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Lok Sabha Debates

Discussion Regarding Price Rise. on 25 February, 2010

> Title: Discussion regarding price rise.

श्रीमती सुषमा स्वराज (विदिशा):अध्यक्ष महोदया, काफी उठा-पटक के बाद आज महंगाई पर चर्चा प्रारम्भ हो रही है। हम लोग यह चाहते थे कि कार्य-स्थगन प्रस्ताव के तहत यह चर्चा होती, लेकिन आपने हमारा कार्य-स्थगन प्रस्ताव खारिज कर दिया, परन्तु प्रश्न-काल स्थगित करने का अनुरोध स्वीकार कर लिया। इसलिए मैं आपकी अनुमति से यह चर्चा प्रारम्भ करती हूं।

          अध्यक्षा जी, पिछले पांच वर्षों में आज नौवीं बार, महंगाई पर चर्चा हो रही है। मई 2004 में यू.पी.ए. की सरकार सत्ता में आई थी और मई 2004 के बाद, दिसम्बर 2004 में ही महंगाई पर पहली चर्चा हो गई और तब से लेकर वर्ष 2004, 2005, 2006, 2007 और वर्ष 2008 में लगातार यह चर्चा होती रही। वर्ष 2006 में तो तीन बार चर्चा हुई। मैं सारी तिथियां निकाल कर लाई हूं। दिनांक 9-12-2004 को चर्चा हुई, 16-08-2005 को चर्चा हुई, 2006 में 22 मई को चर्चा हुई, 27 जुलाई को चर्चा हुई और 30 नवम्बर को चर्चा हुई। एक साल में तीन बार। 15 मई, 2007 को चर्चा हुई, 16-04-2008 को चर्चा हुई और 15वीं लोक सभा आने के बाद भी 3 अगस्त, 2009 को चर्चा हुई और अब यह नौवीं बार चर्चा हो रही है।

          अध्यक्ष महोदया, यह केवल उन चर्चाओं के आंकड़े हैं, जो स्ट्रक्चर्ड 193 के तहत हुई हैं। इसके अलावा, कॉलिंग-अटेंशन यानी ध्यानाकर्षण के माध्यम से उठाई गईं, स्पैशल मैंशन के माध्यम से उठाई गईं, उनमें से मैंने किसी को इसमें शामिल नहीं किया है। ये केवल 193 के नोटिसेस के तहत चर्चाएं हुईं हैं, उन चर्चाओं का जिक्र मैं कर रही हूं, लेकिन इन चर्चाओं का नतीजा क्या हुआ-   “ मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की।”           महोदया, मैं कल के आंकड़े लेकर आई हूं। हर छः महीने बाद, सांसद इन्हें चेताते रहे, हर छः महीने के बाद सांसद महंगाई के बारे में अपनी व्यथ-कथा यहां कहते रहे, लेकिन दाम आसमान छूते रहे। मैं कल के बाजार भावों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहती हूं। उस दिन भाई मुलायम सिंह यादव कह रहे थे कि प्रतिशत में मत बोलो कि 20 प्रतिशत महंगाई बढ़ गई या 10 प्रतिशत महंगाई बढ़ गई, क्योंकि कोई समझेगा नहीं। कौन सी चीज कितने में मिल रही है, यह बताओ। ठेठ शुद्ध भाषा में, देहाती भाषा में ये आंकड़े मैं लेकर आई हूं। इन्हें मैं आपके माध्यम से सदन में रखना चाहती हूं। आटा 20 रुपए किलो, चावल 25 रु. किलो, अरहर दाल 90 रु. किलो, मूंग छिलका 85 रु. किलो, मूंग साबुत 87 रु. किलो, मूंग धुली 90 रु. किलो, उड़द दाल 84 रु. किलो, सरसों का तेल 87 रु. किलो, चाय पत्ती 270 रु. किलो, चीनी 42 रु. किलो, नमक 12 रु. किलो, हल्दी 140 रु. किलो, लाल मिर्च 205 रु. किलो, धनिया 200 रु. किलो, जीरा 200 रु. किलो, प्याज 20 रु. किलो, मटर 20 रु. प्रति किलो, बीन्स 40 रु. किलो, भिंडी 30 रु. किलो, घीया 40 रु. किलो, बैंगन 30 रु. किलो और अदरक 80 रु. किलो।

          अध्यक्ष महोदया, मैं बताना चाहती हूं कि मैंने किन चीजों के दाम आपके सामने रखे हैं, ये शुद्ध रूप से केवल वे चीजें हैं, जिन्हें गरीब खाता ही खाता है। मैंने दाम रखे हैं आटे और चावल के, मैंने दाम बताए हैं दालों और मसालों के, मैंने दाम गिनाए हैं तेल और सब्जियों के और मैंने दाम गिनाए हैं चाय पत्ती और चीनी के। इनमें एक भी चीज ऐसी नहीं है जो अमीर की डाइनिंग टेबल पर सजती हो। दूध, फल मक्खन आदि किसी का इसमें नाम नहीं है। ये उन चीजों के दाम हैं, कम से कम जिन्हें खाने का हक गरीब को मिलना चाहिए। दो समय की रोटी, रोटी या चावल के साथ, एक दाल या एक सब्जी के साथ खाने का हक तो है और दो समय की चाय, चीनी डालकर। रोटी या चावल, एक दाल या एक सब्जी से खाने के लिए आटा चाहिए, चावल चाहिए, दाल चाहिए, मसाले चाहिए और तेल चाहिए और वह भी सरसों का, मैंने कोई देशी घी के दाम नहीं गिनाए हैं। दो समय की चाय, चाय पत्ती और चीनी के साथ।   उस चाय में भी दूध नहीं होगा, काली चाय है, लेकिन वह भी आज गवारा नहीं है।  ये दाम इस चीज को बताते हैं कि दो समय की रोटी, एक दाल या एक सब्जी के साथ या दो समय की काली चाय चीनी के साथ आज गरीब को नसीब नहीं है।  इन दामों के साथ अगर नसीब हो सकती हो तो आप मुझे बता दीजिए।

          अध्यक्षा जी, मुझे दुख हुआ जब मैंने महामहिम राष्ट्रपति का अभिभाषण पढ़ते हुए उन्हें सुना।  उन्होंने कीमतों पर दबाव की बात तो की, लेकिन उससे पहले एक वाक्य से सरकार ने अपनी पीठ यह कहकर थपथपायी कि हम अपनी खाद्य सुरक्षा को किसी भी प्रकार के संकट से मुक्त रखने में समर्थ रहे हैं।  ...( व्यवधान)  यह राष्ट्रपति जी ने कहा है।  राष्ट्रपति जी ने कहा है कि हम किसी भी प्रकार के संकट से अपनी खाद्य सुरक्षा को मुक्त रखने में समर्थ रहे हैं।  पूरे देश के गरीब पर संकट गहराया हुआ है।  उसकी खाने की थाली पर संकट है, उसके दो समय के भोजन पर संकट है, लेकिन सरकार इन सबसे बेखबर अपनी पीठ थपथपाकर कह रही है कि हम खाद्य सुरक्षा को किसी भी तरह के संकट से मुक्त रखने में समर्थ रहे हैं।  

          अध्यक्षा जी, ऐसा कहते हैं कि किसी भी रोग का इलाज करने से पहले सबसे ज्यादा जरूरी है, उसका सही परीक्षण होना, उसका सही डायग्नोसिस होना।  अगर डायग्नोस सही कर लिया जाए तो इलाज की दिशा तय हो सकती है, लेकिन जिस सरकार का आकलन अपने बारे में यह है कि खाद्य सुरक्षा पर कोई संकट ही नहीं है, तो वह इलाज क्या करेगी?  कीमतों पर दबाव की जो बात उन्होंने की है, उसके चार कारण गिनाए हैं - पहला कारण घरेलू उत्पादन में कमी, दूसरा कारण विश्व स्तर पर चावल, दाल और तेल के बढ़े हुए मूल्यों के कारण कीमतों में बढ़ोत्तरी होना अपरिहार्य, तीसरा कारण किसानों को खरीद कीमतों का अधिक भुगतान और चौथा कारण ग्रामीण क्षेत्रों की आय में वृद्धि।  ये चार कारण गिनाए हैं और मैं आपके सामने बताना चाहती हूं कि ये चारों कारण निराधार है, सत्य से परे हैं।  ये कैसे सत्य से परे हैं, मैं आपके सामने यह बताना चाहती हूं।

          पहला कारण कहते हैं कि घरेलू उत्पादन में कमी है।  मेरे पास कृषि मंत्री जी का बयान है, जो उन्होंने इकॉनामिक एडीटर्स काफ्रेंस में वर्ष 2008-09 में बोलते हुए कहा था।

 “As you know, the year 2008-2009 was a very good year for agriculture with an all-time high production of 233.38 million tones of food grains …”             वर्ष 2008-09 में कृषि मंत्री ने यह कहकर अपनी पीठ थपथपायी थी।  उन्होंने आर्थिक संवाददाताओं के सम्मेलन में बोलते हुए कहा था कि देश में खाद्यान्न का रिकार्ड उत्पादन हुआ है।  233.38 यानी लगभग 234 मिलियन टन खाद्यान्न देश में पैदा हुआ, यह स्वयं कृषि मंत्री जी ने आर्थिक संवाददाताओं को बताया।  जहां तक वर्ष 2009-10 का सवाल है, पी.आई.बी. ने अभी यह आंकड़ा रिलीज किया है।  यह पी.आई.बी. की रिलीज है जिसमें उन्होंने सेकेंड एडवांस एस्टीमेट देते हुए बताया है कि 216.85 यानी लगभग 217 मिलियन टन खाद्यान्न इस साल पैदा होने वाला है। मैं आपसे पूछना चाहती हूं कि जब 233 मिलियन टन रिकार्ड प्रोडक्शन होता है, तो 216 मिलियन टन सामान्य से थोड़ा ही तो कम होगा।  अगर 233 मिलियन टन आल टाइम हाई है, तो 217 मिलियन टन सामान्य से थोड़ा ही तो कम है।  

          अध्यक्षा जी, मैं आपको बताना चाहती हूं कि हमारे समय में चालीस मिलियन टन अनाज कम पैदा हुआ था।  आप एक सूखे की ओट में पूरी जिम्मेदारी से बरी हो जाना चाहते हैं, हर समय सूखे की दुहाई देते हैं।  अध्यक्ष जी, हमने चार-चार प्राकृतिक आपदायें झेली थीं।  हमने उड़ीसा के झंझावात का सामना किया था, हमने गुजरात के भूकंप का सामना किया था, हमने प्रलयंकारी बाढ़ का सामना किया था, हमने भीषण सुखाड़ का सामना किया था।  तब चालीस मिलियन टन अनाज कम पैदा हुआ था, लेकिन बाजार में एक रूपया भी दाम नहीं बढ़ने दिया था। हमने क्या किया था, हमने गोदामों के ताले खोल दिए थे।  हमने अनाज के बदले काम का कार्यक्रम प्रारंभ किया था।  राज्य सरकारों को कहा था कि मुफ्त अनाज देंगे, आप अनाज के बदले काम प्रारंभ करिए, लेकिन लोगों को भूखा मत मरने दीजिए।   हमने गोदामों के ताले खोले थे।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप लोग बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Please take your seat. Please sit down.

… (Interruptions)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्री हरिन पाठक (अहमदाबाद पूर्व): मैं माननीय शरद जी से कहूंगा कि 90 करोड़ लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ मत कीजिए।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइए। उन्हें बोलने दीजिए।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record, except the speech of Shrimati Sushma Swaraj.

 (Interruptions) … * श्रीमती सुषमा स्वराज :वे तमाम लोग जो गेहूं से आटा, मैदा, सूजी बनाते थे, हम लोगों ने उन्हें सस्ते दाम पर अनाज बेचा था और अन्त्योदय के साथ एक नई अन्नपूर्णा योजना शुरू की थी जिसमें 10 किलोग्राम से कोटा बढ़ाकर 35 किलोग्राम कर दिया था और दाम 2 रुपये और 3 रुपये किलो कर दिए थे। यही कारण है कि हमारा भी छ: वर्ष का शासनकाल था, लेकिन केवल एक बार प्राइस राइज़ पर चर्चा हुई थी। मैं आंकड़ा लेकर आई हूं। 27.04.2000 को सोनिया जी का नोटिस था। यह उस समय स्वयं नेता, प्रतिपक्ष थीं। लेकिन एक बार भी ऐसी स्थिति पैदा नहीं हुई कि इन्हें नोटिस देकर यह कहना पड़े कि हम कीमतों की वृद्धि पर चर्चा करना चाहते हैं, मूल्य वृद्धि पर चर्चा करना चाहते हैं, महंगाई पर चर्चा करना चाहते हैं। 27.04.2000 को एक नोटिस था जिसके ऊपर चर्चा हुई और वह भी खाद्यान की कीमतों पर नहीं था, डीजल और पैट्रोल की कीमतें बढ़ी थीं, तब चर्चा हुई थी। छ: वर्ष में एक बार प्राइस राइज़ पर डिस्कशन और पांच वर्ष में नौ बार, यह अपने आपमें एक तुलना बताती है।...( व्यवधान)

 

THE MINISTER OF PARLIAMENTARY AFFAIRS AND MINISTER OF WATER RESOURCES (SHRI PAWAN KUMAR BANSAL): The facts are not correct.

श्रीमती सुषमा स्वराज :क्यों? क्योंकि दाम घटाओ और कोटा बढ़ाओ।...( व्यवधान)

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PLANNING AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI V. NARAYANASAMY): You have no other issue. You have only one issue.

श्री हरिन पाठक : भगवान से डरो, गरीबों से डरो।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Please sit down.

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : शाहनवाज़ जी, आप बैठ जाइए।

                              …( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Please sit down.

…( व्यवधान)

श्री हरिन पाठक : करोड़ों लोग मर रहे हैं।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप अपने नेता को बोलने दीजिए।

…( व्यवधान)

श्रीमती सुषमा स्वराज :महोदया, मैं चाहूंगी कि यह विषय जितना गंभीर और संवेदनशील है, कम से कम हम उतनी ही शाइस्तगी से इस विषय पर चर्चा करें और सुनें। वह शायद उन गरीबों के प्रति एक हमदर्दाना व्यवहार होगा। जो व्यवहार हो रहा है, वह उनके प्रति हमदर्दी नहीं दिखा रहा है। इसलिए मैं आपका संरक्षण चाहूंगी कि इस चर्चा को हम शान्ति और गंभीरता से होने दें। जो गंभीरता इसमें अपेक्षित है, वह  गंभीरता सदन में झलके तो उसे और कोई राहत मिले न मिले, इतनी राहत जरूर मिलेगी कि उसका दर्द यहां कह दिया गया है, उसकी व्यथा यहां बता दी गई है।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्रीमती सुषमा स्वराज :मैं कह रही थी कि दाम घटाओ और कोटा बढ़ाओ, यह हमारा प्रबंधन था, इसलिए कभी प्राइस राइज़ पर चर्चा नहीं हुई और दाम बढ़ाओ और कोटा घटाओ, यह इनका प्रबंधन है, इसलिए नौ-नौ बार चर्चा हुई।...( व्यवधान) यह आंकड़े देकर मैंने आपको बताया कि पहला कारण जो बताया गया कि घरेलू उत्पादन में कमी के कारण महंगाई बढ़ रही है, वह कारण सच नहीं है।

 दूसरा कारण आपने यह कहा कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार  में दाल, चावल और तेल के भाव बढ़ गये, इस कारण महंगाई बढ़ गयी।

          अध्यक्षा जी, मैं यहां फ्यूचर ट्रेड्स, अमेरिका के आंकड़े लेकर आयी हूं।  मैंने ये आंकड़े नेट से निकाले हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बुशल के तौर पर मात्रा तय की जाती है और डॉलर की करेंसी में दाम तय किया जाता है। मैंने अपने देशवासियों को समझाने के लिए बुशल को किलोग्राम में परिवर्तित किया और डॉलर को रुपयों में परिवर्तित किया। डॉलर का रेट कल 46.2 रुपये था और उसी दर से इसको परिवर्तित किया।  मैं आपको अंतर्राष्ट्रीय बाजार के भाव बताती हूं। गेहूं, दिसम्बर 2008 में 11 रुपये प्रति किलो था और फरवरी 2010 में घटकर  8 रुपये 51 पैसा रह गया। ...( व्यवधान) चावल, जनवरी 2008 में 14 रुपये 59 पैसे था और फरवरी 2010  में 14 रुपये 45 पैसे, यह बढ़ा नहीं, बल्कि 14 पैसे घटा। मक्का,  जून 2008 में 12 रुपये 16 पैसे प्रति किलो थी और फरवरी 2010 में 6 रुपये 71 पैसे प्रति किलो बिकी। सोयाबीन का तेल, फरवरी 2008 में 69 रुपये प्रति किलो था और फरवरी 2010 में 37 रुपये प्रति किलो है। यह अंतर्राष्ट्रीय बाजार के दाम हैं, जो मैंने आपके सामने रखे हैं, इसलिए यह कहना ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :   आप शांत रहिये।  आप बीच में मत बोलिये।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  आप बीच में मत बोलिये। आप इस तरह बात मत कीजिए। आप बैठ जाइये और शांत रहिये।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record.

(Interruptions) …* MADAM SPEAKER: Please take your seat. Sit down please.

… (Interruptions)

श्रीमती सुषमा स्वराज :   अध्यक्षा जी, दूसरा जो कारण बताया गया  कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में दाम गिरे, तो वह भी सच नहीं है। तीसरा कारण यह बताया गया कि किसानों को समर्थन मूल्य अधिक दिया। अब क्या समर्थन मूल्य अधिक दिया? वर्ष 2007-08 में साढ़े आठ रुपये प्रति किलो और वर्ष 2008-09 में दस रुपये प्रति किलो और वर्ष 2009-10 में  दस रुपये अस्सी पैसे प्रति किलो समर्थन मूल्य दिया गया। क्यों शरद भाऊ यही आंकड़े हैं--प्रति क्विंटल साढ़े आठ सौ रुपये फिर एक हजार रुपये प्रति क्विंटल और फिर  एक हजार अस्सी रुपये प्रति क्विंटल? लेकिन उपभोक्ताओं को किस भाव में खिलाया? जब साढ़े आठ रुपये समर्थन मूल्य था, तो आटा 15 रुपये प्रति किलो बिका। जब 10 रुपये समर्थन मूल्य था, तो आटा 17 रुपये किलो बिका। जब 10 रुपये 80 पैसे प्रति किलो का समर्थन मूल्य था, तो  आटा 20 रुपये किलो बिका। आप कह रहे हैं कि समर्थन मूल्य के कारण महंगाई बढ़ी। अगर समर्थन मूल्य से डेढ़ या दो रुपये ज्यादा पर चीज बिकती, तो मैं आपके इस तर्क को मान लेती कि आपने साढ़े आठ रुपये किसान को दिये, इसलिए वह 11 रुपये बिकना ही  था। लेकिन दूर-दूर तक कोई रिश्ता किसानो को दिये हुए समर्थन मूल्य और बाजार में बिकने वाले दाम का नहीं है।

          अध्यक्षा जी, मैं आपसे कहना चाहती हूं कि हमारे संविधान निर्माताओं ने हमारे यहां कल्याणकारी राज्य की स्थापना की है और कल्याणकारी राज्य का मतलब था कि किसानों से महंगा खरीदो और उपभोक्ता को सस्ता खिलाओ और बीच का अनुदान दो। उसे कल्याणकारी राज्य कहते है, लेकिन हम किसानों को लाभकारी मूल्य नहीं देते और उपभोक्ता को महंगा खिलाने की मार मार रहे हैं और आप कह रहे हैं कि किसानों के समर्थन मूल्य के कारण महंगाई बढ़ी है।

          शरद भाऊ, जहां तक किसान का सवाल है, तो आप एक हाथ से देते हैं और दूसरे हाथ से ले लेते हैं। अगर आपने किसानों का समर्थन मूल्य साढ़े आठ से दस रुपये अस्सी पैसे किया, तो अभी चार दिन पहले आपने पच्चीस रूपया प्रति बोरा यूरिया का दाम बढ़ाकर उसके दूसरे हाथ से पैसा लेने का काम किया है। ...( व्यवधान) किसान के द्वारा खरीद की जाने वाली हर वस्तु, हर उपकरण महंगा है। वह एक चीज बेचता है, लेकिन बाकी सारी चीजें खरीदता है। अगर गेहूं का उत्पादन करता है, तो गेहूं बेचता है। चावल उत्पादन करता है, तो चावल बेचता है, लेकिन बाकी सारी चीजें--दालें, चाय, चीनी आदि सारी चीजें खरीदता है या नहीं? किसानों के समर्थन मूल्य और उपभोक्ताओं के ऊपर पड़ने वाली मार में किसी तरह का कोई रिश्ता नहीं है, इसलिए आपका यह तर्क भी सही नहीं है कि किसानों के समर्थन मूल्य के कारण दाम बढ़े हैं।

चौथा कारण आपने बताया है कि गरीबों की आय में वृद्धि हुई हैं क्योंकि ग्रामीण विकास कार्यक्रम तेजी से चल रहे हैं। मैं ग्रामीण विकास कार्यक्रमों की चर्चा यहां विस्तार से नहीं करना चाहती हूं क्योंकि उससे विषयांतर हो जाएगा, लेकिन इतना जरूर कह सकती हूं, अभी पीछे से आवाज आई कि नरेगा तो अभी ठीक से शुरू भी नहीं हुआ है। ...( व्यवधान) नरेगा से छला हुआ मजदूर दोहरी मार सह रहा है - महंगाई की मार भी सह रहा है और भ्रष्टाचार की मार भी सह रहा है। गरीबों की कौन सी आय वृद्धि की बात आप कहते हैं? मैं कहती हूं कि अगर नरेगा पूरा चले, सही चले, एक भी पैसे का पिलफरेज न हो तो 100 दिन का कारोबार, 100 रूपए प्रतिदिन की बात आपने कही है। पूरे 100 दिन उसे रोजगार मिले, 100 रूपए प्रतिदिन पगार मिले, तो साल के 10,000 रूपए होते हैं यानी 850 रूपए प्रति महीना। 850 रूपए की आय को आप गाना गाकर, ढोल पीटकर कहते हैं कि गरीबों की आय में वृद्धि हो गयी? 850 रूपए की आय उसकी जेब में आएगी और वह भी तब आएगी अगर 100 दिन पूरा रोजगार मिले और 100 रूपए प्रतिदिन पगार मिले। हालात यह है कि जॉबकार्ड्स बने हैं, न 100 दिन का रोजगार मिल रहा है, न 100 रूपए पगार मिल रही है।  आप राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में कह रहे हैं ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप लोग बैठ जाइए।

श्री गणेश सिंह (सतना):उनको 30 रूपए रोज से ज्यादा मजदूरी नहीं मिलती है।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप क्यों खड़े हैं? आप बैठ जाइए।  

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप लोग बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : शांति बनाए रखिए। आप लोग शांत हो जाइए।

श्रीमती सुषमा स्वराज :अध्यक्षा जी, महंगाई बढ़ने के जो चार कारण राष्ट्रपति अभिभाषण में गिनाए गए हैं कि घरेलू उत्पादन में कमी हुई है, अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में दाम बढ़े हैं, किसानों को बेहतर समर्थन मूल्य मिला है, गरीबों की आय में वृद्धि हुई है, इसलिए महंगाई बढ़ी है, ये चारों कारण अनुचित हैं, चारों कारण निराधार हैं और ये चारों कारण असत्य हैं। महंगाई के कारण कौन से हैं, यह मैं बताती हूं। महंगाई के चार कारण हैं। इसे मैं आपके सामने बताती हूं कि वे चारों कारण घोटाले हैं, गेहूं घोटाला, चावल घोटाला, दाल घोटाला, चीनी घोटाला और इसीलिए इसे हम महंगाई नहीं, महंगाई का महाघोटाला कहते हैं। ...( व्यवधान)

          अध्यक्षा जी, मैंने घोटाला शब्द का प्रयोग पूरी जिम्मेदारी के साथ किया है। मैं एक-एक घोटाले के आंकड़े आपके सामने रखना चाहती हूं। जहां तक गेहूं आयात घोटाले का सवाल है, आपने वर्ष 2007-08 में गेहूं के लिए 8.50 रूपए समर्थन मूल्य दिया। शरद भाऊ मैं आपका ध्यान चाहूंगी। 8.50 रूपए समर्थन मूल्य दिया आपने, लेकिन उसी साल आपने गेहूं आयात किया 14.82 रूपए प्रति किलो के हिसाब से यानी हमारे यहां के किसान को 850 रूपए का दाम और विदेशी किसान को 1482 रूपए का दाम, 632 रूपए प्रति क्विंटल आपने ज्यादा दाम विदेश के किसानों को दिया। आपने गेहूं कौन सा मंगाया, ऐसा लाल गेहूं जो आदमी तो क्या जानवर भी खाने से मना कर दे। लाल रंग के गेहूं की रोटी जब थाली में रखी जाती थी, तो आदमी को भ्रम होता था कि शायद पत्नी ने गुड़ की रोटी बनाई है। वह बहुत खुशी-खुशी मुंह में डालता था और मुंह में डालते ही उसे इतनी बकबकी होती थी कि वह थूकता फिरता था। वह अपनी पत्नी से पूछता है कि यह कैसी रोटी है, तो वह कहती थी कि जैसा गेहूं मिला है, वैसे ही गेहूं की रोटी बनाई है। यह गेहूं 14 रुपए 82 पैसे प्रति किलोग्राम के हिसाब से आयात किया गया था।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record except what Sushma ji is saying.

(Interruptions) …* अध्यक्ष महोदया: आप बैठ जाएं।

]… (Interruptions)

अध्यक्ष महोदया: तूफानी सरोज जी आप बैठ जाएं। कृपया इन्हें बोलने दें।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing is going on record.

(Interruptions) … * श्रीमती सुषमा स्वराज : मैं अपने विपक्ष के साथियों से कहना चाहूंगी कि यह उनकी अपनी मानसिकता को दर्शाता है इसलिए आप चुप रहें। गरीब सुन रहा है कि यह नाटक उसके साथ ये रच रहे हैं या हम कर रहे हैं।

          अध्यक्षा जी, विदेश से 14 रुपए 82 पैसे प्रति किलोग्राम के हिसाब से लाल गेहूं मंगवाया और वहीं बस नहीं कर गए। शरद भाऊ यहां बैठे हैं। अगले साल फिर 19 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से दस लाख मीट्रिक टन गेंहू मंगाने का प्रस्ताव आया, लेकिन देश में किसानों का इतना बड़ा जन आंदोलन खड़ा हो गया कि इन्हें वह निर्णय रद्द करना पड़ा, वरना 19 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से फिर आयात हो रहा था। यह तो हुआ इस घोटाले का एक पहलू...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record.

(Interruptions) … *  श्रीमती सुषमा स्वराज : मैं अब इस घोटाले का दूसरा पहलू बताना चाहती हूं। घोटाले का दूसरा पहलू यह है कि सन् 2007-2008 में यह कह दिया गया कि गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध है, बैन कर दिया गया है।  Ostensibly it was banned. लेकिन आरटीआई के तहत एक क्वैरी लगी। उसमें एक व्यक्ति ने पूछा कि गेहूं का कोई निर्यात इन सालों में हुआ है तो उसका जवाब आया कि वर्ष 2007-2008 में भी निर्यात हुआ और वर्ष 2008-2009 में भी हुआ। इसी तरह वर्ष 2009-2010 में भी निर्यात हुआ। मैं अगर आपको बताऊं कि किस दाम पर निर्यात हुआ था, तो आप हैरान हो जाएंगे। आप 14 रुपए 82 पैसे प्रति किलोग्राम की दर से आयात करते हो, फिर 19 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से आयात करने का प्रस्ताव करते हो, लेकिन वर्ष 2007 में दस रुपए एक नए पैसे के हिसाब से निर्यात हुआ। इसी तरह वर्ष 2008-2009 में 13 रुपए दो नए पैसे के हिसाब से निर्यात हुआ। वर्ष 2009-2010 में जब हमारे देश में आटा 20 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिक रहा है, तो उसका 12 रुपए 51 पैसे के हिसाब से निर्यात हुआ। आप कहते हैं कि घोटाला नहीं है। अगर यह घोटाला नहीं है तो फिर क्या है? आपका अपना उपभोक्ता, भारतवासी, बाजार से 20 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से आटा खरीद रहा है और भारत की सरकार प्रतिबंध के बावजूद 12 रुपए 51 पैसे प्रति किलोग्राम के हिसाब से वर्ष 2009-2010 में निर्यात कर रही है। यह घोटाला नहीं तो और क्या है।

          अध्यक्ष महोदया, मैंने कहा था कि गेहूं के बाद चावल में भी घोटाला हुआ है। अब मैं चावल के निर्यात में जो घोटाला हुआ, वह बताती हूं। चावल को दो किस्मों बासमती और गैर बासमती में बांटा जाता है। तय किया गया कि वर्ष 2007-2008 में गैर बासमती चावल का निर्यात नहीं होगा।

क्योंकि दाम घरेलू बाजार में बढ़ रहे थे। अध्यक्ष महोदया, लोगों की आंखों में धूल झोंककर गैर-बासमती को बासमती बताकर निर्यात किया गया। यह पहला घोटाला था।

          दूसरा घोटाला, अफ्रीकी देशों की मदद करने के नाम पर गैर-बासमती चावल का निर्यात भी खोला गया और वह निर्यात सरकारी कंपनियों के द्वारा नहीं प्राइवेट व्यापारियों के द्वारा करवाया गया। मुझे कष्ट से कहना पड़ता है कि जिनकी मदद के लिए वह चावल निर्यात किया गया था, वह उन लोगों तक नहीं पहुंचा, बीच समुद्र में दूसरी तरफ सरका दिया गया, दूसरी तरफ चला गया। आपका अपना देश भूखा मर रहा, आपने अपने लोगों के मुंह का निवाला छीना और जिनकी मदद के लिए, जिनकी भूख मिटाने के लिए भेजा, उन तक पहुंचाया भी नहीं और बीच में ही लाभ बनाकर ले गये, प्रोफिट बनाकर ले गये। यह घोटाला नहीं तो क्या है?

          तीसरा घोटाला दालों का हुआ। ...( व्यवधान) अध्यक्षा जी, दालों का घोटाला तो त्रासदी से भरा हुआ है। घरेलू बाजार में दालों के भाव आसमान छू रहे थे। दाल 30 रुपया, 35 रुपया, 40 रुपया, 42 रुपया, 50 रुपया किलो हुई और अभी कल के दाम मैंने आपको बताए कि दाल 90 रुपया किलो है। दालों का आयात किया गया, आयात की छूट दी गयी लेकिन मुझे आपको बताते हुए दुख होता है कि आयात की हुई दालें बंदरगाह पर पड़ी रहीं, व्यापारियों ने वहां डैमरेज देना स्वीकार किया लेकिन दालों को बाजार में लाना इसलिए स्वीकार नहीं किया कि दाम और बढ़ने वाले हैं और वहां से तब उठाएंगे जब हमें इसके दाम का लाभ तिगुना-चौगुना मिलेगा। मुझे ज्यादा दुख इस बात का है कि इस आयात में स्टेट एजेंसियां एसटीसी, पीईसी, एनएसी, एमएमटीसी और नैफेड इस अपराध में शामिल थीं। उन दिनों   “ हैडलाइन्स टूडे”  ने एक स्टोरी की थी। उनकी एक खोजी टीम कोलकाता बंदरगाह पर पहुंची थी और सेंट्रल वेयरहाउसिंग कोरपोरेशन में लदी हुई बोरियां उन्होंने दिखाई थीं जबकि लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, उन्हें खाने के लिए दालें नहीं मिल रही है। गरीब की एक मात्र प्रोटीन दाल होती है लेकिन वह आयातित माल इस इंतजार में पड़ा हुआ था कि कब दाम बढ़ें और उन्हें बाजार में लाया जाए। यह दालों का घोटाला था।

          अध्यक्ष महोदया, चौथा घोटाला चीनी का है। चीनी का पूरा का पूरा कारोबार सरकार द्वारा नियंत्रित होता है। आप उनकी मुस्कराहट में गरीब का दर्द देखो। गरीब का बेरौनक चेहरा देखों, इन्हें मुस्कराने दो। यह मुस्कराते नहीं तो दाम बढ़ते क्यों? अध्यक्ष महोदया जी, चीनी की फैक्ट्रियां लगाने का लाइसेंस सरकार देती है, गन्ने की कीमत सरकार तय करती है, लेवी में जो चीनी ली जाती है उसका दाम तय करने के साथ-साथ सरकार उसे खरीदती भी है और चीनी के आयात-निर्यात की नीति भी सरकार तय करती है। इस पूरे का ज्ञान माननीय शरद भाऊ से ज्यादा किसी को नहीं है, वे चीनी साम्राज्य के मालिक हैं, वे देश के चीनी सम्राट हैं। मैं माननीय शरद भाऊ जी से पूछना चाहती हूं कि आपको मालूम है कि चीनी के उत्पादन का साईकल तीन वर्ष का होता है। वर्ष 2006-2007 में इस देश में चीनी का रिकार्ड उत्पादन 28.3 मिलियन मीट्रिक टन हुआ।

चीनी का रिकार्ड उत्पादन हुआ और चीनी के दाम कम हुए, तो गन्ना किसानों को कम लाभ मिला। इसका नतीजा यह हो सकता था कि गन्ना किसान अगले वर्ष गन्ने की जगह कुछ और बोए। वैसे भी जब चीनी की इतनी बहुतायत हो गई, तो कोई भी दूरदर्शी कृषि मंत्री यह कहता कि मैं बफर स्टाक जमा कर लूं, क्योंकि कल को अगर चीनी की देश में कमी होगी, तो बफर स्टाक से निकाल कर दे दूंगा। लेकिन बफर स्टाक नहीं बनाया और चीनी को निर्यात करने की छूट दे दी। इतना निर्यात हुआ कि देश में ही चीनी की कमी हो गई। जब देश के लोग त्राहि-त्राहि करने लगे कि चीनी के दाम बढ़ रहे हैं, तो ओजीएल पर उन्हीं कम्पनियों को आयात करने की छूट दे दी। जब निर्यात किया तो निर्यात करते समय उन्हें अपनी तरफ से सरकारी खजाने से एक्सपोर्ट असिसटेंस भी दी कि निर्यात करो और ट्रंसपोर्टेशन और हैंडलिंग के हम कुछ पैसा दे देते हैं, वह भी ले लो। जब घर में कोहराम मचा तो कहा कि अब चीनी का आयात कर लो। मैं आपको बताना चाहती हूं कि ओजीएल के तहत फिर आयात शुल्क की छूट दे दी कि डय़ूटी फ्री इम्पोर्ट कर लो। ऐसा चीनी मिल मालिकों को भी कहा, प्राइवेट व्यापारियों को भी कहा और स्टेट एजेंसियों को भी कहा।

          अध्यक्ष महोदया, मैं बताना चाहती हूं कि एक ही समय में देश में चीनी का आयात भी हो रहा था और निर्यात भी हो रहा था। एक समय ऐसा भी आया, वह दृश्य देखने लायक था कि कांदला बंदरगाह पर दो जहाज एक साथ खड़े थे। एक जहाज चीनी ले कर आया था और दूसरा जहाज चीनी ले कर जा रहा था। महोदया, आप आंकड़ों को सुनकर हैरान होंगी कि जो चीनी बेची जा रही थी, वह साढ़े बारह किलो के हिसाब से बेची जा रही थी और जो चीनी खरीदी जा रही थी, वह छत्तीस रुपए प्रति किलो की दर से खरीदी जा रही थी। अगर ये आंकड़े गलत हैं, तो शरद भाऊ बता दें। एक ही समय पर चीनी का निर्यात और आयात जारी था। आप जानती हैं कि इसका क्या परिणाम हुआ, इसका परिणाम यह हुआ कि 33 चीनी मिलें, जो स्टाक एक्सचेंज में लिस्टेड हैं, जिनका लाभांश त्रैमासिक तौर पर तय किया जाता है, उन 33 कम्पनियों का लाभ अक्टूबर से दिसम्बर, 2008 में कुल मिला कर 30 करोड़ रुपए था, जो अक्टूबर से दिसम्बर, 2009 में बढ़ कर, आप अनुमान लगाइए कि कितना हो सकता है, वह प्रोफिट 30 करोड़ से बढ़ कर 901 करोड़ रुपए हो गया। अगर आप प्रतिशत लगाओ तो 2900 प्रतिशत उनका मुनाफा बढ़ गया। देहाती भाषा में सौ कम तीन हजार प्रतिशत उनका मुनाफा बढ़ गया। इसीलिए अध्यक्ष महोदया मैं आपसे कहना चाहती हूं कि चीनी भले ही मेरे और आपके लिए कड़वी हो, चीनी भले ही गरीब की चाय से गायब हो गई हो, लेकिन उन चंद चीनी मिल मालिकों ने अपने वारे न्यारे कर लिए और सात पुश्तों का पैसा जमा कर लिया। उस मुनाफे में किसका कितना हिस्सा है, यह मुझे नहीं मालूम है, मैंने इसकी खोज नहीं की है, लेकिन मैं आपसे कहना चाहती हूं कि इसकी खोज होनी चाहिए।

          ये चार घोटाले मैंने आपके सामने रखे हैं और चारों ऐसी चीजें हैं, जो गरीब की थाली से गायब हैं। आटा, दाल, चावल, चीनी, इन चारों चीजों के घोटाले मैंने आपके सामने रखे हैं। मैं आपसे मांग करती हूं कि एक संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया जाना चाहिए, जो इन चारों घोटालों का पर्दाफाश करे और बताए कि यह आयात और निर्यात जो बार-बार खुल रहे थे, आखिरकार इसके पीछे मामला क्या था।

ये कहेंगे डॉयलाग और नाटक की बात कहते हैं। मैं आपको बताना चाहती हूं कि एक फिल्म में किसी ने धर्मेन्द्र से पूछा कि आप क्या काम करते हो, उन्होंने कहा - इधर का माल उधर करता हूं और उधर का माल इधर करता हूं। अगर सच पूछें तो महंगाई केवल इस कारण से हुई है कि सरकार इधर का माल उधर कर रही है और उधर का माल इधर कर रही है। जब इधर फायदा होता है तो आयात खोल देती है और जब उधर फायदा होता है तो निर्यात खोल देती है। मेरी मांग है कि इधर-उधर करने की जांच होनी चाहिए। मैं आपके माध्यम से मांग करती हूं कि जेपीसी गठित हो ताकि मैंने जो चार घोटाले सामने रखे हैं, वह इनका पर्दाफाश करे। यह कमेटी सब लोगों के सामने लाए कि महंगाई के क्या कारण हैं, वे चार कारण नहीं हैं या ये चार कारण हैं।

          महोदया, अब मैं खाद्य सुरक्षा की पोल खोलना चाहती हूं। राष्ट्रपति अभिभाषण में महामहिम राष्ट्रपति से कहलवाया गया कि हम अपनी खाद्य सुरक्षा को दीर्घावधि के लिए सुनिश्चित तब कर पाएंगे जब कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए सतत प्रयास करेंगे। इसके नीचे लिखा था कि हमारी सरकार खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाने के लिए कृतसंकल्प है। सरकार कहती है हम खाद्य सुरक्षा कानून बनाने के लिए कृतसंकल्प हैं। मैं पूछना चाहती हूं कि आप महामहिम राष्ट्रपति के मुंह से असत्य भाषण क्यों करवाते हैं? मेरे पास पिछली बार का भी अभिभाषण है, नौ महीने पहले जून की बात है, उसमें कहा गया “मेरी सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम नामक नया कानून बनाने का प्रस्ताव करती है।” आज ये कृतसंकल्पता पर आ गए जबकि तब प्रस्ताव किया था। इसमें लिखा है कि “प्रस्ताव करती है जो एक ऐसे ढांचे के लिए सांविधिक आधार मुहैया कराएगी जिसमें सभी के लिए खाद्य सुरक्षा का आश्वासन होगा। ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे का प्रत्येक परिवार तीन रुपए प्रति किलोग्राम की दर से प्रति माह 25 किलोग्राम गेहूं और चावल प्राप्त करने का कानूनन हकदार होगा। इस विधान को सार्वजनिक वितरण प्रणाली में व्यापक व्यवस्थित सुधार लाने के लिए भी उपयोग में लाया जाएगा।” यह पिछली बार का अभिभाषण है। आपने इस देश के बारे में महामहिम राष्ट्रपति के मुंह से कहलवाया कि आप एक ऐसा कानून लाएंगे जिस कानून में 25 किलोग्राम गेहूं या चावल प्रति माह तीन रुपए किलो के आधार पर देंगे। आज नौ महीने बीत गए हैं, लेकिन क्या हुआ? चाहिए तो यह था कि इस अभिभाषण में यह आता कि हमने उस कानून में क्या प्रगति की है, हमने कानून का प्रारूप तैयार करवा लिया, हम इस सत्र में इसे लेकर आ रहे हैं या आपने पहले पारित करवा लिया होता लेकिन आप यह न करवाकर कृतसंकल्पता पर आ गए। अंग्रेजी में इसका मतलब है We are committed, हिंदी में इसका मतलब है हम कृतसंकल्प हैं। आप कैसे कृतसंकल्प हैं? मैं सरकार से कहना चाहती हूं कि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के चार स्तंभ होते हैं और आप चारों स्तंभों की उपेक्षा कर रहे हैं। आप कैसे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे? आप पूछेंगे कि चार स्तंभ कौन से हैं? सबसे पहला स्तंभ गरीबी के सही आंकड़े है। देश में गरीबों की कितनी संख्या है यह  पता लगाना चाहिए। दूसरा स्तंभ अच्छा उत्पादन है। इसका मतलब है उत्पादन बढ़े। तीसरा स्तंभ पर्याप्त भंडारण है। हमारे गोदाम भरे रहें। चौथा स्तंभ प्रभावी वितरण है। जब तक ये चार आयाम, पाये या स्तंभ मजबूत नहीं होते तब तक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकती है। अब मैं इस सरकार के बारे में बताती हूं कि इन चार स्तंभों को क्या मजबूती दी है जिससे चारों स्तंभ लड़खड़ा रहे हैं। जहां तक गरीबों की संख्या का सवाल है, वर्ष 2004-05 की जनसंख्या के आधार पर गरीबों की संख्या जानने के लिए चार कमेटियां और एजेंसियां बनाईं। चारों एजेंसियों ने अलग आंकड़े दिए और वर्ष 2004-05 की जनसंख्या को आधार बनाया। पहला आंकड़ा योजना आयोग का आया, इसके अनुसार इस देश में  25.7 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। इसके बाद एक और कमीशन, नेशनल कमीशन फार इन्टप्रिन्योर्स इन अनऑर्गेनाइज सैक्टर का गठन किया गया।

क्यों बसुदेव दा इन्होंने ऐसा किया था? उसका आंकड़ा आया कि 77 प्रतिशत लोग इस देश में गरीबी की रेखा के नीचे हैं। उसके बाद इन्होंने एक सुरेश तेंदुलकर कमेटी गठित की। सुरेश तेंदुलकर कमेटी ने ग्रामीण भारत की गरीबी अलग निकाली और शहरी भारत की गरीबी अलग निकाली और कुल मिलाकर आंकड़ा 37.2 प्रतिशत दिया। उन्होंने कहा कि 37.2 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं। फिर ग्रामीण विकास मंत्रालय तस्वीर में आ गया। उन्होंने कहा कि हम एक कमेटी बनायेंगे और चूंकि हमें कार्यक्रम चलाना है, हम गरीबी के आंकड़े देंगे और ग्रामीण विकास मंत्रालय ने एक एन.सी.सक्सेना कमेटी बना दी। उसने ग्रामीण भारत के आंकड़े निकालकर कहा कि इस देश में ग्रामीण भारत के पचास प्रतिशत लोग गरीब हैं। आज तक आप यह तय नहीं कर पाये कि गरीबी मापने का आधार क्या होगा, आज तक आप यह तय नहीं कर पाये कि इन आंकड़ों में से आपका कौन सा आंकड़ा मान्य होगा। इस तरह से आपका पहला स्तम्भ ही लड़खड़ा गया। अब गरीबी मापने का नया आधार क्या आ रहा है कि गरीब कितनी कैलोरी खाता है? अध्यक्ष महोदया, मैं पूछना चाहती हूं कि जिस गरीब का पेट पीठ से सटा हुआ है, उसके पेट में क्या कैलोरी टटोलते हो? उसके पेट में नहीं, उसके माथे पर लिखा है कि वह गरीब है। उसके घर से गरीबी बोलती है। उसके बदन के चीथड़े कपड़े गरीबी बोलते हैं। उसका पेट टटोलने की जरूरत नहीं है।

          मैं आपको बताना चाहती हूं कि पिछली बार का जो इनका राष्ट्रपति का अभिभाषण था, उसमें आपने कहा था कि आप बीपीएल के आंकड़े लायेंगे, उसके लिए ग्राम सभा या शहरी निकाय को माध्यम बनायेंगे। आपने कहा था कि ग्राम सभा बैठकर तय करेगी कि हमारे गांव में गरीब कौन हैं, शहरी निकाय तय करेंगे, ताकि आपत्ति दर्ज कराई जा सके, अगर कोई गलत आंकड़ा आ जाए। मैं पूछना चाहती हूं कि गरीबी का आंकड़ा तय करने के लिए क्या ग्राम सभा की एक भी मीटिंग हुई, क्या शहरी निकाय ने गरीबी का एक आंकड़ा भी दिया? जब आपको यही पता नहीं है कि खाद्य सुरक्षा कितने लोगों की तय करनी है, आपको यही मालूम नहीं है। अगर घर में एक गृहिणी को यदि पति कह दे कि शाम को मेरे कुछ मित्र आ रहे हैं, आप उनके लिए खाना बना लेना तो वह पहला सवाल पूछती है कि कितने लोग होंगे? अगर वह कहे कि दस लोग आयेंगे और 25 आ जाएं तो उसकी फजीहत होनी ही है। वह 10 में से 15 को खिला देगी, 16 को खिला देगी, लेकिन 25 को कैसे खिलायेगी? यह साधारण कॉमन सैन्स है कि अगर आप खाद्य सुरक्षा तय करना चाहते हैं तो सबसे पहले यह तय करिये कि आपको कितनों को खिलाना है। आपके गरीबों का आंकड़ा क्या है? लेकिन आज तक यह सरकार न गरीबी के आंकड़े तय कर पाई, न गरीबी मापने का आधार तय कर पाई तो इनका पहला स्तम्भ पूरी तरह लड़खड़ा गया।

          दूसरा स्तम्भ मैंने कहा था- अच्छा उत्पादन, बढ़ा हुआ उत्पादन। शरद भाऊ, बढ़ा हुआ उत्पादन कब होगा, बढ़ा हुआ उत्पादन तब होगा, जब कृषि योग्य भूमि बढ़ेगी, ज्यादा रकबे में खेती होगी, यह साधारण सी बात है। लेकिन आपके अपने कृषि मंत्रालय के आंकड़े हैं कि इस साल कृषि योग्य खाद्यान्न का रकबा आठ प्रतिशत घटा है। मेरे पास स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट है। स्टैंडिंग कमेटी ने आपके द्वारा दिये गये आधार पर कहा है, मैडम, मैं वह पढ़कर सुनाना चाहती हूं -

 

“The Committee observes that the area under foodgrains has declined by 8 per cent from 680.99 lakh hectares in 2008-09 to 626.47 hectares in 2009-10”.

 

          680 लाख हैक्टेअर से घटकर 626 लाख हैक्टेअर में खाद्यान्न उग रहा है। आप कह रहे हैं कि 2009-10 में प्रोडक्शन कम हुआ। यह स्वाभाविक बात है, कम रकबे में अगर आप खाद्यान्न बोयेंगे तो कम पैदा होगा, ज्यादा रकबे में अगर आप खाद्यान्न बोयेंगे तो ज्यादा पैदा होगा। जब आपका रकबा ही घट रहा है। आपकी भूमि खेती से निकल कर गैर खेती चीजों में जा रही है, एसईजैड के लिए जा रही है, बाकी चीजों के लिए जा रही है तो आपके यहां उत्पादन कैसे बढ़ेगा, यह मैं आपसे पूछना चाहती हूं? जो दूसरा स्तम्भ है। आपने इस बार राष्ट्रपति से कहलवाया कि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृषि उत्पादकता बढ़ानी जरूरी है। केवल उत्पादन नही, उत्पादकता चाहिये। यह उत्पादकता कैसे बढ़ेगी? जिस जमीन में आज खेती नहीं हो रही है यानी जो असिंचित है उसे आप सिंचित करेंगे, उसे खेती योग्य बनायेगें, ज्यादा भूमि में खाद्यान्न बोयेंगे, तभी उसका उत्पादन और उत्पादकता बढ़ेगी। उत्पादन और उत्पादकता का आपस में सीधा रिश्ता है। आप जितनी ज्यादा भूमि कृषि योग्य बनाते जायेंगे, खाद्यान्न उगाते जायेंगे, आपका उतना ज्यादा उत्पादन बढ़ता जायेगा  लेकिन इसका उलटा हो रहा है। आपका रकबा कम हो रहा है और खेती खिसक रही है। जहां तक  कृषि उत्पादकता बढ़ाने का सवाल है, उसमें आप एक इंच भी आगे नहीं बढ़े हैं। अगर कृषि की उत्पादकता को आगे बढ़ाना है तो गुजरात सरकार का मॉडल आपके सामने है। अध्यक्षा जी, मैं सदन के माध्यम से आपको बताना चाहती हूं कि  गुजरात की अर्थव्यवस्था कभी कृषि आधारित   अर्थव्यवस्था नहीं थी लेकिन उसने कृषि विकास दर को 9.6 प्रतिशत पर लाकर रख दिया है। यह बात न मैं कह रही हूं, न आडवाणी जी मोह में कह रहे हैं और न बी.जे.पी. के नेता कह रहे हैं। यह सर्टिफिकेट इस देश के जाने-माने अर्थशास्त्री दे रहे हैं। ये अर्थशास्त्री हैं - सर्वश्री तुषार शाह, अशोक गुलाटी, पी. हेमन्त और गंगा श्रीधर। इन लोगों ने एक पेपर लिखा है  जो इकोनोमिक और पौलिटिकल वीकली में छपा है।  उसमें शीर्षक था- "Secrets of Gujrat agrarian miracles after 2000"  सन् 2000 के बाद गुजरात में कृषि चमत्कार का रहस्य । ये अर्थशास्त्री भाजपाई नहीं है। इन्होंने डा. एम.एस आहलुवालिया  की प्रशंसा में एक पेपर लिखा था। लेकिन यह चमत्कार कैसे हुआ? सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तर गुजरात में वह भूमि जो बंजर थी, उस बंजर भूमि को सिंचित करके वहां रोड इनफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करके दूरदृष्टि दिखाकर जो खेती करवाई है, उससे कृषि उत्पादकता बढ़ी है। उसके कारण यह चमत्कार हुआ और गुजरात ने कृषि विकास दर 9.6 प्रतिशत हासिल की है। अगर सरकार कृषि में उत्पादकता बढ़ाना चाहती है तो एक राज्य का मॉडल आपके सामने तैयार है लेकिन उसके लिये दूरदर्शिता चाहिये, इच्छा शक्ति चाहिये, उसके लिये सही नीतियां चाहिये और  उन नीतियों का प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन चाहिये जो इस सरकार में चारों की कमी दिखाई देती है।

          अध्यक्ष महोदया, खाद्य सुरक्षा का तीसरा स्तम्भ लड़खड़ा रहा है क्योंकि खाद्यान्न पहले के बजाय घटा है जबकि खाद्य सुरक्षा के लिये उत्पादकता बढ़नी चाहिये। मैंने जैसा कहा कि तीसरा स्तम्भ पर्याप्त भंडारण का होना चाहिये। जहां तक भंडारण का सवाल है, शरद जी जानते हैं क्योंकि कंज्यूमर अफेयर्स के वह मंत्री हैं। हमारी भंडारण की प्रमुख संस्था एफ.सी.आई. के पास 25.7 लाख मीट्रिक टन की कवर्ड और 28 लाख मीट्रिक टन का अनकवर्ड कैपेसिटी है। एफ.सी.आई के पास जो अपने गोदाम हैं या जो किराये पर लिये हुये हैं, उनमें हमारी टोटल कवर्ड और अनकवर्ड कैपेसिटी भंडारण की यही है। जो अनाज बाहर रखा जाता है, वह बारिश के कारण सड़ता है, जो अंदर रखा जाता है, वह पुराना होकर सड़ता है। शरद जी को याद होगा कि जब मैं राज्य सभा की सदस्या थी, उनसे एक सवाल किया था। हमारे यहां परम्परागत अनाज की हैंडलिंग मैनुअल की जाती है जब कि विश्वभर में मिकेनाइज्ड हैंडलिंग हो रही है। मैनुअल और मिकेनाइज्ड हैंडलिंग में अंतर यह है कि जब बोरियों का लदान किया जाता है तो पल्लेदार आता है, एफसीआई के गोदाम में बोरियां रख देता है। जब नई आवक होती है तो उसके ऊपर नई बोरियां रख देता है और जब नय़ा अनाज आता है तो उसके ऊपर रख दिया जाता है। जब सार्वजनिक वितरण के लिये अनाज निकालते हैं तो ऊपर की बोरियां सब से पहले निकालते हैं।

 

12.00 hrs. जो नया अनाज आया, वह निकल गया और पुराना अनाज वहीं बना रहा। फिर खरीफ की फसल आयी, फिर लदान आ गया, फिर पीडीएस के लिए नया अनाज निकल गया और पुराना अनाज पड़ा रहा। मैकेनाइज्ड हैंडलिंग में उल्टा है, वहां कन्वेयर बैल्ट की तरह चलता है। जब अनाज की बोरी निकलती है तो सबसे पहले नीचे की बोरी निकलती है, उसके बाद ऊपर की बोरी निकलती है। नीचे का अनाज निकलता जाता है और ऊपर की अनाज की बोरी नीचे आती जाती है।

श्री अधीर चौधरी (बहरामपुर): महोदया, हमें भी बोलने दीजिए। एक घंटा हो चुका है। ...( व्यवधान)

श्रीमती सुषमा स्वराज :महोदया, कम से कम वे स्पीकर की भूमिका न निभाएं। यह सात घंटे की चर्चा है और 6 बजे इसका रिप्लाई होगा। सात घंटे की चर्चा में मेरी पार्टी का जो समय है, मैं उसे ले रही हूं, मैं आपका समय नहीं खा रही हूं बल्कि आप मेरा समय खा रहे हैं।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्रीमती सुषमा स्वराज : गरीब का दाना तो खा लिया, उसका दर्द तो कहने दीजिए। आप उसका समय क्यों बर्बाद कर रहे हैं? ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : अधीर रंजन जी, कृपया बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्रीमती सुषमा स्वराज :  महोदया, मैं आपको बता रही थी कि मैकेनाइज्ड हैंडलिंग और मैनुअल हैंडलिंग का यह फर्क है कि मैकेनाइज्ड हैंडलिंग में पुराना अनाज निकलता जाता है और नयी बोरी नीचे जाती रहती है। इससे अनाज सड़ता नहीं है और वह बचा रहता है। हमारे यहां मैनुअल हैंडलिंग की जो प्रथा है, उसके कारण नयी बोरियां निकलती जाती हैं और पुरानी बोरियां सड़ती जाती हैं। मैं अनाज की पुरानी बोरियों के सड़ने की बात ऐसे ही नहीं कह रही हूं। एक आरटीआई की क्वेरी श्री देवाशीष भट्टाचार्य ने लगायी थी। उसने पूछा था कि एफसीआई हमें बताए कि क्या उनका कोई खाद्यान्न नष्ट हुआ है? उस आरटीआई की क्वेरी का जवाब आया था कि हां, हमें 10 लाख टन खाद्यान्न नष्ट करना पड़ा है, क्योंकि वह अनाज सड़ गया है। उस दिन मुलायम सिंह यादव जी जो बात कह रहे थे कि चूहें अनाज खा रहे हैं, वह बात गलत नहीं है, वाकई चूहें अनाज खा रहे हैं। जो अनाज नीचे पड़ा है।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record.

(Interruptions) … *  अध्यक्ष महोदया : सुषमा जी, आप बोलिए।

श्रीमती सुषमा स्वराज : महोदया, मैं आपको बताना चाहती हूं कि उस क्वेरी में बताया गया कि 10 लाख टन खाद्यान्न नष्ट कर दिया गया। उसके बाद यह प्रश्न मेरे सहयोगी श्री अनंत कुमार ने सदन मे उठाया। उस समय शरद जी ने कहा था कि हम इस सिस्टम को दुरूस्त करेंगे, लेकिन आज तक सिस्टम दुरूस्त नहीं हुआ है। यह हमारी भंडारण की स्थिति है। मैं आपसे कहना चाहती हूं कि अगर हमारा अनाज सड़ रहा है तो आपके पास जो आंकड़े हैं कि इतना बफर स्टॉक है, वह अनाज नहीं है, वह घुना हुआ अनाज है। वह अनाज बूरा हो गया है, जब आप उसे निकालेंगे तो वह खाने योग्य नहीं होगा, वह केवल समुद्र में फेंकने योग्य होगा। आपका पर्याप्त भंडारण का स्तंभ भी लड़खड़ा रहा है। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइए। अधीर रंजन जी, बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्रीमती सुषमा स्वराज : महोदया, खाद्य सुरक्षा का चौथा स्तंभ प्रभावी वितरण है। मैंने जो चार स्तंभ गिनाये थे, उनमे चौथा स्तंभ है प्रभावी वितरण। यहां शरद जी कह सकते हैं कि वितरण व्यवस्था तो राज्यों के जिम्मे हैं, उसमें आप हमें क्या कहना चाहती हैं, मैं बिल्कुल कहना चाहती हूं। वितरण व्यवस्था राज्य के जिम्मे जरूर है, लेकिन इस वितरण के लिए बांटा जाने वाला खाद्यान्न केंद्र सरकार देती है।

 

राज्य सरकार और केन्द्र सरकार के आँकड़ों में बहुत बड़ा विवाद है। मैं मध्य प्रदेश से आती हूँ। हमारे मुख्य मंत्री ने लिखकर आपको दिया कि हमारे यहाँ 42 लाख गरीब हैं। आप कहते हैं कि आपके मुताबिक 21 लाख गरीब हैं। जब आधा माल देंगे तो आधा ही तो बाँटेंगे। 42 लाख लोगों के लिए ज़रूरत है और 21 लाख के मुताबिक मिल रहा है, उस पर आप कहते हैं कि वितरण व्यवस्था प्रभावी बने। कैसे राज्य वितरण व्यवस्था को प्रभावी बनाएँ? हमारे यहाँ तो और दुखदायी बात है। मध्य प्रदेश सबसे ज्यादा अच्छा गेहूँ पैदा करता है, एशिया का सबसे अच्छा शरबती गेहूँ पैदा करता है। लेकिन आप हम पर दबाव डालकर कहते रहे कि लाल गेहूँ बाँटो। हमने कहा कि लाल गेहूँ आपके यहाँ से आएगा तो ट्रंसपोर्टेशन की कॉस्ट पड़ेगी, जबकि हमारे यहाँ अपने गेहूँ का भंडारण हो रखा है। जो मज़दूर जाकर खेत में अच्छा शरबती गेहूँ बो रहा है, उसको अगर हम सार्वजनिक वितरण प्रणाली से लाल गेहूँ खिलाएँगे तो वह कितनी बददुआ देगा? लेकिन आप कहते हैं कि आप उसको लाल गेहूँ खिलाओ क्योंकि हम आपको लाल गेहूँ दे रहे हैं; हम 21 लाख का देंगे और आप 42 लाख को खिलाओ; आप जानो, आपका काम जाने। मैं तो शाबाशी देना चाहती हूँ भाजपा शासित राज्यों के मुख्य मंत्रियों को, जिन्होंने अपने ही खजाने पर बोझ डालकर वितरण प्रणाली को सुव्यवस्थित बनाया। मध्य प्रदेश में दो रुपये किलो और तीन रुपये किलो के हिसाब से गेहूँ-चावल बाँटा जा रहा है और छत्तीसगढ़ तो सबसे आगे निकल गया - एपीएल को दो रुपये किलो, लेकिन एक रुपया किलो के हिसाब से बीपीएल को छत्तीसगढ़ में चावल खिलाया जा रहा है। हर महीने की सात तारीख को 35 किलो चावल का बोरा एक रुपया किलो की दर से मात्र 35 रुपये में हमारे सारे लोग खड़े होकर बँटवा देते हैं और 35 रुपये में वह राशन लेकर अपने घर चला जाता है। किसान को हम समर्थन मूल्य से ज्यादा बोनस दे रहे हैं। धान का बोनस छत्तीसगढ़ ने दिया, गेहूँ का बोनस 100 रुपये प्रति क्विंटल मध्य प्रदेश ने दिया। हम कल्याणकारी राज्य की बात कर रहे हैं। हम किसान को अपने खजाने से बोनस दे रहे हैं और गरीब को अनुदान देकर सस्ता अनाज खिला रहे हैं। यह हमारी वितरण व्यवस्था है, लेकिन आपकी वितरण व्यवस्था में खाद्य सुरक्षा के चारों के चारों पाये लड़खड़ा रहे हैं।

          अध्यक्षा जी, एक तरफ तो महंगाई की मार से गरीब मर रहा है और दूसरी ओर जले पर नमक छिड़कने का काम इस सरकार के मंत्री कर रहे हैं।  कभी शरद जी का बयान आता है जिसमें वे कहते हैं कि मैं कोई ज्योतिषी थोड़े ही हूँ जो बताऊँ कि महंगाई कब कम होगी। अरे शरदभाऊ, किसी बुरे ग्रह के कारण महंगाई नहीं आई है जो ज्योतिषी की ज़रूरत हो। महंगाई आपकी सरकार की गलत नीतियों के कारण आई है और इसीलिए सरकार से पूछा जाता है कि नीतियों में सुधार कब करोगे, बताओ - महंगाई कम होगी कि नहीं, और कम होगी तो कब होगी?  इनकी एनसीपी की एक मैगज़ीन है - राष्ट्रवादी, जिसमें कहते हैं कि चीनी तो खानी ही नहीं चाहिए, उससे डायबिटीज़ हो जाती है।  ऐसे ऐसे बयान आते हैं। कभी अमेरिका के राष्ट्रपति बुश ने कहा था कि हिन्दुस्तान के लोगों ने ज़्यादा खाना खाना शुरू कर दिया है, इसलिए महंगाई हो गई है। उसको भारतीय शैली में इनकी सरकार के एक मंत्री ने कहा कि गरीब चूँकि दो वक्त रोटी खा रहा है, इसलिए महंगाई हो गई है। अगर आप हमारे घावों पर मरहम नहीं लगा सकते तो कम से कम उस पर नमक छिड़कने का काम तो मत करिये।

          अध्यक्ष जी, सरकार में इतनी अंतरकलह चल रही है कि एक दूसरे के माथे पर ठीकरा कैसे फोड़ा जाए, सब इसी कवायद में लगे हैं। पूरी की पूरी कांग्रेस के नेता चाहते हैं कि शरदभाऊ के माथे ठीकरा फोड़ो और बरी हो जाओ। फिर शरद जी हैं कि कलैक्टिव रिस्पॉन्सिबिलिटी है, सामूहिक ज़िम्मेदारी है। वे प्रधान मंत्री को सामूहिक ज़िम्मेदारी याद दिलाते हैं कि प्रधान मंत्री आप हैं,  मैं तो केवल कृषि मंत्री हूँ। लेकिन प्रधान मंत्री का द्वन्द्व अलग है, क्योंकि प्रधान मंत्री अर्थशास्त्री भी हैं। अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह और प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह में दुविधा चलती है। अर्थशास्त्र का सिद्धांत यह समझाता है कि महंगाई बढ़ती हुई विकास दर की द्योतक होती है। इसलिए जब देश में महंगाई बढ़ती है तो अंतर्राष्ट्रीय जगत में उन्हें वाहवाही मिलती है। वे जाकर कह सकते हैं कि देखो - inflation is an indicator of growth. मैं जो कह रहा हूँ कि हमारे यहाँ विकास दर बढ़ रही है, उसका सबसे बड़ा संकेत यह है कि इंडिया में इनफ्लेशन बढ़ रहा है। लेकिन जब प्रधान मंत्री के तौर पर वे सोचते हैं तो उन्हें चिन्ता सताती है। वे दोनों दुविधाओं में फँसे हुए हैं। लेकिन आज प्रधान मंत्री यहाँ नहीं हैं। मैं उन्हें कहना चाहती हूँ कि प्रधान मंत्री जी, अब अर्थशास्त्र में भी नये मुहावरे आ रहे हैं।  

इन नये मुहावरों को समझिए। अभी कुछ दिन पहले मेरी भूटान के राजा से मुलाकात हुई, तो उन्होंने बताया कि उनके पिता, जो कि के-फोर कहलाए जाते हैं, उन्होंने और कोस्टारिका ने मिलकर एक नया मुहावरा दिया है कि जीडीपी की टर्म में बात मत करो, जीएनएच की टर्म में बात करो। ग्रोस डोमेस्टिक प्रोडक्ट्स सही आंकड़ा नहीं देता है। जीएनएच का मतलब है, ग्रॉस नेशनल हेप्पीनेस और यही बात मैं प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी को बताना चाहती हूं कि महंगाई किसी ओर की बढ़ रही है, विकास दर किसी ओर की बढ़ रही है, इसलिए दोनों में तालमेल नहीं है। विकास दर तो उनकी बढ़ रही है जो 30 करोड़ से 901 करोड़ के हो गए। आप उन्हें दाल एक हजार रूपये किलो भी खिला दो, तो क्या फर्क पड़ता है? लेकिन यह ग़रीब जो नित्य कुआं खोदता और नित्य पानी पीता है, महंगाई की मार इस पर पड़ रही है। इसलिए जीडीपी की टर्म में बात मत करो, जिस दिन जीएनएच की टर्म में सोचना शुरू कर दोगे, जिस दिन गरीब के आंसू आपको दिख जाएंगे, उस दिन आपकी नीतियां सही हो जाएंगी। अर्थशास्त्री के नाते जब आप सोचते हैं तो आप इन नीतियों में बदलावा नहीं कर सकते हैं। ग़रीब रो रहा है। उसके पास दो समय की रोटी नहीं है और जब त्यौहार आता है तो आंसू नौ-नौ की जगह सौ-सौ हो जाते हैं।

          अध्यक्ष महोदया, इसलिए मैं आपके माध्यम से प्रधानमंत्री जी को कहना चाहती हूं, वह यहां नहीं बैठे हैं, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व बैठा है, यूपीए की चैयरपर्सन बैठी हैं। यूपीए की चैयरपर्सन पर एक अन्य ढंग की जिम्मेदारी भी आयी है। वह सरकार को संचालित करते हुए अपनी तरफ से भी निर्देश दे सकती हैं और मैं आपको कहना चाहती हूं कि आप अपने प्रधानमंत्री जी को समझाइए और यह चार पंक्तियां आपको बताना चाहती हूं कि जिस दिन आप ग़रीब के आंसू देखना शुरू कर दोगे उस दिन अपने आप महंगाई समाप्त हो जाएगी, उस दिन ये घोटाले भी अपने आप समाप्त हो जाएंगे। ये चार पंक्तियां हैं-

 

किसी मजबूर की मजबूरियों को सोचकर देखो, प्रेम को झौपड़ियों के बीच खोजकर देखो।

अगर इंसानियत को  फिर से धरती पर बुलाते हो, किसी रोते हुए के आंसुओं को पौंछकर देखो।

   

MADAM SPEAKER: Thank you Sushmaji. Before I call the next speaker on this issue, a statement has to be made by the hon. Minister of External Affairs. Item No. 7 – Shri S.M. Krishna.

