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State Consumer Disputes Redressal Commission

O.I. Co. Ltd vs Garib Nawaz Off Set Printing Press on 18 December, 2015

  	 Cause Title/Judgement-Entry 	    	       STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP  C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010             First Appeal No. A/1624/2015  (Arisen out of Order Dated 06/07/2015 in Case No. C/23/2015 of District Shambhal)             1. O.I. Co. Ltd  R.O. Hazratganj Lucknow ...........Appellant(s)   Versus      1. Garib Nawaz oFf Set Printing Press  Office Munif Qamar Market Near Munsafi Sambhal Distt. Shambhal ...........Respondent(s)       	    BEFORE:      HON'BLE MR. Jitendra Nath Sinha PRESIDING MEMBER    HON'BLE MR. Jugul Kishor MEMBER          For the Appellant:  For the Respondent:     	    ORDER   

राज्‍य उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।

                                                   (सुरक्षित) अपील संख्‍या   1624/2015   (जिला मंच, सम्‍भल द्धारा परिवाद सं0-23/2015 में पारित निर्णय/आदेश दिनांक 06.7.2015 के विरूद्ध)   The Oriental Insurance Co. Ltd. Regional Office, Hazratganj, Lucknow, through the Manager.

                                      Appellant/Opp.Party-No 1                                                                                     Versus    1    Garib Nawaz Offset Printing Press Through their Proprietor office, Munif Qamar market, Near Munsafi Sambhal, Distt. Sambhal.

2    Panjab National Bank through Branch Manager, Branch Office Arya Samaj Road, Sambhal, Distt. Sambhal                                                        Respondent/Complainant/Opp.Party No-2 समक्ष :-

माननीय श्री जितेन्‍द्र नाथ सिन्‍हा, पीठासीन सदस्‍य माननीय श्री जुगुल किशोर, सदस्‍य अपीलार्थी की ओर से उपस्थित    :  श्री आलोक कुमार सिंह, विद्वान अधिवक्‍ता।
प्रत्‍यर्थी सं0 1 की ओर से उपस्थित :  श्री एस0पी0 पाण्‍डेय, विद्वान अधिवक्‍ता।
प्रत्‍यर्थी सं0-2 की ओर से उ‍पस्थित :  कोई नहीं।
दिनांक   15.03.2016 मा ननीय श्री जुगुल किशोर , सदस्‍य द्वारा उदघोषित निर्णय      परिवाद सं0 23/2015 गरीब नवाज आफ सैट प्रिन्टिंग प्रेस बनाम ओरियन्‍टल इंश्‍योरेंस कं0लि0 व अन्‍य में जिला मंच, सम्‍भल द्वारा दिनांक 06.7.2015 को निर्णय पारित करते हुए निम्‍नलिखित आदेश पारित किया गया है:-
"परिवाद आंशिक रूप से विपक्षी सं0-1 बीमा कम्‍पनी के विरूद्ध स्‍वीकार किया जाता है। विपक्षी सं0-1 बीमा कम्‍पनी को आदेश दिया जाता है कि वह बीमा धनराशि 5,00,000.00 रू0 मय 09 प्रतिशत वार्षिक ब्‍याज दौरान मुकदमा ता वसूली तथा 20,000.00 रूपया क्षतिपूर्ति और 2500.00 रूपया वाद व्‍यय परिवादी को अदा करें।"

उक्‍त वर्णित आदेश से क्षुब्‍ध होकर विपक्षी सं0-1/अपीलार्थी की ओर से वर्तमान अपील योजित की गई है।

अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री आलोक कुमार सिंह तथा प्रत्‍यर्थी सं0-1 की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री एस0पी0 पाण्‍डये उपस्थित आये। उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्‍तागण को सुना तथा प्रश्‍नगत निर्णय व उपलब्‍ध अभिलेखों का गम्‍भीरता से परिशीलन किया गया।

