Legal Document View

Unlock Advanced Research with PRISMAI

- Know your Kanoon - Doc Gen Hub - Counter Argument - Case Predict AI - Talk with IK Doc - ...
Upgrade to Premium
[Cites 0, Cited by 0]

Lok Sabha Debates

Further Discussion On The Motion For Consideration Of The Mahatma Gandhi ... on 8 March, 2013

> Title: Further discussion on the motion for consideration of the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee (Amendment) Bill, 2010 (Amendment of section 2, etc.), moved by Shri Hansraj G. Ahir on 22.02.2013 (Discussion concluded and Bill withdrawn).

 

MR. DEPUTY-SPEAKER: The House shall now, take up Item No. 45.

          Shri Arjun Meghwal to continue his speech.

   

श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर): माननीय सदस्य श्री हंसराज गं0 अहीर के द्वारा गैर सरकारी बिल के माध्यम से नरेगा में जो अमेंडमेंट प्रस्तावित किया गया है, उसके संबंध में मैं बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। हंसराज जी का अमेंडमेंट यह है कि 100 दिन के रोज का बंधन क्यों? केवल 100 दिन क्यों और परिवार में एक ही आदमी को रोजगार क्यों दिया जाये? यह अमेंडमेंट करने के लिए यह बिल आया है और बहुत ही सही समय पर यह बिल आया है। मैं पिछली बार बोलते हुए यह कह रहा था कि यह लिमिटेड परपज के लिए अमेंडमेंट है, लेकिन मैं इसमें जोड़ना चाहता हूं कि नरेगा में 60-40 का एक प्रावधान हैं, माननीय मंत्री जी यहां बैठे हैं। कुछ काम ऐसे होते हैं जो 60-40 के रेश्यो से नहीं हो सकते हैं।

Sir, 60 per cent is the labour component and 40 per cent is the material component. आप भी जिस क्षेत्र से आते हैं, वहां कई जगह, पठारी क्षेत्रों में यह प्रॉब्लम आती होगी कि यह 60 परसेंट लेबर का कम्पोनेंट कैसे खड़ा करें? मेरा यह कहना है कि अपवाद स्वरूप इसमें भी अमेंडमेंट होना चाहिए। जैसे मैं बीकानेर राजस्थान से आता हूं, कई जगह ऐसे काम हैं, जहां लेबर 60 परसेंट से भी ज्यादा जाता है और कुछ ऐसे काम हैं, जहां लेबर 40 परसेंट ही रहता है। मैटीरियल कम्पोनेंट 60 परसेंट हो जाता है। मेरा यह कहना है कि यह जैसे एक पत्थर की लकीर की तरह  है कि हमने तो कानून बना दिया, अगर 60-40 का रेश्यो मैन्टेन नहीं करेंगे तो हम आपकी किस्त नहीं देंगे। पहले हम सुनते थे कि यह रेश्यो स्टेट लेवल पर मैन्टेन होना चाहिए, बाद में पता चला कि यह रेश्यो डिस्ट्रिक्ट लेवल पर मैन्टेन होना चाहिए। अब जानकारी आ रही है कि हर ग्राम पंचायत लैवल पर यह रेशियो मेनटेन होना चाहिए। उपाध्यक्ष जी, यह नहीं हो सकता है। मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ। हमने एक अमैन्डमैंट किया, हमने  रेलवे के साथ एक इनीशियेशन लिया। राजस्थान से भी हमारे भाई जितेन्द्र सिंह जी बैठे हैं। हमारे बीकानेर डीआरएम रेलवे ने एक बड़ा अच्छा इनीशियेशन लिया कि जो आर.यू.बी. यानी रेलवे अंडर ब्रिज और एफ.यू.बी. ग्रामीण क्षेत्रों में होते हैं, ये नरेगा से क्यों नहीं बन सकते? हमने अपनी डिस्ट्रिक्ट मॉनीटरिंग कमेटी में इस इश्यू को उठाया। धीरे-धीरे ज़िला कलैक्टर को राज़ी किया। वे मान गए और उन्होंने प्रस्ताव कर दिये। हमारे यहाँ 21 नरेगा से डवटेल करके आर.यू.बी. बने हैं जिससे किसानों को खेतों में आने-जाने का रास्ता मिल गया। पहले लंबा रास्ता था, ट्रैसपास कर के जा रहे थे, उससे सुविधा मिल गई और बहुत बढ़िया काम हुआ। जब रेल बजट पेश होने वाला था, तब वह मेरा ही लैटर था जिसके तहत रेल मंत्री पवन कुमार बंसल जी कह रहे थे कि हम आर.डी. से भी कुछ काम कराएँगे। काम वही हैं, लेकिन इसमें भी अड़चन हैं। वे कह रहे हैं कि नरेगा में अमैन्डमैंट नहीं हैं। मैं जयराम रमेश जी से भी मिला। मैंने कहा किस तरह का अमैन्डमैंट चाहिए? उन्होंने कहा कि हमारा 60:40 का रेशियो मेनटेन नहीं हो सकता। मैं यह कह रहा हूँ कि नरेगा में कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, कई तरह की दुविधाएँ आ रही हैं। जो ये काम हैं, जैसे किसान ने अपनी फसल पैदा कर दी, अब वह अपनी मंडी में ले जाना चाहता है। आप कहते हैं कि उसको ट्रैसपास करो, या कहते हैं कि जहाँ फाटक है, वहाँ जाओ। वहाँ वह खड़ा रहता है। तो क्यों नहीं जहाँ फीज़ीबल है, वहाँ आप आर.यू.बी. बना देते? ग्रामीण क्षेत्र के किसानों के काम वह आएगा, रोज़गार में काम आएगा, लोगों के आने-जाने का रास्ता सुगम होगा और इसमें अगर 60:40 का रेशियो आड़े आता है तो इसमें संशोधन होना चाहिए। ऐसे कई काम हैं जिसमें 60:40 का रेशियो आड़े आता है।

