State Consumer Disputes Redressal Commission
Razia Bano vs Dr D K Tyagi on 12 May, 2017
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/2013/1069 (Arisen out of Order Dated in Case No. of District State Commission) 1. Razia Bano a ...........Appellant(s) Versus 1. Dr D K Tyagi a ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. Udai Shanker Awasthi PRESIDING MEMBER HON'BLE MRS. Smt Balkumari MEMBER For the Appellant: For the Respondent: Dated : 12 May 2017 Final Order / Judgement
राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।
सुरक्षित अपील सं0-१०६९/२०१३ (जिला मंच, पीलीभीत द्वारा परिवाद सं0-४३/२००९ में पारित प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश दिनांक १०-०४-२०१३ के विरूद्ध) रजिया बानो पत्नी स्व0 पुत्तन खॉं निवासी मोहल्ला नौगवॉं, ग्राम शेरपुर कलां, तहसील पुरनपुर जिला पीलीभीति। ............. अपीलार्थी/परिवादिनी।
बनाम डॉ0 डी0के0 त्यागी महाजन हैल्थ केयर सेण्टर मोहल्ला दुर्गा प्रसाद शहर व जिला पीलीभीत। ............ प्रत्यर्थी/विपक्षी।
समक्ष:-
१- मा0 श्री उदय शंकर अवस्थी, पीठासीन सदस्य।
२- मा0 श्रीमती बाल कुमारी, सदस्य।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : श्री कुलदीप सक्सेना विद्वान अधिवक्ता। प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित : कोई नहीं। दिनांक :- २०-०६-२०१७. मा0 श्री उदय शंकर अवस्थी , पीठासीन सदस्य द्वारा उदघोषित निर्णय
प्रस्तुत अपील, जिला मंच, पीलीभीत द्वारा परिवाद सं0-४३/२००९ में पारित प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश दिनांक १०-०४-२०१३ के विरूद्ध योजित की गयी है।
संक्षेप में तथ्य इस प्रकार हैं कि अपीलार्थी/परिवादिनी के कथनानुसार परिवादिनी मोहल्ला नौगवॉं, ग्राम शेरपुर कलां, तहसील पुरनपुर जिला पीलीभीति की निवासी है। पति के जीवनकाल में ही उसका तलाक हो गया। वह लोगों के घरों में चौका बर्तन का काम करके अपना जीवन-यापन करती है। परिवादिनी के दाहिने हाथ की कलाई में फ्रैक्चर हो जाने के कारण दर्द और सूजन की वजह से दिनांक ०७-०२-२००७ को पूरनपुर स्थित दिनेश नर्सिंग होम में परिवादिनी ने अपना एक्स-रे कराया जिसे देखकर डॉ0 डी0के0 गुप्ता ने परिवादिनी के दाहिने हाथ की कलाई में फ्रैक्चर होने की पुष्टि की तथा अच्छे इलाज के लिए परिवादिनी को प्रत्यर्थी के पास भेजा। परिवादिनी दिनांक ०९-०३-२००७ को प्रत्यर्थी के पास अपने इलाज के लिए पहुँची और प्रत्यर्थी ने परिवादिनी का परीक्षण करके परिवादिनी के हाथ में कच्चा प्लास्टर चढ़ा दिया और दवाऐं लिखकर दस दिन बाद पुन: बुलाया। परिवादिनी जब पुन: दिनांक २०-०३-२००७ को प्रत्यर्थी के पास पहुँची तब प्रत्यर्थी -२- ने अपनी व्यस्तता बताकर परिवादिनी को दोबारा आने को कहा और दवाऐं लगातार खाते रहने का निर्देश दिया। परिवादिनी प्रत्यर्थी के निर्देशानुसार दवाऐं लेती रही। दिनांक २८-०४-२००७ को परिवादिनी ने प्रत्यर्थी की सलाह पर जिला अस्पताल पीलीभीत में अपना एक्स-रे कराया तथा उसी दिन प्रत्यर्थी से सम्पर्क स्थापति किया और