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Lok Sabha Debates

Shri Rajesh Rajan Alias Pappu Yadav Called The Attention Of The Minister Of Social ... on 18 December, 2003

12.13 hrs. CALLING ATTENTION TO THE MATTER OF URGENT PUBLIC IMPORTANCE Need to include Dalit Muslims, Dalit Christians and Certain other backward communities in the list of Scheduled Castes/Scheduled Tribes and to provide reservation benefits to them Title: Shri Rajesh Rajan alias Pappu Yadav called the attention of the Minister of Social Justice and Empowerment to the need to include Dalit Muslims, Dalit Christians and certain other backward communities in the list of Scheduled Castes/Scheduled Tribes and to provide reservation benefits to them.

   

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव (पूर्णिया):महोदय, मैं सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री का ध्यान विलम्बनीय लोक महत्व के निम्न विषय की ओर दिलाता हूं और प्रार्थना करता हूं कि वह इस संबंध में वक्तव्य दें :

"दलित मुसलमानों, दलित ईसाईयों और कतिपय अन्य पिछड़े समुदायों को अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल करने और उन्हें आरक्षण का लाभ दिए जाने की आवश्यकता तथा इस संबंध में सरकार द्वारा उठाए गए कदम।"

अध्यक्ष महोदय : मंत्री जी स्टेटमेंट पढ़ना चाहते हैं, अगर वे स्टेटमेंट सदन के पटल पर रख दें तो क्या चल जाएगा।

श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : नहीं सर।

श्री प्रियरंजन दासमुंशी (रायगंज) : नहीं।

अध्यक्ष महोदय : ठीक है, आपको जो बोलना है, बोलिये। माननीय मंत्री जी, आप बैठ जाइये।

SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : Sir, I disagree with many of my colleagues here. On Calling Attention, the statement is always read out by the Minister in the House. We are diluting every practice in Parliament. What is this? He should read out the statement.

MR. SPEAKER: If the Member wants, the statement will be read out.

SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : Not just the Member, we also want it to be read.

MR. SPEAKER: You can also say that.

SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : This is the property of the House.

MR. SPEAKER: Shri Dasmunsi, there is nothing in this to get agitated. You can stand up and say that you want the statement to be read out.

SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : We want to know what is there in the statement.

MR. SPEAKER: Why do get agitated unnecessarily? There is no necessity of this. You can always stand up and ask for it.

SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : I beg your pardon, Sir.

MR. SPEAKER: Thank you.

Even if one Member wants it, I would ask the Minister to read out the statement.

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री (डॉ. सत्यनारायण जटिया) : अध्यक्ष जी, संविधान के अनुच्छेद ३६६ (२४) के अनुसार, " अनुसूचित जातियोंसे ऐसी जातियां, मूलवंश या जनजातियां अथवा ऐसी जातियों, मूलवंशों या जनजातियों के भाग या उनमें के यूथ अभिप्रेत हैं जिन्हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए अनुच्छेद ३४१ के अधीन अनुसूचित जातियां समझा जाएगा ।"

२. संविधान के अनुच्छेद ३४१ के खण्ड (१) में यह उपबंध है कि " राष्ट्रपति, किसी राज्य अथवा संघ राज्य क्षेत्र के संबंध में और जहां वह राज्य है, वहां उसके राज्यपाल से परामर्श करने के पश्चात् लोक अधिसूचिना द्वारा, उन जातियों, मूलवंशों या जनजातियों अथवा जातियों, मूलवंशों या जनजातियों के भागों या उनमें से यूथों को वनिर्दिष्ट कर सकेगा, जिन्हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए, यथास्थिति, उस राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के संबंध में अनुसूचित जातियां समझा जाएगा।"

3. इसके अतरिक्त, संविधान के अनुच्छेद ३४१ के खण्ड (२) में यह व्यवस्था है कि "संसद, वधि द्वारा, किसी जाति, मूलवंश या जनजाति के अथवा जाति, मूलवंश या जनजाति के भाग या उसमें से यूथ को खण्ड (१) के अधीन निकाली गई अधिसूचना में वनिर्दिष्ट अनुसूचित जातियों की सूची में सम्मिलित कर सकेगी या उसमें अपवर्जित कर सकेगी, किन्तु जैसा ऊपर कहा गया है उसके सिवाय, उक्त खण्ड के अधीन निकाली गई अधिसूचना द्वारा परिवर्तन नहीं किया जाएगा। "

४. अनुसूचित जातियों की सूची में सम्मिलित करने के लिए लागू कसौटी "अत्यन्त सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ापन है जो अस्पृश्यता की परम्परागत प्रथा के कारण होता है। "

५. संविधान (अनूसूचित जाति) आदेश, १९५० के पैरा ३ में केवल हिन्दू, सिक्ख और बौद्ध धर्म शामिल हैं। इसके द्वारा इन धर्मों से सम्बंधित व्यक्ति ही अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल किए जाने के पात्र हैं, यदि वे उक्त संवैधानिक आदेश में वहित शर्तें पूरी करते हों। राष्ट्रपतिय संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, १९५० के पैरा ३ की वैधता पर उच्चतम न्यायालय में सूसई आदि बनाम भारत संघ और अन्य के मामले (१९८३ की प्रकरण संख्या ९५९६) में विचार किया गया था, जिसमें शीर्ष न्यायालय ने निर्णय के पैरा ७ में टिप्पणी की कि "अब यह विवाद का विषय नहीं हो सकता कि जाति प्रथा हिन्दू सामाजिक संरचना की एक विशेषता है। यह एक सामाजिक घटना है, जो हिन्दू समाज के लिए अनूठी है। हिन्दू सामाजिक व्यवस्था केविभाजन का संदर्भ एक समय व्यावसायिक और कार्य संबंधी पेशे से दिया जाता था जिसे एक संरचनात्मक उत्तराधिकार में ढाल दिया गया जो शताब्दियों के बाद निश्चित रूप से एक ऐसे स्तर में ढाल दिया गया जहां कि व्यक्ति का निर्धारण जन्म से निर्धारित किया गया। जो सामाजिक सीढ़ी के निचले भाग पर थे, उनका अस्तित्व सभ्य समाज की परधि से परे समझा गया, और वे यहां तक कि वास्तम में "स्पृश्य " भी नहीं थे। इस सामाजिक प्रवृत्ति ने उन जातियों को गम्भीर सामाजिक एवं आर्थिक असमर्थताओं तथा सांस्कृतिक व शैक्षिक पिछड़ेपन के हवाले कर दिया। "

