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Lok Sabha Debates

Discussion On The Demand For Grant No. 94 Under The Control Of Ministry Of Tribal ... on 23 April, 2010

Title: Discussion on the Demand for Grant No. 94 under the control of Ministry of Tribal Affairs for the years 2010-11 (Discussion concluded and Demands voted in full).

 

MR. DEPUTY-SPEAKER: The House will now take up discussion and voting on Demand No. 94 relating to the Ministry of Tribal Affairs.

          Hon. Members present in the House whose cut motions to the Demand for Grant have been circulated may, if they desire to move their cut motions, send slips to the Table within 15 minutes indicating the serial numbers of the cut motions they would like to move.  Only those cut motions, slips in respect of which are received at the Table within the stipulated time, will be treated as moved.

          A list showing the serial numbers of cut motions treated as moved will be put up on the Notice Board shortly thereafter.  In case any member finds any discrepancy in the list, he may kindly bring it to the notice of the Officer at the Table immediately.

Motion moved:

 “That the respective sums not exceeding the amounts on Revenue Account and Capital Account shown in the fourth column of the Order Paper be granted to the President of India, out of the Consolidated Fund of India, to complete the sums necessary to defray the charges that will come in course of payment during the year ending the 31st day of March, 2011, in respect of the heads of Demands entered in the second column thereof against Demand No. 94 relating to the Ministry of Tribal Affairs.”   Now, Shrimati Susmita Bauri.
 
श्रीमती सुस्मिता बाउरी (विष्णुपुर): उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे वर्ष 2010-2011 के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय की अनुदानों की मांगों पर बोलने का मौका दिया, उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देती हूं।
          मैं इस सम्बन्ध में कुछ बातें सदन में रखना चाहती हूं। आज ट्राइबल्स पर काफी अत्याचार हो रहे है और यह एक गम्भीर समस्या बन गई है। हमारे देश में आदिवासी लोगों की हालत काफी दयनीय है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार देश में आदिवासियों की कुल आबादी 8.43 करोड़ है। देश में नई जनगणना शुरू हो गई है और लगता है कि इनकी आबादी दस से 11 करोड़ के बीच होगी। आज आदिवासी आर्थिक रूप से, शिक्षा के क्षेत्र में और अन्य क्षेत्रों में भी सबसे पीछे हैं। इस वर्ष के बजट में इस मंत्रालय को 3200.37 करोड़ रुपए अलाट हुए हैं in Plan and non-Plan Heads.  The detailed Head allocation is not being discussed here but this small amount of Budgetary allocation does not make any welfare to such a large group of people who are 10 to 11 crore in number.  So I would request the Government to give more money for the welfare of the tribal people.
          अक्तूबर1999 में जनजातीय कार्य मंत्रालय की स्थापना हुई थी। But, till date, it is not a complete Ministry because there are many vacancies; posts are lying vacant.  So, how the job of this Department would be done?  It should be immediately done. अगर हम पिछले सालों में इस मंत्रालय को आबंटित हुई धनराशि को देखें तो वर्ष2006-2007 में ट्राइबल वेलफेयर मिनिस्ट्री को 131452 करोड़ रुपए आबंटित हुए थे। वर्ष2007-20081,30067करोड़ रुपये, वर्ष 2008-2009 में1,20097.76करोड़ रुपये, वर्ष 2009-2010 में8004.66करोड़ रुपये देखते हैं। लेकिन हम लोग देख रहे हैं कि वर्ष 2006-2007में जितना रुपया था उससे कम होता जा रहा है। एनजीओज को ज्यादा दिया गया है और जब रैजिडेंशियल और नॉन-रैजिडेंशियल होस्टल्स, ट्राइबल्स स्टूडेंट्स के लिए, उसमें 29,000स्टूडेंट्स का टार्गेट रखा गया था, लेकिन 21,400 को ही मिला है। Strengthening education among ST Girls in low literacy areas,  इसमें हम लोगों का टार्गेट 28000 एसटी गर्ल्स के लिए था लेकिन 1983 लड़कियों के लिए ही हो पाया। Support to National, State ST Finance and Development Corporation,  इसमें32000बैनिफिशरीज का टार्गेट रखा गया था लेकिन 7033 को ही फायदा मिला है।
          हमारी आजादी को 64 साल बीत गये हैं, बाबा, साहेब अम्बेडकर ने संविधान में इसे रखा था और कहा था कि 10 साल में इन ट्राइबल्स की हालत में बहुत सुधार होगा, लेकिन हम देखते हैं कि कितने ही साल बीत गये, लेकिन ट्राइबल्स लोगों की हालत में ज्यादा सुधार नहीं आया है।  केन्द्रीय सरकार की बजट में जो मानसिकता दिख रही है उससे तो बजट में और भी ज्यादा प्रावधान होना चाहिए। बजट का कम से कम 1 परसेंट तो इन लोगों को देना चाहिए।
          ट्राइबल्स लोग जंगल में, हिल-एरियाज में रहते हैं और जंगल के पेड़-पौधों पर अपने जीवन का निर्वाह करते हैं। वहां पर अभी तक प्राइमरी स्कूल नहीं हैं, प्राइमरी हैल्थ सेंटर नहीं हैं, इसलिए हम देखते हैं कि चाइल्ड मृत्यु दर, माताओं की मृत्यु दर काफी है। डाक्टर्स सारे हैल्थ सेंटर्स में नहीं होते हैं और डाक्टर्स को भी सुविधा वहां नहीं होती है और वे वहां जाना नहीं चाहते हैं। इसलिए हमारे ट्राबल्स लोग हैल्थ और शिक्षा में बहुत पीछे हैं। ये लोग अभी भी ओझा, धर्म-गुरू और हथौड़े-डाक्टर्स पर निर्भर हैं क्योंकि वहां एमबीबीएस डाक्टर्स तो जाते नहीं हैं, इसलिए उन्हें इन लोगों के ऊपर निर्भर रहना पड़ता है। चाहे इंदिरा आवास योजना हो, बीपीएल, एपीएल सिस्टम हो, जब रूरल डिवेलपमेंट पर चर्चा हुई तब हमें पता चला कि हमारे ग्रामीण सेक्टर के लिए क्या चल रहा है। हमारे ट्राइबल्स लोग बड़े कष्ट में हैं।
          वैस्ट-बंगाल में वामपंथी सरकार आने के बाद जो भूमि सुधार कानून आया, इसमें सरकार ने बहुत सी सरप्लस भूमि गरीबों में बांटी है, अभी तक 5 लाख फैमलीज को पट्टा मिला है। गरीब और आदिवासी लोगों को थोड़ी जमीन मिलने से उनका आर्थिक सुधार हो रहा है। हम जानते हैं कि आर्थिक उन्नति के लिए भूमि सुधार होना जरूरी है। वैस्ट बंगाल, त्रिपुरा और केरला में ऐसा हुआ है लेकिन आसाम, महाराष्ट्र और उड़ीसा जहां सबसे ज्यादा ट्राइबल्स लोग रहते हैं, वहां हमारे केन्द्रीय मंत्री को इस बारे में देखना है।
          झारखंड अलग राज्य बना है, लेकिन हम देखते हैं कि वहां आदिवासी लोगों को ज्यादा सहन करना पड़ रहा है। अभी भी स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। कीड़े-मकौड़े की तरह उन्हें मार दिया जा रहा है। हमारे राज्य में अलचिकी भाषा, जो आदिवासी लोगों की डिमांड थी, वेस्ट बंगाल में 18 कालेज में उस भाषा के माध्यम से पढ़ाया जा रहा है। डिग्री तक उस भाषा में पढ़ाया जा रहा है। संथाली एकाडमी भी शुरू हो गई है। आदिवासी संस्कृति को ये बचाने का काम कर रहे हैं।
          हमारी बहुत दिनों से डिमांड थी कि जो आदिवासी जंगल में रहते हैं, उन्हें जंगल का अधिकार मिले। यह हमारी पार्टी की मांग थी और इसके बहुत आंदोलन करने पड़े। टाइगर लॉबी की तरफ से इसमें बाधा थी, लेकिन हमने ओरिजिनल बिल में संशोधन करके बिल पास कराया और लागू हुआ। हम अभी भी देख रहे हैं कि इसका काम सारी स्टेट्स में शुरू नहीं हुआ है। वेस्ट बंगाल में बहुत पहले से शुरू हो गया है।...( व्यवधान) आपका धन्यवाद। हम लोग चाहते हैं कि जमीन का अधिकार सारे देश में मिले। हमारी पुरुलिया में 18 से20 परसेंट आदिवासी हैं। यहां पट्टे का काम 90 परसेंट तक हो गया है। बाकुड़ा में काम चल रहा है, लेकिन केंद्र सरकार को इसे लागू करना चाहिए और इसके लिए ज्यादा से ज्यादा पैसा उपलब्ध कराना चाहिए। इसकी सही ढंग से मोनिटरिंग भी होनी चाहिए कि यह काम कैसे अच्छे ढंग से चले। हम देखते हैं कि आदिवासी लोगों के लिए बहुत से एनजीओज काम करते हैं, लेकिन यह भी देखने को मिलता है कि कोई एनजीओ अच्छा काम करती है और कोई एनजीओ अच्छा काम नहीं करती है। इसके लिए केंद्र सरकार को अच्छे ढंग से मोनिटरिंग करनी चाहिए। हमारे आदिवासी लोग आजादी के 64 साल बाद भी बहुत पिछड़े हुए हैं। उनके लिए अच्छा बजट होना चाहिए, जिससे कि वे सामान्य जनता के साथ वे कम्पीट कर सकें। वेस्ट बंगाल में रानीबाम, झिलीमिली बहुत लैम्प्स काम करते हैं। जैसे तेंदूपत्ता उपलब्ध कराते हैं। इस कारण आर्थिक सुधार आया है।
          मैं मंत्री के सामने अपनी कुछ मांगें रखना चाहती हूं। आदिवासी लोगों को बहुत सम्मान नहीं मिलता है, इसके लिए एट्रोसिटी एक्ट लाया गया है, लेकिन क्या हो रहा है, यह भी सरकार को देखना चाहिए। केंद्रीय सरकार बड़ी-बड़ी संस्था को पैसा देती है, लेकिन आदिवासी लोगों के लिए जैसे फारेस्ट एक्ट को इम्प्लिमेंट करने की बात होती है, तब वे नहीं देते हैं। सुझाव के तौर पर मैं कहना चाहती हूं कि stop alienation of land belonging to the tribal people; plug loopholes in the existing laws and take steps to restore land illegally transferred from adivasis.  Register land records for tribal lands.  In the scheduled areas under the Fifth Schedule, adhere to the Samata judgment of the Supreme Court regarding use of land for industrial and commercial purposes. पुनर्वास पैकेज आदिवासी लोगों के लिए चाहिए।
Takeover surplus lands above ceiling and distribute them to landless adivasis along with other landless families.  Provide irrigation facilities in the remove tribal areas.
Amend the Forest Act in such a manner as to recognize the rights of adivasi forest dwellers to access and use of forests. People’s participation in forests through community management should be introduced.
उपाध्यक्ष महोदय : आप अपनी बात समाप्त कीजिए।
 
श्रीमती सुस्मिता बाउरी : महोदय, आदिवासी लोगों के बारे में बात कर रही हूं। दो-चार बातें कह कर मैं अपनी बात समाप्त करूंगी। Forest produce must be accessible to forest dwellers and neighbourhood adivasi communities. The tyranny of forest guards must end. For marketing forest produce, cooperative efforts which are not bureaucratically managed but of the adivasis as producers of forest goods should be set up.
          No project industrial or developmental can be undertaken where displacement occurs without a comprehensive and sustainable rehabilitation package.  Such a Scheme must be put in place before any displacement or work on the project begins.
          Provision of drinking water in remote hamlets must be a priority for ending hardships to tribal women in this regard. Sexual harassment by forest guards of Advasi women, who go to forests for gathering forest produce and firewood, must be strictly punished. Tribal developmental schemes should pay adequate attention to employment for Adivasi women. The Government should give protection to women at work sites from sexual exploitation.
          The Public Distribution System should be revamped so that all tribal areas are covered with fair price shops and cooperatives. Instead of BPL cards, all tribal areas, scheduled and non-scheduled, must be covered by a universal system where all tribal families get foodgrains and other essential commodities at a subsidised rate.
          Special composite educational programmes for the tribal students should be promoted by the Central Government and by all the State Governments. Arrangements for setting up of schools in the tribal dominated areas with provision of vocational training and hostel facilities for the tribal youth should be undertaken.
          The Government should take steps for implementation of reservation of ST quotas in all categories of employment and education. Tribal languages and scripts should be recognised and developed.
          इसके नहीं होने से ट्राइबल्स की हालत में सुधार नहीं आएगा। मैं माननीय मंत्री जी से यही कहना चाहती हूं।
          इन्हीं बातों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करती हूं और डिमांड्स फार ग्रांट्स को अपोज करती हूं।
 
श्री हेमानंद बिसवाल (सुन्दरगढ़): उपाध्यक्ष महोदय, मैं आज सदन में ट्राइबल मिनिस्ट्री का डिमांड्स् फार ग्रांटस 2010-11 का समर्थन करता हूं। मैं समर्थन इसलिए करता हूं कि मैं 2003 से देख रहा हूं बजट प्रोवीजन के हिसाब से रखा गया है और मुझे लगता है कि दो साल में कुछ ज्यादा बजट एलोकेशन है। वर्ष 2009-10 में 3205 करोड़ और 2010-2011 में 2206 करोड़ है। ऐसा जमाना था 2002-03 और 2003-04 में 1200 और 1300 करोड़ का प्रोवीजन है। It was most discouraging.
          हम सब महसूस करते हैं कि ट्राइबल्स का डेवलपमेंट होना चाहिए जो जंगल में रहते हैं, बारिश, धूप और ठंड में रहते हैं और इन सब परिस्थितियों के साथ खुले बदन से लड़ते हैं। इन लोगों की आर्थिक उन्नति होनी चाहिए। यह सभी पार्टियों और दलों का नारा है। माननीय इंदिरा जी का 1971 में हार्ट टचिंग नारा था, उस समय इंदिरा जी ने एक बात कही थी, which was written in the preface of 1971 SC/ST Commission Report. कमीशन रिपोर्ट में लिखा था -
“Parents look after their children with equal affection and equal attention to each child. But the sick child is given preferential attention. Similarly, in a big family like India, we should give preferential attention to the downtrodden, particularly to the Scheduled Castes and Scheduled Tribes.”   इंदिरा जी ने यह बात बोली थी, यह उनके दिल की धड़कन थी, मन की विचारधारा थी।
यह विचारधारा ऐसी थी कि जो पिछड़े हुए लोग सबसे नीचे हैं, उन्हें प्रिफरेन्शियल अटैन्शन देनी चाहिए।
Those who are ‘haves’ have to sacrifice for the ‘have-nots’. जिन लोगों को हम थैलावाला बोलते हैं, जो अच्छे स्टैन्डर्ड में रहते हैं, इन लोगों को यह काम कराने के लिए कुछ सैक्रिफाइस भी करना चाहिए। यह मैं क्यों बोल रहा हूं, आपने यह बोल दिया कि बजट एलोकेशन हमारे समय में ज्यादा हुआ है। लेकिन टोटल बजट एलोकेशन देखेंगे तो एनुअल प्लान 2010-11के लिए 3,73,092करोड़ था, 2009-10में 3,25,149करोड़ था। यह टोटल प्लान एलोकेशन पूरे देश का है। यदि एनुअल प्लान देखें तो 2008-09में 2,43,386करोड़ था इतने दो लाख, तीन लाख, 73 परसैन्ट और यदि आबादी का हिसाब देखें तो शेडय़ूल्ड कास्ट की आबादी लगभग 14परसैन्ट है और ट्राइबल लोगों की परसैन्टेज पहले लगभग सात परसैन्ट थी, लेकिन खुशी की बात है, खुशी की बात मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि अब यह बढ़कर 8.2परसैन्ट हुआ है। लेकिन यदि उड़ीसा में देखें तो 1971 में एस.टी. परसैन्टेज 24थी। 1991 में देखें तो 24 परसैन्ट घटकर  22 परसैन्ट हुआ। उसके बाद यदि देखेंगे तो वह और घट गई।
          उपाध्यक्ष महोदय, जब मैं उड़ीसा असैम्बली में था तो तब भी हम इस बारे में सवाल उठाते थे कि जानबूझकर स्टेटिस्टिकल जगलरी करके लगता है कि इन लोगों की परसैन्टेज को घटाया जा रहा है।  For the purpose of reservation in 1974 for the postal services we had been fighting and a Private Members’ Bill was also brought by me in the House. But, unfortunately, that could not be passed in the Assembly. In 1975 the Minister brought a most comprehensive report. At that time Nandini-ji was the Chief Minister and here Indira-ji was the Prime Minister. With regard to the reservation to postal services for the Scheduled Castes and Scheduled Tribes all over India, Orissa was the pioneer State. By that time the Reservation Bill for the Postal Services was enacted after it was passed in the Assembly.जो बाद में रिडय़ूस होने लगा, उससे मेरे मन में दो बातें आती हैं, जो मैं महसूस भी करता हूं कि सरकार जानबूझकर स्टेटिस्टिकल जगलरी कर रही है। अन्यथा जो फैमिली वैलफेयर का जो कार्यक्रम होता है, ट्राइबल लोगों को किसी हिसाब से कराते हैं, ये लोग ज्यादा अपने होंगे, ऐसा मन में आता है। इसलिए हम जब बजट प्रोजिवन देखते हैं तो 2010-11में 3,73,092करोड़ रखे गये हैं।
If we see the figure for the Ministry of Tribal Affairs, this is only 0.86 per cent; not even one per cent. If we see in 2009-10 it was only 0.98 per cent. In the year 2009-09 it was only 0.74 per cent. ट्राइबल आबादी 8.2 परसेंट है और इन लोगों की उन्नति के लिए सभी लोग लगे हुए हैं, सभी पार्टियों का नारा है, but the Budget allocation is not even one per cent. यह बहुत दुख की बात है। मैं सदन से अपील करता हूं, सदन से आग्रह करता हूं कि यह परसेंटेज बढ़ना चाहिए। सबसे बड़ी चीज यह है कि एसटी डिपार्टमेंट को एक नोडल डिपार्टमेंट के हिसाब से आज तक एक्सेप्ट नहीं किया गया है। एसटी डिपार्टमेंट को एक नोडल डिपार्टमेंट के हिसाब से भी ग्रहण करना चाहिए। इससे इसकी ग्रोथ और महत्ता बढ़ सकती है। मैं सदन से और मंत्री जी से ऐसा आग्रह और निवेदन करता हूं। ट्राइबल लोगों के लिए, आदिवासियों के लिए बहुत सारी योजनाएं कार्यकारी हो रही हैं। सबसे बड़ी चीज यह है कि हम लोग इनके फॉरेस्ट राइट के बारे में जो चर्चा कर रहे थे, फॉरेस्ट राइट के लिए हम लोगों ने बहुत सारे राज्यों मे आन्दोलन किया है, कन्वेंशन किया है, कन्वेंशन कर रहे थे। पार्लियामेंट में वर्ष 2004 में वह फॉरेस्ट राइट देने के लिए, जो फॉरेस्ट लैंड रिजर्व फॉरेस्ट एरिया में है, जहां ट्राइबल लोग रहते हैं, ट्रैडिशनली ट्राइबल लोग इन फॉरेस्ट एरिया में रहते हैं और other than tribals, those who are traditionally remaining in the forests, they will also be treated as tribals.  इन लोगों की लैंड भी इन लोगों के नाम पर रिकॉर्ड होगी। इसके लिए वर्ष 2004 में पार्लियामेंट में अमेंडमेंट आया, लेकिन वह पास नहीं हो सका। फिर वह दोनों सदन की ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी को गया। ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी से आने के बाद वर्ष 2006में वह पास हुआ। यह वर्ष 2006में पास हुआ, लेकिन उसके इम्प्लीमेंट होने में वर्ष2006से 2008 तक का समय लग गया। किसी भी राज्य सरकार ने इसका अच्छी तरह से क्रियान्वयन करना नहीं चाहा। इनके दिल में भी इतनी हमदर्दी नहीं थी कि इसे अच्छे ढंग से कार्यकारी किया जाये। Ultimately, after two years or after more than one year, the Central Government communicated to different States and the different States also started.  उस फॉरेस्ट एरिया को इन लोगों के नाम पर, जो आदिवासी लोगों के पजेशन में है, इनके नाम पर रिकॉर्ड करने के लिए, इतना ज्यादा तो नहीं, लेकिन हमारे उड़ीसा में भी पिछले साल दिसम्बर 2009 में तीन साल के बाद मुझे एक चिट्ठी उड़ीसा सरकार से आयी। सरकार ने एक प्रोग्राम बनाया है कि फॉरेस्ट एरिया आदिवासी लोगों को बांटने के लिए एक मेला आयोजित किया है। मेला का मतलब सरकार ने एक उत्सव किया है, फंक्शन किया है, जिसमें पट्टा बांटा जायेगा। इस हिसाब से हमारे जिले में एक-दो जगह शुरू हुआ है, उड़ीसा में भी ऐसे ही है।
          This work is going on very slowly.   अगर आप इसका अचीवमैंट देखेंगे तो अचीवमैंट के बारे में भी सरकार के पास ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करें। आपका समय हो गया है।
श्री हेमानंद बिसवाल : आप कुछ समय तो दीजिए। पीएमओ से भी चिट्ठी गई इसको प्रापरली इंप्लीमैंट करने के लिए। उन्होंने एक मानीटरिंग कमेटी के लिए कहा। वह स्टेट में हुई होगी तो मुझे नहीं मालूम, लेकिन मानीटरिंग कमेटी डिस्ट्रिक्ट लैवल पर आज तक नहीं हुई है। मानीटरिंग कमेटी या कोई विजिलैन्स कमेटी होती तो हम सांसदों को भी कुछ जानकारी होती कि कैसे इंप्लीमैंटेंशन हो रहा है या नहीं। इस बारे में हमें पता भी चलता लेकिन आज तक वह भी नहीं हुआ है। इससे लगता है कि हम ट्राइबल लोगों को जो राइट मिलता है, उसको इंप्लीमैंट करने के लिए राज्यों में जितनी सरकारें हैं, कोई भी इतनी हमदर्दी नहीं दिखाती हैं, उसको करने के लिए भी इनकी इच्छा नहीं होती है। लेकिन जब भाषण में बात करेंगे, तो सबसे पहले आदिवासियों का नाम लिए बिना भाषण शुरू नहीं होता है। किसी का भी भाषण दलितों की बात कहे बिना शुरू नहीं होता है।
          मैं एक बात और कहना चाहता हूँ। फॉरैस्ट एरिया के बारे में मैं बोल रहा था। आप देखेंगे, आपको इसमें महसूस होगा कि “The Scheduled Tribes and other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006, which is being administered by the Ministry of Tribal Affairs, seeking to recognize and vest the forest rights and occupation in the forest land, in forest dwelling Scheduled Tribes and other traditional forest-dwellers who have been residing in such forests for generations….. ”   उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य, कृपया समाप्त करें।
श्री हेमानंद बिसवाल : इन लोगों के लिए 31.12.2007में सरकार से चिट्ठी गई है फिर भी इनका इंप्लीमैंटेशन ठीक से नहीं हुआ है। फिर अभी सवाल आता है कि फॉरैस्ट और ट्राइबल एरिया में सबसे ज्यादा माओवादी देखे जा रहे हैं। माओवादी इस हिसाब से आए हैं, इतने एग्रैसिव पोज़ीशन तक पहुँच गए हैं कि दंतेवाड़ा की सब लोग चर्चा कर रहे थे। एक दिन हमने भी चर्चा की। लेकिन अखबार में जो निकला था, आप सभी ने पढ़ा होगा, उसमें लिखा हुआ था कि जो ग्रीन हंट्स उसी इलाके में और सीआरपी फौजी उसी इलाके में जिनको तैनात किया गया था, इंडियन एक्सप्रैस में मैं देख रहा था कि ग्रीन हंट वाले They have come out of wilderness. लेकिन इन लोगों को जंगली कायदा मालूम नहीं था। जंगली कायदा बोलने से मुझे लगता है कि जंगल से पहाड़ में नीचे आने के लिए और पहाड़ से ऊपर जाने के लिए और पहाड़ के बीच में जो वैली होता है, उधर जाने की इन लोगों को जानकारी नहीं है। ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आपकी पार्टी का डेढ़ घंटा है। अकेले बोलेंगे तो और लोग नहीं बोल पाएँगे।
श्री हेमानंद बिसवाल : इसलिए लगता है कि यह तरीका जो इनको मालूम नहीं था, इसलिए वे लोग एक्टिव हुए। I am telling the most interesting thing. That is why, I was interested to speak on this. आदिवासी और ट्राइबल लोग क्यों इनमें शामिल होते थे, उस पर मैं बोलना चाह रहा हूँ। ट्राइबल नौजवान जो ठंड में, बरसात में और धूप में लड़ते हैं, शेर और चीते के साथ लड़ते हैं, इऩ लोगों में जो शक्ति हैं, ये लोग जो अनइंप्लाइड हैं, इन लोगों को हम लोगों ने क्यों डिप्लाय नहीं किया। ...( व्यवधान)
          जैसा कि आपको मालूम है कि हिमाचल में डोगरा नाम की एक कास्ट है। उनकी हाइट मिलिट्री के हिसाब से 5 फीट6इंच नहीं होती है। लेकिन डोगरा लोगों को पांच फीट या उससे अधिक होने पर मिलिट्री में शामिल किया जाता है और उनके नाम से अलग से डोगरा रेजीमेंट आर्मी में बनायी हुई है। मैं पहले भी इस सुझाव को आपके सामने रखना चाहता था, लेकिन मुझे बोलने का मौका नहीं मिला। लेकिन आज मैं इस बात को कहना चाहता हूं कि आर्मी में ट्राइबल रेजीमेंट का भी गठन किया जाना चाहिए। इससे जो नौजवान गुमराह हो रहे हैं, माआवादियों के साथ मिल रहे हैं, वे मेनस्ट्रीम में रहेंगे और मेनस्ट्रीम में रहकर लड़ाई लड़ेंगे। यह देश, समाज और ट्राइबल के लिए अच्छा होगा, इतना कहकर, मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
   
श्री अर्जुन मुण्डा (जमशेदपुर): उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे आज एक महत्वपूर्ण मंत्रालय की अनुदान की मांग पर बोलने का अवसर दिया, उसके लिए मैं आपका आभारी हूं।
          महोदय, मैं अपनी बात को प्रारम्भ करूं, इससे पहले मैं आपके ध्यान में एक बात लाना चाहता हूं कि संविधान निर्माताओं ने बहुत सोच-समझकर संविधान को सबके लिए ग्राह्य बनाते हुए अंगीकार किया, ताकि सब उसे आत्मसात करें। ऐसे लोगों को जिनके बारे में यह समझा गया कि मुख्यधारा में जुड़ने से काफी दूर रह गए हैं, उन्हें समान अवसर जल्द से जल्द उपलब्ध करवाया जाए। इसके लिए सुदूरवर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को एक विशेष संवैधानिक प्रावधान के तहत, चाहे आप उसे आरक्षण कहें, चाहे संरक्षण कहें, चाहे समान अवसर प्राप्त करने के लिए विशेष अवसर देने की बात कहें, दिया गया।
          महोदय, दुर्भाग्य इस बात का है कि ऐसे गंभीर विषय पर चर्चा करते समय इस संबंध में सिर्फ इस विभाग के निरीह मंत्री उपस्थित हैं। मैं इस शब्द का प्रयोग इसलिए कर रहा हूं क्योंकि हम सभी संवैधानिक प्रावधानों की बात तो करते हैं कि इस देश में सभी लोगों को समान अधिकार हैं और उनको प्राप्त करने के लिए कुछ लोग जो पीछे छूट गए हैं, उन्हें विशेष प्रावधानों के तहत समान अवसर प्राप्त हो। लेकिन आज हमारे सामने वास्तविक चित्र क्या है? आज जब आजादी के 60 वर्षों के बाद इन सारी बातों को देखते हैं तो हमें आज की चर्चा को देखते हुए बड़ा आश्चर्य लगता है कि यहां बहुत सी गंभीर चर्चाएं होती हैं, उन जंगलों की बात होती है, वहां की गूंज सुनाई देती है। गृह मंत्री बहुत गंभीरता से चर्चा करते हैं। लेकिन आज न गृह मंत्री हैं, न प्रधानमंत्री हैं और न ही सदन के नेता सदन में हैं। अब आएंगे भी या नहीं आएंगे, यह भी कहना बहुत कठिन है। ऐसी परिस्थिति में इस गंभीर मसले पर हम लोग चर्चा कर रहे हैं।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय:कृपया आप शांत रहे, सदन को चलने दें।
…( व्यवधान)
श्री अर्जुन मुण्डा : उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से बताना चाहता हूं कि इन्होंने जो पिछले कई वर्षों में आवंटन दिए हैं, खर्चे किए हैं, जो उपलब्धियां ये गिनाने वाले हैं और जिन बातों की हम चर्चा करने वाले हैं, उन विषयों पर मैं बाद में आऊंगा। मैं पहले इस विषय पर आता हूं कि कहां आप राजा बोझ और कहां गंगू तेली की बात कर रहे हैं। आपने टोटल 11 लाख करोड़ का बजट प्रस्तुत किया। आपके आंकड़े के अनुसार साढ़े आठ प्रतिशत रहने वाली जनजातीय आबादी के लिए, आपने जैसे भोजन के समय कुछ चटनी का भी प्रावधान रहता है, उसी तरह आपने 3200 करोड़ का प्रावधान किया। आप अपनी पूरी पीठ थपथपाने में कहीं कोई कंजूसी नहीं कर रहे हैं। आपने साढ़े आठ प्रतिशत से अधिक आबादी के लिए टोटल 11 लाख करोड़ का बजट प्रस्तुत है, आप कम से कम यह तो ख्याल रखिए। आप कुछ नहीं देते, कम से कम यह तो कहते कि हमने एक परसैंट दिया। आप बताइए कि कितना परसैंट है? मैं इस विषय पर बाद में आऊंगा, लेकिन जो वास्तविक बात है, आप जो कहते हैं कि आपने रिजर्वेशन के माध्यम से जनजातीय क्षेत्रों के लोगों के लिए, पूरे भारतवर्ष में रहने वाले लोगों के लिए आप बहुत चिन्ता करते हैं, बहुत चिन्तित हैं, उनके प्रति आपके मन में बहुत व्याकुलता है। आपकी परेशानी से पूरा देश चिन्तित है कि कल्याण मंत्रालय के माध्यम से भारत सरकार कितनी चिन्तित है। ट्राइबल अफेयर्स के माध्यम से आप कितना बड़ा कार्य करना चाहते हैं। आप इससे क्या काम करेंगे, कौन सा इफ्रास्ट्रक्चरल डेवलपमेंट करेंगे, कितने जनजातीय लोगों को जोड़ेंगे?यह एक दस्तावेज देश के सामने आपने जो प्रस्तुत किया है, वह एक तरीके से असत्य है, धोखा है। आपने एक तरीके से जनता को बहुत कायदे से, किस तरीके से शब्दों से अलंकृत करके खुश किया जाए, ऐसे ताना-बाना बुन करके, कि हम ट्राइबल अफेयर्स मंत्रालय के माध्यम से बहुत सारा कार्य कर रहे हैं। आपने अपनी रिपोर्ट में इसकी सूची गिनाई है, उसमें आपने क्या काम किया है, उसकी कहीं कोई चर्चा नहीं है, सिर्फ ये काम करते हैं, इसकी चर्चा है। इसका आउटकम क्या है, इसके बारे में आपकी कोई चर्चा नहीं है। आपने एनजीओस को दिया, उसका परिणाम क्या आया? इस बारे में कुछ नहीं दिया है। आपने आंकड़ों में अलॉटमेंट दिया, ये आंकड़ों की खेती करते हुए आप चाहते हैं कि ट्राइबल का भला हो जाए। आपके सामने ये कागज बता रहे हैं, आपने जो उत्तर दिया है, समय-समय पर कहा है कि आपको दो तरह से पैसे मिलते हैं, एक इस हाउस के माध्यम से वोटेड मनी मिलती है और दूसरी डायरेक्ट प्रेज़ीडेंशियल आर्डर से चार्ज मनी मिलती है। जो वोटेड मनी है, उसका भी अगर हम पिछले तीन वर्षों का आंकड़ा आपके सामने रखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि किस ढंग से आपने इस विभाग को देखा है। भारत सरकार किस रूप में इस विभाग को देखती है।
          उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि आपने सन् 2007-08 में1719करोड़ का बजट प्रावधान किया, 1719 करोड़ में एक्सपेंडीचर 1524करोड़ हुए और उसमें से 195 करोड़ या 200 करोड़ भी रुपए भी खर्च नहीं हुए। सन् 2008-09में भी आपकी ऐसी ही स्थिति है, 2121 करोड़ में से आपने रिवाइज़्ड एस्टेमेट में घटा दिया।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय: आपको जब बोलने का मौका मिलेगा, तब आप बोलिए।
…( व्यवधान)
 
श्री निशिकांत दुबे (गोड्डा) :  एनडीए को शासन छोड़े हुए छ: साल हो गए।...( व्यवधान)
श्री अर्जुन मुण्डा : शुरुआत में ऐसी हालत है तो बाद में आपका क्या होगा।...( व्यवधान) मैं इसी तरह आपको सन् 2008-09 की बात बताता हूं। 2008-09 में315करोड़ रुपये लैप्स कर गए। 2009-10में उससे और ज्यादा दुर्गति हुई। 1200करोड़ रुपये लैप्स कर गए। क्या इंटैंशन है, क्या विल पावर है, क्या इच्छा शक्ति है, क्या करना चाहते हैं, क्या दिखाना चाहते हैं?आप ट्राइबल्स को किस रूप में देखना चाहते हैं। यह वास्तविकता है। यदि हम देश के पूरे बजट को लें, जनजातीय क्षेत्र को लें, उनकी आबादी को लें, तो कुछ अलग ही कहानी बनती है। आपको जो मिला है, मैं उसकी स्थिति बता दूं। लास्ट में जो 1200 करोड़ रुपये लैप्स किए हैं, वैसे आपने 2000 करोड़ रुपये का खर्च दिखाया है। मुझे पूरी सूचना है कि आपने 2009के 500 करोड़ रुपये फरवरी में एलॉटमैंट दिखाकर पम्प किए कि हम आंकड़ों में दिखा सके कि अगले बजट के समय हमने एक्सपैंडीचर किया है। इसी तरह कई वर्षों के बजट प्रावधान के अनुसार खर्च की गई राशि देखें। मैं इस वर्ष के बजट पर आने से पहले कुछ विषयों को आपके ध्यान में लाना चाहता हूं। यह वास्तविक है, यह आपकी वोटेड मनी है। जिस राशि का किसी भी तरह डायवर्शन नहीं हो सकता। जो राशि कनसॉलिडेट है, उसका खर्चा आपको सुनिश्चित करना चाहिए। उस राशि की क्या हालत है, आप देखें। आंध्र प्रदेश का सन्2009-10में 38 करोड़ रुपये का एलॉटमैंट था। आपने 19 करोड़ रुपये दिए और 19करोड़ रुपये रिलीज़ नहीं किए। असम में 41करोड़ रुपये का एलोकेशन किया। आपने मात्र 28 करोड़ रुपये दिए, 12करोड़ रुपये एलॉट नहीं किए। ...( व्यवधान) इसी तरह आपने गोवा को एक करोड़ 60लाख रुपये एलॉट किए। आपने गोवा को एक करोड़ 60 लाख रुपये में से चाशनी दी, कुछ दिया ही नहीं। अब झारखंड का देखिए। यदि मैं पहले झारखंड के बारे में बोलता तो आप कहते कि झारखंड के हैं, इसीलिए बोल रहे हैं। इसलिए मैंने आंध्र प्रदेश से शुरू किया। झारखंड को 81करोड़ रुपये एलोकेट किए। 81करोड़ रुपये में से शून्य, शून्य, शून्य में लगा दिया, एक रुपया भी एलॉट नहीं किया।...( व्यवधान) जम्मू कश्मीर में आपने 14 करोड़ रुपये का एलोकेशन किया और उसे मात्र 2 करोड़ रुपये दिए और 11 करोड़ रुपये लैप्स करवा दिए, रिलीज़ नहीं किए। मध्य प्रदेश में भी आपने टोटल एलोकेशन के 29 करोड़ रुपये लैप्स करवा दिए, जो वोटेड मनी नहीं है। इसी तरह महाराष्ट्र में 51 करोड़ रुपये का एलोकेशन दिया और मात्र 8 करोड़ रुपये दिए। आपने 2009-10 में 42 करोड़ रुपये लैप्स करवा दिए।
   
          माणिपुर में 10 करोड़ रुपये का एलॉटमैंट दिया, लेकिन वहां आपने मात्र पांच करोड़ रुपये दिये। वहां भी आपका 5 करोड़27लाख रुपया लैप्स है। राजस्थान में 55करोड़ रुपये का एलोकेशन था, लेकिन आपने वहां 34 करोड़ रुपये दिये और21करोड़ रुपया लैप्स करा दिया। तमिलनाडु की स्थिति वही है। वहां पर भी आपने 3 करोड़ रुपया लैप्स कराया। उनको 4करोड़ रुपये का एलॉटमैंट मिलना था, लेकिन आपने उनको एक करोड़ रुपया दिया। उत्तराखंड में 1 करोड़32लाख रुपये मिलना था, लेकिन आपने वहां भी लैप्स करा दिया। उत्तर प्रदेश में 5 करोड़95लाख रुपये देना था, लेकिन उसे भी आपने शून्य बटा शून्य, शून्य, शून्य, शून्य कर दिया। वैस्ट बंगाल में आपने 30 करोड़ का एलॉटमैंट था।  आपने वहां पर भी लैप्स कर दिया। इसमें ऐसा कोई प्रदेश ही नहीं है, जहां आप यह कह सकें कि हमने शत-प्रतिशत पैसा राज्यों को दिया। यह स्थिति आपकी राज्यवार की है।
          आप देश में क्या चाहते हैं?आप हाऊस में बजट लेकर आये हैं, वह इनसफीशेंट है। वह इनसफीशेंट तो है ही, उसके अलावा आपको जो पैसा दिया जा रहा है, वह भी खर्च नहीं हो रहा है। उसको भी आप खर्च नहीं कर रहे। पिछले60वर्षों में आपने इस बात की चिन्ता नहीं की कि ट्राइबल डेवलपमैंट कैसे होगा?आपने सिर्फ इस बात की चिन्ता की कि ट्राइबल का वोट कैसे मिलेगा। आपने इस बात की चिन्ता की कि वह जब तक भूखा, नंगा और गरीब नहीं रहेगा तब तक वह हमें वोट नहीं देगा। आपने वोट की राजनीति की। आज यह स्थिति आपके सामने है। मैं इस बात से बिल्कुल सहमत हूं कि जिसको देश के संविधान पर विश्वास नहीं है, ऐसी ताकतों को रोकना चाहिए, ऐसी ताकतों के लिए भारत सरकार जितने बल का प्रयोग कर सकती है, वह करे, क्योंकि देश का संविधान सबके लिए है।
          उपाध्यक्ष महोदय, मैं यह भी कहूंगा कि जंगलों में रहने वाले, पहाड़ों और कंद्राओं में रहने वाले जो लोकेशनल बैकवर्डनैस के शिकार हैं, जिन्होंने प्रकृति के साथ जीना सीखा, प्रकृति को गले लगाया, प्रकृति के साथ जिया, ऐसे लोगों के साथ आपने क्या किया? आपने उनकी आवाज को कभी सुनने की कोशिश नहीं की। उनके सीने में जो दहकती हुई आग है, उसे कभी समझने की कोशिश नहीं की। आप सिर्फ चर्चा करते हैं। आप ऐसे लोगों के ऊपर कार्रवाई नहीं करते, बल्कि उनके साथ आप फाइव स्टार में बैठकर चाय पीते हैं। जिनको संविधान पर भरोसा नहीं है, विश्वास नहीं है, वह आपके नुमाइंदे बनकर घूमते हैं। जंगलों में जिसके सीने में आग है, दर्द है, कराह है, पीड़ा है, जो अपने दर्दों से छटपटा रहा है, उसे संभालने की बजाय, उसे रोकने की बजाय, उपाध्यक्ष महोदय, मैं यह कहूंगा कि भारत सरकार को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए कि ऐसे जो हार्ड कोर लोग हैं, जो संविधान के खिलाफ बात करते हैं, उनके ऊपर जोरदार ढंग से कार्रवाई होनी चाहिए और आदिवासियों को उग्रवादी बनने से रोकना चाहिए। उनकी दहकती आग को समझने की कोशिश करनी चाहिए।
          उपाध्य महोदय, मैं इस बात को इसलिए कह रहा हूं कि आज मैं इस सर्वोच्च सदन में सांसद के रूप में आया हूं। इससे पहले मैं विधायक, मंत्री और मुख्य मंत्री था। आज मैं सांसद के रूप में इस सदन में आया हूं। लेकिन मुझे यह बात याद है कि मैंने अपनी चार वर्ष की आयु में अपने पिता को एक आदिवासी परिवार से खोया है। मैं आदिवासी परिवार का लड़का हूं। मैंने मां के उस दूध और मां के उस आंचल को देखा है, जिससे संघर्ष की बुनियाद खड़ी होती है। जिस संघर्ष के बल पर आज इस सर्वोच्च सदन में आपके बीच में मुझे कहने का मौका मुझे भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता होने की हैसियत से प्राप्त हुआ है।
          उपाध्यक्ष महोदय, हमें हकीकत को समझने की कोशिश करनी चाहिए। जंगल की आवाज को, आज आप वन नीति की चर्चा करते हैं और यह बात करते हैं। जंगल मे रहने वाले किसी भी व्यक्ति को इससे कष्ट होगा। आज आपके पदाधिकारी कहते हैं, वनों में पदःस्थापित पदाधिकारी कहते हैं कि जंगल में रहने वाले आदिवासियों को अंग्रेजों ने बसाया है। अब अंग्रेज इस देश में आये थे या आदिवासी इस देश में आये थे। कहते हैं फारेस्ट विलेज है। ऐसा कह कर अपमानित करते हैं। जो व्यक्ति प्रकृति के साथ जीता है, मरता है, फल-फूल, कन्दमूल खाकर जीवित रहता है, जिसने हमेशा प्रकृति का आलिंगन किया है, कभी भी वह अपनी आवश्यकता से ऊपर लकड़ी नहीं काटता, कभी भी नहीं चाहता है कि मेरा जंगल बर्बाद हो। जंगलों के पेड़ों पर जब फल लगते हैं, तो सबसे पहले वह अपने आराध्य, पेड़-पौधों को पूजते हुए अनुमति लेता है कि हम आपके पेड़ से फल खाएं या नहीं। वह पूजा करने के बाद, उसकी पद्धति से, विश्वास के साथ वह फल ग्रहण करता है। उसे आप यह कहते हैं कि अंग्रेजों ने इन्हें बसाया?जो जंगल में पैदा हुआ, जंगल में जिया है, जो जंगल में रहा है, जो जंगल का मालिक है, उसे आप फारेस्ट नीति के तहत कहते हैं कि यह फॉरेस्ट विलेज अंग्रेजों ने बसाया? उनके साथ ऐसा क्रूर मजाक करना छोड़ दीजिए। जब यह मजाक करना छोड़िएगा, तो रास्ता निकलेगा। यह लोकेशनल बैकवर्डनेस है।  जंगल में रहना कोई पाप नहीं है, पेड़-पौधों के साथ रहना कोई पाप नहीं है, पेड़-पौधों के साथ जीन सीख लेंगे तो ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या पैदा नहीं होगी। लगातार प्रदूषण पैदा करने वाले, कार्बन पैदा करने वाले आप लोग आदिवासियों से जीना सीखिए। जीना सीखिए जंगलों में रहने वाले लोगों के साथ, पेड़-पौधों के साथ जीना सीखिए। आज फारेस्ट एक्ट की क्या गति है? वह ठीक ढंग से इंप्लीमेंट नहीं हो रहा है। जब फारेस्ट डिपार्टमेंट के लोग गांव में जाते हैं, तो यही कहते हैं कि यह फारेस्ट विलेज अंग्रेजों ने बसाया है। जो जंगल में रहा है, उसे ये लोग कहते हैं कि आपको बसाया गया है। इस देश में अंग्रेज शासन करने आए थे, वे रूलर्स थे, व्यापार करने के लिए आए थ, उनके वाणिज्यिक स्वार्थ थे। अगर ऐसी निरीह जनता के साथ आज भी ऐसा व्यवहार हो रहा है, तो इसे समझना चाहिए। मैं आपको कुछ उदाहरण देना चाहता हूं। आज हमारे मंत्री जी जाते हैं, गृहमंत्री जी भी जाते हैं, सारे लोग जाते हैं, फाइव स्टार होटलों में जाते हैं। कुछ दिन पहले ग्लोबल वार्मिंग पर एक कार्यक्रम हुआ, उसमें मुझे भी आमंत्रित किया गया। लेकिन आज ट्राइबल्स के साथ क्या हो रहा है, वे किस तरीके से जी रहे हैं? आज किसी फाइव स्टार होटल में एक कप चाय की कीमत कितनी होगी? कम से कम 90 रूपए जरूर होगी। उससे ज्यादा ही होगी। आज ममता जी यहां नहीं हैं। मैं बताना चाहता हूं कि झारखण्ड में रेलवे लाइन बिछाई जा रही है। मैं उसकी हालत बताना चाहूंगा। वहां एक विधवा महिला हैं, जिनका नाम मंगरी देवी है। उनकी पुश्तैनी जमीन जो एक एकड़13डिस्मिल है, उसे रेलवे एक्वायर कर रही है। इसके लिए उनको नोटिस दिया गया है कि आपकी इस एक एकड़13डिस्मिल जमीन जिसका खाता नंबर 45, मौजा चिट्टो, रकबा एक एकड़ 13डिस्मिल है, के एवज में मुआवजे के रूप में 1848 रूपए दिए जा रहे हैं। इस तरह प्रति डिस्मिल उस जमीन की कॉस्ट क्या है? जिसने मिट्टी और जंगलों से प्यार किया, जिसने प्रकृति से प्यार किया, जो वहां जिया, वहां मरा, वहीं सभी काम किए, उसकी पुश्तैनी जमीन, खानदानी जमीन जब सरकार के द्वारा ली जा रही है, तो उसका मुआवजा प्रति डिस्मिल 16 रूपए है। आप इतने पैसे में एक कप चाय पिला दीजिए? यह कीमत है आदिवासियों की जमीन की और आप कहते हैं कि हम आदिवासियों के बीच में काम कर रहे हैं।
15.00 hrs.           लैंड एलीनेशन के लिए आर्टिकल 244 एक्सीक्यूट कर रहे हैं। संविधान में लिखा है कि आर्टिकल 244 के माध्यम से लैंड एलीनेशन को रोका जाएगा। वे लोग लैंड एलीनेशन कर रहे हैं, तो यह कहा जा सकता है कि यह नाजायज है, लेकिन जब सरकार ही ऐसा कर रही हो तो क्या उसे जायज कहा जा सकता है, यह देखना चाहिए। सरकार 16 रुपए प्रति डिस्मिल जमीन का मुआवजा दे रही है। अब उस मंगरी देवी के परिवार का क्या होगा, अगर उसका जवान बेटा है तो वह क्या सोचेगा कि उसकी पुश्तैनी जमीन का मुआवजा सिर्फ 1848 रुपए ही दिया जा रहा है। सरकार रेल लाइन के लिए वह जमीन ले रही है। यह बात न केवल रामगढ़, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी हो रही है...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय: श्री अर्जुन मुंडा की बातों के अलावा और कुछ रिकार्ड में नहीं जाएगा।

