, किन्तु विशेष कार्यवाही नहीं हो पाई।  इसलिए आज आम जनता संसद की ओर निहार रही है और कह रही है कि हम अन्ना जी के साथ हैं, जन लोकपाल विधेयक लाओ, भ्रष्टाचार मिटाओ।  किन्तु केन्द्र में बैठी हुई सरकार ना नुकुर करते-करते विलम्ब कर रही है, भ्रष्टाचारियों को बचाने का प्रयास कर रही है, जो राष्ट्रीय हित में ठीक नहीं है।  हम मानते हैं कि सिर्फ एक कानून बना लेने भर से भ्रष्टाचार दूर नहीं होगा, बल्कि इसका व्यापक प्रचार-प्रसार होगा, इसलिए जनजागरुकता एवं दृढ़ इच्छाशक्ति आवश्यक है।

        देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण कालाधन में इजाफा हुआ है। परिणामस्वरूप देश में महंगाई बढ़ी है और आम जनता इसकी मार झेल रही है और सोने की चिड़िया कहलाने वाला देश आज गरीबी के कगार पर खड़ा है। इसलिए हम सब मिलकर ऐसा सशक्त, प्रभावशाली एवं सर्वव्यापी कानून बनाए, जो देश, प्रदेश एवं गांव तक पहुंचे, जिसके दायरे में, नेता, अधिकारी, कर्मचारी, पत्रकार, समाजसेवी एवं उद्योग घराने के लोग आए और भ्रष्टाचार करने के पहले परिणाम के बारे में सोचे तथा हमारा देश भ्रष्टाचार मुक्त देश बनकर पुराना वैभव और गौरव प्राप्त कर सकें।

                                         

*श्री अशोक अर्गल (भिंड)ःआज जिस भ्रष्टाचार पर चर्चा हो रही है,  यह केवल अवैध धन की उगाही का मामला नहीं है।  बल्कि यह हमारे पूरे तंत्र (सिस्टम) का मामला है।  चाहे लाल फीताशाही हो या बड़े पदों पर बैठे हुए लोगों की आम जन के प्रति संवेदनहीनता, ये सब भी तो भ्रष्टाचार ही है।  हमें विचार करना होगा कि क्या कारण है जो अचानक अन्ना हजारे जी या बाबा रामदेव जैसे समाजसेवियों के पीछे पूरा देश खड़ा हो गया है। हमारे देश के युवा हों या वृद्ध, महिलाएं हों या बच्चे, आज अन्ना जी के साथ खड़े हैं। हमें इनके कारणों पर विचार करना होगा तभी हम किसी निष्कर्ष पर पहुंच पाएंगे।  

        मेरा मानना है कि यूपीए की वर्तमान सरकार ने भ्रष्टाचार की समस्त सीमा रेखाएं तोड़ दी हैं, ये 2जी स्पेक्ट्रम, कॉमन वेल्थ गेम, आदर्श सोसायटी घोटाला आदि की अनुमानित रकम में शून्य नहीं लगा पाए क्योंकि इन घोटालों की अनुमानित राशि में शून्य लगाने में समय लगता है।  विदेशों में भी आज इतना काला धन जमा है कि यदि वह वापस लाया जाता तो पूरे भारत का नवनिर्माण किया जा सकता है और पुनः सोने की चिड़िया के नाम से जाने जाना लगेगा।

        तब जनता मन ही मन में भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों और इस तंत्र से नफरत करने लगी।  लेकिन जनता अपनी बात कहती किससे?  जनता जाती तो किसके पास  जाती?  क्योंकि उनको समझ में आने लगा कि यह केवल नाम के लिए जनतंत्र है और उन्हें यह लगने लगा कि जनतंत्र के मंदिर संसद में भी वोटों की खरीद फरोख्त,  कर सरकार बचाने की कोशिशें की जाती हैं।  इसी सदन में चंद रुपयों की खातिर 11 सांसदों की सदस्यता समाप्त की जाती है।

        यह प्रश्न मेरे सामने भी था।  जब जुलाई 2008 में हमको यूपीए 1 सरकार को बचाने के लिए वोट देने पर बदले में करोड़ों रुपए दिए जाने का मामला आया। हमने भी सोचा कि हमको इस भ्रष्टाचार को देश की जनता के सामने उजागर करना है तो हम किसके पास जाएं?  हम पुलिस पर भरोसा करें या सीबीआई जैसी किसी अन्य संस्था पर?  विपत्ति में या निर्णयों के क्षणों में हर आम भारतीय का प्रश्न होता है कि हम किसके पास जाएं।

        बिल्कुल यही प्रश्न परसों टीम अन्ना के लोग कर रहे थे कि पहले कपिल सिब्बल जी से वार्ता विफल रही, सलमान खुर्शीद जी से भी वार्ता विफल हो गई, फिर भी सरकार के न0. 2 माने जाने वाले सबसे ताकतवर मंत्री प्रणब मुखर्जी से भी वार्ता विफल हो गई।  

        ऐसी ही विषम परिस्थितियों में जनता के पास अन्ना जी हजारे जैसे ऊंचे आदर्श पूर्ण जीवन जीने वाले व्यक्तित्व की चुनौती आई और देखते ही देखते पूरा भारत अन्ना जी के साथ हो गया।  चाहे गांव हो या शहर हो स्कूल के बच्चे हों या मंदिरों के पुजारी हो, सेना के सैनिक हों या न्यायपालिका के जज हों,  सभी एक स्वर में अन्ना के साथ हैं। मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारों में अन्ना के स्वास्थ्य के लिए दुआएं की जा रही हैं और पूरे सदन ने उनसे अनशन समाप्त करने का आग्रह किया है।

        ये वह समय है जब यहां पर बैठे हम सभी जनप्रतिनिधियों को इस देश के नागरिकों को यह बताना होगा कि हम आपके लिए दिन-रात काम करते हैं। हमें ऐसा कहना भी होगा और हमें ऐसा करना ही होगा।  अन्यथा वह दिन दूर नहीं कि राजनेता के रूप में हमारा सम्मान समाप्त हो जाएगा।

        इसलिए मेरा एक सुझाव यह भी है कि जब हमारा संविधान बना, संसद जैसी संस्थाएं बनीं, तब इंटरनेट जैसा कोई भी प्रभावशाली साधन हमारे पास नहीं था।  मेरा अनुरोध है कि आज भारत के करोड़ों युवक इनटरनेट के माध्यम से जुड़े हुए हैं।  इन करोड़ों युवकों के महत्वपूर्ण सुझाव हम तक आ सकें।  इसके लिए हमें जन संसद के नाम से एक नई ऑफीशियल बेव साइट बनानी चाहिए।  ताकि भारत का कोई भी आम नागरिक अपने सांसद को कोई भी सलाह या सुझाव या जानकारी सीधे दे सकें।  इसी जन संसद की बेवसाइट पर यह भी प्रत्येक सांसद को लिखना होगा कि आज पूरे दिन में वह सांसद कहां रहा और उसने देश के लिए जनता के लिए क्या किया?  जनता हमसे ज्यादा उत्तरदायित्व की अपेक्षा कर रही है और वह गलत नहीं है, वह बिल्कुल सही है।

        इसलिए अब हमें एक मजबूत एवं प्रभावी लोकपाल की दिशा में आगे कदम उठाना चाहिए।  ऐसा मेरा सदन से अनुरोध है।   

                           

* श्रीमती सुशीला सरोज (मोहनलालगंज):  मैं अन्ना जी के लिए कहना चाहती हूं कि आने वाली सन्तानें हम पर गर्व करेंगी, हमने अन्ना को देखा है।     

          मैं अन्ना जी की कोई चापलूसी नहीं करना चाहती, बल्कि इस महान विभूति को सलाम करना चाहती हूं, जिसने अपने संघर्ष और आंदोलन के द्वारा पूरे देश को एक छतरी के नीचे लाकर खड़ा कर दिया है। आज चारों तरफ भारत माता की जय, वंदे मातरम, इंकलाब जिन्दाबाद के नारों से पूरा देश गूंज रहा है। यह वह भीड़ है, जो बार-बार आ रही है। जनता वह नहीं, जो ई-मेल से साथ दे, जनता वह है, जो आज भी रोटी के लिए लड़ रही है। आज राजनीति व राजकोष की निगरानी पर जनता की दृष्टि धारदार हुई है। भ्रष्टाचार आम आदमी का मुद्दा बना है। पहले सबकी पीड़ा थी, अब सबका साझा गुस्सा है। आश्चर्य है केन्द्र सरकार ऐसी बात क्यों नही समझ रही है।

          मैं अपने सुझाव देना चाहती हूं। सरकार को नये विधेयक में कुछ निश्चित सिद्धांतों पर ध्यान देने की गारंटी देनी होगी और टीम अन्ना को भी उन प्रावधानों को हटाने पर सहमत होना होगा। जिन्हें कुछ ज्यादा ही कठोर माना जा रहा है। गतिरोध तोड़ने के लिए निम्नलिखित सिद्धांत प्रस्तुत किए जा सकते हैं और इनके आधार पर नया बिल तैयार किया जा सकता है-

          भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए तमाम एजेन्सियों को पूरी तरह सरकार व कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त कर दिया जाना चाहिए। उन्हें फिर किसी एक व्यक्ति अथवा नामित या नियुक्त समूह के अधीन नहीं रखना चाहिए। ऐसी एजेन्सियां 7 या 11 सदस्यीय समिति के अधीन रहे। सदस्यों का यचन ठोक-बजा कर किया जाना चाहिए। गड़बड़ी करने वाले सदस्य को उपराष्ट्रपति की अध्यक्षता वाली एक कमेटी द्वारा बर्खास्त किया जा सकता है। जिसके अन्य सदस्यों में प्रधानमंत्री व लोक सभा के नेता प्रतिपक्ष होने चाहिए।

           भ्रष्टाचारी के ख़िलाफ़ कार्रवाई में पद के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। चपरासी से लेकर प्रधानमंत्री तक को समान मानना चाहिए। इसके लिए प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायर में लाया जाना ज़रूरी है। इसी प्रकार संयुक्त सचिव व इसके नीचे के अधिकारियों में कोई अंतर नहीं होना चाहिए। सीवीसी एक्ट की धारा 26 के तहत जांच करने तथा धारा 18 के तहत मामला चलाने की अनुमति लेने की आवश्यकता का प्रावधान खत्म किया जाना चाहिए।

 

* Speech was laid on the Table            न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाना उचित नहीं है। एक लोकतंत्र में न्यायपालिका अन्तिम निर्णायक और क़ानून व संविधान की व्याख्याता होती है। न्यायपालिका की जवाबदेही के लिए अलग तंत्र राष्ट्रीय न्यायिक आयोग बनाना चाहिए। इसका फैसला अंतिम होना चाहिए।

           हमारे संविधान ने शक्तियों के विभाजन का सिद्धांत दिया है, जबकि प्रस्तावित जन लोकपाल में जांच, नियोजन, निगरानी और शास्कीय शक्तियां एक ही संस्था को देने का प्रावधान है। यहां तक की कुछ हद तक दंडित करने का अधिकार भी जन लोकपाल के पास है। वर्तमान में इनमे से अधिकांश शक्तियां सरकार के पास हैं। इन शक्तियों के कारण ही सरकार भ्रष्ट और अनियंत्रित हो गई है।

           प्रवर्तन निदेशालय को सीबीआई के साथ मिला देना चाहिए और तमाम जांचों की जिम्मेदारी इनकी ही होनी चाहिए। लोकपाल के जिम्मे प्रशासकीय निगरानी का काम सौंपना चाहिए, जो आजकल सीवीसी के जिम्मे है। वर्तमान में सीवीसी बेहद कमज़ोर संस्था है। स्वतंत्र जन लोकपाल को इसका स्थान ले लेना चाहिए।

           भ्रष्टाचार व काले धन संबंधी क़ानूनों को काफी सख्त बनाए जाने की ज़रूरत है। भ्रष्टाचार निरोधक एक्ट के तहत दण्ड श्रेणीबद्ध होना चाहिए। जितनी अधिक राशि का भ्रष्टाचार हो, उतना ही कड़ा दण्ड हो। यह दण्ड आजीवन कारावास तक होना चाहिए।

           कानून में शिकायतकर्ता की रक्षा होनी चाहिए।

           मजबूत लोकपाल बिल में अनुसूचित जाति-जनजाति, पिछड़े वर्ग व अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के साथ-साथ महिलाओं को भी प्रतिनिधित्व देने का सुझाव रखती हूं।

          अपने सुझावों के साथ-साथ अंत में मैं अन्ना हजारे जी से समाजवादी पार्टी की ओर से तथा अपने संसदयी क्षेत्र के हजारों लोगों की ओर से अनशन तोड़ने की अपील करती हूं।

           

 *SHRI RAMEN DEKA (MANGALDOI): Today, corruption is a major issue and it should be addressed in totality. Corruption caused concern to every sphere of life. The suffering of common man due to corruption is unthinkable. To root out this evil factor, we need a strong and powerful Act which can perish the corrupt at all levels.

          Corruption in the highest level which should be dealt with strong hand. The common people face difficulties to get a driving license, electric connection, ration card etc. and they are forced to give bribe. The lower bureaucracy which deals with common people is more corrupt and pollutes the society. In view of this, the lower bureaucracy should be in the ambit of Lokpal.

          The mechanism to judge the corruption in judiciary should be discussed threadbare by this august House.

          Today, people want a corruption free India. We must stand on this occasion to make our country corruption free.

          A strong, vibrant and powerful Lokpal Bill will only be able to solve the problem of corruption.

          I am concerned with the deteriorating health of Anna Hazare. I appeal to him to end the fast. Further, I appeal to the Government to expedite the process to bring the Lokpal Bill.

                                                                                                                   

* Speech was laid on the Table *श्री विष्णु पद राय (अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह):  63 साल से सरकार को लोगों ने सुना है।  लेकिन कम से कम एक बार सरकार को लोगों को सुनना चाहिए।  यह है जनलोकपाल और लोकायुक्त की बात।

        3 अप्रैल, 1963 में डॉ.एल.एन.िंसघवी, कांग्रेस सांसद प्रशासन रिफोर्मस में लोकपाल तथा लोकायुक्त का प्रस्ताव लाए थे।  

        1969 में कांग्रेस सरकार ने लोक सभा में लोकपाल और लोकायुक्त का प्रस्ताव पारित कराया था, भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाने के लिए। लेकिन लोक सभा भंग होने के कारण तथा कांग्रेस में विभाजन होने के कारण, राज्य सभा में यह विधेयक पारित नहीं हो सका।  माननीय प्रणव बाबू ने 2001 में लोकपाल का समर्थन करते हुए प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने का सुझाव दिया था।

        पहली बार भारत में भारत के लाल माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने स्वयं प्रधानमंत्री के नाते भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाने के लिए प्रधानमंत्री को इस बिल में शामिल किया था।  इसको कहते हैं, देश प्रेम, कहते हैं लोकशाही सेवक, इच्छा शक्ति का प्रगटीकरण।  लेकिन आज यह इच्छाशक्ति यू.पी.ए. सरकार के मुखिया में नही है।

        आजादी के 63 साल के बाद आम आदमी को रिश्वत देना एक आम बात हो चुकी है, रिश्वत लेने में और देने में बुरा नहीं समझता है।  क्या यह लोकशाही है?

        सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के भ्रष्टाचार के ऊपर बार-बार टीका टिप्पणी की है लेकिन सरकार के आंख और कान गंधारी की तरह पट्टी बांधकर अंधा और बहरे बन गए हैं।  कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट की एक सख्त टिप्पणी आया है - सरकार हर एक काम की रिश्वत का रेट क्यों नहीं तय करती?  सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सी.वी.सी. की नियुक्ति, 2जी घोटाला, आदि भ्रष्टाचार के ऊपर सख्त टिप्पणी की है।

        आज 2जी के मामले में कोर्ट में खड़े होकर पूर्व मंत्री राजा, वर्तमान सांसद तथा उच्च सरकारी कर्मचारी, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, वित्त मंत्री को कटघरे में विटनेस के लिए बुला रहे हैं।

        कानून की आंखों में सब बराबर है।  तो प्रधानमंत्री उससे बचकर क्यों रहेगा? 

        सिटीजन चार्टर की बात करें तो 63 साल बाद भी लोगों को छोटा-छोटा काम कराने के लिए ऑफिस में चक्कर पर चक्कर और रिश्वत पर रिश्वत के बिना काम नहीं होता है।

        सांसद भी एक नागरिक है और संसद में शून्यकाल में मैटर ऑफ पब्लिक इर्म्पोटेंस (आम आदमी की समस्यायों पर) उठाते हैं और रिपोर्टर ब्रांच से मेहनत करके उस वक्तव्य को लिखित में सांसद को मिलता है।  लेकिन इस पर कोई कार्यवाही नहीं होता है। शून्यकाल में आम आदमी की तकलीफ सुनने के लिए सरकार की ओर से मंत्री भी नहीं रहते।  मुझे तो लगता है कि शून्य प्रहर को सरकार बंद कर दे या सही लोक सभा चले और लोगों की समस्याओं पर  प्रशासन या सरकार कार्यवाही करने के लिए सिटीजन चार्टर में यह भी लाये।

        सांसद के पत्र  सरकार के मंत्रालय में भेजने के बाद तथा सांसद व्यक्तिगत रूप से मिलने के बाद भी कोई सही कार्यवाही नहीं होती केवल नाम के लिए पावती मिलती है और जवाब सही नहीं होता है।  यह हालत है  लोक सभा में पार्लियामेंट प्रश्नों की।

        अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में आम आदमी के वास्ते स्वास्थ्य, शिक्षा, ब्रिज आदि के लिए भी संसद की मांग पर भी कोई कार्यवाही नहीं होती।  भ्रष्टाचार पर प्रमाण के साथ सांसद लिखने के पश्चात् भी कोई कार्यवाही नहीं हो रहा।  सुनामी में सुनामी के नाम पर लूट हुई लेकिन सब चुपचाप बैठें हैं।

        सांसद निधि में भी काम नहीं हो रहा है,  अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में।  सांसद काम को रिकमंड करके दो साल हो चुके हैं लेकिन अफसर की काम करने की इच्छाशक्ति नहीं है।   14वीं लोक सभा में सांसद निधि का पैसे से कम्प्यूटर, सेलरी, फैक्स मशीन आदि खरीदा गया और अंडमान प्रशासन सब जानते हुए भी चुपचाप रहा।

        केन्द्रशासित प्रदेश विधान सभा के बिना जैसा अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप, दादर नगर हवेली, दमन दीव में कई स्थानों में लैफ्टीनेंट गवर्नर हैं और कई स्थानों में प्रशासक भी हैं।  अतीत में अंडमान निकोबार द्वीपसमूह में लैफ्टीनेंट गवर्नर ने करोड़ों रुपयों का भ्रष्टाचार किया और सरकारी कर्मचारी को भ्रष्टाचार में लिप्त किया।  इन राज्यों में विधान सभा नहीं है, सारे अधिकार उपराज्यपाल तथा प्रशासक के हाथ में है, जो खुद प्रधानमंत्री भी है, गृह मंत्री भी है, मुख्यमंत्री भी है।  सब का विधाता एक व्यक्ति है।  आम लोगों में भ्रष्टाचार की चर्चा हो रही है।  आज जब प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री लोकपाल और लोकायुक्त में आयेगा, तो केन्द्रशासित प्रदेश विधानसभा के बिना जैसा अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप, दादर नगर हवेली, दमन दीव में कई स्थानों में लैफ्टीनेंट गर्वनर है और कई स्थानों में प्रशासक है, इनको भी लोकपाल अथवा लोकायुक्त में लाया जाये।

        अन्ना जी के जनलोकपाल को जनसमर्थन प्राप्त है और आज लोक सभा और सरकार द्वारा इस पर सख्त कानून न बनाने के कारण आम जनता अन्ना जी के माध्यम से देश में क्रंति लेकर आयी।  यह क्रंति शायद देश की आजादी की दूसरी क्रंति है।  इस क्रंति से भ्रष्टाचार मुक्त होने से देश में आगामी पीढ़ी को अच्छे दिन देखने को मिलेंगे।

        अन्ना जी के जनलोकपाल में प्रधानमंत्री को लायें।  इस बात का मैं भी समर्थन करता हूं और इस बारे में नेता प्रतिपक्ष ने भी जोरदार पक्ष रखा है।  सरकारी लोकपाल भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने के लिए बना है, उसके एक-दो उदाहरण हैं, सरकारी लोकपाल में जांच के लिए 7 साल जबकि जनलोकपाल में 6 महीने से 2 साल। सजा के बारे में सरकारी लोकपाल में 6 से 7 महीने और जनलोकपाल में कम से कम 6 साल या उम्र कैद।

        घोटालेबाजों से रूपया वसूली के लिए कोई विधान सरकारी लोकपाल मे नही है, जबकि जनलोकपाल मे वसूली की व्यवस्था है।  सी.बी.आई. और सी.वी.सी. आज देश में एक सरकार का हथियार है।  विरोधी पक्ष और जिन्होंने सरकारी भ्रष्टाचार के ऊपर आवाज उठाई है,  उस पर सी.बी.आई. भूत की तरह सवार होगी।  अंडमान निकोबार द्वीपसमूह में करीब 100 सरकारी अफसर के घर में सी.बी.आई. रेड हुआ, केस बना, परन्तु एक भी जेल नहीं गया। इसलिए जनलोकपाल मे सी.वी.सी. और सी.बी.आई. को लाया जाये।

        सरकारी कर्मचारी छोटे से बड़े तक सभी को लाया जाये क्योंकि सब पब्लिक सर्वेन्ट हैं।  उच्च अधिकारी छोटे आदमी से फाइल बनाता है लेकिन सरकारी कर्मचारी के साथ ज्यादती न हो इसका प्रावधान रहे।

        इसलिए मैं अन्ना जी का तीन मांगों का समर्थन करता हूं -

1.     सिटीजन चार्टर - आम आदमी का अधिकार

2.     सरकारी कर्मचारी बड़ा या छोटा सब लोकपाल के दायरे में आये।

3.     प्रधानमंत्री, सी.वी.सी., सी.बी.आई. सभी इसके दायरे में आये।

        अन्ना जी 74 साल के देश के गांधी के रूप में एक महान व्यक्ति आये हैं।  हम हिन्दू लोग कहते हैं कि हमारा पुनर्जन्म होता है।  शायद अन्ना जी की आत्मा में महात्मा गांधी जी का विचार पूर्ण छा गया।  तभी तो करोड़ों लोग देशभक्ति का झंडा लेकर वंदेमारतम्, भारत माता की जय कह रहे हैं।  आज आजादी की लड़ाई की बात याद आती है।  लोक सभा में हरियाणा का एक युवा घुस गया और जनलोकपाल, अन्ना हजारे का आवाज बुलन्द की।  इसलिए मैं अनुरोध करूंगा कि सरकारी दल गरूर में न रहें और अन्ना के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए लोकशाही को सम्मानित करते हुए लोक सभा धर्म का प्रतीक बनकर एक प्रस्ताव पारित करे और उस प्रस्ताव में सभी दल, सभी सांसद एक वाक्य से भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने के लिए अन्ना के जनलोकपाल तथा अन्ना जी की तीन मांगों का समर्थन करते हुए प्रस्ताव पारित करे, अन्यथा देश में एक क्रंति आयेगी।  Either Pass the Resolution Or Face the Revolution.

 

*SHRI KABINDRA PURKAYASTHA (SILCHAR): Today the 27th August, 2011 is a memorable day in the political history of our country.  The discussion as regards Jan Lokpal Bill will pave the way for passing the Bill which is a historic event.  This is the 9th attempt for passing the Lokpal Bill in the Parliament. But the rousing of public sentiment for the Bill is extraordinary this time.  As if the whole nation woke up on the clarion call of Shri Anna Hazare. That had never happened earlier though attempt for passing Lokpal Bill started since 1968.  Involvement of mass people has given the movement a special feature.

          Now the question is regarding acceptance of this Jan Lokpal Bill drafted by the Civil Society under the leadership of Shri Anna Hazare.  There are several salient features of this Bill: (a) Whether a single Act be provided for both the Centre and the state? So far as I understand that Constitution allows cover of both in a single Act.  This may be done in the public interest; (b) Prime Minister needs to be brought within the purview of the Lokpal in consideration of making the Lokpal more fruitful.  Otherwise importance of the Act will definitely be less.  But there should be exception like internal security etc; and (c) The activities of the Members of Parliament outside the Parliament be brought within the purview of the Act.

          Shri Anna Hazare demanded that all employees of the Central Government should be brought within the jurisdiction of the Bill.  The Govt. Lokpal Bill talks about the high officials only.  But the grassroot level mass people need not have generally anybusiness with the high officials.  They always come in contact with the lower bureaucracy for their small purposes and face extreme trouble.  So, the lower bureaucracy also should be brought within the jurisdiction of the Bill.  That should be applicable in the state also through the Lokayukta.

          A responsible person should not violate the mechanism of redressal of grievance.  But now a days everywhere it is found that violation has become the rule causing immense miseries to the mass people.  So, for giving a proper check to this, Lokpal should be given power.

          In the present day of corruption a very strong and effective Lokpal Act should be enacted and brought into force.  This will definitely help the nation to be free from corruption.

*श्री घनश्याम अनुरागी (जालौन):  लोकपाल विधेयक पर आज देश पूरी तरह से एकजुट है और पूरा सदन इस अत्यंत गंभीर एवं आवश्यक मुद्दे पर विचार-विमर्श उपरांत इसे अमलीजामा पहनाने की कवायद में लगा है।  मैं भी इसमें अपने समर्थन के साथ कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं।

        साठ के दशक से ही लोकपाल संस्था की मांग की जाती रही है।  कुछ राज्यों में लोकपाल (लोकायुक्त) हैं भी।  कहीं मजबूत, तो कहीं कमजोर।  इसमें किसी का उदाहरण देना बेमानी है।  पिछले कुछ वर्षों में देश में भ्रष्टाचार के रिकार्ड कायम हो गए हैं।  इस विधेयक को देशहित में लाने के लिए हम भी प्रतिबद्ध हैं।  मैं चाहता हूं कि लोकपाल बिल एक ऐसा बिल बने जिसमें किसी भी तरह का कोई किंतु-परन्तु न हो ताकि जो भ्रष्टाचारी पूरे देश को खोखला करने में जुटे हैं, उन पर पूर्णतः शिकंजा कसा जा सके।  पूरा संसद इस पर एकमत होना चाहिए कि भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाना है।  इस बिल के माध्यम से ऐसा संभव हो, ऐसा मैं चाहता हूं।  अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर हमें इस राह में एक कदम ताल से चलना होगा।

        लोकपाल बिल के दायरे में और भी कुछ प्रावधानों को जोड़ा जा सकता है जिनसे उचित व्यवस्था बनाये रखने एवं भ्रष्टाचार को समाप्त करने में सहायता प्राप्त होगी।  उच्च औद्योगिक घरानों, बड़े पूंजीपतियों और जो मीडिया के प्रबंध तंत्र के रूप में और मीडिया की आड़ में ढेर सारे बड़े धंधे करते हैं और मीडिया को व्यापार के रूप में एवं विज्ञापनों द्वारा मनमाने तरीके से धन अर्जित करते हैं।  यहां तक अपने कर्मचारियों को वेतन भी नहीं देते हैं, उनको भी दायरे में आना चाहिए।  एन.जी.ओ. (समाजसेवी संस्थायें) इत्यादि को भी इस बिल के दायरे में लाया जाये तो मैं समझता हूं कि यह भी एक बड़ी पहल होगी और काफी हद तक भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकता है।  जजों के लिए एक न्यायिक आयोग हो।  सभी विभागों में पूरी पारदर्शिता के साथ कार्य होना चाहिए ताकि भ्रष्टाचारी नामक कीड़े को किसी भी कोने में छुपने का कोई स्थान न मिले।

        आज संसद में सभी लोग इस बिल के गठन के लिए एकजुट हैं।  कहीं कोई गुंजाइश नहीं है।  देशहित के लिए हम सदैव एकजुट हैं।  किसी भी मुद्दे पर सभी पार्टियों में मतभेद हो सकते हैं लेकिन मनभेद किसी भी पार्टी में नहीं होना चाहिए। विचार भिन्न हो सकते हैं लेकिन दिशा सबकी एक होनी चाहिए।  देश के उत्थान के लिए समाज के हर वर्ग का प्राणी अपनी सभी व्यक्तिगत इच्छाओं को ताक पर रखकर देश के लिए आगे बढ़ता है।

        मेरा आग्रह है कि इस लोकपाल के गठन के दौरान यह निश्चित रूप से ध्यान रखा जाये कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक समुदाय की जनसंख्या के आधार पर उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाये, जिससे इस समुदाय के लोगों को न्याय मिल सके।  इन वर्गों के लोगों की भावनाओं को भी यदि इसमें शामिल किया जाये तो यह उचित होगा।  इन वर्गों के लोगों की आबादी के अनुसार लोकपाल के गठन, उसके प्रारूप एवं गठित समिति में उनकी भागीदारी होना नितांत आवश्यक है ताकि उनके साथ किसी भी तरह का अन्याय न हो सके।  ऐसा करने से एक प्रभावी एवं सशक्त लोकपाल बिल का गठन होना सुनिश्चित हो सकेगा।

        जो भी प्रावधान इस लोकपाल बिल में जोड़े जाने हैं या जोड़े जायेंगे, उनमें हमारे विचारों का भी ध्यान रखा जाये तो मैं समझता हूं कि यह लोकपाल बिल एक बहुत ही जनोपयोगी सिद्ध होगा।  इस बिल के माध्यम से काफी हद तक समाज में फैली अव्यवस्था को काबू में लाया जा सकता है और भ्रष्टाचार निवारण हो सकेगा।  लोकपाल बिल लागू होने के उपरांत इसमें यह भी प्रावधान होना चाहिए कि समय-समय पर इसकी समीक्षा हो ताकि इसमें यदि कोई कमजोर कड़ी बची हो या कुछ नया जोड़ना हो तो उसे पुनः दुरुस्त किया जा सके।

        आज हम जनलोकपाल बिल पर चर्चा करने के लिए सदन में आये हैं।  इसक साथ तीन और बिल भी हैं।  मैं चाहूंगा कि इन सभी बिलों पर एक सामूहिक चर्चा भी होना चाहिए।  इसमें जो भी निष्कर्ष निकलेगा, वह अमूल्य होगा, ऐसा मेरा मानना है।  जितना बहस होगा उतना ही मंथन होगा और मंथन से जो निकलता है वह सचमुच बहुत ही सोने से शुद्ध होता है।

        संविधान के अनुसार लोक सभा को जो शक्तियां प्रदत्त हैं उन शक्तियों को कोई भी चुनौती नहीं दे सकता, चाहे वह कोई भी हो।  संविधान सर्वोपरि है।  लोक सभा के सम्मान को किसी भी तरह कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।  आज पूरे देश में सांसदों को अपमानजनक शब्दों से परिभाषित किया जा रहा है।  यह बहुत ही निराशाजनक है।  इतिहास गवाह है गांधी जी के किसी भी आंदोलन में इस तरह की भाषा का इस्तेमाल नहीं हुआ है।  सांसदों की अपनी एक गरिमा है, सांसद भी अपने क्षेत्र के साथ-साथ पूरे  देश के हित में कार्य करता है।  यह संसद केवल एक इमारत नहीं है।  सदस्यों के द्वारा बनी एक संस्था है, संसद है।  ऐसा भी सुनने में आया कि सांसदों को इम्तिहान देना चाहिए और 60 प्रतिशत नम्बर आने पर ही उनको टिकट दिया जाये।  मैं यह कहता हूं कि सांसदों को 15-16 लाख लोगों द्वारा इम्तिहान लेकर ही संसद भेजा जाता है। ऐसा कहना कहां तक उचित है? यह बड़ा शर्मनाक एवं अपमानजनक है।

        देश की जनता के साथ अन्याय न हो।  सबकी बात सुनने के बाद और विचार करने के बाद सदन एक निर्णय पर पहुंचे और वह निर्णय सबको मंजूर होना चाहिए।  आज जनलोकपाल पर चर्चा हो रही है।  इस बिल में अच्छी बातें भी हैं, जिन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, लेकिन सुषमा जी ने पहले का जिक्र किया कि इससे पहले नौ बार यह बिल लाया जा चुका है।  लेकिन यह सत्य है कि कभी भी इस सदन ने यह बिल पास नहीं किया।  क्यों नहीं किया, इसमें मैं नहीं जाना चाहता।

        इतिहास देखें तो भ्रष्टाचार से लड़ने का समाजवादियों का इतिहास रहा है।  जितना समाजवादियों का इतिहास रहा है, उतना किसी का नहीं रहा है।  मैं यही बताना चाहता हूं कि सबसे बड़ा आन्दोलन किसी ने पूरे देश में किया तो वह जयप्रकाश नारायण जी ने किया था।  इतना बड़ा आन्दोलन कि एक चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करने का काम किया।  इतना बड़ा आन्दोलन इस देश में किसी नेता ने करने का काम नहीं किया।  यह भी समाजवादी थे।  समाज के उत्थान के लिए हमारे नेता गरीबों की भलाई के लिए इसी लड़ाई को जारी रखे हुए हैं।  

        आज यह स्थिति उत्पन्न क्यों हुई?  इस असामान्य स्थिति के लिए सरकार का हर निर्णय और उसका लचर रवैया ही जिम्मेदार है।  अगर सरकार ने पहले ही पूरे सदन को विश्वास में ले लिया होता तो शायद यह नहीं होता। यह स्थिति पैदा करने की पूरी जिम्मेदारी सरकार की है।  हमने इस बिल के सदंर्भ में अपना पक्ष बता दिया है।  लेकिन मेरा आग्रह है कि पूरे सदन की भावनाओं से अन्ना जी को अवगत कराया जाये और उस अनशन को तुड़वाया जाये।  साथ ही यह भी बताया जाये कि आपके सिद्धांतों को मान लिया गया है।  उनके अनशन को समाप्त करवाया जाये।  ऐसा पूरा सदन चाहता भी है।  अन्ना जी को भी सदन की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।  मैं इन्हीं बातों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं।

       

*श्री कमलेश पासवान (बांसगांव):  आज भ्रष्टाचार हमारी जड़ों तक पहुंच गया है जनता आज भ्रष्टाचार से त्रस्त है, हमारी पार्टी भ्रष्टाचार की हमेशा खिलाफ रही है, परन्तु मैं धन्यवाद देता हूं श्री अन्ना हजारे जी को जिन्होंने इसे पूरे समाज को इस मुद्दे पर एक कर दिया है।

        आज जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट होकर खड़ी हो गयी है तथा समाज हम से एक सख्त कानून चाहता है।  सरकार के द्वारा जो लोकपाल बिल लाया गया था वो इतना कमजोर है कि उससे भ्रष्टाचार नहीं रोका जा सकता।  भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए एक मजबूत लोकपाल बनाना होगा।  हमारी पार्टी पहले से ही कहती रही है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के अन्दर होना चाहिए।

        इसके अलावा जनता आज हर दिन पटवारी बाबू के बीच फंसी हुई हैं। इस लोकपाल में नीचे के अधिकारी भी शामिल हो।  जिससे आम आदमी भी भ्रष्टाचार से राहत पा सके।  हमें इस पर भी सोचना होगा कि 42 सालों में हम क्यों नाकाम रहे, लोकपाल को पारित करने में कहीं न कहीं इसके लिए हमें इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए।  परन्तु अभी भी वक्त है कि हम अपनी गलतियों से सबक लें और लोकपाल बिल को पारित करें।

        इसके अलावा हमें इसका भी ख्यान रखना है कि लोकपाल की नियुक्ति में पारदर्शिता रखी जाये।  लोकपाल पर ईमानदार कर्त्तव्यपरायण व्यक्ति ही बैठे।  मैं व्यक्तिगत स्तर से व पार्टी की तरफ से भी श्री अन्ना हजारे जी से प्रार्थना करता हूं कि वह अपना अनशन खत्म कर दे।  उन जैसे महापुरुषों की देश को बहुत ही आवश्यकता है।

 

*श्री समीर भुजबल (नासिक):  देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए एक मजबूत कानून बने।  मैं इस बात का भी समर्थन करता हूं कि सरकारी तंत्र द्वारा एक निश्चित समय सीमा में लोगों की आवश्यकता को पूरा करने संबंधी एक सिटीजन चार्टर की भी हमें जरूरत है।

        हमें केन्द्रीय व राज्य कर्मचारियों को देश के लोगों के प्रति जवाबदेह बनाने की जरूरत है।  हाल के वर्षों में सरकार ने ऐसे कई उपाय किए है जिनसे सरकारी नौकर ज्यादा से ज्यादा जवाबदेह हुए हैं।  सूचना का अधिकार कानून इसका एक उदाहरण है।  हाल में केन्द्र और कई राज्यों की सरकारों ने भ्रष्टाचार को मिटाने  और पारदर्शिता लाने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा दिया है।  यह बताते हैं कि सरकार अपने नागरिकों को बेहतर सेवा देने और भ्रष्टाचार मिटाने के लिए कितनी गंभीर है।

        केन्द्र में मजबूत लोकपाल का समर्थन करते हुए हमें राज्यों में इसी तरह के मजबूत लोकायुक्त की जरूरत है।  राज्यों के लोकायुक्त के गठन के क्रम में हमें राज्य सरकार को भी शामिल करना चाहिए और केन्द्रीय कानून की तर्ज पर एक मॉडल मसौदा तैयार करना चाहिए, जिसे शीघ्र लागू किए जाने के लिए राज्य सरकारों को भी जारी किया जाए।  यह सोचना कि भ्रष्टाचार केवल सरकारी तंत्र में है, इसी समस्या को बहुत छोटा करके देखना होगा। वास्तव में नागरिक, जीवन के हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार का सामना कर रहे हैं।  हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ, रिश्वत लेने और देने के खिलाफ, एक मजबूत, बहुत बड़ी जनजागृति की जरूरत है।

        यह एक कठोर सत्य है कि अपनी रोज की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए, जैसे कि राशन कार्ड लेना, खाद्य सामग्री वितरण, जमीन दस्तावेज, ड्राइविंग लाइसेंस आदि ऐसे और भी कई मामले हैं जो निचले स्तर की नौकरशाही के द्वारा निपटाये जाते हैं।  हमें इस स्तर पर एक प्रूफ व्यवस्था की जरूरत है जो भ्रष्टाचार से निपट सके।

        यद्यपि मैं इस बात पर अवश्य बल देना चाहूंगा कि आज जबकि पूरी सरकारी मशीनरी को एक ही नज़र से देखा जा रहा है और वह है भ्रष्टाचार, किंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी प्रणाली में सैकड़ों, हजारों ईमानदार और निष्ठापूर्वक कार्य करने वाले कर्मचारी है जो नागरिकों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए रात दिन कार्यरत हैं।  हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारी सारी पहलों में ईमानदार और निष्कपट कर्मचारियों का बचाव भी होना चाहिए जिससे वे अपना सर्वोत्तम देश को दे सके।

        देश में चुनाव सुधार बहुत महत्वपूर्ण पहलू है।  यह साबित हो चुका है कि देश में चुनाव कराये जाने की वर्तमान प्रणाली भी भ्रष्टाचार का एक कारण है।  सार्वजनिक जीवन में प्रिंट और इलैक्ट्रानिक मीडिया की भूमिका सराहनीय है।  मैं मीडिया के कुछ भागों द्वारा चुनाव के समय समर्थन के लिए अपनाई गई प्रणाली, पैसा लेकर समाचार देने पर भी अपनी चिंता व्यक्त करता हूं।

        आज सारा देश मजबूत लोकपाल बनाने की बात कर रहा है।  मैं श्री अन्ना हजारे जी को हार्दिक धन्यवाद और भारी संख्या में सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अत्यधिक जागृति और उसे मुख्य मुद्दा बनाने पर सराहना करता हूं।  मैं और अपने नासिक संसदीय क्षेत्र की आम जनता की ओर से संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया के माध्यम से मजबूत लोकपाल लाने का पूरी तरह से समर्थन करता हूं।  हमें संसदीय प्रणाली में पुनः विश्वास कायम करने के लिए काम करने की आवश्यकता है।

        अंत में, मैं श्री अन्ना हजारे जी को अनशन वापस लेने का निवेदन करता हूं।  हम विकास जैसे मुद्दों सहित देश के समक्ष आये विभिन्न मुद्दों पर उनसे लगातार मार्गदर्शन लेते रहेंगे।

                                                 

*श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर):  नेता सदन द्वारा जनलोकपाल विधेयक के संबंध में दिये गये वक्तव्य के संबंध में निम्नांकित सुझाव ले करना चाहता हूं।

        देश में जनभावनाओं को देखते हुए सशक्त एवं प्रभावी लोकपाल की आवश्यकता है जिससे प्रत्येक क्षेत्र में बढ़ रहे भ्रष्टाचार की प्रवृति पर अंकुश लगाया जा सके तथा तय समय सीमा में भ्रष्टाचारी को दंड मिलने की व्यवस्था होने से सार्वजनिक क्षेत्र, नौकरशाही एवं स्थानीय स्तर भ्रष्टाचार कम होने की व्यवस्था विकसित हो सके।

        प्रस्तावित लोकपाल बिल के दायरे में प्रधानमंत्री को सम्मिलित किया जाना चाहिए, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व व्यवस्था से संबंधित विषयों को इससे पृथक रखा जाना चाहिए।  प्रधानमंत्री मंत्री के नाते जो कर्त्तव्य निर्वहन करते हैं और इससे किसी व्यक्ति को लाभ होता है तो ऐसे विषय लोकपाल के दायरे में रहने चाहिए।

        दुनिया की सभी लोकतंत्रीय व्यवस्थाओं में न्यायपालिका को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष बनाया गया है। भारत में भी संविधान निर्माताओं ने इस सिद्धांत का पालन किया है, लेकिन न्यायपालिका में बढ़ रही भ्रष्टाचार की शिकायतों के संबंध में इस मांग को बल मिला है कि न्यायपालिका के भी भ्रष्ट जजों की जांच होनी चाहिए। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट के जजों को लोकपाल के दायरे में तो सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन राष्ट्रीय विधि आयोग बनाकर उच्चतर न्यायपालिका को जवाबदेही बनाया जाना आवश्यक है।  भारत में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को भी संविधान की मूल भावना के अनुरूप रखा जाना आवश्यक है।  वर्ष 1993 से पूर्व जजों की नियुक्ति कार्यपालिका की सहमति से की जाती थी, लेकिन 1993 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने इस व्यवस्था को बदल दिया और कॉलेज्यिम पद्धति प्रारंभ कर दी इससे उच्चतर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की संभावनाएं बढ़ गई है।  अतः वर्ष 1993 से पूर्व की व्यवस्था को प्रारंभ किया जाये।  इसके अतिरिक्त देश में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का भी गठन किया जाये।  जिससे समाज के सभी वर्गों को न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व मिले और प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से आने से योग्यतम नागरिकों को स्थान मिल सके और उन  अखिल भारतीय सेवाओं की भांति आचरण और आचार संहिता के नियम बनाये जाये।