६. शीर्ष न्यायालय ने अपने निर्णय के पैरा ८ में यह टिप्पणी की कि "यह बहुत स्पष्ट है कि राष्ट्रपति जी के पास यह उल्लेख करने वाली वह सभी सामग्री थी कि हिन्दू और सिक्ख समुदायों के दलित वर्गों में इतनी मात्रा में आर्थिक और सामाजिक असमर्थता एवं सांस्कृतिक व शैक्षिक पिछड़ापन है कि इन दो समुदायों में उन जातियों के लोगों ने अनुसूचित जातियों से संबधित प्रावधानों के संरक्षण की मांग की। यह स्पष्ट था कि उनकी दशा में सुधार लाने और उनकी उन्नति की व्यवस्था करने के लिए राज्य द्वारा अपने विधायी और कार्यकारिणी शक्तियों के माध्यम से हस्तक्षेप पर विचार करना आवश्यक समझा गया। इसे स्मरण रखना चाहिए कि उन्हें अनुसूचित जातियों के व्यक्ति समझे जाने के लिए पैराग्राफ ३ में सम्मिलित की गई घोषणा के ऐसी घोषणा थी जो संविधान के प्रयोजनों के लिए की गई थी। यह एक घोषणा थी जो संविधान के अनुच्छेद ३४१ के खण्ड (१) द्वारा लागू की गई। " शीर्ष न्यायालय ने निर्णय के पैरा ८ में इस प्रकार निष्कर्ष दिया "इसलिए यह कहना संभव नहीं है कि राष्ट्रपति ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, १९५० के पैरा ३ को अधनियमित करने में अपने फैसले के प्रयोग में स्वेच्छा से काम किया।
७. ऐसा आरोप है कि १९३५-५० के दौरान "दलित मुस्लिम " वे लाभ प्राप्त कर रहे थे, जो अनुसूचित जातियों के लिए उपलब्ध हैं तथा संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, १९५० ने दलित मुस्लिमों को इन लाभों से वंचित कर दिया है। यह स्वष्ट किया जाता है कि कोई उपलब्ध रिकार्ड नहीं है जो यह दर्शाता है कि दलित मुस्लिमों को १९३५-५० की अवधि के दौरान वे लाभ मिल रहे थे जो अनुसूचित जातियों के लिए उपलब्ध हैं। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की सूचियों में संशोधन संबंधी सलाहकार समति, भारत सरकार की रिपोर्ट में यह उल्लेख है, "संगत रिकार्डज दर्शाता है कि अनुसूचित जातियों की सूची तैयार करने में इस्तेमाल की गई कसौटी अस्पृश्यता की ऐताहासिक प्रथाओं से उत्पन्न सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ापन है। १९५० में तैयार की गई अनुसूचित जातियों की सूची भारत सरकार अधनियम, १९३५ के तहत अनुसूचित जातियों की सूची की संशोधित पाठ थी, जौ क्रमश: दलित वर्गों की पूर्ववर्ती सूची के क्रम में थी। यह ज्ञात है कि दलित वर्गों को भारत के जनगणना आयुक्त द्वारा १९३१ में सुव्यवस्थित तरीके से श्रेणीकृत किया गया, जिन्होंने श्रेणी के लिए निम्नलखित निर्देश दिए थे -
" मैंने दलित जातियों को उन जातियों के रूप में स्पष्ट किया है जिसके साथ सम्पर्क से ऊंची जातियों के लिए शुद्धकरण अपरिहार्य है ऐसा उद्देश्य नहीं है कि परिवर्तन का व्यवसाय से ऐसा कोई संबंध है किन्तु उन जातियों को, जिन्हें हिन्दू समाज में उनकी पारम्परिक स्थिति के कारणों से उदाहरण के लिए मन्दिरों में प्रवेश के लिए रोका जाता है अथवा अलग कुंओं का प्रयोग करना होता है या स्कूल भवन के भीतर बैठने की अनुमति नहीं दी जाती है किन्तु बाहर रहना पड़ता है अथवा इसी प्रकार की असमर्थताओं का सामना करना पड़ता है। " अत: यह स्पष्ट है कि दलित मुस्लिमों अथवा दलित ईसाइयों को १९३५-५० के दौरान दलित वर्गों की सूची में शामिल नहीं किया गया। अनुसूचित जातियों की सूची में ईसाई धर्म में परिवर्तित अनुसूचित जातियों में शामिल करने के मुद्दे पर भारत के महारजिस्ट्रार और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति आयोग के साथ परामर्श करके कार्रवाई की गई है। भारत के महारजिस्ट्रार ने विचार व्यक्त किया है कि जातियों के आधार पर ईसाइयों का स्तर विन्यास अन्तर्राष्ट्रीय विवाद का विषय बन सकता है और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर यह गलतफहमी हो सकती है कि कहीं भारत ईसाइयों में जाति प्रथा को तो नहीं थोप रहा