State Consumer Disputes Redressal Commission
Darshanpal vs N.I.C.Ltd on 10 August, 2022
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/2040/2015 ( Date of Filing : 01 Oct 2015 ) (Arisen out of Order Dated 01/09/2015 in Case No. c/12/2015 of District Baghpat) 1. Darshanpal Baghpat ...........Appellant(s) Versus 1. N.I.C.Ltd Baghpat ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. SUSHIL KUMAR PRESIDING MEMBER HON'BLE MR. Vikas Saxena JUDICIAL MEMBER PRESENT: Dated : 10 Aug 2022 Final Order / Judgement (सुरक्षित) राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग , उ0प्र0 , लखनऊ अपील सं0- 2040/2015 (जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बागपत द्वारा परिवाद सं0- 12/2015 में पारित निर्णय एवं दिनांक 01.09.2015 के विरुद्ध) Darshanpal S/o Sri Leelu Singh, Village-Naurojpur, Tehsil Baghpat, District- Baghpat. ........Appellant Versus Manager, National Insurance Co. Ltd., Baraut, Tehsil-Baraut, District-Baghpat. ......Respondent समक्ष:- माननीय श्री सुशील कुमार, सदस्य। माननीय श्री विकास सक्सेना, सदस्य। अपीलार्थी की ओर से : श्री एच0के0 श्रीवास्तव, विद्वान अधिवक्ता। प्रत्यर्थी की ओर से : श्री आशीष कुमार श्रीवास्तव, विद्वान अधिवक्ता। दिनांक:- 23.08.2022 माननीय श्री सुशील कुमार , सदस्य द्वारा उद्घोषित निर्णय 1.
परिवाद सं0- 12/2015 दर्शनपाल बनाम मैनेजर नेशनल इंश्योरेंस कं0लि0 में जिला उपभोक्ता आयोग, बागपत द्वारा पारित निर्णय एवं आदेश दि0 01.09.2015 के विरुद्ध यह अपील धारा 15 उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत राज्य आयोग के समक्ष प्रस्तुत की गई है। अंकन 3,00,000/-रू0 की क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिए प्रस्तुत किया गया परिवाद विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग, बागपत द्वारा इस आधार खारिज कर दिया गया कि गाड़ी के गुम होने में स्वयं अपीलार्थी/परिवादी की लापरवाही है। प्रत्यर्थी/विपक्षी बीमा कम्पनी द्वारा सेवा में कोई कमी नहीं की गई है।
2. प्रश्नगत निर्णय व आदेश को इन आधारों पर चुनौती दी गई है कि विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने विधि विरुद्ध एवं मनमाना निर्णय पारित किया है। प्रत्यर्थी/विपक्षी बीमा कम्पनी द्वारा जो दस्तावेज मांगे गए वे उपलब्ध करा दिए गए थे। चाभी अभी भी अपीलार्थी/परिवादी के पास मौजूद है, जिसे मंच के सामने प्रस्तुत कर सकता है। चाभी प्रस्तुत न करने के कारण परिवाद खारिज करना विधि विरुद्ध है। प्रत्यर्थी/विपक्षी बीमा कम्पनी ने दो स्टाम्प पेपर हस्ताक्षर युक्त प्राप्त कर लिए थे जिनका दुरुपयोग बीमा कम्पनी द्वारा किया गया। चोरी की सूचना दि0 29.03.2003 को थाने पर दे दी गई थी। 14 दिन के बाद सूचना देने का कथन विधि विरुद्ध है। इसलिए विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा पारित निर्णय व आदेश अपास्त होने योग्य है।
3. हमने अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता श्री एच0के0 श्रीवास्तव तथा प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्ता श्री आशीष कुमार श्रीवास्तव को सुना। प्रश्नगत निर्णय व आदेश तथा पत्रावली पर उपलब्ध अभिलेखों का सम्यक परिशीलन किया।
4. अपीलार्थी/परिवादी के कथनानुसार दि0 28.03.2013 को वाहन सं0- यू0पी0 12 एच0-3124 खिंदोड़ा के जंगल से चोरी हो गई थी जिसकी सूचना दि0 29.03.2013 को दी गई थी, परन्तु पुलिस द्वारा समय पर मुकदमा दर्ज नहीं किया गया और मुकदमा दि0 12.04.2013 को दर्ज किया गया। अपीलार्थी/परिवादी के विद्वान अधिवक्ता का यह तर्क है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में अपीलार्थी/परिवादी के स्तर से कोई देरी नहीं हुई है जो भी देरी कारित हुई है वह पुलिस द्वारा की गई कर्तव्यहीनता के कारण हुई है। अपीलार्थी/परिवादी के ज्ञापन के साथ थाना प्रभारी सिंघावली, जनपद बागपत को दि0 29.03.2013 को दी गई सूचना की प्रति संलग्न की गई है। इस दस्तावेज