        देश में कार्पोरेट क्षेत्र, गैर-सरकारी संगठनों एवं प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया के क्षेत्रों में भी भ्रष्टाचार के समाचार सुनने को मिलते हैं।  इन क्षेत्रों का भ्रष्टाचार भी कहीं न कहीं अन्य सेक्टरों का भ्रष्टाचार बढ़ाने में मदद करता है।  अतः भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहिम में समग्र दृष्टि अपनाते हुए सभी क्षेत्रों के भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए लोकपाल बिल में या समानान्तर रूप से आगामी प्रस्तावित बिलों में इन क्षेत्र का भ्रष्टाचार समाप्त करने की भी व्यवस्था होनी चाहिए।

        नेता सदन ने जो तीन बिन्दुओं पर सदस्यों की राय मांगी है उसके संबंध में अनुरोध है कि नेता प्रतिपक्ष श्रीमती सुषमा स्वराज ने जो सुझाव सरकार को दिये हैं उनके साथ मैं भी अपने आपको संबद्ध करता हूं।

        प्रस्तावित लोकपाल संविधान की भावना के अनुरूप बने।  संविधान के मूल ढांचे को किसी तरह से क्षति नहीं पहुंचे तथा संसद की सर्वोच्चता बरकरार रखते हुए सशक्त लोकपाल विधेयक निर्मित किया जाना चाहिए।

        प्रस्तावित लोकपाल बिल में लोकपाल एवं लोकपाल के सदस्यों के रूप में जो नियुक्ति होनी है उससे समाज के कमजोर वर्गों विशेष रूप से अनुसूचित जाति व जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

        कानून सशक्त हो यह आवश्यक है, लेकिन भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने के लिए  भ्रष्टाचार की जड़ पर प्रहार करना पड़ेगा।  इसके लिए प्रारंभिक शिक्षा के समय से ही स्कूली पाठय़क्रम इस तरह से निर्धारित किया जाये कि भारत के नागरिकों में चरित्र निर्माण और संस्कार निर्माण के संस्कार ज्यादा विकसित हो और भ्रष्टाचारी को देशद्रोही की श्रेणी में रखे जाने से संबंधित पाठय़क्रम में विषय सम्मिलित हो तभी कहीं जाकर सुसंस्कारित और अच्छे चरित्र के नागरिक बनेंगे, जिन पर भविष्य में भारत का प्रशासन, राजनीति, मीडिया, व्यापारिक संस्थान, न्यायपालिका, अन्य निजी संस्थान, आदि चलाने का भार आने वाला हो।

        भ्रष्टाचार एक सामाजिक बुराई है। इसलिए समाज के किसी भी क्षेत्र में भ्रष्ट आचरण के द्वारा यदि पैसा कमाया जाता है तो उसको हीनदृष्टि से देखे जाने की प्रवृत्ति पैदा होनी चाहिए या उसका सामाजिक बहिष्कार किये जाने से संबंधित राष्ट्र में सामाजिक संस्कार विकसित होने चाहिए और यदि भ्रष्टाचार रहित जीवन व्यतीत करने वाला कोई नागरिक हो तो उसको सम्मान की दृष्टि से देखे जाने की प्रवृत्ति विकसित होनी चाहिए।

        वर्तमान समय में प्रत्येक राजनीतिज्ञ को बेईमान समझने की जो प्रवृत्ति विकसित हुई है उसमें सरकार को यह पहल करनी चाहिए कि जितने भी सांसद हैं उनकी खुफिया रिपोर्ट सरकार के पास उपलब्ध एजेंसियों से प्राप्त करनी चाहिए और जो अच्छे चरित्र से जीवन व्यतीत कर रहे हैं या किसी भी भ्रष्ट आचरण में लिप्त नहीं हैं उनकी भी सारी सूचना सरकार को मंगवाकर संसद को उपलब्ध करवाई जानी चाहिए।  ऐसी सूचना सरकार को प्राप्त करने में कोई ज्यादा दिक्कत नहीं आयेगी क्योंकि सर्वेक्षण करने से उस क्षेत्र में रहने वाले राजनीतिज्ञ की पूरी जानकारी प्राप्त हो जायेगी और उसकी एक वेबसाईट बनाकर क्षेत्र की लोकप्रियता के बारे में जो सरकार को रिपोर्ट प्राप्त होती है वो तथ्य अंकित होने चाहिए जिससे चरित्रवान सांसद या किसी राजनीतिज्ञ का मनोबल बढ़ेगा और वह हमेशा अच्छे चरित्र की ओर अग्रसर होने का ही प्रयास करेगा और जो सांसद या राजनीतिक उस वेबसाईट के पैरामीटर में खरे नहीं उतरते हैं उन्हें भी उस पैरामीटर की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी व अच्छा चरित्र निर्माण करने के प्रयास करेंगे।

                                               

वाणिज्य और उद्योग मंत्री तथा वस्त्र मंत्री (श्री आनन्द शर्मा): माननीय सभापति महोदया, आज भारत की संसद, यह सदन और राज्य सभा एक ऐसे वि­ाय पर चर्चा कर रही हैं, जिससे पूरे रा­ट्र का संबंध है। यह ऐतिहासिक चर्चा भी है और एक ऐसा समय भी है जब हमें, जो इस संसद में हैं, जो देश के कानून बनाने का संवैधानिक अधिकार रखते हैं, देश से संबंधित, जनता से संबंधित वि­ाय पर चर्चा करते हैं। हमको यह सोचने का भी समय है कि जो विषय उठे हैं, उनकी गंभीरता में कोई दो राय नहीं है, इस सदन में दोनों पक्षों ने इस बात को कहा, नेता प्रतिपक्ष ने बात शुरू की, सत्ता पक्ष की ओर से और सब राजनैतिक दलों ने अपनी-अपनी बात कही। इससे एक बात स्पष्ट है कि भारत की संसद सचेत है, सतर्क है, संवेदनशील है, देश के हालात पर नज़र रखती है, देश की आवाज़ सुनती है और फिर अपना फ़ैसला करती है। यही प्रजातत्र का एक बुनियादी नियम और असूल है। हमें पृष्ठभूमि को देखना होगा कि किस पृष्ठभूमि में यह चर्चा हो रही है। यह सही बात है कि एक आंदोलन देश में चला। पहले भी अप्रैल के महीने में यह बात उठी थी, आज फिर यह आंदोलन उठा है। इस आंदोलन के माध्यम से भ्रष्टाचार का जो विषय है। देश में ऐसी संस्था बने, राज्यों में ऐसी संस्था बने, जो मज़बूत और सशक्त हो। प्रधानमंत्री जी ने इसी सदन से कहा, नेता प्रतिपक्ष और पूरे सदन ने एक आवाज़ में यह बात कही कि एक सशक्त लोकपाल समय की आवश्यकता, पुकार और संसद की प्रतिबद्धता और सहमति है। इसमें कोई विवाद नहीं है। यह सोचना की कौन सा ऐसा भ्रष्टाचार है, जिसमें दो मत हो सकते हैं, मैं समझता हूं कि इस पर भी केवल एक ही मत है, हर पक्ष और व्यक्ति का, जो इस देश की गरिमा को देखता और समझता है, जो इस देश के भविष्य के प्रति चिंतित है और विशेषकर एक बड़े संघर्ष के बाद देश ने प्राप्त किया है, जिसके हम वारिस हैं, इस देश की आज़ादी, इसकी संस्थाएं, इसकी संसद की गरिमा, संसद की सोवरैनिटी। उसका भी सम्मान करते हैं। इस देश में यह चर्चा नहीं हो सकती है कि कौन सर्वापरि है? संविधान सर्वोपरि है। जहां तक सप्रभुता की बात आती है, भारत की जनता सप्रभु है। वह सॉवरेण्टी इस देश की संसद में निहित है। यहां निवास करती है। संविधान के निर्माता, इस देश के राष्ट्रीय आंदोलन के अग्रिम सेनानी थे। यह आज़ादी और संविधान बहुत क़ुर्बानी के बाद इस देश को मिला है। हम सौभाग्यशाली हैं, मेरी पीढ़ी के लोग, जो आज़ादी के तुंत बाद पैदा हुए। एक आज़ाद हिन्दुस्तान, जिसमें इस देश की जनता अपने नियम बना सकती, अपना संविधान लिख सकती थी, अपने निर्णय कर सकती है। सिर झुका कर जीने का अधिकार नहीं, सिर उठाकर जीने का अधिकार मिला है। इसलिए यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है। आज नेता सदन ने यह बात कही कि जो भी हम काम करें, जो भी हम चर्चा करें, जो भी निर्णय करें, अपने संविधान की परिधि में होगा। संविधान से समझौता नहीं हो सकता है।  The Constitution of India is, and shall remain inviolable and non-negotiable.  आज जो चर्चा है देश में, मेरी ऐसी सोच है कि यह चर्चा राष्ट्रीय चर्चा है, एक राष्ट्रीय संवाद है। भारत की एक परंपरा रही है सदियों से कि हमारे समाज के अंदर चर्चा और चिंतन रहा है, वाद और विवाद रहा है। वाद और विवाद का मतलब टकराव नहीं है। वाद और विवाद से एक अच्छा निष्कर्ष निकलता है, सहमति बनती है समाज और देश के अंदर जो आने वाले समय में, आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करती है। एक ऐसा ही सम्वाद होना चाहिए। यह देश बड़ा है, जिसकी जनसंख्या करीब 120 करोड़ है। हम बहुभाषी हैं, बहुधर्मी हैं। हमारी विविधता हमारी शक्ति है। इसलिए इस देश की संसद में वह विविधता और डाइवर्सिटी प्रतिबिम्बित होती है कि भारत क्या है। इसीलिए सबसे बात करना आवश्यक होता है। यह विषय हो या अन्य कोई विषय हो। देश के सामने कई चुनौतियां हैं। भ्रष्टाचार एक कैंसर है। हम सब महसूस करते हैं कि माननीय श्री अण्णा हज़ारे के स्वास्थ्य के बारे में सभी को चिंता है। जो विषय उन्होंने उठाया है वह विषय किसी दलगत राजनीति की कैद में नहीं है। वह विषय पूरे भारत की जनता को त्रस्त करता है। यह कैंसर है, जिसे दूर करना आवश्यक है। परंतु उसके लिए हमें यह भी सोचना होगा कि सही क्या है।

          सदन में कई माननीय सदस्यों द्वारा कहा गया कि कौनसा भ्रष्टाचार लोगों को त्रस्त करता है और किस पर क्रोध है। माननीय नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज जी ने यह बात कही, अगर मैं सही मायने में समझ पाया कि आम आदमी कोई लाइसेंस बनवाने जाता है, जमीन के कागजात दर्ज कराने पटवारी या तहसीलदार के पास जाता है, कोई थाने जाकर पुलिस से शिकायत करने जाता है, कोई स्कूल में बच्चे का दाखिला कराने जाता है, कालेज-विश्वविद्यालय में पढ़ने जाता है या नौकरी प्राप्त करने के लिए जाता है तो हर कदम पर उसे इन सब चीजों के लिए  जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ता है। इसलिए उसे इन परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उसी परेशानी को वह सरकार के राजनीतिक नेतृत्व के रूप में देखता है। उससे वह त्रस्त है। बाकी यह सही है कि अगर बड़ा भ्रष्टाचार है, उस पर उसे क्रोध है, कार्रवाई के बारे में इतना नहीं सोचता। मैं इस पर बाद में टिप्पणी करूंगा, क्योंकि बहुत बातें सदन में उठी हैं।

          माननीय नेता प्रतिपक्ष ने भी इस पर अपनी बात कही है। मुझे एक बात कहनी है कि जहां हमारे संविधान ने हम सबको अपनी-अपनी संस्थाओं के माध्यम से, इस संस्था और अन्य संस्थाएं, यह यकीन दिलाया है कि जो हमारे मौलिक अधिकार हैं, वे हर नागरिक के सुरक्षित हैं। उन पर कोई आंच आए, उसकी रक्षा करने के लिए न्यायपालिका है, कार्यपालिका है, एक स्वतंत्र मीडिया है।

          जब हम मूलभूत अधिकारों की बात करते हैं, इस देश में आज यह भी बात उठी है, चारों तरफ अंगुलियां उठी हैं, आरोप-प्रत्यारोप का समय है, कई संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लग रहे हैं, यह बात याद रखना जरूरी है और याद दिलाना भी जरूरी है हर किसी को कि कोई ऐसी बात न करें, कोई ऐसा काम न करें, कोई ऐसा संघर्ष न करें, जिससे लम्बे समय के लिए इस देश की संस्थाओं में, अपनी गरिमा को लौटाने में मुश्किल आ जाए। कोई भी अधिकार बिना जिम्मेदारी के नहीं दिया जाता।

          संविधान सभा में बने संविधान को अगर हम पढ़ें, चर्चा करें, तो संविधान निर्माता ढाई-तीन बरस वहां बैठे रहे और हर विषय पर उन्होंने चर्चा की। जवाहर लाल नेहरू जी, मौलाना आज़ाद जी, सरदार पटेल जी, ये बहुत बड़े लोग थे। चाहते तो वे खुद संविधान लिख सकते थे। लेकिन सबसे बात करके, एक-एक व्यक्ति की बात सुनकर बाबा साहेब बी.आर. अम्बेडकर जी की अध्यक्षता में देश का संविधान लिखा गया। इस बात को हमें याद रखना होगा।  संविधान को, भारत की जनता ने अपने आप को दिया है। संविधान की प्रस्तावना में यह बड़े स्पष्ट रूप में लिखा है। हमें देखना होगा कि आज एक चुनौती आई है, कल दूसरी भी आयेंगी तथा इस देश की जनता के सामने और भी बड़ी चुनौतियां हैं। भ्रष्टाचार के बाद कई बड़े संघर्ष अभी इस देश में बाकी हैं। गरीबी, बेकारी और जो बच्चियों की हत्या की जाती है वह भी एक बड़ा सामाजिक संघर्ष होगा। जात-पांत के खिलाफ, दलितों को जो त्रस्त किया जाता है, उसके विरुद्ध, ये बड़े संघर्ष भारत के सामने बाकी हैं।

          मैंने बड़े ध्यान से माननीय सुषमा जी का एक-एक शब्द सुना। सुषमा जी, आपने सही कहा और सारा सदन प्रसन्न हुआ कि चर्चा का स्तर बहुत ऊंचा होना चाहिए, चर्चा दलगत भावना से ऊपर उठकर होनी चाहिए, चर्चा देश को सामने रखकर होनी चाहिए। आपने बहुत अच्छी बातें कीं, पर कुछ बातों पर मैं आश्चर्य-चकित रह गया। नेता प्रतिपक्ष का निजी रूप में भी और नेता प्रतिपक्ष के रूप में भी, मैं इनका बड़ा सम्मान करता हूं। मैं प्रजातंत्र का भी बड़ा सम्मान करता हूं। चर्चा चिंतन की और वाद-विवाद की तो हमारी परम्परा है। हमने आपकी बाद सुनी, अब आप हमारी बात भी सुनिये।

          मुझे इस बात पर अफसोस हुआ कि पहले सदन आश्वस्त और प्रसन्न हुआ लेकिन उसे बड़ी जल्दी तोड़ दिया गया। चर्चा का स्तर ऊपर उठते-उठते कई दिशा में भटक गया। यह कहा गया कि जब तक इन्हें, माननीय आडवाणी जी और वरिष्ठ नेतृत्व को, अन्ना हजारे जी के टीम के सदस्य जिनकी परिपक्वता और शालीनता की चर्चा आज सदन में हुई है, उसे भी मैं दोहराना चाहता हूं, कि उससे पहले इन्हें ज्ञान नहीं था। माननीय सुषमा जी, आपने स्वयं कहा कि यह विषय पुराना है। अप्रैल महीने में भी इसी विषय को लेकर एक अनशन हुआ था। उसके बाद अन्ना हजारे जी की टीम सभी राजनैतिक दलों को मिली। बीजेपी के नेतृत्व को भी मिली, कांग्रेस के नेतृत्व को भी मिली। ऑल-पार्टी-मीटिंग में भी चर्चा हुई, स्टेंडिंग कमेटी में भी वे जाकर मिले। इसलिए यह केवल कल और परसों के ज्ञान की बात नहीं है, ज्ञान हम सभी को पूरा है। मैं तो आपकी बात को सुनकर टिप्पणी कर रहा हूं, अपनी तरफ से नहीं कर रहा हूं।

श्रीमती सुषमा स्वराज (विदिशा):परसों जब टीम अन्ना हमसे मिलने आई, तब उन्होंने कहा कि सरकार की तरफ से इन तीन विषयों पर रैजोल्यूशन आयेगा और हम आपका समर्थन लेने आये हैं। हमारी इन तीन विषयों पर कुछ आशंकाएं थीं। चूंकि वे पहली बार हमसे मिले, हमने कुछ उनकी बातों को समझा और कुछ बातें हमने उन्हें समझाईं। जैसे यह लोकायुक्त वाली बात है, हमने उन्हें समझाया कि यह केवल नियम 252 में हो सकता है, संविधान आड़े आता है लेकिन संविधान की एक धारा बताती है तो वह आप मानेंगे या नहीं मानेंगे - मैंने तो सिर्फ यह कहा, ज्ञान की बात तो आई ही नहीं। मैंने कहा कि जब वे हमारा समर्थन इन तीन विषयों पर लेने आये, आपकी बात के बाद कि सरकार इन तीन विषयों पर एक रैजोल्यूशन लाएगी। आप मुख्य अपोजीशन पार्टी हैं, हम आपका समर्थन चाहते हैं। हमने तीनों विषयों पर चर्चा की और कुछ हम उन्हें समझाने में कामयाब रहे, कुछ वे हमें समझाने में कामयाब हुए, तब इन तीन विषयों पर हमारी सहमति बनी। मैंने यह कहा था।

श्री आनन्द शर्मा:   इस सदन की हर उस विषय पर सहमति बनी रहे, जिस पर राष्ट्र चिंतित है, वही राष्ट्र के हित में है। यह विवाद चल रहा है कि पंथ-प्रधान को, देश के प्रधान मंत्री को उसमें शामिल किया जाना चाहिए या नहीं किया जाना चाहिए। नेता प्रतिपक्ष के द्वारा यह भी कहा गया कि जब आपके शासन-काल में दो बिल लाए गये थे, उसमें प्रधान मंत्री जी को शामिल किया गया। अच्छा होता, यह झगड़ा और आंदोलन ही न होता, न अन्ना हजारे जी को और न आपको कष्ट होता, अगर वह पास हो जाता, क्योंकि उस समय प्रतिपक्ष मदद के लिए तैयार था।...( व्यवधान) यह आपस में एक-दूसरे की बात नहीं है, यह सही बात आपने कही कि आठ बिल आ चुके, यह बात हमने नहीं छेड़ी। प्रधानमंत्री को लाने की बात इस सदन में आज की है।  उनकी बात का उत्तर देना मेरा कर्त्तव्य है।

  18.20 hrs. (Shrimati Sumitra Mahajan in the Chair)   कृपया उसको सम्मान के साथ स्वीकार कीजिए।...( व्यवधान)

श्री नरेन्द्र सिंह तोमर (मुरैना):अधिकांश समय आपकी ही सरकार रही है। आपका जो दोष है, उसे स्वीकार कीजिए।...( व्यवधान)

सभापति महोदया :  शर्मा जी, आप चेयर को एड्रेस करके बात कहिए।

श्री आनन्द शर्मा:  मैंने किसी निजी संबोधन नहीं किया है, बड़े सम्मान से नेता, प्रतिपक्ष से बात की है।

          प्रधानमंत्री इसमें हों या न हो, उस पर एक विचार नहीं है। आपने भी कहा कि देश के पंत प्रधान देश का प्रतिनिधित्व पूरे विश्व में करते हैं, इसलिए कई सेफगार्ड्स दिए गए हैं। आपने खुद कहा कि स्टैण्डिंग कमेटी की बुद्धिमत्ता पर इस बात को छोड़ दिया जाए, यह सुझाव आ चुका है सदन के अंदर। लेकिन यह टिप्पणी कि अगर पंत प्रधान ने कह दिया कि मैं इसमें शामिल होना चाहता हूं, मगर यह कहना कि आपकी बात सुनी नहीं जाती है, मैं बड़े सम्मान से कहूं कि प्रधानमंत्री एक इंस्टीटय़ूशन हैं, देश के प्रधानमंत्री हैं, यह सोचना और कहना मैं नहीं समझता हूं कि एक जिम्मेदारी की बात है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रधानमंत्री की बात सुनी जाती है या नहीं, यह उनके मंत्री जानते हैं, उनके सांसद जानते हैं। प्रधानमंत्री का देश सम्मान करता है, ईमानदार है, चरित्रवान हैं,  विद्वान हैं।...( व्यवधान) देखिए, यहां जब हम चर्चा करते हैं, मैं कभी यह बात नहीं कहूंगा, न अपने दल के किसी सदस्य को कहूंगा कि सुषमा जी से यह प्रश्न पूछें कि आपके दल में सम्मान करते हैं या नहीं। ...( व्यवधान) यह प्रश्न उचित नहीं है कि हमारे दल में हमारे प्रधानमंत्री का क्या सम्मान है। हम मानते हैं, हम अनुशासन रखते हैं, हमारे नेता हैं, हमने चुना है। आपके दल के अंदर सुषमा जी मैं कभी यह प्रश्न नहीं पूछूंगा कि आपके दल में आपकी पार्टी के अध्यक्ष आपकी बात कितनी मानते हैं, आडवाणी जी की बात कितनी मानते हैं। मैं उस बहस में नहीं पड़ना चाहता हूं।...( व्यवधान) यह उचित भी नहीं है। यह दो दलों की बात नहीं है, यह देश की बात है।...( व्यवधान) हमको यह भी याद रखना है कि जिस समय की चर्चा हमने पहले की, प्रजातंत्र बहुत बड़ा है। सबसे बड़ा अधिकार वोट का अधिकार है। यूरोप के बहुत से देशों में वोट करने का अधिकार नहीं दिया गया था जब भारत ने इसको अपने संविधान में अपनाया।  सबको बराबरारी का दर्जा दे दिया, चाहे उस समय के बड़े उद्योगपति हों, अमीर लोग थे, बड़े राजा-महाराजा थे, आम आदमी थे, सभी को बराबरी का दर्जा दिया गया। इसका श्रेय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को दिया गया है। इसका श्रेय उस समय के संविधान निर्माताओं को जाता है। हमारी आज की सरकार पर बात नहीं है, हमारी यूपीए की सरकार ने...( व्यवधान)

श्री शरद यादव (मधेपुरा):महोदया, मैं सोचता हूं कि दिन भर से हम यहां बैठे हैं, सदन की भी राय हो जाए। सदन के नेता यहां हैं, यदि वह पहले बोल दें और उसके बाद जो वक्ता बचे हों, वे बोल लें। नेता, सदन का पहले बयान हो जाए कि सरकार इस बारे में क्या कदम उठा रही है, यदि यह सहमति बन जाए, तो इससे अच्छी कोई बात नहीं है।...( व्यवधान) लोगों का रोज़ा भी चल रहा है।...( व्यवधान) इस पर आपको रूलिंग देनी चाहिए।

सभापति महोदय : शर्मा जी, आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

श्री आनन्द शर्मा:  सभापति महोदया, मुझे एक बात और कहनी है। कल सदन में माननीय श्री राहुल गांधी जी ने अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए, अध्यक्ष की अनुमति के साथ अपनी बात कही। नेता, प्रतिपक्ष ने आज एक बहुत लम्बा समय कल के माननीय श्री राहुल गांधी जी के बयान पर लगाया, उस पर टिप्पणी करी। मैं पूछना चाहता हूं कि किस बात पर आपत्ति है? क्या इलैक्ट्रॉरल रिफार्म्स नहीं होने चाहिए? क्या स्टेट फंडिंग नहीं होनी चाहिए? एक बात उन्होंने कही कि लोकपाल की एक संवैधानिक संस्था बननी चाहिए। इसमें कौन सी बात पर आपत्ति है? ...( व्यवधान) हम समझते हैं कि उनको राजनैतिक आपत्ति है, तिलमिलाहट है क्योंकि इस कांग्रेस के पास, इस यूपीए के पास मनमोहन सिंह जी भी हैं और राहुल गांधी जी भी हैं। ...( व्यवधान) आपको भी शुभकामनाएं। मैं समझता हूं कि इस तरह का एक लम्बा समय नेता, प्रतिपक्ष ने उस बयान पर दिया।...( व्यवधान) मैं तो उनका धन्यवाद करता हूं।...( व्यवधान)

           मुझे दो बड़ी महत्वपूर्ण बातें आपके माध्यम से सदन को बतानी है। आज जो चर्चा हो रही है, वह यह चर्चा है कि देश के अंदर एग्जीक्यूटिव की क्या शक्ति है? यह भी एक संवैधानिक बात है क्योंकि देश के संविधान के निर्माताओं ने बड़ा फाइन बैलेंस ऑफ सैपरेशन इनमें रखा है चाहे लेजिस्लेचर है, चाहे एग्जीक्यूटिव है और चाहे ज्यूडिशियरी है। एग्जीक्यूटिव की जो पॉवर्स हैं, वह नीति बनाना है, उसका एग्जीक्यूशन है और तीसरी पॉवर टू पनिश है। अगर एग्जीक्यूटिव की इन तीनों शक्तियों में से किसी भी शक्ति को हटाने की बात है,  वह संवैधानिक बात है। वह बात केवल चर्चा तक सीमित नहीं है क्योंकि  Executive will become dysfunctional. This is not an issue which is frivolous. This is an issue which the House must take in all seriousness before we take any view on such matters. नेता, प्रतिपक्ष ने यह भी कहा कि राज्यों के अंदर जो लोकायुक्त बनना चाहिए, संविधान के आर्टिकल 252 का भी उल्लेख हुआ। मुझे एक बात कहनी है। लोकपाल भी बनना चाहिए, लोकायुक्त भी बनने चाहिए परंतु यह स्टैंडिंग कमेटी संविधान को देखकर तय करेगी कि क्या इसमें सही निर्णय हो सकता है क्योंकि राज्यों की जो विधान सभाएं हैं, लेजिस्लेचर हैं, उनको संवैधानिक शक्तियां दी हैं। उन शक्तियों को राज्यों को साथ मिलाकर, राज्यों की सहमति से बात आगे बढ़ती है।...( व्यवधान)

सभापति महोदया : कृपया करके अब अपनी बात समाप्त करिए। बीस मिनट से ज्यादा समय आपको बोलते हुए हो गया है। कृपया अब अपनी बात समाप्त करिए।

श्री आनन्द शर्मा:  सभापति महोदया, ...( व्यवधान) अगर टीका-टिप्पणी से समय बचे तो मैं अपनी बात समाप्त करूं।...( व्यवधान)

सभापति महोदया : अपनी सीट पर बैठकर बोलने वाले माननीय सदस्यों की टीका-टिप्पणी रिकार्ड में नहीं जाएगी।

…( व्यवधान)

MADAM CHAIRMAN : Nothing will go on record, except what Shri Anand Sharma is saying.

(Interruptions) … * श्री आनन्द शर्मा:   हर राज्य में लोकायुक्त बनना चाहिए। कई राज्यों के अंदर नहीं बना। यह विषय भी आज उठा था। गुजरात के अंदर केशूभाई पटेल ने मुख्य मंत्री के रूप में लोकायुक्त बनाया था जिसका टेन्योर वर्ष 2003 में खत्म हो गया। उसके बाद 2003 से 2011 तक कोई लोकायुक्त नहीं बना। यह भी एक सच्चाई है।...( व्यवधान)

सभापति महोदया :  कृपया करके अब आप अपनी बात पूरी कीजिए। बहुत समय हो गया है।

श्री आनन्द शर्मा: आज जो वातावरण है, उसे देखते हुए जो बातें सदन में उठी हैं, मेरा मत है कि चाहे न्यायपालिका हो, कार्यपालिका हो या हर संगठन हो, जो देश के अंदर काम करते हैं, जिनका जिक्र यहां आया, एनजीओज़ का जिक्र आया, जो बड़े कारपोरेट हाउसिस हैं, उसके साथ जिन लोगों को स्वतंत्र इच्छा व्यक्त करने का मौलिक अधिकार मिला है, मीडिया, ये ऐसे प्रोफेशन हैं जो देश की जनता के सशक्तिकरण के लिए हैं। देश और समाज की सेवा के लिए हैं इसलिए ऐसे हर प्रोफेशन पर निगाह होनी चाहिए।...( व्यवधान)

सभापति महोदया :  ऐसे नहीं होता है।

आनन्द शर्मा:  महोदया, मेरे दल का समय है।

सभापति महोदया :  प्लीज आप कन्कलूड कीजिए। सदन का समय भी देख लीजिए।

…( व्यवधान)

सभापति महोदया: आप सब बैठ जाइए। शर्मा जी, आप अपनी बात खत्म कीजिए।

…( व्यवधान)

सभापति महोदया : सिंह साहब, आप बैठ जाइए। उन्हें अपनी बात पूरी करने दीजिए तभी बात आगे बढ़ेगी।

…( व्यवधान)

श्री आनन्द शर्मा:  महोदया, मैं अपनी बात खत्म कर रहा हूं। मुझे मालूम था कि कहीं न कहीं टोकाटोकी होती है। ऐसा होता है, मुझे कोई आपत्ति नहीं है।

सभापति महोदया : आप अपनी बात कहिए।

…( व्यवधान)

श्री आनन्द शर्मा:  महोदया, यह बात भी मूलभूत है। यहां हम एक दूसरे की बात सम्मान से सुनते हैं। स्वतंत्र विचार रखने का अधिकार संसद, संविधान का है, सबका है। अगर विरोध का अधिकार है, विवाद का अधिकार है, मतभेद का अधिकार है तो सुनने की भी सहनशीलता होनी चाहिए। सच्चाई कड़वी जरूर होती है।

          मुझे अंत में एक बात कहनी है, विषय गंभीर है इसलिए हम चाहते हैं कि सदन एक मत से ऐसा कदम उठाए कि इस हालात से देश उभर सके। लेकिन आज उन्माद और जोश का वातावरण है लेकिन जोश के साथ होश जरूरी है। कहीं ऐसा न हो कि जोश में कोई ऐसा फैसला कर बैठें, ऐसा कोई कदम उठा जाएं जिसके दूरगामी परिणाम हों। हमने देश पर बात होती सुनी है, सदन को सोचना होगा क्योंकि हम जो करेंगे उसका पूरे देश पर देश के भविष्य पर सीधा असर होगा। मेरा अंत में यही कहना है कि यहां सर्वोपरि संविधान है और वहीं तिरंगे का भी सम्मान होना चाहिए। माननीय लालू जी ने तिरंगे का जिक्र किया था कि इसे फहराने के लिए बड़ी कुर्बानियां हुईं। जब यह तिरंगा दिखता है तब हमारा मन उनकी तरफ जाता है जिन्होंने यह तिरंगा दिया, संघर्ष किया, फांसी पर चढ़े, कुर्बानियां दी।...( व्यवधान) आप मजाक करें, आपका उससे कोई संबंध नहीं रहा? राष्ट्र तिरंगे का सम्मान करें। ...( व्यवधान) किस ढंग से तिरंगा फहराया जा रहा है।...( व्यवधान) हमें मालूम है क्या हुआ?...( व्यवधान) मुझे मालूम है मैं क्या कह रहा हूं।...( व्यवधान)

सभापति महोदया: आपके बोलने का समय भी है। आप बैठ जाएं।

…( व्यवधान)

श्री आनन्द शर्मा:  हमने योगदान का इतिहास पढ़ा है, इतिहास पढ़ा है।

सभापति महोदया: अब आप कन्कलूड करें। धन्यवाद।

श्री आनन्द शर्मा:  हमें मालूम है कि किसकी क्या सोच, क्या योगदान रहा है। इतिहास बदला नहीं जा सकता है। सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता है।इसे स्वीकार करना पड़ेगा, दर्द होगा लेकिन स्वीकार कीजिए। देश का सम्मान करें। आपका बहुत धन्यवाद कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया।

 

*श्रीमती जयश्रीबेन पटेल (महेसाणा)ःलोकपाल विधेयक पर मैं अपने कुछ विचार प्रकट करना चाहती हूं।  लोकतंत्र सिर्फ एक ढांचा (Structure) नहीं है बल्कि एक जीवन पद्धति (way of life) है।  चर्चिल ने भी कहा था कि लोकतंत्र में विलंब रहता है और इनमें कई खामियां भी हैं, लेकिन उससे बेहतर कोई शासन पद्धति दुनिया में नहीं है।

        लोकतंत्र को सुदृढ़, मजबूत, अनिवार्य, गतिशील बनाने में लोकमत ऑक्सीजन की तरह काम करता है।  वह लोकतंत्र को चेतनाशील रखता है।  इनमें सिविल सोसायटी, प्रेशरग्रुप्स, जनजागृति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।  

        लोकतंत्र की नींव के लिए मजबूती प्रदान करने के लिए लोकपाल एक अनिवार्य और आवश्यक कदम है।   लोकतंत्र का विचार सबसे पहले यूरोप के स्कैंडिनेवियाई देशों में उपजा था।  डेनमार्क की वर्ष 1241 की कानून संहिता में "ओम्बुड्समैंन" का उल्लेख मिलता है, जो कि लोकपाल का समानार्थी है।  

        लोकपाल विधेयक लाने की जरूरत और जनता में उनकी मांग सिर्फ भ्रष्टाचार से निजात पाने के लिए रहती है।  भ्रष्टाचार जो एक लोकतंत्र का कैंसर कहलाता है, वह लोकतंत्र को  "ल्यूकेमिया" कर देता है।

        आज  भ्रष्टाचार लोकतंत्र के स्ट्रक्चर को अंदर से खोखला बनाता जा रहा है।  इंदिरा गांधी ने भी बोला था कि भ्रष्टाचार वर्ड फिनोमिना है- "भ्रष्टाचार वैश्विक मुद्दा " है।  संयुक्त राष्ट्र ने भी उनके बारे में चिंता जताई है।  दुनिया के 192 देशों में भ्रष्टाचार व्याप्त है।  इससे अमेरिका, ब्रिटेन तथा भारत भी अछूता नहीं रहा। भारत भ्रष्टाचार से ग्रस्त और त्रस्त है।  1974 में संपूर्ण क्रंति का नारा देकर जय प्रकाश नारायण ने और हाल ही में अन्ना जी की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम चल रही है।  लेकिन भ्रष्टाचार पर सरकार कोई अंकुश नहीं लगा सकी है।  न्यायतंत्र की लंबित और विलंबित प्रक्रिया का सहारा लेकर भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े गिरोह छटक गए हैं या उनके चंगुल से बच गए हैं क्योंकि भारत सरकार की सरकारी संस्थाएं भी भ्रष्टाचार से लिप्त हैं और सरकार की इच्छा शक्ति भी इतनी मजबूत नहीं  रही है।

        आज भ्रष्टाचार का राष्ट्रीयकरण हो गया है।  आज भ्रष्टाचार संस्थागत हो गया है। भारत में भ्रष्टाचार बद से बदतर है और उसके लिए उद्योगपतियों ने भी चिंता जताई है क्योंकि इसके कारण विश्व में भारत की छवि धूमिल पड़ गई है।

        पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने भी कहा था कि हम केन्द्र से 100 रू भेजते हैं तो गांव तक जाते-जाते 15 रू. हो जाते हैं।  मतलब कि 85 प्रतिशत भ्रष्टाचार पंचायत से पार्लियामेंट तक व्याप्त है।  भारत सरकार के सभी विभाग-प्रभाग नीचे से ऊपर तक लिप्त हैं।

        लोकपाल विधेयक का 43 सालों का राजनीतिक इतिहास रहा है।  पहले प्रधानमंत्री स्व. नेहरू जी ने भी लोकपाल विधेयक लाने की पहल की थी लेकिन वह सफल नहीं हुई।  

        1968 में मोरारजी देसाई की अध्यक्षता वाले प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिश पर लोकायुक्त और लोकपाल की स्थापना के लिए विधेयक पेश हुआ।  लोक सभा में विधेयक पारित हुआ।  लेकिन उसके भंग होते ही विधेयक खत्म हो गया।

        1971 में यह विधेयक दोबारा पेश हुआ।  लेकिन छह साल तक विचार के लिए पड़ा रहा।  

        1977 में लोक सभा भंग हुई और विधेयक भी समाप्त हो गया।

        1977 में मोरारजी देसाई सरकार ने विधेयक पेश किया।  लोक सभा भंग हो गई और विधेयक खत्म हो गया।

        1985 में लोकपाल विधेयक पेश हुआ।  दोनों सदनों की संयुक्त समिति ने विधेयक पर विचार-विमर्श करते हुए 23 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की यात्रा की।  समिति का कार्यकाल आठ बार बढ़ा।  नियत समय के तीन साल बाद तक काम करती रही। नवम्बर 1988 में यह विधेयक वापस ले लिया गया।

        1989, 1996, 1998 और 2001 में गैर कांग्रेस सरकारों ने विधेयक पेश किया।  लेकिन हर बार किसी न किसी कारण से यह पारित नहीं हो सका।  संसद में आज तक लोकपाल विधेयक 9 बार पेश किया गया है।  

        एक अंदाज के मुताबिक भारत देश में हर साल 8500 करोड़ रुपए की रिश्वत दी जाती है।

        सरकार और सिविल सोसायटी के बीच 8 बैठकें हुई, 40 मुद्दों पर संसद में समझौता हुआ जिसमें से केवल 34 मुद्दों पर ही समझौता हो पाया है तथा 6 मुद्दों पर आज भी सहमति नहीं हो सकी है।  

        आज सिविल सोसायटी, केन्द्र सरकार, जे.पी. ग्रुप, अरूणा रॉय, टी.एन. शेषन ने अपने-अपने विचारों के मुताबिक लोकपाल विधेयक बनाया है।   भारत में 17 राज्यों में भी लोकपाल विधेयक पारित किया गया है और लोकायुक्त नियुक्त किए गए हैं।  लोकपाल विधेयक ने आज संसद के अंदर और बाहर भी लोकमत को उजागर कर दिया है।

        सिविल सोसायटी और सरकार के विधेयक के बीच लोकपाल विधेयक के दायरे में प्रधानमंत्री को लाने का कांग्रेस की सरकारों ने हमेशा विरोध किया है।  दूसरी ओर गैर-कांग्रेसी सरकारों ने इसकी पैरवी की है।  विधेयक को इससे पहले 8 बार लोक सभा में पेश किया, जिनमें से पहले चार विधेयकों में प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में नहीं रखा गया। बाद के चार विधेयकों में प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की बात की गई।  

हमेशा कांग्रेस ने मना ही कियाः क्रम सं.