     

श्री संजय निरुपम (मुम्बई उत्तर): अध्यक्ष महोदया, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे बोलने की अनुमति दी।

          महोदया, श्रीमती सुषमा स्वराज लोक सभा विपक्ष की नेता हैं और इस नाते यह उनका पहला भाषण था और मुझे यह लगा था कि नेता विपक्ष की तरफ से जब पहला भाषण आएगा, तो वह सत्य पर आधारित होगा...( व्यवधान) आप बैचेन क्यों हो रहे हैं? मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सुषमा जी का भाषण असत्य पर आधारित है। मैं यह कह रहा हूं कि सुषमा जी ने बोला, वह आधा सच है और आधा सच सबसे ज्यादा खतरनाक होता है, यह बताने की जरूरत नहीं है।...( व्यवधान)

          अध्यक्ष महोदया, मुझे लगता है कि भारतीय जनता पार्टी के सांसदों को नेता विपक्ष ने ऐसा निर्देश दिया है। यह गंभीर विषय है, संवेदनशीलता के साथ बातें करते हैं तो संवेदनशीलता के साथ सोचिए भी।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप शांत रहिए।

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम (मुम्बई उत्तर): अध्यक्ष महोदया, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पिछले दिनों महंगाई बढ़ी है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर रहा है।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप इनको सुन लीजिए।

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम : महोदया, चावल महंगा हुआ, गेहूं महंगा हुआ, दालें महंगी हुईं, चीनी महंगी हुई और सब्जियां महंगी हुईं। यह हम इसलिए महसूस करते हैं, क्योंकि सब्जी सिर्फ आप नहीं खाते हैं, हम भी खाते हैं।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप उनको सुनिए।

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम : तेल की जरूरत हमें भी पड़ती है। रोटी हम भी खाते हैं, भात हम भी खाते हैं। यदि महंगाई बढ़ी है तो इस दुख को हम सब झेल रहे हैं। इस दुख को मैं यहां शेयर कर रहा हूं।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप उनको बोलने दीजिए।

श्री संजय निरुपम : लेकिन प्रश्न यह है कि महंगाई बढ़ी क्यों?

          अध्यक्ष महोदया, सुषमा जी ने सारी बातें बताते हुए, उनके बुनियादी कारणों पर प्रकाश नहीं डाला। बुनियादी कारण ये हैं कि जब एन.डी.ए. का शासन था ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठिए। आप चुप हो जाइए।

…( व्यवधान)

 

श्री संजय निरुपम : लेकिन एन.डी.ए. के टाइम में सारे घोटाले आपने किए। शेयर घोटाला, यू.टी.आई. घोटाला, सेंटौर घोटाला, सब आपके समय में हुए। ...( व्यवधान) आपने गरीबों को जितना बर्बाद किया उससे ज्यादा किसी ने नहीं किया। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम :  कृपा कर के आप मेरी बात शांति से सुनिए। यह गम्भीर विषय है।

...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : राम किशन जी, आप कृपया बैठिए।   Nothing will go on record.

श्री संजय निरुपम : अध्यक्ष महोदया, यह गम्भीर विषय है और इस पर संवेदनशीलता के साथ बात होनी चाहिए। नेता विपक्ष का निर्देश है कि इस विषय पर गम्भीरता से चर्चा होनी चाहिए। मेरा निवेदन है कि कम से कम भारतीय जनता पार्टी के लोग शांति से सुनें। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : नहीं, नहीं। यह नहीं होना चाहिए। आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम : अध्यक्षा जी, मेरा कहना है कि ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप कृपया बैठ जाइए। अब आप कृपया सुनिए।

श्री अनंत गंगाराम गीते (रायगढ़): अध्यक्ष महोदया, श्री संजय निरूपम अपने पापों को धोने का प्रयास कर रहे हैं। मैं अपने साथियों से कहना चाहता हूं कि उन्हें अपने पाप धो लेने दीजिए।

अध्यक्ष महोदया : आप बैठिए। कृपया आप सुनिए।

श्री संजय निरुपम : अध्यक्ष महोदया, महंगाई के लिए जो कारण हैं, अगर नेता विपक्ष ने यदि प्रकाश डाला होता, तो मुझे लगता है कि सदन का भी सही मार्गदर्शन होता और देश में गरीब लोग जो सही मायने में बढ़ती हुई महंगाई से परेशान हैं, उन्हें भी समझ में आता कि महंगाई का क्या कारण है। महंगाई बढ़ने का सबसे बड़ा कारण मैं समझता हूं कि एन.डी.ए. के जमाने में, जब इनकी सरकार थी, तो जिस कच्चे तेल का हम अपने देश में पैट्रोलियम प्रोडक्ट्स के लिए उपयोग करते हैं, उसकी कीमतें ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : श्री तूफानी जी, आप क्यों बोल रहे हैं। कृपया आप बैठिए।

श्री संजय निरुपम : पूरे एन.डी.ए. के शासन काल में, छः साल तक, कच्चे तेल का भाव 40 डालर प्रति बैरल से ऊपर कभी नहीं गया, लेकिन हमारे राज में, जिसके ऊपर हमारा कोई कंट्रोल नहीं था, यू.पी.ए. का कोई कंट्रोल नहीं था, हमारे जमाने में 40 डॉलर से बढ़ते-बढ़ते 140 डॉलर प्रति बैरल तक गया। आज वही 60 से 65 डॉलर प्रति बैरल के बीच में है। अब इसका क्या कारण है, यह मैं बताना चाहूंगा। पूरे देश में डीजल और पेट्रोल की जो खपत है ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : योगी आदित्य नाथ जी, कृपया आप बैठिए। कृपया आप मत बोलिए। आप अपना स्थान ग्रहण कीजिए। आप उन्हें बोलने दीजिए।

श्री संजय निरुपम : अध्यक्ष महोदया, हमारे देश में डीजल और पेट्रोल की जो खपत होती है, उसका 78 प्रतिशत हिस्सा बाहर से कच्चा तेल लाकर हम अपने देश का काम चलाते हैं। जैसे ही अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का भाव बढ़ता है, हमारे देश में डौमैस्टिक प्राइसेस पर उसका असर पड़ता है। क्या इस सच को उजागर करने की हिम्मत नेता विपक्ष में थी, यदि हां, तो क्यों उन्होंने यह बात नहीं कही? पिछले पांच-छः वर्षों में जो महंगाई बढ़ी, उसका सबसे बड़ा कारण यह है। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : श्री विष्णुपद राय जी आप बैठ जाइए।   Nothing will go on record.  आप बैठिए। विष्णपद राय जी, आप बैठिए। आप बैठिए और सुनिए। अगर आप सब लोग एक साथ भाषण देने लगेंगे, तो कैसे काम चलेगा। अब आप भाषण देने लगे। आप कृपया बैठ जाइए।

                                                              ...( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम : नेता विपक्ष ने महंगाई के कारणों को बताते-बताते बहुत सारे घोटाले याद दिलाए। घोटाला एक बहुत सनसनीखेज शब्द होता है और वह बड़ा विषय होता है। अगर आप गम्भीरता से बात करना चाहेंगे, तो घोटालों की बात कह कर वह गम्भीरता खत्म हो जाती है। खुद, सनसनीखेज ढंग से, लोगों के मनों में, दिलों में और दिमागों में सनसनी पैदा करने के लिए दो-चार घोटालों, जिनका कोई सुबूत नहीं, प्रूफ नहीं, उनका जिक्र कर के आप महंगाई पर गम्भीरता पूर्वक चर्चा नहीं कर सकते।

   

          मुद्दा एमएसपी का है। एमएसपी के बारे में ...( व्यवधान) अगर आप सचमुच महंगाई के प्रति इतना ज्यादा चिंतित हैं, तो कृपया मुझे बोलने दीजिए।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : मीना जी, आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम : एक मुद्दा एमएसपी का आया।  इस देश में समर्थन मूल्य बढ़ा है, क्या इस बात से कोई इन्कार कर सकता है? क्या यह एक कारण है महंगाई का, सिर्फ इस पर उनको ऐतराज हो सकता है, एनडीए के जमाने में समर्थन मूल्य कितना था और आज कितना समर्थन मूल्य है?  जरा उसका फर्क महसूस करने की कोशिश कीजिए।  अगर राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में कहा गया, जिसको शायद भारतीय जनता पार्टी समझती है कि यह महंगाई के लिए बहाना है, बाकी सब घोटाला है।  आज गेहूं और चावल का समर्थन मूल्य हजार और ग्यारह सौ रूपए के आसपास हो रहा है, क्या यह घोटाला है?  70 हजार करोड़ रूपए किसानों की कर्जमाफी के लिए गांवों में भेजा गया, क्या यह घोटाला है?  ...( व्यवधान) नरेगा के जरिए 39 हजार करोड़ रूपए गांवों में गरीबों की जेबों में भेजा गया, क्या यह घोटाला है?  एमएसपी के मूल्यों पर इनको थोड़ा शक हुआ।  एनडीए के जमाने में जो समर्थन मूल्य थे, वह सिर्फ साठ प्रतिशत बढ़े थे।  ...( व्यवधान)

श्री अनंत गंगाराम गीते : कांग्रेस को जवाब देने के लिए इनके सिवाय कोई और नहीं मिला।..( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम : अगर आपने मेरी कद्र नहीं जानी तो यह आपका दोष है, कांग्रेस का दोष नहीं है। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : गीते जी, इस तरह की टोकाटोकी नहीं करिए।  आप सीनियर लीडर हैं।  आप क्या टोकाटोकी कर रहे हैं? आप ऐसा नहीं करिए।  उनकी बात सुनिए।

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम : एनडीए के जमाने में वर्ष 2000-01 के बीच गेहूं का समर्थन मूल्य क्या था - 580 रूपए, वर्ष 2001-02 में 610 रूपए गेहूं का समर्थन मूल्य था जबकि आज वर्ष 2009-10 में इस समय इस देश के किसानों को, गेहूं के उत्पादकों को जो समर्थन मूल्य दिया जा रहा है, वह है 1180 रूपए। ...( व्यवधान)  मैं शक्कर पर भी आता हूं। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप चेयर की तरफ बोलिए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइए।  उनको बोलने दीजिए।  उनकी बात सुनिए।  

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : विष्णु पद राय जी, आप बैठ जाइए।  

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आपकी कोई बात रिकार्ड में नहीं जा रही है।  आप कृपया बैठ जाइए।

 (Interruptions) … * SHRI SANJAY NIRUPAM : Madam, I am not yielding.… (Interruptions)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप उनकी बात सुनिए।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Please sit down.

… (Interruptions)

श्री संजय निरुपम : अध्यक्ष महोदया, चावल का समर्थन मूल्य वर्ष 2000-01 के बीच एनडीए के जमाने में क्या था? जब उन्होंने बहुत अच्छा शासन किया, जिसकी वजह से लोगों ने उनको सत्ता से बाहर कर दिया।  उस दरम्यान चावल का समर्थन मूल्य 511 रूपए था, वर्ष 2001-02 में चावल का समर्थन मूल्य 530 रूपए था और आज वर्ष 2009-10 में चावल का समर्थन मूल्य एक हजार रूपए है।  इन्होंने बताया कि समर्थन मूल्य इतना है, नेता विपक्ष ने अपनी बात रखी ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप लोग इतना उत्तेजित क्यों हो रहे हैं?  शांतिपूर्वक उनकी बात सुन लीजिए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : उनकी बात सुन लीजिए।

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम : नेता विपक्ष ने एक सवाल खड़ा किया कि जब समर्थन मूल्य 1100 और 1080 रूपए है, तो मार्केट में डोमेस्टिक प्राइज इतनी ऊपर क्यों जा रही है और चीजें इतनी महंगी क्यों मिल रही हैं?  उनकी बात सही है।  उनका सवाल बहुत वाजिब है।  सुषमा जी, मैं इस सवाल के लिए आपको धन्यवाद देता हूं और आपका अभिनंदन करता हूं।  मैं कोई बहुत ज्यादा अर्थशास्त्र वगैरह नहीं जानता हूं, आप बड़े अर्थशास्त्री हैं, थोड़ा आपका मार्गदर्शन करना चाहूंगा।  अगर एक क्विंटल चावल, एक क्विंटल पैडी आप खरीदते हैं ...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: There should be no running commentary.  What is this?

… (Interruptions)

श्री संजय निरुपम : अगर एक क्विंटल धान आप प्रोक्योर करते हैं, तो उसमें से जो चावल निकलता है, वह लगभग साठ से पैंसठ किलो होता है। जब वह चावल एफ.सी.आई. प्रोक्योर करती है, तो उसकी कीमत लगभग 1300 से 1400 के बीच में आती है।          

          मान लीजिए पंजाब के किसी छोटे शहर में 1300 रुपये से 1400 रुपये के बीच में चावल प्रोक्योर किया गया, ऐग्ज़ैक्ट फिगर शरद बाबू बताएंगे। जब वह चावल दिल्ली, मुम्बई आएगा, तब उस पर और भी खर्चे होंगे। उसकी ट्रंसपोर्टेशन कॉस्ट होगी, उस पर लेवी लगेगी तथा और सारे टैक्सेज़ लगेंगे। याद रखिए गुजरात में सबसे ज्यादा वैट है। आप गुजरात की बड़ी जय-जयकार कर रहे हैं। मैं अभी गुजरात की कहानी बताऊंगा।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Please sit down.  Why are you getting excited?

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप ज़रा सा शान्त रहिए। एकदम इतना ज्यादा उत्तेजित मत होइए, ज़रा सुनिए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : विष्णु पद जी, आपको आज क्या हो गया है।

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम : 1050 रुपये में प्रति क्विंटल प्रोक्योर की हुई पैडी जब चावल की शक्ल में मार्किट में आती है, तो उसकी कीमत 1945 रुपये होती है। यह आप किसी बड़े विशेषज्ञ, अर्थशास्त्र के जानकार जिन्हें हिसाब-किताब, गुणा, भाग अच्छा आता है, उनसे करवाकर देख लीजिए। यदि उसके बाद मार्किट में आज उस भाव पर चावल मिल रहा है, तो मुझे लगता है कि इसके लिए सरकार को दोष नहीं देना चाहिए, मार्किट फोर्सेज़ को थोड़ा सा दोष देने की आदत रखिए।

          सुषमा जी ने महंगाई के कारणों में जो एक कारण नहीं बताया, मैं उसे बताना चाहूंगा। ...( व्यवधान)

महंगाई के तमाम कारणों को गिनाते हुए सुषमा जी ने एक कारण नहीं बताया जिसे मैं बताता हूं। इसका बहुत बड़ा कारण जमाखोरी है। ब्लैक मार्किटिंग बढ़ी है, इस बात से इंकार नहीं कर सकते।...( व्यवधान)

लेकिन जमाखोरी के खिलाफ कार्यवाही करने की जवाबदारी केन्द्र सरकार की नहीं, राज्य सरकार की होती है। ...( व्यवधान)

श्री चंद्रकांत खैरे (औरंगाबाद): संजय जी, महाराष्ट्र में किसका राज है, यह बताइए।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइए। आप हर समय खड़े होकर बोलते हैं।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Please sit down. Please take your seats.

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आज बहुत ही गंभीर विषय पर चर्चा हो रही है। इसे पूरा देश देख रहा है, जनता देख रही है। महंगाई पर चर्चा हो रही है। सबको अपने-अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है। जब कोई अपना विचार व्यक्त करे और दूसरे टोका-टोकी करते रहें, तो वह बोल नहीं पाएंगे। अभी-अभी आपके नेता ने अपना भाषण दिया, अपना मत व्यक्त किया। अब उन्हें अपना मत व्यक्त करने दीजिए और आप सुन लीजिए।

…( व्यवधान)

श्री अनंत गंगाराम गीते : अध्यक्ष महोदया, मैं कहना चाहता हूं कि ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : गीते जी, जब हम खड़े हैं तो आप क्य़ों खड़े हुए हैं।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER:  Shri Geete ji, you just sit down.  I want order in the House.

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम : अध्यक्ष महोदया, मैं अभी कह रहा था कि जमाखोरी बढ़ी है, इस बात से इंकार नहीं कर सकते, लेकिन इस बात को केन्द्र सरकार ने भी बहुत अच्छे ढंग से महसूस किया और अगस्त, 2006 में केन्द्र सरकार ने राज्यों को यह अधिकार दिया कि आप 1955 के इसैंशियल कमोडिटीज़ एक्ट के तहत जमाखोरों के खिलाफ खुलकर कार्यवाही कर सकते हैं, एक्शन ले सकते हैं।

          जमाखोरी के खिलाफ वर्ष 2009 में  राज्यों ने क्या-क्या कार्रवाई की, उसकी एक रिपोर्ट मैं यहां बता रहा हूं। मैं केवल दो-तीन राज्यों की ही कहानी बताऊंगा। आंध्र प्रदेश में जमाखोरी के खिलाफ 6,119 छापे मारे गये और एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया। ...( व्यवधान) आपको इतना अधीर होने की क्या जरूरत है? आप पूरी बात सुनिये। ...( व्यवधान) उसमें लगभग 102 लाख करोड़ रुपये का माल जब्त किया गया। बिहार में उस दरम्यान क्या हुआ? ...( व्यवधान) बिहार में चार जगहों पर वर्ष 2009 में छापे मारे गये। ...( व्यवधान)

श्रीमती मेनका गांधी (आंवला):  उसमें दो लोग गिरफ्तार किये गये। ...( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम : उसमें दो लोग गिरफ्तार किये गये। ...( व्यवधान)

श्रीमती मेनका गांधी :   अगले साल तीन लोग गिरफ्तार किये जायेंगे। ...( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम : अगर भारतीय जनता पार्टी के लोग अपने सहयोगी दलों के भद्र कर्म के ऊपर ताली बजाने में खुशी महसूस करते हैं, तो उनको मुबारक हो, मुझे इसमें कोई एतराज नहीं है। बिहार में चार छापे मारे गये, जिसमें दो लोगों को गिरफ्तार किया गया।...( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद (सारण):   ये छापे कब मारे गये? ...( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम :  उन्होंने यह वर्ष 2009 की रिपोर्ट दी है।  ...( व्यवधान) हो सकता है कि यह रिपोर्ट सही न हो। लालू जी को इसे स्पष्ट करने का पूरा अधिकार है।  ...( व्यवधान) एक  भी व्यक्ति को अभी तक प्रॉसीक्यूट नहीं किया गया है, एक भी व्यक्ति कनविक्ट नहीं हुआ है और कितना माल जब्त हुआ है, उसकी कोई रिपोर्ट नहीं है। ...( व्यवधान) अब हम गुजरात में आते हैं। ...( व्यवधान)

श्रीमती मेनका गांधी :   एक व्यक्ति को जेल भेजकर क्या आप प्राइस राइस कंट्रोल करा देंगे? ...( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम :  अब हम गुजरात के बारे में आते हैं। वर्ष 2009 में पूरे गुजरात राज्य में 21, 281 छापे मारे गये, जिसमें 21 लोगों को गिरफ्तार किया गया। ...( व्यवधान) 21 हजार छापों में 21 लोगों को गिरफ्तार किया गया। ...( व्यवधान) अब मुझे  नहीं मालूम, शायद नरेन्द्र मोदी जी आज का लोक सभा सैशन लाइव देख रहे होंगे, तो जवाब दें, मैं उनसे ही पूछ रहा हूं कि आपने 21 लोगों को गिरफ्तार किया, लेकिन 74 लोगों को प्रॉसीक्यूट कैसे किया गया, यह समझ में नहीं आ रहा । ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  आप बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record except the speech of Mr. Sanjay Nirupam.

(Interruptions) …* अध्यक्ष महोदया :   आप बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम :  वर्ष 2009 में मध्य प्रदेश में क्या हुआ? ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : निरूपम जी, आप इधर देखकर बात कीजिए।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Hon. Members, just sit down.

… (Interruptions)

श्री संजय निरुपम :  वर्ष 2009 में मध्य प्रदेश में कितने ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  आप बैठ जाइये और उन्हें बोलने दीजिए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  आप हर समय उत्तेजित मत होइये।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : विष्णु पद राय जी,  आप हर बात पर, हर वाक्य पर उत्तेजित  हो रहे हैं,  तो ऐसे कैसे चलेगा?

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  आप बैठ जाइये। आप  फिर क्यों खड़े हो गये।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  आप बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: No.  That is very wrong. Please take your seats.

… (Interruptions)

 श्री संजय निरुपम :  मैं महाराष्ट्र राज्य के आंकड़े भी आपके सामने लेकर आऊंगा, लेकिन उससे पहले मैं मध्य प्रदेश और कर्नाटक की बात बताना चाहूंगा। मध्य प्रदेश में जहां से ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  यह बहुत गलत है।  आप बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

 

श्री संजय निरुपम : अध्यक्ष महोदया, केन्द्र सरकार  की ओर से पूछा गया कि वर्ष 2009 में मध्य प्रदेश में जमाखोरों के खिलाफ राज्य राज्य सरकार ने क्या कार्रवाई की, उसका राज्य सरकार द्वारा जवाब दिया गया है।  मध्य प्रदेश में कितने रेड मारे गए, उसके कॉलम में लिखा गया है निल। मध्य प्रदेश में कितने लोगों को गिरफ्तार किया गया, जवाब है निल। मध्य प्रदेश में कितने लोगों को प्रॉसिक्यूट किया गया, जवाब है निल। कितना माल जब्त किया गया, जवाब है निल। ...( व्यवधान)

श्री गणेश सिंह (सतना):मध्य प्रदेश में कालाबाजारी नहीं हो रही है। कालाबाजारी कांग्रेसशासित राज्यों में हो रही है।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइए। आप हर वाक्य पर, हर बात पर खड़े हो रहे हैं। यह क्या बात है?

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप लोग बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम : ऐसी हालत कर्नाटक में नहीं है। मैं कर्नाटक के मुख्यमंत्री को बधाई दूंगा क्योंकि थोड़ी सी कार्रवाई उन्होंने की है। उन्होंने क्या कार्रवाई की है, यह मैं बताना चाहूंगा। कर्नाटक में वर्ष 2009 में...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप लोग बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप लोग उनकी बात तो सुनिए। अगर हर वाक्य पर खड़े हो जाएंगे तो कोई कैसे बोलेगा।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Please sit down.

… (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record. Nothing is going on record.

(Interruptions) … * अध्यक्ष महोदया : आप क्यों खड़े हैं। आप बैठिए।

श्री संजय निरुपम : महोदया, कर्नाटक की राज्य सरकार से केन्द्र सरकार ने पूछा कि आपने कितने छापे मारे,  जमाखोरों के खिलाफ क्या कार्रवाई की, तो कर्नाटक सरकार ने बताया है कि उन्होंने पूरे साल में 881 जगहों पर छापे मारे, 39 लोगों को गिरफ्तार किया और पांच लोगों को प्रॉसिक्यूट किया। जब उनसे पूछा गया कि कितने रूपए का माल जब्त किया, तो बताया गया कि 22 लाख रूपए का माल पूरे साल में जब्त किया गया। अब मैं महाराष्ट्र के बारे में बताना चाहूंगा। आप लोगों में महाराष्ट्र के बारे में जानने की बेचैनी हो रही थी। महाराष्ट्र में पूरे साल में राज्य सरकार ने 1011 जगहों पर छापे मारे और 1639 लोगों को गिरफ्तार किया गया।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप लोग बैठ जाइए। आप लोग फिर खड़े हो गए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप लोग बैठिए। हर चीज का जवाब देना है। क्या यहां सवाल-जवाब हो रहा है?

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप लोग उनकी बात को सुनिए। हर समय क्यों खड़े हो रहे हैं।

…( व्यवधान)

श्री अनंत गंगाराम गीते : सबसे ज्यादा जमाखोरी महाराष्ट्र में हो रही है। आप क्या आंकड़े रहे हैं?...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : गीते जी आप बैठ जाइए। आपका भी नाम आएगा बोलने के लिए, उस समय बोलिएगा। अभी क्यों बोल रहे हैं। आप एक दफा बोल लीजिएगा।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: आप बैठ जाएं और इन्हें बोलने दें।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: लाल सिंह जी, अब आप क्यों खड़े हो गए हैं।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: What is this running commentary?

श्री संजय निरुपम : अध्यक्ष महोदया, मैं महाराष्ट्र के बारे में बता रहा था कि जब केन्द्र सरकार ने महाराष्ट्र सरकार से पूछा कि सन् 2009 में पूरे साल में आपने जमाखोरों के खिलाफ क्या कार्रवाई की, तो सरकार ने कहा कि इस साल प्रदेश में 1011 ठिकानों पर छापे मारे गए, 1639 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 1008 लोगों को प्रोसीक्यूट करके उनके खिलाफ कार्रवाई की गई। उसके बाद कितना माल जब्त किया गया, यह भी मैं बताना चाहूंगा, क्योंकि मैंने पहले ही स्वीकार किया था कि महंगाई बढ़ने के जो कारण हैं, उनमें जमाखोरी बहुत बड़ा कारण है। महाराष्ट्र सरकार ने केन्द्र सरकार को बताया कि वर्ष 2009 में पूरे प्रदेश में 12500 लाख का माल जब्त किया गया है पूरे महाराष्ट्र में।...( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद : अध्यक्ष महोदया, मैं एक बात कहना चाहता हूं।

अध्यक्ष महोदया: अभी नहीं।

श्री लालू प्रसाद : मैं कुछ बोलना नहीं चाहता, सिर्फ पूछना चाहता हूं, आप पहले सुन लें। मेरा यह कहना है कि सब लोग बोल रहे हैं और सभी स्वीकार कर रहे हैं कि महंगाई है, लेकिन महंगाई को कैसे रोका जाए, कौन जिम्मेदार है रोकने के लिए, इस बात पर कोई चर्चा नहीं हो रही है।

अध्यक्ष महोदया: ठीक है, आप जब अपनी बात कहेंगे तो यह भी कहिएगा।

श्री संजय निरुपम : मेरे कहने का आशय यह था कि कहीं न कहीं राज्य सरकार की भी जवाबदेही है और हम भी अपनी जवाबदारी से मुक्त नहीं हैं, लेकिन उनकी भी जिम्मेदारी है महंगाई को रोकने की और उन्हें भी एक प्रो एक्टिव भूमिका निभानी चाहिए। इसका सबसे बड़ा सबूत हमें दिल्ली में दिखाई देता है। आप सब दिल्ली में रहते हैं।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing is going into the record, except his speech.

(Interruptions) … * श्री संजय निरुपम : दिल्ली में जब दालों के भाव आसमान छूने लगे तो दिल्ली सरकार ने, दिल्ली की मुख्य मंत्री जी ने दालों के लिए विशेष काउंटर खोले और मार्केट प्राइस से सस्ती दालों को वहां पर बेचने का काम किया। इन काउंटरों पर दस रुपए प्रति किलोग्राम का आटे का बैग सस्ते भाव पर बेचा गया। यह है राज्य सरकार की जनता की तकलीफों के प्रति संवेदनशीलता का सबूत, न कि जमाखोरों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करना, जैसे कई राज्य सरकारों ने किया और कोई कार्रवाई नहीं की।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: विष्णु पद राय जी, आप फिर खड़े हो गए। कृपया बैठ जाएं।

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Why are you standing? Nothing will go on record.

(Interruptions) … * अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम :  अध्यक्ष महोदया, दिल्ली की राज्य सरकार का जो विशेष अभियान चला, उसका नतीजा कल एक अखबार में पढ़ने को मिला।   “ दाल की कीमते दिल्ली सरकार की दखलंदाजी की वजह से नीचे आईं” ।  ...( व्यवधान) सुषमा जी ने एक बात बताई कि उत्पादकता नहीं बढ़ी है। मुझे लगता है कि यह एकमात्र गंभीर विश्लेषण था कि अपने देश में कृषि उत्पादकता जिस तरह से बढ़नी चाहिए, उस तरह से बढ़ नहीं रही है। उसका कारण या जवाबदेही किसी एक सरकार पर मढ़ना, मुझे लगता है कि थोड़ी बचकानी अप्रोच होगी, थोड़ा गंभीरता से सोचें तो पिछले 30 वर्षों में हमारे देश में जो कृषि योग्य जमीन थी, उस जमीन में कितनी बढ़ोत्तरी हुई है, यह एक छानबीन का विषय है, शोध का विषय है।

          कहीं पर एक अपोजीशन के नेता बोल रहे थे कि पिछले तीस वर्षों में पहली बार इतनी बड़ी महंगाई महसूस की गयी है। मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि वर्ष 1972 में पहली बार ऐसा हुआ था कि इतनी बड़ी अनावृष्टि हुई थी जहां 23 प्रतिशत बारिश कम हुई थी। यह भी 30 वर्षों का रिकार्ड है, आप यह बताना भूल गयीं कि सूखे की कैसी चपेट थी, यह बताना भूल गयीं कि एक जगह सूखा पड़ा और दूसरी जगह बारिश से अनाज बर्बाद हो रहा है ...( व्यवधान) अभी क्या हुआ कि जो कृषि योग्य जमीन थी ...( व्यवधान) लगभग 680 लाख हैक्टेयर कृषि योग्य जो जमीन थी वह घटकर 620-622 लाख हैक्टेयर रह गयी यानी करीब 60 लाख हैक्टेयर जमीन पर हम खेती नहीं कर पाए। उसका बहुत बड़ा कारण सूखा था। दिलचस्प बात यह है कि जहां सूखे से तीन-चार राज्य परेशान थे वहीं दक्षिण के दो राज्य बारिश से परेशान थे। एक तरफ सूखे से हमारी फसले नष्ट हो रही हैं दूसरी तरफ बारिश से आंध्र प्रदेश और कर्नाटक की फसलें बर्बाद हो रही हैं। अगर फसलें बर्बाद होती हैं तो उत्पादकता पर असर पड़ता है। लेकिन साथ-साथ यह भी बताना चाहूंगा कि पिछले 8-10 वर्षों में इर्रिगेशन पोटेंशियल इतना बढ़ा है कि उसका अगर हम तुलनात्मक अध्यन करें तो लगभग 70 लाख हैक्टेयर भूमि पर जितनी उत्पादकता होनी चाहिए थी उतनी उत्पादकता इर्रिगेशन पोटेंशियल बढ़ने से हुई है। ...( व्यवधान) वर्ष 2003 से वर्ष 2008 के बीच हमारे देश के अलग-अलग राज्यों में प्रति हैक्टेयर उत्पादन क्या रहा?

          अगर हम चावल की बात करें तो वर्ष 2003 में, पंजाब में, 3654 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर उत्पादन होता था जो वर्ष 2008-2009 में बढ़कर 4022 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर हो रहा है। यूपीए सरकार आने के बाद उत्पादन बढ़ा है। ...( व्यवधान) मुझे लगता है कि सबसे बड़े जानकार आप ही हैं। इसीलिए पिछले दो चुनावों में जनता ने धक्का मारकर ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : निरूपम जी, चेयर को एड्रेस कीजिए।

श्री संजय निरुपम :  आपको इतना ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। हम भी महंगाई से परेशान हैं लेकिन उसके कारणों को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप लोग बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बार-बार क्यों खड़े हो रहे हैं। आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : मैं किसी अन्य सदस्य को बोलने के लिए अलाऊ नहीं करूंगी। कृपया सभी माननीय सदस्य श्री संजय निरूपम को सुनें।

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : शरद जी, आप कल भी बोले थे। आपको फिर मौका मिलेगा, आपका बोलने का नम्बर आने वाला है।

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम : महोदया, यह बहुत अजीबो-गरीब सवाल है कि आप मुम्बई में रहते हो, आप खेती के बारे में क्या जानते होंगे। मैं मुम्बई में रहता हूं, लेकिन इस देश के 72 प्रतिशत किसानों के प्रति मेरे मन में एक आदर की भावना है, उनके प्रति विश्वास है, उनके लिए सम्मान है। उस सम्मान के नाते मैं बताना चाहता हूं कि आज पंजाब की क्या पोजिशन है। पंजाब में उत्पादन बढ़ा, लेकिन छत्तीसगढ़, जिसे धान का कटोरा कहा जाता है, उसकी असलियत आप समझने की कोशिश कीजिए।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम : वर्ष 2003-04 में छत्तीसगढ़ के अंदर 1454 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उपज होती थी। उसके बाद वर्ष 2008-09 में घटकर 1176 किलोग्राम उपज प्रति हेक्टेयर हो रही है।

अध्यक्ष महोदया : आप फिर खड़े हो गए हैं। यह क्या हो रहा है?

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : शरद यादव जी, आप बैठ जाएं। आपका नम्बर अभी आने वाला है।

…( व्यवधान)

श्री शरद यादव (मधेपुरा):अध्यक्ष महोदया, मैं इस विषय पर नहीं बोल रहा हूं। आप मेरी बात सुन लीजिए। मेरा सारे सदन के सदस्यों से निवेदन है कि उस तरफ से जो उत्तर दिया जा रहा है, उसका उत्तर देने के लिए हम यहां बैठे हैं। लेकिन हर मिनट पर इतनी गंभीर चर्चा को हम हलका न करें। मेरी विनती है कि इस विषय पर चर्चा को चलने दें, जिससे कि इसकी गंभीरता बनी रहे। माननीय सदस्य बहुत बड़ी बात नहीं कह रहे हैं, जिसका उत्तर हम उन्हें बीच-बीच में देते रहें। हमें इस चर्चा का मज़ाक नहीं बनाना है।

अध्यक्ष महोदया : ठीक है, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

श्री संजय निरुपम : महोदया, मैं पंजाब के किसानों को सलाम करता हूं कि संकट के समय भी उन्होंने अपने उत्पादन को प्रभावित नहीं होने दिया। लेकिन याद रखने की जरूरत है कि कृषि, सिंचाई आदि व्यवस्थाएं राज्य सरकार के पास होती हैं। इसे राज्य का सब्जेक्ट कहते हैं। आखिर छत्तीसगढ़ में इतना फेरबदल कैसे हुआ कि जिसे धान का कटोरा कहा जाता था, वहां चावल का उत्पादन कैसे कम हो गया। मुझे लगता है कि इस सवाल का उत्तर ढूंढ़ना जरूरी है कि वहां खेती के लिए क्या-क्या प्रयास किए गए। हमें इस बात पर भी चिंतन करने की जरूरत है कि उपज को बढ़ाने के लिए वहां की सरकार ने क्या-कया प्रयास किए। पूरे देश में उत्पादकता बढ़नी चाहिए, ऐसा नेता विपक्ष का विशेष आग्रह था। यह आरोप भी लगाया गया कि आपके राज में उत्पादकता नहीं बढ़ी। मैं चाहता हूं कि एक जानकारी आपके समक्ष रखूं। वर्ष 2002-03 में जब एनडीए का शासन था, जिस शासन का गौरवगान करते आज भी बीजेपी के हमारे साथी आज भी नहीं थकते हैं, उस समय चावल का उत्पादन 71.82 मिलियन टन था। वर्ष 2008-09 में, यानी यूपीए सरकार का पिछला साल, इस साल चावल का उत्पादन 99.18 मिलियन टन हुआ।

 अब मैं गेहूं के बारे में बताता हूं। गेहूं का उत्पादन वर्ष 2002-03 में 65.76 मिलियन टन हुआ करता था और वर्ष 2008-09 में बढ़कर 80.68 मिलियन टन हो गया। इसके बाद भी सुषमा जी कहती हैं कि उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो मुझे लगता है कि उनके पास जो आंकड़े हैं, शायद वे ज़ायज नहीं हैं, शायद आंकड़ो में कोई दोष है। उनका सुझाव सही है कि उत्पादकता बढ़नी चाहिए लेकिन सच यह है कि भारी सूखे और बाढ़ के बावजूद उत्पादकता बढ़ रही है। ...( व्यवधान) यहां बार-बार महंगाई के कारणों के बारे में चर्चा होती है कि खाद्यान्न की सट्टेबाजी चल रही है। मैं खुद इस सट्टेबाजी के खिलाफ हूं।  मैंने इस सट्टेबाजी के खिलाफ न ही सिर्फ बोला है, मैंने हमारे देश में जो तीन कमोडिटी एक्सचेंज हैं, जहां खाने-पीने की चीजों के ऊपर सट्टेबाजी के खिलाफ न सिर्फ बोला है बल्कि पार्टी में भी नोट्स दिए हैं। मुझे बहुत खुशी होती है कि सरकार ने पिछले दो-तीन वर्षों में समय-समय पर अलग खाद्यान्नों को डिलिस्ट करने का निर्णय भी लिया है। आज किसी भी खाद्यान्न की फॉरवर्ड ट्रेडिंग नहीं हो रही है। कमोडिटी एक्सचेंज कृषि मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं। मैं सरकार से कहना चाहता हूं कि कभी भी किसी भी समय कमोडिटी एक्सचेंज से किसी भी खाद्यान्न की फारवर्ड ट्रेडिंग नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह आम आदमी के जीवन से जुड़ा प्रश्न है। सट्टेबाजी की दुकान लग गई, बहुत बुरा हो रहा है इसलिए मैं बीजेपी के साथियों को याद दिलाना और पूछना चाहता हूं कि सट्टेबाजी की दुकान किसने लगाई? ये कमोडिटी एक्सचेंज कब शुरू किए गए? मैं तीन कमोडिटी एक्सचेंज का इतिहास बना देता हूं। There is a National Commodity and Derivatives Exchange Limited, NCDEX. It is located in Mumbai. It was incorporated on 23.4.03. तब यूपीए सरकार नहीं थी। ...( व्यवधान) हम जानते हैं, पूरा देश जानता है, आप एक ही बात कहते रहते हैं।...( व्यवधान)NCDEX was incorporated on 23.4.03. इसके लिए यूपीए जवाबदार नहीं है। ...( व्यवधान) कमोडिटी एक्सचेंज का ऑपरेशन 15.12.03 को शुरू हुआ। Then, Multi Commodity Exchange of India Limited, the biggest commodity exchange in India, is also located in Mumbai. It was incorporated on 10.11.03. The next one is National Multi Commodity Exchange of India Limited. … (Interruptions) मैं आपको इसके बारे में अभी बता देता हूं।It was incorporated on 28.12.01 and started operation on 26.11.02. देश को बता रहे हैं कि सट्टेबाजी हो रही है, अनाज की सट्टेबाजी की दुकान लगी हुई है। मैं बताना चाहता हूं कि ये दुकान लगाने वाले और कोई नहीं बल्कि एनडीए और बीजेपी के लोग हैं।...( व्यवधान) मैं इस दुकान के पक्ष में नहीं हूं। ...( व्यवधान) ये दुकान बंद नहीं होगी लेकिन खाद्यान्नों की फारवर्ड ट्रेडिंग बंद होनी चाहिए। अब मैं आपको आगे की बात बताता हूं, खाद्यान्नों की फारवर्ड ट्रेडिंग बंद हो चुकी है लेकिन पूरी दुनिया में फारवर्ड ट्रेडिंग चल रही है। सुषमा जी ने कौन से फ्यूचर प्राइसिस सुनाए हैं, मुझे नहीं मालूम लेकिन अभी शिकागो बोर्ड पर चावल की जो नेटटैस्ट फ्यूचर प्राइसिंग फारवर्ड ट्रेडिंग के तहत हुई है, मैं उसके दो-तीन फिगर बताना चाहता हूं।

13.00 hrs.             इससे हम कैसे बचेंगे, यह चुनौती सरकार के सामने है। यह एक बड़ी चुनौती है। हमें अपने खाद्यान्नों की ट्रेडिंग बंद कर देनी चाहिए। लेकिन लंदन एक्सचेंज, शिकागो एक्सचेंज और पुरी दुनिया के हर देश में कमोडिटी एक्सचेंज चल रहे हैं। हम एक ग्लोबलाइज्ड इकोनोमी में जी रहे हैं। कोई रिस्ट्रिक्शन नहीं है, कोई बंधन नहीं है, कहीं का माल कहीं भी आ सकता है। उन्होंने धर्मेन्द्र की कहानी सुना दी कि इधर का माल उधर और उधर का माल इधर और वही धर्मेन्द्र बीजेपी में शामिल हो गया। मुझे उस तरह के सनसनीखेज बयानों में नहीं जाना है।

MADAM SPEAKER: I have to inform the House that there shall be no Lunch Break.

         Shri Sanjay Nirupam, please continue with your speech.… (Interruptions)

 

SHRI SANJAY NIRUPAM : Future prices of wheat at the Chicago Board of Trade on 01 February 2010 को गेहूं का जो फ्यूचर प्राइस था, मार्च, 2010 में जो फ्यूचर प्राइसिंग की गई, वह 174.44 यू.एस डालर पर मीट्रिक टन था और यही शिकागो बोर्ड पर 1 फरवरी, 2010 को जुलाई, 2010 की जो फ्यूचर प्राइसिंग की गई है, वह 184.27 यूएस डालर पर मीट्रिक टन है। आज हम फरवरी महीने में हैं, फरवरी की 18 तारीख को जुलाई, 2010 की प्राइसिंग शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड पर अनाउंस हो चुकी है। इस अंतर्राष्ट्रीय फारवर्ड ट्रेडिंग से यह देश कैसे बचेगा? मुझे लगता है कि आज यह सवाल सरकार के सामने है और विपक्ष की तरफ से इस सवाल से जूझने का सजेशन आना चाहिए। हम यह भूल गये कि 1991 के बाद से हमने उदारीकरण की नीति को स्वीकार किया है। हम लोग एक ग्लोबलाइज्ड इकोनोमी में जी रहे हैं। अलग-अलग देशों में इनफ्लेशन बढ़ेगा तो उसका असर हम पर पड़ेगा। अलग-अलग देशों में महंगाई बढ़ेगी तो उसका असर हम पर पड़ेगा और अलग-अलग देशों में दाम कम होंगे तो उसका फायदा भी हमें होगा। आज इंटरनेशनल लैवल पर क्या प्राइसिंग चल रही है? सुषमा जी ने अपनी तरफ से कुछ इंटरनेशनल सीन बताया था। आज मुद्रास्फीति की स्थिति यह है कि उत्तर अमरीका में पिछले एक-दो वर्षों में जो इनफ्लेशन रेट रहा, वह जीरो से लेकर छः प्रतिशत रहा। दक्षिण अमरीका में तीन से लेकर 12 प्रतिशत रहा। यूरोप में माइनस...( व्यवधान) अमरीका की बात इसलिए कर रहा हूं क्योंकि इस समय आप ग्लोबलाइज्ड इकोनोमी में जी रहे हैं। आपके पड़ोस में क्या हो रहा है, उसका प्रभाव आप पर भी पड़ेगा।...( व्यवधान) You cannot live in isolation. Please try to understand this point. … (Interruptions)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइये।

...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइयेगा। जब आपके दल की बारी आयेगी, तब आप बोलियेगा। अभी आप बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम : यदि आपको अमरीका से तकलीफ है तो एशिया की बात सुनिये। एशिया में इस समय इंडिया का इनफ्लेशन रेट 8.3 था। चाइना छः परसैन्ट था, रशिया 14.1 प्रतिशत था, पाकिस्तान 20.3 और श्रीलंका 22.6 प्रतिशत था। अगर आप ऐसी स्थितियों के हिसाब से चलें तो मुझे लगता है कि हिंदुस्तान में काफी हद तक चीजें नियंत्रण में रही हैं। आप यह मत भूलिये कि सिर्फ सूखा और बाढ़ का प्रश्न है। आप यह मत भूलिये कि सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल का भाव बढ़ा है। आप यह भी याद रखिये कि पिछले दो वर्षों से एक आर्थिक मंदी का दौर चल रहा है और इस आर्थिक मंदी के दौर में दुनिया के बड़े-बड़े देशों की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई। अमरीका बर्बाद हुआ, ब्रिटेन का जीडीपी ग्रोथ निगेटिव होने लगा। चाइना, जिसे एक फास्टैस्ट इमर्जिंग इकोनोमी बोला जाता था, उसकी पूरी डीजीपी ग्रोथ लड़खड़ा गई। ऐसे में हमारे देश में ...( व्यवधान) कृपया रनिंग कमेन्ट्री मत करिये, यदि आप गंभीर नहीं हैं तो आप प्लीज बाहर चले जाइये। प्लीज, बाहर जाइये। ...( व्यवधान) यदि आपके मन में गरीबों के लिए थोड़ी सी भी चिंता है, अगर आपके मन में गरीबों के लिए इतनी चिंता है...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Shri Nirupam, please address the Chair.

… (Interruptions)

अध्यक्ष महोदयाः ऐसे में आप रनिंग कमैंट्री मत करिए,                               ( व्यवधान)  ……* MADAM SPEAKER : Sanjay Nirupam ji, please address the Chair.

…( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: आप बैठ जाइये। नीरज जी, आप इतना नाराज क्यों हो रहे हैं?

                    ( व्यवधान)...

श्री संजय निरुपम (मुम्बई उत्तर):  अगऱ महंगाई के लिये इतने चिन्तित हैं ...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER : Don't join the issue.

… (Interruptions)

MADAM SPEAKER : Nothing will go on record.

(Interruptions) …* अध्यक्ष महोदया : आप बैठिये। इस तरह से बातें नही करते हैं। Please delete  all this.

आप बैठ जाइये।

श्री संजय निरुपम : अध्यक्ष महोदया, दाल और शक्कर के भाव बेतहाशा बढ़े हैं। हमने महसूस किया और सारा देश महसूस कर रहा है। लेकिन पिछले 15-20 सालों से दालों के उत्पादन और खपत में बहुत बड़ा गैप है। हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिये। हम उस गैप को आज तक भर नहीं पाये हैं। लगभग 3-4 लाख मीट्रिक टन दाल की कमी है। दालों का हम बाहर से आयात कर रहे हैं। यह पहली बार नहीं किया गया है, हर समय किया गया है। जब आप बाहर  से इम्पोर्ट करते हैं तो वहां के दामों का असर हमारे घरेलू दामों पर  पड़ता है। हम म्यांमार से 8 लाख टन तूर दाल इम्पोर्ट करते हैं।  अचानक वहां भी तूर दाल का उत्पादन कम हो गया. उसने इम्पोर्ट कम किया और रोका। क्योंकि बाकी देशों में तूर दाल नहीं होती है, इसलिये और कहीं से नहीं आती है। आस्ट्रेलिया में एक पीली मटर की दाल होती है। हमारे यहां के लोगों को पीले मटर खाने की आदत नहीं है क्योंकि इससे वई होती है। फिर क्या करेंगे, जब तूर दाल नहीं है तो पीली मटर की दाल खानी पड़ेगी।  राज्य सरकार की इस बारे में क्या भूमिका है? जब आप दिल्ली में रहते हैं तो आप गाड़ी में घूमते होंगे, एफएम रेडियो सुनते होंगे।  दिल्ली सरकार किस प्रकार का ऐड दे रही है कि थोड़ा कोशिश करिय़े और पीली मटर की दाल पर निर्भर करिये, इसकी सप्लाई ज्यादा हो रही है, सस्ती हो रही है। कहीं न कहीं जनता और सरकार के बीच में संवाद स्थापित होना चाहिये। यह संवाद स्थापित करने की जिम्मेदारी केवल केन्द्र सरकार पर नहीं, राज्य सरकार की भी बनती है। मैं केन्द्र और राज्यों के बीच संबंधों के विवाद की बातें नहीं कर रहा हूं लेकिन यह हम सब की जवाबदारी बनती है।

           अध्यक्ष महोदया, यहां शुगर की बात कही गई है। विश्व में ब्राजील देश शुगर का सब से बड़ा उत्पादक देश है। सन् 2005 में  अचानक ब्राजील में शुगर का बम्पर प्रोडक्शन हुआ, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में शुगर का दाम कम हो गया। हमारे यहां शुगर फैक्ट्री वाले परेशान हो गये।  महाराष्ट्र में एक-दो शुगर फैक्ट्री वालों को मैं भी जानता हूं। उन्होंने 2005 में कहा कि शुगर फैक्ट्री चलाना उनके लिये मुश्किल हो रहा है क्योंकि बाहर की शुगर सस्ती हो रही है और हमारी शुगर खरीदने को कोई तैयार नहीं है। इस कारण हमारी शुगर इंडस्ट्री का पूरा का पूरा चेन गड़बड़ा रहा है। उसके बाद  2008-09 की स्थिति यह रही कि वह पलट गई।  आज ब्राजील  में शुगर का उत्पादन उतना नहीं होता। आज ब्राजील में 50 परसेंट से ज्यादा शुगर का उपयोग इथेनिल के लिये हो रहा है।  आज ब्राजील में शुगर प्रोडक्शन 50 प्रतिशत कम हो गया है। हमारे यहां 220 लाख मीट्रिक टन शुगर की आवश्यकता है जबकि हमारे पास 160 लाख मीट्रिक टन उपलब्ध है। इस कारण सरकार के सामने इस गैप को भरना चुनौती है। इस चुनौती से जूझते समय अगर महंगाई बढ़ती है तो हमारे ऊपर बात आयेगी और हम सुनेंगे।  जो सत्ता में होता है, उसे हर तकलीफ के लिये जवाबदेही देनी होती है। अगर कहीं बम विस्फोट होगा तो हमारे ऊपर जिम्मेदारी आयेगी। अगर महंगाई बढ़ेगी तो हमारे ऊपर बात आयेगी लेकिन सरकार की नीयत की तरफ भी ध्यान से देखिये। सरकार जहां जहां गैप है, शुगर उपलब्ध कराकर उसे भरने का प्रयास कर रही है।

कहीं पर एमएसपी बढ़ा रही है, जहां अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीजों के दाम कम हो रहे हैं, वहां से इम्पोर्ट करने का प्रयास कर रही है। मैं महंगाई के मुद्दे पर संवेदनशीलता के साथ अपना दुखः प्रकट करते हुए, गरीब लोगों के लिए चिंता प्रकट करते हुए सरकार से चाहूंगा कि आने वाले दिनों में महंगाई के ऊपर ज्यादा अच्छे ढ़ंग से, ज्यादा खूबी के साथ, ज्यादा बेहतर तरीके से नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास करे ताकि आम आदमी को राहत मिले। आम आदमी के लिए जो जरूरत की चीजें हैं, उनके भाव थोड़े कम हों। धन्यवाद।

             

श्री मुलायम सिंह यादव (मैनपुरी):महोदया, मैं आपको धन्यवाद देता हूं। अभी तक के जो भाषण हुए हैं, कुछ लोग अच्छा बोले, ठीक है। हम आने वाले वक्ताओं से पूछना चाहते हैं कि क्या शिकागो और एशिया के आंकड़ों से इन गरीब लोगों का पेट भरेगा? इतनी गंभीर समस्या है कि जो महंगाई है, वह कैसे रूके और गरीबों का पेट कैसे भरे? हम केवल इतनी सी बात आपके सामने रखना चाहते हैं। हमारी संक्षिप्त सी बात है, कोई लंबा भाषण नहीं है। आजादी के बाद से अब तक यह महंगाई सबसे ज्यादा बढ़ी है। इतनी महंगाई कभी नहीं बढ़ी, महंगाई एक-दो दिन नहीं, प्रतिदिन बढ़ रही है। आप अंदाजा लगा सकते हैं, हम आंकड़े नहीं देंगे, पिछला सत्र जो दिसंबर में खत्म हुआ है, उस सत्र में सरकार ने महंगाई कम होने का आश्वासन दिया था। आप देख लीजिए कि तब महंगाई कितनी थी और आज महंगाई कितनी है। दोनों पक्ष के लोगों को यह फैसला करना है। प्रधानमंत्री जी या महोदया, आप मीटिंग बुला लीजिए, आखिर इसका कोई तो रास्ता निकालना है। इसका कोई रास्ता नहीं निकाला जा रहा है। सदन में यह होड़ लगी है कि कौन ज्यादा आंकड़े देगा? बुरा मत मानिए। हम केवल एक-दो आंकड़े देंगे, आप उससे ही अंदाजा लगा लीजिए कि देश की क्या हालत है और इसके लिए क्या राय दी जानी चाहिए? मैंने पहले ही बता दिया है कि रोजमर्रा की उपभोक्ताओं की चीजों के दाम दिन-प्रतिदिन बढ़ते चले जा रहे हैं। सरकार जितनी भी महंगाई घटाने की घोषणा करती है, वह उतनी ही बढ़ जाती है, इसकी क्या वजह है? यह सीधी सी बात है कि केंद्र सरकार पूरी तरह से देश के उद्योगपतियों और पूंजीपतियों से मिली हुई है। माननीय कृषि मंत्री शरद पवार जी, मैं आपको सावधान करना चाहता हूं कि बड़ी चालाकी से यह पूरे देश में चलाया गया है कि महंगाई के लिए शरद पवार जिम्मेदार हैं। ऐसा वातावरण बना दिया गया है। मैं बता रहा हूं कि कांग्रेस पार्टी की जिला कमेटियों तक यह प्रचार है। यह नहीं है कि आप कटघरे में ऐसे ही खड़े हो जाएंगे, एक इतिहास भी लिखा जाएगा कि आपके जमाने में सबसे ज्यादा महंगाई बढ़ी। इसके लिए माननीय शरद पवार जी जिम्मेदार थे। यह बहस सरकारी पक्ष में छिड़ी हुई है और आप चुपचाप हैं। आपको पद भले ही मिल गया हो, आप कृषि मंत्री हो, यह देश के लिए बहुत बड़ी चीज नहीं हैं। कभी किसी मंत्री या प्रधानमंत्री का इतिहास नहीं रह सकता। इतिहास उसका रहता है, जो जनता के लिए काम करे और उसके लिए मिटने के लिए तैयार रहे। उनका ही इतिहास बना है। मैं नाम नहीं लेना चाहता, चाहे गांधी जी हों, चाहे जय प्रकाश जी हों, चाहे लोहिया जी हों, ये पद पर नहीं रहे, लेकिन हिन्दुस्तान का इतिहास इनके इतिहास को नहीं मिटा सकता है। इसलिए मैं आपको सच्चाई से, दिल से सावधान करना चाहता हूं। यह सारा आरोप आपके ऊपर जा रहा है। आप इसके लिए जवाब दीजिए और सही जवाब दीजिए। इसके लिए पूरी तरह से सरकार जिम्मेदार है। प्रधानमंत्री जी से लेकर जितने मंत्री हैं और ये जो सारे लोग बैठे हैं, ये महंगाई के लिए जिम्मेदार हैं। ये इसे स्वीकार क्यों नहीं करते हैं? आप सहयोग मांगिए, कहिए कि हां, महंगाई है, आप सहयोग दीजिए।

          महोदया, आज इतनी महंगाई हो गयी तो क्या हिन्दुस्तान, इस सरकार के चलाने वालों के नाम पट्टा है। यहां हम सब लोग आये हुए हैं, जो नेता थे, उन्हें मंहगाई की समस्या के लिए बुलाते कि महंगाई बढ़ रही है, आप सुझाव दीजिए। हम बहस नहीं कराते, तय हो जाता। क्या हमें कभी बुलाया, महोदया, आप ही बुला लेतीं। ये आपकी बात नहीं मानते हैं तो हम लोगों के सामने बात रखते कि सरकार नहीं मान रही है या केंद्र सरकार मेरे वश में नहीं है।

   13.15 hrs. (Mr. Deputy Speaker in the chair)   आज हम इतना ही कहना चाहते हैं और इसका एक सबूत है कि चीजों के दाम इसलिए बढ़ रहे हैं, क्योंकि केंद्र सरकार उद्योगपतियों से मिली है। मैनवाल्को एक कंपनी है, इसका मैं एक ही उदाहरण देना चाहता हूं।

इसका एक ही सबसे बड़ा सुबूत है कि चीनी के दामों में अभूतपूर्व वृद्धि आखिर क्यों हो रही है। आपको इसका पता है। गन्ना कहाँ ज्यादा पैदा हो रहा है, चीनी कहाँ ज्यादा पैदा हो रही है, आपको सबसे ज़्यादा ज्ञान है। आपने कहा भी है और जब हम सरकार में वहाँ थे तो आपने यहाँ भाषण दिया भी था और प्रदेश में अधिक चीनी पैदा होती है। वह मेरे पास है, लेकिन उसको बोलने की ज़रूरत नहीं है। एक तरफ चीनी मिल मालिकों के पास लाखों टन चीनी रखी हुई है तो आपने निजी क्षेत्र की कंपनियों को विदेश से चीनी आयात करने की अनुमति क्यों दी? इसका जवाब मुझे मिलना चाहिए। चीनी गोदामों में भरी पड़ी है। हम तो उत्तर प्रदेश में रहते हैं जहाँ सबसे ज्यादा चीनी मिलें हैं, जहाँ सबसे ज्यादा चीनी पैदा होती है। एक तरफ चीनी भरी पड़ी है और दूसरी तरफ जो निजी मिल मालिक हैं, उन्हीं को अनुमति दी जाती है चीनी आयात करने की। हम लोग निर्यात भी कर सकते थे, और चीनी निर्यात भी की गई। हम लोग निर्यात भी कर रहे हैं और आयात भी कर रहे हैं। यह सही कहा था कि ये दोनों काम नहीं चलने चाहिए। निजी कंपनियों द्वारा बाहर से 16 रुपये किलो चीनी मंगाई जा रही है। यदि आप चीनी मिल मालिकों से सारी चीनी बाहर निकलवा दीजिए तो एक हफ्ते के अंदर चीनी का भाव 50 रुपये से घटकर 25 रुपये हो जाएगा, यह बात मैं सदन में ज़िम्मेदारी के साथ कहना चाहता हूँ। चीनी मिल मालिकों के यहाँ भरी पड़ी है। माननीय शरद यादव जी भी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में चीनी मिल मालिकों के यहाँ चीनी भरी पड़ी है और उन्हीं को बाहर से चीनी खरीदने की अनुमति दी जा रही है। वह 16 रुपये किलो पर आएगी और यहाँ 50 रुपये में बेचेंगे? 46 रुपये किलो तो कहीं-कहीं मिल रही है लेकिन 50 रुपये किलो चीनी बिक रही है। 50 रुपये किलो चीनी मैंने खुद खरीदी है, 46 रुपये किलो चीनी कहाँ मिल रही है? शायद कुछ लोगों को मिल रही होगी, किसी दुकान पर मिल रही होगी। हज़ारों टन चीनी बंदरगाहों पर पड़ी है और आपको पता भी है। उपभोक्ता की जेब से तो पैसा चला गया। आप इसे कब घटाएँगे - जब उपभोक्ता पूरा बरबाद हो चुका होगा। मैंने जो पहले कहा, वह आज भी कह रहा हूँ कि देश की जनता हताशा और निराशा में है लेकिन कोई भी व्यक्ति जब हताशा और निराशा में होता है तो मरना कबूल नहीं करेगा, वह कुछ ऐसे काम करने के लिए तैयार हो जाएगा जिससे देश की एकता और अखंडता को खतरा पैदा हो जाएगा। ...( व्यवधान) मैं उन शब्दों को नहीं कहूँगा, लेकिन वह तैयार होगा। कभी हताशा और निराशा ज्यादा हो जाती है तो कोई व्यक्ति मरना कबूल नहीं करेगा। वह ऐसा कदम उठाएगा, ऐसा तरीका अख्तियार करेगा जिससे देश की एकता और अखंडता को खतरा होगा। यह सवाल है महंगाई का। यह होगा और हम लोग इसको मिलकर भी नहीं बचा पाएँगे। कहते हैं कि मरता क्या न करता। वही हाल हो जाएगा। ...( व्यवधान)

श्री शरद यादव : यह काम इनके साथ होगा, हम लोगों के साथ थोड़ी होगा, हमारा क्या दोष है?

