Lok Sabha Debates
Discussion Regarding Flood And Drought Situation In The Country (Discussion Not ... on 27 August, 2010
> Title: Discussion regarding flood and drought situation in the country (Discussion not concluded).
MR. CHAIRMAN: Hon. Members, the discussion on flood and drought situation in the country has been admitted in the names of Shri Anant Kumar Hegde and Dr. Murli Manohar Joshi. Shri Anant Kumar Hegde has requested the hon. Speaker to allow Shri Navjot Singh Sidhu to raise the discussion on his behalf. Hon. Speaker has since acceded to his request.
Now, Shri Navjot Singh Sidhu.
1637 बजे श्री नवजोत सिंह सिद्धू (अमृतसर): सभापति महोदय, देवता न काठ की मूर्ति में है न मिट्टी की, देवता भावना में विद्यमान है, इसलिए आज मैं आपका शुक्रगुजार हूं कि आपने पंजाब और हरियाणा के बाढ़-पीड़ित, मुसीबतजदा, लाचार, बेकश लोगों की आवाज बुलंद करने का मुझे मौका दिया है। उनके हक की आवाज, “ चुप रहना है जुल्म की ताईद में शामिल, हक की बात कहो जुर्रते इजहार मत बेचो।” यह जुर्रत मुझे पंजाब की मिट्टी ने दी है, यह मेरे खून में है, विरासत में गुरू गोविंद सिंह जी ने मुझे दी है। “ कादिराए कार गुरू गोविंद सिंह, बेकशां यार गुरू गोविंद सिंह।” इसलिए आज उन बेकश लोगों की आवाज बुलंद करता हूं।
सभापति महोदय, यहां सब लीडर बैठें हैं। Leaders convert weakness into strength, obstacles into stepping stones and disaster into triumph. लेकिन बड़े अफसोस से मुझे यह कहना पड़ता है कि 63 साल देश को आजाद हुए हो गये, हमने अपनी सबसे बड़ी ताकत वाटर मैनेजमेंट को अपनी सबसे बड़ी कमजोरी बना लिया है।
सभापति जी, नेकचंद जी ने पंजाब में वेस्टेज और डब्ल्यूसी के स्टोन्स को लेकर, एक कलात्मक रवैया लेकर, उन्होंने एक रॉक-गार्डन बनाया, जो आज भी सारी दुनिया को आकर्षित करता है। गुरू की वाणी में पानी को कहा गया है कि “पवन गुरू, पानी पिता, माता धरत महत्” वह पानी जिसे अगर योजना और नीतिबद्ध तरीके से उपयोग में लाया जाए तो बिजली प्रदान करता है, सिंचाई के काम आता है, वाटर-रिजेनरेशन प्रदान करता है, वह पानी, जिसे आज खेतों में वरदान बनना चाहिए था, मिस-मैनेजमेंट की वजह से अभिशाप बन गया है। What was going to be a golden mine is today a curse for India.
जिसकी वर्षों की कमाई एक पल में मिट गई। जो अपने बच्चों को रोटी नहीं खिला सकता, सरकार उसे क्या मुआवजा देती है, मैं उस बात पर चर्चा करना चाहता हूं। मुआवजा एक धुरी है, जिसके ऊपर मैं अपनी इस डिबेट को घुमाना चाहता हूं। आज सरकारों की सबसे बड़ी पूंजी लोगों का विश्वास है। आज भी चाहे कोई आम आदमी हो, चाहे दुकानदार हो, चाहे व्यापारी हो वह सरकार पर भरोसा किए बैठा है कि कोई भी प्राकृतिक आपदा अगर आएगी, तो सरकार मुझे बचाएगी। मैं उन लोगों को शत्-शत् प्रणाम करता हूं जो हर साल डूबते हैं और हर साल डूबने के बाद दस परसेंट मुआवजा वह सरकार से लेकर फिर से सरकार पर भरोसा करते हैं। धन्य हैं वे लोग जो तीन-तीन बार डूबने के बाद भी सरकार पर भरोसा करते हैं और धन्य है वह सरकार, जो गूंगी और बहरी हो कर उनकी नहीं सुनती है। जिस देश में टमाटर 75 रुपए किलो, हल्दी 250 रुपए किलो हो, दाल 100 रुपए किलो हो, वहां मुआवजे के तौर पर क्लामिटी रिलीफ फंड से एक आदमी को बीस रुपए मुआवजा मिलता है। इससे बड़ी शर्म की बात और क्या है कि इससे उनके जो जानवर हैं, उनके चारे के लिए भी सवा सौ रुपए या डेढ़ सौ रुपए से कम नहीं आता है। अगर आप एक एकड़ की बुआई लें, तो करीब दो हजार से ढाई हजार रुपए लगते हैं और सरकार क्लामिटी रिलीफ फंड में वह मुआवजा 1600 रुपए तय करती है। जहां उसे उपज के 15 से 20 हजार रुपए मिलते हैं, वह ठेका देता है। " मिट गया मिटने वाला, फिर सलाम आया तो क्या, दिल की बरबादी के बाद उनका पैगाम आया तो क्या। " आप जा कर वहां देखिए कि लोग क्या कह रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि " जिन्हें हम हार समझे थे, गला अपना सजाने को, वही अब नाग बन बैठे हमारे काट खाने को। " क्या आज सरकार जख्मों पर मरहम लगाने की बजाय नमक छिड़केगी। I strongly advocate changing of these norms. They are laughable. ये नार्म्स गरीब की गैरत पर बहुत करारा तमाचा है। इंसान घोड़ी से गिरकर उठ सकता है, लेकिन इंसान अपनी नजरों में गिर जाए, उसे उठाने वाला दुनिया में कोई पैदा नहीं हुआ। आप गरीब को उसकी नजरों में गिरा रहे हैं।
महोदय, डिजास्टर मैनजमेंट के तहत सरकार रिलीफ देती है। अभी कुछ दिन पहले चित्रा जहाज डूब रहा था। टीवी वाले चीख रहे थे, चिल्ला रहे थे। तीन दिन में जहाज डूबने के बाद डिज़ास्टर मैनेजमेंट की मीटिंग बुलायी गई। तीन दिन बाद, यह है डिज़ास्टर मैनेजमेंट। पंजाब में डिज़ास्टर मैनेजमेंट का जो आफिस है, उसमें एक पियन बैठा है और एक भी तकनीकी स्टाफ नहीं है। ये वो लोग हैं, जो कपड़ा बेचते हैं, कपड़ा बर्बाद होने के बाद दो सौ रूपये वाला कपड़ा बीस रूपये मीटर बेचने की कोशिश करते हैं, तो भी कोई उस कपड़े को नहीं खरीदता है। मैं आज इतना ही कहना चाहता हूं कि पानी की जो मैनेजमेंट है, उसे प्रिवेंशन के ऊपर जोड़ दें तो ये मुआवजों के चक्कर से निकल सकते हैं। विन्सटन चर्चिल ने एक बार कहा था कि “Better prevent and prepare than repent and repair”. साठ साल से हम रिपेंट और रिपेयर ही कर रहे हैं, we have never prevented and prepared. अगर हमने कभी डिसिलटेशन की होती, अगर हमने कोई प्लान बनाया होता, मैं उन लोगों की बात कर रहा हूं, जो दो परसेंट एरिया में से साठ परसेंट देश का अनाज पैदा करते हैं। पंजाब और हरियाणा से इस देश का साठ परसेंट अनाज आता है। आज उन लोगों को ऐसा करारा तमाचा मिला है। अगर मणियों को धूल में फैंक दोगे, उन्हें सोने का आधार नहीं दोगे, तो मणियों की चमक कम हो जाएगी।
“अंधेरों का दर्द क्या जाने जो खुद उजाले हैं, डूबने की टीस क्या जाने जो खुद किनारे हैं।
आग के दरिया में डूबने का दर्द हमसे सीखो, पंजाब और हरियाणा ने कई उजड़े हुए गुलशन संवारे हैं।” इसलिए मैं आज उन लोगों से गुहार लगाता हूं कि जब यह बाढ़ आई थी तो सेंटर की तरफ से न कोई स्टैंडिंग कमेटी की टीम गई, सेंटर की तरफ से न ही कोई मुआवजा देने की बात हुई। करीब करीब 2000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। करीब 7 लाख एकड़ जमीन जो है, वह आज बाढ़ग्रस्त है और किसान त्राहिमान त्राहिमान कर रहा है और सेंटर का कोई भी आदमी अभी तक वहां पूछताछ करने के लिए भी नहीं गया।...( व्यवधान) बंसल साहब तो अपने निर्वाचन क्षेत्र में गये थे। फ्लड एरिया में नहीं गये थे। मैं सरकार से यही विनती करता हूं कि सरकार एक आश्वासन दे कि एक टाइम बाउंड पॉलिसी फ्यूचर के लिए सरकार बनाए जो प्रिपरेशन के लिए नहीं बल्कि प्रिवेंशन के लिए हो और आने वाले समय में हम लोग मुआवजों पर निर्भर न रहें औऱ मुआवजों से ज्यादा हम लोग खतरे को आने से पहले टाल दें। धन्यवाद।
श्रीमती अन्नू टण्डन (उन्नाव):सभापति महोदय, आपने मुझे आज इस बाढ़ और सूखे के बारे में चर्चा करने का मौका दिया है, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देती हूं। हम बाढ़ और सूखे की बात करते हैं लेकिन मैं कहना चाहंगी कि वास्तव में बाढ़ और सूखे की बात पानी पर निर्भर करती है, जैसे हमारे माननीय सदस्य नवजोत सिंह सिद्धू जी ने कहा और उनके उस दर्द को मैंने समझा। पानी ही इस पूरे खेल का एक प्वाइंट है। मौसम हो या मानसून हो, वह अपना खेल दिखा जाता है। जब पानी ज्यादा बरसता है तो बाढ़ आ जाती है और जब पानी कम बरसता है तो सूखा हो जाता है। इस साल भी बरसात ने बाढ़ का कहर हमारे उत्तर प्रदेश के घाघरा नदी मे दिखाया है। उसके अलावा गंगा नदी, राप्ती, शारदा, सरयू, यमुना ये भी खतरे के मार्क से ऊपर बह रहे हैं। हमारे यू.पी. के कई जिले हैं जिनमें गोंडा, बाराबंकी, लखीमपुरखेरी, सीतापुर, बिजनौर, बहराइच, श्रावस्ती, फरुख्खाबाद इत्यादि सब जगहों पर बाढ़ का कहर है। यह सिर्फ उत्तर प्रदेश की बात नहीं है जैसे हमारे नवजोत सिंह सिद्धू जी ने कहा, हरियाणा और पंजाब में भी बाढ़ ने अपना तांडव दिखाया है। इनको छोड़िए। मुम्बई और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में भी बाढ़ का तांडव देखा गया है। एक तरफ यह बाढ़ आई हुई है और दूसरी तरफ सूखे की स्थिति बनी हुई है। पिछले वर्ष के सूखे से हम अभी ऊबर भी नहीं पाए थे कि वर्षा इस वर्ष भी उत्तर प्रदेश के संत रबीदासनगर, सोनभद्र, मिर्जापुर के पूर्वांचल के कई जगहों पर पानी मानों बरसा ही नहीं है। अगर हम आंकड़ों पर जाएं तो कहा जाता है कि 50 फीसदी से कम बारिश वहां पर हुई है। उड़ीसा, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल के भी 18 जिलों में से 11 जिलों में सूखा पड़ा हुआ है। असम, मेघालय में भी कहा जाता है कि इस साल पानी कम बरसा है। हमें केन्द्र सरकार का सहयोग मिलता है। जितने भी बाढ़ग्रस्त और सूखाग्रस्त राज्य हैं, उनमें भी हमें केन्द्र का सहयोग मिलता है।
हमें सही मायने में यह बात समझनी होगी कि यह दायित्व राज्य सरकार का है कि समय पर केंद्र सरकार को सूचना दे। बजट का आबंटन कितना करना चाहिए इसके बारे में सोचे। जब स्कीम या प्रोग्राम का पैसा मिले तो उसका क्रियान्वयन कैसे हो, यह देखना राज्य सरकार का दायित्व होता है। केंद्र सरकार ने सूखे के लिए एआईबीपी, एक्जलेरेटिड इरीगेशन बेनिफिट्स प्रोग्राम के बारे में सैंट्रल लोन असिसटेंस, सीएलए के माध्यम से प्रोवीजन किया हुआ है। इसमें मेजर मीडियम एक्सटेंशन, रेनोवेशन, मॉडर्नाइजेशन प्रोजेक्ट शामिल हैं। स्पेशल कैटेगिरी स्टेट्स को सीएलए 3:1 नान स्पेशल कैटेगिरी को 2:1 रेश्यो में दिया जाता है। स्पेशल कैटेगिरी स्टेट्स में सीएलए का 90 फीसदी और नान स्पेशल का 30 फीसदी ग्रांट में कन्वर्ट हो सकता है। ड्राट प्रोन और ट्राइबल एरिया स्पेशल कैटेगिरी स्टेट्स में आते हैं। राज्य सरकारों को अपना दायित्व समझकर काम करना पड़ेगा। मैं छोटा सा उदाहरण उत्तर प्रदेश नॉन सेंसटिव सरकार का देना चाहती हूं।...( व्यवधान) जैसा कि नवजोत जी ने कहा कि हर साल बाढ़ आती है और हमें तैयारी करनी होती है इसलिए इसकी सेंसटिविटी हमारे पास होनी चाहिए। ...( व्यवधान) आप उत्तर प्रदेश सरकार के बारे में सुन लीजिए, फिर आपको जो कहना है कह लीजिएगा। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बारे में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है और न ही चर्चा की। केंद्र सरकार ने 90 किलोमीटर एम्बेंटमेंट घाघरा नदी और शारदा नदी के लिए सैंक्शन कर दिया। 90 करोड़ फ्लड प्रोटेक्शन प्रोजेक्ट, जब एक डिस्ट्रिक्ट लखीमपुर खीरी के लिए कहा गया था, सैंक्शन किया गया। 23 अगस्त की न्यूज में देखा गया कि उत्तर प्रदेश सरकार का 1500 करोड़ का एक सप्लीमेंटरी बजट पास हुआ। इसमें 500 करोड़ रुपया मूर्तियों, उद्यानों और पत्थरों के लिए पास किया गया। बुंदेलखंड पांच साल से सूखाग्रस्त है और 2000 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं, वहां के लिए सिर्फ 10 करोड़ रुपए दिए गए। बाढ़ की लोकेशन में विकास के नाम पर सिर्फ 50 करोड़ रुपए दिए। किसी स्टेट के बारे में बोलना मेरे लिए उचित नहीं है, स्टेट को खुद सोचना चाहिए।
महोदय, जब हम बाढ़ और सूखे की बात कहते हैं तो सही मायने में अंत में दो रोटी की बात होती है। बाढ़ पीड़ित अगले वक्त की रोटी की ही बात कहता है। बाढ़ और सूखे से क्या होता है, इसके बारे में हमें सदन में चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है। वहां जो हालात हैं, कैमरे में देखने की जरूरत नहीं है, आप एक बार जाकर देख लीजिए आपको स्थिति पता चल जाएगी। जो स्थितियां पैदा हो रही हैं, बाढ़ आ रही है, इसमें चंद वर्षों में बढ़ोतरी हुई है। मेरा कहना है कि क्लाइमेट चेंज पर सोचना चाहिए। मेरी व्यक्तिगत सोच है कि आधुनिक युग में मानव जाति का प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने का यह नतीजा हो सकता है। हम संसद में मौजूद हैं, अगर हम व्यक्तिगत तरीके से कुछ करना चाहते हैं तो वाटर सिक्योरिटी के बारे में सोचना चाहिए। अतिरिक्त वाटर को किस तरह से कम्युनिटी लैवल पर कन्जर्व करें, रिजर्व करें, इसके बारे में सोचना चाहिए। सरकार को क्या करना है, सरकार क्या रिलीफ देती है, यह तो आता ही है। हर तरीके से मॉनिटरिंग कम्पेनसेशन को आप इतना छोटा बता रहे हैं, यह इतना छोटा नहीं होता है। राज्य सरकार केंद्र सरकार मिलकर सही मायने में सही कम्पेनसेशन पहुंचाती है। हो सकता है आपका कोई दुखद अनुभव हो। हर तरीके का कम्पेनसेशन, प्रोग्राम और रिलीफ मीजर्स किए जाते हैं लेकिन समय पर इसकी जानकारी होनी जरूरी है। मैं नवजोत जी की बात से सहमत हूं कि यह एक इमीडिएट मरहम की तरह इस्तेमाल होता है।
यह एक मरहम है। आज तो हमने उन्हें कुछ थोड़ा सा सहयोग दे दिया, रिलीफ दे दिया। लेकिन सही मायनों में लांग टर्म में यह कोई स्ट्रेटेजी नहीं है। इसके लिए हमें यह जानना, कबूलना जरूरी होगा कि जिंदगी में पानी बहुत अहमियत रखता है। यदि पानी नहीं है तो इस हाउस में हम भी नहीं है। जल सुरक्षा आज का अहम् मुद्दा होना चाहिए। चाहे वह बाढ़ के बारे में बात करें या सूखे के बारे में बात करें। लांग टर्म स्ट्रेटेजी या सोल्यूशन के लिए बिना चतुर्मुखी, होलिस्टिक राष्ट्रीय जल नीति यानी नेशनल वाटर पालिसी के बिना यह शायद असंभव होगा।
महोदय, मैं जल संसाधन मंत्री और उनके मंत्रालय को धन्यवाद देना चाहती हूं। मंत्री महोदय यहां मौजूद हैं, उन्होंने इसके बारे में सोचना आरंभ कर दिया है। मीटिंग्स होनी शुरु हो गई हैं और नेशनल वाटर पालिसी को डिफाइन करने का कार्यक्रम शुरू हुआ है। इसी संदर्भ में मैं कुछ बातें कहना चाहती हूं। मानव या पशु के पेयजल की बात हो या सिंचाई की बात हो या उद्योग की बात हो या ऊर्जा उत्पादन की बात हो या देश में अत्यधिक जल की समस्या से जूझने की बात हो, हमें नेशनल वाटर पालिसी में इन सब चीजों को ध्यान में रखकर एक बात समझनी होगी कि बाढ़ तो आकर चली जाती है, लेकिन हैंडपम्प की जरूरत कभी खत्म नहीं होती। एक तरफ बाढ़ है और दूसरी तरफ हैंडपम्प की जरूरत यानी पानी की जरूरत के लिए हम उससे जूझते हैं।
मैं पिछले वर्ष की डिमांड्स फार ग्रांट्स, मिनिस्ट्री ऑफ वाटर रिसोर्सेज 2010-11 का उल्लेख करना चाहती हूं, उसमें कंवर्जन की बात कही गई थी। यह एक बहुत अहम् बात है, जब हम कंवर्जन की बात करते हैं तो उसके ऊपर व्याख्या करते हुए मैं कहना चाहती हूं कि एक स्रोत के रूप में जल वाटर रिसोर्से मिनिस्ट्री के अंतर्गत आता जरूर है। लेकिन रुरल डैवलपमैन्ट, अर्बन डैवलपमैन्ट, एनवायरनमैन्ट, पावर यानी हाइड्रो पावर, शिपिंग, एग्रीकल्चर, अर्थ साइंसेज, साइंस एंड टैक्नोलोजी, कामर्स, इंडस्ट्री मिनिस्ट्री, प्लानिंग कमीशन न जाने कितनी मिनिस्ट्रीज और विभाग इस विषय पर विचार एवं हस्तक्षेप करते हैं और इसके कारण ओवरलैपिंग की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है।
महोदय, पानी की प्रतिदिन कमी होने के कारण इसकी महत्ता बढ़ती जा रही है। इस अवसर पर मैं सदन के समक्ष देश में जल की कमी या वेस्टेज के कारण उत्पन्न हो रही स्थिति का उल्लेख करना चाहती हूं। आज जितना समझा जा रहा है, स्थिति उससे ज्यादा चिंताजनक है। मैं मैडम सोनिया गांधी जी की बहुत आभारी एवं अनुग्रहीत हूं, जिन्होंने इस चिंताजनक स्थिति को समझा ही नहीं,बल्कि उसका विशेष उल्लेख करने के लिए मुझे प्रोत्साहित भी किया। संसार में प्रतिदन, प्रति व्यक्ति का औसत जल उपयोग 53 लीटर है। लेकिन भारत में यह मात्र बीस लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह औसत उपभोग अन्य देशों की अपेक्षा गिरकर 9 लीटर के आसपास है। सूखे क्षेत्रों में यह सिर्फ पांच लीटर के आसपास है। इस तरह जल का औसत दैनिक उपभोग अन्य देशों के मुकाबले सिर्फ 10 फीसदी है।
भाखड़ा नंगल डैम, हीराकुंड डैम, दामोदर वैली, नागार्जुन सागर, राजस्थान कैनाल सिस्टम और नर्मदा डैम न जाने कितनी अन्य योजनाओं के द्वारा जल प्रबंध के बावजूद अभी तक केवल प्रति व्यक्ति के औसत से 200 क्यूबिक मीटर जल का संरक्षण हमारे देश में हो पा रहा है। जबकि अमरीका एवं आस्ट्रेलिया प्रति व्यक्ति के हिसाब से पांच हजार क्यूबिक मीटर पानी का संचय करते हैं। चीन जिसका वाटर मैनेजमैन्ट का प्रयास एवं समय सीमा भारत जैसी होने के कारण प्रति व्यक्ति की दर एक हजार क्यूबिक मीटर पानी संचय कर पाता है। पानी संचयन की पूर्ण क्षमता के संबंध में भारत में वर्षा के केवल तीस दिन का पानी संरक्षित कर पाता है, जबकि विकसित देशों में 900 दिन का पानी संचय होता है। अनेक देशों में समाज जल के लिए युद्ध कर चुके हैं। इसका सबसे सटीक और स्पष्ट उदाहरण अरब-इजराइल का 1967 का पानी को लेकर युद्ध हुआ था। जल को लेकर विभिन्न देशों में विवाद इस परिदृश्य के एक पक्ष में है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष विभिन्न राज्यों के बीच होने वाले विवाद हैं। जैसे कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी रिवर वाटर डिस्प्यूट हुआ था। इन सारे विवादों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पानी दिन-प्रतिदिन एक बहुमूल्य वस्तु, एसेंशियल वैल्युएबल कमोडिटी होता जा रहा है। इसका अर्थ यह हुआ कि हम सबको यह मानना होगा कि जल अत्यधिक मूल्यवान है और इसे एक राष्ट्रीय स्रोत यानी नेशनल रिसोर्स का स्थान उसी तरह से मिलना चाहिए, जैसे तेल, गैस और यूरेनियम को मिलता है।
17.00 hrs. सभापति महोदय, पानी कभी भेदभाव नहीं करता लेकिन उसके बावजूद पानी की सब को जरूरत है और सब समान हैं। आज हमें यह समझने की जरूरत है कि एक राष्ट्रीय स्रोत की सोच होनी चाहिये, हम सिर्फ इसे एक कमोडिटी मानकर नहीं छोड़ सकते हैं। हम सभी यह बात भली-भांति जानते हैं कि भारत में उपलब्ध पानी का 80 से 90 फीसदी तक प्रयोग कृषि में होता है। कृषि एक ऑफिशियल डिक्लेयर्ड इंडस्ट्री है। क्या इसका मतलब यह नहीं हुआ कि इंडस्ट्री के लिये इसैंशियल इनफ्रास्ट्रक्चर रिक्वायरमेंट पानी है। जैसे किसी इंडस्ट्री के लिये बिजली होती है। यदि हम ग्रामीण विकास की बात करते हैं तो कृषि के विकास की बात भी करनी चाहिये। साथ में भोजन सुरक्षा प्रणाली, गरीबों के उत्थान की बात करते हैं तो बिना इसके हम लोग कोई काम नहीं कर पायेंगे। इसी बात को समझकर और सोचकर मैं कनवर्जन संबंधी बिन्दु पर कहना चाहती हूं। इसी प्रकार अनेक योजनाओं की समस्या जटिल हो जाती है जब अनेक विभाग एक साथ मिलकर एक ही बिन्दु पर न आकर अलग-अलग चर्चा करते हैं । इसलिये वाटर पौलिसी को पुन: परिभाषित करने के अतिरिक्त हमारे पास और कोई विकल्प नहीं है, चाहे इंटरनैशनल डिस्पयूट हो या इंटरा-स्टेट डिस्पयूट हो, या फॉरेन पौलिसी हो, या एनवायरमेंटल या इकोलोजी फैक्टर हो, इन्हीं सारी बातों के लिये हमें एक वाटर पौलिसी पर चर्चा करनी होगी। वाटर रिसोर्सेज मिनिस्ट्री पर सारे बिन्दुओं को हमें वहीं लाकर खड़ा करना होगा। मैं जानती हूं कि लोगों के विभिन्न मत हो सकते हैं। इस पर निर्णय करने से पहले बहस की जरूरत है।
सभापति महोदय, यदि पानी को संविधान के 7वें शेडूल के अंतर्गत यूनिय़न लिस्ट में रखा जाये तो शायद ज्यादा बेहतर होगा। आज यह स्टेट लिस्ट में है। अगर यूनियन लिस्ट में नहीं तो कम से कम कनकरंट लिस्ट में इसे रखा जाये। मैं अपनी मित्र डॉ. ज्योति मिर्धा का धन्यवाद करना चाहती हूं जिन्होंने पिछले सत्र में इस तरह का विचार व्यक्त किया था।
सभापति महोदय, मैं जल के बारे में इसलिये बोल रही हूं क्योंकि मेरा संसदीय क्षेत्र उन्नाव में कई जोन डार्क घोषित कर दिये गये हैं। जल स्तर बिलकुल नीचे चला गया है। एक आवश्यकता हैंड पम्प की रह गई है। अब की बार हमारे यहां काफी पानी बरसा है पर इतना नहीं कि आजीवन पानी की किल्लत समाप्त हो जाये.। इसके अलावा लैदर इंडस्ट्री के मालिकों की हठधर्मिता, प्रदूषित पानी, वाटर रिसोर्स मैनेजमेंट एंड कंजर्वेशन स्कीम जो सैंटर से इतनी अच्छी चलायी जाती हैं कि उसमें भ्रष्टाचार व्याप्त है तथा 120 वर्ष पुरानी नहर जो ब्रिटिशकाल से प्रारम्भ हुई थी, भ्रष्टाचार का शिकार हो गई है। उसकी वजह से न केवल जल प्रदूषित हो गया है बल्कि पानी एक दुर्लभ वस्तु बनकर रह गई है। मैं लगातार जल संबंधी समस्याओं के लिये एक मिनिस्ट्री से दूसरी मिनिस्ट्री जाती रही हूं लेकिन मुझे यह कहीं सौभाग्य प्राप्त नहीं हो पाया कि मैं सब को एक टेबल पर लाकर इस मामले को सुलझा सकूं। सौभाग्य से जल संसाधन मंत्रालय ने डिंमांड फॉर ग्राट में पिछली बार यह तय किया था कि एआईडीपी के प्रोजैक्ट्स जिसमें यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट नहीं आयेगा, उनका आगे का बजट आवंटित नहीं किया जायेगा। उसमें हरदोई ब्रांच उन्नाव जिले की आती है। उसके बावजूद मैं इसका स्वागत करती हूं कि कम से कम उस भ्रष्टाचार को दूर कर सकेंगे।
सभापति महोदय, इसके पहले कि मैं अपनी बात समाप्त करूं, मैं आपको धन्यवाद देना चाहती हूं कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया। इस प्रेस्टीजियस प्लेटफार्म पर तत्काल कुछ बिन्दुओं पर विचार करना अनिवार्य है जिस पर विचार करने के लिये अनुरोध करती हूं।
मैं रघुवंश जी के हिसाब से बोलती हूं, मेरा पहला मुद्दा है कि जल को राष्ट्रीय स्रोत माना जाये। Water be treated as a national resource. दूसरा, जल को कृषि हेतु ढ़ांचागत आवश्यकता माना जाये। Water be treated as an infrastructure requirement. तीसरा, जल को यूनियन सूची में सूचीबद्ध किया जाये। Water be brought under the Union List. चौथा, जल के विभिन्न स्वरूपों को एक मंत्रालय में सम्मिलित किया जाये, यानी जल संसाधन मंत्रालय। All aspects of water be brought under one Ministry which is the Ministry of Water Resources. और पांचवां, नई राष्ट्रीय जल नीति, नेशनल वाटर पॉलिसी बनायी जाये। मैं अपनी बात समाप्त करने से पहले एक बार अपनी सरकार से और माननीय प्रधानमंत्री महोदय से अपनी आंखों द्वारा बाढ़ ग्रस्त इलाकों को संवेदनाशील तरीके से देखने का अनुरोध करती हूं। इस सरकार व प्रधानमंत्री जी पर मुझे पूरा विश्वास है कि हमेशा की तरह इस बाढ़ व सूखे की स्थिति के साथ-साथ इस सदन में रखे हुए मेरे सुझावों पर भी गंभीरता से विचार करेंगे। बहुत -बहुत धन्यवाद।
MR. CHAIRMAN : Hon. Members, the allotted time for this discussion is two hours. I have 24 more Members to speak. The list is very long. So, I would request all the hon. Members to please confine their speeches within five minutes so that we are able to complete the discussion today.