वर्ष हां/न प्रधानमंत्री 1 1968 नहीं इंदिरा गांधी

2. 1971 नहीं इंदिरा गांधी

3. 1977 नहीं मोरारजी देसाई

4. 1985 नहीं राजीव गांधी

5. 1989 हां वी.पी. सिंह

6. 1996 हां एच.डी. देवेगोड़ा

7. 1998 हां अटलबिहारी वाजपेयी 8 2001 हां अटल बिहारी वाजपेयी

9. 2011 हां/नहीं डॉ. मनमोहन सिंह (व्यक्तिगत रूप से सहमत लेकिन सरकार सहमत नहीं)   इसके संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।  इसका अर्थ यह हुआ कि यदि लोकपाल किसी संसद के विरुद्ध उसके द्वारा सदन में किए गए आचरण की जांच करता है तो वह अनुच्छेद 105 (2) के विरुद्ध होगा, जिससे न्यायपालिका और संसद में संसदीय विशेषाधिकार को लेकर टकराव होने की संभावना बनेगी।  अतः यदि अन्ना का विधेयक इसी रूप में पारित करना है तो पहले संविधान के अनुच्छेद 105 (2) में संशोधन करना पड़ेगा, जो एक लंबी प्रक्रिया है।  इसमें निश्चित रूप से समय लगेगा। मेरी मांग है कः‑

1.  राष्ट्रीय सुरक्षा और पब्लिक आर्डर दोनों विषयों को छोड़कर प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया जाए।

2.  संसद की प्रक्रिया के तहत संसद और संविधान की गरिमा तथा सांसदों की सक्षमता को बरकरार रख कर लोकपाल बिल को प्रभावी और मजबूत बनाया जाए।

3.  न्यायपालिका, जो लोकतंत्र का तीसरा मजबूत खम्बा है, उसकी स्वतंत्रता-निष्पक्षता बरकरार रखनी चाहिए। उसको लोकपाल के दायरे में न लाए।  "ज्युडिशियरी अकाउंट बिल " जल्द से जल्द पारित करना चाहिए और नेशनल जुडिशियरी कमीशन जल्द से जल्द  बनाने की मांग करती हूं।

4.  यूपीए सरकार ने भ्रष्टाचार का राष्ट्रीयकरण कर दिया है और उसको संस्थागत कर दिया है।  उससे जल्द से जल्द देश को छुटकारा दिलाया जाए।

5.  सीबीआई जो आज कांग्रेस ब्यूरो इन्वेस्टीगेशन बन गया है,  उनकी स्वायत्ता बरकरार रखी जाए।  

मेरा सुझाव है कि

1.  सिटीजन चार्टर बनाया जाए।

2.  लोअर और अपर ब्यूरोक्रेसी भ्रष्टाचार से जो आज सामान्य जनता त्रस्त है उस पर पूरी रोक लगाई जाए तथा भ्रष्टाचार के केसों पर एपीलेट ऑथोरिटी को क्रियान्वयन किया जाए।

3.  कॉरपोरेट सेक्टर तथा भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जाए।  नौकरशाह और उद्योगपतियों के बीच जो मिली-भगत है उसको ध्यान में रखा जाए।

4.  एनजीओ (गैर-सरकारी संस्थाएं) के भी भ्रष्टाचार सामने आए हैं। उनके क्रियान्वयन में कभी-कभी राष्ट्रीय हित विरोधी क्रिया चलता है, उन पर रोक लगाई जाए।

5.  राज्यों में मॉडल लोकायुक्त बिल लाकर पब्लिक ग्रिवेंसिस सिस्टम और मैकेनीजम सिस्टम को कार्यान्वित किया जाए।

6.  लोकपाल या लोकायुक्त के पास द्वेष प्रभाव से बदले की भावना से और हैरान-परेशान करने के लिए गलत कम्पलेंट की जाए, उनके बारे में पनिशमेंट के प्रावधान होने चाहिए।

     मेरी मांग है कि आज भ्रष्टाचार के सामने दुनिया तथा भारत भर में जन सैलाब सड़कों पर आ गया है।  उनकी भावनाओं की कदर करके प्रभावी-सक्षम-मजबूत-पारदर्शी लोकपाल बिल बनाया जाए, नहीं तो जनाक्रोश की लपटों में पूरा देश आ जाएगा और उसके नतीजे मध्य-पूर्व राज्यों में जो तानाशाहों के सामने जाए और जिसने तानाशाहों की सत्ता भ्रष्ट कर दी, ऐसी भावनाओं को उजागर न होने दें।

     मैं मानती हूँ कि जन लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है, उसकी भावनाओं की हमें अनदेखी नहीं करनी चाहिए।  

*श्री प्रेमदास (इटावा)ः हमारे देश में भ्रष्टाचार का बोलबाला चल रहा है।  मैं ज्यादा गहराई में नहीं जाना चाहता हूं पर हमारे संभ्रांत सांसदों ने बहुत अच्छी तरह से अपनी बात रख दी है।  आम आदमी परेशान है, गरीब और गरीब होता जा रहा है और अमीर व्यक्ति और अमीर होता जा रहा है।  इसको रोकने की अति आवश्यकता होने लगी है।  पूरे देश में राजनीतिक लोगों को लोग खराब दृष्टि से देखने लगे हैं।  जबकि आज भी सांसद एवं जनप्रतिनिधि जनता के बीच में जाकर अपनी बात रखते हैं एवं उनकी समस्याओं के निराकरण का पूरा प्रयास करते हैं।  निम्न बातों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है-

1.  लोकपाल बिल संविधान को ध्यान में रखते हुए संसद की गरिमा को ध्यान में रखकर बनाया जाए।

2.  भ्रष्टाचार केवल सरकारी संस्थाओं में ही नहीं, गैर-सरकारी संस्थाओं में भी है।  अतः इन्हें भी दायरे में लिया जाए।

3.  सिटीजन चार्टर बनाने की भी आवश्यकता है।

4.  15वीं लोक सभा के गठन के तुरन्त बाद एक मा. सदस्य ने सदन में सवाल उठाया था कि मीडिया के लोग चुनाव में पैसे मांगते हैं।  अतः इन्हें भी दायरे में लिया जाए।

5.  श्री अन्ना हजारे जी के मंच से सांसदों के प्रति असम्मानजनक बातें कही गई। यह सदन की गरिमा पर प्रश्न चिह्न है, ऐसा करने वालों के प्रति कठोर कार्यवाही की जानी चाहिए।

6.  प्रधानमंत्री एवं मुख्य न्यायधीश को छोड़कर सभी छोटे-बड़े अधिकारियों और कर्मचारियों को दायरे में रखा जाए।   

 

* श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):महोदय, मैं कुछ सुझाव देना चाहता हूं, जो इस प्रकार हैं। नेता सदन श्री प्रणब मुखर्जी के लोकपाल गठन से संबंधित मुद्दों पर वक्तव्य पर हो रही चर्चा में मैं कहना चाहता हूं कि चार अगस्त, 2011 को सरकारी बिल पेश हुआ। यह लोकपाल बिल 9वीं बार पेश किया गया है और 43 वर्षों से लम्बित है। कब-कब क्या हुआ, जन आन्दोलन वाला बिल, सब कुछ प्रणब दादा ने विस्तार से बताया है। प्रत्यक्ष रूप से सिविल सोसाइटी से वार्ता में 9 बार बैठे, जबकि आल पार्टी लीडर्स की अनदेखी हुई। बड़े घोटालों की उत्पत्ति से अन्ना हजारे जैसे लोग पैदा हुए। 40 मूल मुद्दों में से 34 मान गए, शेष पर विवाद है। संवैधानिक दायरों में यह बिल बने। पीएम को इसके दायरे में लाना, न्यायालयों के लिए राष्ट्रीय न्यायिक आयोग बने। एसी,एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक, महिला भी लोकपाल समिति में सदस्य हों। 31 मई, 2011 को राज्य सरकारों से राय ली गयी, छः पार्टीज के प्रमुखों की राय ली। स्थायी समिति ने सम्मान देकर राय ली। बाहर कुछ लोगों ने संविधान की प्रति जलाईं। वे लोग "लोकपाल या जोकपाल"  बोलते हैं। 16 अगस्त, 2011 से अनशन शुरू किया। अनशन 12वें दिन तक जारी है। मेरी अन्ना जी से अपील है कि अपना अनशन समाप्त करें। लालू जी ने ठीक कहा है कि आप स्थायी समिति को ओवरलुक न करें, उसे सम्मान दें। इसमें फाइनल चर्चा होकर बिल पास हो। लोकपाल से तुंत भ्रष्टाचार दूर नहीं होगा। प्रशासनिक, पुलिस, जुडिशियल आदि का स्ट्रक्चर सुधारना पड़ेगा। निचले स्तर के नौकरशाहों को इसमें रखें तभी न्याय मिलेगा। पीएम का स्वागत है, सभी बिलों पर चर्चा करें। सरकारी, निजी, सुश्री राय और डा. जयप्रकाश, सभी के ड्राफ्ट्स पर विचार करें। मीडिया, कारपोरेट घरानों, एनजीओज को छोड़ा गया है, इनको भी शामिल किया जाए। बिल धारदार हो जिससे भ्रष्टाचार समूल नष्ट हो सके। लोकपाल पद पर चुना हुआ व्यक्ति संविधान की शपथ ले और तभी कार्य करे।

          लोकपाल के आधार पर ही राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति हो एवं लोकायुक्तों के अधिकार भी लोकपाल के समान हों। जिन्हें लोकपाल नियुक्त किया जाना हो, उनका नाम एवं विवरण समाचार पत्रों एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया के जरिए सार्वजनिक किया जाए तथा नियुक्ति से पूर्व जनता से राय ली जाए। लोकपाल की नियुक्ति करते समय यह ध्यान रखा जाए कि उसमें अल्पसंख्यक, दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों को उनकी आबादी के अनुपात में स्थान मिले। लोकपाल एवं लोकायुक्त के अधिकार क्षेत्र में सभी छोटे-बड़े अधिकारी, कर्मचारी, संसद सदस्य, विधायक, मंत्री एवं देश की बेंच के सभी सदस्य हों। प्रधानमंत्री   * Speech was laid on the Table को अगर लोकपाल की परिधि में लाना हो तब भी रक्षा एवं विदेश नीति से जुड़े मामलों को लोकपाल की परिधि से बाहर रखा जाए। सभी एनजीओज, ट्रस्ट, सभी कार्पोरेशन्स, निजी क्षेत्र के विश्वविद्यालय, निजी मेडिकल एवं इंजीनियरिंग कालेजों के प्रबंध तंत्र, इलैक्ट्रानिक एवं प्रिंट मीडिया, दवा बनाने वाली कम्पनियों एवं दवा विक्रेता, खाद एवं कीटनाशक बनाने वाली कम्पनियां, सभी तरह की शिक्षण संस्थाओं के अध्यापक, सभी सरकारी गैर सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर, खाद्य पदार्थों का व्यापार करने वाले सभी व्यापारी, लोकपाल या लोकायुक्त (जिसका भी क्षेत्र हो) के अधिकार क्षेत्र में लाए जाएं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105(2) जिसके द्वारा संसद के अंदर बोलने, वोट करने की संसद सदस्यों को आजादी है, पर कोई समझौता नहीं। लोकपाल के निर्णय के खिलाफ हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जाने का प्रावधान है और उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में कोई आम आदमी इसलिए नहीं जा सकता है, क्योंकि वकीलों की फीस दो लाख से पांच लाख रुपए प्रतिदिन प्रति केस होती है। इसलिए मेरी राय है कि सुप्रीम कोर्ट के वकील की फीस अधिकतम दस हजार रुपए प्रतिदिन प्रति केस और हाई कोर्ट के वकील की फीस पांच हजार रुपए प्रतिदिन प्रति केस निर्धारित की जाए।

          उपरोक्त सुझावों में जो मामले केंद्र सरकार से संबंधित हैं, उन्हें लोकपाल की परिधि में और जो राज्यों से संबंधित हैं, उन्हें लोकायुक्त की परिधि में रखा जाए।

                           

*SHRI R. THAMARAISELVAN (DHARMAPURI): The Lok Pal Bill, an effort to rein in the pervasive corruption in public life, was first mooted in the late 60s.  However, it failed to become law despite successive attempts.

          For the last few weeks the country has been witnessing a strong wave in favour of a strong Lok Pal Bill in whatever name you call it whether it is Lok Pal Bill or Jan Lok Pal Bill.

          Our beloved leader, Dr. Kalaignar had made it very clear from the very beginning that the Lok Pal Bill should cover the Prime Minister as well and it has been the consistent stand of our party since the issue of setting up of Lok Pal Bill cropped up.

          While debating on this issue in this august House today by Shri Pranab Mukherjee, he made it clear about the need to discuss (i) whether the jurisdiction of the Lok Pal should cover all employees of the Central Government, (ii) whether it will be applicable through the institution of the Lok Ayukt in all States, and (iii) whether the Lok Pal should have the power to punish all those who violate the ‘grievance redressed mechanism’ to be put in place.  Sir, When our leader, Dr. Kalaignar had made it clear that the Prime Minister should also come under the purview of Lok Pal, our party’s stand is clear that the jurisdiction of the Lok Pal should also cover all employees of the Central government and there is no doubt on it. Lok Pal will be applicable through the institution of the Lok Ayukt in all States, our party’s stand since its inception is that we should uphold the true federalism.  Therefore, Lok Pal should not encroach upon the States power and whatever the institutions functioning in this direction in the states should continue to function as it is without curtailing any power of it. Therefore, the Lok Ayuktas of the States should not come under the purview of Lok Pal Bill.  Lok Pal should have the power to punish all those who violate the ‘grievance redressed mechanism’ to be put in place.  So, these are the three main demands of Team Anna Hazare with regard to Lok Pal Bill.

          Shri Anna Hazare Deserves congratulations from all corners, for taking up Lok Pal Bill issue very seriously and he did receive appreciation from our Hon’ble Prime Minister too.  We are all in agreement with the movement he has been carrying on.  But what I disagree that no Bill or an Act or Rules can be generated outside the Parliament.  No one should bypass the procedures of this august House.  Lok Pal Bill should also be passed immediately in the same way and in the same respect as any other Bills passed in the Parliament.  The Standing Committee has the provision to obtain more views on the Lok Pal Bill from the common man and other experts.  It should not be limited to Team Anna, the people of the entire country should be provided with an opportunity to air their views on Lok Pal and frame a more meaningful Lok Pal Bill.

          With this, I conclude my speech and I support the initiative taken by the Govt. in this regard.

                                             

*श्री बलीराम जाधव (पालधर):  सदन में लोकपाल और जनलोकपाल पर आज ऐतिहासिक चर्चा हो रही है, लोकपाल बिल बहुत बार इस सदन में आया है मगर इस पर अभी तक इतनी गंभीरता से सदन में चर्चा हुई नहीं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है।  पिछले दो साल में जो भी बड़े भ्रष्टाचार हुए, यह बहुत ही भयावह है।  यह भ्रष्टाचार सिर्फ सरकार में बैठे लोगों ने किया है, ऐसा बिल्कुल नहीं है।  यह भ्रष्टाचार Media houses, NGO’s, Private big industries/companies इन सभी क्षेत्रों द्वारा हुआ है।  यह बड़ा गंभीर मामला है।  हम सबको मिलकर इस भ्रष्टाचार को मिटाना बहुत ही जरूरी है।

        लोगों में बहुत ही गुस्सा है इसलिए अपने देश में आम जनता भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना बड़ा संघर्ष कर रही है, आज भ्रष्टाचार लड़ाई का सबसे बड़ा और अहम मुद्दा बन गया है। लोगों को लोकपाल या जनलोकपाल बिल लाना यह इतना महत्व नहीं है मगर भ्रष्टाचार कैसे मिटाया जाए इसकी बड़ी चिंता है।  सवाल सिर्फ लोकपाल बिल या एक अन्ना हजारे के अनशन का नहीं है, सवाल आम जनता जिस परिस्थिति में जी रही है इसका है। जन्म से लेकर मृत्यु तक भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है।  अभी भी छोटे स्तर पर आम जनता को रोज भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ता है।  यह सिर्फ सरकारी दफ्तर में नहीं है यह सभी जगह जैसे कि Media, NGO’s, Private big industries/companies में भी है।  इसको हमें मिटाना बहुत ही जरूरी है।  इसके लिए सख्त से सख्त कानून व्यवस्था की जरूरत है।

        भ्रष्टाचार रोकने के लिए देश में CAG है, सी.बी.आई., पुलिस, जे.पी.सी. आदि विविध संस्थाएं अपने देश में है, मगर यह सब सिस्टम कमजोर बन गया है इसीलिए यह भ्रष्टाचार हो रहा है।  इसलिए हमें इस देश में सामाजिक क्रंति की जरूरत है।  लोगों को विश्वास में लेकर सख्त कानून जल्द से जल्द बनाना जरूरी है।

        मैं अन्ना हजारे का बहुत ही इज्जत करता हूं इनकी जनलोकपाल लाने के लिए जो लड़ाई है, उसका मैं और मेरी बहुजन विकास आघाड़ी पार्टी पुरा समर्थन करती है।  गांधीवादी के मूल्यों पर इस लड़ाई को अन्ना को हमारा पूरा समर्थन है।  मगर इनके Team Anna के नाम पर जो  dictatorship एवं हुकुमशाही बर्ताव जो किरण बेदी, केजरीवाल द्वारा  हो रहा है यह पूरा लोकशाही (Democracy)   के खिलाफ है और मैं इसकी निंदा करता हूं।

        अन्ना जी के जो तीन प्रस्ताव हैं - राज्यों में लोकायुक्त, सिटीजन चार्टर बने, सभी कर्मचारी लोकपाल के दायरे में हो, इसका मैं और मेरी बहुजन विकास आघाड़ी पार्टी पूरा समर्थन करती है।  भ्रष्टाचार रोकने के लिए लोकपाल बिल को मजबूत और सख्त बनाना बहुत ही जरूरी है।  मैं चाहता हूं कि देश के विभिन्न क्षेत्र के स्वच्छ ईमानदार छवि के विद्वान उसमें डॉक्टर, विधितज्ञ, साईंटिस्ट, उघोजक, किसान, मजदूर, सामाजिक कार्यकर्ता आदि सभी लोगों के कम से कम 100 लोगों की कमिटी स्थापित की जाए और कम से कम दो महीने में  लोकपाल बिल पर इनकी सिफारिश मंगवाई जाए।  और यह भी देखना चाहिए कि बाबा साहेब अम्बेडकर के Constitution में बाधा नहीं आनी चाहिए।

        मैं कांग्रेस के युवा नेता राहुल जी के लोकपाल को इलेक्शन कमिशन की तरह संवैधानिक संस्था का दर्जा दिलाने की मांग का समर्थन करता हूं।  चुनाव में जो अनाप-शनाप खर्चा होता है, उसको रोकना भी बहुत जरूरी है।  भ्रष्टाचार का एक कारण चुनाव का बढ़ता खर्च है। हमें उसको दुरुस्त करने के लिए जल्द से जल्द पारदर्शी कानून लाने की जरूरत है।

        भ्रष्टाचार के खिलाफ आम आदमी की नाराजगी को दूर करने के लिए सरकार को जल्द से जल्द सरकार की विभिन्न सामाजिक योजनाओं को पारदर्शी बनाने और सोशियल ऑडिटिंग तथा भ्रष्ट अफसरों की बर्खास्तगी के लिए सख्त कानून की जरूरत है और मुझे विश्वास है कि सरकार इस दिशा में जरूर ध्यान देगी और जल्द कानून संसद में पारित करेगी।  भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए मैं लोकपाल बिल के इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए मैं अपने इस भाषण को समाप्त करता हूं।

 

*श्री ओम प्रकाश यादव (सिवान): मैं आपके प्रति आभार प्रकट करता हूं कि आपने जन-लोकपाल विधेयक पर सदन में हो रही महत्वपूर्ण चर्चा पर मुझे बोलने का अवसर दिया। जन-लोकपाल की संस्था को स्थपित करने और उसे प्रभावी बनाने के लिए अन्ना हजारे और उनके समर्थक लंबे समय से आंदोलन कर रहे हैं।  श्री हजारे बारह दिनों से भूख हड़ताल पर हैं।  हम सबको उनके स्वास्थ्य की चिंता है।  सरकार ने अच्छी पहल की है और उनकी मांग मानने की दिशा में कुछ ठोस कदम उठाए हैं।  यह स्वागतयोग्य कदम है।  इसलिए मैं आदरणीय अन्ना जी से इस सदन के माध्यम से अपील करता हूं कि वे अपना अनशन वापस ले लें।  उनका जीवन हमारे लिए और देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। 

           सम्पूर्ण देश में भ्रष्टाचार व्याप्त है।  हम सब इससे त्रस्त हैं ओर मैं समझता हूं कि इस लड़ाई में हम सब अन्ना जी के साथ हैं।  जहां तक प्रक्रिया का प्रश्न है कि लोकपाल बिल के प्रावधान क्या हों और इस संस्था को किस प्रकार स्थापित किया, इस पर सदन चर्चा कर रहा है और अपनी संवैधानिक मर्यादा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के भीतर रहकर हम सबको एक साथ मिलकर कोई न कोई रास्ता अवश्य निकालना होगा।

           लोकपाल के मुद्दे पर अन्ना हजारे जी के पक्ष और सरकार के पक्ष में बहुत अंतर नहीं है।  सिर्फ दो-तीन मुद्दे ऐसे हैं जिन पर मतभेद खत्म नहीं हुए हैं। लेकिन जिन्हें आपसी बातचीत के जरिए दूर किया जा सकता है।   इस बातचीत में हो सकता है कि कुछ समय लग जाए, लेकिन आज सबसे पहली आवश्यकता इस बात की है कि एक वृद्ध व्यक्ति जो 12 दिनों से अनशन पर बैठा है, उसे सदन द्वारा विश्वास दिलाते हुए उसका अनशन समाप्त करवाने का ईमानदारी से प्रयास किया जाए।

           इस बात से कोई भी इंकार नही कर सकता कि भ्रष्टाचार एक ऐसा रोग है जिससे देश का प्रत्येक नागरिक किसी न किसी प्रकार से प्रभावित होता है, लेकन आम आदमी जिससे सबसे अधिक प्रभावित होता है, वह प्रशासन के निचले स्तर पर होने वाला भ्रष्टाचार है।  चाहे वह जिला अदालत का कार्यालय हो, बीडीओ, सीओ या पटवारी का कार्यालय हो या स्थानीय पुलिस थाना हो, आम आदमी इन स्थानों पर होने वाले भ्रष्टाचार से सबसे अधिक त्रस्त है।  उसे अपना छोटा से छोटा काम कराने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है, चाहे जन्म प्रमाण-पत्र लेना हो, लाइसेंस लेना हो या पासपोर्ट बनवाना हो या थाने में कोई मामला दर्ज करवाना हो, उसे इन सभी जगहों पर रिश्वत देनी पड़ती है।

 

* Speech was laid on the Table            सरकार की पंचायतों को सीधे धन देने की जो नीति है, उसने भ्रष्टाचार का विकेंद्रीकरण कर दिया है और भ्रष्टाचार गांवों तक पहुंच गया है।  इसलिए मैं अन्ना हजारे जी की इस मांग का समर्थन करता हूं कि निचले स्तर की नौकरीशाही को भी लोकपाल के दायरे में लाया जाए, तभी इस कानून का फायदा आम-आदमी को मिल सकेगा। 

           इन्हीं शब्दों के साथ आपके प्रति पुनः आभार प्रकट करते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।  

                     

*SHRI SANJAY DINA PATIL(MUMBAI NORTH-EAST): Today on this historic occasion when parliament is to consider the Gandhian’s three key demands on Lokpal Bill, I strongly feel that whatever be the outcome of the debate, be it within the Constitutional framework and by preserving Parliament’s supremacy.

          In fact, we all agree that the issues raised by Shri Anna Hazare are “important” and “genuine” which “deserve our serious consideration” and therefore we as lawmakers must “seize the moment and demonstrate the commitment” in dealing with corruption which is “gnawing at the vitals of our polity”.  Shri Anna Hazareji has put forth three points that are (i) whether the jurisdiction of the Lokpal should cover all employees of the Central government; whether it will be applicable through the institution of the Lok Ayukt in all states; and whether the Lokpal should have the power to punish all those who violate the ‘grievance redressal mechanism to be put in place.

 *श्री दानवे रावसाहेब पाटील (जालना):आज 12 दिन हो गए हैं और रामलीला मैदान में अन्ना हजारे और उनकी टीम अनशन  पर बैठी है। सरकार की तरफ से बार-बार अनशन तोड़ने की कोशिश की गई लेकिन सरकार सफल नहीं रही। क्यों? क्योंकि इस सरकार पर कोई आंदोलनकारी भरोसा करने को तैयार नहीं है। पहले आंदोलन जंतरमंतर पर हुआ। सिविल सोसाइटी को आश्वासन दिया गया था, लेकिन क्या हुआ? पहले आश्वासन दिया फिर धोखा दिया। आज 12 दिन हो गए हैं और अनशन चल रहा है। क्यों चल रहा है यह आंदोलन? क्यों देश के कोने-कोने से मिल रहा है इस आंदोलन का समर्थन? कौन शामिल है इस आंदोलन में? इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि यह आंदोलन क्यों चल रहा है। इस देश में भ्रष्टाचार और कालेधन की बात हो रही है जबकि भ्रष्टाचार रोकने में यह सरकार नाकाम रही है इसलिए हर आदमी इस आंदोलन का समर्थन कर रहा है। अब यह आंदोलन अन्ना जी का आंदोलन नहीं रहा, इस देश के आम आदमी का आंदोलन हो गया है। यह आंदोलन अचानक से नहीं हुआ, एक साल पहले से सिविल सोसाइटी सरकार के संपर्क में थी लेकिन सरकार ने बात नहीं सुनी। अन्ना जी ने इससे पहले भी महाराष्ट्र में आंदोलन किए हैं, वे महाराष्ट्र तक सीमित थे। वह समय था कि बिहार, झारखंड की जनता पूछती थी कि कौन है अन्ना। लेकिन आज यह हालत हो गई कि कौन अन्ना को नहीं जानता। यह आंदोलन अन्ना जी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाया है इसलिए भ्रष्टाचार मिटाने के लिए लोकपाल लाने की बात कही है। मैं इस मांग का समर्थन करता हूं। इस आंदोलन को देश के कोने-कोन से लोग समर्थन दे रहे हैं। नौजवान अब जाग उठा है, आम आदमी सरकार की तरफ से ठगा सा लग रहा है। किसी आफिस में काम कराने जाओ तो बिना पैसे के काम नहीं होता है चाहे बिजली का काम हो या राशन कार्ड निकलवाना हो। सब काम भ्रष्टाचार के बिना नहीं होते हैं, इस कारण देश के हर कोने से इस आंदोलन को समर्थन मिल रहा है। इस आंदोलन में सभी वर्ग के लोग हैं, किसी दल का आंदोलन नहीं है। यह आम आदमी की आवाज है इसलिए सरकार को इसे सुनने की जरूरत है। मैं आपके माध्यम से सरकार को कहना चाहता हूं कि आप अन्ना जी की बात सुनो, बिल लाओ, सशक्त लोकपाल लाओ और इस देश में होने वाले भ्रष्टाचार को रोको।

          मैं इन्हीं शब्दों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं।

     

* Speech was laid on the Table   *श्रीमती कमला देवी पटले (जांजगीर-चम्पा):  देश में जिस तरह भ्रष्टाचार फैला है उसे रोकना अति आवश्यक है।  आज देश में भ्रष्टाचार ऊपर से लेकर नीचे के लिए अनशन पर बैठे हैं।  देश की जनता चाहे वे बड़े, बूढ़े, नौजवान, बच्चे, महिलाएं सभी आयु वर्ग के घर से निकलकर सड़क पर आ गए हैं।  इस लोकतांत्रिक देश में जनता की आवाज को देखते हुए एक सशक्त एवं प्रभावी लोकपाल बिल का आना देशहित में होगा।

        भ्रष्टाचार का मामला पिछले कुछ वर्षों से देश में इस तरह उजागर हुआ है चाहे वो टू.जी. स्पैक्ट्रम का घोटाला हो, कॉमनवेल्थ गेम्स का मामला हो, आदर्श सोसाइटी हो या विदेशों में जमा काला धन।  ऐसे कई अन्य घोटाले देश में उजागर हुए हैं जिससे लोग काफी उद्वेलित हुए हैं, घोटाले के कारण देश में मंहगाई आसमान छूने लगी, जो दिनोंदिन बढ़ती जा रही है जिससे देश की जनता आक्रोशित हो गयी।  इस घोटाले से सबसे ज्यादा गांव, गरीब, किसान एवं मध्यम वर्गीय परिवार प्रभावित एवं परेशान हुए जो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य नहीं दे पा रहे हैं।  खाने को दो वक्त की रोटी नहीं दे पा रहे हैं। किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, युवा वर्ग बेरोजगार पड़े हैं, देश में त्राहि-त्राहि मची हुई है, इसलिए देश में एक सशक्त एवं प्रभावी लोकपाल बिल लाया जाये जिससे भ्रष्टाचार रुक सके।  कम से कम 75 प्रतिशत भ्रष्टाचार में कमी लायी जा सके और देश की अर्थव्यवस्था सही ढंग से चल सके, लोकतंत्र की रक्षा हो सके, सांसद की मर्यादा एवं गरिमा बनी रह सके।

        सशक्त लोकपाल बिल में सभी दफ्तर में निश्चित समय-सीमा में काम निपटाने, लोकपाल के साथ ही राज्यों में लोकायुक्तों के लिए कानून बनाने एवं सभी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाये जाने का प्रावधान होना चाहिए।  साथ ही प्रधानमंत्री भी इस लोकपाल के दायरे में हो तथा सी.बी.आई. भी इसके दायरे में होने चाहिए। एन.जी.ओ., दूरदर्शन एवं मीडिया के साथ-साथ वकीलों को भी इसके दायरे में आना चाहिए।

                                                 

*श्रीमती सीमा उपाध्याय (फतेहपुर सीकरी):  आज आम सहमति से जो भी मसौदा तैयार होता है वह भारतीय संविधान के हिसाब से होना चाहिए और साथ ही भारतीय संविधान के अनुरूप ही संसद में पेश होना चाहिए।  मैं कहना चाहती हूं कि केन्द्र सरकार द्वारा भारतीय संविधान परम पूज्यनीय बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की सोच व उनकी भावनाओं का आदर सम्मान करते हुए लोकपाल बिल के अन्दर सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले स्थानों पर समाज के खासतौर से उन अनुसूचित जाति/जनजाति व अन्य पिछड़े, धार्मिक अल्पसंख्यकों के लोगों को भी उचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए जो लोग अपने देश में सदियों से हर स्तर पर आज भी शोषण के शिकार होते चले आ रहे हैं।  हमारा संविधान धर्म निरपेक्षता के आधार पर बने होने के कारण सभी धर्मों के लोगों का इस बिल में उचित प्रतिनिधित्व होना चाहिए। अगर लोकपाल बिल में केन्द्र सरकार द्वारा ऐसा नहीं किया जाता तो फिर यह बिल समर्थन के योग्य नहीं है।

        भ्रष्टाचार को खत्म करने का सवाल है तो हम सभी सदन में बैठे जन-प्रतिनिधि, भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ हैं और हमेशा उन संगठनों का पूरा समर्थन करते हैं जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं।

        मैं कहना चाहती हूं कि केन्द्र सरकार द्वारा जो भी बिल आता है वह हर मामले में सशक्त प्रभावशाली हो।  इसलिए इस बिल को पारित करने से पहले इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि यह बिल भ्रष्टाचार उन्मूलन में पूरी तरह प्रभावी हो और इसके सभी प्रावधान एकदम स्पष्ट हो जो आसानी से आम आदमी के समझ में आ सके।  ऐसा न हो कि कहीं यह खास लोगों तक ही सीमित रह जाये जिससे देश की आम जनता को इसका लाभ न मिल सके। 

        मैं आपको बताना चाहती हूं कि उत्तर प्रदेश में लोकायुक्त की संस्था प्रभावी रूप से कार्य कर रही हैं।  सरकार लोकायुक्त की सिफारिशों के आधार पर फैसले ले रही है।  जो सिटीजन चार्टर के मामले में उत्तर प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी सरकार ने प्रभावी कार्यवाही करते हुए राज्य में उत्तर प्रदेश जनहित गारंटी कानून को लागू किया है जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत सर्व समाज में, कमजोर व गरीब लोगों को प्रतिदिन रहती है।  उत्तर प्रदेश में जनहित गारंटी कानून के अंतर्गत अधिकारियों के निर्धारित समय सीमा में उचित कार्यवाही करने की जवाबदेही स्पष्ट की गई है और इसकी अवहेलना करने पर अधिकारियों पर अर्थदंड लगाने का भी प्रावधान किया गया है।

        जहां तक माननीय प्रधानमंत्री जी और न्यायपालिका को लोकपाल बिल के दायरे में शामिल किये जाने की बात है।  इस संबंध में संसद में आम सहमति से जो भी निर्णय लिया जायेगा, उसका मैं समर्थन करूंगी।

        मेरा केन्द्र सरकार से आग्रह है कि परम पूज्यनीय बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपने देश का भारतीय संविधान बनाया था, इसलिए लोकपाल के मुद्दे पर जो भी निर्णय लिया जाए वह संविधान के अंदर होना चाहिए और संसदीय गरिमा को बनाये रखे।

        मैं अंत में कहना चाहती हूं कि देशहित में जल्दी भारतीय संविधान के तहत इन मुद्दों का हल निकाल कर जल्दी से जल्दी अन्ना जी के अनशन को समाप्त करा देना चाहिए।

           

*श्री भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी (संत कबीर नगर):  आज की जो चर्चा हो रही है उसकी जड़ में मूलतः भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़ी हुई मुहिम है जो श्री अन्ना हजारे एवं सिविल सोसाइटी के द्वारा शुरू की गई है।

        भ्रष्टाचार पर चर्चा आज पहली बार नहीं हो रही है परन्तु जो विशेष बात है वह यह है कि क्या लोकपाल बिल या कोई अन्य मिलता-जुलता विधेयक पास करने से यह समस्या समाप्त हो जाएगी या फिर ऐसा हो कि लोकपाल स्वयं एक निरंकुश संस्था अपने आप में बन जाए। अभी स्थिति ऐसी नहीं है कि इस मामले में स्पष्ट रूप से कुछ कहा जा सकता है।  भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लौटते हुए मैं यह कहना चाहता हूं कि इसका किसी व्यक्ति या संस्था को दी हुई शक्तियों से सीधा-सीधा सम्बन्ध है।  अमूमन गरीब और निरीह व्यक्तियों पर भ्रष्टाचार का आरोप क्यों नहीं लगता है। इसलिए कि वह तो परिस्थितिवश या अन्य कारणों से दूसरों पर निर्भर है या यूं कहे कि दूसरों की दया के पात्र हैं। इसलिए जो व्यक्ति या संस्था एक सीमा से अधिक शक्तिशाली हो जाती है उसके भ्रष्ट या निरंकुश होने की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है।  आज जो यह आन्दोलन चल रहा है उसने सरकार तथा उसकी नीतियों को एक राक्षस के रूप में खड़ा कर दिया है।  केन्द्र में आज एक दल की सरकार, राज्यों में दूसरी सरकारें।  भारत एक संघीय राज्य है जिसमें केन्द्र और राज्यों की बात सत्ता तथा जिम्मेदारियां बंटी हुई हैं। बहुत सा धन केन्द्र सरकार खर्च करती है, वहीं राज्य सरकारों का अपना दायित्व और दायरा है।  

        अन्ना हजारे जी आज केन्द्र से एक कानून बनाने के लिए संघर्षरत हैं।  इसके पहले वह महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ अनशन/आन्दोलन कर चुके हैं।  उनका जीवन एक आदर्श है जैसे और कई नेताओं/समाजसेवियों का पूर्व में रहा है।  पर कई बार देखा गया है कि महज आदर्शवादिता ही अपने आप में बहुत कुछ हासिल कर पाती है, जब वह सच्चाई और वास्तविक परिस्थितियों से दूर रहती है।  इसलिए आज मैं कहता हूं कि भ्रष्टाचार की लड़ाई अन्ना जी केन्द्र सरकार से लड़ रहे हैं वह कल किसी और सरकार से भी लड़ सकते हैं, किसी और मुद्दे पर लड़ सकते हैं। भारत एक विशाल देश है, जहां भांति-भांति की समस्यायें हैं, जिनका कोई सीधा समाधान नहीं है।  तब बात आती है कि क्या लोकपाल बिल की लड़ाई सिर्फ सरकार तक सीमित है या फिर वह व्यवस्था से भी है।

        मुझे लगता है कि अन्ना जी और उनके समर्थक पूरी व्यवस्था को ही बदलना चाहते हैं, उस व्यवस्था को जो भारत के संविधान द्वारा बनाई गई है तथा राज्य के तीन अंग विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका जिसके द्वारा उत्पन्न हुए हैं।  इनके अलावा हमारी सारी व्यवस्था लोकतांत्रिक है तथा checks and balances की समुचित व्यवस्था भी हमारे यहां मौजूद है।  ऐसे में हम अगर कोई नई संस्था की संरचना करे जिसमें कि पुलिस, जांच तथा निर्णय सभी की शक्तियां निहित हों, तो क्या गारंटी है कि वह संस्था अपने आप में एक सुपर लेजिसलेटिव, एग्जीक्यूटिव और ज्यूडिशयरी न बन जाए।  हमारा संविधान अब तक करीब-करीब सौ बार तक संशोधित किया जा चुका है।  वह इसलिए कि संविधान बनाने वाले महापुरुष यह जानते थे कि बदली हुई परिस्थितियों में बदलाव की आवश्यकता होती है और इसलिए इन्होंने इसमें संशोधन करने की शक्ति और प्रावधान को रखा।  ऐसे में आज हम कैसे कह सकते हैं कि अगर हम एक जनलोकपाल बिल ले आये तो वह आगे आने वाली सभी परिस्थितियों से निपटने में सक्षम होगा तथा हमारे देश में भ्रष्टाचार का वह समूल नाश कर देगा।

        भ्रष्टाचार केवल हमारे देश की समस्या नहीं है।  बहुत सारे देश जो हमारे साथ या हमारे बाद उपनिवेशवाद से आजाद हुए वहां यह देखा गया कि नए स्थानीय शासकों को जो जनता के दुलारे थे, इतना भ्रष्टाचार तथा abuse of power का दोषी पाया गया कि आखिर त्रस्त जनता को विद्रोह कर ऐसे शासकों को भगाना पड़ा।  मजे की बात यह है कि ऐसे शासक ने जनता की मर्जी से सत्ता में आने के बावजूद जनता का खूब शोषण किया और लोकतांत्रिक व्यवस्था से कोई नाता ही नहीं रखा।  ऐसे शासकों का हश्र हमने देखा और देख रहे हैं।  भ्रष्टाचार हमारे देश में व्याप्त है इससे इंकार नहीं है, परन्तु लोकतंत्र के चलते हम यह नहीं कह सकते कि जनता बेबस या लाचार है।  वह बोल सकती है, बोल रही है, उसकी सुनवाई भी होती है न कि एक तानाशाही की तरह उसकी आवाज को दबा दिया जाता है।

        आज उसी जनता की आवाज पर हम यह चर्चा कर रहे हैं।  हमारी संसद ने अब तक बहुत सारे ऐसे कानून बनाये हैं जिससे की जनता का जीवन बेहतर हुआ है तथा सार्वजनिक जीवन में तथा सरकारी कामकाज में पारदर्शिता आयी है।  संसद कोई भी कानून बना सकती है जब तक कि वह कानून या संविधान के मूल ढांचे या बेसिक स्ट्रक्चर को ही न बदले, ऐसा उच्चतम न्यायालय ने कहा है।

        अब प्रश्न यह उठता है कि जनलोकपाल तो एक ऐसी संस्था होगी जो अन्ना हजारे जी एवं उनके सहयोगियों द्वारा मांग की जा रही है कि वह तो संविधान में प्रदत्त सभी समस्याओं से ऊपर होगी तथा संसद, कार्यपालिका और न्यायपालिका सभी से ऊपर होगी तथा इन सबकी निगरानी करेगी।  अब मैं यह बात दुबारा कहना चाहता हूं कि क्या ऐसा संविधान के अनुसार हो सकता है और क्या यह संविधान के मूल ढांचे से गैर जरूरी छेड़छाड़ नहीं है।

        सभी एक मजबूत तथा दांत वाला लोकपाल चाहते हैं, पर शायद सुपर लोकपाल नहीं।

        जनलोकपाल बिल के समर्थन में यह कहा जाता है कि यूनाईटेड नेशन्स आर्गेनाईजेशन अगेन्स्ट करप्शन ही यह कहता है कि सदस्य देश इसका पालन करें अपने संविधान के दायरे में, परन्तु क्या जनलोकपाल बिल संविधान के दायरे में है, शायद नहीं।

        भ्रष्टाचार तब ज्यादा फैलता है जब किसी चीज की किल्लत हो या किसी व्यक्ति या संस्था को व्यापक या असीमित अधिकार दे दिये जाएं।  इसलिए डिलीवरी मैकेनिज्म की व्यवस्था को मजबूती प्रदान करिए, रेगुलेटरी मैकेनिज्म को चुस्त रखिए तथा निगरानी तंत्र को मजबूत करने के साथ त्वरित कार्यवाही करिये।  आप एक मजबूत लोकपाल बिल ले आइये।  संसद सार्वभौम चाहे उसे जिस रूप में पास करे, उसका सम्मान करिए।  राज्य सरकारों को भी सलाह दीजिए कि वह भी इस मामले में आवश्यक कार्यवाही करें।  आइये, हम सब मिलकर एक बेहतर और मजबूत भारत के स्वप्न को साकार करें।

                 

SHRI VARUN GANDHI (PILIBHIT): Madam, as the Sun sets on this fateful day, I stand here to speak with a very heavy heart. While I… (Interruptions) Shri Anand Sharma ji, please show me the courtesy that I showed you and listen to me.

          As I stand here to speak, it sits very heavy on my conscience that while we sit here and debate these larger issues, there is a 74 year old man who sits quietly battling between life and death.

          The issues are not whether this Lokpal Bill, this Jan Lokpal Bill or the other Lokpal Bills are perfect pieces of legislation because obviously no one piece of legislation can be entirely perfect. There is something … (Interruptions)

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी): मैडम, मेरा एक बहुत महत्वपूर्ण प्वाइंट ऑफ ऑर्डर है।

सभापति महोदया :  आपका प्वाइंट ऑफ ऑर्डर कौन से रूल के तहत है? आप रूल बताइये।

श्री शैलेन्द्र कुमार : महोदया, 1992 में...( व्यवधान)

सभापति महोदया : नहीं, ऐसे नहीं होता है। आप रूल बताइये, तब मैं आपकी बात सुनुंगी, नो आई एम सॉरी।

…( व्यवधान)

सभापति महोदया : अगर प्वाइंट ऑफ ऑर्डर है तो रूल बताइये। ऐसे नहीं होता है।

…( व्यवधान)

सभापति महोदया : वरुण जी, आप बोलना शुरू कीजिए।

श्री शैलेन्द्र कुमार : महोदया, यह बहुत महत्वपूर्ण मामला है। ।

सभापति महोदया : आप नियम बताइये, यह कौन से नियम के अतर्गत है।

श्री शैलेन्द्र कुमार : यह हाउस की बात है। यह हमारे सदस्यों के अधिकार की बात है।

सभापति महोदया : नहीं, ऐसे नहीं होता है। श्री वरुण जी, आप बोलिये।

…( व्यवधान)

सभापति महोदया : आपको मालूम है वह यील्ड नहीं कर रहे हैं, इसलिए मैं अलाऊ नहीं करूंगी। वरुण जी, क्या आप यील्ड कर रहे हैं? आपने प्वाइंट ऑफ ऑर्डर बोला है, आप बतायें यह किस नियम के अंतर्गत है। यदि आप नियम बतायेंगे तो मैं आपको अलाऊ करूंगी। नो, आई एम सारी।

श्री शैलेन्द्र कुमार : नियम 376 के अंतर्गत उड़ीसा हाई कोर्ट ने 1992 में एक जजमैन्ट दिया, जिसमें हम एमपीज को पब्लिक सर्वेन्ट कहा और उस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मोहर लगा दी। लेकिन हम आपके माध्यम से सरकार से पूछना चाहेंगे कि हम पब्लिक सर्वेन्ट हैं या पब्लिक रिप्रजेन्टेटिव है? यह हमें बताया जाए, यह बड़े मार्के की बात है।...( व्यवधान)

सभापति महोदया : यह कोई प्वाइंट ऑफ ऑर्डर नहीं बनता। वरुण जी, आप बोलिये।

श्री शैलेन्द्र कुमार : हमें बताया जाए कि हम पब्लिक सर्वेन्ट हैं या पब्लिक रिप्रजेन्टेटिव हैं?

सभापति महोदया : वरुण जी, आप बोलना चाहेंगे या नहीं?

…( व्यवधान)

सभापति महोदया : यह प्वाइंट ऑफ ऑर्डर नहीं है।

…( व्यवधान)

SHRI VARUN GANDHI : Madam, I entered this House in my 29th year. I have never seen or encountered any of the great movements of this century. I was not a part of the freedom movement obviously. I have not witnessed Swami Vivekanandaji or Jayprakash Narayanji or Panditji or Vinoba Bhaveji. But when I saw the initiative that Shri Anna Hazareji has taken, it sparked something within me. There are hundreds of millions of young people in this country that may not be agitating on the streets today, but in their own quiet and dignified way this movement has changed all of us for the better. All of us in some way, shape or form were passive observers. Many people even consider themselves fence-sitters.

          It was very fashionable to say that there is something wrong with the system, there is something wrong, there is something broken. But this movement has convinced almost the entire youth of this country that they are active agents of change, that they can rise up and be counted, that their voices will not get beaten down, that when they stand it will make a difference. This entire day today is a testimony to that fact.

          Madam, listening to the debate over the last two, three weeks, it occurs to me that a manufactured divide is being brought about between this great institution of Parliament and the people that we represent. Madam, this sets about a very dangerous precedent for the future of all of us. When you study history, as Shri Sharma said before me, you will realise that under colonial times it was the State that was sovereign. But as our nation achieved freedom, it was the people that became sovereign. It is very clear to me that we must stand here and speak as servants of the people, as mirrors of the people that we represent.

