State Consumer Disputes Redressal Commission
U. I. I. Co. Ltd. vs Prabhu Dayal Jaiswal on 22 March, 2022
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/2012/177 ( Date of Filing : 24 Jan 2012 ) (Arisen out of Order Dated in Case No. of District State Commission) 1. U. I. I. Co. Ltd. a ...........Appellant(s) Versus 1. Prabhu Dayal Jaiswal a ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. Vikas Saxena PRESIDING MEMBER HON'BLE MRS. DR. ABHA GUPTA MEMBER PRESENT: Dated : 22 Mar 2022 Final Order / Judgement
राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग , उ0प्र0 , लखनऊ।
(सुरक्षित) अपील सं0 :- 177 / 201 2 (जिला उपभोक्ता आयोग, देवरिया द्वारा परिवाद सं0- 256/2005 में पारित निर्णय/आदेश दिनांक 28/11/2011 के विरूद्ध) The United India Insurance Co. Ltd. Regional Office, Kapoorthala complex, Lucknow, through the Dy. Manager.
Appellant Versus Prabhu Dayal Jaiswal aged 45 years S/O Ram nath R/O Mohalla-Bhikhampur Road, PO & Distt. Deoria.
............Respondent समक्ष मा0 श्री विकास सक्सेना, सदस्य मा0 डा0 आभा गुप्ता, सदस्य उपस्थिति:
अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्ता:- श्री आलोक कुमार सिंह, अधिवक्ता प्रत्यर्थी की ओर विद्वान अधिवक्ता:- श्री बी0के0 उपाध्याय, अधिवक्ता दिनांक:-12.04.2022 माननीय श्री विकास सक्सेना , सदस्य द्वारा उदघोषित निर्णय यह अपील जिला उपभोक्ता फोरम, देवरिया द्वारा परिवाद सं0 256/2005 प्रभुदयाल जायसवाल प्रति यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड में पारित निर्णय व आदेश दिनांकित 28.11.2011 के विरूद्ध योजित किया गया है।
प्रत्यर्थी/परिवादी का कथन इस प्रकार है कि वह ट्रक पंजीकरण सं0 यूपी 52 एफ/0654 का पंजीकरण स्वामी है। उक्त ट्रक अपीलकर्ता के लखनऊ ब्रांच से बीमित थी। दिनांक 11.08.2003 को यह ट्रक दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसकी सूचना परिवादी द्वारा पुलिस थाने बिरनो, जनपद गाजीपुर में दी गयी तथा विपक्षीगण की नजदीकी शाखा आजमगढ़ में तुरंत दी गयी। विपक्षीगण की अनुमति के उपरान्त उक्त प्रश्नगत वाहन को सेल आटो मोटर वर्कशाप, गोरखपुर लाया गया। गोरखपुर शाखा ने इस वाहन का तुरंत निरीक्षण किया और गाड़ी ले जाने की अनुमति दी। गाड़ी पर कुल 93,000/- रूपये खर्च हुये। प्रत्यर्थी/परिवादी का कथन है कि उसने बीमा की समस्त औपचारिकतायें पूर्ण कर दी थी। अपीलकर्ता ने 93,000/- का भुगतान नहीं किया और पत्र दिनांकित 29.06.2004 द्वारा प्रत्यर्थी/परिवादी को सूचना दी थी कि प्रश्नगत वाहन के चालक हीरालाल का ड्राइविंग लाइसेंस सं0 3010/डीआरए/78 जांच हेतु एआरटीओ, देवरिया के कार्यालय से जारी होना नहीं पाया गया। इस आधार पर बीमे का दावा खारिज किया। परिवादी का कथन है कि उसने विपक्षीगण को जो डी0एल0 भेजा था, उसका नम्बर 599/ओडी/04 दिनांकित 15.06.1985 तक परिवादी ने यह आरोप लगाया कि विपक्षी ने फर्जी डी0एल0 लगाकर प्रत्यर्थी/परिवादी का दावा खारिज कर दिया है।
अपीलार्थी/विपक्षीगण की ओर से वादोत्तर प्रस्तुत किया गया है, जिसके अनुसार बीमा की आवश्यक शर्त थी कि उक्त प्रश्नगत वाहन का चालन वैध एवं प्रभावी चालक अनुज्ञप्तिधारी चालक द्वारा किया जायेगा। प्रत्यर्थी/परिवादी ने वाहन चालक हीरालाल को अपना चालक बताते हुए डी0एल0 सं0 3010/डीआरए/78 की छायाप्रति अपीलार्थी बीमा कम्पनी को प्राप्त करायी थी। उक्त लाइसेंस का सत्यापन बीमा कम्पनी द्वारा संबंधित बीमा आरटीओ, देवरिया से कराया गया तो इस आशय की आख्या प्राप्त हुई कि उक्त लाइसेंस उनके विभाग से जारी नहीं किया गया है। विपक्षी के अनुसार एआरटीओ, देवरिया की आख्या से पूरी तरह स्पष्ट है कि दुर्घटना के समय प्रश्नगत वाहन के चालक हीरालाल के पास वैध एवं प्रभावी चालन अनुज्ञप्ति नहीं थी। इस कारण प्रत्यर्थी/परिवादी का दावा ''नो क्लेम'' किया गया। विद्धान जिला उपभोक्ता फोरम ने दोनों पक्षो को सुनवाई का अवसर देते हुए प्रत्यर्थी/परिवादी का परिवाद स्वीकार किया और दुर्घटनाग्रस्त ट्रक की मरम्मत में व्यय की धनराशि रूपये 83,700/- रूपये तथा वाद योजन की तिथि से वास्तविक अदायगी तक 08 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ आज्ञप्त किया, जिससे व्यथित होकर यह अपील प्रस्तुत की गयी है।