Those Members who want to lay their speeches can lay their speeches on the Table of the House.
Shrimati Usha Verma.
श्रीमती उषा वर्मा (हरदोई):महोदय, आपने मुझे बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदा पर बोलने की अनुमति दी, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देती हूं। अभी जैसा कि सदन के माननीय सदस्य सिद्धू जी और माननीया अन्नू टंडन जी ने सूखे और बाढ़ जैसी आपदा पर जो बात कही, मैं उस पर अपनी सहमति देते हुए अपनी बात रखना चाहती हूं।
17.07 hrs. (Shrimati Sumitra Mahajan in the Chair) महोदया, हमारे देश का कुछ क्षेत्र सूखे से प्रभावित है और कुछ क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित है। बारिश और कटान के चलते नदियों का जल स्तर बढ़ने से उत्तर प्रदेश के कई जिलों में बाढ़ का प्रकोप बढ़ गया है। उत्तरांचल के रामनगर बैराज से पानी छोड़ने के कारण सीतापुर, बहराइच, पीलीभीत, शाहजांहपुर, लखीमपुर, देवरिया व बाराबंकी में बाढ़ की स्थिति बनी हुई है। यमुना का जल स्तर बढ़ने से दिल्ली में भी बाढ़ की स्थिति है। जैसा कि अभी बताया गया कि पंजाब और हरियाणा में भी बाढ़ की स्थिति बनी हुई है। मेरा लोक सभा क्षेत्र हरदोई पांच-पांच नदियों से घिर हुआ है। गंगा, रामगंगा, गर्रा, कुंडा, नीलम, गम्भीरी और सुखेता जैसी पांच-छह नदियों से मेरा क्षेत्र घिरा हुआ है। यहां पर हर वर्ष बाढ़ आती है। नरौरा बांध से पानी छोड़ने के कारण फरूखाबाद फरूखाबाद, कन्नौज और हरदोई में हर साल बाढ़ की स्थिति आती है। इस बार भी बारिश के सीजन में दूसरी बार बाढ़ वहां आयी है। इस समय नरौरा बांध से चार लाख क्यूसेक पानी छोड़ने के कारण वहां बाढ़ की तबाही बहुत ज्यादा है। हरदोई, फरूखाबाद और कन्नौज क्षेत्र नरौरा बांध से पानी छोड़ने के कारण इस समय बाढ़ से प्रभावित हैं। गर्रा नदी में सात हजार क्यूसेक पानी छोड़ा गया है और रामगंगा में 26 हजार क्यूसेक पानी छोड़ा गया है और गंगा नदी में 3 लाख 21 हजार क्यूसेक पानी इस समय छोड़ा गया है। मेरा क्षेत्र सदर, शाहाहबाद, सवायसजपुपुरर,, बिलग्रामलगराम और सांडी तहसीलों में आवागमन के मार्ग पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हुए हैं। पुलों की एप्रोच भी प्रभावित हुई है। हरदोई-कन्नौज मार्ग भी पूरी तरह से प्रभावित हुआ है और वहां पर बाढ़ की बहुत ही भयानक स्थिति है। जब मैं 12वीं लोक सभा में पहली बार चुनकर आयी थी, उस समय भी मैंने सबसे पहले अपने क्षेत्र की जो समस्या थी, बाढ़ की स्थिति को मैंने उस समय भी रखा था, जब मैं 14वीं लोक सभा मे चुनकर आयी, तब भी मैंने सबसे पहले अपने क्षेत्र की बाढ़ की स्थिति को रखा था और आज फिर मैं अपने क्षेत्र की बाढ़ की स्थिति से इस सदन को अवगत कराना चाहती हूं। मैंने अपने क्षेत्र की बाढ़ की भयानक स्थिति को अपनी आंखों से देखा है। वहां का हर वर्ग बहुत बुरी तरह से प्रभावित है। चाहे बाढ़ की स्थिति हो, चाहे सूखे की स्थिति हो, अगर कोई इनसे सबसे ज्यादा प्रभावित होता है तो वह किसान है। इस समय हमारे क्षेत्र की सैंकड़ों हैक्टेअर भूमी जिस पर जिस पर फसल खड़ी थी, वह फसल नष्ट हो गयी है। वहां पर पुलों की एप्रोच भी समाप्त हो गयी है। वहां गांव के पीड़ित लोग प्रशासन से मदद की आस लगाये बैठे हैं। शासन की तरफ से वहां जो मदद दी गयी है, चाहे नाव की मदद की गयी हो या स्टीमर की जो मदद की गयी है, वह बहुत ही कम है और उससे गांव के लोग संतुष्ट नहीं हैं।
एक व्यक्ति का सपना होता है कि वह अपने जीवन में कम से कम एक कमरे का मकान बनाए। मैंने अपने क्षेत्र में जो लोगों की स्थिति देखी, जो लोगों का सपना होता है एक कमरा बनाने का, उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई से किसी तरह से एक कमरा बनाया, जब हमने देखा कि वहाँ रामगंगा का पानी बढ़ता है और लोगों को लगता है कि पानी के थपेड़ों से उनका मकान बहने वाला है, तो वहाँ के लोग अपने मकानों को खुद अपने हाथों से तोड़ते हैं। वे सोचते हैं कि मकान तोड़ने से उसकी ईंटों को ही संभालकर हम कहीं सड़क के किनारे छप्पर बनाकर रह लेंगे। पिछले वर्ष भी ऐसा हुआ था कि अपना मकान तोड़ते समय एक किसान के बेटे की उसमें दबकर मृत्यु हो गई थी। कल ही की घटना है, बाढ़ की स्थिति में हमारे क्षेत्र की दो बच्चियाँ पानी में बह गईं। इससे पहले भी हर वर्ष हमारे क्षेत्र के सैकड़ों लोग बाढ़ में बहकर मौत के मुँह में समा जाते हैं। हमारे क्षेत्र में बाढ़ की जो स्थिति है, मैं उसके लिए सदन में मांग करना चाहती हूँ कि नदियों के जो किनारे हैं, हर वर्ष जो बाढ़ आती है, उससे नदियों के किनारे कटने से ज्यादा से ज्यादा गाँव कट जाते हैं। इसके लिए गाँव के किनारे नदियों की पत्थर-सोलिंग की जाए, उनको पक्का किया जाए जिससे गाँव हर वर्ष ज्यादा से ज्यादा न कटें।
महोदय, जब हम बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में जाते हैं, तो उस समय यह लगता है कि इस समय इतना पानी है, लेकिन जिस समय उसी क्षेत्र में सूखे की स्थिति आती है तो किसान पानी के अभाव में तरसता रहता है। जब उसकी फसल सूखती है तो यही विचार आता है कि सरकार इस पानी को एकत्रित करके किसानों के लिए सिंचाई के लिए उपलब्ध करा पाए। इसके अतिरिक्त मैं यह मांग भी करना चाहती हूँ कि हमारे क्षेत्र में जो लोगों की मृत्यु हुई है, उनको कम से कम एक एक लाख रुपये का मुआवज़ा दिया जाए और नदियों के किनारे पत्थर-सोलिंग करवाकर जब उनके किनारे पक्के किये जाएंगे तो हर वर्ष आने वाली बाढ़ से किनारे नहीं कटेंगे। इसके अतिरिक्त मैं यह भी कहना चाहती हूँ कि हर वर्ष जब बाढ़ आती है तो बाढ़ आने के बाद हम विचार करते हैं कि किसानों को किस तरह से प्रभावित क्षेत्र में बाहर निकाला जाए, प्रभावित क्षेत्र से उनको क्या क्या सुविधा दी जाए। अगर हम बाढ़ आने से पहले उस पर विचार करें कि उस क्षेत्र में बाढ़ ही न आए जबकि हम जानते हैं कि हर वर्ष बाढ़ आती है तो बाढ़ आने से पहले हम ऐसी कोई योजना बनाएँ जिससे बाढ़ उस क्षेत्र में न आए और सबसे बड़ी बात यह है कि नदियों के किनारे अगर पत्थर-सोलिंग करा दी जाए तो हर वर्ष आने वाली बाढ़ की तबाही से हम लोग गाँवों को बचा सकते हैं।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपका धन्यवाद करती हूँ कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया।
*SHRI C. SIVASAMI (TIRUPPUR): Mr. Chairman, Sir, I would like to thank you for the opportunity given to me to participate in the discussion on flood and drought situation in the country conducted in this House under Rule 193.
Our country has got various natural resources and varying climatic conditions. Our country is also so vast that severe floods on one side and acute drought on another side cause havoc one and the same time. The Government spends thousands of crores of rupees for relief and rehabilitations. Currently the river Yamuna flowing by the capital is in spate. It is an annual feature to find the river Ganges causing flood havoc resulting huge loss of lives and property. Drought conditions have led to river water sharing disputes between states. Cauvery dispute between Karnataka and Tamil Nadu, Palar dispute between Andhrapradesh and Tamil Nadu, Mulla Periyar dispute between Kerala and Tamil Nadu have also led to law and order problems in all these states. Recently there were mob agitations in Coimbatore, Tiruppur and Erode districts due to the Kerala Governments attempts to construct a dam across rivers Pamba reducing water flow to Amaravathy dam. A visionary approach is the need of the hour to link all the rives flowing wastefully in to the sea and this can help overcome the drought. When the river Ganges is in floods water flow in Cauvery meets with drought conditions and hence inter-linking of rivers can help us to get adequate water throughout the year both for irrigation and drinking water purposes.
When Ganga and Cauvery are linked, we can one and the same time curtail the vast devastation caused by floods and droughts both in the North and the South. The funds that are being spent on relief and rehabilitation measures can be saved to fund the project of linking the major rivers of the country. This will also help us to develop inland waterways thereby saving energy in a big way helping to decongest our highways. This will also help us to save the money spent on maintenance of roads. Apart from that, we can go in for scientific management of water and conserve excess river water and rain water in small watersheds and tanks. This will help us to augment ground water potential both for drinking and agricultural purposes. On these lines, a pilot project may be taken up by the Centre in my constituency where we have been demanding for long the Avanashi-Athikadavu Project. Special fund allocation may be made to conserve the excess water flowing from the river Bhavani both in Coimbatore and Tiruppur Districts. This water can be saved in watersheds and tanks that come under the Panchayat Unions of Avanashi, Karamadai, Nambiyur, Annur, Perundurai, Oothukkuli and Tiruppur. Only by way of taking up such schemes, we can overcome drought. At this juncture, I would like to recall the visionary measure of our dynamic leader and the former Chief Minister of Tamil Nadu Puratchi Thalaivi Dr. J. Jayalalitha who successfully implemented throughout Tamil Nadu the Rainwater Harvesting Scheme. This received a wide welcome from the public. Hence I urge upon the Centre to take up this scheme throughout the country. With a foresight, we must evolve plans and projects to control flood effects and drought related problems instead of seeking relief after meeting with floods and drought. To ensure the development of our country, we must introspect and proceed with such schemes with farsightedness. I hope this suggestion would be considered for our country’s progress and prosperity. Between Sathiyamangalam and Gobichettipalayam in my constituency, in order to cross Ikkarai Koduveri and Akkari Koduveri on river Bhavani, people have to take a circumlocuitous route of about 50 kms. all these years. I urge upon the Centre to allocate Rs. 10 crore as a special fund to construct a bridge to link these traditional towns in my parliamentary constituency.
With these words, I conclude.
{For English translation of the speech made by the hon. Member, ShriC. Sivasami in Tamil , please see the Supplement. (PP ….…… to ………..)} श्री दारा सिंह चौहान (घोसी): सभापति महोदया, मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने हमें बोलने का मौका दिया। आज बाढ़ और सूखे की समस्या पर हम अपनी पार्टी की तरफ से बोलने के लिए खड़े हुए हैं।
सभापति महोदया, इस देश का दुर्भाग्य ही है कि सबसे ज्यादा जिस देश में किसान रहते हैं, आज वह मौसम की मार को झेल नहीं पा रहा है। कभी बाढ़ तो कभी सूखा, और यह किसी प्रदेश का सवाल नहीं है, यह देश का सवाल है। आज देश में सबसे ज्यादा किसान हैं, तो मैं देश के सवाल पर ज़रूर कहना चाहता हूँ कि जहाँ सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी इस देश की सरकार की है, मैं समझता हूँ कि केन्द्र की सरकार इस बाढ़ से निपटने के लिए, सूखे से निपटने के लिए गंभीर नहीं है। मैं कोई आरोप नहीं लगा रहा हूँ। मंत्री जी का जवाब है, जब एक सदस्य ने पूछा कि क्या सरकार ने बाढ़ नियंत्रण के संबंध में कोई राष्ट्रीय नीति तैयार की है तो माननीय मंत्री जी का जवाब था कि जी नहीं। बाढ़ नियंत्रण संबंधी राष्ट्रीय नीति कोई नहीं है।
संसदीय कार्य मंत्री और जल संसाधन मंत्री (श्री पवन कुमार बंसल): महोदया, मैं इस बात को बोलना नहीं चाहता हूं, क्योंकि इसे गलत न समझा जाए। नीति और चीज होती है और जो उसकी स्कीम है, उसका प्रोग्राम है, फ्लड मैनेजमेंट प्रोग्राम है, उसमें 22 राज्यों ने केन्द्र से पिछले तीन वर्षों में काफी पैसा लिया है।
श्री दारा सिंह चौहान : महोदया, यह जलवायु परिवर्तन का ही दुष्परिणाम है कि बाढ़ और सूखे की मार सबसे ज्यादा देश के 70 फीसदी किसानों पर पड़ती है। मैं हमारे भाई नवजोत सिंह सिद्धु की पीड़ा को सुन रहा था। इन्होंने काफी गहराई और गम्भीरता से चर्चा में हिस्सा लिया। आज पूरा देश, खास कर उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, पंजाब, हरियाणा और देश की राजधानी दिल्ली में यदि बरसात हो जाती है तो क्या हालत हो जाती है, यह किसी से छिपा नहीं है। उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल जिसमें आजमगढ़, बलिया, बनारस, जौनपुर, भदोही, मिर्जापुर, गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, महाराजगंज, बहराइच, सिद्धार्थ नगर, गौण्डा और लखीमपुर खीरी इत्यादि इलाकों में सबसे ज्यादा बाढ़ से प्रभावित है। इसके पहले सूखे पर भी इस सदन में चर्चा हुई थी। जिस समय पूरा देश सूख की चपेट में था, मैं उत्तर प्रदेश सरकार को बधाई देना चाहता हूं कि सबसे ज्यादा 58 जिलों को सूखा प्रभावित घोषित करके किसानों को राहत देने का काम किया। उन्होंने भारत सरकार को प्रस्ताव भी भेजा। भारत सरकार ने उस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार नहीं किया। मैं समझता हूं कि भारत सरकार उन प्रदेशों के साथ जो कांग्रेस शासित नहीं हैं, सौतेला व्यवहार करने का काम किया है और हमेशा करती रही है। मै इस बात को इसलिए कहना चाहता हूं कि जब उत्तर प्रदेश में 58 जिले सूखे की चपेट में थे तो वहां बहुत ही कम राशि सूखे से निपटने के लिए आवंटित की गई। जिस राज्य में कांग्रेस की सरकार है और एक भी जिला सूखाग्रस्त घोषित नहीं किया गया था, वहां सबसे ज्यादा सहयोग किया गया है। इसलिए मैं आरोप लगाता हूं कि भारत सरकार गैर कांग्रेस शासित राज्यों को चाहे सूखा हो या बाढ़ हो, हम तो कहते हैं कि देश की जनता के हित के लिए सरकार गंभीर नहीं है। हमारे संसदीय क्षेत्र में ऐसे इलाके हैं और मैं समझता हूं कि बहुत सारे सांसद हैं, जिनके क्षेत्र में एक तरफ बाढ़ है तो दूसरी तरफ सूखा है।
एक ही जिले में एक तरफ बाढ़ है और दूसरी तरफ सूखा है, चाहे देवरिया, गोरखपुर, जौनपुर, कुशीनगर, कौशाम्बी, इलाहाबाद और आजमगढ़ के कुछ इलाके हैं, ऐसे तमाम इलाके हैं कि जहां एक ही जिले में बाढ़ है तो दूसरी तरफ सूखा है। इसलिए मैं इस बात को आपके संज्ञान में लाना चाहता हूं कि ऐसे तमाम गरीब लोग हैं, जो सबसे ज्यादा बाढ़ और सूखे से प्रभावित होते हैं। सूखे के समय जब गर्मी का मौसम होता है, नदी के घाघरा के किनारे जो लोग बसते हैं, उनके पास पक्का मकान नहीं है, वे झोंपड़ी में रहते हैं। जहां आज भी बिजली नहीं, पानी का साधन नहीं मिल पाता। वहां अगर एक भी जगह आग लग गई तो एक-एक किलोमीटर तक उन गरीब लोगों की झोपड़ी जल जाती है। इसके लिए कई बार संसद में चर्चा हुई, लेकिन भारत सरकार कभी इस पर गंभीर नहीं हुई। जब बाढ़ आती है तो वही इलाके जो सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित रहे हैं, चाहे घाघरा, गंगा नदी, तमसा या राप्ती हो, इनके किनारे बसने वाले जो लोग हैं, वे ही सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। उनका पूरा का पूरा मकान, परिवार और पशु सारे बर्बाद हो जाते हैं। देश की सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
सभापति महोदया, मैं आपके माध्यम से भारत सरकार से मांग करता हूं कि भारत सरकार को पहल करके उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के तमाम सूबों से, जहां लोग सूखा एवं बाढ़ से पीड़ित हैं, वहां से रिपोर्ट मंगाएं। ऐसे इलाके में रहने वाले जो गरीब लोग हैं, जिन्होंने तबाही को देखा है एवं झेला है, जिनके पास रहने के लिए आवास नहीं है, उनके लिए कम से कम यहां से धन मुहैया कराया जाए। उत्तर प्रदेश सरकार के पास सीमित संसाधन हैं, उससे वह बहुत कुछ उनके लिए कर रही है। गरीबों के आवास के लिए 40-50 हजार नहीं, बल्कि एक लाख 75 हजार तक ऐसे गरीबों को मकान दिया है, जिन गरीबों को आजादी के 60 साल बाद भी पक्के मकान में रहना नसीब नहीं था। आज उत्तर प्रदेश सरकार ने भारत सरकार से मांग की है, इस बाढ़ से निबटने के लिए दस हजार करोड़ रुपए की मांग की है। मैं समझता हूं कि इस पर केन्द्र की सरकार को काफी गंभीर होकर मानवीयता के आधार पर मदद करनी चाहिए। अगर आप गरीब के हित में फैसला लेना चाहते हैं तो मैं समझता हूं कि उत्तर प्रदेश सरकार ने जो रिपोर्ट दी है, जो जान-माल का नुकसान हुआ है, उसके विकास एवं उनकी बेहतरी के लिए दस हजार करोड़ रुपए की उत्तर प्रदेश को जरूर मदद करें। कभी-कभी ऐसा होता है कि जो भारत सरकार है, कारण क्या है कि जो राष्ट्र की समस्या है, इसके लिए जो राष्ट्रीय नीति की जरूरत है, वह बनाई जानी चाहिए। कुछ दिन पहले कुछ नीतियां बनीं, लेकिन दुर्भाग्य तब हो जाता है कि जब सरकारें बदलती हैं तो इस नीति को बदलने का भी काम करने लगती हैं।
सभापति महोदया, मेरी आपके माध्यम से मांग है कि सरकार भले ही बदले, लेकिन जो देश के हित में है, राष्ट्रीय परियोजनाएं हैं, इससे निबटने के लिए जो सक्षम कारगर साबित हो सकती हैं, ऐसी परियोजनाओं को बदलने की जरूरत नहीं है, बल्कि उस पर एकदम आगे बढ़ कर काम करने की जरूरत है। नदियों को जोड़ने के लिए कुछ दिन पहले जो प्रारूप तैयार किया गया था, मैं समझता हूं कि उन नदियों को जोड़ने की पूर्व की सरकार ने योजना बनाई थी, अगर ईमानदारी से उस योजना को कार्यान्वित करने का काम किया होता तो आज जो विभीषिका इस देश में है, शायद उससे निजाद पा सकते थे और किसानों को भी उसका फायदा दे सकते थे।
सभापति महोदया, इन्हीं शब्दों के साथ आपको धन्यवाद देते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
* mukesh 2 ओश्री सतपाल महाराज (गढ़वाल ): श्री सतपाल महाराज (गढ़वाल )ः प्राकृतिक त्रासदी जब भी होती है तो उसका प्रभाव अर्थव्यवस्था एवं सामाजिक व्यवस्था पर अवश्य पड़ता है। बहुत सी प्राकृतिक आपदाएं ऐसी हैं कि जिनका पूर्वानुमान लगाना असंभव तो मैं नहीं कहूंगा लेकिन मुश्कल जरूर है परन्तु बाढ़ और सूखा ऐसी प्राकृतिक आपदाएं हैं जो भूकम्प या चक्रवात की तरह नहीं हैं जिसका पूर्वानुमान नहीं लग सके, इनका पूर्वानुमान समय रहते लगाया जा सकता है।
हमें मालूम है देश के कौन -कौन से हिस्से बाढ़ के लिए संवेदनशील हैं और कौन -कौन से क्षेत्र सूखे से प्रभावित हो सकते हैं। देश में इन प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान हो सकता है। जरूरत है इच्छा शक्ति की, यदि हम इनके बारे कोई ठोस योजना बनाएं और उस पर अमल करें । प्रतिवर्ष हजारों मौतें हमारे देश में बाढ़ एवं सूखे के कारण होती हैं। लाखों हैक्टेयर जमीन की फसलें बाढ़ एवं सूखे के कारण नष्ट हो जाती हैं। हजारों की संख्या में पशुधन की हानि होती है। बाढ़ के कारण दक्षिण एशिया में विशेषकर भारत विश्व में सर्वाधिक प्राकृतिक तथा मानव जनित आपदाओं को झेलता है। प्राकृतिक आपदाओं में से बाढ़ के कारण उत्तर भारत में सबसे अधिक मौतें होती हैं तथा बीमारियां फैलती हैं। विदर्भ, आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र तथा बुंदेलखंड क्षेत्र वह क्षेत्र है जिनमें अत्यधिक सूखे की संभावना रहती है। बिहार, पश्चिम बंगाल में गंगा बेसिन के केन्द्रीय और नीचले भागों, उड़ीसा का डेल्टा क्षेत्र, पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्र ऐसे क्षेत्र हैं जहां बाढ़ की आशंका सबसे ज्यादा रहती है। सूखे एवं बाढ़ के कारण न केवल काफी संख्या में लोगों की जान जाती है अपितु उनकी आय भी प्रभावित होती है। इसीप्रकार पशुधन एवं सम्पत्ति की हानि से परिवार की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित होती है। बाढ़ व सूखे के कारण अनेक महामारियों का फैलाव होता है और बहुत सारे संचारी रोगों के विद्यमान होने के कारण रोगियों की संख्या बढ़ जाती है।
नेपाल में हुई भारी बारिश से बिहार में गंडक और मसान नदियां उफना गई हैं। पहाड़ों पर लगातार बारिश से क्षेत्र की नदियों में पानी का दबाव बढ़ गया है। मारकंडा नदी उफान पर है। दिल्ली में भी यमुना का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर पहुंच गया है। उत्तर प्रदेश में सैंकड़ों गांव बाढ़ से प्रभावित हो गए हैं। बहराइच में घाघरा नदी खतरे के निशान से ऊपर है। बाराबंकी में बाढ़ के पानी से तीन दर्जन से अधिक गांव घिर गए हैं। सीतापुर में भी शारदा, घाघरा, गोबरहिया, चौका, केवानी आदि नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है। लखीमपुर में शारदा के तटबंध पर बसे करीब दो दर्जन गांवों में बाढ़ का पानी भरने से आवागमन बिल्कुल ठप्प है। आजमगढ़ में 80 गांवों का रास्ता और फसल जलमग्न हो चुके हैं। फरूखाबाद में गंगा नदी ने तबाही मचा दी है। वहां लोगों ने पक्के मकानों की छत पर शरण ले रखी है। इसी क्रम में भी कुछ दिन पहले लेह में बादल फटा था जिससे भारी तबाही हुई। उत्तराखंड में भारी मूसलाधार वर्षा से, भूस्खलन से, बादल फटने से कई हादसे हुए हैं। वर्षा के कारण कालीमठ में काली गंगा के कटाव के कारण 20 मीटर सड़क बह गई थी।
यह हम सभी जानते हैं कि यह सब प्राकृतिक आपदा हैं और मानव ऐसी आपदाओं को रोक नहीं सकता है चूंकि प्राकृति पर हमारा नियंत्रण नहीं है परन्तु आज हमने ऐसी आपदाओं के प्रभाव को कम करने के क्षेत्र में काफी प्रगति की है परन्तु अभी भी हमारे पास समुचित बाढ़ नियंत्रण एवं आपदा प्रबंधन की प्रभावी नीतियां नहीं है इसलिए हम ऐसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। इसके लिए मेरे कुछ सुझाव हैं -
सर्वप्रथम हमें ऐसे क्षेत्रों को चिह्नित करना होगा जहां बाढ़ एवं सूखे आने की संभावना ज्यादा रहती है। सैटेलाइट से ऐसे क्षेत्रों का गहन सर्वेक्षण एवं अध्ययन करवाया जाए। फिर वहां उपलब्ध संसाधनों का प्रयोग किस प्रकार ऐसे समय में किया जा सकता है उसके लिए योजना बनाई जानी चाहिए।
राष्ट्रीय राज्य और जिला स्तर पर आपदा नियंत्रण के लिए सार्थक एवं सशक्त प्रयास किए जाएं तो बाढ़ एवं सूखे के दौरान जान की हानि को कम किया जा सकता है। प्राथमिक रूप से हमारी नीतियां राहत पर जोर देती हैं, जिसमें प्रमुखता से आपदा के बाद देखभाल पर ध्यान दिया जाता है जबकि हमें इनसे निपटने की तैयारियों, निवारण और इन्हें कम करने पर जोर देना चाहिए।
सरकार को बाढ़ एवं सूखे से जानमाल की रक्षा के तरीकों को सुधारने तथा बहुआयामी समस्याओं के समाधान हेतु व्यापक कार्ययोजना का निर्माण करना चाहिए। सही प्रबंधन और विकास के कार्यक्रमों के माध्यम से सरकार और सभ्य समाज दोनों ही आपदा के लिए समयबद्ध तैयारी, निवारण और उसे कम करने के लिए कार्य कर सकते हैं।
भौगोलिक परिस्थितियां, आपदा के समय में राहत सामग्री के पहुंचने में लगने वाले समय को दृष्टिगत रखते हुए सरकार को मुआवजे की राशि तय करनी चाहिए। मैदानी इलाकों की अपेक्षा पहाड़ों में रहने वाले लोगों का जीवन काफी विषम परिस्थितियों में होता है। अतः वहां की मुआवजा राशि मैदानी क्षेत्रों की तुलना में अधिक होनी चाहिए।
देश की सारी नदियों को जोड़कर बाढ़ एवं सूखे की विभीषिका से निपटा जा सकता है।
सूखे के लिए जल संचय, जल का सही प्रबंधन, रैन वाहर हार्वेस्टिंग सिस्टम को प्रोत्साहन देकर काफी हद तक सूखे से बचाव किया जा सकात है। जहां सूखा पड़ने की संभावना है वहां पहले से ही उससे निपटने के लिए 50 प्रतिशत की राशि और खाद्यान्न दिया जा सकता है।
मौसम विभाग के पास ऐसे आधुनिक उपकरण होने चाहिए जो यह बता सकें कि किन -किन स्थानों में कब -कब मौसम की क्या स्थिति रहने वाली है, यह जानकारी आवश्यक है।
महोदया, मेरा आपके माध्यम से केन्द्र सरकार से अनुरोध है कि हमें अपने कृषि और जल वैज्ञानिकों को ऐसे अनुसंधान एवं तैयारियों के लिए जरूरी समान के निर्माण के लिए निर्देश देने चाहिए जिससे बाढ़ एवं सूखे से निपटने के लिए हम समय से ही तैयार रहे सके। हमें इस प्रकार की महत्वकांक्षी योजनाओं पर कार्य करना होगा जिससे इन आपदाओं का सामना हम समय रहते एवं नियोजित तरीके से कर सकें।
श्री विश्व मोहन कुमार (सुपौल): माननीय सभापति महोदय, मैं एक अहम मुद्दे पर बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं।