श्री मुलायम सिंह यादव : वह मैंने कह दिया है कि किसके लिए होगा।

श्री लालू प्रसाद : सरकारों के खिलाफ होगा।

श्री मुलायम सिंह यादव : सरकारों के खिलाफ होगा। अब ज्यादा नहीं कहेंगे नहीं तो ये इधर के उधर लड़ जाएँगे, मेरी तो सरकार कहीं है नहीं। ...( व्यवधान) कभी इनकी सरकार के खिलाफ वे बोल देंगे और ये उनकी सरकार के खिलाफ बोल देंगे और बहस उसी में चली जा रही है।...( व्यवधान)

          इसलिए हम आपसे कहना चाहते हैं कि जो चीनी गोदामों में भरी पड़ी है, उसको माननीय कृषि मंत्री जी और वित्त मंत्री जी बाहर निकालें। बाहर निकालकर दिखा दीजिए। आप कहेंगे कि राज्य सरकार का काम है। यह बहाना करके आप बच नहीं सकते हैं। बहाना करके इस पाप से बच नहीं सकते। गरीबी के कारण लोग  भूख से मर रहे हैं। जो बीमार हैं, उनके पास दवाई के लिए भी पैसे नहीं हैं और वे बेमौत मर रहे हैं। गरीबों के पास उनके बच्चों की पढ़ाई, दवाई के लिए पैसा नहीं है, यह हालत आज है।  इस महंगाई से उत्पन्न गरीबी के कारण बहुत से बच्चे आज स्कूल छोड़ रहे हैं।

इसके लिए कौन जिम्मेदार है? हम तो आप लोगों को सावधान कर रहे हैं क्योंकि जनता सब सुन भी रही है और देख भी रही है। अब वह ज़माना नहीं रहा है। गांव-गांव में चैनल लगे हुए हैं। इसलिए हम आज जो भाषण दे रहे हैं, उसे लोग देख और सुन रहे हैं। इसके परिणामों के लिए हम नहीं, आप जिम्मेदार होंगे। लेकिन देश का सवाल है, इसलिए चिंता है। इसलिए आपको सलाह दे रहा हूं, हताशा, निराशा के कारण जनता बहुत दिनों तक अपने आपको रोक नहीं सकेगी। फिर वह दूसरा रास्ता इख्तियार करेगी, जिससे देश की एकता और अखंडता का खतरा पैदा होगा। यह सबसे महत्वपूर्ण है, जिस पर आपको विचार करना चाहिए। अब इस सदन के अंदर इसे लेकर गंभीरता आए, यह आप जानिए, आपको सही राय देना हमारा फर्ज़ है।

          हम आपको समर्थन दे रहे हैं, इस पर अब हमें पश्चाताप हो रहा है। हम नहीं जानते थे कि सरकार इस तरह से कार्य करेगी। हमने केवल साप्रदायिक शक्तियों को रोकने के लिए समर्थन दिया था। क्योंकि इसके लिए ये लोग भी जिम्मेदार हैं। यदि ये लोग मस्जिद नहीं गिराते तो आज कांग्रेस सरकार में नहीं आते। हम लोगों की यह मजबूरी है कि हमारे पास कोई और रास्ता नहीं है। देश के सामने इनका जवाब नहीं है। यदि मस्जिद नहीं गिराई होती तो आज आपकी स्थिति दूसरी होती।...( व्यवधान) बहुमत नहीं कर पाओगे। यदि आप वह कर भी लेंगे तो हम समर्थन नहीं करेंगे।...( व्यवधान) अब कैसे मिलेंगे? हम आपसे दो बार मिले थे, लेकिन अब नहीं मिलेंगे।...( व्यवधान) हम समान विचारधारा के लोगों को मिलेंगे। भा.ज.पा. के साथ जो दल हैं उन लोगों को हम निकालेंगे। शरद यादव से भी कहेंगे निकलो। देश के हित में निकलो, समाज के हित में निकलो, किसान के हित में निकलो, जिन के वोट लेकर आए हैं, उनके हित में निकलो।...( व्यवधान) हम सब एक हो जाएंगे।...( व्यवधान) पवार जी को तो हम सावधान कर रहे हैं ताकि वह कांग्रेस से निकल कर इधर आएं।

          महोदय, गरीबी की रेखा से नीचे कितने लोग हैं, इसकी परिभाषा को बदला जाना चाहिए। सरकारी आंकड़े के अनुसार 27 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। लेकिन अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी रिपोर्ट के अनुसार 80 फीसदी लोग आठ रूपये से बीस रूपये तक रोजाना खर्च करते हैं। उनकी इतनी ही क्षमता है। अर्जुन सेन गुप्ता ने यह रिपोर्ट भारत सरकार को दी है, देश के सामने रखी है। इससे आप यह देख सकते हैं कि गरीबी रेखा से नीचे कितने लोग हैं। हमारे अनुसार 80 फीसदी लोग आज दुखी हैं, उन्हें खाने-पीने का सम्पूर्ण भोजन को नहीं मिल रहा है। मध्यम वर्ग भी मजबूर है। वह सोचता था कि समाज में हमारी इज्जत है, लेकिन उनकी भी बेइज्जती हो रही है। आज उन्हें भी महंगाई की मार से दो समय सम्पूर्ण भोजन  नहीं मिलता है। भरपेट का मतलब दूध भी मिले, दही भी मिले, मट्ठा, घी भी मिले और फल भी मिले। 80 फीसदी लोग ऐसे हैं, जिन्हें दो समय का भरपेट खाना नहीं मिल रहा है। यह स्थिति देश में है। इसके कारण बीमारियां बढ़ रही हैं।

          महोदय, सरकार ने आर्थिक सर्वे करवाया। सरकार ने अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट को स्वीकार किया है और उन्होंने भी स्वीकार किया है कि 63 फीसदी लोग 20 रूपये से कम प्रतिदिन खर्च करते हैं। सरकार ने जो आर्थिक सर्वे करवाया था, उसमें भी अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट को स्वीकार किया गया है। यह कमेटी किसने बनायी? आर्थिक सर्वे किसने करवाया? सरकार ने करवाया और आपने लिखा है कि अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट सही है कि 80 फीसदी हिन्दुस्तान के लोग 8 रूपये से 20 रूपये तक खर्च करने की क्षमता रखते हैं। इस बात को स्वीकार किया है कि 63 फीसदी लोग तो निश्चित हैं, जो 20 रूपये से कम खर्च प्रतिदिन करते हैं।

          उपाध्यक्ष महोदय, अब आप बताइए पढ़ाई-लिखाई कहां से होगी, दवाई कहां से आएगी, आज यह हालत है। इसलिए हम ज्यादा आंकड़े नहीं देना चाहेंगे और अपने मित्रों से भी कहेंगे कि वे आंकड़ों में न पड़ें। यह सही है कि नेता विरोधी दल ने अच्छा भाषण दिया, लेकिन आंकड़ेबाजी ज्यादा कर दी। उन्हें न किसान समझता है, न गरीब समझता है और न भूखा समझता है। आंकड़े तो सबके पास हैं। चाहे जितने आंकड़े दे दो, लेकिन आंकड़ों से कैसे पेट भरेगा?  सभी कह रहे हैं कि आंकड़े दो, आंकड़े दो। सवाल है कि पैदावार कैसे बढ़े?

          उपाध्यक्ष महोदय, हिन्दुस्तान की खेती की जमीन प्रति वर्ष तीन फीसदी कम होती चली जा रही है। वैसे तो ज्यादा है, लेकिन कम से कम तीन प्रतिशत, प्रति वर्ष खेती की जमीन कम होती जा रही है। उस जमीन पर कारखाने बन रहे हैं, कॉलेज बन रहे हैं, अस्पताल बन रहे हैं, मकान बन रहे हैं और शहर बसाए जा रहे हैं। यह गम्भीर सवाल है। अगर तीन फीसदी की दर से, जमीन प्रति वर्ष घट रही है, उसके लिए आप क्या कर रहे हैं या करेंगे? मैं बताना चाहता हूं कि हमने अपनी सरकार के समय में खेती को बढ़ाने के लिए काफी प्रयास किया और उसका बहुत फायदा हुआ। हमने उत्तर प्रदेश में मजदूर और भूमि सेना बनाई। भूमि सेना से हमने 65 हजार एकड़ जमीन को खेती लायक बनाने का प्रयास किया और उसमें पैदावार करा के दिखा दी। उसके लिए हमने कहा कि जब तक जमीन खेती के लायक नहीं हो जाएगी, तब तक उस पर जितना भी खर्च होगा, वह पूरा सरकार करेगी। उस पर पूरी मजदूरी, नाली, पानी का इंतजाम, वह चाहे वह बिजली के माध्यम से हो, नहर के माध्यम से हो या टय़ूबवैल के माध्यम से हो, उसका इंतजाम किया। इस प्रकार का अभियान चलाकर हमने उत्तर प्रदेश में 65 हजार एकड़ जमीन को खेती के लायक बनाने का प्रयास किया। आप स्वय बता रहे हैं, कानपुर और हरदोई जिले में जाइए, भूमि सेना ने कितनी जमीन खेती लायक तैयार की और उसमें पैदावार हुई। हमारे यहां बेहड़ कितना हैं, हमारे यहां क्वारी, चम्बल और यमुना नदियां हैं। यहां के बेहडों को, इन बीहड़ों को खेती लायक बनाया जा सकता है। इन तीनों नदियों में पानी है और यदि नहीं होगा, तो पानी का इंतजाम किया जा सकता है, पैदावार बढ़ाई जा सकती है, लेकिन कांग्रेस   में बैठे लोगों को किसानों और गरीबों की कोई परवाह नहीं है।

          उपाध्यक्ष महोदय, आज यहां इस समय प्रधान मंत्री नहीं हैं। ऐसी बहसों के समय प्रधान मंत्री को सदन में उपस्थित रहना चाहिए और इससे उन्हें  कोई मतलब ही नहीं है। यह गंभीर बात है, लेकिन दिखाई नहीं देती है। आप इन बैंचों पर गिन लीजिए कि कितने लोग हैं। जो इस सरकार को समर्थन दे रहे हैं, यदि उन्हें निकाल दीजिए, तो गिन लीजिए कि कांग्रेस के लोगों की इस समय उपस्थित लोगों की संख्या कितनी है।

श्री लालू प्रसाद : टी.वी. घुमा-घुमा कर दिखा रहा है कि कितने लोग उपस्थित हैं।

उपाध्यक्ष महोदय : हाउस में बाकी मंत्री लोग बैठे हैं। राज्य मंत्री जी भी पीछे बैठे हैं।

श्री मुलायम सिंह यादव : उपाध्यक्ष महोदय, इस वर्ष खेती की पैदावार ऋणात्मक हुई है। वित्त मंत्री जी और संसदीय कार्य मंत्री जी यहां बैठे हैं, उनके पास आंकड़े होंगे, खेती की पैदावार ऋणात्मक हुई है। खेती की पैदावार में घाटा हुआ है। किसान की ज्यादा लागत लगी और पैदावार कम हुई है।

उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करें।

श्री मुलायम सिंह यादव : महंगाई को रोकने में सबसे ज्यादा भूमिका किसान की है। वह पैदावार ज्यादा करेगा। उसकी पैदावार की कीमत ज्यादा देनी होगी। किसान को उसकी उपज की लाभकारी कीमत देनी पड़ेगी। मैं कहना चाहता हूं कि सरकार सिर्फ एक ही काम कर दे, तो महंगाई एक हफ्ते में कम हो जाएगी, लेकिन हमें विश्वास नहीं है कि यह काम सरकार करेगी, क्योंकि न उसमें साहस है, न इच्छा शक्ति है और न संकल्प शक्ति है। अगर सरकार में ये तीनों हों, इच्छा शक्ति, संकल्प शक्ति और साहस, तो महंगाई रुक सकती है।

लेकिन सरकार में न संकल्पशक्ति है, न साहस है और न इच्छाशक्ति है, ऐसा मैं समझता हूं।  आज तक इनकी इच्छाशक्ति नहीं हुयी ...( व्यवधान)कोई मतलब नहीं है, इच्छा रही ही नहीं।  तीन बातें अनिवार्य हैं और इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं।  आज तक खेती की जो पैदावार हुयी, तो अंदाजा लगा लीजिए कि आगे हाल क्या होगा?  ये तो सोचेंगे नहीं, हम लोग तो सोच के ही आ रहे हैं। अस्सी फीसदी लोग आज अधिकतम बीस रूपए प्रतिदिन खर्च नहीं कर सकते हैं।  आज सौ रूपए किलो दाल है, नब्बे भी है और कहीं-कहीं सौ भी है जबकि उसकी बीस रूपए रोज अधिक  खर्च  करने की क्षमता नहीं है।  गरीबों के लिए सबसे पौष्टिक भोजन अरहर की दाल है।  न उसको फल मिलता है, न दही, न दूध, न मठ्ठा, उसे कुछ नहीं मिलता है, अंडा, मांस, मुर्गा आदि के बारे में सोच भी नहीं सकते, खाने वाले इसे खाते हैं, लेकिन मैं सदन को बताना चाहता हूं कि गरीब का सबसे पौष्टिक भोजन अरहर की दाल है। अरहर की दाल अगर मजदूर को, फावड़ा चलाने वालों को मिल जाए, तो उसका पौष्टिक भोजन उसे मिल गया।  आज अरहर की दाल सौ रूपए किलो है और कहीं नब्बे रूपए किलो है। इसमें लूट किसकी हुयी?  इससे दो लोग की लूट हुई - एक उपभोक्ता और दूसरा किसान।

          किसान की अरहर पच्चीस रूपए किलो खरीदी गयी।  दाल बनाने के लिए ज्यादा से ज्यादा दो रूपए खर्च होते हैं, मैं कहता हूं कि पांच रूपए खर्च हुए, तो तीस रूपए में एक किलो दाल तैयार हो गयी, जबकि यह 90 और 100 रूपए में बेची जा रही है।  आप कितना मुनाफा करायेंगे?  हमारी समाजवादी पार्टी की दाम बांधो नीति रही है।  उधर से कृषि मंत्री बोल रहे थे, इन आंकड़ों में नहीं जाऊंगा, अगर दाम बांधो नीति नहीं समझते हैं तो दाम बांधों नीति स्वीकार करिए।  कारखाने में बनी हुयी चीजों पर लागत-खर्चा निकालकर डय़ोढ़े से ज्यादा मुनाफा कमाने की इजाजत न दी जाए।  इसके लिए सख्ती की जाए।  तब मैंने कहा साहस, संकल्प और इच्छाशक्ति तीनों होना पड़ेगा और महंगाई हट जाएगी, लेकिन ये तीनों चीजें इस सरकार में नहीं है, न साहस है, न संकल्पशक्ति है, न इच्छाशक्ति है, तीन में एक भी नहीं है।  इसके न चार उपाय हैं, न तीन उपाय हैं और न दो उपाय हैं, सीधा एक उपाय है कि कारखाने की बनी हुयी चीज का लागत-खर्च निकालकर, कोई डय़ोढ़ा मुनाफा न कमाने पाए।  बताइए कि आज भाव क्या है? जब पच्चीस रूपए किलो अरहर खरीदी ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : कृपया अपनी बात समाप्त करिए।

श्री मुलायम सिंह यादव : मैं संक्षेप में अपनी बात कहूंगा।  आप अस्सी फीसदी की बात छोड़िए, वे दो बार भरपेट पूरी तरह से खाना नहीं खा पा रहे हैं, हम यह देश को बताना चाहते हैं, यहां के लोगों को बताना चाहते हैं, देश तो इस बात को समझता है।  इस देश का दुर्भाग्य है कि खिलाने वाला किसान और मजदूर जिंदा रहने के लिए संघर्ष कर रहा है।  तभी मैंने कहा था कि इलाज न कर पाने के लिए आप कितने भी आंकड़े दें, लेकिन सिर्फ आंकड़ों से नहीं होगा, मैं शरद यादव जी को धन्यवाद देता हूं कि कम से कम खड़े होकर उन्होंने अपने पक्ष के लोगों से यह बात कही कि शांत रहिए।  लेकिन इधर से किसी ने भी नहीं कहा।  इन मंत्रियों में से किसी ने खड़े होकर नहीं कहा कि आप शांत रहिए। आपने अच्छा किया कि कम से कम इसे गंभीरता से लिया। मैं बार-बार दोहराना चाहता हूं कि अगर यही स्थिति रही तो फिर गंभीर परिणाम होंगे।  गोदामों में चीनी भरी रहे, चीनी मिल मालिकों के पास चीनी भरी रहे और गेहूं गोदामों में भरा रहे और लोग सड़क पर भूखों मरते रहें, इसको बहुत दिनों तक बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।  यह सोचना पड़ेगा, इसके लिए सरकार प्रयास करे।  सरकार का जो हुक्म अधिकारियों को होगा, वे वैसा ही करेंगे।  केवल अधिकारियों को दोष देना, यह कह देना कि फलां राज्य है या फलां राज्य जिम्मेदार है, ऐसा नहीं है।  आज जिम्मेदार है दिल्ली की सरकार की नीतियां।  अगर राज्य सरकार ऐसा काम रही है, तो केंद्र सरकार की क्या नीति है? राज्य सरकार की हैसियत क्या है? हम लोग वर्ष 1978-79 में सोते रहे, हमें पता ही नहीं चला, जब जगे तो पता चला कि हमारी सरकार कांग्रेस ने बर्खास्त कर दी।  हम पद से हट गए, गाड़ी चली गयी, चपरासी चले गए। ...( व्यवधान)   

उपाध्यक्ष महोदय : मुलायम सिंह जी, आप कृपया समाप्त कीजिए। आपका समय काफी हो गया है।

…( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव : केवल पांच मिनट का समय और दे दीजिए। अभी टोका-टोकी हुई है, भले ही बड़े दल हैं।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अभी कोई टोका-टोकी नहीं कर रहा है।

…( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव : आप हमें थोड़ा सा ज्यादा समय दे दीजिए। हम पांच-दस मिनट से ज्यादा नहीं बोलेंगे।...( व्यवधान)

श्री शत्रुघ्न सिन्हा (पटना साहिब): उपाध्यक्ष महोदय, यह काफी गंभीर विषय है। यह जनजीवन से जुड़ा हुआ मुद्दा है और इसकी जवाबदेही जिनसे मांगी जा रही है, उनमें से एक भी व्यक्ति यहां नहीं हैं।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  लीडर ऑफ दी हाउस बैठे हुए हैं।

…( व्यवधान)

श्री शत्रुघ्न सिन्हा : मैं आपकी अनुमति और सदन की सहमति से कहना चाहता हूं कि यहां कितने बढ़िया-बढ़िया वक्ता हैं। मुलायम सिंह जी इतना अच्छा बोल रहे हैं, हम शरद जी को सुनना चाहते हैं, गुरुदास दासगुप्ता जी को सुनेंगे, सुषमा जी ने इतना अच्छा बोला। हमारे दोस्त संजय निरुपम जी ने कितने आंकड़े पेश किए। यह बात एक तरफ है, लेकिन दूसरी तरफ यह है कि जिनका खाना खराब हो रहा है, महंगाई की बात हो रही है, लेकिन वे एक दिन का खाना नहीं छोड़ सके। लोग कह रहे हैं कि लंच करने गए हैं।...( व्यवधान) यह मामला बहुत ही गंभीर है।...( व्यवधान)

श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): सुषमा जी ने कहा है।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  आपको जवाब देने की जरूरत नहीं है, मंत्री जी जवाब देंगे।

…( व्यवधान)

श्री शत्रुघ्न सिन्हा :  मुलायम सिंह जी इतना अच्छा बोल रहे हैं, लेकिन इस समय सत्ता पक्ष की तरफ न ही कृषि मंत्री जी हैं और न ही माननीय सदस्य हैं।...( व्यवधान)

THE MINISTER OF FINANCE (SHRI PRANAB MUKHERJEE): Discussion on the same subject is going on in both the Houses.  The Minister of Agriculture was here.  He has gone to the other House.  That is why, I have come here.… (Interruptions)

उपाध्यक्ष महोदय : आप बैठ जाइए। सिर्फ मुलायम सिंह जी की बात रिकार्ड में जाएगी, और किसी की बात रिकार्ड में नहीं जाएगी।

...( व्यवधान)* उपाध्यक्ष महोदय : लीडर ऑफ दी हाउस ने बोल दिया है। उन्होंने कहा है कि हम बैठे हैं। वे जवाबदेही ले रहे हैं।

…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : मुलायम सिंह जी, आप जल्दी समाप्त कीजिए।

…( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव : हमें बोलने ही नहीं दिया जा रहा है।...( व्यवधान) मैंने जान-बूझकर ऐसा कुछ नहीं बोला है जिससे किसी को आपत्ति हो। मैं सुझाव दे रहा हूं।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप 28 मिनट बोल चुके हैं।

श्री मुलायम सिंह यादव : हम आपसे बहस नहीं करेंगे, लेकिन बीच में बोलकर माननीय सदस्यों ने हमारे 10-15 मिनट ले लिए हैं। मैं फिर भी आपका निर्देश मानूंगा।

उपाध्यक्ष महोदय : बाकी माननीय सदस्यों को भी बोलने का मौका मिलना चाहिए।

                                                  …( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव : मैं कहना चाहता हूं कि 80 फीसदी लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा है। वित्त मंत्री जी, यह सही है और हम भी जानते हैं कि यदि एक मंत्री भी बैठे रहेंगे तब भी सदन चलता रहेगा। लेकिन जहां जनता द्वारा सीधे चुने हुए लोग आए हैं, कम से कम ऐसे मुद्दे पर  सदस्यों को रहना चाहिए।...( व्यवधान) मंत्री जी जाना चाहें तो कोई बात नहीं है। प्रधान मंत्री जी दस मिनट के लिए ही आ जाते।...( व्यवधान) अगर प्रधान मंत्री जी विदेश गए हुए हैं तो कोई बात नहीं है। उन्हें ऐसे में विदेश नहीं जाना चाहिए। वे 10-15 मिनट ही हमारी बात सुन लेते।...( व्यवधान) हम आपसे जवाब जानना चाहेंगे कि महंगाई कब तक और कितनी घटा देंगे। जवाब चाहे वित्त मंत्री जी दें, कृषि मंत्री जी दें या कोई और मंत्री दें, लेकिन सदन में आज यह ऐलान होना चाहिए कि इतने दिन में इतनी महंगाई घटा देंगे। तब इसका महत्व है। अब सार्वजनिक वितरण प्रणाली पूरी तरह से असफल है।  उपभोक्ताओं को जितना खाद्य पदार्थ मिलना चाहिए, वह भ्रष्टाचार में चला गया। आप नरेगा-नरेगा बोल रहे हैं, तो वह नरेगा कहां है, यह बता दो।  माननीय जगदम्बिका पाल जी, आप नरेगा के बारे में बता दो  और हमें साथ ले चलो। क्या नरेगा कहीं है?...( व्यवधान) नरेगा पूरा भ्रष्टाचार में चला गया है। ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :   आप कृपया बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव :   आप इन्हें बोलने दीजिए। मैं नरेगा के बारे में बोल रहा हूं कि कोई भी हमारे साथ चले।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :   वह अपनी बात बोल रहे हैं, इसलिए आप बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव : वित्त मंत्री जी, किसी को भी नियुक्त कर दीजिए। ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  वह अपनी बात बोल रहे हैं, इसलिए आप बैठ जाइये। आप बाद में इसका जवाब दीजिए।

…( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव :  नरेगा में यह हो रहा है कि यदि सौ रूपये मजदूरी है, तो ठेकेदार 50 रुपये बिना मजदूरी के मजदूर को देता है और हस्ताक्षर करा लेता है और कहता है कि मैं ऐसे लिख दूंगा कि काम हो गया और घर बैठे 50 रुपये आपको मिल जायेंगे। अब मजदूर सोचता है कि हमें बिना काम किये हुए ही 50 रुपये मिल रहे हैं। ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  कृपया आप लोग शांत रहिये।

…( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव : उन्हें बिना काम किये हुए ही 50 रुपये मिल रहे हैं। ठेकेदार 50 रुपए ले लेता है। ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :   आप बैठ जाइये। आप जवाब मत दीजिए।

…( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव :   अब नरेगा कहां है?...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  जब आपको बोलने का मौका मिलेगा, तब आप इसका जवाब दीजिए।

…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  कृपया आप जवाब मत दीजिए। जब  आपको बोलने का मौका मिलेगा तब आप जवाब दीजिए। आप बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव :  उपाध्यक्ष महोदय, हम कौन सी ऐसी बात कह रहे हैं, जिससे इनको बुरा लगा हो। ...( व्यवधान) हम ऐसी कोई भी बात नहीं कह रहे हैं,  हम तो केवल जानकारी दे रहे हैं। जगदम्बिका पाल जी, क्या आपको जानकारी है कि नरेगा में  मजदूरों को बिना काम किए ही 50 रुपये दे दिए जाते हैं।  वे सब  सोचते हैं कि हमें काम नहीं करना पड़ा। इस तरह ठेकेदार 50 रुपये ले लेता है। ...( व्यवधान) हम नरेगा के बारे में बता रहे हैं। उसी में से कुछ पैसा अधिकारी ले लेते हैं। इस तरह सब मिलकर नरेगा का भ्रष्टाचार करते हैं। नरेगा पूरी तरह से भ्रष्टाचार में चढ़ गया है।  हमें सदन में कोई भी बता दे कि नरेगा के जरिये कितना काम हुआ, तो हम उसके साथ चलने को तैयार हैं। हमें कोई भी वहां   काम दिखा दे। ...( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद :   हाथ वाले सब काम मशीन से हो रहे हैं। ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  कृपया आप बैठ जाइये। आपकी कोई भी बात रिकार्ड में नहीं जायेगी।

...( व्यवधान)* उपाध्यक्ष महोदय :   आप सब बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : मुलायम सिंह जी की बात के अलावा और किसी की बात रिकार्ड में नहीं जायेगी।

                              ...( व्यवधान)* उपाध्यक्ष महोदय :  कृपया आप बैठ जाइये। आपस में टोका-टाकी नहीं होनी चाहिए। आप सब बैठ जाइये।

…( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव :  उपाध्यक्ष महोदय, मेरी समझ में यह नहीं आता कि इनके खिलाफ मैंने  क्या बोला है? ...( व्यवधान) मैं पहली बार सदन में नहीं आया हूं। मैं आपको नहीं बताऊंगा कि कितनी बार उत्तर प्रदेश विधान सभा के रहे और कितनी बार यहां रहे। मेरी समझ में यह नहीं आता कि मैंने ऐसी कौन सी बात कह दी जिससे इनको बुरा लगा। इस बारे में कोई मुझे बता दे कि मैंने इनके खिलाफ क्या बोला। हम  इनको सुझाव दे रहे हैं तब भी ये खड़े हैं। ये देश को दिखा रहे हैं कि मैं खड़ा था। ...( व्यवधान) ये अपना चेहरा दिखा रहे हैं। अपने प्रिय लोगों को चेहरा  दिखा रहे हैं। इनका यही मतलब है। इससे अलावा और क्या मतलब है? जब हम कोई खराब बात नहीं कर रहे, तो फिर ये बेमतलब क्यों खड़े होकर बोल रहे हैं? ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  आप बैठ जाइये और जवाब मत दीजिए।

…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  कृपया आप बैठ जाइये और जवाब मत दीजिए। आप उनको बोलने दीजिए।

…( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव :  उपाध्यक्ष महोदय, यह नहीं मानेंगे, मैं इनकी आदत जानता हूं। ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  यह आप लोगों के आपस की बात है, प्रदेश की बात है।

…( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव :  उपभोक्ताओं का खाद्य पदार्थ भी पूरा भ्रष्टाचार में चढ़ गया है, नहीं तो ऐसी स्थिति न होती। हमें इतनी बहस कराने की जरूरत न पड़ती, अगर उनको सस्ते दामों पर चीजें मिलती और सार्वजनिक वितरण प्रणाली सही होती। ये लोग तो जिम्मेदार है। आप  राज्य सरकार की हैसियत जानते हैं कि वह कितनी है? कलैक्टर यहां  बैठा है और वहां लेखपाल और पटवारी है। अब कलैक्टर के सामने लेखपाल और पटवारी की हैसियत क्या है? कलैक्टर तो दिल्ली की सरकार है और राज्य सरकार तो लेखपाल और पटवारी है।  अब लेखपाल और पटवारी की कलैक्टर के सामने हैसियत क्या है जो आप कहते हैं कि राज्य सरकार इसके लिए जिम्मेदार है। इसके लिए राज्य सरकार जिम्मेदार नहीं है, बल्कि केन्द्र सरकार  पूरी तरह से जिम्मेदार है। आप बताइये कि किसी सरकार या मुख्य मंत्री के खिलाफ आपने क्या कार्रवाई की है? आप उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं कर सकते? जब गरीबों के बच्चे पढ़ नहीं सकते। ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : कृपया आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

…( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव :  उपाध्यक्ष महोदय, मैं दो-तीन मिनट में  अपनी बात समाप्त कर रहा हूं। हमने हमेशा एक राय दी है। अब समझ में नहीं आता तो हम कहते हैं कि पढ़ लीजिए। हम क्या करें?  माननीय वित्त मंत्री जी आप बहुत पढ़े-लिखे, समझदार और अनुभवी नेता हैं।

 

आपको पता है कि हम समाजवादियों ने हमेशा नारा दिया है, हमेशा कहा है कि कारखाने की बनी हुई चीज पर लागत खर्चें के डय़ोढ़े से ज्यादा मुनाफा मत कमाने दो। चाहे सरिया हो, सीमेंट हो, लोहा हो, चीनी हो, कोई सामान बनाते हों, कारखाने की बनी हुई  किसी भी चीज पर कारखानेदार मालिकों को डय़ोढ़ा मुनाफा कमा लेने दो। अगर 100 रूपए की लागत है तो 150 रूपए कमा लें, लेकिन 100 रूपए की लागत वाली चीज को 1000 रूपए या 1500 रूपए पर बेचने की इजाजत कौन दे रहा है? मैं राज्य सरकारों को नहीं कह सकता हूं। वे भी जिम्मेदार हैं, लेकिन राज्य सरकारों के खिलाफ आपने क्या कार्रवाई की है? जब यहां आरोप लगा रहे हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई क्या की है? मैं दोहराना चाहता हूं कि दिल्ली की सरकार के सामने राज्य सरकारों की कोई हैसियत नहीं है। हमारे सरकारी साढ़े तीन साल चली, रोज उसे बर्खास्त करने की बात की जा रही थी, रोज मीटिंग्स होती थीं, यहां की सरकार में कुछ ऐसे लोग थे, लोग प्रयास करते थे कि मुलायम सिंह यादव की सरकार बर्खास्त करो। दूसरे प्रधानमंत्री थे तब भी और जब माननीय मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तब भी ऐसा होता था। रोजाना मीटिंग होती थी कि बर्खास्त कैसे किया जाए। हम सोचते थे कि बर्खास्त कर दो। बर्खास्त कर दी होती तो जनता ने आपको बर्खास्त कर दिया होता। हमें घाटा हुआ। अगर सरकार बर्खास्त कर दी होती तो मैं विश्वास दिलाता हूं कि इनको आज जनता ने बर्खास्त कर दिया होता।...( व्यवधान)

श्री शरद यादव : अगर आपने समर्थन नहीं दिया होता तो भी देश का इतना बुरा हाल नहीं होता।

श्री मुलायम सिंह यादव : यह बात मैं पहले ही स्वीकार कर चुका हूं।

          मेरा खास तौर से यह कहना है कि अगर ऐसी स्थिति आती है, तो उसमें हम सहयोग देने के लिए तैयार हैं। सरकार केवल एक वायदा कर दे कि कितने दिन में महंगाई खत्म करेंगे, कितनी करेंगे। उसके लिए अगर हमारा सहयोग चाहते हैं तो हम विपक्ष भी सहयोग देने के लिए तैयार हैं। शरद यादव जी हमने समर्थन केवल एक ही कारण से दिया है। आपकी गलती से हमने दिया है। आपकी गलती से क्योंकि आप उन लोगों के भा.ज.पा. के साथ मिल गए। मस्जिद गिरने के बाद अब हम इनके साथ नहीं मिल सकते। मस्जिद जब तक नहीं गिरी थी, मिले हैं। हम लोग जिस दिन एक साथ मिल जाएंगे, ये हार जाएंगे। मैं कहता हूं कि हम तीन ही मिल जाएं। हम तीनों के खिलाफ साजिश हो ही रही है कि ये तीनों यादव हैं, पिछड़े हैं, गरीब घरों से आए, साधारण परिवारों से आए हैं, समाजवादी हैं, लोगों की इसकी बड़ी जलन है।

          उपाध्यक्ष महोदय, मेरी मांग है कि आज सरकार जब जवाब दे तो यह बताए कि कितने दिन में महंगाई कितनी कम करेगी और हम लोगों से कितना सरकार सहयोग चाहेगी। हम सहयोग देंगे, लेकिन आप वायदा कर दीजिए कि फलां तारीख तक हम महंगाई को इतना कम कर देंगे। मैं सरकार से यही वायदा चाहता हूं।

उपाध्यक्ष महोदय : श्री दारा सिंह चौहान योजना मंत्रालय में राज्य मंत्री और संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री वी.नारायणसामी):यूपी में क्या हो रहा है?

श्री दारा सिंह चौहान (घोसी): अभी बताते हैं।

          उपाध्यक्ष महोदय, काफी जद्दोजहद के बाद आज देश में बढ़ती महंगाई पर नियम 193 के तहत चर्चा के लिए सरकार तैयार हो गयी। आज सारे देश के लोग इस बात को देख रहे हैं कि देश की संसद में उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि कितनी गंभीरता से चर्चा कर रहे हैं। यह बात समझ में आती है कि जब पूरा विपक्ष 58(2) की चर्चा करानी चाही तो सत्ता पक्ष के लोग इस पर चर्चा क्यों नहीं करा रहे थे। नेता प्रतिपक्ष ने जब महंगाई पर इस चर्चा की शुरूआत की, पानी पी-पीकर उन्होंने विस्तार से, बिन्दुवार आंकड़े दे रही थी, तो सत्ता पक्ष की तरफ से तमाम प्रतिवाद हो रहे थे।  इनमें बहुत आक्रोश था, लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि श्रीमती सुषमा स्वराज केवल आंकड़े दे रही थी, कोई गाली नहीं दे रही थीं। आज देश की जनता जो भूख से मर रही है, जिसे दो जून पेट भरने को भोजन नहीं मिल रहा है, वह पानी पी-पीकर देश की सरकार को गाली दे रही है। इसलिए सरकार को इस पर गम्भीर होना चाहिए।

          उपाध्यक्ष जी, मैं इस चर्चा में भाग लेने वाले सदस्यों के भाषणों को सुन रहा था। इस देश में दो बड़े दलों के नेतृत्व में कई बार सरकार बनी है। महंगाई केवल आज का ही सवाल नहीं है। जब से मुल्क आजाद हुआ, तब से इस देश का गरीब आदमी, किसान बेबस, लाचार और तबाह होता रहा है। मैं यह बात कह सकता हूं कि आज महंगाई के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार उस पार्टी की सरकार है, जिसने आजादी के बाद सबसे ज्यादा समय तक इस देश पर राज किया है। उसी सरकार के समय में देश में सबसे ज्यादा भुखमरी के शिकार लोग हुए हैं, जिन्हें दो वक्त का खाना भी नहीं मिल पाया। इसलिए आज इस बढ़ती हुए महंगाई के लिए मौजूदा केन्द्र सरकार सबसे ज्यादा जिम्मेदार है।

          सरकारें आती और जाती रहती हैं, लेकिन मौजूदा सरकार में जो सबसे बड़ा दल है, उसकी देश में सबसे ज्यादा समय तक सरकार रही है और उसी की गलत आर्थिक नीतियों और गलत आयात-निर्यात नीतियों के कारण देश में जो गरीब लोग हैं, जो खेती करने वाले हैं, वे सबसे ज्यादा शिकार हुए हैं। आज देश में कृषि भूमि का रकबा सिकुड़ता जा लहा है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जो गरीब किसान है, जो धरती का सीना चीरकर अपना खून-पसीना बहाकर खेती करता है, उसके पास खेत नहीं हैं और जिसने खेत की मेढ़ तक को नहीं देखा है, वह हजारों एकड़ जमीन का मालिक है। इसलिए महंगाई पर चर्चा करते समय भूमि सुधार पर भी चर्चा होनी चाहिए।

          इस देश की मौजूदा सरकार चुनावों के समय नारा लगाती थी कि फलां पार्टी का हाथ, आम आदमी के साथ। और गरीब इस नारे में भटक गया, बहक गया और उसका परिणाम यह निकला कि उस पार्टी की सरकार बन गई। जिसकी गलत आर्थिक नीतियों और गलत आयात-निर्यात नीतियों के कारण महंगाई का यह आलम है कि वह अपनी चरम सीमा पर है तथा देश में भुखमरी की स्थिति बढ़ती जा रही है। इस चीज से साफ हो गया है कि यूपीए का हाथ गरीबों के साथ नहीं, पूंजीपतियों के साथ है।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय: माननीय सदस्य दारा सिंह जी के भाषण के अलावा और कुछ रिकार्ड में नहीं जाएगा।

...( व्यवधान)* श्री दारा सिंह चौहान : मैं कोई गलत बात नहीं कह रहा हूं, नियमों के तहत ही अपनी बात सदन में रख रहा हूं। मैं मौजूदा सरकार की गलत आर्थिक नीतियों और गलत आयात-निर्यात नीतियों के बारे में बताना चाहता हूं। आज इसी की वजह से धान की पैदावार कम होने के बावजूद भी लगातार दो साल तक चावल का निर्यात सस्ते दामों पर केन्द्र सरकार द्वारा करने का काम किया गया। यह भी महंगाई बढ़ने का एक प्रमुख कारण है।

उपाध्यक्ष महोदय :  आप कृपया शांत रहें।

श्री दारा सिंह चौहान :  मैं समझता हूं कि कुछ पार्टियां इस महंगाई के प्रति गंभीर हैं क्योंकि यह पूरे देश का सवाल है। हो सकता है कि कुछ लोगों को इससे व्यक्तिगत पीड़ा हो सकती है, किसी सरकार को लेकर के पीड़ा हो सकती है लेकिन मेरी पीड़ा किसी प्रदेश सरकार से नहीं है। यह पीड़ा हमारी पार्टी की पीड़ा है, इस देश का गरीब आदमी जो भूखमरी का शिकार है, जिसे देश की सरकार संरक्षण नहीं दे पा रही है, उसकी पीड़ा को लेकर हम यहां खड़े हुए हैं।

          उपाध्यक्ष महोदय जी, इस देश में चीनी का उत्पादन कम हुआ। ...( व्यवधान) पाल साहब, आप अपनी बात को रखियेगा, आपको भी मौका मिलेगा। यह देश के लोगों की पीड़ा है, जिस पर मैं बोल रहा हूं। आज उत्तर प्रदेश में बहुमत की सरकार है, गरीबों की सरकार है लेकिन आपके आरोप से उस सरकार का कुछ होने वाला नहीं है। उत्तर प्रदेश की सरकार बहुमत में है और आने वाले दिनों में जब चुनाव होगा, तब भी बहुजन समाज पार्टी की सरकार यूपी में बहुमत की सरकार बनाएगी, इसमें कोई दो राय नहीं हैं।...( व्यवधान)

          उपाध्यक्ष महोदय जी, आज इस देश में गलत आर्थिक नीतियों के कारण समय-समय पर महंगाई बढ़ी है। चुनाव में जो पूंजीपतियों का काला धन सरकारी पक्ष के साथ लगता रहा है, तो जब सरकार सत्ता में आती है तो कहीं डीजल के दाम, कहीं पेट्रोल के दाम बढ़ाकर उन्हीं पूंजीपतियों को मदद करने का काम करती है, जिसके कारण आज देश में महंगाई बढ़ रही है।

          माननीय कृषि मंत्री जी यहां मौजूद नहीं हैं। जब-जब इस देश की संसद ने महंगाई कम करने का सवाल किया और माननीय कृषि मंत्री जी ने बयान दिया कि महंगाई घटेगी, तब-तब महंगाई बढ़ी है। ...( व्यवधान)

          उपाध्यक्ष जी, मैं केवल इतना ही कहना चाहता हूं कि आज देश में जो सरकार है और जिसकी गलत नीतियों के कारण महंगाई बढ़ी है, और यहां आज महंगाई पर चर्चा हो रही है, आपके माध्यम से मैं कहना चाहूंगा कि वैश्विक मंदी का बहाना बनाकर और यह कहकर कि देश में उत्पादन क्षमता कम हुई है, प्रदेश सरकारों पर दोषारोपण करना, सरकार द्वारा अपनी कमी को छिपाना है, अपनी गलती को छिपाना है, यह मेरा आरोप है।

          इस देश की सूबे की सरकारों ने प्रस्ताव किया है कि गरीबी-रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को सस्ते दामों पर अनाज मिले, दाल मिले, चीनी मिले। हमारे माननीय वित्त मंत्री जी यहां बैठे हैं, हमने पिछली बार भी इस बात को उठाया था और उत्तर प्रदेश जो देश का सबसे बड़ा सूबा है और जो आजादी के बाद से ही उपेक्षित रहा है, जबकि उसकी आजादी के इतिहास में बड़ी कुर्बानी रही है, वहां पर बीपीएल की सूची बढ़ाई नहीं गयी है, मैं उसे बढ़ाने की मांग भी करता हूं।

          उपाध्यक्ष महोदय जी, इस देश में गलत आर्थिक नीतियों के कारण महंगाई बढ़ने के बावजूद भी यह सरकार कभी इस पर गंभीर नहीं रही है। उत्तर प्रदेश की सरकार हमेशा इस इश्यु पर गंभीर रही है। मैं माननीय जगदम्बिका पाल जी को कहना चाहता हूं कि आप मुझसे नम्बर ले लें. अगर आपको अपने बस्ती जिले में कहीं लगता है कि कालाबाजारी हो रही है तो बताइये, तुंत छापा पड़ेगा। ...( व्यवधान)

14.00 hrs. उपाध्यक्ष महोदय : कृपया शांत रहिए।

…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : कृपया माननीय सदस्य को बोलने दीजिए।

…( व्यवधान)

श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): अगर कहीं लगता है कि कालाबाजारी हो रही है...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य के भाषण के सिवा कुछ रिकार्ड में नहीं जाएगा।

…( व्यवधान)

श्री दारा सिंह चौहान : महोदय, जहां-जहां इनकी सरकार है, अकेले उत्तर प्रदेश की जहां सरकार है, 31000 से ज्यादा जगहों पर छापा मारा गया और लोगों को पकड़ा गया है। इन्हीं की पार्टी के समर्थक लोग थे। आज इन्हें कष्ट हो रहा है, इसलिए यहां बोल रहे हैं। यह सरकार नरेगा के माध्यम से अपनी पीठ को थपथपा रही है। अगर नरेगा की यही हालत रही, तो लोग मरेंगे ही। सरकार कह रही है कि नरेगा के माध्यम से लोगों की आमदनी बढ़ रही है। मैं कहना चाहता हूं कि जिस औसत में गरीबों की आय बढ़ रही है, उससे कई गुना इस देश में महंगाई बढ़ रही है। नरेगा के माध्यम से अपनी पीठ थपथपाने वाले लोगों से मैं कहना चाहता हूं कि देश के लोग भुखमरी से मरेंगे नहीं, तो और क्या होगा। मैं संक्षेप में बिना आंकड़ों के अपनी बात कह रहा हूं, क्योंकि मेरी पार्टी के अन्य सदस्यों ने भी अपनी बात कहनी है।

          इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करते हुए अंत में कहना चाहता हूं कि देश की सरकार, जिसका सबसे ज्यादा समय तक इस देश में राज रहा है, उनकी गलत आर्थिक नीतियों के नाते, गलत आयात-निर्यात नीतियों के नाते देश में महंगाई बढ़ी है और देश का गरीब आज भुखमरी का शिकार हुआ है। इसलिए मैं चाहता हूं कि इस बारे में कृषि मंत्री जी, विद्वान वित्त मंत्री जी इस बारे में कोई उपाय खोजने का काम करें और रास्ता निकालें कि किस तरह से देश में बढ़ती महंगाई को कम करेंगे।

       

श्री शरद यादव : उपाध्यक्ष महोदय, महंगाई आज देश के लिए ऐसी मुसीबत बन गई है कि उसे बयान करना और आज जिस हालत में देश पहुंच गया है, न दाएं है न बाएं है। हमने ऐसी नीतियां बना ली हैं, ऐसी नीतियां अपना ली हैं कि मुझे नहीं लगता है कि कुछ लोगों की जीडीपी आमदनी 2 फीसदी थी और आज पूरे देश में मुट्ठीभर लोगों की आमदनी 21 फीसदी है। हम सदन में इसलिए खड़े हुए हैं कि आज निराशा है, यह बहस इसलिए हो रही है कि सच्चाई और ईमान के साथ कोई रास्ता निकलता। जिस समय मुझे बोलने का अवसर मिला है, तो नीचे और ऊपर दोनों जगहें खाली हैं। ऊपर वाले लोग गजब लोग हो गए हैं। नीचे खाली रहता है तो बहुत बोलते हैं। ऊपर जब खाली रहता है, तब वे आत्म चिंतन नहीं करते हैं। कल रेल बजट आया था। आज पूरे अखबारों में रेल बजट के बजाए क्रिकेट मैच के बारे में छपा है।

 क्रिकेट खेल है, अच्छी बात है। कला है, संस्कृति है। ये सारी चीजें अपनी जगह इंसान की जिंदगी के हिस्से हैं। लेकिन ये तभी हिस्से हैं - “जब मन चंगा तो लोटे में गंगा।” देश के 90 फीसदी लोगों का मन आज जिस हालत में है, हम सब उसके करीब नहीं हैं लेकिन उनके बीच में जरूर हैं। वे किस हालत में हैं? जैसे आजादी की उम्र बढ़ती जाती है वैसे इस देश की जनता की लाचारी, बेबसी, गुरबत और बेरोजगारी बढ़ती जाती है। यह ऐसे बढ़ती जा रही है जिसे बयान नहीं किया जा सकता है। हम क्यों आजाद हुए? किस बात के लिए आजाद हुए? हम बहुत गौरव महसूस कर रहे हैं कि हम बहुत आगे बढ़ रहे हैं, दुनिया हमें देख रही है। हमारे बीच में 12 या 20 फीसदी कुछ लोग हैं, वे जरूर दाम से परे हैं। दिल्ली में ऐसे बाजार हैं जहां आदमी पैसा नहीं गिनता है, वह अपमान मानता है, सामान लेते समय पूछता नहीं है, कहता है यह दे दो, वह दे दो। मॉल बन रहे हैं। नाच हो रहा है, तांडव हो रहा है। इस देश की संसद में बहुत सी संवेदनाएं बाकी हैं। इस देश में बहुत से गाली बकते हैं कि राजनीतिक लोग खराब हैं लेकिन किसी अच्छे आदमी का जिक्र नहीं करते। इस सदन में कितने अच्छे लोग रहे हैं, लोहिया जी, कर्पुरी ठाकुर, श्री एस.एम. जोशी, श्री मधु दंडवते, चन्द्रशेखर जी, चौधरी चरण सिंह आदि नाम हैं। जगन्नाथ राव जोशी मेरे साथ रहे हैं। अटल जी हैं।

कबीरा हम पैदा भए जग हासे हम रोए करनी ऐसी कर चलो कि हम हासे जग रोए।

 

यहां ऐसे लोग थे और ऐसे लोग हैं। इस तरफ से भी करोड़ों लोगों के नाम गिना सकता हूं लेकिन वक्त नहीं है। आज भी हिन्दुस्तान को बनाने और बिगाड़ने का काम इस सदन से होगा। देश के करोड़ों लोगों को बजट में वह जगह नहीं मिलती जो जगह मिलनी चाहिए। अगर हर चीज में संतुलन नहीं होगा तो देश और दुनिया का लोकतंत्र नहीं चल सकता। मैं इस बहस को इस तरह इसलिए शुरू कर रहा हूं क्योंकि मैं कहना चाहता हूं कि हम महंगाई को कैसे दूर करेंगे, इस देश की बेकारी और बेरोजगारी को कैसे दूर करेंगे, किसान के उत्पादन को कैसे बढ़ाएंगे। यह कृ­िा नीति से होगा, पालिसी से होगा। अच्छा छलेवा बनकर यह पूरा सदन स्टूडियो बन जाए, इससे नीति नहीं बनेगी। शत्रुघ्न सिन्हा बहुत अच्छे कलाकार हो सकते हैं, अच्छे कलाकार, अच्छा सिनेमा और अच्छा नृत्य होना चाहिए। मैं खुद संगीतकार हूं लेकिन संगीत से नीति नहीं बनेगी। नीति तो इस सदन से बनेगी, राजनीतिक लोगों से बनेगी। कल जो बजट आया और उसके बाद खबरें छपी हैं। इस देश के माननीय प्रधानमंत्री और महामहिम रा­ट्रपति को महंगाई और गरीबों के बारे में चिंता होनी चाहिए। इंसान के लिए अच्छा संगीत, ड्रामा, खेल सुकून की चीज है लेकिन सुकून तभी मिलेगा जब समाज में सुकून होगा। पहली कहावत है कि जस राजा, तस प्रजा। अब कहावत है कि जस प्रजा, तस कला, तस लोक सभा, तस विधान सभा और तस सरकार बनेगी। इसलिए मेरी आपसे विनती है कि आज देश में अजीब हालत हो गई है। महंगाई के ऊपर बहस हो रही है, मैं मानता हूं कि इस बहस में इस देश के लगभग 85 फीसदी लोगों का सवाल है। ...( व्यवधान) मंत्री क्या बहुत सारे लोग गायब हैं, आगे के लोग गायब है, पीछे के लोग गायब हैं। क्यों उंगलियों को चारों तरफ घुमाएं, बात तो इतनी बिगड़ गई है। कल रात मैं देख रहा था, एक आदमी बोल रहा था कि चार सौ चैनल्स हो गये हैं। मुझे खुशी होती यदि चार सौ चैनल्स होने के बाद उन पर हिंदुस्तान के सवालों पर बहस हो रही होती। लेकिन उन सवालों पर तो नकली, फर्जी शादी हो रही है। गाना, बजाना, नाचना हो रहा है। जब बिहार में लड़के नाचते हैं तो कहते हैं कि लौंडा नाच है। अब दिन भर साढ़े चार सौ चैनलों पर लौंडों का नाच हो रहा है, उसे कोई कुछ नहीं कहता। हजारों वर्षों से लड़के नाच रहे हैं, वह बुरी बात नहीं है।...( व्यवधान) आप बोलिये, क्या कहना चाहते हैं, मैं आपकी बात का जवाब दूंगा।

SHRI GOBINDA CHANDRA NASKAR (BANGAON): Sir, he should come to the subject! … (Interruptions)

श्री शरद यादव : मैं सब्जैक्ट पर ही आ रहा हूं। आपके सिर से ऊपर चीजें निकल रही हैं, यदि आप मेरी बात को समझ जाते, यदि देश समझ जायेगा तो रास्ता निकलना शुरू हो जायेगा। मैं कह रहा हूं कि यह सब क्यों बिगड़ा है, इतना बड़ा मुद्दा ठीक से क्यों नहीं बन रहा है। आपको पता होना चाहिए कि जब कल तीन बजे सदन स्थगित हो रहा था तो सदन में यहां इतनी कम संख्या नहीं थी, लेकिन ऊपर जहां आंख, कान हैं और जिनके द्वारा देश भर में फैलाने का काम होता है, वहां सिर्फ तीन पत्रकार थे। कोई बोलेगा नहीं, चूंकि आपको छपना है। लेकिन मेरे जैसे आदमी को तकलीफ होती है। मैं किसी पर ऊंगली नहीं उठाता, लेकिन बेचैनी और तकलीफ होती है कि तीन दिन से देश का सवाल उठ रहा है, लेकिन जो अखबारों में, मीडिया में जिन चीजों को जैसे आना चाहिए, वैसे नहीं आ रहा है। ये हाथ, नाक, आंख और कान हैं। ...( व्यवधान) छक्का जरूर लगाओ, मुझे कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन छक्कों का संतुलन होना चाहिए कि छक्का कितना दिखाओगे, पंजा कितना दिखाओगे। ...( व्यवधान) यह भूखों का सवाल नहीं है। इंसान की इंसानियत की पूरी जमात का धुरी सवाल है।

उपाध्यक्ष महोदय : शरद जी, आप चेयर को एड्रैस करें, उधर नहीं।

श्री शरद यादव : ये धुरी सवाल है। कोई कहे कि देश को स्टूडियो बना दो तो स्टूडियो बनाने से क्या देश बन जायेगा। कोई कहे कि इसे क्रिकेट का मैदान बना दो, क्या उससे देश बन जायेगा। मैं कह रहा हूं उसकी जगह अलग है, इसकी जगह अलग है। इसलिए मैं आपसे कहूं कि आपकी सरकार के चलते यह हुआ, मैं वहां आ रहा हूं, जिन लोगों के चलते नीचे और ऊपर यह मुद्दा लोगों की बेचैनी बनकर सड़क पर नहीं आ रहा है, बेजबान लोग जो भुगते हुए लोग हैं। हम यहां बेचैन हैं, हम बात कर रहे हैं, लेकिन ये बेचैनी सड़क पर नहीं जा रही है, गांव, देहात में नहीं जा रही है। इसे वहां जाना चाहिए, आज की बहस का मतलब ही यही है कि यह बहस यहीं नहीं रहेगी। सरकार कोई हो, हमारी हो या उनकी हो, लोकतंत्र में सरकार जनमत से, लोकमत से ही दबाव में आती है।

          आपको मालूम होना चाहिए कि गन्ने के सवाल पर जब यहां लोग आ गये तो गन्ने के सवाल पर नीति और पालिसी ठीक बन गई। लेकिन यह सारे देश में मुद्दा क्यों नहीं बना? हम भी और बाकी लोग भी जो इस देश के लोकतंत्र, लोकशाही को चला रहे हैं, कहीं न कहीं इसमे हिस्सेदार हैं। आज देश बेचैन है। आज देश इस हालत में है कि हम उसे बयान नहीं कर सकते। बयान क्या करें, आदमी तो भूख के पहिये के साथ घूम रहा है। यह सरकार आई, प्रणव बाबू आपके आने के साथ ही हिंदुस्तान में जो बना हुआ था, वह ढांचा ही बिगड़ गया। आप कह रहे थे, मुझे आना है, मैं अब आ रहा हूं। आपकी समझ के लिए भी समझ लीजिए, मैं पांच-छः बार इस भारत सरकार में मंत्री रहा हूं।  मैंने यहां मंत्री रहकर कोई बड़ा भारी उलटफेर कर दिया कि हमारी उस समय कुव्वत ही नहीं थी। जो हमारी कुव्वत थी, हम उसके लिये कोशिश करते रहे हैं। भोजन के मामले में कोई राज रहा हो, कोई सरकार रही हो,  चाहे जवाहर लाल नेहरु रहे हों, इन्दिरा जी रही हों, मोरारजी भाई रहे हों, अटल जी रहे हो, उस समय मोटा-मोटी एक तंत्र, एक रास्ता बन गया था। यहां पर मोनोपली प्रोक्योरमेंट था,  और वह एफ.सी.आई. करती थी। अभी हमारे कई माननीय़ सदस्यों ने कहा कि एफसीआई में अनाज चूहे खा गये, ठीक है, खाते हैं। भ्रष्टाचार है, लूट होती है। देश के देहातों में जो सड़कें बन रही हैं, जो नेशनल हाईवेज़ बन रहे हैं, क्या वहां खाना नहीं होता है? क्या वहां लूट नहीं हो रही है? देश का एक एक ज़र्रा, एक एक इंच लुटेरों से भरा हुआ है । हिन्दुस्तान में महंगाई का कारण, चाहे दिल्ली हो, चाहे ऊपर हो, चाहे नीचे हो,  दिल्ली के अलावा कामर्शियल शहर मुम्बई हो, इन  दोनों शहरों से महंगाई घटती और बढ़ती है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि एफ.सी.आई. में भ्रष्टाचार नहीं है लेकिन हमारे पास एक तंत्र था, एक रास्ता  था, जिसे, प्रणब बाबू , हमने डैविएट किया है। अभी शरद जी यहां नहीं हैं। मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि हमने आते ही कारगिल को,आईटीसी को, वसैंटो को  बाजार में खरीद करने के लिये पहुंचा दिया। उन्होंने बहुत ज्यादा नहीं खरीदा लेकिन बाजार की साइकिल ने उसे बिगाड़ दिया।  सरकार पीछे के सवाल पर चली जाये क्योंकि तंत्र उसके पास है। जो भंडारण है, उस पर असर हमारे समय से हुआ।

          उपाध्यक्ष जी, गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के लिये 23 हजार करोड़ रुपया फूड की सब्सिडी  के लिये दिया है। पूरे देश में पीडीएस के जरिये दिया जाता है। राज्य सरकार को लगातार इस बात को देखना पड़ता है,          लगातार उसका पीछा करना पड़ता है। हमारे देश की तासीर कुछ है, लगता है कि सच्चाई और ईमान यहां से उठ गया है, इसलिये रखवाली हमें निरंतर करनी पड़ती है। हमारा  एफ.सी.आई. का जो तंत्र है, उसे खरीदने के लिये मल्टी नैशनल कम्पनियों को खरीद के लिये मैदान में उतार दिया है। यहीं से शुरु होता है। फिर दूसरा  सवाल इम्पोर्ट और एक्सपोर्ट का है।  मैं मंत्री महोदय से कहना चाहता हूं जो यहां बैठे हुये हैं। अभी सुषमा जी आंकड़ों के साथ बता रही थीं। मेरे पास भी हैं,अभी समय नहीं है, बाद में मैं दूंगा। इम्पोर्ट और एक्सपोर्ट देश को राहत देने का जरिया नहीं है। कुछ लोगों की लूट का वह एक जरिया बना हुआ है। वह देश में महंगाई बढ़ाने का एक बहुत बड़ा हिस्सेदार है।

          उपाध्यक्ष महोदय,  2007-08 में चीनी का बफर स्टाक था। चीनी बनाने वाले इधर भी हैं, उधर भी हैं। जब चीनी ज्यादा पैदा हुई तो हमने एक्पोर्ट कर दिया। गेहूं, चावल के एक्सपोर्ट का सवाल हमने इस सदन में उठाया था लेकिन आज तक सरकार की तरफ से कोई  वाजिब जवाब नहीं आया है। जे.पी.सी. भी बनना चाहिये। भ्रष्टाचार का पीछा होना चाहिये, उसे छोड़ना नहीं चाहिये। लेकिन मैं निवेदन करना चाहता हूं कि एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट की नीति में कोई खोट नहीं है। आज  महंगाई है, आज कमी है तो इम्पोर्ट किया। आज दिल्ली मुम्बई और कोलकाता में बैठे हुये लोग हैं जो इम्पोर्ट करते आये हैं। आईटीसी हो चाहे वह सरकार की नैफेड हो, ये सारी संस्थाएं सेठों से मिली हुई हैं, लीडरों से मिली हुई हैं। आज जो महंगाई देश में बनी हुई है, उसका बड़ा कारण इम्पोर्ट और एक्सपोर्ट है। मैं मानता हूं कि तेल का मामला आपके हाथ में नहीं है, लेकिन अनाज का मामला तो आपके हाथ में था। अभी बजरंग दल के नेता ने और मुलायम सिंह जी ने एक बात उठायी, मैं उसे ठोस और बारीक तरीके से आपके सामने लाना चाहता हूं। इस देश की वह जरखेत जमीन, नयी जमीन को छोड़ दीजिए, बंजर जमीन को तो आपने उपजाऊ बनाया नहीं, आपने बंजर जमीन को तोड़ा नहीं, लेकिन आपने बनी-बनाई जरखेत, हजारों वर्ष की जमीन, दिल्ली देश का दुर्भाग्य बन गयी। जरखेत जमीन बम्बई, पुणे, भोपाल और बनारस के आसपास है। बड़े शहर वहां बने हैं, जहां इस देश में खेती की जमीन थी और उस खेती की जमीन के चलते ही वहां बाजार थे। इस देश के सबसे ज्यादा बड़े शहर नदियों के किनारे हैं या जो खेती के लिए अच्छा इलाका है, उसके भीतर शहर बने हुए हैं। आप एसईजेड लाये। 8 लाख हैक्टेअर जमीन घट गयी है। एसईजेड से लेकर कई तरह के उपद्रव आपने किये। जितने भी बिल्डर हैं और जितने अपराधी हैं, जो फंस गये हैं, वे भी चैनल चला रहे हैं। कोई इसलिए नहीं बोलेगा, क्योंकि छपना बहुत जरूरी चीज है, नहीं छपोगे तो यहां चिल्ला रहे हो, कौन सुनेगा? हम लोगों को साहस करके, जो खराबी हर तरफ आ गयी है, हमारे भीतर खराबी है तो हम तो चारों तरफ से उत्तरदायी हैं। जो राजनीतिक लोग हैं, एम.पी. को भी आपको हिसाब देना है, मिनिस्टर को भी देना है, भले ही सत्य हो या असत्य हो। असत्य होगा तो आज नहीं तो कल पकड़ा जाएगा। यह संसद है, सरकार है, जो राजनीतिक लोग हैं, वे उत्तरदायी हैं, बाकी पूरा समाज उत्तरदायी नहीं है। नाचो, गाओ, उल्टा हो जाओ, सीधा हो जाओ, अटको, मटको, झटको, कुछ भी करो, सबकी आजादी मिली हुई है। यह आजादी, आजादी को खा जाएगी। मैं चैनल देखता हूं तो मैं सही कहता हूं कि इस आजादी की कुर्बानी को यदि कोई चाट जाएगा, साफ कर जाएगा तो ये चैनल वाले लोग हैं। ये भूत दिखा रहे हैं, काल, कपाल, महाकाल दिखा रहे हैं। यह विज्ञान का इंस्ट्रूमेंट भी पूरा अंधविश्वास दिखा रहा है। नालायक ज्योतिषियों को बिठाये हुए हैं। एक मंत्री हैं, वह कहता है मैं ज्योतिषी नहीं हूं, इस देश में ज्योतिषी कौन है? यदि सबसे ज्यादा ज्योतिष हमारे देश में है तो हमारे देश की तकदीर सबसे पहले बता दी जानी चाहिए थी। यूरोप और अमेरिका में कहीं ज्योतिष नहीं है, लेकिन वे आगे जा रहे हैं। ये चैनल वाले अंधविश्वास फैला रहे हैं। परमात्मा में विश्वास करना बुरी चीज नहीं है। देश और दुनिया के सब बड़े लोग परमात्मा में विश्वास करते हैं। जो परमात्मा में विश्वास करता है, वह आत्मा में भी विश्वास करता है, वह इंसान में भी विश्वास करता है। हमारे देश में तो उल्टा खेल है, खोज तो की नहीं और जो खोज हुई उससे कह रहे हैं कि यह नाग जा रहा है, यह कुछ जा रहा है, पता नहीं क्या-क्या दिखा रहे हैं? कोई कह रहा है कि पांडव यहां से जा रहे हैं, कोई कह रहा है कि यहां द्रोपदी घूम रही है, अजीब हालत है, हनुमान जी रो रहे हैं, गणपति जी दूध पी रहे हैं। क्या पत्थर दूध पी जाएगा?...( व्यवधान) पूरा देश अंधविश्वास से भरा हुआ है। इस अंधविश्वास को मिटाना चाहिए।...( व्यवधान) आपकी और मेरी बात नहीं है, देश की जनता दूध पिला रही है। हम गुनाहों के लिए हाथ क्यों उठाते हैं, हमने देश बनाया नहीं है, सुधारा नहीं है। 60 बरस हो चुके हैं, जवाहर लाल नेहरू जी कहते थे कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण होना चाहिए।  

 