पर थाने की मुहर अंकित है तथा सूचना प्राप्त करने वाले पुलिसकर्मी के हस्ताक्षर मौजूद हैं। अत: अपीलार्थी/परिवादी के इस तर्क में पर्याप्त बल है कि वाहन चोरी होने के तुरंत पश्चात यानि दि0 29.03.2013 को थाना प्रभारी को सूचना दे दी गई, परन्तु थाना प्रभारी द्वारा सूचना दर्ज नहीं की गई। इसलिए दि0 30.03.2013 को पुलिस अधीक्षक, बागपत को पंजीकृत डाक के माध्यम से जो दस्तावेज सं0- 29 पर चस्पा है सूचना दी गई। धारा 156(3)आई0पी0सी0 के अंतर्गत प्रस्तुत किए गए आवेदन पर आदेश होने के पश्चात दि0 12.04.2013 को मुकदमा दर्ज हुआ। अत: इस देरी में अपीलार्थी/परिवादी का कोई रोल नहीं है। यर्थाथ में थाना प्रभारी द्वारा सूचना के बावजूद मुकदमा दर्ज नहीं किया गया और वाहन को खोजने का प्रयास नहीं किया गया। अत: इस त्रुटि के लिए बीमाधारक अपीलार्थी/परिवादी को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।
5. विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने अपने निर्णय में यह कथन किया है कि वाहन का प्रयोग बगैर चाभी के किया जा रहा है जो एक लापरवाही है और पालिसी की शर्तों का उल्लंघन है तथा यह भी निष्कर्ष दिया गया कि बीमा कम्पनी को सूचना देरी से दी गई है, इसलिए बीमा पालिसी की शर्त का उल्लंघन है। यर्थाथ में बीमा कम्पनी को देरी से सूचना देने का विपरीत प्रभाव नहीं है, बल्कि केवल वैधानिक बाध्यता यह है कि चोरी होने के तुरंत बाद पुलिस को सूचना दी जानी चाहिए, ताकि पुलिस द्वारा चोरी गए वाहन को खोजने का प्रयास किया जा सके।
6. विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने यह भी निष्कर्ष दिया कि जिस समय गाड़ी को स्टार्ट किया गया उस समय गाड़ी में क्लीनर व दो व्यक्ति मौजूद थे। इसलिए यथार्थ में गाड़ी को लूटा गया है और गाड़ी की चोरी नहीं हुई है। इसलिए बीमा पालिसी के अनुसार बीमादावा देय नहीं है। विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग ने अपने निष्कर्ष में यह भी अंकित किया है कि अपीलार्थी/परिवादी का यह कथन है कि गाड़ी में क्लीनर सोया हुआ था यदि वाहन को ले जाने वाले व्यक्ति द्वारा बल का प्रयोग नहीं किया गया है तब लूट नहीं कहा जा सकता। यदि वाहन में व्यक्ति सो रहा है और उसे दूसरा व्यक्ति लूट कर ले जाए तब इसे चोरी कहा जा सकता है। अत: विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा पारित निर्णय व आदेश अपास्त होने योग्य है। अब इस बिन्दु पर विचार किया जा रहा है कि अपीलार्थी/परिवादी किस धनराशि को प्राप्त करने के लिए अधिकृत है। यह सही है कि गाड़ी की चाभी उपलब्ध कराने का तथ्य साबित नहीं है, इसलिए अपीलार्थी/परिवादी के स्तर से लापरवाही कारित करना माना जा सकता है। तदनुसार बीमित धन में से 25 प्रतिशत की कटौती की जा सकती है। बीमा पालिसी अंकन 3,00,000/-रू0 के लिए की गई है, अत: इस राशि में 75,000/-रू0 की कटौती करते हुए शेष 2,25,000/-रू0 बीमित धन का आदेश दिया जाना उचित है। तदनुसार अपील स्वीकार होने योग्य है।
आदेश
7. अपील स्वीकार की जाती है। विद्वान जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा पारित प्रश्नगत निर्णय व आदेश अपास्त किया जाता है। परिवाद इस प्रकार स्वीकार किया जाता है कि अपीलार्थी/परिवादी बीमा कम्पनी से वाहन चोरी होने के कारण अंकन 2,25,000/-रू0 बीमा क्लेम प्राप्त करने के लिए अधिकृत है। अपीलार्थी/परिवादी इस राशि पर परिवाद प्रस्तुत करने की तिथि से अदायगी की तिथि तक 06 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी प्रत्यर्थी/विपक्षी से प्राप्त करने के लिए अधिकृत है। अत: प्रत्यर्थी/विपक्षी 03 माह के अन्दर इस राशि को अदा करे।
अपीलार्थी/परिवादी परिवाद एवं अपील व्यय के रूप में 5,000/-रू0 भी प्रत्यर्थी/विपक्षी से प्राप्त करने के लिए अधिकृत है।
आशुलिपिक से अपेक्षा की जाती है कि वह इस निर्णय व आदेश को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दें।
(विकास सक्सेना) (सुशील कुमार) सदस्य सदस्य शेर सिंह, आशु0, कोर्ट नं0-2 [HON'BLE MR. SUSHIL KUMAR] PRESIDING MEMBER [HON'BLE MR. Vikas Saxena] JUDICIAL MEMBER