बाढ़ और सुखाड़ हमारे देश के लिए एक अभिशाप बना हुआ है। जहां बाढ़ से लोग मरते हैं, वहां पर सुखाड़ से खेती ग्रस्त ही नहीं होती है, बल्कि उसके नहीं रहने से हमारे किसान वहां पर आक्रान्त होते हैं। जो बाढ़ में रहते हैं, वे बाढ़ का आलम जानते हैं। जिन्होंने बाढ़ के मंज़र को नहीं देखा, वे उसका बयान नहीं कर सकते। बाढ़ की स्थिति में जहां पंजाब और हरियाणा में पहले बाढ़ नहीं आती थी, वहां भी अब बाढ़ आने लगी है। हमारे यहां खासकर बिहार में जो नदियां आती हैं, कोसी है, गंडक है, कमलाबलान है, अदवारा समूह है, परमान है और महानन्दा है, ये सभी नदियां नेपाल से निकलती हैं, जो बिहार को बर्बाद करके छोड़ती हैं।
आप जानते हैं कि 2007 और 2008 में बाढ़ तो बराबर आती है, हर साल बाढ़ आती है, लेकिन बराबर कुछ न कुछ अपनी करतूत दिखाकर चली जाती है। 2007 में भी बाढ़ आई थी, बहुत सारे लोग उसमें मरे थे और बहुत सारे मवेशी मरे थे। 2008 की बाढ़ में सभी जगह से, देश-विदेश से लोगों ने सहायता की थी। बाढ़ से वहां पर करीब 40 लाख लोग प्रभावित हुए थे, बहुत सारे पशु मरे थे, बहुत सारे वहां पर घर बर्बाद हुए थे, लेकिन बिहार सरकार ने जब 14,800 करोड़ रुपये का पैकेज केन्द्र सरकार से मांगा तो यहां से मात्र एक हजार करोड़ रुपया मिला। वह भी बहुत जद्दोजहद के बाद हम लोगों को हासिल हुआ।
मैं केन्द्र सरकार से मांग करता हूं कि केन्द्र सरकार भेदभावपूर्ण रवैया छोड़कर काम करे। इनके लिए सभी राज्य बराबर हैं, जहां इनका शासन है, वे भी बराबर हैं और जहां इनका शासन नहीं है, वे राज्य भी बराबर हैं। सभी इनके मतदाता हैं, सभी इनके लोग हैं, इसलिए अपने दिल की ऊंचाईयों को देखते हुए सबों की मदद करे, सबों को अच्छे ढंग से सहायता दे।
अभी सुखाड़ के समय में भी हमारे बिहार के मुख्यमंत्री यहां पर आये थे। उन्होंने करीब 24 हजार करोड़ रुपये का पैकेज मांगा था, क्योंकि सूखा पूरे बिहार में है, सभी 38 जिले सूखाग्रस्त घोषित किये जा चुके हैं। उसकी एवज में मात्र 1163 करोड़ रुपया बिहार में हम लोगों को मुहैया हुआ है। जब तक इस समस्या का कोई स्थाई समाधान नहीं होगा, तब तक इसी तरह चलता रहेगा। हमारे क्षेत्र में कोसी पूरे जिले को बर्बाद करती है, कोसी का जो स्वरूप है, वहां की जो मिट्टी कटती है, वहां पर अभी करीब 10-12 गांव ऐसे हैं, जहां से सभी लोग पलायन कर चुके हैं, सभी का घर कट चुका है, सभी लोग आकर रास्ते पर फंसे हुए हैं, कोई बांध में फंसे हुए हैं, उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं है। सरकार जो भी अपने स्तर से होता है, वह सहायता करती है, लेकिन केन्द्र सरकार को चाहिए कि हमारी मदद करे। उस समय में भी हमारे प्रधानमंत्री जी 2008 में गये थे, वे राष्ट्रीय आपदा घोषित करके आये, लेकिन यहां आने के बाद देने के लिए फूटी कौड़ी भी उनको नसीब नहीं हुई। मैं चाहता हूं कि केन्द्र सरकार सभी के साथ भेदभावपूर्ण नीति नहीं अपनाकर अच्छे ढंग से सबों को देखे।
बिहार में जहां तक हम लोगों के यहां कोसी पर बांध बनाने की बात थी, भारत सरकार के द्वारा गठित राष्ट्रीय बाढ़ आयोग की रिपोर्ट भी आई थी, लेकिन उसके तहत हम लोगों के यहां कुछ काम नहीं हो पाया है। नेपाल में शारदा नदी, महाकाली नदी, पंचेश्वर पर बहुउद्देश्यीय परियोजना और कोसी नदी से, सप्तकोसी बांध परियोजना वर्षों से लम्बित है। पिछले साल भी हमारे सदस्य जो मंत्रिमंडल में थे, वे हमारे बिहार के ही थे, उन्होंने भी पहल की थी। हमारे माननीय मंत्री जी भी इस बार काठमांडू वगैरह गये थे, वे वहां देखकर आये तो मैं चाहूंगा कि वहां कोई स्थाई समाधान हो। वहां पर कोई बांध बने, डैम बने, ताकि जो हम लोगों का इलाका है, पूरा बिहार उससे आक्रान्त है, पूरा बिहार जलप्लावित रहता है। अभी जाकर वहां कुछ मुआयना करेंगे, देखेंगे तो पता चलेगा कि वहां की स्थिति क्या है, वहां के लोग कैसे रहते हैं। वहां पर हमारी जो सरकार है, 2008 में जितनी भी रोड्स थीं, पुल-पुलिया थे, जितनी भी नहर प्रणाली थी, वे सभी खत्म हो चुके। अपने स्तर से राज्य सरकार के कोष से 750 करोड़ रुपये लगाकर उन्होंने अपना काम करवाया है और सारी नहर प्रणाली को दुरुस्त किया है, सभी रोड्स दुरुस्त करवाई हैं, लेकिन यह नाकाफी है।
मैं केन्द्र सरकार से मांग करता हूं कि हमारी सरकार की मदद करे, सभी राज्य सरकारों की मदद करे, ताकि एन.सी.सी.एफ. का जो पैसा आप देते हैं और अपनी जो उगाही करते हैं, उसमें से मदद करें, अपने लोगों की मदद करें, क्योंकि वहां इससे पशु-पक्षी मरते हैं।
आपदा प्रबंधन नियम में भी बहुत सारे दोा हैं। वाऩ 2008 में हमारे यहां बहुत सारे जानवर मर गए। बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जो मर गए लेकिन अगर उनकी लाश नहीं मिली तो फिर उनको अभी मुआवजा नहीं मिला। जिनके पशु की लाश उपलब्ध नहीं हुयी, उनको अभी तक मुआवजा नहीं मिला। आपदा प्रबंधन में इस तरह की जो खामियां हैं, उनको दूर करें ताकि जो घर बर्बाद हुए हैं, जो पशु, पक्षी और लोग मरते हैं, उनकी लाश नहीं भी मिले तो उनका जो आइडेंटीफिकेशन है, उसके हिसाब से उनको उसका लाभ मिले। जहां तक सहायता की बात है, हमारे यहां अभी फ्लड आया हुआ है। कोशी बहुत खराब नदी है। वहां जितने भी गाद हैं, नेपाल से जितनी भी नदियां आती हैं, वहां वे पहाड़ में कट-कटकर पूरा गाद भर देती हैं, उसको निकालने के लिए आप राज्य सरकार के साथ सहयोग करें। अगर गाद निकल जाएगा, तो हमारी सिंचाई व्यवस्था भी दुरूस्त हो जाएगी। जो पानी है, वह वहां नहीं रूकेगा और जल उत्प्लावन नहीं होने के चलते हमें उससे निजात मिलेगी।
*SHRI SUDIP BANDYOPADHYAY (KOLKATA UTTAR): Earlier it is flood or drought cause extremely and tremendous difficulties of the people residing in the rural areas.
Most scientific process to protect flood water is to make implementation of the system of ‘Water Harvesting” process.
Monetary support to be extended to the affected and damaged areas of the States and proper monitoring system is to be instituted. Utilization certificates are to be submitted by the State Governments in time.
West Bengal Government misuse Central Government assistance extended to them.
The disastrous storm namely “Aiila” collapsed the district of 5-24 (Parganas) in the last year. Money was looted and affected people were not extended assistance. Money was distributed in partisan manner along with materials.
Few districts of West Bengal are not under flood. Central Government should sent official delegation to access the losses and then make allotment of financial assistance.
National policy in connection with flood control is to be taken on top priority basis.
Preservation of water system is the need of the hour. Government should tackle these two issues with all importance. Approach should be scientific.
There must be imagination, farsightedness and managerial efficiency to tackle these situations.
We should think twice that whether interlinking of the rivers of the country can be viable and whether it is a proposal with reality.
Disaster management group and the Department must be activated. This Department is giving importance every moment.
We all should think together that how and in what way we can come out from the flood and drought situation.
SHRI PULIN BIHARI BASKE (JHARGRAM): Thank you, Madam Chairman Sir, for giving me this opportunity to participate on the discussion on a very serious matter in this House. We are discussing here regarding drought and flood situation in our country.
Due to deficient rainfall, the entire Eastern India including West Bengal, Bihar, Chhattisgarh, and Orissa is facing unprecedented drought. I am coming from West Bengal. The Government of West Bengal has declared drought in 11 of the 19 districts. The truant monsoon has not only affected West Bengal, it has also impacted rice sowing in other Eastern States like Bihar, Jharkhand and Orissa. The entire Bihar, Jharkhand, Orissa and parts of other States have been declared as drought hit. In West Bengal there is a 30 per cent deficit rainfall. Around 11 lakh hectares of paddy crop have been severely affected out of targeted 44 lakh hectares for the Kharif season. The condition of farming in West Midnapur District is very miserable where more than three lakh hectares of land is not in a position to be cultivated.
Madam, non-availability of water from the big irrigation systems like DVC, Kangsaboti and Mython etc., has further contributed to crisis owing to drying up of canals, tanks and depleting subsoil water levels.
As you know, West Bengal is country’s largest rice producer. The State produced 104 lakh tonnes of paddy in the last season. The production of paddy in the State is likely to be 17 lakh tonnes less than the last Kharif season if the planted crop may survive.
The Government has already proposed to encourage the cultivation alternative crops like maize, wheat, sesame and oilseeds in Kharif and Rabi season in the State; and seed would be distributed free of cost to the farmers.
The State Government has already sanctioned Rs.50 crore initially, and another Rs.37 crore, total Rs.87 crore, for meeting the drought situation. The State Government in order to tackle drought has decided to infuse Rs.5,000 crore as a relief package for the affected farmers.
There is a genuine demand to increase the work of MNREGA by manifolds but fund is not available. According to the Government Report, the fund availability is Rs.1,165 crore. The fund already spent in West Bengal is Rs.949 crore. That means, the expenditure is 82 per cent. The State Government has already got only Rs.170 crore from the Centre, which is very meagre. So, I demand the Central Government that at least Rs.1,400 crore of MNREGA fund is required immediately to face the drought situation in West Bengal.
The Chief Minister of West Bengal has already written a letter to the hon. Prime Minister and the Agriculture Minister of the Government of India. I also appeal to the Central Government to send a Central team to assess the situation and the pathetic condition of the farmers.
The Central Government must respond to save the common people and provide jobs to the common people of West Bengal, who are facing drought situation which is prevailing in West Bengal, Eastern India, Jharkhand, Bihar and other parts of the country. Sufficient financial assistance should be provided from the National Calamity Contingency Fund to the drought-hit districts to help the affected farmers. This is my humble submission, through you, Madam, to the Government of India. Thank you.
*श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर):महोदय, बाढ़ एवं सूखे के ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर निम्नांकित सुझाव प्रस्तुत करना चाहता हूं।
1. सी.आर.एफ/एन.सी.सी.एफ नार्म्स में अविलम्ब संशोधन हो।
2. राजस्थान के उत्तरी क्षेत्र में घग्घर में बाढ़ आती है। अतः अनूपगढ़ क्षेत्र के बिंजौर में बांध बनाया जाये।
3. फ्लड मैनेजमेंट ऑथोरिटीबोर्ड की शीघ्र स्थापना हो।
4. राजस्थान में प्रायः सूखा रहता है। अकाल पड़ता रहता है। अतः राजस्थान को विशेष पैकेज जारी किया जाये।
5. सूखे के समय एम.पी.लैड को नरेगा के साथ संबद्ध किया जाये।
SHRI NITYANANDA PRADHAN (ASKA): Madam Chairman, I speak on behalf of my Party Biju Janata Dal, and also I thank on behalf of my Party that you have given chance to speak on this discussion.
Madam, you know that this problem of flood and drought is gripping the entire country since its inception. Hitherto, probably, there was not much publicity but now the media has come up and electronic media is there, the entire problem gets to the knowledge of everybody.
Due to climatic change also, we face a lot of difficulties both because of flood and drought. We will be analyzing the entire situation in the whole of India. In China, Chile and in other places, severe flood is affecting lakhs and lakhs of people. In our country also, the situation in Leh in Kashmir is very precarious. Similarly, in other parts of the country, there are severe floods. So, what I think is that it is a perennial problem, and the Centre is keeping its eyes closed on this subject. If the Centre would have been very sensitive, they could have solved this problem within these 63 years or so.
They should have taken steps to immediately solve this problem wherever it is there. In consultation with State Governments, the Central Government should come forward to tackle the flood situation throughout the country at once by making suitable arrangements for funds and material. It is mainly the responsibility of the Centre, though water is in the State List. I think the Centre should come forward to talk to the States, specially the vulnerable States where flood occurs every year.
This situation is also prevalent in my State, Orissa. Every year there is flood and there is drought. This is a peculiar situation that we are passing through. It is not just the case in my State, but that of the whole of the country. You must appreciate the statements made by hon. Members who stated that while some parts of their States are reeling under drought, some other parts are flooded with water. This is a very peculiar situation which should be tackled i on a humanitarian way. There should be a will on the part of the Central Government to solve this problem.
Coming to the situation in my State, this year also there is a shortfall in rains. Out of 30 districts in Orissa, only seven to eight districts have got full rainfall whereas 25 districts have got very scanty rainfall, with the result the cropping pattern could not be adhered to. The sowing and transplantation season is almost over. Now it is the end of August. So, there cannot be any further transplantation. These 25 districts of Orissa are reeling under severe drought while some southern districts of the State have been affected by flood. This is the scenario in the whole State for the last several years. Right from 1999 at my State is witnessing floods and drought every year. There was a heavy cyclone and heavy flood. There is also drought. The Government of Orissa is spending money from its own account, from its own treasury, but the tragedy is that the Central Government does not come forward to support Orissa Government.
On many occasions, you will be surprised to note that when there was severe drought, the then Home Minister Shri Shivraj Patil came to our State and announced that the Prime Minister was pleased to sanction Rs.500 crore. But, only Rs.82 crore went to our State. Similarly, the Prime Minister also assured our Chief Minister Shri Naveen Patnaik an assistance of Rs.500 crore and Rs.200 crore. But only Rs.25 crore has been given. This is the tragic condition under which the farmers of my State are going through. It is a very miserable condition. The Central Government should come forward with a programme to preserve the rain water and also prevent flood thereby solving certain problems which are there including drought.
In my State many areas like Chandwali and Soro, Dhamnagar are all in the Bhadrak district from where our learned friend Shri Arjun Sethi, M.P. has been elected. Those areas are completely drought striken. The entire list pertaining to rainfall in Orissa has been sent to the Central Government. It shows that less than 30-40 per cent rain is there in 25 districts. I humbly request that the Centre should come forward with a mind to help the people, mind to help the farmers, so that they can come up and withstand the tragedy of flood and drought.
At the same time, I would request that the Central Government should come forward with a special package for the State of Orissa for which our hon. Chief Minister, Shri Naveen Patnaik and the successive Orissa Governments have been demanding for a long time. For the last ten to fifteen years, there has been a demand for a special package for Orissa to develop its irrigation system and all these things, but not a single pie has been given to the State Government. Under such pathetic conditions, I think, it is the moral responsibility and obligation of the Central Government to come forward to help the people of Orissa as it does to the other States.
I have seen in the answer given by the hon. Minister in the House that help is given to other States. I am not going into the details of all that. There is a disparity. While other States are getting money from the Centre, my State is being singled out. My State, Orissa, does not get any help from the Centre. So, I would request that the Central Government should take a humanitarian approach for helping the flood and drought affected people of my State.
The Central Government, at the same time, should also come forward, after discussion with the State Government, to prepare a plan. They should come forward not only to prepare a plan but also to work it out. Simply preparing a plan does not help. If minor irrigation projects and all other irrigation projects can be completely repaired, the rain water can be stored and we can overcome the situation of drought.
I hope, the Central Government will take a positive view in the matter and give necessary help.
SHRI GANESHRAO NAGORAO DUDHGAONKAR (PARBHANI): Madam, I thank you for giving me the opportunity to speak on this discussion o n r flood and drought. I would like to put forth a few points before this House.
I have visited the areas in my constituency Parbhani in Maharashtra. In Parbhani district, there are big rivers like the Dakshin Ganga, the Godavari and the Purna V River. Due to heavy rainfall, one minor irrigation dam Bailwadi in taluka Gangakhed, district Parbhani has been damaged by floods. That is why, all the small farmers’ lands have been damaged and their crops have also been damaged. I, therefore, have a request to the Central Government to help these farmers in respect of their crops and loans because they are very poor people. Their, 4,000 acres of land have been damaged and land has vanished to the extent 10 feet to 20 feet. The farmers of this area are small land-holders. I would, therefore, like to request the Government to help and assist these people.
SHRI P. KUMAR (TIRUCHIRAPPALLI): Madam, I thank you for giving me this opportunity to participate in the discussion on flood and drought situation in various parts of the country on behalf of the AIADMK Party.
The flood and drought are two sides of the natural calamity. While one part of our country is affected by flood, the other parts are affected by drought. India is the most flood affected nation in the world after Bangladesh. It accounts for one-fifth of global deaths due to floods and on an average, thirty million people are evacuated every year. So, floods in India are not a new phenomenon.
Excessive rainfall and intense rainfall when river is flowing full accompanied with poor natural drainage are the main causes for floods. While these are all the main reasons, there are no permanent precautionary measures taken to save our people from the natural disaster. The Indian Meteorlogical Department is giving warning before the occurrence of natural calamity, but the poor attention paid to it by the Government results in damages to crops, houses and public utilities in the country. The Government should act immediately on the warning of IMD so that the damages may be minimized. To avoid the damages caused by flood, the Government should come forward to construct embankments, construct detention reservoirs and improve the channels etc. The river disputes that are prevailing all over the country between States is the main reason for drought situation in the country. While some States are affected by floods / overflowing of water, other parts of our country are in dire need of water. The Government should come forward for interlinking of rivers and to nationalise all the rivers to avoid such a situation and to save our country from these two disasters.
Now, I come to the issue concerning Tamil Nadu. My Parliamentary Constituency is situated on the banks of Cauvery. Srirangam city -- where the famous Lord Ranganatha Temple is situated -- is surrounded by Cauvery and Kollidam, and Srirangam looks like an island. It is very much affected during floods as 30 cubic metres of water of Cauvery and Kollidam are flowing in to the sea. The Government should come forward to allocate funds to divert the surplus water during floods to the water-starved adjacent districts, namely, Pudukottai and Sivagangai. A scheme has to be formulated for this purpose to save Srirangam from frequent floods.
The compensation that is announced by the Government for the affected farmers is distributed only at the time when the place is affected by drought. The Government should come forward with measures to avoid the undue delay in distribution of compensation to the affected agriculturists, and it should be done on time. Further, whenever a team from the Centre is being sent to the affected places for the on-the-spot assessment, then the local representative may also be included in this team.
In the year 2005, Tamil Nadu was affected by major floods and Tsunami, in which 55 municipalities, 101 Taluk Headquarters, 3,690 villages, 2,84,174 hectares of cultivable agricultural land, and 3,692 kms. of roads were severely affected. Tamil Nadu, which was under the leadership of our General Secretary, hon. Amma Dr. J. Jayalalithaa, had taken necessary serious measures on time and saved those people from disasters like Tsunami, which affected Tamil Nadu very seriously and which resulted in loss of a large number of human lives. The then hon. Chief Minister, Dr. J. Jayalalithaa, took timely steps to save the people from Tsunami. The Government should come forward to follow the methods adopted by the then Chief Minister of Tamil Nadu and save the country at the time of such natural disasters.