प्रत्यर्थी ने परिवादिनी के हाथ में पक्का प्लास्टर चढ़ा दिया और लगभग एक माह बाद पुन: बुलाया तथा दवाऐं खाते रहने का निर्देश दिया। परिवादिनी लगातार प्रत्यर्थी द्वारा बतायी गयी दवाऐं खाती रही लेकिन जब परिवादिनी के दाहिने हाथ व अँगुलियों में तेज दर्द होने लगा तथा सूजन आ गई और अँगुलियों ने काम करना बन्द कर दिया तब परिवादिनी ने प्रत्यर्थी से इस बात की शिकायत की जिस पर प्रत्यर्थी ने कहा कि चिन्ता मत करो प्लास्टर कटने पर सब ठीक हो जायेगा। लगभग एक माह दस दिन बाद दिनांक ०७-०६-२००७ को प्रत्यर्थी ने परिवादिनी का प्लास्टर काटा और कुछ दवाऐं खाने को बतायीं तथा कहा कि कुछ दिनों बाद परिवादिनी का हाथ बिल्कुल ठीक हो जायेगा। परिवादिनी प्रत्यर्थी के कहने पर विश्वास करते हुए उसके निर्देशानुसार दवाऐं लेती रही। प्रत्यर्थी ने परिवादिनी के कष्ट पर कोई ध्यान नहीं दिया। प्रत्यर्थी की लापरवाहीके कारण परिवादिनी के दाहिने हाथ की अँगुलियों ने काम करना बन्द कर दिया। प्रत्यर्थी की लापरवाही के कारण परिवादिनी को गम्भीर शारीरिक एवं मानसिक यातना सहनी पड़ी। बाध्य होकर परिवादिनी ने प्रत्यर्थी को दिनांक १३-०६-२००७ को एक नोटिस इस आशय की दी कि परिवादिनी को प्लास्टर का कुल खर्च ४१००/- रू० दवा का खर्च २०००/- रू०, क्षतिपूर्ति हेतु ५०,०००/- रू० तथा नोटिस व्यय ५००/- रू० कुल ५६,६००/- रू० एक माह के अन्दर भुगतान करे, किन्तु प्रत्यर्थी द्वारा कोई जवाब नहीं दिया गया और न ही कोई क्षतिपूर्ति अदा की गयी। अत: चिकित्सा में व्यय तथा क्षतिपूर्ति की अदायगी हेतु परिवाद जिला मंच के समक्ष योजित किया गया।
प्रत्यर्थी के कथनानुसार प्रत्यर्थी ने परिवादिनी का कोई इलाज नहीं किया। दिनांक ०९-०३-२००७ को परिवादिनी उसके क्लीनिक पर आयी थी और अपना हाथ दिखाया तब प्रत्यर्थी ने कहा कि वह हड्डियों का इलाज नहीं करता और परिवादिनी के अनुरोध पर उसने दवा लिख दी। प्रत्यर्थी ने नि:शुल्क पट्टी बांधकर दर्दकी दवाओं का पर्चा लिख दिया।-३-
प्रत्यर्थी का यह भी कथन है कि उसने परिवादिनी के हाथ में प्लास्टर नहीं चढ़ायाऔर न ही कोई इलाज किया है। असत्य कथनों के आधार पर परिवाद योजित किया गया।
विद्वान जिला मंच ने प्रत्यर्थी द्वारा परिवादिनी का इलाज करना न मानते हुए प्रश्नगत परिवाद निरस्त कर दिया।
इस निर्णय से क्षुब्ध होकर यह अपील योजित की गयी।
हमने अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री कुलदीप सक्सेना के तर्क सुने तथा अभिलेखों का अवलोकन किया। प्रत्यर्थी की ओर से नोटिस की तामीला के बाबजूद तर्क प्रस्तुत करने हेतु कोई उपस्िथत नहीं हुआ।
परिवादिनी का यह कथन है कि वह दिनांक ०९-०३-२००७ को अपने दाहिने हाथ की कलाई के फ्रैक्चर के उपचार हेतु प्रत्यर्थी के क्लीनिक पर गई थी। प्रत्यर्थी ने अपीलार्थी/परिवादिनी का परीक्षण करके उसके हाथ में कच्चा प्लास्टर चढ़ा दिया तथा दवाऐं लिखकर १० दिन बाद पुन: बुलाया। दिनांक २०-०३-२००७ को परिवादिनी प्रत्यर्थी के पास पुन: गई। प्रत्यर्थी ने अपनी व्यस्तता बता कर दोबारा आने के कहा तथा दवाऐं लगातार खाने का निर्देश दिया। अपीलार्थी/परिवादिनी प्रत्यर्थी के निर्देशानुसार दवाऐं लेती रही। दिनांक २८-०४-२००७ को परिवादी ने प्रत्यर्थी की सलाह पर जिला अस्पताल पीलीभीत में अपना एक्स-रे कराया तथा उसी दिन प्रत्यर्थी से सम्पर्क स्थापति किया और प्रत्यर्थी ने परिवादिनी के हाथ में पक्का प्लास्टर चढ़ा दिया और लगभग एक माह बाद पुन: बुलाया तथा दवाऐं खाते रहने का निर्देश दिया। परिवादिनी प्रत्यर्थी के निर्देशानुसार दवाऐं खाती रही किन्तु उसके हाथ का दर्द ठीक नहीं हुआ।