...( व्यवधान) * श्री अर्जुन मुण्डा : आदिवासियों के बारे में बोलने से पहले आदिवासियों को समझें, केवल भाषण देने से ही उनकी समस्याओं का निदान नहीं होने वाला है।

15.01 hrs. (Shri Francisco Cosme Sardina in the Chair)           सभापति महोदय, मैं कुछ सच्ची और कड़वी बातों को यहां इसलिए रखने का प्रयास कर रहा हूं कि देश में बड़े पैमाने पर, खास कर इन वर्गों में बहुत असंतोष है। मैं उस दिन गृह मंत्री जी को सुन रहा था, जब वह एक चर्चा का जवाब दे रहे थे। उन्होंने अच्छे तरीके से बातों को यहां रखा और कहा कि विकास के कार्य जनजातीय इलाकों में बंद हैं। वास्तव में यह बात सही है कि कई इलाकों में विकास नहीं हो रहा है, लेकिन इन्हें क्यों नहीं शुरू किया गया। देश की आजादी के बाद 60 साल तक यह अवसर आपको मिला था। जब तक आपका शासन रहा, आप वहां तक नहीं पहुंचे। जब तक वे लोग आपको सहयोग दे रहे थे, तब तो ठीक था, लेकिन उन्हें कुछ बुद्धिजीवियों ने भड़काया, जो आपके साथ बैठकर चाय पीते हैं, आइडियोलॉजिकल डिसकशन करते हैं, कांफ्रेंस करते हैं, तो आप अब उनका विरोध कर रहे हैं। जब यहां इसकी चर्चा होती है तो पता नहीं चलता कि कौन किसका समर्थन कर रहा है। आदिवासियों को जिन लोगों के द्वारा भड़काया जा रहा है, पहले उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।

          आदिवासी सच्चे लड़ाकू हैं। सन् 1857 में देश की आजादी की लड़ाई शुरू हुई थी, लेकिन उससे भी पहले सन् 1855 में संथाल परगना की धरती पर आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ने का काम किया था, लेकिन वह स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई नहीं कही गई, क्योंकि वह लड़ाई जंगल, जमीन और जल के लिए लड़ी गई थी। अपने अधिकारों को किस तरह से सुरक्षित रखा जाए इसलिए वह लड़ाई लड़ी गई और कानू, चांद, सिद्धु और भैरव के नेतृत्व में 1855 में महान विद्रोह हुआ, लड़ाई हुई। उस लड़ाई में 30,000 आदिवासी शामिल हुए और उनमें से हजारों की तादाद में शहीद हुए। कानू, चांद, सिद्धु और भैरव भी शहीद हुए।

          सभापति महोदय, मैं उसके बाद की कहानी आपको बताता हूं। ब्रिटिश आर्मी चीफ ने एक आर्डर निकाला, एन्नैल्ज आफ बंगाल में उसकी चर्चा है। उन्होंने मूवमेंट आर्डर निकाला कि फोर्स का मूवमेंट कैसे होना चाहिए। उस आर्डर में यह भी लिखा कि पूरा ट्राइबल एरिया जंगल, पहाड़ों से घिरा हुआ है, यहां मिलिट्री का मूवमेंट होगा, तो इन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए। साथ में यह भी लिखा कि यह पूरा मलेरिया प्रोन एरिया है इसलिए अपने साथ कुनैन भी लेते जाएं।

   

 वर्ष 1855 के मूवमेंट आर्डर में कुनेन का जिक्र है। क्या कुनेन से आज भी इन आदिवासियों को मुक्ति मिली है? मूवमेंट आर्डर में आज भी वही लिखा जाता है जो 1855 में लिखा जाता था। आपकी फोर्स जो वहां जाती है, उसमें से कितने परसेंट को मलेरिया होता है और जब आपकी फोर्स वहां जाती है तो डायरेक्शन देते हैं कि यह दवा लेते जाइये, तो आप आदिवासियों के बीच में क्या काम करेंगे? आप अपनी फोर्स को दवा ले जाने की बात करते हैं लेकिन उन आदिवासियों तक दवा कैसे पहुंचेगी, जंगल के लोगों में जो मलेरिया फैलता है वह कैसे समाप्त होगा, उसकी आपके पास क्या योजना है? आप संवैधानिक आउट-कम की चर्चा करते हैं, आर्टिकल 244 में यह चर्चा करते हैं कि जनजातीय क्षेत्रों में फिफ्थ-शैडय़ूल्ड एरिया में, राज्यपाल, गवर्नर डायरेक्ट ट्राइबल्स के कस्टोडियन हैं और आर्टिकल 244 के माध्यम से एक ऐसा प्रतिवेदन राष्ट्रपति को भेजा जाएगा, जिसमें इस बात का जिक्र होगा कि जनजातीय क्षेत्रों में विकास का काम कैसा हो रहा है, किस तरीके से हो रहा है और उसका परिणाम क्या निकल रहा है? आप बताइये कि आपके बजट में इस बात का उल्लेख है कि किस राज्यपाल ने राष्ट्रपति को कौनसी रिपोर्ट भेजी है? आखिर देश की जनता को आप कैसे विश्वास दिलाएंगे कि आप ट्राइबल्स के बीच में काम कर रहे हैं। उस फोर्मेलिटी को आपने बंद कर दिया है। वह जो विल-पावर थी कि इनको रिजर्वेशन दिया है तो उस रिजर्वेशन के आधार पर हम काम कर रहे हैं, आपने रिजर्वेशन के नाम पर सब को प्रीजर्व कर दिया, फ्रीज कर दिया।

MR. CHAIRMAN: Mr. Munda, you have taken 30 minutes and your Party time is 52 minutes.  How many more minutes will you take?

SHRI ARJUN MUNDA: Sir, we are the largest Opposition Party… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN:  All right. But if you take all the time, your other Party Members will not get time to speak.

श्री अर्जुन मुण्डा : सभापति महोदय, मैं थोड़ी सी बातों का जिक्र कर रहा हूं। मैंने तीन पार्ट में सदन का ध्यान आकृष्ट करने का यत्न किया है क्योंकि यह बजट ही नहीं है, यह ट्राइबल पॉलिसी है। इस पर गंभीरता से हमें सोचना चाहिए कि इस देश में ट्राइबल-पॉलिसी कैसी होगी? माननीय मंत्री जी अपने जवाब में बताएंगे कि पिछले10 साल से ट्राइबल-पॉलिसी पर क्या चर्चा हो रही है। बार-बार प्लानिंग-कमीशनकी वर्किंग कमेटी डिस्कश कर रही है। वर्ष 2002-2007 में और वर्ष 2007-2011 में वर्किंग ग्रुप का डिस्कशन क्या हो रहा है? किन समस्याओं को देखा जा रहा है, इसकी गहराई में मैंने जाने की कोशिश की और मैंने देखा कि फोर्मेलिटी इस ढंग से पूरी की जा रही है कि अलंकृत शब्दों से जनजातीय समाज को खुश किया जा सके और उसी ढंग से रिपोर्ट बनाने का काम किया गया है। प्लानिंग कमीशन की उस रिपोर्ट को एग्जिक्यूट कौन करेगा? वह रिपोर्ट कैसे एग्जिक्यूट होगी, इसकी कोई चर्चा आपने नहीं की है। आपकी डिमांड फॉर ग्रांट में इस बात की कोई चर्चा नहीं है। आज किस तरह की वहां की पॉपुलेशन है, डैमोग्राफी है, किस तरह की आबादी है और उस आबादी के अनुसार आपकी योजना क्या है? लम-सम बजट से ट्राइबल्स का काम करना छोड़ दीजिए, यह लम-सम चटनी है, उन्हें चटनी देकर खुश करने की कोशिश मत कीजिए, रीयल बजट पर आइये। नीड-बेस बजट बनाइये, जो आवश्यकता है उसे समझिये। जो पारिस्थितिजन्य बैकवर्डनेस है, उसके आधार पर बजट बनाइये, चर्चा कीजिए। प्लानिंग कमीशन ने कुछ काम किया है लेकिन आंकड़ों की खेती और आंकड़ों की फसल से क्या आदिवासियों की जिंदगी बदल जाएगी, आदिवासियों का परिवर्तन हो जाएगा। उससे और समस्याएं बढ़ेंगी। वे यहां नहीं आ सकते हैं, हम जैसे कितने लोग आ सकते हैं और आयेंगे भी तो बार-बार यही कहेंगे कि बैठिये, बैठिये।

          आप बार-बार यही कहेंगे कि बैठ जाइए, बैठ जाइए। आदिवासी डिप्रेशन में चला जाता है। मैं सभी मेंटल होस्पिटल्स से रिकार्ड ले कर आया हूं। मैंने देखा है कि ट्राइबल का डिप्रेशन लेवल क्या है। किस तरह से वह जी रहा है। ट्राइबल का करेक्टर है, जंगल में रहता है, उसे लड़ाई लड़नी आती है। उसका करेक्टर ही लड़ाई लड़ने का है। वह जंगलों में करेंगे या मरेंगे। अगर उसे आप नहीं पहचानेंगे, तो वह अपना काम करेगा। डिप्रेशन में व्यक्ति दो ही काम करता है या तो मारता है या खुद मर जाता है। इसी कारण हमेशा विद्रोह होता है, लड़ाई होती है। वह किसी से पीछे हटने वाला नहीं है और वह पीछे हटेगा भी नहीं। यदि आपकी मंशा साफ है तो नीड बेस्ड बजट बनाइए। उनकी आवश्यकता को समझिए और उस ताकत को देश हित में लगाइए। आपकी जितनी आंतरिक समस्याएं हैं, उन सभी समस्याओं का समाधान अकेले आदिवासी मिलकर कर सकते हैं, नहीं तो आप इतिहास पढ़ कर देख लीजिए। आप 1784 की घटना को देखिए। 1784 में तिलकामा जी, जिन्हें भागलपुर में फांसी पर चढ़ा दिया गया। वहां आज भी लोग महसूस करते हैं कि बाबा तिलकामा जी को यहां फांसी दी गई थी। उन्होंने कहा था कि एक अंग्रेज पदाधिकारी यहां आया है, जो हम आदिवासियों को तंग कर रहा है। हमारी जमीन, जोत, मालिकाना अधिकार को छीनने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने अपनी माँ से अनुमति मांगी कि ऐसे पदाधिकारियों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। उनकी विधवा माँ ने कहा कि तुम यदि आदिवासी की कोख से पैदा हुए हो, तो उसे मारने के बाद मेरे पास लौटना। उन्होंने उसे तीर की नौक पर मारा और उसके बाद फांसी पर चढ़ गए। यह आदिवासी करेक्टर है। इस करेक्टर को एनर्जी के रूप में हमें इस देश में लागू करना चाहिए। अगर हम इसे देश में ताकत के रूप में लागू करेंगे, तो देश की समस्या का समाधान होगा। आप इस ऊर्जा को काम में लगाइए। इस ऊर्जा को समझने की कोशिश कीजिए और यदि आप कहेंगे कि हम खाने के साथ स्वाद के लिए चटनी दे रहे हैं, तो आप देखिए। इससे समस्याएं बढ़ेंगी। दहकती आग पूरे क्षेत्र को जलाने का आप काम कर रहे हैं। हम सभी उस आग में झुलसेंगे। जब गांव में आग लगती है, तो पूरा गांव ही जलता है, कोई एक घर ही नहीं जलता है। जिस ढंग से जनगणना में हेल्थ सिनेरियो दिखता है, एजुकेशन सिनेरियो दिखता है, जो परिणाम हमारे सामने हैं, कई रिपोर्ट, कई कमीशन बने हैं। उनकी रिपोर्ट आई है और हम सिर्फ अपनी विवशता जाहिर करके अपना रोना रोए हैं। अगर आप आरक्षण की बात करते हैं, तो उसमें ईमानदारी होनी चाहिए। आज आपके पास बैकलोग है, क्योंकि आरक्षण की आपने पात्रता तैयार नहीं की है। जहां पात्रता पूरी है, वहां आपने कोशिश की कि वह पोस्ट तीन साल तक खाली रहे और तीन साल बाद वह पद समाप्त हो जाएगा और उस पद को आरक्षित करने की आवश्यकता नहीं रहेगी। इसी तरह से यह बिना रुके जारी है। पंडित नेहरू जी ने इस देश में जनजातियों की कुछ बातों को समझने की कोशिश की और उन्होंने कहा कि इस देश में इनवेस्टमेंट पर उसका मूल्यांकन नहीं होना चाहिए, बल्कि आउट-कम पर उसका मूल्यांकन होना चाहिए। उन्होंने कहा कि पंचशील की नीति पर काम होना चाहिए। आपको इस बात पर ध्यान नहीं देना चाहिए कि उस पर कितना खर्चा हुआ, बल्कि इस बात को देखना चाहिए कि इससे फायदा कितना हुआ। क्या आपने इस बारे में कभी सोचा है? आपने नेहरू जी की उन बातों का भी ध्यान नहीं रखा और आप कहते हैं कि आप तो खानदानी कांग्रेसी हैं। यह आश्चर्यजनक है। अगर पंचशील की नीति को सही ढंग से क्रियान्वित की होती, तो देश की और आदिवासियों की आज यह दुर्दशा न होती।

          आपने उसे भी नहीं माना और लोगों के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं। आप उन्हें उग्रवाद की ओर मत धकेलिए। मेरी विनम्र प्रार्थना है कि उसकी ताकत को समझने की कोशिश करें, उनकी मानसिकता को समझने की कोशिश करें। कांस्टीटुंट एसेम्बली में जयपाल सिंह मुंडा ने कहा था, इसी बात को दोहराया था यदि आप इस देश में डेमोक्रेसी को लागू करना चाहते हैं, आप चाहते हैं कि इस देश में डेमोक्रेसी आए, You learn from tribals who are the most democratic people in the world.उन्होंने इसका हाउस में जिक्र किया था और कहा था कि डेमोक्रेटिक सिस्टम को समझिए। पेड़ और जंगलों में रहने वाले सिर्फ मनुष्य से ही परमिशन नहीं मांगते, पेड़-पौधों से मांगते हैं। हल जोतने से पहले खेत में जाकर कहते हैं - आप अन्नदाता हैं, हम हल जोतेंगे तो आपको कष्ट होगा लेकिन आपकी उर्वरा से मेरा पेट भरेगा, उदर भरेगा। इसके बाद वह हल जोतता है और खेती करके अनाज पैदा करता है। इस अनाज से अपना जीवन चलाता है। ऐसे सरल और सादे जीवन के साथ आपने छेड़छाड़ करने की कोशिश की है, आपने हर तरह से छेड़छाड़ करने की कोशिश की है। एक तरफ बजट प्रोवीजन किया है और इतनी राशि बजट में दे रहे हैं लेकिन उसे ध्वंस करने के लिए कितनी राशि दे रहे हैं, इसका हिसाब-किताब कीजिए। उस क्षेत्र में कितना पॉल्यूशन फैला रहे हैं, उसे देखिए। वहां के कस्टमरी सिस्टम को तोड़ने के लिए कितना खर्च कर रहे हैं, उसे देखिए। चाहे आर्टिकल 16 हो,164हो, 244 या245हो, कांस्टीटुएशन में कम से कम दस जगह, इस बात का जिक्र है कि किसी बात के होते हुए प्रोटेक्शन देना है, आरक्षण देना है, इनकी भावनाओं और अधिकारों को सुरक्षित करना है। आप फिफ्थ शैडय़ूल के बारे में भी चर्चा करते हैं कि इसमें छेड़छाड़ करें क्योंकि इसके माध्यम से आपको मौका नहीं मिलता। सुप्रीम कोर्ट ने समता जजमेंट में आंध्र प्रदेश के मामले में फैसला सुनाया। जनजातीय समाज जंगलों में रहता है, पेड़ पौधों के बीच रहता है लेकिन वह गरीब नहीं है, गरीब हमने बनाया है, हमारी व्यवस्था ने बनाया है। जहां जंगल हैं, वहां खनिज पदार्थ हैं। खनिज पदार्थ हल्के नहीं हैं कि चूना पत्थर मिलता है। उन्हीं जंगलों में लोहा, सोना, चांदी, अभ्रक, कोयला, यूरेनियम मिलता है जहां आदिवासी और आदिवासियों का दिल बसता है। जहां आदिवासी रहते हैं वहीं ये सब चीजें मिलती हैं। लोकेशनल बैकवर्डनस जंगल होने के कारण नहीं है। समता जजमेंट के आधार पर आपने किसी स्टेट कोनहीं कहा कि वे किस ढंग से काम करें ताकि उनके अधिकार केंद्रित हो, उनको उनका अधिकार मिले। आपने उसका मखौल उड़ा दिया और वह फैसला फैसला ही रहा। उस फैसले का आगे कुछ नहीं हो सका। मैं मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि आप आदिवासी परिवार से ही हैं, मेरुदंड सीधा कीजिए और कोशिश करके इन सब चीजों को केबिनेट में बोलिए कि पॉलिसी क्या होगी। आप हिम्मत से बोलिए, नहीं तो छोड़ दीजिए और बोलिए कि यह काम नहीं करेंगे। आपके ऊपर लोगों की जिम्मेदारी है और अगर आप नहीं करेंगे तो आपको भी जंगल में घुसने नहीं देंगे। आपको कठिनाई होगी। आज स्थिति यह है। मैं सिर्फ एक बात का जिक्र करूंगा कि वर्ष 1903 में छोटा नागपुर -ए लिटल नोन प्रोविंस, बुक पब्लिश हुई थी। मैं सिर्फ फोटो दिखाना चाहता हूं आप इसे देखिए।

          आज जो फोटो अखबारों में छपी है, उसे भी देखिये कि उसमें कितना बदलाव आया है। इसमें जो लिखा है मैं उसका थोड़ा सा जिक्र करूंगा कि किस ढंग से यहां पर लोगों ने खेल खेलने की कोशिश की है, लोगों ने जनजातीय चरित्र को बदलने की कोशिश की है। ब्रेडली बर्ट अंग्रेजी राइटर ने 1903 में लिखा है और उन्होंने इस बात को स्वीकार किया है कि किस ढंग से यहां पर यह सब हो रहा है।

          सभापति महोदय, डैवलपमैन्ट का यह मतलब नहीं है कि उन्हें बदल दिया जाए। उन्हें उनके आधार पर जीने का अवसर मिलना चाहिए और यदि उन्हें उनके आधार पर जीने का अवसर नहीं मिल रहा है तो उसकी आजादी का मतलब नहीं निकलता है। यह कल के अखबार में छपा था। यह झारखंड का दृश्य है और भी कई प्रदेशों के दृश्य हैं। एक सौ साल बाद भी फोटो में कितना मेनटेन किया है। उस समय से आज तक फोटो मेनटेन किया है। यदि कोई चीज बदलाव लाया है तो हम इस बात को कहते हैं कि यदि कोई आदमी अपने मन से देश की स्वतंत्रता, देश की सार्वभौमिकता स्वीकार करता है। लेकिन जिस ढंग से इस बुक में लिखा है, उसे मैं थोड़ा सा पढ़कर सुनाना चाहता हूं। I quote:

 “There is only one last bit scattered Ranchi of special interest. The English, German and Roman Catholic Missions, which have worked with such wonderful success over large districts in Chota Nagpore, all have their headquarters here. Four Lutheran Ministers, sent out by Pastor Gossner of Berlin in 1845 were the pioneers of missionary enterprise. Arriving in Ranchi, they started work among the Kols, labouring for five years before a single convert was made.”     पांच साल के बाद एक आदमी को मिला कि वह कंवर्ट हुआ।I quote again:
 “However, once begun, their numbers rapidly increased, until in 1869, there were about ten thousand native Christians to be found in the district.”   यह मैंने नहीं लिखा, हमारे खानदान के किसी आदिवासी ने नहीं लिखा।1903 में ब्रेडली बर्ट ने इस बात को स्वीकार करते हुए लिखा है और वायसराय ने इसमें नोट लिखा है, एकनॉलिज किया है और किस ढंग से इसका संस्कृति पर आश्चर्यजनक प्रहार हुआ है। क्या चाहते हैं, जंगलों में आवाज नहीं करेंगे तो क्या करेंगे। कई इस तरह की घटनाएं, इस तरह की चर्चाएं आज हम सारे लोग सुनते हैं। इसलिए आदिवासियों को आदिवासियों की तरह जीने का अधिकार मिले, यही कहने के लिए आज मैं सदन में खड़ा हुआ हूं।
          मैं अंत में यह कहना चाहता हूं कि चर्चा बहुत सारी चीजों पर करनी थी, लेकिन समय की पाबंदी है, यदि आप मुझे फिर मौका देंगे तो मैं अधूरी बात को फिर से कहूंगा।
MR. CHAIRMAN : You can take five minutes more. But nobody else from your party will get a chance, because there are others also who want to speak in this debate.
श्री अर्जुन मुण्डा : सभापति महोदय, मैं सिर्फ इतनी बात और कहूंगा कि महात्मा गांधी जी ने हिंद स्वराज की बात की थी। सौ साल पहले1909 में उन्होंने यह कहा था। उस हिंद स्वराज की जो प्रकृति थी, वह जनजातीय जीवन पर आधारित थी, उसमें आदर्श भारत की कल्पना थी। उसका यदि अनुसरण करना चाहते हैं तो केन्द्र सरकार नीड बेस्ड बजट बनाये और उसका इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करे, यह फॉर्मेलिटी न करे कि हमने राज्यों को पैसा भेज दिया। सरकार पेपर प्रोग्रैस न दिखाये। यह मेरा सुझाव है। अन्यथा आज के दिन यह पेपर प्रोग्रैस प्रॉक्सी रूलिंग में दिखाई दे रहा है। प्रॉक्सी रूलिंग बहुत खतरनाक है। यह बात मैं सुझाव के तौर पर कहना चाहता हूं, क्योंकि मैं हकीकत के बारे में आपको बताना चाहता हूं।
          आज जनजातीय समाज में एक हजार बच्चे जन्म लेते हैं और उनमें से 82 बच्चे जन्म लेते ही मर जाते हैं। यह उनकी हैल्थ की स्थिति है। जो बच्चे बचते हैं, उनमें से 126बच्चे पांच वर्ष की आयु पूरी नहीं करते हैं। वे पांच वर्ष की आयु पूरी करते-करते मर जाते हैं, पता नहीं मैं मरते-मरते कैसे बचा और यहां आया हूं। इसके साथ ही जो बच्चे बच जाते हैं, उनमें से 55प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार होते हैं। मैं यह भारत सरकार के आंकड़े देखकर ही कह रहा हूं, ये मेरे आंकड़े नहीं हैं।...( व्यवधान)
श्री निशिकांत दुबे :  आप कुपोषण पर चर्चा नहीं करना चाहते हैं।...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN : Nothing will go on record.
(Interruptions) …* MR. CHAIRMAN: Hon. Members, please sit down and let him speak.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Nothing will go on record.
(Interruptions) …* MR. CHAIRMAN: You please sit down.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Please sit down.  Nothing is going on record, I have already said that.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Hon. Members, please sit down.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: He is already speaking.  You please sit down.
… (Interruptions)
MR. CHIARMAN: Please sit down.  Mr. Munda, wind up now.  You have two more minutes to speak.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: You sit down first.
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: Hon. Member, you have just to minutes more.
… (Interruptions)
श्री अर्जुन मुण्डा :  महोदय, मुझे उनके कहने का अफसोस नहीं है क्योंकि वे अपने को ही कह रहे हैं। 60 साल में जो बीज बोया है, उसकी ही फसल काट रहे हैं। मुझे उनकी बात का कोई गम नहीं है।
MR. CHAIRMAN: Please wind up and address the Chair.
श्री अर्जुन मुण्डा :  महोदय, स्वास्थ्य की स्थिति यह है कि 55 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हो जाते हैं और उसके अलावा जो बचते हैं, वे बेगारी, बेरोजगारी मे भटकते हैं और बंधुआ मजदूर के रूप में काम करते हैं। आप पूछिये कि आज ऐसे कितने लोग दिल्ली में घरों में काम करने वाले हैं। वे यहां आते हैं।...( व्यवधान)
THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PLANNING AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI V. NARAYANASAMY): Sir, he should address the Chair.
श्री अर्जुन मुण्डा :महोदय, यह हैल्थ की स्थिति है।...( व्यवधान)
SHRI NISHIKANT DUBEY: Sir, he cannot guide the House.
MR. CHAIRMAN: You sit down.  I have already told him.
श्री अर्जुन मुण्डा :  महोदय, मैं शिक्षा पर बात करता हूं। शिक्षा पर इतना सारा स्टैटिस्टिक आया है। आप सिलैक्टिड एजुकेशनल स्टैटिस्टिक देखिए, एजुकेशन इन इंडिया में देखिए, एजुकेशनल एनुअल रिपोर्ट 2002 में देखिये।           जनगणना2001में देखिये। ये सारी चीजें दिखाती हैं कि आदिवासियों की वास्तविक स्थिति को आपने पिछले साठ वर्षों में कहाँ पहुँचा दिया। आप बहुत ऊँची आवाज़ में बोल सकते हैं क्योंकि हम लोग तो धीरे वाले हैं। आप बोल सकते हैं। क्योंकि हमें हमेशा दबाने की कोशिश करते हैं। आप बोलिये लेकिन सच तो आपके आँकड़े ही बोल रहे हैं। ...( व्यवधान) मुझे बताने की जरूरत क्या है।
MR. CHAIRMAN: Please wind up now; I am calling the other man.
… (Interruptions)
श्री अर्जुन मुण्डा : सभापति महोदय, मैं दो मिनट आपका समय लूँगा। आज जो आर्थिक स्थिति है, ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Shri Shailendra Kumar, please get ready.  Just wind up; one minute more; please.  Just conclude; please conclude. 
… (Interruptions)
 MR. CHAIRMAN:  Please wind up now; you had so much time.
… (Interruptions)
SHRI ARJUN MUNDA : Sir, give me only a few minutes.… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN: One minutes more, please.
श्री अर्जुन मुण्डा : सभापति महोदय, यह जो आर्थिक स्थिति है, उसके एरिया में सारे लौह-अयस्क, खदान और सारी चीज़ें हैं, लेकिन वह आदिवासी धूल फांक रहा है। कालाहांडी बाक्साइट माइन्स में धूल फांक रहा है। आइरन ओर में उड़ीसा और झारखंड धूल फांक रहा है। कोयला में धनबाद धूल फांक रहा है। ये सारे आदिवासी क्या धूल फांकने के लिए हैं? संथाल परगना धूल फांक रहा है। उसकी ज़मीनें यदि जा रही हैं तो 16 रुपये डिसमिल का भाव मिल रहा है। यह उसकी वास्तविक स्थिति है। सारे आँकड़े आपके सामने हैं। बीपीएल में सबसे अधिक यदि कोई है तो वे आदिवासी हैं। सारी संपत्ति, सारी दौलत, प्रकृति की दी हुई चीज़ को संभालकर रखने वाला आदिवासी आज गरीबी की हालत में जी रहा है, इसलिए ...( व्यवधान) सभापति जी, इन लोगों को कहिये कि समझ लीजिए ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Now wind up.  Shri Shailendra Kumar, you please get up.
          … (Interruptions)
श्री अर्जुन मुण्डा : आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए मैं आपका धन्यवाद करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूँ।
श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी): माननीय सभापति जी, आपने मुझे 2010-11के जनजातीय कार्य मंत्रालय के नियंत्रणाधीन अनुदानों की मांगों पर बोलने का अवसर प्रदान किया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ। बहुत सारी जानकारियाँ मुझसे पूर्व वक्ताओं ने अपने उद्बोधन में कहीं। राष्ट्रपति बापू ने आदिवासियों को गिरिजन कहकर संबोधित किया था। आदिवासी का मतलब होता है मूल निवासी। आज पूरे देश में 9करोड़ के करीब आदिवासी निवास करते हैं जिनके बारे में इस बजट में हम चर्चा करने के लिए खड़े हुए हैं। जहाँ तक देखा जाए तो मेघालय मिज़ोरम और नागालैन्ड में 80 से93प्रतिशत तक आदिवासी हैं। बाकी अगर देखें तो मध्य प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और गुजरात में आठ परसेंट से लेकर 23 परसेंट लोग हैं। मुख्यतः इनकी लड़ाई हमेशा जल जंगल और ज़मीन से हुई है। आदिवासी भगवान शिव को भी अपना आराध्य मानते हैं और यह मानते हैं कि भगवान शिव भी आदिवासी थे और महर्षि वाल्मीकि भी स्वयं भील आदिवासी थे, ऐसी आदिवासियों की आस्था है।
          महोदय, आदिवासियों के विषय में इससे पहले भी इस सदन में चर्चा हुई है। इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि समाज की मुख्यधारा से ये आदिवासी वंचित हैं, 2008में वनाधिकार विधेयक कानून पारित हुआ जिसके लिए एक समिति बनी थी। देव जी उसके चेयरमैन थे और मैं उसका सदस्य था। मुझे याद है कि हम यहाँ पर चर्चा कर रहे हैं कि जो आदिवासी पीढ़ियों से जंगल में रह रहा है, उसके विषय में हमें चिन्ता करनी है और तमाम सम्मानित सदस्यों ने अपने विचार यहाँ रखे हैं और आज भी अगर देखा जाए तो वनों की भूमि पर जिनका सदियों से कब्ज़ा और अधिकार था, आज तक उनको वह अधिकार नहीं मिल पाया है, वे वंचित हैं।
          कानून तो हमने बनाएं हैं, लेकिन आज आदिवासियों का स्वरूप बदल चुका है। आदिवासियों की कुछ जातियां ऐसी हैं, जो घुमन्तू के रूप में हैं। उन्हें जंगल से निकाला गया तो वे घुमन्तू के रूप में रात में कहीं ढेरा जमाते हैं और अगले दिन कहीं ओर चले जाते हैं। जहां तक राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की बात है, आयोग तो हमने अनुसूचित जाति और पिछड़ी जाति आयोग बनाया है, लेकिन हम इन्हें वैसा संवैधानिक दर्जा नहीं दे पाए हैं, जैसा कि चुनाव आयोग को प्राप्त है। इस पर विचार करने की आवश्यकता है कि जब तक चुनाव आयोग जैसे अधिकार इन आयोगों को नहीं देंगे, तब तक सुधार होने वाला नहीं है। इस बारे में सरकार को गंभीरता से सोचना होगा। सड़क, बिजली और पानी, शिक्षा, रोजगार का बहुत अभाव है और इसी कारण से नक्सलवाद और माओवाद पनप रहा है। सरकार की बहुत सी योजनाएं हैं, जिनमें से एक एसजेएसवाई योजना भी है। आदिवासियों के हाथों में बहुत कला संस्कृति होती है, यदि उनकी कला संस्कृति को प्रोत्साहन दिया जाए तो उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाए जा सकते हैं। लेकिन इस ओर सरकार का ध्यान नहीं है। मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, अरूणाचल प्रदेश एवं अन्य पूर्वोत्तर राज्य हैं, जहां 80 से93प्रतिशत तक आदिवासियों की जनंसख्या निवास करती है। जिन्होंने रोजगार के अभाव में आतंकवाद का रास्ता अपनाया है। इस ओर हमें गंभीरता से विचार करना होगा।
          महोदय, मैं इस पर पूर्व में भी चर्चा कर चुका हूं और मैंने यह मामला शून्यकाल में भी उठाया था कि इलाहाबाद की कोल जाति को अनुसूचित जाति में रखा गया है, जबकि कोल जाति को अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश में जब माननीय मुलायम सिंह जी मुख्यमंत्री थे तो कैबिनेट के डिसीजन से विधान सभा में बिल पास हुआ, उसका गजट निकला, लेकिन वह आज भी केन्द्र सरकार के विचाराधीन है, लेकिन आज तक भी हम उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं दे पाए हैं। वे लोग सुबह से शाम तक गिट्टियां तोड़ते हैं, क्योंकि वह बुंदेलखंडी पथरीला इलाका है। उन्हें टीबी और दमा जैसी तमाम तरह की बीमारियां हैं। उनके स्वास्थ्य और उनके बच्चों के लिए शिक्षा के कोई इंतजाम नहीं हैं। मेरा आपसे आग्रह है कि कोल जाति के लंबित मामले को जल्द से जल्द अनुसूचित जनजाति में शामिल करें।
          महोदय, हमें विभिन्न स्थायी समितियों के साथ विभिन्न प्रदेशों में जाने का मौका मिला। आपने देखा होगा कि पूर्वोत्तर राज्यों के आदिवासियों की सांस्कृतिक सभ्यता, कला काफी अच्छी है। यदि हम आदिवासियों को जंगलों से विस्थापित करते हैं तो हमें यह देखना होगा कि हम उनकी सांस्कृतिक सभ्यता को किस प्रकार से सुरक्षित रख सकते हैं। इस ओर विशेष ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि आदिवासियों की सांस्कृतिक सभ्यता धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।
          महोदय, आदिवासियों के लिए केवल 3200करोड़ रूपये का बजट रखा गया है, जबकि इस देश में आदिवासियों की संख्या नौ करोड़ है। यह बजट बहुत कम है और इसे बढ़ाने की आवश्यकता है। मैं आपके माध्यम से मांग करता हूं कि इस बजट को बढ़ाया जाए क्योंकि 9 करोड़ आदिवासियों पर 3200 करोड़ रूपये कोई मायने नहीं रखते हैं। अभी मुण्डा जी कह रहे थे कि यह केवल ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है, इसे बढ़ाने की जरूरत है। इस विभाग को नोडल डिपार्टमेंट बना कर हमें रखना पड़ेगा, तभी हम आदिवासियों की संस्कृति, सभ्यता और कला की संरक्षा को सुरक्षित रख पाएंगे, इस तरफ हमें विशेष ध्यान देना होगा। अभी मुण्डा जी राज्य सरकारों की बात कह रहे थे कि फलां प्रदेश को इतना मिला, हमें केवल राज्यों पर डिपेंड नहीं रहना पड़ेगा। राज्यों पर डिपेंड होकर हम आदिवासियों का सुधार कर लेंगे या उनके विकास की बात कर लेंगे, राज्यों को बजट देकर हम आदिवासियों के सुधार की बात नहीं कर सकते। आज जरूरत इस बात की है कि हमें ट्राइबल पॉलिसी बनानी पड़ेगी और उसके बाद हमें यहां से मोनिटरिंग भी करनी पड़ेगी, तभी हम आदिवासियों के विकास की बात कर सकते हैं।
          सभापति महोदय, आपके माध्यम से सरकार से मैं यह निवेदन करना चाहूंगा कि ट्राइबल एडवायज़री काउंसिल भी बनाई जाए। स्टेंडिंग कमेटी में यह भी तय हुआ था कि माननीय प्रधान मंत्री जी की अध्यक्षता में बना दीजिए। मंत्री ग्रुप का समूह है, हमारे तमाम आदिवासी यहां पर मेम्बर ऑफ पार्लियामेंट है, उन्हें सदस्य बना दीजिए। उनसे राय-मशविरा करके आदिवासियों के विकास के बारे में आप चिन्ता कीजिए, उनके विकास की बात कीजिए, तभी हमारा मकसद पूरा हो पाएगा। पुश्तैनी रोजगार से जुड़े हुए जो आदिवासी हैं, आज उन्हें उनके रोजगार से महरूम किया जा रहा है, उन्हें रोजगार से हटाया जा रहा है।          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा, केवल ये आदिवासियों की बात नहीं, अन्य जातियां भी हैं, उसमें पिछड़ी जातियां भी हैं, जिनका अपना पुश्तैनी रोजगार है -जैसे ताड़माली है, बिहार में पासी हैं, ये वहां ताड़ी निकालने का काम करते हैं। वे शराब भी बनाते हैं, लेकिन बेचने वाले दूसरे हैं, उत्पादन कोई करता है, निकालता कोई अन्य है और बेचता कोई अन्य है। करोड़पति एवं अरबपति कोई बनता है, लेकिन उनकी स्थिति वैसे की वैसी है। यही कारण है कि आज इलाहाबाद में जो गंगा-यमुना के किनारे बसे हुए लोग हैं, पिछड़ी जाति के, खास कर केवट, निषाद, बिन्द, मल्लाह आदि के बारे में मैंने शून्य-काल में जिक्र किया था। उन्हें न तो घाट का पट्टा मिला, न मछली पालन का, न ही बालू का । जब माननीय मुलायम सिंह यादव जी मुख्य मंत्री थे तो उन्होंने मछली पालने का घाट का पट्टा, नाव का पट्टा और बालू का पट्टा आदि देने का काम किया था। आज वह माफिया के हाथों में है और यही कारण है कि उन्होंने लाल सलाम गुलाबी सेना नाम से अपना संगठन बना लिया। उनके हाथ में कटार, भाला आदि हथियार रहते हैं। पुलिस वहां खड़ी देखती रहती है और वह कुछ नहीं कर पाती। आज उनके पुश्तैनी रोजगार को अगर आप छीन रहे हैं, वे हथियार नहीं उठाएंगे तो क्या करेंगे?इस पर हमें गंभीरता से सोचना पड़ेगा। आज यही कारण है कि नक्सलवाद, माओवाद बढ़ा है। अभी मैं एक बुकलेट देख रहा था तो मुझे पता चला कि उड़ीसा में बहुत से ऐसे आदिवासी हैं, जिनकी कोई जिन्दगी नहीं है। उनकी जिन्दगी जानवरों से भी बदत्तर है। उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य किया जा रहा है, इस तरफ भी सरकार को सोचना पड़ेगा। हमारे देश की जो संस्कृति और सभ्यता है, जो मूल निवासी और आदिवासी थे, उन्हें हम कैसे सुरक्षित रख पाएं, उनके विकास की बात हम कैसे कर पाएं, इसके लिए सरकार को सोचना पड़ेगा। इन्हें देश की मुख्य धारा से भी जोड़ना पड़ेगा।
          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि जहां तक शिक्षा की बात है, शिक्षा का संवर्धन करके इनके विकास की बात की जाएगी, तभी इनका विकास हो सकता है। ये भुखमरी और कुपोषण के शिकार हैं। आज ये समाज की मुख्य धारा से अलग हुए हैं, इन्होंने ऐसे ही हथियार नहीं उठाए हैं। ऐसे ही माओवाद और नक्सलवाद पैदा नहीं हुआ है।
          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से निवेदन करूंगा कि इस बात को गंभीरता से सोचें कि आज नक्सलवाद, माओवाद, तमाम आतंकवाद जो पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ा है, उसका क्या कारण है?इस विभाग का नोडल डिपार्टमेंट, ट्राइबल एडवायज़री काउंसिल और इसके बजट को बढ़ाने की जरूरत है और केन्द्र सरकार से यहां मोनिटरिंग करने की जरूरत है, तभी आदिवासियों का विकास हो सकता है।
          सभापति महोदय, इन्हीं शब्दों के साथ मैं इस बिल का पुरजोर समर्थन करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।
                                                                                                     