श्री रमेश राठौड़ (आदिलाबाद): सभापति महोदया, आपने मुझे इस चर्चा में भाग लेने का अवसर प्रदान किया, उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। आंध्र प्रदेश पिछले पांच साल से बाढ़ और सूखे से जकड़ा हुआ है। मेरे से पूर्व कई सदस्यों ने अपने-अपने राज्यों में बाढ़ या सूखे से उत्पन्न स्थिति के बारे में चर्चा की है। केन्द्र में यूपीए सरकार है, जिसमें कांग्रेस पार्टी मुख्य दल है और आंध्र प्रदेश में भी कांग्रेस पार्टी की सरकार है, लेकिन फिर भी आंध्र प्रदेश के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है, यह ठीक नहीं है। गत वर्ष भारी सूखा पड़ने से हमारे राज्य की सरकार ने 22 जिलों में 981 मंडलों को सूखाग्रस्त घोषित किया था। हमारे मुख्य मंत्री जी ने एक सितम्बर 2009 में एक जीओ दिया, जीओएमस नं.-20 निकालकर और 87 मंडलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया। इस समय राज्य में 1068 मंडल सूखाग्रस्त हैं। राज्य का 90 प्रतिशत हिस्सा सूखाग्रस्त घोषित किया जा चुका है। हमारे राज्य में खरीफ की फसल 63 लाख हेक्टेयर भूमि में थी, जिसमें से 13.56 लाख हेक्टेयर जमीन में पूरी फसल सूख गई है। राज्य सरकार ने 9747 करोड़ रुपए की सहायता राशि केन्द्र सरकार से मांगी थी। लेकिन केन्द्र सरकार ने अभी तक बहुत कम राशि दी है और वह राशि भी वहां खर्च नहीं की गई है।
आंध्र प्रदेश में पिछले पांच वर्षों में गोदावरी, पेनगंगा, कृष्णा, तुंगभद्रा नदियों से दस जिलों को भारी नुकसान हुआ है और 107 लोग मारे गए हैं। 350 लोग प्रभावित हुए, 11,86,618 मकान तथा 55,1966 हेक्टेयर खेती की भूमि नष्ट हो गयी। अगस्त-नवम्बर 2006 में आयी भारी वर्षा और चक्रवात से प्रदेश में 93 लोग मारे गये तथा 13 जिलों को प्रभावित किया। करीब 12,5055 घर तथा 60,4554 हेक्टेयर खेती क्षेत्र को नुकसान पहुंचा। वर्ष 2007 में 4 जिलों में भारी वर्षा के कारण 172 लोगों की जानें गयीं तथा 2, 30,000 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र नष्ट हो गया। वर्ष 2008 में तीन बार आयी भारी वर्षा तथा बाढ़ की वजह से 17179 लागों की मौतें हुई। गत वर्ष अक्टूबर में लैला तूफान की वजह से करनूल, नालगोण्डा, महबूबनगर, गुंटूर तथा कृष्णा कुल पांच जिलों में भारी तबाही हुई जिसमें 571 गांव तथा 89.93 लाख जनसंख्या प्रभावित हुई और 73 लोग मारे गये तथा 17,9040 घरों की तबाही हो गयी। पिछले पांच सालों में सूखा और बाढ़ की वजह से 45 हजार करोड़ रुपये का जो रिलीफ सरकार से मांगा था, केन्द्र और राज्य सरकार ने मिलकर 1800 करोड़ रुपया ही दिया, लेकिन वह भी ऑरिजनल लोगों को नहीं मिला। मैं सरकार से मांग करता हूं कि भारी वर्षा के कारण जो पीने का पानी, आरडब्ल्यूएस से मिलता था, लाइन रिपेयर होने के कारण पानी नहीं मिलता है। ऐसे समय केन्द्र सरकार ने जो डायरेक्शन दिया कि 30 दिनों तक, इन लोगों को खाने की सुविधा दी जाए, 30 रुपये बड़ों को व 15 रुपये छोटों को मजदूरी दे, लेकिन ऐसा कहीं भी नहीं हुआ। इतना ही नहीं बल्कि जो भारी बरसात के कारण घर गिर गये, उन लोगों को 35,000 रुपये देने के लिए केन्द्र सरकार ने कहा लेकिन हमारी आंध्र सरकार सिर्फ 5000 रुपये ही देती है। उतना ही नहीं जो घर पार्टली डैमेज हुए, उन लोगों को 10,000 रुपये देने के लिए केन्द्र सरकार ने कहा था लेकिन सरकार सिर्फ 5000 रुपये ही दे रही है। केन्द्र सरकार की डायरेक्शन है कि भारी वर्षा के कारण एक हैक्टेयर को 15000 रुपये का मुआवजा दिया जाए लेकिन वहां केवल 2 हजार से 6 हजार रुपये ही सरकार दे रही है। जिन लोगों का नुकसान हुआ है उन्हें मुआवजा नहीं मिलता, लेकिन जिनकी खेती नष्ट नहीं हुई, उन लोगों को मुआवजा मिल रहा है। जो सड़कें प्राइम-मिनिस्टर सड़क रोजगार योजना, नाबाड या वर्ल्ड बैंक की सहायता से बनाई गयीं, वे आज तक भी रिपेयर होने की स्थिति में नहीं है। इसलिए मैं सरकार से निवेदन करना चाहता हूं कि वहां पर सड़कों की सुविधा करें, फ्लड-रिलीफ और सूखा राहत में जल्द से जल्द सहायता दें। जो घर डैमेज हो गये हैं, जो लोग बाढ़ और तुफान में मारे गये हैं, उनके परिवारों को स्वयं प्रधान मंत्री जी ने आकर एक लाख रुपये देने की बात कही, लेकिन आंध्र प्रदेश की सरकार वहां पर केवल 50 हजार रुपये दे रही है और वह भी पिछले दो साल से नहीं मिल रहा है।
18.00 hrs. इसके ऊपर सरकार क्यों ध्यान नहीं दे रही है। इस प्रांत में जो खेती नष्ट हुई है, वहां केंद्र सरकार उन किसानों की मदद करे। आंध्रप्रदेश को स्पेशल पैकेज देने का सरकार को काम करना चाहिए। आंध्र प्रदेश के किसान सबसे ज्यादा दुखी हैं। गत वर्ष 5 जिलों में भारी बाढ़ आई। उनके जानवर गाय, भैंस, बकरी मारे गए। आज तक सरकार ने उस तरफ ध्यान नहीं दिया है। आंध्र में भी इनकी सरकार है, लेकिन यहां सदन में कहते हैं कि जहां इनकी सरकार है, वहां ये काम करते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है।
इन्हीं बातों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
THE MINISTER OF PARLIAMENTARY AFFAIRS AND MINISTER OF WATER RESOURCES (SHRI PAWAN KUMAR BANSAL): Madam, I would request that the sitting of the House today may kindly be extended by one hour.
सभापति महोदया : सदन की कार्यवाही एक घंटे के लिए बढ़ा दी जाती है। जिन माननीय सदस्यों को अपने भाषण ले करने हैं, वे कर सकते हैं।
योगी आदित्यनाथ जी।
योगी आदित्यनाथ (गोरखपुर): महोदया, आज सदन में एक बार पुनः बाढ़ और सूखे व् पर ाEाळ चर्चा हो रही है। प्रति वर्ष मानसून सत्र में एक-दो बार इन विषयों पर चर्चा होती है। सदन में हुई चर्चा को सरकार कितनी गम्भीरता से लेती है, पिछले 12-14 वर्षों से देख रहे हैं। चर्चा के उपरांत जो क्षेत्र बाढ़ से त्रस्त हुए हैं या सूखे की चपेट में आए हैं, आपदा राहत प्रबंधन द्वारा राहत के जो कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं या चलाने की कोशिश होती है, उसमें व्याप्त दुर्व्यवस्था उनसके परिणामों से सहज अनुमान लगाया जा सकता है। जल को हमारे जीवन का महत्वपूर्ण स्रोत माना गया है। जल के बिना इस सृष्टि की कल्पना नहीं की जा सकती है, इसलिए जल सृष्टि का आधार भी है। लेकिन जब जल का उचित प्रबंधन न हो और उचित नियोजन भी न हो, तो वह जल किस प्रकार से मानव सभ्यता के लिए, इस सृष्टि के लिए खतरनाक हो सकता है, वह बाढ़ की त्रासदी के समय हम सब महसूस कर सकते हैं।
बड़ी अजीब सी विडम्बना है कि एक ही समय देश का एक क्षेत्र बाढ़ की चपेट में आता है तो दूसरा क्षेत्र सूखे की चपेट में भी रहता है। मानसून देर में आया। पहले आशंका उठ रही थी कि मानसून नहीं आएगा, सूखा पड़ेगा। कई क्षेत्रों में सूखा पड़ा हुआ है। मेरी बगल में रमेश जी बैठे हैं, रमेश जी के छत्तीसगढ़ में सावन में वहां पर बारिश नहीं हुई। बिहार का एक बहुत बड़ा भाग है जो आज भी सूखे की चपेट में है। हम लोगों ने देखा कि पहले ही पंजाब और हरियाणा में जिस प्रकार से बाढ़ ने अपना कहर बरपाया, राजस्थान और गुजरात जहां हमेशा सूखा रहता था, इस बार बाढ़ की त्रासदी से वहां पर लोग काफी हद तक प्रभावित हुए हैं। बाढ़ और सूखे की इस त्रासदी को एनडीए सरकार ने स्वीकार किया था और एनडीए सरकार ने इसके लिए योजना भी बनाई थी। कितना अच्छा होता कि पर्यावरण को ध्यान में रखकर जो भी प्रयास हो सकते थे, नदियों को जोड़ने की उस परियोजना को क्रियान्वित किया गया होता तो संभवत: ऐसा नहीं होता कि इस देश का एक बहुत बड़ा भू-भाग एक ही समय में सूखे की चपेट में होता है तो एक बड़ा भू-भाग बाढ़ की चपेट में भी होता है। कहीं न कहीं प्रबन्धन की कमी है और उस कमी के कारण आज यह स्थिति इस देश में आई है। हम लोग पिछले 14 वर्षों से लगातार इस बहस में पड़े हुए हैं। हमेशा जब भी मानसून सत्र प्रारम्भ होता है तो कहीं से सूखे की आवाज उठती है तो कहां से बाढ़ की चर्चा की आवाज उठाई जाती है। चर्चा के बाद मंत्री जवाब देते हैं और उस जवाब के साथ ही आगे की योजनाएं बनती हैं और वह बात वहीं पर ही समाप्त भी हो जाती है। हम लोग जानते हैं कि घोषणाएं जो यहां पर होती हैं, वे कितनी प्रभावी हो पाती हैं। कभी कभी यह भी प्रश्न उठता है कि संसद इस सरकार के प्रति जवाबदेह है या सरकार इस संसद के प्रति उत्तरदायी है। यह प्रश्न उठने लगता है और इसलिए पार्लियामेंट्री डैमोक्रेसी पर जो एक प्रश्न उभरने लगा है, मुझे लगता है कि उस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
आपदा कोई भी आए, मुझे लगता है कि आपदा कभी भी बताकर नहीं आती है। आपदा प्रबन्धन के लिए आपने क्या किया है, सरकार उसके बारे में बताए। आपदा जब आएगी, उसके बाद तब कोई रिलीफ के काम प्रारम्भ होते हैं और वह भी देर से होते हैं, यानी 72 घंटे के बाद या 100 घंटे के बाद रिलीफ के कार्य शुरु होते हैं। मुझे लगता है कि वह आपदा प्रबन्धन नहीं, वह सरकार की संवेदनहीनता को दर्शाता है और जनमानस की भावनाओं के साथ यह सीधे-सीधे खिलवाड़ है। इस प्रकार का खिलवाड़ हम लोग हर वर्ष देखते हैं। ऐसा नहीं है कि जल के उचित प्रबन्धन के माध्यम से या किसी भी प्रकार की आपदा के लिए अगर हमारे पास प्रशिक्षित स्टॉफ है, या प्रशिक्षित टीम है औऱ वह टीम इस आपदा को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी न हो सके। पैसा हर साल खर्च होता है। बाढ़ की जो त्रासदी है, मैं जानता हूं कि इस बाढ़ से जुड़े हुए जितने विभाग हैं, इस देश के भ्रष्टतम विभागों में से है। हर साल बाढ़ के पूर्व आपदा नियंत्रण के लिए जो पैसा जाता है, उस पैसे का कहीं भी उचित उपयोग नहीं होता है। वह पैसा बाढ़ को रोकने के लिए किस रूप में यूज होता है और जब बाढ़ आती है उस समय किस प्रकार से बाढ़ के समय वह पैसा बहाया जाता है, वह हम लोगों ने अपनी आंखों से देखा है। हम लोगों ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और आसपास के क्षेत्र में 1998 की और 2001 की और उसके बाद की जो सदी की सबसे भीषणतम बाढ़ थी, उसको हम लोगों ने अपनी आंखों से देखा है। हम लोगों ने वहां पर जन और धन की व्यापक क्षति को देखा है। लोगों के उजड़ते हुए घरों को हम लोगों ने देखा है। कराहती हुई मानवता को चिल्लाते हुए उन बच्चों को हम लोगों ने वहां पर अपनी आंखों से देखा है। लेकिन बार बार वही प्रश्न उठता है कि बाढ़ के समय या किसी भी आपदा के समय मंत्रियों के, माननीय प्रधान मंत्री के, मुख्य मंत्री के दौरे संबंधित क्षेत्रों में होते हैं लेकिन जब आपदा थोड़ी नियंत्रित होती है तो उसके बाद की कार्रवाई सब शून्य हो जाती है। उसके बाद के जो उपाय होने चाहिए, वे सब शून्य हो जाते हैं। इसलिए खास तौर से जब बाढ़ और सूखे के बारे में चर्चा हो रही है तो बाढ़ आने से पूर्व क्या प्रबन्धन किये गये हैं, तटबंधों के संबंध में नदियां जो आज गाद से भर चुकी हैं क्योंकि बाढ़ अचानक नहीं आ रही है। वनों की अंधाधुंध कटाई, भूमि-संरक्षण और मृदा संरक्षण से संबंधित जो उपाय होने चाहिए थे, वे उचित रूप में नहीं किये जा रहे हैं, विकास की अवैज्ञानिक सोच बाढ़ के मुख्य कारणों में से है। मैं इस बात को पिछले तीन-चार वर्षों से महसूस कर रहा हूं। हमारा जो गोरखपुर जनपद है, वहां इस वर्ष भी आधे जनपद में अच्छी बारिश हुई और आधे जनपद में बारिश ही नहीं हुई।
केवल एक जनपद की बात नहीं है पूर्वी उत्तर प्रदेश के तमाम जनपदों में इस प्रकार की स्थिति पैदा हुई है। वहां अच्छी बारिश होती है सरकार उसे देखकर बाकी क्षेत्रों को सूखाग्रस्त घोषित नहीं करती है। पिछले वर्ष भी जनपद सूखे की चपेट में आया था, इसके उपरांत फसल बोने का समय समाप्त हो गया और बाद में बाढ़ की चपेट में भी आ गया। इस तरह से दोनों त्रासदियों को वहां का किसान झेलता है। उसे न तो वहां बाढ़ की त्रासदी में सहयोग मिलता है और न ही सूखा त्रासदी में सहयोग मिलता है। हम जानना चाहते हैं कि बाढ़ आने से पूर्व क्या प्रबन्ध किये गये है? तटबंधों की मरम्मत का कार्य, मृदा संरक्षण का काम उचित न होने के कारण उपजाऊ मिट्टी नदियों की गाद में भर चुकी है, पूरी तरह से नदियों के जल में भर चुकी है। जब पानी को बहने की जगह नहीं होगी तो ओवरफ्लो होना ही होना है। उसके लिए हम लोगों ने कोई योजना नहीं बनाई है। अन्य जो उपाय हो सकते थे, जहां पर जल को रोककर उसका उचित प्रबन्धन करके औऱ फिर आवश्यकतानुसार उस जल को सिंचाई के लिए जल विद्युत परियोजना के तहत उपयोग किया जाना था लेकिन वर्ष 1954 से जब से आपदा नियंत्रण के लिए योजना चली, तब से उस ओर ईमानदारी से कोई प्रयास नहीं हो पाया।
महोदय, बाढ़ जब आती है तो आपदा प्रबन्धन के लिए जो व्यवस्था बनाई गई है, चाहे वह केन्द्रीय सरकार के स्तर पर हो या राज्य सरकार के स्तर पर हो या जनपद स्तर पर हो, कोई काम नहीं कर पाती है। लोग बाढ़ से घिरे होते हैं और वहां से उन्हें निकालने के लिए नावों की व्यवस्था नहीं होती है। एक माननीय सदस्य अभी बता रहे थे कि उन लोगों को राहत के नाम पर 20 रुपये एक परिवार को दिये जाते हैं। क्या 20 रुपये में एक परिवार को भरपेट भोजन मिल पाएगा? उस परिवार के साथ उनके मवेशी हैं, उनके लिए सरकार क्या व्यवस्था कर रही है? क्या सरकार पीने के लिए उचित जल की व्यवस्था कर रही है? कोई भी व्यवस्था बाढ़ आने के बाद नहीं हो पाती है। बाढ़ आने के बाद जो त्वरित आपदा राहत कार्य होने चाहिए, वे नहीं हो पाते हैं। जब बाढ़ जाती है तो वहां महामारी छोड़ जाती है।
महोदया, हम पूर्वी उत्तर प्रदेश से आते हैं और वहां हर वर्ष चाहे बाढ़ आए या न आए, 15 जून के बाद से वहां पर तरह तरह की बीमारियां जैसे मलेरिया, फाइलेरिया, कालाजार, इंसेफ्लाइटिस डेंगू तमाम बीमारियां फैलती हैं और सैकड़ों की संख्या में मौतें होती हैं। इस साल अभी तक गोरखपुर में दियाड़ीबीआरडी मेडिकल कॉलेज जो पूर्वी उत्तर प्रदेश का एकमात्र सरकारी मेडिकल कॉलेज है, वहां 210 से ज्यादा मौतें इंसेफ्लाइटिस से हो चुकी हैं और लगातार प्रतिदिन 25-30 नये मरीज आ रहे हैं। इसका कोई उपाय नहीं है। सरकार के स्तऱ पर कुछ नहीं किया जा रहा है और ये तो वे लोग हैं जो उस सरकारी मेडिकल कॉलेज में आ जाते हैं। बहुत बड़ी संख्या ऐसी है जो वहां पहुंच नहीं पाती है। उस महामारी को रोकने के लिए क्या व्यवस्था होनी चाहिए, इसका कोई उपाय नहीं है। जिन लोगों के घर उजड़ चुके होते हैं, उन लोगों के घरों का निर्माण करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं होती है। जिनके मवेशी मर जाते हैं, उनको किसी प्रकार की कोई राहत नहीं दी जाती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार प्रतिवर्ष ये नेपाल की तराई के क्षेत्र में बसा है और ये क्षेत्र प्रतिवर्ष हिमालय से आने वाली नदियों में बाढ़ के कारण भीषणतम त्रासदी से जूझते हैं। वर्ष 1954 से नेपाल के साथ कुछ परियोजनाएं चल रही हैं, चाहे राप्ती, आमी रोहनी,ओली, सरयू, घाघरा, नारायणी या किसी अन्य छोटी बड़ी नदियों के कारण, नेपाल से आने वाली नदियों के कारण बाढ़ आती है। 1954 से नेपाल के साथ वार्ता का क्रम प्रारंभ हुआ था नेपाल से इन नदियों को रोककर नेपाल में उच्च क्षमता के बांध डैम बनाकर उचित उपयोग करेंगे। नेपाल में शारदा नदी पर महाकाली पंचेश्वर बहुद्देशीय परियोजना थी।
परंतु अभी तक वह कार्य प्रारम्भ नहीं हो पाया। कोसी नदी पर सप्तकोसी उच्च बांध परियोजना थी, वह काम भी नहीं हो पाया। राप्ती नदी पर पश्चिम राप्ती में नौपुरा में बहुद्देशीय परियोजना थी, लेकिन वह काम भी अब तक नहीं हो पाया। बागमती नदी, कमला नदी पर भी काम होना था, लेकिन वह काम भी नहीं हो पाया। मेरा कहने का मतलब है कि ऐसी तमाम योजनाएं थी, जिनके बारे में नेपाल के साथ बातचीत करके हम लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार को बाढ़ की त्रासदी से बचा सकते थे। लेकिन एक ईमानदार पहल भारत सरकार के स्तर पर नहीं हो पाई। चूंकि हर वर्ष हम लोग बाढ़ से प्रभावित होते हैं, इसलिए हम लोगों ने बाढ़ आने से पहले वहां बाढ़ खंड और सिंचाई विभाग के अधिकारियों के साथ चर्चा की कि आखिर आप बाढ़ आने से पूर्व यहां कार्य क्यों नहीं करते हैं? तब उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार के पास हम लोगों ने प्रस्ताव भेजे हैं, लेकिन केन्द्र से पैसा नहीं मिला है, इसलिए हम कार्य नहीं कर पा रहे हैं। यह बड़ी अजीब सी बात है। सरकार कहती है कि हम बाढ़ नियंत्रण के लिए, आपदा राहत के लिए, आपदा नियंत्रण के लिए कार्रवाई कर रहे हैं। लेकिन जब राज्य सरकार के पास जाते हैं, उनके तंत्र से जब इस बारे में चर्चा करते हैं तो वे कहते हैं कि इसे रोकने के लिए हमारे पास कोई व्यवस्था नहीं है।
इसलिए मैं आपके माध्यम से सरकार से अनुरोध करूंगा कि जब बाढ़ आती है तो कोई प्रबंधन का कार्य उस समय नहीं हो सकता है। उससे पहले वह कार्य करना पड़ेगा, उससे पहले उसे रोकने की व्यवस्था करनी पड़ेगी। इसका स्थायी समाधान यही है कि आपने मनरेगा की एक योजना चलाई है, यह बहुत अच्छी योजना है। लेकिन इस योजना का उपयोग आप इसमें क्यों नहीं करते हैं। यदि नदियों के उस गाद को हटाने में मनरेगा के पैसे का उपयोग हो सके और नदियों के तल को गहरा किया जाए तो काफी हद तक बाढ़ की त्रासदी को नियंत्रित करने में सफलता मिलेगी और उसी गाद को लाकर यदि आप तटबंधों में जमा कर देंगे तो तटबंध भी ऊंचे, पक्के और मजबूत होंगे और वहां आप बाढ़ की त्रासदी को भी रोक सकते हैं।
दूसरी बात मैं कहना चाहता हूं कि नेपाल के साथ जो हमारी परियोजनाएं लम्बित पड़ी हुई हैं, सरकार तत्काल उन पर पहल करें। क्योंकि यह नेपाल और भारत दोनों के हित में है। अगर यह हो जाता है तो बिहार और पूर्वी उत्तर जिसमें गोरखपुर, महाराजगंज, कुशीनगर, देवरिया, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर और श्रावस्ती जैसे तमाम जनपद आते हैं। इन सभी जनपदों को बाढ़ की त्रासदी से बचाया जा सकता है और प्रतिवर्ष बाढ़ से होने वाली जन और धन की व्यापक क्षति को रोका जा सकता है।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात यहीं समाप्त करता हूं।
* mukesh ओश्री मिथिलेश कुमार (शाहजहांपुर ):
श्री मिथिलेश कुमार (शाहजहांपुर )ः मेरे संसदीय क्षेत्र शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश के जनपद शाहजहांपुर में प्रति वर्ष आने वाली बाढ़ का कारण दिउनी डैम से जनपद की गर्रा नदी में छोड़ा गया पानी है। डैम प्रबंधन द्वारा बिना किसी पूर्व सूचना के छोड़े गए पानी से काफी जनहानि एवं धनहानि होती रही है। वर्ष 2010 में 19, 20 व 21 जुलाई को बिना किसी सूचना के क्रमश 25, 30 व 40 हजार क्यूसेक पानी छोड़ा गया। छोड़े गए पानी से अब तक जनपद के करीब 50 गांव को बाढ़ में अपने चपेट में लिया है, जिससे जनपद के हजारो किसानों की फसल बर्बाद हो गयी है। पानी के तेज बहाव में आकर ग्राम जेंवा मकरन्दपुर विकासखंड निगोही के एक गरीब परिवार मटरेलाल बाल्मीक का 20 वर्षीय युवा पुत्र धर्मेन्द्र बाल्मीकि 24 जुलाई, 2010 को 9 बजे बहकर मर गया जिसका शव गोताखोरों कि मदद से निकाला गया तो दूसरी घटना में 21. 07. 2010 को सांय में नदी किनारे खड़े ग्राम -कुडरिया, थाना -परौर, जलालाबाद निवासी अन्नु, पुत्र ईश्वरी, उम्र 30 वर्ष को पानी के तेज बहाव ने नदी के किनारों को काटते हुए बहा ले गई, जिसका शव काफी खोजबीन के बाद भी नहीं मिला। मैं पत्र के साथ एक मृत्तक का फोटो सहित प्रभावित ग्रामों की सूची संलग्न कर रहा हूं।
ज्ञात हो कि सूचीबद्ध गांवों को बाढ़ से बचाने के लिए राज्य सरकार को कई बार पत्र लिखे जाने के बावजूद भी सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। मेरा संसदीय क्षेत्र शाहजहांपुर राज्य का पिछड़ा एवं कृषि पर निर्भर रहने वाला जनपद है। बाढ़ कि वजह से जनपद के करीब 50 गांवों के किसान पूरी तरह भूखमरी के कगार पर खड़े हैं। मेरे संसदीय क्षेत्र शाहजहांपुर के लोगों में काफी रोष व्याप्त है।
अतः, मैं सरकार से अनुरोध करूंगा कि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए और इसे अधिक विस्फोटक न बनने देने के लिए कारगर उपाय करें और मृतक परिवारों को 5-5 लाख रुपए की सहायता करते हुए पीड़ित किसान परिवारों के प्रति हेक्टेयर 50-50 हजार रुपए की अनुदान प्रधानमंत्री राहत कोष अथवा किसी अन्य केन्द्रीय योजनाओं द्वारा सरकारी अनुदान देने कि कृपा की जाए।
मेरे संसदीय क्षेत्र शाहजहांपुर से बाढ़ से प्रभावित ग्रामों की सूची -
क्रम सं.
ग्राम का नाम विकासखंड
1.