          The BJP and many other parties in the Parliament today I think have shown a tremendous respect for the people of this nation by taking the stand that is today in the hearts and minds of Indians, a stand that is displayed on the streets outside Parliament as we leave today.  Madam, a churning has taken place. We could say it was a silent revolution, except it is not so silent any more, and it has compelled us, it has in a way forced our hand to react. Today the nation looks to us for a solution, not semantics; for answers.

          What have we seen in the last two weeks of debate, specifically from the treasury benches but in some shape or form from perhaps all of us? We have been talking about protecting the privileges of Parliament. That is fine. But what about protecting the privileges of people? Madam, the people’s rights in our democracy cannot be extinguished after casting of vote once every five years. It is the people that must govern, rule, maybe not through referendums, the kind that we see in Europe or Africa or in several parts of the world where if the public has something very important to say, a referendum is conducted. There are no points of recall in our democracy. But at the end of the day, Madam, it is our duty to reflect public opinion, not to judge it and reject it. Remember, it is to the people that we go to reaffirm our strength in 2014.

          Madam, the debate is one on corruption. Many hon. Members, especially the Leader of the Opposition, have given masterful speeches, debating the technicalities of this proposal. So, I choose not to do that because it will merely be repetitive and there are other hon. Members who want to speak.

          I just want to say, when we talk about corruption, we have to be very careful not to look at it in abstraction. I come from Uttar Pradesh. Large parts of Bihar and Uttar Pradesh today have been ravaged by flood. All those people whose lives have, for ever, been darkened will receive cheques of Rs. 1,000 at best. Why? It is because there is no money; there is a Consolidated Fund of India; there is a certain amount of money that the Government has at its disposal. When we look at a scam like the 2G or when we look at a scam like the CWG, or when we look at various scams since 1947 till today, what do we see? We see a figure, we see a number and we see statistics. What do we not see? Imagine, if there is a scam involving Rs.1,000 crore, there are a thousand villages that will go without electrification, there are a thousand schools or inter-colleges that will not get built. In Uttar Pradesh, for instance, we do not have proper teachers today. We have what we call ‘Siksha mitras’. Who are they? They are 16-17 year old children who have passed the 8th standard and who are teaching other children. … (Interruptions) You can speak, once I have spoken. … (Interruptions)

MADAM CHAIRMAN : No. Do not disturb. This is not the way.

… (Interruptions)

SHRI VARUN GANDHI : I am speaking from a point of my experience. You may speak from the point of your experience. You cannot drown down my voice. … (Interruptions) I have earned the right to speak and you will listen to me! … (Interruptions) In our country, do you agree or not, that the system of education in most parts of rural India is lacking? Is that the moot point? Or are we here just to make cheap shots at one another? … (Interruptions)

MADAM CHAIRMAN: Please sit down. This is not the way.

… (Interruptions)

SHRI VARUN GANDHI : I do not yield to you. … (Interruptions) The fact remains that in our country today the education system, the health system, the systems of infrastructure are lacking. The reason why they are lacking is, there is no money.

          Yesterday, during Question Hour, we had some hon. Members who said that the RGGVY which may have been created with the best of intentions, today lies incomplete or at rest. Why is that? It is because there is no money, not because there are no means to implementation; it is because there is no medium for implementation.

          We are talking about corruption here. What systems we had in our country to take up corruption? We have had systems of self-policing, whether it is in judiciary since 1993 or whether it is in the departmental vigilance or in the CVC or the CBI; the entire scheme and the system is one of self-policing. It is clear from the voices out on the street that the system is broken; it has failed us. So, what are we going to do about this?

        What is Shri Anna Hazare asking for? Is that such a calamitous demand? In essence, he is asking for an independent Ombudsman. Why should we assume, as a polity, as the leaders of elected India, that the first thing this independent Ombudsman will do is try and gobble us up?  Is that not presupposing guilt?

 I do not think that is what is going to happen.  It may be a naive thought.  Why are young people on the streets today?  The numbers can be debated but why are the young people on the streets today? It is because corruption affects us as team as a nation.  If a young person has to stand in line for a job and to pay a bribe of Rs.50,000 or Rs.1,00,000 to get a Government job, it affects your self-esteem as an Indian.  That is why young people are on the street today.  If you are a rickshaw puller, a street vendor or a farmer who goes to the mandi to sell the produce and if you have to pay 20 or 30 per cent bribe, not only does it depress incomes of Indians but it also makes them go hungry.

          Madam, there has been a lot of propaganda about the BJP being the force behind Anna Hazare’s movement.  The fact remains that the movement has been an entirely spontaneous one that has erupted from almost all of our individual constituencies.  All of us know this.  All of us are getting calls from our constituents asking why we are not speaking for Shri Hazare.  The BJP is proud of its association in supporting this movement.  We stand behind Shri Anna Hazare.  We stand with Shri Anna Hazare and in the event of an assault on his liberty we stand in front of him to protect him.

          Madam, as I conclude my speech today, I will say that the most meaningful experience I had was when I went to the Ramlila Maidan to sit with the people in support of this democratic movement.  There was an old man who sat next to me.  He must have been in his mid to late eighties.  He said to me:   "बेटा, अन्ना हजारे जो हैं, एक व्यक्ति नहीं हैं, एक सोच है और हमारे देश को फिर से महान बनाने के लिए इस सोच की विजय हो, यह हमारे देश के लिए आवश्यक है। "

          मैं केवल यह बोल रहा हूं कि हम सब लोग यह कल्पना करते हैं कि चाहे कांग्रेस के हों, चाहे हम हों, चाहे वामपंथी साथीं हों, चाहे जो भी हों, इस आंदोलन द्वारा, इस नये रास्ते द्वारा, इस सोच की जीत हो, हमारे देश के नवनिर्माण की जीत हो।
 
   *श्री महेश्वर हज़ारी (समस्तीपुर): सदन में आज लोकपाल के गठन से संबंधित मुद्दे पर बहस चल रही है। आज का दिन ऐतिहासिक है। जिस भ्रष्टाचार से पूरा देश कराह रहा है, उसके लिए आज समाज को जागरूक करने की आवश्यकता है। भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए हम सारे सदस्य एकजुट हैं। हमारी सदन की प्रतिष्ठा पर आज कुछ लोगों द्वारा चौराहे पर प्रश्नचिह्न लगाया जा रहा है। यह प्रजातंत्र के लिए दुर्भाग्य की बात है। आज प्रखंड से लेकर दिल्ली सचिवालय तक भ्रष्टाचार फैला हुआ है। इसे दूर करने के लिए एक मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी सख्त कानून की आवश्यकता है। मैं समझता हूं कि लोकपाल के दायरे में इलैक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया को भी लाया जाना चाहिए। इसके साथ ही एनजीओज एवं उद्योगपतियों को भी लोकपाल के दायरे में लाना चाहिए।
          मेरा सरकार से आग्रह है कि लोकपाल के निर्माण में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े एवं अति पिछड़े वर्गों की भी हिस्सेदारी होनी चाहिए। जिससे कि यह समाज गरीबों के कष्ट, गरीबों की कठिनाइयों एवं गरीबों की शिक्षा संबंधी बातों को रख सके।। मेरी व्यक्तिगत राय है कि माननीय प्रधान मंत्री एवं संसद सदस्यों को लोकपाल की परिधि में नहीं रखना चाहिए।
          मैं श्री अण्णा हजारे को धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने पूरे भारत में भ्रष्टाचार के प्रति एक जन-जागरण पैदा किया है। हमारे सभी सांसदों द्वारा भी भ्रष्टाचार के विरोध में लड़ाई लड़ी जा रही है। मैं भारत सरकार से अपील करता हूं कि श्री अण्णा जी का अनशन शीघ्र तुड़वाया जाए। सभी भाई अपील करें कि अण्णा जी की सेहत अच्छी रहे एवं वह स्वस्थ रहें। उनका जीवन भारत के लिए अति महत्वपूर्ण है।
          इतना कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
                 
* Speech was laid on the Table * DR. MIRZA MEHBOOB BEG (ANANTNAG): Sir, I participate on the  Discussion on the statement made by Hon’ble leader of the House on Lokpal Bill.  The crisis the country is facing is to say the   least is credibility crisis.  Huge trust deficit does exist between all sections  of the Society and  that is the basis of present situation prevailing  right now.  We are grateful to Anna Hazare ji for making a very valid point that corruption has    eaten into the vitals of the society and  needs an immediate checks and Balances.  We must salute the common man, because it  is because of them  that Indian Democratic System and its constitution  puts us  ahead of many countries and has world wide appreciation.  While putting an effective Bill in place, so that the Monster called corruption is  put under control but nothing should be done  to demolish an existing, vibrant Parliamentary system and players, elected by them are not reduced to a  ridicule. Anna has  made his point and it is now for their elected representatives to  go ahead  and come up to the expectations  of common man. Let  the Constitution and the Constitutional procedures  take it up and  respect and recognise the  sentiments of our people           If we are want to put Judiciary system under the vigil why leave other sections  of the Society out of the vigilance net.  Why leave out NGO’s,leave out MEDIA?  Include   all and make us all accountable.  We have many Laws, Bills and Commissions to control the Monster caller corruption.  Putting more and more Accountability  Bills and Commission and adding one more, is it the answer for the effective implementation on ground?  Attacking Institutions, which have taken roots and are doing well will not help. One can agree to make improvement and plug loopholes rather than making new Institutions and demolishing the older, established ones as that will be a tragedy in the long run.  It seems there is a constant campaign and conspiracy against the well defined and established Parliamentary Democratic System.  It has to be preserved at all cost.
         
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* Speech was laid on the Table *श्रीमती रमा देवी (शिवहर)ःहमलोग 42 वर्ष से देश को लोकपाल नहीं दे पाए हैं।  यह सिर्फ मृगमरीचिका ही साबित हुआ है।  जहं तक मेरा अनुभव है कि भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा प्रभावित गांव-शहर में रहने वाले गरीब-अशिक्षित नागरिक हैं,  जिनको 63 वर्ष की आजादी के बाद भी अधिकार नहीं दिला पाए।  आजादी दिलाने वाले महात्मा गांधी व बाबा साहब अम्बेडकर कभी सोचे भी नहीं होंगे कि एक समय ऐसा भी आएगा जब देश भ्रष्टाचार की आगोश में जकड़ जाएगा।  मेरा प्रैक्टिकल अनुभव है कि आज कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां भ्रष्टाचार से लोहा नहीं लेना पड़ता हो तथा भ्रष्टाचार का कैंसर क्षेत्र नहीं है जहां भ्रष्टाचार से लोहा नहीं लेना पड़ता हो तथा भ्रष्टाचार का कैंसर तमाम संस्थानों में फैल गया है।  पैदा हुए तो जन्म प्रमाण-पत्र हो, आय प्रमाण-पत्र हो, जाति प्रमाण-पत्र हो, दाखिल-खारिज हो, अस्पताल में इलाज कराना हो, ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना हो, पासपोर्ट बनवाना हो, बैंक से लोन लेना हो, बिजली का कनेक्शन लेना हो, राशन कार्ड बनवाना हो, थाने में मुकदमा दर्ज कराना हो, यहाँ तक कि मुर्दाघर से मुर्दा लेना हो, सभी क्षेत्रों में नागरिकों को एक सुविधा शुल्क के नाम पर रिश्वत देनी पड़ती है।  आमलोग इससे त्रस्त हैं।  उससे जनता के बीच भारी नाराजगी है जिसका नेतृत्व समाजसेवी श्री अन्ना हजारे कर रहे हैं।  अन्ना जी को मिल रहे जन समर्थन से एक बात साफ है कि जनता निम्न एवं उच्च पदों पर व्याप्त भ्रष्टाचार से त्रस्त हो चुकी है।  सरकार की नीयत पर अब उसका भरोसा नहीं रहा।  अन्ना हजारे जी की बेदाग छवि के कारण लोग उनकी बात पर भरोसा कर रहे हैं।  राम मनोहर लोहिया जी ने कहा था कि जिंदा कौम पांच साल तक इंतजार नहीं करती लेकिन इस देश में लोकपाल के लिए वर्षों से इंतजार हो रहा है।  किसी आजाद देश की ऐसी भयावह तस्वीर होगी ऐसा हमारे संविधान निर्माता ने भी कभी कल्पना भी नहीं की होगी। उच्च पदों पर जो भ्रष्टाचार है इस पर बताने की आवश्यकता नहीं है। इस पर हमारे वरिष्ठ नेता एवं सदस्यों ने प्रकाश डाला है।  आज केन्द्रीय स्तर की लोक कल्याणकारी योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है, आज इस सत्य को योजना आयोग भी स्वीकार कर रहा है।  भ्रष्टाचार का तहखाना सिर्फ स्वीट्जरलैंड तक ही सीमित नहीं है, जहां दुनियां भर के जमा काले धन में आधे से अधिक भ्रष्ट भारतीयों का है बल्कि कई और देशों के बैंकों में गैर-कानूनी धन जमा है।
        आज आम लोगों में यह धारणा उत्पन्न हो गई है कि यह देश भ्रष्टाचार से मुक्त कैसे होगा।  नीचे से ऊपर तक फैले भ्रष्टाचार से मुक्ति कैसे मिलेगी जिस पर हम सभी को विचार करना है।  
        मेरा सुझाव है कि पंचायत, प्रखंड व जिला स्तर के मुलाजिमों के लिए प्रभावी एवं सशक्त लोकपाल का एक मॉडल राज्यों के लिए हो।  प्रधानमंत्री भी लोकपाल के दायरे में हो। सीबीआई का दुरूपयोग रोकने हेतु लोकपाल के दायरे में हो। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को दूर करने हेतु एक राष्ट्रीय स्तर की प्रभावी एवं सशक्त राष्ट्रीय आयोग का गठन हो।  एनजीओ एवं औद्योगिक घरानों में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने हेतु लोकपाल के दायरे में हो। प्राइवेट शैक्षणिक संस्थान भी लोकपाल के दायरे में हों।  विदेशों में जमा काला धन लोकपाल के दायरे में हो।
        आज देश की साख दांव पर है।  हम सभी जिस सर्वोच्च सदन में है इस पर देश की 121 करोड़ जनता की निगाहें हैं।  देश के आम नागरिक उद्वेलित है। जनता एक सशक्त एवं प्रभावी लोकपाल बिल चाहती है।  आजादी के बाद 42 वर्ष से सदन की प्रतिष्ठा भी फंसी हुई है।  हम लोग देश को एक सशक्त लोकपाल बिल नहीं दे पाए हैं।  इसके पीछे जो भी कारण रहे हों। इसलिए आज यह क्षण आ गया है कि हम लोग भी जनता की नजर में दोषमुक्त हों, एक सशक्त व प्रभावी लोकपाल बिल का निर्माण हो जिससे कि आम नागरिकों को भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने का हथियार मिल सके तथा मैं यह भी कहना चाहूंगी कि लोगों में लोकपाल बिल के साथ-साथ अवेयरनेस भी लाना होगा तभी देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो सकेगा।  इसी के साथ, मैं अपने भाषण को विराम देती हूं तथा श्री अन्ना हजारे से अपील करती हूं कि उनके परिवार के लोग अनशन पर हैं, साथ में उनकी भावनाओं से जुड़े लोग भी अनशन कर रहे हैं जो काफी अस्वस्थ हो गए हैं।  मैं निवेदन करती हूं कि आपके लोकपाल की तीन शर्तों को मानते हुए हमारी नेत्री माननीया सुषमा जी तथा माननीय शरद जी के विचार से सभी सहमत हैं। सदन की भावना को देखते हुए वे अनशन तोड़ें।  
               
SHRI NARAHARI MAHATO (PURULIA): Madam, on behalf of my Party, All India Forward Bloc, I stand here to participate in this very important discussion.
          Madam, corruption has become a major public concern in the wake of successive scams unfolding over the past few years.  The battle against corruption in order to be effective today can be achieved only through a comprehensive reform of our political, legal, administrative and judicial system and not through one-off or piece-meal measures.  The establishment of an effective Lokpal institution is one such measure.  There has to be a grievance redressal set up for citizens based on legislation.  There has to be a National Judiciary Commission to oversee the higher judiciary. There has to be electoral reform to check the use of money power in elections which is another source of corruption.
          Today, everybody be it poor, rich, young, old man or woman wants a strong and effective Lokpal so that they can get rid of day-to-day corruption.  Shri Anna Hazare through his fast just wants to draw the attention of the Government to the fact that everybody is fed up of corruption and this is proved by the huge crowd and support that we can see at the Ramlila Maidan.
The Lokpal should essentially be a fact-finding body that receives complaints, enquiries, investigates and forwards cases to special courts.  It should oversee the entire machinery related to the corruption cases at the Central level.  The Lokpal Bill, which we have seen in the agitation and demonstration, which is going on for the last 13 days will be written in our Indian history with golden words, as this is very unique.  All the protestors are carrying this agitation and demonstration very peacefully in a non-violence way and not a single public and private property is damaged, whereas we all know that even if there is any small agitation or protest against any policy, the general public always damages the public and private property.  We all should salute those who are part of this great movement. 
          There must be a separate mechanism for grievance redressal.  This should be set up by a separate legislation.    The grievances of citizens about the citizens’ charter, etc., should be brought under this set up. 
          The Lokayukta set-up on the lines of Lokpal should bring all State Government employees, local bodies and State Corporations under their purview. Further, a citizen grievance redressal machinery that we have proposed to be set up separately, should address all grievances regarding delivery of basic services and entailments of the citizens.
          We are in favour of a strong Lokpal Bill, which should help our people and country to curb the menace of corruption.  We believe that if needed, hon. Prime Minister should be kept under the purview of Lokpal and the Judiciary under the Lokpal. If, required we can have a separate body for Judiciary.  Further, a Central law should be made to set up Lokayuktas in all the States on the same line of Lokpal.   We also believe that corruption flows from top to bottom. All the Government officials should be brought under Lokpal.  There should not be any difference between Grade A,B,C or D.  If, anybody is indulged in corruption, it is corruption. What is the meaning of rank here? We also strongly support that a citizens’ charter should be made in the Lokpal Bill, detailing the responsibilities of Government Departments and also to impose penalty, if those responsibilities are not fulfilled. 
          At last, on behalf of my Party, I request Shri Anna Hazare to call off his fast, as his health condition is deteriorating day-by-day and we need his guidance to make India strong and corruption free.
          I, on behalf of my Party want powerful, strong and effective Lokpal Bill.  Madam, being submission I conclude my speech. 
                                                                                               
*SHRI A. SAMPATH (ATTINGAL): We have been hearing about Lokpal for the last more than 40 years.  But, I do not understand why such a fruitful legislation has not come into being so far. It is a primary duty of Government of India to come with a comprehensive Lokpal Bill.  They should have the courage to fight  corruption; instead of being part and parcel of it, if not the fountain head of it.
          Corruption breeds black money, and that black money leads to parallel economy. We have reached a stage where a parallel economy is swallowing a real economy of India.  Black money give birth to black money alone, like a mother wiper delivers baby wipers which are also highly venomous.
          I express my solidarity to the cause raised by Shri Anna Hazare and the Members of the Civil Society who are determined to fight corruption.  But, at the same time, I have reservation on the modus operandi of the agitation also.  Constitution is supreme and everybody is below it and it is the largest written Constitution in the world;  I mean the Constitution of Sovereign, Socialist, Secular Democratic Republic.  We are discussing about the urgent need for an effective and strong Lokpal even during the late hours of this day because the corruption has become rampant.  There is a tendency to get it institutionalized and to loosen the loopholes of the existing laws.  I do not agree with the view that corruption has grown along with the growth of the economy.
          Are we passing through an era of corruption? Since Independence this the first time we are hearing about the “mother of all the scams”.  The UPA Government has become the most corrupt Government in the history of the nation. Has the Government forgotten about the principles of social justice which were enshrined in our Constitution?  I wonder where the advocates and proponents of the new liberalism have gone?  Since 1991, a small number of people have benefited from the neo-liberal policies. Some of them have become billionaires or millionaires at the expense of worsening of the standard of living of the working class as well as the poor. Those nations which have opted the neo-liberal policies have already reversed their policies of denationalization and privatization.  But in India, politics is being converted into business and business is conducted through politics.  The unholy nexus of large corporate houses, the ruling political class and the Consultative Committees rarely meet.  Many of our Hon’ble Ministers do not give proper reply in this august House.  I remember one Minister, though he is not a Minister now, told the MPs in this House to ask question under RTI if they want a proper reply!  But now I fear, being an RTI activist may also cost your life.
          Many of the central agencies, including the CBI, have been used with malafide intentions to hunt the political opponents.  In 1996, I raised the matter of CBI investigations on Sister Abhaya’s suspicious death at the Pious 10th Convent in Kottayam of Kerala.  Still now CBI is knee-jerking before its masters.  The Government of Kerala has requested four times to the Government of India for a CBI probe into the largest ever communal conflagration in the history of Kerala State. That was regarding the Marad massacre in Kozhikode on 2nd May 2003 in which nine persons were hacked to death on that evening at Marad beach within 10 minutes of time.  Why the Government of India is still hesitant? I hope the Treasury Benches will not forget how the appointment of the Central Vigilance Commissioner (CVC) put the Government in a soup.
          We are the Central legislature of a federal nation.  I repeat, a Federal Nation.  But the tendency of the Union Government is always to take away the powers and the sources of revenues from the State Government.  And we hear now and then about ‘outsourcing’.  Is it a nick name given for privatization?  Then, may I ask you when are you going to outsource the function of the Parliament and the Judiciary?  Of course, I am not saying that you may sell the Parliament and the Supreme Court just like you sell the precious natural resources and the public sector undertakings of this country.
          The people of this country want to know the truth, nothing else but the truth, about the drain of the nation’s economy.  Why is the Government afraid of taking strong actions against those persons and private companies who have looted the public money and those who have stashed away illegal money abroad in tax heavens?  It is time that the Prevention of Corruption Act, 1988 has to be amended.  Otherwise the moles will find out alternative ways to infest the body of this nation.  Whistleblowers must be protected in order to combat corruption.  The RTI Act should be made applicable to Public-Private Partnership (PPP) and also to all those enterprises which enter into any type of contract with any Government, PSUs and all those under the ambit of “State” as defined by Article 12 of the Constitution of India.  We are the largest multi-party democracy in the world.  This House has a duty to ensure Fundamental Rights of the citizens.
          Quoting Shakespeare in ‘Julius Caesar’ “Dear Brutus, the fault is not with our stars but with ourselves”.  – Likewise may I add, the fault is not with our Constitution but with ourselves.
          With these words, I also humbly request Anna Hazare ji to end his fast and to carry forward the fight against corruption with more strength and vigour.
*श्री जितेन्द्र सिंह बुन्देला (खजुराहो):सदन में जन लोकपाल बिल के संबंध में प्रमुख रूप से तीन बिंदुओं को ध्यान में रख कर चर्चा की जा रही है। सभी राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति की जाए, सिटीज़न चार्टर बने, कर्मचारियों को लोकपाल बिल में शामिल किया जाए। भ्र­टाचार ने आज सारे देश में हलचल मचा दी है। देश का वृद्ध, युवा एवं बच्चे सभी इस जन आंदोलन के साथ जुड़ गए हैं। पिछले 12 दिनों से रामलीला मैदान में अण्णा हजारे जी के साथ पूरा देश जुड़ गया है। वर्षों से जो भ्र­टाचार होता आ रहा है, पिछले दो वर्षों में जो घोटाले हुए हैं, वे कई लाखों-करोड़ों रूपये में हुए हैं। उनमें कॉमनवेल्थ गेम्स, 2-जी स्पेक्ट्रम, आदर्श सोसाइटी घोटाले आदि प्रमुख हैं, जिनसे देश में भूचाल आ गया है। अतः अण्णा हजारे जी के आंदोलन को इतना जन समर्थन मिल रहा है। बड़े घोटालों से बड़े-बड़े लोग प्रभावित होते हैं किंतु आम आदमी को पटवारी, तहसीलदार, एसडीएम, डाक्टर, थानेदार से कार्य पड़ता है। ये लोग बिना सुविधा शुल्क के कोई कार्य नहीं करते हैं। जिससे आम आदमी पेरशान होता रहता है। दफ्तरों के चक्कर काटता रहता है। अण्णा हजारे के आंदोलन में यही आम आदमी आकर खड़ा हो गया है।
          इसीलिए प्रभावी लोकपाल बिल बिल की मांग जोर पकड़ती जा रही है। देश के कई राज्यों में लोकायुक्त कार्य कर रहे है। शेष राज्यों में भी लोकायुक्त की मांग तर्कसंगत है। जहां तक सिटीज़न चार्टर की बात है, देश के कई राज्यों में लोक सेवा गांरटी प्रदाय अधिनियम बने हुए हैं। जिनमें निश्चित समय सीमा में कार्य नहीं होने पर संबंधित अधिकारी या कर्मचारी को दण्ड देने का प्रावधान है। अतः केन्द्र में सिटीजन चार्टर को लोकपाल बिल में शामिल करना चाहिए। कर्मचारी अपने कार्य के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं। एक-दूसरे पर कार्य को टालते हैं। अतः छोटे कर्मचारियों को भी लोकपाल बिल में शामिल करना चाहिए।
          लोकतंत्र में सदन सर्वोच्च होता है। अतः सदन की गरिमा का मान रखते हुए एक प्राभावी एवं सशक्त लोकपाल बिल बनाया जाना चाहिए जिससे भ्र­ष्टाचार पर अंकुश लग सके तथा आम आदमी शांति से रह सके।
          सशक्त लोकपाल इसलिए जरूरी है क्योंकि कमजोर, विकलांग लोकपाल अपना प्रभाव ठीक से नहीं छोड़ पाएगा। आज इस भ्र­ष्टाचार के कारण आम आदमी परेशान है। कभी भारत को सोने की चिड़िया के नाम से जाना जाता था। आज उस देश में भ्र­ष्टाचार फैला हुआ है।
 
* Speech was laid on the Table           देश का हाजारों-करोड़ो रूपया विदेशों में जमा किया गया है। इससे हमारे देश की अर्थव्यवस्था बिगड़ रही है। सरकार को उस पैसे को वापस लाना चाहिए। इस चर्चा को भ्रष्टतंत्र के लोगों जिन्होंने विदेशों में धन जमा किया है, वे उसे निकाल लें, उस पर नजर रखी जाए। इस संसद में सरकार बचाने हेतु सांसदों की खरीद-फरोख्त की जाती है जिसे पूरा देश जानता है। इस संसद में 11 सांसदों को कुछ गलतियों के कारण संसद से बाहर का रास्ता दिखाने का काम भी किया है। जिससे संसद की मर्यादा को कायम रखा गया है।
          आज का दिन संसदीय इतिहास में याद रखा जाएगा क्योंकि संसद में यह बहस एक अलग तरह की बहस है। इस प्रकार देश के जागरूक लोग जो आज आज भ्र­टाचार से तंग आ गए हैं वे भी चाहते हैं कि परिवर्तन हो। इसलिए एक सशक्त लोकपाल का गठन होना चाहिए।
                                                                                                       
*श्री के.डी. देशमुख (बालाघाट): माननीय अन्ना हज़ारे जी विगत बारह दिनों से आमरण अनशन पर हैं। उनके नेतृत्व में पूरा देश खड़ा हो गया है। पूरा देश भ्रष्टाचार समाप्त करना चाहता है तथा भ्रष्टाचार से दुखी है, त्रस्त है।
          माननीय विपक्ष की नेता सुषमा जी ने जो वक्तव्य दिया है, मैं अपने को शामिल करता हूं, समर्थन करता हूं। प्रधानमंत्री पद को तथा संसद सदस्यों को जन लोकपाल में शामिल किया जाए। सी.बी.आई. को जन लोकपाल के दायरे में लाना जरूरी है।   न्यायपालिका को न्यायिक आयोग का गठन कर शामिल करना चाहिए। निचले स्तर की नौकरशाही को जन लोकपाल बिल में शामिल होना जरूरी है तथा सिटीजन चार्टर बनना चाहिए।
          आज देश के करोड़ों लोगों की भावनाएं भ्रष्टाचार को समाप्त करने की है। सारा देश जन लोकपाल बिल संसद में पारित कराने के पक्ष में है। हम सब भ्रष्टाचार को बहुत करीब से देख रहे हैं। भ्रष्टाचार ने कैंसर का रूप धारण कर लिया है। देश की जनता भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए अब ज्यादा इंतजार करने के पक्ष में नहीं है और अपने जन प्रतिनिधियों को ज्यादा समय देने के भी पक्ष में नहीं है। बिना समय गंवाए श्री अन्ना हज़ारे की मांग के अनुसार सशक्त जन लोकपाल बिल सदन में पारित किया जाए। जनता जनार्दन का स्वरूप है। यह समय ना-नुकुर करने का नहीं है।
          इस जन लोकपाल बिल को पारित करना जरूरी है। यह वक्त का तक़ाज़ा है। इतिहास गवाह है कि जिसने वक्त को नहीं समझा, उसे मिटना पड़ा है।
                                                                                                                             
* Speech was laid on the Table *श्री दिलीपकुमार मनसुखलाल गांधी (अहमदनगर):माननीय अण्णा जी ने भ्र­टाचार के खिलाफ जनलोकपाल बिल संसद में पास हो, इसलिए अनशन शुरू किया है। अण्णा जी का गांव रालेगण सिद्धि है, मैं वहां से प्रतिनिधित्व करता हूँ और अण्णा जी को गत पच्चीस सालों से स्वच्छ छवि वाले समाजसेवक के रूप में देखता आया हूँ। उन्होंने गांव की जनता की सहायता से क्षेत्र का विकास किया। उसके देखने के लिए विदेश से भी गणमान्य लोग आते हैं। बचपन से ही अण्णा जी समाज से जुड़े हैं। मिलिट्री सर्विस में भी उन्होंने समाजसेवा का व्रत नहीं छोड़ा। मिलिट्री से रिटायर होते ही उन्होंने समाजसेवा के लिए अपना जीवन समर्पित किया। तब से वे भ्र­टाचार के खिलाफ आवाज उठाते आ रहे हैं। अगर हम रामायण, महाभारत का उदाहरण लें तो पता चलता है कि भ्र­टाचार के सौ अपराध होते हैं तो उसके खिलाफ आवाज उठती है। वर्तमान स्थितियों में कांग्रेस द्वारा हो रहे भ्र­टाचार जैसे 2जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ गेम्स आदि जैसे घोटाले देखकर अण्णा जी सहन नहीं कर पाए और भ्र­टाचार के खिलाफ उग्र आंदोलन करके पीड़ित जनता के लिए श्रीकृ­ण बने।
          मेरी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने शुरू से ही अण्णा जी को समर्थन दिया है और अण्णा जी स्वयं मेरे वोटर हैं। उनका समर्थन करना मैं अपना सौभाग्य समझता हूँ। आज श्रीमती सु­ामा जी ने जो प्रस्ताव दिया है, उसे मेरा समर्थन तो है ही साथ ही मैं अपील करता हूँ संसद के सभी सदस्य भ्र­टाचार के खिलाफ ही होंगे। वे सदन में लाया जाने वाला प्रस्ताव तुंत पारित कर के अण्णा जी को सूचित करें ताकि वे अपना अनशन खत्म करें। अण्णा जी हम सब की धरोहर हैं। उनको संभालना हम सबका कर्त्तव्य है। हम लोग इस कर्त्तव्य से ना चूंकें।
                                                                                                                 
* Speech was laid on the Table *श्रीमती दर्शना जरदोश (सूरत)ःआज देश एक चौराहे पर खड़ा है।  सभी देशवासियों की नजरे संसद की ओर लगी हैं।  सामान्य आदमी चाहता है कि लोकपाल बने।  जिस तरह से प्रश्न को हाथ में लिया गया एवं उस पर टिप्पणियां, व्यक्तिगत टिप्पणियां की गईं उसके कारण देश में राजकरण में कार्यरत कार्यकर्त्ताओं की छवि धूमिल हुई है।  विदेशों में भी जिस तरह से भारतीय रास्ते पर उतरा है यह छवि बनी है कि भारत सरकार भ्रष्टाचार को रोकने पर इच्छुक नहीं है।  यह समझने की बात है कि आम आदमी की नजरों में आज सभी राजकीय पक्षों की छवि एक स्तर पर आ गई है, वह आदमी यह नहीं सोच रहा है कि यह कौन से पक्ष का है।  उसकी नजरों में आज भी सांसद, विधायक एक समान हो गए हैं।  
        आज मीडिया में हुए विकास के कारण देश के आदमी ने सरकार के मंत्रियों ने एवं सत्ताधारी पक्ष द्वारा जिस तरह से निवेदन दिए गए, उनके कारण देश में यह आंदोलन एक आग की तरह फैला है।  लोगों के आज भी सरकार पर विश्वास नहीं है कि सरकार सच में मजबूत लोकपाल लाना चाहती है कि नहीं?  यह विश्वास पुनःप्राप्त करना अब सरकार एवं पूरी संसद की जिम्मेदारी है।  अगर देश के लोगों का विश्वास पुनः प्राप्त करना है तो सरकार के मंत्रियों एवं सांसदों को देश के लोगों की भावनाओं का सम्मान करना होगा।  आज वाणी विलास के कारण से लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंची है।
        जिस तीन बातों पर आज यह पूरा मामला उलझा हुआ है उनकी अगर बात करें तो पूरे देश में सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारियों को लोकपाल में सम्मिलित करना, राज्यों में लोकायुक्त एवं शायद देश का आम आम आदमी जिससे ज्यादा त्रस्त है वह है सिटिजन चार्टर का न होना।  मुझे लगता है कि आम आदमी जो इतने सालों से सरकारी तंत्र से परेशान है उसमें यही तीन बातें प्रमुख हैं, और इन्हीं के कारण लोगों में आज आंदोलन, जन आंदोलन बन चुका है।  मेरा स्पष्ट मत है कि संसद की गरिमा को ध्यान में रखते हुए एवं राज्यों में चुनी हुई सरकारों की गरिमा को भी ध्यान में रखते हुए क्योंकि जैसे कल गुजरात की चुनी हुई सरकार को बाजू पर करके केन्द्र के इशारे पर लोकायुक्त की नियुक्ति हुई है, वह इस सरकार की अन्य पक्षों की सरकारों के प्रति जो नजरिया है वह दिखाता है।  मैं केन्द्र सरकार के ऐसे नजरिए का भी विरोध करती हूं।  हमें इन बातों को सम्मिलित करके एक मजबूत लोकपाल देश को देना चाहिए और मैं मजबूत लोकपाल के पक्ष में हूं। आज देश को जरूरत है एक ऐसे लोकपाल की जो लोगों की अपेक्षा को पूर्ण करे।   
                                 
*श्री दत्ता मेघे (वर्धा):  सबसे पहले मैं माननीय प्रधानमंत्री जी को इस बात के लिए बधाई देना चाहता हूं कि हमारी सरकार ने जो वादा किया था कि हम देश को एक सशक्त भ्रष्टाचार निरोधक कानून देंगे और आज हम पहल करने जा रहे हैं।  मैं अपने दो शब्द कहने से पहले अन्ना जी को अपना अनशन तोड़ने की प्रार्थना करता हूं।
        आजादी के बाद से हमने लगभग हर क्षेत्र में तरक्की की है लेकिन हम भ्रष्टाचार रोकने में नाकाम रहे।  भ्रष्टाचार समाज का नासूर बन चुका है।  किसी भी बिल से यह नासूर नष्ट नहीं होगा, इसके लिए हमें समाज का प्रबोधन करने की आवश्यकता है।  माननीय प्रधानमंत्री जी ने ठीक ही कहा है कि सरकार के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है जिसे घुमाया और भ्रष्टाचार खत्म हुआ।  लेकिन भ्रष्टाचार आज की सच्चाई है।  समाज का हर वर्ग इससे त्रस्त है।  नर्सरी के एडमिशन से लेकर वरिष्ठ नागरिकों को मिलने वाली पेंशन प्राप्त करने तक सब जगह भ्रष्टाचार व्याप्त है।  मैं उस जगह का प्रतिनिधित्व करता हूं जो महात्मा गांधी और विनोबाजी की कर्मभूमि रही है।  मुझे आज भी याद है कि विनोबा जी ने देश के भ्रष्टाचार को लेकर कहा था, देश के नेता और अफसरों को दो वर्ष का अवकाश लेना चाहिए।  विनोबा जी का यह कथन हमारे देश के चरित्र को बताता है।  इसलिए हमें लोकपाल की आवश्यकता है, इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
        आज भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए दो लोकपाल बिल और दो लोकपाल मसौदे हमारे सामने हैं जिसमें सरकार का लोकपाल बिल और सिविल सोसाईटी मतलब अन्ना हजारे जी का जनलोकपाल बिल तथा अरुणा राय और जयप्रकाश नारायण के कुछ सुझाव।  आज हम जनलोकपाल बिल पर चर्चा कर रहे हैं।  इन चारों बिलों में सब कुछ अच्छा है। यह कहना भी गलत होगा और सब कुछ बेकार है यह कहना भी गलत होगा।  हम आज मुख्यतः अन्ना जी के तीन प्रावधानों पर चर्चा कर रहे हैं।  (1) राज्यों में लोकपाल द्वारा लोकायुक्त की नियुक्ति, (2) सिटीजन चार्टर यानि की हर सरकारी दफ्तर नागरिक समस्या के लिए कुछ नियम बनाये जिसे ना मानने पर संबंधित अधिकारी को दंड मिले, (3) सभी केन्द्र सरकार के नौकर वर्ग को लोकपाल के दायरे में लाना।  अब तक काफी वक्ताओं ने इन बिन्दुओं पर चर्चा की है।  मुझे जो इन बिलों में शंकायें हैं, उसे मैं उजागर करना चाहूंगा।
        जेष्ठ समाज सेवक अन्ना हजारे जी का जनलोकपाल बिल आखिर है क्या?  इसके कुछ बिंदु मैं आपके सामने रखना चाहूंगा। इसमें देश के हित में क्या है यह भी हमें देखना होगा।  इस कानून के अंतर्गत, केन्द्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा;  यह संस्था निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी,  कोई भी नेता या सरकारी अधिकारी जांच की प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर पाएगा; भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कई सालों तक मुकदमे लम्बित नहीं रहेंगे।  किसी भी मुकदमे की जांच एक साल के भीतर पूरी होगी।  ट्रायल अगले एक साल में पूरा होगा और भ्रष्ट नेता, अधिकारी या न्यायाधीश को दो साल के भीतर जेल भेजा जाएगा; अपराध सिद्ध होने पर भ्रष्टाचारियों द्वारा सरकार को हुए घाटे को वसूल किया जाएगा; यह आम नागरिक की कैसे मदद करेगा यदि किसी नागरिक का काम तय समय-सीमा में नहीं होता, तो लोकपाल जिम्मेदार अधिकारी पर जुर्माना लगाएगा और वह जुर्माना शिकायतकर्त्ता को मुआवजे के रूप में मिलेगा; अगर आपका राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट आदि तय समय सीमा के भीतर नहीं बनता है या पुलिस आपकी शिकायत दर्ज नहीं करती तो आप इसकी शिकायत लोकपाल से कर सकते हैं और उसे यह काम एक महीने के भीतर कराना होगा।  आप किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार की शिकायत लोकपाल से कर सकते हैं जैसे सरकारी राशन की कालाबाजारी, सड़क बनाने में गुणवत्ता की अनदेखी, पंचायत निधि का दुरुपयोग।  लोकपाल को इसकी जांच एक साल के भीतर पूरी करनी होगी।  सुनवाई अगले एक साल में पूरी होगी और दोषी को दो साल के भीतर जेल भेजा जाएगा; क्या सरकार भ्रष्ट और कमजोर लोगों को लोकपाल का सदस्य नहीं बनाना चाहेगी? ये मुमकिन नहीं है क्योंकि लोकपाल के सदस्यों का चयन न्यायाधीशों, नागरिकों और संवैधानिक संस्थानों द्वारा किया जाएगा न कि नेताओं द्वारा। इनकी नियुक्ति पारदर्शी तरीके से और जनता की भागीदारी से होगी; अगर लोकपाल में काम करने वाले अधिकारी भ्रष्ट पाए गए तो?  लोकपाल/लोकायुक्तों का कामकाज पूरी तरह पारदर्शी होगा।  लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच अधिकतम दो महीने में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा; मौजूदा भ्रष्टाचार निरोधक संस्थानों का क्या होगा?  सी.वी.सी., विजिलेंस विभाग, सी.बी.आई. की भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (एंटी करप्शन डिपार्टमेंट) का लोकपाल में विलय कर दिया जाएगा।  लोकपाल को किसी न्यायाधीश नेता या अधिकारी के खिलाफ जांच करने व मुकदमा चलाने के लिए पूर्ण शक्ति और व्यवस्था भी होगी।
        इन सब मुद्दों पर आरोप-प्रत्यारोप होना लाजमी है क्योंकि हम लोकशाही में विश्वास रखते हैं।  सबसे महत्वपूर्ण है इसमें पारदर्शिता हो और एक सशक्त लोकपाल बिल देश को मिले, ना कि हम एक भस्मासुर खड़ा करे जिससे हमारे जनतंत्र पर ही प्रश्न चिन्ह लगे।
        मुझे दूसरा डर है कि अगर हम अन्ना जी के लोकपाल को पास कर लेते हैं तो इसमें सरकारी नौकर का जो मुद्दा है उस पर भी गंभीरता से विचार होना आवश्यक है।  सरकारी नौकरशाही को भी विश्वास में लेना होगा। नौकरशाह आपसी द्वेष मतभेद के कारण इस कानून का दुरुपयोग ना करे यह भी सुनिश्चित करना होगा।  अगर किसी व्यक्ति पर अपराध साबित होता है तो उससे नुकसान वसूलना इतना आसान नहीं होगा, इसमें कानूनी अड़चनें भी आ सकती है।
        मेरा तीसरा मुद्दा यह है कि इस सारे उथल-पुथल में उद्योग जगत का क्या होगा?  इस बिल का उद्योगों पर, अन्य देशों में हो रहे निवेश पर क्या असर होगा, यह भी सोचना होगा।  भ्रष्टाचार की इस लड़ाई में हमें हमारी आर्थिक प्रगति को संभालते हुए कदम उठाने होंगे।
        यह तो अन्ना जी के बिल की बात हुई, इसके अलावा और भी मसौदे है जिसमें अरुणा राय जी का नाम प्रमुख है।  उनका एक मुद्दा सदन के सामने रखना चाहूंगा जो आम जनता की भ्रष्टाचार की शिकायतें दूर करने के संबंध में है। यह भ्रष्टाचार की शिकायतें निवारण का ढांचा सत्ता के विकेन्द्रित रूप में कार्य करेगा।  राज्य से लेकर जिला स्तर तक ब्लॉक का निर्माण होगा जिसमें आम लोगों की शिकायतों का निवारण त्वरित होगा।
        आज सुबह जब मैं अखबार देख रहा था तब मुझे हमारे पूर्व चुनाव आयुक्त श्री टी.एन.शेषन जी के बिल के कुछ बिंदु पढ़ने में आये, जिसमें से कुछ बिंदु पर से सहमत हूं जिन्हें मैं सदन के सामने रखना चाहूंगा।  (1) लोकपाल नियुक्ति में वोटिंग नहीं, सर्वसम्मति होनी चाहिए; (2) लोकपाल को हटाने के लिए महाभियोग प्रक्रिया होनी चाहिए; (3) चुनाव सुधार की दिशा में पहल होनी चाहिए; और (4) अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग की तर्ज पर लोकायुक्तों को हाई कोर्ट की तरह संविधान में शामिल किया जाए।
        इन सारे अलग-अलग बिलों, मसौदे के बाद मैं अपनी आखिरी बात रखना चाहूंगा।  आज हमें सुनहरा मौका मिला है कि हम भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनायें।  इसलिए जरूरी है कि सशक्त लोकपाल बिल हम पास करें, किंतु इसमें हमारी लोकतंत्र की स्वायत्तता और उसके कार्यक्षेत्र पर कोई आंच नहीं आनी चाहिए। इसके साथ-साथ अन्ना जी ने जो तीन प्रस्ताव हमारे सामने रखे हैं जिसका उल्लेख मैंने पहले भी किया है - (1) सिटीजन चार्टर, (2) सभी नौकर वर्ग को लोकपाल के दायरे में लाना चाहिए; और (3) लोकपाल द्वारा लोकायुक्त की नियुक्ति।  मैं सदन से यह कहना चाहूंगा कि अन्ना की यह तीनों मांगें, तीनों शर्ते स्वीकार कर लेनी चाहिए ताकि अन्ना अपना 12 दिन का अनशन समाप्त कर लें और देश को एक सशक्त लोकपाल मिले।
                                 
* SHRI S. SEMMALAI (SALEM):Corruption is like cancer, eating away the vital values of our Society.  Fight against corruption is a long drawn process and the nation must be prepared with a determination to fight it out.  Parliament is for discussion and not for disruption.  So on this vital  issue  let us discuss the pros and cons of the five versions of Lokpal and  arrive at a consensus.  Let us show to the nation, to our people and to the world that Parliament and the Hon’ble Members of this august House are very much concerned with corruption  and that they are one in eradicating this evil  will from the country.  Let us work  out an agreeable solution and bring out a legislation  under whatever banner.  At this juncture  I would like to mention here that  no  interference  will be allowed to the States  power by the Lokpal Bill.  The right and power of the  states  should not be infringed.  The States may have their own laws to deal with their State affairs.  The States power should not be eroded.  Can a Lokpal change the mindset of people who bribe or bribed?  It would be futile for sheep and goats to pass  resolutions favouring vegetarianism when wolves  have a different opinion.
          Every one in our country is against corruption.  But corruption is all pervasive and present every where.  Let us think why it is so.  It is because of mind set.  We want to root out corruption.  But when one wants to get things done he does not hesitate to bribe. To corrupt or  to get corrupted are both dangerous.  Right from 1966 light attempts have been made in the Parliament to create a mechanism against corruption .  But all the measures have failed.  In Democracy Parliament is supreme and its power to  legislate cannot be delegated to any  other organ or institution.  Mobocracy is not a substitute to democracy.  Parliament is the only body to make laws.  But the will of the people should  be taken into account by the Parliament. 
 