MR. CHAIRMAN : Hon. Members, I have a list of 32 more speakers to speak on this Demand for Grant. Those who want to lay their written speeches, they can lay on the Table of the House.
श्री शरद यादव (मधेपुरा): सभापति जी, आज ट्राइबल की बाबत हमने पैसे का जो आबंटन किया है, उस पर इस सदन में चर्चा हो रही है। आज विकट स्थिति है। किसी देश की जिंदगी में साठ वर्ष बहुत लंबे होते हैं। इस लंबे समय में यदि कोई एक इलाका, कोई एक हिस्सा या कोई एक जमात निरंतर-निरंतर गरीबी में, भूख में, सभ्यता में कोई एक चीज नहीं है, जिसमें उसको धकेल किनारे नहीं खड़ा किया हो। अभी अर्जुन मुंडा जी बोले, उनके साथ बहुत से साथी बैठे थे, लेकिन अब वे सभी चले गए। वे रहते तो मैं उनकी बात का भी थोड़ा जिक्र करता।
          महोदय, इस देश में दलितों की आवाज है, किसान और पिछड़े लोगों की भी आवाज है और जो इस देश के प्रभु लोग हैं, उनकी आवाज तो सदियों से है।जो रूलिंग क्लास है, उसकी आवाज तो सदियों से है।आजादी के पहले या बाद में उनकी आवाज में कोई फर्क नहीं आया है। उनके देखने में ही फर्क नहीं आया है। आजादी की लड़ाई का कोई सबसे बड़ा सिद्धांत है और उस आजादी की लड़ाई के सबसे बड़े आदमी का कोई सिद्धांत है। अनवरत हमेशा चिंता में एक आदमी, महात्मा जी रहते थे, उनकी सोच थी कि जो लोग इस देश में खेत-खलिहान और जंगलों में रहते हैं, उनकी जिंदगी बनेगी, तो आजादी से ही बनेगी। उनकी जिंदगी संवर जाएगी और उसी के लिए हमने आजादी की लड़ाई लड़ी। आजादी के मायने वही थे। लेकिन आज एक जमात की आवाज कहीं नहीं है, न उसका नेतृत्व है। उसका नेतृत्व भी, जस प्रजा तस नेता होता है।वे सीधे लोग हैं। जो नॉन ट्राइबल लोग हैं, उनकी जिस तरह की चेतना है, वह जिस तरह सभ्यता में आगे हैं, वह आज से नहीं हैं, पहले से ही हैं। पहले के लोगों ने ऐसी तबाही और बर्बादी का दौर उनकी जिंदगी के आसपास नहीं चलाया था, जो हमने चला दिया है। हमने 60 वर्ष में चला दिया है।
          महोदय, मैं सच कह रहा हूं कि अंग्रेजों के जमाने में भी जंगल इतना छेड़ा नहीं गया था, जैसा हमने आदिवासी इलाके को घेरकर के छेड़ दिया है और ऐसा छेड़ा है, जो सबसे बड़ी बात है, जिसका जिक्र यहां नहीं हुआ। जब से बाजार आया, बाजार आएगा और हम इसे रोक नहीं सकते हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि बाजार जो है, वह आज है।सदियों से बाजार है। पहले यात्रा करने की सीमा थी, लेकिन आज नहीं है। बाजार आएगा।  हमको भी ले जाना है और उनको भी लाना है, लेकिन इस बाजार के चलते जो मल्टीनेशनल हैं, जो कारपोरेट्स हैं, हिंदुस्तान में उनकी कहीं रूचि नहीं है।वह सबसे ज्यादा इन इलाकों में गए हैं। इन इलाकों में उनकी रूचि है।एक दौर 17-18 वर्ष से चला हुआ है, जो वर्ष 1991 से चल रहा है कि कौन मुख्यमंत्री कितना ज्यादा निवेश लाता है?
          निवेश की होड़ लगी है। निवेश की होड़ मुम्बई, कर्नाटक, गुजरात में हो तो बात समझ में आती है, लेकिन गुजरात में जब निवेश होता है तो वह इलाका भरूच से लेकर छोटा उदयपुर है। उसमें सबसे बड़ा हमला है, वहीं लोग जाते हैं। बाजार का हमला हिन्दुस्तान की और जगहों पर कम है, सबसे ज्यादा हमला हिन्दुस्तान के आदिवासी इलाकों में हुआ है। मैं भारत सरकार से निवेदन करना चाहता हूं। यहां कोई मंत्री नहीं बैठे हुए हैं।...( व्यवधान) ठीक है भूरिया जी मंत्री हैं, लेकिन केबिनेट मंत्री एक भी नहीं हैं।...( व्यवधान) आप इससे खुश हैं, मुझे क्या एतराज है।...( व्यवधान) मैं इतना ही निवेदन करना चाहता हूं कि बाजार का सबसे ज्यादा हमला किस इलाके में हुआ, सबसे ज्यादा एमओयू कहां हुए? उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़ में हुए। वहां किस चीज के लिए एमओयू हुए। नक्सलवाद पर चर्चा हो रही थी। गृह मंत्री जी अपनी बात रख रहे थे। वह अधूरा सच है। उस इलाके में बड़ी उथल-पुथल है। पांच हजार एकड़, दस हजार एकड़ जमीन घेरी जा रही है। हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी दौलत पहाड़ों में है, आदिवासियों के आस-पास है। वहीं हमला हुआ है। जब हमला वहीं हुआ है तो उनकी जिंदगी पर हर तरह से मार हुई है। उन इलाकों में विकास के पांच पैसे भी नहीं पहुंचते। उन इलाकों में विकास का कोई काम ही नहीं होता। जो ट्राइबल लोग हैं, बक्सर लोग हैं, राज्य सरकार के जो विकास के काम हैं, उन विकास के कामों से पैसे कमाने का खेल है। केन्द्र सरकार का ट्राइबल वाला मुद्दा है। हमें इस पर विचार करना पड़ेगा।
          अभी उड़ीसा के माननीय सदस्य श्री हेमानंद बिसवाल ठीक कह रहे थे। बड़ी समस्या है कि वहां दौलत है। आजकल दुनिया में दौलत का मतलब सोना-चांदी नहीं बल्कि मिनरल्स, लोहा, अभ्रक, तांबा है। उन्हें क्या मालूम था कि ऐसी दौलत हमारी जिंदगी तबाह कर देगी। उन्होंने कभी उसकी तरफ नहीं देखा और न ही वे जानते थे। मैं कहना चाहता हूं कि आदिवासी इलाकों में जो वृंद वाद्य हैं, संगीत के वाद्य हैं, उनमें न तांबा है, न पीतल है, न लोहा है, वे लकड़ी के हैं। या चितकोरा है या ढोलक है। ढोलक का मतलब वह लकड़ी की होती है और उस पर चमड़ी चढ़ी हुई होती है। वहां कोई दूसरा वृंद वाद्य नहीं है। संगीत के सारे गाजे-बाजे उनके वाद्य हैं। मैं यही कहना चाहता हूं कि भारत सरकार को मिनरल्स का तत्काल राष्ट्रीयकरण करना चाहिए, नहीं तो इलाके को तबाही से नहीं बचा सकते। बेल्लारी में जो दो पूंजीपति थे, क्या हुआ। उन्होंने पूरी सरकार को सूली पर टांग दिया।
         यहां हमारे मित्र बैठे है। उन्हें सूली पर टांग दिया। यदि वहां अदालत खड़ी न होती, तो उन लुटेरों को कोई रोकने वाला नहीं था। उनके पास क्या नहीं है? वे दोनों सूबों में सम्पत्ति का नंगा नाच कर रहे हैं। यदि पूंजी वाले लोगों ने कहीं दौलत के सहारे सत्ता को पकड़ने और सत्ता की तरफ जाने का काम किया, तो वह बेल्लारी के ...( व्यवधान) ….* वे यहां नहीं हैं, इसलिए मैं उनका नाम नहीं लूंगा। आप उसे काट दीजिए। ...( व्यवधान) मैंने कहा कि मैं उनका नाम नहीं ले सकता, इसलिए आप उसे प्रोसीडिंग्स से निकाल दीजिए।  ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Hon. Member, please address the Chair.
… (Interruptions)
श्री शरद यादव (मधेपुरा): मैं आपसे निवेदन करूंगा कि इसका राष्ट्रीयकरण तत्काल होना चाहिए। सारे ट्राइबल्स इलाके के लिए हमें कोई कानून या रास्ता बनाना चाहिए, जिससे ये सारी चीजें भारत सरकार के हाथ में आ जायें। अब ये उसके हाथ में क्यों आये, यह मैं कहना चाहता हूं। यह दिल्ली भर का सदन है, क्योंकि दुनिया भर के पत्रकार यहां है। दूसरे सदन कैसे चल रहे हैं, यह बताने में तकलीफ होती है। लेकिन इस सदन में शर्म और मर्यादा है। आजादी की लड़ाई से लेकर आजादी के बाद हम कैसे चलें, उसमें बिगाड़ तो यहां भी हो गया है।  यहां एकाउंटेबिलिटी सबसे ज्यादा है। जो आदिवासी इलाका है, उसे सीधे हाथ में नहीं लिया गया।मैं आपसे विनती करना चाहता हूं कि नक्सलवादी समस्या सिर्फ मिनरल्स की लूट से आयी है। उस इलाके की जो दौलत है, उसकी लूट से यह समस्या आयी है। आपने यह लूट बंद नहीं        की है।                                                                                                                  सभापति महोदय, आपका राज्य गोवा है। आप जानते हैं कि व चारों तरफ से लोहे को  लादकर चीन ले जाया जा रहा है। हमारे यहां की सारी दौलत सस्ते में दुनिया भर में जा रही है। हम इस सदन में क्या कर रहे हैं? हम आने वाली पीढ़ियों के लिए कंगाली का रास्ता बनाकर जा रहे हैं। हमें सबसे पहले यह काम करना चाहिए कि इस देश के एमओयू का सब जगह पता लगा लेना चाहिए। सारे सूबों में पता लगा लेना चाहिए। सबसे ज्यादा इस देश के जो एमओयू हुए हैं, वे सिर्फ मिनरल्स, खदानों के बारे में हुए हैं। सबसे ज्यादा फास्ट मनी और कमाई हुई है, मैं अभी कमाई का जिक्र नहीं करना चाहता, क्योंकि मेरे पास समय नहीं है। मैंने अपने साथियों से समय मांगा था, लेकिन मुझे नहीं मिला। मुझे यहां कभी मौका मिलेगा, तो किस तरह से आमदनी और सबसे ज्यादा पूंजी कहां से पैदा की गयी है, वह बताऊंगा। आईपीएल तो बहुत छोटा पड़ जायेगा। सबसे ज्यादा ट्राइबल इलाके के माल पर दौलत बनाने का काम चारों तरफ हो रहा है। यदि हमने इसे नहीं रोका, तो मैं आपसे कहूंगा कि देश जो हर तरह से सुरक्षित है, जिसका वह इलाका  जो पूरी तरह से रोटी और लंगोटी में अपने को संतुष्ट रखता था, वहां लोगों के मन में आग लग गयी है कि हमारी कोई चीज बचने वाली नहीं है। जब जान खतरे में आ जाये, तो आदमी विवेक खो देता है और जान बचाने की कोशिश करता है, सभ्यता बचाने की कोशिश करता है। आज लड़ाई सभ्याता के बचाव की है। इतिहास गवाह है कि बंगलादेश सभ्यता की भाषा को बचाने में बन गया। संस्कृति भी पेट के साथ, जेहन के साथ ऐसी लिपटी हुई है। जब उस पर हमला होता है, वहां तो हमला संस्कृति भर पर नहीं है, वहां तो पेट पर भी हो गया। वहां लंगोटी भी उनके साथ रहने को तैयार नहीं है।
          इसलिए मेरा आपके माध्यम  से सरकार से कहना है कि जो पूरे मिनरल्स हैं, उन्हें तत्काल आप राष्ट्र की धरोहर घोषित करो और अपने हाथ में लो, फिर देखो कि इस नक्सलवादी समस्या का समाधान उसी दिन से होता है या नहीं, रास्ता निकलता है या नहीं? यह रास्ता इसलिए बिगड़ा है, नक्सलवाद वहां इसलिए बढ़ा है कि हजार एकड़ में, दस हजार एकड़ में, पन्द्रह हजार एकड़, बीस हजार और बाइस हजार एकड़ जमीन मल्टीनैशनल्स, यहां के पूंजीपतियों और कारपोरेट्स को दी गयी है। मैं आपसे विनती करूंगा कि नक्सलवादी समस्या का हल यही है और ये आदिवासी हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा हैं।

16.00 hrs.           महोदय, मैं अंत में एक बात कहना चाहता हूं। एक और बड़ा काम हुआ है, जिस पर कोई बोलता नहीं है। हिन्दुस्तान के 60 वर्षों में जितनी भर्ती हुई है, आप उसका सर्वे करा लीजिए, उनमें ट्राइबल्स के नाम पर सबसे ज्यादा लाभ मीना लोग आए हैं। जो आदिवासी है, उसका रंग अलग है, उसके पैर अलग हैं, उसके बाल अलग हैं, उसका कोटा किसके पास गया है? आप मीना लोगों को दीजिए, लेकिन आप उनको सीमित करेंगे या नहीं। आठ करोड़ आदिवासियों का हक कुछ तेज, होनहार लोग खींचकर ले जाते हैं, नॉथ-ईस्ट के कुछ लोग भी इसमें आए, लेकिन उन्होंने इतना नहीं लिया। ट्राइबल का ज्यादा हिस्सा मीना लोगों के पास जा रहा है खासकर आईएएस और आईपीएस जैसी बड़ी सर्विसेज के बारे में आपको सोचना चाहिए।

          मैं इन्हीं बातों के साथ आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे बोलने का समय दिया।

 

*SHRI J.M. AARON RASHID (THENI): I would like to mention here some unnoticed burning problems being faced by the Tribals. Our U.P.A. government has taken several welfare measures for the Tribal across the country. Implementation of these measures is primarily on the shoulder of the concerned Forests officials of the States. It has come into my notice that in villages of Tribals which are located near Reserve Forest Land areas, heavy damages to crops of the tribal and death of tribal are caused by the wild animals, particularly elephants. The forest officials are apathetic to such problems of tribal. Even Forest officials usually do not report such cases to their higher officials. Nor they report such incidents  to the nearest Police post. Police officials  are not permitted to enter the forest areas by the forest officials, hence they are helpless in conducting an enquiry on such incidents. Therefore, measures like fencing the forest dwelling areas of the tribal and installing electricity poles in and around the dwelling areas,  providing police patrolling  in the tribals villages for protecting their life and forest produce are required to be taken and necessary allocation of fund for the same should be made. Another more serious matter  which I had noticed during my visit to tribal areas of my Constituency Theni, Tamil Nadu is that the forest officials are indulged in a scam. They are indulged in harassing the poor tribal by shunting them out of their forest areas overnight, which they are in possession for several decades on the pretext of Reserved Forests Land, which is illegal as per the Forest Dwelling right Act, 2006 enacted by our U.P.A.  Government in 2008.  The victims of such kind of cases are tribals who own 1 or ½ acres of land and cultivate tea, coffee or medicinal plants to earn their livelihood.  After ousting the tribals from their lands on false threat, they grab the land of tribals and start cultivating tea, coffee and other medicinal plants for earning extra money. In one of such incidents in High Way hills viz, Kodai hills, Vellimalai area of my Theni constituency, it was found that in some incidents, the tribal were forced  to vacate their forest lands which they had in their possession for two decades and chased away with the tacit support of the Forest Officials. Hence, no body knows about the actual owners of the estates, till to date. The innocent tribal who are illiterate and unaware of their rights under Forest Dwelling Rights Act, 2006, remains just like a mock spectators.

In some cases, I had found that forest officials, under the pretext of preparing charcoal  and also falsely reporting forest fire, use to cut branches of Sandalwood, Teakwood, Red Sandalwood and Sal trees and swindle the trunks of these trees for their own illegal benefits after  burning the leaves and branches of the trees which they had cut and declare such incident  as Forest Fire. As the root cause of such cases is not investigated, the forests officials remain indulged in such illegal activities with impunity. My humble suggestions to prevent such unfair deeds of the forest officials is that we should engrave numbers  on the valuable trees i.e. like sandalwood when the circumference  of its trunk becomes 6”  and like wise for other trees like Sal, Vengai  and teak wood trees, the trees should be numbered when circumferences of trees become one sq feet. Similarly, cases of illegal occupation of the land of the tribal by the forest officials, should be checked and guilty officials should be brought to the books. Further, forest officials, some times forced the innocent and illiterate tribal to work as their domestic servants with out paying even a nominal remuneration. The tribal are treated just like a bonded labour. Appropriate preventive measures are required to be taken in this regard.

Further, still, there is a scarcity of clean potable water in tribal dominated areas. Water borne diseases are still wide spread in these areas, particularly in monsoon season. The infant mortality rate is still at alarming stage in these areas and tribal women are prone to anemic diseases. There is no Primary Health Center in tribal villages or the Primary Health Centres are located far away from the villages that too in some cases without a doctor and well trained para medical staff. Some tribal community are on  the verge of diminishing for the want of said basic amenities. Measures like providing free nutrient foods and providing adequate health facilities to the tribals are required to be taken on priority basis both by the Central and State Governments.

    In some remote tribal dominated areas, tribals are still unaware of their rights and the various welfare schemes launched by our U.P.A. Government. Measures to get them aware of their rights and various welfare schemes are required to be taken by utilizing the services of some reputed and committed N.GOs. and N.S.S., J.S.S. Volunteers, particularly in remote  tribal dominated areas.

Lastly, I request the Central Government to set up a joint Parliamentary Committee to find out the problems being faced by the tribal community at the grass root level across the country and also to find out why the Rights to Forest act, 2006 is being implemented in some states half heartedly. The Committee may be asked to submit its findings after touring all the tribal dominated areas across the country and suggest some concrete measures for speedy implementation of the various welfare measures taken by our U.P.A. Government for the welfare of the tribal community. If agreed the committee may also be asked to ascertain the factual fact as to how much damage has been caused to the culture, flora and fauna of the tribal community in the areas where mining work is being done by the Private mining companies and to what extent these companies have taken welfare measures for the affected tribal community.

             With these words, I conclude by supporting the demand.

                 

×श्री मनसुखभाई डी. वसावा (भरूच)ः यद्यपि सरकार ने आदिवासियों और वनवासियों के जीवन स्तर को सुधारने की दृष्टि से ही वन अधिनियम को2006 में पारित किया, किन्तु वन विभाग जो अधिकार सरकार द्वारा आदिवासियों व वनवासियों को प्रदान किया गया है, उसे लागू करने में बाधा उत्पन्न करते हैं । उदाहरण के तौर पर जो आदिवासी, वनवासी वनों में खेती कई पुस्तों से करते आ रहे हैं उन्हें उस जमीन पर उनका अधिकार देने में आनाकानी करते हैं और उनसे कहा जाता है कि इस जमीन पर आपका कब से कब्जा है इसके सबूत जमा करो और उन्हें मजबूर किया जाता है कि दंड रिपोर्ट, जुर्माना रिपोर्ट आदि जमा कराओ तभी भूमि पर कब्जा मिलेगा, इसे समाप्त किया जाना चाहिए और जो आदिवासी वनवासी जिस जमीन पर खेती कर रहे हैं उस पर उनको कब्जा दे देना चाहिए ।

          मैं इस सदन का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि जो आदिवासी, वनवासी वन उपजों पर अपना जीवन निर्वाह कर रहे हैं, वन अधिकारी उनको भी ऐसा करने से मना कर रहे हैं जैसे जो आदिवासी तेंदूपत्ता; केन्दूपत्ता अथवा बांस से सामान बनाकर अपना जीवन निर्वाह कर रहे हैं उन्हें तेंदूपत्ता बीनने पर रोक लगाते हैं जिसके कारण उनका जीवन-यापन में परेशानी होती है । इसकी अनुमति उनको मिलनी चाहिए।

          आदिवासियों व वनवासियों को लघु वन उपज पर अधिकार, चारागाह क्षेत्र पर अधिकार, जल क्षेत्र पर अधिकार मिलना चाहिए जो वन विभाग पूरी तरह से नजरअंदाज कर रहा है । इसकी भी खुली अनुमति आदिवासियों और वनवासियों को मिलनी चाहिए ताकि वे अपना जीवनयापन भली प्रकार कर सकें ।

          संरक्षित क्षेत्रों विशेषतः बाघ संरक्षण क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी, वनवासी लोगों के अधिकारों की अनदेखी लगातार वन विभाग द्वारा की जा रही है । इस प्रकार की धारणा फैलायी जा रही है कि आदिवासी व वनवासी जो संरक्षित क्षेत्रों में निवास करते हैं वे वन अधिनियम के अन्तर्गत नहीं आते हैं । आदिवासियों और वनवासियों के उत्थान हेतु इस भ्रम को पूरी तरह समाप्त किया जाना चाहिए ।

          वन मंत्रालय ने आखिरकार निर्देश जारी किए कि लोगों को उनकी सहमति के बिना उनके घरों एवं वन क्षेत्रों से न हटाया जाए किन्तु वन विभाग उनको वहां से हटा कर व्यवसाय व परियोजनाओं के लिए अधिग्रहण कर लिया लेकिन पिछले डेढ़ वर्षों से उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है । जो अवैध विस्थापन कर रही है । इसी प्रकार की अवैधानिक भय की कहानी वन्य जीवन अभ्यारण्य, राष्ट्रीय पार्क और बाघ संरक्षक केन्द्रों में भी दोहराई जाती है ।

          वन आरक्षित व सेन्चुरी क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों को उनके कब्जे की जमीन पर उनको स्थायी रूप से कब्जा दिया जाना चाहिए ।

          पिछले अनेक वर्षों में सरकारों ने अपने-अपने बजट में आदिवासी लोगों के विकास के लिए योजनाएं तैयार की हैं और प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में करोड़ों, अरबों रुपये खर्च किए किन्तु आदिवासियों की आज भी वही स्थिति है जो लगभग 40 वर्ष पूर्व थी ।

          जब हम आदिवासी क्षेत्रों में साक्षरता की बात करते हैं तो सरकार आंकड़ा दे देती है जबकि वास्तविकता उससे कोसों दूर है । शिक्षा के क्षेत्र में थोड़ा बहुत विकास तो हुआ है फिर भी गाँव और शहर की शिक्षा में जमीन आसमान का अन्तर है । गुजरात सरकार जो शिक्षा में सुधार व गुणवत्ता बढ़ाने का प्रयास कर रही है वह प्रशंसनीय हे किन्तु जो छात्रावासों में विद्यार्थी रहते हैं उन्हें अलग-अलग छात्रावासों में अलग-अलग मात्रा में अनुदान प्रदान किया जाता है जिससे जिन छात्रावासों में कम अनुदान दिया जाता है वहां के छात्रों में हीन भावना उत्पन्न होती है इसलिए केन्द्र सरकार से मेरा अनुरोध है केन्द्र अथवा राज्य सरकारों द्वारा चलाये जा रहे सभी छात्रावासों में रहने वाले छात्रों को एक समान अनुदान दिलाने की व्यवस्था करें ताकि छात्रों में पनप रही हीन भावना समाप्त हो सके ।

          आदिवासी क्षेत्रों में बड़े-बड़े बांध बनाये जाते हैं जिससे उनके आसपास के आदिवासी विस्थापित हो जाते हैं और उनको सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं होती है । मेरा मानना है कि यदि सरकार वास्तव में आदिवासियों को विकास करना चाहती है तो उन्हें भी बारहों मास सिंचाई की सुविधा मिलनी चाहिए और यह तभी संभव है जब आदिवासी क्षेत्रों में मध्यम श्रेणी के बांध, कुंए, बोरवेल की सुविधा उपलब्ध हो और सिंचाई के लिए विद्युत कनैक्शन अविलम्ब मिल सके ।

          सिंचाई की सुविधा बारहों मास मिलने से गाँव के मजदूरों को गांव में ही रोजगार मिलेगा जिससे गाँव से बढ़ते पलायन पर अंकुश लग जाएगा । गांव में सम्पूर्ण सिंचाई होने से गांवों में पशुपालन का व्यवसाय बढ़ेगा क्योंकि गांव में पशुओं को पीने का पानी और हरा चारा उपलब्ध होगा ।

          आजादी के 60 वर्षों के बाद भी आदिवासी क्षेत्रों में चिकित्सा की सुविधा नाममात्र ही उपलब्ध है । मेरा ऐसा मानना है कि यदि सरकार आदिवासी बाहुल क्षेत्र में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना चाहती है तो तहसील और तालुका स्तर पर ऐसे चिकित्सालय स्थापित होने चाहिए जिसमें सभी विभाग और सभी आधुनिकतम सुविधाएं उपलब्ध हों ताकि ग्रामीण लोगों को अपने उपचार हेतु शहर की ओर न भगना पड़े । यदि आवश्यकता पड़े तो डॉक्टरों और अन्य कर्मचारियों को आदिवासी क्षेत्र में जाने हेतु विशेष पुरस्कार के रूप में धनराशि प्रदान करनी चाहिए ।

          अतः मेरा केन्द्र सरकार से अनुरोध है कि यदि आदिवासियों का सही अर्थ में विकास करना है तो उन्हें वनभूमि पर पूरी तरह से कब्जा और रिजर्व फारेस्ट, सेंचुरी एरिया में पक्की सड़कें, सिंचाई सुविधा व बिजली की सुविधा अविलम्ब उपलब्ध करानी चाहिए तथा आदिवासियों की समस्याओं को ध्यान में रखकर तथा स्थानीय प्रतिनिधियों के साथ परामर्श कर योजना तैयार करनी चाहिए । बस इतना ही कहकर अपनी बात समाप्त करना चाहता हूँ ।

     

×श्री रामसिंह राठवा (छोटा उदयपुर) : भारत की कुल आबादी में लगभग आठ करोड़ 82 लाख (8.2 फीसदी) आदिवासी हैं । जिनके सामाजिक, शैक्षणिक, स्वास्थ्य व मानव विकास से संबंधित तमाम सूचक बेहद ही चिंताजनक है ।

          सरकार ने आदिवासी समुदायों के सवालों पर अनदेखी किया है । आदिवासी का अर्थ है मूल निवासी । राष्ट्रपिता बापू ने आदिवासियों को गिरिजन कहकर संबोधित किया था । वन अधिकार कानून का लाभ अब भी देश के वनवासियों को नहीं मिल पा रहा है । कानून बने तीन साल होने को है फिर भी मूल निवासी आदिवासी आज जमीन की तलाश में दर-दर भटक रहा है । आज वनवासी अपने ही घर में बेगाने बन गये हैं । आज आदिवासियों का चौतरफा दोहन हो रहा है । इनका जल, जंगल और जमीन को लेकर शोषण किया जा रहा है । देश में जबरन धर्मपरिवर्तन के शिकार आदिवासी बन रहे हैं ।

          वनाधिकार कानून 2006 में साफ लिखा है कि अनुसूचित जनजाति के जो परिवार 13 दिसम्बर, 2005 से पहले तक जिस जमीन पर खेती करते रहे हैं या रहते आ रहे हैं उस भूमि का उन्हें पट्टा दिया जाएगा । लेकिन ऐसे परिवारों से इसके दस्तावेजी सबूत मांगे जा रहे हैं जो ज्यादातर के पास नहीं है । सरकार ने भी ऐसे सबूत उन्हें मुहैया नहीं कराए हैं ।

          सरकार की नौकरशाही व उनकी मशीनरी ने कानूनी नुक्तों का ऐसा पच्चड़ हर कहीं फंसाया कि आदिवासियों को न तो भूमि अधिकार हासिल हुए और न सामुदायिक वनाधिकार ही अमल में आ सके ।

        जनजातीय कार्यालय का गठन सन् 1999 में हुआ । इस मंत्रालय को अब लगभग 11 वर्ष हो चुके हैं । संविधान 46 के अन्तर्गत आदिवासी और अनुसूचित जनजातियों को विशेष अधिकार दिए गए हैं । इस संविधान के अन्तर्गत अनुसूचित जनजातियों के लिए हर प्रकार की सुविधा देना और उनकी सुरक्षा में वृद्धि करना अनुच्छेद 5 और6 में मुख्य प्रावधान किया गया हे । माननीय इन सबके पश्चात् सरकार आदिवासियों की सुविधा और रक्षा के लिए अभी तक कोई भी दृढ़ कदम नहीं उठा पाई है । इसका एक उदाहरण मैं आपके सामने रखता हूँ ।

          14वीं लोक सभा में सरकार ने कई विधेयक लोक सभा में पेश किए जिसमें आदिवासियों को कई प्रकार की सुविधाएं देने का प्रावधान था । कुछ के नाम इस प्रकार हैं :-

1.              The Compensatory Afforestation Fund Bill, 2008
2.              The Rehabilitation and Resettlement Bill, 2007
3.              The Land Acquisition (amendment) Bill, 2007
4.              The Sixth Schedule to the Constitution (Amendment) Bill, 2007
5.              The SC and ST (Reservation of Post and Services) Bill, 2008             14वीं लोक सभा के भंग हो जाने से ये 5 विधेयक लैप्स हो गये और अभी तक दुबारा लोक सभा में पेश नहीं किए गए । मैं सरकार से अनुरोध करूंगा कि अगर सरकार आदिवासियों की भलाई के गंभीर है तो ये पांचों विधेयक लोक सभा में जतना जल्दी हो सके पास करायें ।

          महोदय, सन् 2004/2005 एन.डी.ए. ने नेशनल ट्रॉइबल पॉलिसी का गठन किया लेकिन इस पॉलिसी को सरकार की मान्यता नहीं मिल पाई । सन् 2006 में नेशनल ट्रॉइबल पॉलिसी को दुबारा ड्राफ्ट किया गया । इस ड्राफ्ट पॉलिसी को केबिनेट को भेजा गया और केबिनेट ने इस पॉलिसी को ग्रुप ऑफ मिनिस्टर को सौंप दिया । अभी इसकी क्या स्थिति है यह कहना मुश्किल है । इस पॉलिसी का स्वागत है लेकिन जानकारों के अनुसार इसमें कोई भी ऐक्सन प्वाइंट नहीं है । मैं सरकार से अनुरोध करूंगा कि पॉलिसी डाकूमेंट को Standing Committee on Tribal Affairs के सामने रखें ताकि इस पर विस्तार से चर्चा हो सके ।

          महोदय,4 नवंबर,2009 को राज्य जनजातीय कार्य मंत्रियों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने आदिवासियों की सुरक्षा के लिए राज्यों से निवेदन किया था । माननीय प्रधानमंत्री जी ने नक्सलवाद और माओवादियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का जिकर भी किया था । नक्सलवाद और माओवादियों के अतिरिक्त इस देश में कुछ बाहर के देशों की कुछ संस्थाएं जनजातीय क्षेत्र में काम कर रही हैं इनके नाम Amnesty International, Survival International और Action Aid हैं । यह संस्थाएं आदिवासियों के क्षेत्र में कोई भी विकास का कार्य नहीं होने देते जिससे आदिवासी पिछड़े रह जाते हैं । यह बाहर की संस्थाएं गैर-कानूनी ढंग से अपना कार्य करती हैं । मैं माननीय मंत्रीजी से यह अनुरोध करूंगा कि वह इन तीन संस्थाओं का पूरा ब्यौरा गृह और वित्तमंत्री जी से मांगे ताकि यह पता चल सके कि सरकार ने इन संस्थाओं को Security Clearance दी है । यह भी पता लगाने की कोशिश की जाय कि क्या ये संस्थाएं हमारे देश में पंजीकृत हैं या नहीं । हाल ही में दांतेवाड़ा में माओवादियों द्वारा हमारे सुरक्षा कर्मचारियों पर हमले के बाद इन संस्थाओं का ब्यौरा लेना बहुत आवश्यक हो गया है ।

          अध्यक्ष महोदय, Central Institute of Indian Languages पिछले40 वर्षों से एच.आर.डी. मंत्रालय के अन्तर्गत काम कर रही है । यह संस्था जनजातीय भाषाओं की शिक्षा शिक्षकों को दे रही है । इसमें कुछ खास सुधार नहीं हो पा रहा है । मैं सरकार से अनुरोध करूंगा कि यह संस्था जनजातीय कार्य मंत्रालय को सौंप दी जाय । इससे जनजातीय कार्य मंत्रालय गंभीरता से आदिवासी शिक्षकों को जनजातीय भाषा में प्रशिक्षण दे सकें ।

     

×श्री महेन्द्रसिंह पी. चौहाण (साबरकांठा) : आदिवासी, जल, जंगल और जमीन के साथ जुड़ा हुआ समाज है । गांधी बापू उसे गिरिजन कहते थे, आदिवासी यानि मूल निवासी है । आदिवासी यानि वनवासी समाज हमारे देश की पुरानी सभ्यता और संस्कृति से जुड़ा हुआ है । जंगलों एवं पहाड़ियों पर अपना निवास बनाकर इसी समाज ने जंगलों की, पर्यावरण की एवं खनिज सम्पत्ति यानि वन संपदा का रक्षण किया है । भूतकाल में इसी समाज ने महाराणा प्रताप जैसे योद्धाओं के साथ मिलकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की थी, तो देश की आजादी के जंग में बीरसा मुंडा जैसे अनेकों वनवासी नेताओं ने अपने जीवन का बलिदान दिया था । ये मांगने वाला नहीं देने वाला समाज है । गाने वाला, नाचने वाला, थोड़े में खुश रहने वाला उत्सवप्रिय समाज है । जिसने हमारी सभ्यता और संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन किया है । मैं उनको धन्यवाद देकर वंदन करता हूँ ।

          देश की आजादी का 9 प्रतिशत यानि की 10 करोड़ से ज्यादा आबादी वाला समाज आज आजादी के 63 साल के बाद भी पिछड़ा और बिछड़ा है । अपने अधिकारों एवं विकास हेतु जूझ रहा है । 84 प्रतिशत से ज्यादा लोग गरीबी लाइन के नीचे जी रहे हैं । ये तो अंदाजित आंकड़े हैं, सही आकलन तो केन्द्र सरकार के पास भी नहीं है । अधूरे अंदाज, अधूरी धारणा और अधूरी हकीकत के आधार पर उनका विकास कैसे हो सकता है ।

          मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि बहुत से लोगों ने रेलगाड़ी नहीं देखी, कभी बड़ा शहर नहीं देखा, उनके बच्चों के लिए कान्वेन्ट स्कूल तो क्या धुलिया शाला भी मुहैया नहीं, उनमें से दूसरों के लिए गगनचुंबी इमारते बनाने वाला खुद छोटी सी झोपड़ी में सिकुड़ गया है ।

          आज उनकी परिस्थिति बहुत दयनीय है । शहरों की संपदा उनके लिए उपलब्ध नहीं है और जंगलों की संपदा उसे मिल नहीं रही ।

          दुख के साथ कहना पड़ता है कि वनवासी समाज को वनभूमि से खदेड़ने का प्रयास चल रहा है । वनवासियों की पिटाई, गिरफ्तारी और उनके खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज कराके उनकी बंदी बनाने का मामला सामने आ रहा है ।

          मेरे मतक्षेत्र साबरकांठा जहां 20 प्रतिशत से भी ज्यादा आदिवासी आबादी है, उन क्षेत्रों का दौरा किया, मेरे साथ तालुका पंचायत के प्रमुख भी थे जो खुद वनवासी हैं ।

          हमने देखा तो ऐसे कई गांव हैं, जहां लोग प्राथमिक सुविधाओं से वंचित हैं । वन विभाग के कड़े कानून की वजह से गांव है में जाने के लिए न सड़क है, न बिजली, न पानी की सुविधा । राजीव विद्युत योजना में मंजूर खम्भे एवं पानी की पाइपलाइन वन विभाग के अधिकारी नहीं ले जाने देते । इन्दिरा आवास योजना में आवास बनाना हो तो अपने सर पर रेती, सिमेंट इत्यादि ले जाना पड़ता है । प्रसुता स्त्री महिला को हॉस्पिटल ले जाने का रास्ता नहीं होने की वजह से कभी-कभी माँ और बच्चे को गंवाना पड़ता है । ये सब देखकर हमारी आंखों से आँसू निकल आये ।

          क्या यह ही है हमारी लोकशाही । भोले-भाले समाज को कितना हैरान करोगे?

          हम संसद में नक्सवाल एवं माओवाद की चर्चा तो करते हैं लेकिन इसी अन्याय तथा शोषण से नक्सलवाद का जन्म होता है ।

          आदरणीय सभापति जी वनवासी समाज ने तो वनों की रक्षा की है ।

          माफिया तत्व और भ्रष्ट वन विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से ही वन एवं खनिज सम्पत्ति का हनन एवं खनन हुआ है । इसकी जांच होनी चाहिए ।

          वनवासी समाज को अपने जमीन के अधिकार जल्द से जल्द मिलने चाहिए । प्रमाण पत्र की मांग की जाती है, लेकिन ये अशिक्षित समाज प्रमाण-पत्र कहां से लायेंगे ? 36000 टाइटल तैयार हैं, लेकिन वितरित नहीं किये गये हैं ।

          वनवासी समाज के विकास हेतु केन्द्र सरकार ने सिर्फ 3220 करोड़ आवंटित किया है, जो विकास हेतु काफी कम है ।

          हमारे गुजरात में वनबंधु कल्याण योजना लागू की गई है जो 15000 करोड़ की योजना है, इसके लिए हमारे आदरणीय मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को धन्यवाद देता हूँ ।

   

*श्री यशवंत लागुरी (क्योंझर): भारत में आदिकाल से मूल निवासी यानि आदिवासी सरकार की गलत नीतियों के कारण अपने जीवन से बेदखल हो रहे हैं । यह जातियाँ सदैव उपेक्षित रही है जिनके कारण आज भी देश की आजादी के सत्तर साल के बाद पशुओं एवं नारकीय जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है वैसे उन पर अत्याचारों की एक लंबी कहानी है अंग्रेजों के जमाने से उन पर अत्याचार होते रहे हैं परंतु उन्होंने अपने जंगल, जमीन और जिंदगी में दखल नहीं होने दिया यह वे जातियां है जिन्होंने आजादी की लड़ाई में बिरसा मुंडा, कान्हू, सिद्ध तिलक माझी जैसे आजादी के सिपाहियों के साथ कंधे से कंधा मिलाने का काम किया है । पर आज सरकारी मशीनरियां भूमि माफिया, अवैध खनन चलाने वाले, वन माफिया के दबाव में आदिवासियों पर गौलिया बरसाती है उन्हें चोर कहती है और उनको पुलिसिया खौफ दिखाया जाता है ।

          आज देश के 90 प्रतिशत कोयला खदानों,72 प्रतिशत जंगल और 80 प्रतिशत खनिज उत्पाद क्षेत्रों की कोख में भारत की कुल आबादी का 10 प्रतिशत से ज्यादा आदिवासी बसे हुए है और अपनी आँखो से प्रकृति के साथ खिलवाड़ का खेल देख रहे हैं । देश के 15 प्रतिशत भू भाग पर आदिवासी प्रकृति के साथ मिलकर देश में पर्यावरण को कायम रखे हुए है । देश में आदिवासी के विकास का नाटक प्रथम पंचवर्षीय योजना के साथ चला था जब 43 योजनाएं चलायी गयी थी जो बुरी तरह से अपने उद्देश्यो की प्राप्ति में असफल रही । एक तरह से यह योजनाएं नही थी यह तो केवल उप योजनाएं थी जो कई दूसरी योजनाओं के साथ जोड़ दी गयी थी । आज भी शहरों की बूनियादी सुविधाएं एवं औद्योगिकीकरण के संसाधनों को इन आदिवासी क्षेत्रो से जुटाया जाता है । इन आदिवासियों में से 85 प्रतिशत आदिवासी गरीबी रेखा से नीचे जी रहे है । यह आदिवासी आज अपने को राष्ट्र की मुख्य धारा से अलग-थलग महसूस कर रहे हैं । 2001 की जनगणना के अनुसार कुल आदिवासी के आबादी का 93 प्रतिशत बंधुआ मजदूर है । विशेष केंद्रीय सहायता के माध्यम से जनजाति उप योजना के तहत 22 राज्यो में रोजगार एवं आय सृजन संबंधित योजनाएं चलाई जा रही हैं । स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, जल संरक्षण, सिंचाई, संपर्क मार्ग एवं गांव स्वच्छता कार्यों को किया जाना है जो जंगलों में स्थित 2413 गांवों में रहने वाले गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले आदिवासी लोगों के लिए है । भारतीय संविधान की धारा 275(1) के अंतर्गत अनुदान भी दिए जा रहे हैं जिसमें छठी से12वीं क्लास की शिक्षा एवं एकलव्य माडल आवासीय स्कूल को सहायता दी जा रही है परंतु यह सहायता देश के84,326,240 आदिवासी लोगों के लिए पर्याप्त नहीं है इन योजनाओं का क्या एरिया है क्या प्रगति हुई है इन योजनाओं से कितने लोग लाभ प्राप्त कर रहे हैं इसकी कोई जानकारी केंद्र सरकार के पास नहीं है । कितने लोग आदिवासी लोग गरीब हैं यह भी केंद्र सरकार को पता नहीं है । इन तथ्यों के अभाव में केंद्र सरकार किस प्रकार से जनजाति विकास कर रही है यह सोचने की बात है ।

          आदिवासी यानि वनवासी जो वनो में आदिकाल से रह रहे हैं जिनके पूर्वजों ने शहर नही देखे, रेलगाडियां नहीं देखी उनके लिए आदिवासी सांसदो द्वारा कई दशको से मांग की जा रही थी परंतु इस पर 2006 में गौर किया जिसके तहत वनों मे रहने वालों को वनो में रहने का अधिकार दिया परंतु उसमें नियम बना दिया कि जो 13 दिसंबर 2005 तक75 साल से जिस क्षेत्र में रह रहा है वह उसका होगा उसके लिए आदिवासी को प्रमाण लाने होंगे । इससे बडा मज़ाक क्या होगा आदिवासी जो अनपढ़, जिसका घर नही है, उनके बच्चे स्कूल नही जाते, उनके संबंध में सरकार के पास कोई रिकार्ड नहीं है तो वे लोग कहाँ से प्रमाण लाएंगे । इस तरह से यह कानून जो 2006 में लागू किया था उसका फायदा अभी तक 5 प्रतिशत आदिवासी लोगों को नहीं मिला है। इस कानून के तहत 31 अक्तुबर 2009 तक3,25,303 व्यक्ति एवं 3,19,703 समुदायों ने अपने अधिकार जताया था परंतु वितरण केवल 6600 मामले में हुआ है । सरकार के इस ढुलमुल कार्यों पर सदन में एवं सदन के बाहर काफी किरकिरी हुई तो फरवरी 2010 तक आनन फानन में 27,16 लाख दावे हुए और जिसमें से 7,59 लाख टाईटल्स का वितरण हुआ है एवं 36 हजार टाईटल्स तैयार है पर उनका वितरण नहीं किया गया है । जनजातियों की काफी जमीन तो औद्योगिकीकरण के नाम उद्योगों को बाट दी है इस बात की जानकारी भी जनजाति मंत्रालय को नहीं है । अगर जनजाति मंत्रालय जनजातियों पर हो रहे अत्याचार को रोकने का काम नहीं करेंगे तो जनजाति मंत्रालय अपना अधुरा काम ही करेगा ।

          अभी भी कई जगह पर इन वनवासियों को वन भूमि से खदेड़ने का सिलसिला चल रहा है । वनवासियों की पिटाई, गिरफ्तारी उनके खिलाफ झूठे मुकदमें दर्ज करने बिना बताए उनको बंदी बनाना के मामले आए दिन आते रहते हैं । उन पर आरोप लगाया जाता है कि वह वनों को काटते हैं खानो से खनिजो की चोरी करते हैं। परंतु देश में आज पर्यावरण आदिवासी के कारण कायम है । वह एक लोग एक पेड़ काटते हैं तो दो पेड़ लगाते है और इन पेड़ों को अपने बच्चों से ज्यादा प्यार से पालते हैं एवं जंगलों की रक्षा करने का काम वन अधिकारियों से ज्यादा करते हैं परंतु आज तक वन अधिकारियों के गुमराह किए जाने के बाद पर्यावरण की रक्षा में आदिवासियों का कभी सहयोग नहीं लिया यह बड़ा खेदजनक है । विश्व आज ग्लोबल वार्मिंग से डरा हुआ है अगर आदिवासी के प्रकृति प्रेम का पाठ सिखा होता तो आज ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति नहीं आती । पर्यावरण को कायम रखना एवं प्रकृति का अनुकूल स्थिति में लाभ उठाने की कला आदिवासी से ज्यादा कोई नहीं जानता ।

          हमारे प्रधान मंत्री महोदय ने 15 अगस्त को एवं नवंबर के प्रथम सप्ताह में कहा कि आदिवासी की देश के सामाजिक आर्थिक विकास में बराबरी की भागीदारी मिलनी चाहिए क्योंकि वे हमारे देश के ही नागरिक हैं एवं सरकार की जिम्मेदारी है कि आदिवासी समुदायों को सरकार उनकी जीवन शैली, उनकी सुरक्षा और उनके भविष्य के लिहाज से वे अधिकार संपन्न हो परंतु उनको कौन से अधिकर मिले है और इन अधिकारों की रक्षा कहां पर हो रही है । आज उनको विस्थापित किया जा रहा है । चिंता की बात विस्थापन की नहीं है बल्कि भूमि से अलग होना एवं इस अलगाव से अपनी संस्कृति और अपनी शैली से अलग होना एक अहम मुददा है । प्रधान मंत्री जी कहते हैं आदिवासियों का शोषण को रोका जाना चाहिए परंतु कहाँ पर शोषण रूका है । शोषण के साथ उनकी संस्कृति पर बराबर चोट की जा रही है । जनजातियों के नाम जाली प्रमाण पत्र बनवाकर जनजातियों का हक मार रही है । चेतना एवं शिक्षा के अभाव में फिर भी 1624 मामले दर्ज हुए है जिसमें से 148 मामलों की जांच हुई तो पता लगा कि 147 प्रमाण पत्र जाली है । सबसे बड़ी खेद की बात है कि इन मामलों की जांच में 2 से3 साल लग जाते है जो यह बताती है सरकार जनजाति के विकास में कितनी गंभीर है ।

          पुलिसिया खौफ और माफिया के बढते दबाव से प्रकृति पर हो रही चोट से जो आदिवासी आंदोलित होने जा रहा है उस पर माओवादी एवं नक्सलवाद की निगाह है और इस प्रकार से आदिवासी की शक्ति का उपयोग हिंसा में किया जा रहा है । इसके लिए सरकार ही पूरी तरह से दोषी है । अगर सरकार आदिवासियों को विकास प्रक्रिया का भागीदारी बनाकर उनको लाभ दिया जाएगा तो स्थिति में सुधार हो सकता है । इन आदिवासी क्षेत्रों में अनकों परियोजनाएं चल रही है और कई चलकर पूरी हो गयी है परंतु इन आदिवासियों को इन परियोजनाओं से क्या मिला ? उलटे इनके घर चले गए और इनकी खेती बाड़ी की जमीन भी इन परियोजनाओं में चली गयी । सरकार द्वारा मुआवजा एवं नौकरियों में स्थान दिए जाने की बात की जाती है परंतु कितने लोगों को मुआवजा मिला और कितने लोगों को नौकरी । 1951 से 1990 के बीच 75 लाख आदिवासी विस्थापित किए गए और नौकरी मिली केवल 14500 लोगों को । जिन स्थानों पर परियोजनाओं बनी है उन स्थानों के रहने वाले भी इन परियोजनाओं से लाभान्वित होने चाहिए । जिनके चलते वे विस्थापित हुए है इन विस्थापन का नजला अधिकतर आदिवासियों पर क्यो पड़ता है यह समझ में नही आता है ।

          सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारी आदिवासी क्षेत्रों में काम नहीं करना चाहते हैं जिसके कारण आदिवासी के शिक्षा एवं स्वास्थ्य कार्य पर बूरा असर पड़ रहा है । जहाँ तक शिक्षा के विकास की बात है आदिवासी क्षेत्रो में आदिवासी वर्ग के पढ़े लिखे लोगों को नौकरी देकर शिक्षा का काम किया जा सकता है । वह स्थानीय भाषा को अच्छी तरह से जानते हैं । आदिवासी क्षेत्रो में काम करने के लिए जोखिम भत्ता, आवास एवं अन्य अनुदान इत्यादि पर भी विचार किया जाना चाहिए । निजी क्षेत्र के लोग कई कारणों से आदिवासी क्षेत्रों में पूंजी नहीं लगाना चाहते इसके लिए पहले सरकार को आगे आना होगा । आदिवासी क्षेत्र में जो सरकारी उपक्रम चलते हैं वहाँ समाजिक उत्तरदायित्व के तहत उस उद्योग के आसपास लोगों को उद्योगों के कुल लाभ का दो प्रतिशत के अंश का कल्याण संबंधी कार्य पर खर्च करने का प्रावधान है परंतु भारत सरकार ने कानून ऐसे बना रखे हैं कि यह उपक्रमो पर निर्भर करता है वह समाजिक उत्तरदायित्व के तहत स्थानीय लोगों के कल्याण संबंधी काम करे या न करे यानि सरकार ही आदिवासी कल्याणकारी कार्यों को करने में बाधा खडी कर रखी है । सरकार को ऐसे प्रावधान बनाने चाहिए जिससे प्रत्येक ऐसे उद्योग जो आदिवासी क्षेत्र में काम करता है उसे स्थानीय क्षेत्र के विकास संबंधी कार्यों पर अपने लाभ का दो प्रतिशत अवश्य खर्च करना चाहिए ।

          आदिवासी की भूमि व्यवस्था की जानकारी लेने के लिए एक अध्ययन समूह का गठन किया था जिसकी अध्यक्षता प्रो0 बी के राय बर्मन ने की थी । डा0 बर्मन ने उड़ीसा के कुछ स्थानों के भूमि सर्वेक्षण व सेटेलमेंट कार्य का ब्यौरा देते हुए बताया कि जिस भूमि का आदिवासी उपयोग कर रहे थे उसमें से मात्र एक प्रतिशत पर ही उनके अधिकार को रिकार्ड किया गया । जिन भूमि पर 10 प्रतिशत ढलान था उसको अतिक्रमण मान लिया गया इस तरह से 8 लाख आदिवासियों के अधिकार छिन लिये गये । इस तरह से आदिवासी हर तरह से सताये गये हैं धर्म परिवर्तन का लालच उड़ीसा एवं झारखंड में ज्यादा दिया गया । उड़ीसा में सबसे ज्यादा जनजातियाँ हैं लगभग सब की सब उपेक्षित हैं उनकी भागीदारी नगण्य है । उड़ीसा के क्योझार, मयूरभंज, जाजपूर तथा सूदरगढ़ इत्यादि भूखमरी की वजह से दुनिया में जाने जाते हैं । यहाँ शिशु मृत्युदर, असाक्षरता का स्तर एवं बीमारी का इलाज नहीं होने पर मरने वाले की तदाद अन्य क्षेत्रों से कहीं ज्यादा है । 2008-2009 में जो आदिवासी योजनाएं बनाई गई उसमें कुछ राज्य को शामिल नहीं किया गया था ।