          उपाध्यक्ष महोदय, जे.सी.बी. से काम की शिकायतें बहुत आती हैं। कई जगह 60:40 का रेशियो मेनटेन नहीं होता है तो सरपंच लोग, प्रधान लोग मशीन से काम करा लेते हैं और उसके बाद उसमें पेमेन्ट करते समय दिक्कत आती है। मेरा अमैन्डमैंट है कि एक तो 60:40 के रेशियो पर अमैन्डमैंट होना चाहिए। दूसरा, नरेगा स्कीम में लिखा हुआ है कि हम जॉब कार्ड देंगे। जो आदमी जॉब कार्ड मांगेगा, उसको हम जॉब कार्ड देंगे। हंसराज जी कह रहे हैं कि सौ दिन का ही बंधन क्यों और परिवार में एक ही आदमी को रोज़गार क्यों? मेरा कहना है कि इस जॉब कार्ड में भी धाँधली होती है। वे कहते हैं कि क्या आपने फॉर्म सं. 6 भरा है? आपने जॉब कार्ड मांगा ही नहीं, हम काम क्यों देंगे? जॉब कार्ड भी लोग फर्जी बना लेते हैं। मेरा आपके माध्यम से यह सुझाव है कि नरेगा में यह अमैन्डमैंट भी होना चाहिए कि जैसे हर नागरिक को राशन कार्ड मिलता है और उस राशन कार्ड का उपयोग वह करे या नहीं करे, ऐसे ही नरेगा में जॉब कार्ड सबको मिल जाए, उसके बाद जिसको जँचेगा, वह काम करेगा, जिसको नहीं जँचेगा, वह काम नहीं करेगा। इस जॉब कार्ड को राशन कार्ड की तरह क्यों नहीं बना दिया जाए, नहीं तो ये जो रोज़गार सहायक लोग हैं, वे इसमें भी करप्शन करते हैं। जॉब कार्ड ये आसानी से नहीं बनाते हैं। तीसरा मेरा कहना था कि एरिया स्पैसिफिक आपको प्लान करने का भी अमैन्डमैंट करना पड़ेगा। आप प्रोटोटाइप नहीं कर सकते। मैं रेगिस्तान से आता हूँ। वहाँ आप कहेंगे कि 60:40 का रेशियो लागू होगा, लेकिन वहाँ कई जगह नहीं होगा। आप यह कहेंगे कि पातालतोड़ कुँआ अपने यहाँ बना लो। पता नहीं हमारे यहाँ वह सक्सैसफुल है या नहीं है। फिशरीज़ के लिए अलग होगा, रेगिस्तानी इलाके के लिए अलग होगा, नदियाँ जहाँ ज़्यादा हैं, वहाँ के लिए अलग होगा। एक प्रोटोटाइप योजना होनी चाहिए। हुक्मदेव जी यहाँ बैठे हैं। ये हमारे यहाँ कई गाँवों में गए हुए हैं। वहाँ बरसात में गाँवों में पानी भरा रहता है। पानी निकालने के लिए नाली नहीं है। नरेगा में आप पानी निकासी का काम तो ले सकते हैं पाइपलाइन के थ्रू, तो ऐसा क्यों नहीं कर सकते आप कि एक पातालतोड़ कुँआ बना दो, नीचे भी पानी रीचार्ज होगा। लेकिन वे कहते हैं कि कानून आड़े आता है। खाली निकासी कर सकते हैं पाइपलाइन के थ्रू। पाइपलाइन लोग खोद देते हैं। आगे भी जहाँ जाएगा, वे कहेंगे कि हमारे गाँव की बदबू इस घर के पास आ गई, उस घर के पास आ गई। ग्रामीण क्षेत्रों में इनफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने के लिए नरेगा है। आप रोज़गार तो उपलब्ध कराएँगे ही, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इनफ्रास्ट्रक्चर भी खड़ा होना चाहिए जिससे इस देश का पैसा काम आ सके, एक आधारभूत संरचना खड़ी हो सके।