* Speech was laid on the Table               Our revered leader, Chief Minister of Tamil Nadu Puratchithalivi               J. Jayalalithaa has  rightly pointed out that Prime Minister should not be brought under the purview  of the Lokpal Bill.
          If the Lokpal wishes to go into any complaint against the Prime Minister, there will clamour, rightly so for, his  resignation on moral grounds even before the allegation is proved.  And if the Prime Minister has to resign under pressure, then the Government falls.  That is why my great leader emphasises  on this. We should not go in a wrong path.
          Our country is built up with federal set up.  So no law, enacted by the Centre, is allowed to shake the basic structure  of federalism.  States have to be given more powers  by the Centre.   If States are strong, only then the nation will be so strong.  In this sense, all political parties should try to bring an independent, credible and   workable Lokpal before the Parliament.
          Since the matter is under public domain, the Standing Committee is willing to receive all suggestions from the public and other stake holders with an  open mind and submit the report to the Parliament.  The States are also  entitled to tender their views and opinions on this issue.  Let us wait for the report from the  Standing Committee and arrive at a decision in the Parliament after a detailed discussion.  Let us not  rush through and  bypass the procedure.
                                                                                           
श्री कामेश्वर बैठा : जन लोकपाल बिल जैसे महत्वपूर्ण विषय पर मुझे आज बोलने का मौका मिला है, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। असलियत में जन लोकपाल विधेयक क्या है?
सभापति महोदया : यदि आप सभी की सहमति हो तो मैं सदन का समय आठ बजे तक बढ़ा रही हूं।
अनेक माननीय सदस्यः ठीक है।
सभापति महोदया : धन्यवाद। Yes, you can continue now.
श्री कामेश्वर बैठा : जन लोकपाल विधेयक पर आज पूरे सदन में पूरी चर्चा हुई। पक्ष-विपक्ष ने अपनी राय रखी।
19.00 hrs. आज सारी चीजें सुनने के बाद मुझे काफी अनुभव मिला है, जानने और समझने को मिला। मैंने कई लोगों के भाषण को सुना है। माननीय प्रधान मंत्री जी का भाषण भी सुना, कल मैंने राहुल गांधी जी का भाषण भी सुना था। आज सुषमा स्वराज जी के भाषण को भी सुना, बहुत से माननीय सदस्यों का भाषण मैंने सुना। सब ने जन लोकपाल विधेयक पर अपनी-अपनी राय बताई। यह जो बिल लाया जा रहा है, भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए, भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने के लिए, भ्रष्टाचार के सारे लोगों को शिकंजे में कसने के लिए सदन में आज सभी माननीय सदस्य जो चर्चा कर रहे हैं, हमें देश और दुनिया के लोग देख रहे हैं। लोग इंतजार कर रहे हैं कि यहां क्या तय होता है।
          सभापति महोदया, मैं आपके माध्यम से सदन में बताना चाहता हूं कि आज जो भ्रष्टाचार है, सिर्फ आज पैसा खाने वाला और पैसा लूटने वाला कोई भ्रष्टाचार में नहीं लिया जाए, बल्कि भ्रष्टाचार जो भूमि हड़पने वाला है, भूमि माफिया हैं, 9-9-70 में देश का जो कानून हर आदमी की जमीन रखने के लिए बना था, किस आदमी के पास कितनी जमीन होगी, किस के पास जमीन रखने की क्या औकात होगी, सरकार की नीति तय हुई थी। आज भी देश के अंदर बड़े-बड़े भू-माफिया हैं, जिनके पास हजारों-सैंकड़ों एकड़ जमीन पड़ी हुई है। 9-9-70 में यह कानून बना था। उस जमीन को गाय, बैल, सुग्गा-सुग्गी, मंदिर और मस्जिद के नाम पर आज भी उन्होंने अपने कब्जे में किया हुआ है।
          सभापति महोदया, मैं आपके माध्यम से सरकार से जानना चाहता हूं कि क्या भूमि हड़पने वाले भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं है, क्या उन्हें भ्रष्टाचार के दायरे में नहीं रखा जा सकता है? उन्हें भी इस भ्रष्टाचार के दायरे में रखना चाहिए। आज हमारे कई माननीय सांसदों ने कई तरह के भ्रष्टाचार की रूपरेखा बताई। चाहे टिकट काउंटर पर, वृद्धा पेंशन में, अंत्योदय कार्ड, विधवा पेंशन में, इंदिरा आवास में, नरेगा एवं मनरेगा आदि तमाम जगहों पर भ्रष्टाचार है। आप यदि भ्रष्टाचार को जड़ से निकालना चाहते हैं, आज जो अन्ना हजारे द्वारा जन लोकपाल बिल लाया गया है, आपको इस जन लोकपाल बिल में उस जनता की समस्या, उनकी आवाज को भी शामिल करना होगा। आज जो जन लोकपाल का मतलब देखेंगे, जनता का जहां तक भ्रष्टाचार का सवाल है।...( व्यवधान)
सभापति महोदया :  कृपा कर कंक्लुड कीजिए।
श्री कामेश्वर बैठा : सभापति महोदया, हमें कम से कम पांच-दस मिनट बोलने का समय दिया जाए।...( व्यवधान) आप गांव में जाएंगे तो आपको पता चलेगा कि वहां सामंती लोग बैठने नहीं देते हैं। वे वहां दिन भर काम करेंगे और उनके बच्चे शाम को भूखे सो जाएंगे। क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है? वे दिन भर मजदूरी करते हैं, थकते हैं, फिर भी भूखे रहते हैं। आज हमारे माननीय लालू प्रसाद जी ने जिस तरह से अपने वक्तव्य को रखा है, दारा सिंह चौहान जी और शरद यादव जी ने भ्रष्टाचार के बारे में कहा है, मैं भी अपनी बात को उसमें जोड़ना चाहता हूं, मेरी बात को सुना जाए।
         सभापति महोदया, आपने मुझे बोलने का मौका दिया है, उसके लिए मैं आपका आभार प्रकट करता हूं। अगर मुझे बोलने नहीं दिया जाएगा तो मैं अपनी बात को कैसे रख सकता हूं। ...( व्यवधान)
सभापति महोदया: कामेश्वर बैठा जी, आप जल्दी अपना भाषण समाप्त कीजिए।
श्री कामेश्वर बैठा : हमें यह कहना है कि जिस तरह से इन्होंने अपनी बात को रखा है, हमें भी अपनी बात को रखना है। आज हमारा जो आरक्षण और आजादी का मामला है, जिस तरह सदन की गरिमा है, बाबासाहेब ने जो संविधान बनाया है, हम तमाम माननीय सांसद जो आज यहां बैठे हैं, उसी संविधान पर आए हुए हैं। बाबासाहेब ने संविधान में हमें आरक्षण दिया है। मैं पलामू से आया हूं। मैं रिजर्व सीट से आया हूं। अगर बाबासाहेब नहीं देते तो मैं पलामू संसदीय क्षेत्र से रिजर्व सीट से नहीं आता। आज मुझे सदन में अपील करनी है, माननीय लोगों से मुझे अपील करनी है कि कोई भी आप बिल बनाते हैं, कोई भी कानून जब बनाते हैं तो बाबासाहेब के संविधान का अवलोकन करना चाहिए। बाबासाहेब के संविधान को सामने रखकर ही आपको चीज़ तय करनी चाहिए। अगर बाबासाहेब के संविधान को आप खारिज कर देंगे, ठीक है, अन्ना हजारे जी बिल लाये हैं, अन्ना हजारे जी का जन-लोकपाल बिल जो आया है, उसमें आप कोई जनता को जो देखेगा, हमारे देश में नक्सली मूवमेंट हो रहा है...( व्यवधान)
सभापति महोदया : धन्यवाद। आपने अपनी बात रख ली।
श्री कामेश्वर बैठा : ठीक है। महोदया, एक मिनट। नक्सल मूवमेंट में भी देखेंगे तो आखिर किस चीज़ का सवाल उठा रहे हैं।...( व्यवधान)
सभापति महोदया: आपकी बात हो गई, इसलिए बैठें।
श्री कामेश्वर बैठा : आज भूमि माफिया सबसे बड़ा उसका कारण है। वही भूमि माफिया, जो गांवों  में ...( व्यवधान)
                                                                                         
सभापति महोदया: अब रिकार्ड में कुछ नहीं जायेगा। Nothing will go on record. अब बैठिये, अब आपकी बात रिकार्ड पर नहीं जा रही है।
(Interruptions) … * *SHRI MOHAN JENA (JAJPUR): Today is one of the historic day in the history of Parliament as we are discussing such an issue which is very fundamental in nature and a long cherished dream of every citizen.  We are all aware that our hard-earned freedom is yet to reach the door-steps of toiling millions due to growing rampant corruption.  Corruption prevents equal growth, creates inequality.  Corruption disrupts the rule of law, divides humanity.  And finally sabotages democracy.  So after Independence, corruption has become a gigantic monster before the nation and all of us cutting across party lines are to be united to fight this evil.  In this context, I would like to convey my regards to the great leader Anna Hazare for his historic endeavour to create massive awareness throughout the nation. First and foremost, I would request him to break his fast as his life is precious to every Indian.
          The issue of ‘Jan Lok Pal’ Bill has been discussed by this august House at length. The Government’s version of the Bill is also in the domain of the Standing Committee.  Thus, my suggestion in precise would be to reach at a consensus as early as possible to pass the Lokpal Bill as the country has waited long enough since 1968 when the Bill was introduced for the first time.
          The question of inclusion of the P.M. under the purview of the Lokpal is one of the important aspects of the issue.  The entire nation wants the inclusion of P.M. within the ambit of Lokpal. I too support this stand.  But on the question of national security and public order, Prime Minister should be excluded.  Secondly, on the question of Judiciary we should not dilute the constitutional spirit and provision of separation of power theory.  Judiciary in our system is completely autonomous and independent.  At any moment it should not be subservient to any other constitutional body or executive. We have to find out other constitutional way to check the menace of corruption, highhandedness and nepotism in judiciary.  For the accountability of Judiciary, a Bill is already pending before the House.  There is a demand from different segments of society to formulate National Judicial Commission.  I think it will be an appropriate step for transparency in appointment and promotion.  Thirdly, India is a huge country with a vast bureaucratic structure.  It will be a herculean task to bring the entire structure under one umbrella.  On the other hand, ours is a federal polity.  Thus, States should have autonomy and choice to constitute their own Lokayuktas, according to their specific needs with norms laid down by the National Lok Pal.  State Government employees should be covered under State Lokayuktas and Central Government employees including P.S.Us should come under the jurisdiction of National Lok Pal.
          There is a saying ‘Justice delayed is justice denied’.  So one should not run from pillar to post in search of justice when years pass by.  So, every citizen should get justice in due time and every official starting from gram panchayat level to central government secretariat must be legally bound and constitutionally responsible to discharge their duties within a time-bound manner.  Hence citizen’s charter is a very sensible and appropriate demand.  In every office whether at Tehsil level, block level or any ministry of the Central Government, a display board should be placed indicating the nature of work, the officer-in-charge and the stipulated time for the disposal of work. For this a new well drafted and effective legislation is required.  Officers, however big or small they may be, will be punished if they violate the citizen’s charter. 
          Parliament is the supreme institution of our system.  Hence Lok Pal should not be a body above Parliament directly or indirectly.  The conduct of members inside the Parliament should not be brought within the purview of the Lok Pal as Article 105(2) of the Constitution covers the issue.  It is pertinent to mention here that National Lok Pal for its performance should be answerable to Parliament.
          Another point is our society is socially fragmented into various castes, classes and groups.  Though politically ours is a democratic system, social democracy is a distant dream for deprived millions.
          So, this august House should listen to the inner voice of the voice-less people. There are people – the scheduled castes and the scheduled tribes, not represented as per the social composition in different states of the State – be it executive, judiciary or the private sector.  Our Constitution also provides mechanism to safeguard the interests and rights of these deprived sections.  So, when we are discussing to bring an epoch-making legislation in this House, we must not forget them.  Their representation in the search committee, in the selection committee and at the organizational structure of Lok Pal and Lokayuktas is a pre-requisite.
          Another important point is that NGO, both print and electronic media and corporate House, Industry should come under the purview of the Lok pal.  With these words, I conclude.
             
*श्री दुष्यंत सिंह (झालावांड़)ःआज पूरा देश भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हुआ है और हर राजनीतिक पार्टी इस भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत एवं सशक्त लोकपाल बिल लाने की तरफ कदम बढ़ रही है।  आज मुझे स्मरण हो रहा है कि ये बिल 1968 में भी लाया गया था और अब तक 9वीं बार है कि ये बिल लाया गया है। आज देश ऐसे मोड़ पर है कि एक तरफ सिविल सोसाइटी, दूसरी तरफ संसद का लोकपाल बिल और इसको देखते हुए हमें एक मजबूत एवं सशक्त बिल बनाने की जरूरत है।  
        आदरणीय अन्ना जी, की तीन मांगे हैं; प्रधानमंत्री जी को लोकपाल के बिल के दायरे में लाना चाहिए; लोकायुक्त को भी लोकपाल बिल के दायरे में लाना चाहिए और जो लोअर ब्यूरोक्रेसी है इसको भी लोकपाल बिल के दायरे में लाना चाहिए।  जब तक ये तीन विषयों पर संसद की संकल्पना नहीं बनती तब तक आदरणीय अन्ना जी अपना अनशन नहीं छोड़ेंगे। हमें प्रधानमंत्री जी को इस लोकपाल बिल में लाना चाहिए क्योंकि प्रधानमंत्री देश के नागरिक हैं पर उन्हें राष्ट्रीय सिक्यूरिटी के विषयों को इस लोकपाल बिल के दायरे से बाहर रखना चाहिए।  जैसे हमारी विदेश नीति या हमारी सुरक्षा की नीति को इस लोकपाल बिल के दायरे में नहीं रखना चाहिए।  लेकिन प्रधानमंत्री जी इस देश के नागरिक हैं और कोई भी नागरिक आपराधिक कार्य करें तो सीआरपी की धारा में आता है।  इस विषय को देखते हुए प्रधानमंत्री जी को लोकपाल बिल में लाना चाहिए।  
        भारत के प्रांतों में लोकायुक्त हैं और इस लोकायुक्त को लोकपाल बिल के दायरे में लाने की बात की गई है।  ये लोकायुक्त प्रत्येक राज्य में है। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि भ्रष्टाचार राज्यों में न हो और लोकपाल बिल की यह पुकार है कि लोकायुक्त को लोकपाल बिल के दायरे में लाया जाए।  हम लोग भारत के संविधान से बंधे हुए हैं और हमें दो से अधिक राज्यें में एक प्रस्ताव डालते हुए हमें राज्य की एक "इनेबिलिंग क्लोज " डालते हुए इन लोकायुक्तों को लोकपाल बिल के दायरे में लाना है।  जिसके द्वारा भ्रष्टाचार राज्य से हटे और हमारे आम आदमी को एक भ्रष्टाचार मुक्त शासन मिले।  इसके लिए हम सबको आज दृढ़संकल्प करना चाहिए।
        जो हमारी नीचे तबके की ब्यूरोक्रेसी है उसको भी हमें ग्रीवेंस बिल के द्वारा यह तय करना चाहिए कि जो पटवारी या तहसीलदार हो, जो उसके निर्धारित काम हों, वो काम उनके निर्धारित समय पर पूरे हों अगर वो काम कर नहीं पाए तो उनके भत्ते से पेसे काटकर जो व्यक्ति किसी समस्या से पीड़ित है उसको सहायता मिले। उस अधिकारी की तनख्वाह से इसके लिए एक ग्रीवेंस बिल आ रहा है और इसको भी हमें लोकपाल के दायरे में लाना चाहिए।  इसके द्वारा हमें जो नीचे तबके के अधिकारी हैं उनके ऊपर एक धार रहेगी।
        माननीय सांसद अपनी-अपनी विचारधारा लोकसभा में रख सकते हैं और उनको स्वतंत्र प्रभार मिलना चाहिए कि जिसके द्वारा वो लोकसभा में बोल पाएं, वोट दे पाएं और प्रश्न पूछ पाएं।  उनको संविधान की धारा 105 द्वारा छूट मिली है और उनके आचरण को जो लोकसभा में हैं वो लोकपाल बिल में नहीं आ सकता क्योंकि हमारा संविधान सर्वश्रेष्ठ है और हर सांसद लड़ने से पहले, जीतने के बाद और लोकसभा में आने के बाद शपथ लेता है।  पर अगर कोई सांसद लोकसभा के बाहर कुछ गलत काम करता है तो उसको सीआरपीसी की धारा से देखा जाता है।  तब उसको लोकपाल के दायरे में लाने के लिए वाजिब है।
        ये भी माना गया है कि हमें न्यायपालिका को भी लोकपाल बिल के दायरे में लाना चाहिए लेकिन इसके लिए सरकार को जल्दी से जल्दी एक नेशनल जूडिशियल कमीशन लाना चाहिए जिसके द्वारा जजों की नियुक्ति, जजों के कार्यकाल के बारे में चर्चा व विचार-विमर्श कर सकें और अगर कोई जज भ्रष्टाचार में लिप्त हो तो इसको इस राष्ट्रीय न्यायिक आयोग में लाया जाए।
        लोकपाल बिल के दायरे में सीबीआई को भी लाने की बात कही गई है।  हम इस विचार से सहमत हैं कि एक राष्ट्रीय जांच एजेंसी आए जो केन्द्र सरकार से हटकर हो और देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करें।  आज देखने को मिल रहा है कि जहां विपक्ष की सरकार हो या नेतृत्व हो वहां सीबीआई को उपयोग किया जाता है केन्द्र सरकार के लिए।  इसलिए सीबीआई को भी लोकपाल के दायरे में लाना चाहिए।  एनजीओ को भी हमें लोकपाल बिल के दायरे में हमें लाना चाहिए।  इस पर सरकार को विचार-विमर्श करना चाहिए और एनजीओ को इस लोकपाल बिल के दायरे में लाना चाहिए।  अखिरी में मुझे ये कहना है कि देश ने भ्रष्टाचार की चरम-सीमा देखी है।  जैसे 2जी स्पेक्ट्रम सीडब्ल्यूजी, ऐसे घोटाले देश की सर्वश्रेष्ठ पंचायत को धब्बा देते हैं और हमें आज के नए भारत के लिए ऐसा देश बनाना है जो स्वच्छ हो और भ्रष्टाचार मुक्त हो।  मेरी ये प्रार्थना है कि अन्ना जी अपना अनशन समाप्त करें और हम सब आपके साथ हैं, आपके बनाए हुए रास्ते पर चलने के लिए तैयार हैं।   
                       
*श्रीमती अन्नू टण्डन (उन्नाव)ःसबसे पहले जिस वजह से यह चर्चा है उसके लिए अनशन पर बैठे अपने बुजुर्ग और आदरणीय अन्ना हजारे जी को मैं गुजारिश करना चाहूंगी कि अब अपनी हठ छोड़ दें, अनशन तोड़ दें और हमारा आगे भी मार्गदर्शन करने के लिए स्वस्थ रहे और उनको दीर्घायु की कामना करती हूं।
        अपने लोक सभा क्षेत्र उन्नाव की भावनाओं को मैं इस सदन में बताना चाहती हूं जो मेरा दायित्व है।  भ्रष्टाचार से मुक्ति हमारी एकमात्र इच्छा व एक सुंदर भविष्य की आशा है।  आज की चर्चा लोकपाल या जन लोकपाल या अरूणा रॉय जी के सुझाव, लोकसत्ता के सुझाव आदि पर सीमित नहीं रह सकती बल्कि यह एक सशक्त कानून या शायद कल एक अधिनियम बनाने की शुरूआत है।  इस पर तो चर्चा आगे भी होगी और कुछ और कहने के पहले हमारे माननीय वित्त मंत्री के वक्तव्य में जो अन्ना हजारे जी के तीन मुद्दे रखे गए थे उस पर अपने विचार इस सदन को देने हैं।
        इसके लिए मेरे ख्याल से अब तक सदन के फैसले के बारे में अन्ना हजारे जी को खबर मिल गई होगी।  मूल रूप से कोई विरुद्ध नहीं, अपितु हर के अपने छोटे-मोटे सुझाव हैं ताकि इसमें हम कोई गलती न कर बैठे।  मेरा भी यही मत है और मैं सदन की भावनाओं से इन तीनों मुद्दों पर अपने को संबद्ध करती हूं।
        अब जब लोकपाल की चर्चा होगी तो मेरे हिसाब से  Standing Committee  को और सदन को इन खास चार मुद्दों पर विशेष ध्यान देना है।  पहला यह कि एक साधारण लोकपाल या जन लोकपाल कोई नाम भी दीजिए बनेगा या इसको और दांत दिए जाएंगे या एक संवैधानिक दर्जा देने की आवश्यकता है।  मैं कानून की छात्रा नहीं रही हूं इसलिए सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि मिलकर अब कोई चूक ना हो, ऐसा सशक्त कानून बनाए कि इस भ्रष्टाचार की लड़ाई में ब्रह्मास्त्र का काम करे।
        इस कानून के हर तरह के Version को हम लोगों ने देखा परन्तु समय पर इस Standing Committee  को और सदन को तय करना पड़ेगा कि क्या यह संस्था suo moto या खुद से इस पर एक्शन ले सकती है, क्या इसको अपनी एक  Investigation Agency  या Police Powers दी जाए, यह आज के मौजूदा संस्थाओं पर निर्भर रहेगी। क्या इस संस्था के कानून बनाने के बाद जो स्टाफ होगा हमारे मौजूदा   Bureaucracy से लिए जाएंगे या इनका UPSC  द्वारा या किसी और तरीके से Cadre बनाया जाएगा।   इस तरह के कई सवाल और हैं जैसे अन्ना जी के आज हमने तीन सवालों के जवाब दिए।
        यह संस्था को चलाने वाले Chairman व Committee का  Composition क्या होगा।  भ्रष्टाचार की लड़ाई में इस पर तो अभी से अपने-अपने नुमाइंदे घुसाने की बात हो रही है, जिसके नुमाइंदे ज्यादा उसका पलड़ा भारी।  क्या इस पर विचार करना Unbiased तरीके से जरूरी नहीं।
         Article 105 का हक संविधान ने हम सांसदों को दिया है और इस पर एक मत है हम कि इसको कोई बदल नहीं सकता।   Parliamentary Supremacy बरकरार रहे, संविधान की गरिमा बनी रहे और भ्रष्टाचार के नाम पर अपने इस लोकतंत्र में राजनीति खत्म हो।  भगवान से इसी प्रार्थना के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देती हूं।
           
*SHRI P.K. BIJU (ALATHUR): I would like to bring to your notice about my concerns over the Lokpal Bill.  I fully agree with the cause of the movements and the four different versions of the Bill proposed by different persons and groups, i.e. deter corruption in the public institutions and personnel, redress grievances of citizens, and protect whistle-blowers. I feel that the following recommendations should be taken care of with the final draft.  First of all, the PM should come under the provisions of the Bill, as proposed by the activists.  Secondly, judiciary should be monitored by a Judicial Accountability Committee.  My third point is to bring the Media, NGOs and corporate under the ambit of the Bill.  It is obvious that corruption is a byproduct of neo-liberalism.  The uncontrolled market intervention since the introduction of new economic policies in 1990s has a direct connection with the ongoing scale of corruptions or looting of public money. The corporate put aside even 15% of their investment for bribing the bureaucrats for the smooth functioning of the business.  This is just tip of the ice berg.  The neo-liberal reforms are creeping into welfare sectors such as education, health etc making it inaccessible to the common man.  The picture is not different in financial sectors such as banking, LIC etc. FDI is the mantra of the UPA government neglecting its gross implications on the poor sections of our country.
          Hence, I urge the Government to include the above suggestions and keep away from all efforts towards the path of privatization which is a byproduct of neo-liberal policies. 
                                       
*SHRI G.V. HARSHA KUMAR (AMALAPURAM): Shri Anna Hazare’s fight against corruption has created sensation in the country.  We all know, each and every Indian has suffered on account of this cancer of corruption.  The common man is thinking that corruption has spread to all levels of society.  That is why, when Anna Hazare started this fight, people thought we should all support this movement.  The educated youth, especially in urban areas, are supporting him whole-heartedly.  But this fight of Anna Hazare is against corruption or something else, we have to think; because of his anti-democratic actions till date.
          Indian democracy has been quite successful and I am sure it is the best in the world.  Each and every problem is being solved within the framework of the Constitution of India.  But Anna Hazare is not only misguiding the common man but also the whole public of the country.  The Aaam Admi problem of corruption is quite different from what the Anna Hazare’s fight against corruption is.  People are facing corruption at lower levels like Police Station, Hospital, Tehsil office etc., and this problem is hitting them directly, particularly the down-trodden people.  This common man’s sentiments, the Anna team wants to cash on.  People are thinking that Anna is fighting for them but Anna is fighting against corruption at higher levels, that too, leaving out Non-Governmental Organisations (NGOs).  Why has he not included NGOs because Anna has got his own NGO.  Do NGOs  not commit frauds by taking funds from government meant for public welfare. Likewise this Civil Society, what is the meaning of Civil Society, we do not know.  This Civil Society, with the help of media and corporate sponsorship, attacking the Indian democracy in the name of fight against corruption.
          Anna says that this is the greatest non-violent fight on the earth but does he know about Dr. Ambedkar and his fights for justice; I want to quote here.
          Dr. Ambedkar started the Mahab agitation in 1927, but the “untouchables” got access to the tank only in 1937 through a Court Order.  The people of the high castes had managed a Court Order to ban the entry of “untouchables” into the tank on the ground that it was a private tank. Dr. Ambedkar accepted the Court Order and discontinued a second march to the tank.  But he fought through the Courts and got justice in 1937, almost after 10 years.  He did this using legal instruments and a peaceful mass movement, without the coercive means of fasts and hunger strikes.
          Similarly, the agitation for entry into the Kalaram temple went on for 4 years, from 1930 to 1934. He discontinued the agitation in 1934 following opposition by priests, notwithstanding the support extended by Gandhiji.  But he fought a legal battle, along with a peaceful agitation, for the next four years, and in 1939 ultimately secured entry to the temple for “untouchables”.
          Dr. Ambedkar warned people against “hero worship”.  He was immensely concerned over the political culture of “laying down the liberties at the feet of great men or to trust them with powers which enable them to subvert their institutions”.  He believed that there is nothing wrong in being grateful to great men who have rendered life-long services to the country.  But there are limits to gratefulness. No man can be grateful at the cost of his honour, and no nation can be grateful at the cost of its liberty.  This caution is far more necessary in the case of the people of India than in the case of any other country, for in India, Bhakti, or what may be called the path of devotion or hero-worship, plays a part in politics, un-equalled in magnitude to the part it plays in the politics of any other country in the world, argued Dr. Ambedkar.  He went on to add that bhakti or hero-worship in religion may be a road to the salvation of the soul, but in politics, bhakti or hero-worship is a sure road to degradation and to eventual dictatorship.
          The Parliament makes Laws/Acts and how much are we following these Laws?  For example, the scheme of “Special Component Plan for SC/ST, started in 1979.  From inception to till date, including the latest Commonwealth Games, funds have been diverted upto the value of Rs.4,00,000 crores. For this lapse, there is no action against the defaulted authorities. An amount of Rs.678.91 crore was diverted to infrastructure projects irrelevant to the SCs and STs. This shows how much respect we give to the Laws and Acts of Parliament.  What action we have taken on this diversion of funds?  This scheme was initiated by Smt. Indira Gandhi ji and Dr. Manmohan Singh ji was the Head of the Committee at that time.
          My comprehensive view on the matter is that people’s sentiments against corruption have been hijacked by Anna Hazare and team. This team is blackmailing the Parliament of India and attacking the Constitution of India.  If that is not so, why have they not included NGOs in the ambit of their Lokpal Bill. Therefore, my recommendation is that: (i) constitute a new Drafting Committee consisting Members of the previous drafting committee from the Government and Civil Society groups (Team Anna) in addition to the representatives of the political parties and wider civil society organizations, including representatives from SC, ST, OBC, Religious Minority Communities and women; (ii) the revised draft, adopted by the new Drafting Committee, shall be placed before the Parliament; and the Parliament can refer the revised Bill to a new Parliamentary Standing Committee for wider consultations with various groups and communities, political parties within specified time; (iii) there should be due representation of SCs, STs, BCs including BCs of religious minorities and women in the Lokpal and in its Selection Committee; and (iv) above all, we urge Shri Anna Hazare to end his fast and facilitate the wider consultative process to ensure comprehensive Lokpal Bill.
*SHRIMATI BIJOYA CHAKRAVARTY (GUWAHATI): India is a great country having unparalleled tradition of its own. Powerful Emperors, when fail to discharge their duty to the people or for any other cause, when “Guru” asked to resign, Emperor resigned leaving everything. This is past and a part of history now.
Ours is the greatest democracy in the world. Presently it is in peril. Corruption which was unknown in the country raised its ugly head since 1950 and 1960. All legal provisions then made were not effective. Corruption spread its tentacle everywhere.
Now crores and crores of rupees have been siphoned off by people in high places. Ministers, high officials are caught for corruption, and languishing in jail. Corruption breeds corruption. Corruption creeps in political, economic, social, education and medical spheres, as a result, people face acute hardship. They have to pay bribe for every service.
Agri-land snatched. Land of poor people forcibly taken away. When protested, they had been shot at and lathi-charged. Due to corruption, there is rise in prices of every essential. People feel depressed and want a way for redressal of the genuine grievances. When Anna Hazarji resorted to hunger strike and asks for Jan Lokpal Bill to be passed in the Parliament, people spontaneously joined Annaji’s movement. It is because rampant corruption makes people helpless. Instead of responding to the people’s concerns, the Government arrests Anna Hazarji. Even today Government is reluctant to thrash out a solution but play delaying tactics when Annaji is in fast for last 12 days.
In Assam, flood eroded acres and acres of land and many people lost their lives due to floods but corrupt officials never care for all these. Thus corruption in every sphere of life eat up vitality of the country. Hence a strong Bill is necessary.
   
* Speech was laid on the Table I support movement against corruption by Annaji. Moreover, I support the Leader of the Opposition Shrimati Sushma Swaraji’s view for a strong Jan Lok Pal to save the people from utter distress.
                                                                                           
श्री शरीफ़ुद्दीन शारिक (बारामुला):चलिये, इनका तार कट गया, मेरा जुड़ गया। मोहतरमा सदर नशीन, सुबह से उस बयान पर बहस हो रही है, जो लीडर ऑफ दि हाउस ने हाउस के सामने रखा और उस पर मोहतरम सुषमा जी ने तफसील से बहस को और बाकी सारे दोस्तों ने दोनोंतरफ से बहस की। सवाल यह नहीं है कि बिल किस किस्म का बनेगा। बिल तो इस मुल्क में बहुत हैं, कानून तो इस मुल्क में बहुत हैं। अगर कानून पर अमलआबरी नहीं होगी तो कानून बनाने का कोई फायदा नहीं रहेगा। इसमें दो राय नहीं हैं, चाहे यहां से कहें, चाहे यहां से कहें। रिश्वतखोरी, बद्यानती, बेईमानी, बदएनवानी का जाल फैला हुआ है, उसमें दो राय नहीं हैं। इंशाअल्लाताला, आगे भी लोग पकड़े गये हैं, पकड़े जाएंगे, लेकिन बुनियादी बात यह है कि हम क्यों इस दर्जे पर पहुंचे हैं। हमारी तारीख कितनी रोशन है, हमारे नेता जो रहे हैं, कितने रोशन रहे हैं, कितने रोशन ख्याल तारीखें इस मुल्क में चली हैं, फिर बीच में हमारा क्यों यह ठहराव आ गया कि हम दयानतदारी के बदले, बद्यानती की तरफ जा रहे हैं। अब हमारे इकलाख़ में गिरावट क्यों आई है और हमारे मोरल करैक्टर में इतनी कमजोरी क्यों आ गई कि हम पैसा देखते ही फुदकने लगते हैं और हमारा सारा दीन-धरम भूल जाते हैं।
          मेरी इसमें यह गुज़ारिश है कि जितने भी आपके पास प्रस्ताव आये हैं, आपके पास सिफारिशें आई हैं, आपके पास बिल बनकर आये हैं, इनको बेशक आप स्टेंडिंग कमेटी में भिजवा दीजिए और स्टेंडिंग कमेटी से भी हमारी गुज़ारिश होगी कि इसमें सख्त से सख्त, कठोर से कठोर और संगीन से संगीन कानून बनाकर इस हाउस में सिफारिशें लाये। लेकिन बुनियादी बात फिर यही आयेगी कि क्या कानून बनाकर हम उन पर अमलआबरी करने का इरादा रखते हैं। हमारे पास वे सिलसिले हैं, वह मशीनरी है, हमारे पास वे तमाम चीज़ें हैं कि हम इस कानून पर सख्ती के साथ अमल करें। मैंने परसों भी कहा था कि कानून यहां हैं। कत्ल के खिलाफ कानूनहैं तो हमारे दो वज़ीरे-आजम कत्ल किये गये। लिहाजा अगर कानून पर हम अमर नहीं करते तो बुनियादी बात है कि हमारे पोलीटीशियंस पर एतबार खत्म हो गया है। दुनिया में हम बेएतबार हो गये हैं। क्यों हममें एतबार नहीं है? क्यों हम महात्मा गांधी की तारीख के वारिश हैं? हम अज़ीम तहरीक के वारिश हैं, हमको देखकर लोग चिढ़ते क्यों हैं? हमने किया क्या है? हो सकता है कि हममें दो, तीन, चार या पांच लोग ऐसे हों, जिनके खिलाफ उंगली उठाई जा सकती है, लेकिन हमारा यही है कि दामन निचोड़ लें तो फरिश्ते वज़ू करें। हमारी यह बात नहीं है कि हर एक इस हमाम में यहां ऐसा ही है, वह बात नहीं है। यहां बहुत ही पवित्र लोग बैठे हैं, यहां बहुत ही मौहज्जिब और ईमानदार लोग बैठे हैं। हर एक के खिलाफ उंगली उठाने का न किसी सिविल सोसायटी को हक बनता है, न किसी सिविल सोसायटी के किसी और आदमी को हक बनता है। यहां वे लोग हैं, जो बहुत झंझट झेलकर यहां पहुंचे हैं। जिन्होंने सारी जिंदगी आवाम की खिदमत में लगायी है, लिहाजा इन लोगों के खिलाफ उंगली उठाना हिंदुस्तान की बेइज्जती होगी।  जो लोग बाहर हैं, उनसे मैं यही गुजारिश करूंगा कि ये हिंदुस्तान के नुमाइंदे हैं, हिंदुस्तानी आवाम के नुमांइदे हैं, चाहे इस तरफ से हैं, चाहे उस तरफ से हों, यहां चुनकर आते हैं।  इनका सम्मान करना, इनकी इज्जत करना, इनकी इज्जत बरकरार रखना, इस हाउस की इज्जत बरकरार रखना, इस संविधान और आईन की इज्जत बरकरार रखना, यह सारे देशवासियों का फर्ज है।  इसको बच्चों की चेयर नहीं बनाना चाहिए।  इसी के साथ अन्ना हजारे जी को, जो इस सारी सोच में एक उछाल लेकर लाए, उनका हमें धन्यवाद करना चाहिए।  जैसा यहां सभी ने अपील की कि उन्हें अब अपना अनशन और भूख हड़ताल खत्म करना चाहिए।  उन्होंने एक दिशा दी, उन्होंने एक रहनुमाई दी, उन्होंने एक डायरेक्शन दिखाया, उस डायरेक्शन पर आज संसद, सारे हिंदुस्तान के नुमाइंदे सोच रहे हैं।  उसी डायरेक्शन को ठीक करने के लिए यह सारा देश चल रहा है, लेकिन बदउन्वानी के खिलाफ जंग जारी रहनी चाहिए।  हर जगह पर बदउन्वानियां, इंडस्ट्री है, बदउन्वानी है, मीडिया है, बदउन्वानी है, जुडीशियरी है, बदउन्वानी है, एग्जीक्यूटिव है, बदउन्वानी है, पॉलिटिक्स है, बदउन्वानी है, तिजारत है, बदउन्वानी है, इसको दूर करने के लिए आप ही सोच सकते हैं, यही हाउस उसको ठीक कर सकता है।  किसी ने कहा था कि न मानोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदुस्तान वालों, तुम्हारी दास्तां तक बी न होगी दास्तानों में।   
   
SHRI AJAY KUMAR (JAMSHEDPUR): Madam Chairman, first of all, I thank you for giving me this opportunity to speak on such a historic occasion.  It is for the first time I am speaking in the House. The occasion is also pretty overwhelming because a galaxy of leaders spoke before me and I am greatly humbled by this opportunity.
          I come from Jamshedpur, Jharkhand.  I just want to tell you that being in Jharkhand, I have experienced pernicious practice of corruption day in and day out.  The people of Jharkhand not only need an effective Lokpal Bill here but they also want an effective Lokayukta there.  Actually, Shri Babulal Marandi, the leader of my Party, Jharkhand Vikas Morcha, is basically supporting the affiliation for fight against corruption.
          There are a couple of issues which I want to bring it to your attention. Three day back, I had an opportunity to go to Ramlila Grounds.  One of the discussions that happened was on the Citizens’ Charter, the Lokayukta in States and the inclusion of lower bureaucracy to be included with the consensus of Parliament. Now, as I have heard that there will be a voice vote, I am sure, he would definitely end his fast.
          I would request him from this august House to end his fast as the discussion is going on and there is a consensus between the Leader of the House and the Leader of the Opposition. They have said that these important points will be referred to the Standing Committee.   Therefore, I request Shri Anna Hazare to end his fast for the good of the nation and if he does not, then we would assume that the intention is to create a situation which cannot be resolved.
          We agree with most of the Members like Shri Lalu Yadav and Shrimati Sushma Swaraj. They have said that the judiciary should be out of the Lokpal Bill as there is the Judiciary Accountability Bill. But it would be inappropriate if I do not mention that I have friends in the civil society. What we witnessed in the Ramlila Grounds, when Shri Om Puri and Shrimati Kiran Bedi spoke, was definitely unfortunate.  It is important for Parliamentarians to understand that however much we may be critical of the parliamentary process, the democratic process or the parliamentary process is the best process that we have.  That process should be respected.  The day we lose it, the nation loses and that is something fundamental and very important for everybody to understand.  That should not happen.
          I had been a civil servant and now a new Member of Parliament but I have been associated with political activities for the past 15 years.  I want the people outside to hear from this House that a majority of the people in public service and political sphere are people who fight for the poor day in and day out.  They are the people who understand and who have to listen to complaints. They are the people who have led 30 years of political struggle and agitation. So, it is not proper to paint everybody with very unfortunate picture. It is important for us to realize that a large percentage of Members have served three to four terms and have been actually working for the interests of the people.
          I can tell you from my heart that it is easier to be a civil servant than to be a public representative.  So, my request to the civil society members is that, please do not reduce the respect of the House; please do not make such statements outside. They are people who are responsible.
          Last but not least, it is something too big for a person of my experience to say this.  But, I think, we all have a historic chance to prove to the civil society members outside that we will come with a Bill which is better than this, which is more transparent, more practical, and more effective. I think we are capable of doing that. 
*श्री गोरखनाथ पाण्डेय (भदोही): आज पूरा देश भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आन्दोलित है। श्री अण्णा हजारे जी 12 दिन से भूख हड़ताल पर हैं। उनकी टीम उनके तीन प्रस्ताव, तीन विषयों पर सदन की चर्चा चाहते हैं तथा उसी आधार पर लोकपाल विधेयक बने। इसमें पहला बिन्दु है कि प्रधानमंत्री जी को लोकपाल के दायरे में आना चाहिए। देश की गरिमा की दृष्टि से विदेश नीति, आन्तरिक नीति पर उन्हें स्वतंत्र रखा जाये। उनकी प्रतिष्ठा देश की प्रतिष्ठा है। अन्य मामलों पर उनकी सहमति भी है, इन्हें भी दायरे में रखा जाना चाहिए।
           सांसदों को उनके आचरण, उनके कार्य को लोकपाल के दायरे में रखा जाये। जनता की इच्छा से, जनता के द्वारा चुनकर चुनाव के बाद प्रतिनिधि आते हैं। इनको अविश्वसनीय बनाना, इनके आचरण पर अविश्वास करना, सदन की गरिमा पर प्रश्नचिन्ह लगाना है। संसद के ऊपर सुपर पावर बनाना संविधान का उल्लंघन है। बाबा साहब डा0 भीमराव अम्बेडकर जी ने देश का संविधान बनाते समय कानूनी अधिकार सब को दिया और उसी आधार पर देश चल रहा है। आज इस संविधान की गरिमा पर चोट नहीं होनी चाहिए। कानून संसद बनाती है और इसकी गरिमा को अक्षुण रखना चाहिए।
           आज देश की न्यायपालिका भी अपने कर्त्तव्य, कार्य-व्यवहार से घेरे में आ गयी है। न्यायाधीशों के कार्य-व्यवहार, फैंसलों पर अंगुली उठ रही हैं। उनके ऊपर निगरानी के लिए निगरानी समिति बननी चाहिए। आज जरूरत है कि जनता को सही न्याय मिले। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना आवश्यक हो गया है।
          आज देश भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहता है। हर वर्ग, हर समुदाय, समाज का प्रत्येक समुदाय भ्रष्टाचार से कराह रहा है। इससे देश की गरिमा प्रभावित हो रही है। संसद में बहस चल रही है और हर दल के लोग अपने विचार रख रहे हैं। अण्णा जी के स्वास्थ्य के प्रति पूरा सदन चिंतित है। उनके जीवन के प्रति सदन चिन्ता व्यक्त कर सुझाव भेज रहा है। आज पूरे देश में भ्रष्टाचार कैसे समाप्त हो, इस पर विचार किया जा रहा है।
           आज अधिकारी निरंकुश हो गये हैं, अधिकारी भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं, उन्हें इसकी परिधि में आना चाहिए। यदि बड़े अधिकारियों पर अंकुश लगा तो छोटे वर्ग के कर्मचारियों पर स्वतः ही अंकुश लग जायेगा। संविधान की संप्रभुता को ध्यान में रखकर प्रभावी लोकपाल बनाया जाये।
 