है। अत: ऐसा आरक्षण न्यायोचित नहीं है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग ने मत व्यक्त किया है कि आरक्षण के प्रयोजन में अनुसूचित जातियों की सूची में दलित ईसाइयों को सम्मिलित करना न तो वांछनीय है और न ही न्यायोचित है। इसी प्रकार, इस्लाम में परिवर्तित अनुसूचित जातियों को सम्मिलित करने के मामले में भारत के महारजिस्ट्रार ने राय दी है कि यह गम्भीर विवाद और साथ ही मुस्लिमों में असंतोष का विषय होगा। यदि उनके समुदाय को अस्पृश्यता की पारम्परिक प्रथा के कारण उत्पन्न, विशेष कर भारत के संविधान के अनुच्छेद ३४१ के प्रयोजन के लिए पिछड़ेपन के आधार पर हिन्दू जातियों के अनुरूप मान्यता दी जाती है। इस संबंध में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग ने अभिमत व्यक्त किया है कि मुस्लिमों को अनुसूचित जातियों की सूची में जोड़ने के प्रस्ताव का कोई औचित्य नहीं है। अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल करने के लिए धर्म के आधार पर कोई बाधा नहीं है।
श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : अध्यक्ष महोदय, माननीय मंत्री जी ने जो जवाब दिया है, मुझे ऐसा लगता है कि यह किसी गवर्नमैंट ऑफिसर का तैयार किया जवाब है जिसे उन्होंने सदन में पढ़ दिया। इन्होंने सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़ेपन की चर्चा की। देश में चाहे जिस जाति के लोग हों चाहे वे ब्राहमण हों, राजपूत हों, कायस्थ हों, भूमिहार हों, कुर्मी हों, कोली हों, सामाजिक, आर्थिक पिछड़ेपन से ग्रस्त ऐसे लोगों को आरक्षण की सुविधा मिलनी चाहिए। हम भी इसके पक्षधर हैं लेकिन जो देश में सबसे ज्यादा कमजोर रहे उनकी तरफ सरकार ने ध्यान नहीं दिया। मंत्री जी ने उनकी अपने जवाब में चर्चा की कि छुआछूत के कारण, सामाजिक अव्यवस्था के कारण, आर्थिक पिछड़ेपन के कारण, सांस्कृतिक अव्यवस्था के कारण, मंदिर में प्रवेश न करने के कारण. पानी के नजदीक न जाने के कारण, घर में प्रवेश न करने के कारण उनकी हालत और खराब होती चली गई। इन सब चीजों और सामाजिक अव्यवस्था के कारण हिन्दू दलितों को आरक्षण की सुविधा सबसे पहले दी गई। पता नहीं, जटिया साहब को इसकी जानकारी है या नहीं? हमारे प्रदेश में पूरी आबादी का ८० से ८५ प्रतिशत भाग दलित मुसलमानों का है। शायद इन्होंने इसे नहीं देखा। मैं जिस इलाके से आता हूं, वहां के लोगों के पास पानी की कोई सुविधा नहीं है, उनके बदन पर कपड़े नहीं हैं। आप किशनगंज. पूर्णिया, अररिया और कटिहार में जाकर उनकी स्थिति देख सकते हैं। ( व्यवधान)मैंने इस बात की पहले ही चर्चा की है। मैं जानकारी के लिए बताना चाहता हूं कि आप इस बात को स्पष्ट रूप से जानें कि आज भी मुसलमान अशक्षित हैं। आपने लिखा है कि " अज्ञानता, अशिक्षा और आर्थिक अव्यवस्था के कारण पांच प्रतिशत से कम देश के मुसलमान लोग पढ़े-लिखे हैं " इनमें से दलित मुसलमानों की संख्या डेढ़ से दो प्रतिशत भी नहीं होगी। जितनी संख्या में हिन्दू के बाद मुसलमान देश में है, उसके मुताबिक उनकी सरकारी नौकरियों में कितनी भागीदारी है, यदि उसे देखेंगे तो उनकी सम्पूर्ण देश में भागीदारी एक-डेढ़ प्रतिशत के बीच है। आप सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था की बात करते हैं। आप उस बात को याद करिए जब बाबा साहेब अम्बेडकर ने पूना एक्ट के तहत इस चर्चा को उठाया था, उन्होंने किसी जाति या धर्म को नहीं बांधा। उन्होंने डिप्रैस्ड क्लास, ऑप्रैस्ड क्लास और ऑस्टरसाइज्ड क्लास को आरक्षण देने की बात कही थी। आपने उन चीजों को ध्यान में रखते हुए कुछ काम नहीं किया। १९३२ में यह सवाल उठा था। १९३५ में पूना एक्ट के तहत इसमें कामयाबी मिली। जब १९५० में धार्मिक पाबंदी लग गई तो आप कह रहे हैं कि हमें उसकी जानकारी नहीं है कि दलित मुस्लिम को किसी तरह का आरक्षण देने की बात थी या नहीं?
   