अपील में मुख्य रूप से यह आधार लिये गये हैं कि अपीलार्थी द्वारा सेवा में कोई कमी नहीं की गयी है। प्रत्यर्थी/परिवादी के बीमे का क्लेम उचित चालन अनुज्ञप्ति न होने के आधार पर खारिज किया गया है। प्रत्यर्थी/परिवादी ने चालक लाइसेंस सं0 3010/डीआरए/78 चालक हीरालाल प्रस्तुत किया गया था, जिसके संबंध में एआरटीओर, देवरिया से आख्या प्राप्त हुई है कि यह उचित एवं वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं है। अत: बीमे का दावा उचित प्रकार से ''नो क्लेम'' किया गया। उक्त साक्ष्य को नजरअंदाज करते हुए यह निर्णय पारित किया गया है, जो अपास्त होने योग्य है।
अपीलार्थी के विद्धान अधिवक्ता श्री आलोक कुमार सिंह तथा प्रत्यर्थी के विद्धान अधिवक्ता श्री बी0के0 उपाध्याय को विस्तृत रूप से सुना गया। पत्रावली पर उपलब्ध समस्त अभिलेख का अवलोकन किया गया। तत्पश्चात पीठ के निष्कर्ष निम्न प्रकार से हैं:-
उभय पक्ष के अभिवचनों के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि अपीलकर्ता यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कम्पनी द्वारा इस आधार पर परिवादी का क्लेम को ''नो क्लेम'' किया गया है कि जो ड्राइविंग लाइसेंस प्रत्यर्थी/परिवादी की ओर से दुर्घटना के समय प्रश्नगत वाहन के चालक हीरालाल का प्रेषित किया गया था कि वह लाइसेंस 13509/डीआरए/85 एआरटीओ, देवरिया द्वारा निर्गत करना नहीं बताया गया। अत: बीमा कम्पनी अपीलकर्ता द्वारा यह माना गया कि प्रश्नगत वाहन वैध चालक लाइसेंस के साथ चालक द्वारा दुर्घटना के समय नहीं चलाया जा रहा था जबकि यह बीमा की एक शर्त है।
इस संबंध में प्रत्यर्थी/परिवादी का यह स्पष्टीकरण है कि चालक हीरालाल का ड्राइविंग लाइसेंस सं0 599/ओडी/2004 जो उसके द्वारा प्रस्तुत किया गया वह उचित एवं वैध था। इस तथ्य से अपीलकर्ता बीमा कम्पनी ने भी इंकार नहीं किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वाहन स्वामी द्वारा जिस चालक से वाहन चलवाया जा रहा था। उसके पास दुर्घटना के समय वैध एवं प्रभावी ड्राइविंग लाइसेंस था। यह बात अलग है कि परिवादी द्वारा जो पहले लाइसेंस बीमा कम्पनी को दिया गया था वह उचित नहीं पाया गया था, किन्तु यह भी स्पष्ट है कि चालक के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस था। इस संबंध में प्रत्यर्थी/परिवादी का यह स्पष्टीकरण भी है कि यह चालक लाइसेंस पुराना ड्राइविंग लाइसेंस था। समस्त परिस्थितियों से यह स्पष्ट हो जाता है कि दुर्घटनाग्रस्त वाहन के चालक हीरालाल पुत्र बलजीत के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस था एवं परिस्थितियों से यह भी स्पष्ट नहीं होता है कि प्रत्यर्थी/परिवादी ने जानबूझकर इस वाहन को बिना उचित वैध ड्राइविंग लाइसेंस वाले व्यक्ति को चलाने को दिया।