          जहां पर आदिवासी रहते हैं प्रकृति ने वहां पर अपार सम्पदा दी है उसका नियोजन अगर सही ढंग से स्थनीय लोगों के सहयोग से किया जाये तो देश में कम संसाधनों से अधिक उत्पादन किया जा सकता है और स्थानीय लोगों में खुशहाली लाई जा सकती है । जो इस वक्त नहीं हो रहा है केवल लूटने का काम हो रहा है । यह तो सरकार द्वारा ही इस तरह से योजना बनाई जाती है जिससे आदिवासी बर्बाद होते हैं और खनिज सम्पदा का दोहन बूरी तरह से होता है जो प्रदूषण को बढ़ावा देता है । स्वार्थी लोग इन खनिज सम्पदाओं का इस तरह से दोहन कर रहे हैं जैसे पूरी दुनिया की जरूरतों को यहीं से पूरा किया जा रहा हो । बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भी इस कार्य में पीछे नहीं हैं इस कार्य के लिए बड़ा से बड़ा भ्रष्टाचार करने में संकोच नहीं कर रही हैं जिनके कारण आदिवासियों की टिकाउ पद्धति संस्कृति एवं पर्यावरण को व्यापक क्षति हो रही है । आवश्यकता इस बात की है इन कम्पनियों की मनमर्जी एवं जोर जबरदस्ती से आदिवासी बहुल्य क्षेत्रों को बचाया जाए । आदिवासी क्षेत्रों की जमीन को हड़पने में कई असरदार लोग भी शामिल हैं । सरकार ने जो कानून आदिवासी की सुरक्षा एवं रक्षा के लिए बनाये हैं उसका सही ढंग से पालन होना चाहिए जिससे हम आदिवासी की भूमि की रक्षा कर सके । आदिवासी कल्याण के लिए जो काम सरकार नहीं करती है उसके लिए न्यायालयों को आगे आना पड़ा और सरकार के आदिवासी कार्यों में की जा रही कार्यों में बदनामी उठानी पड़ी ।

          आवश्यकता इस बात की है कि सरकार को आदिवासियों के साथ जूड़ना होगा । पुलिसिया खौफ, उनके प्रदर्शनों पर गोलीबारी करके आदिवासियों पर विजय नहीं पाई जा सकती है । सरकारी मशीनरियां उन्हें पशु जैसा समझती हैं उनकी सलाह एवं सहयोग की बात तो दूर की है । यही कारण है कि आदिवासियों के दिल में माओवादी, नक्सलवादी धीरे-धीरे बस रहे हैं और उनका सम्पर्क प्रशासन के साथ कट रहा है । अगर आदिवासियों को भागीदारी नहीं दी गई तो आदिवासी आन्दोलन उग्र रूप ले लेगा ।

          खनन क्षेत्रों में आदिवासियों के मानव अधिकार का जिस तरह से उल्लंघन किया गया है इसका उल्लेख संसद की स्थाई समिति ने भी किया है इस समिति ने आदिवासियों की सुरक्षा को सुनिश्चित किये जाने पर जोर दिया था एवं इसके लिए अलग से व्यवस्था करने का अनुरोध किया गया है । वेंदांत, टाटा स्टील, आर्सेलर मित्तल इत्यादि कम्पनियों को स्थानीय लोगों का विरोध का सामना करना पड़ रहा है । अब तक स्थानीय लोगों एवं इन बड़े-बड़े पूंजीपतियों के विवाद में सरकार पूंजीपतियों की तरफदारी करती दिखाई दी है ।

          आज देश के आदिवासी मुख्य धारा से अलग थलग है क्योंकि आदिम जनजातियों को लगातार हाशिए पर धकेला जाता रहा । उनकी परम्पराओं का मजाक उड़ाया जाता रहा जबकि आदिवासियों की संस्कृति अपने आप में अनोखी है जहां पर गरीबी एवं अमीरी नहीं दिखाई देती, जात-पात नहीं दिखाई देती । प्रकृति के साथ सहयोग कर पर्यावरण में सहायता करने के अनूठे उदाहरण देखने को मिलेंगे, अपनेपन की बजाय समाजिक कल्याण की भावना, जो एक बेहतर समाज के बनाने में काम देती है । आदिवासी उद्योग एवं अन्य विकास कार्य से दूर नहीं भागते परन्तु उन्हें ऐसा लगता है कि इन उद्योगों एवं अन्य विकास से उनके घर टूटेंगे । उनको विस्थापित किया जाएगा और उसके बाद मिलेगी उनको भूखमरी एवं बेरोजगारी । इन सब कारणों से आदिवासी देश के प्रशासन मशीनरी से जलता एवं चिढ़ता है और इस तरह से वे राष्ट्र की मुख्य विचारधारा से कट गया है । इसलिए आज उसको सम्मान एवं उसका सही स्थान देना होगा । अभी मार्च2010 में एक संसदीय प्रश्न पूछा गया था कितने जनजाति लोगों की भूमि अधिग्रहित की गई है तो केन्द्र सरकार के पास जवाब था ऐसी सूचनाएं सरकार के पास उपलब्ध नहीं है ।

          आजादी के सत्तर साल के बाद भी आज आदिवासी समाज के सबसे वंचित तबको में से एक है । गरीबी एवं भूखमरी, अनपढ़ता के आंकड़े देखें तो आदिवासी वर्ग ही ज्यादा नजर आता है । इसका क्या कारण है कि आदिवासी कल्याण के लिए बनाये गए कानून एवं योजनाओं से उनपर कोई असर क्यों नहीं हुआ ? इसका क्या कारण है कि आज उनको आरक्षण के माध्यम छोटी-छोटी नौकरियां दी जा रही हैं और बड़ी नौकरियां केवल नाम की आदिवासी जातियां ले रही हैं क्या कारण है कि इसकी समीक्षा नहीं होती है जो जातियां आदिवासी के नाम पर कई तरह से सुविधा ले रही है और आज वे जातियां बहुत विकास प्रगति कर चुकी है फिर क्यों उन्हें आदिवासी मानकर उनको बड़ी-बड़ी नौकरियां दी जा रही हैं ? इन सबके कारण आज कई जातियां आदिवासी श्रेणी में आना चाहती हैं । सरकार को चाहिए कि जो वास्तव में आदिवासी हैं, जिनको सुविधा नहीं मिल रही है, उनको आरक्षण एवं अन्य सुविधाएं मिलनी चाहिए नहीं तो आने वाले समय में पढ़ा लिखा आदिवासी एवं महा आदिवासी जैसे वर्ग बन जाएंगे । मैं सरकार से जानना चाहता हूँ कि कितनी जातियों को जनजातियों में जोड़ा गया है । अनुसूचित जनजातियां वर्ग में शामिल करने के लिए नया फार्मूला चुनना होगा जैसे आदिम जनजाति गुण, अनूठी संस्कृति, भौगोलिक अलगाव एवं पिछड़ापन । सरकार भी जानती है कि आदिवासी की रोटी जो केन्द्र सरकार देती है उसको कुछ आदिवासी केवल नाम के ही जातियां ले रही हैं । राजस्थान की मीणा जाति क्या आदिवासी है ? यदि नहीं तो किस तरह से अनुसूचित जनजाति का फायदा उठा रही है ? सरकार को नीतियों में इस तरह से बदलाव करना चाहिए जिससे इसका लाभ वास्तविक आदिवासी लोगों को मिल सके ।

          अभी हाल ही में मैंने संसद में प्रश्न लगाया था कि वनों में फालतू जमीन जिस पर खेती हो सकती है और पुष्प एवं जड़ी बूटियां पैदा की जा सकती हैं वहां की जमीन को सरकार द्वारा वनों में रहने वाले आदिवासी लोगों को लीज पर दिये जाने के बारे में पूछा तो सरकार की तरफ से जवाब आया है कि ऐसा सरकार का कोई विचार नहीं है और न ही सरकार ने इस संबंध में कोई प्रावधान किया है । अतः सरकार की करनी एवं कथनी में भी फर्क है ।

     

*SHRI LAXMAN TUDU (MAYURBHANJ): I being a tribal, having born and brought up in the midst of tribal society, I know the route causes of backwardness of the tribal. I must thank to the constitution maker, those who have inserted the provision of tribal development programme in the constitution it self in the form of Directive Principles & Scheduled area development.

          I can emphatically say that, different Governments in different times have taken so many tribal development programmes to bring them as per with the general society in all respect, i.e. educationally, economically & socially, but the expected result is not satisfactory. Reasons are many.

          I can openly say that the tribal communities are mostly under the clutches of prejudices & superstitions & living in the unhealthy atmosphere. Only education & education  can bring them to the main stream of the society.

         With this strong understanding my Hon’ble Chief Minister of Odisha, Sh. Naveen Pattanaik has taken a strong & historical decision for establishing more and more residential school for their educational development,  particularly for women’s education. For non-residential tribal girls and ladies, those are school going as well as college going students are supplied with bicycles for their easy movement to school &  colleges for which a tremendous enthusiasm & liking for education has developed among the tribal boys & girls. Though my Chief Minister has targeted to provide education for one lakh girls students per year by providing residential facilities but still some lakhs and lakhs of tribal girls and boys are out side the purview of residential facilities.

          Hence, I request the Govt. of India to take necessary steps for further opening of residential school in the backward reason of the State of Odisha as well as through out India. Though eleven numbers of Ekalavya Model Residential Schools are established with the direct assistance of tribal welfare department, Govt. of India, we  want more and more that type of institution. Each and every block should be facilitated with those EMRS through out India for tribal development.

          I being the product of the Sainik Schook at Bhubaneswar in Odisha, at that time which was the only premier institution of Eastern region of our country. I feel that each & every state should have more and more Sainik Schools taking in account the population of that particular state. It is found that, in most of the naxal effected state like, Odisha and neighbouring state, Chhatisgarh, Jharkhand, West Bengal etc., the half educated  and illiterate young tribals are under the clutches of the naxals who are involved in most of the antisocial activities. I feel, if most of the tribal young boys are admitted in Sainik Schools, the patriotic feeling will be developed among themselves and they will not tolerate the antisocial activities of the naxals. Rather, they will oppose tooth & nail, because most of the development programme of the tribal areas are being hampered due to these antisocial activities which are spread in the backward areas of different states in our country.

          In conclusion, I can say that Govt. of India should liberally take the development programme in the poor tribal states like Odisha, Jharkhand, Chhatisgarh etc. and other state of Eastern reason of our country.

       

श्री रमाशंकर राजभर (सलेमपुर): महोदय, मुझे इसी स्थान से बोलने की अनुमति दी जाए।

          महोदय, भारत सोने की चिड़िया कहा जाने वाला देश था। जहां तक मेरी जानकारी है 400 ईसवी के बाद से विदेशी आक्रमणकारी सोने की चिड़िया कहे जाने वाले इस देश को लूटने के लिए आने लगे। आज हम मिनिस्ट्री ऑफ ट्राइबल अफेयर्स की डिमाण्ड फार ग्राण्ट पर चर्चा कर रहे हैं। इसलिए मैं इस बात को जरूर उठाना चाहूंगा कि अंग्रेजी हुकूमत ने एक सर्वे कराया।

16.02 hrs. (Shri Arjun Charan Sethi in the Chair)           पूरे देश में 700 जनजातियां है, 180 डिनोटिफाइड ट्राइब्स जातियां और 313 खानाबदोश जातियों का चिन्हीकरण किया गया। मै दावे के साथ कहना चाहता हूं, ये भी प्रमाण मिले हैं कि ये जनजातियां, पहले लोकतंत्र नहीं था, कबीलों के रूप में इस देश की शासक रही हैं। जब कबीलों के रूप में काफी जनजातियां यहां की शासक रहीं, तो स्वाभाविक था कि विदेश से आने वाले आक्रमणकारियों से उनको संघर्ष हुआ होगा। जब उनसे संघर्ष हुआ, तो निश्चित तौर पर अगर वे लोग सफल हुए, तो ग्रुप का ग्रुप बनाकर काफी आदिवासी जनजातियों को, उनके वयस्क पुरूषों का कत्ले-आम कर दिया गया और पेट में वंश बनाने के लिए हमारी माताएं पहाड़ों के किनारे, नदी-नालों के किनारे, जंगलों के किनारे जाकर बसीं। सबूत के तौर पर कहना चाहता हूं कि अंग्रेजी हुकूमत ने इन्हीं जनजातियों को, जिन्हें आपने इनक्लूड किया, वर्ष 1871 में इस देश की जनजातियों को जरायमपेशा जातियां कहा जाने लगा। वर्ष 1871 में इन जातियों के लिए क्रिमिनल एक्ट भी लाया गया। वर्ष 1871 में अंग्रेजों द्वारा जरायमपेशा कही जाने वाली जातियों को क्रिमिनल ट्राइब्स कहा जाने लगा। जब हम और आगे बढ़ते हैं, वर्ष 1924 में अंग्रेजी हुकूमत इसमें संशोधन करती है कि इन जरायमपेशा जातियों के लोग अगर अपने ससुराल भी जाते हैं, मौसी या बुआ के यहां भी जाते हैं, तो बिना थाने पर बताए नहीं जाएंगे। अगर इनके घर कोई बेटा पैदा होगा, तो स्थानीय थाने में उसके अंगूठे का निशान लिया जाएगा, वे लोग कहीं ग्रुप में नहीं रहेंगे, इनके कोई भी मुकदमे केवल अंग्रेज जज देखेगा, भारतीय जज नहीं देखेगा और इनकी मुकदमों की अपील ऊपरी कोर्ट्स में नहीं हो सकेगी।  इतनी प्रताड़ना होती थी। जनजातियों में शामिल डिनोटीफाइड ट्राइब्स की मैं आपसे बात करना चाहता हूं। भारत के आजाद होने के पहले से ही इस देश में, जहां तक मेरी जानकारी ठीक है, केरल के जज अय्यर साहब की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई थी। उस कमेटी ने यह रिपोर्ट दी कि जिन जातियों को क्रिमिनल एक्ट में निरुद्ध किया गया है, गालियां दी जाती हैं, जरायम पेशा कहा जाता है, उन्हें सबसे पहले इस धारा से मुक्त किया जाए। अगर कोई घुमन्तू है, अनुसूचित जनजाति में है और अस्थाई निवास करता है, तो उन्हें अनुसूचित जाति में शामिल किया जाए।

          उत्तर प्रदेश में 19 जातियों को, जिन्हें क्रिमिनल एक्ट में निरुद्ध किया गया था, अनुसूचित जनजाति में शामिल किया गया। इन जातियों में 17वें नम्बर पर एक भर जाति थी, जो नारायणी और गंगा के दोआबे में विदेशी आक्रमण से तबाह हो गई थी, 'अरली हिस्ट्री ऑफ इण्डिया' में डॉ. इस्मत चुगतई ने लिखा है कि बुंदेलखंड में भरों के कबीलों का राज था, जो चन्द्रवंशी होने के नाते अपने आपको चंदेल लिखने लगे। आज वे पूर्वांचल में नारायणी और गंगा के दोआबे में ताड़ी उतारने का काम करके अपना जीवनयापन कर रहे हैं, पत्तल बीन कर और मछली मारकर अपना जीवनयापन कर रहे हैं। आज उनकी बेटियों की शादी नहीं हो पा रही है। आज तक वे स्थाई घर नहीं बना पाए हैं। आपने इसका सर्वे भी कराया है और उसमें शिक्षा आदि की कमी पाई है। यह सम्पूर्ण जाति काफी दिनों तक विदेशी आक्रमणकारियों से लड़ाई लड़ती रही और देश को बचाया। भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। हजारों वर्षों तक विदेशी आक्रमणकारियों के आने के बावजूद भी वे लोग यहां की सभ्यता और संस्कृति को नहीं मिटा पाए। भारत मां की धन सम्पदा और प्राकृतिक सम्पदा को वे लूटते रहे, लेकिन यहां की सभ्यता को नहीं मिटा पाए। मैं दावे से कहना चाहता हूं कि हजारों वर्षों तक जो संस्कृति और संस्कार इन लोगों में पैदा किए गए थे, आज भी वे विद्यमान हैं।

          इन दलितों के, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के हित के लिए जो आपने अपने मंत्रालय के तहत अनुदानों की मांगे रखी हैं, हम उनका समर्थन करते हैं। सरकार द्वारा कराए गए सर्वे के अनुसार देश में आदिवासियों की कुल जनसंख्या साढ़े आठ करोड़ के करीब है यानि सम्पूर्ण आबादी का 8.2 प्रतिशत अंश जनजातियों का है।

          हम जो बजट देश के लिए बनाते हैं और उसे खर्च करते हैं, उससे हम विकसित भारत तो बना लेंगे, लेकिन गौर से देखेंगे तो आपको झोंपड़ियों वाला भारत दिखेगा, पैसे के अभाव में बेटी की शादी न करने वाला भारत दिखेगा। विकास की योजनाओं को बनाया जाता है, उसमें हमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन वे योजनाएं ऐसी होनी चाहिए, जिनसे इन लोगों को भी लाभ पहुंचे।

          मैं दावे के साथ कहना चाहता हूं कि जब कहीं बिजली का पोल लगना शुरू होता है तो गरीबों के मोहल्ले तक आते-आते तार और पोल खत्म हो जाते हैं। इसी तरह जब कहीं राशन कार्ड बनने शुरू होते हैं तो गरीबों के मोहल्ले तक आते-आते वे भी खत्म हो जाते हैं। मैं कहना चाहता हूं कि डिनोटिफाइड ट्राइब्स जातियों की गणना मंत्री जी के विभाग ने की है, वह स्वयं देख लें कि उनके सुधार के लिए एक-दो नहीं, कितने ही एक्ट बने, लेकिन परिणाम आशा अनुरूप नहीं आया। क्रिमिनल एक्ट 1871 के तहत क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1911, क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1924, क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1952, जो रिफाइंड करके बनाए गए। सन् 1950 से लेकर अब तक बीसीयों एक्ट इन पर बने हैं। मैं दावे के साथ कहना चाहता हूं कि जीओ नम्बर 899(1), एक्सएसबीआई(705)1959,12मई 1961 को जो भर जाती, जो विमुक्त जाति है और उत्तर प्रदेश की सरकार उसे विमुक्त जाति का सर्टिफिकेट भी देती है लेकिन जब मैंने आपकी इस किताब को पढ़ा तो इसमें भर जाती कहीं भी डिनोटिफाई ट्राइब्स जनजाति में नहीं है। मैं आपसे मांग करता हूं कि इसे देखना चाहिए।

          अंत में मैं एक बात और कहना चाहता हूं कि अगर हम सचमुच में जनजातियों को ऊपर उठाना चाहते हैं तो सबसे पहले उनके कल्चर से संबंधित प्रोग्राम लेकर, उनके कल्चर से अवगत होने वाले प्रोग्राम लेकर उनके बीच में हमें जाना होगा। आप उनके बच्चों को पढ़ाते हैं और उनके बच्चे किस भाषा में पढ़ना चाहते हैं, क्या इसका हमने इंतजाम किया है? राजस्थान, उत्तर प्रदेश और गोवा का जो जनजाति समूह है, उनकी मात्रभाषा में जब आप अपने प्रोग्राम को लेकर जाएंगे, तब वे आपके प्रोग्रामों से अवगत होंगे, नहीं तो वहां भी आप अंग्रेजी बोलकर चले आयेंगे तो आपके प्रोग्राम ले जाने वाले तो माला-माल हो जाएंगे लेकिन जिनके लिए आपने प्रोग्राम दिया है, उन्हें कुछ नहीं मिलेगा। इसीलिए मैं चाहूंगा कि आप अपने प्रोग्रामों को उनकी भाषा में ले जाएं।

          उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए आपने गांवों का सर्वे कराया है, लेकिन सुझाव के तौर पर कहना चाहता हूं कि आप सर्वे करवाइये कि जहां इनका समूह बसता है, वहां एक इंच भूमि भी विद्यालय के नाम पर छोड़ी गयी है, एक इंच भूमि भी वहां विद्यालय के नाम पर नहीं है। गरीबों के मौहल्ले में विद्यालय के नाम पर जमीन ही नहीं है, बनाएंगे कहां?जो जनजातीय समूह हैं, वे कहां बसे हैं?हजारों साल पहले तो वे कबीलों के राजा थे लेकिन आज यह जनजातीय समाज कहां बसा है - इलाके के पोखरों पर बसा है और वहां भी उसके नाम से वह भूमि नहीं है। इसलिए वह तबाह होता है।

                                                                                         

MR. CHAIRMAN :  Hon. Members, as an exception, I am calling Shri Ramesh Rathod to speak only for three minutes because he has to catch a flight to Hyderabad.

       

श्री रमेश राठौर (आदिलाबाद): सभापति महोदय, मैं खुद आदिवासी हूं और आंध्र प्रदेश से हूं और मुझे खुशी है कि यूपीए की अध्यक्ष जी आज सभा में हैं। सन् 1998 में माननीय सोनिया जी नारनौल में आये थे, उस समय 1800 गिरिजन डायरिया, मलेरिया के कारण मरे थे और उसका कारण शुद्ध पानी का न मिलना था। गत् वर्ष भी 500 आदिवासी और गिरिजन पानी न मिलने के कारण मर गये। वर्ष 2006-2007 में 1500 लोगमर गये। आज 62 साल की आजादी के बाद भी गिरिजन को पानी नहीं मिलता है। आंध्र सरकार ने इंद्रम्मा हाउसिंग का अच्छा कार्यक्रम लिया है लेकिन गिरिजनों के घर नहीं बन पा रहे हैं। वहां पर केवल पैसा लुटाया जा रहा है लेकिन उनको घर नहीं मिल रहा है। आंध्र प्रदेश में गिरिजनों और आदिवासियों में शिक्षा का प्रतिशत बहुत कम है।   उस प्रांत में आदिवासियों के लिए पढ़ाई की व्यवस्था करना है। वहां चार हजार शिक्षकों के पद खाली हैं। सारे पद भरना सरकार की जिम्मेदारी है। केंद्र सरकार और राज्य सरकार को जितना बजट जनसंख्या के हिसाब से देना है, उसमें पूरी तरह विफल रही हैं। गिरिजनों के साथ न्याय न करके सरकार अन्याय कर रही है। सरकार उचित निर्णय ले, ताकि गिरिजनों को समान अधिकार मिले। केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से जनसंख्या के हिसाब से जितना बजट देना है, उतना दिया जाए।

          सर्वशिक्षा अभियान के लिए जो स्कूल इमारतें बनाई गई हैं, वे अभी तक पूर्ण नहीं हो सकी हैं। ट्राइबल्स को ऊंची शिक्षा में जो प्राथमिकता दी जानी चाहिए, वह भी नहीं दी गई है। उनकी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए जो एक्शन प्लान केंद्र सरकार की तरफ से बनाया जाना चाहिए, लेकिन आदिवासी लोगों को बैंक गारंटी न मिलने की वजह से किसी को लोन नहीं मिल रहा है। आईटीडीआर में कोई ऐसा बजट एलोकेशन देना, लेकिन रिलीजियस न देने से किसी को वहां सब्सिडी, मार्जिन मनी या बैंक लोन नहीं मिल रहा है। इससे अमीर और ज्यादा अमीर होते जा रहे हैं और आदिवासी गरीब और ज्यादा गरीब होते जा रहे हैं। उनके लिए एक समय का खाना भी प्राप्त करना मुश्किल हो गया है।

          आज नक्सलवाद की जो समस्या है, उसमें हर आदमी कहता है कि ट्राइबल्स का हाथ है। यह सरासर गलत है।1986में आल्लमपल्ली जी ने जो नक्सलियों ने पुलिस के 17 लोगों को मारा था, उस समय एन.टी. रामाराव जी ने जा कर गिरिजन की हजार टीचर्स का पोस्ट भर्ती की थी और फोरेस्ट गार्ड्स की पोस्ट भर्ती की थी। इसी तरह गिरिजनों को उसमें से निकालने के लिए सरकार प्रयास करे, ताकि पूरे गिरिजन युवकों को, बेरोजगार युवकों को नौकरी दे। मैं निवेदन करना चाहता हूं कि माइनिंग ट्राइबल्स की प्रोपर्टी है, ...( व्यवधान) आप ट्राइबल्स के बारे में बोलने दीजिए। ट्राइबल अगर बोलता है, तो आपको क्यों तकलीफ होती है। यूपीए सरकार की तरफ से हमें पानी मिल जाएगा, हमारे बच्चों को नौकरी मिल जाएगा, हमें मिल गया है, तो इन्हें क्यों तकलीफ होती है? आप हमें यहां तो बोलने दीजिए। मैं सरकार से निवेदन करना चाहता हूं कि वैजाट में बाक्साइट माइनिंग है, जिन्दल कम्पनी को दिया गया। उस एरिया में जो एमपी साहब है, उनका बयान है कि वहां माइनिंग नहीं बनेगी, लेकिन वहां आज तक काउंसिल नहीं बनाया गया। ग्राम सभा नहीं बनाई गई है। पर्यावरण परमिशन नहीं मिलने के कारण बाक्साइट एल्यूमिनियम की फैक्टरी चालू हो गई है, यह ट्राइबल्स के ऊपर सरासर अन्याय है। इतना ही नहीं अभी विशाखा एजेंसी में 1700 हेक्टर रिजर्व फारेस्ट लैंड जो ट्राइबल के कंट्रोल में आती है, वहां भी अलकायदा कम्पनी को दिया गया। उड़ीसा में वैद्यनाथ माइनिंग कम्पनी के बारे में सदन को मालूम है और खास कर गृह मंत्री जी को मालूम है कि यहां पर किस तरह ट्राइबल लोगों पर अन्याय हुआ।

          मैं सरकार से निवेदन करता हूं कि ट्राइबल्स के लिए न्याय करेंगे, तो ट्राइबल कभी आपके साथ अन्याय नहीं करेगा। आपको कभी नहीं भूलेगा। आने वाले दिनों में आप ट्राइबल लोगों को समान अधिकार देंगे, ऐसे समझते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

     

*श्री सतपाल महाराज (गढ़वाल):   हमारे यहां जनजातियों का इतिहास बहुत पुराना रहा है तथा सभ्यता के विकास में इनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता । बरसों से आदिवासियों के हक-अधिकार की लड़ाई लड़ रहे स्वयंसेवी संगठनों के मुताबिक सरकारी तंत्र, खासकर वन विभाग का अमला अंग्रेजों के जमाने से आदिवासियों के साथ हो रहे अन्याय को दूर करने के वनाधिकार कानून के मूल उद्देश्य का ही गला घोटने पर तुला है । इस कानून पर अमल करने वाली नोडल एजेंसी आदिम जाति कल्याण विभाग है, पर व्यवहार में उसकी यह अहम और अग्रणी भूमिका वन विभाग ने हथिया ली है । यह विभाग आज भी आदिवासियों और अन्य परंपरागत वनवासियों को वन भूमि से खदेड़ने के अपने पुराने रैवये पर कायम है ।

          गौरतलब है कि वनाधिकार कानून में वन विभाग को निर्देश दिया गया है कि जब तक आदिवासियों व अन्य भूमि अधिकारों के सत्यापन का काम पूरा नहीं हो जाता, तब तक किसी को जमीन से बेदखल न किया जाए । मगर इसका खुला उल्लंघन किया जा रहा है । कई वनवासियों को उनकी जमीन पर खेती करने से रोका जा रहा है । वन हटा कर या फिर वनवासियों की भूमि पर प्लांटेशन का सिलसिला चल रहा है वह भी स्थानीय समुदाय से बिना किसी राय-मशविरे के । इससे उनके चौपायों को चरने के लिए घास भी नहीं मिल पाती ।

          मेरा संसदीय क्षेत्र उत्तराखंड में है जिसमें थारू और बोक्सा जनजाति हैं, जिनका जमीन पर कब्जा सालों से है । मैं अपने क्षेत्र के संबंध में बताना चाहता हूं कि वर्ष 1969 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नैनीताल तराई भाबर क्षेत्र के लिए गजट नोटिफिकेशन किया गया था । उसके अनुसार उत्तराखंड में नैनीताल जिले के रामनगर विधान सभा क्षेत्र में जंगलों में वर्षों से अपनी जमीन पर रह रहे थारू एवं बोक्सा जनजातियों को जमीनें वर्ग तीन व चार में दे दी गयी । उनकी जमीनों को वर्ग एक (क) की श्रेणी में नहीं किया गया तथा उन्हें जमीनों के भूमिधारी अधिकार नहीं दिए गए। इस कारण उन्हें उनकी जमीनों पर बैंक से ऋण भी नहीं दिया जाता है और केंद्र सरकार की इंदिरा आवास जैसी लाभान्वित योजनाओं से भी उन्हें वंचित होना पड़ रहा है क्योंकि उन्हें भूमिधारी अधिकार प्राप्त नहीं है ।

          मालधन चौड़ क्षेत्र में शिवनाथ पुर नई व पुरानी बस्ती, पटरानी व कुमगडार तथा नैनीडांडा के सुंदरखाल आदि जो वन गांव हैं, वहां बिजली के खंबे नहीं लग पा रहे हैं, पीने के पानी की सुविधा नहीं मिल पा रही है तथा वहां बच्चों के लिए विद्यालयों का निर्माण कार्य नहीं हो पा रहा है, क्योंकि वहां के जनजातियों को जमीन पर भूमिधारी अधिकार नहीं दिए गए हैं । हमारी सरकार के विकास के कार्य उन्हें कोई लाभ नहीं पहुंचा पा रहे हैं ।

          इसी प्रकार मारछा, तोलछा एवं भोटिया भी प्रदेश की जनजातियां हैं । पहले इन लोगों का तिब्बत में व्यापार था वहां पर इनकी जमीन-जायदाद आदि थी जिसके कागज भी इन लोगों के पास हैं । परंतु अब वहां चीन का कब्जा होने के कारण भूमि के कागज होने के बावजूद भी इनको कोई मुआवजा नहीं मिला । ये लोग सर्दी के मौसम में पहाड़ से नीचे आकर रहने लगते हैं तथा गर्मी में वापिस ऊपर पहाड़ पर चले जाते हैं, जिस प्रकार नीति व माना के लोग सर्दी में निचले भागों में आ जाते हैं तथा गर्मी में वापिस नीति व माना पहुंच जाते हैं ।

          मेरा केंद्र सरकार से अनुरोध है कि विभिन्न प्रदेशों की वन भूमि पर कई पीढ़ियों से रह रहे जनजाति के लोगों तथा उत्तराखंड के थारू व बोक्सा आदि जनजाति के लोगों को, जिनकी जमीनें वर्ग तीन व चार में रखी गयी हैं, उन्हें वर्ग एक (क) के अधिकार देकर भूमिधारी अधिकार दिए जाएं एवं उन सब के गांवों को राजस्व गांव घोषित किया जाए ताकि उन्हें मूलभूत सुविधाएं तथा सरकार की योजनाओं का पूरा लाभ मिल सके । इसके लिए उन्हें वन भूमि पर स्वामित्व का भूमिधारी अधिकार दिए जाने हेतु अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम,2006 की भांति एक उपयुक्त केंद्रीय अधिनियम लाए जाने की आवश्यकता है । मेरा केंद्र सरकार से यह भी आग्रह है कि मारछा, तोलछा और भोटिया जनजाति के लोगों को चीन की सरकार से बात कर मुआवजा दिलाया जाए एवं इनके पड़ाव पंजीकृत करने के लिए उचित कदम उठाएं जाएं । साथ ही, कैलाश मानसरोवर की यात्रा को नीति और माना से भी खोला जाए ।

          इसी के साथ मैं अपनी बात को यहीं समाप्त करता हूं तथा एक बार पुनः आपको धन्यवाद देता हूं।

                     

DR. KAKOLI GHOSH DASTIDAR (BARASAT): Salam Johar, Chairman Sahib, Khurumjari I stand in support of the Demands for Grants of the Ministry of Tribal Affairs.

          We are making efforts for the upliftment of the backward people. The other day an hon. Member from the other side cited an incident in which just because a dog belonging to the family of a backward person barked at a youth of a high-class family, all the hutments belonging to the backward people were burnt down. This shows where we stand today.

          It shows the status of the backward people. It shows the status of the tribal people, the dalits today in India. But of course, the National Scheduled Tribes Finance and Development Corporation set up in 2001 with an authorised share capital of Rs.500 crore was to support them. The State Tribal Development Corporations were provided with funds to the tune of Rs.48.76 crore. The Tenth Plan provided Rs.2,518.07 crore to the State Governments to strengthen the Tribal Sub-Plan but the main point  remains that who is monitoring them.

          As far as my State, West Bengal, is concerned, it has become famous for the starvation deaths in the areas of Lalgarh, Amlasol, Kheyada, Ghoshpada in Mushirabad. So, there has to be a strict monitoring and accountability again to know as to what is happening to the funds that is going to these places to take care of the tribal people. If these people were well fed and looked after,   I am sure, they would not suffer as they do today. Neither, they would be misled as they are being today. We recognise them for their primitive mindset and so do like us the enemies of India, the national enemies, who instigate these gullible people to discontent and resentment and encourage them to take up arms because as we know, Article 366 of the Constitution of India refers to the Scheduled Tribes as those communities who are Scheduled in accordance with Article 342 of the Constitution – the essential characteristics first laid down by the Lokur Committee that these are people with indications of primitive tribes, distinctive cultures, shyness of contact with the community at large, geographical isolation and backwardness.

          So, when we do realise that they have these traits, it becomes even more important for people like us to stand by them and not unleash State-sponsored terrorism on them. There are areas, for example, in Manipur, the base level and local body elections have not taken place for 20 years, which has given rise to resentment amongst the people. They are looking for their democratic right to franchise, their democratic right to fight the elections for self-governance. But this is not done and that is the reason why they are up in arms. I think, it is pertinent to put here that we should be taking their status in mind and looking after their democratic rights also. What is the difference between those people and us? Anthropologically, it is the  same race, fusion of gametes resulting in the pheno-type of homo-sapiens or human beings. Intellectually, the DNA replicates to form the sulci and gyri of the brain. It is the same brain; it is the same human being. But only difference is the social behaviour that in different regions differs, customs  vary, cultural heritage varies, languages vary and if we can handle it carefully, we can have them brought to the mainstream.

They are powerful people, they have risen against the State a number of times; they have risen against the oppression even during the pre-Independence time; they are used to walking miles together with load on their heads through jungles; they run down hillsides which we cannot do. They carry wood; they carry water. Why can’t we have them channelised into things like sports? Why can’t we have them channelised into Departments like Defence? Why can’t we adopt their culture as ours? Why can’t we prompt their song and dance and give it to the world who are going to be impressed by them? We can teach the women weaving. They are doing their own weaving in different parts of our country. Why can’t we encourage them, give them more allotment, and engage these women for self-help? Why can’t we like the Dogra culture, encourage them for sculptures, which can be sold? We know that the Incas are still being preserved. The Totem poles are being sold all over the world. So, our necessity would be to think for some reason, to set up some organisation, some set up, some autonomous body that can take care of their artistic skills need.

It is true that today as per 2001 census, there are 84.33 million of them in the country and there are 573 Scheduled Tribes speaking 270 languages. So, when we are trying to allot funds for their education, what is happening is that the teacher who is going to the village or the hilly area or the forest area, to teach, is speaking the regional language – the child does not know the regional languages. So, the child does not understand what the teacher is saying and the teacher does not understand what the child is saying. For this reason, the language bridge was supposed to be formed for understanding the languages. But that has not been effective, since 25 per cent of the teachers are not performing their duties properly at these remote areas.

          The forest dwellers, traditionally are protected by articles of the Constitution. The hill dwellers are also protected; their rights have to be recognized. Through the Kasturba Gandhi Balika Vidyalaya Scheme and through other schemes, we are trying to help them. There has been the Janshala programme of the Government of India, along with five UN agencies, but we have seen that the drop out rate is very high. Where do these little children go? They either go to fetch water for the family because the family does not have drinking water facility or they go to the forest to collect wood for firewood, for their meals to be cooked. So, we have to look at their basic needs very carefully to provide such requirements to prevent dropout.

          Why, nearly after 63 years of Independence, we have not been able to organize drinking water or potable water for them? Why can we not have an autonomous body which takes care of the drinking water facility for these backward people in our country? Is it not high time, with the global warming setting in, for the situation to improve? That is why, their education, their drinking water facility, etc. have to be taken up very seriously and given importance. Their health facilities are completely lacking. They do not get food. I wonder, how many of us sitting in this august House here have had the opportunity to taste chutney made of red ants. That is the food that these tribal people are taking in their homes because there is no food and water there. They are suffering from diseases and there is no means by which they can go to the doctors. So, if we take good care of them, they will also take good care of us. There are areas after areas in Chhattisgarh, Orissa, Madhya Pradesh and in the districts of Purulia, Bankura, Birbhum and Lalgarh in West Midnapur of West Bengal where starvation deaths are common. They cannot organize two square meals a day.  We have to provide them nutritions food.

          The National Rural Health Mission is trying to do a lot for the people. I do think that these people need better care and we must organize health care facilities for them, their food, their education and bring them to the mainstream so that they could lead a good life.

          With this, I support the Demand for Grant of the Ministry.

   

SHRI K. SHIVKUMAR ALIAS J.K. RITHEESH (RAMANATHAPURAM): Sir, people are now very happy as our UPA Government has announced a lot of schemes for all the States. Our Tamil Nadu Chief Minister Dr. Kalaignar has implemented all the schemes perfectly. So I should convey my heartfelt thanks to the UPA leader hon. Sonia ji, hon. Prime Minister Dr. Manmohan Singh Ji, and hon. Chief Minister of Tamil Nadu Dr. Kalaignar Tamil Nadu is the number one State in India, in implementing the new schemes. Because of the untiring and ceaseless hard work of our leader Tamil Nadu Chief Minister Dr. Kalaignar, Tamil Nadu people are very happy and no one will refuse it.

Now in Tamil Nadu Eklavya Modern Residential Schools are functioning at Vilupuram and Salem. 720 Tribal Students were benefited. A lot of Tribals are there in Vellore, Namakkal and Tiruvannamalai. I request the Government to grant funds to establish Eklavya Schools in the above mentioned districts for which the proposal was already forwarded to the Government of India.

Under the Research, Information, and Mass - Education, Tribal Festivals Schemes, the Tribal Research Institute had been setup at Mu-Paalada Ooty in Tamil Nadu and it is functioning well. Grants to this Tribal Research Institute was stopped before four years. 1 urge the Government to continue Center's share for the improvement of Ooty Tribal Research Institute.

Apart from that, our leader, Tamil Nadu Chief Minister Dr. Kalaignar is taking keen interest for the upliftment of the all the poor people including Scheduled Tribes in Tamil Nadu.

For example, the Government of Tamil Nadu has implemented the following schemes during the year 2009-2010 for the welfare of the Tribes.

(i)       Under the Integrated Tribal Development Scheme the Government of Tamil Nadu has passed orders and released Rs.16.8 lakhs to construct 28 houses in Namakal and Thiruvanamalai Districts.
 (ii)     For the Economic Development of the Tribal people of Dharmapuri, Salem, and Tiruvanamalai Districts, the Government of Tamil Nadu had spent Rs.10.10 lakhs to supply 34 Sheep Units and 20 milch animals.
(iii)     Tamil Nadu Government has spent Rs. 32 lakhs for the Water Scheme in four Tribal Residential Areas and also Rs.4.95 lakhs were sanctioned to construct three check dams.

In addition to that, under the first Proviso to Article 275/1 of the Constitution of India Rs.82.65 lakhs have been sanctioned for electrification in 75 Tribal Areas in Namakal District.

(iv)     Under the Special Central Assistance to Tribal Sub Plan Scheme, the Government of Tamil Nadu had taken steps and issued orders to supply Bee-keeping boxes, Milch Animals, Sheep units, Fishing nets and to establish Brick Chambers, New roads and to improve 5 Residential Tribal schools etc. at the cost of Rs.189 lakhs.

 In addition to the above, the Tamil Nadu Government has sanctioned Rs.63 lakhs for the Income Earnings Schemes to the Scheduled Tribes.

The Central Government has lot of schemes for the welfare of the Tribal people like:

(a)      Centrally sponsored Central Sector Schemes.   

(b)      Special area Programmes.   

(c)      Special central assistance to Tribal sub plan.   

(d)      Granting Aid to voluntary organizations.   

(e)      Strengthening education among ST girls in low literacy districts etc.   

But most of the Tribal people did not know about the Government Welfare Schemes. The Government of India should take steps to create awareness among the Tribals to make use of the schemes. The basic objective of policy programmes is to bring the development by making them Self-Reliant.

As per 2001 Census 6.51 lakhs Tribals are living in Tamil Nadu. The Income Generation Activities like supply of Sheep Units, Milch Animals etc., are provided to the Tribals in Tamil Nadu according to the availability of funds. Every year around 200 Tribals are benefited. To uplift their life conditions 600 Tribals will be provided through above income generation activities at a tune of Rs.75 lakhs. The above amount may be sanctioned as a special case to Tamil Nadu.

In Vellore, Coimbatore, Tiruvannamalai, Tiruvallur areas a lot of Tribals are living. There are no proper road facilities. The Government should take steps to allot the funds for the road projects about which I have already written separately to the hon. Minister. Already the proposals had been sent to the Government for necessary action. Now I urge the Government to take immediate steps to sanction the above mentioned roads.

Likewise, the Government should allot funds for the welfare of the neglected Kanayakumari, Tirunelveli, Madurai, Dindugul, Theni and Ramnad Districts in Tamil Nadu.

I urge the Government to extend more financial support and grant funds for the pending projects for the Socio - Economic Development of Scheduled tribes of India including Tamil Nadu.

The days are not far for a common man to say that the UPA Government had safeguarded the interests of the tribal communities as well.

                                                                                     

*SHRI JAYARAM PANGI, (KORAPUT): Respected Sir, I will speak in my mother-tongue Oriya.  Thank you, for giving me this opportunity to speak.  At the outset I rise to oppose the Demands for Grants for Tribal Affairs. The reason being that in India we have more than nine crores of tribal population but the Budget is only of thirty-two hundred crores, passed since independence.  Sixty-two years have passed since independence.  From those sixty-two years Congress Government was ruling at the centre for 49 years with brief stints of Janata Dal and NDA Government in between.

          Sir, one fourth of the population in my State Orissa belongs to the tribal community Maximum number of most primitive tribes reside here.  Many tribal leaders like Birsa Munda, Siddhu, Tilka Majhi, Kanhu, have sacrificed their lives for the cause of the nation.  Sir, I became a member of the Orissa Legislative Assembly in the year 1977.  I am the son of a freedom fighter and several of my family members have been people’s elected representatives in the past.  Yet we could not be successful in improving the conditions of the people at the grassroot level.  There was no facility as far as communication, health or education is concerned.  Due to the faulty central policies Koraput district lacked road or railway connectivity.  Till the year 1990, no development took place is Orissa. I must remind you here that Koraput is the land of Saheed Laxman Nayak who participated in the Quit India Movement of 1942, who was later hanged in the jail of Berhampur.  Madho Singh one of the veteran freedom fighters of Bargarh district was deported to the cellular jail of Andaman, other tribal leaders who started armed rebellion against the mighty British Empire were Hathi Singh, Kunjal Singh, Aairi Singh, Bairi Singh, Chakara Bisoi, Kasti Dakha etc. Thus tribal leaders have sacrificed so much for the freedom of this nation.  Yet what have they got in return?  They remain neglected in politics, in administration, in health, education and every other sphere.  The tribal communities are always at the receiving end.  The tribal leaders remain unsung heroes.

          In Orissa, whatever little progress has been made in backward districts like Koraput the credit goes to our farmer leader late Shri Biju Patnaik.  Now under the able leadership of Shri Naveen Patnaik we are optimistic.     

          I must thank the NDA Government for spearheading the developmental process and especially to Shri Vajpayeejee.  Road connectivity improved a lot.  We now have Biju Jyoti Yojna.  I fail to understand why the Congress Government is obsessed in crediting itself with all the developmental works that have taken place anywhere in Orissa. ...*  Congress has utilised the tribal community in Orissa as a mere vote bank.  In parties like the BJD we have a consensus approach and all-inclusive perspective.

          The Central Government has always overlooked the fact that tribal community is a part and parcel of the society and need all-round development to be part of the national mainstream. Tribals are being uprooted from their own land in the name of industrialization and exploited in every sphere.  We should give them the due recognition as the custodian of our forest and mineral wealth.  They must be properly compensated and rehabilitated before being displaced.  The Government of Orissa thankfully is very serious as far rehabilitation policy is concerned.

          What is most disturbing in the trend of migration. While tribals are moving to cities to work as labourers and becoming slum-dwellers in the process, the urban elites are reaching tribal areas to set up industrial hubs.  The tribals are working hard in fields, but not getting remunerative prices for their produce.  Most tribal areas lack road connectivity and transport facilities to mainland market.  Hence tribals fall prey to middlemen and languish in poverty. In order to improve their condition, we urgently need a new central policy with a pro-people, pro-poor approach.  The administration should also be sensitized to cater to the needs of the tribal brethren.

          Sir, wherever industrialization has taken place a member of the displaced family must get a job.  Secondly the family which has lost its traditional livelihood and homestead land must be given legal right as a share-holder of the concerned company.  For this we require a central legislation which this august House must deliberate upon.

          Sir, I would like to draw the attention of the Central Government to the Pollavaram project which if implemented may submerge many areas in the Malkangiri district in my state.  So kindly think about the tribal families who will lose their land.

          Sir, I would like to thank the Central Government that Orissa has been sanctioned 11 Ekalavga Model Schools.  The word ‘Model’ means an ideal.  Unfortunately in these schools there is nothing ideal.  The old pattern continues.  There are no permanent teachers, the quality of education in sub-standard, the food is unhygenic and living condition is deplorable. Residential facilities and hostels must be provided for tribal students.  We have enacted the new law without offering hostel facilities to tribal students who hail from interior places.    The drop-out rate will certainly go down if we provide accommodation at the Gram Panchayat level.

          Sir, I would like to express my gratitude to the Central Government for opening a central university in Koraput district and also to the State Government for providing the logestic support.  It is my humble request that this university be named after Saheed Laxman Nayak and students of the Scheduled Tribe and Scheduled Caste community be given priority in admission.