सरकार ने १९५० में धार्मिक पाबंदी लगाई लेकिन उसके बाद दो बार एक्ट में संशोधन किया गया। उसके बाद ही सिक्ख दलित को आरक्षण मिला। १९९० में श्री राम विलास पासवान ने बौद्ध दलितों को आरक्षण दिलाने का काम किया। आप पूवार्ंचल राज्य में चले जाइये। केरल में चले जाइये जहां क्रिश्चियन दलितों को आरक्षण मिला हुआ है। मध्यप्रदेश और राजस्थान में भूमिहारों और राजपूतों को आरक्षण देने का काम किया गया है। जब दोनों मुख्य राजनैतिक दल इसके पक्षधर हैं और इसे करने का काम किया है, यह अच्छी बात है। यदि ब्राहमण और राजपूत में गरीब लोग हैं तो उन्हें आरक्षण मिलना चाहिये। मैं भी उनका पक्षधर हूं। उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति को देखकर उनके आरक्षण की वकालत पूरे देश में होनी चाहिये। क्या सरकार ने कभी यह सोचा कि इस देश में दलितों को आरक्षण मिला हुआ होने के बावजूद उनकी क्या स्थिति है? देश में दलित मुसलमानों की संख्या क्या है? इस सदन में कितने दलित मुसलमान हैं? पूरे देश में एक-दो दलित मुसलमानों के आई.ए.एस. आफिसर्स होंगे। जब संविधान की धारा-१४ में स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है कि कानून की नजर में सब धर्म बराबर हैं और संविधान की धारा-१५ एवं १६ के अनुसार लिंग, धर्म, जाति, नस्ल या जन्म के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा तो क्या संविधान की इस धारा को दरकिनार कर दिया जायेगा? जब संविधान की धारा-२५ में यह व्यवस्था की गई है कि सब को धार्मिक स्वतंत्रता है तो क्या बंजारा, धुनिया. नाई, हज्जाम, जुलाहा, चूड़ीहार, लुहार, रंगरेज़ आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े रहेंगे? इन्हीं जातियों के लोग आज हिन्दू समाज में पिछड़े हुये लोग हैं। ये लोग जो भी काम करते हैं, वहीं काम दलित मुसलमान भी करते हैं। चाहे पाखाना उठाने का कार्य हो या कोई ऐसा कार्य हो, यही लोग ही करते हैं। क्या उन्हें बांटने का काम किया जायेगा? जब दलित मुसलमानों में काम करने की वही व्यवस्था है जो हिन्दू दलित काम करते हैं तो हम उन्हें बांटने का काम नहीं कर सकते।
अध्यक्ष महोदय, अभी बिहार के सूरजपुरी लोगों के सवाल पर हल्ला किया गया। बिहार सरकार ने( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : मैं आपको नियम बता दूं कि कहीं कोई सदस्य यह सोचने लग जाये कि कालिंग अटैंशन के नाम पर उस पर मैं अन्याय कर रहा हूं, ऐसा नहीं है। कालिंग अटेंशन का नियम यह है कि केवल प्रश्न पूछना होता है और मैंने सोचा चूंकि विषय इम्पार्टेंट है, इसलिये आपको थोड़ा भाषण करने की अनुमति दी लेकिन आप इतना लम्बा भाषण करेंगे तो अन्य सदस्यों को ज़ीरो ऑवर का मौका नहीं मिलेगा। आप सीधे प्रश्न पूछिये।
श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : अध्यक्ष महोदय, माननीय मंत्री जी ने दो बातों को केन्द्र बिन्दु बनाया। इस देश में हिन्दू समाज में दलित कमजोर है। लेकिन उससे ज्यादा कमजोर मुस्लिम दलित हैं। देश में इतना गरीब और इतना दलित कोई नहीं जितना मुस्लिम दलित है। माननीय मंत्री जी ने छूआछूत की बात उठायी। सिक्ख दलित में छूआछूत की कोई बात नहीं थी लेकिन सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में उसे आरक्षण दिया गया। इसी प्रकार ब्राहमण और राजपूत में जो गरीब हैं, उनमें छूआछूत की कोई बात नहीं थी लेकिन मन्दिर में जाने और पानी पीने के लिये कोई आस्पृश्यता की बात नही थी। क्या उन्हें आरक्षण देने के लिये बात की गई या नहीं? यदि आपने की है तो किस आधार पर उन्हें आरक्षण देना चाहते हैं? आप धार्मिक पाबंदी को खत्म करिये क्योंकि १९५० के बाद आपने लिख दिया है। मैं चाहता हूं कि यदि इस देश की एन.डी.ए. की सरकार निश्चित रूप से इस काम को करती है तो याद रखिये कांग्रेस ने आज तक ८५-९० प्रतिशत दलित मुसलमानों के वोट लिये हैं, उनके दर्द पर कांग्रेस ने कभी मरहम नहीं लगाई, कभी उन लोगों की आत्मा की आवाज नहीं सुनी। यदि कांग्रेस ने उनकी आवाज सुनी होती तो आज तक इन्होंने जो राज किया, इन्हें निश्चित रूप से सबसे पहला काम करना चाहिए था तो दलित हिन्दुओं के बाद मुस्लिम दलितों के लिए काम करना चाहिए था। मैं एन.डी.ए. सरकार से आग्रह करूंगा कि आपको इन चीजों को गंभीरता से लेना चाहिए। हिन्दुस्तान का कोई मुसलमान इन चीजों के खिलाफ नहीं है और न ही ये किसी की धार्मिक भावनाओं की अनदेखी करता है। यह उनका अधिकार है, उनका हक है, उनके सम्मान, आर्थिक व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था को बढ़ाने के लिए ये सब चीजें हैं। जब तक समाज में असंतुलन की व्यवस्था रहेगी, तब तक मैं आरक्षण का पक्षधर हूं। जिस दिन समाज में संतुलन स्थापित हो जायेगा, आप आरक्षण खत्म कर दीजिए, मेरा कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन इन्हें संतुलित समाज में लाने के लिए आपको आरक्षण की व्यवस्था करनी पड़ेगी। इसमें धार्मिक भावनाओं का कोई मतलब नहीं है। यह मेरा आपसे आग्रह है। मैं इससे ज्यादा आपसे कुछ नहीं कहना चाहता। इन्हें आप सिर्फ यह कहकर मत टालिये कि कहीं न कहीं धार्मिक भावना इसमें होगी। आप सर्वे करा लीजिए, देश के सारे मुसलमान चाहते हैं कि सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था निश्चित रूप से हम भी डेवलप करे और हमारे कमजोर लोगों भी डेवलप करें। मैं समझता हूं कि आप मेरी भावना को समझेंगे और मुस्लिम दलितों के लिए ३४१ एक्ट के तहत आरक्षण का प्रावधान करेंगे।
...( व्यवधान)* * Not Recorded अध्यक्ष महोदय : इनका आगे का भाषण रिकार्ड पर नहीं जायेगा।