प्रत्यर्थी ने जिला मंच के समक्ष प्रस्तुत अपने प्रतिवाद पत्र में परिवादिनी का उसके क्लीनिक पर दिनांक ०९-०३-२००७ एवं २८-०४-२००७ को आना स्वीकार किया है। प्रत्यर्थी के कथनानुसार प्रत्यर्थी ने अपीलार्थी/परिवादिनी का कोई इलाज नहीं किया और न ही कोई प्लास्टर चढ़ाया। परिवादिनी ने हाथ में अधिक दर्द होना बताया तथा दर्द की दवा लिखने का अनुरोध किया तो प्रत्यर्थी ने बिना कोई शुल्क लिए दवाऐं लिखी थीं। प्रत्यर्थी का यह भी कथन है कि उसने परिवादिनी को सूचित कर दिया था कि वह हड्डी का इलाज नहीं करता। परिवादिनी ने कहा कि हाथ की हड्डी वह जिला अस्पाल में दिखा -४- लेगी, जिस पर प्रत्यर्थी ने नि:शुल्क परिवादिनी के हाथ पर पट्टी बॉंध दी थी तथा दर्द की दवाऐं लिख दी थीं। जिला मंच के समक्ष प्रत्यर्थी की ओर से प्रत्यर्थी के कम्पाउण्डर जय सिंह तथा मेडिकल स्टोर चालक ताहिर खलीक नाम के व्यक्तियों ने शपथ पत्र प्रस्तुत किया है। यद्यपि ये साक्षी हितबद्ध साक्षी हैं, किन्तु इन साक्षीयों ने अपने-अपने शपथ पत्रमें प्रत्यर्थी द्वारा परिवादिनी के हाथ में पट्टी बॉंधना तथा दर्द की दवाऐं लिखना स्वीकार किया है।
अपीलार्थी/परिवादिनी ने जिला मंच के समक्ष प्रत्यर्थी के क्लीनिक में लगे बोर्ड की फोटोप्रति दाखिल की है तथा इस फोटो की फोटोप्रति अपील के साथ संलग्नक-८ के रूप में दाखिल की है एवं मोहम्मद कमाल खॉं नाम के व्यक्ति का शपथ पत्र प्रस्तुत किया। श्ापथ पत्र की फोटोप्रति अपील के साथ संलग्नक-१२ के रूप में दाखिल की है। इस साक्षी ने शपथ पत्र में प्रत्यर्थी के क्लीनिक में लगे बोर्ड की फोटो खींचना स्वीकार किया है तथा पत्रावली में दाखिल फोटो को ही खींचा जाना प्रमाणित किया है। संलग्नक-८ के अवलोकन से यह विदित होता है कि प्रत्यर्थी के क्लीनिक में इस आशय का बोर्ड लगा पाया गया-
महाजन हेल्थ केयर सेन्टर डा.डी.के.त्यागी M.D.AY हार्निया हाइड्रासील बवासीर भगन्दर तथा हड्डियों के समस्त आपरेशन एण्ड फिजियोथेरेपी आपात कालीन सेवायें २४ - घन्टे उपलब्ध हैं।
इस सन्दर्भ में प्रत्यर्थी ने जिला मंच के समक्ष प्रस्तुत प्रतिवाद पत्र में यह अभिकथित किया है कि डॉ0 महाजन आर्थोपेडिक सर्जन थे, जो इस अस्पताल के मूल रूप से मालिक थे उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी की भावनात्मक आशा के रूप में महाजन केयर हास्पिटल नाम का बोर्ड आज भी मौजूद है, जिसकी फोटोप्रति न्यायालय में दाखिल की गयी है। उल्लेखनीय है कि इस बोर्ड में मात्र महाजन हैल्थ केयर सेण्टर ही अंकित नहीं है, बल्कि डॉ0डी0के0 त्यागी का नाम भी अंकित है। इस प्रकार प्रत्यर्थी ने इस बोर्ड में स्वयं को इस केयर सेण्टर में उपलब्ध डॉक्टर के रूप में प्रदर्शित किया है। इस केयर सेण्टर में उपलब्ध सुविधाओं को प्रदर्शित करते हुए '' हार्निया हाइड्रासील बवासीर भगन्दर तथा हड्डियों के समस्त आपरेशन एण्ड फिजियोथेरेपी '' अंकित है।-५-