          Sir, the State Tribal Advisory Committee under the chairmanship of Chief Minister of Orissa has sent a proposal to the Central Government to include the following castes in the ST category.  They are Jhodia, NTDora and Nukadore.  Kindly comply with the same.  The people of Koraput had voted for the Congress party in the last nine general elections.  But their hopes have been betrayed.  Thus the Central Government must take suitable steps so that the area is developed, problems like naxalism is eradicated and tribals become part of the national mainstream.

 SHRI J.M. AARON RASHID (THENI): He said “Congress policy and Government”.  Those words should be expunged. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN:  Shri Aaron Rashid, I will look into the proceedings.  Please sit down.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Shri M. Anandan to speak now.

SHRI M. ANANDAN (VILUPPURAM): Hon. Chairman, on behalf of All India Anna DMK, I rise to put forth my views on the Budget for 2010-11 in general and on the Demands for Grants for the Ministry of Tribal Affairs for the year 2010-11 in particular.  

          The UPA Government has been presenting a very rosy picture of this Budget. Tall claims are being made out saying that special sector spending has been increased to uplift the poor and the needy.  But the Budget Estimates give a different picture.  The Budget Estimates proposed in the Budget for 2010-11 is Rs. 11,08,749 crore, which is an increase of 8.5 per cent over the total expenditure of the Budget Estimates for 2009-10.  There is 80 per cent increase in the Budget of the Ministry of Social Justice and Empowerment, but the allocation for the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes is poor. The total annual plan expenditure for 2010-11 is Rs. 2,84,284 crore. According to Special Component Plan, dalits are supposed to get Rs. 46,054 crore. As per the Tribal Sub Plan, tribals are to get Rs. 23,311.29 crore.  However, the allocation under the SCP is Rs. 20,624 crore and the TSP is Rs. 11,745.94 crore.  The Budget denies Rs. 25,429.70 crore to dalits and Rs. 11,565.35 crore to tribals.

          The Economic Survey of 2009-10 points out that the implementation of schemes for the Scheduled Castes, the Scheduled Tribes and the OBC have not met the targets.  Out of the total annual expenditure of Rs. 10,20,838 crore for the financial year 2009-10, the Government spent 13.36 per cent in social service sector in both the plan and non-plan Budgets.  However, the Departments of social service sector have spent a negligible 0.42 per cent on the Scheduled Castes, the Scheduled Tribes and the OBCs who constitute 76.4 per cent of the population.

          The schemes under the two agencies, namely the National Scheduled Castes Finance Development Corporation and the National Safai Karamchari Finance Development Corporation disbursed on an average Rs. 14,939 crore for NSCFDC and Rs. 12,892 crore for NSKFDC.  

This shows that the schemes are outdated in nature and are poorly designed. Scholarships provided under education development schemes are an insult to the Dalits. The monthly amount per head for Pre-Matric Scholarship is Rs. 77 and for Post-Matric Scholarship is Rs. 160. This scheme needs a thorough review.

          Out of 83 Departments and Ministries under the Government that have Plan allocation, only 18 have allocated funds for SCP and TSP from their Annual Plan Expenditure. Of the Departments and Ministries that have allocated funds for SCP and TSP, 8 Departments and Ministries have made allocation below five per cent. It is a matter of great concern that the Ministry of Information Technology headed by a Minister hailing from Dalit community is one of the 8 Ministries that have done poor allocation for the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes.

          The Budget focuses on accelerated development of high quality physical infrastructure, such as roads, ports and airports that are essential to sustain economic growth. For this, an amount of Rs. 1,73,552 crore, which accounts for over 46 per cent of the total Plan allocations, has been earmarked. But surprisingly there is zero allocation for the Scheduled Castes and Scheduled Tribes in 8 Ministries and Departments under TSP or for Scheduled Castes and Scheduled Tribes.

          Rural Development has got an increase of almost Rs. 4,000 crore with an attempt to create rural infrastructure and job creation in the villages with a total allocation of Rs. 66,100 crore. But the overall allocation under SCP in the Ministry of Rural Development is only Rs. 5,019.60 crore which is a meagre 7.5 per cent of the total Plan allocation of the Ministry. The allocation for NREGP has been stepped up to Rs. 40,100 crore in 2010-11. Looking at the number of needy people from Dalit community throughout the country, Rs. 40,100 is not sufficient.

          Swarna Jayanti Shahari Rozgar Yojana, which is designed to provide employment opportunities in urban areas, has been strengthened by increasing the allocation for urban development by more than 75 per cent from Rs. 3,060 crore to Rs. 5,400 crore. In addition, the allocation for Housing and Urban Poverty Alleviation is also being raised from Rs. 850 crore to Rs. 1,000 crore in 2010-11. But I regret to say that there is no allocation under SCP or TSP from the Ministry of Urban Development as well.

MR. CHAIRMAN:  Mr. Anandan, you speaking on all the Demands at a time. You should speak only on the Demand of the Ministry of Tribal Affairs. Please try to conclude now.

SHRI M. ANANDAN: Sir, I will conclude.

          I call upon the Government to revise the allocations made for SCP and TSP to match the population according to the guidelines issued by the Planning Commission.

          Sir, I, once again, appeal to the Government to immediately address the pressing issues of the Scheduled Castes, Scheduled Tribes and Other Backward Classes who make up for the bulk of the manpower in the country.

          With these words I conclude.

DR. PRABHA KISHOR TAVIAD (DAHOD): Mr. Chairman, Sir, I thank you for giving me this opportunity to speak in support of the Demands for Grants of the Ministry of Tribal Affairs for the year 2010-11.

          Sir, we are able to see that the development of the tribes in this country is due to the right policy adopted by the first Prime Minister of the country hon. Late Pandit Jawaharlal Nehruji, as desired by Mahatma Gandhi, since Independence.

Late Prime Minister, Shrimati Indira Gandhi, late Prime Minister, Rajiv Ji were very keen to implement the overall developmental programmes of the tribals.  Our great leaders thought that if we want to have these poor, illiterate tribals to come to the mainstream, we have to give them some priority in the development and reservation in education, administration, employment, and by empowerment in politics, like Gram Sabhas, Panchayat Bodies, Legislative Assemblies and Parliament.  This will lead to the overall development of tribals. 

Our great leaders knew the importance of education which makes the man a civilised human being and through this he can earn the bread for himself and understand the things better.  This was the long sightedness of our great leaders, like, father of our nation, Mahatma Gandhi, Sardar Vallabhbhai Patel, Dr. Ambedkar and our first Prime Minister, Pandit Jawaharlal Nehru.

Sir, I was listening to the hon. Member and my brother from the Opposition, Shri Arjun Munda. We are given the ability to speak and to express our views because of earlier policies of the Congress Party. They supported us to speak and made us to develop that ability to speak through education. 

Sir, the UPA Government is giving huge amount of grants to States for tribal development. But many State Governments are not utilising the grants and are diverting the grants allocated for the development of tribal areas to other programmes.  The development of tribals suffers a lot because of this. 

गुजराती में एक कहावत है, "वाड ज बिमडा गजे "। That means, the fencing is eating away the fruits and you will not find anything in the farm.  The Gujarat Government is diverting the tribal area sub-plan fund to other non-tribal areas and because of this we are suffering a lot.  I have got so many records e.g.they are constructing court buildings in areas not a scheduled areas.  The UPA Government is very much concerned for the safeguards of the tribals.  I came to know that the hon. Prime Minister, Dr. Manmohan Singh has appointed a Mungekar Committee to review the provisions for the Scheduled Tribes. 

          Sir, I have a few suggestions for implementation of the programmes effectively.  I suggest the implementation of the B.L. Mungekar Committee Report for the tribal welfare.  The Tribal Affairs Ministry may be made as a nodal Ministry for the tribal development.  There is a need to create a national advisory council headed by the hon. Prime Minister, which may consist of all the Chief Ministers of the States, Ministers of Tribal Affairs, Members of Parliament, NGOs who are working in the tribal areas.  That way we can have a watch on the functioning of the works at the State level as to what they are doing with the money allocated for the tribal areas. 

          Hon. Governors of the Scheduled Area States are not sending reports regarding implementation of programmes in Scheduled Areas with their suggestions to the hon. President of India.  I would request the Government to make a provision for regular reports from the Governors for the Scheduled Tribes.

 

17.00 hrs. The Central Government can take an appropriate action for the welfare of tribal people.  I suggest for implementation of the provisions of the Bhuria Committee report in Tribal area, the PESA Act that is the Panchayats (Extension to Scheduled Area) Act, 1996.  It is high time that the National Tribal Policy is finalised as there is no clear-cut policy for development of the tribal people.  So I suggest that Madam Sonia ji, and Manmohan Singh ji, all our leaders, should think of it and we should finalise the Tribal Policy.

           Regarding how we can regain the confidence of the tribal people, although the tribal area is richest in mineral wealth and water resources, due to highest poverty amongst the tribes, it is leading to frustration, unrest in the tribals as there is no development.  There should be a policy for effective implementation of developmental programmes. Give them right to property; give assurance not displace the tribes; and rehabilitate them.

          Most of the catchment area is in the tribal area and the command area is in non-tribal area.  Give them water for drinking and irrigation purpose and the tribal people will produce all for their livelihood except salt from their farm.  I have seen that the tribal people are earning and producing everything on their own field.  They should be given proper facility for irrigation.  Give good infrastructure facility for road, education and health in scheduled areas.  The developmental grants allocated to the tribal areas should be non-lapsable and non-divertable to avoid Naxal activities.  Give posting of efficient officers in scheduled area with incentive; the posting should not be given as a punishment posting. 

          I would suggest for empowerment of National Commission for Scheduled Tribes.  The benefit of constant reviews and advices by the National Commission for Scheduled Tribes, as mandated, is available to the Government. 

MR. CHAIRMAN:  Madam, please conclude.

DR. PRABHA KISHOR TAVIAD:  I am just concluding, Sir.

          There should be effective implementation of Forest Act in the tribal areas to build their houses and for agricultural purpose. While giving acres of forest land to the industrialists, simultaneously we should think for the tribals also. There are about 200 forest villages, in a way, in Gujarat only.  The forest villages are to be converted to revenue villages in a time-bound manner. The above measures will regain the confidence of the tribe and tribal people will not go for, so-called, Naxalite activities. 

          So many points have been raised by my colleagues.  I would suggest a little bit that the tribal population is about 10 crore which is 8 per cent of the total population of India.  Financial allocation for Tribal Affairs Ministry is to be increased.  This is my humble request. 

          I would request hon. Prime Minister, UPA Chairperson Madam Sonia ji, and hon. Finance Minister Pranab ji to allocate at least 8 per cent of the Budget to the Ministry of Tribal Affairs for overall development of tribal people.

          Sir, I thank you; you have given me an opportunity.

             

*SHRI PABAN SINGH GHATOWAR (DIBRUGARH):  Sir, total population of tribal of our country is 8,43,26,240, which is 8.2% of our total population.  The tribal population of our country are socially educationally, economically backward than the other population of our country.  For all this, our tribal population needs special attention for their overall development.

Our U.P.A. Government under the leadership of UPA Chairman, Smt. Sonia Gandhi and Hon. Prime Minister, Dr. Manmohan Singh, are taking all steps towards this direction.

One of the most progressive steps of the UPA Government  is the passing of Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Right) Act, 2006This Act seeks to recognize and vest the forest right and occupation in forest land in forest dwelling Scheduled Tribes and other traditional forest dwellers who have been residing in such forest for generations, but whose rights on ancestral land and their habitat were not adequately recognized in the consolidation of State forests, resulting in historical injustice to them.

Many Hon. Members have already mentioned about the various progressive plan and programme of our U.P.A. Government, which I am not going to repeat.

          Many Hill and Plain tribals line the remote North-East region of our country. Some of the N.E. States are tribal majority.  May I request to the Government  that more allocation should be earmarked for the State of North Eastern region.  There should be strict monitoring of fund allocated and speedy implementation of the programme so that the target group get the full benefit of all these progressive schemes.

          As a matter of fact the then Tea garden labourers of Assam now known as the Tea Tribes of Assam.  The substantial part of this community have settled in the adjacent villages to the Tea Industry in Assam.

          They have been made to migrate to Assam from undivided Bihar, Orissa, undivided Madhya Pradesh.  They are the aboriginal tribals from those states.  These tribals mostly Oraon, Munda, Kharia, HO, Santhals, Gond, Sawar or Sawras, Parjai, Kandha, Khoya, Rajwar, Kherwar, Ghatowars and many other aboriginal tribals.

          These people in Assam during pre-independence were recognized as Tribes, but unfortunately during post independent period while preparing the Scheduled List these people were excluded to serve the narrow political interest of a few which was subsequently in the findings of Commissions and Parliamentary Committees.  Subsequently the reports submitted by A.K. Chanda Committee, Lokur Committee, Dhebar Commission have positively dealt with this matter and have expressed their concern over descheduling these committees.

          Consequent upon the persistent demand by these communities to bring  them at par with their original counterparts, the Assam Government on different occasions recommended the Central Government to remove the Area restrictions on these communities to include them in ST List.

          Alongwith the Tea Tribes communities the State Government of Assam also recommended the Chutias, Ahoms, Koch Rajbangshi, Moran and Motoks to include them in the ST list.

          If this issue is taken up in its positive perspect the further possibility of socio-economic flare up in Assam and also check the foreigners influx into Assam in particular and North East as a whole.

          The Forest Right Acts is one of the most progressive legislation of our UPA Government which provides right to tribal peoples and non scheduled tribe ‘forest dwellers’ who have been living in the forest area for 3 generation.

          The J.P.C. had unanimously recommended that one generation should be equaled with 18 years i.e. 3 generation would mean 54 years.  But the assessment of the present act for eligibility for non-tribal ‘forest dwellers’ in 75 years i.e. 25 years per generation which is very much arbitrary and unfair.  Considering the very poor condition of non tribal ‘forest dwellers’ this provision of the Act may kindly be amended as it was recommended by J.P.C.           It is alleged the PESA (Panchayat Extension to Scheduled Areas) is being misused by the Mining and Industrial mafia.  They influence the Gram Sabha to pass the required resolution in their favour. I think this violates the very spirit of the Constitution and negates the protection guaranteed to Scheduled V and VI areas.  I request the Government  to examine this problem seriously to stop the misuse of this PESA and to take necessary corrective step.

          Sir, I support the Demands and Grants 2010-11 under of Ministry of Tribal Affairs.

     

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): सभापति महोदय, आज बड़ा ही अच्छा संयोग है, क्योंकि आज बाबू कुंवर सिंह का विजय दिवस है। देशभर में लोग बहुत जानदार, शानदार ढंग से बाबू कुंवर सिंह का विजय दिवस मना रहे हैं। सन् 1857 में अंग्रेजी सल्तनत के खिलाफ देश के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी बाबू कुंवर सिंह ने लगातार अंग्रेजों को तीन लड़ाइयों में परास्त किया। पिछड़े आदिवासी, अनुसूचित जाति आदि सब लोगों ने उनका समर्थन किया। इसलिए वहां लोग गीत गाते हैं-  बाबू कुंवर सिंह तेगवा बहादुर, बंगला में उठेला गुलेल। छुरी कटारी बिके हमा छुरी हारी न आवत नाहीं। इस बात के लिए आज अच्छा संयोग है। आज के दिन देश के जो छुटे हुए आदिवासी, वनवासी रह गये हैं, महात्मा गांधी जी अनुसूचित जनजाति को हरिजन कहते थे और आदिवासियों को गिरिजन कहते थे। ये लोग सर्वाधिक पिछड़े रह गये। इसी दिन बहस हुई। मैं आज शुरू में ग्यारह बजे बहुत भयभीत था। मैंने देखा कि बाहर गर्मी है और सदन में भी गर्मी है। आईपीएल का झकझोर है, इसमें एक मंत्री हटाये गये हैं और दो कानम्बर आ रहा है। हमें लगा कि इसी लड़ाई, झंझट, कहासुनी, भीड़-भाड़ में आदिवासियों भाइयों की अनुदान मांगें कहीं बिना बहस के पास करने की नौबत न आ जाये। लेकिन विपक्ष ने बहुत सूझबूझ से काम किया और अब वनवासी, आदिवासी भाइयों की अऩुदान मांगों पर शांतिपूर्वक बहस चल रही है। उन्होंने अपनी लड़ाई को तत्काल स्थगित कर दिया कि अगले दिन इसे देखा जायेगा। उस तरफ से माननीय सदस्य बोल रहे थे कि वनवासी, आदिवासी भाइयों को बड़ा भारी फायदा हुआ है।हम संक्षेप में दो-तीन बातें बताना चाहते हैं। कांति लाल भूरिया जी हमारे कुलीग रहे हैं। पहले जब इधर से कोई बोलता था, तो मंत्री रहते हुए भी वे खड़े हो जाते थे जैसे अभी श्री आरुन रशीद किसी भी विषय पर खड़े हो जाते हैं। उन्हें कोई कुछ बना नहीं रहा है, लेकिन फिर भी बार-बार खड़े होकर अड़चन डालने का काम करते हैं। आदिवासियों की संख्या 9 करोड़ हो गयी होगी। हम मान लेते हैं कि उनकी संख्या8-9 प्रतिशत है। ये सबसे अधिक पिछड़े हैं, इसमें कोई विवाद नहीं है। लेकिन उन पर खर्चा कितना हो रहा है? इस साल आप 3200 करोड़ का बजट लाये हैं। मैं इससे संतुष्ट नहीं हूं। उनकी 8-9 करोड़ की आबादी है जो देश में सर्वाधिक पिछड़े हुए हैं। सामाजिक, आर्थिक आदि सभी मामलों में पिछड़े हुए हैं। वे बेरोजगारी और गरीबी से पीड़ित हैं, नक्सलवाद से आतंकित हैं। उन पर सब तरफ से हमले हो रहे हैं। उसके बावजूद भी उनका बजट केवल3200 करोड़ रुपये है। यह क्या जस्टीफिकेशन है?वर्ष2010-2011 का 3200 करोड़ रुपये का खर्चा आया। पिछले वर्ष भी यानी वर्ष 2008-09 में भी 3200 करोड़ रुपये का खर्चा आया था।यह खर्चा क्यों दो हजार करोड़ रुपये हुआ, इस बारे में कोई जवाब दे। उनका 1200 करोड़ रुपये का हिस्सा कहां गया? क्यों वह खर्चा नहीं हुआ, इसका जवाब कौन देगा? यह खर्चा भी दो हजार करोड़ रुपये नहीं हुआ। इसमें 1600 करोड़ रुपये खर्च होने की रिपोर्ट आयी है। बजट 3200 करोड़ रुपये से दो हजार करोड़ रुपये तक क्यों घटाया?यह दावा करते हैं कि हम आदिवासी, वनवासी के हितैषी हैं। अब हितैषी का काम खर्चा बढ़ाने का है या घटाने का है? इसका जवाब आप हमे दीजिए।

           राष्ट्रीय जनजाति नीति कहां है? उसे आपने क्यों रोककर रखा है? आप क्यों दस करोड़ आबादी को दबाकर रखे हुए हैं? उसे क्यों रोके रखा गया है?कब घोषणा करेंगे और घोषणा ही नहीं, उसका कार्यान्वयन कब से शुरू किया जाएगा?मेरा तीसरा प्रश्न यह है कि इससे पहले 3200करोड़ रूपए के बजट को घटाकर 2000 करोड़ रूपए किया गया जिसमें से 1600करोड़ रूपए खर्च हुए। मैं पिछले साल का हिसाब बताता हूं- वर्ष2008-09में था 2100 करोड़ रूपए का बजट, जिसमें से 1800करोड़ रूपए खर्च हुए। एक तो बजट कम, उसमें खर्चा भी कम किया जाता है, इसीलिए आदिवासी भाई हो रहे हैं बेदर। ऐसा क्यों हो रहा है, इसका कोई मुझे जवाब दे। क्यों उनके लिए बजट कम होता है और कम होने के बाद भी खर्च क्यों कम किया जाता है?इसके लिए कौन जिम्मेदार है और इसमें कैसे सुधार होगा?...( व्यवधान) क्या राज्य सरकारों को मैं ठीक करूंगा? केन्द्र सरकार की बागडोर आपके हाथ में हैं, राज्य सरकारों को ठीक करने का काम भी आपका है। हर काम में केन्द्र कहता है कि राज्य सरकार की कमी है और राज्य सरकार कहती है कि केन्द्र सरकार की ढिलाई है, दोनों सरकारों की ढिलाई में हो रही है गरीब आदिवासियों की पिसाई। यह न्याय नहीं है। न्याय करो तो आधा दो, उसमें भी कहीं बाधा हो तो दे दो केवल पांच ग्राम। आपने इस विभाग के लिए 5000 करोड़ रूपए का बजट क्यों नहीं रखा है? 3200 करोड़ रूपए में भी खर्च किए 1600 करोड़ रूपए और फिर इस बार कहते हैं कि हम 3200 करोड़ रूपए ही खर्च करेंगे? क्यों 5000 करोड़ रूपए आपने इसके लिए नहीं किया? उनकी आबादी आठ-नौ प्रतिशत है, तो दस लाख करोड़ रूपए का आठ-नौ प्रतिशत कितना होता है? यह उनके साथ अन्याय हो रहा है।

          मेरा चौथा सवाल यह है कि नेशनल रिहैबिलिटेशन एंड सेटलमेंट पॉलिसी, लैण्ड एक्वीजिशन एक्ट जो अंग्रेजी सल्तनत का बनाया हुआ है, उसमें अमेंडमेंट इसी लोक सभा ने पारित किया है। वह राज्य सभा में जाकर अटक गया। फिर मुझे जानकारी मिली है कि कैबिनेट ने उसे पारित कर दिया है। क्यों उसे रोक कर रखे हुए हैं? उसे क्यों नहीं ला रहे हैं? जहां प्रो-फार्मर, प्रो-ट्राइबल, गरीब के पक्ष में पॉलिसी बनी है, जिनकी जमीन ली जाएगी, उनको रोजगार मिलेगा, उनके रिहैबिलिटेशन के लिए पॉलिसी होगी। अभी श्री शरद यादव जी भाषण कर रहे थे कि आदिवासियों की जमीन और संपत्ति को नेशनलाइज्ड कर दीजिए और बड़े-बड़े आदमियों, धनपशुओं को प्राइवेटाइज कर दीजिए। कहां के नेता, कहां से बोल गए? कह रहे थे कि मीना लोगों को रोक दिया जाए, हटा दिया जाए, ज्यादा हो रहा है। कुछ ट्राइबल लोगों को नौकरी मिल गयी है तो अब इनके प्राण छूट रहे हैं। यह झगड़ा लगाने का काम करना चाहते हैं। क्या यह एक नेता का काम है? वह ट्राइबल है, उसका नाम और नंबर आया, तो क्या हमने बनाया? पहले से सोशियो-इकोनोमिक सर्वे हुआ, उनका आयोग है, वे लोग देखेंगे कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में कौन जाएंगे। जब मैं यह कहने लगूंगा कि एक ही जाति के लोग कई चीजों पर कब्जा किए हैं, ऐसा क्यों है, तो प्राण छूटने लगेंगे। गरीबी क्यों है? इसलिए कि देश में बेरोजगारी है।...( व्यवधान)

सभापति महोदय :  आप बहुत बोल सकते हैं, लेकिन टाइम कम है। प्लीज अपनी बात समाप्त कीजिए।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : महोदय, मैं वर्णन नहीं कर रहा हूं, मैं केवल सवाल पूछ रहा हूं।     

          नेशनल रिहबिलेटेशन एवं रिसेटलमेंट पॉलिसी गरीबों के हित में है, आप उसे क्यों ला रहे हैं? गरीब के पक्ष में, फार्मर के पक्ष में, ट्राइबल के पक्ष में होने का आप दावा करने वाले हैं, लेकिन उनके पक्ष में बनाया गया कानून कहां गया? वनाधिकार कानून संसद में वर्ष 2007 में पारित हुआ, वर्ष 2008 में इसकी नियमावली बनी, वर्ष 2009 में लागू हुआ। क्या लागू हुआ है? आप उसे क्यों लागू नहीं कर रहे हैं? फिर राज्य सरकार की बात कही जाती है, तो क्या राज्य सरकार को हम ठीक करेंगे या आप ठीक करेंगे?...( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप जल्दी से समाप्त कीजिए।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : महोदय, जो वनाधिकार कानून पारित हुआ है आदिवासियों के पक्ष में, फिर उस कानून में सुधार करने के लिए, उस कानून को बदलने के लिए ये लोग विचार कर रहे हैं। एक बार उन्हें अधिकार देकर यदि उसे वापस लिया गया तो फिर यह उचित नहीं होगा, यह मैं सरकार को सावधान करना चाहता हूं, क्योंकि यह प्रतिगामी कदम होगा, आप उन्हें फिर से पीछे की ओर ले जाएंगे। उनके 26 लाख आवेदन पड़े हैं, केवल सात लाख का ही निष्पादन हुआ है। इस तरह कैसे उन्हें उनका हक मिलेगा, यह सरकार को देखना चाहिए। अंग्रेजी सल्तनत के समय आदिवासी तबाह हो गए थे। अगर इनकी सल्तनत में भी तबाह होंगे, तो यह देश की एकता के लिए खतरा होगा। इसे न्याय और सामाजिक न्याय का राज नहीं कहा जाएगा। अगर दबे-कुचले, शोषित, आदिवासी, वनवासी, पिछड़े लोग पीछे छूट जाएंगे, उन्हें उनका हक न मिले, उनकी देखभाल न हो, तो कैसे आप देश का विकास कर पाएंगे। आज शिक्षा के क्षेत्र में भी वे अत्यंत पिछड़े हुए हैं। उनकी जो बसावट है, वे छोटी-छोटी जगहों पर, कम संख्या में निवास करते हैं। वहां पर कोई एप्रोच रोड नहीं है। जहां कच्ची सड़क होती है, उसे तो पक्की सड़क में तब्दील किया जाता है और 1000 की आबादी जहां होगी, उसे सड़क से जोड़ा जाएगा, ऐसा कानून है। लेकिन जहां 150-200 की आबादी होगी, वे लोग सड़क से वंचित रहेंगे, क्योंकि उनके दस-बीस घर कहीं यहां बसे होते हैं तो कहीं वहां बसे होते हैं।

सभापति महोदय : माननीय सदस्य, काफी समय हो गया है, अब आप अपनी बात समाप्त करें। आप तो स्वयं पैनल ऑफ चेयरमैन हैं। आपको तो सब मालूम है कि सदन को रेग्युलेट कैसे किया जाता है, कितना मुश्किल काम है। वैसे यह ठीक है कि इस विषयपर काफी बोल सकते हैं, लेकिन अब अपनी बात समाप्त करें।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : सभापति महोदय, मैं केवल संक्षेप में सवाल ही कर रहा हूं। सड़क के किनारे जहां बड़े लोग बस गए, तो उनके टोले या बस्ती में सड़क नक्शे में है, लेकिन जहां आदिवासी, अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति के लोग रहते हैं, उनके यहां नक्शे में सड़कें नहीं हैं। इन लोगों की बैलगाड़ी, पशु आदि सब कच्चे रास्तों से ही आते जाते हैं। उनके लिए कोई एप्रोच रोड का प्रावधान नहीं है। अगर नक्शे में प्रावधान है तो पक्की सड़क बनेगी, लेकिन ट्राइबल्स के एरिया में नहीं बनेगी और जहां नक्शे में ही सड़क नहीं है तो उसके लिए आप क्या करेंगे?

          सभापति महोदय, फिफ्थ शिडय़ूल और सिक्स्थ शिडय़ूल कहां चला गया। जहां पंचायती राज व्यवस्था नहीं है, जहां ये लोग रहते हैं, वहां पंचायती राज सम्बन्धी 73वां और 74वां संविधान संशोधन जो हमने किया था, वह कहां लागू होता है? जो नक्सल प्रभावित क्षेत्र है, पिछले साल वहां के लिए 500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था, लेकिन इस बार शून्य का प्रावधान किया गया है। उसे क्यों खत्म किया गया, यह मैं सरकार से पूछना चाहता हूं? 17 योजनाओं में से एक भी योजना के लिए इन्होंने इस बार पैसा नहीं दिया है।

सभापति महोदय: माननीय सदस्य, अभी 20 सदस्यों ने और बोलना है इसलिए कृपया अपनी बात समाप्त करें।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : फिफ्थ शिडय़ूल में एक योजना है कि जहां नक्सल प्रभावित एरिया है, वहां के वहां के बच्चों की पढ़ाई के लिए पिछले साल 500 करोड़ रुपया भी खर्च नहीं हुआ और इस साल एक पैसा भी नहीं दिया।

सभापति महोदय: जब आप मंत्री थे, उसी समय क्यों नहीं यह सब किया?

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : मैंने यह बात बार-बार सदन में उठाई है। मिजोरम, नगालैंड, मेघालय में जहां 80-90 फीसदी ट्राइबल्स हैं, झारखंड, अंडेमान और निकोबार तथा छत्तीसगढ़ में भी काफी संख्या में आदिवासी हैं, वहां पर 70 ऐसी जातियां हैं, जिन्हें कहा गया कि ये आदिवासी हैं, लेकिन इन घुमन्तू जातियों को जनजातियों में शामिल नहीं किया गया।

सभापति महोदय: माननीय सदस्य, अब आप अपनी बात समाप्त करें, नहीं तो आसन को कहना पड़ेगा कि अब आपकी बात रिकार्ड में नहीं जाएगी।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : मैं अपनी बात समाप्त कर रहा हूं। मैं पूछना चाहता हूं कि उन जातियों का क्या हुआ, जिसके बारे में विष्णु पाद राय जी ने भी यहां सवाल उठाया है? इसलिए जब तक अनुसूचित जनजाति के लोगों की समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तब तक देश का विकास नहीं हो पाएगा। इसलिए आपको गरीबों का खासकर आदिवासियों का हित करना ही पड़ेगा। जो लोग सबसे पीछे छूट गए हैं, उन्हें समुचित हिस्सा देना होगा, उन्हें उनका अधिकार देना होगा, उनके सम्मान और संस्कृति की रक्षा करनी ही होगी। अगर ऐसा नहीं होगा तो फिर ये लोग इसका कड़ा विरोध करेंगे।

          इन सब सवालों का जवाब मंत्री जी को देना चाहिए, नहीं तो जैसे आदिवासी भाई अंग्रेजी सल्तनत के खिलाफ लड़े थे, इस सरकार के खिलाफ भी लड़ाई करेंगे, आंदोलन करेंगे, फिर कोई टिकेगा नहीं।

         

MR. CHAIRMAN : Hon. Members, there are still twenty members to speak, so I will give only five minutes to each member. Please try to confine your speech within five minutes.

* DR. PRASANNA KUMAR PATASANI (BHUBANESWAR):   Today the discussion relating to tribal welfare is highly debated in august house for the approval of the grant for the year 2010-2011.  I can draw the attention of the House putting some valuable analogy that can enlighten the future generation for the  nation. I am known as a poet than politician in my State.  I have been writing and my eternal poetry based on poor, proletariat, harijan, girijan and adivasis.  While I was schooling the then Government applied MISA against  me because through my creative writing the poor adivasis and downtrodden are provoked.  My book was banned and I was thrown to the prison and I had gone about 10 years underground life.  I was leading my life from Adivasi hill area to Himalayan ranges. This is my experience relating to adivasis life, how they are leading and the holistic approach towards the mother earth is so deep rooted within the hearts of million of adivasis those are eating the fresh fruits, drinking the holy water of springs and the word ‘Adivasi’ originated out of ‘Adim’ and they are Adi Manav. So simple, so truthful and the deeds of their character fruiting like fruit with a green leaf on the branches of the tree.  Our of these adivasis, the word itself is vibrating the word Lord Jagannath – the tribal god, the god of the universe not only being prayed by our Oriya people but also global wise, the Car festival is being celebrated.

          Since the independence, Congress is in the power depending upon their votes taking maximum advantage out of their innocence and they have done nothing rather exploiting like a Sahukar Mahajan from very beginning from the time of the Britishers to present day.  Could you prove before me that a single adivasi nourishing his life from rural to urban one to maintain the livelihood opening a single shop in the cities and converted himself as a rich man?  Rather through the adivasi quota some scholars are inducted in the ministry and administration but they are not sincerely served their own people, own caste and own villagers where they are born in this country.  Whatever the allotment ever made by the Government to the adivasi areas is not properly utilized, mismanaged corruption, nepotism is well prevailing amidst the poor innocent adivasis.  Since the days from independence to till now, there is no school, sanitation, health hazards, water problems is so acute.  Despite that those innocent poor people residing in the respective village depending on nature.  The Shehari Baboos, rich persons rather cutting the jungle, looting the forest commodities and killing the animal selling their skins and bones in the cities, looting the entire jungle, residing in the cities creating the brutality every caused to innocent people.  Rather the law is protecting the rich people than the poor one.

          Since independence, the allocation ever granted by Central Government  is never utilized fruitfully causing the damage as there is no communication of roads.  If the ignorant adivasis eyes to be opened they never go for voting to the Congress. Out of that tell me, how many adivasis are joining military? Therefore, the so calling Naxals presently known as Maoist group taking maximum advantage creating anarchy.  The problem cannot be rooted out by killing the Naxals until unless the problem of Adivasis is solved.  How long the Government  may neglect the local inhabitants those are residing in the jungles and leading their lives in the peace environment which is not every protected presently.  To kill Maoists don’t create unpleasant situation, rather Government  should provide better facilities to promote the adivasis, to maintain their  livelihood to convert the earth as heaven.  The Programme and the projects to be initiated properly executed without delay.  I can give a very good analogy. Since my legislation to the Odisha Assembly and Parliament about 30 years consequently.  In the floor, it is highly discussed through the debate in every Session tabled in the name of adivasis is highly mockery and we are rather teasing despite of solving the problem one should go within to solve the problem and never a single man is allowed to die without hunger. The rich people aspiring to occupy their lands to loot the hidden treasure from Iron Ore to Manganese, cutting the trees, installing the factories should be immediately abandoned because they are poisoning the atmosphere and inviting the global warming to destroy the animal life and human kingdom which is the greatest crime that the law ever enacted in the House for saving the lives.

          I can draw the attention of the House that since my legislation, I have been demanding to promote my State out of below poverty line.  That the only railway line linking from West to East i.e. Khurdha-Bolangir railway line which will go only through adivasi areas in the country must be materialized which can educate, enlighten the adivasi life in promoting the commercial values including in strengthening economical conditions of the poor downtrodden girijan and adivasis is highly essential. The adivasi people are lacking education and they should be trained immediately until unless proper attention is not paid properly by the Centre.  The entire country will be suffering and the stress and tension would be prevailing although killing the people not only solve the problem rather it may create the problem.  Accordingly, Constitutional Right of adivasi Harijan, Girijan should be well protected. If the individual tree is protected the jungle life may be laughing like natural flower.  The House  garden of poor villagers can create the decency and there must be law against the tree cutter and against the annihilator to protect the life of the animals, birds singing the glory of nature must be well attended. When the jungle is protected, the poor adivasis may lead the peaceful life and well educated to create the awareness within. The present problem of extremists  would be vanished. Until unless a every single adivasi is not provided shelter to live, water to drink and clothing despite of all the sanctions by  the Central Govt. and the successful implementation of Budgetary money which is being granted by the August House may create the havoc. It may create more danger than the earthquake.

          I like to draw the attention of the Central Govt. to pay special attention to the adivasi areas of my constituency relating to their health, sanitation and education. Sufficient grants to be allotted and I must see not a single village is left out of electrification. The country is not for the rich people those are enjoying the livelihood in the cities exploiting the  downtrodden would never be tolerated. For the first time in India, our Chief Minister, Odisha marked an epoch making venture in constructing thousands and thousands hostels for the adivasi children and I can challenge if you can visit the KIITs  how a single man Dr. Achuto Samanto providing shelter, food and clothing of 20,000 adivasi children  those are schooling in the KIITs University where I am associated. Under my divine guidance Professor Minaketan also opened an adivasi institute under Bhalunki mountain under my constituency to teach and train poor adivasi students.

         

श्री निनोंग ईरींग (अरुणाचल पूर्व): सभापति जी, मैं आपको धन्यवाद देना चाहता हूं कि आपने मुझे इस बजट पर बोलने का मौका दिया, लेकिन आप मुझे केवल पांच मिनट ही दे रहे हैं, इसलिए मुझे बहुत ही संक्षेप में बोलना पड़ेगा। मैं जो इतना लम्बा-चौड़ा पढ़कर आया था, शायद वे सारे आंकड़ें मैं नहीं दे पाऊंगा। मुझसे पहले माननीय सदस्यों ने इस विषय पर बोला, लेकिन मैं एक-दो आंकड़ों पर टिप्पणी करना चाहूंगा। हमारे जनजाति के लोगों के लिए आपने जो एक प्रावधान रखा था, उसमें वर्ष 2006 से लेकर 2010 तक देखेंगे तो वर्ष 2006-2007 में 1660 का आंकड़ा रखा था जिसका शत-प्रतिशत इम्प्लीमेंटेशन रिवाइज्ड स्टेटमेंट में हुआ था। वर्ष2009-2010 में जैसे हमारे पिछले स्पीकर माननीय रघुवंश प्रसाद जी ने भी कहा कि जो 3220 करोड़ का एलोकेशन था और इस साल के 3220.37 के एलोकेशन में सिर्फ 26 लाख का ही इजाफा हुआ है। हमारे उत्तर-पूर्वी राज्यों के जो इलाके हैं उसमें आप देख सकते हैं कि उसमें जो आंकड़ा है, अन्य जो विभाग हैं, इसके मुताबिक अगर आप 1 लाख करोड़ का बजट रखते हैं, जैसे उन्होंने कहा कि उसमें से 10 परसेंट रखेंगे, तो हमें 10,000 करोड़ मिलना चाहिए था। जो आंकड़ा आपने रखा है, वह बहुत कम है। हम तो कहेंगे कि मिनिस्ट्री को इसे बढ़ाना चाहिए, क्योंकि जनजातियों के लोग भी इस देश के ही निवासी हैं, पिछड़े वर्ग से हैं और बहुत दुख-तकलीफ हमें सहने पड़ते हैं। इस बार हमने देखा है कि राज्यों को जो फंड्स आप रिलीज करते हैं, हर साल आप देख रहे हैं कि हमारे यहां जो बढ़ोत्तरी हो रही है वह एनजीओज की तरफ से जा रही है, राज्य सरकारों को आप कम फंड्स दे रहे हैं और एनजीओज को बढ़ावा मिल रहा है। माननीय मंत्री जी, इस बारे में भी आप कुछ कहें। इस बारे में हम आपसे सुनना चाहते हैं कि राज्यों को कम राशि देकर एनजीओज को क्यों ज्यादा महत्व दे रहे हैं। शैडय़ूल्ड ट्राइव्ज फाइनेंश एंड डिवेलपमेंट कॉरपोरेशन के विषय में, ट्राइबल कोओपरेटिव मार्किटिंग डिवेलपमेंट फेडरेशन के विषय में बहुत विस्तार से सबने भाग लिया। यह काबिले तारीफ है कि हमारी सरकार ने जो 26 लाख रिसेटलमेंट के क्लेम थे, उसमें से 6 लाख80 हजार टाइटल्स दिये गये हैं, इस बार 73 हजार और देने के लिए तैयार हैं। यह अच्छी बात है, इसमें लोगों को फायदा हो रहा है। सरकार की जो अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए रिजर्वेशन की पॉलिसी थी, उस पालिसी के बारे में मैं कुछ कहना चाहता हूं। खास तौर पर आपने शिक्षा का इसमें बहुत प्रावधान किया है और बेरोजगारी की जो बात हम करते हैं, उसमें आपने सभी राज्यों और संघ शासित प्रदेशों में 7.5 प्रतिशत आरक्षण किया है, इसे हमारे मंत्री जी ध्यान में रखें, क्योंकि हमने सुना है कि इसमें कुछ बाधाएं आ रही हैं, इसे आप जरूर देंखे।

          अरूणाचल प्रदेश में नक्सलवाद मुद्दा है, यह बेरोजगारी, गरीबी और बैकवर्डनेस के कारण है। ये मुद्दे बहुत महत्वपूर्ण हैं। उत्तर पूर्वी राज्यों और पश्चिम उत्तर पूर्वी, पाकिस्तान, चीन और बर्मा के बार्डर हैं, यह जो ट्राइएंगल एरिया है, यह बहुत खतरनाक एरिया है। इसमें यदि आप विशेष ध्यान नहीं देंगे, तो शायद जैसा छत्तीसगढ़ और झारखंड में हुआ है, ऐसी समस्या हमारे यहां भी आ सकती है।

          महोदय, मैं एक बात और कहना चाहता हूं कि हम यहां आपसे कुछ सीखने के लिए आते हैं और बुजुर्ग जो सिखाते हैं, हम कभी-कभी उससे बहुत दुखी होते हैं, क्योंकि आप जानते हैं कि जिस प्रकार से उन्होंने हमारी सरकार को टोका है, यह सोचने की बात है। " लूट के औरों का धन राज बनाया होगा, महज रोटी के लिए सैकड़ों को मोहताज बनाया होगा, वही शहंशाह ने ताज बनाया होगा"।...( व्यवधान) वही आदमी जो हमारे यहां मुख्यमंत्री रहा, वही आदमी जो हमारी जनजाति का प्रतिनिधि रहा, उनका आंकड़ा हमें दिखाइए कि कितने लोगों को बेरोजगारी से दूर कराया। हमारे ऊपर जो आरोप और प्रत्यारोप लगा रहे हैं, उसके विषय में भी हमें समझाएं और आंकड़े दें।

*SHRI S.S. RAMASUBBU (TIRUNELVELI): At the outset, I thank Chairman of this august House to give me the opportunity to speak on the Demands of the Ministry of Tribal Affairs.

          The Scheduled Tribes who are living primarily in Assam, Chattasigarh, Gujarat, Madhya Pradesh, Orissa, Mizoram, Uttar Pradesh, West Bengal, Article 275(1) of the Constitution of India guarantees grants from the consolidated fund of India each year for promoting the welfare of Scheduled Tribes. Ministry of Tribal Affairs provide fund and 100% funds are provided by Central Government for the promotion of welfare of Scheduled Tribes and the State Government implementing it. Scheduled Tribe Community are given importance in Eklavya Model Residential School- With the objective of providing quality education to tribal students the Constitution of India provides 100 model residential schools from Class VI to Class XII in different States. During 2010, 89 schools are reported to be funded. 

Ownership -  The new law says that all those who occupied forest land before December 13th ,2005 have a right to live and earn their livelihood from forests.

          But in forest most of the tribal people are not allowed to own land and cultivate by forest department in many States. The produced commodities are not getting reasonable price for these tribal people.

Scheduled Tribes Committee - In my constituency, in Western Ghat areas of Papanasam, Karayar, Manamadurai, Karaikudi, Kutralam most of the Scheduled Tribe people - Malai Kuravas and Kattu Niacker community - are dwelling. The students from this community are sometimes denied ST certificates. So, it is affecting employment opportunity to the Scheduled Tribes Community People.

 

* Speech was laid on the Table   Electrification is not possible to some villages in hill areas. Since the Forest Department is not giving clearance certificate.

In many States Naxalites are giving trouble to this community people. The State Government should take various steps to improve the status of forest dwelling Scheduled Tribe people by providing better education, electricity, drinking water facility and self employment scheme.

Even though the Central Government gives all assistance; the State Governments should lend their co-operation to uplift these downtrodden people.

                                                                                               

*डॉ. विनय कुमार पाण्डेय (श्रावस्ती): माननीय सभापति महोदय, वर्ष 2010-2011 के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय के नियंत्रणाधीन अनुदान की मांग पर चर्चा में कृपया मेरे निम्न सुझावों को सम्मिलित कर, अनुग्रहीत करने की कृपा करें।

          मेरे निर्वाचन क्षेत्र श्रावस्ती, उत्तर प्रदेश अंतर्गत विकास खण्ड सिरासया जनपद श्रावस्ती एवं विकास खण्ड गैंसड़ी जनपद बलरामपुर में थारू जनजाती की अच्छी आबादी है, जिनकी सांस्कृतिक सभ्यता एक अमूल धरोहर है। परन्तु, यह हमारा दुर्भाग्य है कि आजादी के 63 वर्षों बाद आज तक विकास के नाम पर उन्हें धोखा ही मिला और शिक्षा, रोजगार एवं उन्नयन से आज भी उनकी पूरी व्यथापूर्ण है।

          थारू जनजातियों के उन्नयन हेतु विकास खण्ड सिरसिया जनपद श्रावस्ती एवं विकास खण्ड गैंसड़ी जनपद बलरामपुर में एक-एक नवोदय विद्यालय (जे.एन.यू) की अस्थापना के साथ ही आई.टी.आई/पॉलीटैक्निक कॉलेज एवं प्रबंधन कॉलेज की स्थापना के साथ ही स्वयं सहायता समूहों की स्थापना कर एस.जी.एस.वाई. के तहत उन्हें मजबूती प्रदान करते हुए, पशुपालन सेरी कल्चर / एपी कल्चर/ खादी ग्रामोद्योग की इकाईयों की स्थापना के साथ ही स्वच्छ पीने के पानी एवं सिंचाई हेतु डीप टयूबवैल की व्यवस्था एवं डीप बोरिंग मशीन्स की व्यवस्था तथा दोनों ही विकास खण्डों के ग्राम पंचायतों में कम से कम दो टयूबवैल की संख्या के हिसाब से 50-50 टयूबवैल स्पेशल पैकेज के तहत भारत सरकार से प्रदान करने की व्यवस्था होनी चाहिए।

          विकास खण्ड सिरसिया जनपद श्रावस्ती एवं विकास खण्ड गैंसड़ी जनपद बलरामपुर में सीआरपीएफ/सीआईएसएफ/एसएसबी के साथ ही सेना की विशेष भर्ती अभियान के तहत कैम्प की भी व्यवस्था की जानी चाहिए।  

          आपके माध्यम से इस सभा में अपील करते हुए भारत सरकार से अपेक्षा करता हूं कि मेरे निर्वाचक क्षेत्र के थारू जनजातियों के उत्थान हेतु एवं भारत निर्माण योजना के तहत एनआरएचएम/एमएसडीपी/बीआरजीएफ/नेशनल हॉर्टिकल्चर मिशन/बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट फंड एवं पीएमजीएसवाई/एमएनएआरईजीए/एसजीएसवाई/सेरीकल्चर आदि योजनाओं को सुचारू रूप से विशेष पैकेज की व्यवस्था बजट में सुनिश्चित कराने का कष्ट करें।

             

* Speech was laid on the Table     SHRI BIBHU PRASAD TARAI (JAGATSINGHPUR): Sir, thank you for giving me the opportunity to speak. Now the tribal population is nine per cent of the total population of our country and they are residing in 15 per cent of the total geographical area of our country. They are the people of hills, forests and nature. If we see the Economic Index of the nation, these aboriginal communities of our country are the poorest of poor and these communities are exploited in many ways. They are living in such areas which are rich in flora and fauna, mineral resources and precious stones. In spite of all these things, they are merely the watchmen of the natural wealth and they have no share in it.