* Speech was laid on the Table                          आजादी के बाद आठ बार लोकपाल विधेयक लाया गया किन्तु वह प्रभावी नहीं हो पाया। आज समय की पुकार है कि इसे कानून की परिधि से संसद से पारित किया जाये। स्टैंडिंग कमेटी में प्रस्ताव जायेगा, सभी के सुझाव आयेंगे, एक सशक्त लोकपाल बनाया जाये, यह हमारी भी इच्छा है, सुझाव है और सदन की भी यही धारणा है। आज कॉरपोरेट घराने, एन.जी.ओ., मीडिया भी इस घेरे में आना चाहिए, यह धारणा सदन से आ रही है। मेरा भी यही सुझाव है। देश में भ्रष्टाचार की जड़ें देश की हर व्यवस्था तक जा चुकी हैं। ग्रामीण अंचलों में गरीब कराह रहा है, उसकी मेहनत की कमाई, 2जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ, आदर्श सोसायटी घोटालों की भेंट चढ़ रही है। देश में महंगाई बढ़ रही है, सरकार लाचार है, यह भी भ्रष्टाचार की परिधि में ही आता है।
           लोकपाल विधेयक, जन लोकपाल विधेयक आज श्री अण्णा हजारे जी का ही आन्दोलन नहीं रह गया है। यह देश का आन्दोलन बन गया है। देश का हर वर्ग आन्दोलित है, इस पर अंकुश लगना आवश्यक है। देश के विकास में भ्रष्टाचार, कालाधन बाधक है और इस पर रोक लगाना आवश्यक है। आरोप, प्रत्यारोप न लगायें जायें, राजनीति की परिधि से ऊपर उठकर कानून के दायरे में लोकपाल सशक्त लोकपाल बने, आज देश की यही मांग है।
           हमारी नेता मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश ने अपने प्रदेश में लोकायुक्त एवं जनसुरक्षा कानून के पहले से लागू कर रखा है। आज उत्तर प्रदेश में सर्व समाज की व्यवस्था में कार्य हो रहा है, सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की नीति पर कार्य हो रहा है। मेरा सुझाव है कि देश से भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए कड़े कानून, सुदृढ़ लोकपाल की आवश्यकता है किन्तु इसके निर्माण के साथ बाबा साहब डा0 भीमराव अम्बेडकर जी द्वारा बनाये गये संविधान की अवमानना न हो। संसद की गरिमा धूमिल न हो, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ी, गरीब तथा निरीह लोगों का विकास बाधित न हो, उस पर भी समुचित ध्यान देते हुए देश से भ्रष्टाचार समाप्त हो। जनता की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए सशक्त, मजबूत, सर्वमान्य लोकपाल विधेयक पारित करना चाहिए।
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*श्री प्रवीण सिंह ऐरन (बरेली): समयाभाव के कारण मैं संभवतः इस पवित्र सदन में लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर में अपनी बात और अपने विचार, जो जन लोकपाल बिल के प्रस्ताव में अधिकांश प्रावधानों के समर्थन में हैं, नहीं रख पाया। अतः मैं लिखित में अपने विचार इस सदन के सम्मुख रख रहा हूं। मैं इनका समर्थन करता हूं, सिवाय उस प्रावधान के जिसमें सम्मानित सदस्यों के सदन के भीतर व्यवहार को जन लोकपाल के अधीन लाना प्रस्तावित था। परंतु, मेरी राय में समाज के तमाम ऐसे वर्ग हैं जिनके मत और उनके पक्ष में भी किसी विधिवत कानून बनाए जाने से पूर्व सुना जाए। इसमें अल्पसंख्यक वर्ग, किसानों, श्रमिकों, कृषि कामगारों, वकीलों, डॉक्टरों, शिक्षकों, बुद्धिजीवियों सहित तमाम वर्गों को शामिल किया जाए। इसमें मीडिया को तथा एनजीओज को भी शामिल किया जाए। इसमें कॉरपोरेट जगत में व्याप्त घोर भ्रष्टाचार को भी शामिल किया जाए। इसमें धार्मिक संस्थाओं में यदि भ्रष्टाचार है तो वह भी शामिल किया जाए।
           मैं आपको और तमाम साथी सांसदों को, इस सरकार और इस महान संसद को आभार, धन्यवाद और साधुवाद देता हूं कि आप सबने देशवासियों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए कल सर्वसम्मति से आदरणीय अण्णा हज़ारे जी को एक मजबूत और प्रभावी लोकपाल बिल पास करने के पक्के इरादे का भरोसा देते हुए अपना अनशन समाप्त करने की अपील की।
          मैं आदरणीय अण्णा जी को भी आभार, धन्यवाद और साथ में बधाई देना चाहता हूं कि जिस भ्रष्टाचार को कंट्रोल करने के लिए एक मजबूत लोकपाल बिल सरकार और ये महान संसद बनवाने को कटिबद्ध है उसे और जल्दी और मजबूत बनाने में और इसके लिए एक बड़ा जनमानस तैयार करने में महत्वपूर्ण एवं केन्द्रीय भूमिका अदा की है। महोदय, जो तीन प्रस्ताव इस सदन के सामने हैं जिनमें जन लोकपाल बिल शामिल हें, इन तीनों में ही कुछ बहुत अहम और प्रभावी प्रस्ताव शामिल है। जेसा कि हम सब जानते हैं कि सरकार द्वारा पेश और संसद की स्थायी समिति के समक्ष विचाराधीन लोकपाल विधेयक एक प्रस्तावित विधेयक है और उसे स्थायी समिति के सामने भेजने का उद्देश्य यही है कि इसमें श्री अण्णा हज़ारे जी और उनके संगठन सहित देश के सभी वर्गों का पक्ष और विचार लिये जा सकते हैं और साथ ही साथ इस महान संसद के सभी राजनैतिक दलों के विचार और प्रस्तावित संशोधन पर विचार करें और अपनी रिपोर्ट इस संसद के समक्ष पेश करें और इस पर गहन चचा के बाद संविधान के दायरे में रहते हुए एक   * Speech was laid on the Table ऐसा प्रभावी मजबूत लोकपाल बिल लाया जा सके जिसे गांव, मोहल्ले, कस्बे, नगरों, और महानगर सहित इस देश के कोने-कोने में रहने वाले करोड़ों लोगों को भ्रष्टाचार रूपी राक्षस से मुक्ति एवं राहत मिल सके।
          मैं जानता हूं कि इस महत्वपूर्ण विषय पर सभी दलों के तमाम अनेकों साथी सांसद अपने विचार रखना चाहते हैं और हमारे पास समय भी कम है इसलिए मैं बिन्दुवार अपने विचार रखूंगा।
          भ्रष्टाचार से गांव, गली, मोहल्ले से महानगरों तक लगभग हर क्षेत्र में हर विभाग और लगभग हर कदम पर आम और खास पीड़ित और प्रभावित हम सांसदगण भी इसमें शामिल हैं।
          जन लोकपाल बिल के उन सभी प्रावधानों में विस्तृत चर्चा चाहता हूं जो इस बिल को महत्वपूर्ण बनाने में मददगार होंगे और मैं यह भी चाहता हूं कि इस बिल पर जो चर्चा हो उसमें संसद के विचारों को संबंधित संसदीय समिति को भेजा जाए ताकि समिति इन तीनों बिलों पर समाज के तमाम पक्षों और वर्गों से उनकी राय लेकर अपनी रिपोर्ट वापस सदन को दें।
          मैं जन लोकपाल बिल में ऐसे सभी प्रस्ताव जो संविधान के विरूद्ध हें, उनका विरोध करता हूं।
          इसी प्रकार, सुश्री अरूणा राय जी एवं जय प्रकाश नारायण के बिल के प्रस्तावों को भी कानून एवं न्याय मंत्रालय संबंधी स्थायी समिति को भेजने या उस पर इस सदन की राय या विमर्श भेजे जाने की संस्तुति करता हूं।
          सभी सांसदों, राजनीतिज्ञों एवं सभी दलों के लिए अपमानजनक भाषा, जो श्री हज़ारे की टीम ने की है, उसका मैं विरोध करता हूं।
          राजनैतिक मंच के राजनैतिक उपयोग का अनैतिक उपयोग जो किया गया, उसकी भी विरोध है।
          लोकतंत्र के चारों स्तंभ- विधानपालिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका एवं जनसूचना तंत्र (मीडिया) को भी शामिल करना चाहिए।
          एन.जी.ओ. को भी लोकपाल अथवा किसी और प्रभावी संस्था में नियमित करना चाहिए।
          संसद के अंदर सांसदों के आचरण बाहर रहे।
          प्रधानमंत्री को शामिल करते हुए रक्षा, राष्ट्र की सुरक्षा जैसे मुद्दों को जन लोकपाल के दायरे से पूरी तरह अलग रखा जाए।
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*श्रीमती जे. शांता (बेल्लारी):  देश में जिस तरह भ्रष्टाचार फैला है उसे रोकना अति आवश्यक है।  आज देश में भ्रष्टाचार ऊपर से लेकर नीचे तक के लिए अनशन पर बैठे हैं।  देश की जनता चाहे वे बड़े, बूढ़े, नौजवान, बच्चे, महिलाएं सभी आयु वर्ग के घर से निकलकर सड़क पर आ गए हैं।  इस लोकतांत्रिक देश में जनता की आवाज को देखते हुए एक सशक्त एवं प्रभावी लोकपाल बिल का आना देशहित में होगा।
        भ्रष्टाचार का मामला पिछले कुछ वर्षों से देश में इस तरह उजागर हुआ है चाहे वो टू जी स्पैक्ट्रम का घोटाला हो, कॉमनवेल्थ गेम्स का मामला हो, आदर्श सोसायटी हो या विदेशों में जमा काला धन।  ऐसे कई अन्य घोटाले देश में उजागर हुए हैं। जिससे लोग काफी उद्वेलित हुए हैं, घोटाले के कारण देश में मंहगाई आसमान छूने लगी, जो दिनोंदिन बढ़ती जा रही है जिससे देश की जनता आक्रोशित हो गयी।  इस घोटाले से सबसे जयादा गांव, गरीब, किसान एवं मध्यम वर्गीय परिवार प्रभावित एवं परेशान हुए, जो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य नहीं दे पा रहे हैं।  खाने को दो वक्त की रोटी नहीं दे पा रहे हैं, किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, युवा वर्ग बेरोजगार पड़े हैं, देश में त्राहि-त्राहि मची हुई है।  इसलिए देश में एक सशक्त एवं प्रभावी लोकपाल बिल लाया जाये जिससे भ्रष्टाचार रुक सके।  कम से कम 75 प्रतिशत भ्रष्टाचार में कमी लायी जा सके और देश की अर्थव्यवस्था सही ढंग से चल सके, लोकतंत्र की रक्षा हो सके, सांसद की मर्यादा एवं गरिमा बनी रह सके।
        सशक्त लोकपाल बिल में सभी दफ्तर में निश्चित समय-सीमा में काम निपटाने, लोकपाल के साथ ही राज्यों में लोकायुक्त के लिए कानून बनाने एवं सभी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाये जाने का प्रावधान होना चाहिए।  साथ ही प्रधानमंत्री भी इस लोकपाल के दायरे में हो तथा सी.बी.आई. भी इसके दायरे में होना चाहिए। एन.जी.ओ., दूरदर्शन एवं मीडिया के साथ-साथ वकीलों को भी इसके दायरे में आना चाहिए।  सभी भा.ज.पा. सांसद चाहते हैं कि श्री अन्ना हजारे अपना अनशन खत्म करें।  हम संसद में जनलोकपाल बिल पारित करने का समर्थन करते हैं।
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वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया): सभपति महोदया, आज इस सदन में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चर्चा की जा रही है। यह एक ऐसा मुद्दा है जो देश के एक-एक नागरिक को प्रभावित करता है - चाहे वह नौजवान हो, महिला हो या बुजुर्ग हो। देश की शक्ति आज विश्व स्तर पर प्रामणित हो रही है। लेकिन मैं भी समझता हूं चाहे अन्ना जी हों या अन्ना के टीम के लोग हों उनके सोंच विचारधारा में...( व्यवधान) गलतियां सबसे होती हैं और हम मानने के लिए तैयार हैं। मैं नहीं समझता हूं कि कोई व्यक्ति छोटा होता है अगर वह अपनी गलतियां मानने के लिए तैयार हो।
          भ्रष्टाचार का मुद्दा आज एक-एक व्यक्ति को प्रभावित कर रहा है। आज देश भर की आवाज इस संसद में गूंज रही है। हरेक व्यक्ति की आवाज गूंज रही है जो केवल रामलीला मैदान में न हो, जैसा शरद जी ने कहा, लालू जी ने कहा कि गांव-गांव का व्यक्ति भी इस से प्रभावित है। इस से पिछड़े वर्ग के व्यक्ति प्रभावित हैं। दलित वर्ग के व्यक्ति और महिलाएं इससे प्रभावित हैं। आज संसद से यह आशा है, पूरी देश संसद की ओर देख रही है। विश्वास का आलम हमें इस संसद से तय करना होगा। एक ऐसा विश्वास का आलम जिसमें एकता दिख पाए, अनेकता नहीं। देश की प्रभुता बनाए रखनी है क्योंकि देश ने सदैव पूरे विश्व को एकता का प्रमाण दिया है। अनेकता में एकता, वासुधव कुटुम्ब, स्वामी विवेकानंद जी के बारे में वरूण जी ने कहा कि इस देश में यह उनकी देन है। आज संसद को भी उसी स्वर में बोलना चाहिए।
          मुझे एक नौजवान होते हुए नेता पक्ष के भाषण को सुनते हुए आश्चर्य हुआ। मैं सुषमा जी का बहुत आदर करता हूं। केवल वह मेरी बुजुर्ग नहीं है लेकिन अब मेरे प्रदेश से भी हैं। वह मेरे निकट क्षेत्र विदिशा से हैं। हमारी बहुत बार बहुत विषयों पर चर्चा हुई है। मैं सम्मान से उनके सामने दो तीन मुद्दे रखना चाहता हूं।  आज के भाषण में उनका वक्तव्य था कि सस्ती लोकप्रियता हमें हासिल नहीं करना चाहिए। लेकिन उस वक्तब्य के बाद हम सब ने संसद में क्या सुना? आज बुजुर्गों का यह दायित्व होना चाहिए कि जो सीख वे नौजवानों को सिखाए, क्या सीख, यह सीख हम सिखें की हमारी कथनी और करनी में अंतर न हो। यह सीख हम सिखें की हमारी नीति और नियत में अंतर नह हो। बुजुर्गों का यह दायित्व होता है कि यह पूंजी अपने समय से नई पीढ़ी में यह प्रमाणित करना। वही हम नौजवानों की चेष्टा बुजुर्गों के प्रति है। आज मैं एक नौजवान होने के नाते देश की युवाओं की तरफ से दो-तीन प्रश्न करना चाहता हूं। इस संसद में कहा गया कि आप के प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में आने के लिए तैयार थे लेकिन आप ने उसे स्वीकृति प्रदान नहीं की।
   
जब एनडीए के प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी थे, वे मध्य प्रदेश और ग्वालियर से आते हैं, जिनका मैं भी बहुत आदर करता हूं, जब वे इस दायरे में आने के लिए तैयार थे, तो आज देश का नौजवान सुषमा जी से प्रश्न करना चाहता है कि वह लोकपाल बिल एनडीए के समय में पारित क्यों नहीं हुआ? कथनी और करनी में अंतर नहीं होना चाहिए। वह यहां छ: साल लंबित रहा।...( व्यवधान) मैंने आपकी पूरी बात सुनी है। मैं आपसे विनम्रता से अनुरोध करना चाहता हूं कि मेरी बात सुनिए।...( व्यवधान)
          सस्ती लोकप्रियता की बात की गई। आज देश का युवा अनंत कुमार जी, गोपी नाथ मुंडे जी से पूछना चाहता है कि वे कल, परसों रामलीला मैदान में क्या कर रहे थे? अगर सस्ती लोकप्रियता नहीं हासिल कर रहे थे, तो रामलीला मैदान में क्या कर रहे थे? जब उन्हें वापिस जाने का रास्ता दिखाया गया, जैसे लालू जी ने अपने भाषण में कहा, तब वे यहां वापिस आए। अगर सस्ती लोकप्रियता की बात की जा रही है, तो मैं प्रश्न पूछना चाहता हूं कि एनडीए सरकार ने वर्ष 2001 में यह विचार रखा था, बहुत अच्छा विचार रखा था कि सूचना अधिकार नियम के जैसे हमें एक अधिनियम पारित करना चाहिए। वह संसद में आया और संसद में आने के बाद किस कचहरी और किस फाइल में गायब हो गया, आज तक किसी को नहीं मालूम। सूचना अधिकार नियम अगर पारित किया गया तो यूपीए सरकार के प्रथम समय पर पारित किया गया जब सोनिया गांधी जी की एनएसी ने प्रधान मंत्री जी के साथ मिलकर उसे संसद के सभा पटल पर रखा था। वह राइट टू इन्फार्मेशन एक्ट, सूचना का अधिकार अधिनियम पारित किया गया।...( व्यवधान) जब आप बोल रहे थे तब हम सुन रहे थे, इसलिए मैं हाथ जोड़कर निवेदन करना चाहता हूं कि हमारी बात भी सुनी जाए।
          मैं आगे कहना चाहता हूं कि जब वह सूचना अधिकार नियम विधेयक इस संसद के सभा पटल पर पेश किया गया, जिस सभा पटल के बारे में लालू जी ने कहा कि यह मंदिर है, हम नौजवानों, देश के हरेक वासी के लिए मंदिर है, सभापति महोदया, जहां आप बैठी हैं, वहां हम नतमस्तक होते हैं। लेकिन जब वह सूचना अधिकार अधिनियम विधेयक इस संसद में पेश किया गया तब पूरी एनडीए इस संसद से बॉय काट करके बाहर चली गई। मुझे आज वह तारीख याद है क्योंकि उस समय मैं पीछे बैठा हुआ था। उस दिन यानी 10 मई, 2005 को मैं पीछे बैठा हुआ था जब मेरे दोस्त, मेरे सहयोगी मिलिन्द देवरा जी ने उस भाषण की शुरुआत की थी, तब इस हाउस में एनडीए की तरफ के सारे बैंचेस खाली पड़े हुए थे, एक व्यक्ति उस बात को सुनने के लिए तैयार नहीं था। आज जो टीम अन्ना कहती है, सामाजिक संस्थाएं कहती हैं कि हमें अपना हक चाहिए, हमें अपना अधिकार चाहिए, वह अधिकार अगर इस देश में किसी ने दिया है तो यूपीए सरकार ने उन सामाजिक संस्थाओं को दिया है। यहां बैंचेस खाली पड़ी हुई थीं। आप में से एक भी सदस्य चर्चा करने के लिए नहीं आया। आप में से एक भी सदस्य अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए नहीं आया। चाहे सहमति हो या असहमति हो, उसमें कोई कठिनाई नहीं है। लेकिन एक व्यक्ति भी मौजूद नहीं था।...( व्यवधान) मैं नौजवान हूं, मुझसे गलती हो सकती है, इसलिए मैं माफी मांगता हूं। लेकिन कृपया करके मेरी बात सुनिए। इस देश में 70 करोड़ नौजवान खड़े हुए हैं। जब सामाजिक संस्थाओं की बात की गई, आज देश में सिविल सोसाइटी के बारे में बहुत बात हो रही है। बीजेपी, विपक्ष सब लोग सिविल सोसाइटी के बारे में बात कर रहे हैं। लेकिन आज मैं यहां गर्व से कह सकता हूं कि अगर पहली बार इस देश के इतिहास में सिविल सोसाइटी के साथ किसी का इंगेजमैंट हुआ तो सोनिया गांधी जी के नेतृत्व में जब यूपीए सरकार पहले आई थी, नेशनल एडवाइज़री कमेटी के आधार पर हुआ।...( व्यवधान) सुषमा जी, कृपा करके सुनिए।...( व्यवधान)
          मेरा तीसरा प्रश्न है।...( व्यवधान)
श्रीमती सुषमा स्वराज (विदिशा):बाहर से किसी की स्लिप आई थी, इसलिए मैं बाहर जा रही हूं। प्रणब दा, आप बताइए कि मैं जाऊं या नहीं जाऊं।...( व्यवधान)अगर आपके लोग कहते हैं, तो मैं नहीं जाती। मैं बैठ जाती हूं। ...( व्यवधान) अरे भइया बता दो। क्या सदन से निकलना भी आपकी इजाजत लेकर होगा? ...( व्यवधान) इजाजत दे दो। ...( व्यवधान) नौजवान इजाजत दे दें, तो बुजुर्ग चले जायें। ...( व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया: नहीं, मैंने नहीं कहा। ...( व्यवधान)
श्रीमती सुषमा स्वराज :   मैं जाऊं या न जाऊं। ...( व्यवधान)
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:  मैं आपको कभी कुछ नहीं कह सकता। ...( व्यवधान)
श्रीमती सुषमा स्वराज :  बहुत-बहुत शुक्रिया।
श्री ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया:  मुझे आश्चर्य है कि इस संसद में जब अध्यक्ष महोदया इस सीट पर बैठी थीं, विराजमान थीं, ज्यादा पूर्व की बात नहीं है, केवल कल की बात है। एक नौजवान सांसद को उन्होंने अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए एक मौका दिया और उनका अधिकार है, हक है। ...( व्यवधान) हां, मैं आया हूं, क्योंकि आपने मुद्दा उठाया। ...( व्यवधान) आपने मुद्दा उठाया, तो मुझे जवाब देने का हक है और मैं जवाब जरूर दूंगा। ...( व्यवधान) जब उनके आदेश के आधार पर वह बोले, तो भाजपा में बहुत बवंडर उठ गया। ...( व्यवधान) एनडीए की बाकी सहभागी पार्टियों में बवंडर नहीं उठा, लेकिन भाजपा में बहुत बवंडर उठ गया। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ जब भाजपा के कुछ नेताओं ने, मैं देख रहा था, आपकी तरफ देखने के बदले वे मीडिया की तरफ देख रहे थे। क्या आज संसद में यह सारा नाटक मीडिया को प्रभावित करने को ही हो रहा है?...( व्यवधान) यह प्रश्न राष्ट्र का युवा भाजपा से पूछना चाहता है और उन्होंने क्या कहा? ...( व्यवधान) आज मुझे  आश्चर्य है। ...( व्यवधान) मुझे आश्चर्य है कि जब उन्होंने अपनी सोच-विचार को संसद के पटल पर रखा और एक ऐसी सोच और विचारधारा जो अन्ना हजारे जी के साथ मिलती हुई, उनकी सोच को आगे ले जाती हुई, अगर लोकपाल को सशक्त करना होगा, लोकपाल को मजबूत करना होगा, तो संवैधानिक ढांचे के अंदर करना होगा, यह राहुल गांधी जी की सोच और विचारधारा है। ...( व्यवधान) हां, शायद उसमें समय लगे। ...( व्यवधान) लेकिन उनकी सोच और विचारधारा दूरगामी है। ...( व्यवधान) उनकी सोच और विचारधारा एक दूर-दृष्टिकोण की सोच और विचारधारा है। ...( व्यवधान) एक सोच और विचारधारा है, जहां भ्रष्टाचार को उसकी जड़ से निपटाने का पूरा संकल्प राहुल जी ने लिया है, वह सोच और विचारधारा है। उसके बाद ...( व्यवधान) अऩुराग जी, बैठ जाओ। ...( व्यवधान) हम सस्ती लोकप्रियता नहीं करना चाहते। लेकिन यह सब करने के बाद  भी भाजपा वहीं नहीं रुकी। ...( व्यवधान)
          उनका दूसरा मुद्दा था कि जनता में फूट डालने की आदत के बदले अब कांग्रेस में भी फूट लेकर आओ। मैं उनको यह भी बताना चाहता हूं कि कांग्रेस और यूपीए सरकार ने सदैव देश को जोड़ने का काम किया है और भविष्य में भी सदैव देश को जोड़ने का काम करेगी। ...( व्यवधान) इस देश की संस्कृति, इस देश का इतिहास, इस देश के सिद्धांत को पूरी तरह से सजाकर रखना हरेक व्यक्ति का धर्म होना चाहिए। ...( व्यवधान) मुझे बड़ी खुशी है। ...( व्यवधान)
          सभापति महोदया, आज समय है कि हमें एकता का प्रमाण लाना होगा। हमें एंटी-बॉयटिक की जरूरत नहीं है। ...( व्यवधान) हमें सर्जरी की जरूरत है और अगर सर्जरी चाहिए, तो हमें जरूर भू-माफिया को देखना होगा जैसे राहुल जी ने कहा। हमें टैक्स रिफार्म्स देखने होंगे, इलैक्टोरल फंडिंग के नियम देखने होंगे जैसे राहुल जी ने कहा है। ...( व्यवधान) अगर यह सब हमने नहीं किया, तो आपको टैम्परेरी एंटी-बॉयटिक मिलेगा और करप्शन, भ्रष्टाचार की सर्जरी इस देश में नहीं हो पायेगी।...( व्यवधान)
          अन्ना जी ने कहा कि आज भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार हो चुका है देश में। आज मैं एक युवक होने के नाते, एक देशवासी के रूप में, न कि एक सांसद या मंत्री के रूप में बोल रहा हूं। महात्मा गांधी जी ने एक सीख देश को दी थी कि अगर हमारा लक्ष्य हमें हासिल करना होगा।...( व्यवधान) आपको जो कहना हो कह दीजिए, मुझे कोई कठिनाई नहीं है।...( व्यवधान) महात्मा गांधी जी ने कहा था कि अगर लक्ष्य की पूर्ति करनी हो, तो उसका माध्यम भी उतना ही पवित्र होना चाहिए जितना लक्ष्य पवित्र होता है। इसलिए आज अगर उसके माध्यम में हमें पवित्रता लानी होगी, इस सारे सदन में हमें एकता का प्रमाण देना होगा, तो उस लक्ष्य की पूर्ति तभी हो पाएगी जब अन्ना हजारे जी हमारे साथ मिलें, संगम हो संसद, संविधान और जनता की मांग और उसी के तहत एक सशक्त लोकपाल बिल जारी होना चाहिए।
 
  19.31 hrs. (Madam Speaker in the Chair) मैं अंत में एक ही वाक्य कहना चाहता हूं। अन्ना जी की तरह मैं भी एक मराठा हूं।  *  My only request is please withdraw your fast.
…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया : आप लोग अपनी स्पीचेज ले कर दीजिए।
…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया : अपनी स्पीच ले कर दीजिए।
…( व्यवधान)
MADAM SPEAKER: Shri Pranab Mukherjee.
… (Interruptions)
MADAM SPEAKER: Let there be order.
… (Interruptions)
MADAM SPEAKER: Not  now. Let us have order in the House.
… (Interruptions)
3
*श्री बद्रीराम जाखड़ (पाली):  जनलोकपाल के दायरे में उच्च श्रेणी के अधिकारियों से लेकर कर्मचारियों तक सम्मिलित करने की बात पर मेरा विचार यह है कि आज ग्रामीण स्तर से लेकर उच्च अधिकारियों तक भ्रष्टाचार में लिप्त सभी कर्मचारियों को सम्मिलित करना चाहिए।
        हमारे नेता राहुल गांधी जी द्वारा संसद में दिए गए बयान का मैं समर्थन करते हुए कहना चाहता हूं कि संसद ही सर्वोपरि है तथा अकेले जनलोकपाल विधेयक से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होगा।  इसमें आप और हमारी सबके सहयोग की आवश्यकता है।
        अन्ना हजारे जी को नमन करता हूं तथा उनके द्वारा किए जा रहे अनशन का तरीका ठीक नहीं है।  कोई भी विधेयक या बिल पारित करने के लिए संसद की प्रक्रिया से ही गुजरना संसद की गरिमा को बनाये रखने में सहयोग प्रदान करती है।
                          4
*SHRI LALIT MOHAN SUKLABAIDYA (KARIMGANJ): Chairman, Sir, I thank hon. Speaker for giving me the opportunity to associate myself with this historical event in our Parliament.
           Corruption exists in large scale in our system. We all know very well that out of the huge expenses on Govt. welfare projects, very little – negligible portion actually reaches the beneficiaries. To eliminate corruption many Acts have been enacted, institution of CBI has been created and a number of action taken. Yet, the corruption existed unhindered.
          Parliament of India is unanimously supporting the issues which have been expressed by public under the leadership of Anna Hazare to make India corruption free.
          Lokpal Bill was initiated several times but ultimately this is going to be passed aiming to make our system corruption free. So, in order to make our society corruption free, we welcome the enactment of Lokpal Bill that the House is ready to pass a STRONGEST Lokpal Bill.
          Today’s issues are (1) whether lower bureaucracy is to come under the ambit of Lokpal (2) Appointing of Lokayukta at the State level, and (3) Citizen Charter.
          Lower bureaucracy is in touch with nearly 80% of the population, who live in villages and in small towns. So, they are also required to be taken in the ambit of Lokpal.
          There should be Lokayukta in the States, otherwise who will look after the function of the Lokpal in the States.
          Citizen Charter will include Govt. employees’ responsibilities, failure of which is to be penalized, and also on the other side, attempt to bribe should be included as corruption and people involved should be penalized. 
 
* Speech was laid on the Table           We have not seen how Ahinsa Andolan by Mahatma Gandhi could unite crores of Indians, but now a replica of such an Andolan can be visible in the movement of  leader Gandhian Anna Hazare.
          After Independence, we notice disintegration in the present generation based on their different language, different religion, different region etc. But, the present movement has united them all. This is a very good sign for the revival of nationalism. 
          So, a strong Lokpal Bill passed by the Parliament will make the people understand their responsibilities. The people will understand that it is everybody’s business, it is NOT nobody’s business – IT IS MY BUSINESS – and the Government and the people will be jointly responsible.
          One of the Members pointed out that Law can punish but it cannot prevent. For prevention of corruption we have to make slight reform in our education policy.
          We often find that we have forgotten many happenings in our life when we are grown up but what we learn in our childhood is never forgotten. So, our syllabus should include value education that imbibe in a child’s mind the value of honesty, patriotism, integrity, loyalty – and this should be from very early stage – from pre and primary level. Hence, when these children grow up from the mainstream of population, we will get a corruption free India in our next generation. 
                                                                                                        5
*श्री राकेश सचान (फतेहपुर):  आज सदन असामान्य परिस्थितियों में एक विधेयक पर सुझाव देने और विधेयक के अन्तिम प्रारूप को तय करने के बाद स्थायी समिति के सुपुर्द करने के लिए विचार कर रहा है।  यह निश्चित रूप से संसद की प्रक्रिया और नियमों को नजरअन्दाज करके किया जा रहा है।  इस असामान्य परिस्थिति के लिए सरकार में अनिर्णय की स्थिति और उसके लचर रवैये को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
        यह एक अत्यधिक गंभीर विषय है और इसलिए इस चर्चा को समय सीमा में नहीं बांधा जाना चाहिए।  सदन के अन्दर बड़े पैमाने पर बहुत ही काबिल सदस्य हैं।  उन सभी के सुझावों को यथासंभव लेने और विधेयक के प्रारूप में सम्मिलित करने का प्रयास किया जाना चाहिए।  यह सदन देश की सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है और इसलिए एक छोटे से समूह द्वारा तैयार किए गये विधेयक के प्रारूप को अन्तिम मानना देश की शेष जनता के साथ अन्याय होगा और इस सदन की एक बड़ी भूल होगी।
        मेरी राय है कि सरकारी लोकपाल बिल, जनलोकपाल बिल एवं श्रीमती अरूणा राय के संगठन द्वारा तैयार किये गए लोकपाल बिल पर संदन में व्यापक विचार-विमर्श हो।  उसके बाद ही कोई प्रारूप संसद की स्थायी समिति को भेजा जाये।  मैं इस समय केवल जनलोकपाल बिल पर अपनी राय रखने जा रहा हूं।  
        जनलोकपाल बिल की धारा 2 की उपधारा ई-1 में से संसद के अन्दर भाषण और मत देने से संबंधित पंक्ति को रद्द कर दिया जाए।
        जनलोकपाल बिल की धारा 3 का क्षेत्र असीमित है।  इसमें इस बात का स्पष्ट उल्लेख हो कि इस विधेयक की कोई भी धारा या धाराएं संविधान के किसी भी अनुच्छेद का उल्लंघन नहीं कर सकती।
        जनलोकपाल बिल की धारा 4 की उपधारा 5 को संशोधित करके इस बात का उल्लेख किया जाये कि लोकपाल के 11 सदस्यों में कम से कम 6 सदस्य सुप्रीम कोर्ट/हाई कोर्ट के सिटिंग और अवकाश प्राप्त न्यायाधीश/मुख्य न्यायाधीश होंगे।
        जनलोकपाल की धारा 4 की उपधारा 6 में चयन समिति के गठन करने का उल्लेख है।  इसको संशोधित करके इस प्रकार कर दिया जाये - "चयन समिति का अध्यक्ष प्रधानमंत्री होगा और उसके सदस्य लोक सभा और राज्य सभा मे नेता प्रतिपक्ष, प्रधानमंत्री जिस सदन के नेता हों उसको छोड़कर दूसरे सदन का नेता सदन, सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीश, देश के दो बड़े उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश, भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त और भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक सदस्य होंगे। "

        जनलोकपाल बिल की धारा 4 की उपधारा 8 को संशोधित करके निम्नवत् कर दिया जाए - "सर्च कमेटी के सभी 10 सदस्यों को चयनित करने का अधिकार चयन समिति का होगा।  सर्च कमेटी के सभी सदस्य बेदाग छवि वाले सर्वोच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त मुख्य न्यायाधीश एवं न्यायाधीश, उच्च न्यायालयों के अवकाश प्राप्त मुख्य न्यायाधीश, अवकाश प्राप्त मुख्य निर्वाचन आयुक्त और देश के विख्यात कानूनवेत्ता होंगे।"

        जनलोकपाल बिल की धारा 4 की उपधारा 17 में निम्न वाक्य और जोड़ दिया जाये - "शर्त यह है कि लोकपाल के लिए चयनित किए जाने वाले व्यक्तियों में अल्पसंख्यक, दलित और पिछड़े वर्ग के व्यक्तियों को उनकी आबादी के अनुपात में चयनित किया जाए। "

        जनलोकपाल बिल की धारा 6 की उपधारा "सी " से डिसमिसल और रिमूवल शब्द को हटा दिया जाए।  इसी धारा की उपधारा "एक्स " को हटा दिया जाए, क्योंकि चुने हुए जनप्रतिनिधियों के शपथ पत्र की जांच इलैक्शन कमीशन, इनकम टैक्स विभाग से स्वयं कराता है।

        जनलोकपाल बिल की धारा 7 की उपधारा 5 और 8 को डिलीट कर दिया जाए।  क्योंकि यह दोनों उपधाराएं लोकपाल को तानाशाह बना देंगी।

        जनलोकपाल बिल की धारा 23 की उपधारा 2 को डिलीट कर दिया जाए।  क्योंकि यह नेचुरल जस्टिस के विरुद्ध है।

        मेरी राय है कि लोकपाल की तर्ज पर ही राज्यों में लोकायुक्त का गठन हो लेकिन यह अधिकार राज्य के विधानमंडलों को हो क्योंकि संघीय व्यवस्था में राज्य के अधिकारों में केन्द्र का हस्तक्षेप अन्ततोगत्वा लोकतंत्र के लिये घातक सिद्ध हो सकता है।

        मेरी राय में लोक सेवकों के अलावा सभी गैर-सरकारी संगठन चाहे वे सरकार से मदद पाते हों या नहीं, सभी दवा बनाने वाली कम्पनियां व दवा विक्रेता, सभी कार्पोरेशन्स, खाद बनाने वाली सरकारी और निजी कम्पनियां, खाद्य पदार्थों का व्यापार करने वाले सभी व्यापारी, इलैक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया को भी लोकपाल के दायरे में लाने के लिए स्पष्ट रूप से एक धारा को जोड़ा जाए।

        आज आम आदमी भ्रष्टाचार से अत्यधिक पीड़ित है।  गांव में रहने वाली 80 प्रतिशत आबादी जो खेत खलिहान से जुड़ी है, वह पुलिस, तहसील, लेखपाल, रजिस्ट्री कार्यालय, बिजली विभाग, ब्लॉक, सिंचाई विभाग, खाद विभाग तथा राशनिंग विभाग आदि में छोटे-छोटे कार्यों के लिए वह सभी छोटे कर्मचारियों के द्वारा भ्रष्टाचार में लिप्त होने के कारण अपने कार्यों को नहीं करा पाते हैं।  इस कारण से केन्द्र तथा राज्य सरकार के इन सभी छोटे कर्मचारियों को भी लोकायुक्त या लोकपाल के दायरें में लाना चाहिए।  इनको किसी प्रकार की छूट नहीं मिलनी चाहिए।

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*श्रीमती सुमित्रा महाजन (इन्दौर):  आज भ्रष्टाचार को लेकर पूरा देश आन्दोलित है।  संसदीय प्रक्रिया से मानो जनता का विश्वास उठ रहा है।  प्रजातांत्रिक प्रणाली को सबसे बड़ा धक्का लगता दिख रहा है।  राजनीति और राजनेता इन पर जनता का विश्वास उठता जा रहा है।  सवाल केवल लोकपाल बिल का नहीं है या केवल अनशन का भी नहीं है।  अब समय आ गया है हमें सम्पूर्ण देश की भावनाओं को उचित दिशा देते हुए जनता के मन में आत्मविश्वास जगाकर प्रजातंत्र को मजबूत करना जरूरी हो गया है और इसमें सत्तारूढ़ पार्टी की जिम्मेदारी सबसे बड़ी होती है।  आज सरकार द्वारा जिस तरह से लोकपाल बिल माननीय अन्ना हजारे जी का आन्दोलन और इन सबको ठीक तरीके से सुलझाने का प्रयास नहीं करने के कारण आज गंभीर स्थिति बन गई है।  लगता है सत्तारूढ़ कांग्रेस प्रश्न सुलझाने के बजाय उसका उलझाने में माहिर हो गई है और यह अनशन आन्दोलन इसको जैसे कश्मीर प्रश्न बना दिया।

        लोकपाल बिल को लेकर प्रमुख रूप से दो-तीन मुद्दे हमारे सामने हैं।  माननीय सुषमा जी ने हर उस मुद्दे पर ठोस विचार रखते हुए एक प्रकार से भारतीय जनता पार्टी का दृष्टिकोण ही सामने रखा है।  मेरी तो मान्यता है कि एक भारतीय होने के नाते हमारी संस्कृति, परम्परा हमारे संस्कार कह रहे हैं कि सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति की शुद्धता का विचार करना आवश्यक है और उसकी शुद्धता के बारे में कोई शंका नहीं होनी चाहिए।  हमारे सामने श्री प्रभु रामचंद्र जी का उदाहरण है। श्री रामचंद्र जी माता सीता से अत्यधिक प्रेम करते थे उसके बिना जीवन की वह कल्पना भी नहीं करते थे। वन में रहते हुए राम सीता की हर ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश करते हैं, वहीं राम जब राजा बनते हैं तब एक छोटे सा धोबी उंगली उठाता है तो सीता का त्याग करते हैं।  भगवान श्रीकृष्ण प्रजा के लिए किये गये सभी भले-बुरे कर्मों की जिम्मेदारी लेते हैं।  लेकिन व्यक्तिगत रूप से जब उन पर स्वयं तक मणी चुराने का आरोप लगते हैं तो कष्ट सहन करते हुए प्रजा के सामने निर्दोष साबित करते हैं।  इसलिए प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में रखने का विचार माननीय सुषमा जी ने रखा उससे हम सहमत है।

        जहां तक ज्युडिशियरी की बात आती है, वास्तव में जो न्याय करने बैठता है उसकी न्याय प्रक्रिया, उसकी नीयत, उसके व्यवहार के बारे में कोई भी शासकता नहीं दिखनी चाहिए।  आज बात यह होती है कि कोई भी अपने दिल पर हाथ रख कर वकील या जज इनकी मिलीभगत नहीं होगी यह विश्वास के साथ नहीं कह सकता।  कोर्ट में उपस्थित क्लायंट (पक्षकार) कोर्ट के बाहर यह कहते हुए भी आजकल देखे जाते हैं कि वकील साहब आज रहने दो, जब कोई विशिष्ट जज की कोर्ट बैठेगी तब देखेंगे, मैनेज हो जायेगा।  कई बार सत्ता, संविधान, संसद पर ज्यूडिशियरी हावी होने लगती है फिर भी पूरी ज्यूडिशियरी खराब नहीं है। लेकिन फिर भी ज्यूडिशियरी के लिए नेशनल ज्यूडिशियल कमिशन को मजबूत स्वरूप देना जरूरी है। बात जब लोकायुक्त की आती है, हमने संविधान के अंतर्गत एक केन्द्र और राज्यों के संबंधों की कल्पना की है कि राज्यों के अपने अधिकार भी सुरक्षित हैं।  हमारे संविधानकर्त्ताओं ने माननीय बाबा साहेब अम्बेडकर जी के नेतृत्व में पूरी संविधान सभा ने इस देश को एक संविधान दिया है।  इस संविधान ने राज्यों के अधिकार, केन्द्र-राज्य संबंध, संसद की सर्वोच्चता तथा गरिमा, सांसदों की स्वतंत्रता, सम्मान इन सबकी कल्पना करते हुए हमें कुछ नियम कानून बना के दिये हैं।  उन सभी का विचार गंभीरता से करना आवश्यक है।

        आज का वातावरण किसी भी गलती से क्यों न हो बड़े-बड़े घोटालों के कारण, बढ़ती महंगाई के कारण, कदम-कदम पर बिखरे भ्रष्टाचार के कारण जो एक अविश्वसनीयता निर्माण हो गई है, जिसका शिकार भले-भले लोग भी हो रहे हैं, आज इस सदन पर दृष्टि डाली जाये तो क्या पूरे के पूरे सभी सांसद भ्रष्ट हैं ऐसा माना जाये, ऐसा कभी नहीं हो सकता। मैं स्वयं को सामने रखते हुए कह सकती हूं कि जो राजनीति में रहते हुए स्वयं कष्ट उठाकर कार्य कर रहे हैं लेकिन कुछ मुठ्ठीभर भ्रष्ट लोगों के कारण आज सबको झिड़कियां सुनना पड़ रही है।  वास्तव में कई लोग हममें से पेड न्यूज नामक बीमारी का शिकार हुए हैं।  हमारे जीवन के कई खट्टे-मीठे अनुभव हैं।  किस तरीके से मीडिया चुनाव के समय, चाहे प्रिंट हो इलेक्ट्रानिक हो या अन्य समय में, उसे ब्लैकमेल किया तो उसको बुरा लगता है लेकिन पैसे नहीं देने की स्थिति के कारण आपको सताया जाता है, आपके खिलाफ वातावरण बनाया जाता है।  तो ऐसे मीडिया को भी लोकपाल के दायरे में क्यों नहीं लिया जाना चाहिए।  मुझे मालूम है कि मीडिया के लिए प्रेस कौंसिल बनी हुई है।  लेकिन वह निप्रभावी है।  इसलिए इन बातों पर भी विचार आवश्यक है।  कल सदन में चुनाव सुधार की बात की गई उस पर भी गंभीरता से विचार आवश्यक है।  आज हम देखते हैं कि जो सिविल सोसायटी या उनके जैसे अन्य कई लोग या सामान्य से सामान्य लोग भी इस लड़ाई में जागरूकता से हिस्सा ले रहे हैं।  वहीं लोग चुनाव में वोटिंग करें या वोटिंग के लिए जागरूकता पैदा करें तो सही व्यक्ति को चुनाव जिताने में मदद हो सकती है।  लेकिन कोई बुरा नहीं माने।  मगर यहां बैठे हुए कई सांसदों को अनुभव होगा कि मतदान के दिन आस-पास लगातार एक या दो दिन की छुट्टी आती है तो कई समझदार लोग छुट्टी मनाने परिवार समेत मतदान छोड़कर चले जाते हैं। कई बार जिनके चुनाव क्षेत्र में ग्रामीण क्षेत्र है या छोटे कस्बे हैं, छोटे शहर हैं वो इस पीड़ा को और समझते हैं।  मतदान के आस-पास शादी-विवाह के मुहुर्त हो तो मतदान के लिए बारात रोक के रखना कितना मुश्किल होता है।  इसलिए चुनाव सुधार की बात पर भी सक्रियता से सोचना आवश्यक है।  मुझे इस बात की खुशी है कि मैं ऐसे प्रदेश से आती हूं जहां सामान्य लोगों की तकलीफ को समझने वाला संवेदनशील मुख्यमंत्री और सरकार है।  मैं मध्य प्रदेश की बात कर रही हूं जहां पर लोक सेवा प्रदाय गारंटी अधिनियम बनाया गया है और भी कई कानून जो लोगों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।  जैसे आतंकवाद से निपटने के लिए कानून बनाये गये हैं और केन्द्र के पास सम्मति के लिए भेजे गये हैं।  केन्द्र उसे जल्दी सम्मति दे तो अच्छा रहेगा।  मैं समझती हूं कि माननीय अन्ना हजारे जैसे मनीषी, जिनको संत भी कहे तो गलत नहीं होगा, जिनके प्राण बचाना हमारा परम कर्त्तव्य है।  साथ-साथ उनकी भावनाओं के अनुरूप एक अच्छी शासकीय प्रणाली बनाने का संकल्प लें।

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*SHRI HASSAN KHAN (LADAKH): Prime Minister Office should also come under Lokpal.  Judiciary must have a separate effective accountability law.  All public servants if not included in Lokpal Bill then other anti corruption agencies must be made independent in matter of investigation and prosecution.  NGOs getting government assistance must come under Lokpal. Fast track courts must be set up to deal with corruption cases in time bound period. Due representation must be given to ST/ST in Lokpal.