श्री राम विलास पासवान (हाजीपुर) : अध्यक्ष जी, मैं आपका बहुत शुक्रगुजार हूं कि आपने इस महत्वपूर्ण विषय पर कालिंग अटैंशन में मुझे बोलने का अवसर दिया। इसमें तीन शब्द हैं - प्रथम दलित मुसलमान, दूसरा दलित क्रिश्चियन और तीसरा शब्द है कि और भी अन्य समुदाय और अनुसूचित जातियों को शामिल नहीं किया गया है। मंत्री जी ने जो जवाब दिया है, उसमें दो-तीन बातें कहीं हैं और वे बातें सही हैं। मैं उनके डिटेल में नहीं जाना चाहता। चूंकि मैं इस विभाग का मंत्री रहा हूं। अनुसूचित जातियों को कैसे जोड़ा जाता है, कहां से आता है, वह जानता हूं। इसमें मामला सीधा है, कि धर्म के आधार पर किसी के साथ डिसक्रमिनेशन नहीं होना चाहिए। इस देश में कोई मुसलमान विदेशी नहीं है। कोई बाबर की संतान नहीं है, सब इसी देश के लोग हैं और यह भी सही है कि कोई क्रिश्चियन भी विदेशी नहीं है। कोई अंग्रेज या गोरा क्रिश्चियन नहीं है। सब इसी देश के लोग हैं। इस देश में जाति व्यवस्था रही है। जिन लोगों ने धर्म परिवर्तन किया होगा, वे किसी न किसी जाति से गये होंगे। इसी तरीके से यदि हम मुसलमानों में देखें तो शेख है, सैयद है, बक्को, धोबी, नट, दर्जी, पमरिया, बटियारा, भिश्ती, गुज्जर, गद्दी, मल्लाह, बकरवाल आदि जातियां हैं। इन्होंने जवाब में कहा कि धर्म में हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। हम भी इस बात को मानते हैं। लेकिन पहले से ही ये लोग मंडल कमीशन के तहत हैं। पहले से ही ये लोग पिछड़ी जातियों से हैं। अंतर सिर्फ इतना ही है कि पिछड़ी जातियों से उन्हें अनुसूचित जाति में जोड़ा जाए। मंत्री जी आप देखें, आपने जो १९३५ का एक्ट का हवाला दिया है। महात्मा गांधी ने १९३२ में जब आमरण अनशन किया था, उसके बाद पूना पैक्ट बना था। उसी के तहत यह १९३५ का एक्ट बना लेकिन उसमें कोई रिलीजन का सवाल नहीं था। जो भी अछूत हैं, अनटचेबल हैं, उन्हें अनुसूचित जातियों का दर्जा दिया गया । यह बात सही है कि उसमें सारे धर्म के सदस्य थे। बाद में १९५० में सिर्फ हिन्दू दलित को जोड़ा गया। लेकिन जब हल्ला हुआ तो फिर १९५६ में सिख दलित को जोड़ा गया। १९९० में हमने नव बौद्धौं को अनुसूचित जाति में जोड़ने का काम किया । अब सिर्फ दो समुदाय के लोग दलित मुस्लिम और दलित क्रिश्चियन बच गये हैं । चुंदूर में जो घटना घटी, वहां लोग मारे गये, वह बहुत दुखद घटना थी । हम लोग वहां से न्याय ज्योति लेकर चले थे। वे लोग दलित क्रिश्चियन थे। लेकिन यह बात कोई नहीं जानता। सब कहते हैं कि दलित लोग मारे गये। इसलिए धर्म का तर्क देना ठीक नहीं है। श्री पी.एम.सईद, जो डिप्टी स्पीकर हैं, वह मुसलमान हैं। लेकिन उनकी कांस्टीटुएंसी ट्राइबल की है। इस तरीके से क्रिश्चियन ट्राइबल को रिजर्वेशन मिल सकता है। ट्राइबल क्रिश्चियन को आदिवासी माना जाता है तो ट्राइबल मुस्लिम को रिज़र्वेशन मिल सकता है तो जो दलित क्रिश्चियन हैं, उनको रिज़र्वेशन क्यों नहीं मिल सकता? दलित मुसलमान को अनुसूचित जाति का दर्जा क्यों नहीं दिया जा सकता । ( व्यवधान)
आप ऐसे मत करिये। आप कहें तो हम आपके बगल में ही आकर बैठ जाएं। ( व्यवधान)
उसी प्रकार से मुसलमानों में शेख हैं, सैयद हैं, हर जातियों की कैटागरी बनी हुई है और सारे के सारे दलित वर्ग के लोग वहां किसी सत्ता के लिए नहीं गए थे। वे इसलिए गए थे कि यहां धर्म में उनका जो अपमान हो रहा था, उससे बचने के लिए गए थे। मैं आपसे आग्रह करना चाहूंगा कि ( व्यवधान)
श्री रतिलाल कालीदास वर्मा (धन्धुका):वे लोग वहां जाकर भी वही काम करते हैं। अगर वहां जाकर भी वही काम कर रहे हैं तो धर्म बदलने की क्या ज़रूरत थी?( व्यवधान)जब ये सत्ता में थे पचास सालों तक, तब कुछ नहीं किया और आज बोल रहे हैं। ( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : आप ऐसे कैसे बोल सकते हैं? बीच में बोलने का कोई अधिकार आपको नहीं है। प्लीज़ बैठिये। आपका कोई मुद्दा हो तो जब चर्चा होती है, चर्चा में आसन की अनुमति से आप खड़े होकर बोल सकते हैं, लेकिन जब एक सदस्य बोल रहा है तो उनको अपना द्ृष्टिकोण रखने का पूरा अधिकार है। कृपया बैठिये।
श्री राम विलास पासवान: अध्यक्ष जी,इनको मालूम नहीं है कि पिछले कुछ दिनों तक क्रिश्चियैनिटी में भी चर्च में बिशप और फादर बनने का उनको अधिकार नहीं था।
इसी प्रकार एक और जो तीसरा तबका है जो एक राज्य में अनुसूचित जाति में है लेकिन दूसरे राज्य में नहीं है। बिहार में पासवान शैडयूल्ड कास्ट में है लेकिन दिल्ली में वह अनुसूचित जाति में नहीं है। फिशरमैन पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जाति में है लेकिन बिहार में अनुसूचित जाति में नहीं है। धोबी, फिशरमैन यहां अनुसूचित जाति में है लेकिन कर्नाटक में और दूसरे राज्यों में अनुसूचित जाति में नहीं है। हम लोगों ने एक बिल अपने समय में तैयार किया था कि जो एक राज्य में अनुसूचित जति में होगा, दूसरे राज्य में जाने पर उसकी जाति नहीं बदलती है इसलिए एक जाति यदि एक राज्य में अनुसूचित जाति में होगी तो वह देश में कहीं भी जाए, अनुसूचित जाति या जनजाति का दर्जा उसे मिलना चाहिए। अनुसूचित जाति का दर्जा सैन्ट्रल गवर्नमेंट में है लेकिन राज्य सरकार में नहीं है। उसी तरीके से बिहार से हमारे शरद यादव आते हैं, जार्ज साहब आते हैं। वहां बहुत दिनों से मांग रही है कि गोड को शैडयूल्ड कास्ट्स में शामिल किया जाए। उत्तरांचल में नमोशुद्रा है, पोद है, पांडु है, राजवंशी है, धुमाली है, पालिया है, मालो है, केवट है, जेले है, कोरी है और चमार इत्यादि सारी की सारी जातियां हैं जिनको अनुसूचित जाति में शामिल नहीं किया गया है। इसी तरह से दिल्ली में पासवान है। मैं चाहूँगा कि सरकार इस ओर गंभीरता से विचार करे और यह बात कहना कि वह मुस्लिम हैं और वहां जाति-पाति नहीं है, क्रिश्चियन्स में जाति-पाति नहीं है और वहां से ऑब्जैक्शन आ रहा है। कहीं से ऑब्जैक्शन नहीं आ रहा है। सरकार को सकारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता है और इससे सामाजिक समरसता भी आएगी। धर्म के नाम पर भेदभाव भी खत्म होगा और आपस में एक दूसरे के प्रति वैमनस्य भी खत्म होगा, यही मैं आपके माध्यम से आग्रह करना चाहता हूँ। ( व्यवधान)यह सारे देश की भावना है। ( व्यवधान)