प्रत्यर्थी यह स्वीकार करता है कि वह हड्डियों को इलाज नहीं करता। जिला मंच के समक्ष प्रस्तुत प्रतिवाद पत्र में प्रत्यर्थी ने स्वयं को आयुर्वेद डॉ0 होना बताया है। प्रश्नगत निर्णय के अवलोकन से यह विदित होता है कि जिला मंच के समक्ष आयुर्वेद चिकित्सक के रूप में अपना शैक्षिक प्रमाण पत्र भी प्रत्यर्थी द्वारा दाखिल किया गया है। इस स्वीकारोक्ति के बाबजूद भी कि प्रत्यर्थी को हडि्डयों के इलाज की शैक्षिक योग्यता नहीं है और वह इस इलाज के लिए सक्षम नहीं है। प्रत्यर्थी ने अपने क्लीनिक के सामने प्रदर्शित बोर्ड में वस्तुत: यह प्रदर्शित करके भ्रमित किया है कि हड्डियों के समस्त आपरेशन उनके द्वारा किया जाता है।
अपीलार्थी ने प्रत्यर्थी द्वारा उसके किए गये इलाज से सम्बन्धित पर्चे अपील के साथ संलग्नक-४ एवं ७ के रूप में दाखिल किए हैं। संलग्नक-४ दिनांक ०९-०३-२००७ को प्रत्यर्थी द्वारा लिखा गया पर्चा है जिसे प्रत्यर्थी ने जिला मंच के समक्ष प्रस्तुत अपने अभिकथनों में स्वीकार भी किया है। इस पर्चे में भी हड्डी का गलत जुड़ना अपीलार्थी के रोग के सन्दर्भ में दर्शित है तथा संलग्नक-४ एवं ७ में एलोपैथी की दवाऐं अपीलार्थी को इलाज हेतु लेने के लिए सुझाई गयी हैं। इस प्रकार प्रत्यर्थी ने, स्वयं आयुर्वेदिक चिकित्सक होने के बाबजूद अनधिकृत रूप से एलोपैथी की दवा मरीज को सेवन करने हेतु निर्देशित किया है।
यद्यपि अपीलार्थी ने जिला मंच के समक्ष प्रस्तुत अपने शपथ पत्र में प्रत्यर्थी द्वारा इलाज के मध्य उसके हाथ में प्लास्टर चढ़ाया जाना भी बताया है और अपीलार्थी/परिवादी की ओर से श्री नूर हसन ने अपना शपथ पत्र जिसकी फोटोप्रति अपील मेमो के साथ संलग्नक-१३ के रूप में दाखिल की है, में अपीलार्थी के कथन का समर्थन करते हुए यह अभिकथित किया है कि प्रत्यर्थी द्वारा अपीलार्थी/परिवादी के हाथ में प्लास्टर भी चढ़ाया गया किन्तु प्रश्नगत निर्णय के अवलोकन से यह विदित होता है कि इस सन्दर्भ में कोई अभिलेखीय साक्ष्य जिला मंच के समक्ष प्रेषित नहीं की गयी किन्तु मात्र इसी आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि प्रत्यर्थी ने वस्तुत: अपीलार्थी के दाहिने हाथ की कलाई की हड्डी टूटने के सन्दर्भ में कोई इलाज नहीं किया जबकि स्वयं प्रत्यर्थी यह स्वीकार करता है कि उसके द्वारा पट्टी बॉंधी गयी तथा दवाऐं दी गयीं। उसके -६- द्वारा जारी किए गये पर्चे में मरीज के रोग के सन्दर्भ में हड्डी का गलत जुड़ना दर्शित है। उसके क्लीनिक में इस आशय का बोर्ड लगा है कि क्लीनिक में हड्डी का ऑपरेशन भी किया जाता है।
यह भी उल्लेखनीय है कि अपीलार्थी द्वारा प्रस्तुत लिखित बहस में यह उल्लिखित किया गया है कि अपीलार्थी पूरनपुर तहसील के गॉव शेरपुर की निवासी है तथा पीलीभीत जिले का मुख्यालय पुरनपुर से ४० तथा शेरपुर से ५० किलोमीटर की दूरी पर है। प्रत्यर्थी पीलीभीत में नर्सिंग होम चलाता है। यह नितान्त अस्वाभाविक प्रतीत होता है कि अपीलार्थी/परिवादिनी मात्र दर्द की दवा लेने के लिए अपने घर से लगभग ५० किलोमीटर दूर प्रत्यर्थी से सम्पर्क करे वह भी मात्र एक बार नहीं बल्कि कई बार।