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*श्री पन्ना लाल पुनिया (बाराबंकी):  लोकपाल बिल पर आदरणीय नेता, सदन श्री प्रणब मुखर्जी ने अपना वक्तव्य दिया जिस पर नेता प्रतिपक्ष श्रीमती सुषमा स्वरज जी के अलावा अनेक सदस्यों ने अपने विचार रखे। विस्तृत चर्चा हुई है। सब अच्छे सुझाव प्राप्त हुए हैं। इन पर कोई विवाद नहीं है कि भ्रष्टाचार मिटाने, रोकने के लिए सशक्त लोकपाल बनना चाहिए लेकिन संविधान के दायरे में रहकर। बाबा साहब द्वारा बनाए गए संविधान के साथ खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए। अनेक दलित संगठनों ने इस तरह के प्रयास का विरोध किया है।

          भ्रष्टाचार रोकने के लए अनेक कानून हैं। आईपीसी में व्यवस्था है। पी.सी.ए. एक्ट 1988, बेनामी ट्रंजेक्शन (प्रोहिबिशन) एक्ट 1988, प्रिवेंशन ऑफ मनी लेंडरिंग एक्ट, 2002 तथा सिविल सर्विसेज कंडक्ट रूल्स की व्यवस्था है। लेकिन भ्रष्टाचार बराबर बढ़ता जा रहा है। कानून का कठोरता से पालन किया जाना चाहिए। सामाजिक संकल्प की आवश्यकता है। अन्ना हजारे जी को चाहिए कि अपने समर्थकों से कहें कि वे संकल्प लें कि वे न रिश्वत देंगे और न रिश्वत लेंगे, अकेले कानून बनाने से कुछ नहीं होगा।

          जो जन लोकपाल बिल में प्रावधान किए गए हैं उसमें भ्रष्टाचार की परिभाषा में परिवर्तन किया जाना चाहिए। दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक तथा इन वर्गों की महिलाएं, बच्चों के लिए बनी योजनाओं को ठीक से लागू नहीं किया जाता है, इसलिए इन्हें भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए। दलितों पर उत्पीड़न की घटना घटित होती है और कोई अधिकारी उस पर कार्यवाही नहीं करता है तो उसे भी लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में रखा जाए। मैं शरद यादव जी का आभारी हूं जिन्होंने उपेक्षित वर्ग की हिमायत की है। शैडयूल्ड सब प्लान के पैसे का सही उपयोग नहीं किया जा रहा है, उसे अन्य कार्यों पर खर्च कर दिया जाता है और सामाजिक गैर बराबरी खत्म करने का हमारा लक्ष्य धरा का धरा रह जाता है। इसे भी भ्रष्टाचार में सम्मिलित कर लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में रखा जाना चाहिए।

          गरीबी देश के लिए अभिशाप है लेकिन देश के गरीबों में 30 प्रतिशत दलित हैं। इनकी किसी को चिंता नहीं है। आज भी छूआछूत है। आज भी अनेक कानूनों के बनने के बाद भी दलितों पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ रही हैं और उन्हें काम नहीं मिल रहा है। जो योजनाएं इस समाज के लिए बनी हैं, उनको सही ढंग से लागू नहीं किया जा रहा है। गरीबी घटने के बजाए बढ़ रही है। इसका भी समाधान होना चाहिए और इसे लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में रखा जाना चाहिए।

* Speech was laid on the Table             अंत में नेता सदन के वक्तव्य के बाद सर्व सम्मति बन रही है जिसका सभी दलों ने समर्थन किया है। उसका मैं समर्थन करता हूं। उम्मीद है कि इससे अन्ना हजारे जी का अनशन समाप्त होगा तथा भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा।

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*SHRI THOL THIRUMAAVALAVAN (CHIDAMBARAM):A life swings between life and death for the past 12 days to wipe out corruption. The immediate task before us all is to save the life of Shri Anna Hazare who has resorted to non-violent agitation in the form of a hunger strike. If he is to lose his life, the blame will be not only on this Government but on every one of us here. Hence, I urge upon all concerned to take urgent appropriate action in this regard. On behalf of the Government, suitable action may be initiated to meet him and request him to give up his fast.

          Whether this legislation against corruption can eradicate the evil at all levels is a big question mark. But at the same time, it can definitely be misused to take revenge on people especially the poor. So far, we have legislated enough. It is a history that more than bringing down the crime level, they have always been used against the poor and punished. All these years, we have seen that Dalits, minorities and women have been greatly affected. In the same way, Lokpal Bill also may be used against socially backward people belonging to the depressed sections of the society like Scheduled Castes and Scheduled Tribes and minorities like Muslims and Christians and above all, women belonging to the lower strata of the society. Hence, I would like to impress upon that the representatives of Dalits, minorities and women are appointed at all levels in all the Lokpal mechanisms wherever they are established. Whenever certain complaints made against Dalits are to be taken up, enough of opportunities must be given and approval from SC/ST Commission should be obtained. If this is not done, the status quo may continue because we know that law can bend before the mighty and can harshly ill treat and kick at the meek and the weak. The envisaged Lokpal also should not follow suit.

 

*English translation of the Speech originally laid on the Table in Tamil.

 

          In India, we find that in all the States and in all the Central Prisons the majority of people who are under the confines of the jail walls are Dalits and minorities. I would also like to point out that the people who have been greatly affected by TADA, POTA and Prevention of Unlawful Activities Act are the poor people from the depressed sections of the society. With the existing laws, the people who are wronged in both the Government and public sector are from the Dalit and minority communities. Planned revengeful activities continue due to caste and communal differences and also enmity arising out of competition for posts. Supposing a Dalit is due for promotion, his jealous competitors lodge false complaints to implicate their unsuspecting rival in cases and resort to vengeful mean methods.

            Famous lines of yesteryears by Pattukkottai Kalyanasundaram says as follows:

“Thittam pottu thirudura koottam Thirudik kondey Irukkudhu.
Adhai sattam pottu thadukkara koottam Thaduththuk kondey irukkuthu.
Thirudanaai paarththu thirunthaa vittaal Thiruttai olikka mudiyadhu”.
Those lines tell us that without bringing about change of heart no looting can be stalled and the law makers would keep on making laws while the pilfers would continue to profligate their booming loot.
              Hence, I urge upon the Government to legislate taking care to see that there is no scope for misuse of this law by unscrupulous, vengeful, jealous minds. With these words, I conclude.
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*SHRI M.B. RAJESH (PALAKKAD): It is the unprecedented public concerns about growing corruption that has compelled the Government to address the issue of Lokpal. The Lokpal as we all know, is not at all a new concept. The demands for Lokpal has a long history of more than 40 years. The fact that in this long four decades, the Lokpal Bill could not be passed in the Parliament shows the utter lack of political will in fighting corruption.  In recent years, a situation has come where the Government can no more ignore the demand for a Lokpal. Exposures of huge corruption cases  one after another, attempts to cover up these scams and Government’s monumental failure in checking corruption has ignited wide-spread public anger. People all over the country have become disillusioned with the pervasive corruption. This disillusionment and discontent is being manifested in the streets now. Tens of thousands of people are coming out against the Government’s inaction and insensitiveness in fighting corruption. It is in this context that the issues related to the Lokpal is being debated in this House today.
While coming to the topic of Lokpal, at the outset I would like to stress the need for enlarging the definition of corruption. The “Corruption” as defined in the prevention of Corruption Act – PCA – should be widened so as to include not only acts of Commission but also those of omissions. Often there may be no traceable kickbacks but still there may be  a huge loss to the public exchequer due to willful misuse of power.
             
* Speech was laid on the Table   With regard to the composition, functions and jurisdiction of Lokpal, there should not be any ambiguity. The Lokpal should essentially be a fact-finding body that receives complaints, enquiries, investigates and forwards cases to special courts where prima facie case is bound to recommend an enquiry and investigationsuo motu. It is of utmost importance that the Constitution of Lokpal should conform to the principle of separation of powers. The functions of grievance redressal must be separate. This should be set up by a separate legislation. The grievances of citizens about citizens’ charter should be brought under this mechanism. In the Lokpal there should not be any member drawn from commerce or industry just as there can be no politician.
The office of the Prime Minister along with all public servants was brought under the purview of Lokpal by the V.P.Singh Government in 1989. In all subsequent legislations, the Prime Minister has been placed under Lokpal. The fact is that the present Government which is involved in a large number of scams is unwilling to ensure the accountability of the highest executive office. The office of the Prime Minister must fall within the purview of the Lokpal.
There is no doubt that judiciary too needs to be made more accountable in the current context of increasing prevalence of corruption within judiciary. However bringing judiciary under Lokpal will violate the constitutionally guaranteed independence of the institution.  So a National Judicial Commission should be set up to take care of the appointments in the higher judiciary and enquire into the complaints of corruption. The Judicial Standards and Accountability Bill, 2010 is grossly inadequate to meet this objective and hence a new legislation has to be brought in. The protection and freedom guaranteed to MPs under Article 105 of the Constitution should not be made applicable to acts of corruption. In order to achieve this, Article 105 can be amended.   
The alarming growth of corruption in the post-liberalization era is directly related to the nexus between big business, politicians and bureaucrats. Lokpal should have powers to investigate cases which involve business entities to recommend cancellation of licences, contracts etc., if it was obtained by corrupt means. The Lokpal should also have the power to recommend blacklisting companies from getting Government contracts and licenses.
Likewise the Lokpal should be given powers to recommend steps to recover the loss caused to public exchequer in cases which business entities have made benefits out of corrupt practices.
In order to cover public servants at the State level and to curb corruption at lower levels, Lok Ayuktas must be set up in States. This can be set up on the model of Central Lokpal.
Effective steps to prevent tax evasions are also very much needed because this has become an important route of corruption. The Government should do away with Double Taxation Avoidance Agreements with countries like Mauritius. The Government should also show firm political will to unearth black money and confiscate the funds illegally stashed away in tax havens.
Another important area of fighting corruption is bringing far-reaching electoral reforms. The electoral process has been vitiated and at times even sabotaged through the money power. Money power has become the deciding factor in elections. Votes are purchased and people’s will is manipulated through the use of formidable money power. Without addressing this issue seriously, any attempt to curb corruption will go in vain. The basis of the nexus between big business and politicians is the corporate fundings of political parties. This should be banned and state funding of elections is needed.
Isolated or piece-meal measures cannot effectively serve the purpose of fighting corruption. What is needed today is a set of comprehensive reforms. All institutions of our democracy must be reformed and made more accountable to the people. These institutions should in fact be strengthened and not weakened to fight corruption. Any attempt to undermine or weaken democratic institutions will not help us in fighting corruption. Corruption is fundamentally a political issue and it cannot be fought on an apolitical platform and agenda. The larger policy issues involved in the alarming growth of corruption cannot be overlooked or bypassed any more. The politics of fighting corruption is related to the larger struggle against the policies of liberslization which has become the major source of corruption in recent period. The fight against policies of liberalization, corruption and the fight to strengthen our democratic institutions must form part of a common struggle. The setting up of a strong and effective Lokpal will indeed be a significant step in our larger struggle against corruption.
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*श्री हर्ष वर्धन (महाराजगंज, उ.प्र.): आज सारा देश भ्रष्टाचार के प्रश्न पर आंदोलित हैं। रामलीला मैदान में अनशन कर रहे अन्ना हज़ारे जी ने कोई चमत्कार नहीं किया है, वासतविकता यह है कि भ्रष्टाचार से उत्पीड़ित जनता की मानसिकता ने इस आंदोलन को बल दिया है। अंधेरी सुंग में ज्योति की एक किरण आशा का संचार कर देती है और अन्ना के अनशन ने भी देश के आम आदमी के भ्रष्टाचार से जकड़न को उजागर किया है। हमें आज दलों की प्रतिबद्धता से ऊपर उठ कर भ्रष्टाचार के इस दानव से समाज की मुक्ति का उपाय निकालना होगा।
           लोकपाल या जन लोकपाल, यह समस्या का समाधान नहीं है। समाधान तब होगा, जब देश के अंतिम आदमी को जन कल्याणकारी योजनाओं का पूरा लाभ बिना कमीशन प्राप्त होने लगे। जब बिना घूस दिए प्रताड़ित पक्ष की रिपोर्ट थाने में दर्ज हो जाए और आम आदमी की बेबसी धन के अभाव में बेबसी नहीं रह जाए। आज जो लोग संसद की सर्वोच्यता को चुनौती देते हुए, उस पर अपने विचार थोपने का प्रयास कर रहे हैं, वह किसी विचार या नीति से प्रभावित नहीं होता है, वरन् भीड़ की मानसिकता को भुनाने में माहिर लोग हैं। जयप्रकाश जी का 1974-75 का आंदोलन रहा हो या 1988 का आंदोलन, हम उन दोनों आंदोलनों के सिपाही रहे हैं। आज इस संसद में हैं तो उसके मूल में लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति हमारी प्रतिबद्धता है, अन्याय के विरूद्ध हम मारेंगे नहीं, परन्तु मानेंगे नहीं का नारा लगा कर हमने सविनय अवज्ञा आंदोलनों में हिस्सा लिया है।
           अन्ना जी के अनशन का एक योगदान अवश्य है कि इसने संपूर्ण देश की पीड़ा को फलक पर ला दिया है, परन्तु मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि अन्ना जी के अनशन की आड़ में कुछ लोग अपनी रोटी सेंक रहे हैं। माननीय प्रधान मंत्री जी, माननीय नेता विपक्ष एवं माननीय अध्यक्ष महोदया जी द्वारा सारे सदन की भावना को अन्ना जी के अनशन के परिपेक्ष्य में जिस संजीदगी एवं सम्मान के साथ पारित किया गया, उस अपील को नजरअंदाज करने का कार्य हुआ, वह अन्ना जी के सहयोगियों की हठधर्मिता का ही परिचायक है। हमें अन्ना जी के जीवन की चिन्ता है, क्योंकि उन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे को जनता का स्वर प्रदान किया है। इसलिए जिन तीन मुद्दों पर अन्ना जी संसद का आश्वासन चाहते हैं, उस पर एक सार्थक बहस के मद्देनज़र वह अपना अनशन समाप्त करें। लोकपाल बिल नौवीं बार संसद में रखा गया है, परन्तु पूर्व में संसद में रखे गए लोकपाल बिलों के पीछे कोई जन आंदोलन परिलक्षित नहीं हुआ था। अन्ना हज़ारे का   * Speech was laid on the Table प्रयास इस 15वीं लोक सभा में सभी दलों को एक सशक्त लोकपाल बिल पारित कराने में सहायक होगा, परन्तु एक लोकपाल भ्रष्टाचार पर कितना अंकुश लगा पाएगा, इस प्रश्न का उत्तर भविष्य की गर्त में छिपा रहेगा।
          मेरी सुनिश्चित राय है कि भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश राजनीति एवं राजनेता ही लगा सकते हैं, क्योंकि लोकतंत्र में अंतिम उत्तरदायित्व चुने हुए जनप्रतिनिधियों का है, अफसरशाही तो निमित मात्र है।
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*SHRI BHAKTA CHARAN DAS (KALAHANDI): Panchayat, Zila Parishad, Nagar Palika and Nagar Nigam must be included in the Lok Pal.  We must acknowledge that the village Panchayats is the foundation and back bone of our democracy.
          There should be a provision for quota. The quota must be fixed for Dalit, Tribal, OBC, Women and minority section in the formation of the Lok Pal.
          Detection or recovery by the Lok Pal should directly go to Government exchequer; not to Lok Pal.  Budget of Lok Pal should be separately managed by the Government.
          Whistleblowers should be protected.  In case, the whistleblower is found wrong or in an act of blackmailing, there should be a provision of punishment and fine for such acts.
          In the process of selection of members for Lok Pal, the Government has suggested four members from the Government and five members from Non-government.  It can be further reviewed.
          But suggestions of Jan Lok Pal to select national and International awardees as members in the Lok Pal must be reviewed.  Instead, people engaged in social movement of dalits, tribals, backward communities, regions etc. should be considered.
          Public feedback should be taken from the Panchayat and not only from the electronic media.  It is necessary to include the feedback of common people on Lok Pal besides the elite through Panchayat.
          There should be provision to challenge the decision of the Lok Pal in the court of law.  It should be done on fast track in the High Court and this is the core of natural justice.
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*श्री जितेन्द्र सिंह मलिक (सोनीपत) : मैं सरकार को निम्नलिखित सुझाव देना चाहता हूं :-   सभी स्तर के कर्मचारियों को लोकपाल बिल के दायरे में लाया जाना चाहिए, सिटीजन चार्टर बनाया जाए और सभी प्रदेशों में लोकायुक्त नियुक्त किये जाएं।
      आज सारे भारतवर्ष में केन्द्रीय, राज्य एवं जिला स्तरों के सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार के कारण आम आदमी संसद तथा संसद सदस्यों पर उंगली उठा रहा है। आज आम आदमी को अपने रोजमर्रा के काम के लिए ब्लाक, तहसील, थाने तथा अन्य सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। अधिकारीगणों की कोई जवाबदेही तय नहीं है। इसलिए इस बिन्दु को लोकपाल में शामिल करने से आम आदमी के कार्य समय के भीतर और सुविधा के साथ होंगे तथा भ्रष्ट अधिकारियों पर नकेल कसी जा सकेगी।
     केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकारों के सभी कार्यालयों में सिटीजन चार्टर लागू होना चाहिए और उसे नेट पर डालना चाहिए, ताकि आम आदमी को सुविधा हो सके।
     सभी प्रदेशों में केन्द्र के लोकपाल की तर्ज पर लोक आयुक्त बनाये जाएं, जिससे कि राज्यों में होने वाले वाले भ्रष्टाचार पर नकेल लग सकेगी।
     हमारे कई साथियों ने भी कहा है और मेरा भी यह विचार है कि लोकपाल को एक स्वायत्त संस्था के रूप में स्थापित किया जाए, ताकि लोकपाल भी भ्रष्ट होने से बच सके। इतना कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
                                                                                                   
* Speech was laid on the Table 4 *DR. TARUN MANDAL (JAYNAGAR): At the outset, I would like to express my deepest concern regarding the deteriorating health condition of Shri Anna Hazare, who is on the 12th day of his continuous fast.  I met him and his team at Ramlila Maidan along with veteran Trade Union and SUCI (Communist) Party leader Com. Krishna Chakraborty, last evening and have witnessed the ocean of unflinching support the nation is pouring on him, on his battle against corruption, oppression and deprivation of Aam Admi.  Being a medical doctor also, I can understand what sort of stress and strain this 74 years old but young man of indomitable spirit has been enduring for a great cause of the oppressed people. 
          I do consider, Madam, the onus of prolonging this agitation led by Shri Anna Hazare and his team lies primarily on the Union Government led by INC.  It could not realise the pain and sufferings of people of larger Bharat, not India, which have turned into the moral and physical strength of this great people’s movement.  The Government thought Anna is one but ‘of late’ Government and many other political outfits could realise Anna is Hazare, which means in thousands, in millions, in crores in this battle for the people against corruption. 
          It appears from the statement by the Leader of the House that the movement’s leadership could realise the paraphernalia’s and nitty-gritty of Parliamentary procedures and has come out with more practical approach for consideration of the Government and of Parliament.  But the Government and the Ruling Party seem slow and reluctant to react realistically to end the impasse. Parliamentary democracy does honour legitimate demands of democratic movements and meet it with all sincere efforts.  Legitimacy of a matter cannot be suppressed by the inadequacy of legality or legal void of a system. 
          Nothing can be superior to conscious and organised people’s power and will, which history has proved time and again. Even, Parliament and Constitution   * Speech was laid on the Table are not sacrosanct and unchangeable.  People’s power does alter the composition of Parliament, complexion of Governments and amend or add to the Constitution.
          I failed to understand what actually emboldened the Government to change its stance after the all-Party meeting of 24th August, 2011.  Whether there were elements in the intention and submissions of the political party leaders, mainly from the Opposition, which did help the Government to belittle the strength of the people’s movement in the false apprehension of losing superiority of Parliament.  We must ponder over.  The entire nation is watching the role played by each and every political party and individual Members of Parliament. 
          I am in favour of a strong and effective Lokpal Bill to fight corruption and that ought to be instituted at the earliest possible time under exercise of essential procedures with the strong will and active initiative of the Government. 
          At the same time, I believe, in this decadent capitalist system, which itself is breeding corruption every moment from its inherent profit motive of production for individual gain, the Lokpal may be infested with corruption.  Conscious, organised, vigilant people’s committees at grassroots’ levels can be sole guarantee to check and contain corruption. 
          I advocate also, inclusion of corporate, private companies, NGOs and Media Mughals to bring into the ambit of Lokpal with necessary addition of tooth and nail into the Bill.  The Prime Minister, as many more said, with MPs be included within Lokpal, which will only enhance our dignity and credibility.  The ‘formula’, which Anna Team’ spearheading the people’s struggle has put forward to end fasting of Sri Anna Hazare – I support fully and appeal to all hon. Members to endorse it in entirely.
          To include all Government employee, to frame citizens’ charter for redressal of Public grievances and formation of Lokayukta in states with Lokpal at the Centre will be genuine and practical measures and effective lively organs of Lokpal.  Let the House support them unequivocally. 
          I appeal to the Leader of the House to immediately convey this consensus to Anna Hazareji and help to end his 12 day long fast. His health and wellbeing is also our supreme priority and we wish him long healthy life to continue his fight against the evils of price rise, unemployment and many others as well.      
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*SHRI PRASANTA KUMAR MAJUMDAR (BALURGHAT): The development in the capital for the last couple of weeks is very remarkable after the independence.  The havoc wave of Anna Hazare issue is getting its strength.  It is gaining more and more solid ground day by day.  It seems to me that the present UPA Government has surpassed all previous records of corruption.  The image of Dr. Manmohan Sikngh as the Prime Minister is under scanner.  Being the Head of the Government he cannot avoid responsibility.
The arrest of Anna Hazare and subsequent handling of the issue is blame worthy.  It brings all sections of people specially middle class and young generation closer to Anna.  He was able to capitalize on public sentiment to strengthen his fast movement.
Our party R.S.P. does not support this way of handling the whole matter.  We reiterate our stand of Parliamentary supremacy from all corners specially enacting a law but our view is that the issue is very pathetic. This is due to rampant corruption in every sphere of life.  For this we strongly like to remind all about the factor of liberalization and privatization of early 1990s leads to corruption.
As a result o this attitude even the profitable public sector enterprises like mine, petroleum production, raw materials and many natural resources are sold to private and multinational firms.
The so called liberalization and privatization paved for rampant corruption.  A section of bureaucratic tie up with the ruling politicians and big industrialists almost everywhere and involved in misuse of public property.
The judiciary is also under question mark.  Even we see the incident of impeachment of a sitting judge in the Parliament.  That 2G-spectrum scam shows how limitless corruption can be. Again the Swiss Bank money controversy is very much fresh in our memory. The young generation and civil society can not accept this.  So, there is such an extreme agitation for the Lok Pal Bill.
My party’s stand is that the public opinion should not be ignored.  If there is logic of the civil society movement it should be considered.  There should be no haste while drafting such an important bill.  We strongly believe that at national level, effective, strong and genuine Lok Pal Bill is highly essential even the Prime Minister should be brought under its purview and all government officials should be brought under the purview of Lok Pal.  There is also the need of a National Judiciary Commission.
A state level Lokayukt Bill should be passed.  All bureaucrats and even Chief Minister need to be brought under purview.
There is also an urgent need to reform the election procedure to check the infiltration of money power.  The Government should constitute an independent prosecution commission to take action against persons indulging in corruption.  
Now to overcome the situation of unrest, the existing draft bill of Government should be abandoned.  In its place a consensus oriented all parties draft including ruling parties, opposition parties and civil society should be taken into consideration so that we frame an effective strong and creditable Lok Pal Bill, through Parliament which will uproot the corruption in all sphere of life.
Anna is fighting against corruption in right direction so we appeal to the government to accept his demands and also appeal to Anna Hazare to end his fast.
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*डॉ. अरविन्द कुमार शर्मा (करनाल):  लोकपाल/जनलोकपाल पर श्री अन्ना हजारे के आन्दोलन से विशेषकर उनके अनशन से देश में अभूतपूर्व, विचित्र व असाधारण सी परिस्थितियां पैदा हो गई है।  सारे देशवासी चाहे किसी भी जाति से हो, किसी भी धर्म से हो, किसी भी क्षेत्र या वर्ग से हो, टकटकी लगाये आज संसद की ओर देख रहे हैं।  उन्हें अपने प्रतिनिधियों में आज भी आशा की किरण दिखाई देती है।  विश्व में लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली के पक्षधर भी इस ओर उम्मीद लगाये देख रहे हैं कि भारत की संसद कैसे इस अभूतपूर्व संकट से बाहर आती है।  माननीय सांसदों ने और इस सदन ने पहले भी इससे गहरे संकट झेले हैं।  असाधारण परिस्थितियों में असाधारण निर्णय भी लिये हैं।  मेरा विश्वास है कि यह सदन भी आज पूरी तरह सक्षम है और लोकपाल पर प्रभावी एवं सर्वमान्य मत बनाएगा।
        लोकपाल पर इस अनशन ने जहां पूरे देश का ध्यान भ्रष्टाचार के मुद्दे की ओर खींचा है, वहीं संसद व सांसदों की गरिमा एवं सार्थकता पर भी उंगली उठी है।  अब इस सदन को यह सोचना है और देखना है कि कैसे हमारे संविधान एवं संसद की गरिमा पर कोई आंच ना आए और भ्रष्टाचार की विभीषिका पर कड़ी लगाम लगे।
        लोकपाल देश में भ्रष्टाचार को खत्म करने का एक उपाय हो सकता है और अन्य अनेकों उपाय भी हो सकते हैं।  चाहे वो संविधान के ढांचे के अंतर्गत हो या ढांचे के बाहर।  आवश्यकता पड़े तो माननीय सांसदों को साहस जुटाना चाहिए और जनहित में संविधान संशोधन से भी पीछे नहीं हटना चाहिए।  साथ ही, मैं इस सदन को विनम्रता से यह कहना चाहता हूं कि हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारे संविधान में न्यायपालिका, कार्यपालिका एवं विधायिका एक-दूसरे के पूरक हैं और साथ ही साथ सुदृष्टि भी रखते हैं।
        प्रत्येक माननीय सदस्य व पूरा सदन, मेरा ऐसा विश्वास है कि हम सब यह चाहते हैं कि सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए कठोर एवं प्रभावी कदम उठाए जाएं, चाहे वो लोकपाल के रूप में हो या किसी और स्वरूप में।  मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि माननीय सांसदों से पूर्व में कोई ना कोई चूक हुई है अन्यथा आज ये दिन देखने में नहीं आते।  हमारे लिए देश के हर व्यक्ति का जीवन अनमोल है, बहुमूल्य है।  श्री हजारे जी ने जनलोकपाल के मुद्दे को उठाकर पूरे देश में जागृति खड़ी की है।  हमें उनका धन्यवाद करने में भी पीछे नहीं हटना चाहिए।  जनता है तो सरकार है, और सरकार है तो समस्याएं भी रहती हैं।  सरकार को धैर्य के साथ जनहित में सोचना चाहिए।  
        मुझे बहुत खुशी है कि सरकार के दोनों सदनों एवं संसद सदस्यों को श्री अन्ना हजारे के अनशन को जल्द से जल्द खत्म करने एवं उनके सकुशल स्वास्थ्य की काफी चिंता है।
        मैं माननीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी एवं यू.पी.ए. सरकार तथा सदन के सभी सदस्यों का आभार व्यक्त करता हूं कि उन्होंने लोकपाल पर खुले दिल से चर्चा में विश्वास जताया है।  मैं श्री राहुल गांधी की लोकपाल एवं भ्रष्टाचार तथा अन्य देशहित से जुड़ी सार्वजनिक समस्याओं पर दी गई अभिव्यक्ति का पुरजोर समर्थन करता हूं।
        यू.पी.ए. चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी जी एवं प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में सरकार द्वारा चलाई जा रही जनहित योजनाओं का पूरा लाभ एवं हक सभी गरीबों, बेरोजगारों, महिलाओं, दलितों एवं किसानों को समयबद्ध तरीके से मिलना चाहिए।  श्री अन्ना हजारे के 12 दिनों से चले आ रहे अनशन की वजह से करोड़ों गरीब लोग भी मजबूरी में इस आन्दोलन का हिस्सा बने और भूखे पेट रहे, क्योंकि इन गरीब लोगों को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती।  श्रीमती सोनिया गांधी ने सम्पूर्ण देश में खाद्य सुरक्षा अधिनियम को पुरजोर तरीके से लागू करने की सिफारिश की है ताकि आम और गरीब लोगों को कम से कम दो वक्त की रोटी तो नसीब हो सके।  समय पर पढ़े-लिखे बेरोजगार नवयुवकों को रोजगार मिल सके।  किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य एवं सब्सिडी सीधे तौर पर मिल सके।  ताकि इनकी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी हो सकें और इनका भी जीवन स्तर ऊंचा उठ सके।  इसके लिए हमारी यू.पी.ए. सरकार वचनबद्ध है।
        मैं सरकार से व्यक्तिगत तौर पर आग्रह करता हूं कि श्री अन्ना हजारे द्वारा लोकपाल विधेयक में तीन अहम् प्रावधानों - सिटीजन चार्टर बनाना, सभी स्तर के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाना एवं केन्द्र में लोकपाल की तर्ज पर सभी प्रदेशों में लोकायुक्त का गठन करने के बारे में विस्तृत चर्चा हो और इस बारे में सर्वसम्मति से लिए गए फैसले का मैं पक्षधर हूं।
        मेरा देशहित में सुझाव है कि सभी राजनीतिक पार्टियां तुच्छ स्वार्थों में न पड़े और अनावश्यक रूप से देशहित के मुद्दों को विचलित न करें।  हम सबको दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ना चाहिए और इससे पहले कि वर्तमान आन्दोलन का आक्रोश एक राजनीतिक आन्दोलन में बदल जाए, हम सबको, इस सदन को प्रभावी कदम उठाने चाहिए।  और अंत में मैं बड़ी विनम्रता से पूरे सदन से आग्रह करता हूं कि श्री अन्ना जी के अनशन को समाप्त करवाने के लिए शीघ्र से शीघ्र पहल की जाए और एक सशक्त एवं सुदृढ़ लोकपाल का गठन किया जाए।
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*श्रीमती पुतुल कुमारी (बांका):  आज हम एक ऐतिहासिक घटनाक्रम के पात्र बने हैं। लोकपाल विधेयक जिसके ऊपर चर्चा चल रही है उसमें हम सभी सांसदों की भूमिका बड़ी गंभीर है। लोकपाल विधेयक जो आज सें पहले आठ बार संसद के पटल पर प्रस्तुत किया गया लेकिन विधेयक नहीं बन सका। आज नौवीं   बार, पन्द्रहवीं लोकसभा में इस पर चर्चा चल रही है। आज हम सभी सांसद और देशवासी उत्सुकता से इस घटनाक्रम के ऊपर नजर रखे हुए हैं। देश में ही नही विदेश में भी, लोगों की नजर हम पर है कि हमारी भूमिका इसमें कैसी रहती है?
          भ्रष्टाचार के खिलाफ आज सारा देश एकजुट हो गया है। देश में बेरोजगारी, गरीबी महंगाई और तरह-तरह की तकलीफों से निपटारे का एक ही रास्ता नजर आ रहा है और वह है भ्रष्टाचार। लोगों के मन में यह धारणा बैठ गयी है कि लोकपाल सारी समस्याओं की कुंजी है। भ्रष्टाचार दो शब्दों के मेल से बना है- भ्रष्ट और आचार यानी कि जिसका व्यवहार भ्रष्ट हो, वही भ्रष्टाचारी है। इसकी परिधि में किसकों रखा जाए? इसकी परिभाषा क्या हो, यह अह्म मुद्दा है?
          आज हम लोकपाल के तीन बिन्दुओं की चर्चा पमुखता से कर रहे हैं। लेकिन इन तीन बिन्दुओं पर चर्चा करने से या पारित कर देने से, क्या भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा? आज समाज के 70औ मध्यवर्गीय और गरीब लोग जिन्हें भ्रष्टाचार से छुटकारे की बात कर रहे हैं, क्या वह इनमें समाहित है? मेरा यह मानना है कि निचली अदालतों, मीडिया, एन.जी.ओ, प्राइवेट सेक्टर और निचले स्तर के नौकरशाहों को भी इसमें लाना होगा। इसकी परिधि बड़ी करनी होगी तभी एक मजबूत लोकपाल की स्थापना हो सकेगी।
          इस पूरे प्रकरण में एक और बात जो निकल कर आयी है, वह है लोगों का विश्वास। आज लोगों का विश्वास संसद से और जनप्रतिनिधियों से उठता जा रहा है, उनका मोह भंग हो रहा है। हमें अपने कार्यकलापों में पारदर्शिता लाकर लोगों का भरोसा जीतना होगा। साथ ही, मैं उन लोगों को अगाह करना चाहती हूं कि हम जनप्रतिनिधि का अपमान, हमारे क्षेत्र के उन लाखों लोगों का अपमान है जिनके मतों से हम जीत कर आये हैं। जिन लोगों ने अपनी लड़ाई लड़ने के लिए हमें यहां भेजा है।
          साल के 365 दिन में से 360 दिन हम बीमार और परेशान लोगों से घिरे होते हैं। उनकी चिकित्सा, नौकरी, उनके दुख-सुख के अनेक अवसरों पर हम क्षेत्र के लोगों के साथ होते हैं। अपना कोई समय नहीं होता है। कोई ऐसा मौसम नहीं होता, सर्दी, गर्मी हर वक्त हम लोगों का लोगों के साथ गुजरता है। अचानक     * Speech was laid on the Table एक दिन एक आंदोलन की शुरुआत होती है और हम सभी भ्रष्ट, चोर और न जाने क्या-क्या बन जाते हैं? गांव में एक कहावत है चने के साथ घुन भी पिसता है। थोड़े से भ्रष्ट लोगों के कारण सबके दामन दागरदार हो गये हैं। उन सभी लोगों से कहना चाहती हूं कि मर्यादा में ही शालीनता है, अमर्यादित भाषा का प्रयोग करके वे अन्ना की गरिमा को कम न करें।
          इसके साथ ही मैं संतुलित मजबूत लोकपाल का समर्थन करती हूं जो कि जन आकांक्षाओं के अनुरूप हो और साथ ही संसद की सर्वोच्चता एवं संप्रभुता भी कायम रहे।  
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*श्री धर्मेन्द्र यादव (बदायूं):  आज सदन असामान्य परिस्थितियों में एक विधेयक पर सुझाव देने और विधेयक के अन्तिम प्रारूप को तय करने के बाद स्थायी समिति को सुपुर्द करने के लिए विचार कर रहा है।  यह निश्चित रूप से संसद की प्रक्रिया और नियमों को नजरअंदाज करके किया जा रहा है।  इस असामान्य परिस्थिति के लिए सरकार में निर्णय लेने की स्थिति और उसके लचर रवैये को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
        यह एक गंभीर विषय है और इसलिए इस चर्चा को समय-सीमा में नहीं बांधना चाहिए।  सदन के अन्दर बड़े पैमाने पर बहुत से काबिल सदस्य हैं उन सभी के सुझावों को यथासंभव लेने और विधेयक के प्रारूप में सम्मिलित करने का प्रयास किया जाना चाहिए।  यह सदन देश की सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है और इसलिए एक छोटे से समूह द्वारा तैयार किये गये विधेयक के प्रारूप को अन्तिम मानना देश की शेष जनता के साथ अन्याय होगा और इस सदन की एक बहुत बड़ी भूल होगी।
        मेरी राय है कि सरकारी लोकपाल बिल, जनलोकपाल बिल एवं श्रीमती अरूणा राय के संगठन द्वारा तैयार किये गये लोकपाल बिल पर सदन में व्यापक विचार-विमर्श हो।  उसके बाद ही कोई प्रारूप संसद की स्थायी समिति को भेजा जाये।  मैं इस समय केवल जनलोकपाल बिल पर अपनी राय रखने जा रहा हूं।
        जनलोकपाल बिल की धारा 2 की उपधारा ई-1 में से संसद के अन्दर भाषण और मत देने से संबंधित पंक्ति को रद्द कर दिया जाए।
        जनलोकपाल बिल की धारा 3 का क्षेत्र असीमित है।  इसमें इस बात का स्पष्ट उल्लेख हो कि इस विधेयक की कोई भी धारा या धाराएं संविधान के किसी भी अनुच्छेद का उल्लंघन नहीं कर सकती।
        जनलोकपाल बिल की धारा 4 की उपधारा 5 को संशोधित करके इस बात का उल्लेख किया जाये कि लोकपाल के 11 सदस्यों में से कम से कम 6 सदस्य सुप्रीम कोर्ट/हाई कोर्ट के सिटिंग और अवकाश प्राप्त न्यायाधीश/मुख्य न्यायाधीश होंगे।
        जनलोकपाल बिल की धारा 4 की उपधारा 6 में चयन समिति के गठन करने का उल्लेख है।  इसको संशोधित करके इस प्रकार दिया जाये - चयन समिति का अध्यक्ष प्रधानमंत्री होगा और उसके सदस्य लोकसभा और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष, प्रधानमंत्री जिस सदन के नेता हों उसको छोड़कर दूसरे सदन का नेता, सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीश, देश के दो बड़े उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश, भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त और भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक सदस्य होंगे।  
        जनलोकपाल बिल की धारा 4 की उपधारा 8 को संशोधित करके निम्नवत् कर दिया जाये - सर्च कमेटी के सभी 10 सदस्यों को चयनित करने का अधिकार चयन समिति का होगा।  सर्च कमेटी के सभी सदस्य बेदाग छवि वाले सर्वोच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त मुख्य न्यायाधीश एवं न्यायाधीश, उच्च न्यायालयों के अवकाश प्राप्त मुख्य न्यायाधीश, अवकाश प्राप्त मुख्य निर्वाचन आयुक्त और देश के विख्यात कानूनवेत्ता होंगे।
        जनलोकपाल बिल की धारा 4 की उपधारा 17 में निम्न वाक्य और जोड़ दिया जाये - शर्त यह है कि लोकपाल के लिए चयनित किये जाने वाले व्यक्तियों में अल्पसंख्यक, दलित और पिछड़े वर्ग के व्यक्तियों को उनकी आबादी के अनुपात में चयनित किया जाये।
        जनलोकपाल बिल की धारा 6 की उपधारा "सी " से डिसमिसल और रिमूवल शब्द को हटा लिया जाये।  इसी धारा की उपधारा "एक्स " को हटा लिया जाये।  क्योंकि चुने हुए जनप्रतिनिधियों के शपथ पत्र की जांच इलैक्शन कमीशन, इनकम टैक्स विभाग से स्वयं कराता है।
        जनलोकपाल बिल की धारा 7 की उपधारा 5 और 7 को डिलीट कर दिया जाये।  क्योंकि यह दोनों उपधारायें लोकपाल को तानाशाह बना देंगी।
        जनलोकपाल बिल की धारा 23  उपधारा 2 को डिलीट कर दिया जायें क्योंकि यह नेचुरल जस्टिस के विरुद्ध है।
        मेरी राय है कि लोकपाल की तर्ज पर ही राज्यों में लोकायुक्त का गठन हो लेकिन यह अधिकार राज्य के विधानमंडलों को हो क्योंकि संघीय व्यवस्था में राज्य के अधिकारों में केन्द्र का हस्तक्षेप अन्ततोगत्वा लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
        मेरी राय में लोकसेवकों के अलावा सभी गैर-सरकारी संगठन चाहे वे सरकार से मदद पाते हों या नहीं, सभी दवा बनाने वाली कम्पनियों व दवा विक्रेता, सभी कार्पोरेशन्स, खाद बनाने वाली सरकारी और निजी कम्पनियां, खाद पदार्थों का व्यापार करने वाले सभी व्यापारी, इलैक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया को भी लोकपाल के दायरे में लाने के लिए स्पष्ट रूप से एक धारा को जोड़ा जाये।  मेरी राय में दोनों सदनों की गरिमा का भी ध्यान रखा जाए।
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*श्री कमल किशोर ‘कमांडो’ (बहराइच) :   लोकपाल/जन लोकपाल बिल के सम्बन्ध में मुझे कहना है कि लोकपाल विधेयक बनाते समय संविधान को ध्यान में रखना होगा। गरीबों, महिलाओं, दलित, मुसलिम, बैकवर्ड, जनजातियों का कोई भी नुकसान नहीं होना चाहिए। मेरे कहने का मतलब है कि संविधान के साथ कोई भी छेड़-छाड़ नहीं होनी चाहिए।
                                     