हमने लोगों का साइंटिफिक दृष्टिकोण नहीं बनाया, हम अंधविश्वास फैला रहे हैं। अरे मित्रो! सरकार के लोग! यह आज़ादी जो है, उसमें हमें तो नियम और कानून के अंतर्गत बोलने की बात करते हैं - सारे नियम, कानून और संविधान हम पर लागू हैं, यह अच्छी बात है, कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन ये मर्यादाएँ सब पर लागू होंगी या नहीं? आज़ादी का मतलब मर्यादाहीनता तो नहीं है। आज़ादी के नाम पर पूरा समाज नंगा होकर हर तरह के कुकर्म करने के लिए नहीं है। आज़ादी इंसान और इंसान की कौम को ठीक रास्ते पर ले जाने के लिए है। हमको आपने आज़ादी की सीमाओं में बाँधकर रखा, वह बुरी बात नहीं है, अच्छी बात है। संविधान के दायरे में अभी सदन में बहस हो रही है कि महंगाई पर किसका दोष है - भारत सरकार का है या राज्य सरकारों का है। सुषमा जी ने ठीक बात कही कि राज्य सरकार का इसमें बहुत कम हिस्सा है। गरीबी के हमारे पास चार-चार आँकड़े हैं। किससे माथा मारो? यानी आज़ादी के 60 बरस बाद हम गरीबों की संख्या को भी नहीं गिन सकते। 60 बरस बाद हम दाम तय नहीं कर सकते। कोई आँकड़ा भारत सरकार का होगा कि 52 हफ्ते में महंगाई कितनी बढ़ गई। अब मैं इसको पढ़ूँ, समय नहीं है। पिछले 52 हफ्तों में एसेन्शियल आइटम्स का जो प्राइस राइज़ है - चावल 12.60 प्रतिशत बढ़ा, गेहूँ बढ़ा 14.40 प्रतिशत, दालें बढ़ गईं 46.87, दूध बढ़ गया 13.95 प्रतिशत, आलू बढ़ गया 47.56 प्रतिशत, चीनी बढ़ गई 95.1 प्रतिशत, सब्ज़ियाँ बढ़ गईं 10.5 प्रतिशत, फ्रूट्स बढ़ गए 4.17 प्रतिशत। यह भारत सरकार कह रही है। तो सीधी बात है। मैंने आपसे कहा था कि कुछ मुट्ठी भर कमाने वाले लोग, देश को लूटने के लिए इस आज़ादी का अपहरण कर रहे हैं, इस आज़ादी को कमज़ोर कर रहे हैं, इस आज़ादी को आम आदमी से दूर कर रहे हैं। चुनाव इतना महंगा हो गया है कि जब मैं पहली बार चुनाव लड़ा था तो 24 हज़ार रुपये मुझे बचा था। और मैं सही कहूँ कि आज अगर लड़ता हूँ तो कार्यकर्ता जीप में पैट्रोल डलवाता है, दिन भर खाने का सामान लेता है, और क्या क्या होता है मैं कह नहीं सकता, उस पर कोई बहस हो तो हो जाए। यानी भ्रष्टाचार के चलते भी महंगाई है और समूचे हिन्दुस्तान में जिनको खाना नहीं मिल रहा है, उनको छोड़कर  बाकी सभी लोग बेईमानी में कहीं न कहीं हिस्सेदार हैं। इसलिए भारत सरकार  और राज्य सरकारों के बीच में झंझट मचा है कि कौन गुनहगार है। भारत सरकार तय करती है गेहूँ के दाम, भारत सरकार तय करती है चावल के दाम, भारत सरकार तय करती है पल्सेज़ के दाम, भारत सरकार तय करती है बाजरा के दाम, भारत सरकार तय करती है शुगरकेन के दाम। भारत सरकार चीनी का बफरस्टाक करती है, भारत सरकार गेहूँ और चावल का भंडारण करती है। भारत सरकार हिन्दुस्तान में पैट्रोलियम उत्पादों और तेल के दाम तय करती है। राज्य सरकार का ज़िम्मा है पीडीएस। मैं सही बताऊँ तो सुषमा जी जो बात कह रही थीं, वह सही है। यहाँ शत्रुघ्न सिन्हा जी बैठे हुए हैं। बिहार के बारे में केन्द्र सरकार बताती है कि 60 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं।   बिहार सरकार एवं देश-दुनिया के लोग 114 लाख बता रहे हैं। कैसे गरीबों को अनाज बांटा जाए? आप राज्य सरकारों के लिए निश्चित रूप से आफत खड़ी कर रहे हैं क्योंकि गरीबी की रेखा के नीचे ज्यादा लोग हैं, लेकिन अनाज कम मिल रहा है। इस पर सोचने की जरूरत है। आप सच मान लीजिए और यह कहिए कि हम एक किलो नहीं आधा किलो देंगे, लेकिन हम आंकड़ों की बेइमानी क्यों कर रहे हैं। चार-चार कमेटियां, सक्सेना कमेटी, अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी, तेंदुलकर कमेटी बनी। मित्रो, लोग कहते हैं कि धरती और दुनिया में परमात्मा है। हम देश में कितने गरीब हैं? इस का पता लगाया जाए ताकि हम यह महसूस कर सकें कि इतने गरीब हमारे साथ सो रहे हैं। लेकिन हम इसका भी पता नहीं लगा पाए। चावल और गेहूं का मिनीमम बफर स्टॉक भी बना हुआ था। हर चार साल में एक साल खराब आता है, इसका इंतजाम भी था। केवल हम लोगों की सरकार ने नहीं सब लोगों की सरकार ने यह बनाया हुआ था, लेकिन आप लोगों ने उस तंत्र को तोड़ दिया।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त कीजिए।

श्री शरद यादव : महोदय, आंकड़ों के अनुसार 80 फीसदी जिम्मेदारी भारत सरकार की है, 20 फीसदी जमाखोरी की वजह से महंगाई है। आपकी सरकार केन्द्र एवं सूबों में भी है। आप देश के सामने एक मॉडल खड़ा कर दीजिए कि महंगाई समाप्त करने का यह मॉडल है। यदि यह भी नहीं करते हैं तो आपके पास सीबीआई है, सूचना तंत्र है। मैं आपको खड़ा होकर आश्वासन देता हूं कि यदि आपका सूचना तंत्र हमें सूचना देगा तो हम उस जमाखोरी को खत्म करने का काम करेंगे। इस महंगाई को हम चुनौती मान लें। मुलायम सिंह जी ने कहा कि हम समय बांध लें कि दो प्रतिशत या पांच प्रतिशत, किस प्रकार से कम करेंगे। हम इसे चुनौती मान लें। बहस के लिए सदन को दो दिन और बढ़ा दिया जाए क्योंकि हमारे जैसे लोग अपनी बात पूरी नहीं कर पाते हैं क्योंकि समय की सीमा है। आपकी भी मजबूरी है।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : मैं मजबूर हूं।

श्री शरद यादव : मैं आपसे निवेदन करूंगा कि भारत सरकार के हाथ में सारे तंत्र हैं और यह जान लेना भी आवश्यक है कि दो नगर महंगाई के लिए जिम्मेदार हैं, पहला है दिल्ली और दूसरा मुम्बई।

          अंत में एक बात कहूं कि भारत का बाजार सदियों से है, यह एक दिन का नहीं है। हमारे बाजार की संस्कृति के चलते महंगाई ऐसे नहीं भाग सकती, जैसे अभी भागी है। हमारे बाजारों में एक सेल्फ रैगूलेशन था। उसके बाद कमोडिटी एक्सचैंज आया। मैं इस सदन में कहना चाहता हूं कि हमारी सरकार के ज़माने में मेरे हाथ से दो-तीन कमोडिटी एक्सचैंज लोग ले गए। मेरे ब्यूरोक्रैट्स ने, मेरे साथियों ने, सरकार में कुछ लोग थे, जिन्होंने मुझे कहा कि इससे किसान को बहुत फायदा होगा। हम दो बार हार चुके हैं और इस सदन में कह रहे हैं कि गलत काम हो गया है। कोई कह रहा था कि सब जगह कमोडिटी एक्सचैंज है। मुलायम सिंह जी बोले, दारा सिंह जी बोले और मैं बोल रहा हूं और ट्रैज़री बैंच का वक्ता गायब है। आपके हाथ में सारा तत्र है, फौज है, सरकार है, आईबी है, सीबीआई है, इन्कम टैक्स है, इसके बाद भी आप नहीं सुनेंगे तो हमारी बात का क्या मतलब निकलेगा? सीधी बात है। मैं आपसे कहूं कि राज्य सरकारों के ऊपर जो डाला जा रहा है तो आप उनकी जिम्मेदारी को फिक्स कीजिए, उन्हें बताइए, उन्हें रास्ता दिखाइए कि क्या कर सकते हैं? जैसे कि मैं एक राज्य सरकार की तरफ से यहां बोल रहा हूं। हम तो आफत में हैं क्योंकि आप अनाज कम दे रहे हैं और वहां गरीबों की संख्या ज्यादा है।

           उपाध्यक्ष महोदय, वहां हम अपनी तरफ से अनाज जोड़ कर दे रहे हैं। प्रणब बाबू, आपने सब जगह मदद की, लेकिन बिहार में विप्लव आया और प्रधान मंत्री ने कहा कि संकट है, कहा कि राष्ट्रीय संकट है और राष्ट्रीय संकट के बाद, जो मदद मिलनी चाहिए, वह नहीं मिली। हम मांग रहे हैं 14 हजार करोड़ रुपए,  लेकिन हमें कुछ नहीं दिया गया। आपने सुनामी हो या भूकम्प हो, उसमें हुए नुकसान के लिए प्रत्येक व्यक्ति को घर बनाने के लिए डेढ़ लाख रुपए दिए, लेकिन आपने हमारे यहां नहीं दिए। इसलिए आपकी निगाह में समानता होनी चाहिए। आपमें सबको एक सा देखने की ताकत होनी चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से देश बनेगा, बिगड़ेगा नहीं। यदि आप पूरे देश को एक नजर से नहीं देखेंगे, तो इससे देश बिगड़ेगा।

          उपाध्यक्ष महोदय, मुलायम सिंह यादव जी, दाम बांधने की बात कह रहे थे, आज तो देश कहां से कहां चला गया। यह तो पूरी तरह से, जो हमारा एक बाजार है, जिसके चलते उसकी संस्कृति का रुतवा और जलवा चारों तरफ है, यूरोप और अमरीका के लिए तो हमारा देश लट्टू है। यदि किसी दिन वह गिर जाएगा, तो हम किसी दूसरी तरफ चल देंगे। दाम बांधने का काम यदि सरकार कर ले, यदि सरकार उसके लिए बात कर ले, फिर चाहे दाम खेत के हों या कारखाने के हों, हालांकि आप कारखाने के दाम की कह रहे थे, लेकिन मैं कह रहा हूं कि दाम चाहे खेत के हों या कारखाने के हों, वे एक वर्ष के भीतर डेढ़ गुने नहीं बढ़ने चाहिए, ज्यादा से ज्यादा 60 गुने नहीं बढ़ने चाहिए, लेकिन वह संभव नहीं। हम यहां आकर खड़े हो गए, क्योंकि आपकी सरकार में, आपने एक हिस्सा बना लिया है गरीबों के भजन का, मैं आपसे कहूं प्रणब बाबू कि आप गरीबों के लिए जो सहायता दे रहे हैं, जैसे बाकी योजनाओं की लूट होती है, मैं उस पर बहस नहीं करूंगा, लेकिन गरीबों के लिए जितने भी पैकेज सरकार ने दिए हैं, वे सब लुटते हैं, चाहे इंदिरा आवास हो या गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगों के लिए अनाज हो और चाहे नरेगा हो। जो नरेगा है वह मरेगा हो जाता है, ऐसा नहीं है, बल्कि नरेगा भी वहां कुछ लोगों के लिए माल पैदा करने का साधन हो जाता है। मरेगा, तो वह गरीब के लिए है, लेकिन वहां कुछ लुटेरे हैं, उनके लिए तो यह वरदान है।

उपाध्यक्ष महोदय : शरद जी, कृपया अब आप अपना भाषण समाप्त कीजिए।

श्री शरद यादव : उपाध्यक्ष महोदय, भारत सरकार के हाथ में सारा तंत्र है। उस तंत्र में, यदि आप फिर से फूड सिक्योरिटी चाहते हैं, तो जैसे सभी चीजों में भ्रष्टाचार है, उससे अधिक भले ही एफ.सी.आई. में भ्रष्टाचार होगा, लेकिन आप उसके माध्यम से प्रक्योरमेंट बढ़ाइए। अब जो संकट है, यदि आपके पास बफर स्टाक होता, तो आप आज बाजार में मार्केट प्राइस से थोड़े नीचे के दामों पर अनाज दे देते, तो डिमांड एंड सप्लाई का जो आपका प्रिंसपल है, उसमें फर्क आ जाता।

          मैं खुद फूड मिनिस्टर रहा हूं। लाखों टन अनाज मैंने दिया है। बिस्कुट वालों को दिया है, मैदा वालों को दिया है और बाजार में दिया है। बफर स्टाक बहुत बड़ी चीज है और जैसी यहां बहस हुई है, इसके रख-रखाव का भी विस्तार होना चाहिए। इसलिए मैं आपसे विनती करूंगा कि भारत सरकार के हाथ में 80 फीसदी तंत्र है और यह आपका नहीं, बल्कि सब का बनाया हुआ तंत्र है। इसलिए आप इसे दुरुस्त करिए। मैं आपसे कहता हूं कि अभी रबी की फसल आने वाली है, आप बड़े पैमाने पर प्रक्योरमेंट करिए। हरियाणा और पंजाब को छोड़ कर देश की बाकी सरकारों से कहिए, नहीं है, तो एफ.सी.आई. को लगाइए और बड़े पैमाने पर बफर स्टॉक रखिए, जिससे इस देश के जो लुटेरे हैं, जो बाजार को पकड़े हुए हैं, वे मुम्बई और दिल्ली में हैं, वे लूट न सकें। कम्युनिटी एक्सचेंज का पूरी तरह से ताला बन्द कीजिए। पहले इसमें बिचौलिए तीन थे, अब इसमें बिचौलिए 20-25 नहीं बल्कि 300 हो गए हैं। बाजार में सामान नहीं आता है। दाल के लाख बोरे कलकत्ता के मार्केट में बिकते हैं, वे मुम्बई में बिकते हैं, चेन्नै में बिकते हैं और अहमदाबाद में बिकते हैं और इस तरह दाम बढ़ाने में कम्युनिटी एक्सचेंज का बहुत बड़ा हाथ है। हालांकि इसमें से कुछ चीजें आपने निकाली हैं, लेकिन उसके बावजूद कम्युनिटी एक्सचेंज का हाथ देश में महंगाई बढ़ाने में है। आप मेरी एक बात का जरूर जवाब दीजिए कि कम्युनिटी एक्सचेंज में कितने लाख का ट्रंजैक्शन हुआ।

 उससे कितनी बचत हुयी?  मेरी बात का जवाब मिलना चाहिए।  मैं अंत में एक बात कहूंगा कि रहिमन आह गरीब की कबहूं न खाली जाए, मुई खाल की श्वांस से लौह भस्म हो जाए।  हिंदुस्तान के जो गरीब लोग हैं, मैं उनके बारे में कहना चाहता हूं, रहिमन आह गरीब की कबहूं न खाली जाए, कबहूं न निष्फल जाए।  यह खाली नहीं जाएगी।  आज की बहस खाली न जाए, इसकी आप पर ज्यादा जिम्मेदारी है, लेकिन इस तरफ के लोगों की जिम्मेदारी है कि सड़क पर आएं। जब तक सड़क पर खेल नहीं होगा, तब तक सरकार और राज्य का राह-रास्ता और दिशा नहीं बदलेगी।  

          मैं इन्हीं शब्दों के साथ कहना चाहता हूं कि कुनाह-कुनाह को इधर से उधर मत टालो, कुनाह को एक साथ उठाकर नया रास्ता बनाने का काम करो और यही बात कहकर अपनी बात को समाप्त करता हूं।  

 

DR. KAKOLI GHOSH DASTIDAR (BARASAT): Mr. Deputy-Speaker, Sir, thank you. Today’s situation of hunger and starvation is worrisome. Throughout the nation the poor people are not being able to gather two square meals a day. It is definitely a very very serious problem that the nation has taken upon itself today to discuss in this august House and we have to consider certain points as far as this problem is concerned. This problem did not arise suddenly in the past few days. It has been slowly building up over the past couple of years and there are reasons behind it.

          Firstly, we will have to keep in mind the worldwide recession which shook the world. Possibly this recession is the worst to hit the world after the great recession of the 1930s and that affected adversely our import and export situation. The price rise affected international markets and the export of rice was also hit. Hoarders stepped in at that moment and they thought they would make a kill by hoarding rice and later on releasing it to the international market till it was banned. Also the rises and at certain times little fall in the crude oil prices all over the world has affected this adversely because, after all, the foodgrains are carried mostly using transport modes which use the finished products of the crude oil, also used for crop irrigation by shallow pumps.

          Keeping this in mind we have to agree the state of the poor people, the poor people of the nation who are going hungry, the poor people of our nation who are not able to gather two square meals a day. It is no doubt a very very serious situation. I am really grateful to the hon. Leader of the Opposition for bringing up this topic, of course, from a Party which is known to be the messiah of the hoarders and traders. And it appears that there is a political motivation because this is not an emergency situation which started just two days back or a week back. It has been developing over the past few years.

          So, the tussle over the last two days regarding under which rule we would discuss the hunger and thirst of our poor people leaves us wondering whether their constant demand for the Adjournment Motion is politically motivated or not. Here, we would really like to appreciate the Government for the excellent projects taken by them. During the course of the day we have really heard criticism about the National Rural Employment Guarantee Act. Now my question is – why did the Hon.Members  of the Opposition, when they were in power, not think of the poor people of our nation by giving them such an opportunity to earn money albeit it is Rs. 100 for 100 days coming to Rs. 10,000 per year. 

          Why did they not think even of this amount when they were in power? As I said, messiahs of traders and hoarders have suddenly woken up to today’s situation and taking advantage of it, they have been lashing out at the Government which has been trying very hard.

          At the time of Independence, the average lifespan of the Indians was 40-42 years. Today, it stands at 65-67 years. It is through the efforts of the Government which has worked hard to improve the food situation, to improve the delivery system of the medical facilities and in taking good care of our people that the lifespan has increased from 42 years to 67 years.

          Being a doctor myself, I would however like to point out that this hulla-gulla being created about sugar should be curtailed. Do not look at the comment politically. We have to realise that our country has been projected by peers internationally as the diabetic capital of the world. Juvenile diabetes is also taking place here. We are genetically predisposed. So, it is correctly being pointed out that though it is definitely required as an essential component of our daily intake, there should not be such a big hue and cry regarding sugar, which is the most harmful food product of the humankind.

          Coming from here, taking up from there, I would really like to point out that the enlistment of the poor people through the BPL List is not a job of the Central Government alone; the State Governments are lagging behind in this and they are putting the names of other persons into it. Particularly in my State of West Bengal, they are including the names of the people in the BPL List who belong to the cadres of the political party which is ruling the State there. No de-hoarding attempts have been taken by the State Governments, particularly in West Bengal where we have seen an uprising of the people, the common man against the hoarders and the ration dealers in the last one year. People have been brought to book because from their godowns, the poor people, the hungry people of West Bengal’s Purulia, West Midnapore, Bankura, Birbhum and Burdwan area pulled out sacks of rice stored there which were meant to be distributed among the poor people.

Here, we want to point out that there should be more accountability and monitoring, and strict vigilance on the part of the Central Government as far as the PDS of different States is concerned. The PDS should be used more efficiently as it is in our knowledge that the grains meant for the poor people are taken out of the system by the retailers and sold in the open market at a higher price. They should be brought to book. The question remains how much of such hoarders have been arrested. For example, in my State, West Bengal where people are dealing with poor people’s lives by taking away food from their mouths and selling it in the open market, this question has to be thought of very seriously. At the same time, we have also to keep in mind that the land space is not increasing. We have only one world, but the population is increasing.

We have also to keep in mind that our great nation surging ahead and leaping forward towards development has increased buying capacity of the middle class. This middle class, according to statistics, is now capable of buying more things for their own consumption and also the National Rural Employment Guarantee Scheme, albeit criticised by the Opposition Benches, has given some opportunity to the rural poor for consumption and they are also buying things. The difference starts here, where there is gap between the demand and supply. We have not been able to keep up with the demand of our people who are now capable of buying food for consumption. So, the suggestion would be that more stress should be laid upon irrigation, more stress should be laid on non-wastage of food grains and more importance should be given to scientific advances in agricultural research which would result in the Green Revolution which we had once seen under the able leadership of our beloved late Prime Minister, Shrimati Indira Gandhi.

She had brought the Nation out of this crisis once, and the research has resulted in high-yielding crops. So, these are the suggestions that should come here. It is not right just to come and criticise negatively. I feel that positive suggestions should come as far as the PDS system and de-hoarding are concerned, and exemplary punishment should be meted out to the hoarders and traders after de-hoarding.

          I again stress the point that we should really think about it, and I would request the hon. Minister to think about this. Would it be prudent to start investigation on the traders and hoarders who are hoarding food grains and whether it is being done under political motivation and political instigation by anybody to demean the Government, which is trying to do so much good for our Nation?

                                                                                           

SHRI T.R. BAALU (SRIPERUMBUDUR): Thank you, Sir. The issue of price rise and the prices of essential goods are of great concern to everybody. It is not only the concern of the Opposition, but also of the Ruling Party. But at the same time, the people who wanted or demanded the debate should understand that the Central Government is not the only Government that is responsible for the price rise. They should look back to their own States.    

          The demand to debate the issue of price rise to precede the customary debate on the Motion of Thanks on the President’s Address is welcomed by everybody because it is a serious issue that is affecting the common man. Hence, the Government has yielded to go ahead with this discussion under Rule 193. The issue of price rise is not a recent occurrence. It has happened for the past 2 ½ years. On 6th February, the food inflation was of the order of 17.97 per cent, and now it has exceeded to more than 20 per cent. Hence, my Leader, the hon. Chief Minister of Tamil Nadu, Dr. Kalaignar M. Karunanidhi called for an urgent General Council Meeting on 20th of this month, and he has requested and demanded not only the Central Government but also all the States to go for corrective measures and actions to resolve the issue of price hike. We have to put our heads together to see that the price rise is reduced, and the burden on the common man is checked. It is an elaborate Resolution, but I want to quote the operative part of it. I quote :

“The General Council demand to control the prices of essential commodities on war footing and at the same time to bring out appropriate legislation to amend the Essential Commodities Act by both the Centre and the State.”             It will not be out of context if I point out a Report by the United Nations Department of Economic and Social Affairs. It has assessed the situation in 2009 itself. It has said, “13.6 million Indians are pushed to the rank of poorness because of joblessness and because of high rate of inflation.” If this report is true, it is a warning bell to India.           Rising prices of essential commodities are of a great concern to everybody – to the middle-class, the lower middle-class, especially to the poorest of the poor. At the same time, in a growing economy like us, it is not so easy to insulate the prices of each and every essential commodity. The Government has a dual responsibility. On one hand, the Government has to pay remunerative prices to the farmers, and on the other hand, it has to ensure that the customers get commodities at affordable prices. The Government has to act in both ways.           The Indian population has been increasing at a higher rate. Let me explain that. What was the Indian population in 1971-72? It was 551 millions. What was the Indian population in 2007? It was 1,122 millions. The burden of Government to feed the public in 1971-72 has doubled in the year 2007. It means the population has doubled, but at the same time, the production has not doubled. We should take note of this issue that the population has increased whereas the production has not increased in a significant proportion.           What was the production figure of pulses? The production of pulses in 2009-10 was of the order of 14.86 million tonnes. It is expected to reach 15.79 million tonnes in 2011-12. In terms of percentage, the increase is only six per cent. At the same time, the demand grew at the rate of nine per cent. There is a gap between production and supply; the demand-supply gap is there. That is why we have imported pulses. In 2005-06, we have imported 1.6 millions; in 2007-8, we have imported 2.7 millions; and in 2008-9, we have imported three millions.           Hence, I demand that the Government has to come forward and advise our scientists to go for inventing new varieties of hybrid pulses. We are concentrating on wheat and rice, but at the same time, we are not concentrating on pulses.           The International Food Policy Research Institute (IFPRI), which is supported by 64 countries, a private institution that is recognized world over, in a Climate Change Meeting held in Bangkok recently said, “Countries like India, Nepal, Bangladesh, and Afghanistan are vulnerable to declining crop yields due to glacier melting, drought, floods, and erratic rainfall.” This has happened last year and also happened in the year previous to that. There was drought situation, erratic rainfall, floods and so on. We have experienced it. We were witness to these occurrences. The Executive Director of the United Nations Environment Programme has said in a Seminar, “We need to deal with not only the way world produces food, but the way it is distributed, sold and consumed.”

  15.00 hrs. It is the message of the Executive Director of the United Nations Environment Programme. So, distribution forms part of the most important issue and not just the production. The way in which the country distributes, for instance the PDS, is important. What is the story of PDS? The Government of India has launched a programme of targetted PDS. It only helps the poorest of the poor. It is not addressing the entire population. But here, there is a success story. There is a success story that has been prevailing since 2006 onwards in the State of Tamil Nadu. Our Government, the Government of Tamil Nadu headed by the Octogenarian Leader, Dr. Kalaignar Karunanidhi has declared Universal PDS. There is no APL; there is no BPL. In its entirety, there are 1.98 crore card holders in Tamil Nadu. Each card holder is issued rice at the rate of Re.1.00 per kilo. They have universalised it. Sugar is distributed at Rs.13.50 per kilo. We never had it anywhere except in Tamil Nadu. Kerosene is at Rs.9.00 per litre. What is the APL price? It is Rs.8.30 per kilo. What is the BPL price? It is Rs.5.65 per kilo. What is the AAY price? It is Rs.3.00 per kilo.

 My friend Shri Sharad Pawar ji is not here, he will be hearing me somewhere. He will be seeing me somewhere in television. It is not just for the benefit of the House, I am addressing him also. Tamil Nadu needs 3.16 lakh tonnes per month whereas the Government of India is supplying 2.98 lakh tonnes. The shortage is 20,000 tonnes. The Government of India is meeting the extra need. But on what price is it supplying? We are extending to the public, the entire mass, at Re.1.00 per kilo but we have to purchase it at the rate of Rs.15.37 per kilo from the Government of India. How do we have to cope up with the situation? What is the APL price? The price is Rs.8.60 per kilo. At least, the Government of India should come forward to give the additional allocation at the rate of Rs.8.60 per kilo. But they are not extending it. They are charging us Rs.15.37 per kilo and we are supplying it at Re.1.00 per kilo. What is the price of sugar? We are extending sugar at the rate of Rs.13.50 per kilo. But we are purchasing in the market at the rate of Rs.40 per kilo.

 Here, I want to mention one thing for the benefit of my friends who are clapping the desk on the other side. The quantity of levy sugar has been increased. The levy sugar, some three months back, was up to 10 per cent. Now it has been increased to 20 per cent. Whatever levy sugar he has increased up to 20 per cent, it has to go to the PDS. Is it not? That means, the 20 per cent of the levy sugar invariably has to be distributed through the PDS system. That means, they have to extend the extra allocation to the PDS, to the State Government. The levy has been increased from 10 per cent to 20 per cent. But the stocks are lying in the mills only. It has not been distributed to the public, the needy.

          We need additional allocation of sugar. Sugar allocation should be increased. Our monthly requirement of sugar is 34,000 tonnes but the allocation is only 11,000 tonnes. We need an additional allocation of 23,000 tonnes, but we are not getting it. We have to purchase it from outside at the rate of Rs.40 per kg. What happened to the levy sugar? The entire levy sugar of 20 per cent has to be distributed through the PDS. It is intended for that. I do not know where it is lying? Maybe it is being kept as buffer stock for the worst period. The Government can surely do that. However, when there is a need, it has to be met. 

          The Government of Tamil Nadu is not only issuing rice at Rs.1 per kg, sugar at Rs.13.50 a kg and kerosene at Rs.9 per litre, it has launched the Special PDS. One can compare the prices. The per kg price of toor dal is Rs.40, urad dal Rs.40, rava Rs.17, mida Rs.16, atta Rs.11, and price of palmolein is Rs.30 per litre. From 2nd October, 2008, the birthday of Mahatma Gandhi, spices and condiments have been included in this. Spices and condiments like turmeric, coriander, chilly, mustard, pepper, garam masala, bengal gram dal, jeera, methi, urad dal, etc., are supplied in PDS and it is only Rs.50 when the cost is Rs.131.50. Government of Tamil Nadu is issuing these things in pockets.

          Let us compare the prices in Delhi and Chennai. These are Government figures. Yesterday an hon. Minister has stated these figures in answer to a question. On 17th February, 2010, the price of rice was Rs.1 per kg in Chennai and it is Rs.23 per kg in Delhi. Wheat per kg was available at Rs.7.50 per kg in Chennai and it was available here at Rs.15 per kg. Atta was available at Rs.11 per kg in Chennai and it was available at Rs.17 per kg in Delhi. Sugar price was Rs.13.50 in Chennai and Rs.43 per kg in Delhi; rava was Rs.17 in Chennai and Rs.26 in Delhi; mida was Rs.16 in Chennai and Rs.26 in Delhi; toor dal was Rs.40 in Chennai and Rs.77 in Delhi, urad dal was Rs.40 in Chennai and Rs.69 in Delhi; palmolein was Rs.30 per litre in Chennai and Rs.55 in Delhi.

          This is a success story in Tamil Nadu. The scheme adopted by the Government of Tamil Nadu, headed by my leader Dr. Kalaignar Karunanidhi, has been a success story. Why don’t you go in for a Universal PDS? What is the fun in continuing with this Targeted PDS? I can only advice my friends to seriously consider switching over to Universal PDS.

SHRI SHARAD YADAV : But they should follow your advice?

SHRI T.R. BAALU (SRIPERUMBUDUR):   They are following the proper advice, not the one given by the Opposition. They are being guided by Dr. Kalaignar Karunanidhi only, and not by you.

          Taking into account the success story of Tamil Nadu, the Government of India should come forward and go in for Universal PDS throughout India. Additional allocation of rice and wheat should be made to the PDS at the APL prices. The entire quantity of levy sugar of 20 per cent should be passed on to the PDS of the States concerned. 

          Before I conclude I would say that it is not the responsibility of Government of India alone, it is the responsibility of all the States; and it is the responsibility of the Government of India to go in for a new legislation, if necessary.

                 

SHRI BASU DEB ACHARIA (BANKURA):  Sir, I rise to raise the voice of millions and millions of suffering people of our country. There has been a cruel attack on aam aadmi because of rising prices of almost all essential commodities. There has been relentless increase in the prices of food grains, edible oils, pulses.  This rise is not the recent event but what is the recent happening is that the food inflation has crossed 20 per cent. This is the highest food inflation in 26 years and that was why we have been demanding; the entire Opposition demanded that a discussion on price rise should be under the Adjournment Motion.

We had discussed the issue of price rise on 26.11.2009 in the Winter Session; we had also discussed in the last August during the Budget Session; and we had discussed it in the 14th Lok Sabha at least six times. Totally, we had discussed nine times, if we take today’s discussion into account.

Because of the callous attitude and casual attitude of the Central Government, there has not been any let up in regard to the rising prices of essential commodities. We have seen the reply of the Minister of Food, Consumer Affairs and Public Distribution, Shri Sharad Pawar. While concluding his speech, he replied that the Government would take every step to control and contain the prices of essential commodities.  What the Prime Minister, while inaugurating the Conference of Chief Ministers’ said was the worst is over.  The day the Prime Minister of India said that the worse is over, the next day, there has been one point rise in the inflation of food articles.

Why are the prices increasing? Why has the Government failed to control and contain the prices of essential commodities, particularly, the prices of food grains?  What are the reasons?  The Government always tried to shirk its responsibility and try to blame the State Government as if it is the responsibility of the State Government, and the Central Government has no responsibility  or role to play.

The policy is determined by the Central Government.  Export-import is decided by the Central Government. The Essential Commodities Act was amended by the Central Government and it was diluted by the Central Government. The Public Distribution System is being dismantled by the Central Government.  The Food Corporation of India procures the food grains.  It has the monopoly power to procure the grains and then distribute to the States.  The role of the State Government is to distribute the food grains to the people.

In 1991 we adopted the globalised or liberalised economy. We found its impact on our economy and on the other aspects of our society in the successive years.  Our economy has been integrated with the global economy and that is why sometimes this has been interpreted as the reason for increase in inflation of food articles as if it is a global phenomenon.  If we see the inflation rate of food articles among G-20 countries, we will find that the inflation in our country is the highest amongst the Group-20 countries.  Russia’s inflation rate is nearer to ours but ours is the highest inflation rate. So, it is not the global phenomenon but it is the result of the domestic policy being pursued by this Government. 

It has been mentioned here that we had a bumper sugarcane production and a bumper sugar production in the year 2006-07.  Why did the Government not build up buffer stock?  Without building buffer stock why the export, that too at a cheaper price, was allowed?  Next year when there was less production we had to import sugar by paying a much higher price.  We allowed export at the rate of Rs.12 per kg. but when we imported sugar we had to pay Rs.35 per kg.  Export subsidy was given on the export of sugar which was allowed at a cheaper rate. It has been stated here that this profit was cornered by 33 mill owners.  How has this happened?  I would like to know whether the Government was not aware that altogether these 33 mill owners had the profit of only Rs.20 crore.  How could they have a windfall profit?  Just because the export was allowed at a much cheaper price, their profit increased to Rs.900 crore in a year.  There was 2900 times increase in the profit.  I would like to know whether the Government was aware of it or not.

We would like to know why export was allowed and why these 33 companies were allowed to have a windfall profit to the extent of Rs.900 crore. We would also like to know whether any inquiry has been done or any action has been taken.  The Government owes an explanation to this House. 

          The same thing happened with wheat.  Wheat was allowed to be imported at different rates. This question was raised on the floor of this House during Fourteenth Lok Sabha. The Government has no explanation why certain companies were allowed to export wheat.  We exported wheat and on the other hand we also had to import wheat. There is a problem of mismatch between supply and demand.  One of the reasons which the Government tries to put forward is that there is a less agricultural production. 

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please conclude.

SHRI BASU DEB ACHARIA :  Sir, I have spoken for five minutes only.  If you want, I can sit down.  Please allow me to speak.  I have just started.  I could cover the first point till now and you are asking me to conclude.  I have not come to the main points.   I have many points but I will deal with some of the important points only.

          It is indeed a fact that there has been a reduction in the cultivable land to the extent of six lakh to ten lakh hectares.  It has an impact on our agricultural production.  As you know, China has much less cultivable land than India but their agricultural production is double than what we produce. In 2008-09, we produced 233 million tonnes and that was an all time high according to the Minister of Agriculture. Their agricultural production is double because of crop intensification.  In order to increase agricultural production and in order to achieve four per cent growth in food grain production, two schemes were started – National Food Security Mission and subsequently the Rashtriya Krishi Vikas Yojana.  I am referring to the seriousness of this Government towards agriculture and towards overcoming agrarian crisis.  More than two lakh farmers have already committed suicide in our country.  The crisis is being accentuated in our country in the agrarian sector.… (Interruptions)

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PLANNING AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI V. NARAYANASAMY): Sir, he is misleading the House.

SHRI BASU DEB ACHARIA :  You are a Minister.  You should not disrupt the House… (Interruptions)

          Sir, Rs.25,000 crore was the financial target for five years under Krishi Vikas Yojana.  But for the three years of the Eleventh Five Year Plan how much money has been allocated?  It is only one-third - Rs.8565 crore.  Now we have only two years left.  Can we achieve this financial target of Rs.25,000 crore?

If financial target is not achieved, then the physical target also will remain unfulfilled. That means, our target with regard to food grain production to the extent of four per cent will not be achieved and as a result of that the food security of the country will be at stake.

          Sir, forty per cent of our agricultural land is irrigated and in the last several years the capital formation in agriculture has been declining, rather gradually decelerating. There has not been much extension of irrigation and it has its impact on agricultural production. As a result of that the growth in agricultural production is not commensurate with the growth of population of our country.

          The third important aspect that I would like to touch upon is about overcoming this spiralling impact of prices, the unprecedented rise in prices of food grains and also about the problem of providing food grains to the people of our country. When the UPA Government assumed office in 2004, in its Common Minimum Programme, one of the important programmes that was incorporated was strengthening of the Public Distribution System. Along with strengthening of the Public Distribution System there was a need for universalisation of the Public Distribution System. Why are we asking for universalisation of the PDS?

          In the year 2001 by the introduction of the targeted Public Distribution System, the people of our country has been divided. According to the guidelines issued by the Planning Commission then, we had only 26 per cent of our population below the poverty line. But subsequently, a Committee was constituted by the Ministry of Rural Development under the Chairmanship of Shri N.C. Saxena and that Committee observed that we have 50 per cent of our people living below the poverty line. Then, another Committee was constituted under the Chairmanship of Shri Tendulkar and it observed that we have 37 per cent of our people living below the poverty line. Finally, another Committee was constituted under Dr. Arjun Sengupta by the UPA Government and that Committee in its last report observed that 77 per cent of our population has to depend on Rs. 20 only for their survival. That means, 80 per cent of our population needs subsidised food grains. Now, how much food grains do we require to provide 80 per cent of our population subsidised food grains? We require 90 million tonnes of food grains for this.

उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करिये।

श्री बसुदेव आचार्य :बस, खत्म कर रहे हैं।

उपाध्यक्ष महोदय :  नहीं, आपका भाषण  लम्बा हो जायेगा।

श्री बसुदेव आचार्य : लम्बा नहीं कर रहे हैं। 5-7 मिनट में  कह रहे हैं, कोई दूसरी बात नहीं कर रहे हैं।

उपाध्यक्ष महोदय :  दूसरी बात नहीं कहनी है।

SHRI BASU DEB ACHARIA : How much funds do we require to provide 35 kilograms of food grains at subsidised rate? 

       

We require Rs. 1,20,000 crore. We have worked out this figure by way of calculation.   The figure is Rs. 1,20,000 crore.   How much is the Government spending as food subsidy?  It is Rs. 50,000 crore.  So, by spending Rs. 70,000 crore, we will be able to provide 80 per cent of the population, that is, 25 crore households, with subsidised food grains like wheat, rice, sugar, pulses and edible oil.  In order to mitigate not only the sufferings of the BPL families, but also the entire population of our country, they should be provided with subsidised food grains, edible oil and other items.   The recent increase in prices by 10 per cent and decontrolling the price of fertilisers has added fuel to fire.  It will have repercussions on the cost of agricultural production, and the farmers of our country will be adversely affected.  This is intrinsically connected with the prices of foodgrains.… (Interruptions)

          I demand that the decision to increase it by 10 per cent and to reduce the subsidy of fertilisers by Rs. 40,000 crores should be withdrawn.  

          The Parekh Committee has submitted a Report to the Government on the prices of petroleum products.   Our demand is that the Governemnt should reject the recommendations of Parekh Committee.  If its recommendations are implemented, then not only the prices of petroleum products like the LPG will be affected but it will also have an inflationary cascading effect on the prices of other essential commodities.  The Government should reject the Parekh Committee recommendations.

I have four important suggestions to make and then I would conclude my speech.  Firstly, the Government must release cereal stocks through PDS by increasing the quota of rice and wheat to the States.  The quota of BPL has been slashed drastically and it has been reduced by 80 per cent in the case of Kerala, it is 62 per cent in the case of West Bengal. In spite of that, the Government of West Bengal is providing the entire BPL category with rice and wheat at the rate of Rs. 3 per kilogram.  When the price of potatoes increased to Rs. 22 per kilogram, potatoes were supplied to the people through ration shops at the rate of Rs. 13 per kilogram only. Pulses are also being supplied to them.   The Government must supply sugar, pulses, edible oil through PDS outlets at cheaper rates.  The PDS should be universalised.  Futures trading is a very important point which many hon. Members have mentioned.

Allowing futures trading has created havoc.  Although in case of wheat it was withdrawn for sometime, it has been re-imposed.  So, that should be revoked.  The commodity exchange market system should be withdrawn forthwith. 

          The Central Government, in coordination with the State Governments must launch a countrywide crackdown against hoarding, black marketing; all private traders of food articles must disclose their stocks and release surplus stocks; and diesel and petrol prices which were hiked last year should be brought down.  A large number of people in our country today have to go to bed empty-stomach. One-fourth of the population today is hungry.  India has become the hunger capital of the world.  The Government has not taken any steps.  It has only convened a meeting of the Chief Ministers and it has constituted a Standing Committee.  So far no concrete action has been taken by the Government of India to mitigate the sufferings of millions of people of our country. 

          I demand that when the Minister of Agriculture and Consumer Affairs, Food and Public Distribution replies –the Minister of Finance is expected to intervene before him – he should inform as to what concrete steps will be taken by the Government to mitigate their sufferings. In order to control and contain the prices of essential commodities, the Government should strengthen the Public Distribution System and revoke the futures trading, forward trading and commodity exchange market system.

          I demand that the Government of India should take all these measures forthwith. 

 

THE MINISTER OF FINANCE (SHRI PRANAB MUKHERJEE): Mr. Deputy-Speaker, since morning we are discussing the issue of price rise, which is not only sensitive but also affects the life of every one of us, particularly the more vulnerable sections of the society.  It is nobody’s case that there has not been rise in the prices. There is a consequence to that. It results in the sufferings of the common people.  When the prices of commodities, particularly when the prices of essential commodities, go beyond the reach of the common people, it affects them.  There is nothing unusual when the Members of Parliament, representing the entire spectrum of the population get agitated and their concerns get reflected in the House.  Therefore, it is good that we have kept that behind us and today we are engaged in discussing this important subject.

 

          But there is one general point which I would like to point out in the course of my observations.  I will come to it, as Shri Basu Deb Acharia, was telling that no concrete steps have been taken.  Or, what concrete steps have been taken including banning the forward trading, on which items and on which date? I will give those details.  But there has been one general point stated that what is the meaning of discussion and what is the purpose of discussion if this discussion does not lead to anything.

          First of all, we shall have to keep in mind that any amount of rhetoric and any amount of accusation cannot alter the laws of the economy – neither the laws of demand and supply nor the laws of too much money chasing too few goods.  If there is a shortage, there is a shortage. Any amount of speech, volumes and tonnes of observations cannot make the deficit into surplus.  This ground reality is to be kept in mind.  If the country does not produce the quantum of pulses it requires, there will be shortage.  We require 18 million tonnes of pulses and we produce around 13 to 14 million tonnes of pulses.  The concrete steps, which I will narrate a little later, there I will mention as to what steps we are taking. 

          We have through the import of pulses on the public sector undertakings, with the blanket assurance that you can import up to three million tonnes and 15 per cent of your loss will be made up by the Government so that the gap between the supply and demand can be bridged.  But mere accusation is not going to bridge that gap and for that economic steps are to be taken. I would like to mention here that certain steps have been taken. 

          It has been pointed out that what MSP has to do with the price of rice.  Yes, it has something to do with the price of rice. If the Government procures one quintal of wheat at Rs. 1,100/- per quintal, after procurement the local taxes are added. All the distinguished hon. Members are fully conversant with the agricultural economy of the country in which State which local taxes are there and what is their percentage.  None of this  information which I am sharing with the distinguished Members is not unknown to me.  The short point which I am trying to drive at is what is the co-relation?  Therefore, if we buy one quintal of wheat at Rs. 1,100/-, after adding the local taxes, transportation and thereafter the prices at which it comes to the consumer, it is Rs. 13.50 per kg.  When we procure one quintal of paddy at Rs. 1,050/- plus Rs.50/- bonus, at Rs. 1,100/-, the same procedure is being followed.  One quintal of paddy will give us 66 kgs of rice. … (Interruptions)

THE MINISTER OF AGRICULTURE AND MINISTER OF CONSUMER AFFAIRS, FOOD AND PUBLIC DISTRIBUTION (SHRI SHARAD PAWAR): Rs. 50/- bonus is already added.

SHRI PRANAB MUKHERJEE: Yes, Rs. 50/- bonus is already added. So, the price comes to Rs. 1,050/- Then, when it reaches at the consumer points, it become Rs. 19.45.  Therefore, these are in-built which in the term of economy is called, `cost push’.  These are the ingredients which are there.  Therefore, nobody is denying that the prices have risen. 

   

          Now, what is our option? Yes, we have deliberately chosen that. I am sorry, I am not apologetic to it. I am part of the Government from day one. When we took the decision that we would enhance the Minimum Support Price from Rs.600 to Rs.1100, when we decided to enhance the procurement price from Rs.1050 to Rs.1100 per quintal because we were confident that we induce the farmers and the cultivators to produce more, they have produced more.  Sir, 234 million tonnes of grains have been produced last year.

          I remember, in the Monsoon Session, when the impending drought was threatening us,  I still remember the expressions of the hon. Members. Fortunately, I must express my gratitude to the Governments of Punjab, Haryna and many other States also which have taken timely steps and as a result of that, the adverse impact of the drought and the later part of the flood could not reduce the kharif production at the anticipated level. There will be some shortfall. It may be 10 million tonnes or it may be 15 million tonnes. I do not know the exact figure. Shri Sharad Pawar will respond to you about that.

SHRI SHARAD YADAV : It is 7 per cent.

SHRI PRANAB MUKHERJEE:   I am talking in terms of million tonnes. 10 to 15 million tonnes may be the shortfall but the encouraging part is that procurement, particularly from the two major States which fill the Central Pool, Punjab and Haryana, is higher than compared to last year’s procurement. Therefore, stocks are available.

          I am pretty old. That is why, please do not mind if I give you the reference of past days. In our rhetoric, we may like to indulge in it. It was said that it has never happened. Somebody has stated that in  60 years, it has never happened. I am not going back to 60 years – 1950. I am going back to 1974. In this very Hall, when the Wholesale Price Index reached as high as 24 per cent, the then Finance Minister Shri Y.B. Chavan had to present the second Budget after presenting the first Budget in the last working day of February – a second financial proposals were to be approved by this House and drastic economic measures were taken.  It was because of acute financial crisis mostly related to food crisis because of three reasons. They were the two consecutive droughts, the first oil crisis of  1973 and the delayed impact of war with Pakistan in  connection with the liberation struggle of Bangladesh. Therefore, it happened.

In 1979, when the Janata Party Government collapsed and then on 14th January, Shrimati Indira Gandhi took over,  the rate of inflation which was running was as high as 16 per cent, not 8.3 per cent which we are describing as an unprecedented one! It was said that in 60 years, it never happened!! In 1991, when Shri P.V. Narasimha Rao took over after a short spell of experiments, there too prices were high. Therefore, it has happened. The short point which I am trying to drive at is that the Indian economy has the resilience, has the capacity to overcome that. Our farmers, our workers and our managers have the capacity to  overcome this crisis.

          They can see that the equilibrium is brought in the economy. Therefore, my first contention is that it is correct that it should be discussed and through this discussion many points emerge and it helps the policy makers.

          Somebody mentioned about forward trading. I would like to inform that as a result of one such discussion, the forward trading on these items was banned. It resulted out of a discussion on the floor of this House. Therefore, the discussion on the floor of this House is not meaningless. It directs the Government to work and it suggests the policy makers to take appropriate steps.

          Futures trading  in rice and two pulses, urad and tur was suspended by the Forward Marketing Commission in the year 2007-08 and it is still continuing. We have added sugar to that list with effect from 27.5.2009. Therefore, it is not correct to say that some actions have not been taken in respect of forward trading and exchange market.

SHRI SHARAD YADAV : What about other pulses? There is chana dal, there is moong dal, there is urad etc. SHRI PRANAB MUKHERJEE: Urad is there in the list.

SHRI SHARAD YADAV : But what about chana dal?

SHRI PRANAB MUKHERJEE: Chana dal is not there in that list. You are correct that not all pulses are put on the list. But at that point of time this was the demand which was raised.

          I can share this with the House that when Laluji was in the Government, he insisted that an immediate ban should be put in respect of forward trading on these items and it was put. Therefore, it is not correct to say that the discussion and the suggestions given by hon. Members are not heeded to and are not acted upon.

          A question was raised – and this is the favourite thesis of my Leftist friends – about universalisation of the Public Distribution System. It is ideal. Who denies that? If we have the capacity, we can do it. But we have the capacity? Are we running the Public Distribution System effectively? Dr. Kakoli Ghosh Dastidar spoke about a few minutes ago and she vividly described about the failure of the Public Distribution System in some States. We are not running the Targeted Public Distribution System effectively and if you want to expand the capacity, do you believe that people will have confidence in that system? This is a mere ideological posture, it is not the practical suggestion. If we had utilized whatever we have, then this situation would not have arisen. I am not saying that we have been able to take care of the problems of the entire population of our country.

श्री शरद यादव : मैं एक मिनट में अपनी बात कहना चाहूंगा।  ...( व्यवधान)

SHRI PRANAB MUKHERJEE: Please do not interrupt every time. This is the second time I am conceding to you.

श्री शरद यादव : मैं आपसे एक निवेदन कर रहा हूं कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले जो लोग हैं, उनकी संख्या के बारे में बड़ा कन्फ्यूजन है, उस बाबत आपकी एक राय बननी चाहिए।  वह कैसे होगी?  जैसे अर्जुन सेन गुप्ता कुछ बोलते हैं  ...( व्यवधान) 

SHRI PRANAB MUKHERJEE: Please do not give another baashan. I listened to your speech. I am replying to the point about persons living below the poverty line. The fact of the matter is, whatever be their number, the number is known to us. As per the current calculations of the Planning Commission, about 6 crore plus families are living below the poverty line.

 My limited question is, are we serving them properly?  This is my question.  I am not  blaming anybody.  I am just taking it upon myself and including others. We are in the Government here, and we are in the Government in 28 States.  Are we in a position to serve through our PD System effectively, whatever is available? 

          What is available right now? Right now what is available is, rice at Rs.5.65 per kg for BPL, Rs.3 per kg for AAY; and wheat at Rs.4.15 per kg for BPL, Rs.2 per kg. for AAY since 2002.  Can we tell honestly that in my State, whatever be the existing number, we are serving them with this level of supply? 

          I am sorry, Mr. Deputy-Speaker, Sir, we are not doing that.  That is why, it has been suggested what the committee will do.  The committee will do what the Prime Minister thought after the discussion of the Chief Ministers. Some very valuable points emerged.  The way many Chief Ministers are dealing with it, at least, it appeared to me -- I was listening to them from 10 o’clock in the morning till the end -- that the models which they are suggesting can be replicable in certain other areas.  Therefore, it was thought that the Chief Ministers, along with the key Central Ministers, in this matter should sit together, should try to find out a solution.

          I will give you just one example.  Many of you might have read the daily newspapers, published in Delhi.  In the box item, they have given what is theMandi Prices at Azadpur, whatever is the name -- I am sorry I do not know that Mandi – and what is the price at the retail shop.  Now, this is not just for general information.  The problem which it is pointing out is the huge cost of intermediation.  If there is a difference of Rs. 6 to Rs.7 per kg. from the wholesale market to the retail market, then what the poor farmer is getting?   Perhaps, he is getting even half of that.  Therefore, there is a huge cost of intermediation from the farm gate to the kitchen.

          How to solve this problem?  The discussion is necessary for that.  Suggestions to improve this; what mechanism, what innovation, what steps we can take from the MPs, from the Chief Ministers, from those who are involved in dealing with this problem would help us.

          A question has been raised as to what number will be accepted.  The Government is contemplating, thinking, considering it.  Various reports have come.  The Tendulkar Committee Report has come.  Other reports are also available and when the Government will arrive at a decision then that will be the number.  But before that we cannot remain idle.  We will have to deal with the numbers which are readily available to us. Even if it is a small section, for whom this is being meant, we will be able to address their problems.  We have not enhanced the AAY issue price since 2002. We are providing certain commodities to certain categories of consumers at the MSP rate. 

          Now, there are two schemes which are available, Rs.15 per kg. subsidy scheme of edible oil.  Except six States, out of 28 States, have not taken this.  Some States have said that there are no takers of the subsidised edible oil per kilogram.  We are providing not to have the general impact on the price. My contention is to protect the vulnerable sections of the society who could be identified as the persons who are below the poverty line.    

  16.00 hrs. For them, when we are providing per KG of edible oil a subsidy of Rs. 15 and  per KG of pulses a subsidy of Rs. 10, at least let us utilise that. स्टेट नहीं लेंगे, तो कैसे मिलेगा।  It is not possible for the Agriculture Ministry to carry it on its head and go to each and every household. So we are taking and this Scheme is still on.  This is on the tap; if somebody wants to put on the tap, he can have it.  Tomorrow onwards the States are entitled to have it.  Let them have it.  There will be no problem.

          Basudebbabu has made a good speech on sugar.  I have some comments to make on sugar. It is true; let us look at the figure. Everybody knows; particularly those who are agricultural experts know much more than me.  They know about the cyclical trend of sugar.  In 2006-07, the area under sugar cultivation was 51.51 lakh hectares.  Sugarcane production was 3555 lakh tonnes.  Actual sugar production was 282 lakh tonnes; our demand was 191 lakh tonnes. Therefore, there was a surplus. Next year also there was a surplus. Production was 263 lakh tonnes; demand was 205 lakh tonnes.  What should we do if we do not export?  We have buffer-stock.  We have simply the buffer-stock, if we do not export, if the prices collapse as it has happened. Therefore when we are talking here to put a ban on forward trading, I had pre-Budget interaction with the farming community, and all the noted farmers organisations and their leaders said: ‘We do not want it.  We want they should be freely traded.  You take care of the speculators in different manners but not at the cost of the farmers.’  It has been suggested export-import is the root cause of the price rise.  It is not export-import. It can happen; it should happen; international trade on same commodities.  Even if we are in short supply, we shall have to import to meet our requirement.  If we have excess, we shall have to export it.  But international market does not depend on when I will have exportable surplus. International market is a competitive market.  If I do not fulfil my export obligations, export commitments, somebody else will come and fill in the gap. My exporters will not get it. Particularly for the agricultural commodities, once the export market is closed, when your demand is less, supply is more, buffer-stock is no economic answer.  The answer lies that you shall have the system so that there is not a drastic reduction, a drastic mismatch between the supply and demand management. Why has it happened?  It has happened mainly because of the fact that when the market prices of wheat, rice and paddy went up very high, the sugar-cane farmers also changed because they noticed that in the preceding five years, the enhancement was only Rs. 60, an average Rs. 12 for five years.

 

          In the next five years, the enhancement was more than Rs.400 and Rs.450. Therefore, he had the option and he opted for it. Now, in 2008-09, the production figure came down further; 146 lakh tonnes was produced and 220 lakh tonnes was the demand.  For this year, the forecast is that 160 lakh tonnes would be the production and 230 lakh tonnes would be the demand. 

Mr. Deputy-Speaker, Sir, this is the issue where we shall have to work out a strategy.  I think, many Members have made comments, and I entirely agree with their observation that long-term, even medium-term solution lies, particularly to ensure our food security, that we must have massive investment in agriculture. There is no denying to this fact. I am not passing on the buck to anybody.  I share the buck on myself because for the major part I was in the Government; we were in the Government but you shall also have to take a small share. You cannot just raise the accusing finger only against me because we did not make adequate investment in agriculture, and we have made the beginning. 

The Leader of the Opposition accused why twice the Food Security Act has been mentioned in the President’s Speech.  The commitment of the Party was that if we had voted back to power, we would bring the Food Security Act.  The Indian people trusted us and they voted us back.  They voted us back not for five months or six months or seven months or nine months; they voted us back for five years.  Even after the passage of one year or two years, if you see that there is no movement on the Food Security Act, then you can accuse us but not after seven months or nine months.  Therefore, you shall have to wait for that.  So, my most respectful submission is this.  … (Interruptions) Yes, is there anything offence? I have not offended anybody.  I do not want to offend anybody.  If somebody feels offended, I am sorry for that. … (Interruptions) I do not want to mean anything.  What I say is: “Yes, we have committed, and we shall have to do it.”  Please wait.  This was not the proper time. If you were the Finance Minister or the Agriculture Minister when drought is impending and all over the world agriculture is uncertain, will you do it?  I have calculated every price.  I have calculated the prices; the trend of prices.  Yes, I do agree, rather I envy you when you started your Government in 1998, at least on one point you were lucky; your average oil prices were 36 to 40 dollars per barrel.  During our five-year period, the average oil prices had gone not less than 69 to 70 dollars per barrel.  Therefore, can there be two comparable situations?  When 75 per cent of my crude is imported, I have to pay through the noses. Do you see that you have a carpet under which you can …. … (Interruptions) Madam, would you like to say anything? … (Interruptions)

श्रीमती सुषमा स्वराज :आप पांच साल के लिए सरकार में आए हैं, आपको जनादेश मिला है, आप पूरे पांच साल राज कीजिए, इसमें कोई बात नहीं है। लेकिन आपने पांच साल में 100 दिन का एजेंडा भी इस देश के सामने रखा था। मैं केवल आपको आपका 100 दिन का एजेंडा याद दिलाना चाहती हूं। आप पूरे पांच साल राज कीजिए। अभी आपने कहा कि गरीबों के आंकड़े जब हमारे पास आ जाएंगे, तब हम आपको बता देंगे। मैं केवल आपको पिछले अभिभाषण से आपके 100 दिन के एजेंडे का 23वां आइटम पढ़कर सुनाना चाहती हूं। यह 100 दिन का एजेंडा आपने रखा था, मैंने नहीं रखा था, उसमें आपने कहा था - "मेरी सरकार अगले 100 दिनों के भीतर इन उपायों पर कदम उठाएगी। " इसके आगे मैं 23वें प्वाइंट को पढ़कर आपको सुनाना चाहती हूं।

 यह आपका 100 दिन का एजेंडा था, पांच साल का नहीं था।

“गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को लक्षित पहचान पत्र लागू किया जाएगा। यह पहचान इस साझे आधारभूत सिद्धांत पर लागू होगी कि सभी लाभार्थियों अर्थात् बेनिफीशरीज़ की पहचान ग्राम सभा और शहरी स्थानीय निकायों द्वारा की जाएगी और इस सूची को जनता के सामने लाया जाएगा, ताकि यदि आवश्यक हो तो आपत्ति दर्ज कराई जा सके।”   यह जिस फूड सिक्योरिटी की बात आप कर रहे हैं, उस फूड सिक्योरिटी का पहला पिलर है - गरीबी का आंकड़ा। आपने इस देश को राष्ट्रपति के माध्यम से और इस सदन में यह कहा था कि यह काम 100 दिन में पूरा कर लेंगे। इसलिए मैं आपको केवल यह बता रही थी कि आप अपनी फूड सिक्योरिटी का पहला बिंदु भी पूरा नहीं कर पाए, जो 100 दिन के लिए है, पांच साल के लिए नहीं है।

SHRI PRANAB MUKHERJEE: Absolutely correct.  So far as the Food Security enactment is concerned, I have given the explanation that the drought came within these 100 days.  It did not come after 100 days… (Interruptions) Most respectfully, I would submit that the drought was there from July onwards.  This was the speech delivered in July and the drought was from the month of July onwards… (Interruptions)

So far as the statistical number of persons below poverty line is concerned, I have stated that these various figures have come. Except the Tendulkar Committee Report, other Reports had their limited applications.  What the Ministry of Rural Development did, their Terms of Reference were different. What Dr. Arju Sengupta Committee did , their Terms of Reference were different.  It was comprehensive criterion on the basis of which the persons below poverty line were to be calculated; and it was covered  by the Terms of Reference of the Tendulkar Committee. Therefore, we shall have to go by that.

SHRIMATI SUSHMA SWARAJ : But you said,it is the Planning Commission.  There is a vital difference. The  Planning Commission says 25.7 per cent and the Tendulkar Committee Report says 37.2 per cent.   There is a difference of 12 per cent.

SHRI PRANAB MUKHERJEE: Sushmaji, please do not try to confuse  yourself. You cannot confuse me.  But do not try to confuse yourself.

SHRIMATI SUSHMA SWARAJ :  I am not confusing… (Interruptions)

SHRI PRANAB MUKHERJEE:  The Planning Commission  is still talking today  of 25 per cent; and on that basis, I have mentioned six crore families.  Unless that figure is replaced...

SHRIMATI SUSHMA SWARAJ : ...by 37 per cent.

SHRI PRANAB MUKHERJEE: Whatever is the number. Unless that figure is replaced and adopted by the Government, the relevance of the Planning Commission will be there  and the allocation will be  made on the basis of the figures of the Planning Commission. This is as simple as that. Therefore, those figures are being worked out.

          I would not like to take more of your time.  Rather I must say that I have done a little out of box because the Finance Minister does never speak before the Budget presentation, and it is just even 24 hours before the Budget presentation, I am to speak. That Sushmaji forced me to speak!  I  am jokingly saying it… (Interruptions)

SHRIMATI SUSHMA SWARAJ : Take a hot cup of coffee and take rest, for the Budget tomorrow… (Interruptions)

श्री मुलायम सिंह यादव : आपने सूखे का जिक्र किया कि उस समय सूखा पड़ा था। हिन्दुस्तान में हर साल कुछ हिस्सों में सूखा पड़ता है और कुछ में बाढ़ आती है।

SHRI PRANAB MUKHERJEE: That is true, Mr. Mulayam Singh Yadav.  I would simply request you to go through you own speech delivered in this very House. The picture, you projected was this. You said: “There would be droughts; we, Members of Parliament would not be able to move.  You take immediate steps, and call the  meeting of the Chief Ministers.”   Please read your own speech on droughts, which you delivered in the Monsoon Session… (Interruptions)

          Therefore, keeping  that in view, I am a little bit influenced by your observations, observations of a very senior leader, who ruled Uttar Pradesh, the largest State of the country and who is expert on these matters.

          So, if I am little scared and advise my colleagues that you do not proceed further because we do not know and we are giving the legal guarantee. But if there is no food, I know what will happen. It is because as a student of history I have seen that we had to borrow Bajra. We had to bring Milo from other countries to feed our people. Therefore, keeping that in view, if we take a little cautious step, you can say that we are extra cautious but do not blame us.

          Thank you Mr. Deputy-Speaker for giving me this opportunity.

                                                                                         

SHRIMATI SUSHMA SWARAJ : Have a hot cup of coffee and take rest to present the Budget tomorrow. We are all waiting for your Budget.

 

SHRI B. MAHTAB (CUTTACK): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I stand here today to speak on the issue of price rise that is being very abnormal, and it has agitated us for the last three days when the Budget Session is on.

          During the last one year there has been abnormal increase in prices of essential commodities and it has been a matter of great concern for all of us. These food items form the basic constituents of common man’s diet and rising prices affect one and all. The problem is more acute for the poor whose real incomes get eroded and nutrition intake gets affected.

          In the last three years there have been huge fluctuations in commodity prices and this has been caused due to macro economic factors. The Leader of the House and the Finance Minister has mentioned about the resilience of our farmers and our workers to fight back and bring back the economy on to the rails. But I was expecting an answer from the Finance Minister and the Leader of the House that he should come out with the reasons for this man-made disaster.

          Therefore, I would say there is a demand to investigate why these fluctuations have taken place within the last one year, and the Government should come out with a White Paper as early as possible before the House rises for recess so that the whole country would know why the Government should always react in a knee-jerk manner and take steps within 15 days, fortnight, month-wise and it should explain to the country why such fluctuations have taken place.

          The Government has detailed some steps in the hon’ble President’s speech relating to food prices. The Government has recognized pressure on the prices of food grains and food products. The reasons that have been given are shortfall in domestic production and prevailing high prices of rice, cereals and edible oils globally. Through the President’s speech, the Government has stated that because of higher procurement prices and higher public spending on programmes of rural development and because of raised income in rural areas, the prices of essential commodities have gone up.

Nothing can be far from truth. Would anyone subscribe to this view? When one diagnosis the problem one expects that the remedy will follow. But if the decision is deliberate, then the focus shifts to other areas. Therefore, their actions are blunted. What we hear from the Government is not ‘actions’ but belated explanations.

Last year, in February, the United Nations Environment Programme released a report in New York which had warned that food prices might increase by 30 to 35 per cent within the next ten years. This would force those living in extreme poverty to spend 90 per cent income on it. UNEP Executive Director   Mr. Achim Steiner had said: “We need to deal with not only the way the world produces food, but the way it is distributed, sold and consumed.” I am reminded of Finance Minister Pranab Babu’s speech of February 16, 2009, when he presented the Interim Budget. He had said: “The real heroes of India’s success story are our farmers. Through their hard work they have ensured food security for the country. Procurement of 22.7 million tonnes of wheat, 28.5 million tonnes of rice for our public distribution system was done in 2008. Our granaries are full.” He had assured us. “Annual growth rate of agriculture rose to 3.7 per cent and production of foodgrains increased by 18 million tonnes each year to reach an all time high to over 230 million tonnes in 2007-08.”   16.21 hrs.                               ( Shri P.C. Chacko in the Chair)           But the Government does not want to hear that the full granaries failed to calm the turbulent prices. They just rose. Despite high production, prices rose. I am of the opinion that many of supply side measures taken to contain prices of essential commodities by Cabinet Committee on Prices are based on flawed assumption. It is naïve to assume that hoarding alone is behind the spurt of prices of agricultural items. Commodities like vegetables, fruits, milk, egg, meat and fish, all of which have contributed significantly to food inflation, are highly perishable in nature. Hoarding cannot explain the rise of these prices.