SHRI HANNAN MOLLAH (ULUBERIA): Hon. Speaker, Sir, I thank you for giving me the opportunity to speak on this important subject. I agree with my earlier colleagues who raised the point that the Dalits should be given this reservation opportunity irrespective of their religion. The Government should consider it in proper perspective.
Apart from that, I want to add some new points. Santhal tribe people are in big number and they went from Chhota Nagpur to various places all over the country during British Raj. The Santhal community is recognised as Scheduled Tribes in States like Bihar, Orissa and West Bengal, but in other States like Assam they are not recognised as Scheduled Tribes. So, a large number of people belonging to the Santhal community do not get the benefits of Scheduled Tribes. All these tribes should be recognised as Scheduled Tribes all over the country.
Secondly, during partition a large number of people migrated to India from Pakistan. The people from Pakistan migrated on two occasions to India. Once they came after the 1947 partition and again they migrated after the 1971 war. These people settled mainly in West Bengal and in some other parts of India, like Chattisgarh, Uttar Pradesh, Bastar and Udhamsinghnagar. Many amongst these people are not getting the benefit of being Scheduled Castes. There are, at least, four to five sub-castes. One is the Namashudra. There are a large number of people who belong to this sub-caste and who migrated from East Pakistan. Then, there are sub-castes like the Pondra, Pode and Majhi. The people belonging to these sub-castes are recognised as Scheduled Castes in the State of West Bengal. But they are not recognised as a Scheduled Caste community in States like Uttaranchal, Uttar Pradesh, Delhi and other places.
Sir, a community is recognised as a Scheduled Caste community on the basis of certain criteria. It is not out of the blue that such a recognition is accorded to a community. Now, if after due consideration of certain criteria a community is recognised as Scheduled Caste in one State, then why should they not be considered as Scheduled Castes in other States? There are about a few lakhs of people in places like Udhamsinghnagar, Nainital and such other places who are not recognised as persons belonging to Scheduled Caste. Those people came to Delhi last week and sat on a dharna. They are being deprived of their benefits.
उसमें हम सब भी गए थे। वे लोग भी शेडयूल्ड कास्ट्स हैं। So, these people should be recognised as belonging to the Scheduled Caste community in States like Uttaranchal, Uttar Pradesh, Delhi and other places.
Sir, the Santhals, as I said, should be recognised as a Scheduled Tribe community in the State of Assam. As has been suggested by Shri Ram Vilas Paswan, once a community is recognised as being a Scheduled Caste community in one State, that community should be given recognition as a Scheduled Caste community throughout the country. That would render...
अध्यक्ष महोदय : जितने भी माननीय सदस्य इस विषय पर अपना समर्थन देना चाहते हैं, उनके नाम एसोसिएट कर दिए जाएंगे। Shri amchandra Paswan is the last speaker on this subject. He has given notice. His name has come in the ballot. Let him speak now.
SHRI HANNAN MOLLAH : Sir, recently the Supreme Court has given a judgement that once a community is recognised as Scheduled Caste in one place in India, then they should be recognised as Scheduled Caste in every place in the country. That judgement should be considered and implemented properly (Interruptions)
श्री रामचन्द्र पासवान (रोसेड़ा):अध्यक्ष जी, आज तक हमने सुना है और देखा है कि लोगों का नाम बदला है। ( व्यवधान)
SHRI ANIL BASU (ARAMBAGH): Sir, there is an unanimity amongst Members on this issue (Interruptions) Every section of the House agrees on this (Interruptions) You please take the sense of the House and ask the hon. Minister to reply to this (Interruptions)
अध्यक्ष महोदय : पासवान जी, आप बोलिए।
श्री रामचन्द्र पासवान : अध्यक्ष जी, आज तक( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : रामचन्द्र पासवान जी, आप अपने बड़े भाई साहब की तरह बोलते रहिए।
श्री रामचन्द्र पासवान : अध्यक्ष महोदय, एक रोज हमारा जीरो आवर में ही भाषण हुआ था, लेकिन हल्ला-गुल्ला होने के कारण हम अपनी बात पूरी नहीं कह पाए और बहुत कुछ बोलने से छूट गया और आज भी मुझे लग रहा है कि कहीं हमारा भाषण छूट न जाए। आपके आसन में होने के कारण ही हमें बोलने का अवसर मिल रहा है। आपने हमें बोलने के लिए अवसर प्रदान किया, इसके लिए हम आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देते हैं। ( व्यवधान)
श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव : अध्यक्ष महोदय, यह बिलकुल सत्य है कि आपके आसन में होने के कारण यह सब्जैक्ट सदन में आया है, अन्यथा यह सदन में ही नहीं आता। ( व्यवधान)