* Speech was laid on the Table 0 *श्री राजाराम पाल (अकबरपुर):  आज लोकपाल बिल पर मुझे अपना सुझाव रखने का अवसर प्राप्त हुआ।  देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर जन आन्दोलन को लेकर पूरा देश चिंतित है, किंतु एक लोकपाल बिल आने से मात्र इसका हल नहीं हो सकता क्योंकि संविधान निर्माताओं ने एक शंका संविधान बनाते समय जो कि थी आज वह 65 वर्ष आजादी के बाद सच साबित हुई है।  उन्होंने कहा था किसी देश का संविधान (कानून) कितना ही अच्छा क्यों न हो किंतु अगर उसका लागू करने वालों की नीयत अच्छी नहीं होगी तो बेकार साबित होगा।  आज इतने वर्षों बाद संविधान में सैकड़ों संशोधन होने के बाद भी देश की हालत में सुधार होने की बजाय गरीब और गरीब होता जा रहा है।  सामाजिक विषमता बढ़ती जा रही है।  इस देश के किसानों की हालत दिनोंदिन खराब होती जा रही है।  उसका कारण यह है कि आजादी के बाद इस देश की बहुत बड़ी आबादी वाला जो किसान था, जो खेतों में काम करता है, उसके लिए लैंड सीलिंग एक्ट बनाकर उसकी सीमा सीमित कर दी किंतु आर्थिक सीलिंग आज तक नहीं की गयी जिसके कारण अमीर और अमीर होता जा रहा है तथा गरीब और गरीब होता जा रहा है।  इस खाई को पाटने की आवश्यकता है।  जिसके चलते राष्ट्रीयता घटती जा रही है तथा लोकतंत्र के प्रति लोक अनिच्छा होती जा रही है।  जिसके कारण वोट का प्रतिशत और घटता जा रहा है।  आज लोग यह कहते हैं कि हम वोट क्यों डालें, हमें क्या मिलेगा।
        शहरों में जहां पढ़े-लिखे लोग रहते हैं वहां का प्रतिशत 25, 30 प्रतिशत तथा ग्रामीण अंचलों में 40, 50 से अधिक नहीं है। इस प्रतिशत को कानून बनाने से नहीं बढ़ाया जा सकता है।  बल्कि उन्हें इस देश के लोकतंत्र के प्रति जवाबदेह बनाने से बढ़ाया जा सकता है।  आज आबादी के इतने वर्षों बाद इसकी 80 प्रतिशत आबादी के लोग लोकतंत्र का अर्थ नहीं जानते, जबकि लोकतंत्र का मतलब था लोक इच्छा से लोकहित में लोक के इशारे पर तंत्र काम करेगा।  लोक जातियों में बंट गया।  लोक धर्मों में बंट गया, लोक दलों में बंट गया, लोक लोभ में पड़ गया और तंत्र हावी हो गया।  इस देश का दुर्भाग्य है कि लोक द्वारा चुनी गयी सरकार अपनी सरकार नहीं समझता।  लोक अपने अथवा सरकार को अलग समझता है। इसलिए सरकारी सम्पत्ति के प्रति उसकी न तो आस्था है और न लगाव है।  इतने वर्षों से हम कह रहे हैं कि भारत सरकार से चलने वाला एक रुपया जमीन पर लोक तक 10 पैसा पहुंचता है।  जिसके कारण देश की हालत, बड़ी आबादी आज भी उन मूलभूत सुविधाओं के लिए तंत्र के सामने हाथ फैलाये खड़ी है।  पूरे सदन में प्रत्येक सत्र में गरीबी मिटाने की बात खूब होती, किंतु उसको अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका।  जिसके कारण भ्रष्टाचार से त्रस्त अभी चन्द लोग सड़क पर आये है और पहली बार लोगों को लगा है कि लोक सर्वोच्च है, तंत्र सर्वोच्च नहीं है।
        मैं सरकार को सुझाव देना चाहता हूं कि लोक को भिखारी न समझें।  अपना उनके प्रति कर्त्तव्य समझे।  आज सदन विचार करे कि वह कौन सी योजनाएं हैं जो हम गरीबी मिटाने के लिए संसद ने बनायी है और जिनके लिए बनायी है वह इतने वर्षों में उनक साथ सही न्याय, सही व्यक्ति तक हम नहीं पहुंचा सके। क्या उन योजनाओं को बंद करके राष्ट्र में होने वाली समृद्धि में से जो हिस्सा इस देश का आबादी का है उसको सीधे बिना बिचौलिये को कानून बनाकर प्रत्येक व्यक्ति का खाता खुलवाकर सीधे प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचाए, जिससे वह न्यूतनम आवश्यकता, रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा वह बिना बिचौलियों, बिना सरकार की कृपा/भीख के लोकतंत्र के प्रति, राष्ट्र के प्रति अपना अधिकार समझकर लोकतंत्र के प्रति जवाबदेह बनाया जा सके जिससे राष्ट्रीयता बढ़े तथा भ्रष्टाचार में कमी लाई जा सके।
        चौदहवीं लोक सभा में हम 110 सांसदों ने लोक सभा में एक याचिका डाली थी जिनमें प्रत्येक वोटर को उसकी न्यूनतम जरूरतें रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा पूरी करने के लिए राष्ट्र की आय का 50 प्रतिशत हिस्सा सीधे वोटर पेंशन, वोटरशिप, कानून बनया जाए और 18 वर्ष से ऊपर के प्रत्येक वोटर सीधे बैंक में खाता खुलवाकर राष्ट्र को आपका हिस्सा सीधे खाता खोलकर सीधे खाते में डालकर प्रत्येक व्यक्ति को ए.टी.एम. कार्ड देकर उसका अधिकार दिया जाए ताकि बूढ़े बाप को बेटे के सामने, पत्नी को पति के सामने, लूले-लंगड़े भाई को भाई के सामने हाथ न फैलाना पड़े।  जब व्यक्ति राष्ट्र की आय से पढ़ेगा, राष्ट्र आप से चलेगा, तो राष्ट्रीयता उसके खून में शामिल होगी और वह लोकतंत्र के प्रति अपनी जवाबदेही तथा राष्ट्र के प्रति समर्पित होगा।
        मेरा यह सुझाव है कि जो अन्ना के आन्दोलन में देखे या शहरी बढ़ती भीड़ देखे, आज पढ़े-लिखे नौजवानों की भीड़ मिलेगी, उनके सामने घोर अंधेरा है। अगर हमने समय रहते उनको राष्ट्र के प्रति उनके अधिकार न दिए तो यह बेरोजगारी गरीबी का आन्दोलन बड़े महलों में आग लगाने व लूटने को मजबूर होगा।
        आज पूरे देश के गरीबी मिटाने के नाम पर चलने वाली योजनाएं जैसे वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन, विकलांग पेंशन, मिड-डे मील, शादी अनुदान, बेरोजगारी भत्ता, रोजगार गारंटी योजना, सूखा राहत, निर्बल आवास गीला राहत, हैवी आपदा राहत जो जिनको मिलना चाहिए न मिलकर इसका 90 प्रतिशत पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है।  उसको समाप्त कर दिया जाए ताकि बहुत बड़ा भ्रष्टाचार मिट सके।  क्योंकि भ्रष्टाचार के लिए जोखिम लोकपाल बिल सदन में लाया जाए, कहीं सुपर भ्रष्टाचार की दुकान न बन जाये। इसलिए भ्रष्टाचार वाली योजनाएं बंद कर लोक को तंत्र के प्रति जवाबदेह बनाया जाए ताकि भ्रष्टाचार रुके।  मैं इस बिल का समर्थन करता हूं और अन्ना को अनशन तोड़ने का अनुरोध करता हूं।
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*श्री धनंजय सिंह (जौनपुर):  आज सुबह नेता सदन के द्वारा दिये गये वक्तव्य पर सदन में चर्चा हो रही है और कई मायनों में यह चर्चा बहुत ही महत्वपूर्ण है।  क्योंकि पिछले कुछ महीनों से सम्पूर्ण राष्ट्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक वातावरण बन रहा था, क्योंकि वर्तमान केन्द्र सरकार की नीतियों की वजह से कई बड़े घोटाले हुए और जिसका समाधान सरकार करने में पूर्ण रूप से विफल रही तथा घोटाले का सिलसिला अभी भी जारी है।  जिसकी वजह से लम्बे समय से भ्रष्टाचार का बना वातावरण जनता के आक्रोश के रूप में तब्दील हो गया।  यह बात इसलिए कहना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस समय देश में कुछ समाजिक संगठनों को यह गलतफहमी हो गयी है कि जनता उनके साथ है तथा वह भ्रष्टाचार से इस देश को मुक्ति दिला रहे हैं।  मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं तथा स्पष्ट भी करना चाहूंगा कि देश में जो वातावरण बना है वह हमारी कमियों, कमजोरियों, लापरवाहियों की वजह से है न कि किसी की मेरिट की वजह से है।  इसलिए किसी को गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए और पिछले कुछ दिनों से जिस तरीके के शब्दों का प्रयोग "सो कॉल्ड " सिविल सोसाइटी के लोगों के द्वारा किया गया है, मैं नाम नहीं लेना चाहूंगा।  वह निश्चित तौर पर निन्दनीय है, अगर राजनीतिक वर्ग के लोगों ने उनके आचरण, वक्तव्यों पर धैर्य नहीं रखा होता तो निश्चित तौर पर देश में अराजकता का वातावरण पैदा हो जाता। इसलिए मैं सदन के माध्यम से अन्ना हजारे और उनके लोगों को सलाह देना चाहता हूं कि वाणी में संयम बरते और समाज सेवा के क्षेत्र में कुछ कार्य करें और देश में भ्रमण करके गरीब जनता को उनके अधिकारों और कर्त्तव्यों के प्रति जागरूक करें तथा विनोबा जी से कुछ सीखें। जिस सिटीजन चार्टर की वो बात कर रहे है, इस देश का 75 प्रतिशत आदमी उस सिटीजन चार्टर को समझने में असमर्थ है। यह आवश्यक इसलिए है कि कोई कानून तभी सफल हो सकता है जब उस कानून के बारे में लोग जानते हो, समझते हो।
        लोकतांत्रिक व्यवस्था में इलेक्ट्रोरल डेमोक्रेसी के साथ-साथ पार्टीसिपेटरी डेमोक्रेसी भी होती है जिसकी भूमिका अन्ना हजारे और उनके लोग कर रहे हैं।  मैं इस चलन का विरोध करता हूं कि 10-20 हजार लोग कहीं खड़े होकर अपनी जिद, व अहंकार सदन व सरकार के ऊपर थोपे।  अगर ऐसा ही चलन रहा तो एक दिन नेक्सलाइट भी इसी दिल्ली में एक करोड़ से अधिक की संख्या में उपस्थिति होकर अपनी बात सरकार से मनवायेंगे।  मैं यह मानता हूं कि इस देश में जो विद्यमान संस्थाएं काम कर रही है, यदि हम उन्हें मजबूत, पारदर्शी व स्वतंत्र रूप से कार्य करने देंगे तो निश्चित रूप से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा पाने में सफलता प्राप्त करेंगे।
        मुझे सुबह सुषमा जी का भाषण सुनकर प्रसन्नता हुई कि उन्होंने जनता के आक्रोश से उत्पन्न स्थिति को जन आन्दोलन कहा।  मुझे बहुत खुशी होगी यदि यह जनता का आक्रोश आन्दोलन का रूप ले, क्योंकि अभी तक यह मात्र जनता का आक्रोश है, मुझे तब बहुत दुख होगा जब यह आक्रोश उत्सव व पर्व के रूप में सेलीब्रेट होकर समाप्त हो जायेगा, क्योंकि बड़े लम्बे समय के बाद किसी मुद्दे पर जनता के आक्रोश ने राष्ट्रीय स्वरूप धारण किया है।
        आज पूरी बहस में जिस बात को निकलकर आना चाहिए था वह आ नहीं पायी, आज सदन में जोरदार तरीके से यह बात आनी चाहिए थी कि सदन किस तरीके का लोकपाल बिल लाना चाहता है और राष्ट्र के सामने यह संदेश देना चाहिए था कि हम सिविल सोसाइटी से बेहतर कानून बनाकर देना चाहते हैं, जिससे कि इस देश की जनता को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिला सके।  मेरे कुछ महत्वपूर्ण सुझाव हैं।
        जब भी लोकपाल बिल सदन में आये उस बिल में लोकपाल के अधीन कार्य करने वाले तथा उसमें खर्च होने वाली धनराशि के लिए स्पष्ट वित्त व्यवस्था का प्रावधान हो।  साथ ही उसके साथ कार्य करने वाले लोगों का स्वरूप भी तय हो।
        लोअर ब्यूरोक्रेसी के भ्रष्टाचार को समाप्त करने हेतु प्रदेश के लोकायुक्तों से विचार-विमर्श करके पूरे देश में जिले स्तर पर लोकपाल बिल के कमेटियों का गठन किया जाए।  कम से कम 10 सदस्य जिला स्तर पर हों।
        लोकपाल के माध्यम से जन भागीदारी की व्यवस्था सुनिश्चित करायी जाए।  सभी सरकारी विभागों में जन निगरानी अनुश्रवण समितियों का गठन हो।
        प्रधानमंत्री को रक्षा, आंतरिक सुरक्षा तथा विदेश नीति के मामले में इसके दायरे से बाहर रखा जाए। क्योंकि एक सशक्त राष्ट्र का संचालन इन विषयों पर कूटनीतिज्ञ तरीके से किया जाता है न कि आदर्शों से चलाया जाता है, आदर्शों से समाज चलाया जाता है।
        गरीब, मजदूर, असहाय, अशिक्षित लोगों को सिटीजन चार्टर समझने के लिए उनके अन्दर जागरूकता पैदा करने के लिए कोई मैकेनिज्म तैयार करना होगा।
        किसी भी संस्थान का निर्माण बहुत ही उच्च नैतिक मापदंडों के आधार पर स्थापित किया जाता है, परन्तु समय काल के साथ संस्थाओं का दुरूपयोग होने लगता है।  इसका ध्यान रखा जाए।
        मुक्त अर्थव्यवस्था के दौर में यदि प्राइवेट सेक्टर को लोकपाल में सम्मिलित नहीं किया गया तो भ्रष्टाचार दूर नहीं हो सकता है।  क्योंकि 80 प्रतिशत इस देश की अर्थव्यवस्था इसी सेक्टर से संचालित होती है तथा सरकार के निर्णयों को भी अपने अनुकूल बनाते-बिगाड़ते रहते हैं, चाहे पेट्रोलियम पदार्थों में डी-कंट्रोल सिस्टम लागू करने का मामला हो या 2-जी स्पेक्ट्रम आवंटन का मामला हो।
        मीडिया, धार्मिक ट्रस्ट, एन.जी.ओ. जिसकी संख्या देश में लगभग 20 लाख है, को भी लोकपाल के दायरे में लाया जाए।
        मैं उनके पूरे जनलोकपाल बिल को नकारता नहीं हूं परन्तु उनके पूरे बिल से सहमत भी नहीं हूं और अन्त में एक बात कहना चाहूंगा कि गांधी जी ने कहा था।  “We get the Government we deserve, when we improve government is bound to improve” गांधी जी के इस वाक्य में सारे निहतार्थ है, इसलिए हमें समाज को जागरूक करना होगा।
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*SHRI THANGSO BAITE (OUTER MANIPUR): Lokpal Bill has been moved by the successive Governments  nine times irrespective of parties  or Governments, whether   it is Congress, BJP or other, but failed to get through.  Now recently a section of the people vigorously attempting to get the said Bill passed,  by applying pressure from outside and inside Parliament and has given a time to pass the said Bill.  They want the Prime Minister, MPs and judiciary to come under the purview  of  Lokpal Bill India inherited Parliamentary form of Government with   balance of power between Legislature, Executive and Judiciary.  so that nobody have Govt.’s power exclusively.
          India is a Parliamentary form of Government and the largest democratic country in the world.  Parliamentary system of Government implies people’s  Government, and any attempt for subordination and degradation of Parliament will  not be  compromised as stated by Hon’ble  leader of the House Shri   Pranab Mukherjee.
          The supremacy  of Parliament  is the spirit of parliamentary form of Government  To bring Prime Minister, MPs and judiciary under the purview of Lokpal,  pertains to change of the forms of Government as the basic structure of  the Indian Constitution is being changed.  In such a case  what form of government we are going to have?
          Lokpal in case is  accepted and is  passed by the Government  that will be the end of democracy  because the elected people of body would be accountable to an appointed or nominated body i.e. Lokpal.
          Corruption is no doubt a chronic ill of the society, but it is an entity of our social phenomena can be  dealt with by other  Government  agencies by giving more powers..
 
* Speech was laid on the Table           The present form of Government is the outcome by struggle of Indian National Congress, no any alteration and change will  be compromised. Our leaders  have chosen and implanted the best form of Government.     
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*DR. THOKCHOM MEINYA (INNER MANIPUR): I would like to express my views on the statement made by hon. Leader of the House, Shri Pranab Mukherjee, today in the House.  Today is really a historic day.  Almost all of us cutting across party lines join together for enacting a strong and effective Lokpal Bill in the country.  I do join all of you to appeal to Shri Anna Hazare to end his fast.
          It is my personal view that Shri Anna Hazare had the best time to end his fast on the 25th last when the hon. Prime Minister, the hon. Leader of Opposition, the hon. Speaker and the whole House wholeheartedly and unanimously appealed to him to end the fast.  It did not happen. 
          We stand for the supremacy of the Parliament for legislation.  The separation of power between Legislature, Judiciary and Executive as enshrined in the Constitution of India cannot be undermined.  On this issue, there has never been any difference between the Government and the Congress Party in terms of policy and governance.
The three issues as raised in the statement of the hon. Leader of the House are whether the jurisdiction of the Lokpal should cover all employees of the Central Government; Whether it will be applicable through the institution of the Lok Ayukta in all States; and whether the Lokpal should have the power to punish all those who violate the “grievance redressal mechanism” to be put in place?
 
          These are important and require serious consideration keeping in view the supremacy of the Parliament and the Constitution of India.  Hence, the first issue   * Speech was laid on the Table           is quite OK. The second issue should be taken into consideration the federal form of the Union where the federating States should be given the power to legislate as per the provisions of the Constitution. The third issue is very delicate, where the rule of law and jurisprudence shall have to be followed. Let us hope for the best.
           I do appeal to Shri Anna Hazare once again to end his fast keeping in view the openness of the UPA Government on the issue of fighting against corruption and also to legislate a strong, powerful and effective Lokpal Bill.  I suggest that today’s proceedings in the House may please be sent to the Standing Committee for the consideration of the Committee.
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*श्री पकौड़ी लाल (रॉबर्ट्सगंज):जन लोकपाल बिल सुदृढ़ बने, इसका मैं समर्थन करता हं। लोकपाल के दायरे में निम्न विभाग के कर्मचारी एवं अधिकारियों को लिया जाए, जिन्होंने भ्रष्टाचार का जखीरा फैला कर सरकार की योजना को भ्रष्ट बनाया है। गरीब जनता एवं आम जनता का सरकार एवं सरकार की योजनाओं से विश्वास उठा है। जनता भ्रष्टाचार का शिकार बन कर नक्सल एवं अन्य गलत काम करने पर उतारू है और मानव, मानव की दूरियां बढ़ रही हैं।
          लेखपाल सहित कानूनगो तहसीलदार, एसडीएम लोकपाल दायरे में हों।  ग्राम विकास अधिकारी सी.डी.ओ., बी.डी.ओ. इस दायरे में हों।  भू-माफिया एवं निजी फैक्ट्री वाले इस दायरे में हों। मास्टर, डाक्टर और पुलिस आदि जो वित्तीय विकास से जुड़े हों, वे भी इस इस दायरे में हों।  
                   
* Speech was laid on the Table ( 5 *श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): आज सदन के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है, जब विशेष सदन इस ऐतिहासिक क्षण का केवल साक्षी ही नहीं बनने जा रहा है, बल्कि एक इतिहास का निर्माण भी करने जा रहा है। पिछले 42 वर्षों से इस सदन के समक्ष लोकपाल विधेयक लम्बित रहा है। ये ऐतिहासिक क्षण ऐसा नहीं है कि इस अवसर पर आरोप प्रत्यारोप किया जाए, बल्कि इसे खुले मन से स्वीकार करने में सदन को संकोच नहीं करना चाहिए। पहले कहीं न कहीं जनभावनाओं के अनुरूप लोकपाल विधेयक को सदन पारित नहीं कर सका, जिसके कारण आज जनता आंदोलित है। यह सच्चाई है कि आज देश में जनता भ्रष्टाचार से पीड़ित है। हर स्तर पर जनता भ्रष्टाचार के कारण दिनचर्या में किसी न किसी रूप से पीड़ित है। आज राशन कार्ड बनवाने, जन्म प्रमाण-पत्र, वृद्धावस्था पेंशन, लाइसेंस, पटवारी अथवा पुलिस स्टेशन पर जनता को भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ रहा है, इसीलिए आज श्री हन्ना हजारे के नेतृत्व में लोकपाल विधेयक को सदन द्वारा पारित कराने हेतु एक जनआंदोलन चल रहा है। वक्त के तकाजे के अनुरूप भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी ने 15 अगस्त को लालकिले के प्राचीर से कहा कि हमारी सरकार एक प्रभावी एवं कठोर लोकपाल विधेयक ले कर आएगी। जहां प्रधानमंत्री ने कहा कि कठोर लोकपाल बिल लाएंगे, वहीं श्री राहुल गांधी ने उसे एक संवैधानिक लोकपाल बनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि देश के लोगों की भावनाओं को वास्तविक रूप से मूर्तरूप देने के लिए लोकपाल को एक स्वतंत्र रूप से चुनाव आयोग की तर्ज पर संवैधानिक संस्था बनाने की मांग की है। इससे साफ है कि न केवल कांग्रेस एवं यूपीए की सरकार ही भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए कटिबद्ध है, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की भावना भी जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करने के लिए लोकपाल को पूर्ण रूप से स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के रूप में स्थापित करने की है। जनलोकपाल ने अपने बिल में यूनाइटेड नेशन्स कन्वेंशन अगेंस्ट क्रप्शन से काफी कंटेन्ट्स लिए हैं। यूएनसीएसी की प्रस्तावना में तत्कालीन महासचिव श्री कोफी अन्नान ने लिखा है कि भ्रष्टाचार पूरी दुनिया के विकास में बाधक बन रहा है। गरीब सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है। भ्रष्टाचार लोगों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने एवं गरीबी दूर करने में बाधक बन रहा है। कांग्रेस और यूपीए सरकार ने पहल करके यूनाइटेड नेशन्स कन्वेंशन अगेंस्ट क्रप्शन की इंटरनेशनल ट्रीटी पर साइन किए, जिससे भ्रष्टाचार को समाप्त करने के अभियान में सक्रियता से जुड़ने की प्रतिबद्धता जाहिर की है। इसीलिए लोकपाल विधेयक में एनजीओज एवं   * Speech was laid on the Table प्राइवेट सैक्टर को भी जोड़ने का काम किया, जबकि जनलोकपाल में कारपोरेट हाउसेस, मीडिया एवं एनजीओज को नहीं रखा गया है। एक तरफ बीजेपी कह रही है कि लोकपाल बिल सरकार वापिस लिया जाए तथा जनलोकपाल को प्रस्तुत किया जाए, जबकि दूसरी तरफ गुजरात में राज्यपाल द्वारा जस्टिस आर.ए. मेहता को लोकायुक्त नियुक्त किया, तो उसके खिलाफ बीजेपी की सरकार ने हाईकोर्ट में चैलेंज कर दिया। अभी तक उत्तराखंड, बिहार, झारखंड में लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं की गई है। इन सारे राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं, इसलिए इस विषय को विवादित मत बनाइए। आज इस सदन से एक ध्वनि जानी चाहिए कि सम्पूर्ण सदन भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए राजनीति से ऊपर उठकर एक होकर इस बिल को लाने के लिए कटिबद्ध है।  
          सदन इस बात का गवाह रहा है कि देश की बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए यहीं से हमेशा रास्ता निकालने का काम किया है। आज इसी सदन ने गरीबों के लिए रोजगार के लिए कानून बनाने का काम किया है। इसी सदन में देश के गांवों में 18 साल के व्यस्कों के लिए मनरेगा के अंतर्गत 40 हजार करोड़ रुपया इस वित्तीय वर्ष में भारत सरकार ने आबंटित करने का काम किया है। इसी तरह से सूचना का अधिकार एवं शिक्षा का अधिकार के लिए कानून बनाने का काम किया है। इस सदन ने श्री अन्ना हजारे के स्वास्थ्य का पिछले दिनों संज्ञान लिया और सम्पूर्ण सदन ने एक स्वर में उनसे अनशन समाप्त करने की अपील की। भारत के प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष एवं माननीया स्पीकर महोदया ने सम्पूर्ण सदन की तरफ से उनसे अपील की, लेकिन इसके बावजूद भी श्री अन्ना हजारे का अनशन जारी रहा। आज पुनः सदन श्री अन्ना हजारे द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में जनलोकपाल विधेयक के तीन मुख्य बिंदुओं के बारे में सदन में चर्चा कर रहा है। आज सदन श्री अन्ना हजारे तथा प्रजातंत्र की जनभावनाओं का आदर करते हुए उनके मुख्य तीन बिंदुओं पर चर्चा कर रहा है। ज्यादातर सांसदों की भावनाएं कठोर लोकपाल विधेयक बनाने के पक्ष में हैं। श्री अन्ना हजारे के तीन मुख्य बिंदु जैसे राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति, सिटीजन चार्टर तथा निचले स्तर के अधिकारी एवं कर्मचारियों को लोकपाल विधेयक के अंतर्गत लाने की मांग है। आज कांग्रेस सरकार की प्रबल इच्छा कठोर लोकपाल की है। फलस्वरूप जीओएम के साथ सिविल सोसाइटी के पांच सदस्यों के साथ लगातार बैठकों के बाद उनके 40 महत्वपूर्ण बिंदुओं में से 34 बिंदुओं पर सहमति हो गई। कदाचित पहली बार सरकारी विधेयक में 34 बिंदुओं में संशोधन करने का काम कांग्रेस सरकार ने किया। स्वयं श्री अन्ना एवं उनकी टीम ने माना कि केंद्र सरकार ने उनकी अधिकांश जनलोकपाल विधेयक की बात मान ली है। यह वास्तविकता है कि अगर तीन बिंदुओं पर ही केवल असहमति थी और उन पर भी आज सदन विचार कर रहा है तथा उस पर भी सरकार सम्पूर्ण सदन की भावनाओं का समावेश करते हुए स्टैंडिंग कमेटी को भेजने का काम करेगी।
          प्रजातंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है और यह सम्मानित सदन देश की जनभावनाओं के अनुरूप ही कानून बनाने का काम करता है। आज फिर सदन एक इतिहास बनाने का काम कर रहा है। पुनः जनता का विश्वास इस सदन के लिए स्थापित होगा तथा लोकतंत्र मजबूत होगा।
          मैं अंत में श्री अन्ना हजारे से अनशन समाप्त करने की अपील करता हूं तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ सम्पूर्ण सदन एवं सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराता हूं। सरकार सैद्धांतिक रूप से श्री अन्ना हजारे की मांगों पर सहमत है।
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*DR. PRASANNA KUMAR PATASANI (BHUBANESWAR): We support a strong Lokpal Bill, which will remain within the frame-work of Constitution and will not be superior to the Parliament.  We support Anna’s demand to bring lower bureaucracy under the purview of Lokpal.  We also support to have uniform Lokayukta laws at state level.  There should be a tool to remove Lokpal, if found guilty and corrupt. Parliament should be empowered to impeach the Lok Pal.  A special desk be created in the office of CJI to look into the complaints against the Lokpal, lodged by common people.  The CJI must take immediate cognizance of the complaint.  We support Anna’s method in selection of Lokpal. But there should be a provision by which a common man can seek redressal against the verdict of Lokpal/Lokayukta. A time frame should be decided for the investigation and enquiry of complaint filed by a citizen.  Legal assistance should be made available to a poor complainant.  Behaviour and voting of MPs/MLAs should be kept out of the ambit of Lokpal.  CBI and judiciary should remain out of Lokpal and should come under separate bodies on the lines of Election Commission.  No hurry should be made in passing the Bill. A special session should be called in October for consideration of the Bill.
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THE MINISTER OF FINANCE (SHRI PRANAB MUKHERJEE): Madam Speaker, first of all, I would like to express my deep appreciation for all the hon. Members and as I understand, up to now, 27 hon. Members of this House have spoken since 11 o’ clock.  Most respectfully, I would like to request the hon. Members  to take their seats because 27 Members have already spoken. I do appreciate  that many more Members wanted to express their views. Unfortunately, we could not do so because there is constraint of the time. Mr.  Bwiswmuthiary, please take your seat. This is the constraint of the time. There is an occasion where we shall have to deliberate and hold a discussion because the issues which we are discussing today is not merely an academic exercise, theorization because I am told that the views of this House, as they are being  expressed by various speakers, may lead to a situation where somebody will take an important decision. Therefore, in that context, this debate has assumed a larger dimension. That is why, in the morning I stated that it is not my intention to score any debating point; it is not my intention to pass on blame to anybody. I just stated the factual position from day one, in which we tried to handle the situation. … (Interruptions) It may be; you may call it bungling; you may call it mismanagement. I will not quarrel with you.  And  I have no intention of joining issues with you. The short point which I am trying to drive at,  I am repeating it; recalling it, on 5th of April, Shri Anna Hazare decided to go on fast indefinitely.
          The issue on which he was agitating, none of us sitting in this Chamber can say the issue is not important, none of us can say the issue is not to be addressed, none of us can condemn or criticise the person who has raised this issue even at an old age, taking the risk of endangering his life – you may call it, we have bungled, I will accept it. But in that context, immediately the Prime Minister decided, through his interlocutors, to discuss with the representatives of Shri Anna Hazare that what can address his concern, what mechanism we could evolve and the mechanism was suggested, which I indicated in the morning and it was the Joint Drafting Committee. We have been criticised, there is no doubt about it.
But at the same time, please remember that in the largest functional democracy of the world, encompassing 120 crore plus people, it is not necessary that always we shall have to move in the conventional strait-jacket way, mechanical way because it is the largest functional democracy. … (Interruptions) Please, most respectfully I would like to submit that we can have some control on our tongue, Heaven is not going to fall, you are going to be here tomorrow, you can use as much abusive languages as you prefer to us; only for today’s sake, I am requesting you with folded hands not to do so.
Therefore, it was decided like that. Yes, it is a non-conventional way. I am not a new Minister. I know how Government functions. Normally, legislation is drafted by the Ministry through the help of the civil servants. After that, with inter-ministerial consultations it gets the approval of the Cabinet. Then it is brought to the House and after that, it is sent to the Standing Committee. The Standing Committee has come into existence from 1991, but in the history of Indian Parliament, from 1947 to 1950, it was the Central Assembly, from 1950 onwards, it was the Provisional Parliament and from 1952 onwards, it is the Lok Sabha. In 1991, the Standing Committee came. Before that, there was a process of Select Committee. Even when the Bill is being introduced, any Member could get up and move a Motion asking for the Bill to be circulated for eliciting public opinion. That was the conventional way in which we were making legislation.
But recognizing the fact, admitting our own lapse, if we could not bring Lokpal, it is our lapse. I was a Minister in the 1970s, in the 1980s, in the 1990s and yes, during our time we could not do it. As Sushmaji has admitted, during their time also, the Bill was introduced twice. Even in 1996, when the United Front Government was there, of which Mr. Gurudas Dasgupta’s Party was a participant, they also could not pass it and it happens sometimes. We recognize that for 40 years, legislation could not be passed. Therefore, if somebody is making an agitation, sitting on fast and demands a particular mechanism, through the process of consultation we agreed. We tried; we tried our best.  It is unfortunate that we could not agree on all points.  But there were substantial agreements.   As I mentioned, out of 40 basic principles on as many as 34 there were agreements; on six, there were differences. 
          I sought the opinion of the others.  In democratic process we shall have to always create a situation where there will be give and take.  I thought in that process we would be able to resolve it, but we could not.  We have to go through the process and it is not new, I made clear from day one that this is prior consultation before the normal legislation making process begins. Thereafter we will follow the entire legislation making process in the usual course and we did so.
          Yes, it may not be up to your expectation, you are free to say so.  Whatever was incorporated in the Bill would be subjected to the scrutiny of the Standing Committee, it would be subjected to the scrutiny of this House and thereafter with your approval, with the approval of the House, it would be passed.  If you want to include Prime Minister, you will be free to do so; if you want to delete any provision, you will be free to do so; and if you want to strengthen it by making any amendment, you are free to do so. 
So, what is so grave that a particular Bill is to be withdrawn or a particular Bill, which has been introduced, to be burnt publicly?  That is, of course, not the democratic way. There should be a distinction between mobocracy and democracy.
          In democracy, individuals should have the right to express their views and also their dissent.  You may not like it, still that is true.  I am not going to recount again what because in the morning I did so – I will like to share some information with the hon. Members.  I am not making any comment on the Bill because in this Bill -- as I mentioned, which we have placed for the consideration – a substantial number of principles, basic ideas, basic values of the Jan Lokpal Bill have been incorporated in the our language. 
          The six issues where we have differences, there also we hoped that it would be possible to have some agreement and we were working on it.  But unfortunately, thereafter the line of communication was snapped.  We were threatened with the agitation that this Bill was to be passed by 15th August, which I found that with the Session starting from 1st of August, and by 15th August it might be difficult. 
          Therefore, when the actual fasting started, again the line of communication was started and we tried our best.  We shared in the morning what happened chronologically. Corruption is an important issue, but does anyone of us believe seriously -- not to score a debating point -- one piece of legislation, however, powerful and effective it may be, however, independent and empowered it may be that piece of legislation will completely eradicate corruption?  There is a need for the change in the system and we are doing so.
          I can give you one example.  In my own Department, there was a constant complaint – Shri Yashwant Sinhaji will agree with me – in regard to the refund claim of the taxpayer. And, as a result – in technical term our people are talking of; I did not hear the English term ‘electronisation’ in my school days – through electronisation, through the use of IT platforms and net banking,  we have been able to ensure the IT refunds to the extent of more than 37 per cent.  There the tax collectors and the recipients of the refunds do not come face to face; everything is transacted through electronic mechanism.  These are the systemtic changes we are wishing on. 
We are hoping that by next year, by March 2012, 20 crore people of this country will have Unique Identity Number and Mr. Nilekani is assuring us that he would be in a position in the next two to three years to provide the Unique Identity Number to all the residents of India, not merely the citizens but to all the residents of India. That itself would create a new system of identities and individual discretion will be eliminated substantially.  
We have introduced the PAN card in the area of taxation.  The same PAN card can be used for all sorts of taxes from commercial tax, Sales Tax, to Goods and Services Tax if introduced, in GSTN. So, these are the systemic changes which we are trying to bring about.  It is taking time.  Sometimes we are slow.  Therefore strong legislation is needed.  Strong, powerful institution to supervise the effective implementation of the legislation is needed.  At the same time, a systematic change is needed.  This is the area where we shall have to work collectively now.
I have not listened to all the speakers sitting here but they should not have the feeling that I did not listen to them.  Yes, I had to sometimes consult the various leaders because this is an important debate.  I must appreciate substantially the hon. Members who have participated.  They have shown sensitivity to the occasion, risen to the occasion, and have raised the level of the debate.  Acrimony which we see normally has been reduced substantially because, as I mentioned, it is not merely an academic, a theoretical discussion.  We are trying, through this debate, to resolve an important issue, an agitation carried on by a very respectable leader having very broad support.  And, at the same time, being the Members of the Parliament, we take oath by the Constitution to abide by the Constitutional norms and principles, to protect the Constitution, we shall have to abide by the Constitution which we have received from Baba Saheb Ambedkar.  One young man, little impatiently was saying, but for Baba Saheb Ambedkar, perhaps he would not have entered into this House.  But, without Baba Saheb Ambedkar, Pandit Jawaharlal Nehru and other founding fathers of the Constitutions, I can assure that hon. Member that not only he, perhaps as a village boy I could have never entered into this Chamber.  It is because it is possible today, even when we are seeing major changes which are coming in the horizon of Indian politics, the people coming from those sections of the society which could never imagine 50 or 60 years ago to assume the high offices which they are holding.   It is the contribution of democracy.  It is the contribution of the constitutional mechanism.  It is the Constitution which has been just described by Sir Anthony Eden as the biggest Magna Carta for socio-economic transformation which is the Indian Constitution. 
          Therefore, it is our responsibility to abide by the Constitution to ensure that there is no conflict with the desire of the people who are our masters, there is no question of conflict.  Our democracy is powerful enough, strong enough and flexible enough to accommodate various view points.  It can allow various thoughts, various pools of thoughts to develop, to flourish and it has done so over the years. 
          Madam Speaker, what I understand from the observations of the various hon. Members who have participated in the debate, and if I can convert it into the sense of the House, then perhaps I can convey the sense of the House in the following words:
          The House discussed various issues relating to setting up of a strong and effective Lokpal.
          This House agrees in principle on the following issues: Citizens Charter, Lower Bureaucracy also to be under the Lokpal through appropriate mechanism, and Establishment of  Lok Ayuktas in the States.
          Madam Speaker, I will request you to transmit these proceedings to the Department-related Standing Committee for its perusal while formulating its recommendations for the Lokpal Bill.
          Thank you, Madam Speaker.  Once again I thank all the distinguished participants.
MADAM SPEAKER: The oHouse stands adjourned to meet on Monday the 29th August, 2011 at 11.00 a.m. 19.48 hrs The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Monday, August 29, 2011/Bhadra 7,1933 (Saka).       
                                       

* Not recorded.

* Not recorded.

* Not recorded.

* Not recorded.

* Not recorded.

* Not recorded.

* Not recorded.

* Not recorded.

* Not recorded.

* Not recorded as ordered by the Chair * Not recorded as ordered by the Chair.

* Not recorded.

* Speech was laid on the Table * Speech was laid on the Table.

* Speech was laid on the Table.

* Speech was laid on the Table.

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* Speech was laid on the Table * Speech was laid on the Table * Speech was laid on the Table.

* Not recorded.

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* Not recorded.

* English translation of the Speech originally laid on the Table in Tamil.

* Speech was laid on the Table.

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* Speech was laid on the Table * Speech was laid on the Table.

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* Not recorded.

* Speech was laid on the Table.

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* Speech was laid on the Table * Speech was laid on the Table.

* Speech was laid on the Table.

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* Speech was laid on the Table * Speech was laid on the Table.

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* Not recorded.

* Speech was laid on the Table * Speech was laid on the Table.

* Speech was laid on the Table.

* Speech was laid on the Table * Speech was laid on the Table * Speech was laid on the Table.

* English translation of the Speech originally delivered in Marathi.

* Speech was laid on the Table.

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* Speech was laid on the Table * Speech was laid on the Table * Speech was laid on the Table.

* Speech was laid on the Table.

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* Speech was laid on the table.

* Speech was laid on the Table.