          From the time of Independence till today, various Governments have taken up a large number of schemes and we have launched many pilot projects for the upliftment of socio-economic conditions of these tribal people. Our politicians, our legislators, our intelligentsia and our administrators have taken up so many policies for them, but despite all these policies, till today they have remained poor. And, from the beginning of the First Five Year Plan till today, we have not solved their problems. We are seeing that our economy is growing; we are seeing that the infrastructure facilities are expanding; the GDP is rising; and the basic education is percolating. But if we see their living condition, then we find that it is declining. Hence, there is a sense of alienation among them; there is a sense of frustration among them; and they are led towards Naxalism and they become Naxalites. This is the problem.

          I would like to mention about my State Orissa where 10 per cent of the total tribal population of our country resides. The total tribal population to the total population of my State is 22.5 per cent, but they are living in pitiable condition. They are living in poverty in spite of our rich mineral reserves, plenty of water and mineral resources. Why is this occurring? If we see our economy, then we find that our economy is growing since 1990. On the one hand, our Union Government is contributing land for the establishment of industries by the multi-national companies; by the corporate houses; and by the industrial houses. On the other hand, we are taking so many polices for the upliftment of the tribal people. As the multi-national companies and corporate houses are establishing industries and as they are going to be displaced, then there is no policy of the Government as to how the rehabilitation will be done in favour of the tribal people. On the other hand, they have no land and they have no status of having land that is of their own. So, when we are displacing them, then the Government should have taken interest and the Government should have made policies for the interest of the tribal people. They have been deprived of their basic fundamental rights guaranteed by the Constitution. The very existence of the community is threatened because of wrong planning, rapid industrialisation, indiscriminate mining and excessive depletion of forest resources.

          Now, there is extinction of tribes. There are 700 tribes, and my State is contributing 62 tribes. Now, more than 70 tribes are going to be extinct due to wrong policies of the Government of India.

MR. CHAIRMAN: Hon. Member, please conclude now.

SHRI BIBHU PRASAD TARAI : On the other hand, I would like to mention that in our State of Orissa our beloved Chief Minister has requested the Union Government to give more assistance for the KVK Yojana for the undivided Kalahandi, Koraput and Bolangir districts where the people are suffering a lot. The people are selling their … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: All right, please conclude now. You have mentioned the problem. Please conclude now.

SHRI BIBHU PRASAD TARAI : So, we have to introspect and plot new points of our plan and policy in order to eradicate poverty and sense of alienation and hatred. The Government should make more budgetary allocation for tribal community through specific projects … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: The next speaker is Shri Hamdullah Sayeed.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: I have already called the name of the next speaker to speak. Hence, please conclude your speech.

… (Interruptions)

SHRI BIBHU PRASAD TARAI: Sir, please give me one more minute to speak.… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: I have already called his name, and he is on his legs to speak.

… (Interruptions)

SHRI BIBHU PRASAD TARAI: Sir, please give me one more minute. The tribal policy should be adopted and the monitoring system … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Hon. Member, please sit down. He has already started his speech.

… (Interruptions)

SHRI BIBHU PRASAD TARAI: Thank you, Sir.

                                                                                                     

SHRI HAMDULLAH SAYEED (LAKSHADWEEP):  Mr. Chairman, Sir, I rise to support the discussion on the Demand for Grant of the Ministry of Tribal Affairs. When we talk about the tribal people, we must not forget the steps taken by the UPA Government and the Congress Party for the benefit and welfare of the tribal people.

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PLANNING AND MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF PARLIAMENTARY AFFAIRS (SHRI V. NARAYANASAMY): It is his maiden speech, Sir.

MR. CHAIRMAN : You are right.

SHRI HAMDULLAH SAYEED : Not maiden Speech, it is my second speech in Parliament. If we look at the Plan outlay for the year 2008-09, it was Rs. 2121 crore, whereas in 2009-10, the Plan outlay was Rs. 3,205 crore, which was almost 34 per cent more. This increment or increase in the Plan outlay itself shows and proves that the UPA Government is committed to fight the problems of the tribals, to develop the tribal areas and to ensure that the tribal people get the development in the tribal areas. I would like to quote the Plan outlay for 2010-11, which is Rs. 3,206 crore. There is a marginal increase in the Plan outlay for this year. We must not forget the Forest Dwellers Act, 2006 which was enacted by the UPA-I, which gives the benefits to the tribal people who are living in the forests. They were previously deprived of using the forest reserves and the produce which was there in the forest and in which they had the titles. Under the Forest Dwellers Act, 2006, they are entitled to use the forest reserves, and this has been materialized under the able leadership of Prime Minister Dr. Manmohan Singh, and the UPA Chairperson Madam Sonia Gandhi. It is a gift of the UPA Government to the tribal people.

          I would like to highlight certain schemes which have been introduced by the UPA Government. The Post-Matric Scholarship Scheme which has been introduced entitles the Scheduled Tribe children, who hail from such families whose family income does not exceed Rs. 1,80,000 per annum. They are entitled to 100 per cent financial assistance by the Central Government to get free education. This step which has been taken by the UPA Government and by the Congress Party is a step to remove illiteracy, to remove the problems of the uneducated, and to create awareness and knowledge among the tribal people.

          The National Overseas Scholarship Programme which has been introduced gives 15 Scheduled Tribe children the opportunity to go abroad to specified foreign universities and get admission in Post-Graduate courses. All these schemes have been introduced by the UPA and the Congress Party keeping in view of the problems being faced by the tribals.

          I would also like to mention about the Rajiv Gandhi National Fellowship Programme, which is another scheme that was introduced in the year 2005-06, by the UPA Government for Scheduled Tribe students to pursue M.Phil and Ph.D courses. All these steps have been taken to develop the tribal regions and for the welfare of the tribal people.

          If we see the demography of India’s population, eight per cent of the total population of the country is tribals. They are spread in Jammu and Kashmir, Uttar Pradesh, Madhya Pradesh, Andaman and Nicobar Islands, Lakshadweep, Daman and Diu, Tamil Nadu, Kerala and in all other parts of the country. I represent the Lakshadweep Parliamentary Constituency. In my constituency, there is a serious problem which is being faced by the Central Government employees and the Lakshadweep Administration employees working there. Lakshadweep is a cluster of 36 Islands, and only ten are inhabited with people. The southern-most Island of Lakshadweep is called Minicoy. All the Central Government employees working there get ‘hard area allowance’ at the rate of 25 per cent. I would request and urge the UPA Government that the ‘hard area allowance’ which has been extended to the Central Government employees at Minicoy Island may be uniformly extended to all the Islands because all the Islands in Lakshadweep are equally remote, equally isolated and socially and economically backward.

Therefore, I would support the Demands for Grants of the Ministry of Tribal Affairs. इसके साथ मैं यह भी कहना चाहूंगा कि विरोधी दलों की ओर से कुछ लोगों ने कहा कि हमारी यूपीए सरकार भेदभाव करती है।  काफी पैसा स्टेट्स में भेजा गया है और काफी सारे राज्यों में पैसा गया है, लेकिन वह पैसा जिस कार्य में जहां लगना चाहिए, वह नहीं लगा है। इसी वजह से कंप्लेंट्स आ रही हैं। अगर आप लोग अपने-अपने स्टेट्स में झांककर देखें, तो यूपीए सरकार को जितना पैसा देना था, उसने हक से ज्यादा ही पैसा दिया है, वह कम नहीं हो सकता है। अगर आप उस पैसे को ग्रास रूट पर परकुलेट करायेंगे, तो नक्सल की प्राब्लम भी दूर हो जाएगी।इसी के साथ आपने बोलने का मुझे मौका दिया।

                                                                                                             

MR. CHAIRMAN :  Thank you for your maiden speech.

 

ओश्री कमल किशोर कमांडो (बहराइच): महोदय, मैं लोक सभा बहराइच से कांग्रेस संसद सदस्य हूं जहां पर नेपाल बार्डर पर दो ऐसे ब्लॉक हैं जिनका नाम मेहिपुरवा एवं नवाबगंज है । यहाँ पर बहुत ही गरीबी में अनुसूचित जन जाति के लोग निवास करते हैं जिनके लिए न तो स्कूल, न ही क्रीड़ा मैदान, मनोरंजन के साधन, पीने की पानी, नलकूप, सड़कें बिजली, आदि की सुविधा है उनकी स्थिति बहुत ही दयनीय है । चूकि नेपाल से लगा हुआ इलाका है खुला है । यही नहीं बल्कि पूरे जंगलों से घिरा हुआ इलाका है, जहाँ पर बहुत ज्यादा संख्या में लोग निवास करते हैं । वह लकड़ी तोड़कर अपना खाना-पीना बनाते हैं और सेवन करते हैं । इनके लिए गैस चूल्हे तथा गैस पवाइंट बनाने की अति आवश्यकता है ।इन निवासियों को स्पेशल कंपोनेंट प्लांट के तहत व्यवस्था करनी चाहिए । चूंकि यह जातिया ज्यादे हिस्से में जंगल में रहते हैं और जंगली जानवरो से इन्हें खतरा होता है । कभी न कभी चीता-बाघ एवं अन्य जानवरों जैसे भालू ,नीलगायों द्वारा इनका नुकसान होता है । मेरी इच्छा है कि उन्हें कांटे तार लगाकर वनों के पास रहने वाले से सुरक्षित किया जाय । वहाँ पर जान जाने के बाद से इन्सान कीमत केवल 20 से 30 हजार रूपये में है । यह उचित नहीं है । उनके लिए भी वही व्यवस्था है जो अन्य के लिए है । जनजातीय इलाकों में डाक्टर की व्यवस्था नलकूप की व्यवस्था अतिशीघ्र बिना सोने समझे होनी चाहिए।  ऐसे इलाकों में जनजातीय अधिकारियों या कमेटियों को भ्जकर जानकारी लेना चाहिए ।  उसी के मुताबिक कायवाही करना चाहिए ।

          सरकार द्वारा जो प्रावधान बनाया गया है उसका लाभ बिल्कुल नहीं मिल पाता है । इसका महज कारण है अधिक्षा साक्षरता अभियान लगाकर कार्य तेज करना चाहिए । इन्हें बुनियादी व्यवस्था शिक्षा एवं शिक्षकों की व्यवस्था अति आवश्यक हे । उनके लिए हॉस्टल बनाकर जनजाति बच्चों एवं बालिकाओं के लिए अच्छी व्यवस्था हो ।केन्द्र सरकार काफी प्रयास कर रही है । जो भी ट्राइबल बजट है उसे बढ़ाना चाहिए ।  इन जातियों के अलावा वहां अन्य जातियां जैसे मुसलिम-हिन्दू, सिख, ईसाई जो उस इलाके में रहते हैं उनकी भी वही हालत है जैसे जनजातीय लोगों की । चूंकि बहराइन जिला एक गरीब जिला है जहां पर अभी हर तरह की व्यवस्था चाहिए । वैसे रेल लाइन की व्यवस्था हो रही है । वहां पर रहने वाले की स्थिति ठीक नहीं है । ज्यादा से ज्यादा मदद होनी चाहिए । इन्हीं बातों के साथ मैं जनजाति बजट का समर्थन करता हूं ।

   

* Speech was laid on the Table     श्री विष्णु पद राय(अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह): महोदय, मैं हमीद भाई को बहुत धन्यवाद दूंगा क्योंकि इन्होंने लक्षद्वीप की बात उठायी है। मैं तन और मन से इसका समर्थन करता हूं। हमारे द्वीपसमूह में निकोबार एक एरिया है, निकोबारी ट्राइबल भाईयों की सूनामी के पश्चात हालत बहुत बुरी है, उन्हें घर मिला, लेकिन उन्हें लाइवलीहुड नहीं मिला। सरकार को उनके लाइवलीहुड की चिंता करनी चाहिए। कचाल द्वीप में जो निकाबारी भाई लोग हैं, सूनामी के पश्चात उनकी जेट्टी टूट गयी, हॉस्पीटल टूट गया, इसके लिए सरकार फंड दें, यह हमारी मांग है। अंडमान निकोबार द्वीप समूह में सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग आगे नक्सालाइट न बनें, आतंकवादी न बनें, इस पर सरकार को चिंतन करना चाहिए। छोटा नागपुर से आदिवासी या वनवासी भाई, मुंडा, उराव, खड़िया, लोहार भाईयों को वर्ष 1918 में अंडमान निकोबार के विकास के लिए लाया गया था। पहले बैच में चार सौ लोग लाये गये थे, उसके पश्चात वर्ष 1946 से1952 तक करीब 12 हजार मुंडा, उराव, खडिया, लोहार, जो वहां के आदिवासी लोग थे, हम उन्हें रांची भाई कहते हैं, उन्हें द्वीपसमूह में लाया गया। उन्हें द्वीपसमूह में लाकर, जंगल कटवाया, रास्ता बनवाया, जेट्टी बनाया, आदि विकास के काम करवाये। ईस्ट पाकिस्तान/बांग्लादेश से रिफ्यूजी को द्वीपसमूह में बिठाया, उसी तरह कैम्पबेल वे में एक्स सर्विसमैन को बिठाया। आज उनकी संख्या करीब सत्तर हजार है।

MR. CHAIRMAN: You just mention your point and conclude.

SHRI BISHNU PADA RAY: I will take five minutes only.

 महोदय,कुल आबादी के 17 से20 परसेंट लोग इस परिवार के हैं। ये लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि उन्हें आदिवासी का दर्जा दिया जाये क्योंकि ये मुख्य भूमी में आदिवासी हैं। आज 50, 60 साल बाद भी रांची भाईयों में कोई गजटिड अफसर, डॉक्टर, इंजीनियर नहीं बना है और इन्होंने केवल मजदूर का ही काम किया है। आज उसकी हालत सबसे बुरी है। उदाहरण के लिए, बाराटांग, डिगलीपुर, रामनगर, जिरकाटंग आदि स्थानों में इनकी बुरी हालत दिखायी देगी। ये रांची भाई वर्ष 1981 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी, 1986 में राजीव गांधी जी, 1997 में रा­ष्ट्रपति तथा भारत सरकार से पत्र से मांग करते रहे और बीच-बीच में आन्दोलन भी किया कि हमें आदिवासी का दर्जा दिया जाये। यह मेरी पहली मांग है। मेरी दूसरी मांग अंडमान निकोबार द्वीपसमूह में जारवा के बारे में है। अंडमान निकोबार एक अकेला ऐसा द्वीपसमूह है, जहां आज भी प्रीमिटिव ट्राइब्स/अबोरजिनल ट्राइब्स हैं। ये भारत में किसी भी जगह नहीं मिलेंगे। पांच ट्राइब्स हैं, ऊंगीज, अंडमानीज, जारवा, सैंटिनलीज और सोम्पेन्स हैं। आज जारवा लोग खतरे में हैं। अंडमान के विकास में जारवा एक बाधा बनकर खड़े हुए हैं। आज जारवा की संख्या मात्र 359 है, लेकिन जारवा के एरिया 1028 स्क्वायर किलोमीटर है। जारवा पॉलिसी पर दोबारा पुनर्विचार करना जरूरी है। सरकार को इस पर चिंतन करना पड़ेगा। जिस दिन भारत सरकार ने जारवा एरिया के बीच से अंडमान ट्रंक रोड बनाया, भारत सरकार ने वर्ष 1954 में ईस्ट पाकिस्तान/बांग्लादेश के रिफ्यूजी को बुलाकर जारवा एरिया के अगल-बगल बिठाया गया। जैसे उदाहरण के लिए गांव का नाम तिरू, उत्तरा, कदमतला आदि। यहां से जारवा की तकलीफें शुरू हुई। आज जारवा गांव के लोगों के साथ मिल चुके हैं। वे केकड़ा, हिरन का मांस गांव वालों को देते हैं और उसके बदले में उनसे खाने का सामान जैसे चावल, नमक, मसाला, तेल आदि लेते हैं। आज जारवा के साथ गांव का नाता जुड़ गया है। जारवा के घर में गोरा बच्चा पैदा हो गया है। ऐसे तीन बच्चों के नाम मेरे पास हैं। आज जारवा खतरे में है। जारवा एरिये की जो तकलीफ है, मैं उसे सरकार से देखने का अनुरोध करूंगा। जारवा की जो प्रोटेक्शन फोर्स है, जो स्टाफ दिया गया है, वह बहुत कम है, उनका वेतन भी कम है। उन्हें रेग्युलराईज किया जाय। यह हमारी दूसरी मांग है।

          मेरी तीसरी और अंतिम मांग है कि अंडमान और निकोबार में 2007में जारवा एरिया को पाँच किलोमीटर आगे बढ़ाकर बफर ज़ोन बनाया गया। परिणामस्वरूप समुद्र के बीच में जारवा एरिया आ गया। लोकल लोग समुद्र में डुंगी लेकर मछली मारने जाते हैं तो पुलिस उनको पकड़कर लेकर आती है। जो जारवा एरिया समुद्र में एक्सटैन्ड किया गया, वहाँ समुद्र में कोई पहचान चिह्न नहीं है। जारवा एरिया से समुद्र में जाने के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ा है। चारों तरफ समुद्र है और उसको बफर ज़ोन बनाया गया है। सरकार इस पर चिन्तन करे और स्थानीय लोगों को जारवा एरिया में पहचान चिह्न लगाकर मुख्य समुद्र में जाने का रास्ता दे। मैं पुनः अनुरोध करूँगा कि सरकार इन बिन्दुओं पर ध्यान दे। मेरी अंतिम डिमांड क्रेन आदिवासी जाति जो द्वीप समूह में लाए गए थे, उनको आदिवासी का दर्जा आज तक नहीं मिला है। पुनः राची लोगों को आदिवासी का दर्जा दे। सरकार इनको आदिवासी का दर्जा दे, यही हमारी मांग है।

                                                                                                   

श्री नृपेन्द्र नाथ राय (कूच बिहार): सभापति महोदय, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूँ। सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के अनेक माननीय सदस्यों ने इस पर चर्चा की है। सभी सदस्यों की मांग है कि भारत की जो आदि जनजाति है, उसका कल्याण हो। मैं इस विषय पर ज्यादा नहीं बोलूँगा। यदि मंत्री जी यहाँ उपस्थित होते तो अच्छा होता। लोक सभा में मंत्री जी ने एक प्रश्न संख्या 3575 के उत्तर में 11दिसम्बर 2009को बताया कि 2009-10में आदिवासी छात्रों के होस्टल में भर्ती का टार्गैट 29000 छात्रों के लिए था। इसके अंतर्गत अंबेडकर विद्यालय और आश्रम आदि आते हैं। इसमें लड़के और लड़कियों के होस्टल में भर्ती करने का टार्गैट 29000 था, लेकिन 21400 सीटें ही भरी गईं। कम साक्षरता वाले क्षेत्रों में एसटी लड़कियों में शिक्षा को मजबूती प्रदान करने के लिए 28000 लड़कियों को शिक्षित करने का टार्गैट रखा गया था लेकिन 1983लड़कियों को ही इसका लाभ पहुँचा। मंत्री जी को मालूम है कि जो बहुत सारे आश्रम स्कूल बनाए, आज उनकी हालत क्या है। हम क्यों सफल नहीं हो पाते?हम अच्छी अच्छी बात करते हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष के सभी सदस्य जनजातीय लोगों का मंगल चाहते हैं, यह ठीक है लेकिन जब स्कूल बनाए हैं तो स्कूलों की हालत क्या है, वह भी देखना चाहिए। स्कूलों में पढ़ने, लिखने, टीचिंग आदि के लिए अच्छी सुविधा है या नहीं यह मंत्री जी को देखना चाहिए।

          बजट के संबंध में बहुत से सदस्यों ने बराबर एक ही मांग की। 2008-09के बजट की हालत देखिये 3220करोड़ रुपये बजट एलोकेशन था लेकिन वह पूरा पैसा खर्च नहीं हुआ। वह खर्च क्यों नहीं हुआ? मंत्री जी को जनता के उन्नयन के लिए ठीक ढंग से सोचना चाहिए। हम क्यों खर्च नहीं कर पाए?फिर आप देखें तो 2010-11 में 3220.37करोड़ रुपये बजट एलोकेशन हुआ। इसमें कितनी बढ़ोतरी हुई? जितनी राशी 2009-10 में थी, करीब उतनी ही राशि 2010-11में रखी गई। मंत्री जी को यह सोचना चाहिए कि यह धोखा है या नहीं?

          अभी जैसे हमारे विष्णु पद राय जी ने कहा कि अंडमान निकोबार की एक आदिम जनजाति जारवा है। हमारी कांस्टीटय़ूंसी के पास भी एक जिला है जलपाईगुढ़ी। वहाँ आश्रम स्कूल हैं, बिरसा मुंडा स्कूल है। वहां एक आदिम जनजाति है जिसका नाम टोटो जनजाति है। उनकी आबादी केवल 2000है। वे बहुत संकट में हैं। वह जनजाति विलुप्त होने के कगार पर है। आदिम जनजाति के बारे में जब हम बोलते हैं तो हमें टोटो पारा के लिए भी सोचना पड़ेगा। बहुत लोगों ने फॉरैस्ट के बारे में कहा, रास्ते के बारे में कहा। हमने यह योजना क्यों नहीं बनाई? हमारे यहाँ प्रधान मंत्री रोजगार योजना है या दूसरी योजनाएँ जो हैं, क्यों हम उनको आदिवासी एरियाज़ में प्लान नहीं देते? जहाँ जहाँ आदिवासी क्षेत्र हैं, वहाँ प्रधान मंत्री सड़क योजना से भी रास्ता बनाना चाहिए, तब हमारा यहाँ बात करना सार्थक होगा।

          आप महाभारत पढ़ लीजिए अथवा हमारा पिछला इतिहास उठाकर देख लीजिए, हमारे देश के असली निवासी तो आदिवासी हैं। लेकिन उन्हें वनों से हटाया जा रहा है। इस कारण उनमें गुस्सा है। मेरी मांग है कि आदिवासियों के लिए वन का कानून बनाना चाहिए। वनों पर उनके अधिकार के लिए कानून बनाने की आवश्यकता है।

          इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

   

*SHRI PRASANTA KUMAR MAJUMDAR (BALURGHAT) : Hon. Chairman Sir, tribal people of India are socially, economically and educationally, the most backward.  Since the independence of the country, the land which have been acquired by the Government for developmental purposes was mostly owned by the tribals. About a third of the entire land acquired was of the poor tribal communities.  Even today, in the name of irrigation, or industrial development or setting up of manufacturing units, the tribal land are being occupied. This practice should stop immediately.

          When the land reforms law was enacted by the Congress Government, it was declared that the forest dwellers would be given ownership deeds.  But that was not done.  Thus on one hand the tribal land are being grabbed and on the other, these poor people are not getting enough compensation.  They are in a miserable condition.  Infact I would like to urge upon the Government to go through the financial review and outcome Budget.  It has been clearly mentioned that the money which is being paid to the tribals is a paltry sum and highly inadequate.  For 9 to 10 crores of people,  merely three thousand or one thousand five hundred crores of rupees have been spend. This is ridiculous.  If this amount is not enhanced, there will be no development in the backward regions.  I think that we are failing to feel the pulse of these people while allocating Budget or implementing the schemes because we are non-tribals.  So we just overlook their interests as a result of which they remain underdeveloped – this issue must be sincerely looked into.

          We have seen that shares of the State Governments are decreasing and that of the NGOs are increasing over the years.  Thus the question of transparency crops up which needs to be addressed.  The tribal villages are very small, sometimes only 200 or 300 people live there.  They mostly depend on the forests and are usually cut off from the mainstream.  These areas should connected through PMGSY so that their reach can be widened. Otherwise in the absence of roads and other infrastructure, naxalites are finding it easier to hide there and carry out anti-social activities.  The tribals live on the pond water or river water. They do not have access to clean drinking water which should be made available to these areas.

          Lastly, I want to say that every community wishes to speak its own language, study in its own mother tongue therefore the tribal languages must be given recognition in the 8th Schedule of the constitution and research and development work should be undertaken to propagate these primitive languages. They are linguistic minorities.   If other kinds of cultural and religious minorities can be promoted and protected in this country then why are these linguistic minorities left out? A nation has to thrive upon a rich cultural and linguistic heritage.  Without language and literature, no nation can survive.  So I would request the Government to do the needful in this regard.  Though there are various schemes for development of learning and education, these are not properly executed in these tribal regions.  So much needs to be done; much work is left.  If the Government takes care of these aspects then only we will be able to create a better, prosperous India.  With these few words, I conclude my speech.

   

SHRI KALYAN BANERJEE (SREERAMPUR): I must thank you, Mr. Chairman, Sir. I will try to keep my commitment to complete my remarks within three minutes. I will not reiterate the issues which have already been said. Several discussions have taken place on this. On behalf of my Party, I support this.

          I will only give a few suggestions here. I want to suggest that a new Bill should be introduced, giving right of forests to the tribal persons who live in the forests. This Bill should be introduced and passed for the purpose of real development of tribal persons. Everywhere we now find that no forest clearances are given. Let this right be given to the persons who are in the Scheduled Tribe areas. Let a meaningful life be extended to the tribal people. Today’s naxal and Maoist movements are there because of the fact that for long years, decades after decades, no development has taken place in the areas where tribals live. 

          I take the areas of Jharkhand and West Bengal where coal mining operations are going on and Damodar Valley Corporation’s project is also there, and at the same time, Scheduled Tribes’ areas are there. Unfortunately the public sector undertakings are not spending the moneys from the CSR accounts which are kept for that purpose. Today, if the State Government is serious about curbing the naxalite and Maoist movements, extensive development has to take place in the areas where Scheduled Tribe persons are there. Had there been any benefit extended to the affected persons in the areas where the mines are allotted to the private persons, these naxal and Maoist movements would not have been there.

          I will tell you the experience of West Bengal. Today three districts are affected by naxal and Maoist movements.

17.57 hrs                          (Shri P.C. Chacko in the Chair)           In these three districts, for the last nearly 35-40 years, no development has taken place. So, development is needed today. We must make an endeavour and sincerely we must see that the Central Government implements the policies in the areas where there are Scheduled Tribes. Unfortunately for the last 5-6 years, though there have been many Central Government projects like PMGSY, RGGVY, water projects, and others, they have not been implemented and the benefits have not been extended to the Scheduled Tribe areas.

          I will keep my commitment by just repeating it. I would say that the right of forest should be extended to the Scheduled Tribes who live in forest. That is the suggestion that I would like to give. We must extend a meaningful life for them, within the ambit of our Constitution. .

   

श्री विजय बहादुर सिंह (हमीरपुर):  सभापति महोदय, आपने मुझे वर्ष 2010-11के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय की अनुदान की मांगों पर बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। मैं इसका समर्थन करता हूं, लेकिन मैं सदन के सामने यह प्रश्न करना चाहता हूं कि रूलिंग पार्टी की मानसिकता क्या है? क्या ये ट्राइबल को इप्रुव करना चाहते हैं या ट्राइबल की जो पोजिशन पहले थी, उसी को कंटीन्यू करना चाहते हैं? उदाहरण के तौर पर मैं बताना चाहता हूं कि जैसे गमले में कोई पौधा लगा हुआ है, उसमें थोड़ा पानी डालते रहें तो वह न सूखेगा और न ही बढ़ेगा। आप कल्पना करिए कि नौ करोड़ पापुलेशन है और आप 3200 करोड़ दे रहे हैं। उसी साल कॉमन वैल्थ गेम्स में16हजार करोड़ दे रहे हैं। नौ करोड़ ट्राइबल को 3200करोड़ और कॉमन वैल्थ गेम्स में 15दिन में जो आतिशबाजी होगी, सौ मैडल में से 99 मैडल लेकर चले जाएंगे।...( व्यवधान)

18.00 hrs. MR. CHAIRMAN : No interruptions please. Shri Singh, you may please continue.

श्री विजय बहादुर सिंह : महोदय, मेरी बात समझ लीजिए, मैं आपके माध्यम से माननीय सदस्यों को कांस्टीटय़ूशन की बात याद दिलाना चाहता हूं। संविधान के आर्टीकल 21में लिखा है कि प्रोटैक्शन ऑफ लाइफ एंड पर्सनल लिबर्टी। Article 21  says protection of life and personal liberty. सुप्रीम कोर्ट की कांस्टीटय़ूशन बैंच ने कहा है कि पर्सनल लाइफ का मतलब है डीसैंट लाइफ,  not animal life. अभी अपने ऑनरेबल प्राइम मिनिस्टर ने 9नवम्बर को एक स्पीच दी। अगर आप परमिट करें, तो उनकी स्पीच की एक लाइन मैं पढ़कर बता दूं। उन्होंने अपनी स्पीच में कहा, जो अखबार में छपा है कि आदिवासियों को देश के सामाजिक आर्थिक विकास की बराबरी में भागीदारी मिलनी चाहिए, क्योंकि वे हमारे देश के नागरिक हैं। प्रधान मंत्री, डॉ. मन मोहन सिंह ने आगे कहा कि यह हमारी जिम्मेदारी है कि आदिवासी समुदायों को हम उनकी जीवन शैली की सुरक्षा और भविष्य में सम्पन्न रखें। यह माननीय प्रधान मंत्री जी ने कहा और आप उन्हें केवल 3200करोड़ रुपए दे रहे हैं। It is a chicken feed.  जैसे एक बड़े भारी लीलैंड ट्रक में 1 लीटर पेट्रोल डाल दें और फिर कहें कि आप ट्रक को चलाओ, यह कैसे होगा?

सभापति महोदय :   श्री विजय बहादुर सिंह जी, कृपया आप एक मिनट के लिए बैठिए।

          We have 10 more Members to speak on this discussion. We will have to extend the time of the House and the hon. Minister will reply at 6.30 p.m. So, with your consent I extend the time of the House.

श्री विजय बहादुर सिंह : सभापति महोदय, सभापति महोदय :   श्री विजय बहादुर जी, अब आप समाप्त कीजिए।

श्री विजय बहादुर सिंह : सभापति जी, मैं समाप्त ही कर रहा हूं।

          महोदय, एक एक्ट बना जिसका नाम Scheduled Tribe and Traditional Forest Developers Recognition of Rights Act, 2006.  है। यह एक्ट 2006 में पास हो गया। इस एक्ट की मंशा थी कि जो ट्राइब्स, उन विलेजेज में रह रहे हैं, उन्हें राइट्स दिए जाएं। इस हेतु 35 लाख लोगों ने एप्लाई किया, लेकिन सिर्फ 5लाख लोगों को राइट्स दिए गए।  Not even 5 per cent.  अगर यह है, तो फिर मैं आपके माध्यम से सरकार से पूछना चाहता हूं कि यह कौन सा एक्ट है? मैं आपकी ही बात कहना चाहता हूं। ...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Please take your seat. Your time is over.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: No disturbance please. 

श्री विजय बहादुर सिंह : माननीय सभापति जी, मैं इनसे कहना चाहता हूं कि आप कम से कम डॉ. मनमोहन सिंह, जो भारत के प्रधान मंत्री के अलावा, संसार के माने हुए अर्थशास्त्री हैं, उनके वचनों की तो थोड़ी कद्र कीजिए, उसका तो पालन कीजिए।

          महोदय, मैं लास्ट में धन्यवाद देते हुए, एक लाइन कहना चाहता हूं, लगता है ये ट्राइबल लोग इन्हें वोट नहीं देते। इसीलिए उनकी स्थिति में सुधार करने की इनकी मंशा नहीं है।

                                                                                                   

श्री बसोरी सिंह मसराम(मंडला): सम्मानीय सभापति महोदय, जनजातीय कार्य मंत्रालय की वर्ष 2010-11 की अनुदान मांगों के समर्थन में बोलने हेतु स्वीकृति के लिए मैं संसदीय क्षेत्र की ओर से आपको धन्यवाद देता हूं। मानव के सामाजिक विकास की यात्रा में सर्वाधिक प्राचीन संस्कृति का पोषक माने जाने वाले आदिवासी समुदाय ने जहां आज भी अपने आपको प्रकृति के समीप रखा है, वहीं वह छल, कपट, लोभ और मोह से दूर है। इस वर्ग की परम्पराओं को जीवित रखते हुए उन्हें सामाजिक आर्थिक विकास में सक्रिय भागीदारी देना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस वर्ग के सम्पूर्ण विकास के लिए केन्द्र शासन की ओर से अनेक योजनाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, रोजगार और आवास आदि के लिए प्रति वर्ष राज्यों के स्तर पर क्रियान्वयन हेतु भेजी जाती हैं। फिर क्या कारण है कि आज भी आम आदिवासी गरीबी, बेकारी और पिछड़ेपन का शिकार है। केन्द्रीय योजनाएं दिल्ली से राज्य की राजधानियों से होकर जिला मुख्यालयों तक और वहां से गांव तक पहुंचते-पहुंचते आदिवासी वर्ग के उत्थान के नाम पर भ्रष्ट नौकरशाही का शिकार हो जाती हैं।

          इन योजनाओं के नाम पर बंदरबांट करने वाले तथा राजनैतिक लाभ उठाने वाले राज्य सत्ता के शोषकों के हाथों में उलझ कर रह जाते हैं। इसी कारण से दुर्दशा का शिकार हो रहा आदिवासी वर्ग अब कुंठित हो रहा है जिसका अनुचित लाभ उठाकर नक्सलवाद जैसी गंभीर समस्याएं अब पैर पसारने लगी है।  समय की मांग है कि इस पर गंभीरता से विचार किया जाए कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में ही नक्सलवाद क्यों अधिक पनपता है और यह क्या केवल कानून व्यवस्था की समस्या है अथवा केंद्रीय योजनाओं के पालन में राज्यों के द्वारा अपनाये जा रहे कुप्रबंधों का नतीजा है?

          हमें विचार करना होगा कि केवल छात्रवृत्ति अनुदान या कतिपय योजनाओं के लिए धनराशि आबंटित करने वाले विभाग की छवि से इसे मुक्त कराया जाए। जनजातीय कार्य मंत्रालय की उपयोगिता और उसकी गंभीरता को समझते हुए उसे महत्व प्रदान किया जाए तथा देश के लगभग साढ़े आठ करोड़ आदिवासियों के हितार्थ विभिन्न विभागों के माध्यम से संचालित योजनाओं को इसी मंत्रालय के अंतर्गत लाया जाए। इसे इन समस्त योजनाओं की समीक्षा करने तथा नियंत्रणकर्ता विभाग के रूप में नोडल विभाग की तरह विस्तृत दायरे में कार्य करने हेतु पर्याप्त आबंटन प्रदान किया जाए।

          मेरा सुझाव है कि आदिवासी समाज की बेहतरी के लिए संचालित विभिन्न योजनाओं की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर माननीय प्रधानमंत्री जी की अध्यक्षता में राष्ट्रीय आदिवासी मंत्रणा परिषद गठित हो, जिसकी प्रत्येक तीन माह में बैठक हो। राज्यों के मुख्यमंत्री इसके सदस्य हों व संबंधित योजनाओं के विषय विशेषज्ञ भी उसमें सम्मिलित किए जाएं, जो आदिवासियों के हित में समस्त कार्यक्रमों की समीक्षा कर सुधारात्मक निर्णय ले सके।

          राज्यों के द्वारा राजस्व बढ़ाने व ठेकेदारों को लाभान्वित करने के उद्देश्य से आदिवासी संस्कृति के नाम पर बनायी गयी दूषित शराब नीतियों की समीक्षा भी इसी मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में की जाए, ताकि आदिवासियों के नाम पर बनी दूषित आबकारी नीति से प्रति वर्ष लाखों आदिवासी परिवारों को मद्यपान के लिए बढ़ावा मिलने से उन्हें होने वाली स्वास्थ्य क्षति, पारिवारिक अशांति तथा आर्थिक दुर्दशा से गरीब आदिवासी परिवारों को बचाया जा सके।मेरे निर्वाचन क्षेत्र में इस दूषित शराब नीति के कारण पुलिस प्रताड़ना से दिनांक 04 दिसंबर, 2009 को ग्राम अमरपुर में एक नवयुवक को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिसकी जवाबदेही तय की जाए।

          महोदय, अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित मेरे संसदीय क्षेत्र मंडला के अंतर्गत चार जिलों के आठ विधानसभा क्षेत्रों के 23 विकासखंडों के 400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले चार हजार से अधिक बसावटों के लगभग सोलह लाख मतदाताओं में से दो तिहाई क्षेत्रों में लोग आदिवासी बाहुल्य हैं। जो जंगलों, पहाड़ों, छोटे-छोटे टोले पारों में स्थानीय वन, जल, भूमि की उपलब्ध के आधार पर निवास करते हैं। यहां वन भूमि में काबिज व पात्रताधारी अधिकांश आदिवासी परिवारों को केंद्र की यूपीए सरकार के द्वारा वन भूमि अधिकार अधिनियम बनाये जाने के बावजूद राज्य की सरकार के द्वारा अपनी दोषपूर्ण व्यवस्था के चलते भूमि के पट्टे उपलब्ध नहीं कराये जा सके हैं। इस हेतु जनजाति कार्य मंत्रालय के माध्यम से शीघ्र ही मैदानी समीक्षा कराने एवं आदिवासी परिवारों को इस योजना से लाभान्वित कराने की अपेक्षा है। साथ ही इस पिछड़े संसदीय क्षेत्र के प्रदेश के सर्वाधिक वृहद् आदिवासी भूभाग में अधोसंरचना विकास, कृषि, सिंचाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल एवं सड़कों हेतु विशेष पैकेज जनजातीय कार्य मंत्रालय के माध्यम से उपलब्ध कराये जाने का अनुरोध है।

          मैं जनजातीय कार्य मंत्रालय के द्वारा प्रस्तुत विभाग की अनुदान मांगों का समर्थन करता हूं।

   

श्री हसन खान (लद्दाख): चेयरमैन साहब, मैं बहुत ब्रीफ में दो-चार बातें आपको बताना चाहता हूं।  मैं जम्मू-कश्मीर स्टेट के लद्दाख रीजन को बिलांग करता हूं, जहां पर 99 प्रतिशत आबादी ट्राइबल्स हैं।  ये ट्राइबल्स सात हजार फुट से लेकर 17 हजार फुट के बीच में रहते हैं।ये छत्तीसगढ़ की तरह या बाकी स्टेट्स की तरह नहीं हैं कि वे जंगलों में या बाकी जगहों में रहते हों।  वे सिर्फ पहाड़ी इलाकों में रहते हैं, फार अवे कट आफ। जो ट्राइबल्स हमारे एरिया में रहते हैं, वह क्षेत्र 60हजार स्क्वायर किलोमीटर में फैला हुआ है। एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने के लिए घंटों, महीनों नहीं बल्कि दिन लग जाते हैं। वहां पर कनैक्टिविटी नहीं है। उस ट्राइबल एरिया के लिए सैंट्रल गवर्नमैंट जो भी प्लान बनाती है, अगर आन ग्राउंड देखा जाए तो वह इफैक्टिव नहीं है because of various reasons.  First of all, it is the severity of the climate, then the distance from one place to another and the most difficult thing is it is a cut-off area. वह ट्राइबल एरिया बाकी कंट्री से छ: महीने कट-ऑफ रहता है। सरकार ने उस ट्राइबल एरिया को मेन लैंड के साथ जोड़ने के लिए आज तक कोई काम नहीं किया, ताकि वह बाकी कंट्री के साथ बारह महीने जुड़ा रहे। कनैक्टिविटी की प्रॉब्लम की वजह से उन ट्राइबल्स की प्रॉब्लम बाकी जगहों से बिल्कुल भिन्न है। ठीक है, इस समय हम यूपीए सरकार के मशगूर हैं कि वह कनैक्टिविटी की तरफ बहुत ध्यान दे रही है। बहुत जगहों पर प्रधान मंत्री सड़क योजना के तहत या नेशनल हाईवेज़ स्कीम के तहत सड़कें बन रही हैं। लेकिन इस वक्त वहां बहुत मिज़रेबल कंडीशन हैं, खासकर स्कूलों की हाल देखिए। एक स्कूल दूसरी जगह से पचास-पचास, सौ-सौ किलोमीटर की दूरी पर है। रेज़िडैंशियल होस्टल्स नहीं हैं। वहां टीचर पहुंचते नहीं हैं। अगर कहीं से टीचर चले जाएं तो वहां उनके बैठने के लिए जगह नहीं है और वे सीवियरनेस में वहां बैठ नहीं सकते। वहां से स्टूडैंट्स निकलकर सिटी, जम्मू, श्रीनगर, दिल्ली आ जाते हैं। उन्हें ट्राइबल स्कॉलरशिप भी नहीं मिल रही है।

          आज मुझे पढ़कर और देखकर हैरानी हुई कि पिछले साल जम्मू कश्मीर को ट्राइबल प्लान में 14करोड़ रुपये रुपये दिए गए, जिसमें से 2करोड़ खर्च हुए। हमारे वहां जो ट्राइबल्स के इंचार्ज हैं, उन्हें हम जाकर बोलते हैं कि यहां के सैंकड़ों लड़के-लड़कियां दिल्ली, जम्मू, श्रीनगर, चंडीगढ़ में पढ़ते हैं, उन्हें ट्राइबल स्कॉलरशिप नहीं मिली, तो वे कहते हैं कि हमारे पास पैसे नहीं हैं। यहां बोला जाता है कि पैसे दिए गए थे लेकिन उन्होंने खर्च नहीं किए। हमें मालूम नहीं है कि क्या सैंटर ने पैसा दिया था जो खर्च नहीं किया गया या यहां से पैसा नहीं गया। एक्चुअली ग्राउंड पर ट्राइबल्स के लिए जो स्कीम बनाई जा रही हैं, कनैक्टिविटी में भी, जो स्कीम आप यहां से बनाकर भेजते हैं, आप इम्प्लॉयमैंट का देख लीजिए, उस ट्राइबल एरिया में रहने वाले यूथ के लिए जो स्कीम आप यहां से फार्मुलेट करके वहां भेजते हैं, लोन के जरिए वे इम्प्लॉयमैंट जनरेशन का जो काम करते हैं, उनकी वह इकोनॉमिक एक्टीविटी छ: महीने के लिए बिल्कुल बंद हो जाती है। वह ट्राइबल अनइम्प्लॉयमैंट छ:महीने क्लाइमेट की वजह से, सरकार उन्हें जो फायदा देती है, वह भी बंद हो जाती है। Whereas other tribals can claim benefits for the whole year. इन चीजों की तरफ मैं आपका ध्यान इसलिए दिलाना चाहता हूं क्योंकि हमें राज्य में कुछ और कहा जाता है और जब हम यहां आकर देखते हैं तो बहुत खुशनुमा लगता है। प्लान देखकर आदमी खुश हो जाता है कि इतने पैसे स्कॉलरशिप के लिए जा रहे हैं, इतने पैसे ट्राइबल होस्टल के लिए जा रहे हैं, इतने पैसे कनैक्टिविटी के लिए जा रहे हैं, इतने पैसे हैल्थ स्कीम में जा रहे हैं।...( व्यवधान) मैं कहना चाहता हूं कि आप हैल्थ की प्राब्लम देख लीजिए। ट्राइबल एरिया में आजकल जो पैथेटिक कंडीशन है, Ladakh should not be taken as Leh or Kargil town. हाल ही में हमारे एक हिस्टोरियन राइटर तिब्बत जाकर आए। उन्होंने यहां आकर किताब लिखी। उन्होंने जम्मू यूनीवर्सिटी में एक लैक्चर दिया। हमें बोला कि जब हम तिब्बत में ट्रेन से पहुंचे तो ऐसा लगता था कि हम यूरोप की किसी कंट्री में पहुंच गए। ...( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप कृपया अपनी बात समाप्त कीजिए।

…( व्यवधान)

श्री हसन खान (लद्दाख): लेकिन जब हम वहां से पचास किलोमीटर अंदर जाते हैं तो पहले से भी बदतर हालत होती है।...( व्यवधान) The same is the condition in our area.जो स्कीम यहां से गई हैं, उन्हें ग्राउंड लैवल पर देखा जाए। पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी जी ने भी बोला था कि हम यहां से जो देते हैं, वह नीचे कितना पहुंचता है। मेरी सबमिशन है कि इम्प्लीमैंटेशन को देखें, जियोग्राफिकल कंडीशन को देखकर इम्प्लीमैंट करें न कि छत्तीसगढ़ में जो होता है, वही लद्दाख में भी होता है, आदि।

                                                                                                   

* SHRI PREM DAS RAI (SIKKIM):  The Ministry may consider the Demand of the State Government of Sikkim to give seats in the Assembly by expanding the Assembly, to the Scheduled Tribes named Tamangs and Limboos. Furthermore, the Ministry may consider the following OBC category communities to be admitted in the Scheduled Tribe category. They are – Rais, Bhujels, Mangras, Gurungs, Sunumars. Incidentally all these erstwhile tribes are very much akin to the Limboos and Tamanags.