     प्रकरण संक्षेप में इस प्रकार है कि परिवादी ने विपक्षी सं02 से लिए गये ऋण तथा अपने सामान की सुरक्षा हेतु दिनांक 28.6.2013 से 27.6.2014 तक की अवधि के लिए बीमा पालिसी विपक्षी सं0-1 से रू0 8,50,000.00 हेतु प्राप्‍त की गई थी एवं दिनांक 17/18.02.2014 की रात परिवादी के संस्‍थान/दुकान में आग लग गयी एवं संस्‍थान में रखा पेपर, प्रिटिंग मैटिरियल, प्‍लान्‍ट व मशीनरी, स्‍टाक फर्नीचर आदि सब जलकर नष्‍ट हो गया, जिसकी सूचना परिवादी ने तत्‍काल पुलिस और फायर बिग्रेड एवं विपक्षीगण को भी दी, जिसके फलस्‍वरूप विपक्षीगण द्वारा निरीक्षण के बाद बीमा की धनराशि को तुरन्‍त भुगतान करने हेतु परिवादी को आश्‍वासन दिया और कुछ माह पश्‍चात विपक्षी सं0-1 ने रू0 2,50,000.00 परिवादी के ऋण खाते में जमा करा दिया तथा शेष धनराशि का भुगतान करने से विपक्षी सं0-1 ने दिनांक 20.02.2015 को इंकार कर दिया, जिसके फलस्‍वरूप परिवादी द्वारा विपक्षीगण के विरूद्ध बीमित धनराशि मय क्षतिपूर्ति के साथ दिलाये जाने हेतु जिला मंच के समक्ष परिवाद प्रस्‍तुत किया है।

     जिला मंच के समक्ष विपक्षी सं0-1 की ओर से अपना लिखित कथन प्रस्‍तुत कर परिवाद का विरोध किया गया है और यह अभिवचित किया गया है कि परिवादी द्वारा अपने परिवाद के समर्थन में कोई प्रमाणित अभिलेख प्रस्‍तुत नहीं किया है एवं सर्वेयर ने उक्‍त अग्निकाण्‍ड में परिवादी की क्षति रू0 2,51,087.00 निर्धारित की, जिसके आधार पर विपक्षी/बीमा कम्‍पनी ने परिवादी के दावे को रू0 2,50,000.00 में फुल एण्‍ड फाइनल सैटलमेण्‍ट हेतु आवश्‍यक औपचारिकताएं पूर्ण करने हेतु सूचित किया एवं परिवादी ने विपक्षी सं0-1 के कार्यलय में उपस्थित होकर 2,50,000.00 में अपना दावा फुल एण्‍ड फाइनल सैटलमेण्‍ट हेतु स्‍वेच्‍छा से सहमति दी तथा सहमति पत्र पर अपने हस्‍ताक्षर करके सील लगायी तथा बैंक खाते का विवरण दिया, जिसके आधार पर विपक्षी ने रू0 2,50,000.00 का चेक परिवादी के खाते में भेज दिया एवं बीमा कम्‍पनी द्वारा सेवा में कोई कमी नहीं की गई है तथा परिवाद खारिज किये जाने योग्‍य है। विपक्षी सं0-2 की ओर से कोई उपस्थित नहीं आया, अत: विपक्षी सं0-2 के विरूद्ध परिवाद की कार्यवाही एकपक्षीय रूप से करने का आदेश दिनांक 11.6.2015 की की गई।

उभय पक्ष के अभिवचन एवं उपलब्‍ध अभिलेखों पर विचार करते हुए जिला मंच द्वारा उपरोक्‍त वर्णित निर्णय/आदेश पारित किया गया, जिससे क्षुब्‍ध होकर वर्तमान अपील योजित है।

     अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा मुख्‍य रूप से यह तर्क प्रस्‍तुत किया गया है कि परिवादी द्वारा पूर्ण एवं अंतिम संतुष्टि (Full & Final Settlement) में प्रश्‍नगत बीमा की बावत धनराशि प्राप्‍त कर ली गई एवं प्राप्ति रसीद में इस आशय का कोई उल्‍लेख नहीं किया गया कि प्रश्‍नगत धनराशि आपत्ति के तहत प्राप्‍त की जा रही है एवं परिवादी द्वारा प्रश्‍नगत धनराशि की प्राप्ति की बावत धोखा या दबाव आदि का अभिवचन भी नहीं किया गया है और ऐसी स्थिति में मा0 राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा Kuka Rice and General Mills Vs. National Insurance Co. Ltd. में पारित निर्णय दिनांकित 13.02.2013 एवं Pulkit General Store Janta Colony Vs. National Insurance Co. Ltd. में पारित निर्णय दिनांकित 13.01.2012 में प्रतिपादित सिद्धांत को देखते हुए जिला मंच द्वारा पारित आदेश अपास्‍त किये जाने योग्‍य है। अपने तर्क को आगे बढाते हुए यह भी कहा गया कि मा0 राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा उपरोक्‍त वर्णित निर्णयों में मा0 उच्‍चतम न्‍यायालय की नजीरों का भी स्‍पष्‍ट उल्‍लेख किया गया है और उन्‍हीं के अनुपालन में प्रश्‍नगत निर्णय पारित किया गया है और इस प्रकार वर्तमान प्रकरण के तथ्‍य, अभिवचन और अभिलेखों को देखते हुए जिला मंच द्वारा दिया गया निष्‍कर्ष स्‍वीकार किये जाने योग्‍य नहीं है।

     उपरोक्‍त तर्क के खण्‍डन में प्रत्‍यर्थी के विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा मा0 उच्‍चतम न्‍यायालय की नजीर New India Assurance Co. Ltd. Vs. Pradeep Kumar IV (2009) CPJ 46 (SC) की ओर ध्‍यान आकर्षित किया गया और यह कहा गया कि सर्वेयर रिपोर्ट की आख्‍या अंतिम नहीं है और जिला मंच एवं आयोग को यह देखना आवश्‍यक है कि सर्वेयर द्वारा जो आख्‍या दी गई है वह स्‍वीकार किये जाने योग्‍य है अथवा नहीं ? प्रत्‍यर्थी के विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा पीठ का ध्‍यान मा0 उच्‍चतम न्‍यायालय की नजीर United India Insurance Vs. Ajmer Singh Cotton & General Mills & Ors. II (1999) CPJ 10 (SC) की ओर आकर्षित किया गया और यह कहा गया कि केवल इस बात से कि परिवादी ने बीमा की धनराशि बाउचर के माध्‍यम से प्राप्‍त कर ली है, उसे शेष धनराशि का क्‍लेम करने से वंचित नहीं किया जा सकता है। मा0 उच्‍चतम न्‍यायालय द्वारा United India Insurance Vs. Ajmer Singh Cotton & General Mills & Ors. II (1999) CPJ 10 (SC) में निश्चित ही यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है कि केवल इस आधार पर कि परिवादी ने बाउचर के माध्‍यम से धनराशि प्राप्‍त कर ली है उसे शेष धनराशि की बावत क्‍लेम करने से मना नहीं किया जा सकता है, परन्‍तु परिवादी के लिए यह आवश्‍यक है कि वह यह प्रमाणित करें कि उसके द्वारा जो डिसचार्ज बाउचर (Discharge Vouchers) के माध्‍यम से धनराशि प्राप्‍त की गई Fraud, Undue influence, Misrepresentation आदि कारित किया गया, जिसके फलस्‍वरूप उसने धनराशि प्राप्‍त की और इस संदर्भ में यदि यह प्रमाणित करने में सफल रहता है कि जो उसके द्वारा धनराशि प्राप्‍त की गई वह आपत्ति के तहत प्राप्‍त की गई और उसके साथ छल, धोखा हुआ है, तो ऐसी स्थिति में निश्चित ही वह शेष धनराशि प्राप्‍त करने का अधिकारी है एवं यहॉ स्‍पष्‍ट रूप से इस आशय का उल्‍लेख करना उचित प्रतीत होता है कि United India Insurance Vs. Ajmer Singh Cotton & General Mills & Ors. II (1999) CPJ 10 (SC) के मामले पर विचार करते हुए मा0 राष्‍ट्रीय आयोग द्वारा Pulkit General Store Janta Colony Vs. National Insurance Co. Ltd. में निर्णय पारित किया गया है और इस प्रकार वर्तमान प्रकरण में मुख्‍य रूप से यह देखना है कि परिवादी/प्रत्‍यर्थी द्वारा प्रश्‍नगत धनराशि जो प्राप्‍त की गई वह आपत्ति के तहत प्राप्‍त की गई अथवा परिवादी द्वारा धनराशि प्राप्‍त करने में उसे कोई धोखा हुआ या उसे धोखा दिया गया।