कुआडाडा खंजन खुदागंज
2. हुसियापुर खुदागंज
3. लालपुर कन्नापुर खुदागंज
4. रामपुर जयचन्द खुदागंज
5. नौगवां लसीतपुर खुदागंज
6. कुंडा हरचन्द खुदागंज
7. मीरपुर उत्तमपुर खुदागंज
8. कंधरापुर खुदागंज
9. रामेश्वरगंजगौटिया खुदागंज
10. लालपुर कांट
11. अकर्रारसुलपुर ददरौल
12. भरतापुर निगोही
13. विक्रमपुर निगोही
14. साधौ गौटिया निगोही
15. कुकहा महमुदपुर निगोही
16. जेवा मुकुन्दपुर निगोही
17. धीमर गौटिया निगोही
18. परवा खेड़ा निगोही
19. वीरसिंहपुर निगोही
20. सकतिया निगोही
21. भरी वसंतपुर निगोही
22. विक्रमपुर चकोरा निगोही
23. चकमली निगोही
24. चकुलिया निगोही
25. भरतापुर निगोही
26. भाउपुर निगोही
27. मौजमपुर मिर्जापुर
28. कुनियासाहनजिरपुर मिर्जापुर
29. किलापुर मिर्जापुर
30. मई धीरगंज मिर्जापुर
31. धिरौला मडैया मिर्जापुर
32. ककारी की मडैया मिर्जापुर
33. नवादा मिर्जापुर
34. कपारी मिर्जापुर
35. टिकरउ मिर्जापुर
36. सगहा मिर्जापुर
37. खाकरमई मिर्जापुर
38. कोयला मिर्जापुर
39. कुडरिया कलान डॉ. ज्योति मिर्धा (नागौर): सभापति महोदया, आपने मुझे इस विषय पर बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देती हूं। इस सदन में बाढ़ और सूखे पर चर्चा में अभी तक जितने सदस्यों ने बात कही है, मोटा-मोटी सबने फ्लड के बारे में बताया है। मेरी भी मोरल रिस्पांसिबिलिटी बनती है, चूंकि मैं राजस्थान से आती हूं, इसलिए हमारे यहां के सूखे की बात मुझे सदन में पहले रखनी चाहिए। राजस्थान में पिछले 52 साल के रिकार्ड में 40 वर्ष तक सूखा पड़ा और ठीक-ठाक मैनेज कर रहे थे। जब तक ब्रिटिशर्स आये थे और उससे पहले जब राजे-रजवाड़ों का समय था, तब तक जो हमारी कम्युनिटीज थी, वह वाटर मैनेजमैन्ट किया करती थी। नलके का सिस्टम नहीं था कि नलका चालू किया और टोंटी में पानी चालू हो गया। यह दिक्कत हमें तब आने लगी थी, मैं ड्राउट हिट जोन की बात कर रही हूं, जब हमारी कम्युनिटीज ने इस सिस्टम को गिव अप कर दिया। आज अगर मैं उसका कोई इलाज सोच पाती हूं या कोई इंटरवेन्शन सोच पाती हूं तो वह सिर्फ यह है कि हमें वाटर हार्वेस्टिंग बहुत बड़े पैमाने पर करनी चाहिए। हमारी सरकार की एक फ्लैगशिप योजना महात्मा गांधी नरेगा योजना है, मैं रह-रह कर सदन में यह बात उठाती हूं कि वाटर शैड मैनेजमैन्ट का जो डिपार्टमैन्ट है, वह रूरल डैवलपमैन्ट मिनिस्ट्री के अंडर आता है और बहुत क्लोजली नरेगा के काम से उसका कार्य जुड़ा हुआ है। यदि इन दोनों विभागों को हम मर्ज कर दें तो हमारे पास कांट्रैक्चुअल स्टाफ की जगह रेगुलर स्टाफ होगा, जो नरेगा को संभाल पायेगा और हम इसका सारा फोकस वाटर हार्वेस्टिंग पर रखें। ये सारी स्टडीज पहले कंडक्ट हो चुकी हैं कि अगर आप माइक्रो लैवल पर वाटर मैनेजमैन्ट करना चाहते हैं तो आप वाटर हार्वेस्टिंग करें और उससे आप इतना पानी बचा पायेंगे कि आप छोटी-मोटी इरिगेशन भी कर सकें। आज आप जानते हैं कि हमारी डैजर्ट स्टेट हैं, दूसरी सूखी जगहें हैं। हर जगह कहते हैं कि अगर पेड़ होंगे तो बरसात होगी। वह कहते हैं कि पेड़ कैसे लगायें, अगर बरसात होगी तो पेड़ लग सकेंगे। इसलिए यह अंडे और मुर्गी की जो सिचुएशन है, इसे तोड़ने के लिए हमारे हाथ में एक ही चीज है कि हम ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगायें। भगवान की कृपा से इस बार हमारे यहां बरसात अच्छी हुई है। परंतु मैंने यह देखा कि आदमी की एक आदत होती है, वह शार्ट टर्म सोचता है, शार्ट टर्म देखता है। पिछले साल बहुत भीषण अकाल था और हम सब अकाल की बात कर रहे थे।
अब की बार जब मेरे पास फोन आते हैं तो कोई यह नहीं कहता कि पानी की प्राब्लम है। बरसात बहुत हो गई, सड़क एक नहीं बची है। यह लौंग टर्म प्रोस्पैक्टिव, चाहे बाढ़ हो या सूखा हो, रखना पड़ेगा। आज तक हम क्या करते आये हैं? सदन में कोई भी ऐसा सदस्य नहीं होगा जो कह सके जब से हमने आजादी ली है, हमने शायद बाढ़ और सूखे के प्रबंधन में जितना पैसा लगाया है, फिर भी हमारा क्षेत्रफल बढ़ा है, हमारी फ्रीक्वैंसी ऑफ इंटैंसी ड्राट एंड फ्लड है, उसमें बढ़ी है। माईक्रो लैवल पर हम मैनेज करना चाह रहे लेकिन माईक्रो लैवल पर मिसमैनेजमेंट हो रहा है। पिछले 63 साल में हमें यह लैसन जरूर ले लेना चाहिये। मैं सदन के सभी सदस्यों से गुजारिश करूंगी कि सूखे के अंदर आप वाटर हारवैस्टिंग करें, क्योंकि पानी एक इम्पार्टेंट टापिक है। कृषि इस पर पूरी तरह से आधारित है। आज फूड सिक्योरिटी एक्ट लाने की बात हो रही है। अगर हमारी कृषि ठीक से नहीं हो रही होगी,अगर हमारी पाइंटेड एप्रोच नहीं होगी कि कहां पर ड्राई है, कहां हमारे फ्लड्स हैं, कहां वैटलैंड है, हमें कहां पर किस फसल की बुआई करनी चाहिये, अगर हम इस पर फोकस नहीं करेंगे तो आने वाले समय में हम लोगों को तकलीफ हो सकती है।
सभापति महोदया, हमारे साथियों ने यहां पर बाढ़ के बारे में बात कही है। मैं एक उदाहरण देना चाहूंगी कि माईक्रो मैनेजमेंट में मिसमैनेजमेंट क्यों रही है? इंजीनियर्स लोग इसे करते हैं। योगी आदित्यनाथ जी ने कहा कि हमें एम्बैंकमेंट्स बनाने चाहिये। हम 400 किलोमीटर का एम्बैंकमेंट बनाते हैं और कोसी नदी का इसके संदर्भ में उदाहरण दूंगी कि कोसी नदी में सदियों से आज तक बाढ़ आती रही है। पहले बाढ़ का पानी वहां सात दिन रुकता था, किसान लोग उसका इंतजार करते थे। जब ब्रिटिशर्स ने सैंचुरी के शुरु तक इस बात को रिकार्ड कर रखा है कि किसान वहां बैठकर इंतजार करता था कि जो फायदे का फ्लड है, वह .आये ताकि जो फर्टाइल सिल्ट है, हमारे खेतों में फैले, हमारी जमीन उपजाऊ हो, जिससे हम फसल के अंदर फायदा उठायें। पर आज क्या होता है? आज हमारी अप्रोच बदल गई है। हम एम्बैंकमैंट करके सोचते हैं कि हम नेचर से बड़े हैं, और एम्बैंकमेंट करके उस नदी को बीच में रोकना चाहते हैं। धीरे-धीरे नीचे सिल्टिंग होती है क्योंकि हिमालय पर्वत की एक नेचर है कि वह यंगैस्ट माऊंटेन रेंज है, दुनिया भर में सब से ज्यादा सिल्टिंग यहां होती है। नदी का लैवल ऊपर होता जाता है क्योंकि आपने एम्बैंकमेंट क्रिएट कर रखा है। बरसात का जो पानी है या,िट्रब्यूटरी आकर नदी में मिलनी चाहिये थी, वह नहीं मिल पाती है तो एम्बैंकमेंट के इस तरफ वाटर लौगिंग हो जाती है, नदी में उफान आया हुआ होता है। अगर वह एम्बैंकमेंट टूटता है तो गांव के अंदर फ्लड आ जाता है। इन आपदाओं से सब से ज्यादा नुकसान गरीब तबके का होता है। सभी सदस्यों ने राहत की बात कही लेकिन मैं उस लैवल तक नहीं जाना चाहती। कोसी नदी ने पिछले 250 साल में 120 किलोमीटर अपना कोर्स चेंज किया है। वह एक जमाने में किसी नदी में ड्रेन किया करती थी, पहले वह ब्रह्मपुत्र में जाती थी और अब वह गंगा नदी में जाती है। मैं दूसरा उदाहरण तीस्ता नदी का दूंगी। यह सब से वाइल्ड नदी है, यह हिमालय पर्वत से निकलकर आती है। कई माननीय सदस्यों ने कहा कि उस पर बांध बनने चाहिये। मैं कहना चाहती हूं कि जब 1997 में बाढ़ आयी थी तो तीस्ता नदी, जो गंगा में ड्रेन किया करती थी, वह अब ब्रह्मपुत्र नदी में ड्रेन करने लगी है। एक बहुत ही एम्बीशियस योजना बनाने की बात कही गई थी कि सारी नदियों को एक साथ जोड़ दिया जाना चाहिये ताकि जहां सूखा है, वहां हम पानी पहुंचा सकें। हम इनसान हैं और पिछले साल जो भीषण अकाल पड़ा था तो मेरे ख्याल से सब को समझ आ गई होगी कि मौनसून के लिये हम पहले बैठकर आसमान की तरफ ताक रहे थे कि यह आये और हम लोग अपने आप को कितना अदना महसूस कर रहे थे। इस सदन में आज भी कई चीजें ट्रेडीशन के हिसाब से की जाती हैं। ब्रिटिशर्स से हमने ट्रेडीशन इनहैरेट की थी कि जब यहां बजट पेश होता है तो हमारे दो बजट पेश होते हैं। एक जनरल बजट और दूसरा रेल बजट। मैं यहां पहले डिस्कलेमर देना चाहूंगी कि मैं रेल मंत्रालय और रेल मंत्री के खिलाफ कुछ नहीं बोल रही हूं। एक छोटी सी बात है कि एक जमाने में रेल को इम्पार्टैंस दी गई थी। आज कहते हैं कि रेल विभाग में 14 लाख कर्मचारी काम करते हैं और मुझे रेल मंत्रालय पर गर्व है। उस जमाने में रेलवे लाइन हाथी से उठवाय़ी जाती थी। उस समय 100 आदमी लगकर पटरी बिछाते थे। नदी-नाले पर, सुंग खोदकर, पहाड़ों पर पटरी बिछाते थे। उस समय एक मेगा इंजीनियरिंग टास्क था। वे मेगा स्ट्रक्चर थे।
60 साल से 100 साल के अंदर यह प्रवृत्ति चेंज होनी चाहिए। हमें समय के हिसाब से अपने आपको प्रायोरिटाइज करना पड़ेगा। आज अगर इस देश के अंदर जरूरत है कि एक नया बजट आना चाहिए, तो वह बजट वाटर मैनेजमेंट के ऊपर आना चाहिए। वाटर मैनेजमेंट के ऊपर बजट लाइए, क्योंकि इसके ऊपर आपका एग्रीकल्चर डिपेंडेंट है। अगर सिर्फ 14 लाख रेलवे के अंदर कर्मचारी हैं, तो भी पानी तो हर एक आदमी को चाहिए। एग्रीकल्चर से जो अनाज पैदा होता है, वह आपके यहां हर आदमी को चाहिए।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करते हुए सदन का और आपका धन्यवाद करती हूं।
*ओश्री पन्ना लाल पुनिया (बाराबंकी ):
श्री पन्ना लाल पुनिया (बाराबंकी )ः मेरे क्षेत्र के 5 लाख लोग बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहे है। मैं विशेष रूप से सदन का ध्यान मेरे लोक सभा क्षेत्र में घाघरा नदी में प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ की ओर आकर्षित करना चाहता हूं कि इस बाढ़ से बाराबंकी जनपद के मुख्यतः 3 ब्लॉक सूरतगंज, रामनगर, सिरौली -गौसपुर प्रभावित होते है, इनके अलावा सीतापुर, फैजाबाद, बहराईच जनपदों के कुछ क्षेत्र भी बाढ़ की विभीषिका से त्रस्त रहते है। हालत इतनी खराब है कि पूरे क्षेत्र में एक भी पक्का मकान नहीं है केवल कच्ची झोपडियां है जो हर साल बाढ़ से नष्ट हो जाते हैं। बाढ़ के बाद पुनः उन झोपड़ियों को बनाया जाता है। इन क्षेत्रों के लड़कों की शादियां नहीं हो रही है क्योंकि इन क्षेत्रों से बाहर के लोग अपनी लड़कियों की शादी इस क्षेत्र मं नहीं करना चाहते हैं। बीमार लोगों के लिए चिकित्सा सुविधा नहीं है। आवागमन के साधन नहीं है। सड़के तारकोल से बनती है। हर साल बाढ़ का पानी उन सड़कों के ऊपर से गुजरने के कारण हर साल नष्ट हो जाती है। मैंने पहले भी सुझाव दिया था कि बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों में सिमेन्टेड रोड़ बननी चाहिए। इन क्षेत्रों में बाढ़ आने का कारण जरूरी नहीं कि इन क्षेत्रों में बारिश हो, बल्कि नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा अधिक होने के कारण वहां बने बांध लबालब हो जाते हैं तथा उनका एकत्रित पानी घाघरा नदी में छोड़ दिया जाता है, जिससे बड़े पैमाने पर जान -माल तथा जानवरों की हानि होती रहती है। भारत सरकार ने उत्तर प्रदेश सरकार से इस क्षेत्र में पुल व बांध बनाने के लिए प्रस्ताव भेजने को कहा है, लेकिन 1 वर्ष से ज्यादा अवधि होने के बावजूद सर्वेक्षण करवाकर प्रस्ताव गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग पटना को नहीं भेजा गया है। अतः मेरी मांग है कि शीघ्र से शीघ्र बांध बनवाया जाए और सर्वेक्षण में इस बात का ध्यान रखा जाए की कोई भी गांव नदी के पेटे में न रह पाए, आवश्यक ठोकरे लगाकर सभी ग्रामों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की जाए। यदि राज्य सरकार इस मामले में हिल -हवाला करे तो केन्द्र सरकार सीधे अपने स्तर से सर्वेक्षण करवाकर आगे की कार्यवाही कराए। मौके पर गांवों के बाढ़ पीड़ितों को अपने घरों से निकालने की भी पूरी व्यवस्था नहीं है, जिसे तत्काल नावें लगाकर की जानी चाहिए। उनके भोजन की व्यवस्था भी तत्काल करने की आवश्यकता है क्योंकि पानी से घिरे धरों में खाना बनाने की व्यवस्था भी नहीं है। पानी दूषित हो चुका है, स्वच्छ पानी की व्यवस्था की जानी चाहिए। संक्रामक रोगों की चपेट में आने की संभावना है जिसके लिए चिकित्सा सुविधाओं की व्यापक व्यवस्था की जानी चाहिए।
मैं मांग करता हूं कि मेरे लोक सभा क्षेत्र बाराबंकी में बाढ़ पीड़ितों के लिए तत्कालीन तथा दीर्घकालीन उपायों पर गंभीरता से शीघ्र कार्यवाही की जाए।
SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): Hon. Chairperson, I thank you for giving me this opportunity to speak. We are used to deliberate and discuss on flood and drought situation in all parts of the country, particularly during the monsoon Session. I am not going into the details. As previous speakers have narrated the grim and gloomy situation all over the country, some parts of our country are suffering from flood like how it is happening in North India and the northern part of my State, Bengal. But the major part of our country, particularly the southern part is seriously suffering from drought.
I will talk first about the issue of prediction. It is told several times in the House that the Meteorological Survey of India is going to make predictions very scientifically and that the technology used by them has improved but even this year, the Meteorological Survey of India befooled the people. It was the prediction that there will be a good monsoon this year. But still, major part of our country is suffering due to scanty rainfall or drought.
I am coming from West Bengal. It is already said that West Bengal Government declared 11 districts out of 19 districts as drought affected areas. The Member from Orissa said that 25 districts have been declared as drought affected area. So, everyone in the concerned area is affected but the most affected ones are the farmers. They are the worst hit and the agricultural workers in such areas are the most affected.
We are talking about the GDP growth and we have fixed the target as the growth in agriculture is four per cent. But what we have witnessed last year? The growth was -0.2 per cent. It is a negative growth. If in this year, this situation continues, then what will be the growth in agriculture? More than 70 per cent of the people depend on agriculture. If agriculture fails, how will our country progress?
So, we have made some arrangements in this regard. The National Disaster Management Authority under the Chairmanship of the hon. Home Affairs is there. This is only to manage disasters and not for taking any preventive measures. We have several mechanisms like Food Security Mission and we have the Rainfed Area Development Commission and National Water Commissions. But what is the result of these Commissions or what is the performance or the outcome of these organisations?
Water management is a serious problem which includes water harvesting. But it should be taken for a special discussion.
I do agree with the Member who spoke before me, Dr. Jyoti Mirdha, that special Budget should be placed in respect of agriculture, particularly for water management and water resources. But, now the question is: What immediate measure should be taken to solve the immediate problems? Short-term problems are there. So, short-term measures should be taken, and long-term measures should also be taken. What is needed immediately? Special package should be offered to all the States. The proposals sent by the State Governments should be accepted by the Union Government. The special package may cover all the things.
I am talking about two or three problems. One, credit at lower interest rate to agriculturists and to those in the villages. Norms were declared that any farmer can take loan from the commercial banks up to Rs. 3 lakh. It has already been declared that without any collateral, any farmer or poor man can take credit from the commercial banks up to Rs. 1 lakh. But no commercial bank is prepared to give credit up to Rs. 1 lakh at four per cent or five per cent interest rate. So, it should be taken for consideration.
Second, food security. In the Budget, allocation of Rs. 400 crore was made for the Green Revolution in Eastern part of the country. Without rainfall, without water, without irrigation, and without cultivation, how can Green Revolution take place? So, what is the proposal for that? So, I think all these things should be taken into consideration.
It is rightly said that Mahatma Gandhi NREGA should be used for creating for large water bodies. This should be one of the guidelines put in the NREGA so that water resources can be used for cultivation, and for drinking water. Drinking water is a serious problem. Most of the areas are suffering due to shortage of drinking water. Water level is going down. There is no sufficient water in the rivers and in the canals. So, it is a very serious problem. Reservoirs are getting dried up. Reservoirs and dams are getting useless. They are not supplying water even in the rainy and monsoon season. So, all these things should be taken into consideration. This should not be taken in a casual manner.
Everywhere we are habituated to have a discussion on this matter. But what is the result and what is the outcome? A lot of recommendations are there. But how many have been implemented by the Union Government? Only talking out the issues is not enough.
So, I demand that the Union Government should take it very seriously. It should not be taken in a casual manner. We are in a very serious situation. Particularly those areas which are affected by floods and droughts are in a very serious situation.
Lastly, I appeal to the Government to please consider the proposal given by the West Bengal Government on the drought affected areas.
With these words, I conclude.
श्री जगदानंद सिंह (बक्सर):सभापति महोदया, इस बहस का लब्बोलुबाब यह है कि राष्ट्र स्वयं भ्रम में है कि इस राष्ट्र की बाढ़ और सुखाड़ की समस्या को किस रास्ते से हल किया जाए। मुझे अनुभव रहा है और बिहार में 15 साल सिंचाई मंत्री रहने के बादरहा हूं। जब इस देश की राष्ट्रीय जल नीति बन रही थी तो हमारे उस समय के वाटर रिसोर्सेज़ के राज्य मंत्री यहाँ बैठे हैं । उस समय हम लोंगों ने इसमें सक्रिय भागीदारी निभायी थी, लेकिन हमने महसूस किया कि राष्ट्रीय जल नीति बनाने वाले लोग इतने भ्रम के शिकार हैं कि इस देश का वॉटर मैनेजमेंट कभी भी सही दिशा में नहीं जा सकता है। बाढ़ से बचाव यदि हम चाहते हैं तो बाढ़समझना होगा कि का अअनकंट्रोल डिस्चार्ज ही बाढ़ का कारण बनता है। यदि हमने डिस्चार्ज को कंट्रोल नहीं किया, हमने जलाश्यों का निर्माण नहीं किया, हमने जलाश्यों में फ्लड क्यूशन की व्यवस्था नहीं की, तो कभी भी हम बाढ़ से बचाव नहीं कर सकते हैं।, लेकिन मैं आपको जानकारी देना चाहता हूं कि इस राष्ट्र में बहस यह नहीं है कि बाढ़ से कैसे बचाया जाए? 33 सालों से एक कानून बनाने की बात इस पूरे राष्ट्र में प्रचारित है कि लोग बाढ़ में रहें, बाढ़ रहेगा, लेकिन फ्लड जोनिंग का कानून बने, अर्थात् ऊंचे स्थलों पर विकास होंगे, मध्यम इलाकों में कहीं-कहीं विकास होंगे और बाकी निचले इकाई के लोगों को उसी पानी के अंदर रहना होगा। फ्लड प्रूफिंग, फ्लड जोनिंग हो या हम बाढ़ से बचाव करना चाहते हैं, इस पर भी आज तक राष्ट्र सहमत नहीं हुआ। इसलिए मैं जल संसाधन मंत्री से कहना चाहता हूं कि जब राष्ट्रीय जल नीति बनने जा रही है, तो 33 सालों का यह भटकाव समाप्त होना चाहिए। इस मुल्क को बाढ़ से बचाव चाहिए और बर्षा काबाढ़ से संरक्षित पानी जहां जलाशयों में हो उससे जलाश्यों में हो उससे सुखाड़ की लड़ाई लड़नी चाहिए। मैं बिहार से आता हूं। बिहार पूरे देश के 39 जिले जो बाढ़ से प्रभावित हैं, उसमें अकेले 12 जिले बिहार के बाढ़ से प्रभावित होते हैं । सबसे अधिक बाढ़ का इलाका बिहार में है। आधी आबादी पूरे देश में इस त्रासदी को झेलती है, वह अकेले बिहार की होती है। दो हजार करोड़ रूपये का प्रति वर्ष वहां की फसल, घर इत्यादि बाढ़ से नष्ट होता है। प्रति वर्ष जो लोग बाढ़ में अपने घर को खोते हैं, उनमें से अधिकांश लोग बिहार के होते हैं, इसलिए बिहार के लोग बाढ़ की कठिनाइयों को समझते हैं, परेशानियों को समझते हैं और उन्हें पता है कि बाढ़ से बचाव के कौन से उपाय किए जा सकते हैं। कोसी नदी हाई डैम की लोगों ने चर्चा की,डैम, पता नहीं कहां से रिसर्च है कि कभी कोसी नदी ब्रह्मपुत्र नदी में मिलती थी, अब वह गंगा में मिलती है। पता नहीं यह रिसर्च कहा से है। ढाई सौ किलोमीटरवर्षों में कोसी अपनी जगह से दूसरी जगह चली गई, लेकिन मैं सदन से कहना चाहता हूं कि कोसी का उदगम स्थान और कोसी का अंत यह कभी नहीं बदला है। बीच का इलाका जहां बदला हो, लेकिन कोसी नदी हमेशा गंगा में मिलती थी ढाई सौ साल पहले भी और आज ढाई सौ साल बाद भी। पिछली बार कोसी नदी कीकी त्रासदी बाढ़ प्राकृतिक त्रासदी नहीं थी, वह मानवीयव भूल थी। मैं आपसे कह सकता हूं क्योंकि पन्द्रह साल मैं सिंचाई मंत्री के रूप में कोसी के तटबंधों से कोसी को बाहर नहीं जाने दिया था। मैं इस बात का गवाह हूं कि यदि सही ढंग से बाढ़ का प्रबंधन हो, तो बाढ़ से बचाया जा सकता है। मानवीय भूल के कारण कहीं न कहीं यह त्रासदी होती है, जिसका फल आम आदमी को भुगतना पड़ता है। अभी तक कोसी नदी पर बांध बन गया होता, तो तटबंधों के भीतर सील्टम (गाद )दरार नहीं आती। तटबंधों में सील्ट (सीम (गाद )दरार नहीं आती तो कोसी नदी का पेट ऊंचाची नहीं होताहोती और कहीं भी खतरा पैदा नहीं करती।
महोदया, मैं दो-तीन बातें सुखाड़ पर कहना चाहता हूं, क्योंकि बिहार इस साल सुखाड़ से प्रभावित है। मुझे खुशी है कि केन्द्र सरकार ने केन्द्र सरकार पूरे देश के लिए सुखाड़ से लड़ने के लिए 48 सौ करोड़ रूपये दिए हैं और उसमें से अकेले बिहार को 12 सौ करोड़ रूपये दिए हैं। वहां के मुख्यमंत्री जी को 23 सौ हजार करोड़ रूपये चाहिए थे, लेकिन वह शायद भारत सरकार नहीं दे पायी है। पूरे देश में सुखाड़ से लड़ने के लिए 72 हजार करोड़ रूपये का प्रस्ताव था, सुखाड़ से लड़ने के लिए, लेकिन केन्द्र सरकार द्वारा केवल 48 सौ करोड़ रूपये की व्यवस्था की गई। बिहार को 12 सौ करोड़ रूपये दिए गए हैं। लेकिन वहां क्या स्थिति है? वहां 16 हजार ट्रंसफार्मर जलेल गए हैं। पांच हजार पुराने नलकूप बंद हैं। नए पांच हजार नलकूपों को बिजली की आवश्यकता है, जो कि नहीं दी जा रही है। सुखाड़ है, प्राकृतिक आपदा है, लेकिन इससे लड़ने के लड़ने के लिए तैयारी कई सरकाररों की नहीं को करनी पड़ती है। यह 12 सौ करोड़ रूपये कहां खर्च हो रहे है? यह बिहार में हम देख नहीं पा रहे हैं।
सभापति महोदय, मैं भारत सरकार से मांग करता हूं, हमारे जल संसाधन मंत्री जी निश्चित रूप से बाढ़ और सुखाड़ पर जवाब देंगे वेदे रह सुखाड़ ो हैं, सुखाड़ को अकेले नहीं झेल सकते। आज सबसे बड़ा साधन बिजली है। इस देश के पैमाने पर सुखाड़ वाले इलाके को बिजली अलग से देने का प्रबंध होना चाहिए। यह बात उन्हें एनर्जी मिनिस्टर से करनी चाहिए। बिहार को यदि दो हजार मेगावाट बिजली मिलती तो बिहार सुखाड़ से लड़ सकता। 12 सौ करोड़ रुपए हमारे सुखाड़ के इलाके में लोगों को राहत पहुंचाने का काम करेगा, हमारी खेती को बचाने का काम नहीं करेगा। इसलिए मैं सदन में वाटर रिसोर्सेस मिनिस्टर साहब से मांग करता हूं कि दो हजार मेगावाट बिजली का एलोकेशन होना चाहिए। अफसोस की बात है कि कहलगांव में बिजली पैदा होती है, वहां की बिजली ग्रिड के माध्यम से उत्तरी, पश्चिमी एवं दक्षिणी इलाके में चली जाती है, लेकिन बिहार को बिजली नहीं मिल पाती। आज ईस्टर्न रीजन में पावर सरप्लस है, लेकिन उसका उपयोग बिहार में नहीं हो पा रहा है।
18.41 hrs. (Mr. D eputy Speaker in the Chair) उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से मांग करता हूं कि हमारी जो परेशानियां हैं, उसमें कहीं न कहीं से भारत सरकार को सहयोग करना पड़ेगा। बिहार बाढ़ से प्रभावित इलाका था, हिन्दुस्तान में सबसे अधिक बाढ़ को झेलने वाला इलाका था, आज वह सबसे अधिक सुखाड़ को झेल रहा है। हमारे 38 जिलों में 36 जिले सुखाड़ से प्रभावित हैं। धान का कटोरा कहा जाने वाला सोन का इलाका, बक्सर, कैमूर, भोजपुर और रोहतास, जो बिहार के लिए आधा अन्न उत्पादन करता था, आज वहां सुखाड़ की स्थिति है। नहरों में पानी नहीं है, बिजली नहीं है, ट्रंसफार्मर और नलकूप जले हुए हैं। वहां की खेती बर्बाद हो रही है। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि बाढ़ और सुखाड़ के लिए जल प्रबंधन की नीति हो और, जो हमारी राष्ट्रीय जल नीति बनने जा रही है, इस पर बड़े पैमाने पर बहस होनी चाहिए। इतने कम समय में बाढ़ और सुखाड़ की बहस और उसके नतीजे इस सदन में निकालने का प्रयास मुझे लगता है कि संभव नहीं हो पाएगा। इस पर विस्तार से बहस होनी चाहिए कि जल का प्रबंधन इस राष्ट्र में कैसे हो ताकि बाढ़ और सुखाड़ से राष्ट्र को मुक्ति दिलाई जा सके और जो जल नीति बने, उसका केन्द्र बिन्दु होना चाहिए, बाढ़ का प्रबंधन, हम बाढ़ का प्रबंधन करेंगे तो सुखाड़ का प्रबंधन भी हो जाएगा।
उपाध्यक्ष महोदय, इन्हीं शब्दों के साथ अपनी बात समाप्त करते हुए भारत सरकार से मांग करता हूं कि जो राष्ट्रीय जल नीति बनने जा रही है, वह जल्दबाजी सेमें नहीं बननी चाहिए, इस पर सदन के अंदर बहस होनी चाहिए और सब की बात सुनी जानी चाहिए। ...( व्यवधान) राष्ट्र बहुत झेल चुका है।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय: कृपया समाप्त करें।
श्री जगदानंद सिंह :राष्ट्र को अगर प्राकृतिक आपदा की परेशानी से बचाना है तो बाढ़ और सुखाड़ से बचाना चाहिए। उपाध्यक्ष महोदय, इन्हीं शब्दों के साथ आपको धन्यवाद देते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
* शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी): महोदय, देश में कृषि की पैदावार बढ़ाने के लिए पानी का बेहतर प्रबंधन जरूरी है। सतह पर मिलने वाले पानी का 45औ कृषि पर खर्च हो रहा है। भूगर्भ से मिलने वाले जल को भी मिला लें तो 70औ जल कृषि कामों के लिए चाहिए, जो कम होता है। आपूर्ति की अपेक्षा मांग अधिक हो रही है। आधुनिक और जल संसाधन प्रबंधन को दुरूस्त करना आवश्यक हो गया है। मेरे निर्वाचन क्षेत्र में 25औ खरीफ धान की रोपाई, बुआई हो पाई है। सूखे की स्थिति है। कर्ज माफी हो, वसूली बंद की जाये। राज्य सरकार ने जनपद कौशाम्बी को सूखा घोषित किया है। प्रतापगढ़ भी सूखे की चपेट में है। किसान बुरी तरह से टूट रहा है। अनियमित विद्युत आपूर्ति, सूखी नहरें, बिगड़े राजकीय नलकूप के कारण किसान बुरी तरह से परेशान हैं।
कौशाम्बी में किसी प्रकार से किसान ने खरीफ की फसल की बुआई की भी। अब अपनी आंखों से मुर्झाता देखकर उनके चेहरे उदास हैं। किसान बैंकों का कर्ज वापस नहीं कर पा रहा है। उसका उत्पीड़न किया जा रहा है। खरीफ की ज्वार, बाजरा, अरहर, उर्द, मूंग, तिल, मूंगफली के साथ-साथ धान की रोपाई 25औ से कम हो पाई है। निरंतर प्राकृतिक आपदा के कारण किसान आर्थिक रूप से टूटता जा रहा है। बच्चों की शिक्षा बाधित हो रही है। बुंदेलखंड की तर्ज पर तंगहाली से दिवालिया हुए किसान आत्महत्या शुरू कर सकते हैं। धान के अलावा दलहन, तिलहन फसलें सूख रही हैं। राज्य सरकार भी सूखा घोषित करने के बाद राहत नहीं पहुंचा पा रही है। आज स्थिति बहुत खराब है। आलू की फसल बोने के पैसे नहीं मिल पा रहे हैं। पूरे संसदीय क्षेत्र के चायल कई किसान सभा जैसे, चामल,, मंझनपुर, सिरायू में भूजल स्तर का संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है। किसी भी क्षण प्राकृतिक हादसा हो सकता है। इन ब्लाकों में किसी भी समय धरती दहक सकती है। जल के दोहन के कारण भूगर्भ में जल सूख गया है। जमीन में दरारें पड़ रही हैं। ऐसी स्थिति में भारी जन-धन हानि से इनकार नहीं किया जा सकता है।
केन्द्रीय भूजल परिषद ने भी भूजल संकट को महसूस किया है। परिषद ने अभी हाल में रिपोर्ट दी है, जिसमें कौशाम्बी, प्रतापगढ़ जनपद शामिल है। उक्त दोनों जनपदों को डार्क सूची में डाल रखा है। उक्त जनपद के कुछ ब्लाकों में जल सूख गए हैं। उक्त जनपदों में भूजल का संकट काफी गहरा गया है। प्रतापगढ़ के 5 ब्लाक, कौशाम्बी के 7 ब्लाकों को चिन्हित किया गया है। इन क्षेत्रों में पेयजल संकट व प्राकृतिक आपदाओं की आशंका जतायी है। कौशाम्बी के भरवारी बेल्ट धरती में पड़ी दरारों का निरीक्षण भूजल वैज्ञानिकों की टीम कर चुकी है। थोड़ी वर्षा के बाद दरारें पड़ गई हैं। भूजल स्तर काफी नीचे खिसक जाने से उक्त स्थिति बनी है। जलस्तर प्रतिदिन खिसक रहा है। कैथल व तराई बेल्ट छोड़ दिया जाये तो जल स्तर 20 से 30 मीटर नीचे चला गया है। कौशाम्बी के करारी कस्बे से कुछ दूरी पर टिकरी गांव में 25 मीटर लम्बी एक मीटर चौड़ा भूमी फटी पड़ी हैं, दरारें देखी गईं, जो दिनोंदिन बढ़ रही हैं। इसी प्रकार मंझनपुर विधान सभा के खेजवापुर और करारी के वल्लहा गांव बललहलेबदलहा गांव में भी खासी लम्बी दरारें देखने को मिलीं, करारी इलाके में 10 दिनों में दूसरी घटना देखने को मिली है। मंझनपुर के खेजवापुर गांव में करीब सौ मीटर लम्बी एक से डेढ़ मीटर चौड़ी दरारें देखी गईं हैं।
केन्द्र सरकार तत्काल प्रत्यक्ष रूप से एक वैज्ञानिकों का दल भेजकर दिखाये। सूखा राहत के लिए किसानों के कर्ज माफ और वसूली माफ करें। जानवरों के चारे की व्यवस्था करें। पेयजल की व्यवस्था, डीप बोरिंग करायें, बिगड़े नलकूप बनावायें। नहरों में पानी की व्यवस्था करें। कई ऐसे स्थान हैं जहां अजरौली, बिसौना आदि जगह पम्प कैथल कैनाल लगा कर नहरों में पानी की व्यवस्था करें क्योंकि उक्त क्षेत्र गंगा यमुना के बीच बसा है जिसे द्वाबा भी कहते हैं। सरकार तत्काल व्यवस्था करे।
* mukesh ओश्री वीरेन्द्र कश्यप (शिमला ):
श्री वीरेन्द्र कश्यप (शिमला )ः हमारे देश में हर वर्ष कभी बाढ़ और कभी सूखा आता है। देश की आजादी के 63 वर्षों के पश्चात् भी हमारे देश के किसान खेती इन्द्र देवता के भरोसे करते हैं। जिस वर्ष पानी बरस जाए, उस वर्ष खेती अच्छी होती है, लेकिन जिस वर्ष सूखा पड़ जाए, उस वर्ष खेती बर्बाद हो जाती है। इसी प्रकार जिस वर्ष ज्यादा पानी बरस जाए या बाढ़ आ जाए तो किसान बर्बाद हो जाता है। किसान के साथ -साथ बाढ़ से देश का आम आदमी सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। नदियों में बाढ़ आ जाती है। नदियों के किनारे होने वाली खेती नष्ट हो जाती है और नदियों के किनारे बसी बस्तियां बह जाती हैं जिससे जान -माल का भारी नुकसान होता है।
According to Rashtriya Barh Ayog ( 1980) that the area prone to floods in the country was of the order of 40 millions Hectare out of which 3 2 million hectare has been considered as protectable area.