       

* Speech was laid on the Table     श्री हंसराज गं. अहीर (चन्द्रपुर):  सभापति महोदय, आपने मुझे जनजातीय मंत्रालय की अनुदान मांगों पर बोलने का मौका दिया, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं जनजातीय मंत्रालय की अनुदानों मांगों का समर्थन करता हूं।  देश के जंगलों और दूर-दराज क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी भाइयों के आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक विकास, स्वास्थ्य और रोजगार की जिम्मेदारी मैं सरकार की मानता हूं। यहां पर जो चर्चा हुई है, उसमें सभी दलों के लोगों ने बहुत अच्छी बात की है। इसमें बहुत अच्छे सुझाव आये हैं। मैं सरकार पर कुछ टीका-टिप्पणी करने के बजाय कहना चाहूंगा कि जनजातीय विकास मंत्रालय की स्थापना एनडीए सरकार के कार्यकाल में माननीय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय हुई थी, तभी से आदिवासी भाइयों को सही विकास की दिशा मिलने का प्रयास अच्छा हो रहा है। उनके आर्थिक उत्थान और समृद्धि के लिए हम सब मिलकर प्रयास कर रहे हैं। सरकार आदिवासियों के हित में जो भी कार्यक्रम बना रही है, यहां पर चर्चा हुई कि बजट में जो आर्थिक प्रावधान किया गया है, वह कम है। बजट में नौ करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले आदिवासी भाइयों के लिए3200करोड़ रुपये का प्रावधान कम है। सरकार को इस बारे में सोचना चाहिए। इस बजट को बढ़ाये बिना हम सभी क्षेत्रों जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और आदिवासी भाइयों के संस्कृति के जतन, रोजगार प्राप्ति और विकास के लिए इस धनराशि का पूरा उपयोग सही रूप से नहीं हो पायेगा। मैं पीने के पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि सभी क्षेत्रों में जहां पर आदिवासी भाइयों पर दुर्लक्ष्य हुआ है, उन सबके बारे में कहना चाहूंगा।मैंने एक बार लोक सभा में पीने के पानी के बारे में प्रश्न पूछा था, तो मंत्री जी ने मुझे कहा था कि 2 लाख16हजार गांवों की जनता को फ्लोराइड और क्षारयुक्त पानी पिलाते हैं। इसमें अधिक से अधिक आदिवासी गांव हैं जहां पर जनता ऐसा अशुद्ध पानी पीने से अपनी उम्र भी पूरी नहीं जीती। वे बीमारों जैसा जीवन जीते हैं और भरी जवानी में बूढ़े जैसे लगते हैं। मैं सरकार से विनती करूंगा कि कम से कम पीने का पानी स्वच्छ देने के लिए अधिक से अधिक प्रावधान किया जाता।

          मैं शिक्षा के बारे में भी कहना चाहता हूं। देश में शिक्षा का प्रमाण 62 परसेंट बताया जाता है, लेकिन 48 या50परसेंट से कम आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा का प्रमाण है और हम शिक्षा से वंचित हैं। हमें पूरी तरह से स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिलती हैं। पीएचसी या जो भी सेवा है, रुग्णों के लिए सेवा मिलनी चाहिए, वह नहीं मिलती है। वहां डाक्टर्स जाते नहीं हैं, दवाएं नहीं हैं। वहां हास्पिटल्स नहीं हैं, तो फिर हम आदिवासी भाइयों के लिए क्या करते हैं? आदिवासी भाई हमारे मतदाता हैं। आदिवासी देश के नागरिक हैं। इस क्षेत्र में हमें ज्यादा ध्यान देने के लिए शब्दों से, कागजों से कुछ नहीं होगा। जब तक हम उन्हें धनराशि नहीं देंगे तब तक इस क्षेत्र में काम नहीं होगा। मैं यूपीए सरकार को धन्यवाद दूंगा कि आपने एक जनजातीय विश्वविद्यालय की स्थापना की है। हमने तब भी कहा था कि जनजातीय विश्वविद्यालय बना है, इस क्षेत्र में हम परम्परागत पढ़ाई की बजाय तंत्र शिक्षा, स्वास्थ्य शिक्षा के लिए पहल करें। आदिवासी क्षेत्र में मेडिकल कालेज बनें, क्योंकि यहां उनको डाक्टर और दवाई कुछ भी नहीं मिलती है। अगर हम मेडिकल कालेज आदिवासी क्षेत्र में बनाते, तो शायद वहीं पर डाक्टर तैयार होते, वहीं पर सेवा करते। इस तरह आदिवासी भाइयों के स्वास्थ्य का ख्याल किया जाता। मैं आज भी यहां मांग करता हूं कि सरकार इस पर विचार करे। सरकार ने इसे माना नहीं है। मध्य प्रदेश के अमरकंटक में विश्वविद्यालय का मुख्यालय बनाया गया है, उसकी उप शाखा प्रत्येक राज्य में देने की बात की गयी थी। लेकिन अभी तक इस पर अमल नहीं हुआ है। इसका कहीं भी इम्प्लीमैंट नहीं हो रहा है। मैं चाहता हूं कि हर राज्य में आदिवासी विश्वविद्यालय का उपकेन्द्र बनाया जाये। इस विश्वविद्यालय का हर जगह प्रसार हो और इसका काम अच्छे तरीके से होना चाहिए। इसी तरह इंजीनियरिंग कालेज, आईआईटी, पोलीटेक्नीक अगर हम शहरों में ही बनाते रहेंगे, तो आदिवासी बच्चों को हम कब तंत्र शिक्षण देंगे, कुशल कारीगर कब बनायेंगे?अगर उनको रोजगार देना है, तो यहां सिर्फ भाषण देने से रोजगार नहीं मिलेगा। उनमें तकनीकी निर्माण करने की क्षमता के लिए हमें आईटीआई के प्रमाण अधिक से अधिक करने चाहिए। मेडिकल कालेज के साथ-साथ इंजीनियरिंग कालेज और पोलीटेक्नीक कालेज भी पहुंचना चाहिए। इसके लिए सरकार को कुछ सोचना चाहिए और प्रावधान भी करना चाहिए।

          सभापति महोदय, मैं बहुत ज्यादा न बोलकर केवल स्वास्थ्य के बारे में बताना चाहूंगा। देश में कुपोषित बच्चों की संख्या, महिलाओं में खून की कमी और पुरुषों में भी कुपोषण का प्रमाण जब डब्ल्यू एचओ ने दुनिया में जो रिपोर्ट सादर की और यूनीसेफ ने भी इस संबंध में जो रिपोर्ट दी, उसमें बताया गया है कि दुनिया में सबसे अधिकबच्चे कुपोषण से मरते हैं। उसमें सर्वाधिक बच्चे आदिवासियों के होते हैं। जिन महिलाओं में खून की कमी है, उसका प्रमाण आदिवासी क्षेत्र में सर्वाधिक है। इन सारी बातों को सोचते हुए हमने सरकारें चलायी हैं और सरकार चल रही है। लेकिन अभी तक सरकार ने इन नौ करोड़ आदिवासी भाइयों के लिए जिस तरह से प्रावधान करना चाहिए, जो कार्यक्रम बनाने चाहिए, वे नहीं बनाए हैं। मैं सरकार से विनती करूंगा कि आप बजट प्रावधान बढ़ाएं और उनके कल्याण के लिए अच्छे कार्यक्रम बनाकर उनका इम्प्लीमेंटेशन कराएं।

          मैं आदिवासियों की संस्कृति के बारे में कुछ बातें कहना चाहूंगा। देश की आजादी की जंग में कई आदिवासी नेताओं ने अपने जीवन का बलिदान दिया था। मैं जिस क्षेत्र से आता हूं, चन्द्रपुर गढ़चिरौली, वह भी आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है। वहां पर 1857 की जंग में कई आदिवासियों ने तांत्या टोपे तथा झांसी की रानी के नेतृत्व में युद्ध लड़ा था। उस समय वहां पर 100 से अधिक अंग्रेजों को उन्होंने अपने बलबूते पर मौत के घाट उतारा था। ऐसे आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी जगह-जगह पर हुए हैं और उनका अपना इतिहास भी रहा है। इसलिए मैं सरकार से विनती करूंगा कि ऐसे लोगों के लिए एक कार्यक्रम बनाया जाए।

                                                                                                             

श्री प्रदीप माझी (नवरंगपुर): सभापति महोदय, मैं वर्ष 2010-2011 के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय की अनुदानों की मांगों का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं। जैसा कि हम सभी जानते हैं और यह सर्वविदित है कि आदिवासी धरती और प्रकृति के पुत्र हैं। देश की स्वाधीनता से पहले और बाद में भी देश का निर्माण करने के लिए आदिवासियों ने बड़ा योगदान दिया है।

          सभापति जी, समयाभाव के कारण मैं दो मिनट में अपनी बात समाप्त करूंगा। आदिवासी इस देश में सदियों से जंगल और जमीन के लिए लड़ाई लड़ते आ रहे हैं। ग्लोबलाइजेशन, औद्योगिकरण, माइनिंग और शहरीकरण की वजह से उन्हें बेघर किया गया है। इस देश में शायद ही कोई ऐसा आदिवासी होगा जिसके ऊपर जंगल और जमीन हड़पने के नाम पर मुकदमा न चल रहा हो। सोनिया गांधी जी के मार्गदर्शन और प्रधान मंत्री जी के नेतृत्व में जंगल जमीन अधिकार अधिनियम जो पास किया गया है, उससे आदिवासियों में बहुत बड़ा बदलाव आया है। इसलिए मैं देश के सारे आदिवासियों की ओर से सरकार का बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं।

          मैं एक बात और कहना चाहता हूं कि इस देश में जो आदिवासी इलाके हैं, वे नक्सलवाद की चपेट में आ गए हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि देश की प्रगति का उजाला आदिवासियों के गांवों तक नहीं पहुंच पाया। उड़ीसा के बलांगीर जिले में चावरीपाली गांव में दो-तीन परिवारों को छोड़कर शेष सभी आदिवासी परिवार रहते हैं। सितम्बर 2009 में उस गांव के एक परिवार के पांच लोग एक महीने के अंदर अनाहार से मर गए। वे सारे आदिवासी थे। जब इस बात की जांच की गई तो पता चला कि उस घर का मुखिया झिंटु बोरैया, जो एक आदिवासी है, उसके नाम पर काफी समय पहले सन् 2000 से बीपीएल राशन कार्ड इश्यू हुआ था, लेकिन 2009 तक उसके पास नहीं पहुंच पाया। यह है उड़ीसा राज्य सरकार का काम और इस तरह वह भूख से मर गया। केन्द्र सरकार राज्य सरकार को आदिवासियों की भलाई के लिए काफी पैसा देती है, लेकिन राज्य सरकार की लापरवाही के कारण आदिवासियों की आज तक उन्नति नहीं हो पाई।

          मैं एक और बात कहना चाहूंगा। यहां पर चिदम्बरम जी मौजूद हैं। मेरे क्षेत्र में मल्कानगिरी जिला आता है, जो नक्सलवाद से प्रभावित है। केन्द्र सरकार मल्कानगिरी जिले में नरेगा में, बीआरजीएफ में, आईटीडीए के तहत काफी पैसा भेजा। मैं एक छोटा सा उदाहरण देना चाहता हूं कि केन्द्रीय सरकार के पैसे को राज्य सरकार ने कैसे मजाक बनाकर रख दिया। नरेगा योजना आदिवासियों के पेट भरने के लिए है। लेकिन जब मैंने वहां पर जाकर देखा, आप भी जांच करके देख लें, इस योजना के तहत 157 कांफ्रेंस हाल बनाए गए हैं, पंचायतों में। इस तरह से केन्द्र सरकार के पैसा का मजाक बनाया गया है। मल्कानगिरी जिले में बीआरजीएफ में सेंट्रल असिस्टेंस स्कीम के तहत जो पैसा जाता है, चार करोड़ रुपए में एक बहुत बड़ा स्टेडियम बनाया गया है। वहां पर एक एस.एच.जी. प्रशिक्षण सेंटर बनाया गया है, ऐसा सेंटर दिल्ली सरकार के पास भी नहीं होगा, कम से कम पांच करोड़ रुपए की लागत से बनाया गया है।   इस तरह से राज्य सरकारें केन्द्र सरकार के पैसे को लूटती हैं और वहां पर स्कीमों का मजाक बनाकर रखा है। इसीलिए मलकानगिरी में आदिवासी लोग बंदूक उठाकर नक्सलियों का साथ दे रहे हैं। मेरा आपसे निवेदन है कि ऐसा कोई मैकेनिज्म बनाया जाए कि जहां राज्य सरकार पहुंचना नहीं चाहती है, उस जगह पर केन्द्र सरकार सीधा आदिवासियों के साथ खड़ी हो। नहीं तो राज्य सरकारें खुद भी डूबेंगी और हमें भी साथ लेकर डूबेंगी। इस तरह की परिस्थिति आज आदिवासी इलाकों की हो रही है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

                                                                                                                                         

*DR. PULIN BIHARI BASKE (JHARGRAM): Respected Deputy Speaker Sir, today when we are discussing the Demand for Grant under the Ministry of Tribal Affairs, I thought that I would speak in Santhali language, because I belong to the tribal community and my mother tongue is Santhali. I have given a notice though I know that there is no Interpreter for Santhali language.  Next time I will speak in Santhali language. … (Interruptions) I know there is no Interpreter.  Therefore I am now speaking in Bengali. … (Interruptions)On behalf of my party CPI(M), my previous Speaker has mentioned most of the points and I would like to add a few more.  The tribe of ‘Deshowali maji’ has to be given recognition by the Central Government.  The State Government has already sent the recommendation for it through CRI Report. The ‘Bagal’ community has also to be included in the tribal list.  In 2002, the Parliament of India has recognized Santhali language but to date, the budgetary allocation for development of the same has not been made. There is no mechanism to promote this language. What is the use of passing the legislation in this august House?

          Often the tribal people are regarded as forest dwellers – this is not proper. All tribals are not forest dwellers whereas all forest dwellers are not tribals.  This has to be understood.  Therefore I want to remind everyone that the tribals have shed their blood during the freedom struggle of India.  The Santhals have sacrificed their lives for the independence of the country.  Hon. Arjun Mundaji was mentioning that in 1855, Santhal leaders like Sidhu-Kanu, Chand, Bhairab had fought valiantly against the British regime.  About 30,000 tribal people had laid down their lives in the uprising. Do we ever see any status of those great leaders in and around the Parliament complex? There is a statue of Birsa Munda of course but had there been statues of Sidhu-Kanu also, we would have been very proud.  These men had clashed bravely with the Britishers.  Hon. UPA chairperson Sonia Gandhi is present here.  I request her to consider the issue of unveiling their statues within the Parliament premises.

          We all know that in West Bengal, land reform measures have been carried out successfully.  More than 11 lakh acres of land have been distributed among poor peasants and through operation Barga a huge portion of land had been given to the SC and ST people.  Where the SC population in the state is 18%, 55% of the land has been earmarked for them and where the population of ST is 6%, 50% of the land was set apart.  There has been an allegation of starvation death but no starvation death has taken place in Lalgarh,  Hon. Home Minister is present here.  He had visited Lalgarh.  Has he witnessed any agitation against starvation deaths?  When I was the district chairman, the Amlashole incident had occurred. I had gone to every Lodha family, every Sabar-Kheria household. They are the primitive tribes who are about 5000 in number.  I know them very well.  Scarcity of food was not the reason behind their deaths.  Actually, excessive alcoholism was the cause of the tragedy. They have a habit of consuming alcohol which had an adverse effect on their health after which timely medical help was not available.  Thus they had succumbed.   This incident was being shown in a different light.  False information was spread by the media.  We oppose this kind of misrepresentation of facts.

          I want to also mention that the tribal people who have been displaced from their land have not been paid adequate compensation though twenty long years have passed.  The Tribal Atrocity Act has already been passed, but no where the tribal people are safe.  They are tortured,  harassed, suppressed and subdued.  Various reports of ill-treatment are pouring in. Hon. Minister is sitting here.  I urge upon him to seriously address this problem.

          Lastly I want to say that the budgetary allocation for the development of tribal areas should be adequately augmented so that these poor, hapless people of our country get their due share and are able to live with dignity and peace.  Due to paucity of time, I would like to conclude my speech with the hope that respected Minister will try to solve the problems of our people in right earnest.

   

MR. CHAIRMAN: There should not be a wrong impression in the House.  Shri Birsa Munda ji’s statue is there in the Parliament’s precincts, near Gate No.7.  Please do not make this kind of references very contrary to the facts.

          Now, Shri B. Mahtab. Please be brief.

     

SHRI B. MAHTAB (CUTTACK): Mr. Chairman, Sir, I thank you for allowing me to participate in the discussion on the Demand for Grant in respect of the Ministry of Tribal Affairs.

          Firstly, I would like to remember the great martyr of Orissa and India, the tribal martyr, Saheed Laxman Nayak, who sacrificed his life and who was hanged till death and who had participated in the Quit India Movement.  He was a tribal leader from Mathili, Orissa, and the hon. Members Shri Pradeep Majhi and Shri Pangi represent that undivided Koraput district. He led a non-violent agitation against the British Raj.  He was hanged till death, we still remember it. 

          The Orissa Government has sent a proposal.  Let us commemorate him by putting a statute of Saheed Laxman Nayak though a decision has been taken by the Statue Committee of this Parliament in this regard.

          Every year we commemorate his martyrdom.  But he was the loan martyr in the Quit India Movement.  He was convicted by the British and he was hanged till death in Berhampur jail.

          I also want to remember the agitation the tribals led in Bonai Sub-Division of Sundargarh district, which is represented by Shri Hemanand Biswal, who initiated the discussion today.  It is called ‘Amco-Simco agitation’, where seven hundred and odd tribals were butchered, killed.  It is called the ‘Second Jallian Wala Bagh’ situation which occurred in 1943.  The Britishers wanted to recruit the tribals for the Second World War, and these people had resisted it.  Ms. Frida Topno, who was, at one point of time, representing that seat of Sundargarh was organizing that Amco-Simco Commemoration Day.  I think, these two incidents should be in postal stamp and in different other aspects.  These are national events.  These are not sporadic agitations.  These are national events and should be treated in that manner. 

 

          I am also reminded of the day of our first Prime Minister, Pandit Jawaharlal Nehru, who wanted to lay the foundation of Rourkela Steel Plant.  The only demand of the tribal leaders of that area was that let the Prime Minister make a request to them personally, to which the then Prime Minister very candidly agreed to, went to them and met them.  That was his first job to do.  That is how, in 1958 he laid the foundation for the Rourkela Steel Plant.

          I remember, I heard it myself from Mrs. Indira Gandhi. She said, “Whenever you make a programme to Odissa, please see that I visit a tribal area; I visit a tribal village.” That is how, the leadership of this country has always wanted to embrace the marginalised sections of our society. Tribals have been marginalised. They have been pushed back to the forests. They have been pushed back to the frontiers.

          But I remember the day when Asiad Games came up in 1982. A lot of discussion went on. Sports hostel came up. After 20-25 years, we see the blossoming of the tribal youths. Two tribal youths of Rourkela became captains of Indian Hockey Team. We have to invest in that. I had been to Leh. The tribal youths, the girls and boys, are best in Archery. Why cannot we develop that in a greater way? Why cannot we involve the tribal youths, the girls and boys, in the sports activities and invest in that? I think the Tribal Affairs Ministry, taking the Sports Ministry along with them, can do a lot of work.

          I have certain suggestions to make here. Before concluding, I would come to the problems which are actually confronting the society, this nation, which the Prime Minister had very well--of which Mr. Vijay Bahadur Singh has also mentioned-- in his speech said towards December, 2009. Now, I am also reminded of Jaipal Singh. He had prophetically mentioned this in early 50s. “Civilisation started from forests. Then, it came down to the river valley. That is how the civilisation blossomed. Again, with the industrial revolution, civilisation is going back to the forests." Now, the conflict is there. That is how, Jaipal Singh, the famous tribal leader of this independent India, had prophetically mentioned in the late 40s and early 50s in this House and also in the Constituent Assembly.

MR. CHAIRMAN: Please try to summarise.

SHRI B. MAHTAB: And here I would mention that the Odissa Tribal Advisory Committee has recommended that Jodia, NT Dora and Nuka Dora are the three tribes which are to be recognized. Of course, the Home Ministry is going to take it up. That suggestion is pending. They should include them in the Scheduled Tribe List, and it should be taken up expeditiously.

          Another problem, which is confronting the Scheduled Tribe people of our State and it must be happening in different States, is that we have a restriction that tribals cannot sell their land to any non-tribals. This is creating a problem. I am not in favour of doing away with that. But banks are not providing funds. I think the Finance Minister in his own capacity and in his own way can impress upon the commercial banks. They can also make a review of it as to how many tribals are actually benefiting from the public sector banks in that respect.

          Limited record of right is being provided to the forest dwellers, specially the Scheduled Tribe people and now the banks should come forward to provide funds to the tribals.

          Eleven EMRs—this is an innovative scheme which started last year—are functioning in Odissa, which are imparting qualitative education in the tribal blocks. There is a need to sanction and release—this is a suggestion which the State Government has given—another 30 EMRs as well as one for each remaining 102 tribal blocks in the scheduled area. That can be done in a phased manner.

          The proposal for providing 140 Scheduled Tribe Girls Hostels is pending. Sir, 58 are to be established in Koraput district and 82 in Mayurbhanj district. These two districts are two extremes of Odissa. Why our Government is insisting on girls is that if you educate a girl, the whole family gets educated, which we have been hearing all the time. Here, a number of girls hostel and girls school have come up in Odissa.

MR. CHAIRMAN: Mahtab Ji, please wind up.

SHRI B. MAHTAB: I want to bring one more thing to their notice because very rarely we discuss this subject.

There is a Bonda tribe which lives on the hills. There is no communication with them; they live a very secluded life. Very recently, I think three years back, some girls were brought down to the place. They were educated. They passed the High School Certificate Examination. Around 16 of them were girls. They came to Bhubaneswar to meet the Chief Minister. The Chief Minister very candidly asked them ‘what do you want to be in your life’. Three girls from them told ‘we want to be educated, pass our bachelor’s degree, have training in B.Ed.,  go back to our tribe and educate more number of people from our community’. That is the spirit which the girls have. I think it is necessary that we should give more support to this type of activities in tribal areas and in scheduled areas.

          I would like to draw the attention of the hon. Minister of Tribal Affairs to another point. The post-metric scholarship in respect of Group-III and IV needs to be enhanced up to pre-metric level at least. The income criterion that has been mentioned is as follows. You have ST (Post-metric) which is Rs.1.08 lakh; SC (Post-metric) is Rs.1 lakh; OBC (Post-metric) is Rs.44,500; Minority (Post-metric) is Rs.2 lakh. I would request the Finance Minister and Leader of the House who is present here and also the Minister of Tribal Affairs to pursue this, so that it becomes at par with the minority as it will be of great help.

          52 Ashram Schools are under construction in Orissa. You have released some money. Rs.25.20 crore have been released last year. The total project cost is Rs.45.25 crore. Another Rs.20 crore should be released this year, so that we will be able to complete this.

          I come to the last aspect. This problem is confronting not only the Government, but also the nation as a whole. The Prime Minister has constituted a Committee on State Agrarian Relations and the unfinished task in land reforms in January 2008. The Committee has stated that the tribals have been the biggest victims of displacement due to development projects. Though they are just nine per cent of the population, the tribal communities have contributed over 40 per cent of the total land acquired so far. This is the problem. It is not a problem which can be settled by one party or one Government or different State Governments. We have to go in for development. At the same time, we have to protect the indigenous character of each community. We have to bring in a settlement so that development can occur, progress can occur. At the same time, the indigenous character of each community also will be protected.

          I think there will be another time when we discuss this problem. I think then we will get better suggestions as this is the biggest Panchayat of the country where we can sit and discuss.

श्री रघुवीर सिंह मीणा (उदयपुर): सभापति महोदय, आपने मुझे इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। मुझे इस बात का गर्व हैं कि आज मैं पहली बार सदन में बोल रहा हूं और इससे ज्यादा खुशी की बात यह है कि मैं गरीब की झोंपड़ी में पैदा हुआ और लोकतंत्र की पहली सीढ़ी पर पांव रखा, सरपंच बना, दूसरी सीढ़ी पर पांव रखा, एमएलए बना और अब एम.पी. बनकर यहां आया हूं, आप सबकी कृपा है। मैं राजस्थान के सबसे पिछड़े इलाके उदयपुर संभाग से आता हूं, जो आदिवासी बाहुल्य और जनजातीय उपयोजना क्षेत्र है। राजस्थान की ट्राइबल पापुलेशन 71 लाख में से 31 लाख लोग वहां रहते हैं और 23 पंचायत समितियों डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, सिरोही का थोड़ा पार्ट और प्रतापगढ़ आदि को मिलाकर45 परसैन्ट ट्राइबल्स वहां रहते हैं।

          महोदय, मूल बात यह है कि हम कोई बात कहें तो यहां कोई कहता है कि यह स्टेट गवर्नमैन्ट का मामला है, कोई कहता है कि सैंट्रल गवर्नमैन्ट का मामला है। परंतु हमें सही बात सुननी है और उसका हल कैसे निकालना है, यह मैं आपके सामने रखना चाहता हूं।

          आज देश को आजाद हुए 62 साल हो गये हैं और वहां की 45 लाख की जनसंख्या में से मात्र एक आई.ए.एस. बना है और वह भी प्रमोटी, एक आई.पी.एस. बना, वह भी प्रमोटी और मात्र दो आरएएस स्टेट सर्विस में बने हैं। वहां का एजुकेशन का स्तर, आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्थिति क्या हो सकती है, हम इससे कल्पना कर सकते हैं। वहां के लोग बहुत आदर करते हैं। हिन्दुस्तान में चाहे वह कहीं का भी ट्राइबल हो, वह बहुत स्वामीभक्त होता है। वह बहुत शालीन, शर्मीला और एकान्तप्रिय होता है। वह अपने स्वामी के कारण अपने भाई का भी खून कर सकता है, लेकिन अपने स्वामी की रक्षा करता है। हम उदाहरण के तौर पर मानगढ़ धाम ले लें, जहां पर करीब दो हजार से ज्यादा आदिवासी बच्चे, बच्चियां, औरतें, आदमी, अंग्रेजों के जमाने में मर गये थे। वे गोलियों के शिकार हुए थे। हम आज जलियां वाला बाग को याद करते हैं, हम मानगढ़ धाम को याद तो करते हैं, लेकिन वह इतिहास में कहीं नजर नहीं आता है। इसी तरह से कई ऐसी एतिहासिक जगहें हैं, जहां ट्राइबलों का इतिहास है। हमें इन सबको याद भी करना है।

          महोदय, समय कम है इसलिए मैं मूल बात पर आ जाता हूं। मैं तीन जिलों, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर का उदाहरण दूं, यह माइनिंग का क्षेत्र है, यहां पर एक हजार तेरह खाने हैं। इनमें से नौ माइन्स ट्राइबलों की हैं। उसमें से करीब 34 खानें सैंडस्टोन, चूने के पत्थर की हैं। मेरे कहने का मतलब यह है कि हमें ट्राइबल से मजदूरी करानी है, परन्तु उसके साथ-साथ उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए बैंको से लोन दिलाकर उसे खड़ा करना पड़ेगा, माइनिंग भी एलॉट करनी पड़ेगी, उसे पैसा भी देना पड़ेगा। हम माइन्स आज दे दें, लेकिन बैंक उसे पैसा न दे, लोन न दे तो वह अपने पांव पर खड़ा नहीं हो सकता है।

          महोदय, मैं शिक्षा के क्षेत्र में आपको बताता हूं। यूनिवर्सिटी उदयपुर में 237शिक्षक हैं, इनमें लैक्चरर, एसोसिएट प्रोफेसर, प्रोफेसर में से एक भी ट्राइबल नहीं है। हम 62 साल में एक लैक्चरर तक पैदा नहीं कर पाये हैं। यह कहीं न कहीं भेदभाव हो रहा है। मैं कोई आरोप नहीं लगा रहा हूं। लोकल लेवल पर कहीं न कहीं भेदभाव हो रहा है। अभी तीन-चार दिन पहले पीएचडी के लिए प्रवेश परीक्षा हुई थी। 39 ट्राइबल बच्चों ने परीक्षा दी थी, लेकिन एक भी पास नहीं हुआ। इसका क्या कारण है?वहां लोकल समस्याएं हैं, इन समस्याओं को यह विभाग संभाले या हम सब संभालें। हमारे आदरणीय सिब्बल साहब विराजे हुए हैं, थोड़े दिन पहले मैं स्वयं इनके पास एक समस्या लेकर गया था। हमारे दो हजार बच्चे पीटीइटी (PTET)में पास हुए थे, जिनकी 25-25 हजार रूपये फीस भी जमा हो गयी। एक साल हो गया है, लेकिन उन्हें कॉलेज एलॉट नहीं हुआ है। मैंने आपसे भी रिक्वेस्ट की थी और एनसीटीई(NCTE) के चेयरमैन से भी निवेदन किया था। ऐसी स्थिति में बच्चे 80 दिन तक डूंगरपुर कलक्ट्रेट के बाहर धरने पर बैठे रहे और इसके अलावा दो बार नेशनल हाईवे जाम किया। अगर हम इनकी समस्याओं को नहीं सुनेंगे तो आने वाला समय हमारे लिए ठीक नहीं होगा। हमारा पूरा देश नक्सलवाद से जूझ रहा है और इस पर काबू पाने के लिए हम सबका कर्त्तव्य है कि हम उन्हें सुनें और उनकी समस्या को कैसे हल कर सकें। वन टाइम बैनीफिट देकर भी हम कैसे उन मामलों को सुलटा सकते हैं। चाहे माही का बैकवाटर हो, कडाना का बैकवाटर हो, उससे हजारों की संख्या में ट्राइबल बेघर हो गये, उन्हें आज तक कहीं भी जमीन एलॉट नहीं हुई है। ये ज्वलंत इश्यू हैं और इन्हें ध्यान में रखने की आवश्यकता है। जो पिछली सरकार राजस्थान की थी, उन्होंने जो आबकारी नीति ट्राइबल सब प्लान इलाके में लागू की, उसमेंभारत सरकार के टैम्परेंस प्रोग्राम का उल्लंघन किया। आजादी के बाद से अब तक कभी भी अंग्रेजी शराब की दुकान ट्राइबल सब प्लान इलाके में नहीं थी। वहां सिर्फ जीएसएम (गंगा नगर शुगर मिल)की दुकानें थीं। वे पूरे इलाके में केवल 69 दुकाने थीं। इनसे ट्राइबल अपने कल्चर के मुताबिक कुछ सस्ती देशी दारू लाकर अपने रीति-रिवाज को निभाते थे। वसुंधरा जी के राज में वहां चाय की दुकानों की तरह हर जगह, पूरे ट्राइबल इलाके में दुकानें खोल दीं और ट्राइबल को बर्बाद कर दिया।

          इसके अतिरिक्त मैं आपसे निवेदन करना चाहूँगा कि बहुत सारे इश्यूज़ ऐसे हैं जैसे बीपीएल का है। आदिवासी इलाकों में जो नार्म्स हैं कि दो समय खाना खाते हैं या नहीं, दो जोड़ी कपड़े हैं या नहीं, बच्चों पढ़ाते हैं या नहीं, घर में पंखा है या नहीं, ट्राइबल के घर में पंखा नहीं होगा, पर फिर भी जाने अनजाने में उसके नंबर ज्यादा हो जाते हैं, इस कारण कई लोग ऐसे हैं जो जनजातीय क्षेत्रों में बीपीएल से हट गए हैं। चाहे सर्विस वाला हो, चाहे ज्यादा जमीन वाला हो, उसे हटा दें, बाकी सबको जोड़ने की आवश्यकता है। ट्राइबल सब-प्लान इलाके के एक्सटेंशन के लिए भी प्रस्ताव केन्द्र सरकार के पास पड़ा है। नाथद्वारा है, वल्लभनगर, गोगुन्दा, मावली है, ये कुछ ऐसे इलाके हैं जहाँ ट्राइबल्स बहुत संख्या में हैं पर वे किसी भी तरह से बैनिफिट नहीं उठा पाते। इसलिए हमें निश्चित तौर पर इसे ट्राइबल सब प्लान इलाके में जुड़वाना चाहिए ताकि वहाँ के लोगों को भी बैनिफिट मिल सके। समय कम है और मैं आपकी भावना समझ भी रहा हूँ। आपने मुझे बोलने का मौका दिया, मैं इसके लिए आपका धन्यवाद करता हूँ।  मैं निवेदन करना चाहता हूँ, हालांकि विषय तो राज्य सरकार का है, लेकिन मंत्री जी चूँकि इस विभाग के हैं और देश में 22 शैडय़ूल्ड एरियाज़ हैं और दो यूटी हैं। यूटी तो होम मिनिस्ट्री के अंडर आती हैं। 22 जगह हैं जहाँ आप साल में एक एक बार जाइए और मीटिंग लीजिए तथा निगरानी रखिये कि विभाग में क्या हो रहा है। मेरे पास कहने के लिए बहुत कुछ था लेकिन इतना समय नहीं है। मैं आपकी भावना को समझते हुए सदन का समय बचाते हुए अपनी बात समाप्त करता हूँ।

                                                                                                     

MR. CHAIRMAN: Shri Kodikkunnil Suresh is to speak now.

Shri Suresh, you have many suggestions. It is better to lay your speech on the Table. That will be fully attended to.

SHRI KODIKKUNNIL SURESH (MAVELIKKARA): Yes, Sir.

          Due to time constraint, I am going to lay it on the Table.

MR. CHAIRMAN: Thank you.

श्री राजाराम पाल (अकबरपुर): सभापति महोदय, मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया। मैंने सत्ता पक्ष और विपक्ष के आदरणीय मुंडा जी तथा सभी सम्मानित सदस्यों के विचार सुने हैं। पूरा सदन इस बात से चिन्तित है कि कैसे इस देश के समाज के आखिरी पंक्ति में खड़े लोगों की बेहतरी हो सके। सारे सदन से एक ही बात छनकर आ रही है कि इंप्लीमैंटेशन में गड़बड़ी है। यह तो संविधान निर्माताओं की बात सही हो गई कि किसी देश का संविधान कितना बढ़िया क्यों न हो, कानून कितना बढ़िया क्यों न हो, अगर लागू करने वाले की नीयत ठीक नहीं है तो संविधान बेकार साबित होगा। सारे सदन के लोग कहते हैं, हमारे सत्ता पक्ष के लोग भी कहते हैं कि हम पानी तो भेज रहे हैं लेकिन तेल तक पहुँच नहीं रहा। तो तेल तक पानी पहुँचाने की किसकी ज़िम्मेदारी है?

          महोदय, आज उन लोगों की बातें तो सबने कही हैं, लेकिन मैं उनसे हटकर इस देश में उन 12-14करोड़ लोगों की बात कर रहा हूँ जो आज देश की किसी भी धारा में नहीं हैं। न वे एस.सी. में हैं, न एस.टी. में हैं, न ओबीसी में हैं, फिर भी वे इस देश में अपने को इंडियन्स कहते हैं, फिर भी वे अपने को हिन्दू कहते हैं। वे कौन से लोग हैं -वे लोग जो साँप दिखा रहे हैं,  जो बंदर नचा रहे हैं, जो भालू नचा रहे हैं, जो रस्सी पर चढ़ रहे हैं, जो भेड़ें चरा रहे हैं। ये ऐसे ट्राइबल लोग हैं जो राणा प्रताप के खानदान के अपने को कहते हैं लेकिन खुरपी और हँसिया बना रहे हैं, 63 साल की आज़ादी के बाद भी जिनके पास आज तक राशन कार्ड जैसी कोई चीज नहीं है, वोटर लिस्ट में नाम का सवाल ही नहीं होता। आज वे कुँए से पानी इसलिए नहीं खींचते, दीपक इसलिए नहीं जलाते कि जब तक हमारा राजपाट वापस नहीं आएगा, तब तक हम कुँए से पानी नहीं निकालेंगे, तब तक दीपक नहीं जलाएँगे। लोकतंत्र स्थापित होने के 62साल के बाद भी इस सरकार का इस देश के किसी भी वर्ग का, चाहे वे रामराज्य वाले हों या इधर वाले हों, किसी का ध्यानउन लगभग 12-13 करोड़ लोगों पर नहीं गया। यहाँ सम्मानित और आदरणीय यूपीए चेयरपरसन भी बैठी हैं। मैं कहना चाहता हूँ कि कांग्रेस का एक ही एजेन्डा है, कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ। वे कौन से आम आदमी हैं जिनके पैरों में चप्पल नहीं हैं, शरीर पर कपड़ा नहीं है, पेट में भोजन नहीं है। हमारे जैसे लोगों के पास आने तक के पैसे नहीं, अपनी समस्या कहने के लिए शब्द नहीं। उन आम आदमियों की चिन्ता अगर किसी को इस सदन में है तो आदरणीय यूपीए चेयरपरसन सम्मानित सोनिया गांधी जी को है, कांग्रेस को है। मैं सम्मानित सदस्यों से कहना चाहता हूँ कि केवल एक ही बात पकेर चिन्तन करना चाहिए। बात 3200करोड़ रुपये की नहीं है। चाहे 6500 करोड़ रुपये इन जनजातीय लोगों के लिए आबंटित कर दिये जाएँ लेकिन अगर इंप्लीमैंटेशन ठीक से नहीं होगा तो ये रुपये भी बेकार साबित होंगे। प्रत्येक विभाग में जब भी चर्चा होती है तो केवल एक ही बात की होती है कि बजट एलोकेशन तो ठीक हुआ है लेकिन इंप्लीमैंटेशन सही नहीं हो रहा है। मैं तो एक ही बात कहने आया हूँ कि जिम्मेदारी यूपीए सरकार की है कि वह देखे कि कहां कहां छेद हैं जो उस आम आदमी के पास जिसके लिए हम काम करने के लिए बैठे हैं, जिनकी चिन्ता हम इस सदन में कर रहे हैं।        आखिर वह उन तक क्यों नहीं पहुंच रहा है, इस पर चिंतन करने की आवश्यकता है। जिनकी बात मैंने की है, उनकी बात 62 साल की आजादी में किसी ने नहीं की है, उनको चिन्हित किया जाए, जो आपको भेड़ें चराते मिलेंगे, जो आपको बंदर और भालू चराते मिलेंगे, उनको भी इस देश की मुख्यधारा में लाने के लिए उनके आवास की सुविधा, उनकी वोटर लिस्ट से पहचान कर, राशन कार्ड देकर, इस देश की मुख्यधारा में  लाने का काम किया जाए, ताकि उनके बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की जाए, ताकि वह अपने को भारतीय कह सकें। वे अपने को हिन्दू कहते हैं, नहीं तो उन्हें तो अब तक क्रिश्चियन अथवा मुस्लिम हो जाना चाहिए। मैं यूपीए सरकार से चाहूंगा कि ऐसे लोगों के लिए आयोग बनाया जाए, जो कि वास्तव में ट्राइबल हैं। केवल जंगलों की चिंता करने से काम नहीं चलेगा, इन 12-13 करोड़ लोगों की चिंता भी हम लोगों को करनी चाहिए। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

     

* SHRI KODIKKUNNIL SURESH (MAVELIKKARA): Firstly, I would like to congratulate our hon. Prime Minister, Dr. Manmohan Singh; Madam Sonia Gandhi, the Chairperson of the UPA, for achieving great development in the tribals inhabited areas of our country. The people of our country have great expectations from the present UP A Government, and I am sure that we will rise to the occasion and take all possible steps / measures to fulfill the hope and aspiration of the people of our country.

There are various challenges that are staring right into our face as we are living in the second decade of the 21st Century. I will not deal with all of the issues or challenges that are being faced by the people, especially, the tribal people of our country for paucity of time at my disposal, but I would like to flag a couple of those issues that are of immediate concern to them including some issues concerning my State of Kerala.

As the august gathering is aware that the Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act was a revolutionary piece of forest legislation brought by the UPA-One Government in 2006. I congratulate the hon. Prime Minister and the Chairperson of the UPA Madam Sonia ji who have provided this historic legislation for the welfare and development of the tribals in this country. The law concerns the rights of forest-dwelling communities to land and other resources, which has been denied to them over decades. Many of the States have implemented it for the welfare of the tribal people living there, but the present Left Government in Kerala has not effectively   * Speech was laid on the Table   implemented it in the State of Kerala and the tribals living there have not been benefited from this Act even today.  The attitude of treating the forest dwellers as encroachers has changed with the introduction of this Act as'the Adivasi forest I dwellers got permanent rights for the land and prominent place in the society. It was estimated that lakh of lakh tribal people at the National level are going to be benefited by this legislation. It was also estimated that nearly 13,500 families in Kerala would get benefited from this piece of legislation. Even though this Act has come into effect, but still 1/3rd of the tribal people living in the forest land have not got possession of the land in many of the States. The same is the case in Kerala also.

The Act provides that the Gram Sabha will initially pass a resolution recommending which land belone to whom; how much land was under the cultivation of each person as on Dec 13, 2005; etc., but the Gram Sabhas are not being recognized in many of the States. Further, the Adivasis living in these forest lands were given the right to protect the forests and wildlife. However,' we find that the forest Department finds out ways to bend the rules and the forest dwellers are not given the responsibility to protect the forests and wildlife.

The Provisions of the Panchayats (Extension to the Scheduled Areas) Act that was brought in 1996 should be implemented in its letter and spirit and steps should be taken for this purpose by the Central Government to ensure that it becomes a reality, which was brought by late Shri Rajiv Gandhi, I would like to mention that this Act has not come into existence, especially, in States like Kerala, West Bengal, Tamil Nadu, etc. I would like to say that the landless tribals should be rehabilitated properly. The Government of Kerala under the leadership of then Chief Minister Shri A. K. Antony brought the Tribal Rehabilitation Mission, which is a role model as those who do not have land are provided land and development work is ensured. As per the records, 52,000 landless Adivasis are there in Kerala. The Government run under the leadership of Shri A. K. Antony in 2001 provided land to about 8,000 plus families, in the first phase, the then Government requested the Centre to release 14,000 acres of forest land, and the Ministry of Environment and Forests agreed to release 14,000 acres of land. But it is unfortunate that the Governments that came to power after Shri A. K. Antony's Government in Kerala did not follow up the matter. Hence, the land was not released and given to the Adivasis. Further, 7,500 acres of Aaraiam Farm located in Kannur District of Kerala was bought by then State Government at Rs. 42 crore from the Central Government. Out of this, 2,500 acres of land was distributed by Shri A. K. Antony's Government. As regards the rest of the land, the present Government has not agreed to distribute it. They are using it for other purposes by forming a company. The Adivasis were not tempted to fall into the trap of the Naxalites as a result of the steps taken by Shri A. K. Antony's Government during that time for their welfare.

The steps taken by Shri A. K. Antony's Government in Kerala also discouraged the prospering of Naxalism in Kerala. For example, 300 Adivasi youths were specially recruited as forest guards. This also restricted the prospering of Naxalism in Kerala. Announcement was also made for distribution of land to Adivasis in Chinnacanal in Idukki District, Sugandhagiri in Way an ad District, and Keniyotamalla areas in Kollam District. Therefore, I would request that the land should be immediately given to the affected people, and the Central Government should take effective steps in this direction.

Further, in important areas like providing education, agricultural development, stopping of encroachment, etc. rules should be framed for the welfare of the Adivasis. I feel that special education package is needed for their upliftment. The scope of the residential schools and hostels being run in Kerala for the Adivasi students  should be  expanded  so that  more  tribal people  are benefited by it. A Centre of Excellence should be given importance for the Adivasis to do well in the field of higher education. The number of students enrolling in the professional courses is too less. Hence, SC and ST students should be provided education in higher education institutions. I would like to demand that a Central University for SCs and STs should be established.

As regards the agriculture sector, special agricultural packages should be there. The Adivasis should also be benefited by the MGNREGA. They should be given special package and they should get the wages immediately.

The atrocities committed on the Adivasis should be stopped immediately, and I would say that strict laws should be formed to restrict it. I would like to demand that a National Commission for the Adivasis should be appointed to tackle or solve the problems being faced by the Advasis on war footing. A lot of atrocities are committed by the officers of various State Government Departments. For example, the officers of the Forest Department harass them by falsely implicating them in petty cases or they do not allow the Adivasi people to fetch drinking water from there, etc. The Central Government should take some strong steps to stop such kind of atrocities on them.

I would like to suggest that the Adivasis could cultivate land or agricultural purposes and earn income for themselves by doing it in joint venture with various other agencies of the State Government. For example, the Rubber Board and the Tribal Department could come together and have rubber plantations for the Adivasis having land in Kerala. The remuneration generated from the rubber that is produced from the plantation could then be forwarded or given to these Adivasis. Similarly, it can be done for other cultivations like tea, coffee, etc., and it would go a long way in helping the Adivasis.

There should be a special recruitment drive to recruit Adivasis in the Forest Department as guards, watchers, clerks, etc. The Adivasi officers presently working in the Forest Department should be given proper training so that they are qualified enough to be considered for higher posts like DFO, CFO, etc. As regards the health sector, NRHM should help in building hospitals in the areas inhabited by the Adivasis; doctors should be there to treat them; and medicines should also be provided to them to resolve their health related problems. As of now, proper treatment or medical facility is not provided to the Adivasis who suffer from diseases such as cancer, heart ailments, etc. 1 would demand that urgent steps should be taken by the Central Government to resolve these issues of the Adivasis.

The funds provided by the Central Government for the welfare of the tribal people are not being effectively utilized as the funds are being diverted. The funds released for the tribal people do not actually reach them as the middlemen take the major portion of it for themselves. There are schemes formulated by the Central Government as well as the various State Governments, but the tribal people are still starving; suffering from various diseases; they do not get proper education; their health condition is also very poor; there is harassment of women taking place; there are reports n of police inaction in those places that are inhabited by the tribal people. The various agencies of the State Government are not able to monitor the things. The officers who are found guilty of not allowing the appropriate utilization of the funds provided by the & Centre, they should be punished. For example, they should be removed from service if they are found guilty or such other steps should be formulated by the Government so that they resist from doing the same in the future also.

It is also seen that the funds released for the welfare of the Adivasis get lapsed or they are used for other purposes. The Government should treat this as a big crime, and they should ensure that this does not happen.