इस संबंध में मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय लाल चन्द्र प्रति ओरियण्टल इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड सिविल अपील सं0 3623/2003 निर्णय तिथि दिनांक 22.08.2006 इस संबंध में उल्लेखनीय है कि इस निर्णय मे माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह निर्णीत किया गया कि यदि दुर्घटना के समय चालक के द्वारा फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस के साथ वाहन चलाया जा रहा है किन्तु वाहन स्वामी ने यह विश्वास करते हुए यह चलाने को दिया है कि यह ड्राइविंग लाइसेंस उचित है तो वाहन स्वामी द्वारा जानबूझकर बीमा की शर्त का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है और ऐसी दशा में दुर्घटना होने पर वाहन स्वामी के बीमे के क्लेम को माना नहीं जा सकता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह निर्णीत किया गया कि यदि वाहन स्वामी ने संतुष्टि कर ली है कि वाहन को उचित ड्राइवर द्वारा चलाया जा रहा है तो इसे धारा 149 (2) (a) (iii) मोटर वाहन अधिनियम का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है और बीमे के क्लेम को अस्वीकार किया जाना उचित नहीं है।
उपरोक्त निर्णय माननीय सर्वोच्च न्यायालय के एक अन्य निर्णय नेशनल इंश्योरेंस कम्पनी प्रति स्वर्ण सिंह प्रकाशित 2004 (3) एससीसी पृष्ठ 297 पर आधारित किया गया इस निर्णय में भी माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह निर्णीत किया गया कि ड्राइविंग लाइसेंस में कमी होने पर बीमे के क्लेम को इस आधार पर अस्वीकार किया जाना उचित नहीं है यदि वाहन स्वामी द्वारा जानते-बूझते वाहन ऐसे व्यक्ति को चलाने को दिया है, जिसके पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं है। ऐसी दशा में स्थिति भिन्न होगी किन्तु अन्यथा क्लेम अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। उपरोक्त निर्णयों को दृष्टिगत करते हुए प्रस्तुत मामले में बीमे के क्लेम को अस्वीकार किया जाना उचित प्रतीत नहीं होता है।
पीठ द्वारा बीमे की धनराशि पर भी विचार किया गया कि प्रश्नगत निर्णय के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि विद्धान जिला उपभोक्ता फोरम ने ट्रक की मरम्मत के व्यय के रूप में रूपये 83,700/- की धनराशि प्रदान की है।
विद्धान जिला उपभोक्ता फोरम ने गोरखपुर शाखा अधिकारी द्वारा इस्टीमेट 93,000/- पर आधारित करते हुए रूपये 83,700/- की धनराशि ट्रक की मरम्मत के रूप में हुए व्यय के रूप में प्रदान की गयी है। जबकि अपीलकर्ता की ओर से नियुक्त सर्वेयर द्वारा रूपये 44,765/- की हानि की गणना की गयी है। विद्धान जिला उपभोक्ता फोरम ने प्रत्यर्थी/परिवादी द्वारा प्रस्तुत किये गये बिल के आधार पर यह धनराशि नियत की है, किन्तु यहां पर यह कहना उचित होगा कि बिल बाउचर में दुर्घटनागस्त वाहन या मरम्मत किये गये वाहन में लगाये गये उपकरणों की नई कीमत लगायी जाती है, जबकि सर्वेयर द्वारा वाहन के पुराने हो जाने के आधार पर 50 प्रतिशत तक डिप्रिसियेशन भी काटा गया है। बीमा पॉलिसी में क्षतिपूर्ति वाहन के पुराने हो जाने के आधार पर दिये जाने का वर्णन होता है। अत: ऐसी दशा में पुराने वाहन में लगाये गये नये उपकरणों के स्थान पर डिप्रिसियेशन काटा जाना उचित है और इन परिस्थितियों में सर्वेयर द्वारा गणना की गयी धनराशि प्रत्यर्थी/परिवादी को दिलवाया जाना उचित है। तदनुसार निर्णय संशोधित होने योग्य एवं अपील आंशिक रूप से स्वीकार किये जाने योग्य है।
आंशिक रूप से स्वीकार की जाती है। प्रश्नगत निर्णय अपास्त करते हुए आदेश दिया जाता है कि प्रश्नगत दुर्घटनाग्रस्त ट्रक की मरम्मत में हुए व्यय के रूप में 83,700/- रूपये के स्थान पर 44,765/- रू0 अपीलकर्ता, प्रत्यर्थी/परिवादी को प्रदान करे। अपीलकर्ता प्रत्यर्थी/परिवादी को रूपये 44,765/- प्रश्नगत वाहन की क्षतिपूर्ति के रूप में प्रदान करेंगे। इस धनराशि पर क्लेम की तिथि से वास्तविक अदायगी तक अपीलकर्ता 08 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी अदा करेंगे।
उभय पक्ष वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।
आशुलिपिक से अपेक्षा की जाती है कि वह इस निर्णय/आदेश को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दें।
(विकास सक्सेना) (डा0 आभा गुप्ता) सदस्य सदस्य संदीप आशु कोर्ट-3 [HON'BLE MR. Vikas Saxena] PRESIDING MEMBER [HON'BLE MRS. DR. ABHA GUPTA] MEMBER