According to one report, it has been revealed that since 1953-97, the average damage to crops, houses and public utilities in the country was around Rs.9380 million. According to the information given by the Government in Lok Sabha on 28.7.2010, there are 80 districts in the country which are flood affected.
पहले जितनी बाढ़ आती थी, आज उससे दोगुना, तीन गुना ज्यादा बाढ़ आती है। यदि नेपाल में वर्षा हो जाए तो बिहार पानी में डूबने लगता है। पानी बहने के जो परम्परागत स्रोत थे, चाहे नहरे थीं, नाले थे, जो भी साधन सिंचाई के लिए बने थे, उन सबका अतिक्रमण किया गया, उन्हें भर दिया गया, जिसके कारण नदी का बहाव रुक गया। अगर इसका स्थायी निदान चाहते हैं, तो जितने परम्परागत स्रोत हैं, जितने पुराने स्रोत हैं, उन सबकी खुदाई करा दीजिए। इससे पानी को बढ़ने का रास्ता मिल जाएगा और बाढ़ नहीं आएगी।
हमारे देश में प्रो. के.एल. राव ने देश की नदियों को जोड़कर इन समस्याओं से निजात पाने की सोची थी, लेकिन इस योजना पर सबसे पहले श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के प्रधानमंत्री काल में चर्चा शुरू हुई और काम आगे बढ़ा। अगर सभी नदियां जुड़ जाएंगी तो जहां ज्यादा पानी बरसेगा, वह पानी सभी नदियों में बिखर जाएगा और बाढ़ की विभीषिका से बचा जा सकेगा। इसलिए सब नदियों को जोड़ने का काम प्रारंभ किया गया।
नदियों के जोड़ने से जल संचयन, जल संग्रहण, जल प्रबंधन और जल वितरण का काम हो जाएगा। जल का सही ढंग से, वैज्ञानिक ढंग से रोकने का प्रबंधन किया जाए, तभी बाढ़ और सूखे का स्थायी निदान कर सकते हैं। यदि केन्द्र सरकार में दिशा हो, दृष्टि हो, संकल्प हो, तो तूफान भी रुकेगा, अकाल भी रुकेगा और बाढ़ भी रुकेगी। जब से यू.पी.ए. की सरकार आई है तब से इस योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
यदि देश में नदियों को जोड़ने का काम आगे बढ़ता तो देश में सूखे के समय नदियों के पानी को सूखे क्षेत्रों की नदियों में भेजा जा सकता था और बाढ़ के समय बाढ़ वाले क्षेत्रों की नदियों के पानी को देश के सूखे वाले भागों की नदियों में भेजा जा सकता था। इससे न तो देश में बाढ़ की विभीषिका सताता और न सूखे के समय पानी की कमी सताती। नदियों को आपस में जोड़ने से देश में अन्न और बिजली का इतना उत्पादन होता कि हम पड़ोसी देशों को अन्न निर्यात करने तथा देश की जरूरत से बची अतिरिक्त बिजली को बेचने में सक्षम हो सकते थे, लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व में बनी वर्तमान सरकार ने इस संबंध में कुछ भी नहीं किया और देश के किसानों, गरीबों, अनुसूचित जाति, जनजाति, आदिवासी, पहाड़ी और दूरदराज में बसे लोगों को भगवान के भरोसे छोड़ दिया। यही कारण है कि हमारे देश में हर वर्ष कहीं न कहीं बाढ़ और सूखा आता ही रहता है।
प्रति वर्ष देश को एक तरफ जहां सूखे का सामना करना पड़ता है वहीं दूसरी ओर बाढ़ की भारी तबाही झेलनी पड़ती है। इसके कारण काफी नुकसान उठाना पड़ता है। दुर्भाग्यवश उड़ीसा, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम, कर्नाटक और तमिलनाडु में प्रतिवर्ष बाढ़ आती है। इस वर्ष हरियाणा एवं इसके आस -पास के क्षेत्रों की नदियों में आई बाढ़ से काफी तबाही हुई है। सभी देशवासी इस मुद्दे पर अत्यंत चिंतित हैं।
पिछले दिनों जब हरियाणा में बाढ़ आई तो वहां की राजस्व और आपदा प्रबंधन मंत्री ने कहा कि पड़ोसी राज्यों पंजाब और हिमाचल प्रदेश से अत्यधिक जल प्रवाह के कारण हरियाणा से बाढ़ आई है। इस प्रकार से जो प्रदेश प्रभावित होता है वह अपने पड़ोसी प्रदेशों पर दोषारोपण करता है। हरियाणा में घग्गर नदी के बांध में दरार के चलते आई बाढ़ से एक लाख क्विंटल गेंहू का नुकसान हुआ। हरियाणा में हाल ही में आई बाढ़ से निपटने के लिए हरियाणा सरकार ने केन्द्र सरकार से लगभग 1369 करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता प्रदान करने की मांग की । गत दिनों में हरियाणा के अम्बाला, कुरुक्षेत्र, कैथल, फतेहाबाद व सिरसा जिलों में भारी बाढ़ से नुकसान हुआ। लगभग 2 लाख एकड़ धान की खेती को नुकसान हुआ है। 21 लोगों की इसमें जानें गई, जिसमें 11 लोग अम्बाला तथा 10 कुरुक्षेत्र में मौतें इसी बाढ़ के दौरान हुई हैं। बाढ़ें आती हैं तो किसान की खेती तबाह हो जाती है। तीन -चार वर्षों तक इस पर खेती नहीं की जा सकती। इसके बारे में सरकार को सोचना चाहिए। किसानों को राहत देना जरूरी है। इसी प्रकार दिल्ली में भी भारी वर्षा और हरियाणा के ताजेवाला डैम से छोड़े गए पानी की वजह से यमुना का जलस्तर बढ़ गया है। बढ़ते जलस्तर को देखते हुए सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण विभाग ने चेतावनी जारी कर दी है। जलस्तर खतरे के निशान से काफी ऊपर पहुंच गया है। ताजेवाला से पानी छोड़े जाने के कारण यमुना नदी में जलस्तर काफी ऊंचा हो गया है।
जैसे मैदानी भागों में बाढ़ की वजह से नुकसान होता है वैसे ही पहाड़ों में बादल फटने से अपार जन -धन की हानि होती है। वहां अचानक बादल फटने से करोड़ों -अरबों लीटर पानी एक साथ एक ही स्थान पर इतनी जोर से गिरता है कि गांव के गांव नष्ट हो जाते हैं। उनका नामो -निशान मिट जाता है। हाल ही में लेह में बादल फटने से भारी जान -माल का नुकसान हुआ। मिट्टी धंसने से कई पुल टूट गए। इस प्रकार से वहां के लोगों को भीषण यातनाएं झेलनी पड़ रही है। गत वर्षों से हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू -कश्मीर तथा अन्य पहाड़ी राज्यों में बादल फटने के कारण जान व माल का नुकसान हुआ है। इस और सरकार असहाय ही दिखी है।
बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए सी.आर.ए.एफ. और एन.सी.आर.ए.एफ. नामक दो निधियां हैं। राज्य सरकारें केंद्र सरकार की सहायता से कुछ सीमा तक लोगों को राहत प्रदान करती हैं। आजकल अनेक प्रकार की प्राकृतिक आपदाएं आ रही हैं। जिससे वस्तुतः किसानों को भारी नुकसान होता है। यद्यपि देश बहुत ही गंभीर स्थिति का सामना कर रहा है किंतु केन्द्र सरकार ने अभी तक एक स्थायी आपदा प्रबंधन तंत्र विकसित नहीं किया है। केन्द्र सरकार को इस संबंध में दीर्घावधि उपाय करने होंगे।
बाढ़ अथवा सूखे के कारण देश में खाद्यान्नों के उत्पादन में अत्यधिक कमी आई है जिसके कारण जमाखोरी और कालाबाजारी होती है और अंततः कीमतों में वृद्धि होती है। वास्तव में इसका आम आदमी पर असर पड़ता है। पीड़ित लोगों को तत्काल राहत देने के उद्देश्य से केन्द्र सरकार राज्य में अध्ययन करने तथा बाढ़ की विभीषिका का पता लगाने के लिए केन्द्रीय अध्ययन दल भेजती है, परन्तु कभी -कभी वह केन्द्रीय दल विद्यमान स्थिति का पता लगाने में समर्थ नहीं हो पाता है। अतः राहत देने में विलम्ब होने का यही एक मुख्य कारण रहा है। प्रदेशों को आपदा राहत निधि से निधियां प्राप्त होती हैं, परन्तु मुख्य मुद्दा राष्ट्रीय आपदा राहत निधि से संबंधित है। राष्ट्रीय आपदा राहत निधि में बहुत से मदों को शामिल नहीं किया जाता है।
देश में कहीं अत्यधिक वर्षा कहीं सूखा पड़ने की मुख्य वजह जलवायु परिवर्तन है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस संबंध में बहुत सारी गतिविधियां हुई हैं। सन् 1972 में स्टॉकहोम सम्मेलन हुआ। 1992 में ब्राजील में पृथ्वी सम्मेलन हुआ और दिसम्बर, 2009 में कोपनहेगन में सम्मेलन हुआ । सारे विश्व में पर्यावरण गर्म हो रहा है। यह भी संभावना है कि 2100 के अंत तक अर्थात् इस शताब्दी के अंत तक तापमान में 5 डिग्री से भी ज्यादा वृद्धि हो सकती है। कुछ वैज्ञानिकों को कहना है कि यह वृद्धि 9 डिग्री तक भी जा सकती है। इस तापमान को बढ़ाने की सबसे बड़ी एजेंसी इनर्जी यानि ऊर्जा है। तापमान को बढ़ाने में इनर्जी का 25 परसेंट, लैंड यूज और फॉरेस्ट्री के अंदर अदल -बदल करे तो 8 परसेंट, एग्रीकल्चर का 6 परसेंट, इंडस्ट्रीयल प्रोसेस का 1. 5 अथवा 2. 00 परसेंट और वेस्ट का 1. 5 परसेंट कंट्रीब्यूशन है। तापमान में एक डिग्री की वृद्धि भी गेहूं के उत्पादन को हमारे देश में लगाग 6 मिलियन टन प्रति वर्ष घटा देगी। जहां तक वैश्विक ताप वृद्धि के प्रभाव का संबंध है, भारत सर्वाधिक असुरक्षित देश है। हिमालय के हिमखंड पिघलने शुरू हो गए हैं। इन खंडों के पिघलने और तापमान से समुद्री तल में वृद्धि होगी जिससे पर्यावरणीय प्रकोप होंगे।
सबसे ज्यादा तापमान बढ़ाने या पर्यावरण में परिवर्तन लाने का काम धनी देशों का है। दुनिया के 8-10 बड़े देश हैं। कुल मिलाकर बड़े और छोटे विकसित देश 20 हैं, इनके पास सारी ऊर्जा है, सारे स्रोत हैं। इन्होंने प्राकृतिक स्रोतों पर कब्जा किया हुआ है इसलिए बाकी देशों में ऊर्जा का अभाव है। अब यह कहा जा रहा है कि ऊर्जा में तो गड़बड़ हो गई, पर्यावरण में विकृति आ गई, लेकिन अब इसे ठीक करेंगे और ऐसा करते हैं कि अब आप अपने यहां पेड़ उगाइए, ज्यादा कार्बन पैदा कीजिए ताकि कार्बन -डाईऑक्साइड एब्जार्ब हो जाए और हमें कार्बन डाईआक्साइड बनाने दीजिए। हम आपको पैसा दे देते हैं, आप और पेड़ लगाइए। आप कार्बन -डाईऑक्साइड एर्ब्जाब कीजिए। आजकल विकसित देश, कोपनेगन और इससे पहले के सम्मेलनों में, संस्थाओं के सामने हमारी चिंताओं और समस्याओं को केवल इसी बात पर मूलतः आधारित करते हैं कि उन्हें ऊर्जा उत्पादन करने दीजिए। हम बाजार बने रहें, वे बिजली पैदा करते रहें, हम उसे खरीदते रहें। वे विकास करते रहें और हमारा विनाश होता रहे। दुनिया के 16 प्रतिशत लोग सारी दुनिया के 80 प्रतिशत संसाधनों पर, सारी दुनिया के उत्पादन पर और सारी दुनिया के उपभोग पर स्वामित्व रखते हैं। पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। यदि तापमान इसी प्रकार बढ़ता रहा तो जो आइस ध्रुवों पर जमा है, वह भी पिघल जाएगा।
आज सारी दुनिया में जलवायु परिवर्तन के नाम पर एक भय पैदा किया जा रहा है। भारत और विकासशील देशों को डराया जा रहा है, जबकि जलवायु परिवर्तन में भारत का उतना हिस्सा नहीं है। अमेरिका और चीन अकेले सारी दुनिया में 20 प्रतिशत ग्रीन गैस हाउस का उत्सर्जन करते हैं। विकसित देश कह रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन पर एक सांझा रणनीति बननी चाहिए। दुनिया पर जो ग्रीन हाउस का भार पड़ा है, वह अमेरिका और यूरोप के विलासिता के चलते पड़ा है, हमारी गरीबी और दरिद्रता के चलते नहीं, लेकिन हमें सांझा रणनीति बनाकर उसमें बराबरी का हिस्सेदार बनने के लिए दबाव डाला जा रहा है। यह उचित नहीं है।
ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन और ग्रीन हाउस गैस संकेन्द्रण इस स्तर तक पहुंच गया है कि इसके कारण जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। भारत भी इन परिवर्तनों से प्रभावित है। भारत विश्व के सबसे प्रभावित क्षेत्रों में से है। जलवायु परिवर्तन के कारण हमारी जीवन रेखा मानसून में आमूलचूल बदलाव आएगा। एक अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार वर्ष 2015 तक धरती के तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन से विश्व में प्रभावित 375 मिलियन लोगों में से अधिकतर भारत सहित विकासशील देशों के होंगे। वर्ष 1952 और 2000 के बीच ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में विकसित देशों का हिस्सा 72 प्रतिशत रहा है। इस स्थिति का कारण प्राकृतिक संसाधनों और विश्व के सार्वजनिक संसाधनों का अवैध और अविवेकपूर्ण दोहन है। आज उत्सर्जन के संबंध में लचीलेपन की बातें की जा रही हैं।
मेरा सरकार को सुझाव है कि वह सबसे पहले श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी, भू.पू. प्रधानमंत्री के समय में प्रारंभ की गई नदियों को जोड़ने की योजना पर तत्काल कार्य प्रारंभ करे। इससे ही हम देश में जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे बदलावों को रोकने में वास्तव में सफल होंगे। इससे जहां बाढ़ एवं सूखे की समस्या से निजात मिलेगी, वहीं देश में अरबों और खरबों रुपए की प्रति वर्ष होने वाली सम्पत्ति एवं बहुमूल्य जानों की रक्षा कर पायेंगें। इसके साथ ही मेरा निवेदन है कि बाढ़ प्रभावित राज्यों के साथ दलीय भावना से ऊपर उठकर सहायता एवं बचाव कार्य करने हेतु केन्द्र सरकार की ओर से तत्काल सहायता प्रदान की जाए। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन तंत्र का विकास एवं उसे मजबूत किया जाना नितान्त आवश्यक है। राष्ट्रीय आपदा राहत निधि में जो मदें शामिल नहीं हैं, उन्हें शामिल किया जाना जरूरी है।
*SHRI PRASANTA KUMAR MAJUMDAR (BALURGHAT) : Respected Deputy Speaker Sir, we are witnessing drought in some parts of the country and we are coming across furious floods in some other parts. This is happening due to vagaries of nature. Thus I am not altogether blaming the Central Government or the State Governments. Nature is changing and transforming every now and then. The ground water level in going down gradually. Rainfall is becoming deficient because the area under forest cover is shrinking. Only 18% of the total land is today covered by forests whereas at least 1/3 should be thickly forested. This is adversely affecting our environment. Due to perennial floods and droughts, scores of people are losing their property, land and even life. Crops are being destroyed, cattle and livestocks are being wiped out. There is devastation everywhere. Which leads to loss of crores of rupees.
Therefore I have a proposal to offer. During the NDA regime the policy of inter-linking of rivers was adopted. This policy should be revived and implemented if water management can be properly done, if flood water can be successfully channelized then destruction will be much less. That water can be utilized for agricultural purposes which in turn will lead to increase crop production and food security. This aspect must be kept in mind.
Whenever there is excess rainfall, the rainwater should be preserved by digging canals or by any other means. Rainwater harvesting should be done to get maximum benefit from excessive rainfall. Irrigation can be facilitated through this process.
You are aware that last year the agricultural output was merely 2% against an estimate of 4%. Thus the promise of food security could not be fulfilled. The development of our country depends mostly on the agricultural production. So the *Original in Bengali.
issue of flood and drought must be discussed elaborately and more time should be devoted to this problem. Last year there was ‘Aaila’ in our state West Bengal which caused massive destruction. The Central Government did not extend a helping hand generously. This year 11 districts of Bengal are reeling under severe drought. The Government has already announced a relief package of Rs.5000 crores but all the funds have not been released as yet. I request the Government to release the funds immediately.
The course of Teesta river is changing. Both river Teesta and river Brahmaputra have large quantum of water. But due to various international prohibitions, we do not get the water. Bangladesh and China have a share in it. Our Government must initiate a dialogue with both the countries to sort out the matter. Rivers are slowly drying up. So canals must be dug to conserve the water and raise the water table. If that is done then agriculture activities will get a boost and the cultivators will prosper which will lead to socio-economic development of our country.
Therefore I request that there subjects should be discussed at length in this august House and the Government must take definite steps in order to minimize the adverse effects of natural calamities in future.
With these words I am concluding my speech here. Thank you.
(ends).