     परिवाद पत्र की धारा-7 में स्‍पष्‍ट रूप से यह अभिवचित किया गया है कि परिवादी का संस्‍थान ऋण की बुनियाद पर खड़ा था एवं परिवादी ने विपक्षी बीमा अधिकारियों की जॉच में पूर्ण सहयोग किया एवं जॉच के उपरांत परिवादी द्वारा यह अपेक्षा की गई कि उसे बीमा धनराशि रू0 7,50,000.00 अदा की जायेगी और ऐसा उसे आश्‍वासन भी दिया गया था, परन्‍तु परिवाद प्रस्‍तुत करने के कुछ माह पूर्व परिवादी को जानकारी दिये बिना बीमा धनराशि रू0 2,50,000.00 परिवादी के ऋण खाते में विपक्षी बीमा कम्‍पनी ने जमा करा दी एवं परिवाद पत्र की धारा-8 में यह भी अभिवचित किया गया कि बैंक में उक्‍त धनराशि जमा होने की जानकारी होने पर परिवादी विपक्षी सं0-1 बीमा कम्‍पनी के शाखा प्रबन्‍धक से सैकड़ो बार मिला और अनुरोध किया कि परिवादी के संस्‍थान का विपक्षी बैंक के अधिकारियों द्वारा प्रतिमाह अपने ऋण की सुरक्षा हेतु निरीक्षण किया जाता रहा और घटना के एक दिन पूर्व ही बैंक के अधिकारियों द्वारा निरीक्षण किया गया था और घटना के दिन संस्‍थान में लगभग 02 लाख कि किताबे, 48,000.00 रू0 का फर्नीचर एवं फिटिंग, 1,37,000.00 रू0 की कीमती किताबे, 1,60,000.00 रू0 की नोट बुक लगभग 30,000.00 रू0 के शादी कार्ड, 90,000.00 रू0 के पेपर कीमती लगभग 30,000.00 रू0 के प्रिटिंग मैटीरियल व बिजली का मीटर था और इस प्रकार परिवादी का करीब 7,50,000.00 रू0 का आर्थिक नुकसान हुआ और इस प्रकार रू0 5,00,000.00 अतिरिक्‍त की मॉग मय ब्‍याज के और क्षतिपूर्ति हेतु परिवाद के माध्‍यम से अनुतोष की मॉग की गई। परिवाद पत्र की धारा-8 में स्‍पष्‍ट रूप से यह अभिवचन किया गया है कि दिनांक 20.02.2015 को विपक्षी सं0-1/अपीलार्थी ने परिवादी को अतिरिक्‍त रूप में बीमा धनराशि अदा करने से साफ इंकार कर दिया है, जिसके फलस्‍वरूप प्रश्‍नगत परिवाद सं0/23/2015 प्रस्‍तुत किया गया। प्रत्‍यर्थी के विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा मुख्‍य रूप से यह तर्क प्रस्‍तुत किया गया कि प्रत्‍यर्थी अंग्रेजी भाषा नहीं जानता है और अपीलार्थी बीमा कम्‍पनी की ओर से परिवादी/प्रत्‍यर्थी के सन्‍दर्भ में जो कागजात प्रस्‍तुत किये गये हैं, उस पर परिवादी/प्रत्‍यर्थी को धोखा देकर हस्‍ताक्षर कराये गये एवं हस्‍ताक्षर कराते समय पेपर सादा था और इसी कारण परिवादी/प्रत्‍यर्थी ने परिवाद पत्र में स्‍पष्‍ट रूप से यह अभिवचित किया है कि उसके बिना जानकारी में उसके खाते में रू0 2,50,000/- बीमा कम्‍पनी द्वारा जमा कर दिया गया था। ऐसी स्थिति में जो धनराशि बीमा कम्‍पनी द्वारा जमा की गयी है, उसके सन्‍दर्भ में परिवादी/प्रत्‍यर्थी को आपत्‍ति‍ थी और परिवादी/प्रत्‍यर्थी के अभिवचन और इस बात को देखते हुए कि परिवादी/प्रत्‍यर्थी को बीमा के सन्‍दर्भ में जो धनराशि प्रदान की गयी थी, वह उसे वास्‍तव में आपत्‍ति‍ के तहत ही प्राप्‍त करना स्‍वीकार किये जाने योग्‍य है।