I am reminded of the Conference of Chief Ministers on soaring food prices convened by the Prime Minister on February 6th this year. An attempt was made to find scapegoats. Everyone is pointing fingers at everyone else. Even today we are witnessing that. It also provides an opportunity for heart searching and fresh thinking. One thing must be made clear right at the outset, it simply will not do for the Centre to wash its hands off its responsibility touting the argument that agriculture is a State subject. It is well known to students of constitutional history that though there is distribution of powers between the Federal and State Governments, it has access to and control over vast natural and financial resources and our advances in communications have come to assume an overarching as well as overbearing role resulting in the erosion of the powers of the constituent States. In respect of agriculture in particular, every sphere of decision making laws has by default, if not by tacit consent, comes within the purview of the Central Government.

The Bureau of Costs and Prices computes the cost of production based on which the Ministry of Food and Agriculture fixes the remunerative prices to be paid to farmers. The Food Corporation of India undertakes the procurement of cereals, maintenance of buffer stocks and transportation of foodgrains. The allocation of foodgrains and essential commodities going to States’ public distribution system for distribution in fair price shops is made by the Food Ministry.

          Inter-State movement of food articles, the timing, duration, quantities and pricing of exports and imports including trade and all levies connected with these operations are regulated by the Centre.

          Thus, the levers of reversing the present critical situation are mostly at the Centre’s hands. The most potent instrument is the buffer stock of foodgrains. Onus lies with this Government. Please do not shift your responsibility. In view of comfortable levels of production and procurement, the Kirit Parikh Committee had some years ago brought down the buffer stock to four million tonnes of wheat and six million tonnes of rice whereas the stocks with the FCI as at the end of 2009 are 19 million tonnes of wheat and 24 million tonnes of rice. The first question that arises, therefore, is – why does the Central Government prefer to sit on this huge quantity far in excess of the minimum essential level of buffer instead of using at least half of that quantity for reducing the prices and releasing to the States as much as they want for population above and below the poverty line and for the Targeted PDS meant for the vulnerable section. Plainly, the Food Minister owes an explanation for this omission.

          It is not enough merely to make the allocation to the PDS, accommodating the requirements conveyed by the States. Do you have weekly meetings with the FCI and the Railways regarding the progress in the movement and delivery of the quantities allotted? The Government should also overcome the tendency to be indifferent to the offer of cooperation by the States ruled by Opposition Parties. I have a question here. Is it true that one Government – I am not naming that Government – had offered to crush nine lakh tonnes of imported raw sugar lying at ports in that State in mills to augment availability but the Central Government, weighed down with political inhibition, adopted a ‘dog in the manger’ policy of neither taking up the offer nor making alternative arrangements. … (Interruptions) It is Gujarat Government.    . … (Interruptions)

We need a categorical reply. Very often difficulties are created for the States by the Food Ministry acting on its own without keeping the States in the picture. Delays and cuts in the allocation for PDS have brought the situation in the affected States to near crisis. Even the tenor of allocation, transportation and supply at the doorstep of fair price shops is disturbed by the Centre’s dilatory or thoughtlessness actions. It takes a long time for the  State to get back to the normal rhythm. This clearly demonstrates that substantive responsibilities are left to the States to manage the PDS and taking action against hoarding, profiteering and other malpractices under the Essential Commodities Act. Instead of looking within and correcting the causative factors for which you are answerable, you are adopting too escapist ploys to divert attention for your failure.

          First, you are making it look as if launching de-hoarding drives by the State Government by itself holds the key to bring down the prices. However extensive and effective de-hoarding drive, the quantities unearthed do not make any difference to the overall picture. Second, you have gone for the time-dishonoured move for setting up a Standing core Committee comprising the Finance Minister and the Agriculture Minister, the Deputy Chairman of Planning Commission and the Chairman of Prime Minister’s Economic Council and ten Chief Ministers. This Group has been asked to suggest measures to deal with price rise and proposed steps for improving PDS, procurement of foodgrains and production of agriculture produce including long-term policies for sustained agriculture growth. 

          There is no doubt that it is an all encompassing charter, but it is a waste of time because comprehensive database and recommendations do already exist.

          In the recently held CM’s Conference, Orissa Chief Minister had mentioned about the issue of estimating the number of the poor. The latest recommendation and estimates of Tendulkar Committee put the poor in Orissa at 57.2 per cent, but the question here is whether the Central Government is allocating food grains for PDS accordingly. The allocation is of 1992-93 and 2002. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : Please conclude. Your time is over.

SHRI B. MAHTAB (CUTTACK): Sir, I need more time.

MR. CHAIRMAN: One minute.

SHRI B. MAHTAB : To bring about transparency in PDS, I would mention in this House that Orissa Government has taken up a pilot project in one of the districts of the so-called KVK, named Rayagada where biometrics of all the households have been captured. The UID and the State also plan to roll this across the State. This would lead to real time monitoring of PDS lifting and inventory levels. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN:  No interruptions please.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Please address the Chair and finish your speech.

… (Interruptions)

SHRI B. MAHTAB : This should be done throughout the country.

          Sir, I would say that galloping food prices have shattered family budgets across the country. With the latest inflation data showing that prices rose at around 20 per cent continuously for the past four weeks, the main essentials of the Indian kitchens are almost beyond reach. Sugar is up by 60 per cent, pulses by 46 per cent and potato by 53 per cent over a year in a country already suffering from chronic malnutrition and low income. This trend is a killer.

          Recently, Centre for Budget and Governance Accountability points out that if food security is to be really achieved, restricting the provision of subsidized grains to the BPL category, … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Shri Mahtab, please take your seat. You have taken 16 minutes while your time was 10 minutes. Please conclude in one minute.

SHRI B. MAHTAB : Sir, I am giving certain suggestions. I need some more time.

          What is required is availability of food grains by channeling cheap food grains through a universal Public Distribution System as was propounded by Shri Baalu and supported by Shri Basu Deb Acharia. Along with that, I am adding that you provide the biometrics as quickly as possible to the vulnerable sections of the society so that one can monitor.

          If you make it universalized, the point that has been missed here is that if you provide 35 kilograms of food grains to each family, the expenditure would be Rs. 84,399 crore annually. This is less than one-fifth of the revenue foregone by the Government through tax exemptions in 2008-09. Mr. Chairman, you can very well understand. The amount of tax foregone is Rs. 4,18,096 crore. Therefore, there is a need to universalize PDS and have biometrics of all the households captured. There is a need to monitor release of food grains to the PDS at Central level.

  I demand for proper investigation into these matters, and the Government should come out with a White Paper on the reasons for the repeated fluctuations and rise in prices of essential commodities before the House rises for Budget recess.

          With these words, I conclude.

                                                                                                   

MR. CHAIRMAN: The next speaker is Shri Anant Geete. Mr. Geete, the time available with you to speak on this issue is only seven minutes. Please do not exceed too much.

श्री अनंत गंगाराम गीते (रायगढ़):  सभापति महोदय,  यू.पी.ए. के छ: साल के कार्यकाल में हम सदन में नौंवी बार महंगाई पर चर्चा कर रहे हैं। हर बार यह अपेक्षा की गई थी कि सरकार की तरफ से   महंगाई को रोकने के लिये कुछ प्रयास किये जायेंगे लेकिन हर समय चर्चा के अलावा इस सदन से कुछ नहीं निकला है और न ही सरकार की तरफ से महंगाई रोकने के लिये कोई पहल की गयी है। आज जब हम नौंवी बार चर्चा कर रहे हैं तो मुझे नहीं लगता कि  सरकार द्वारा महंगाई रोकने के लिये कोई प्रयास किये जायेंगे।

          सभापति महोदय, अभी य़हां सदन के नेता और वित्त मंत्री श्री प्रणब मुखर्जी ने इस चर्चा में भाग लिया और जिसमें उन्होंने पूरे समय महंगाई का समर्थन किया। उन्होंने महंगाई बढ़ने के अलग-अलग कारण बताये। उन्होंने महंगाई को तो स्वीकार किया लेकिन उसे रोकने के लिये सरकार क्या करना चाहती है, इस पर एक वाक्य भी नहीं कहा। इसलिये मुझे नहीं लगता कि सरकार की मानसिकता महंगाई रोकना चाहती है। श्री शरद पवार कृषि एवं खाद्य मंत्री हैं। उन्होंने इससे पहले भी इस चर्चा का लम्बा जवाब दिया है  और आज भी मुझे लगता है कि इस चर्चा का जवाब लम्बा देंगे। जब पहले ही सदन के नेता ने महंगाई रोकने के लिये कदम उठाने की कोई बात नहीं की है तो मुझे नहीं लगता है कि महंगाई रोकने के लिये सरकार की तरफ से कोई पहल की जायेगी। सदन के नेता ने न केवल महंगाई का समर्थन किया बल्कि अपोज़ीशन को इस बात के लिये धमकाया कि उन्हें पांच साल के लिये जनादेश मिला है। यह तब धमकाया जब हम इस विषय को नियम 193 के अधीन डिसकस कर रहे हैं। यदि उनमें साहस होता तो काम रोको प्रस्ताव स्वीकार करते और उसके बाद हमें धमकाते लेकिन उन्होंने यह चांस नहीं लिया। जब नियम 193 के अधीन चर्चा आयी है तो हमें धमका रहे हैं लेकिन सदन के नेता को इस बात का ख्याल रखना चाहिये कि यह बहस महंगाई पर है। आज देश की सारी जनता महंगाई से परेशान है। न केवल बीपीएल बल्कि एपीएल की हालत बदतर है। हम बीपीएल के लिये प्रोग्राम बनाते हैं, उनके कल्याण के लिये योजनायें चलाते हैं लेकिन उनकी हालत खराब है। आज हमारे देश की 72 प्रतिशत जनता ग्रामीण है। इस तरह 72 प्रतिशत ग्रामीण भारत है। उसमें रहने वाला चाहे किसान हो, बीपीएल हो, एपीएल हो, उसके जीवन-यापन का तरीका एक ही है। इसलिये महंगाई से आम जनता परेशान है। जब भी कांग्रेस या यू.पी.ए. की सरकार रही है, आम आदमी हमेशा परेशान रहा है। महामहिम राष्ट्रपति जी ने अपने अभिभाषण में जिक्र किया है कि आज आम आदमी परेशान है।

 

लेकिन, सरकार कुछ नहीं करना चाहती है। कल सदन में यह चर्चा हुई कि काम रोको प्रस्ताव स्वीकार किया जाए या नहीं। हमने उस पर अपनी राय रखी, हमारे संसदीय कार्य मंत्री जी मुझ पर गुस्सा हुए, मैंने तब सरकार को एक चेतावनी दी थी कि यदि यह महंगाई इसी तरह बढ़ती रही तो एक दिन रोटी को लेकर इस देश में सिविल वॉर होगा। वह समय नजदीक आ रहा है। ...( व्यवधान) यह जन-आन्दोलन है, लोगों में आक्रोश है...( व्यवधान) देश की जनता में आक्रोश है।...( व्यवधान)

सभापति महोदय  : गीते जी, आप चेयर को सम्बोधित कीजिए।

…( व्यवधान)

श्री अनंत गंगाराम गीते : महोदय, आज देश की जनता महंगाई को लेकर आक्रोशित है, क्रोधित है और आन्दोलित है और किसी भी समय यह चिंगारी भड़क सकती है। शरद यादव जी ने कहा कि अब यह मामला सदन का नहीं रहा, इसे सड़क तक ले जाना चाहिए। लालू जी, जो हमारे नेता हैं, वे कह रहे हैं कि भारत भर में इस पर जन-आन्दोलन होना चाहिए। बिहार में आन्दोलन शुरू हो गया है, उत्तर प्रदेश में भी इसकी शुरूआत हो रही है और धीरे-धीरे यह महंगाई का आन्दोलन सड़क पर उतरेगा। यह आन्दोलन सारे देश में होगा और उसकी जिम्मेदारी भारत सरकार की होगी। महंगाई का जो मुद्दा है, केंद्र सरकार इसकी जिम्मेदारी राज्यों पर थोप रही है और राज्य सरकारें कह रही हैं कि इससे हमारा कोई संबंध नहीं है, यह भारत सरकार की जिम्मेदारी है। जब यहां पर संजय निरूपम जी बोल रहे थे, उन्होंने जमाखोरों की लिस्ट यहां पर पढ़ी और विशेषकर कई राज्यों का जिक्र किया। वे यहां पर उपस्थित हैं, सबसे ज्यादा 16,000 जमाखोरों पर कार्रवाई महाराष्ट्र में हुई। संजय निरूपम जी, इसका अर्थ यह होता है कि सबसे ज्यादा जमाखोर महाराष्ट्र में है।...( व्यवधान) मुझे इसी बात का गुस्सा था और मैं इसी बात पर गुस्सा होकर बोल रहा था। ...( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम :  महाराष्ट्र में जमाखोरों पर कार्रवाई भी की गयी है।...( व्यवधान)

श्री अनंत गंगाराम गीते : महोदय, मुझे स्पीकर आसन से रोका गया, मैं इसी बात पर उत्तेजित था। आप क्या बता रहे हैं, आप क्या जानकारी दे रहे हैं? ...( व्यवधान) वहां सरकार आपकी है, कांग्रेस की सरकार है। ...( व्यवधान)

श्री संजय निरुपम :  आप शाहरूख खान को लेकर गुस्सा हैं।...( व्यवधान)

श्री अनंत गंगाराम गीते :  वहां आपकी सरकार है।...( व्यवधान) वहां कृषि मंत्री जी की सरकार है।...( व्यवधान) महाराष्ट्र की सरकार कृषि मंत्री जी की है, महाराष्ट्र की सरकार सदन के नेता की है, महाराष्ट्र की सरकार चेयरपर्सन की है। यदि सबसे ज्यादा जमाखोरी महाराष्ट्र में है तो इसके लिए वहां की सरकार जिम्मेदार है, आप लोग जिम्मेदार हैं। आपने दिल्ली का जिक्र किया, दिल्ली में किसकी सरकार है, आप क्या जानकारी दे रहे थे? ...( व्यवधान) मुझे इस बात का अफसोस है, मैं महाराष्ट्रियन हूं और मुझे इस बात का अफसोस है, यदि यह बात सही है तो मुझे इस बात का अफसोस है, लेकिन इसके लिए राज्य की सरकार जिम्मेदार है। ...( व्यवधान) इसके लिए सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं। आज यह जमाखोरी गलत नीतियों के कारण हो रही है।...( व्यवधान) मैं जमाखोरों के समर्थन में नहीं हूं, मैं उनके खिलाफ हूं। आपने जिस ढ़ंग से इस बात को सदन में कहा, आप क्या कहना चाहते थे? इसके लिए आपकी सरकार और आपकी नीतियां जिम्मेदार हैं, राज्य की सरकार जिम्मेदार है।

          महोदय, केवल राज्यों के ऊपर जिम्मेदारी थोपकर केंद्र सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं भाग सकती। सरकार को अपनी जिम्मेदारी लेनी चाहिए और महंगाई को स्वीकार करना चाहिए। महंगाई को रोकने के प्रयास होने चाहिए, लेकिन सारी बहस के बाद जब हमने सदन के नेता को सुना तो यह नहीं लगता कि सरकार महंगाई को रोकने के लिए कोई कदम उठाना चाहती है, बल्कि आप उसका समर्थन कर रहे हैं। आप डिमांड और सप्लाई के बीच के गैप को बता रहे हैं, आप यहां क्रूड के दाम को जोड़ रहे हैं। आज आप किसानों को बड़ी संख्या में समर्थन मूल्य देने की बात कर रहे हैं, आप उसका संदर्भ तो यहां पर दे रहे हैं, लेकिन दुर्भाग्य है कि इसके बावजूद भी सबसे ज्यादा आत्महत्याएं महाराष्ट्र में किसानों की हुई हैं।   

 विदर्भ में किसानों द्वारा आत्महत्याएँ हुई हैं और आज भी किसान आत्महत्या कर रहे हैं। क्या सुविधाएँ हम उनको दे रहे हैं? सभापति महोदय, हमारे देश में कृषि योग्य भूमि के केवल 28 प्रतिशत पर ही सिंचाई होती है। हमें 62 साल में क्या मिला? हमारी प्राथमिकताएँ क्या थीं? 72 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि ऐसी है जहाँ पानी नहीं है। आज खाद्यान्न की खेती करने वाले किसान धीरे धीरे खेती छोड़ने लगे हैं। खाद्यान्न की खेती घाटे की खेती होने लगी है। इसलिए धीरे धीरे किसान इसको छोड़ने लगे हैं। किसानों का पलायन धीरे धीरे शहरों की ओर हो रहा है। मज़दूर बढ़ने लगे हैं, बेरोज़गार बढ़ने लगे हैं और धीरे धीरे खेती कम होने लगी है। यहाँ सुषमा जी ने कहा कि कृषि का रकबा कम हुआ है। रकबा तो कम हुआ है लेकिन किसान जो खाद्यान्न का उत्पादन करते हैं, वह खेती घाटे में होने के कारण किसान खेती छोड़ने लगा है, उसका भी दुष्परिणाम महंगाई के रूप में सामने आ रहा है और अनाज की कमी के रूप में सामने आ रहा है। यह हमारी सरकार की गलत नीतियों के कारण हो रहा है। सरकार की गलत नीतियों के कारण आज किसान दुखी है। सरकार की गलत नीतियों के कारण आज गरीब दुखी है, महंगाई दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। महंगाई पर नियंत्रण करने वाला यहाँ कोई नहीं है। सरकार अपनी ज़िम्मेदारी से हट रही है, भाग रही है। ऐसी स्थिति में यदि आप जनता को भगवान के भरोसे छोड़ दो, ईश्वर के भरोसे छोड़ दो तो कल यह स्थिति होगी कि कल सड़क पर जनता उतरेगी, देश भर में आंदोलन होगा और निश्चित रूप से उसके परिणाम केन्द्र सरकार को भुगतने पड़ेंगे।

          सभापति महोदय, आज लगभग 50 प्रतिशत से ज्यादा लोग नौकरी करने वाले हैं - वर्कर्स हैं, मज़दूर हैं, कामगार हैं, सैलेरी अर्नर्स हैं। आज उनकी हालत सबसे बुरी है क्योंकि उनका वेतन तो सीमित है, उसमें बढ़ोतरी नहीं हो रही है। महीने के अंत में उनको उतना ही वेतन मिलना है और हर दिन जीवनावश्यक चीजों के दाम बढ़ते जा रहे हैं। हफ्ते भर में भाव दुगुने होते जा रहे हैं। आम आदमी का जीना मुश्किल हो गया है। 28 फरवरी और 1 मार्च को होली है। इस बार मुझे नहीं लगता कि देश का गरीब होली खेल सकेगा या होली का त्यौहार मना सकेगा। कोई होली नहीं खेल पाएगा। आज चीनी के दाम क्या हैं? 42 रुपये और 50 रुपये किलो आज चीनी के दाम हो गए हैं। आज कैसे हम लोग अपने त्यौहार मनाएँगे? ...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Please take your seat. There are many speakers. They will be denied the time to speak. Please take your seat.

श्री अनंत गंगाराम गीते : मैं समाप्त ही कर रहा हूँ। यह मामला इतना संगीन है कि ...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: We have ten more speakers. Please confine to your time limit. You know the time allotted to each Party.

श्री अनंत गंगाराम गीते : सभापति महोदय, यह जो महंगाई का मामला है, इसको इतनी आसानी से लेकर सरकार अपनी ज़िम्मेदारी से भाग नहीं सकती है। सरकार को महंगाई रोकने के लिए सख्त कदम उठाने चाहिए। आज सदन में कृषि मंत्री जब जवाब देंगे, तब उनको इस सदन को आश्वस्त करना होगा कि महंगाई को रोकने के लिए वे कौन से कदम उठा रहे हैं, कौन सी कार्रवाई कर रहे हैं, इस पर सदन को आश्वस्त करना पड़ेगा।

                                                                                                   

DR. M. THAMBIDURAI (KARUR): Thank you Mr. Chairman for giving me the opportunity to say a few words on this important issue. All Members in the House have expressed their views about price rise. All Members expressed that there is an unprecedented price rise of essential commodities. Because of that, the common man is affected very much. Even our President of India in her speech said: “There has been an unhappy pressure on the price of food grains and food products. Higher prices were inevitable, even the shortfall of domestic production.” In this aspect, I want to say a few words. The President of India speech means, it is the policy of the Government. The Government itself accepts that there is price rise and also shortfall in production.

          When production goes down, definitely there is shortage of goods  and demand will be more and  because of that the price increases. This is a simple theory of economics. Due to shortage in food production, prices are increasing. Why is there a shortage of food production in India? It is because the farmer is not given enough remunerative price. There is demand from the farmers that the minimum support price of rice, wheat, sugarcane and other products be increased. That is what the farmers are expecting. Input costs of farm products are increasing and the farmers are getting low income by selling their produce. That is why the farmers are not coming forward to cultivate more lands and produce more. That is why farm production is going down.

          Recently, my leader hon. Ms. Jayalalithaa has written a letter to the Union Agriculture Minister requesting him to consider increasing the support price of sugarcane. Farmers in Tamil Nadu are getting a minimum support price of Rs.1437 per tonne of sugarcane. During the reign of Ms. Jayalalithaa in 2005-06, the price given was Rs.1014. At that time the sugar price was Rs.12 to Rs.14 per kg. Now the price of sugar is Rs.44 per kg. When that is the case, if the support price given is Rs.1437, is it feasible for the farmer to cultivate sugarcane? That is why the production is going down, cultivation area is going down and due to less production the price is increasing and so we are forced to import. Why do we have to import? If you give more incentives to farmers, definitely the production will increase and definitely the price can be controlled. That is why our leader Ms. Jayalalithaa has written a letter requesting the Union Government to consider increasing the support price for sugarcane to Rs.2500 per tonne. Then only it will be remunerative for the farmers.

          Production of sugar in Tamil Nadu during the term of Ms. Jayalalithaa in 2005-06 was 21.5 lakh metric tonnes. It has come down in 2008-09 to 16.4 metric tonnes. Instead of going up, sugar production is going down in agriculture sector. That is why the Hon. President in her Address said that production is going down. Therefore, in order to increase production, definitely we have to consider the request of the farmers. Otherwise, farmers would not come forward for cultivation.

          I now come to the prices of other essential commodities. One Hon. Member said that the Government of Tamil Nadu was giving rice at Rs.1 a kg.  But what about the prices of other commodities? In the open market the price of rice is Rs.34 per kg. This is the price prevailing in the open market. Take the example of salt. What is the price of salt now? It is Rs.9 to Rs.10 per kg. Even a match box costs Rs.2 nowadays. Prices of every commodity are going up.

          We have to have an effective PDS mechanism. It is not at all effective in Tamil Nadu. That is because most of the rice is smuggled to the neighbouring States and to other countries also. We have seen a report in the newspapers about two weeks ago, about officials raiding the stock of a firm in the Tuticorin harbour. They seized nearly  two thousand tonnes of rice there. The officials said that that was PDS rice. Within a week the officials came forward to say that that was not PDS rice but that was similar equivalent to PDS rice. They said that the firm procured that rice from the same place in Andhra Pradesh where PDS rice was procured. This has become a controversy. I am referring to it to say that the PDS rice is smuggled to other States and to other countries like Maldives. This is going on. This is reported in the newspapers. It is very essential that the Government strengthen the PDS and see that the poor man gets essential commodities at cheaper rates.

         I want to make a suggestion regarding marketing of products by farmers. Some kind of corporation is required for this purpose. Central Government  should consider this suggestion and set up corporation to procure the products from the farmers and sell them to the consumers directly through the cooperative system.  This system would alone control the price rise, otherwise, middlemen would make a lot of profits in this.

          Another issue which affects the price rise is inflation. I think, inflation is more because of circulation of more money and maybe because of certain RBI policies. Illegal activities are going on in our country. Most of the counterfeit, illegal money printed in Pakistan, China and Nepal come to our country through various ways. This money is circulated among the people which results in escalation of inflation.  The money which people are getting through these means are invested in real estates. Poor farmer is tempted by the money.  At one point of time, the cost of one acre was Rs.1 lakh but because of the flow of illegal counterfeit money, the farmer is given Rs.1 crore and the farmer sells his land. This one crore of rupee may be spent by the farmer in due course of time but this land was kept by the ancestors for the family but because of flow of counterfeit money and the inflationary conditions, he is tempted to sell the land. Afterwards, he suffers. Therefore, the Government should come forward with a new monetary policy to curb flow of illegal and counterfiet money. Thank you for giving me time.

   

श्री नामा नागेश्वर राव (खम्माम):  ऑनरेबल चेयरमैन, प्राइस राइस के बारे में, इस हाउस में, इससे पहले भी बहुत चर्चा हुई है। मैंने पहली बार एम.पी. बनकर, इस हाउस में आने के बाद यह सोचा था कि देश के जो कुछ भी इश्यूज हैं, उनके ऊपर अगर यहां बात कही जाए, तो उनके ऊपर गवर्नमेंट सीरियसली विचार कर के, उनका जरूर कोई न कोई रास्ता निकालती है। मगर यहां प्राइस राइस के ऊपर दो बार चर्चा होने के बाद भी प्राइस कंट्रोल करने के बारे में यह गवर्नमेंट टोटली फेल हो गई है।

          अभी हमारे प्राइम मिनिस्टर साहब ने बताया कि मार्केट फोर्सेस की वजह से यह प्राइस राइस हो रही हैं। हमारे एग्रीकल्चर मिनिस्टर साहब बोलते हैं कि रबी की फसल आने के बाद प्राइसेस पर कुछ कंट्रोल होने के चांसेस हैं। अल्टीमेटली ये जो प्राइस राइस डे टू डे हो रहा है, उसके कारण देश में इन्फ्लैशन 20 परसेंट को टच कर रहा है। लास्ट टाइम, इसी हाउस में बोला था कि एग्रीकल्चर सैक्टर में 1.6 परसेंट से 4.00 परसेंट ग्रोथ की जाएगी, लेकिन यह बहुत ही अनफॉर्चुनेट है कि एग्रीकल्चर में 0.2 परसेंट ग्रोथ रेट मायनस हो गई है। इसके लिए इस गवर्नमेंट की पूरी जिम्मेदारी है।

          चेयरमैन साहब, यह बहुत ही सरप्राइजिंग है कि फायनेंस मिनिस्टर साहब शुगर एक्सपोर्ट का समर्थन कर रहे थे। फायनेंस मिनिस्टर साहब, अभी यहां नहीं हैं, लेकिन मेरी उनसे गुजारिश है कि वे इस बात का जरूर रिप्लाई दें कि फायनेंस मिनिस्टर साहब एक्सपोर्ट का समर्थन क्यों कर रहे थे, क्या वे इसलिए समर्थन कर रहे थे कि उस समय मार्केट में सरप्लस शुगर थी, क्या इसलिए एक्सपोर्ट किया था। इसके साथ उन्होंने यह भी बोला था कि वर्ष 2008 में शुगर प्रोडक्शन 263 लाख टन का हुआ था और हमारा कंजम्पशन 205 लाख टन का था। यह बहुत ही इम्पौर्टेंट पाइंट है कि वर्ष 2009 में शुगर का प्रोडक्शन 146 लाख टन ही रह गया। जब उन्हें यह बात पता थी कि अगले साल देश में शुगर का प्रोडक्शन कम होगा, तो उन्होंने एक्सपोर्ट क्यों किया और अब उसका वे समर्थन क्यों कर रहे हैं? जब उन्हें पता था कि देश में अगले साल का शुगर प्रोडक्शन कम होगा और कंजम्पशन भी बढ़ेगा, तो एक्सपोर्ट को अलाऊ नहीं करना चाहिए था। एस्कपोर्ट को अलाऊ ही नहीं किया, बल्कि एक्सपोर्ट करने हेतु सब्सिडी भी दे दी। 695 करोड़ रुपए की इस सरकार ने एक्सपोर्ट करने वालों को सब्सिडी दी है, जबकि फार्मर्स को कुछ भी नहीं मिला।

          चेयरमैन साहब, गवर्नमेंट के पास दो-तीन साल की प्लानिंग होनी चाहिए, लेकिन इस सरकार के पास ऐसी कोई प्लानिंग नहीं है। यह बहुत ही अनफॉर्चुनेट है। इस इश्यू पर फायनेंस मिनिस्टर ने भी सपोर्ट किया है और कहा है कि एक्सपोर्ट सही है। इसी कारण आज शुगर के प्राइस ने 50 रुपीज को टच किया है।

 17.00 hrs.     इसके लिए गवर्नमेंट पूरी तरह से जिम्मेदार है।  हमारे एग्रीकल्चर मिनिस्टर साहब को सबसे ज्यादा गन्ने के बारे में मालूम होता है।  उनको यह भी मालूम है कि नेक्स्ट ईयर का प्रोडक्शन क्या है, वह मालूम होते हुए इन्होंने एक्सपोर्ट को एलाउ किया।  इसके लिए गवर्नमेंट पूरी तरह से जिम्मेदार है।  वर्ष 2004 में यूपीए की गवनमेंट आने के बाद से अभी प्राइस 13 रूपए से 40 रूपए हुआ है, यह दो सौ प्रतिशत यह बढ़ गया है।  इसके साथ ही दाल भी 34 रूपए से 96 रूपए हो गयी है, उसका दाम भी तीन सौ प्रतिशत बढ़ गया है। शुगर 13 रूपए से 45 रूपए हो गयी है, इसका दाम भी 250 प्रतिशत बढ़ गया।  इस तरह से हर एक आइटम जो गरीब आदमी खाता है, उसका दाम दो सौ से तीन सौ प्रतिशत इस गवर्नमेंट के आने के बाद बढ़ा है।  अपनी पालिसी के फेल्योर के कारण यह इसको कंट्रोल नहीं कर पायी है, फार्मर को प्रोटेक्ट नहीं कर पायी और फार्मर में कान्फिडेंस क्रिएट नहीं कर पायी।  इस गवर्नमेंट के आने के बाद प्रोडक्शन कम होने के लिए यह गवर्नमेंट जिम्मेदार है।  कम से कम गवर्नमेंट अब यह रियलाइज करे, फार्मर को पूरा सपोर्ट करे और उसे एम.एस.पी. का अच्छा रेट दे दे।  हम लोगों ने इस हाउस में बहुत बार कहा है कि फार्मर को उचित रेट मिलना चाहिए, लेकिन सब लोगों के कहने के बाद भी कोई कुछ सुनता नहीं है।

          महोदय, यह बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है।  देश के गरीब लोगों को खाने में दिक्कत हो रही है।  सबसे इंपोर्टेंट प्वाइंट है, पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा हमारे देश में हंग्री पीपुल जो खाने के बिना मर रहे हैं, हम लगभग 21 करोड़ लोगों के लिए सही ढंग से खाना नहीं दे पा रहे हैं।  रेट्स बढ़ने की वजह से इनकी संख्या भी बढ़ रही है।  इसलिए हम गवर्नमेंट से रिक्वैस्ट करना चाहते हैं और डिमांड करना चाहते हैं कि इसकी जिम्मेदारी लेते हुए, आगे के लिए एक रास्ता निकालना चाहिए।  गवर्नमेंट की ओर से कहा गया कि measures taken by the Government to control the prices of essential commodities. क्वैश्चन नंबर 2511 में ये बोलते हैं।  प्राइस को कंट्रोल करने के लिए यह क्या-क्या बोलते हैं?  ये बोलते हैं कि इंपोर्ट डय़ूटी को जीरो कर देंगे।  इंपोर्ट डय़ूटी को जीरो करते हैं, तो रेट्स कम होते हैं।  Reducing the import duty on refined sugar and a ban on export of non-basmati. अभी भी यह नहीं बोल रहे हैं, हमें मालूम है हमारा टाइम कम है।  ...( व्यवधान)

          महोदय, इस तरह से जो मेजर्स लिए हैं, वन टाइम मेजर्स में फार्मर को प्रोटेक्ट करने के लिए एक भी प्वाइंट नहीं लिखा है, फार्मर के लिए कुछ भी नहीं लिखा है।  एक्सपोर्ट, इंपोर्ट और वैट के बारे में लिखा है, मगर फार्मर को इसको कंट्रोल करने के लिए, प्रोडक्टिविटी बढ़ जाए और फार्मर को सपोर्ट कर दें, इस बारे में एक भी बात नहीं है।  इसी से पता चलता है कि ये लोग फार्मर के लिए क्या कर रहे हैं? सिर्फ बात करते हैं, काम कुछ नहीं करते हैं।  इसलिए आप फार्मर्स के बारे में सीरियसली सोचें।

          महोदय, फूडग्रेन्स की प्रोडक्टिविटी 7.5 पर्सेंट तक कम हो गयी।  उसमें सबसे ज्यादा ग्राउंडनट आयल तो कम से कम 22 से 23 पर्सेंट कम हो गया, राइस 12 पर्सेंट कम हुआ है और उसी तरह से शुगर भी काफी कम हो गया है।  इस सब को ध्यान में रखते हुए, प्रोडक्शन को इंप्रूव करने के लिए फार्मर को जरूर सपोर्ट करें।  फार्मर्स को प्राइस दे दें, एक कान्फिडेंस क्रिएट करें, तभी आगे आने वाले समय में प्राइस कंट्रोल होगा।

          हमारी पार्टी के प्रेसीडेंट चंद्रबाबू नायड़ू जी ने तेलगूदेशम के टाइम में प्राइस को कंट्रोल करने के लिए राइट बाजार डाला।  जिससे बीच में कोई मिडिलमैन नहीं रहता है, फार्मर मार्केट में जाकर डायरेक्ट अपने प्रोडक्ट को सेल कर सकता है।  फार्मर को भी रेट मिलेगा, कंज्यूमर को रीजनेबल रेट मिलेगा, उस तरह से फार्मर बाजार लगाया था। इसको देखकर लोग जागेंगे।  सब्सिडी के बारे में कहते हैं कि डायरेक्ट सब्सिडी देंगे, उसको सब्सिडी क्या देंगे, यह पता नहीं है, इन्होंने यूरिया का भी दस प्रतिशत बढ़ा दिया, आज फार्मर्स के ऊपर लाठी चार्ज हो रहा है।  हमारी कांस्टीच्युंसी में यूरिया की वजह से पिछले साल लाठी चार्ज करके फार्मर्स को जेल में डाला। कल भी यही हुआ है। यूरिया का जो बैग 225 रुपये का था, इनकी पॉलिसी की वजह से 125 रुपये एक्सट्रा लगाकर उसका दाम 350 रुपये हो गया। इसके लिए सरकार जिम्मेदार है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए किसानों को पूरा सपोर्ट किया जाए, प्रोडक्शन इनक्रीज़ किया जाए। स्वामीनाथन कमीशन की रिकमैंडेशन्स को डिस्कस करके किसानों को सपोर्ट किया जाए। साथ ही सुबह लीडर ऑफ दी औपोजिशन ने शुगर स्कैम, राइस स्कैम, दाल स्कैम के बारे में बोला। उसे क्लीन चिट देने के लिए वे लोग जरूर कोशिश करेंगे। इस बारे में जेपीसी का गठन करना चाहिए, यही बोलते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

                                                                                         

श्री लालू प्रसाद : सभापति महोदय, देश में बर्निंग ईशू कमर तोड़ महंगाई का है। महंगाई के खिलाफ सभी पक्ष के नेताओं ने चिन्ता जताई है और गुस्सा जाहिर किया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के हमारे साथियों ने अलग-अलग ढंग से आरोप-प्रत्यारोप किया है। यह एडमिटेड फैक्ट है कि महंगाई जो बेतहाशा बढ़ रही है, रुकने का नाम नहीं ले रही है, इससे देश की जनता की कमर टूट रही है। सवाल सिर्फ चीनी का नहीं है, मसाले, धनिया, हल्दी, लहसुन, टमाटर, फूलगोभी, मांस, मछली, दूध, आलू आदि सबके दाम बढ़े हैं। जब हम यूपीए सरकार नम्बर एक में थे, हमारे समय में आलू दो रुपये किलो मिलता था। जब से यूपीए नम्बर दो आई है, तब से कमर तोड़ महंगाई है। यहां कोई कोआर्डीनेशन नहीं है और यह बिल्कुल निरंकुश हो चुके हैं। यह वहम में हैं। देश की सरकार राज्यों पर दोष लगाती है कि वे सहयोग नहीं कर रहे हैं, दोषी हैं, कालाबाजारियों के आर्डर के खिलाफ पीडीएस को स्ट्रैन्थैन नहीं कर रहे हैं। एसएफसी द्वारा उन्होंने प्रोक्योरमैंट नहीं किया। यह बात सही है कि राज्यों में चाहे किसी की भी सरकार है और दिल्ली की सरकार, दोनों समान रूप से दोषी हैं। जो बहस हो रही है, इससे कोई नतीजा नहीं निकलने वाला है। आज जवाब आ जाएगा - किया जाएगा, देखा जाएगा, यह डाटा, वह डाटा, दुनिया में मंदी हो गई है, इसका असर है - इस तरह के जस्टिफिकेशन से देश की जनता तंग और तबाह है।

          महोदय, आपको याद होगा कि सन् 1977-78 में जब हमारी सरकार थी, तब प्याज के दाम बढ़े थे। प्याज के सवाल पर पूरी सरकार चली गई थी। अजब देश है हमारा। सिर्फ सदन में ही नहीं, बाहर देश की जनता जो भुक्तभोगी है, कमर तोड़ महंगाई की मार से तंग है। आमदनी अट्ठनी है और खर्चा रुपया है। फिर आगे बढ़ने की बात आ रही है। मुलायम सिंह जी ने ठीक कहा। कांग्रेस पार्टी द्वारा संगठित रूप से कहा जा रहा है, मीडिया के लोग हमसे भी पूछते थे कि शरद पवार जी के ऊपर क्या कार्रवाई होनी चाहिए। इसमें कोई राजनीति नहीं है। हम आपके साथ रहे हैं, एक साथ रहे हैं, लेकिन आपके लक्षण ठीक नहीं हैं। इसलिए यह बात आगे बढ़ने वाली नहीं है। हमने इन्हें दूर रखने के लिए आपको समर्थन दिया था। वह काम पूरा हो गया। आपने वहम में, अहंकार में देश की जनता को, आप सोच रहे हैं, देख रहे हैं कि अभी हमें पांच साल रहना है, लेकिन आप सब लोगों को बीच में ही जाना पड़ेगा, क्योंकि यह बात बर्दाश्त होने वाली नहीं है। देश की जनता ने जो अंगड़ाई ली है, जो भी परिवर्तन हुआ है, जो भी हवा चलती है, वह बिहार से चलती है। बिहार में कमरतोड़ महंगाई के खिलाफ राज्य सरकार,  बिहार में  भूख से पांच सौ मौते हुई हैं। लाल कार्ड, पीला कार्ड, तीन रुपया, पांच रुपया और भारत निर्माण के तहत जो पैसा पम्प किया गया, सारे लाल कार्ड, पीला कार्डधारी मारे-मारे फिर रहे हैं, लेकिन उनको कहीं भी राशन नहीं मिल रहा है। इसका नतीजा यह है कि नक्सलपंथ बढ़ रहा है। आप और हम जब ढीले पड़ जायेंगे, तो कमान नक्सली उठायेंगे। बिहार में दो-तिहाई हिस्सा नक्सलियों के कब्जे में चला गया है। आप इस बारे में बिल्कुल पता करा सकते हैं, क्योंकि आपके पास आई बी आदि सब कुछ है। वहां यह स्थिति बनी हुई है। हम यह नारे सुनते थे कि जब तक भूखा इंसान रहेगा, धरती पर तूफान मचेगा। ये नारे आज जो मैं देख रहा हूं और हम लगाते थे - रोको महंगाई बांधो दाम, नहीं तो होगा चक्का जाम। जो सरकार महंगाई न रोके, वह सरकार निकम्मी है। जो सरकार निकम्मी है, वह सरकार बदलनी है। बिहार बंद हुआ, ऐतिहासिक बंद हुआ। मैं रेल मंत्री था। अब यू.पी. बंद होने जा रहा है।  हमारे साथ और लोग भी हैं। इस सवाल पर हर राज्य से अलग-अलग पार्टी के लोग आ रहे हैं। आप देखिये कि बहस से काम चलने वाला नहीं है। याचना नहीं अब रण होगा। सिर्फ प्रार्थना करने से, भाषण करने से समस्या का समाधान निकलने वाला नहीं है। मुम्बई के जुए का जो खेल है, जो फारवर्ड मार्केट है, वहां से लेकर गरीब आदमी तक, इस गवर्नमैंट को इसी सत्र में देखेंगे। आप लोग सावधान हो जाइये। इधर के लोग भी सावधान हो जाइये। इस सरकार के लिए महिला रिजर्वेशन बिल की प्रॉयरिटी है। महिला रिजर्वेशन का बिल आ रहा है। महंगाई से जनता कराह रही है।  इससे लोग तंग और तबाह हो रहे हैं और ये साजिश हो रही है कि हर लीडरशिप को, महिलाओं का नाम लेकर आप लोगों को पार्लियामैंट में आगे नहीं आने दिया जायेगा। यह सरकार की प्रॉयरिटी है। प्रॉयरिटी यह नहीं है कि कैसे हम मार्केट को ठीक रखें, कैसे डी-होर्डिंग करें। चाहे राज्य सरकार हो या दिल्ली की सरकार हो, हद तो तब हो जाती है, सिर्फ महंगाई की मार ही नहीं बल्कि जो बेकारी, बेरोजगारी बढ़ी है, उसकी मार देश के नौजवान आज भोग रहे हैं। मुझे इस बात का अफसोस है कि शिव सेना के लोग, ...( व्यवधान)*  बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के बारे में बोलते थे। इनके ज़हन में नफरत है।  ...( व्यवधान)* यहां पर वहीं आदमी टैक्सी का ड्राइवर हो सकता है, जो महाराष्ट्रियन हो।  यह क्या बता रहे हैं, देश को ये लोग तोड़ने जा रहे हैं। देश के टुकड़े-टुकड़े करने जा रहे हैं। इस तरह का काम हुआ, तो मैंने प्रधान मंत्री जी को चिट्ठी लिखी, चिट्ठी नहीं लिखी, टेलीफोन से कहा। इस पर कैबिनेट डिसीजन लेकर कांग्रेस पार्टी का मंत्रिमंडल, जिसमें शरद पवार जी शामिल हैं। शरद पवार जी की पार्टी भी सरकार में है। आपने यह निर्णय लिया और बता रहे हैं कि इकोनामिक जो बूम हुआ और राज्यों को भारत निर्माण के तहत जो पैसा पम्प किया गया, यह बात सही है कि उस समय  हम लोगों ने यह किया। आज स्थिति यह है कि एक तरफ बेरोजगारी और दूसरी तरफ महंगाई की मार है। दिल्ली में आलू 50 रुपये किलो बिका। किसान ने मेहनत करके आलू निकाले हैं और एक साजिश के तहत अभी बिहार में आलू दो रुपये, चार रुपये किया गया है। ...( व्यवधान) यहां भी किया होगा। जब यह ठंडाघर में चला जायेगा, उसके बाद आलू अपनी ओरिजनल पोजीशन पकड़ेगा। प्याज का दाम, अभी मुसलमान भाइयों का पवित्र महीना गुजरा, हमारी जो बकरीद गुजरी, लोग प्याज की महंगाई की मार से मारे गये। 35 रुपये किलो प्याज बिका।

          लहसुन का दाम, हल्दी का दाम 500 रूपए किलो हो गया, कारखानिया सामान से लेकर सारी चीजों के दामों में आग लगी हुई है। आग लगी हुई है तो संसद से अपेक्षा है देश की जनता का कि आप लोग बोल रहे हो या नहीं। शरद भाई ने कहा कि अब सड़क पर जाना पड़ेगा। राष्ट्रीय जनता दल, लोक जनशक्ति पार्टी, हम सड़क पर हैं। सड़क पर जाने का नतीजा हुआ कि पूरे बिहार की सभी जातियों, सभी बिरादरी के लोग सड़कों पर आए, व्यापारी आए, सब लोग आए, स्वेच्छा से बंद किया, लेकिन हम रेल मंत्री थे, हमने कोशिश किया कि रेल को इसमें इंक्लूड नहीं करना है। अगर मैं बोल देता कि रेल बंद रहेगा तो क्या हालत होती देश की। गुस्सा है, तकलीफ है लोंगों को, इसलिए केवल डाटा देने से काम नहीं चलेगा कि पहले क्या हुआ है, कब क्या हुआ, अभी क्या हो रहा है, उसे देखिए। हमारी थाली से अरहर की दाल गायब है। अभाव रहता है तो कहा जाता है इम्पोर्ट कीजिए। दिल्ली का दायित्व है इम्पोर्ट करना, लेकिन दाम बेसी दीजिए, अरहर की दाल और दूसरे सामान महंगे मिल रहे हैं। होर्डिंग करने वाले और ब्लैक मार्केटियर्स फूल और फल रहे हैं। इसका कारण क्या है? क्या एक गरीब आदमी चुनाव जीतकर आ सकता है? पांच-पांच करोड़ रूपए जब कैंडीडेट को आप देंगे, वह पैसा कहां से आता है, वह पैसा कहां से आया? बड़े-बड़े व्यापारियों के यहां से आया। हुक्मदेव जी अभी यहां नहीं हैं। चौधरी साहब जब प्रधानमंत्री थे, हुक्मदेव जी ने कहा, लालू अब तो चुनाव होने जा रहा है, चौधरी साहब से कुछ पैसा मांगा जाए। हम लोग गए, कहा कि चौधरी साहब, हम लोग चुनाव  में जा रहे हैं, पैसा नहीं कैसे चुनाव लड़ेंगे। बाघ की तरह आंख तरेर कर चौधरी साहब ने कहा, क्या बोला? तुमने क्या बोला? बेटा, पैसा हमें बहुत मिलेगा। हमारे दरवाजे पर पूंजीपति बहुत आते हैं। अगर हम पैसा लेकर तुमको देंगे तो तुम पूंजीपतियों का काम करोगे या भूखे किसानों और देश के नौजवानों का? इतना बड़ा झटका हम लोगों को लगा। जब इलेक्शन में पैसा लेंगे, जीतेंगे, टीवी को खरीदीएगा, प्रेस को खरीदीएगा, विज्ञापन दीजिएगा, तो वह अपना माल निकालेगा और निकाल रहा है, खींच रहा है। प्रभात जोशी जी यहां नहीं हैं, महान पत्रकार नहीं हैं, इन्होंने चार्ज किया।...( व्यवधान) माननीय मुलायम जी ने ठीक कहा कि यदि इन लोगों ने बाबरी मस्जिद नहीं गिराई होती, तो आज हम लोग टुकड़े-टुकड़े नहीं होते। हम लोगों ने इनको मदद की।...( व्यवधान)

सभापति महोदय :  आपका टाइम हो गया, आप कंक्लूड कीजिए।

श्री लालू प्रसाद : क्या इससे महंगाई रूक जाएगी।...( व्यवधान)

सभापति महोदय : एक मिनट में कंक्लूड कीजिए।

श्री लालू प्रसाद :  मैं एक मिनट में कैसे अपनी बात समाप्त कर सकता हूं। आप यहां पहले नहीं थे, लोग घण्टों बोले हैं। क्या ऊपर पानी पड़ रहा है जो जल्दी जाना चाहते हैं।

सभापति महोदय : अन्य कई लोग बोलने वाले हैं, प्लीज कंक्लूड कीजिए।

श्री लालू प्रसाद : मैं सभी साथियों की बात सुनूंगा।

          महोदय, आपको मालूम होना चाहिए कि यह बनावटी महंगाई है। प्रधानमंत्री जी नेक इंसान हैं, लोगों को बुलाते हैं, लेकिन ये मंत्री लोग कोई कंट्रोल में हैं? विभागों में कोई कोआर्डिनेशन है? कोई मॉनीटरिंग है? कुछ नहीं है। कह रहे हैं कि फूड गारंटी कानून बनना चाहिए, भूखा कोई आदमी न रहे देश में। बनना चाहिए।  लेकिन इनकी प्रायरिटी आ गयी, आ रहा है सामने। देखेंगे हम लोग कि किस दिन ला रहे हैं? अगर रिजर्वेशन करना है आपको महिलाओं के लिए, तो पिछड़ी जाति की महिला, मॉइनारिटी और दलित की बेटियों को लाना होगा।  आपकी साजिश हम लोग अच्छी तरह से जानते हैं। आप चाहते हैं कि ये लोग नहीं आएं, रिजर्व कर दो महिला के नाम पर।  कमरतोड़ महंगाई के खिलाफ सावधान हो जाइए। बीच में ही आपको जाना पड़ेगा, फिर पछताना पड़ेगा। अगर एक महीने के अंदर महंगाई नहीं रूकी तो मैं नहीं जानता हूं कि क्या हालत होने वाली है।

          लॉ एंड ऑर्डर खराब होगा, सिविल वार तो नहीं, लेकिन जो निम्न मिडल क्लास है, मिडल क्लास है यानि सभी लोग झुंड के झुंड बनाकर जहां भी गोदाम होंगे, उन्हें लूट लेंगे। पावर साहब, आपके बफर स्टाक का क्या हुआ। आपने कहा था कि गेहूं का बफर स्टाक है। कारगिल फूड से लेकर फारवर्ड मार्केट से लेकर ये जितने भी प्राइवेट प्लेयर फील्ड में आ गए तो इन्होंने दस रुपए के हिसाब से किसान से अनाज ले लिया, उससे आपको गेहूं खरीदने में दिक्कत हुई। हम लोग प्रकाश सिंह बादल जी को धन्यवाद देते हैं कि उन्होंने आपको उस समय कोआपरेट किया। पंजाब से, हरियाणा से गेहूं आया सरकारी गोदामों में और उस समय सरकार डंके की चोट पर कहती थी कि हम आज अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हैं। लेकिन अब वह अनाज कहां गया, क्यों नहीं आप उसे मार्केट में लाते। मैं बताता हूं, वह अनाज पड़ा-पड़ा सड़ गया मोकामा आदि जगहों के गोदामों में। एक होता है चूहा और एक होता है व्हाइट चूहा। ये लिख देंगे कि यह अनाज मनुष्यों के खाने लायक नहीं है और उस अनाज को मुर्गी के खाने के लिए नीलाम कर दिया।

          आज हालात बद से बदतर हो रहे हैं। इस भूख के सवाल पर हमारा राष्ट्रीय जनता दल अन्य दलों और संगठनों से कोआर्डिनेट करके समूचे देश में भारत बंद का आयोजन करेगा और जेल भरो आंदोलन शुरू करेगा। हम जानते हैं कि आज की इस चर्चा का क्या जवाब आने वाला है। हम लोगों को भूख से नहीं मरने देंगे। जब तक महंगाई कम नहीं हो जाती, तब तक हमारा आंदोलन जारी रहेगा, उसे कोई नहीं रोक सकता। उस आंदोलन में हम सारे लोग कोआर्डिनेट करेंगे। इसलिए हम आपके माध्यम से सरकार को अवगत कराना चाहते हैं कि आपको इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि हम लोग इस मुद्दे पर एक नहीं हैं। हमने इन्हें रोकने के लिए आपको समर्थन दिया था और पांच साल सरकार चलाई थी।...( व्यवधान) ये तो बेचारे चले गए, लेकिन आप निरंकुश होकर न बैठिए। माननीय मुलायम सिंह यादव जी ने जो भावना व्यवक्त की है, उस भावना के साथ और पूरे सदन की भावना के साथ हम सब इकट्ठे हैं और महंगाई को जल्द खत्म करके रहेंगे। इसलिए पवार साहब जो यथार्थ है, जो सच्चाई है, जो हो सकता है, वह आप हमें बताएं। आप किसी दूसरे मामले में न फंस जाएं, नहीं तो ये आप पर सारा कुछ थोपकर खुद निकल जाएंगे।

 

SHRI GURUDAS DASGUPTA (GHATAL): Mr. Chairman, Sir, I must confess very frankly that the speeches made from the treasury benches do not reflect the seriousness of the situation.  The treasury benches have not been able to realise the gravity of the situation that prevails in the country.  … (Interruptions)  I am only saying my opinion.  In Parliament I have the right to express my views and you have the right to express yours. I must say that the devil’s advocates have not been able to argue their case properly. 

The main point is that if scarcity is the reason for the price rise, then scarcity did not occur yesterday. Scarcity of food grains is a phenomenon associated with agriculture for a long period of time.  The present Government is in power for the last six years. What has been done to do away with this scarcity and to improve the agricultural production?  You cannot fall back upon scarcity as a reason for the price rise.  What has been done for agriculture?

Secondly, if the Public Distribution System for the people below the poverty line has not worked, whom do you curse for it?

 MR. CHAIRMAN : Shri Dasguptaji, please allow me one minute.  Many hon. Members wanted to lay their speeches on the Table of the House. The Chair allows those hon. Members who want to lay their speeches on the Table of the House.

SHRI GURUDAS DASGUPTA : The point is very clear.  If PDS has not worked for the people below the poverty line, then who is to be blamed?  It is the Government.  The Government is a homogeneous quantity.  It does not belong to Delhi or Kolkata, but it belongs to whole of India. What has been done to recover the situation? The only thing I understood from them is that selective forward trading has been banned, but forward trading as an economic step has not been banned. Therefore, I must say that you have not argued your case well.  Let us agree that there is catastrophic food inflation in the country.   It is not inflation only, but it is catastrophic food inflation.  Let us all agree that there is a deep human distress in the country.  People belonging to the poverty line are really starving. 

          Thirdly, let us agree that test of the pudding is in the eating. What have you done and what is the result? 

          Sir, Sharad Pawar is the hon. Minister of Agriculture for the last six years. Dr. Manmohan Singh is the Prime Minister and the UPA has been in power for the last six years. What has been done to curb the price rise because it did not produce any result?  Therefore, the question is this.   It appears that the Government is not sensitive to the bitter, baffling and dangerous human problems that have overtaken the nation. That is the complaint. आम आदमी की सरकार, आम आदमी के लिए क्या कर रही है, बताइये? दो रोटी और दाल के बारे में क्या कर रहे हो, वह बताओ?

          So, the point is as to what is the speciality of the price rise. The speciality of the price rise is that the mobile phone has become cheap, but the dal has become costly. The railway travel has become cheap, but the oil has become costly.  The point is that all the commodities of mass human consumption, all that we need to survive, have become too costly and it is the outcome of the total economic policy of the Government.  (Interruptions) … * इस सरकार को नीति बनाने की जिम्मेदारी लेनी होगी।

          The point is that it is the entire economic policy of the Government which is responsible for the situation. What are the steps that the Government has taken?  Who had refused to ban forward trading as a whole?  We demanded forward trading as a whole. It was not done by the Government. Who had allowed export of foodgrains.  This is the Government who had allowed export of foodgrains.  … (Interruptions) The hon. Minister of Agriculture may kindly listen to me. Who had promoted cash crop as a detriment to our food security? Who has done it or who has facilitated it?  Who has facilitated lavish bank loan against foodgrains stock?   Will you kindly answer me why cash crop was promoted and why bank loan was facilitated against foodgrains stock?  Why the reserve of foodgrains against bank loan has been increased from five per cent to ten per cent?

 17.30 hrs.                                  (Dr. M.Thambidurai in the Chair) It is the total economic policy which is responsible. So, I hold that reckless liberalisation as the reason for the food price increase without adequate safeguards. I hold   that the Government has no political will to curb the price rise. If it had the political will, why did the Government not act decisively?

          The hon. Members may kindly remember that during the last Session of Parliament, the Government had announced a number of monetary measures. While the monetary measures failed, while the credit squeeze failed, why did the Government not act decisively to curb the price rise? What you did? Please listen to Shri Pranab Mukherjee. What was done? What was done to curb the price rise? Except that to believe that the market economy will come to its old adjustment, it is their faith in the market economy, it is their faith in the unguarded liberalisation, it is their faith in  globalisation which has brought the country to disaster.

          We argued that the Essential Commodities Act might be amended. You will remember it. But the Essential Commodities Act was not amended. Then, where is the political will? Shri Pawar, we are not ready to listen to your statistics. Statistical jugglery is the greatest mystery in the world, not here in India only. What has been the effect?  What has been the outcome? What has been the impact? How have the prices been contained? That is not the only issue.

Today, food trade is the most profitable trade in the country. Shrimati Sushma Swaraj has referred to sugar. I am referring to the whole food trade. Will you believe it, Sir, that the whole food trade has made a profit of 300 per cent in one year? Wherefrom the money came? The money came from the nationalised banks. Why did the money come? It is because the Government opened the door of the nationalised public sector banks to the food traders. People’s money has been utilised to bring misery to the common people. Therefore, who is to be blamed? Who is to be blamed for this non-performance? Who is to be blamed for the non-Governance? Who is to be blamed for the non-existence of the Government? Sir, please forgive me if I say that people do not believe that there is any Government in the country. People do not believe whatever you are saying in Parliament.  Shri Bansal, you will be having your Parliamentary majority but people do not believe there is any Government in the country.… (Interruptions)

SHRI KODIKKUNNIL SURESH (MAVELIKKARA):  Why?… (Interruptions)

SHRI GURUDAS DASGUPTA : It is because of inflation.… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN :   Order, please.

SHRI GURUDAS DASGUPTA : Bengal is too far away.… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Hon. Members, do not make running commentaries. No running commentary is allowed.

… (Interruptions)

SHRI GURUDAS DASGUPTA : Bengal is too far away. What is happening near Delhi?… (Interruptions)

SHRI KODIKKUNNIL SURESH :  Please describe what is happening in Bengal.… (Interruptions)

SHRI GURUDAS DASGUPTA : What is happening in Andhra Pradesh?… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN:  Shri Aaron, take your seat, please.  Nothing will go on record except Shri Gurudas Dasgupta’s speech. No running commentary is allowed.

(Interruptions) … * SHRI GURUDAS DASGUPTA :  I am saying that Bengal is too far away.  What is happening in Andhra Pradesh? What is happening in Chhattisgarh? What is happening in Pune? The point is that there is nobody to take care of the price rise. There is nobody to take care of the hunger. There is nobody to take care of the pauperization. There is nobody to take care of the disempowerment of the common people. It is the total economic policy which is responsible for this situation. Therefore, what is the suggestion?

 

MR. CHAIRMAN : Please conclude.

SHRI GURUDAS DASGUPTA : Sir, I am concluding.

          I appeal to the Minister to listen to my suggestion. The suggestion is that there must be massive investment in agriculture. The hon. Finance Minister was saying that everything is being done. Earlier, 27 per cent of the Government expenditure was for agriculture. Today, only 5 per cent of the Government expenditure is for agriculture. Who is to be blamed? Now, only 40 per cent of the cultivable land in our country is irrigated and 60 per cent remains unirrigated. Who is to be blamed? The political system is to be blamed and most of the time, the Congress Party was in power either by itself or through a combination.

          Therefore, I would like to suggest that there must be massive investment in agriculture, the Government must expand irrigation, stop commercialization of land, stop diversion of land for non-agricultural purposes, ensure remunerative price for the farmers and set up a huge social infrastructure for the rural areas.

          Secondly, the Government must stop speculation, stop commercialization, stop forward trading and stop bank loan for food trade.

          Most importantly, I would suggest – Mr. Pranab Mukherjee might have ridiculed the idea, this not my idea, not only the idea of the Left, but all the leading newspapers of the country have written and newspapers are all owned by corporate houses – that the only solution is universalisation of the Public Distribution System in the country. For that what is needed? Today we are spending 1 per cent of GDP for food subsidy. I demand that 3 per cent of GDP should be spent for food subsidy so that 23.96 crore families can be given food at subsidized rate. The State must operate, the State must deliver and the Government must see the reason. There must be a change of policy, there must be concern, there must be a tear and there must be consultation. Unfortunately, political abuses were hurled. That is not the way to deal with the basic human problem of the country.

          Lastly, I must tell you that the increase in the Maoist violence cannot be dealt with by the administrative machinery. As long as poverty lives, as long as unemployment remains, as long as hunger remains, as long as atrocities on the Scheduled Castes and Scheduled Tribes continue, Maoism will have its own breeding ground.

          Sir, we are against Maoist violence. But I must tell you that if you do not take care of price rice, if you do not take care of hunger, if you do not take care of food requirement and if you do not take care of the unemployment problem, the country will be divided and the Government will lose its vitality and lose its credibility, we do not want you to lose your credibility. आम आदमियों की सरकार आम आदमियों के लिए क्या करना चाहती है? मेहरबानी करके यह बताओ।

 

MR. CHAIRMAN : The hon. Minister wants to reply at 6 o’clock. Before that, I want to accommodate the remaining speakers. Please cooperate and speak briefly.

         

*SHRIMATI BOTCHA JHANSI LAKSHMI (VIZIANAGARAM) : I have no doubt in my mind that inflation affects every segment of the society, particularly the housewives.  Thee is an impending hike in the petroleum products.  Expecting the hike, the  vendors have already hiked prices of essential commodities.  I thank the Railway Minister that she has announced some reduction in the freight charges on food grains and fertilizers.  We all know that higher food prices had been caused by monsoon deficiency as well as increase in global crude prices. Inflation is a global phenomenon. Even during the NDA regime there has been inflation.  If we see the record of the debates over the past one decade there had been a discussion on inflation every time.  All Governments have assured us that they were controlling the inflation.

          I thank the Government for taking a pro-active policy in controlling the inflation.  Some of them are: increased allocation through Public Distribution System, reduced import duties so as to allow imports of grain at low prices, ban on food exports, reduction in excise imposed on food items, subsidies for food items such as oilseeds and pulse, imposing stock limits on traders and enforcement of provisions against black marketeering and hoarding of food.

          I also expressed my gratitude to the UPA Government that they have announced a number of steps to tackle food price inflation. We all know that in January, 2010 the Central Government had allocated 20 lakh tones of wheat, 10 lakh tones of rice to State Government for sale to retail consumers and small processors. The food grain was allocated to Minimum support price plus freight.  The Opposition should note that half of the allocation was supposed to be lifted by State between October and December, 2009, again extended to January, 2010. But the States could lift only 1.81 lakh tones of wheat and 3.09 lakh tones of rice.  The Opposition which is accusing the Centre should ask their State Governments to life the stocks and distribute the same to the ration card holders.  Another important thing we have to note is that the Government has issued direction to Central Government agencies to sell wheat and rice to retail customers at the same rate as that at which food grain was released to States.  Not only that it has allocated 15 lakh tones of wheat for bulk consumers. The PDS centers are in the hands of State Government.  If they do not deliver properly and timely to the ration card holders, the Centre is not to be blamed.

          We all know that the Prime Minister had held a meeting with States to review implementation of Essential Commodities Act and directed States to take steps against hoarders.  The Centre also asked States to reduce taxed on imported sugar. There is a scheme of subsidized distribution of edible oils.  There is also another scheme to distribute imported pulse at Rs. 10 per kg through State Governments.  If States do not implement the schemes to distribute oils and pulse at subsidized rates, the Centre is not to be blamed.

          Our Government has also taken administrative measure which include ban an export to edible oils and pulse, imposition of stock limit orders in the case of rice, paddy, pulse, sugar, edible oils and oilseeds, Minimum Export Price to regular exports of onion.  Opposition parties should not forget the fact that one million tons of imported edible oils have been supplied to States at a subsided or Rs. 15 per kg.  As per the desire of the Opposition, the Government has banned futures trade in key essential commodities.

          Our Government has been kind enough to provide MSP, subsidized fertilizers, subsidy on mechanized farming to our farmers. Even global warming is impacting the climate.  As a result of this, there have been floods in some States and there have been droughts in some other States. It is affecting the crop pattern.

          We should not forget the loan waiving scheme announced by the UPA Government amounting to Rs. 72,000 crores.  Our Government is pro-farmer.  The Government of Andhra Pradesh is supplying rice at Rs. 2 per kg.  Subsidy on gas and pre power for farmers.  Hon'ble Chief Minister of Andhra Pradesh is very concerned to curtail the price rise on various angles.

          I suggest to the Government to strengthen the local markets by converting them into local super markets Like a flagship programme.  The farmers can sell his produce at these markets.  It will eliminate the middlemen.  The products produced by DWCRA and DWICA can be marketed.  The IT exemption may be raised in respect of the Self Help Groups.

          So far as palm oil is concerned, the Government should encourage States coming forward to produce it.  I have been informed that we are importing palm oil to the extent of Rs. 10,000 crore.  Even if we produce 10 per cent of the palm oil we will be able to save a lot of foreign exchange.  We will be able to supply plam oil in the retail market at subsidized rates.

          Already there is a sign of prices of essential commodities coming down.  After the rabi season, there will be further reduction in inflation.  The Opposition should not make a political issue out of it. 