*ओश्री आर.के.िंसह पटेल (बांदा ):
श्री आर.के.िंसह पटेल (बांदा )ः मैं उत्तर प्रदेश के बुन्देलखंड के बांदा/िचत्रकूट जिलों से चुनकर आया हूं। मैं भी किसान हूं। कई सालों से लगातार कम वर्षा के कारण इस क्षेत्र का किसान सूखे की चपेट में है। कई वर्षों से पानी कम बरसने से नदी, नालों, तालाबों, पोखरों एवं कुओं का पानी सूख गया है। हैण्डपम्प सूखे पड़े हैं। वर्तमान में माह अगस्त का अन्त हो रहा है। अभी तक बुन्देलखंड एवं रीवांचल तथा इलाहाबाद, मिर्जापुर आदि मण्डलों का किसान धान की रोपाई नहीं कर सका है। धान की फसलों वाला क्षेत्र खाली पड़ा है।
बुन्देलखंड में सिंचाई की सुविधाओं की कमी है। बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, महोवा, ललितपुर, झांसी, जालौन जिलों में असिंचित गांवों में गहरे नलकूप लगाने की आवश्यकता है।
मैं सरकार से निम्नलिखित बिन्दुवार मांगें करना चाहता हूं।
1. सूखा प्रभावित क्षेत्रों एवं जिलों के सभी किसानों को 5000/ - रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से सूखा पीड़ित को मुआवजा दिया जाए।
2. सूखा पीड़ित जिलों के किसानों के हर प्रकार के कृषि ऋण माफ किए जाएं तथा सीधे किसानों को लाभ दिया जाए।
3. सूखा पीड़ित जिलों के किसानों को खाद एवं बीज मुफ्त में दिया जाए।
4. सूखा एवं बाढ़ प्रभावित किसानों को 20 घंटे बिजली दी जाए।
5. सूखा पीड़ित क्षेत्रों विशेषकर बुन्देलखंड में प्रत्येक असिंचित गांवों में एक से दो गहरे सिंचाई सरकारी नलकूपों का निर्माण कराया जाए।
6. प्रत्येक सूखा पीड़ित एवं बुन्देलखंड के प्रत्येक जिले में प्रति जिला 5000 नए हैण्डपम्प पेयजल हेतु लगाए जाने हेतु धन दिया जाए।
7. प्रत्येक असिंचित जिलों में बुन्देलखंड सहित पठारी क्षेत्रों में गहरे सिंचाई बड़े -बड़े ब्लाटिंग कूपों का निर्माण कराया जाए।
8. बुन्देलखंड सहित सूखा पीड़ित जिलों में सिंचाई हेतु निजी नलकूप लगाने हेतु किसानों को आर्थिक सहायता दी जाए।
9. बुन्देलखंड सहित सूखा पीड़ित सभी क्षेत्रों को निजी नलकूपों के ऊर्जीकरण हेतु नःशुल्क विद्युत लाइन नलकूपों तक दी जाए। (नःशुल्क ऊर्जीकरण किया जाए। )
10. बुन्देलखंड सहित सभी सूखा पीड़ित क्षेत्रों में बड़े -बड़े गहरे तालाबों का निर्माण कराया जाए।
11. बुन्देलखंड के चित्रकूट जिले में यमुना नदी पर यमुना बैराज बनया जाए जिससे सिंचाई हेतु पानी मिल सके।
12. उत्तर प्रदेश के सूखा प्रभावित जिला चित्रकूट में 4000 मेगावाट का एनटीपीसी का पाव प्लांट बगढ़ क्षेत्र में स्थापित किया जाए।
13. केन, बेतवा नदी जोड़ने हेतु प्रस्तावित/स्वीकृत परियोजना को तत्काल शुरू किया जाए।
14. सूखा पीड़ित क्षेत्र के किसानों के पशुओं को चारा हेतु एवं पशुओं के इलाज की व्यवस्था की जाए।
15. कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कृत्रिम सिंचाई हेतु फौहारा सिंचाई पाइप सेट (प्रिंगलर सेट ) मुफ्त में वितरित कराया जाए।
16. कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कृषि विज्ञान केन्द्र एवं कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना की जाए तथा दलहनी एवं तिलहनी फसलों को बढ़ावा देने हेतु बीज, खाद मुफ्त में दिए जाएं।
17. सूखा प्रभावित क्षेत्रों की नहरें पक्की करके पानी की बर्बादी को रोका जाए।
18. सूखा पीड़ित पहाड़ी क्षेत्रों एवं बुन्देलखंड में बड़े -बड़े बांधों का निर्माण कराया जाए तथा पुराने बांधों एवं नहरों की मरम्मत करायी जाए।
19. जल संचय हेतु कार्यक्रम चलाए जाएं।
20. सूखा एवं बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में वनों एवं पेड़ों को लगाया जाए तथा पहाड़ो एवं जंगलों तथा नदी एवं नालों एवं तालाबों आदि पर अतिक्रमण करने वालों को रोका जाए।
21. नदी, नालों, पहाड़ों एवं वन क्षेत्रों की सीमा की पैमाइस कराकर अवैध कब्जे हटाए जाएं।
अतः आपके माध्यम से मैं सरकार से मांग करता हूं कि मेरी उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए सूखा पीड़ित क्षेत्रों के किसानों को स्पेशल पैकेज देकर उसमें मेरे द्वारा दिए गए सुझावों के आधार पर कार्य योजना तैयार की जाए।
* Laid on th e T a ble *श्री *अशोक अर्गल (भिंड): मान्यवर, मैं अपना लिखित भाषण सभा पटल पर रखे जाने की अनुमति चाहता हूं।
आज देश के कई राज्य बाढ़ एवं सूखे से परेशान हैं। कभी बिहार में बाढ़, कभी बंगाल में तो कभी असम में और कभी-कभी कई राज्य सूखे की मार भी झेलते हैं। आज हम देखते हैं कि बारिश के पानी को हम रोक नहीं पाते हैं जिसके कारण बारिश का पानी बहकर निकल जाता है। मैं मध्य प्रदेश से आता हूं। मेरे संसदीय क्षेत्र भिण्ड / दतिया एवं बगल का मेरा पुराना क्षेत्र मुरैना एवं श्योपुर, इस क्षेत्र से क्वारी, चंबल, सिंध, कूनो, झिलमिल, आन, साक आदि नदियां गुजरती हैं।
महोदय, प्रतिवर्ष जमीन से जल स्तर नीचे गिर रहा है। पहले किसान अपने कुओं से सिंचाई करते थे। जिन कुओं में पानी 60-60 फीट रहता था, वे आज सूख चुके हैं। जिन नदियों में बारह माह पानी चलता था, आज उनकी हालत अच्छी नहीं है। पानी सूख जाता है जिससे पशु, पक्षी और जानवर आज प्यास से दम तोड़ रहे हैं। पर्यावरण वन मंत्रालय जनवरों के रख-रखाव में करोड़ों रूपए प्रति वर्ष खर्च करता है। मैं चाहता हूं कि केंद्र की सरकार एक सर्वे कराए कि किन-किन नदियों पर पानी का रोकने की आवश्यकता है? जिस तरह चंबल क्षेत्र में क्वारी, आसन, सिंध, चंबल और कूनों से लाखों क्यूसेक पानी बहकर निकलता है, उन पर छोटे व बड़े बांध बनाए एवं सूखे खेतों को पानी दिलाया जाए। इससे जमीन का वाटर लेवल बढ़ेगा एवं जो पुराने कुएं सूख गए हैं, उनमें सुधार होगा। जहां से पानी बहकर निकलता है, वह कई राज्यों में तबाही मचाता है। फिर उस पर सरकार बाढ़ पीढ़ितों के राहत हेतु हजारों करोड़ रूपए खर्च करती है। करोड़ों रूपए सूखे पर खर्च किए जाते हैं। चंबल क्षेत्र की जीवनदायिनी चंबल नहर है, जो राजस्थान से होकर निकलती है, लेकिन वहां राजस्थान पानी देने में अन्याय करता है।
बाढ़-सूखा इस देश की सरकार की जिम्मेदारी है। सूखे के कारण आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र के विदर्भ में किसान आत्महत्या के लिए मजबूर होते हैं। आज जलवायु परिवर्तन के कारण जो बारिश लगातार 15 दिनों तक होती थी, लेकिन आज लोग घंटों में हिसाब लगाते हैं कि चार घंटे या छः घंटे बारिश हुयी। 10 हजार करोड़ रूपए उ. प्र. की सरकार बाढ़ से निबटने हेतु मांग रही है, लाखों-करोड़ रूपए बाढ़ व सूखा पर खच्र किए जा चुके हैं। यदि प्रतिवर्ष हजारों, करोड़ों बांटने के बजाय, पानी को रोकने पर खर्च करें। नदियों * Laid on the Table ाEाो जोड़ने की जो योजना एनडीए की सरकार में माननीय अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने शुरू की थी आज उसे अधर में डाल दिया है।
आज चंबल नदी के कारण प्रति वर्ष कृषि भूमि बीहड़ों में परिवर्तित हो रही है। इस हेतु सरकार कोई योजना बनाये एवं बीहड़ी भूमि को कृषि भूमि बनाकर एवं उसका समतलीकरण कर बेरोजगार युवाओं को दे अथवा वहां कोई रोजगार के अवसर की योजना बनायी जाए। धन्यवाद।
(इति ) (x4/ 1845 / mkg / ksp) श्री नृपेन्द्र नाथ राय (कूच बिहार): उपाध्यक्ष महोदय, इस सदन में आज बहुत से सम्माननीय सदस्यों द्वारा नियम 193 के तहत बाढ़ के इश्यू पर सारे देश की जो चर्चा चल रही है, उस में उन्होंने अपने इलाके की बात की। मैं बोलना चाहता हूं कि बाढ़ में खेती का, किसान का, गरीब लोगों का नुकसान होता है और जब सूखा होता है तो सूखे में भी गरीब का, किसान का और भूखे लोगों की खेती का नुकसान होता है। इस देश में सरकार ने कृषि के लिए कई पैकेज की घोषणा की। पंजाब और हरियाणा में बाढ़ के कारण जो 13 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, इसी तरह से सूखे के कारण देश के कुछ इलाकों में, जैसे बिहार, झारखण्ड, वेस्ट बंगाल और उड़ीसा में सूखे से नुकसान हुआ। वेस्ट बंगाल में 19 में से 11 जिले सूखे की चपेट में हैं।
वेस्ट बंगाल गवर्नमेंट ने इस सूखे से मुकाबले के लिए कल केबिनेट की मीटिंग बुलाई थी, जिसमें कृषि विज्ञानी भी थे। वेस्ट बंगाल गवर्नमेंट ने सूखे से मुकाबले के लिए केन्द्र सरकार से मांग की, डिमांड की कि 11 डिस्ट्रिक्ट में ज्यादा रेनफॉल नहीं हुआ, वहां 50 परसेंट रेनफॉल डैफीसिट है और पांच हजार करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। इससे कड़ा मुकाबला करने के लिए वेस्ट बंगाल गवर्नमेंट ने डिसाइड किया और मुकाबले के लिए स्थिर किया कि हर जी.बी. में 2-2 गांव के वहां सीड गांव बनाएगी और किसानों को पशुपालन के लिए मदद देगी। वेस्ट बंगाल गवर्नमेंट ने 50 हजार करोड़ से 70 हजार करोड़ रुपये कल देने की घोषणा की थी और सूखे से मुकाबले के लिए नरेगा में मजदूरों को, लेबर को काम देने के लिए कहा है। उसने केन्द्र सरकार से 1400 करोड़ रुपया इसके लिए मांगा है।
(y4/1850/cp/rs) लेकिन दुख की बात है, पिछले साल वेस्ट बंगाल गवर्नमेंट ने नरेगा के अंतर्गत केंद्रीय सरकार से 1,700 करोड़ रूपए डिमांड किया, लेकिन केंद्रीय सरकार की तरफ से पिछले साल 172 करोड़ रूपए दिए गए। वर्ष 2009 में आइला हुआ था। इस सदन में माननीय फाइनेंस मिनस्टर ने ऐलान किया था कि आइला से मुकाबला के लिए वेस्ट बंगाल को 1,000 करोड़ रूपए इलेवेंथ प्लान से देंगे, लेकिन अभी तक वह 1,000 करोड़ रूपए वेस्ट बंगाल को गवर्नमेंट से नहीं मिले। वेस्ट बंगाल का एक हिस्सा नार्थ बंगाल है। हमारे यहां नदी जालधाका है, तीस्ता है, तोरसा है, करजानिया है, ब्रह्मपुत्र बेसिन है, यह नदी भूटान से आती है। भूटान में जब डैम से जल चलता है, ज्यादा पानी होता है, तो फ्लड हो जाता है।
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करें।
श्री नृपेन्द्र नाथ राय (कूच बिहार ):हमारी मांग है कि वेस्ट बंगाल की जो नदियां हैं, जलधाका, सिंगीमारी, तीस्ता, तोरसा इन सबको कंट्रोल करने के लिए सरकार भूटान गवर्नमेंट से बात करे। जब डैम से जल छोड़ेंगे, तो बातचीत करके ही छोड़ेंगे। इसलिए इसकी आलोचना नहीं करे। जब वहां से जल चलता है तो ज्यादा फ्लड होता है। इसलिए रिवर को कंट्रोल करें, जैसे चीन ने ह्वांगहो नदी में डिजरिंग किया। हमारी गवर्नमेंट की तरफ से गंगा रिवर, बृह्मपुत्र बेसिन सहित जितनी नदियां हैं, वहां डिजरिंग करना चाहिए। जब डिजरिंग होगा, ...( व्यवधान) बारिश से फ्लड नहीं होगा।
उपाध्यक्ष महोदय : कृपया समाप्त करें।
श्री नृपेन्द्र नाथ राय (कूच बिहार ):तो बारिश नहीं होगी। आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए आपको धन्यवाद देते हुए अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं।
(इति ) SHRI S.S. RAMASUBBU (TIRUNELVELI): Thank you very much sir to give me the opportunity to take part in this discussion under 193 on flood and drought situation in our country.
Last year most of the North Indian States were affected by drought. This year the situation is changed. The above States are affected by heavy flood.
Due to climate change, the agriculture production is collapsed completely. The productivity and production of agriculture commodities are reduced tremendously. The reason for price rise also is the consequences of this natural calamity of flood and drought.
Water management and forecasting of drought and flood situation mechanism should be enhanced.
In order to protect and preserve the surplus water which are occurring due to flood can be channalised by establishing a National river from Kashmir to Kanyakumari. Then there will be no problem of dispute between each state regarding water sharing. The National river water can be channalized to water scarce States. It can be useful for making cultivation extensively. The food production can be increased.
In order to meet out the damages caused by flood and drought, our Central Government provides a lot of funds from calamity relief fund. The relief funds are sometimes utilized properly by some States. In some areas are misused.
The Cooperation between States and Centre is essential to mitigate the flood and drought situation of various States. “Prevention is better than cure” By making various forecasts, each and every State Government should take various steps to enhance the river capacity by embankments. The Channels must be repaired. The b andhs mus onds t be desilted and must be deepened. Then only the flood water can be preserved.
* Laid on the Table and Original in Tamil The cause for price rise of various essential commodities is mainly due to flood and drought. In this regard, the government should take various steps and the Centre should coordinate and bring various plans to meet the flood and drought situation. Thanking you.
SHRI N.CHALUVARAYA SWAMY (MANDYA) : Hon. Deputy Speaker Sir, I am very grateful to you for giving me this opportunity to speak on this discussion on flood and drought situation in the country under rule 193.
I, on behalf of J.D.(S) party would like to point out that certain things pertaining to my state. Last year my state Karnataka was severely affected by floods. As we are aware the Government of India had sent an official team to study the problems of the people in flood affected districts in Karnataka. Besides this Hon. Prime Minister Shri Manmohan Singh ji and the chairperson of the UPA Smt. Sonia Gandhi ji also visited and had witnessed the agony of millions of flood victims. Then the Union Government had released Rs. 1,500/- crore to Karnataka for immediate rehabilitation and relief measures.
Sir, the natural calamities like flood and drought are occurring time and again in almost all parts of our country. States like Karnataka, Maharashtra, Bihar, Tamil Nadu and Andhra Pradesh are experiencing the fury of floods almost every year. Since independence Union Government and all the State Governments have been making efforts to deal with such natural calamities. This sort of discussions are going on in our Parliament as well as the State Legislative Assemblies. But we have failed to find out a permanent solution for this perennial problem. It is very very unfortunate.
Sir, I would like to draw your kind attention to the fact that for the last one and a half decades the state of Karnataka has been badly affected whenever there has been heavy downpour in Maharashtra. Many of the villages in Belagaum, Bijapur, Gulbarga and Raichur districts of Karnataka were inundated. It has resulted in severe damage to property and loss of human life and livestock.
*Original in Kannada.
Sir, I would like to know from the Union Government as to how much amount has been released for relief and rehabilitation work to the flood affected states in the country and whether these financial assistance has been utilized properly by the concerned State Governments or not? What is the present status of relief and rehabilitation works in different states? Whether the Government is aware of this mismanagement of funds by the State Governments. If so who is to be made accountable for such irregularities?
What action has been taken to prevent such irregularities. If not what is the necessity of spending such a huge amount.
Sir, I hope the Hon. Minister in his reply would give all these details. I would like to say that if the Government is not serious it is very difficult to find out a permanent solution for the problems arising out of natural calamities. I feel it would have no meaning if you simply release the funds without any accountability.
MR. DEPUTY SPEAKER : Please conclude.
SHRI N.CH A ELUVARAYA SWAMY (MANDYA) : Another thing I would like to mention is that it is very very unfortunate that even today we are following the laws made by colonial Britishers to deal with the problems of farmers and agriculture community. If a farmer suffers a loss due to natural calamities or if a farmer’s land is to be acquired we give a very very paltry amount as a compensation to our poor farmers. But in the case of legislators we increased the salaries by bringing amendments to our existing laws. And also in the case of Government Employees their salaries are being increased as per the recommendations of the Pay Commission set up by the Governments.
It is a matter of great concern that the Government is giving a meagre amount of Rs. 500/- per acre in case of crop failure due to floods. Compensation for farm land acquisition by the Government is also very meagre. All these are happening because even today we are following the colonial laws.
That is why we need to have a re-look into our laws pertaining to agriculture and farming community. Otherwise our farmers may feel that democracy is in no way better than the colonial rule. We also need to think that whether our democratic system is really helping our farmers. If not, we should do something for the betterment of our agriculturists to lead a happy life.
Sir, my next point is about miserable condition of the flood victims in the state of Karnataka. Flood victims were allotted a very small plot measuring 10” X 20” feet to construct a house. Even today those victims are living in temporary sheds. There is no pucca house for them to live in. Flood victims are to live with their family and livestocks in those small sheds. They are to sleep over there and cook and eat there. So, I request the Government to set up a House Committee and send it to look into the problems of farmers and try to find out a solution for this.
With these words I thank the chair once again and conclude my speech.
(ends).
(z4/1855/nsh-rcp) 1857 बजे श्री विजय बहुगुणा (टिहरी गढ़वाल): उपाध्यक्ष महोदय, उत्तराखंड जो देव भूमि, वीर भूमि और ज्ञान भूमि है, वहां प्रकृति ने ऐसा तांडव किया जिसका वर्णन करना संभव नहीं होगा। ऐसी वर्षा, भूस्खलन, बादल का फटना, बाढ़ आदि से सारे जनपद बुरी तरह से प्रभावित हैं। इस समय सौ गांव ऐसे हैं जिनका पुनर्वास करना बहुत आवश्यक हो गया है। करीब 73-74 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। राष्ट्रीय राजमार्ग जो गंगोत्री, यमुनोत्री, बदरीनाथ, केदारनाथ को जोड़ते हैं, जगह-जगह से टूट गए हैं। वहां आज आवश्यक वस्तुं पहुंचाना भी बहुत मुश्किल हो रहा है। आज नदियों में जो बाढ़ आ रही है, उसका मेन कारण यह है कि रिवर बैड उठ रहा है। फॉरैस्ट एक्ट और माइनर मिनरल कनसैशनल रूल के अंतर्गत आपने पत्थर के चुंगान पर पाबंदी लगा दी है, जिससे नदियों का बैड बढ़ रहा है और बाढ़ का पानी गांवों और शहरों में आ रहा है।
यहां वाटर रिसोर्स मंत्रायहां जल संसाधन मंत्री ळ जी बैठे हुए हैं। पर्वतीय क्षेत्रों पर जब बाढ़ आती है तो खेत कट जाते हैं और मैदानी क्षेत्रों में खेत उपजाऊ हो जाते हैं। इससे वहां काफी समस्या का सामना करना पड़ता है। राज्य सरकारों ने नदियों में बाढ़ नियंत्रण के लिए केन्द्र सरकार को जो प्रस्ताव भेजे हैं, मैं अनुरोध करूंगा कि मंत्री जी उन प्रस्तावों को स्वीकृत करने की कृपा करें।
इस समय उत्तरकाशी, टेहरी, पौढ़ी, खटीमा, मुनस्यारी आदि कई जगह बहुत नुकसान हुआ है। सब जानते हैं कि किस तरह 18 बच्चों का असामायिक मृत्यु हुई। मैं कहना चाहूंगा कि राष्ट्रीय राजमार्ग और बार्डर रोड्स इतनी बुरी तरह ध्वस्त हो चुके हैं कि उन पर युद्ध स्तर पर काम करना जरूरी है। उसमें हमारे कई यात्री भी फंसे रहते हैं। मैं अनुरोध करूंगा कि हमें प्रधान मंत्री राहत कोष से पैसा दिया जाए। आज राज्य सरकार क्या मदद कर रही है? जिनके घर पार्शियली डैमेज्ड हैं, उन्हें 2 हजार रुपये दिए जा रहे हैं और जो मकान बिल्कुल ध्वस्त हो चुके हैं, उन्हें कुल 35 हजार रुपये दिए जा रहे हैं। पुरी-भटवाड़ी बाजार जो गंगोत्री से पहले है, पूरा खत्म हो गया है, गांव खत्म हो गया। 2 हजार रुपये और 35 हजार रुपये का आपदा का जो कम्पैनसेशन है, वह बिल्कुल इलुज़राकम है। इससे जनता में बड़ा असंतोष है। मैं कहना चाहता हूं कि आपदा के मानक को बढ़ाया जाना चाहिए। राज्य सरकार ने केन्द्र सरकार को पत्र लिखकर गांव के पुनर्वास के लिए 1500 करोड़ रुपये और 2 हजार करोड़ रुपये लोगों को राहत देने के लिए मांगे हैं।
मैं प्रधान मंत्री जी से अनुरोध करूंगा कि वे उत्तराखंड में एक उच्च स्तरीय समिति भेजें जो पूरे नुकसान का अवलोकन करे और उन्होंने जिस तरह लद्दाख के भूस्खलन में मदद की, उसी तरह उत्तराखंड राज्य को भी आर्थिक सहायता देने की कृपा करें।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं केन्द्र सरकार से अनुरोध करूंगा कि आगे बढ़कर उत्तराखंड, जो दैवी आपदा से प्रभावित है, उसकी आर्थिक मदद करें और वहां के लोगों को इस समस्या से निजात दिलवाएं। धन्यवाद।
(इति ) ओश्री वीरेन्द्र कुमार (टीकमगढ़ ): * श्री वीरेन्द्र कुमार (टीकमगढ़ )ः बारिश की पहली फुहार पड़ते ही आबो -हवा के साथ् इंसानी चेहरों की रंगत भी बदल गई। नहीं बदला तो केवल बुंदेलखंड और उसके बाशिदों के चेहरे की मुरझाइयां। वहां धूल भरी आंधियां हैं, पानी के लिए जगह -जगह मरे पड़े, सड़ते जानवरों की लाशें हैं, कुछ कुंवारों के गांव भी है, क्योंकि लोग उन गांवों में अपनी बेटियों की शादी नहीं करते - इसलिए कि वहां पानी नहीं है। रात में पानी की चोरी करते किसान हैं, पानी के लिए लाठियां चटकाते फौजदारी करते भाई -बंधु हैं और मीलों तपती धरती से नंगे पैर पानी भरकर लाती हुई औरते हैं। ये बुंदेलखंड की भयावह तस्वीर है, जहां आज की तारीख में कवेल 50 से 95 सेमी वर्षा होती है। बुंदेलखंड में सूखे और अकाल का इतिहास बहुत पुराना है। यहां तक कि 744 हिजरी में इब्नबतूता बुंदेलखंड आया तो उसे यहां अकाल के दीदार हुए और उसने अपनी पुस्तक "रेहला" में इसका जिक्र भी किया। यह भयावह सूखा उन घने जंगलों को धीरे -धीरे लील गया जिसमें बाबर द्वारा शिकार खेलने का जिक्र मिलता है। चंदेलों का राजकीय चिह्न शार्दूल जो कि भारतीय शेरों की एक प्रजाति थी, आज केवल पत्थर के स्मारकों में सुरक्षित है।
बुंदेलखंड का इतिहास चंदेलों, बुंदेलों, मराठों और अंग्रेजों के आगोश में अंगड़ाइयां लेता है। शुरूआती दिनों में चंदेलों ने कुओं की तरफ खूब ध्यान दिया। कुएं ही पेयजल और खेती के मुख्य साधन थे। टीकमगढ़ में आज भी देश के सबसे ज्यादा कुएं पाए जाते हैं, लेकिन जलस्तर नीचा होने, विषम -कठोर धरातल, बिखरी हुई बस्तियों के कारण तालाबों ने जल्द ही कुओं का स्थान लेना शुरू किया और तालाबों का एक खूबसूरत नेटवर्क पूरे बुंदेलखंड में बनना प्रारम्भ हुआ। चंदेल राजाओं ने इसे एक धार्मिक और सामाजिक ताना -बाना भी दिया। चंदेल राजाओं ने अपने नाम से यहां तक कि पुत्र -पुत्रियों, पूर्वजों और पौराणिक पात्रों के नाम से भी तालाब बनवाए। पूरे बुंदेलखंड में 700 तालाब इसी अवधि में अस्तित्व में आए। चंदेलों ने कुछ तालाबों के भीतर मंदिर बनवाकर उन्हें ऐतिहासिक स्वरूप भी दिया। इस दौर में ऐसे भी उदाहरण मिले हैं जिसमें सजायाफ्ता दुश्मन राजा को तालाब निर्माण के रूप में जुर्माना भरने को कहा गया। ये तालाब जीविकापार्जन का साधन भी बने। चंदेल शासकों ने जलीय कृषि करने वाली स्थानीय जातियों को इस बात की छूट दी कि वे तालाबों में मछली पालन करें, सिंघाड़ा, मुरार और कमलगट्टा की खेती करें, इस शर्त पर कि वे तालाबों का रख -रखाव भी करते रहें। इन समवेत कारणों से तालाब बुंदेलखंड की सामाजिक -धार्मिक परम्परा पूरी तरह कदमताल करते नजर आए । बुंदेला राजाओं ने उतने महत्वपूर्ण नए तालाब तो नहीं बनाए, लेकिन इन तालाबों का स्वरूप जरूरत बरकरार रखा। चरखारी और अजयगढ़ में कुछ सुंदर तालाब भी बने।
बुंदेलखंड में उत्तराधिकार जब मराठों से अंग्रेजों को हस्तातरित हुआ तो अंग्रेजों ने बुंदेलखंड की सैन्य महत्ता को देखते हुए यहां खुद को स्थापित करने का निर्णय लिया और जलीय संकट के निवारण के लिए बांध निर्माण की योजना बनाई। बांध निर्माण की प्रक्रिया आज भी तब से अनवरत जारी है। दुर्भाग्य से बुंदेलखंड की परम्परागत जल संचयन प्रणाली अब ध्वस्त है। कुएं, बावड़ियां और तालाब सब भूमाफियाओं के कब्जे में हैं। 1930 में शुरू हुई नलकूप प्रणाली ने बुंदेलखंड की परम्परागत जल संचयन व्यवस्था का विध्वस कर डाला है। इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि देश में 1930 में जहां तीन हजार नलकूप थे, वहीं इनकी संख्या अब पाच लाख है। जल संचयन अब केवल सरकारी मकहमे की जिम्मेदारी है। जैसे -जैसे जलस्तर नीचे जा रहा है, हैंडपंप पानी देना बंद कर देते हैं। प्रशासन इसे री -बोर कराकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेता है। गर्मियां शुरू होते ही गांवों में पानी को लेकर जब हाहाकार मचता है तब पानी की चोरी और जल संसाधनों पर कब्जे की घटनाएं कानून एवं व्यवस्था की एक बड़ी समस्या बन जाती है। यह भी एक अजीब विरोधाभास है कि जहां बुंदेलखंड की खेती पानी के अभाव में दम तोड़ रही है वहीं देश की 4 करोड़ हेक्टेयर भूमि बाढ़ में जलमग्न है। कहर मचाते इस जल संसाधन का समान वितरण कैसे किया जाए, इस पर देश के योजनाकारों का ध्यान नहीं जा रहा है। बुंदेलखंड में किन साजिशों के तहत जंगल नष्ट किए जा रहे हैं, तालाबों पर खेती की जा रही हैं, इसके निवारण के लिए बुंदेलखंड की अवाम को अपने बीच से ही भगीरथ पैदा करना होगा। बुंदेलखंड में पिछले 9 वर्षों में 8 बार सूख पड़ा है। बेतवा नदी को जोड़ने की योजना को शीघ्र पूरा कराने की आवश्यकता है।
SHRIMATI BIJOYA CHAKRAVARTY (GUWAHATI): Sir, Assam and flood is extremely a synonymous one. In every year Assam reeled under severe flood. Flood not only hit Assam once in a year but nearly four to five wave of flood affected Assam and huge land is eroded and many lives lost.
For long, we have been demanding that flood in Assam be treated as a national problem. As the dimension of flood is huge, it is beyond the administrative capacity of State Government to control flood in Assam.
Sir, Majuli the river island is the largest one of this kind. This island is the nerve centre of Vhaisnavite culture of propagated by Guru Sri Sankardev in 16th century. There were nearly fifty major Vhaisnavite satra (Religion-cultural centre) but fifteen satras are completely eroded by river Brahmaputra.
Sir, Assam is like a big bowl. It is surrounded by hill states like Maghalaya, Arunachal Pradesh, Nagaland, Mizoram and Bhutan also in the Northern side.
Water form all these hill states cascading to Assam.
When there is huge flood in Bhutan, flood gate of Kurashu river flung open and flood water of the river washed away lives and property of the bordering district of Assam.