श्री रामचन्द्र पासवान :अध्यक्ष महोदय, अभी तक लोगों का नाम बदला है, टाइटल बदला है, लेकिन जाति नहीं बदलती है। आज पूरे देश में, चाहे किसी भी प्रदेश में लोग रहते हों, उनकी जाति एक ही रहनी चाहिए। आज मंत्री जी का जिस तरह का स्टेटमेंट आया है, उसमें बहुत सी जातियां हैं, जो एक-दूसरे राज्य से भिन्न हैं, उनका दर्जा एक-दूसरे राज्य से अलग दिया गया है। इसलिए हम सरकार से जानना चाहते हैं कि एक जाति, जो एक राज्य में अनुसूचित जाति में है और दूसरे राज्य में अनुसूचित जाति में नहीं है, इसके लिए सरकार पूरे देश में सर्वे कराकर सदन में विधेयक क्यों नहीं लाती है? दूसरा, यह सरकार जो धीरे-धीरे एक-एक जाति को जोड़ने का काम कर रही है, इसके लिए व्यापक पैमाने पर क्यों नहीं सदन में चर्चा करा कर विधेयक लाने का काम करती है? हम जानना चाहते हैं कि क्या इसके लिए सरकार पूरे देश के प्रदेश के लोगों के लिए विधेयक लाना चाहती है? तीसरा, इसके लिए आज दलित मुस्लिम, दलित क्रिश्चयन मोर्चा के लिए हजारों-हजार की तादाद में लोग जेल जा रहे हैं। इसके लिए आंदोदन हो रहा है। अभी परसों हमारे साथ लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, रामविलास पासवान जी, कमाल असरफराइन जी, डा. हजाज अली जी थे और पप्पू यादव जी थे, जिन्होंने अभी सदन में चर्चा की है। हम देखते हैं कि हजारों-हजार लोगों ने परसों भी गिरफ्तारियां दी हैं।
अध्यक्ष महोदय, हम आपके माध्यम से सरकार से मांग करना चाहते हैं कि सरकार क्यों नहीं इस विधेयक को यहां लाकर इन लोगों को अनुगृहीत कर रही है। इसके अलावा नौनिया जाति के लोग हैं, जुलाहा, मल्लाह, नमोशुद्र, पोद्रा, बोद्ध और मांझी हैं, जो इससे बिलकुल वंचित हैं। इसलिए इन कास्टों को भी अनुसूचित जाति की सूची में शामिल किया जाए, यह हमारी प्रमुख मांग है। बहुत-बहुत धन्यवाद।
( व्यवधान)
श्री रतिलाल कालीदास वर्मा : अध्यक्ष महोदय, हम भी इस विषय पर दो मिनट बोलना चाहते हैं।( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : जो माननीय सदस्य इस विषय पर बोलना चाहते हैं, मैं उन सभी का नाम इस चर्चा में एसोसिएट कर दूंगा। I am associating the names of all of you. I will associate the names, of all those who are standing, with this discussion. All these names will be associated. लेकिन नियम के अनुसार दूसरे सदस्यों को बोलने की इजाजत नहीं है।
( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : कृपया आप बैठ जाइए।
( व्यवधान)
  MR. SPEAKER: You can raise this issue again under some other device. This is not the device under which I can permit you.
(Interruptions)
डॉ. सत्यनारायण जटिया : अध्यक्ष महोदय, जिस विषय पर ध्यानाकर्षण करने का काम हुआ है, उसमें राजेश रंजन जी ने जो विषय उठाया है,( व्यवधान)
MR. SPEAKER: Shri Ezhilmalai, I have associated your name. I am also associating the names of Shri Mahinder Singh Pal, Shrimati Hema Gamang and Shrimati Kanti Singh..
SHRI DALIT EZHILMALAI (TIRUCHIRAPPALLI): Sir, associating the name is all right, but this is an important issue.
अध्यक्ष महोदय :आप फिर कभी रेज़ कर सकते हैं। You can raise this issue again under some other device in the House. You can come to the Business Advisory Committee and ask for a discussion on this.
(Interruptions)
SHRI DALIT EZHILMALAI : Sir, this is an issue concerning about 35 per cent of the population of this country (Interruptions)
( व्यवधान) श्री रतिलाल कालीदास वर्मा : अध्यक्ष जी, एक पक्ष की बात सुनी गई है, हम भी अपनी बात रखना चाहते हैं।( व्यवधान)
MR. SPEAKER: Memebrs also want to take up the `Zero Hour’.
(Interruptions)
SHRI DALIT EZHILMALAI : This is a perennial problem (Interruptions) This has become a national issue (Interruptions)
MR. SPEAKER: Please listen to me. I have no problem on this subject. I know that most of the hon. Members of the House agree with the subject and some of them do not agree. This is bound to happen always. Therefore, the procedure for every rule is very specific.
The rule about Calling Attention is clear. Only those hon. Members who have given notices will be permitted to speak. I am bound by the rules which this House has framed. I cannot go beyond the rules which are framed. I, therefore, cannot allow more Members to speak.
You must realise another thing. At 1 o’clock I have to allow the Members to go for lunch. Before that ‘Zero Hour’ has to be taken up because I myself have invited the Minister concerned to reply on the Haj Committee issue which was very hotly discussed in the House. Do you not want me to discuss those issues?
I can let the hon. Members to associate themselves. There are 25 Members who want to speak. I am unable to allow them to speak. Otherwise, the issue of Haj Committee will not come for discussion. You cannot insist that on every issue there should be a long discussion. Shri Dalit Ezhilmalai, please sit down. I am prepared to allow you to associate your name.
(Interruptions)
SHRI AMAR ROY PRADHAN (COOCHBEHAR):Sir, in the Eighth Lok Sabha, a discussion on Calling Attention was converted into a discussion under Rule 193. That was also on the Scheduled Caste/Scheduled Tribe issue. It is a national issue. So, here also I request you that you can convert this Calling Attention to discussion under Rule 193.
MR. SPEAKER: I will check as to how it can be done. I have no problem, if the Business Advisory Committee agrees to it. I have absolutely no problem for any discussion now.
(Interruptions)
डॉ. सत्यनारायण जटिया : अध्यक्ष महोदय, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से ( व्यवधान)
SHRI DALIT EZHILMALAI : (Interruptions) But the reservation to other communities that is listed among the Scheduled Castes is based on the Census Commission Report of 1901, 1911 and 1931.
अध्यक्ष महोदय : मंत्री जी, आप अपना उत्तर शुरू कीजिए। आपका उत्तर ही रिकार्ड में जायेगा।
Now, nothing else will go on record.
(Interruptions)* *Not Recorded.
     