     परिवाद पत्र की धारा-8 के सन्‍दर्भ में विपक्षी/अपीलार्थी बीमा कम्‍पनी द्वारा कहा गया कि जिस प्रकार से धारा-8 की तहरीर है, वह उन्‍हें अस्‍वीकार है और उसे सिद्ध करने का भार परिवादी पर है, पर परिवाद पत्र की धारा-8 में स्‍पष्‍ट रूप से यह अभिवचित किया गया है कि दिनांक 20.02.2015 को विपक्षी/अपीलार्थी बीमा कम्‍पनी ने बकाया धनराशि मु0 5,00,000/- परिवादी/प्रत्‍यर्थी को देने से अन्तिम रूप से अस्‍वीकार किया गया है और इस प्रकार दिनांक 20.02.2015 को अन्तिम रूप से अस्‍वीकार किये जाने के अभिवचन को स्‍पष्‍ट रूप से अपीलार्थी/विपक्षी द्वारा खण्‍डन नहीं किया है। यहां यह भी उल्‍लेखनीय है कि इसी प्रकार परिवाद पत्र की धारा-7 के सन्‍दर्भ में भी विपक्षी/अपीलार्थी द्वारा यह अभिवचित किया गया कि जिस प्रकार से धारा-7 अभिवचित है, उस रूप में उन्‍हें अस्‍वीकार है एवं धारा-7 में स्‍पष्‍ट रूप से यह अभिवचित किया गया कि परिवादी ने विपक्षी बीमा कम्‍पनी से कई बार अनुरोध किया कि उसे बीमा धनराशि मु0 8,50,000/- रू0 अदा कर दिया जाये, क्‍योंकि उसका उससे अधिक नुकसान हो गया है और अविवादित रूप से मु0 8,50,000/- रू0 के सन्‍दर्भ में बीमा कराया गया था। अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा मुख्‍य रूप से उन अभिलेखों पर बल दिया गया है, जिसके अनुसार परिवादी/प्रत्‍यर्थी ने डिस्‍चार्ज बाउचर पर हस्‍ताक्षर किये थे। अविवादित रूप से उपरोक्‍त हस्‍ताक्षर उर्दू में हैं एवं उपरोक्‍त वर्णित अभिलेख जिसके आधार पर बीमा कम्‍पनी का यह कथन है कि अन्तिम रूप से पूर्ण संतुष्टि में परिवादी/प्रत्‍यर्थी ने धनराशि प्राप्‍त कर ली थी, वह अभिलेख अंग्रेजी में भरा जाना पाया जाता है एवं अभिलेखों में परिवादी/प्रत्‍यर्थी के हाथ का लिखा हुआ ऐसा कोई उल्‍लेख नहीं है कि वह उपरोक्‍त धनराशि पूर्ण संतुष्टि में प्राप्‍त कर रहा है। उक्‍त अभिलेखों के कॉलम में गवाह के हस्‍ताक्षर होने का भी उल्‍लेख है, जिन्‍हें बैंक के अधिकारी द्वारा हस्‍ताक्षर किये जाने की बात कही जाती है, परन्‍तु विपक्षी बीमा कम्‍पनी यह प्रमाणित करने में असफल रही है एवं बैंक के किसी कर्मचारी का शपथपत्र भी इस सन्‍दर्भ में प्रस्‍तुत नहीं किया गया है। ऐसी स्थिति में केवल उपरोक्‍त्‍ वर्णित्‍ अभिलेखों के आधार पर ही यह निष्‍कर्ष देना कि परिवादी ने पूर्ण संतुष्टि में रू0 2,50,000/- प्राप्‍त कर लिया था, स्‍वीकार किये जाने योग्‍य नहीं है एवं प्रकरण की सम्‍पूर्ण परिस्थितियों एवं अभिलेखों पर विचार करते हुए पीठ इस निष्‍कर्ष पर पहुँचती है कि मु0 2,50,000/- रू0 जो बीमा कम्‍पनी द्वारा परिवादी के बैंक खाते में जमा किया गया था, वह परिवादी/प्रत्‍यर्थी द्वारा पूर्ण संतुष्टि में प्राप्‍त कर लिया था इस अभिवचन को विपक्षी/अपीलार्थी बीमा कम्‍पनी प्रमाणित करने में असफल रही एवं यहां इस बात का स्‍पष्‍ट उल्‍लेख करना उचित प्रतीत होता है कि वर्तमान प्रकरण में परिवादी/प्रत्‍यर्थी द्वारा यह सिद्ध करने में पूर्णतया सफल रहे हैं कि उसने रू0 2,50,000/- जो उसके खाते में जमा किया गया था, वह पूर्ण संतुष्टि में प्राप्‍त नहीं किया था। ऐसी स्थिति में अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्‍ता द्वारा जो तर्क प्रस्‍तुत किया गया है, वह प्रकरण की परिस्थितियों को देखते हुए स्‍वीकार किये जाने योग्‍य नहीं है। इस सन्‍दर्भ में जिला मंच द्वारा जो निष्‍कर्ष दिया गया है, उसमें किसी प्रकार की कोई विधिक त्रुटि होना नहीं पाया जाता है।