*श्री राधा मोहन सिंह (पूर्वी चम्पारण): मंहगाई के मोर्चे पर 8 माह पुरानी यू.पी.ए. की दूसरी पारी की सरकार अपनी कारगुजारियों के कारण इतनी दयनीय स्थिति में खड़ी नजर आएगी, इसका सरकार के प्रबंधकों को जरा भी भान नहीं रहा होगा। पहली बार देश की जनता में यह संदेश बड़ी तेजी से गया कि जिस सरकार को उसने महंगाई नियंत्रित करने का जिम्मा सौंपा था, वही सरकार उसी मोर्चे पर नाकाम और बदनाम रही है।

          पिछले लगभग एक वर्ष से खाद्य पदार्थों की कीमतें जिस तेजी से बढ़ी हैं उससे आम आदमी ही बल्कि मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग की भी कमर टूटने लगी है।  यह आश्चर्यजनक है कि केन्द्र सरकार में अनेक अर्थशास्त्रियों की मौजूदगी के बावजूद खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छू रही हैं।  यदि लगभग एक वर्ष में ही अनेक खाद्य पदार्थों की कीमतें दो गुनी हो गई हैं तो केन्द्र सरकार की नीतियों पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।  चीनी, दालें और सब्जियां जिस तरह आम आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही हैं उससे तो लगता है कि केन्द्र सरकार का खाद्य पदार्थों की कीमतों पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है।  यह विचित्र है कि केन्द्रीय सत्ता की ओर से कुछ ऐसा सन्देश देने की कोशिश की जा रही है जैसे मंहगाई के लिए राज्य सरकारें उत्तरदायी हैं।

          माननीय केन्द्रीय कृषि मंत्री जी ने थोक और खुदरा मूल्यों में भारी अंतर के लिए राज्यों पर आरोप मढ़े है। राज्यों के पाले में गेंद डालकर केन्द्र सरकार अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती है। मंहगाई किसी एक राज्य या कुछ राज्यों तक सीमित नहीं है।  फिर सवाल यह उठता है कि सारा दारोमदार राज्यों पर ही निर्भर करता है, तो कांग्रेस शासित राज्यों में मंहगाई से राहत क्यों नजर नहीं आ रही है।  दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार ने तो इसी कमरतोड़ मंहगाई में वैट की दरें और बढ़ा दी हैं।  दाल, चीनी एवं खाद्य तेलों सहित अन्य जीन्सो के भाव यदि बिहार, गुजरात, कर्नाटक में ज्यादा है तो क्या दिल्ली, महाराष्ट्र, राजस्थान जैसे कांग्रेस शासित राज्यों में कम है क्या?

          सम्पूर्ण देश में खाद्य पदार्थों की कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही है।  पिछले महीने जारी आंकडे भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि खाद्य पदार्थों की मंहगाई दर लगभग 20 फीसदी हो गयी है, जो बहुत ज्यादा है।  माननीय कृषि मंत्री जी के अनुसार खरीफ की फसलों में 2.1 करोड़ टन की कमी की वजह से मांग और आपूर्ति का समीकरण गड़बड़ा गया है और इसलिए स्थिति में सुधार के लिए अगली फसल का इंतजार करना होगा।  इसका क्या यह मतलब निकाला जाए कि सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी और अगली फसल का इंतजार करेगी।  वह मंहगाई को काबू में करने के लिए अपनी ओर से कोई प्रयास नहीं करेगी।  यह ठीक है कि जब भी मांग की तुलना में आपूर्ति कम होगी, इसका दबाव मंहगाई पर पड़ेगा।  लेकिन ऐसा तो नहीं हो सकता।  कृषि मंत्री और उनके काबिल अफसरों को इसका एहसास पहले से नही रहा होगा कि इस साल खरीफ की फसल कमजोर रहने वाली है। यह सवाल उठाना लाजिमी है कि सरकार स्थिति के बेकाबू होने का इंतजार क्यों करती रही।  ऐसे उपाय क्यों नहीं किए गए, जिससे कि मंहगाई पर लगाम लगती।  यदि केन्द्र सरकार को यह शिकायत है कि विपक्ष शासित राज्यों की सरकारें जमाखोरी और कालाबाजारी के खिलाफ कदम नहीं उठा रही है तो कांग्रेस या यू.पी.ए. गठबन्धन की सरकारें इस बारे में पहल करके मिसाल क्यों नहीं पेश करती?

          माननीय प्रधानमंत्री जी विख्यात अर्थशास्त्री है।  वे भली-भांति परिचित है कि अर्थशास्त्र के अनुसार वस्तुओं के दाम तभी बढ़ने चाहिए जब उसकी आपूर्ति कम होगी और अगर आवश्यकता से ज्यादा आपूर्ति होगी तब दाम घटते हैं।  अर्थशास्त्र में इसी को  "मांग-आपूर्ति का सिद्धांत "  कहते हैं।  लेकिन, अपने देश में लगता है यह सिद्धांत भी काम नहीं करता है। आपूर्ति ज्यादा होने पर भी दाम बढ़ते हैं।  ऐसा उल्टा-पुल्टा क्यों होता है?

          उत्तर काफी स्पष्ट है जिसकी हम चर्चा करेंगे।  आम हिन्दुस्तानी का यह अनुभव है कि जब-जब कांग्रेस सत्ता में आयी है मंहगाई बढ़ती है और जब-जब भा.ज.पा. की सरकार आयी है मंहगाई घटती है।

          सन् 1970 से मंहगाई बढ़ने लगी है। लोगों का जीना हराम हुआ।  तब कांग्रेस सत्ता में थी। 1977 में जनता सरकार आयी और मंहगाई गायब हो गयी।  लोगों के लिए यह अनुभव चमत्कार जैसा ही था।

          सन् 1980 में कांग्रेस सत्ता में आयी और फिर मंहगाई बढ़ने लगी।  1989 तक लगातार मंहगाई बढ़ती ही रही।  लोग बेहद परेशान हुए।  1989 में सत्ता बदलते ही मंहगाई एकदम कम हो गयी।

          सन् 1991 में कांग्रेस फिर सत्ता में आयी और फिर मंहगाई की कहानी शुरू हो गयी।  मंहगाई को झटका लगा तभी जब श्री अटल जी ने 1998 में सत्ता संभाली।  1998 से 2004 तक इन छह वर्षों में मंहगाई की चर्चा भी नहीं हुई।  बाजार में सभी वस्तुओं का भंडार लबालब था।  सरकारी गोदाम भी भरे हुए थे और बाजार में प्रत्येक वस्तु आसानी से उपलब्ध थी।  राशन और बाजार के दामों में ज्यादा अंतर नहीं था।  आज भी लोग याद करते हैं कि महज छह साल पहले जो दाल 30 रुपए में मिलती थी अब 100 रुपए हो गयी है।  2004 में तेल 35 रुपए था आज 80 रुपए हो गया है।  एन.डी.ए. के समय मे चावल 10 रुपए था आज 30 रुपए हो गया है।  भा.ज.पा. की सरकार में चाय पत्ती 100 रुपए में मिलती थी, अब 200 रुपए हो गयी।  उस समय पेट्रोल 30 रुपये और डीजल 20 रुपए में मिलता था, आज पेट्रोल के दाम 45-50 और डीजल के 32-38 रुपए हो गये।  बेसन जो 20 रुपये में मिलता था आज उसी के लिए 60 रुपए चुकाने पड़ते हैं।

          दो सरकारों की यह दो कहानियां हैं।  आज जो मंहगाई बढ़ी है इसका कारण कांग्रेस नीत यू.पी.ए. सरकार की नीतियां हैं।  कांग्रेस सट्टोरियों, सट्टेबाजों, मुनाफाखोरों और मिल मालिकों की चिंता करती है।  किसान को भी मारती है और ग्राहक तो लूटती ही है।  कांग्रेस चुनाव में वोट किसान और ग्राहक से लेती है लेकिन सत्ता में आते ही सट्टोरियों, मुनाफाखोरों और मिल मालिकों को फायदा पहुंचाने की नीति अपनाती है।  इनकी मिलीभगत का नुकसान जनता को उठाना पड़ता है।  जनहित विरोधी कांग्रेस की नीतियों का पर्दाफाश हो चुका है।  जब-जब कांग्रेस सत्ता में आती है मंहगाई बढ़ती है और जब-जब भा.ज.पा. सत्ता में आती है तब-तब मंहगाई गायब होती है।

          उदाहरण के तौर पर अभी चीनी के दामों में जो आग लगी है, उसके कारण अगर समझेंगे तो कांग्रेस और मंहगाई का क्या नाता है इसी पोल खुल जाएगी।  देश को हर साल 220 लाख टन चीनी की जरूरत है।  इस साल देश में 240 लाख टन चीनी उपलब्ध है।  ऐसी स्थिति में चीनी के दाम बढ़ने नहीं चाहिए।  लेकिन बढ़ रहे हैं।  जनवरी, 2010 के पहले 10 दिनों में दाम 10 रुपए प्रति किलो बढ़े।  हां, यह सही है कि पिछले और इस वर्ष में गन्ने की खेती कम हुई है और गन्ने की उपलब्धता में कमी आयी है।  लेकिन हमें भूलना नहीं चाहिए कि 2 साल पहले जब किसान 120 रुपए प्रति क्विंटल दाम की मांग कर रहा था, तब यू.पी.ए. सरकार ने देशभर में आंदोलनकारी किसानों को दाम देने की बजाए उन पर लाठियां बरसायी।  गन्ने की खेती किसान के लिए नुकसानदायी हो गयी और इसके परिणामस्वरूप किसानों ने गन्ने की बजाए दूसरी फसलों की ओर रूख किया।

          मंहगाई का असली गणित लोगों को पता होना चाहिए।  इस साल जो चीनी हम 44 रुपए में खरीद रहे हैं वह पिछले साल की निर्मित है।  पिछले साल किसानों को 160 रुपए दाम मिला था।  चीनी का निर्माण, यातायात, विभिन्न कर, मिल मालिक-थोक व्यापारी, खुदरा व्यापारी इन सबका मुनाफा मिलकर भी यह चीनी 25 रुपए में बाजार में मिलनी चाहिए।  यह स्थापित गणित है।  लेकिन सरकार और सटोरिए तथा मुनाफाखोरों की अभद्र मिलीभगत के कारण जो चीनी 25 रुपए में मिलनी चाहिए वह आज 44 रुपए में मिल रही है।

          इस सरकार की हद तो यह है कि दाम कम करने की बजाए दाम कैसे बढ़ेंगे यह बताने की होड़ मंत्रियों में लगी है।

          यू.पी.ए. सरकार मार्च, 2009 तक यह बताती रही कि देश में चीनी का अपार भंडार है और 2 साल तक कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है।  इसलिए सरकार ने चीनी निर्यात की इजाजत दी।  48 लाख टन चीनी 12 रुपए प्रति किलो की दर से निर्यात भी हो गयी।  अब पिछले 6 महीनों से सरकार को लगा कि चीनी की कमी होगी।  अब आयात करने का निर्णय किया और कैसी विडम्बना है कि आज वही चीनी 30 रुपए प्रति किलो की दर से आयात हो रही है।  कुल 70 लाख टन चीनी आयात हो रही है।

          यह नीति नहीं घोटाला है।  अगर सही जांच होगी तो कांग्रेस सरकार की पोल खुल जाएगी।  चीनी की कमी अचानक एक दिन में नहीं होती।  गन्ने की कितनी बुआई होती है यह सरकार को एक साल पहले पता होता है लेकिन यह सरकार है कि जिसकी नीति निजी हित और भ्रष्टाचार है।

          एक और विडम्बना देखिए, यह विदेशी ग्राहक को 12 रुपए में चीनी बेचती है और देश के ग्राहकों को 44 रुपए में परोसती है।

          यह मंहगाई आसमानी नहीं सुल्तानी है।  मांग-आपूर्ति सिद्धांत के विपरीत अगर देश में मंहगाई बढ़ रही है तो उसका कारण आयात एवं निर्यात की घोटालेबाजी है।

          श्री अटल जी के समय सरकार किसान से गेंहू और चावल की खरीद करती थी।  खाद्य निगम के सारे भंडार और गोदाम पूरे भरे थे।  इससे सरकार दो काम कर सकी।  पहले तो 4 करोड़ गरीब परिवारों को 35 किलो अनाज 2 और 3 रुपए की कम कीमत पर देने का ऐतिहासिक फैसला सरकार ने किया यह केवल घोषणा मात्र नहीं थी, इस पर अमल भी हुआ।  इससे गरीब को खाद्य सुरक्षा मिली।  कुपोषण समाप्त हुआ और उसको बाजार में जाने की जरूरत नहीं पड़ी।  दूसरी, जब कभी बाजार में दाम बढ़ने लगते थे तब सरकार तुरन्त हरकत में आकर अपने अपार भंडार से गेंहू या चावल बाजार में सीधे लाते थे जिससे तुरन्त दाम घटते थे और जनता मंहगाई से बचती थी।  सरकार अगर जनहित को ध्यान में रखकर काम करती है तो ऐसे निर्णय होते हैं।

          लेकिन, कांग्रेसनीत यू.पी.ए. सरकार आते ही नाम की ही तरह सब उल्टा-पुल्टा हो गया।  सरकार ने निजी कम्पनियों को किसानों से अनाज खरीदने की मोहलत दी।  करगिल, मोन्सेंटों जैसी विदेशी तथा रिलायंस, अडानि जैसी देशी कम्पनियों ने किसान को चार-आठ आने ज्यादा दाम देकर बहुत मात्रा में अनाज खरीद लिया।  यू.पी.ए. सरकार के पहले चार साल सरकारी गोदाम खाली रहे और निजी गोदाम भरे रहे।  फिर जो होना था वही हुआ।  निजी गोदामों में भंडारण होता रहा।  बाजार में कृत्रिम कमी आयी और दाम बढ़ने लगे।  सरकारी गोदाम Lााली होने से वह बाजार में प्रभावी रूप से हस्तक्षेप नहीं कर सकी जिससे कीमतों को लगाम लगाया जा सकता था।  सरकारी गोदाम खाली रहने से गरीब को भी 35 किलो प्रतिमाह अनाज मिलने की बजाए 15-20 किलो मिलने लगा।  उसको भी बाजार में आना पड़ा और कीमतों में आग लगी।  देखने की बात है कि प्रति व्यक्ति खाद्यान्नों की उपलब्धता में भारी कमी आयी है।  सरकार की नीतियों के कारण जहां प्रति व्यक्ति उपलब्धता 186 किलो थी वह आज मात्र 150 बनकर रह गयी है।

          मंहगाई के लिए सरकार की नीतियां कैसे जिम्मेवार होती है इसका यह एक सबूत है।  सरकार की नीतियां बड़े पैमाने पर मंहगाई बढ़ाती या घटाती है।  कांग्रेसनीत यू.पी.ए. सरकार की नीतियां जन-विरोधी होने के कारण यह मंहगाई बढ़ रही है।  शायद आज इसीलिए देश के आम लोग खाद्य मंत्री को मंहगाई मंत्री एवं माननीय प्रधानमंत्री जी को मंहगाई मोहन की उपाधि से विभूषित करने लगे हैं।

          यह साफ है कि आज की मंहगाई के लिए मुख्यतः यू.पी.ए. सरकार की नीतियां जिम्मेदार है।  इसमें दो राय नहीं कि माननीय शरद पवार जी खाद्य मंत्री के तहत पूरी तरह से विफल रहे हैं और वे इस स्थिति के लिए जिम्मेवार भी हैं।  लेकिन, यह अर्द्ध सत्य होगा।  प्राइवेट कम्पनियों को किसान से खरीद की इजाजत देना, भंडारण संबंधी नियमों में बदलाव न करना, गन्ने के मामले में काला अध्यादेश लाना, स्वामीनाथन फॉर्मूला न अपनाना, बाजार में अनाज न लाना, यह सब सरकार के सामूहिक निर्णय है।  कांग्रेस विश्वामित्र की भूमिका में जाकर जिम्मेवारी से भागना चाहती है।

          वास्तविकता यह है कि यह अली बाबा और चालीस चोरों का राज है।  भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है।  देश में जब चावल की कमी है तो 25 लाख टन चावल वाणिज्य मंत्रालय द्वारा निर्यात किया गया।  अफ्रीकी देशों को मानवीय आधार पर चावल निर्यात करने की योजना में जमकर घोटाला हुआ है।  विभिन्न मंत्रालयों द्वारा मना करने के बावजूद भी वाणिज्य मंत्रालय ने अफ्रीकी देशों को मानवीय न्याय देना उचित समझा। देश में मानवीय न्याय नहीं मिलेगा लेकिन विदेश को मिलेगा।  वास्तविकता यह है कि यह घोटालों की सरकार है।  लूटपाट मची है और जब जनाक्रोश सामने आता है तो भागने के लिए एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हैं।  सच्चाई एक है सिर्फ एक ही है कि यह सरकार ही मंहगाई के लिए पूरी तरह से जिम्मेवार है।

          पेट्रोल-डीजल के दाम सरकार तय करती है। दुनिया में सबसे मंहगा पेट्रोल-डीजल भारत में मिलता है।  क्योंकि पेट्रोल-डीजल की कीमत में आधा हिस्सा करों का है।  दुनिया में कहीं भी किसी भी वस्तु पर और खासकर जरूरतमंद वस्तुओं पर 100 फीसदी टैक्स नहीं लगाया जाता।  लेकिन, अपने देश में यह हो रहा है।  आज पेट्रोल की वास्तविक कीमत 22-25 रुपए होनी चाहिए।  वह आज 45-50 है क्योंकि सरकारी कर भारी मात्रा में है।  सीधे-सीधे सरकारी नीतियों के कारण यह दाम बढ़े हैं।  इसके बारे में भी अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में कीमतों का बहाना बनाया जाता है।  लेकिन, जब सितम्बर, 2005 में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 60 डॉलर प्रति बैरल दाम था तब यहां 43 रुपए में पेट्रोल मिलता था।  लेकिन दिसम्बर, 2008 में जब दाम 43 डॉलर प्रति बैरल इतना कम हुआ तब देश में पेट्रोल 50 रुपए के दाम से बेचा गया।

          श्री अटल जी के शासन में 6 साल में गेंहू आयात करने की नौबत कभी नहीं आयी।  यू.पी.ए. की गलत नीतियों के कारण गेंहू आयात करने की नौबत आयी।  और आयातित गेंहू ऐसा था कि जो खाने लायक भी नहीं था।  गोदामों में सड़ गया।  लोगों ने फेंक दिया। मात्र इस आयातित गेंहू के साथ नई-नई खरपतवार आयी जो कृषि को आने वाले सालों में तबाह करेगी।

          खाद्य तेल की यही कहानी है।  2003 तक देश में तेल आयात नहीं होता था। तेल के मामलें में देश स्वयं पूर्ण था।  लेकिन यू.पी.ए. सरकार की किसान विरोधी नीति से तेल का मिशन डूब गया। इस सरकार को आयात-निर्यात करने में रूचि है।  तिलहन की खेती को लम्बे समय के लिए कीमतों की गारंटी करने की बजाय, इस सरकार ने तेल आयात की इजाजत दी।  शुरू में आयातित तेल सस्ते में आया।  देश का तेल उद्योग खतम हुआ ..... से बिना कस्टम डय़ूटी भारत में तेल नहीं आ सकता।  लेकिन श्रीलंका और मलेशिया में फ्री ट्रेड होने के कारण वहां तेल आना शुरू हुआ।  भारत के कारखाने बंद हुए।  उन्हीं मालिकों ने श्रीलंका में कारखाने शुरू किए।  श्रीलंका और भारत में फ्री ट्रेड है इसलिए मलेशिया का तेल व्हाया श्रीलंका आना शुरू हुआ।  आज जरूरत का 60 फीसदी तेल आयात हो रहा है।  एक स्वयंपूर्ण देश को यू.पी.ए. ने परावलंबी देश बना दिया। दाल और तेल में स्पेशल मिशन बने, लेकिन कमीशन हावी रहा।  इसलिए देश के किसान को न लाभकारी मूल्य मिला, न शोध द्वारा उत्पादकता बढ़ाने में यश मिला, न ही सुरक्षित पानी मिला।  इतना ही नहीं सरकार की आयात-निर्यात नीति में कोई कारगर नीति नहीं है।

          पहले तो यह सरकार मानने को ही तैयार नहीं थी कि मंहगाई बढ़ रही है।  थोक व्यापार सूचकांक के आधार पर सरकार लगातार यह बताती रही कि मंहगाई की दर मात्र 1 या 2 प्रतिशत है और मंहगाई नहीं है।  लेकिन, यह आंकड़े 220 वस्तुओं से मिलकर होते है और भी थोक व्यापार के होते है।  ग्राहक तो खुदरा बाजार में खरीद करता है।  मंहगाई सामने न आए इसलिए सरकार ने छुपाने की बहुत कोशिश की।  लेकिन, सच्चाई सामने आ ही गयी।  खाद्यान्न पदार्थों की कीमतें 20 फीसदी बढ़ रही है, यह साबित हो गया। अनेक वस्तुओं के दाम तो सालभर में दुगने हो गए, यह जनता का अनुभव था।

          ऐसी स्थिति में मंहगाई रोकने के लिए सरकार को ठोस उपाय करने चाहिए थे।  लेकिन, सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया।  उल्टे गैर-जिम्मेदाराना बयान देने लगे।  माननीय प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, खाद्य मंत्री और अन्य मंत्री भी "मंहगाई और बढ़ेगी "  ऐसा कहने लगे।  मंहगाई बढ़ेगी, यह बताने के लिए मंत्रियों की क्या जरूरत है?  मंत्री का काम होता है कि मंहगाई को कैसे रोकेंगे, यह बताना।  इसके विपरीत मंत्रियों के बयान से मंहगाई में और आग लग गयी।  ऐसी गैर-जिम्मेदार सरकार कभी किसी ने नहीं देखी होगी।

          सरकार के कुछ मंत्री और प्रवक्ता यह तर्क देने लगे कि "मंहगाई का बोझ जनता पर नहीं है, क्योंकि चुनाव तो हम जीत रहे हैं। " इतना हास्यास्पद तर्क कभी नहीं हो सकता।  कांग्रेस चुनावी सफलता को मंहगाई बढ़ाने का जनादेश मान रही है।  जनता को भी इसके बारे मे सोचना होगा।

          सरकार के मंत्री कहते हैं कि फारवर्ड ट्रेडिंग से किसान को लाभ होता है।  लेकिन, अपने देश में यह अनुभव नहीं है।  जो कारोबार कुछ साल पहले 62 हजार करोड़ का था, वह आज 37 लाख करोड़ का हो गया है।  यह भी देखना जरूरी है कि कितने किसान फॉरवर्ड ट्रेडिंग में भाग लेते हैं।

          कृषि मंत्री जी ने तो यहां तक बयान दिया कि जलवायु परिवर्तन के कारण देश में अनाज का उत्पादन कम हुआ है।  यह भी कुतर्क है क्योंकि इतने बड़े देश में कुछ मात्रा में सूखा और बाढ़ जैसी नैसर्गिक आपदाएं आती है और इसलिए सरकार बफर स्टॉक की योजना करती है।

          सरकार के कुछ मंत्री तो यहां तक कह रहे हैं कि लोग अब ज्यादा खा रहे हैं।  यह बयान तो अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बुश के बयान जैसा ही है, जिन्होंने कहा था कि भारत के लोग अब ज्यादा खाने लगे हैं। हम सरकार से पूछना चाहते हैं कि क्या गरीब को दो वक्त खाने का अधिकार नहीं है?  सरकार को ऐसी गैर-जिम्मेवार बयानबाजी तुंत समाप्त करना चाहिए।  मंहगाई पर लगाम लगाने हेतु उच्च स्तर पर विद्यमान भ्रष्टाचार को समाप्त करना चाहिए।  वायदा कारोबार के घोटाले एवं आयात-निर्यात की आड़ में महाघोटले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से करानी चाहिए।

 

*श्री रवीन्द्र कुमार पाण्डेय (गिरिडीह):  आज देश में आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतें गरीबों को भूख से मरने को विवश कर रहा है और नौकरी पेशा के लोग मंहगाई के भयानक धुंआ से दमघुट कर न मर रहे हैं न जी रहे हैं।  नौकरी पेशा के लोगों को पे कमीशन का मजा दुकान और मकान में जाने पर पता चलता है क्योकि दुकान में दुकानदार से मकान में बीबी और बच्चों से उलझना पड़ता है।

          सरकारी आंकड़ा है कि खाद्य मंहगाई दर 17.96 प्रतिशत है जबकि बाजार में मंहगाई 40 से 50 प्रतिशत तक बढ़ी है।  जो चीनी 17-18 किलो थी, वह बाजार में 30-35 रुपए किलो, आलू 5 रुपए प्र. किलो वह 10 से 15 रुपए किलो, दाल 25-30 रुपए प्रति किलो वह 90 रुपए प्रति किलो, जो चावल पिछले वर्ष 15 रुपए किलो था, वह 25 रुपए किलो बिक रही है।  आटा, दूध, साबुन, सोडा, तेल-नमक सभी के दामों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।

          कृषि मंत्री जी ने चीनी कम खाने की सलाह देकर जमाखोरों और कालाबाजारियों का मनोबल ऊंचा किया है।  सरकार मंहगाई के दोषी देश के कृषि एवं खाद्य मंत्री को देते हैं लेकिन सरकार का कोई भी फैसला कैबिनेट की बैठक में होता है जिसमें माननीय प्रधानमंत्री जी से लेकर प्रायः सभी मंत्री शामिल होते हैं।  इसलिए यू.पी.ए. की सरकार जनता को गुमराह न करें। जनता बेचारी है हम उनको राहत नहीं दे सकते तो उनको गुमराह करके हत्यारी न बनें।

          आज कांग्रेस का हाथ गरीबों के साथ का नारा गरीबों का किनारा बनता जा रहा है।  देश में भूखे रहकर भी लोग शांति से जिन्दगी जीने को मजबूर हैं। कहां बम धमाका, कहां हत्या, कहां लूट, कहां फूट यह भारत की जनता के नियंत्रण से बाहर है।  बड़े लोगों को भारी सुरक्षा आम जनता को भूख, भ्रष्टाचार, कालाबाजार का देश।  

          अर्थशास्त्रियों ने मंहगाई के लिए मांग और आपूर्ति को दोष देते हैं।  हम केवल दाल का उदाहरण लें।  2008 में देश में दाल का उत्पादन 147.6 लाख टन था जबकि 2009 में यह 146.6 टन रहा।  कुछ अर्थशास्त्रियों ने दालों की मांग 170 लाख टन के आस-पास है।  हम इसे भी मान लेते हैं तो 2009 में भारत ने 25 लाख टन दाल का आयात किया   यदि इस मात्रा को जोड़ दिया जाए तो बाजारों में दालों की उपलब्धता 171.6 लाख टन हो जाती है।  अब जनता समझे कि पिछले वर्ष की तुलना में इस वित्तीय वर्ष में दाल की उपलब्धता अधिक है तो दाम दुगना से भी अधिक क्यों?

          आज खाने-पीने की चीजें बड़े औद्योगिक घराना के लोग एयरकंडिशन में फुलपैंट-टाई वाले लोगों से बिक्री करा रही है।  पहले किसानों से सब्जी और अनाज कौड़ी के भाव खरीदे जाते हैं और उसी वस्तु का भंडारण कर कई गुणा अधिक दाम पर बेचे जाते हैं।  आज देश में टेलीफोन और बिजली नियामक अथारिटी बनी है।  परन्तु खाद्य पदार्थों की बड़ी रिटेल कंपनियों को किसी नियामक नियंत्रण के अभाव में मुक्त रूप से मुनाफा कमाने का मौका मिल रहा है।  व्यापार ने आपूर्ति को रोक रखा है और वह भावनाओं को भरपूर दोहन करना चाहता है - इतना ही नहीं एक छोटा सा रिटेलर भी 400 प्रतिशत कमीशन वसूल रहा है।

          विजिनेश टी.वी. चैनल भी यह बताने में लगे हैं कि निवेशकों को किन खाद्य पदार्थों पर अपना पैसा लगाना चाहिए इससे भी बाजार में उनकी कीमतों पर असर पड़ेगा।  तमाम सरकारी तंत्र मंहगाई के लिए चिंतित हैं, परन्तु समाधान शून्य। सरकारी दुकानों के माध्यम से खाद्य वस्तुओं की सस्ते दर बिक्री का एलान किया जाता है।  दुकान में जाने पर माल गायब, भीड़ का रैला।  जमाखोरी और कालाबाजारी रोकने के लिए सरकार के पास कोई ठोस नीति नहीं है।

                               

*श्री कौशलेन्द्र कुमार (नालंदा):महोदय, नियम 193 के तहत मंहगाई पर चर्चा उठाने का मौका दिया, इसके लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।

          आज आमतौर पर खाने-पीने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाला आटा, दूध चावल, दाल, चीनी, तेल एवं वनस्पति घी साथ ही चाय, साबुन, नमक एवं अन्य वस्तुं जो कि रोजाना उपयोग की हैं, के दामों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। सरकार इस पर नियंत्रण करने में असमर्थ हो गई है। प्रधानमंत्री ने कहा कि पिछले दो साल में खाद्य सुरक्षा और कीमतों को नियंत्रित करने का मामला प्रमुख मुद्दा बन गया है1 पिछले कुछ साल से यह गलत धारणा बनती रही कि खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता पर्याप्त है और चिंता जैसी कोई बात नहीं है। इसी तरह कई लोगों का मानना था कि हम कीमतों को नियंत्रित करने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि बढ़ती जनसंख्या और लोगों के उच्च जीवन स्तर को देखते हुए खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति बढ़ाने की जरूरत है। कृषि पैदावार भी विश्व के अन्य देशों के मुकाबले कम है। इस बार आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने यह वायदा किया था कि सत्ता में आने पर हम लोग तीन महीने में मंहगाई को कम करेंगे। लेकिन यह कम होने के बजाय बढ़ ही रही है।

1.       खाद्यान्नों के उत्पादन मूल्य में वृद्धि हो रही है इस मामले में मेरा अपना विचार है कि किसानों को उचित मूल्य मिलना ही चाहिए।

2.       माल भाड़े में वृद्धि होना।

          पेट्रोलियम पदार्थों में वृद्धि होता है तो इसका सीधा असर इस पर पड़ता है तो मेरे विचार से सरकार को मूल्यवृद्धि से परहेज करना चाहिए।

3.       खाद्यान्नों का सट्टा बाजार बंद होना चाहिए। क्योंकि इनमें जिन्होंने भारी निवेश किया हे, उनका उत्पादन और वितरण से कोई संबंध नहीं है और वो खाली भाव बढ़ाना ही मुनाफा कमाते हैं जिसका बोझ आम जनता पर पड़ता है और मंहगाई बढ़ता है।

 4.      समय पर अभाव वाली खाद्यान्नों का आयात नहीं करना।

          यह देखा गया है कि सरकार पहले तो अनाजों के भाव बढ़ने देती है और जब स्थिति हाथ से निकल जाती है तो आयात करने की घोषणा करती है और इन कदमों से दाम कभी नीचे नहीं आते।

5.       निर्यात - जब आपके अपने घर में बच्चे भूख से बिलख रहे हैं तो अपना परलोक सुधारने के लिए गौमाता को चार रोटी खिलाना कहां तक उचित है? एक तरफ देश में चीनी की कमी का हाहाकार मचा है, दूसरी तरफ, वाणिज्य मंत्रालय सौ करोड़ किलोग्राम चीनी का निर्यात यूरोपीय संघ को निर्यात कर रही है, यह कहां तक उचित है। अगर निर्यात करना ही है तो विदेशों से डायरेक्ट खरीद कर निर्यात करें या उनको क्षतिपूर्ति करें। यहां की चीनी भेजना, उचित नहीं है।

          हर तरफ जमाखोरी और सट्टा बाजार पर तुंत रोक लगनी चाहिए।

          महामहिम राष्ट्रपति जी ने दिनांक 23 फरवरी, 2010 को दोनों सदनों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मंहगाई को कम करना, मेरी सरकार की शीर्ष प्राथमिकता है।

          प्रधान मंत्री ने मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में मंहगाई हटाने के लिए जो सुझाव अमल में लाये हैं या लाने का प्रयत्न करेगी। उसमें एक राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सलाहाकार की नियुक्ति करने से यह समस्या हल हो सकती है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सलाहकार परिषद का भी गठन होना चाहिए।

          भावी खाद्य संकट से निबटने के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा की व्यवस्थित योजना, रणनीति और कार्यक्रम तय करने, उन पर अमल के लिए संबंधित मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय के लिए प्रधानमंत्री की निगरानी में एक केन्द्रीकृत कमान बने जो खाद्य सुरक्षा के लिए जवाबदेह हो। इसका समन्वय राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सलाहकार रहे।

          आज खाद्यान्न सुरक्षा, आतंकवाद ऐसी समस्या बन गई है। अगर समय रहते इस पर विशेष अमल नहीं किया गया तो यह एक विकराल समस्या बन जायेगा और इस पर सरकार का कंट्रोल करना मुश्किल ही नहीं असंभव हो जायेगा। इतना कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं और एक बार फिर यह दोहराता हूं कि सरकार खाद्यान्न सुरक्षा को गंभीरता से ले।

       

*डॉ. किरीट प्रेमजीभाई सोलंकी (अहमदाबाद पश्चिम): इस वर्ष समग्र भारतवर्ष में हम मंहगाई और प्राइस राइस की पराकाष्ठा का बोझ झेल रहे हैं।  शायद भारतवर्ष के हजारों वर्षों के अस्तित्व में इतनी भारी मंहगाई कभी आयी नहीं है।  इस बात में शायद तिल भर अतिशयोक्ति नहीं है।  पिछले अठारह वर्षों से मंहगाई की दर 18 से 20 प्रतिशत रही है।  इस अर्थव्यवस्था और घोटाले का भोज आम आदमी बना है।  आम आदमी का जीना दुष्कर हो गया है।

          आम आदमी के नाम पर सत्ता में आई यू.पी.ए. सरकार की गलत एवं घोटालेयुक्त नीतियों की वजह से गरीब और मध्यमवर्गीय इंसान का जीना मुश्किल हो गया है।

                    रीटेल प्राइस 1 कि.ग्रा.                         किसानों को मिलने वाली कीमतें   

वर्ष                   2007            2009                      2007            2009   

चावल                   14                32                          8.5               10   

गेंहू                12                24                          8.5               10.8   

चीनी                   16                50                          8 से 12                14 से 18   

    

          पिछले तीन सालों में गेंहू, चावल, दाल का बम्पर पाक हुआ है।  एफ.सी.आई. के गोडाउनों में उसे रखने की जगहें कम पड़ती है।  फिर भी ये सरकार की गलत नीतियों और आम आदमी को द्रोह करने वाली नीतियों की वजह से रीटेल प्राइस अंशतः दुगुना हो गयी है।

 

सरकार की गलत नीतियों :

-         बफर स्टोक उपलब्ध कराने में निष्फलता   

-         गेंहू, चावल, दाल और चीनी के दाम दुगुना   

-         2009 में इन्फलेशन, अगस्त - 1 प्रतिशत, दिसम्बर-7.81    

-         खाद्यान्न में 20 प्रतिशत   

-         करीबन 80 प्रतिशत पोपुलेशन खाद्य पदार्थों के पीछे मासिक आय का 70 से 80 प्रतिशत खर्च करती है   

-         उपभोक्ता वर्ग, किसानों को दी जाने वाली कीमतों से करीबन तीन गुना खर्च कर रहे हैं।   

    

          ये सरकार के अन्न प्रधान के हर बयानों पर मंहगाई बढ़ती जा रही है।  प्रधानमंत्री से लेकर, समग्र मंत्रीमंडल में एकसूत्रता का अभाव है।  ये सरकार ने मंहगाई के बारे में अलग-अलग बयानबाजी की है और अपनी नाकामयाबी छिपाने के लिए कभी सूखे के नाम पर तो कभी राज्य सरकारों के सिर पर मंहगाई का ठीकरा फोडने की व्यर्थ कोशिश की है।

          मंहगाई की वजह ये सरकार का असेंशियल कोमोडिटीज में फोरवर्ड ट्रेडिंग का फैसला ही महा घोटाला है।  99 प्रतिशत स्पेक्युलेशन और मेनीप्यूलेटिव ट्रेडिंग है।  सही में डिलीवरी एक प्रतिशत से भी कम है।  इस घोटाले के लाभार्थी बहुराष्ट्रीय कंपनियां, कार्पोरेट्स, मेनीप्युलेटर्स और काले बाजारिया ही है।  इस प्रकार से आम आदमी को दुगुना से तीगुना पैसा देना पड़ता है।  जबकि किसानों को अपनी पैदाइशों पर कम दाम मिले हैं।  बीच वाली रकम ये सब घोटालेबाज ले जाते हैं और इस व्यवस्था में यू.पी.ए. सरकार का उन सब काले बाजारियों को पूरा आर्शीवाद है।  ये सरकार की आर्थिक सरासर निष्फलता है और इसके पीदे बड़े भ्रष्टाचार की बू आ रही है।  सरकार की ये गुन्हाहित विफलता है और इसकी जांच और इन्वेस्टीगेशन होना चाहिए।

          आम आदमी और समग्र देशवासियों का जीना दुष्कर करने वाली इस सरकार के ये कथित घोटाले और गैरव्यवस्था की जांच के लिए मैं जोइंट पार्लियामेंटरी कमेटी (जे.पी.सी.) का गठन करके जांच कराने का नम्र निवेदन करता हूं।

                         

 ओश्री बृजभूषण शरण सिंह (कैसरगंज): आज देश की जनता गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। यह संकट आवश्यक जीवनोपयोगी वस्तुओं से जुड़ा हुआ है ।  खाद्य वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे   हैं । खाने-पीने की चीजों की महंगाई अठारह फीसद पर पहुंच गई है ।  खाद्य पदार्थों  की बेलगाम कीमत वृद्धि का सिलसिला करीब साल भर से लगातार बना हुआ है लेकिन इस समय हालत बेकाबू हो गयी है । साल भर के भीतर ही स्थिति यहां तक पहुंच गयी है कि गत वर्ष इसी समय जिस चीनी का मूल्य 20 से 22 रूपये किलो थी वह 45 से 48 रूपये किलो हो गयी है ।  अरहर की जो दाल 45 रूपये बिकती थी वह अब 90 से 100 रूपये किलो हो गयी है ।  आलू -प्याज के दाम दो गुना हो गये हैं ।  यहां तक कि मामूली लहसुन जो गत वर्ष 15 से 20 रूपये बिका वह इस समय 80 से 100 रूपये किलो बिक रहा है ।  हरी सब्जियों के दामों में भी आग लगी है ।  दूध और फलों के भी दाम बढ़े हैं ।  मोटा अनाज भी महंगा हुआ  है ।  जीवनोपयोगी दवावों के मूल्यों में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुयी है ।  गरीबों और किसानों की बात तो अलग है, शहरों में रहने वाले मध्यम आय वर्ग के लोगों की भी कमर टूट रही है ।  सरकार महंगाई की बात कबूल करती चली आ रही है ।  लेकिन उस पर काबू पाने मे पूरी तरह विफल रही है ।  इसका नतीजा यह हुआ है कि पहले आम आदमी की थाली से दाल गायब हुयी, फिर सब्जी गायब हुयी और आज तो गरीब आदमी को सूखी रोटी के साथ 100 रूपये किलो के लहसुन की चटनी का जुगाड़ करने मे ही पसीना छूट रहा है।

          संसद के भीतर और बाहर जब भी महंगाई का मुद्दा उठा, सरकार ने सूखे का हवाला देकर अपना बचाव करने की कोशिश की ।  कृषि मंत्री अभी तक कह रहे हैं कि खाद्य संकट उसी अकाल के चलते हुआ ।  अब रबी फसल के आने के बाद सुधार होगा। लेकिन हकीकत यह है कि सरकार यदि बोली से ही काम चलाती रही तो आने वाले दिनों मे हालात और विगड़ेंगे ।  देश के सामने खाद्य संकट कोई एक दिन में नहीं आया और इसका समाधान भी एक दिन में नही हो सकता ।  असल बात यह है कि जबसे यू.पी.ए. सरकार बनी तब से लगातार देश में खाद्यान्न संकट गहराता गया और आयात पर हमारी निर्भरता बढ़ती  गयी ।  सरकार इस भयावह तथ्य को नजरअंदाज करती रही कि भुखमरी के कगार पर रहने वाली दुनिया की कुल आबादी मे से 25 प्रतिशत लोग भारत मे रहते हैं जहां कृषि उत्पादन लगभग एक दशक से ठहरा हुआ हे ।  देश में खाद्यान्न उपलब्धता वर्ष 1991 मे जहां 510 ग्राम प्रति व्यक्ति थी वह 2007-08 में घटकर 440 ग्राम हो गयी और वर्तमान मे इसमें और कमी होने का अनुमान है ।

 

* Speech was laid on the Table           खाद्यान्न् के मामले मे देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिये जरूरी है कि सरकार कृषि को प्राथमिकताओं को सूची में रखे । लेकिन दुर्भाग्य से जिस क्षेत्र पर हमारी आधी से अधिक आबादी सीधे तौर पर निर्भर है , वह सरकार की प्राथमिकता में नहीं है ।  कई वर्षों से सरकार रट लगा रही हे कि कृषि क्षेत्र का विकास दर 4 प्रतिशत तक लाना हे लेकिन इसके बावजूद इस समय इसका विकास दर शून्य के नीचे चला गया है । आज हमारी बढ़ती हुयी जी.डी.पी. दर मे किसानों की भागीदारी कम होती जा रही है ।  पिछले सत्र के दौरान हमारे वित्त मंत्री जी ने खुद राज्य सभा मे कहा था कि पिछले 10-12 वर्षों के दौरान खेती पर खर्च  घटा है जिसे बढ़ाने की जरूरत है ।  कृषि क्षेत्र पर सरकारी उपेक्षा का आलम यह है कि वर्ष 2009-10 के केन्द्रीय बजट मे कृषि पर प्रत्यक्ष रूप से मात्र 1 प्रतिशत ही खर्च करने का प्रावधान किया गया था ।  इसी उपेक्षा के चलते खेती घाटे का सौदा बन कर रह गयी है ।  1991-2001 के दौरान 80 लाख लोगों ने खेती से मुंह मोड़ लिया ।  अगले साल होने वाली जनगणना में इनकी संख्या और बढ़ सकती है ।  देश में गन्ना क्षेत्रफल लगातार घटता जा रहा है ।  पिछले कई वर्षों से दलहनी फसलों की पैदावार बढ़ाने की कोशिश नहीं की गयी ।  एक दशक पूर्व हम खाद्य तेलों के मामले में आत्मनिर्भर थे लेकिन आज आधे से अधिक खाद्य तेलों की जरूरत आयात से पूरी की जा रही है ।

          आज महंगाई जो भयंकर रूप धारण किये हुये है उसके दीर्घकालिक और अल्पकालिक दोनों कारण हैं ।  दीर्घकालिक कारण खाद्य वस्तुओं के उत्पादन मे कमी तथा अन्यकालिक कारण इनकी जमाखोरी और कालाबाजारी है।  इसलिये इसका समाधान भी दोनो स्तरों पर करना होगा ।  खुद प्रधान मंत्री जी की आर्थिक सलाहकार परिषद ने अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि महंगाई के पीछे  खाद्य प्रबंधन में लापरवाही भी एक प्रमुख कारण है ।  वास्तव में हुआ यह है कि अधिक उत्पादन के समय बफर स्टॉक के आवश्यकता की उपेक्षा की गयी और निर्यात के बेतुके फैसले किये गये ।  मिशाल के लिये 2008 से पहले जब देश मे चीनी की पर्याप्त उपलब्धता थी तो इसका पर्याप्त सुरक्षित भंडार बनाने पर ध्यान नहीं दिया  गया ।  यही हाल गेहूं और चावल की भी है ।  महंगाई पर काबू पाने की लंबी रणनीति के साथ ही कुछ फौरी उपाय भी जरूरी है ।  कृषि उत्पादन बढ़ाने की योजना के साथ् ही खाद्य प्रबंधन की खामियां दूर करने और जमाखोरी तथा कालाबाजारी  रोकने के लिये तत्काल सकारात्मक कदम उठाये जाने की आवश्यकता हे ।  खाद्य उत्पादन बढ़ाने के लिये कृषि में सार्वजनिक निवेश बढ़ाने और किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाये जाने की नीति बनानी होगी ।

          हमारी दोषपूर्ण आर्थिक नीतियों के कारण देश में आर्थिक विषमता लगातार बढ़ती जा रही है ।  एक तरफ अमीरी का पहाड़ खड़ा होता जा रहा है तो दूसरी तरफ गरीबी की खाई चौड़ी होती जा रही है।  आज एक ही देश मे दो तरह का हिन्दुस्तान बन गया है ।  एक वह हिन्दुस्तान है जहां गगनचुंबी अट्टालिकाओं में वैभव और विलासिता अठखेलियां करती है ।  जहां कुत्ते भी आम इंसान से बेहतर जिन्दगी बिताते है । दूसरी ओर एक ऐसा हिन्दुस्तान भी है जहां आदमी जानवर से भी बदतर जिन्दगी जीने को मजबूर है ।  जहां हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी मजदूर दो जून की रोटी  नहीं जुटा पाता ।  जहां मातायें अपने भूखे से रोते विलखते बच्चो को गोदी में लिये चूल्हे पर खाली पड़ी हांडी को देखकर खून की आंसू बहाती हैं । जहां बीमार दवा के अभाव में एड़ियां रगड़कर भरने को विवश हैं ।  मैं जानबूझकर अथवा राजनीतिक विरोध के कारण सरकार पर कोई झूठा दोषारोपन नहीं कर रहा है बल्क सरकारी जुबान मे ही कुछ तथ्यों को उजागर करना चाहता हूं ।

1.       यू.पी.ए. की सरकार ने ही अपने पिछले कार्यकाल में डा0 अर्जुन सेन गुप्ता की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी जिसने विस्तृत आर्थिक सर्वेक्षण करने के बाद वर्ष 2007 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की । इस चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि           " देश के 77 फीसद अर्थात 83.6 करोड़ लोग 20 रूपये भी एक दिन में खर्च करने की स्थिति में नहीं हैं । "  पिछले तीन वर्षों मे ऐसे लोगों की संख्या मे और वृद्धि हुयी होगी ।

2.       प्रधान मंत्री जी ने अपने मौजूदा कार्यकाल में एक आर्थिक-सलाहकार परिषद का गठन किया है जिसके एक सदस्य प्रसिद्ध अर्थशास्त्री सुरेश तेंदुलकर हैं ।  इन्हीं की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति भी गठित की गयी जिसकी रिपोर्ट कुछ समय पहले आई है ।

          रिपोर्ट की खास बातः-

(i)       देश के 37.2 प्रतिशत लोग गरीब हैं ।    

(ii)      41.8 प्रतिशत आबादी अर्थात लगभग 45 करोड़ लोग प्रति माह प्रति व्यक्ति 447 रूपये पर गुजारा कर रहे हैं ।  मतलब 14.50 रूपये रोज पर गुजारा कर रहे हैं ।  स्पष्ट है कि इतने कम पैसे  मे वे रोजमर्रा की जरूरतें भी पूरी नही कर सकते । दूसरी ओर भारत के 30 धनी परिवारों की संपत्ति भारत की संपदा की एक तिहाई है ।  इन तीस परिवारों के हाथों मे जितना धन आता रहेगा उतनी ही देश की समृद्धि बढ़ती रहेगी, क्योंकि आर्थिक विकास, बढ़ती आर्थिक विषमता को नही दर्शाता । सच बात तो यह है कि आर्थिक विकास जितना बढ़ रहा है उतनी ही गरीबी भी बढ़ रही है ।  सरकार को इस सच्चाई को कबूल करना चाहिये कि उसके उंचे विकास दर का ढिढोरा पीटने के बावजूद भी गरीबी हटाने और भुखमरी मिटाने का वायदा पूरा नहीं किया जा सका ।    

          कुपोषण की समस्या विशेषकर महिलाओं और बच्चों में दिन ब दिन गंभीर होती जा रही है ।  देश के 47 प्रतिशत बच्चे कुपोष्ण के शिकार हैं ।  दुनियां के प्रत्येक तीन कुपोषित बच्चों में से एक बच्चा भारतीय है ।  देश की आधी से ज्यादा महिलायें और तीन चौथाई बच्चे रक्त अल्पता (एनीमिया) के शिकार हैं ।  खाद्य सुरक्षा की मौजूदा नीति विफल साबित हो रही है ।  ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सुविधायें नहीं के बराबर हैं ।  एक तो विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी है और दूसरे सरकारी अस्पतालों में दवावों का अभाव है ।  देश का आम आदमी महंगा इलाज कराने में असमर्थ है ।   सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिये ।  

          बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है ।  हर साल के बजट मे रोजगार सृजन और बेरोजगारी को कम किये जाने की घोषणा की जाती है लेकिन बेरोजगारों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है ।  देश में अपराधिक घटनाओं के बढने का यह  एक बड़ा कारण है ।  सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी देश को साक्षरता दर मे संतोषजनक बढ़ोतरी नहीं हो रही है ।  सर्वशिक्षा अभियान भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है ।  शिक्षा सस्ती होने की जगह महंगी होती जा रही है ।  आरक्षण की आड़ में शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में प्रतिभाओं का दमन हो रहा है ।  देश में आरक्षण को लागू करते समय यह कहा गया कि इसका आधार सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ापन होगा ।  लेकिन व्यवहार में आर्थिक पिछड़ेपन को नजरअंदाज कर दिया गया ।  जहां दलित और पिछड़े वर्ग के संपन्न परिवोरों के मंद बुद्धि बच्चे भी  ऊंची  शिक्षण संस्थाओं में आसानी से प्रवेश पा जाते हैं वहीं केवल ऊंची जाति  में पैदा होने का अभिशाप मेधावी  छात्रों को झेलना पड़ रहा है ।  यही हालत रोजगार के क्षेत्र में भी है ।  नौकरी के अभाव में सवर्णों के शिक्षित बेरोजगार युवक रिक्शा चलाने, जानवरों की तरह ठेलागाड़ी खींचने, जूता पालिश करने तथा घरों और होटलों मे मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं ।  गरीब सवर्ण घरों की महिलायें और युवतियां अपने पापी पेट की खातिर नीच कर्म करने को विवश है ।  यह हमारी आरक्षण नीति के अमानवीय, अव्यवहारिक और विद्रूप चेहरे को सामने लाता है ।

          आज जरूरत इस बात की है कि आरक्षण नीति की नये सिरे से समीक्षा की जाय तथा आर्थिक आधार पर नयी आरक्षण नीति निर्धारित की जाये ताकि सभी धर्मों और जातियों के गरीब लोगों को इसका लाभ मिल सके । यदि आवश्यक हो तो इसके लिये संविधान में संशोधन किया जाय ।

   

MR. CHAIRMAN : Now, I call upon Dr. Rattan Singh Ajnala to speak and request him to speak only for five minutes.

 

*DR. RATTAN SINGH AJNALA (KHADOOR SAHIB) :   Thank you, Chairman Sir. Today, we are discussing a serious issue in this august House – sky-rocketing prices.  Since 2004, we have discussed this issue threadbare about 8 times in this House.  However, we have not reached any conclusion.  We have not found any solution to this problem.  For the last three days, all the opposition parties were agitating for the acceptance of our notices for an Adjournment Motion on price-rise.  However, the Government did not agree to our genuine demand.  Today, we are discussing this issue under Rule 193.  Better late than never.  It was the need of the hour.

          Sir, many hon. members have candidly expressed their views on this issue. Both Shri Mulayam Singh Yadav and Shri Lalu Prasad Yadav have been very forthright in expressing their compulsions under which they had to earlier support the Congress party.

          Sir, 62 years have passed since India became independent.  The Congress party has ruled over this country for more than 52 years.  Hence, it is solely responsible for all the ills that plague this country – illiteracy,  inflation, corruption etc.  Sir, 81% people of this country earn only Rs.20/- daily.  It is unfortunate that people are finding it difficult to make both ends meet.  The Central Government cannot run away from its responsibility.  However, the Government is doing nothing concrete to tide over this problem.  The hon. Agriculture Minister claims that Kharif crop will bring relief.  Sir, these are false hopes.  Price-rise has nothing to do with Kharif or Rabi crops. The policies of the Government are lop-sided and skewed.

 

          The Central Government is trying to pass the buck on the State Governments. The State Governments are pointing their fingers at the Central Government. However, the Central Government cannot shirk its responsibility because it is the Central Government that fixes the MSP for all items like foodgrains, fertilisers etc.  Or else,  the states should be given the right to fix MSP for all items.  Let Punjab decide on these issues.  I assure you that we will feed the entire country and our condition will also improve.

         Sir, the farmers of Punjab toil day and night so that our granaries are full. The farmers of Punjab consider their crops as their sons.  They nurture and love their crops.  They spend their last rupee so that they may get a bumper harvest.  The farmer of Punjab spends Rs.2500/- per acre on the cultivation of paddy.  But what do we get in return?

          Sir, the Chief Minister, MPs and MLAs of Punjab met the Agriculture Minister, Finance Minister and hon. Prime Minister to demand the share of Punjab. However, the Central Government has not given a single rupee to bail out the farmers of Punjab.  We demanded a sum of Rs. 1200 crores.  However, we did not get even a single paise.

          Sir, Punjab has only 1.5% of the entire land of India.  We have 2% of the population of the entire country. However, I am glad to say that we are providing 60% foodgrains to the central pool.  However, the centre has neglected the just and genuine demands of the people of Punjab.

          Chairman sir, Punjab is passing through a difficult phase.  69 lakh tonnes of wheat is lying for procurement in Punjab.  Similarly, 71 lakh tonnes of paddy is lying for procurement in Punjab. However, no Government agency is procuring the foodgrains.  Our foodgrains are rotting in the open whereas people are dying of hunger and starvation in other parts of the country.  Rodents and rats are gobbling up the foodgrains.  The procurement system is faulty, to say the least.

          Even when the foodgrains are purchased, there is no proper storage system. FCI only indulges in corruption. The foodgrains are rotting.  Time and again, we have appealed to the centre to procure the foodgrains in time.  But our appeals have fallen on deaf ears.  The farmers do not have any place to keep their foodgrains.  We have requested hon. Sharad Pawar ji to bail us out. But to no avail.

          We cultivated the 201 variety of paddy.  However, the Government says that Health Ministry will test it first. The Health Ministry had already tested it.  But we are getting no relief from the centre.  If we do not look after the welfare of our farmers, hunger and starvation will become the order of the day.  Farmers must be provided their due.  I appeal to hon. Sharad Pawar ji and to the hon. Prime Minister to kindly direct the central agencies to procure lakhs of tonnes of paddy lying in Punjab. Only then can the farmers heave a sigh of relief.

          What is the root cause of galloping prices?  Sir, I fully agree with Shri Lalu.  At the time of elections, we ask the rural folks to provide us crores of rupees.  After the elections are over, the situation changes altogether.  Sir, the Government is at the root of all inflation and price-rise. If the Government acts decisively, things can be brought under control within a day.  However, the intention of the Government is not good.

MR. CHAIRMAN : Please wind up.

DR. RATTAN SINGH AJNALA  : Sir, I appeal to all sections of the House to rise above party-politics.  We are discussing a very serious issue today.  The Central Government must take corrective measures so that the poor people of the country can have two square meals a day.  No one should find it difficult to make both ends meet. No one should die of hunger and starvation.

           

SHRI NARAHARI MAHATO (PURULIA): Mr. Chairman, Sir, I am thankful to you for giving me an opportunity to participate in the discussion on price rise.  Today, the whole day, the hon. Members of Parliament from the Treasury Benches and from the Opposition Benches are discussing about price rise.  It is a burning problem today.  I rise to raise the voice of crores of people who are suffering in our country due to their hunger.  Massive attacks have been made on the people due to hunger; the people are starving. 

          If we look into the records of the Parliament, in the last five years, nine times there has been discussion regarding price rise in the Parliament, but a permanent solution has not yet come.  Specially, increase in the prices of essential commodities is a great tension to everybody, especially to the lower-middle class people, middle class people, those who are starving and those who are in hunger.  The Government should go for a corrective action to contain price rise.  Production should be increased; universal PDS policy should be formulated.  But because of casual attitude of this Government, it is not under control.  By this time, the prices are rising by leaps and bounds. 

          More than 70 per cent of our agricultural land is not irrigated. After 63 years of independence, a concrete policy on irrigation has not been made.  It should be done to overcome the unprecedented position. 

          Regarding the increase in price of essential commodities, the Central Government must supply sugar and pulses through PDS through the State Governments. There has been an acute pressure for the rise in prices of foodgrains and food products.  Higher prices were inevitable given the shortfall in domestic production and prevailing high prices of rice, cereals and edible oils globally.  Food inflation is near about 18 per cent as prices of essential commodities like sugar, pulses, rice and vegetables have gone through the roof in the recent month. 

          But the Government has failed to take appropriate measures for controlling price rise.  So, the Government should have a plan for this. We should work together.  The Government should play its role, and the forward marketing in respect of food grains must be restricted. 

          The Government is not sensitive to such a burning problem.  It is beyond the policy of this Government.  The Government should have a political will for the solution of this problem of price rise.  The Essential Commodities Act should be amended. 

          Henceforth, my suggestion and humble submission to the hon. Minister, through you, Sir, is that universal Public Distribution System should be made for the benefit and usefulness of the crores of people of our country, who are in hunger today. 

          On the other side, the land which is not being used today should be used by irrigation system, and there must be more investment in agriculture.  On the other hand, my humble submission to the hon. Minister, through you, Sir, is that the Government should take steps for stopping the commercialisation of land. Henceforth, the price rise will be controlled, and the Central Government should have a plan to control this problem of price rise.

         

*श्री वीरेन्द्र कश्यप (शिमला):  आज सारे देश में मंहगाई के कारण हा-हाकार है और केन्द्र की यूपीए सरकार इसे रोक पाने में गत छः वर्षों में पूरी तरह असफल हो गई है। आज रोजमर्रा की सभी वस्तुओं की कीमतें आसमान को छू रही हैं चाहे आटा हो या चीनी, खाने के तेल हो या सब्जी व दालें हो आम आदमी की पहुंच से दूर हो गई है। हमारे पहाड़ों में आज आटा 20-22 रूपये बिक रहा है। खाने के तेल का मूल्य 60-70 रूपये किलो बिक रहा है। यही नहीं दालों की कीमतें 90-100 रूपये प्रति किलो बिक रही हैं। यूपीए की सरकार जब गत मई में बनी थी तो उसने सौ दिनों में महंगाई को कंट्रोल करने की बात कही थी, परन्तु अब तो एक वर्ष पूरा होने को है। मंहगाई खत्म तो क्या उसे आसमान छूने से रोक नहीं पा रही है। आज सभी खाद्यान्नों के दामों में एक तरफ बढ़त हो रही है, परन्तु किसानों को उनके उत्पाद के लिए दाम नहीं मिल रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में भाजपा सरकार द्वारा आज आम आदमी व गरीब लोगों को ध्यान में रखते हुए आटा-दाल व तेल पर सब्सिडी दी जा रही है, परन्तु केन्द्र की सरकार ने हिमाचल प्रदेश को पी डी एस प्रणाली के तहत केन्द्र से मिलने वाली चीनी व अन्य खाद्यान्नों को समय रहते दिया नहीं गया जिसके कारण हमारे लोगों को मुश्किलों में डाला गया।

          इन सभी बातों को मद्देनजर रखते हुए मैं केन्द्र की यूपीए सरकार को इस सदन के माध्यम से कहना चाहता हूं कि मंहगाई पर तुंत रोक लगाई जाये ताकि आम आदमी को राहत मिल सके तथा पहाड़ी राज्यों को उसका चीनी व अन्य खाद्यान्नों का कोटा समय रहते दिया जाये।

             

*श्री प्रेमदास (इटावा): आजमहंगाईपर चर्चा हो रही है। महंगाई का मुद्दा पूरे देश में सबसे बड़ा मुद्दा है। अगर इसके लिए विशेष उपाय न किये गये तो स्थिति बहुत गंभीर हो जायेगी। आज गांव का व्यक्ति और किसान परेशान है। दिल्ली, मुम्बई में इतना पैसा है कि रखने के लिए जगह नहीं । गरीब के पास आज भी खाने के लिए, दवाई के लिए, पढ़ाई के लिए साधन नहीं। देश की भूमि कम होती जा रही है। भूमि को खेती योग्य बनाने के लिए विशेष अभियान चलाया जाये। इसके बाद पहले प्रशासन को ठीक किया जाये जिससे भ्रष्टाचार खत्म हो और गांव और किसान को प्राथमिकता दी जाये। पूरी जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की होनी चाहिए। आज देश में पूंजीकरण हो रहा है, यह देश के लिए बहुत घातक सिद्ध होगा। आज समय है इसको ठीक किया जाये।

                               

*SHRI PRASANTA KUMAR MAJUMDAR (BALURGHAT) : Hon. Chairman Sir, you must be aware that the entire country is in the grips of unprecedented hardships.  Everyday the prices of all commodities are increasing by leaps and bounds. Inflation in food products is to the tune of 20%.  What is the reason for such spiralling prices of food grains and manufactured goods? We know that for economic development of our country, agriculture sector needs to be strengthened and agricultural productivity needs to be increased.  For that, we require massive investment in the agricultural sector. 63 years have passed since our country’s independence but only the Government which rules the nation knows why investment in agriculture could not be increased.  Investment is required for irrigation, for reopening of the closed fertilizers factories or for setting up ware-houses and godowns.  The Government has failed to take care of this aspect as a result of which we are facing such difficulties.  Millions of people go hungry everyday.  They starve due to scarcity of food.  Who is responsible for this?  Congress party and the UPA Government are solely responsible for this kind of situation.

          Last year, in the Presidential Address it was mentioned that within hundred days, the BPL lists would be revised.  But to date the Government has not been able to provide a flawless BPL list.  We don’t have a correct figure as to how many people in the country are below poverty line.  It was also promised that every BPL family would get 35 kg of wheat or rice at the rate of Rs.3 per kg. That promise was also not fulfilled and we do not even find the political will to implement the programmes.  You have to understand that these are the hurdles in the way of the prosperity of the nation.

          Many members are saying that the State Governments are responsible for the spiralling prices.  But can you till me on what count the State Governments are held responsible?  Can you tell me who determines the minimum support price?  It is the Government of India that does it.  No farmer gets the support price.  Be it sugarcane, wheat or paddy cultivation, the cultivators are always a deprived lot.  There is no one to purchase their produce.  Food corporation of India does not procure paddy or wheat – only the traders purchase the produce and resort to hoarding as a result of which prices shoot through the roof.  We all have the experience that there is huge disparity between the wholesale market prices and retail market prices.  This situation is exploited by the middlemen and hoarders.  The Government has to take strong measures to curb these malpractices.  The Essential Commodities Act has to be implemented in a fresh manner.

          We have seen that on one hand population is rising and on the other hand unemployment is also increasing day by day. In future there might be a population explosion and on that day situation will be worse.  The Government should not forget this.  All the developed countries in the world have tried to check population.

          We have also seen that the farmers are not given subsidized fertilizers or subsidized seeds.  Forward trading in also rampant.  The Central Government determines the prices of export and import. We came to know from Sushma Swaraj ji that export import go on simultaneously.  When price in world market is less and price in India is more at that time commodities are imported and when world market price is more than indigenous rates, then commodities are exported.  This is not a good practice These are to be kept in mind.

          Sir, I am a new member of this House and I want to say that price rise is a burning issue, a national problem.  If common people do not survive whom are you going to represent?  People are our inspiration and we are here to express their concerns.  So the Government has to take adequate measures to ameliorate their lot and help them to live with dignity.

          With these words, I thank you for allowing me to participate in this debate and conclude my speech.