Lakhimpur, Dhamaji, Jonaai, Silasgar, pats of Kamrup, Goalpara and parts of Barrack valley reeled under flood. Corrupt Government of Assam Government did not use the Central Government’s funds for proper control of flood. All the embankments of rivers are not properly constructed. And contractors with the connivance of corrupt officials did not use right kind of materials required for construction of embankments. As a result embankments were breached even in the first wave of flood.
* Laid on the Table Moreover, big dams always a very dangerous proposition, especially for Assam proposed huge dam in lower Sovansiri river in Arunachal Pradesh will threatened entire Lakhimpur, Dhemaji, Silasagur and parts of Tinsukia district of Assam. Ecologist’s, Environmentalist’s, Geo-scientist’s are of the opinion that as NE region is earth-quake prone zone, stones of the hills are not mature in the eventuality of earth-quake huge dams will be a potential danger.
Hence I urge upon the Government that instead of big dams, construction of small dams on the upper reaches of the river will be more helpful.
Sir, through you I urge upon the Government to find out a positive way to control food menace in Assam.
(ends) (a5/1900/rjs-lh) 19.00 hrs. उपाध्यक्ष महोदय : सात बज गये हैं, अभी इस विषय पर छः-सात माननीय सदस्य और बोलने वाले हैं। उसके बाद जीरो ऑवर भी है। अगर सदन की मंजूरी हो, तो एक घंटा और बढ़ा दिया जाये।
…( व्यवधान)
संसदीय कार्य मंत्री और जल संसाधन मंत्री (श्री पवन कुमार बंसल ) : इसमें दोनों बातें हो जायेंगी। आधा घंटा इस विषय पर लग जायेगा और आधा घंटा जीरो ऑवर में लग जायेगा। ...( व्यवधान)
कई माननीय सदस्य : ठीक है।
1901 बजे श्रीमती भावना पाटील गवली (यवतमाल-वाशिम): उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे बाढ़ और सूखे की स्थिति पर बोलने का मौका दिया, उसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। वर्ष 2005 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन किया गया, लेकिन उसके बाद इस प्राधिकरण का जो कार्य होना चाहिए था, वह कार्य ठीक तरह से नहीं हो पा रहा है। आज सारा देश बाढ़, सूखे की चपेट में आया हुआ है। राज्य सरकारें, जिनको अच्छी तरह से काम करना चाहिए, वे सरकारें भी काम नहीं कर पा रही हैं। मैं खासकर महाराष्ट्र के बारे में यहां बोलना चाहूंगी। महाराष्ट्र में पिछले तीन-चार सालों से सूखा था, लेकिन इस साल बाढ़ आने के कारण वहां काफी नुकसान हो गया। वर्ष 2006 में महाराष्ट्र में बाढ़ आयी थी, जिसके कारण हजारों-लाखों लोगों के घर बह गये, किसानों की खेती बर्बाद हो गयी, फिर भी सरकार ने वहां पर राहत नहीं दी। उसके बाद वर्ष 2010 में फिर से वहां बाढ़ आयी। उसके बाद भी सरकार को जो उपाय करने चाहिए थे, वे उपाय वहां पर नहीं किये गये। मैं कहना चाहती हूं कि वहां पुनर्वास का कार्य भी नहीं किया गया। जब हम अपने क्षेत्र में जाते हैं, खासकर मैं अपने क्षेत्र दीगर्स गयी थी, वहां बाढ़ के कारण काफी नुकसान हुआ था। जब मैं वहां गयी, तो मेरे पास कई महिलाएं आ गयीं, सारे लोग इकट्ठे हो गये। वहां तकरीबन 900 घरों में पानी चला गया था, जिसके कारण वे लोग अपने घरों में नहीं रह सकें। राज्य सरकार ने कुछ प्रबंध किया, लेकिन वह प्रबंध भी पूरा नहीं हो सका। मैं यहां यह बताना चाहूंगी कि वर्ष 2006 में भी इसी शहर में, इसी गांव में पानी आया था।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : भावना जी, आप संक्षेप में बोलिये।
…( व्यवधान)
श्रीमती भावना पाटील गवली (यवतमाल -वाशिम ): उपाध्यक्ष महोदय, आप मुझे दो मिनट और दीजिए, क्योंकि मैंने अभी शुरुआत की है। ...( व्यवधान) वर्ष 2010 में बाढ़ आने के बाद भी सरकार ने वहां कोई राहत नहीं दी, जिसकी वजह से पुनर्वास नहीं हो पाया। मैं कहना चाहूंगी कि केन्द्र में भी कांग्रेस की सरकार है और राज्यों में भी कांग्रेस की सरकार है, लेकिन अभी तक राज्य सरकार के पास पुनर्वास के लिए तकरीबन 400 प्रस्ताव पड़े हुए हैं। वहां कोई निर्णय नहीं लिया गया। इस कारण वहां लोग आज बहुत ज्यादा मुसीबत में हैं। ...( व्यवधान) मै यह कहना चाहूंगी कि जितना किसानों का नुकसान हुआ है। ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आपके दो मिनट पूरे हो गये हैं।
…( व्यवधान)
श्रीमती भावना पाटील गवली (यवतमाल -वाशिम ): उपाध्यक्ष महोदय, मुझे आपका संरक्षण चाहिए। यह बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है। ...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आपने दो मिनट के लिए कहा था, वह दो मिनट पूरे हो गये हैं। अब दो-दो मिनट करके हम कितना समय बढ़ायेंगे?
…( व्यवधान)
श्रीमती भावना पाटील गवलगवला ळ (यवतमाल -वाशिम ): जब हम अपने क्षेत्रों में जाते हैं, तो वहां किसानों का भी बड़ा नुकसान हुआ देखते हैं। किसानों को भी राहत नहीं मिलती। मैं कहना चाहूंगी कि किसानों को राहत दिलाने की बहुत आवश्यकता है। सबसे बड़ी बात मैं रिवर लिंकिंग के बारे में कहना चाहूंगी। यह प्रस्ताव एनडीए सरकार लायी थी। आज रिवर लिंकिंग न होने के कारण जब बाढ़ आती है, तो एक प्रदेश में सारा पानी चला जाता है, जिससे काफी नुकसान होता है। कई जगहों पर सूखा पड़ता है। अगर हम रिवर लिंकिंग का प्रौजेक्ट बनाते हैं, तो हम अच्छी तरह से अपने देश में कार्य कर सकते हैं और इससे किसानों को भी राहत मिल सकती है। इसके साथ-साथ बाढ़ नियंत्रण के लिए हम जो राष्ट्रीय नीति बनाने जा रहे हैं, उसके लिए राज्यों ने प्रस्ताव नहीं भेजे हैं, ऐसा हमारे संसदीय कार्य मंत्री ने यहां पर बताया था। अगर यह नीति नहीं बनती है, तो हम अच्छी तरह से काम नहीं कर पायेंगे।
(b5/1905/rps-kkd) मेरी मांग है कि जल्द से जल्द यह नीति हम तय करें और हमारे देश के किसानों को, जो लोग पुनर्वास से वंचित हैं, उनके पुनर्वास के लिए योजना बनाई जाए। राज्य सरकार वहां पर अच्छे तरीके से काम करे। मैं बताना चाहूंगी कि जब हमारी सरकार थी, हमने किसानों के लिए अच्छी तरह से योजना बनाई थी, योजना को लागू किया था जिससे किसानों को अच्छी तरह से लाभ हुआ था, लेकिन आज केन्द्र और राज्य में जो सरकारें हैं, वे कुछ भी नहीं कर पा रही हैं। दस वर्षों से वे सत्ता में बैठे हुए हैं, लेकिन इन्होंने कुछ नहीं किया है। इसलिए मैं यही कहूंगी कि जल्द से जल्द राष्ट्रीय अच्छी राष्ट्रीय नीति बनाई जाए ताकि वहां के लोगों को राहत मिले। आपने मुझे समय दिया, इसके लिए आपको धन्यवाद देती हूं।
(इति ) 1905 बजे श्री नारायण सिंह अमलाबे (राजगढ़): महोदय, भारतवर्ष में बाढ़ एक बड़ी समस्या है जिससे देश का 75 प्रतिशत भाग प्रभावि होता है। हर वर्ष बड़ी संख्या में जनहानि होती है, अरबों रुपये की संपत्ति नष्ट हो जाती है, इसके लिए हमें बड़ी-बड़ी नदियों में उद्गम स्थल से ही गाद व गंदगी के प्रभावी नियंत्रण की सख्त आवश्यकता है। गंदगी व गाद के चलते नदियों की जल संग्रहण क्षमता काफी कम हो गयी है। इसके अलावा सूखा भी राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी समस्या है जिससे जूझने के लिए शासन को हजारों करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं, लेकिन सूखाग्रस्त क्षेत्रों में हालात आमतौर पर बद से बदतर ही रहते हैं। बाढ़ एवं सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावी रूप से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन एवं नियंत्रण प्राधिकरण का केन्द्र व राज्य स्तर पर प्रभावी गठन किया जाना चाहिए तथा केन्द्र से राज्य को व राज्य से केन्द्र को सूचनाओं का संप्रेषण भी त्वरित होना चाहिए। साथ ही, इस मामले में कोताही बरतने पर अधिकारियों-कर्मचारियों की जवाबदेही भी सुनिश्चित करने का प्रावधान होना चाहिए। बाढ़ प्रबंधन के लिए अत्याधुनिक तकनीक की व्यवस्था करना अत्यंत आवश्यक है। सूखे व बाढ़ का मूल कारण हमारे देश में वनक्षेत्र का तेजी से समाप्त होना है। यदि वृक्षारोपण के लिए केन्द्र व राज्य के स्तर पर जमीनी कार्यक्रम व प्राधिकरण बनाकर युद्धस्तर पर व्यावहारिक रूप से सघन वृक्षारोपण कराया जाए व देशवासी वृक्षों के महत्व को समझें, तो निश्चित ही दोनों समस्याएं काबू में आ सकती हैं। वृक्षारोपण केवल शासकीय प्रयासों से ही संभव नहीं है, इसके लिए आम जनता में गंभीर चिंता व वृक्षों के अभाव से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने के दुष्परिणामों से अवगत कराने के लिए जनजागरण के कार्यक्रम भी बेहद जरूरी हैं। सघन वृक्षारोपण का सपना तभी साकार हो सकता है, जब देश के आम आदमी को इसमें भागीदार और जवाबदेह बनाया जाए। इसके लिए संसद से लेकर गांव की चौपाल तक, शहर से लेकर नुक्कड़ व बाजार तक, हर स्तर पर राष्ट्र हित में हम सभी को मिलकर प्रयास करना चाहिए। आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए आपको धन्यवाद देता हूं।
(इति ) उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्यगण अपने लिखित भाषण सदन के पटल पर रख दें।
श्री जगदम्बिका पाल 1908 बजे श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज ): महोदय, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।...( व्यवधान)
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली ) : महोदय, मुझे एक मिनट बोलने का समय दीजिए।...( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : आपका एक मिनट बहुत लंबा होता है। मुझे पता है।
श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज ) : आपने मुझे कंक्लूड करने के लिए अवसर दिया है, इसलिए मैं बड़ी भारी मन से बात कह रहा हूं।...( व्यवधान)
महोदय, जिस इलाके से मैं आता हूं, पूर्वी उत्तर प्रदेश की नीयति है बाढ़। हमारे तमाम माननीय सदस्य जानते हैं कि बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की नियति हो गयी है बाढ़। मैं इस चर्चा में इसलिए भाग लेना चाहता था क्योंकि मैं सोचता था कि कम से कम इस चर्चा में, जहां बाढ़ और सूखे पर चर्चा होगी, कोई आरोप-प्रत्यारोप नहीं होगा।
(c5/1910/jr-mmn) मैंने बीएसपी के सदस्यों की बात भी सुनी है।
उपाध्यक्ष महोदय: आप विषय पर बोलें, किसी ने क्या कहा, इस पर न जाएं।
श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागं ज ) : सब माननीय सदस्यों ने जो कहा, उससे ऐसा लगता है कि बाढ़ प्रबंधन की सारी जिम्मेदारी केन्द्र की है, जबकि फ्लड मैनेजमेंट की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है। उसके बावजूद भी जिस राज्य में बाढ़ आती है, बाढ़ आपदा प्रबंधन की तरफ से केन्द्र द्वारा उसे मदद दी जाती है. भारत सरकार ने फ्लड मैनेजमेंट प्रोजेक्ट बनाया है, जिसमें 8,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। चाहे बाढ़ प्रबंधन की बात हो, बंधों के कटावरोधी की बात हो, चाहे समुद्री कटावरोधी की बात हो, चाहे निकासी का सवाल हो, इन सारे मुद्दों पर फ्लड मैनेजमेंट प्रोग्राम के तहत मदद दी जाती है।
सन् 2009 में सूखा पड़ा था। यह भी सही है कि देश के 15 राज्यों में 352 जिलों में सूखा पड़ा था। यह कहा गया कि जहां कांग्रेस पार्टी की सरकारें थीं, वहां पर पैसा दिया गया। लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि हमने बिहार में 1200 करोड़ रुपए दिए, जबकि वहां कांग्रेस पार्टी की सरकार नहीं है। पंजाब में हमने 800 करोड़ रुपए दिए।
उपाध्यक्ष महोदय: वह सब मंत्री जी बताएंगे।
श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): आज उत्तर प्रदेश में चाहे गंगा हो, रामगंगा हो, राप्ती हो, बूढ़ी राप्ती हो या जमुवार हो, इन सभी नदियों के जल स्तर खतरे के निशान से ऊपर हैं। आज खीरी लखीमपुर से दुधवा पलिया की रेल लाइन बंद है। दुधवा में नेशनल वाइल्ड लाइफ पार्क है, वह सारा पानी से भरा हुआ है। मैं समझता हूं कि दुधवा के सामने प्रश्न चिन्ह लग गया है। वहां की दस ट्रेंस कैंसिल हो चुकी हैं। नेपाल से शारदा में 70,000 क्यूसिक पानी छोड़ा गया है, नारयणी में भी नेपाल से 2,40,000 क्यूसिक पानी छोड़ा गया है। आज उस पानी के यहां आने से सिद्धार्थनगर, महाराजगंज, कुशीनगर, बहराइच, गोंडा में बाढ़ की स्थिति पैदा हो गई है।
यह दुर्भाग्य है कि जब चेरापूंजी में बारिश होती थी, तो कहा जाता है कि देश में सबसे ज्यादा बारिश वाला स्थान है, हम बचपन में ऐसा पढ़ा भी करते थे। लेकिन आज वहां सूखा पड़ा हुआ है। इसलिए यह कहीं न कहीं ग्लोबल वार्मिंग है और उस पर चर्चा होनी चाहिए। आज जून, जुलाई और आधे अगस्त तक बारिश नहीं हुई, 42 प्रतिशत मानसून उत्तर प्रदेश में कम था, 27 प्रतिशत बिहार में कम था।
उपाध्यक्ष महोदय: अब आप अपनी बात समाप्त करें।
श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज ): मैं अब केवल उत्तर प्रदेश की ही बात कहूंगा और वह बात कहूंगा जो अभी चर्चा में नहीं आई है। उससे आपका भी ज्ञान बढ़ जाएगा।
उपाध्यक्ष महोदय: आपने उत्तर प्रदेश की भी बात कह दी है, अब आप अपनी बात समाप्त करें। वैसे मुझे भूगोल के बारे में पता है।
श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज ): आज उत्तर प्रदेश में बाढ़ से प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए और बाढ़ राहत कार्यों के लिए काम करना चाहिए, जो कि राज्य सरकार नहीं कर रही है। यह मैन मेड बाढ़ है। बिहार में 2007 से लेकर 2009 में जो वहां चार नदियां है, उनके बंधे हमेशा कटते रहे, तटबंध कटते रहे। इसी तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश के भी तटबंध कटते रहे और वहां बाढ़ आती रही। जब ऐसा होता है तब तक सिंचाई विभाग के इंजीनियर्स सोए रहते हैं। वे चाहते हैं कि जब तटबंध कट जाएंगे, फिर केन्द्र से या राज्य से पैसा आएगा, उसमें भ्रष्टाचार करेंगे। मैं समझता हूं कि बाढ़ से ज्यादा इस चीज पर ध्यान देना चाहिए। पूर्वी उत्तर प्रदेश में कुछ दिनों पहले तक सूखा था, लेकिन अभी कुछ दिनों की बारिश से वहां बाढ़ के हालात पैदा हो गए हैं। इसी तरह दिल्ली में यमुना में पानी खतरे के निशान से ऊपर चला गया है। पंजाब और हरियाणा में भी यही स्थिति है। जहां हम जून-जुलाई में सूखे की बात कर रहे थे, अचानक अगस्त में जिस तरह से मानसून की बारिश हुई, तो बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है। इसलिए सरकार को इस पर ध्यान देकर तुंत बाढ़ राहत कार्य शुरू करने चाहिए। (इति ) 1914 hours DR. TARUN MANDAL (JAYNAGAR): Sir, I hail from a constituency, Joynagar of South 24 Parganas District of West Bengal, the district, which is reeling under drought. Last year also, due to Aila cyclone, this district faced the wrath and the farmers could not cultivate due to marooning of land with the salty water and even flooding of the ponds with salt water. Like some other districts of our State, Purulia, Bankura and West Midnapore also last year faced reduced rainfall and als o similarly they are facing misery and hunger.
MR. DEPUTY-SPEAKER: Please be brief.
DR. TARUN MANDAL (JAYNAGAR): I am very brief.
The West Bengal Government has already declared 11 districts as drought affected and demanded Rs.1400 crore from the Centre. But I suppose with declaring only as drought affected, they have completed their duties. The immediate works, which are needed, like supply of foods, drinking water, fodder for the animals and, particularly exemption of loans of the farmers and fees of the students, are extremely necessary in these conditions.
(d5/1915/kvj-har) All India K a isan and Khet Muzdoor Sanghatans and also Socialist Unity Centre of India (Communist) are launching movements for these demands. I believe this is a joint responsibility of the Centre and the State Governments. Whatever m any oney the State Government has demanded, should be immediately released by the Central Government. At the same time, it should be looked into that it is properly utilised for the particular purpose it has been given.
I am very sorry to say that it is a shame for the nation that after 63 years of independence we could not bring out a permanent policy for this perennial cyclical problem of flood and drought. Flood is the most common natural calamity problem in this country. Even no assessment has been made as to how much wealth we have lost due to th e s r e is natural calamit y ies. So, I will request the Central Government and the State Governments to bring about some permanent projects to save our countrymen from this perennial problem of flood and drought.
(ends) 1916 बजे श्री हेमानंद बिसवाल (सुन्दरगढ़):उपाध्यक्ष महोदय, आज सूखा और बाढ़ के बारे में, नियम 193 के हिसाब से मुझे बोलने का मौका दिया गया है, मैं आपका आभारी हूं। यह साल ऐसा विचित्र साल है जिसमें हम बाढ़ भी देख रहे हैं और सुखाड़ भी देख रहे हैं। उड़ीसा प्रदेश को भारत के लोगों ने और विश्व के लोगों ने देखा है कि वर्ष 1999 में यहां बाढ़ भी आई और सुपर-साइक्लोन भी आया। ये दोनों अलग चीजें हैं क्योंकि अपर-स्ट्रीम ऑफ द रिवर में बाढ़ आ रही है और समुद्र के किनारे साइक्लोन आ रहा है, सुपर-साइक्लोन आ रहा है। अब तक उड़ीसा सरकार इसके लिए कुछ भी कर नहीं पाई है। लम्बी अवधि में ऐसी परिस्थितियों को कैसे सुधारा जाए, मैनेजमेंट कैसे किया जाए, इसके लिए आज भी कोई प्लानिंग नहीं हुई है। हमारे यहां डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी बनी है, उसमें ये लोग कुछ सुझाव देते होंगे, लेकिन ऐसी परिस्थितियों के लिए इन लोगों के सुझाव क्या हैं और इन सुझावों को कार्यान्वित करने के लिए भारत सरकार, उड़ीसा सरकार, इसके लिए क्या कदम उठा रही है, इस पर भी गहराई से सोचना चाहिए।
भारत में आज इतनी बारिश हो रही है कि भारत के सात राज्यों को छोड़ दें तो बाकी सभी राज्यों में बाढ़ के बारे में चर्चा हो रही है। दिल्ली में दस दिनों से बारिश हो रही है और दिल्ली चेरापूंजी की तरह नजर आ रही है। लगता है कि यहां जो कॉमनवैल्थ गेम्स हो रही हैं उसे प्रकृति होने देना नहीं चाहती है। लेकिन दुख की बात यह है कि जब हम बाढ़ के बारे में, चारों तरफ चर्चा देख रहे हैं, सूखे के बारे में हम ध्यान नहीं दे रहे हैं। उड़ीसा के 30 जिलों में से 7 जिलों को छोड़े देने के बाद, 23 जिलों में सूखा पड़ा हुआ है। VªÉä (e5/1920/ind-san) महोदय, छह राज्य सूखा प्रभावित घोषित हो चुके हैं, लेकिन उड़ीसा के बारे में मैं आपको बताना चाहता हूं। दस राज्यों में 30 से 50 प्रतिशत कम बारिश हुई है और 13 डिस्ट्रिक्ट्स में 30 प्रतिशत से कम बारिश हुई है। यह 18 तारीख तक की रिपोर्ट है। आज 27 तारीख है और आप आज तक देखेंगे कि अभी तक इन इलाकों में बारिश नहीं हुई है। उड़ीसा में सुंदरगढ़ डिस्ट्रिक्ट में ऐसे तीन-चार ब्लाक हैं, जहां आज तक कुल पांच सेंटीमीटर बारिश हुई है। वहां पीने का पानी भी नहीं है। हमारी कलेक्टर से भी बात हुई थी, लेकिन कुछ कार्यवाही नहीं की गई। झारखंड बार्डर, छत्तीसगढ़ बार्डर आदि के पास जितने ब्लाक्स हैं, वहां पानी की समस्या बनी हुई है। यह काम राज्य सरकार को करना चाहिए, लेकिन आज तक कोई कदम नहीं उठाया गया है।
उड़ीसा में 23 डिस्ट्रिक्ट आज के समय में सूखा प्रभावित हैं, फिर भी सूखा प्रभावित घोषित नहीं किए गए हैं।
उपाध्यक्ष महोदय : आप अपनी बात समाप्त कीजिए।
श्री हेमानंद बिसवाल (सुन्दरगढ़ ):वाटर हार्वेस्टिंग कैसे हो, इस बारे में हम यहां चर्चा कर रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों ने यह रिपोर्ट भी दी है कि पीने के लिए जो हम पानी नीचे से निकाल रहे हैं, वह आने वाले 35 सालों के बाद वह भी घट जाएगा। हमें वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर ज्यादा से ज्यादा बनाने चाहिए। माइनर इर्रिगेशन के बारे में भी चर्चा होनी चाहिए। केंद्र सरकार राज्य सरकार को जो पैसा दे रही है, उसका सही ढंग से वितरण नहीं होता है, इस बारे में भी चर्चा होनी चाहिए।
आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।
श्री सुभाष बापूराव वानखेडे ( हिंगोली ):महोदय, मेरा प्वायंट आफ आर्डर है।
उपाध्यक्ष महोदय : आप बैठ जाएं।
श्री सुभाष बापूराव वानखेडे (हिंगोली ):महोदय, सचिवालय का स्टाफ सुबह से काम पर आया है, लेकिन इस वक्त उनके खाने की कोई व्यवस्था नहीं है।
श्रीमती भावना पाटील गवली (यवतमाल -वाशिम ):उपाध्यक्ष महोदय, स्टाफ के खाने की कोई व्यवस्था होनी चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय : आप लोग बैठ जाएं।
श्री सुभाष बापूराव वानखेडे (हिंगोली ):महोदय, हमें खाने के लिए मिल रहा है, लेकिन स्टाफ के लिए कैंटीन में खाने की सुविधा होनी चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय : आपनी अपनी बात कह दी है, आप बैठ जाएं। मंत्री जी आपसे कुछ बोलेंगे।
संसदीय कार्य मंत्री और जल संसाधन मंत्री (श्री पवन कुमार बंसल ) : उपाध्यक्ष महोदय, यह पहले तय नहीं हुआ था कि आज देर तक सदन की कार्यवाही चलेगी। सत्र के शुरूआत में किन्हीं कारणों से कुछ दिन तक सदन की कार्यवाही सुचारु रूप से नहीं चल सकी, इसलिए काम आगे बढ़ता गया।
(f5/1925/asa/ak) मैं मानता हूं कि यह बात सही नहीं है। अगर 8 बजे तक हो तो मैं खाने का इंतजाम जरूर करना चाहिए। अब दो दिन की बात है। मैं आपको विश्वास दिला सकता हूं...( व्यवधान) अगर 30 और 31 दो दिन और हाउस चलना है, अगर उन दिनों भी हाउस लेट बैठेगा तो खाने के लिए इंतजाम पहले किया हुआ होगा और अगले सैशन में कभी ऐसा नहीं होगा।
डा. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली ):उपाध्यक्ष महोदय, बहस हो रही है। जरूर इस देश के किसान बाढ़ और सुखाड़ से तबाह हैं। लेकिन मेरा कहना यह है कि इस देश के किसान केवल बाढ़ और सुखाड़ से ही तबाह नहीं हैं, वे इस देश की सरकार से भी तबाह हैं।...( व्यवधान) मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि एग्रीकल्चर में जो काम करने वाले पदाधिकारी हैं, उनका कोई एग्रीकल्चर मैनेजमेंट नहीं है। आज इसी के खिलाफ जंतर मंतर पर हजारों की संख्या में जिसमें एग्रीकल्चर पदाधिकारी काम करने वाले हैं, कमिश्नर औऱ स्टेट कमिश्नर इत्यादि जो हैं, उन सब लोगों ने टॉर्च लाइट प्रोसैशन कर रखा है और मोमबत्ती का प्रोसैशन किया हुआ है। वे जूलूस लेकर जंतर मंतर पर आए हुए हैं। इसीलिए हमने आपका समय लिया और मैं सरकार से मांग करता हूं कि एग्रीकल्चर में काम करने वाले पदाधिकारियों का एग्रीकल्चर कैडर मैनेजमेंट और उनकी देखभाल और जो कृषि की बात जानते हैं, कृषि के विशेषज्ञ हैं, जब उनकी तरफ ही ध्यान नहीं दिया जाएगा तो वे किसान की क्या सहायता करेंगे? इशलिए उनकी मांग जो हैं, उनको पूरा किया जाए।
श्री पवन कुमार बंसल : चर्चा समाप्त हो गई है। उसके बाद 30 को इसका जवाब होगा।
उपाध्यक्ष महोदय : अगर हाउस एग्री करता है तो ज़ीरो ऑवर लेते हैं।
श्री पवन कुमार बंसल : उपाध्यक्ष महोदय, मैंने वहां स्पीकर साहब के ऑफिस में बात की है, उसी दिन एससीएसटी वाला भी साथ ले लिया जाएगा ।
उपाध्यक्ष महोदय : श्री माकन सिंह सोलंकी- अनुपस्थित।
श्री ए.एम.आनंदम- अनुपस्थित।