उपरोक्त तथ्यों के आलोक में यह स्पष्ट है कि प्रत्यर्थी ने हड्डी के इलाज हेतु शैक्षिक योग्यता न होने के बाबजूद अपीलार्थी की हाथ की हड्डी का अनधिकृत रूप से इलाज किया। साथ ही आयुर्वेद की शिक्षा ग्रहण करने के बाबजूद एलोपैथी की दवाऐं दे कर मरीज की चिकित्सा की गयी। ऐसी परिस्थिति में हमारे विचार से प्रत्यर्थी द्वारा अपीलार्थी के इलाज में लापरवाही करते हुए सेवा में त्रुटि की गयी।
जहॉं तक अपीलार्थी की कलाई की हड्डी के गलत जुड़ने तथा उसकी स्थाई विकलांगता का प्रश्न है स्वयं अपीलार्थी/परिवादी यह स्वीकार करती है कि प्रत्यर्थी से इलाज कराने से पूर्व उसने डॉ0 डी0के0 गुप्ता से इलाज कराया था। इस सन्दर्भ में अपील मेमो के साथ संलग्नक-५ के रूप में डॉ0 डी0के0 गुप्ता द्वारा जारी किए गये इलाज के पर्चे की फोटोप्रति अपीलार्थी ने दाखिल की है, जिस पर्चे में अपीलार्थी की कलाई में फ्रैक्चर होना दर्शित है। प्रश्नगत निर्णय के अवलोकन से यह विदित होता है कि जिला मंच के समक्ष दिनांक ०७-०३-२००७ की एक्स-रे प्लेट दाखिल की गयी जिसमें अपीलार्थी/परिवादिनी के हाथ में फ्रैक्चर होना पाया गया। प्रत्यर्थी द्वारा जारी किए गये दिनांक ०९-०३-२००७ के इलाज के पर्चे में कलाई की हड्डी गलत जुड़ना दर्शित है। ऐसी स्थिति में कलाई की हड्डी जुड़ने तथा उसके गलत जुड़ने के लिए मात्र प्रत्यर्थी को ही दोषी नहीं माना जा सकता, किन्तु नि:संदेह प्रत्यर्थी ने हड्डी के गलत जुड़े होने का उपचार बिना किसी शैक्षिक योग्यता के अनधिकृत रूप से से एवं लापरवाहीपूर्वक किया।-७-
अत: अपीलार्थी/परिवादिनी को प्रत्यर्थी द्वारा क्षतिपूर्ति की अदायगी कराया जाना न्यायोचित होगा।
परिवाद के अभिकथनों से यह विदित होता है कि परिवादिनी ने ४१००/- रू० इलाज में खर्च होना बताया है। अपीलार्थी/परिवादिनी का यह कथन है कि वह घरों में चौका बर्तन करके अपना जीवन-यापन करती है। हाथ की अपंगता के कारण उसकी मजदूरी प्रभावित हुई है। मामले की परिस्थितियों को देखते हुए ५०,०००/- रू० बतौर क्षतिपूर्ति तथा १०,०००/- रू० बतौर वाद व्यय दिलाया जाना न्यायोचित होगा। अपील स्वीकार किए जाने योग्य है।
आदेश प्रस्तुत अपील स्वीकार की जाती है। जिला मंच, पीलीभीत द्वारा परिवाद सं0-४३/२००९ में पारित प्रश्नगत निर्णय एवं आदेश दिनांक १०-०४-२०१३ अपास्त किया जाता है। परिवाद आंशिक रूप से स्वीकार किया जाता है। प्रत्यर्थी को निर्देशित किया जाता है कि वह अपीलार्थी/परिवादिनी को ६४,१००/- रू० निर्णय की तिथि से एक माह के अन्दर, परिवाद योजित किए जाने की तिथि से सम्पूर्ण धनराशि की अदायगी तक ०६ प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज सहित अदा करे।
इस अपील का व्यय-भार उभय पक्ष अपना-अपना स्वयं वहन करेंगे।
उभय पक्ष को इस निर्णय की प्रमाणित प्रति नियमानुसार उपलब्ध करायी जाय।
(उदय शंकर अवस्थी) पीठासीन सदस्य (बाल कुमारी) सदस्य प्रमोद कुमार वैय0सहा0ग्रेड-१, कोर्ट नं.-२.
[HON'BLE MR. Udai Shanker Awasthi] PRESIDING MEMBER [HON'BLE MRS. Smt Balkumari] MEMBER