There should be special recruitment for the Adivasis. There are a lot of vacancies in the State Services as well as in the public sector firms, but they are not being recruited and the reason given is that qualified people are not there to fill the posts in these categories. I would suggest that if qualified people are not there, then the Government should take steps in that direction to provide adequate training to them and make them qualified enough to occupy those posts. Further, Adivasi youth should be recruited as forest guard, etc. in the forest department / service. Further, there should be a provision of giving free ration and food grains on a regular basis to the Adivasis who do not get job/during flood, natural calamities, drought, etc. The State Government keeps on including new communities / castes in the Adivasi list. Hence, the reservation given by the Central Government as well as the State Governments is not enough. Therefore, I would suggest that reservation for them should be increased proportionately. I am suggesting this because their share is getting divided further from amongst the present reservation itself Otherwise, the benefit intended to be provided to them will not reach them. I would also suggest that the recommendation made by the State Governments to include new communities in the Adivasi list should be checked as the State Governments are under various kinds of pressure to recommend including new communities into the list.

As regards the field of Information Technology (IT), Adivasi youths should be given more opportunities. They should be given appropriate training in this field, and I would suggest that IT centres should be established in the Adivasi dominated areas.

I had many more issues that I wanted to place before this House for its consideration, but time is not permitting me to do so.

Hence, I would like to take this opportunity to thank all the hon. Members present in the House for giving me a patient hearing and for providing me with an opportunity to speak on this important issue in the presence of all of you.

        With these words I would like to support the Demands for Grants of the Ministry of Tribal Affairs.

                                                                                                                   

ओश्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): महोदय, प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने देश के आदिवासी इलाके के प्रगति एवं विकास हेतु दिसंबर 2009 में कांग्रेस यूपीए सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराते हुये कहा कि हमारी प्राथमिकता भारत के सूदूर संचलों में रह रहे जनजातियों के विकास के कार्य योजना तैयार करने की प्राथमिकता है । सबसे पहले कांग्रेस की सरकार ने आदिवासियों को मालिकाना हक देने का फैसला लिया गया है । आदिवासी इलाकों के लिए भारत सरकार ने बालिकाओं की शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिए विद्यालयों की स्थापना करने का निर्णय लिया गया है यदि आदिवासी इलाके में बालिकाओं को शिक्षित करने में सफलता मिलेगी तो उससे आदिवासी समाज प्रगति करेगा । आदिवासी के घरों में गुणात्मक परिवर्तन होगा जनजातियों समुदाय ने भारत के आजादी से लेकर के अब तक काफी महत्वपूर्ण योगदान किया है । शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली आदि के लिए जनजातियों एवं आदिवासियों के हितों के लिए इस बार भारत सरकार ने3200 करोड़ रूपये का प्रावधान किया है । जबकि भारत में लगभग8.9 करोड़ देश में आदिवासी रहते है । मनरेगा एवं राजीवगांधी समग्र विद्युतीकरण मुख्य रूप से आदिवासी इलाके में रहने वाले जनजातियों को गांव में ही नरेगा के अन्तर्गत रोजगार मिल सके । मनरेगा के अन्तर्गत जनजातियों को साल में 100 दिन के लिए 100 रूपया प्रति दिन के हिसाब से स्थानीय स्तर पर ही रोजगार मिल सके । जंगलों में विद्युतीकरण न होने के कारण तमाम समस्यायें पैदा हो गयी है । देश के आदिवासियों के क्षेत्र में विगत वर्षों में सम्यक रूप से विकास न होने के कारण नक्सलवाद की समस्या उत्पन्न हुयी ।  इसी लिए भारत सरकार द्वारा देश के विभिन्न 22 क्षेत्रों में आदिवासी रहते हैं । वहां के विकास के लिए केन्द्र सरकार ने अलग से प्राथमिकता बना करके चतुर्दिक विकास करने की योजना बना रखी है । आज परंपरागत काम करने वाले आदिवासी के हितों की हिफाजत करने का फैसला लिया गया है । केन्द्र की स्पष्ट नीति है कि कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ है । आज केन्द्र की सरकार ने देश के ट्राइबल क्षेत्र के लिए दो महत्वपूर्ण कदम रोगी एवं रोटी के लिए कानून बनाने का काम किया है । राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना एवं राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा का कानून बनाकर के ग्रामीण अंचलों में सुरक्षा प्रदान किया है । भविष्य में भारत सरकार की योजना है कि आदिवासी मंत्रालय के अंतर्गत जनजातियों के विकास के लिए अनुसूचित जनजाति के विकास के लिए प्रतिबद्ध है । कांग्रेस एवं यूपीए का लक्ष्य है कि समाज के वंचित एवं गरीबों को उनका हक दिया सके । जिसके लिए उन्हें की देश की मुख्यधारा से जोड़ने हेतु कल्याणकारी कदम उठाने का निर्णय लिया गया है । आज आर्थिक सामाजिक रूप से   * Speech was laid on the Table   आदिवासी अलग अलग रहता है । सर्वप्रथम प्राथमिकता है कि उन्हें समाज के समरसता के साथ समन्वय स्थापित कर सके उसके लिए उन तत्वों से जो आदिवासी क्षेत्रों में नफरत एवं घृणा फैलाने का प्रयास कर रहे हैं । उन्हें अलग किया जा सके इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की योजनायें चलायी जा रही है । जिसमें काफी हद तक सफलता मिली है । भारत सरकार ने एक आदिवासी जन-जाति राष्ट्रीय विकास परिषद की स्थापना करने पर विचार किया जा रहा है । आदिवासियों में साक्षरता 47.1औ है जबकि सामान्य 67औ है कुपोषण में 34 औ है जबकि दिश में बच्चों के कुपोषण18 औ है । भारत सरकार के सामने ये समस्यायें गंभीर चिन्ता का विषय है । बीजेपी और एनडीए का बजट केवल 6000 करोड़ था आज कांग्रेस और यूपीए का बजट लगभग 11,000 करोड़ कया है जो वर्तमान परिव्यय पिछली सरकार की तुलना में दो गुना अधिक परिव्यय में वृद्धि किया है । सरकार की आदिवासी जन जाति की नीति में हमने कुछ प्राथमिकताओं को निर्धारित किया है । आदिवासी इलाके में बन अधिकार अधिनियम के बारे में अभी तक कोई सुरक्षा नहीं है । लेकिन अब जनजाति एवं आदिवासी जो वनों में पीटीयों से रह रहे हैं । और उन्हें मालिकाना हक नहीं मिला उसके लिए 7 लाख82 हजार पट्टे आदिवासियों को वितरित किये हैं । जबकि21 लाख लोगों को पट्टे देने की कार्यवाही चल रही है । इस कार्य में भारत सरकार उक्त योजनाओं को लगू करने में दिलचस्पी ले रहे हैं । प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह जी की स्वयं चिन्ता है कि उन आदिवासीयों को जो जंगलों के सम्पदा पर निर्भर है उनके लिए हम कानूनी एवं मालिकाना हम दिलाने की दिशा में केन्द्रीय कांग्रेस की सरकार कदम उठा रही है । यूपीए सरकार ने 12 राज्यों के 2474 वन ग्रामों में सुविधाओं को लिए विशेष आर्थिक सहायता दिया जा रहा है । क्योंकि वन ग्रामों में रहने वालों के जिन्दगी में गुणात्मक परिवर्तन लाने की दिशा में लब तक कार्य ठोस नहीं किया जायेगा तब तक देश के आदिवासी क्षेत्रों में विकास नहीं होगा । इसलिए आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा की दिशा में कांग्रेस यूपीए की सरकार कार्य कर रही है । इसलिए आदिवासियों के हितों एवं जनजाति के कल्याण के लिए ठोस उपाय करके विकास की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं । आज श्री राहुल गांधी देश के सूदूर अंचलों में आदिवासी क्षेत्रों में जा रहे हैं तथा उनके जीवन में परिवर्तन लाने के लिए स्थानीय स्तर के कामों में कार्य योजना बना करके जीवन में गुणात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास किया जा रहा है । इसी लिए केन्द्र ने 12 करोड़ रूपया बढ़ा करके प्रावधान किया है जबकि पहले केवल 2.5 करोड़ रूपये का प्रावधान था भारत सरकार ने पिछले वर्ष 400 करोड़ रूपये का अनुदान राज्य सरकारों को दिया । यूपीए सरकार ने आदिवासी इलाकों के पुर्नवास एवं ग्रामीण विकास मंत्रालये से मिलकर जनजातियों के विकास के लिए योजना बनाने का निर्णय लिया जा रहा है । आदिवासियों के परिवार को लाभ तथा विकास एवं शिक्षा एवं स्वास्थ्य क्षेत्र में भी समुचित योजना बनाने का काम कर रही है । इसके साथ जनजातिय एवं आदिवासी मंत्रालय के प्रस्तुत बजट का समर्थन करता हूं ।

 

जनजातीय कार्य मंत्री (श्री कांति लाल भूरिया): सभापति महोदय, मेरे मंत्रालय को अनुदानों की मांगों पर विस्तृत चर्चा का अवसर प्रदान करने के लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं। इसके साथ ही मैं यूपीए चेयरपरसन सोनिया गांधी जी का भी आभार व्यक्त करता हूं, माननीय प्रधानमंत्री जी का भी आभार व्यक्त करता हूं, जिनके मार्गदर्शन में, नेतृत्व में जनजातीय मंत्रालय का कार्यक्रम बहुत तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है। मैं सर्वप्रथम अपने मंत्रालय के बारे में सदन को संक्षिप्त में जानकारी देना चाहता हूं। मेरा मंत्रालय अनुसूचित जनजातियों के विकास के लिए निरंतर प्रयासरत है। मंत्रालय द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों के क्रियान्वयन से जनजातीय वर्ग को रा­ष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा के साथ जोड़ने का एक प्रमुख उद्देश्य है। हमारे आदिवासी क्षेत्रों का विकास, आदिवासी समुदाय के आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति के सुधार, समावेशी विकास की हमारी अवधारणा से मूल रूप से जुड़ा हुआ है। हमारे समाज के वंचित और हाशिए पर रहे वर्गों को उनके वैध अधिकारों की गारंटी दिए बगैर हम समतामूलक विकास हासिल नहीं कर सकते हैं। मोटे तौर पर हम अपने आदिवासी समुदाय को सामाजिक और आर्थिक विकास की प्रक्रिया में समान भागीदारी और देश के अन्य नागरिकों के समान उनके आत्म सम्मान की नीति, उनकी आजीविका, उनकी सुरक्षा और इन सब के ऊपर उनकी गरिमा को बनाए रखने के लिए उनको सशक्त और समर्थ बनाने की आवश्यकता है।

          महोदय, आज हमारे सदन के करीब 29-30 माननीय सदस्यों ने यहां अपने अमूल्य विचार प्रस्तुत किए हैं। हमारे मंत्रालय को बहुत अच्छे सुझाव दिए हैं। मैं उनके द्वारा दिए गए सुझावों का स्वागत करता हूं और निश्चित उन सुझावों को अपनाने की कोशिश करेंगे।

19.00 hrs. आज की सामाजिक, आर्थिक और न्यायिक व्यवस्था में हमारे आदिवासी भाइयों को मुख्यधारा से अलग-थलग रहने में जो दिक्कत आ रही है, हमारी वर्तमान संरचना, आदिवासी संस्कृति, पारम्परिक विविधताओं एवं विशेषताओं को संरक्षित करते हुए उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का हमारा प्रयास बना रहा है और आगे भी जारी रहेगा। हम लोग चारों तरफ से पूरी तरह से, अपने नौजवानों को रोजगार, उनको एजुकेशन, उनको हर तरह से अलोकतांत्रिक तत्व जो भ्रमित कर रहे हैं, कई प्रकार के लोगों को गलत दिशा में ले जा रहे हैं, इन लोगों से भली प्रकार से उन्हें दूर करने का हमारा पूरा प्रयास है, हमारा कार्यक्रम है। उस कार्यक्रम के तहत किसी भी क्षेत्र में कई प्रकार की अलग गतिविधियां जो लोग चला रहे हैं, जो नक्सलाइट्स हैं, उनसे अपने नौजवानों को अलग करने का हमारा पूरा प्रयास है। निश्चित ही हम उसमें सफल होंगे।

          सभापति महोदय, हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी ने हाल ही में सिविल सेवा दिवस 21 अप्रैल,2010 पर हम सभी का ध्यान इस तरफ आकर्­िात किया है। हमें अपने गरीब आदिवासी भाइयों को, हमारे देश के महत्वाकांक्षी विकास के कार्यक्रमों के लाभ में भागीदार बनाना होगा। हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि हमारे सुदूर आदिवासी उपयोजना क्षेत्रों तक हमारे विकास कार्यक्रमों का प्रभावी लाभ पहुंचे। हमारे प्रधानमंत्री जी के मन में जो पीड़ा थी, वह आपके सामने रखी है।

          सभापति महोदय, इसी दिशा में जनजातियों के लिए केन्द्र सरकार के मंत्रालयों के माध्यम से अनेक विषयों पर पूरे देश में योजनाएं चलाई जा रही हैं। जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, पंचायती राज इत्यादि। ये सभी कार्यक्रम जनजातीय क्षेत्रों को भी सम्मिलित करते हुए पूरे देश में चलाए जाते हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से अनुसूचित जनजातियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए संपूर्ण कमियों को दूर करने के प्रयास किए जाते हैं। साथ ही राज्य सरकारों, संघ राज्य क्षेत्रों तथा स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से भी कई योजनाएं कार्यान्वित की जा रही हैं।

          सभापति महोदय, मेरी मान्यता है कि राष्ट्रीय स्तर पर एक संस्था जनजातीय सलाहकार परिषद का गठन होना चाहिए, जिसमें हमारे कई माननीय सदस्यों ने अपनी भावना प्रकट की है। निश्चित ही इस बात के लिए भी हम लोग प्रयास कर रहे हैं। यह समय की आवश्यकता है कि आदिवासियों की आजीविका की चिन्ता इन क्षेत्रों के विकास के एजेंडे के केन्द्र में होना चाहिए। इसलिए हमें अनेक मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। आदिवासी क्षेत्रों में सभी विकास और कल्याणकारी कार्यक्रमों के बीच तालमेल बैठाने की आवश्यकता है ताकि हमारी रणनीति सुसंगत हो सके। सरकार के सभी विभागों में इसके लिए समन्वय स्थापित करना होगा।  

          सभापति महोदय, अनुसूचित जनजातियों के मानव विकास के सूचकांक यह बताते हैं कि यह एक समूह, साक्षरता की निम्न दर, आर्थिक गरीबी, स्वास्थ्य एवं कुपोषण की भीषण समस्याओं से ग्रसित हैं। जहां आदिवासियों की 2001 की जनगणना के अनुसार साक्षरता दर 47.1 प्रतिशत है, वहां देश के समस्त सामाजिक समूहों में 64.84 प्रतिशत है। इसी प्रकार आदिवासियों में कुपोषण के कारण कम वजन के बच्चों का प्रतिशत 35.8 प्रतिशत है, जबकि देश का औसत 18.4 प्रतिशत है। आदिवासियों के बच्चों में कुपोषण अन्य सामाजिक वर्गों की तुलना में अत्यधिक कम है। आर्थिक गरीबी की दृष्टि से गरीबी की रेखा के नीचे रहवासित आदिवासियों का प्रतिशत 47.3 प्रतिशत है, जब कि सामान्य वर्ग में यह 16.1 प्रतिशत है। आज यह हमारे लिए एक गंभीर चुनौती है।

          सभापति महोदय, हमारे सभी साथियां ने यहां पर बहुत सारी बातें कही हैं, अभी यहां पर अर्जुन मुण्डा जी बैठे नहीं हैं, अगर यहां होते तो मैं उन्हें बताता। अगर हम यूपीए सरकार और एनडीए सरकार की तुलना करें तो पता चलेगा सन्2099 में वहां पर आदिम जाति मंत्रालय बना था और उस समय उनका छ: साल का बजट 5311 करोड़ का था, हमारी यूपीए सरकार का छ: साल का बजट 11,341 करोड़ है। हमारा डबल है, हमने एकदम दोगुना बढ़ाया है।

          महोदय, हम यह कह सकते हैं, लेकिन मुंडा जी यहां कई प्रकार के आरोप लगा कर चले गए। मैं उन्हें बता रहा हूं कि हमने उनके विकास के लिए धनराशि को डबल किया है। हमारे वित्त मंत्री जी ने इस बात को महत्व दिया है और यह भी कहा है कि और भी यदि धनराशि की आवश्यकता पड़ेगी, तो हम उसे आगे करने की बात करेंगे। इसके साथ ही राष्ट्रीय जनजाति नीति बनाने की बात भी हमारे कई माननीय सदस्यों ने कही है। मैं आपको बताना चाहता हूं कि इन सब बातों को देखते हुए, जनजातीय समुदायों के सामाजिक और आर्थिक विकास के सभी पहलुओं पर पूरा ध्यान देने के लिए राष्ट्रीय जनजाति नीति का भी प्रारूप हमने तैयार कर लिया है। आज आदिवासियों के मन में जो भय और शंकाएं हैं, उन्हें दूर करने के लिए हम इस नीति में कारगर समावेश करेंगे। उन्हें प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते हुए नियंत्रण, बेदखल और समाज की मुख्य धारा से भी अलग-थलग होने का भय है। सांवैधानिक प्रावधानों का क्रियान्वयन करना, आधारभूत ढांचे को मजबूत करना और विकास में उनकी भागीदारी बढ़ाना और उनकी संस्कृति के संरक्षण को शामिल करने का प्रावधान हम अपनी आदिवासी जनजातीय नीति में कर रहे हैं।

          राष्ट्रीय जनजाति नीति के प्रारूप को तत्कालीन गृह मंत्री की अध्यक्षता में मंत्री समूह की बैठक में भी रखा गया था, ताकि विस्तृत विचार-विमर्श किया जा सके। संसदीय परामर्शदात्री समिति, केन्द्र के मंत्रालय एवं राज्य सरकारों, राष्ट्रीय जनजातीय आयोग तथा मंत्रियों के समूह के विचार-विमर्श के आधार पर नीति का संशोधित प्रारूप भी तैयार कर लिया गया है। मेरे मंत्रालय ने, इस नीति का प्रारूप, अब प्रधान मंत्री को, मार्गदर्शन प्राप्त करने हेतु भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। कालान्तर में मंत्री मंडल में हम इस नीति का प्रारूप अनुमोदन हेतु भेजेंगे।

          माननीय सभापति महोदय, इसके साथ ही साथ हमारे कई सदस्यों ने वन अधिकार अधिनियम के मामले का जिक्र किया है। मैं बताना चाहता हूं कि इस मामले में हमारी नेता श्रीमती सोनिया गांधी जी के मन में एक पीड़ा थी। वर्षों से हमारे आदिवासी भाई दर-दर भटक रहे थे। फॉरैस्ट वाले, उन्हें हर सीजन में इधर से उधर भगाने का काम करते थे। हमारी नेता, श्रीमती सोनिया गांधी जी ने और प्रधान मंत्री, डॉ. मनमोहन सिंह जी ने दृढ़ता के साथ वर्ष 2005-06 में कानून पास किया और उसे वर्ष 2009तक पूरा करने के लिए सभी राज्य सरकारों से अनुरोध किया गया था। इसके साथ ही साथ हम आपको बताना चाहते हैं कि मेरे मंत्रालय द्वारा अनुसूचित जनजाति तथा अन्य परम्परागत वनवासी, वन अधिकारों की मान्यता अधिनियम 2006 क्रियान्वित किया जा रहा है। इसका लक्ष्य वनों में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति तथा अन्य परम्परागत वनवासी जो पीढ़ियों से इन वनों में निवास कर रहे हैं, तथा उनके अधिकारों का दर्द तक महसूस नहीं किया गया। इन वन अधिकारों को पहचान कर उन्हें प्रदान करना है।

          माननीय सभापति महोदय, मैं अवगत कराना चाहता हूं कि इस अधिनियम के अन्तर्गत, मार्च2010तक, पूरे देश में 27,44,000आवेदन आए थे। हमने पूरी कोशिश कर, जगह-जगह हमने मीटिंग ली, राज्य सरकारों के साथ बैठकें की, माननीय मुख्य मंत्रियों को पत्र भी लिखे गए, तब जाकर हम 27,44,000आवेदनों में से 7,82,000 लोगों को हमने पट्टे वितरित कर पाए हैं। इसी प्रकार21,000पट्टे बनकर और तैयार हैं। यह हमारे काम करने का तरीका है और जो हमने आपकी भावना समझी उसके अनुसार हमने यह किया है।

          सभापति महोदय, मैं सदन को इस बात से भी अवगत कराना चाहता हूं कि आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, त्रिपुरा तथा पश्चिम बंगाल में प्रावधानों का 70 प्रतिशत से अधिक निष्पादन हो चुका है, जबकि असम, बिहार, गुजरात, झारखंड में, यदि यहां हमारे मुंडा जी होते, तो हम उन्हें बताते कि वहां बहुत धीमी गति से काम चल रहा है। वहां हम लोग लगे हुए है कि तीव्र गति से काम चले। कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड इत्यादि राज्यों में इस अधिनियम के क्रियान्वयन में गति लाने की आवश्यकता है। इस अधिनियम का क्रियान्वयन प्रभावी रूप से हो, इसके लिए मैंने स्वयं और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कई राज्यों में मीटिंगें ली हैं और आगे काम बढ़ाने के लिए हम पूरी कोशिश कर रहे हैं। हमारे मंत्रिमंडल के साथी, राज्य मंत्री और सैक्रेट्री को भेजकर हमने अलग-अलग राज्यों में यह सारा प्रयास किया है। हम आगे भी ज्यादा से ज्यादा कोशिश करेंगे, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को पट्टे मिल सकें और मालिकाना हक दिलाने का काम हम करेंगे। मैं इस मौके पर यह बताना चाहता हूं कि हमारे देश के प्रधान मंत्री जी के जो शब्द थे, उनके अनुसार हमने यहां 4 नवम्बर,2009को सभी प्रदेशों के मुख्य मंत्रियों का सम्मेलन किया था और फॉरैस्ट एक्ट को लागू करने के लिए निवेदन किया था।             

          मैं इस मौके पर माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा 4नवंबर, 2009 के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में अपने उद्बोधन की ओर आप सभी का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। उन्होंने हमारे आदिवासी भाइयों के वनों के सरंक्षण में उनके योगदान का उल्लेख करते हुए चिंता व्यक्त की कि जिन लोगों का जीवन वनों पर निर्भर है, उन्हें प्राकृतिक संसाधन, नियोजन, संरक्षण और सुरक्षा की प्रक्रिया में अनिवार्य रूप से भागीदारी देनी चाहिए। इस कानून में हमारी यूपीए सरकार द्वारा न केवल उनके अधिकारों का ध्यान रखा गया बल्कि जैव विविध पर्यावरण संतुलन और हमारे बहुमूल्य वन जीव संसाधन के संरक्षण और सुरक्षा के लिए भी मजबूत प्रावधान करने के लिए माननीय प्रधानमंत्री जी ने सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों को सारी बातें बतायी थीं।

          हमारे कई साथियों ने इस बात के लिए कहा है कि जनजातीय उपयोजना क्षेत्र विशेष केंद्रीय सहायता, यहां पर हम राज्यों को राशि देते हैं और राज्य की एजेंसी के थ्रू हम लोग काम कराते हैं।  माननीय सभापति महोदय, मैं अवगत कराना चाहूंगा कि अनुसूचित जनजाति लोगों की आय सृजन हेतु राज्य सरकारों को विशेष केंद्रीय सहायता दी जाती है। इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन से जनजाति वर्ग के लोगों का आर्थिक एवं सामाजिक विकास किया जाता है।  यह कार्यक्रम देश भर में 22राज्यों तथा दो संघ राज्यों में चलाया जा रहा है।गतवर्ष से जनजाति उपयोजना की विशेष केंद्रीय सहायता के अंतर्गत लगभग 442करोड़ रूपए राज्य शासन को परियोजना लागू करने के लिए वितरित किए।  इस वर्ष से लगभग 961 करोड़ रूपए दिए जाने का प्रस्ताव है।       

          माननीय सभापति महोदय, इसी के साथ वन ग्रामों की बात जो माननीय सदस्यों ने कही थी, उसके लिए भी हमारी यूपीए सरकार ने अलग से व्यवस्था रखी है।  मैं अवगत कराना चाहता हूं कि देश के 12राज्यों में 2,474वन ग्राम हैं, जिनमें सड़क, पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य, वैकल्पिक ऊर्जा आदि जैसी मूलभूत सुविधायें प्रदान करने के लिए मंत्रालय द्वारा राज्यों को अनुदान प्रदान किया जाता है और अब तक12राज्यों में 2,413वन ग्रामों को मूल सुविधा प्रदान करने के लिए लगभग 609करोड़ रूपए अनुदान के रूप में दिया जा चुका है। यह अनुदान जनजातीय उपयोजना की विशेष केंद्रीय सहायता का अंश है।  इन ग्रामों में मूलतः आदिवासी निवास करते हैं, जिनका जीवनस्तर सुधारना हमारी महती जिम्मेदारी है।  

          माननीय सभापति महोदय, अब मैं भारत के संविधान के अनुच्छेद 275(ए)के तहत जो राशि राज्यों को दी जाती है, उसके विषय में मैं बताना चाहता हूं। मेरे मंत्रालय द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 275(ए)के तहत राज्यों को अनुदान दिए जाने की एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है।  इसके अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों में प्रशासन के स्तर को बढ़ाने तथा अनुसूचित जनजातियों के कल्याण हेतु राज्य सरकारों को अनुदान दिया जाता है। इसके अंतर्गत आधारभूत ढांचे को सुदृढ़ किया जाता है।  मेरे मंत्रालय द्वारा इस योजना के अंतर्गत राज्य सरकारों को सौ प्रतिशत अनुदान राज्य में जनजातीय जनसंख्या के अनुपात के आधार पर दिया जाता है। इसके अंतर्गत मुख्यतः सामुदायिक कल्याणकारी कार्यक्रम जैसे सड़क, स्कूल, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा, सिंचाई इत्यादि सुविधायें विकसित की जाती हैं।

          माननीय प्रधानमंत्री जी ने भी आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन के लिए अच्छे अधिकारी नियुक्ति करने की बात कही है। सभी माननीय सदस्यों ने इस बात के लिए कहा है, लेकिन प्रधानमंत्री जी ने पहले ही इस बात को राज्य के मुख्यमंत्रियों के सामने कहा।सभी आदिवासी क्षेत्रों में प्रशासन के सुधार पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि हमारे कुछ आदिवासी क्षेत्रों में या तो प्रशासन तंत्र बहुत कमजोर है या फिर वास्तव में है ही नहीं। उचित बुनियादी ढांचा तैयार करना एक प्रमुख मुद्दा है।  मैं आदिवासी क्षेत्रों में प्रतिबद्ध और सक्षम अधिकारियों की प्रतिष्ठापना के महत्व पर भी जोर देना चाहता हूं। राज्यों को ऐसे अधिकारियों को कठिनाई भत्ता, विशेष आवास और शैक्षणिक सुविधाएं अथवा अनुदान जैसे ठोस प्रोत्साहन देने पर भी विचार करना चाहिए, ताकि ईमानदार अधिकारी हमारे जनजातीय क्षेत्रों में जाएं। प्रधानमंत्री जी ने इस बात के लिए कहा है।  मैं सभी माननीय सदस्यों से निवेदन करता हूं कि अपने-अपने प्रदेश में राज्य सरकारों से कहें कि जनजातीय क्षेत्रों में अच्छे अधिकारी पोस्ट करें। नहीं तो जिन्हें पनिशमेंट के तौर पर वहां भेजते हैं, वे वहां जाकर फिर से लूटना शुरू कर देते हैं। जितनी भी हमारी केंद्र सरकार की योजनाएं हैं, वे उन योजनाओं को पूरी तरह से चूना लगाने का काम करते हैं।...( व्यवधान) मैं भ्रष्टाचार नहीं बोल रहा हूं, चूना लगाने की बात कह रहा हूं। ...( व्यवधान) इस बात के लिए हम सभी ...( व्यवधान) आप मेरी बात सुनिए, मैं आपकी ही बात कर रहा हूं। ...( व्यवधान) अगर माननीय सदन के सब सदस्य इस बात को देखें तो निश्चित ही जनजातीय क्षेत्रों का कल्याण, उसकी तकदीर और तस्वीर बदलने का काम हम कर सकते हैं। लेकिन भाषण से मुक्ति पाकर अलग होने का काम नहीं हो सकता।

          इसके साथ ही मैं अनुरोध करता हूं कि एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय, हमारे स्वर्गीय नेता राजीव जी ने भी इसका सपना देखा था। जब तक आदिवासी क्षेत्रों में एजुकेशन नहीं होगी, तब तक वे अपने अधिकार के लिए जागरूक नहीं होंगे। इसी बात को लेकर हमारे नेता राहुल गांधी जी ने प्रदेश के कई जनजातीय क्षेत्रों में जाकर निकट से देखा। उन्होंने उनकी झोंपड़ियों में जाकर देखा, उनसे बात करके देखा। योजना के मामले में उन्होंने देखा कि सबसे पहले उनकी एजुकेशन, फिर स्वास्थ्य, बिजली, पानी सड़क, इरीगेशन, जब तक ये सारी चीजें नहीं होंगी, तब तक कुछ नहीं हो पाएगा। इसलिए हमने इन बातों को लिया है और मैं निरंतर प्रयास में हूं कि जनजातीय वर्ग के विद्यार्थियोंकी शिक्षा का स्तर बढ़े। मेरे मंत्रालय द्वारा एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय की बड़े पैमाने पर स्थापना एक अनूठा प्रयास है, जो जनजातीयसर्वांगीण विकास में अवश्य सहायक होगा। संविधान के अनुच्छेद 275(1) के अंतर्गत राज्यों को दिए जाने वाले अनुदान से ही एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय की भी स्थापना की जा रही है। पूरे देश में सौ आदर्श आवासीय विद्यालय पिछले समय स्थापित हुए, 22राज्यों को अनुदान दिया गया। छठी कक्षा से बारहवीं कक्षा तक विद्यार्थी एक ही परिसर में सारी क्लासेज पढ़ेंगे और इन विद्यालयों हेतु ढाई करोड़ रुपये प्रति माह प्रति विद्यालय के हिसाब से दिए जा रहे थे। लेकिन जब राहुल जी ने इस बात को कहा कि वहां की एजुकेशन को ठीक करना है तो उसकी राशि बढ़नी भी बहुत जरूरी है और उसकी संस्था एक ही कैम्पस में रखनी आवश्यक है, ताकि वहां टीचर रहें, सारे बच्चे रहें, गर्ल्स और बॉयज़ होस्टल स्थापित रहे। इस तरह से उन्हें एक माहौल मिलना चाहिए। उस बात को लेकर हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि मेरे मंत्रालय द्वारा इन विद्यालयों के निर्माण हेतु ढाई करोड़ रुपये से बढाकर एक संस्था को 12करोड़ रुपये देने का नियम बना रहे हैं। नार्थ-ईस्ट में जो पहाड़ी एरिया है, वहां लिफ्ट आदि के लिए खर्चा ज्यादा आता है। उसके लिए 16 करोड़ रुपये की एक संस्था बनेगी। हम उसके लिए सालाना500करोड़ रुपये से एक हजार करोड़ रुपये करेंगे। तब एजुकेशन की तस्वीर और तकदीर बदलेगी। उसकी तरफ हमारा पूरा ध्यान है।       इसके साथ ही गत वर्ष अनुच्छेद 275के तहत अनुदान में मेरे मंत्रालय ने लगभग 400 करोड़ रुपये का अनुदान राज्य सरकार को दिया है। इस वर्ष भी मंत्रालय द्वारा एकलव्य आदर्श विद्यालय पर और अधिक राशि दिए जाने का प्रस्ताव है। हमे आशा है कि माननीय वित्त मंत्री जी का आशीर्वाद हमें प्राप्त होगा। मैडम सोनिया जी से इस बात के लिए हम हमेशा मार्गदर्शन लेते हैं और निश्चित ही हमें ताकत मिलती है। इसके लिए इस साल एक हजार 46करोड़ रुपये की धनराशि का प्रस्ताव एकलव्य आदर्श विद्यालयों के लिए रखने की बात कर रहे हैं। साथ ही राष्ट्रीय अनुसूचित जनजातीय आयोग, हमारे सब सदस्यों ने कहा कि आदिवासियों के ऊपर अत्याचार होते हैं, उनकी बात नहीं सुनी जाती, उनके मान-सम्मान की रक्षा नहीं होती। उसके लिए 19 फरवरी,2004को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजातीय आयोग की स्थापना की गई थी। संविधान के अनुच्छेद 338द्वारा आयोग को कर्तव्य तथा शक्तियां दी गईं। आयोग मुख्य रूप से जनजातीय लोगों की सुरक्षा, कल्याण, विकास तथा उन्नति के क्षेत्र में कार्य करेगा। साथ ही हम इस बात को भी देख रहे हैं। इसके साथ ही पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना-आदिवासी भाइयों में हमेशा भय बना रहता है कि कब बड़ी परियोजना डैम बन जाए, कब रोड बन जाए और कब क्या हो जाए। उस स्थिति में उन्हें अपनी पुरखों की जमीन छिनने का भय रहता है। उसके लिए भी यूपीए सरकार ने प्राथमिकता के तौर पर कहा है कि जब तक आदिवासियों और उनके परिजनों के विस्थापितों और पुनर्वास की व्यवस्था के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना नीति वर्ष 2007से प्रभावी है। इस नीति के अंतर्गत अनुसूचित जाति के लोगों के लिए अलग से प्रावधान है। यदि दो सौ से अधिक अनुसूचित जनजातीय परिवारों को उनकी इच्छा के विरुद्ध विस्थापित किया जाता है तो इस मामले में एक जनजातीय विकास योजना तैयार करना जरूरी है। प्रधान मंत्री जी ने यह भी कहा है कि अब जब कोई योजना आदिवासी क्षेत्र में बनेगी तो निश्चित ही आदिवासी विकास मंत्रालय से नो ऑब्जैक्शन सैर्टिफिकेट लेना पड़ेगा, आम सहमति बनानी पड़ेगी। तब आप यह योजना चालू कर सकते हैं। नहीं तो वहां से उन्हें हटा दिया जाता है, वे लोग बेघर होकर न घर के न घाट के रहते हैं।

          इस तरह के सारे भय नौजवानों के मन में होते हैं। इसलिए हम इस तरफ भी कोशिश कर रहे हैं। साथ ही हमें इस बात पर विचार करने की नितांत आवश्यकता है कि विस्थापित आदिवासियों को मुआवजा मिल सके, उन्हें उन परियोजनाओं का लाभ मिलना चाहिए और उनके परिवार के लोगों को वहां रोजगार मिले, नौकरी मिले, ताकि वे भी सम्मान के साथ वहां रहने का काम कर सकें।

          महोदय, अब शिक्षा के दूसरे खंड पर आता हूं --अनुसूचित जनजाति विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति। छात्रवृत्ति के मामले में हमारा कार्यक्रम शुरू से बना, लेकिन उसका पैसा नहीं बढ़ा। बाकी सब चीजें जैसे कर्मचारियों की तन्ख्वाह भी बढ़ जाती है, लेकिन छात्रों का जो पैसा है, वह नहीं बढ़ा। उसके लिए हमने कोशिश की है। वर्तमान में जो मैट्रिकोत्तर छात्रवृत्ति सैंटर से 400 रुपये दी जाती है, उसे हम अब बढ़ाकर डबल करने की सोच रहे हैं, ताकि जनजातीय क्षेत्रों को पूरी तरह से फायदा मिल सके। हमें आशा है कि वित्त मंत्री जी से हमें इस बारे में आशीर्वाद प्राप्त होगा। वर्ष 2007-08 में हमारे स्टूडैंट्स 10 लाख 50 हजार थे, वहीं वर्ष 2009-10 में 13 लाख76 हजार स्टूडैंट्स हैं, उनकी छात्रवृत्ति को हम डबल करने का प्रयास कर रहे हैं।

          इसके साथ ही हमारा आश्रम पद्धति के स्कूल चलाने का प्रोग्राम है। जैसे दूरदराज क्षेत्रों में सरकारी या प्राइवेट स्कूल अगर एनजीओ नहीं चलाते, तो फिर हम आश्रम पद्धति के स्कूल चलाते हैं, ताकि बच्चे वहीं रहें, वहीं पढ़ें। इसलिए आश्रम पद्धति को लागू करने का निर्णय हमारे विभाग ने लिया है। शिक्षा की सुविधाओं को बढ़ाने तथा उनका विस्तार करने के लिए उपयोजना क्षेत्रों में आश्रम विद्यालयों तथा छात्रावासों के निर्माण हेतु मंत्रालय अनुदान प्रदान करेगा। लड़कियों की शिक्षा के लिए विशेष कर जहां भी हम विद्यालय बनायेंगे, वहां पर हम हंड्रेड परसेंट केन्द्र से पैसा देंगे। जितने नक्सलाइट एरियाज में हैं, उनको भी हन्ड्रेड परसेंट पैसा देंगे, ताकि वहां पूरी तरह से काम हो सके। इसके अतिरिक्त जितने भी एनजीओज संगठन हैं, एनजीओज के मामले में काफी हमारे साथियों ने कहा कि सारा पैसा एनजीओज दे रहे हैं। उसके लिए हमारे पास कोई एजेंसी नहीं थी। लेकिन हमारी नेता सोनिया जी का मार्गदर्शन लेकर और प्रधान मंत्री जी के नेतृत्व में हमने इस बात को देखा है कि आऩे वाले समय में हम एनजीओज पर पूरी तरह से मौनीटरिंग, निगरानी करेंगे। उसके लिए हमने दो एजेंसी इस साल से ली हैं। उनमें वायम टैक्नोलॉजी लिमिटेड को सभी एनजीओज द्वारा संचालित परियोजनाओं की मौनीटरिंग का कार्य सौंपा गया है। साथ ही ओआरजी सेंटर फार सोशल रिसर्च को एनजीओज की परियोजनाओं के मूल्यांकन का कार्य भी सौंपा गया है। उसकी हम दो-तीन साल में मौनीटरिंग करेंगे ताकि अच्छे काम करने वाले एनजीओज को हम लोग आगे बढ़ायेंगे, मदद करेंगे और जो फर्जी हैं, जिन्होंने हर तरह से वहां पर दलित लोगों के साथ धोखा किया है, उनको ब्लैक लिस्ट डिक्लेयर करेंगे, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करेंगे। यह भी हमारे प्रोग्राम का एक हिस्सा होगा। उसके साथ ही पीटीजी के लिए संरक्षण-- जो गरीब अशक्त जनजातियां हैं, गरीब हैं, जिनकी आबादी कम होती जा रही है, जिनकी साक्षरता का स्तर नीचा है, उनका आर्थिक पिछड़ापन कम है, उसके लिए भी हमने पूरी-पूरी कोशिश की है और इन्हें भी ज्यादा से ज्यादा राशि देने का हमारा लक्ष्य़ है। पिछले समय भी हमने उनको काफी राशि दी और इस साल भी हमारी पूरी कोशिश रहेगी कि उन्हें इस योजना का पूरा लाभ मिले। इसके लिए हम पूरी कोशिश करेंगे।

          सभापति महोदय, मेरे मंत्रालय के अन्तर्गत भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन संघ (ट्राइफेड) कार्यरत है। ट्राइफेड के मामले में भी कहा है कि जब तक जनजातीय क्षेत्रों में उनकी जितनी भी बनी हुई चीजें जैसे खिलौने आदि हैं, वहां सामान कलैक्ट करना है, लौंग है, चिरोंजी है, बेड़ा आदि है इस तरह की, कई चीजें वे लोग कलैक्ट करते हैं। उसके लिए मार्केट देने की भी बात हमने की है। उसको ट्राइब्स इंडिया का नाम दिया है। पूरे देश में ऐसे 23 शोरूम चल रहे हैं, जिनमें आदिवासियों की हस्तकला एवं अन्य वस्तुओं की विपणन की व्यवस्था है। इस प्रकार संस्था के अंतर्गत आदिशिल्प के नाम से राष्ट्रीय स्तर की प्रदर्शनियां आयोजित की जाती हैं जिनमें देश के विभिन्न भागों के आदिवासी कारीगर भाग ले रहे हैं, लाभान्वित हो रहे हैं। मैं बताना चाहता हूं कि ट्राईफेड ने पिछले तीन वर्षों में लगभग 30 हजार आदिवासियों को प्रशिक्षण दिया। आदिशिल्प प्रदर्शनी के द्वारा पिछले तीन वर्षों में उनको लगभग 36 करोड़ रुपये का फायदा हुआ। लघुवनोपज के लिए कहा कि जो कलैक्शन करेंगे, उनको भी ज्यादा से ज्यादा दायरे में लाने की कोशिश करेंगे। इसके साथ ही मैं एक निवेदन करना चाहूंगा कि हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी ने चाहा है कि कौशल विकास मिशन पर विशेष रूप से विचार करने की आवश्यकता है।

          माननीय प्रधान मंत्री जी ने अपनी पीड़ा आदिवासियों के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करते हुए इस बात को बार-बार कहा है कि कौशल डवलपमेंट मिशन पर विशेष रूप से विचार करने की आवश्यकता है। आदिवासी क्षेत्रो में कौशल विकास मिशन का विस्तार करना चाहिए। उसके लिए संसाधनों की तलाश करनी होगी। यह अतीत में उनके प्रति की गई उपेक्षा का एक छोटा सा मुआवजा होगा। हमें आदिवासियों के मामले से निपटने के लिए वर्तमान तौर-तरीकों में भी परिवर्तन करना होगा। ये सारी चीजें हम लोग कर रहे हैं। उसके साथ ही राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति विकास निगम भी हमारे मंत्रालय के तहत काम कर रहा है। उसे भी हम ज्यादा से ज्यादा सहायता दे रहे हैं। पिछले साल उन्हें हमने 84 करोड़ रुपए की सहायता दी थी। इस निगम का यह काम होगा कि आदिवासियों के लिए जो मछली पालन, भेड़-बकरी पालन काम है, सुअर पालने का काम है ...( व्यवधान) कुछ आदिवासी सुअर भी पालते हैं। इसके अलावा गाड़ी बनाने का काम है तथा अन्य जो भी काम वे कर सकते हैं, उनकी आर्थिक दृष्टि को कैसे मजबूत किया जाए। ये सारे काम हम राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति निगम के मार्फत कर रहे हैं। हम उसे आगे और ताकत के साथ चलाएंगे।

          आदिवासियों की जनशक्ति को, उनके त्यौहारों, परम्पराओं और संस्कृतियों को जीवित रखने के लिए हमारा मंत्रालय समय-समय पर राष्ट्रीय स्तर पर मेलों का आयोजन करता रहता है। जनजातीय वर्गों की, संस्कृति की रक्षा के लिए, राष्ट्रीय स्तर पर जनजातीय त्यौहार आयोजित किए जाते हैं, जिनमें विभिन्न प्रदेशों के सांस्कृतिक दल बुलाए जाते हैं और उनके द्वारा निर्मित वस्तुओं की प्रदर्शनी भी लगाई जाती है।राज्य सरकारों को 50 प्रतिशत हिस्सेदारी पैटर्न के आधार पर, 17 जनजातीय अनुसंधान संस्थान, अनुसंधान और मूल्यांकन अध्ययन करते हैं। वर्ष 2009-2010 के दौरान इन कार्यकलापों को करने के लिए 9 करोड़ 50 लाख रुपए उपलब्ध कराए गए। ये चीजें हम लोगों ने की हैं। करीब30 माननीय सदस्यों ने यहां पर अपने-अपने विचार रखे हैं, मैंने उन सबको नोट किया है और मेरी पूरी तैयारी है। अगर आप चाहें तो मैं उनका पूरा ब्यौरा आपके सामने रखना चाहता हूं।...( व्यवधान) इसलिए मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि माननीय सदस्यों ने काफी अच्छे सुझाव दिए हैं, उन पर हम निश्चित रूप से विचार करेंगे और आदिवासियों की तकदीर और तस्वीर बदलने का काम हमारा मंत्रालय करेगा। इस काम में यूपीए सरकार, हमारी नेता सोनिया गांधी जी और हमारे प्रधान मंत्री जी, हमारा नेतृत्व पूरी तरह मजबूत है, हम उनके मार्गदर्शन में जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को मुख्य धारा से जोड़ेंगे और जो अलगाववाद की बात करते हैं, उनसे सख्ती से निपटेंगे और मुंह तोड़ जवाब देंगे।

          सभापति जी, आपने मुझे समय दिया, उसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

                                                                                                             

MR. CHAIRMAN: I shall now put the Demand for Grant relating to the Ministry of Tribal Affairs to the vote of the House.

The question is:

“That the respective sums not exceeding the amounts on Revenue Account and Capital Account shown in the fourth column of the Order Paper be granted to the President of India, out of the Consolidated Fund of India, to complete the sums necessary to defray the charges that will come in course of payment during the year ending the 31st day of March, 2011, in respect of the heads of Demands entered in the second column thereof against Demand No. 94 relating to the Ministry of Tribal Affairs.”   The motion was adopted.
MR. CHAIRMAN:  The House stands adjourned to meet again at 11 a.m. on the 26th April, 2010.
 
19.29 hrs The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Monday, April 26, 2010/Vaisakha 6, 1932 (Saka).       
                                                               

* Not recorded.

* Not recorded.

* Not recorded.

* Not recorded.

* Speech was laid on the Table.

× Speech was laid on the Table.

× Speech was laid on the Table.

× Speech was laid on the Table.

* Speech was laid on the Table.

* Speech was laid on the Table.

* Speech was laid on the Table.

* English translation of the speech originally delivered in Oriya.

* Expunged as ordered by the Chair.

Speech was laid on the Table.

* Speech was laid on the Table.

* English translation of the speech originally delivered in Bengali.

* English translation of the speech originally delivered in Bengali.