     जिला मंच द्वारा पारित आदेश के माध्‍यम से रू0 20,000/- की क्षतिपूर्ति हेतु अलग से आदेश पारित किया गया है, जबकि प्रश्‍नगत बीमित धनराशि पर 09 प्रतिशत की दर से ब्‍याज हेतु आदेश भी पारित किया गया है। ऐसी स्थिति में उपरोक्‍त आदेशित ब्‍याज के दृष्टिगत अलग से क्षतिपूर्ति का आदेश उचित नहीं पाया जाता है, अ‍त: मु0 20,000/- रू0 क्षतिपूर्ति का आदेश अपास्‍त किये जाने योग्‍य है। पत्रावली के परिशीलन से अपील योजित करने में 04 दिन का विलम्‍ब पाया गया है और इस सन्‍दर्भ में विलम्‍ब क्षमा करने हेतु प्रार्थना पत्र मय शपथपत्र प्रस्‍तुत किया गया है, अत: मुकदमें की सम्‍पूर्ण परिस्थितियों एवं उपरोक्‍त्‍ तथ्‍यों को देखते हुए अपील योजित करने में हुए विलम्‍ब को क्षमा करते हुए प्रस्‍तुत अपील आंशिक स्‍वीकार होने योग्‍य है।

आदेश      प्रस्‍तुत अपील आंशिक स्‍वीकार करते हुए जिला मंच, सम्‍भल द्वारा परिवाद सं0-23/2015 गरीब नवाज आफ सैट प्रिन्टिंग प्रेस बनाम ओरियन्‍टल इंश्‍योरेंस कं0लि0 व अन्‍य में पारित निर्णय/आदेश दिनांक 06.7.2015 के अन्‍तर्गत आदेशित रू0 20,000/- क्षतिपूर्ति के बावत आदेश को अपास्‍त किया जाता है। शेष आदेश की पुष्टि की जाती है।

     पक्षकारान अपना-अपना अपीलीय व्‍यय स्‍वयं वहन करेगें।

 
     (जितेन्‍द्र नाथ सिन्‍हा)                         (जुगुल किशोर)

 

       पीठासीन सदस्‍य                                सदस्‍य      

 

लक्ष्‍मन आशु. कोर्ट-2             [HON'BLE MR. Jitendra Nath Sinha]  PRESIDING MEMBER 
     [HON'BLE MR. Jugul Kishor]  MEMBER