MR. SPEAKER: Shri Dalit Ezhilmalai, the hon. Minister will reply to your question also.
(Interruptions)
MR. SPEAKER: Mr. Minister, please take his question also into consideration.
(Interruptions)
MR. SPEAKER: Shri Ezhilmalai, I have already told the Minister to answer your question. You have already spoken and I have told him to reply to your question also.
डॉ. सत्यनारायण जटिया : अध्यक्ष महोदय, जैसा कि ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से ( व्यवधान)
श्री जी.एम.बनातवाला (पोन्नानी) :अध्यक्ष महोदय, मैं इतना कह रहा हूं कि मेरा नाम इसमें एसोसियेट किया जाये।
MR. SPEAKER: Shri Banatwalla, your name will be associated.
SHRI G.M. BANATWALLA : Thank you.
MR. SPEAKER: You are so nice to the Chair.
मोहम्मद अनवारूल हक़ (शिवहर) : अध्यक्ष महोदय, मैं बार-बार कह रहा हूं कि मेरा नाम भी एसोसियेट किया जाये।( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : आपका नाम भी एसोसियेट हो जायेगा। आप भी बहुत अच्छे हैं।
...( व्यवधान)
डॉ. सत्यनारायण जटिया : माननीय अध्यक्ष महोदय, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से एक महत्वपूर्ण विषय की ओर सदन का ध्यान आकर्षित करने का काम श्री राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव, श्री राम विलास पासवान, श्री हन्नान मोल्लाह और श्री रामचंद्र पासवान जी ने किय। आप सब जानते हैं कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का प्रतिशत तय है -- जिसमें १५ परसेंट अनुसूचित जाति के लिए, साढ़े सात परसेंट अनुसूचित जनजाति के लिए और २७ परसेंट पिछड़े वर्ग वालों के लिए आरक्षण दिया गया है। ( व्यवधान)
श्री दलित इजिलमलाई:आज की तारीख में उनका प्रतिशत क्या है ? क्या आज वह १५ परसेंट रह गया है ? आज एस.सी. का प्रतिशत क्या है? ( व्यवधान) Why are you not saying this? (Interruptions)
श्री राम विलास पासवान:अध्यक्ष महोदय, पप्पू जी ने जो कहा, आप स्लिप के तौर पर जवाब देंगे तो फंस जायेंगे। इनको मालूम नहीं है कि एस.सी. एस.टी. की पापुलेशन बढ़कर २६, साढ़े २६ परसेंट हो गयी है। यदि २६ परसेंट हो गयी है तो( व्यवधान)जो बैकवर्ड क्लास है, उनकी संख्या भी २६ परसेंट है। ( व्यवधान)
डॉ. सत्यनारायण जटिया : जो विद्यमान है, उसके बारे में बता रहा हूं। ( व्यवधान)मैं अपनी मर्जी से नहीं कह रहा हूं। ( व्यवधान)
श्री राम विलास पासवान:क्या यह जस्टीफाई करेंगे कि ५० परसेंट से ज्यादा नहीं जायेगा। यह आलरेडी ५० परसेंट से ज्यादा चली गयी है। ( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : उनका उत्तर क्या होगा, यह एंटीसिपेट आप कैसे कर सकते हैं ? उनके उत्तर का एंटीसिपेट करके आप कैसे बोल सकते हैं।
...( व्यवधान)
MR. SPEAKER: Shri Ezhilmalai, please sit down now.
I have given you enough opportunity to speak. Please cooperate with the Chair. I have nothing against the subject. I am interested in knowing what the Government wants to say.
(Interruptions)
SHRI DALIT EZHILMALAI :In the last Session also, you gave us time to raise this issue. (Interruptions)
MR. SPEAKER: Every Member is interested in knowing what the Government has to say. So, please allow the hon. Minister to speak. Please cooperate with the Chair.
SHRI DALIT EZHILMALAI : He is not coming out with the truth. (Interruptions)
MR. SPEAKER: He has not at all spoken. How can you say that he is not telling the truth?
SHRI DALIT EZHILMALAI : He has said that only 15 per cent reservation exists till today. According to the population of the community, reservation should be raised. (Interruptions)
MR. SPEAKER: He has not completed his sentence. Please sit down. By this attitude, you are putting the other Members to a loss.
डॉ. सत्यनारायण जटिया : अध्यक्ष जी, इस ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से एक महत्वपूर्ण विषय की ओर सदन का ध्यान आकृष्ट करने का काम किया गया है और इस बात पर श्री राजेश रंजन जी ने कहा था कि मुस्लिमों में जो दलित हैं, जो उनके काम के प्रकार हैं, उसके आधार पर उनको दलित का दर्जा दिया जाना चाहिए। निश्चित रुप से ये प्रश्न है कि अनुसूचित जाति किसको कहा जाएगा, इसका उल्लेख नियमों में भी है। प्रावधान जो किये गये हैं, वे कानून में भी हैं और उसके अन्तर्गत जो कहा गया है, उसमें ११ बातें ऐसी दर्शाई गई हैं जिसमें अस्पृश्यता के आधार बताए गए हैं और अस्पृश्यता के आधार में जो कहा गया है कि ऐसे व्यक्ति को अनुसूचित जाति का माना जाएगा जिसको सामाजिक रूप से किसी होटल में मनोरंजन के स्थान पर प्रवेश करने से नषिद्ध या प्रतिषेध किया जाता हो या किसी धर्मशाला या सराय में जाने से नषिद्ध या प्रतिषेध किया जाता हो।( व्यवधान)
श्री राम विलास पासवान:अभी किसी के साथ ऐसा नहीं किया जा रहा है।( व्यवधान) How can he say that there is no untouchability prevailing in the country? How can he say that untouchability is abolished? (Interruptions)
अध्यक्ष महोदय : मैंने आपको इजाजत नहीं दी है।
( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : राम विलास जी, आप सीनियर मैम्बर हैं। आप मंत्री भी रहे हैं।
डा. सत्यनारायण जटिया : मंत्री रहकर भी इस प्रकार का व्यवहार कर रहे हैं। आपको भी तो किसी दूसरे को सुनना चाहिए। ( व्यवधान)मैं कोई गलत नहीं बोल रहा हूं। जितना आप समझते हैं, उतना मैं भी समझता हूं। आपकी मर्यादा है, मेरी भी मर्यादा है। ऐसा मत बोलिए।( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : हर बात पर उनको आप रोकेंगे तो उत्तर कैसे पूरा होगा ?
( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : मंत्री जी जो कुछ निवेदन करना चाहते हैं, उनको निवेदन करने दीजिए।
( व्यवधान)
डा. सत्यनारायण जटिया : अध्यक्ष महोदय, चूंकि कॉलिंग अटैंशन एक निश्चित विषय है और इसमें कहा गया है कि मुस्लिम और ईसाई( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : मंत्री जी, आप अपना उत्तर पूरा कर सकते हैं। मैं आपको रोकना नहीं चाहता हूं।
( व्यवधान)
डा. सत्यनारायण जटिया : अब जैसा मैंने पहले ही कहा,( व्यवधान)
श्री रामदास आठवले (पंढरपुर) : अध्यक्ष महोदय, आप जानते हैं कि महाराष्ट्र में भी अभी बुद्दिस्ट बनने के बावजूद भी अनटचेबलिटी है। गांव-गांव में धर्म परिवर्तन करने के बाद भी वे लोग सोचते हैं कि हिन्दू ही है औऱ अगर हिन्दू का बुद्दिस्ट या क्रिस्चियन बन जाता है( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : रामदास जी को मैं नहीं रोक सकता हूं।
( व्यवधान)
श्री रामदास आठवले : इस अनटचेबलिटी खत्म करने के लिए सरकार के पास कोई प्रोग्राम होना चाहिए।( व्यवधान)
अध्यक्ष महोदय : मंत्री जी, आप बोलिए।
डा. सत्यनारायण जटिया : मैंने कहा कि एक निश्चित दायरे का प्रश्न है जिसमें मांग की गई है कि अनुसूचित जाति की सूची में जो मुस्लिम और ईसाई धर्म को मानने वाले ऐसे लोग हैं जो इस प्रकार का काम करते हैं जो अनुसूचित जाति के अन्य लोग भी ऐसे काम करते हैं और इसकी एक प्रक्रिया है।( व्यवधान)उस मान्य प्रक्रिया के अन्तर्गत ही इन सारी बातों को करने के लिए राज्य सरकार, महा रजिस्ट्रार, अनूसूचित जाति, जनजाति आयोग और उसके बाद मंत्रालय के बाद वे सारी बातें आने के बाद ही उनको विधेयक के माध्यम से स्थापित करने का काम किया जाता है। निश्चित रूप से जिस प्रकार की बात आज देश में कही जा रही है,( व्यवधान)उन सबको करने के लिए एक प्रक्रिया का अनुपालन किया जाए और राज्य सरकारों के माध्यम से महा रजिस्ट्रार के पास अनुसूचित जाति, जनजाति आयोग के पास प्रस्ताव करके जो अनुसूचित रूप से आ जाएगा, उसको काम करने के लिए विधेयक रूप में लाकर उसे पूरा करने के लिए अनुसूचित जाति को मानने के लिए जो मान्य प्रक्रिया है, उसको पूरा करने के लिए यह बात की जाती है। निश्चित रूप से इस प्रक्रिया से हम सब बंधे हुए हैं और यदि इस प्रक्रिया के अन्तर्गत कोई बात आती है तो उसको माने जाने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए।( व्यवधान)