*श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):महोदय, देश में आवश्यक वस्तुओं के दामों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। दिन प्रतिदिन 5 वर्षो से लगातार दाम बढ़ रहे हैं। केन्द्र राज्य सरकारों को बदनाम करने की साजिश रचती है। राज्य केन्द्र को बदनाम करता है। आम जनता पिस रही है। विगत 5 वर्षो से संसद में नौ बार चर्चा हुई है। लेकिन दाम अभी तक नियंत्रित नहीं हो पाये हैं। लोग भुखमरी से मरने के लिए बाध्य हो रहे हैं। जितनी मजदूरों की मजदूरी नहीं उससे अधिक आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं। खाद्य सुरक्षा के नाम पर सरकार ढोंग रचती है जबकि देश में आनाज के भरे भंडार को खोल देना चाहिए। केन्द्र व राज्य सरकार दोनों जमाखोरी व चोर बाजारी रोकने में असफल रही है। देश में घरेलू उत्पाद में कमी, आमदनी में कमी आई है जबकि कृषि मंत्री का बयान इस महंगाई में आग में आहूति का कार्य करती है जबकि आवश्यक वस्तुओं के दामों में नियंत्रण करने के लिए सभी वस्तुओं को मार्केट में लाना चाहिए। मंत्री का बयान आता है कि रिकार्ड तोड़ उत्पादन हुए हैं जबकि वित्त मंत्री जी ने कहा दैवी आपदा से आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़े हैं। किसान को कांटों पर अपने उत्पाद को ले जाने की व्यवस्था नहीं है और उसके उत्पाद का वाजिब मूल्य भी नहीं मिला है। किसान ऋण के बोझ से दबता जा रहा है। आत्महत्या करने के लिए मजबूर है। स्वामीनाथन रिपोर्ट  के अनुसार कृषकों को 4 प्रतिशत ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराके उत्पादन को बढ़ावा देना चाहिए। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना का ढिंढोरा पीट रही है जबकि देश में बेरोजगारी बढ़ी है। नरेगा में भारी घोटाला हो रहा है। गरीबों की आय में वृद्धि न होने से देहातों से शहरों की तरफ पलायन हो रहा है। आयात और निर्यात में जो घोटाले हुए हैं पांच वर्षों में संयुक्त संसदीय समिति बना कर जांच होनी चाहिए। पी.डी.एस. (Public Distribution System) राज्यों की जिम्मेदारी है लेकिन कार्ड बीपीएल एवं अन्त्योदय कार्डो के बनाने में बहुत बड़ा घोटाला है। दूसरी सभी व्यवस्था करके बीपीएल व अन्त्योदय धारकों को अनाज उपलब्ध कराना चाहिए। कार्य के बदले अनाज योजना लागू करना चाहिए। वह भी सरकार ने दैवी आपदा में नहीं किया है। दैवी आपदा के नाम से करोड़ों रूपये खर्च हुए जिससे कोई फायदा नहीं हुआ है। किसान बीमा के नाम पर कोई फायदा किसान को नहीं हो पा रहा है।

          देश में मांग की अपेक्षा आपूर्ति का संतुलन नहीं हो पा रहा है। वित्त मंत्री के बयान से यह सिद्ध हुआ है। मंहगाई है  लेकिन रोकने के कोई कारगर कदम नहीं उठाये हैं। महंगाई की चर्चा हमेशा हुई है लेकिन परिणाम समयबद्ध तरीके से होना चाहिए। लोहिया जी के विचार से दाम बांधों नीति को अपनाने से   ही महंगाई पर नियंत्रण होगा। सरकार को दाम बांधों नीति को अपना चाहिए। निर्यात आयात पर तत्काल रोक लगा देना चाहिए महंगाई रोकने के लिए। कृषकों को उत्पादन बढ़ाने के लिए खाद्य, बिजली, पानी देना होगा तथा उत्पाद का वाजिब मूल्य दें। सात करोड़ बीपीए धारकों के लिए विशेष व्यवस्था होनी चाहिए। 28 राज्यों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के व्यवस्था की निगरानी तथा व्यवस्था में परिवर्तन होना चाहिए तभी महंगाई पर काबू पा सकते हैं।

                                                                 

ओश्री गोरखनाथ पाण्डेय (भदोही):देश में महंगाई बेतहाशा बढ़ी है ।  देश में आज महंगाई बेहिसाब बढ़ी है ।  जनता त्रस्त है आम आदमी का जीवन कठिन हो गया है ।  पूरा देश आज बढ़ती कीमतों से परेशान है ।  पूरा सदन इस महंगाई पर चर्चा कर रहा है किन्तु महंगाई क्यों बढ़ी है ।  कीमतें क्यों बढ़ती जा रही है ।  दाल, चीनी, चावल, सब्जी आटा , तेल, घी तथा मसाले सभी बेतहासा बढ़े हैं ।  दूध का दाम बढ़ा है किन्तु सरकार आंकड़ों की बात कर रही है ।  ये बढ़ते हुए दाम बढ़ती हुई कीमतें कैसे रूकेंगी इस पर विचार होना चाहिए ।  सरकार की गलत आर्थिक नीति की वजह से महंगाई बढ़ी है ।  जमाखोरी बढ़ी है। आयात एवं निर्यात नीति गलत हुई जिसकी वजह महंगाई पर अंकुश नहीं लगा पा रही है ।  होली का त्योहार है चीनी 50 रूपये प्रति किलो है ।  गरीब की होली नहीं मनाई जाएगी ।  देश की सरकार प्रदेश को जिम्मेदार बता रही है ।  मैं आपके माध्यम से महंगाई  रोकने हेतु सरकार से मांग करता  हूँ, महंगाई रोकने हेतु सट्टा बाजार पर अंकुश लगे ।  जमाखोरी बन्द करे, किसानों को खेती  करने हेतु आवश्यक सुविधायें प्रदान करें । भुखमरी रोकने हेतु, देश में बढ़ती भुखमरी रोकने हेतु तत्काल कार्यवाही करे ।  सरकार के कृषि मंत्री के बयानों से कभी चीनी का दाम बढ़ता है, कभी दूध का दाम बढ़ता है ।  सरकार की जिम्मेदारी है देश में कोई भूख से न मरे किन्तु इनके कार्य इनकी नीति गलत होने से महंगाई बढ़ी है ।

          यूरिया का दाम बढ़कर किसानों का शोषण हो रहा है ।  इन्हें जहाँ सुविधा मिलनी चाहिए वहाँ इनका शोषण हो रहा हे ।  बढ़ती महंगाई पर रोक न लगा तो गृह युद्ध शुरू हो सकता है । लोग सड़कों पर उतरने के लिए बाध्य होंगे । इसकी जिम्मेदारी सरकार की होगी ।  बढ़ती हुई महंगाई  रोकने    के  स्थान पर वित्त मंत्री का बयान महंगाई के समर्थन पर आया है ।  वे आकड़े दे रहे हैं जबकि देश महंगाइ पर नियंत्रण चाह रहा है ।  देश के लोग भूख से  न मरने पायें आवश्यकता इस बात की है ।

          इस ज्वलंत मुद्दे पर नियंत्रण करके महंगाई रोकने के लिए तत्काल कार्यवाही, की जरूरत है । आवश्यक वस्तुओं का दाम घटे ।  सरकार अपनी नीति स्पष्ट करे ।  कृषि भूमि को सिंचित बनाकर उत्पादन बढ़ाना चाहिए तथा चीनी, दाल, चावल, सब्जी, खाद्यान्न की बढ़ी हुई कीमतों को घटाने की तत्काल कार्यवाही कर महंगाई पर नियंत्रण करना चाहिए ।

     

* Speech was laid on the Table                   *SHRI PREM DAS RAI (SIKKIM) : The seriousness of the price rise is agreed to by the House and the Government as detailed out in the speech of her Excellency the President of India on the 22nd February, 2010. 

          If this is the case in the rest of the country then what must be happening in the mountain regions of our country including the North Eastern States?  This is a question that this House and Government must also deal with.

          We need to understand the reasons for this more this fully and this must be disaggregated to the various regions of this vast country.  I do not think that the Government has taken adequate steps to fully come to grips with the situation.  We do understand that there is price rise on account of the many explanations given and one of them is that there is also the high economic growth which spurs demand.

          I would also like to emphasize that the Government come out with a white paper on the price rise.  I am of the opinion that the drop in production of food grains in the farmers' basket and other items of agriculture is more serious than is perceived.  We need to look at the micro picture as well.  I suggest that there be a much more holistic plan.

          In case there is a drought once again then is there a contingency plan?

          These and other measures need to be taken in all seriousness.

                               

श्री राजू शेट्टी (हातकंगले):सभापति महोदय, आज महंगाई के कारण आम आदमी परेशान हो रहा है। इस महंगाई के लिए किसी न किसी की बलि की आवश्यकता तो है, लेकिन अगर किसानों की बलि इस पर दी जाएगी तो इससे बुरी बात और कोई नहीं हो सकती।

          सभापति महोदय, मैं देख रहा हूँ कि मार्केट में महंगाई बढ़ रही है लेकिन यह पैसा किसानों तक नहीं पहुँच रहा है। उपभोक्ताओं की जेब से पैसा तो निकल रहा है लेकिन पैसा किसानों के घर तक नहीं पहुँच रहा है। मेरे पास 22 जनवरी का अमर उजाला अखबार है। इसमें लिखा है कि आम आदमी की जेब पर चार खरब रुपये का डाका डाला गया है। ये चार खरब रुपये अगर किसानों तक पहुँचते तो वे खुदकुशी और आत्महत्या नहीं करते। यह पैसा सटोरियों के हाथ में गया है। इसमें दिया गया है कि अरहर की दाल में 180 अरब रुपये, अन्य दालों में 120 अरब रुपये, गेहूँ और आटा में 15 अरब रुपये, चावल में 72 अरब रुपये और चीनी में 8.80 अरब रुपये का डाका डाला गया है। अभी वित्त मंत्री महोदय ने बताया कि डिमांड और सप्लाई पर मार्केट तय होता है। अगर डिमांड और सप्लाई में कोई अनियमितता का निर्माण हो तो इसका फायदा भी सटोरियों को होता है। मुझे ज्यादा वक्त नहीं मिला इसलिए मैं संक्षिप्त में बोल रहा हूँ। अभी हाल ही में 6 फरवरी को जो मुख्य मंत्री परिषद् की कॉनफ्रैन्स हुई थी, उसकी रिपोर्ट मेरे हाथ में है। उसके अनुसार 5 अगस्त, 2008 तक चीनी का रिकार्ड उत्पादन  220 लाख टन होने का अनुमान था। जब इतना अनुमान था तो फ्यूचर मार्केट में चीनी का दाम 1673 रुपये प्रति क्विंटल था।  

 

18.00 hrs.   23 अक्टूबर को 205 रूपये बताया गया, जिसके कारण फ्यूचर मार्किट में वह 2112 हो गई। दिसम्बर 188 लाख टन बताया गया, जिसके कारण फ्यूचर मार्किट में 2103 तक बढ़ गई। फरवरी 2009 में 161 लाख टन बताया गया, जिसके कारण फ्यूचर मार्किट में वह 2303 हो गई। 23 जून को बताया गया कि 148 लाख टन चीनी का उत्पादन होगा, इससे फ्यूचर मार्किट में 2421 रूपये बढ़ गई।

18.01 hrs.                               (Madam Speaker in the Chair)           महोदया, अभी एक माननीय सदस्य ने बताया कि चीनी उत्पादन का अनुमान लगाना कठिन नहीं है। गन्ना बोने के बाद उसकी हार्वेस्टिंग 12 से 16 महीने तक होती है। यदि एक साल पहले आपको यह अनुमान था कि पूरे देश में गन्ने का उत्पादन कितना होगा? इससे ही पता लग सकता है कि चीनी का उत्पादन कितना होगा? देश में गन्ने का उत्पादन नहीं बढ़ा है, लेकिन 6 महीने के बाद जो आंकड़े यहां दिखाए गए, यह स्टोरियों को फायदा पहुंचाने के लिए दिखाए गए थे। इसी से पता लगता है कि इसमें बहुत बड़ा घोटाला है। यदि इसकी जांच की जाती तो मार्किट में चीनी का दाम इतना नहीं बढ़ सकता था।

          महोदया, जब हमारे पास चीनी नहीं थी, तब भी हमारी चीनी एक्सपोर्ट हो रही थी। बीच-बीच में रॉ शुगर इम्पोर्ट करके, उसे रिफाइन्ड करने वालों को सब्सिडी देने की बात की गई थी। उपभोक्ता मामलों के मंत्री जी ने जब भी कहा कि चीनी के दाम बढ़ेंगे तो मार्किट बढ़ता गया।

          महोदया, मैं सदन का ध्यान इस ओर आकृष्ट करना चाहता हूं कि जब भी सरकार का कोई जिम्मेदार मंत्री कोई स्टेटमेंट देता है तो मार्किट में उसका असर पड़ता है।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Kindly conclude.

श्री राजू शेट्टी : इसलिए मार्किट में जो अनियमितता है, डिमान्ड और सप्लाई में जो अनियमितता है, इसका क्या कारण है? इसके पीछे कौन है? इतना पैसा मिलने के बाद भी किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: The time of the House is extended till the hon. Minister completes his reply.

Please conclude.

श्री राजू शेट्टी : दूसरी तरफ उपभोक्ता बढ़ते हुए दामों से परेशान है। इसके पीछे कौन है? यह पैसा किसके जेब में जा रहा है? कौन लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं? इस पर विचार किया जाना चाहिए।

 

डॉ. शफ़ीकुर्रहमान बर्क (सम्भल):  महोदया, मैं केवल एक शेर कहना चाहता हूं।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइए। मेहरबानी करके बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

डॉ. शफ़ीकुर्रहमान बर्क :  महोदया, एक शेर में मेरी बात आ जाएगी।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : ठीक है, शेर सुनाइए।

…( व्यवधान)

डॉ. शफ़ीकुर्रहमान बर्क :  महोदया, शेर इस प्रकार है -

          यह बता कि क़ाफ़िला क्यों लुटा,           मुझे रहजनों से ग़र्ज़ नहीं,           तेरी रहबरी का सवाल है।

 

          इसलिए मेरी गुज़ारिश है कि यह बहुत अहम मामला है। इस पर पार्टी से ऊपर उठकर बात की जाए क्योंकि यह सारी इन्सानियत का मसला है, न अपोजीशन का मसला है, न रूलिंग का मसला है।

अध्यक्ष महोदया : आप तशरीफ़ रखिए। बहुत शुक्रिया।

…( व्यवधान)

डॉ. शफ़ीकुर्रहमान बर्क :  इसलिए मैं चाहता हूं कि इस मसले पर इन्सानियत को देखते हुए, गरीबों को, किसानों को, मजदूरों को देखते हुए इस मसले को हर कीमत पर हल करने की कोशिश करें।

 

*श्री पन्ना लाल पुनिया (बाराबंकी) ः मैं आपका अत्यन्त आभारी हूं कि मुझे इस अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय पर अपने विचार रखने का अवसर प्रदान किया।

          महामहिम राष्ट्रपति जी का 22 फरवरी को अभिभाषण हम सब ने सुना, परम्परानुसार सबसे पहले अभिभाषण के लिए महामहिम राष्ट्रपति जी के प्रति धन्यवाद प्रस्ताव पर सदन में चर्चा होती है।  इसी अभिभाषण में सभी विषयों पर चर्चा हो जाती है, क्योंकि राष्ट्रपति का अभिभाषण सरकार की नीति तथा भविष्य के एजेण्डे का दस्तावेज होता है।  अतः विपक्ष के पास हर विषय पर चर्चा करने का एक सुनहरा अवसर मिल जाता है।  महामहिम राष्ट्रपति जी के द्वारा स्वयं अभिभाषण में आवश्यक वस्तुओं की कीमतो पर भी चिन्ता व्यक्त की गई है और बड़े विस्तार से बताया गया है कि किस प्रकार सरकार के द्वारा कीमतों पर काबू पाने के लिए रणनीति बनाई है।  इस विषय पर भी विपक्ष के द्वारा बड़े विस्तार से चर्चा की जा सकती थी, लेकिन दो दिन का समय व्यर्थ नष्ट कर दिया गया और कहा कि पहले सब विषयों को छोड़कर कामरोको प्रस्ताव के माध्यम से ही बढ़ी हुई कीमतों पर चर्चा की जाए। स्वस्थ एवं सौहर्दपूर्ण वातावरण बनाए रखने और सदन को शान्तिपूर्ण ढंग से चलाने के उद्देश्य से सरकार ने नियम 193 के अंतर्गत चर्चा कराने पर अपनी सहमति प्रदान की और अध्यक्ष महोदय के आदेश से आज चर्चा हो रही है।  विपक्ष का केवल एक ही उद्देश्य था कि सदन की कार्यवाही बाधित कर जनता को केवल बता सके कि उनके बारे में वे और केवल वे ही चिन्तित हैं। लेकिन महामहिम राष्ट्रपति जी के अभिभाषण के लिए धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा न करके विपक्ष ने एक स्वस्थ परम्परा का हनन किया है, जो अत्यन्त खेदजनक है।  इनकी रूचि इस विषय पर चर्चा करने की नहीं, बल्कि शुद्ध राजनीति करने की है।  भूखे लोगों की ये बात भी करते हैं, लेकिन उनका पेट केवल नियमों से भरना चाहते हैं।

          कीमतें बढ़ी हैं और बहुत बढ़ी हैं।  रोजमर्रा के जीवन में अनुभव कर रहे हैं तथा अखबारों में निरन्तर समीक्षा समाचार छपते रहते हैं।  कीमतें बढ़ने पर अमीर आदमी पर कोई फर्क नहीं पड़ता बल्कि अमीर बाजार में सबसे महंगी चीज खरीदना चाहता है और सस्ती चीज खरीदना अपनी तौहीन समझता है, लेकिन बेचारा गरीब आदमी महंगाई की मार खाता है।  एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में 78 करोड़ लोग केवल 20 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से खर्च करने की क्षमता रखते हैं और इसमें से 10 करोड़ ऐसे लोग हैं, जिनके पास केवल खर्च करने के लिए 9/-रुपए ही प्रतिदिन उपलब्ध है।  ऐसे व्यक्तियों के लिए विशेषरूप से कीमतें बढ़ने पर हमें चिन्ता करनी चाहिए और उन्हें राहत पहुंचाने का पूरा प्रयास किया जाना चाहिए।

          महंगाई बढ़ने के कारण हैं।  आज महंगाई केवल हिन्दुस्तान में नहीं है बल्कि पूरी दुनियां इससे ग्रसित है।  यह ध्रुव सत्य है कि विश्वव्यापी मंदी का प्रभाव हिन्दुस्तान मे सबसे कम हुआ है।  किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य उपलब्ध कराने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में ऐतिहासिक वृद्धि की गई तो बाजार मूल्यों में वृद्धि होनी ही थी।  इसके अतिरिक्त कीमतों का निर्धारण मांग/आपूर्ति के आधार पर होता है। देश की आवश्यकता का 40 प्रतिशत खाद्य तेल विदेशों से मंगाया जाता है।  आवश्यकता की पूर्ती का 15 प्रतिशत दालें विदेश से आयात करके की जाती है।  विदेशों में इनकी कीमतों में काफी बढ़ोतरी हो गई है और देश में उत्पादन में कमी होने के कारण कीमतों में बढ़ोतरी हुई है।  देश के मानसून का विलम्ब से आना, जिसके कारण बहुत बड़े क्षेत्र में फसल नहीं बोई गई, यदि फसल बोई गई तो पानी के अभाव में सूख गई और जो फसल बची रही वो कुछ क्षेत्रों में आई बाढ़ के कारण वहां नष्ट हो गई।  असाधरण स्थिति उत्पन्न हुई, खाद्यान्नों के उत्पादन में कमी आई, उपलब्धता कम  हो गई, कीमतों का बढ़ना स्वभाविक  था।

          लेकिन सरकार ने इस समस्या का आम आदमी पर प्रभाव कम करने के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण निर्णय लेकर प्रभावी एवं कठोर कदम उठाए हैं।  महामहिम राष्ट्रपति जी ने इन सब कदमों का उल्लेख किया है और कहा है कि बढ़ती कीमतों से आम आदमी के राहत देने के कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देगी।

·      खाद्यान्नों की सपोर्ट प्राईस बढ़ाने के बावजूद 2002 से सार्वजनिक वितरण प्रणाली में जारी होने वाली खाद्यान्नों के दामों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गई।  आज बीपीएल परिवारों को 5.65 रू. प्रति किलो तथा अन्त्योदय कार्ड धारक को 3/-रू प्रतिकिलो चावल तथ 4.15/-रू. प्रतिकिलो बीपीएल परिवारों को तथा 2/-प्रतिकिलो अन्त्योदय  कार्ड धारकों को गेहूं उपलब्ध कराया जा रहा है।  जबकि गेहूं का समर्थन मूल्य 1100/- रू. प्रति क्विंटल है तथा अन्य खर्चों के बाद सरकार को लगभग 1350/-रू प्रति क्विंटल लागत आती है।  धान के समर्थन मूल्य 1050/-रू प्रति क्विंटल है और अन्य खर्चें व चावल बनाने में सरकार को 1945/-रू प्रति क्विंटल लागत आती है।  इस प्रकार खाद्यान्न सब्सिडी बढ़कर 55745 करोड़ हो गई है, जबकि 2003-04 में केवल 25160 करोड़ थी।

·      खाद्यान्न, खाद्य तेल एवं दालों के आयात को पूरी तरह कर-मुक्त कर दिया गया है, ताकि अधिक से अधिक आवश्यक वस्तुं विदेशों से हिन्दुस्तान में आ सके।

·      देश से बाहर अन्य देशों को आवश्यक वस्तुं न भेजी जा सकें, इसके लिए निर्यात पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया गया है।

·      अगले दो महीने में 30 लाख टन गेहूं व चावल खुले बाजार में जारी किया जाएगा, जिससे उपलब्धता में सुधार हो सके। 

·      5 लाख  टन गेहूं तथा 2 लाख टन चावल केन्द्र सरकार के अधीन नेफड तथा सहकारिता नेटवर्क के फूटकर केन्द्रों के माध्यम से जारी किया जाएगा।

·      माह जनवरी-फरवरी में 36 लाख टन गेहूं/चावल की अतिरिक्त मात्रा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से जारी की गई।  यह कार्ड धारकों को मिलने वाली सामान्य मात्रा से अतिरिक्त थी।

·      राज्य सरकारों को खाद्य तेलों व दालों के आयात करने पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से फूटकर मे उपलब्ध कराने पर खाद्य तेलों व दालों पर रू. 15/-प्रतिकिलो की दर से सब्सिडी दिया जाना जारी है।

          कीमतों को रोकने और आम आदमी को राहत पहुंचाने के लिए बड़ी विस्तृत रणनीति दी गई है।  बाजार में आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता बढ़ाने के लिए ठोस प्रयास किए गए हैं।  बाहर भेजने पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा है।  बाहर से खाद्यान्न मंगाने पर आयात शुल्क में पूरी छूट दी गई है।  जमाखोरी न हो इसके लिए व्यापारियों पर स्टॉक सीमा निर्धारित करने के लिए राज्य सरकारों को अधिकृत कर दिया गया है।  केन्द्र सरकार की भारत निर्माण योजना तथा मनरेगा के अन्तर्गत कार्यों से ग्रामीण क्षेत्र में आय में वृद्धि हुई है, लोगों की क्रय क्षमता बढ़ी है।  केन्द्र सरकार के द्वारा जो भी वर्तमान परिस्थितियों में किए जाने की आवश्यकता थी, वह किया गया है।  इस भीषण समस्या का समाधान अकेले केन्द्र सरकार नहीं कर सकती और न ही अकेले इसे दोषी ठहराया जा सकता है।  सभी सहयोग की आवश्यकता है। राज्य सरकारों को इसे और गम्भीरता से लेने की आवश्यकता है और मेरा मानना है कि कुछ राज्यों को छोड़कर बाकी राज्यों द्वारा इसे बहुत गम्भीरता से  नहीं लिया जा रहा है।

·      केन्द्र सरकार के द्वारा थोक उपभोक्ता/मीलों को ओपन मार्केट स्कीम में माह दिसम्बर में 10 लाख टन और जनवरी से मार्च तक के लिए 5 लाख टन गेहूं आवंटन किया गया।  राज्य सरकारों के माध्यम से थोक उपभोक्ताओं/िमलों ने कुल 15 लाख टन में से केवल 5.91 लाख टन ही गेहूं उठाया। यदि पूरी मात्रा खुले बाजार में पहुंच जाती तो आटा व गेहूं की कीमतें अवश्य कम होती।

·      राज्य सरकारों को फुटकर बिक्री के लिए दिसम्बर तक 10 लाख टन गेहूं आवंटित किया गया, लेकिन राज्यों द्वारा इसमें से केवल 2.42 लाख टन ही उठाया गया।  दिल्ली, राजस्थान सरकारों को छोड़कर बाकी राज्यों के द्वारा कोई विशेष रूची इसमें  नहीं दिखाई गई।  पिछली बकाया मात्रा का उठान का समय बढ़ा दिया गया है तथा 10 लाख टन अतिरिक्त मात्रा आवंटित की गई है।  10 लाख टन चावल का भी राज्य सरकारों के लिए आवंटित किया गया, लेकिन राज्यों ने 4.36 लाख टन ही उठाया है।  यदि पूरी मात्रा उठाकर राज्य सरकार अपनी ऐजेन्सियों के माध्यम से फुटकर बाजार में गेहूं चावल बेचती तो उससे कीमतों पर नियंत्रण पाया जा सकता था।  ये कार्यवाही तो  राज्य सरकारों को ही करनी है और इसमें उन्हें तत्परता दिखानी चाहिए।  

·      बीपीएल कार्ड धारक तथा अन्त्योदय  कार्ड धारक ग्राहकों को सस्ते मूल्य पर खाद्यान्न चीनी तथा मिट्टी का तेल उपलब्ध करवाया जाता है।  गेहूं 2/-, चावल 3/-रू. प्रतिकिलो की  दर से अन्त्योदय  कार्डधारकों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से उपलब्ध होता है लेकिन सस्ते गल्ले की दुकान के मालिक राज्यों में कर्मचारियों की मिली भगत से खाद्यान्न व अन्य सामग्री बाजार में बेच देते हैं, जिससे कार्डधारक इस सुविधा से वंचित हो जाते हैं।  यदि वास्तव में सबसे गरीब व्यक्ति, जो अन्त्योदय  कार्डधारक है, को सस्ते मूल्य पर खाद्यान्न, चीनी व मिट्टी का तेल वास्तव में मिल जाता है तो बढ़ी हुई कीमतों के असर से वह मुक्त हो जाता है।

·      मनरेगा एक क्रान्तिकारी योजना है।  बीपीएल सूची या एपीएल सूची का कोई प्रतिबन्ध नहीं है।  मांग पर आधारित योजना है, जो मांग करेगा उसे जॉब कार्ड मिलेगा और 100/-रू प्रतिदिन के हिसाब से 100 दिन प्रतिवर्ष के लिए मजदूरी प्राप्त होगी।  सही ढंग से इस योजना को लागू कर दिया जाए और 100/-रू प्रतिदिन के हिसाब से प्राप्त करने वाला व्यक्ति महंगाई का सामना करते हुए अपना जीवन पालन करने में समर्थ रहता है लेकिन इस योजना को लागू करने में भी राज्य सरकारों के द्वारा अनियमितता कराई जा रही हैं।  पहले शिकायत थी की मजदूरी का पूरा पैसा नहीं मिल रहा है।  केन्द्र सरकार की तरफ से चेक से भुगतान करने की व्यवस्था कर दी गई।  अब शिकायत है कि फर्जी खाते खोलकर चेकों से पैसा निकाल लिया जाता है और खुला भ्रष्टाचार हो रहा है।  राज्य सरकारें इस पर अंकुश लगाने में असमर्थ हैं। जॉब कार्ड धारकों को रोजगार नहीं मिल रहा है।

·      स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए केन्द्र सरकार ने बाहर से माल मंगाने में आयात शुल्क शून्य कर दिया है।  माल बाहर भेजने पर रोक लगा दी गई है, लेकिन इसके विपरीत राज्य सरकारें क्या कर रही हैं।  गेहूं, चावल, चीनी तथा पेट्रोल पर भारी टैक्स लगा रही है। गेहूं, धान, चावल पर टैक्स लगाकर महंगाई को बढ़ाया जा रहा है।  झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और ऐसा दिखाया जा रहा है कि महंगाई के मामले में उन्हीं का दल सबसे ज्यादा चिन्तित है।  चीनी पर 12.5 प्रतिशत टैक्स लगा रखा है।  यदि इनमें जरा भी नैतिकता है तो यहां आवाज उठाने वाले नेता अपनी पार्टी की सरकारों के खिलाफ आन्दोलन करें तथा उन से इन करों को माफ करायें।

·      मुनाफाखोरों पर कार्यवाही करने की आवश्यकता है।  आवश्यक वस्तु अधिनियम तथा कालाबाजारी रोकने के लिए अधिनियम के अन्तर्गत राज्य सरकारों के द्वारा कार्यवाही की जाती है, जो नहीं हो रहा है।  पिछले सप्ताह दालों के मूल्य की समीक्षा  निकली, जिसमें यह बताया गया कि थोक के भाव गिरने के बावजूद फुटकर के भाव उस अनुपात में नहीं बढ़े।  लखनऊ के बाजार भाव में बताया गया कि अरहर (अव्वल) थोक में 60/-रू प्रतिकिलो और फुटकर में 80/- से 90/- रू प्रतिकिलो, अरहर (दोयम) थोक में 50/- रू. तथा फुटकर में 72/-रू प्रतिकिलो ।  दाल पर 20/-रू प्रतिकिलो का लाभ वसूला जा रहा है। उड़द की दाल में थोक के 16/- रू प्रतिकिलो कम हुए, लेकिन कीमतें नहीं घटी।  इसमें राज्य सरकारों की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है।  यदि थोक में मूल्यों में गिरावट होती है तो उसका प्रभाव फुटकर में तुरन्त होना चाहिए। हम नहीं चाहते हैं कि छोटे-छोटे व्यापारियों को परेशान किया जाए।  हम चाहते हैं कि व्यापार मण्डलों के साथ वार्ता कर उनसे सहयोग प्राप्त किया जाए।  यदि फिर भी राहत न मिले तो कठोर कार्यवाही की जानी चाहिए।  यह राज्य सरकारों को ही करना है।

·      क्योंकि यह गम्भीर मामला आम आदमी से जुड़ा है, अतः प्रधानमंत्री स्तर पर कई बैठकें की गईं और एक बैठक में उनके द्वारा सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी आमंत्रित किया गया और इस विषय पर विस्तृत चर्चा हुई।  देश के सबसे बड़े प्रदेश तथा सबसे ज्यादा गरीबों की संख्या वाले प्रदेश की मुख्यमंत्री इस बैठक में मौजूद नहीं हुई और प्रदेश की राजधानी में बैठकर प्रेस कॉफ्रेंस करके केन्द्र को दोषी ठहराती है।  यदि वास्तव में बढ़ती महंगाई से गरीबों को राहत दिलाने का उद्देश्य है तो बैठक में भाग लेकर चर्चा में अपना योगदान देना चाहिए था।

·      चीनी के मूल्यों को नियंत्रित रखने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा 20 लाख टन कच्ची चीनी का आयात किया गया और उसे सफेद चीनी में परिवर्तित करने का काम उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों के द्वारा किया जाना था, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वहां की चीनी मीलों को अनुमति नहीं दी गई और कच्ची चीनी अभी भी बन्दरगाहों पर पड़ी है।  यदि ये चीनी उपलब्ध हो जाती तो निश्चित रूप से बाजार में चीनी के दामों में गिरावट आती।

·      खाद्यान्नों की उपलब्धता मुख्य मुद्दा है।  खाद्यान्न, तिलहन एवं दालें खेत में ही पैदा होती हैं और जिसे किसान ही उगाएगा।  किसान की समस्या पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।  स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार किसानों को 4 प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध होना चाहिए और मेरा तो यह मानना है कि हिन्दुस्तान में कुल ऋण का कृषि के लिए ऋण ज्यादा से ज्यादा 3 से 4 प्रतिशत होगा।  अतः इस पर केवल नाममात्र के लिए 1 प्रतिशत दर पर ऋण उपलब्ध कराया जाना चाहिए।  बीज, खाद आदि समय से उपलब्ध होना चाहिए।  जब यूरिया की जरूरत होती है तो यूरिया उपलब्ध नहीं होता, डीएपी उपलब्ध होती है तथा जब डीएपी की आवश्यकता होती है तो डीएपी बाजार से गायब होती है और यूरिया उपलब्ध होता है।  राज्य सरकारों द्वारा इस पूरी व्यवस्था पर ध्यान देकर सुधारने की आवश्यकता है।  गन्ना, तिलहन, दलहन, धान, गेहूं को किसानों के लिए लाभकारी बनाने की आवश्यकता है।  जनसंख्या में वृद्धि होनी है, सभी वस्तुओं की मांग बढ़नी है।  हमें हमारे पास क्षेत्रफल बढ़ाने की सीमा है।  उत्पादकता बढ़ाने की आवश्यकता है।  उEसर भूमि को कृषि योग्य बनाकर कृषि के लिए अतिरिक्त क्षेत्रफल जोड़ने की आवश्यकता है।  फसल बीमा पर विशेष ध्यान देते हुए वर्तमान व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है।  प्रत्येक कृषक के लिए  फसल बीमा होना चाहिए, यदि किसी भी किसान की फसल नष्ट हो जाए, तो उसे बीमा की धनराशि मिलनी चाहिए।

अन्त में बताना चाहूंगा कि इस महत्वपूर्ण समस्या पर केन्द्र सरकार ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया गया है।  राज्य सरकारों के द्वारा संवेदनशीलता का अभाव रहा है और मैं यह भी निवेदन करना चाहूंगा कि यह राष्ट्रीय समस्या है, जो अत्यंत गंभीर है, इसका राजनीतिकरण न करें।  देश के सामने अगर समस्या है, तो इसका सामना करने के लिए सभी के सहयोग की आवश्यकता है।  आलोचना कर देना तो आसान है, लेकिन  उसका सार्थक समाधान निकालने का प्रयास किया जाना चाहिए।

                   

*श्री तूफानी सरोज (मछलीशहर)ःआज बढ़ती महंगाई से चारों तरफ त्राहि-त्राहि मची हुई है।  हां, उच्च मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग पर इसव*Eा कोई प्रभाव नहीं है और उन पर कोई प्रभाव होगा भी नहीं। महंगाई की सबसे अधिक मार निम्न मध्यम वर्ग और गरीब तथा मेहनतकश वर्ग पर पड़ रही है।  आज गेहूं का आटा 18 से 20 रुपए किलो मिल रहा है। अरहर की दाल 80 से 90 रुपए प्रति किलोग्राम है। चीनी 40 रुपए किलो हो गई है।  दूध का दाम तो हर दो-चार महीने पर बढ़ा दिया जाता है।  खाने के काम आने वाली हल्दी 13 हजार रुपए प्रति क्विंटल हो गई है जबकि उसका उत्पादन करीब 701.66 लाख टन सालाना होता है।

         इसी तरह सब्जियों के दाम भी आसमान छू रहे हैं।  फलों की कीमतों का तो पूछना ही नहीं। सेब 60 से 70 रुपए प्रति किलोग्राम बिक रहा है तो केला कम से कम 30 रुपए दर्जन।  अंडा जो पंद्रह से बीस रुपए दर्जन मिलता था वह अब पचास रुपए दर्जन मिलने लगा है।  केवल आटा, दाल, चावल, सब्जी, फलों के दाम ही नहीं बढ़े हैं।  औद्योगिक उत्पादनों की कीमतों में भी बेतहाशा वृद्धि हुई है।  उद्योगो में तैयार उपभोक्ता सामानों की कीमतें लगातार बढ़ती जा रही हैं।   देश का उद्योगपति वर्ग अधिक मुनाफ कमाने की होड़ में औद्योगिक उत्पादों का दाम लगातार बढ़ाता जा रहा है और सरकार इस पर आंखें मूंदे हुए है1  यहां तक कि जिंदगी और स्वास्थ्य से जुड़ी दवाओं के दाम भी मनमाने ढंग से बढ़ाये जा रहे हैं।  ताज्जुब तो यह है कि सरकार द्वारा संचालित दवा नियामक संस्था ने अभी विगत महीनों  में  स्वयं 119 दवाओं की कीमतें बढ़ा  दी। राज्य सरकारें भी महंगाई पर काबू करने के बजाए उ से बढ़ाने का ही काम कर रही हैं।  दिल्ली में बसों के किराए में पचास गुना से ज्यादा वृद्धि कर दी गई।  मेट्रो के किराये बढ़ा दिए गए।  इसका असर ने केवल आम जनता पर पड़ा है बल्कि इसका सर्वाधिक प्रभाव महंगाई की मार झेल रहे गरीबों और मजदूरी करने वाली मेहनतकश वर्ग पर पड़ रहा है।

         हमारे कृषि मंत्री का कहना रहा है कि देश के गोदामों में 300 लाख टन गेहूं और 172.11 लाख टन चावल भरा हुआ है जो बफर स्टाक के मानक से ज्यादा है। पर वह यह भी कहते हैं कि सटोरियों ने अनाज की कीमतें बढ़ा दीं तो क्या यह माना जाए कि सटोरियों, कालाबाजारियों और जमाखोरों की ताकत सरकार से ज्यादा हो गई है?

         वर्ष 2004 से 2008 के बीच मानसून लगभग ठीक ठाक रहा।  वर्ष 2008 में रिकार्ड उत्पादन का दावा किया गया, तो फिर चावल की कीमत में 46 फीसद, आटा की कीमत में 55 फीसद, गेहूं की कीमत में 62 फीसद एवं नमक की कीमत से 42 फीसद की वृद्धि कैसे हो गई? 

         हकीकत यह है कि वर्तमान सरकार के मुखिया को महंगाई से कोई गिला नहीं है।  वे महंगाई को देश की प्रगति में बाधक नहीं, बल्कि साधक मानते हैं।  प्रधानमंत्रीजी महान अर्थशास्त्री हैं, पर पता नहीं अर्थशास्त्र के किन नियमों एवं सिद्धांतों के तहत वे महंगाई को राष्ट्रहित से जोड़कर देखते हैं।

         खेती के काम पर हमारी 70 प्रतिशत जनसंख्या लगी हुई है और कृषि रोजगार का बहुत बड़ा साधन भी बनी हुई हैं पर सरकार चाहती है कि खेती पर इस तरह की निर्भरता को कम कर दिया जाए।  शायद सरकार अमरीका की नकल करना चाहती है । अमरीका की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान एक प्रतिशत से भी कम है।  इस तरह वहां सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान चार फीसद ही है।  अमरीकी प्रशासन की सोच है कि देश का विकास तभी होगा, जब आबादी की निर्भरता कृषि पर कम हो जाएगी। हमारी सरकार शायद अमरीका की इसी सोच की ही नकल करना चाह रही है।  हमारे प्रधानमंत्रीजी भी कृषि पर आबादी की निर्भरता को कम करने की जरूरत पर बल देने लगे हैं, यह जानते हुए कि भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान 6.5 प्रतिशत है और सकल घरेलू उत्पाद  में 17 प्रतिशत। हमारे प्रधानमंत्री चाहते हैं कि 40 करोड़ लोगों को कृषि से हटा दिया जाए।  क्या सरकार कृषि से हटाकर इन 40 करोड़ लोगों को अमरीका या ब्रिटेन भेजना चाहती है।  हकीकत यह है कि जब-जब कांग्रेस सत्ता में आई है अपने साथ महंगाई भी लेती आई है।

         हमारी सरकार देश की हालत को शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव से जोड़ कर देखती  है, अनाज एवं सब्जी के भाव से नहीं।  सरकार द्वारा ही नियुक्त अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि देश के 77 प्रतिशत नागरिकों की दैनिक आय बीस रुपए से भी कम है जबकि आज बीस रुपए में अरहर की दो सौ ग्राम दाल भी नहीं मिल रही है।  77 प्रतिशत नागरिकों को आज की स्थिति में दो जून की रोटी मिलना मुश्किल हो गया है।

         सरकार के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मर्जी ज्यादा मायने रखती है, गरीबों की नहीं।  इस सरकार ने तो लोगों को बाजार के हवाले कर दिया है।  आज सारे कानून पूंजीपतियों के हित साधन के लिए बनाए जा रहे हैं।  तभी तो उद्योगपतियों का तिमाही मुनाफा ही दो-दो, तीन-तीन हजार करोड़ रुपए होता जा रहा है।

         आंकड़े बताते हैं कि देश में इस वक्त हर चौथा व्यक्ति भूखा सो रहा है।  21 करोड़ से अधिक जनसंख्या को भरपेट भोजन नसीब नहीं होता।  यही नहीं एक व्यक्ति को प्रतिवर्ष मिलने वाली खाद्य सामाग्री पिछले 10 वर्ष के अंदर 34 किलोग्राम कम हो गई है।  1999 के आस-पास भारत में खाद्य सामग्री की प्रति व्यक्ति खपत 186 किलोग्राम जो घटकर 150 किलोग्राम पर आ गई है।  सरकार ने खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के लिए खाद्य पदार्थों को इस्पात और धातुओं की कीमतों के आकलन वाले वर्ग में डाल दिया है।  यही नहीं सरकार मंदी की आड़ लेकर मेहनतकशों को ही निशाना बना रही है।  यही कारण है कि श्रम कानूनों को पूंजीपतियों के हितों के मद्देनजर बनाया जा रहा है।

         यूपीए सरकार यह भूल जाती है कि गरीबों और मेहनतकशों ने ही वोट देकर उसे राजपाट सौंपा है, पर कुर्सी पाने के बाद वह गरीबों को पूरी तरह भूल गई है।  पूंजीपति उसके चहेते बन गए हैं।  वैसे भी महंगाई का धनाढय़ वर्ग के ऊपर क्या असर होगा?  धनाढय़ वर्ग पर खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों का कोई असर नहीं पड़ता है। फर्क तो पड़ता है उस मेहनतकश पर जिसे 50 रुपए से लेकर 100 रुपए की दिहाड़ी मिलती है।  फर्क पड़ता है उस फैक्ट्री कामगार पर जिसे महीने में पांच हजार रुपए भी नहीं मिल पाते।

          वास्तव में यदि सरकार महंगाई पर काबू पाना चाहती है तो वह जमाखोरों, मुनाफाखोरों के खिलाफ अभियान चलाती।  वह महंगाई पर रोक लगाना चाहती तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत बनाती और उसका विस्तार करके जरूरतमंदों को आवश्यक उपभोक्ता सामग्री मुहैया कराती।  मैं चाहूंगा कि सरकार महंगाई पर काबू पाने के लिए यथाशीघ्र कदम उठाये ताकि गरीब वर्ग राहत की सांस ले सके।

                         

*SHRI P. KARUNAKARAN (KASARGOD) : It is an admitted fact that prices of all essential goods are going up.  In every session of the house from 14 Lok Sabha onwards we have been discussing the issue of the price rise but Government has failed to make any control on the trend of high price rise in the country.

 

Government say that there is a better growth rate of 7.6% and have been arguing that there is negative inflationary trend in the country.  If this is true, these two economic parameters are better examples of a growing economy.  But Government has to answer that why this message are not  reflected in the day to day life of the common people.

 

So the claim of the Government that there is a better situation in the social as well as the economic sectors are contradictory that the reality we face now.

 

When we got to the details of the price rise it is shocking to note that the food inflation touch about 20% it was 1% in August 2009 and 7.81% in December and three times increase in the last two months.

 

Food inflation on 11th of 2009 is about 19.05, 12th of 2009 20% and 1st of 2010 again 20%.

 

The wholesale price index in 2009 April was 9.09% and in the December 2009 reached to 20%.

 

The Retail price of rice for 1Kg. was 14 Rupees in 2007 22 Rupees in 2008 and 32 Rupees in 2009 in the same period in the price of wheat for 1 Kg was 12 Rupees in 2007 14 Rupees in 208 and 24 Rupees in 2009.

 

The price of Sugar for 1 kg Rupees 16 in 2007, 18 Rupees in 2008 & 50 Rupees in 2009.

 

At the same period the price paid to the farmers for Sugarcane 1 Kg in 2007 Rupees 8.5 & 2008 Rupes 9 & 2009 Rupees 10.  For sugarcane in 2007 Rupees 8, 2008 Rupees 10 & 2009 Rupees 14.

 

These figures show when prices are high, the prices that the farmers receive doesn't show any such increase either in Rice, Wheat or Sugarcane.

 

Not only prices of these three commodities but prices of almost all the essential items have gone up.

 

It is shocking to note the price of wheat rose from 9 to 24 per kg. from 2004 to 2010 and Rice 10 to 32 Sugar from 14 to 50, Edible Oil from 14 to 100, Dalda 14 to 85, Channa Dal 25 to 56, Tur/Mung Dal 24 to 100, Besan 20 to 60, Milk 16 to 30, Kerosene 18 to 35 in the respective period.

 

Tendulkar Committee says there is 12% increase in poverty.

 

78% of our population spends 60 to 80% of their monthly income for their food articles.

 

Consumers have to pay three times more than the price paid to farmers.

 

Who are the beneficiaries of price rice?  No doubt the benefit goes to multi nationals corporate and commodity companies they are getting 100 to 300% of benefits.

 

Why such a very serious situation of price rice become a day to day phenomena of our society. No doubt this is due to the failure of food policy and also  economic policy pursued by the Governemnt.

 

The reasons are : (a) Food Procurement  policy shifted from Government and FCI to Multinationals (b) Not implementing the essential commodities act strictly.  (c)   Government inaction to promote PDA system (d) the rise in the prices of Petrol and Diesel.

 

It is true that drought and floods effected our production.  But the Governemnt has to take necessary steps to compensate the shortage of food items but we see when there is shortage of Onion,  Government has exported Onion @ of 13 Rupees per Kg, whereas the domestic price  is 45 Rs.

 

When there is a shortage of sugar production of 70 thousand million ton Government has exported Sugar at cheaper price.

 

The better way to control the price is the market intervention through PD system.  In the demarcation of APL BPL Cards has  really worsened the situation by rejecting statutory ration to majority of the people.  The universalisation of the PDS system is the only way to bring down the price in the open market.

 

Kerala has been implementing the system for long time, Kerala has given rice to 25 thousand families @ 2 Rupees per kg.  Government has given rice @ Rs. 9.80 to the APL families and has given rice @ 14 Rs Maveli Stores. Government has to meet a huge burden on this account.

 

Government has met 500 crores Rupees for these food  security  may be highest in the History of Kerala.

 

It is unfortunate to say that the APL Quota allotted to the state in the year 2007 was about 113648 metric tone now it is reduced to 17500 Mt.  It means a reduction of 82% no Government can run in the PDA system if Central Government take such a rigorous stand.

 

Government claim that there is better food buffer stock, but instead of distributing the food grains through PDS System Government give it to the traders to the open market which would only assist the traders and assist to rise the price.

 

So the policy followed by the Government has to be changed immediately and take administrative steps to control the price rise.  PDS system has to be strengthened by allotting more food grains to the states. Remunerative prices have to be given to the farmers for their commodities.

 

The objective of the Government should be to assist the poor people and not the mill owners who need profits at any cost.

             

* डॉ. बलीराम (लालगंज):   सदन में देश में बढ़ती हुई महंगाई को लेकर बहस हो रही है। इस बहस में सत्ता पक्ष के लोग बढ़ती महंगाई को कभी सूखे के कारण बता रहे हैं, कभी अन्तर्रा­ट्रीय मार्केट में कीमतों के बढ़ने को जिम्मेदार बता रहे हैं, लेकिन महंगाई कैसे नियंत्रित होगी, इसके लिए सरकार की तरफ से क्या कदम उठाये जाएंगे, इसका जिक्र नहीं कर रहे हैं। अगर इस देश में बेहताशा कीमतें बढ़ रही हैं तो उसके लिए सरकार की गलत आर्थिक नीतियां जिम्मेदार हैं। यह महंगाई अचानक नहीं बढ़ी है, बल्कि अंग्रेजों के समय में भी भुखमरी था। इससे निजात पाने के लिए व­ाऩ 1942 में बाबा साहब डा0 भीम राव अम्बेडकर जी ने अंगेजों के समक्ष सेप्रेट सैटलमेंट एक्ट प्रस्तुत किया। जिसमें उन्होंने बताया कि हमारे लोग, जिनके बच्चे भूखे, नंगे सो जाते हैं, उसका कारण यह है कि ये खेत मजदूर हैं, लेकिन इनके पास खेत नहीं हैं। जब तक इन्हें जमीन मुहैया नहीं करायी जाएगी, तब तक इनके बच्चे भूखे और नंगे रहेंगे। इसके लिए बाबा साहब डा0 अम्बेडकर ने बताया कि इस देश में जितने भू-भाग पर खेती होती है, उसकी दुगनी जमीन परती और बंजर है, जो सरकार की कस्टडी में है। यदि इन जमीनों को गरीबों में बांट दिया जाय तो इनके बच्चे भूखे-नंगे नहीं रहेंगे।

           अंग्रेजों ने इस योजना को स्वीकार कर लिया और कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा है, ज्यों ही यह युद्ध समाप्त होगा, पंचव­ाावय योजना में गरीबों को जमीन दी जायेगी, लेकिन आजादी के बाद सारी योजनाओं को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। यही कारण है कि भारत में पर्याप्त जमीनें परती और बंजर है। यदि सरकार उन गरीबों के बीच में जमीन बांट देती तो आज इस तरह भुखमरी नहीं होती और ना ही महंगाई बढ़ती।

           बढ़ती खाद्य कीमतों व मूल्य वृद्धि से आम आदमी आज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। महंगाई के आंकड़े अपने चरम पर हैं। इसका कारण कुछ भी हो, फिर भी खाद्यान्नों और खाद्य उत्पादों की कीमतों पर दबाब बढ़ रहा है। सरकार का तर्क है कि घरेलू उत्पादन में कमी और विश्व स्तर पर चावल, दालों तथा खाद्य तेलों के बढ़े हुए मूल्यों के कारण कीमतों में बढ़ोत्तरी हुई है। परंतु मेरा मानना इससे अलग है। हालात ऐसे हैं कि सरकार जितनी बार घो­ाणा करती है कि हम मूल्य नियंत्रित करेंगे, जल्दी मूल्य नियंत्रित करेंगे, आदि-आदि, उतनी ही तेजी के साथ महंगाई बढ़ती जाती है।

           भारत जैसे विशाल देश में, जहां अधिकांश (27.5 प्रतिशत) लोग गरीबी की रेखा के नीचे की जिंदगी बसर कर रहे हैं। जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती। देश में करीब 25 करोड़ लोग रात में भूखे पेट सोने पर मजबूर हैं। भूख, कुपो­ाण और गरीबी की अवधारणा व कल्पना ही भयावह है। अखिल भारतीय स्तर पर 1.9 प्रतिशत परिवार भूख से पीड़ित हैं और यह स्थिति पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, आसाम और बिहार जैसे राज्यों में कुछ ज्यादा ही है। रा­ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2005-06 के अनुसार 45.9 प्रतिशत लोग कुपो­ाण के शिकार हैं तथा 27.5 प्रतिशत लोग गरीबी के शिकार हैं। हमें इन संकल्पनाओं के आधार पर इन सामाजिक बीमारियों व महंगाई पर लगाम कसने हेतु “नीतिगत समाधान” खोजने होंगे। यह अत्यंत चिंता का वि­ाय है कि देश द्वारा लगभग तीन दशकों से खाद्य-उत्पाद में आत्मनिर्भरता हासिल कर लेने और बढ़ते सार्वजनिक खाद्य भंडारों के बावजूद, आज भी देश में भूख व्याप्त है और इतना अधिक कुपो­ाण फैला है। मेरी मांग है कि इन मुद्दों का समाधान सरकार जल्द से जल्द करे और यदि वांछित हो तो विभिन्न हस्तक्षेप तंत्रो की समीक्षा की जाए और उन्हें पुनः नया रूप दिया जाए, जिससे आजीविका, भरण-पो­ाण की समुचित व्यवस्था हो सके।

          देश में गरीब आदमी की आमदनी खाद्य मूल्य वृद्धि के अनुपात में नहीं बढ़ी है। व­ाऩ 1999 में खाद्य खपत प्रति व्यक्ति प्रति व­ाऩ 186 किलोग्राम था, जोकि घटकर प्रति व्यक्ति प्रति व­ाऩ 152 किलोग्राम हो गया है। यानि कि खाद्यान्न खपत प्रति व्यक्ति प्रति व­ाऩ 34 किलोग्राम कम हो गई है। ऐसे में मांग, आपूर्ति का अंतर कहां रहा है। देश में जो गरीबी की स्थिति है, उसमें बहुत ज्यादा सुधार तो नहीं दिखाई देता है, तथापि सरकारी तौर पर हमारी विकास दर बढ़ती जा रही है, क्रय शक्ति बढ़ती जा रही है, परन्तु गरीबी भी उसी अनुपात में बढ़ती जा रही है। 35 राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में तीन राज्यों- बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में कुल आबादी के 40 प्रतिशत लोग गरीबी की जिंदगी बसर कर रहे हैं। गरीबों की कुल संख्या का दो तिहाई भाग, छः राज्यों में उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश, महारा­ट्र और उत्तर प्रदेश में है। ग्रामीण भारत में स्थिति कुछ ज्यादा ही भयावह है। नेशनल सैपल सर्वे आर्गनाइजेशन के आंकड़े बताते हैं कि देश में 20 रूपया प्रति व्यक्ति खपत प्रतिदिन की होती है। व­ाऩ 2004-05 में शहरों में 32.3 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्र में 71.9 प्रतिशत ही केवल 20 रूपया प्रति दिवस और इससे भी कम पैसे व्यक्ति के पास हैं।

          देश में महंगाई बढ़ने का दौर जारी है। सरकार को इस पर अंकुश लगाकर इसे रोकना चाहिए। जिससे देश के लोगों का जीवन-यापन भली-भांति हो सके। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि थोक मूल्यों पर आधारित आंकडों, जनवरी 2010 के अनुसार महंगाई दर 17.94 प्रतिशत को पार कर गई है, जबकि सरकार जीडीपी की दर 7.2 प्रतिशत से खुश है और कह रही है कि जीडीपी बहुत बढ़ गयी है। व­ाऩ 2007-08 तथा व­ाऩ 2006-07 में क्रमशः 9 प्रतिशत तथा 9.7 प्रतिशत की उच्च वृद्धि से गिरावट की द्योतक है। महंगाई के चलते मुद्रास्फीति की दर दिसंबर में 4.78 प्रतिशत से 7.31 प्रतिशत ( थोक आधारित मूल्यों पर) पहुंच गई। आलू का दाम पिछले 52 हफ्तों में 40.57 प्रतिशत बढ़ा है, दालों में 41.24 प्रतिशत, चावल में 9.90 प्रतिशत, दूध में 14.16 प्रतिशत, गेहूं में 15.47 प्रतिशत, सब्जियों में 20.93 प्रतिशत, फलों में 8.67 प्रतिशत, खाद्य तेलों में 50.0 प्रतिशत, नमक 50 प्रतिशत तथा मोटा अनाज 12.15 प्रतिशत बढ़ा है। इस प्रकार थोक मूल्य सूचकांक द्वारा मापित घरेलू खाद्य कीमतें मुद्रास्फीति, समग्र मुद्रास्फीति से काफी उच्चतम बनी हुई है।

          वैश्विक मंदी की बात कही जा रही है, लेकिन हमारे यहां महंगाई आसमान छू रही है। अगर महंगाई पर काबू न पाया गया तो हालात बद से बदतर हो जाएंगे। माननीय उच्चतम न्यायालय को भी सरकार को महंगाई रोकने हेतु कहना पड़ता है, लेकिन महंगाई बेलगाम व बेकाबू है। सरकार के मंत्रीगण अलग-अलग वक्तव्य दे रहे हैं और कह रहे हैं कि महंगाई और बढ़ेगी तथा आगामी रबी फसल के उपरांत ही इस पर कुछ अंकुश संभव हो सकेगा। आखिर क्या कारण है कि माननीय प्रधानमंत्री जी, वित्त मंत्री जी और कृ­िा मंत्री जी बेलगाम महंगाई पर क्यों काबू नहीं पाना चाह रहे हैं? सरकार कहती है कि राज्य सरकारें सहयोग नहीं कर रही हैं और सटोरियों के कारण महंगाई बढ़ रही है। यह कथन सरासर गलत है, क्योंकि सरकार महंगाई को नियंत्रित करने में अक्षम है तथा महंगाई बाजार आधारित हो गयी है। बाजार जैसे बढ़े-चढ़े, उसे वैसे ही चलने दो, परंतु सरकार की अपनी जीडीपी नहीं कम होनी चाहिए। केंद्र सरकार महंगाई के प्रश्न पर जितनी गंभीर होनी चाहिए, शायद उतनी गंभीर नहीं है। मेरी राज्य सरकार ने सामूहिक प्रयत्नों के आधार पर महंगाई को नियंत्रित कया है और लोगों को समुचित तौर पर सभी आवश्यक वस्तुं एवं खाद्य पदार्थ वितरित करवाए हैं।

          देश में कृ­िष पर 66 प्रतिशत लोग आधारित हैं। सरकार की वार्­िाक योजना व­ाऩ 2007-08 में कृ­िा की विकास दर 4.9 प्रतिशत से घटकर व­ाऩ 2008-09 में 1.6 प्रतिशत पहुंच गयी है। यह गलत सरकारी नीतियां ही हैं कि रबी और खरीफ की फसल का उत्पादन ठीक प्रकार से नहीं हुआ या बढ़ा है। किसानों को पानी, खाद, बीज आदि ठीक प्रकार से नहीं मिल पाता है तो फिर उत्पादन कहां से बढ़ेगा? कृ­िा निवेश जो कि व­ाऩ 1999-2000 में 11.9 प्रतिशत था, वह आज 6.6 प्रतिशत से कम हो गया है। कृ­िा जिंसो को वायदा कारोबार से मुक्त करने की आवश्यकता है और उस पर तत्काल रोल लगानी चाहिए। वहीं प्रति हैक्टेअर घटती पैदावार उपज को बढ़ाने के प्रभावी कदम उठाने होंगे। ऐसे बीज विकसित करने होंगे जो पानी की कम खपत करे व पैदावार ज्यादा दें।

          आज भी 73 फीसदी किसानों को सस्ते कृ­िा ऋण उपलब्ध नहीं है। उनको अन्य साधनों से ऊंची ब्याज दरों पर ऋण लेना पड़ता है, जिससे वे लगातार कर्ज के बोझ से दबते जा रहे हैं तथा बेबस और लाचार हैं। कृ­िा के खाद्यान्नों का उत्पादन लगातार घटता जा रहा है। ऐसे में रा­ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन की शुरूआत इस दिशा में सही कदम है। यह अत्यंत दुखद है कि इस मिशन की शुरूआत परिवारों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नहीं की जाती है। इसके चलते चावल का उत्पादन 1 फीसदी, गेहूं 2 प्रतिशत, गन्ना 14.9 प्रतिशत और दाल का उत्पादन 9 प्रतिशत गिरा है तथा प्रति हैक्टेअर उपज भी कम हुई है। सरकार को इस ओर समुचित प्रयास करने चाहिए।

           हम सार्वजनिक वितरण प्रणाली और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए बफर स्टॉक रखते हैं, उसके मानक के हिसाब से कम से कम गेहूं, चावल क्रमशः 110 लाख टन व 52 लाख टन होना चाहिए। परंतु इस सापेक्ष में कुल बफर स्टॉक गेहूं 284.57 लाख टन व चावल का 153.49 लाख टन है। इसी प्रकार चीनी की मांग 230 लाख टन है, परंतु कम पैदावार व मूल्य के चलते किसान मिलों में गन्ना कम ला रहा है।

          मांग और आपूर्ति का अंतर चीनी की कीमतें बढ़ाने का मौका दे रहा है। दाम कम करने के लिए सरकार गेहूं, चीनी, दालों, खाद्य तेलों का आयात कर रही है। व­ाऩ 2006-07 में गेहूं का आयात 5.5 मिलियन टन था, व­ाऩ 2007-08 में 1.8 मिलियन टन आयात हुआ। सफेद चीनी का 10 लाख टन आयात हुआ, दालों का भी 25-30 लाख टन आयात होने के बावजूद इन आवश्यक वस्तुओं व खाद्य पदार्थों के मूल्य बढ़ना जारी है।

           आज वायदा बाजार से कारोबारियों, सटोरियों और बड़ी कंपनियों ने करोड़ों रूपए कमाये हैं। एक बार सरकार ने दाल, चीनी, चावल के वायदा कारोबार पर रोक लगायी भी, परंतु उसे पुनः चालू कर दिया गया। यह समझ में नहीं आया, अतः इसे पुनः बंद करना आवश्यक है। हमारी सार्वजनिक वितरण प्रणाली और सुदृढ़ होनी चाहिए क्योंकि यह व्यवस्था की लापरवाही व कोताही का ही दु­परिणाम है, जिससे आम आदमी लाभ से वंचित है। भयंकर तरीके से महंगाई बढ़ रही है। माननीय वित्त मंत्री जी आरोप लगाते हैं कि राज्य सरकारें हमें सहयोग नहीं दे रही हैं तथा सटोरियों और कालाबाजारियों की धर-पकड़ नहीं कर रही हैं। यह एक बड़ा ही अजीब आरोप है। मेरा कहना है कि जहां एक ही पार्टी की केन्द्रीय सरकार है, एक ही पार्टी की राज्य सरकार है, तो ऐसे लोगों को सरकार गिरफ्तार करके दिखाये कि महंगाई कैसे रूकती है? सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं भाग सकती है। अगर राज्य सरकारें इस प्रकार से बातें करेंगी तो क्या केंद्र सरकार ताकती रहेगी और जनता मरने के लिए विवश हो जाएगी।

          अंत में मैं कहना चाहूंगा कि सरकार को महंगाई को नियंत्रित करने में जितना गंभीर होना चाहिए, उस गंभीरता को पूर्णतया अभाव है। यह आम आदमी के साथ ज्यादती व धोखाधड़ी ही है कि गरीबों की उपेक्षा व दुर्दशा हो रही है और लोग भूखे मरने के लिए मजबूर होते जा रहे हैं। मैं चाहूंगा कि सरकार को बाजार को नियंत्रित कर, मूल्य नियंत्रण व सार्वजनिक वितरण प्रणाली व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना चाहिए। कीमतों के बारे में बुनियादी आधार पर बुनियादी नीतियां तय होनी चाहिए, आरोप-प्रत्यारोपों से काम नहीं चलेगा। यह कह देना कि यह राज्यों की जिम्मेदारी है, यह सर्वथा अनुचित है। दाम तो केंद्र सरकार ही तय करती है। हमें राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है तभी हम इस बेलगाम महंगाई पर काबू पा सकते हैं अन्यथा नहीं।

                                                                                         

*श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर)ःसदन में जो मूल्यवृद्धि पर नियम 193 के तहत जो चर्चा हो रही है इसके संबंध में कुछ सुझाव प्रस्तुत कर रहा हूं।  यह सर्वविदित है कि महंगाई बढ़ी है, आम आदमी परेशान हो रहा है, गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले और भी ज्यादा परेशान हो रहे हैं।  अतः मूल्यवृद्धि को रोकने के लिए मेरे सुझाव निम्नलिखित हैं-

1.    मूल्यवृद्धि का सबसे बड़ा कारण वायदा व्यापार है। होर्डिंग वाले लोग कम्पयूटर के माध्यम से लाखों टन वायदा वस्तुओं का व्यापार करते हैं और इससे वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं।  अतः खाने-पीने की चीजों को वायदा व्यापार से अविलम्ब मुक्त करें और इस हेतु जल्दी वायदा व्यापार कानून में संशोधन किया जाना चाहिए।

2.    आवश्यक वस्तु अधिनियम को भी कठोरता से लागू करने की आवश्यकता है।  आवश्यक अधिनियम का उल्लंघन करने वाले लोगों के लिए शोर्ट ट्रायल की व्यवस्था की जावे एवं संभव हो तो अलग से इसके लिए कोर्ट स्थापित कर दिए जावें क्योंकि जिला कलक्टर को अधिक व्यस्तता के कारण समय कम मिलता है।  इससे अपराधी को शीघ्रता से दण्ड मिलेगा एवं आवश्यक वस्तु अधिनियम के उल्लंघन की घटनाओं में कमी आयेगी।  

3.    आयात-निर्यात नीति की समीक्षा की जावे वर्तमान में मानसून की खराबी के कारण देश में अन्न का संकट है और ऐसी स्थिति में चीनी एवं चावल का निर्यात किया जाना किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत नहीं है।  अतः तुरन्त चीनी एवं चावल के निर्यात पर रोक लगा देनी चाहिए।

4.    जिलों में जिला कलक्टर की अध्यक्षता में खाने-पीने की चीजों के लिए डेली रिपोर्ट प्राप्त करने की व्यवस्था संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को करनी चाहिए और मुख्यमंत्री जब तक मूल्यवृद्धि मे सुधार नहीं हो तब तक आवश्यक रूप से भारत सरकार को प्रतिदिन इस संबंध में रिपोर्ट करें ऐसी व्यवस्था ई-मेल के जरिये की जा सकती है।

5.    मानसून की अनिश्चितता के कारण महंगाई ज्यादा बढ़ रही है।  अतः मिलावटकर्ताओं एवं जमाखोरों के विरुद्ध सख्त कार्यवाही की जावे तथा जो कार्यवाही हो रही है उसकी प्रतिदिन भारत सरकार को स्थिति में सुधार तक राज्यों के मुख्यमंत्रियों से रिपोर्ट प्राप्त आवश्क रूप से करनी चाहिए।

6.    खाद एवं रसायन पर मूल्यवृद्धि की घोषणा से भी महंगाई बढ़ने की संभावना है एवं किसानों की उपज में कमी की भी आशंका है।  अतः खाद एवं रसायन की मूल्यवृद्धि को वास लेने का श्रम करें।

7.    मानसून की अनिश्चितता एवं सूखे के कारण महंगाई और बढ़ने की संभावना है।  भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों को निर्देशित करें की सुखे एवं मानसून की अनश्चितता से बचने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में सुझाव दें।  इनमें ऐसे कुछ सुझाव हो सकते हैं, जैसे जैविक खाद का ज्यादा प्रयोग, ड्रिप एवं माईक्रो ईरिगेशन का ज्यादा प्रयोग, ओर्गनिक फार्मिंग को बढ़ावा, चार उत्पादन के क्षेत्र में नवीन तकनीकी का प्रयोग करके हरा चारा अधिक से अधिक उगाने का प्रयास किया जाना चाहिए, जिससे पशुधन को भी बचाया जा सके एवं वैकल्पिक व्यवस्था के जरिये अनाज का भी उत्पादन संभव हो सके।

8.    सार्वजनिक वितरण प्रणाली की समीक्षा की जाने चाहिए, बीपीएल को छोड़कर शेष आदमियों को दी जाने वाली सुविधाओं को तत्काल बंद किया जावे, क्योंकि इसका लाभ आम-आदमी को नहीं मिलकर होर्डींग करने वाले को ज्यादा लाभ मिल रहा है, विशेष करके कैरोसीन के क्षेत्र में तत्काल कार्यवाही की जानी चाहिए।  इससे जो पैसा बचेगा उसका प्रयोग महंगाई नियंत्रण करने वाले साधनों पर किया जाना चाहिए।

9.    खाद्यान्नों के संकट के कारण महंगाई बढ़ने की बात सरकार कह रही है इस संबंध में मेरा सुझाव है कि खाद्यान्न उत्पादन के लिए बंजर एवं बेकार पड़ी भूमि को कृषि योग्य बनाया जावे।  सिंचाई के साधनों का विकास ज्यादा से ज्यादा किया जावे।  पीपीपी माड़ पर आधारित कृषि क्षेत्र में निवेश करने वाले लोगों की सूची तैयार करके निवेश हेतु प्रोत्साहन उपलब्ध कराया जावे जिससे कृषि के उत्पादनों में बढ़ोतरी हो एवं मांग एवं पूर्ती के बीच में अन्तर भी कम हो सकें।

10.भंडारण व्यवस्था समुचित नहीं होने के कारण कई बार किसानों की पकी पकाई फसल खराब हो जाती है।  अतः इस संबंध में मेरा सुझाव है कि व्यापक स्तर पर ऐसी योजना निर्धारित कर 5 हेक्टर तक भूमि रखने वाले प्रत्ये किसान को भंडारण के लिए गोदाम बनाने हेतु ऋण एवं अनुमति की व्यवस्था की जानी चाहिए।  योजना बनाने के लिए नाबार्ड का सहयोग लिया जा सकता है।  

11 कृषि विकास के लिए बहुत सी योजनाएं संचालित है, लेकिन वो ओवरलैपिंग है।  अतः तकनीकी कृषि विशेषज्ञों के माध्यम से एक कम्पोजिट योजना बनाई जानी चाहिए और शेष सभी योजनाओं की समीक्षा करके उपयुक्त उपबंध कम्पोजिट प्लान में सम्मिलित किए जा सकते हैं और शेष योजनाओं को हटाया जाना चाहिए ताकि किसान योजना को भली भांति समझ सके एवं अपने खेत में उस योजना को लागू कर उत्पादन बढ़ाने में सहयोग कर सकें।  

                                 

*SK. SAIDUL HAQUE (BARDHMAN-DURGAPUR) :Unprecedented rise in prices of all essential commodities, food articles has caused a great concern to the people in general.  It has threatened crisis in food front.  The recent hike in the prices of urea along with government move to decontrol  of price of fertilizer has added fuel to the fire:

          India is currently witnessing one of the highest rates of inflation.  Currently, the inflation rate for food articles on date 6th February 2010 is 17.97%. If we look at more disaggregated picture, we find that the inflation rate for pulse and potato is around 38% for vegetables it is a round 20% and for onions and milk it is around 14%. In other words, all the food items that are used by the common people in this country are witnessing sky rocketing inflation.           The UPA Government has no intention of a course correction in the policies, which have resulted in continuing high rates of inflation of food items which reached almost 18 per cent (WPI) in the week ending January 31.  The Government has consistently refused to accept its own responsibilities and has sough to explain away high prices through lame excuses, one of them being that high inflation rates are a global phenomenon.  A comparison of the consumer price index of the G-20 group of countries shows why the alibi does not work.  Clearly, domestic factors, not international ones are responsible for India having the highest annual inflation rates in the Consumer Price Index of the G-20 countries.   G 20 Countries: Consumer Price Inflation for December 2009   Country   Annual Inflation Rate   India   14.97 Russia   8.8 Argentina   7.7 Turkey   6.5 South Africa   6.3 Brazil   4.3 Saudi Arabia   4.2 Mexico   3.6 United Kingdom   2.9 Indonesia   2.8 Republic of Korea   2.8 United States of America   2.7 Australia   2.1 China   1.9 Canada   1.3 Italy   1.1 France   0.9 Germany   0.9 Japan  
-1.7             The Government by asserting that the price rise is because of an increase in the income in the rural areas is actually undermining the impact that the inflation is having on poor and ordinary people. In other words, if the Government believes that the price rise is a result of the rise in the income in the rural areas, then it actually believes that this inflation is not hurting the poor.

          But, what is the evidence that there has been an increase in the income in the rural areas?  No data is provided.  Contrary to what the Government wants us to believe, it is instructive to look at the data on farmers' suicides over the last few years.  In the year 2008 alone, 16,196 farmers committed suicide in the country.  Is this a symptom of rising income in the rural areas?  The people in the rural areas suffer from acute malnutrition with more than 80% of the population not receiving the stipulated calorie intake  of 2400kcal per day.  The total public investment in the rural areas has declined drastically with the farmers also not being able to access cheap bank credit.  As a result of  all these, it has now become a well established fact that there exists a severe agrarian crisis in rural India.

          It is indeed the case that there has been a shortfall in the agriculture sector and food production in the country.  But the real issue is who is responsible for the short fall.  It is easy to blame the drought conditions of the last year.  But the real point is that the growth rate of food production has slowed down over the years in India.  Moreover, even while registering a very high growth rate of GDP, the agriculture growth rate has been very slow.  The reason behind such slow growth of the agriculture sector is the neo-liberal policies pursued by successive governments, where even after so many years of independence the share of investment in agriculture is only 3.3% of GDP (2008-09).  The lack of investment in agriculture coupled with complete absence of land reform and opening up agricultural trade has resulted in the overall agrarian crisis.

          One of the primary reasons for food inflation lies in the speculative activities in the commodity exchanges whereby essential commodities are traded in the future market giving rise to hoarding activities, which in turn generate inflationary pressures in the economy.  The Government has stubbornly refused to ban future trading on these commodities.  Secondly, because of the vested interests involved in the Government, the prices of  sugar gets dictated by what is profitable for the sugar mills lobby in Maharashtra. Added to all this is the question of the entire policy framework pursued in India which forbids the development of agriculture by protecting the interests of the farmers and the rural poor.

 

As such I urge upon the Government to take following actions as measure for controlling price rise.

 

1.             To strengthen the PDS by making it universal and by providing food grains at cheap prices.

2.             To stop forward trading of all agriculture products.

3.             To withdraw recent hike in prices of urea along with governments move to decontrol the price of the fertilizer.

4.             to implement land reform policies for the benefit of the poor and marginal farmers.

5.             to increase the numbers of BPL families by changing the criteria for identifying of BPL families and also to take action on the basis of Saxsena Committere and Tendulkar Committee reports.

6.             to amend the essential commodity act for taking action against the hoards and black marketers with active cooperation with the State Governments

7.             to stop commodity exchange policy.       

8.             to introduce food security legislation/                 THE MINISTER OF AGRICULTURE AND MINISTER OF CONSUMER AFFAIRS, FOOD AND PUBLIC DISTRIBUTION (SHRI SHARAD PAWAR): Madam Speaker, I have been carefully listening to the discussions in the House on rise in the prices of essential commodities. At the outset, I would like to share the concern of all the hon. Members who have expressed over the escalation of food prices which we have witnessed in the last few months.

          This is a serious issue which impacts the livelihood of many, particularly masses, and has been engaging the attention of the Government also. जो कुछ कदम उठाने की आवश्यकता है, उन्हें उठाने की कोशिश इस सरकार की ओर से हमेशा होती रही है। इससे पहले जो डिसकशन हुए, उनसे जो सूचना आई, उन्हें स्वीकार करने का प्रयास हमेशा सरकार ने किया, फिर चाहे एसैंश्यल कमोडिटीज में सुधार कर के, राज्यों को ज्यादा अधिकार देने की बात हो या फूडग्रेन्स की एलोकेशन करने का सवाल है, ...( व्यवधान) फूड ग्रेन्स के स्टॉक की जो अच्छी पोजीशन है और बफर स्टॉक के नॉर्म्स को मद्देनजर रखते हुए, सरकार के गोदामों में जो ज्यादा माल है, उसे हर राज्य को देने के लिए, अलग-अलग किस्म के निर्णय भारत सरकार के माध्यम से लेने की भी कोशिश की गई।   

          महोदया, एक सुझाव आया था कि प्रधान मंत्री महोदय को प्राइस राइस के इश्यू पर देश के सारे मुख्य मंत्रियों की एक मीटिंग बुलानी चाहिए और उसमें राज्य सरकार के जो कुछ सुझाव हों, उन्हें जहां तक स्वीकार कर सकते हैं, उन्हें स्वीकार करना चाहिए। इस सुझाव पर प्रधान मंत्री जी ने देश के सभी मुख्य मंत्रियों की बैठक बुलाई और पूरे दिन, देश के हर मुख्य मंत्री ने अपने विचार और अपने अनुभव मीटिंग में रखे और आगे की जो स्ट्रैटैजी तय करनी है, उसे तय करने के लिए कुछ राज्यों के मुख्य मंत्री और सेंट्रल गवर्नमेंट के मिनिस्टर्स को मिलाकर एक समिति गठित कर के, इसके टर्म्स ऑफ रैफरेंस भी तय किए गए हैं।

          शायद आप इसको स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होंगे, जो भाषण सुनने के बाद मेरा कहने का मन हो रहा है, जिसका जिक्र बसुदेव आचार्य जी ने किया, प्रधानमंत्री जी के बयान के बारे में कुछ कहा, उन्होंने मुख्यमंत्रियों की बैठक में कहा था कि the worst time is over and the situation will improve.  प्रतिपक्ष की नेता ने मार्केट के कुछ आंकड़े सदन के सामने रखे। मुझे देखना होगा, मैं उनकी तरफ से वे आंकड़े लूंगा, सोर्स भी लूंगा और ज्यादा जानकारी लेने की कोशिश जरूर करूंगा।  मेरे पास हर दिन देश की सभी मार्केट्स की फीगर्स आती हैं।  इस समय कई दिनों से, कई हफ्ते से एक ट्रेंड देख रहा हूं कि कई आवश्यक चीजों के दामों पर असर हो रहा है।  दाम कम होने की प्रक्रिया शुरू हुयी है। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : कृपया उनकी बात सुनिए।

…( व्यवधान)

श्री शरद पवार : मेरे हाथ में 24 फरवरी का दिल्ली का फाइनैंशियल एक्सप्रेस है। The Financial Express of 24th February says : “Prospects of better rabi yield soften pulses and vegetable prices.” उन्होंने कालम करके हर ...( व्यवधान)

श्री अनंत गंगाराम गीते (रायगढ़): यह न्यूज पेपर को कोट कर रहे हैं।  ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

THE MINISTER OF PARLIAMENTARY AFFAIRS AND MINISTER OF WATER RESOURCES (SHRI PAWAN KUMAR BANSAL): Madam, how can they disturb the hon. Minister like this? … (Interruptions)

अध्यक्ष महोदया : मुलायम सिंह जी, आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्री शरद पवार : मैं यह जानता हूं कि क्राइसिस कम होने की जो प्रक्रिया चली है, यह न्यूज आपके लिए कड़वी है। यह मैं जानता हूं।  ...( व्यवधान) मैं सरकारी इन्फार्मेशन देने के लिए भी तैयार हूं, अखबार की भी देने के लिए तैयार हूं।  ...( व्यवधान) अमर उजाला का दिल्ली का ईश्यू 24 फरवरी, बुधवार - देश में सस्ती होने लगी दालें।  इस पोर्शन पर उन्होंने डिटेल रिपोर्ट दी है।   

The Hindustan Times, Delhi of 24th February says : “Delhi Government’s intervention brings down Dal prices and other commodities’ prices.” The Financial Express says : “Prices of the vegetables, pulses and other items are on the decline.” The Business Line of 21st February says : “Cheaper cereals and vegetables signal easing of inflation.  ये सब रिपोर्ट आजकल अखबार में आ रही हैं, मैं वहां तक नहीं जा रहा। ...( व्यवधान)

श्री मुलायम सिंह यादव (मैनपुरी):आंकड़े सुनकर हम परेशान हैं।  इससे कोई समाधान नहीं होगा।  ...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER : Nothing will go on record.

 (Interruptions) … * 18.15 hrs. Shri Mulayam Singh Yadav, Shri Lalu Prasad and some other Hon. Members then left the House.

 

18.15 ¼ hrs. At this stage, Shri Basu Deb Acharia, Shri Nama Nageswara Rao and some other hon. Members left the House … (Interruptions)

श्री पवन कुमार बंसल :  मैडम, इन्होंने दो दिन हाउस नहीं चलने दिया और कहते रहे कि इस पर चर्चा चाहते हैं।  आज चर्चा होने लगी तो ये हालात हैं।  उनकी बात नहीं सुनना चाहते हैं।...( व्यवधान) 

SHRI SHARAD PAWAR: The Government of India has got a special cell under the Ministry of Consumer Affairs which collects daily figures of many items, at least 17 items, and which reports to the concerned Ministry.

          One point raised here by the hon. Leader of the Opposition is that price of rice has gone somewhat near to Rs. 32 per kilogram. On 24.11.09 – this is Delhi market retail price that I am giving – the price of rice was Rs. 23 per kilogram. One month back, it was Rs. 23. One week back, it was Rs. 23. Yesterday also, it was Rs. 23. What I am trying to say is that prices had stabilised at Rs. 23 and not Rs. 32. … (Interruptions) I will definitely come back. … (Interruptions)

श्रीमती सुषमा स्वराज : मैंने 32 नहीं कहा, 25 कहा था। आपने मेरे आंकड़े का सोर्स जानना चाहा है। मेरा सोर्स मेरे स्वयं का राशन का बिल है, मेरा सोर्स मेरे स्वयं का सब्जियों का बिल है। क्योंकि बिल में छोटा-छोटा लिखा हुआ था, इसलिए मैं टाइप करवाकर लाई थी। यह परसों के आंकड़े हैं। … (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Please maintain order.

… (Interruptions)

SHRI SHARAD PAWAR:  Now, the hon. Leader of the Opposition had given one particular figure for atta. My information about atta is this. Three months back, the price of atta was Rs. 17 per kilogram. One month back, it was Rs. 17.5. One week back, it was Rs. 17. Yesterday also, it was Rs. 17.

          Now, I come to gram dal. Three months back, its price was Rs. 40 per kilogram. One month back, it was Rs. 39. One week back, it was at Rs. 37. Yesterday, it was Rs. 36.

          Then, tur dal’s price three months back was Rs. 91 per kilogram. One month back, it was Rs. 87. One week back, it was Rs. 76. Yesterday, it was Rs. 73.5.

          The price of urad dal three months back was Rs. 77 per kilogram. One month back, it was Rs. 74. One week back, it was Rs. 68. Yesterday, it was Rs. 67. So, the price of urad dal has come down from Rs. 77 to Rs. 67. Similarly, the price of masur dal has come down from Rs. 69 to Rs. 59.

         For sugar, I can give market figures of yesterday. In Delhi, it was Rs. 41. Those who know about the sugar, sugar industry and sugarcane, they know the details also. There are also some of the hon. Members who are sitting on the Opposition side, who are very knowledgeable. They are also running sugar mills and they also know all these details, and they will accept one thing that the trend is that sugar prices are also going down. Yesterday, in major States of UP and Maharashtra, and particularly Maharashtra, the S-30 sugar has been sold at Rs. 3,140 a quintal which was Rs. 4,600 one month back. So, this clearly indicates that sugar prices are also going down.

श्रीमती रमा देवी (शिवहर):   वह पहले क्यों महंगी हुई? ...( व्यवधान)

श्री शरद पवार :   मैं उस पर आता हूं। मैं वहां तक जरूर आऊंगा। आलू की बात यहां बहुत कही गयी। आज आलू की स्थिति ऐसी है कि the price of potato three-months back was Rs. 19; its price one-month back was Rs. 10; and its price one-week back was Rs. 9. Today, its price in Uttar Pradesh is Rs. 4.50, and in West Bengal it is Rs. 2. … (Interruptions) In fact, I met a delegation under the leadership of Shri Basu Deb Acharia कि वैस्ट बंगाल मे जिस तरह से आलू के दाम गिर रहे हैं, उसे देखते हुए वहां के किसानों को बचाने के लिए भारत सरकार को आलू परचेज करने के लिए हमारे साथ सहयोग देने की आवश्यकता है।  आज हमारी मीटिंग होने वाली थी, लेकिन वह हो नहीं सकी। कल या परसों वह मीटिंग हो जायेगी। मैं भारत सरकार की तरफ से अपने सब लैफ्ट साथियों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि वहां जो आलू की कीमत कम हो रही है, उसमें भारत सरकार की तरफ से किसानों को बचाने के लिए जो मदद चाहिए, उसे हम पूरी तरह से देंगे। हम इस रास्ते पर जाने के लिए तैयार हैं। ...( व्यवधान) यही सिचुएशन ओनियन की है। ...( व्यवधान)

श्री हरिन पाठक (अहमदाबाद पूर्व):    मुझे समझ में नहीं आता ...( व्यवधान)   

श्री शरद पवार : कीमत तो कम हो गयी। ...( व्यवधान)   

अध्यक्ष महोदया : हरिन पाठक जी, आप बैठ जाइये। आप मंत्री जी को बोलने दीजिए।   

…( व्यवधान)   

SHRI SHARAD PAWAR : So, I have collected all the prices from all the States, but I do not want to go into the details about this.

          I had said that it is correct that the situation was quite serious as it had affected masses and affected many people in this country. The Government was also equally worried and equally serious, and many actions were taken by the Government. Firstly, our total long-term effort was to see how we can improve the agriculture production and productivity, and I will go into the details about what exact action has been taken, but immediate actions were needed in this. What have we done in this? Firstly, it was our responsibility -- when there was a mismatch between demand and supply -- to see that how we will be able to improve availability. Policy-decisions were taken to encourage imports and simultaneously discourage exports for the sake of improving availability.

          The hon. Leader of Opposition has given some information about simultaneous import and export. I will come back and give details about that also. … (Interruptions) In certain cases, subsidy has been given to the Public Sector units to import and distribute some of the commodities through the PDS. My senior colleague, Shri Pranab Mukherjee, the Finance Minister has given details about what subsidy we are providing today for edible oil; what subsidy we are providing today for pulses; what is available in the PDS; and how it is comparatively cheaper than all others. Hence, I will not take the time of the House to mention these.

          The Government of India has given considerable support to the Public Distribution System to ensure that the vulnerable sections of the country are protected, and one of the most important things is that since the year 2002 till today the issue price of wheat and rice has not been changed for AAY, BPL and APL. We have provided substantial rise to the farming community, but these prices have not been changed till today.

          My colleague, the Finance Minister, has given some details about this year’s overall situation.

This year, the hon. Members will recollect, in the last Session, we had discussed at length the issue about the situation arising out of poor monsoon and its impact on the production and productivity. It was reported that it was one of the worst droughts that we had seen after 1972. Some of the States had taken immediate action. The State Governments declared a total of 333 districts as under drought. These States are Assam, Himachal Pradesh, Jharkhand, Manipur, Nagaland, UP, Bihar, Karnataka, Madhya Pradesh, Maharashtra, Rajasthan, Orissa, Jammu and Kashmir and Andhra Pradesh. These State Governments had declared that all these districts were affected because of the poor monsoon.

The States of Maharashtra and Karnataka have faced another calamity. Initially, there was a serious situation because of drought. It had affected the sowing operation of paddy, it had affected the sowing operation of oilseeds, and it had affected the sowing operation of pulses. However, in Maharashtra and Karnataka, there were sudden rains also. The rains were such that they had affected the entire agriculture, many houses were affected in Shri Geete’s area, and we have witnessed a similar situation in Karnataka because of floods. We have seen a similar situation in one part of Andhra Pradesh too.

          Irrespective of this, initially, our report was that we were definitely going to lose a substantial quantity of paddy crop. In Kharif, the major crop is paddy. Punjab and Haryana, these two State Governments have taken special precautions. They tried their level best to save the paddy crop. They bought electricity from other States. They have paid more money for that. The Government of Bihar had introduced a scheme to provide subsidized diesel to save paddy crop. All these Governments have taken proactive actions and because of their efforts, they have succeeded in saving the paddy crop. It is because of their effort, as on today, the initial expectation was that there would be a gap of at least 16 million tonnes in case of paddy, but that has been brought down to nine million tonnes. I would like to congratulate the Governments of Bihar, Punjab and Haryana who have taken these initiatives.

          अभी डाक्टर साहब ने एक बात कही। मैं पंजाबी कम समझता हूं, लेकिन मैंने समझने की कोशिश की जिसमें शायद आपने यह कहने का प्रयास किया कि हमने ज्यादा पैसे लेकर बिजली खरीदी, अपनी फसल को बचाया, हम प्रधानमंत्री से मिले, मुझसे मिले, फाइनेंस मिनिस्टर से मगर एक पैसा भी हमें नहीं मिला। शायद यह शिकायत आपने की। आपकी शिकायत सच है। आप जरूर मिले थे प्रधानमंत्री जी से, आप मुझसे भी मिले थे, वित्त मंत्री जी से मिले थे, लेकिन जिस तरीके से बादल साहब के नेतृत्व में वहां की सरकार ने काम किया इस बारे में, उसकी हम सराहना करते हैं और यहां तक सीमित नहीं रहेंगे। प्रधानमंत्री जी ने इस बारे में कुछ सोचा है, उचित समय पर पंजाब और हरियाणा को मदद दी जाएगी। मुझे विश्वास है कि यह बात उचित समय पर सदन के सामने आएगी।

श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन (भागलपुर):बिहार में डीजल पर सब्सिडी दी गयी।

श्री शरद पवार: बिहार में तो हमने 50 प्रतिशत सब्सिडी, 1000 करोड़ रूपए बिना मांगे ही एनाउंस की थी।

          इनके यहां से एक बार आया। हमने बिना मांग ही दिया था, नीतीश जी ने मांगा नहीं था, लेकिन उन्होंने इनीशिएटिव लिया, उन्होंने रास्ता दिखाया इसलिए भारत सरकार ने यह कदम उठाने का काम किया। मैं बिहार सरकार को भी धन्यवाद देना चाहता हूं।...( व्यवधान)

डॉ. शफ़ीकुर्रहमान बर्क (सम्भल): उत्तर प्रदेश के बारे में भी बता दें।

श्री शरद पवार: जहां यह कोशिश की गई, वहां यह किया गया।

श्री दारा सिंह चौहान (घोसी): जब मांगने पर आप नहीं दे रहे हैं तो बिना मांगे कहां देंगे...( व्यवधान)

श्रीमती रमा देवी (शिवहर): बिहार में कुछ दे दें तो स्थिति सुधर जाए।

अध्यक्ष महोदया: दारा सिंह जी, रमा देवी जी आप बैठ जाएं।

श्री शरद पवार: बिहार ने मांगा नहीं है, यह मैंने पहले भी कहा है, उन्होंने शुरुआत करने के बाद भारत सरकार ने इनीशिएटिव लेते हुए उसको रिस्पाँस्ड किया था।  उस समय जो कुछ कदम उठाने की आवश्यकता थी, उस समय प्रयास किए गए। यह समस्या सामने आ रही है कि ये कीमतें इस तरह से ऊपर क्यों जा रही हैं। मैं एक बात सदन के सामने रखना चाहता हूं। यूपीए की हुकूमत आने से पहले यूपीए की उस समय की सरकार ने जो अपना कार्यक्रम देश के सामने रखा था, उसमें एक बात साफ थी देशवासियों के सामने कि हमारी सरकार किसानों को उचित कीमत देने के लिए हमेशा कोशिश करेगी। किसानों का नुकसान नहीं होगा, इस बारे में हमारा हमेशा ध्यान रहेगा। Basically, it was the thinking of this Government or the objective of the Government to raise the income level of the farmers and improving terms of trade for the agriculture. यह सोच-समझकर कदम उटाने की तैयारी भारत सरकार ने की थी। इसका रिफलेक्शन महंगाई पर कुछ न कुछ होगा, यही सोचकर हमने यह कदम उठाया था। पहली बात यह है कि इस देश में खेती करने वालों की संख्या आज 12 करोड़ परिवार है। एक परिवार में पांच सदस्य हों तो इस देश की कुल आबादी में से 60 करोड़ लोग खेती के व्यवसाय में हैं। इसमें मैंने लैंडलैस लेबर को काउंट नहीं किया है, जबकि उनका सम्बन्ध भी खेती से होता है। By and large, about 62 per cent of the population of this country depends on agriculture. It was a conscious decision that was taken by this Government. Unless and until we improve the overall condition of the sizeable sections of the society, we will not be able to improve the country and country’s economy. We may take many decisions to improve the industry. We may encourage trade that is very much required. But unless and until 60 per cent population or 58 per cent population whose purchasing power is going to be weak and if they are going to disassociate from all these developments, I think, this country or this society has no prospect and future. So, it was deliberately decided that we have to improve the purchasing power of this particular section. कई सालों तक उन्हें जो कीमत दे रहे थे, वह कीमत तय करने की जो प्रक्रिया था, उसमें हमेशा इस ज्यादा ध्यान दिया गया था कि इसका असर मार्केट पर होगा। यह भी आवश्यक है, क्योंकि हम मार्केट को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते। हम आम जनता के इंटरेस्ट को नजरअंदाज नहीं कर सकते।

          मगर यहां तक जाने की आवश्यकता हमें नहीं लगती है कि जिसमें पैदावार करने वाला जो वर्ग है वह खुद संकट में जाए, लेकिन वह संकट में जा रहा था। ...( व्यवधान) तीन महीने पहले मैं पंजाब के एक गांव में गया था। वहां एक बुजुर्ग से जिसकी उम्र लगभग 92 के आस-पास थी,  मेरी मुलाकात हुई। उसने मुझसे कहा कि आप हमारी तरफ से माननीय मनमोहन सिंह जी से जाकर कहिये कि पहली बार हमें गेहूं की कीमत इस तरह से मिल रही है। एक क्विंटल पर 1100 रुपये आज तक हमें नहीं मिले हैं, यूपीए सरकार ने हमें यह कीमत दे दी है। ...( व्यवधान) उन्होंने मुझे कहा...( व्यवधान) जिस तरह से मिनिमम स्पोर्ट प्राइस के बारे में कुछ कदम उठाए गये हैं, आपको खुशी हो या न हो लेकिन इस देश के आम किसानों में उससे खुशी है। ...( व्यवधान) इस 92 साल के किसान ने मुझे एक बात कही थी कि भाई साहब, मैं आपसे कहना चाहता हूं कि मेरी लड़की की शादी जब 62 साल पहले हुई थी तब 10 ग्राम सोना खरीदने के लिए मुझे 5 बोरी गेहूं बेचना पड़ा यानी पांच क्विंटल गेहूं बेचने के बाद मुझे 10 ग्राम सोना मिला। आज मुझे 10 ग्राम सोना खरीदने के लिए 15-16 बोरियां गेहूं की बेचनी पड़ती हैं। इससे यह बात साफ होती है कि किसानों को ज्यादा कीमत देने की आवश्यकता थी। बाकी सभी चीजों के दाम ऊपर जा रहे थे और किसानों की पैदावार की कीमत और बाकी चीजों की कीमत में अंतर बहुत था। इस अंतर को दूर करने के प्रयास यूपीए सरकार ने माननीय मनमोहन सिंह जी के नेतृत्व में किया। ...( व्यवधान)

श्री अनंत गंगाराम गीते (रायगढ़): पिछले पांच सालों में किसानों ने सबसे ज्यादा आत्म-हत्याएं की हैं।

श्री शरद पवार:  वह भी मैं आपको बताता हूं। To boost production, the minimum support price of wheat has been increased from Rs.640 per quintal to Rs.1100. The minimum support price of paddy common variety has been increased from Rs.560 to Rs.1000. Despite a huge cost to the Government, the MSP of wheat has been enhanced by 72 per cent and of paddy by 79 per cent. This is not restricted to wheat and rice only. The same approach has been taken on pulses, on oilseeds, on cotton. An hon. Member asked as to what happened in Vidarbha. 

          For the first time, Vidarba farmers have got between Rs.2,500 and Rs.3,000 per quintal for their cotton, which they never got for a number of year. I have seen on many occasions there was agitation from the Vidarba farmers कि हमें 700 रुपए कीमत मिलनी चाहिए, 1200 रुपए कीमत मिलनी चाहिए, 1500 रुपए कीमत मिलनी चाहिए या 2000 रुपए कीमत मिलनी चाहिए। सरकार ने बिना मांगे 2500 से 3000 रुपए तक कीमत देने का काम किया है।  इतनी खरीद विदर्भ में आज तक नहीं हुई है। मैं आपको इस बात की एक ही मिसाल देना चाहता हूं कि ग्रामीण बैंक की डिपोजिट्स के आंकड़े विदर्भ के यवतमाल जिले, जहां सबसे ज्यादा आत्महत्याएं हुई थीं, वहां से कलेक्ट कीजिए, तो यह बात साफ हो जाएगी कि इस साल किसानों ने बैंकों में जितनी रकम जमा कराई है, उतनी पहले कभी जमा नहीं कराई गई है। इससे बात साफ होती है कि उन्हें सही कीमत मिली है।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Nothing will go on record.

(Interruptions) … * SHRI SHARAD PAWAR: The real problem is, unfortunately some of the State Governments are not taking initiatives to execute these schemes.  Ultimately, these schemes have to be implemented by the State Governments. The Government of India, Cotton Corporation of India is ready to provide whatever money is required, even advance money was also provided, but those State governments have not taken any initiatives.  Unfortunately, the farming community and cotton growers from that area has been affected. … (Interruptions) सरकार ने व्हीट, पैडी, ज्वार, बाजरा, मक्का, आयल सीड्स और सभी प्रकार की दालें तथा कॉटन, सभी की कीमत इस प्रकार से बढ़ाई कि इसका परिणाम देश में उत्पादन में वृद्धि के रूप में दिखाई देने वाला है। कई जगह इसकी प्रक्रिया शुरू हुई है। जैसा मैंने शुरू में कहा कि समाज के गरीब वर्ग के हितों की रक्षा करना भी सरकार की जिम्मेदारी होती है। इसी जिम्मेदारी को सामने रख कर पीडीएस द्वारा, जैसा मैंने कहा एएवाई, बीपीएल और एपीएल तीनों केटिगिरी में कोई बदलाव नहीं किया, इश्यु प्राइज़ वही रखा है। इसका असर टोटल सब्सीडी में, when I took over this responsibility about six years ago, the total burden of the subsidy was Rs.19,000 crore but this year, I think, we would cross Rs.72,00 crore.  That type of burden has been consciously taken by the Government just protect the interests of   these weaker sections.

          सरकार की नीति साफ है उत्पादन करने वाले लोगों को एक तरह से जस्टिस देना, उन्हें ठीक कीमत देना, किसानों की स्थिति में बदलाव लाना, गांव में रहने वाले लोगों की प्रचेजिंग पावर बढ़ाना और इसके साथ-साथ उपभोक्ता तथा उपभोक्ता में भी जो गरीब वर्ग है, इन लोगों के लिए फाइनेंशियल बर्डन भारत सरकार ने अपने ऊपर ले कर सब्सीडी दे कर उचित कीमत पर चीजें देने का प्रयास किया है। इस बारे में हम पिछले कई महीनों से अमल कर रहे हैं।

          यहां सवाल उठाया गया कि एलोकेशन में फर्क किया गया है। मैं एक बात सदन के सामने साफ रखना चाहता हूं कि whatever allocation has been given to the AAY, BPL and APL it has not been reduced at all. It is true that the APL variety category, certain quantity was reduced in the last two years and there was a reason because most of the States have not lifted. The Government of India has allotted food grains to all the States, but in the APL category, the lifting was less than 30 per cent. 

  In some States it was less than 20 per cent.

SHRI B. MAHTAB (CUTTACK): At that time the market rate was less.

SHRI SHARAD PAWAR: Anyway, but that was not lifted.  It was not lifted for two to three years. तीन साल तक लगातार उठाने के बाद जब देखा कि लोगों का सपोर्ट नहीं है, सरकार का सपोर्ट नहीं है तब हमने कोटा कम किया और कुछ नहीं किया लेकिन हमने बाकी कहीं भी एलोकेशन में कमी नहीं की। इस साल एक स्थिति में बदलाव आ गया, कीमतें ऊपर जाने लगी, हमारे पास स्टॉक की पोजीशन अच्छी थी और आज भी अच्छी है। ऐसे स्टॉक में मार्किट में अवेलेबिलिटी बनाने की आवश्यकता है। अवेलेबिलिटी बनाने के लिए एवाई कैटेगिरी और बीपीएल को 35 किलो गेहूं और चावल देते हैं हमने उसे कन्टीन्यू किया। इसके साथ एपीएल कैटेगिरी को दस किलो तक अनाज देते थे, हमने इसमें कुछ बदलाव किया। बदलाव ऐसे किया कि एन्टायर नार्थ-ईस्टर्न स्टेट्स, हिली स्टेट्स, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप में एपीएल कैटेगिरी को 35 किलो देने का काम किया। हमने इस पर अमल किया।...( व्यवधान)

श्री विष्णु पद राय (अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह): ऐसा नहीं हुआ।...( व्यवधान)

श्री शरद पवार: आपको कुछ नहीं मिलता है। आप बैठ जाइए। कल जब रेलवे मिनिस्टर बोल रही थी तब आप चैन्नई से अंडमान ट्रेन की डिमांड कर रहे थे। मैं देख रहा था। अब इसमें कहां तक ध्यान देंगे यह आपका अपना मन है। ...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: Please take your seat.

… (Interruptions)

श्री विष्णु पद राय : आप गलत कह रहे हैं। अंडमान में आपकी ही सरकार थी। ...( व्यवधान) सर्वे हुआ था।...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: You please address the Chair.

SHRI SHARAD PAWAR: I am not yielding.… (Interruptions) इन सभी राज्यों को 35 किलो अनाज देने का काम किया गया।इसके साथ सभी राज्यों को 20 लाख टन ज्यादा गेहूं और चावल अलॉट किया। हमने इसकी कीमत सिर्फ एमएसपी रखी। एमएसपी की कीमत का मतलब क्या है? आज हम किसानों से जो माल खरीदते हैं, किसानों को जो पैसे देते हैं वही पैसे चार्ज किए जबकि वहां तक हमारी कीमत सीमित नहीं रहती है। इसकी डिटेल फाइनेंस मिनिस्टर साहब ने अपनी स्पीच में दे दी है। जब हम एक क्विंटल पैडी खरीदते हैं तो धान किसानों को 1000 रुपए कीमत देते हैं। जैसे पंजाब ने खरीदी तो हमें पंजाब सरकार को 12 परसेंट टैक्स, 120 रुपए ज्यादा देने पड़ते हैं। 50 रुपए गनी बैग के देने पड़ते हैं, लोडिंग और अनलोडिंग के पैसे देने पड़ते हैं और बाद में ट्रंसपोर्ट के पैसे देने पड़ते हैं। इस तरह इसकी कीमत मिलाकर 1600 रुपए के आसपास पड़ती है। हम 1600 रुपए एक क्विंटल धान खरीदता हैं तो इससे हमें 62 किलो चावल मिलता है। इस चावल की कीमत 20 से 21 रुपए आगे होती है। इतनी ज्यादा कीमत होने के बाद, हम आम जनता को आज भी, जैसा कि मैंने शुरू में कहा कि 2002 के रेट से ही देते हैं। भारत सरकार इतनी बड़ी जिम्मेदारी अपने सिर पर ले रही है। हमने ज्यादा माल ले लिया, हम सिर्फ किसानों को 1100 रुपए क्विंटल गेहूं और 1000 रुपए पैडी के देते हैं। हम जब किसानों को 1100 रुपए देते हैं, हम जो एडीशनल कोटा स्टेट गवर्नमेंट को दे देते हैं वह 1100 रुपए में ही देते हैं यानी हमने इसमें गनी चार्जिस चार्ज नहीं किए। पंजाब और हरियाणा सरकार से जो टैक्स दिए हैं, वे चार्ज नहीं किए। लोडिंग-अनलोडिंग चार्जिस नहीं लिए और इसके अलावा वहां का जो लोकल कमीशन होता है, वह भी इस पर चार्ज नहीं किया। आज प्रतिपक्ष के नेता भी कहा कि आपने किसानों को एक कीमत दी जबकि बाजार की कीमत दूसरी है।

          इसके बारे में भी मुझे उनके पास से अधिक इंफॉर्मेशन लेनी पड़ेगी, क्योंकि मेरे पास अन्य राज्य सरकारों की तरफ से अलग लिखा गया है। ...( व्यवधान) मैं एक बात बताना चाहता हूं कि यह ज्यादा एलोकेशन किसलिए है, ज्यादा एलोकेशन महंगाई की समस्या से आम जनता को छुटकाना दिलाने के लिए है और जब हमने ज्यादा एलोकेशन एम.एस.पी. प्राइस पर दे दिया।

          Day before yesterday, the 22nd February, 2010, I have received a letter from the Chief Minister of Bihar.  He has written:

“Although we have been allocated some quantity of wheat and rice for lifting under the OMSS, the prospect for their lifting under this Scheme do not seem very bright when an ineffective price gap between the market price and price under this Scheme is there.”   यानी हमने मिनिमम सपोर्ट प्राइस की कीमत चार्ज करके जो माल राज्य सरकार को दिया, नीतीश जी का यह कहना है कि यह माल हमारे लोग उठायेंगे, इस पर मुझे विश्वास नहीं हैं, क्योंकि हमारे मार्केट के दाम इससे नीचे हैं, इससे भी कम हैं। यानी मार्केट प्राइसेज एमएसपी प्राइसेज से कम हैं। यहां जो लीडर ऑफ दि अपोजीशन ने कहा था कि आप किसानों को एक कीमत देते हैं और बाकी कीमत आम जनता को क्या है, इसका फर्क मैं बताने के लिए...( व्यवधान) मैं दूसरा एक फर्क बताता हूं। श्री हरिन पाठक (अहमदाबाद पूर्व): कंज्यूमर प्राइस के बारे में क्या है?...( व्यवधान)
SHRI SHARAD PAWAR: This letter I got yesterday from Shri Ram Prasad Chaudhary, मंत्री, खाद्य एवं रसद, उत्तर प्रदेश। भारत सरकार द्वारा गेहूं का मूल्य 1140 रुपये एवं चावल का मूल्य 1507 निर्धारित किया गया है। उक्त निर्धारित मूल्य में हैंडलिंग एवं वेज सम्मिलित करने के पश्चात गेहूं या चावल की बिक्री बाजार में होना संभव नहीं है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में इससे कम मूल्य पर बाजार में चावल और गेहूं उपलब्ध है।...( व्यवधान) What these State Governments are communicating to me. ...( व्यवधान) यस सपोर्ट प्राइस, राज्य सरकार को हमने अलॉट करने के पश्चात राज्य सरकार उठाने के लिए तैयार नहीं है और राज्य सरकार मुझे लिख रही हैं कि मार्केट में इससे कम दाम पर माल उपलब्ध है और इसलिए एम.एस.पी. की कीमत पर हम माल नहीं उठा सकते। यहां जो बतलाया गया कि किसानों को एक कीमत देते हैं और बाजार में इससे दोगुनी, तिगुनी कीमत है, इसमें कहां तक सच्चाई है, यह हमें देखना होगा, क्योंकि यह राज्य ारकार इसे एक तरह से अलग करना चाहती है।...( व्यवधान) एक बात बताई गई है ...( व्यवधान) श्रीमती सुषमा स्वराज :आपने यह कहा कि मैंने यह बोला कि समर्थन मूल्य और रिटेल में बहुत ज्यादा अंतर है और वे आंकड़े मैंने दिये। आप बता रहे हैं कि इस बार आपने गेहूं का समर्थन मूल्य 10.80 दिया। यही है न समर्थन मूल्य? श्री शरद पवार : 11 रुपये।
श्रीमती सुषमा स्वराज :मैंने आपसे कहा कि बाजार में आटा 20 रुपये मिल रहा है। आप गैप देख लीजिए। चावल आपने 11 रुपये दिया और 25 रुपये किलो मिल रहा है। आपने स्वयं कहा कि 23 रुपये, आपने स्वयं बताया कि यह 23 रुपये है, मैंने 32 नहीं बोला, मैंने 25 बोला था। जिस दुकान से मैं अपना राशन मंगाती हूं, वहां का अपना राशन का बिल मैं टाइप करके लाई हूं। जो मैं हर महीने खर्च कर रही हूं। आम गृहिणी को...( व्यवधान) संसदीय कार्य मंत्री और जल संसाधन मंत्री (श्री पवन कुमार बंसल):  मैडम, आप कहना चाह रही हैं कि आम आदमी पर असर क्या हो रहा है। आप कह रही हैं...( व्यवधान) श्रीमती सुषमा स्वराज :वह मेरे आंकड़ों को कंफ्रंट कर रहे हैं।  
                                                  ...( व्यवधान)
श्री पवन कुमार बंसल : उनकी बात का आप खंडन कीजिये।
श्रीमती सुषमा स्वराज :वह मेरे आंकड़ों को  कंसैंट दे रहे हैं।
श्री पवन कुमार बंसल : आप उन जगहों पर जाते हैं जहां बड़ी मार्किट हैं।
श्रीमती सुषमा स्वराज : मैं केन्द्रीय भंडार जाती हूं।...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया :  आप लोग बैठ जाइये। लीडर ऑफ दी अपोज़ीशन बोल रही हैं।
…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया :  जगदम्बिकापाल जी, आप बैठ जायें।
…( व्यवधान)
श्रीमती सुषमा स्वराज : कृषि मंत्री जी  ने मेरे आंकड़ों को कंसैंट किया है। दो आंकड़े समर्थन मूल्य और रिटेल मूल्य...( व्यवधान) उन्होंने मेरा नाम लेकर कहा है कि नेता विपक्ष कह रही थी कि समर्थन मूल्य और बाजार भाव में अंतर है। तो मैं सच कह रही थी कि यह अंतर है। आप समर्थन मूल्य किसान को 11 रुपये प्रति किलो दे रहे हैं जबकि बाजार में यह 25 रुपये किलो मिल रहा है। आप इस बात को स्वीकार कर लीजिये। मैं खुद लेकर आयी हूं। आप मेरे साथ चलिये, मैं आपको दिखा देती हूं. इसलिये कि आपने किसानों को 11 रुपये किलो का भाव दिया है जबकि बाजार में 25 रुपये प्रति किलो भाव है। ये दोनों आंकड़े सच हैं।...( व्यवधान) अध्यक्ष महोदया :  ऑनरेबल मिनिस्टर कुछ कह रहे हैं. आप लोग बैठिये।
…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया :  हरिन पाठक जी, आप बैठिये।
श्री शरद पवार :  आपके आंकड़े सच हो सकते हैं। मुझे मालूम है कि आपका दुकान कौन सा है?...( व्यवधान)मुझे यह भी नहीं मालूम कि...( व्यवधान) अध्यक्ष महोदया :  गीते जी, आप क्यों खड़े हो गये हैं? आप बैठ जाइये।
…( व्यवधान)
श्रीमती सुषमा स्वराज : मैं खान मार्किट से नहीं लेती हूं, मैं केन्द्रीय भंडार से लाती हूं। श्री शरद पवार : मुझे मालूम नहीं। जैसा मैंने कहा कि हमारे चावल का रेट पर्टिकुलर वैरायटी का है। गेहूं का रेट कॉमन वैरायटी का है। लगता है कि आप अलग किस्म का चावल लाई होंगी? श्रीमती सुषमा स्वराज : मैं परमल लायी हूं।
श्री शरद पवार : मुझे मालूम नहीं कि ऐसा है।
मानव संसाधन विकास मंत्री (श्री कपिल सिब्बल):  सुषमा जी, लगता है कि आप आम आदमी का चावल नहीं खाती हैं। आप उत्तम किस्म का बासमती चावल खाती हैं। हम तो ब्राउन राईस खाते हैं।...( व्यवधान) अध्यक्ष महोदया :  मुंडे जी, आप बैठ जायें। रमा देवी जी, यह क्या हो रहा है? आप लोग क्या कर रहे हैं? आप बैठिये।                                                   …( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया :  शाहनवाज़ जी, यह आप क्या कर रहे हैं, आप बैठिये।
(Interruptions) … * MADAM SPEAKER : Nothing will go on record like this.
…( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया :  गीते जी, आप हर समय क्यो खड़े हो जाते हैं? आप बैठ जाइये। मत खड़े होइये।
श्री शरद पवार :  नेता, प्रतिपक्ष ने सदन के सामने एक ईश्यू और रखा कि सरकार ने ...( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदया :  गीते जी, आप अपना स्थान ग्रहण कीजिये।
श्री शरद पवार : सरकार ने आम आदमी के हितों की रक्षा करने के लिये बफर स्टॉक रखने की आवश्यकता समझी...( व्यवधान) अध्यक्ष महोदया :  आप सब क्यों खड़े हैं? आप सब क्या बोल रहे हैं? आप सब बैठिये।
श्री शरद पवार : उन्होंने कहा कि सरकार ने बफर स्टॉक मेनटेन नहीं किया, बफर स्टॉक मेनटेन करने की आवश्यकता थी, मैं उस से सहमत हूं।          

19.00 hrs.           आज तक चाहे एनडीए की हुकूमत हो या यूपीए की हुकूमत हो, बफर स्टॉक हमेशा दो ही आइटम के किये जाते हैं, एक गेहूं और दूसरा चावल। जहां तक गेहूं के बफर स्टॉक की स्थिति है, मैं इतना कहना चाहता हूं कि बफर स्टॉक के नॉर्म्स होते हैं, जिन्हें बफर नॉर्म्स कहते हैं। इस सरकार ने हुकूमत में आने के बाद इनमें और सुधार किया है। इसमें एक सुधार ऐसे किया कि बफर नॉर्म्स प्लस स्ट्रैटिजिक रिजर्व। स्ट्रैटिजिक रिजर्व से और धान, अनाज रखकर पोजीशन कम्फरटेबल करने के लिए इस सरकार ने कोशिश की। मैं जो आंकड़े दे रहा हूं, वे बफर स्टॉक के नॉर्म्स और स्ट्रैटिजिक, ये दोनों मिलकर आज हमारे पास स्टॉक की पोजीशन है। मैं यह आंकड़े की बात नहीं, मैं स्टॉक की बात बता रहा हूं।  1 जनवरी 2010 को स्ट्रैटिजिक नॉर्म्स और बफर नॉर्म्स मिलाकर सरकार को 82 लाख टन गेहूं की आवश्यकता थी। हमारे पास 230 लाख टन बफर स्टॉक है।...( व्यवधान) 1 जनवरी 2010 को बफर नॉर्म्स के मुताबिक 118 लाख टन राइस रखने की आवश्यकता थी, हमारे पास 242 लाख टन है।...( व्यवधान) इन दोनों से यह बात साबित होती है...( व्यवधान)

इसमें कई समस्याएं भी पैदा हुई हैं। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : मंत्री जी बता रहे हैं, आप सुनिए।

…( व्यवधान)

श्री शरद पवार :  जो बफर स्टॉक रखने की आवश्यकता है, वह बफर स्टॉक भारत सरकार ने रखा है। खाली रखा है, ऐसा नहीं है। भारत सरकार ने पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन की जो कैटेगरीज़ हैं, इन कैटेगरीज़ की जो डिमांड है, वह पूरी की। इसके साथ-साथ टू मिलियन टन ज्यादा ओपन मार्केट में बेचकर कीमत कम करने के लिए कोशिश की, वह माल बेचा। आटा तैयार करने वाले जितने फ्लोर मिल्स हैं, उन्हें 20 लाख टन एडिशनल एलॉट किया, बेच दिया। इसके साथ-साथ राज्य सरकार को एडिशनल कोटा 20 लाख टन का दिया, इससे मार्केट में एवलेबिल्टी बढ़ाने के लिए कोशिश की गयी है। मुझे इसकी शिकायत करनी पड़ती है कि कुछ ...( व्यवधान)

श्री गणेश सिंह (सतना):दाम क्यों नहीं घटे, यह तो बता दीजिए?...( व्यवधान)

श्री शरद पवार :  दाम घटे हैं। कुछ राज्य सरकारों ने यह एलोकेशन करने के बाद भी माल नहीं उठाया है। हम उन्हें एलर्ट कर सकते हैं।...( व्यवधान)

श्रीमती सुषमा स्वराज :महोदया, हमने यही बोला है कि दाम घटे हैं मगर कृषि मंत्री जी यह मानने को तैयार ही नहीं है कि महंगाई...( व्यवधान)

   19.03 hrs.   Shrimati Sushma Swaraj and some other hon. Member then left the House   अध्यक्ष महोदया : बैठिए, आप लोग तो बैठ जाइए। आप क्यों खड़े हो गये हैं?

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : जगदम्बिका पाल जी, आप क्यों खड़े हो गये हैं?

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप लोग यह क्या कर रहे हैं? आप ऐसा कैसे कर रहे हैं?

…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : इस तरह नारेबाजी मत कीजिए।

…( व्यवधान)

SHRI SHARAD PAWAR:  One more allegation has been made by the Leader of the Opposition.

 

          उन्होंने कहा कि इस देश में राइस की पोज़ीशन खराब होने के बावजूद नॉन-बासमती राइस भारत सरकार ने एक्सपोर्ट किया - यह बात सच नहीं है।  भारत सरकार ने 2008-09 और 2009-10 के दोनों सालों में राइस एक्सपोर्ट नहीं किया। राइस एक्सपोर्ट बैन किया है। सिर्फ 9 लाख 50 हज़ार टन पड़ोसी देशों को डिप्लोमैटिक ग्राउंड पर दिया है। It was done on the request of the Ministry of External Affairs. These countries are Sri Lanka, Bangladesh and Nepal.  They are our neighbouring countries.  There was a request at the Government level.  It was done on a Government to Government level.  It was not trade or any export.  Except that not a single grain was exported.  So, the allegation that has been made is not correct. 

          One more allegation was made here that this Government has exported wheat also. That information is also not correct. We have not exported wheat.  We are not encouraging export of wheat. For the time being we have practically stopped export of wheat, rice, pulses, all types of edible oils and sugar. 

          One more allegation has been made that we are exporting sugar.  That is not correct.  In that particular year, we have not exported sugar. केवल 1 लाख 30 हज़ार टन शुगर एक्सपोर्ट हुई थी पिछले साल,  वह पुराना कॉनट्रैक्ट था। इससे ज्यादा कोई दूसरा कॉनट्रैक्ट नहीं था। एक बात बार-बार कही गई कि 10 हज़ार टन चीनी भारत ने यूरोपियन कंट्रीज़ को देने के लिए कदम उठाए। यह बात मैं सदन को साफ करना चाहता हूँ। यूरोपियन कंट्रीज़ का अपने देश के लिए कुछ कोटा होता है। वह कोटा हमने जब पूरा नहीं किया तो जब सरप्लस होता है उस समय भी हमारा वहाँ भेजने का हक नहीं रहता है। इसलिए 10 हज़ार टन देने की ज़िम्मेदारी भारत के ऊपर थी। वह ज़िम्मेदारी पूरी करने के लिए कॉमर्स मिनिस्ट्री के माध्यम से इजाज़त दी गई। It was done on the condition that equivalent sugar has to be imported.  So, equivalent sugar will be imported and then only equivalent sugar from India will be exported to European countries.  So, there is no question of any effect or impact on our own stock position.  That is the position. यहाँ एक मसला आया कि आपने चीनी का बफर स्टाक क्यों नहीं किया। मुझे लगता है कि शायद उनको ज्यादा मालूम नहीं होगा। चीनी एक ऐसी आइटम है कि वह साल डेढ़ साल से ज्यादा स्टोर नहीं कर सकते। इसको आग लग सकती है, खराब हो जाती है। कभी किसी सरकार ने चीनी का बफर स्टाक नहीं रखा, एनडीए के ज़माने में भी नहीं रखा और आज भी नहीं रखा। यह बात सच है कि तीन-चार साल पहले देश में चीनी का उत्पादन बहुत बढ़ गया था। देश की ज़रूरत से दुगुनी चीनी देश में थी। चीनी का देश का मार्केट, दुनिया का मार्केट नीचे आया था। यहाँ चीनी मिलें किसानों की कीमतें देने की परिस्थिति में नहीं थीं। केन डय़ूज़ 4000 करोड़ रुपये से ऊपर गया था। ऐसी स्थिति में मदद करने की आवश्यकता थी। ऐसी स्थिति में जब तक हम स्टाक डिसमैंटल नहीं करते, एक्सपोर्ट को एनकरेज नहीं करते, तब तक हमारे सामने दूसरा कोई चारा नहीं था। इसलिए शुगर डैवलपमैंट फंड से फाइनैंशियल सपोर्ट करके एक्सपोर्ट इंसैन्टिव देकर चीनी यहाँ से बाहर एक्सपोर्ट की गई। जब दो साल के बाद हमें यह पता लगा कि ओवरआल शुगरकेन का प्रोडक्शन कम हो रहा है, हर राज्य सरकार की तरफ से हमारे पास जब फिगर्स आ गईं तो शुरू में उन्होंने कहा कि इस देश में हमारे राज्य में शुगरकेन के प्रोडक्शन पर कोई बुरा असर नहीं है, अच्छी तरह से पिराई हो जाएगी। मगर छः महीने के बाद उन्हीं राज्य सरकारों ने कहा कि हमारी जानकारी और और आज की स्थिति में फर्क है। हमारे यहाँ शुगरकेन प्लांटेशन कम हुआ है। जब यह इनफॉर्मेशन हमारे सामने आ गई तो हमने एक्सपोर्ट बंद किया।

          बाहर भेजना बंद किया और सौ लाख टन का स्टॉक रखकर, इस देश के लोगों की आवश्यकता पूरी करने की कोशिश की गई। इसी साल हमारा उत्पादन और कम हुआ था। मुझे लगता है कि इस साल 160 लाख टन के आसपास उत्पादन हो जाएगा। कैरीओवर हमारे पास 24 लाख टन है, 184 लाख टन की हमारी एवैलीबिलीटी होगी। हमारी जरूरत 230 लाख टन की है। बीच में जो गैप है, उसे भरने के लिए हमने इनसैन्टिव देकर, we have not put any taxes and we have allowed anybody to import.  They can import raw sugar and they can import fine sugar. Fortunately, the industry has already contracted substantial quantity. Some quantity has been reached to country and some quantity is on the way. I am confident that whatever the requirement of the country is, that gap will be fulfilled because of this import. But the prices at which the farmers were getting today, my observation is that the farming community are quite happy about it.  I recollect and the hon. Members will also recollect last year immediately after the elections when we met here, for the first two days, the House could not function because of the agitation from the sugarcane farmers. I think the hon. Members will recollect it.  There was a demand that we should provide such and such price to the farmers.  The Government conceded their demand. A new formula has been adopted and a new price has been announced.  Fortunately, in most of the places, the industry is also paying the same price.  As on today, the farmer in Uttar Pradesh is getting somewhat near to Rs. 250/- to Rs. 260/ per quintal price for sugarcane which he never got in the last 50 years.

Madam, I do not want to give more information.  I do not want to give the name of one district. In my home State in one of the districts, which produces sugarcane and I had been there for some reason, I visited three Assembly segments.  The Collector gave me the report in the three Assembly segments. It is essentially sugarcane producing districts. In the three Assembly segments in the last four months, 55,000 motor bikes have been purchased by the farmers.  I have also seen that the work of digging well was going on. They are buying new equipment.  A lot of them are constructing their houses. So, the rural India is really changing, particularly the sugarcane area is changing.  … (Interruptions)  I was saying that the cotton farmer has never seen Rs. 3,000/- in the last 40 or 50 years.  So, it is a conscious decision of the Government of India to provide better prices.

श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज):माननीय मंत्री जीउत्तर प्रदेश के किसानों को 250, 260, 280 मिल रहा है।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : जगदम्बिका पाल जी, आप उनको सुन लीजिए।

…( व्यवधान)

श्री जगदम्बिका पाल : यिल्ड कर दिया है तो हम एक मिनट कह लें। जिन किसानों को यह पैसा मिल रहा है और मिल मालिकों को आप दे रहे हैं, उन मिल मालिकों के खिलाफ उत्तर प्रदेश की सरकार ने मुकदमा कर दिया है, जिससे की कठिनाई है। मिल मालिक वहां से फरार हैं कि कहीं उनको जेल न भेज दिया जाए क्योंकि उन्होंने गन्ने के रिज़र्वेशन के आधार पर नहीं बल्कि उन्होंने ओपन किसानों से खरीदा है। यह बात मैं आपके संज्ञान में लाना चाहता हूं।

श्री शरद पवार : आपकी बात सही है। उनका डेलीगेशन हम लोगों से भी मिला था। मैंने उत्तर प्रदेश सरकार को इस बारे में लिखा है और मुझे विश्वास है कि इस पर कोई न कोई कदम उठाए गए हैं। लेकिन इसमें एक बात अच्छी है, मैंने आपके मुंह से इस बात को सुना कि 250 से ज्यादा कीमत आपके यहां भी मिल रही है। उत्तर प्रदेश के किसानों को यह कीमत आज तक कभी नहीं मिली थी, इस सरकार ने देने की कोशिश की है। इस सबका असर कीमतों पर कुछ न कुछ तो होगा। जब 250 रूपये प्रति क्वींटल यानी 2500 रूपये टन कैन की कीमत होती है तो चीनी की कीमत भी ऊपर जाएगी। लेकिन जो बहुत ऊपर चीनी की कीमत जा रही थी, इसमें कुछ न कुछ परिवर्तन हुआ है। मुझे विश्वास है कि चीनी की कीमत 835-36 के आसपास स्टैबल हो सकती है।

           अध्यक्ष महोदया, आज यह ट्रेंड यहां दिख रहा है और चीनी 50 रुपए किलो तक जाएगी, ऐसी स्थिति आज की नहीं है। इसलिए मैं इतना ही कहना चाहता हूं, जैसा मैंने शुरू में कहा कि सरकार की नीति है कि किसान को ठीक तरह से कीमत मिले, इस पर अमल करने का प्रयास किया गया है। सरकार की नीति है कि जो वलनरेबल सैक्शन है, उसे ठीक कीमत पर अनाज मिलना चाहिए। हमने आज तक अनाज की इश्यू प्राइस में बदलाव नहीं किया और पूरी जिम्मेदारी सरकार ने अपने ऊपर लेकर, राज्यों को जो अनाज दिया जा रहा है, वह वर्ष 2002 की कीमत पर आज भी दिया जा रहा है। इसलिए इन वर्गों की रक्षा करने के प्रयास भारत सरकार कर रही है। समाज के जो बाकी वर्ग हैं, जो ए.पी.एल. कैटेगरी है, उसे भी हम उत्पादन बढ़ाकर और अवेलेबिलिटी बढ़ाकर, जो महंगाई की समस्या उनके सामने आ रही है, उसे कम करने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे विश्वास है कि इस देश का जो किसान है, उसे उचित कीमत मिलने के बाद, वह और ज्यादा उत्पादन बढ़ाएगा और देश में जो कुछ कमियां हैं, डिमांड और सप्लाई में जो गैप है, उसे पूरी करने के लिए वह और मेहनत करेगा, क्योंकि सरकार की नीति किसान के पक्ष में है। इसलिए इस पूरी स्थिति में बदलाव आएगा। जैसा प्रधान मंत्री जी ने कहा कि: “The worst time is over.”  I am absolutely confident about that. The worst time is over. We are on the line of better days. I am sure, the situation will change. आम जनता, जो कुछ सहन कर रही है, उसमें बदलाव आएगा। इससे ज्यादा कहने की आवश्यकता नहीं है। इसलिए मैं इतना ही कहकर अपनी बात समाप्त करता हूं।

MADAM SPEAKER: Hon. Minister, thank you.

DR. K.S. RAO (ELURU):  Madam, I have a very important point to make.

MADAM SPEAKER: No. DR. K.S. RAO : Please allow me to put one question.

          Mr. Minister, with the support of the Government of India and with the encouragement from the Government of India, in Andhra Pradesh, the coastal districts are suitable in climate for raising the palm tree gardens. The farmers  have raised  palm tree gardens in one lakh hectares but the rate of palm oil has suddenly fallen from Rs.6300 per tonne to Rs.3400 per tonne thereby the entire farming community, who have raised the plant for fours years now – only after four years, it will come to the crop-bearing stage –is in difficulty. The farmers are in the condition of cutting all the palm trees. If the hon. Minister were to pass on the same subsidy which is given to importers of palm oil from Malaysia and other countries to these farmers, there will not be any need for import of edible oil from other countries, particularly palm oil, which is now running to the tune of 60 lakh tonnes. Will the hon. Minister promise in this House that he will pass on that subsidy which is being given to the traders to the farmers so that permanently this problem is solved?.… (Interruptions)

MADAM SPEAKER: Not so many questions are allowed. This is not a Question-Answer Session.

… (Interruptions)

SHRI P.T. THOMAS (IDUKKI):  The Government is trying to import palm oil. It will badly affect the coconut oil farmers in Kerala. So, I demand that it should not import palm oil to Kerala.… (Interruptions)

SHRI SHARAD PAWAR: The solution for this is there. In the Agriculture Ministry, there is a Scheme called the Market Intervention Scheme where 50 per cent losses will be borne by the Government of India and 50 per cent losses will be borne by the respective State Governments. I am ready to take up this issue of coconut oil with the Kerala Government and of palm oil with the Government of Andhra Pradesh. If both the Governments are ready to accept the Scheme, the Government of India will enter and purchase at MSP that material and save the farmers.

DR. K.S. RAO :  Hon. Minister, I thank you for this.                                                                                                        

MADAM SPEAKER: Hon. Minister, thank you.

The House stands adjourned to meet tomorrow, the 26th February, 2010 at 11 a.m.