          उपाध्यक्ष महोदय, मेरा आपके माध्यम से यह कहना है कि हम जब भी फिल्ड में जाते हैं तो चार-पांच तरह की शिकायतें बार-बार हमें नरेगा में सुनने को मिलती हैं। पहली शिकायत, समय पर काम नहीं मिलता, जिसको हल करने के लिए हंसराज जी बिल लाए हैं। एक को जॉबकार्ड क्यों? मांगने वाले को क्यों? ऑन डिमान्ड क्यों? जितने भी ग्रामीण क्षेत्र में नागरिक हैं, सभी को जॉब कार्ड दे दीजिए, जैसे राशन कार्ड देते हो। जिसको इच्छा होगी, वह काम करेगा। जैसे राशन कार्ड में जिसको जरूरत होती है, वह लेता है, नहीं तो नहीं लेता है। इसलिए पहली शिकायत है कि समय पर काम नहीं मिलता है।

          दूसरी शिकायत रहती है कि काम का पूरा पैसा नहीं मिलता है। इन्होंने यह टास्क बेस कर रखा है। एक ग्रुप होगा उसमें इतने लोग होंगे, उसके बाद काम का बंटवारा होगा। इसमें होता यह है कि मजबूत आदमी कहता है कि मेरे ग्रुप में काम करो। वह खुद तो काम करता नहीं है। तीन आदमी काम करते हैं, बाकी का वह रजिस्टर में नाम लिखवा देता है। इससे क्या होता है कि काम तो तीन आदमी करते हैं, लेकिन पैसा सात-आठ का उठ रहा है। यह जो टास्क बेस सिस्टम बनाया गया है, उसको कहीं न कहीं चैंज करने की जरूरत है, जिससे भ्रष्टाचार की शिकायत कम मिले।

          एक शिकायत मिलती है कि समय पर पेमेंट नहीं मिलती है। यह बड़ी शिकायत है। हालांकि हमने यह कर रखा है कि पोस्ट ऑफिस या बैंक के माध्यम से पेमेंट लेंगे। लेकिन समय पर पेमेंट नहीं मिलता है, क्योंकि पोस्ट ऑफिस के पास इतने संसाधन नहीं है कि वह समय पर पेमेंट कर सके। आपने ग्रामीण क्षेत्र में जिसको भी काम देना था, आरआरबी को या जिसको भी काम देना था, आप ब्रांचिज ज्यादा खोलिए या रिप्रज़न्टेटिव इस तरह का बनाइए, जो कि नरेगा की पेमेंट करे। आपको इस तरह का कोई सिस्टम करना पड़ेगा, अन्यथा पोस्ट ऑफिस के भरोसे पेमेंट नहीं होगा। महीने-महीने भर तक पेमेंट नहीं होता है। इसलिए समय पर भुगतान नहीं होता है।

          चौथी शिकायत आती है कि सोशल ऑडिट नहीं होने के कारण भ्रष्टाचार बढ़ा है। यह कुछ ऐसी चीजें हैं, जिनके अमेंडमेंट की जरूरत है। मैं मंत्री जी को बताना चाहता हूं कि जब यह नरेगा आयी थी तो जिसको हम लाइन डिपार्टमेंट बोलते हैं, पीडब्ल्यूडी, फॉरेस्ट डिपार्टमेंट, ईरीगेशन डिर्पामेंट, पहले बहुत काम करते थे, लेकिन आजकल लाइन डिपार्टमेंट काम ही नहीं करते हैं। फॉरेस्ट वाले काम नहीं करते हैं। ईरीगेशन वालों से मैंने मेरे एरिया में कहा कि नहर की सफाई करनी है। लेकिन वह काम नहीं करते हैं। कहते हैं कि काम हो ही नहीं सकता है, क्योंकि आप मशीन को एलाऊ नहीं करते हैं। यदि आप ईरीगेशन फैसीलिटी गांवों में नहीं बढ़ाओगे तो नरेगा का क्या मतलब हुआ? मेरा यह कहना है कि समय की मांग है कि नरेगा में एमेंडमेंट होना चाहिए, क्योंकि समय की यह मांग है। हंसराज जी जो एमेंडमेंट लाए हैं, हम उसका स्वागत करते हैं। मंत्री जी बैठे हैं शायद सारी चीजें इन्होंने नोट की होंगी। यह होलीस्टिक एप्रोच के साथ पूरा अमेंडमेंट लेकर के आएंगे। आपने मुझे बोलने का समय दिया बहुत-बहुत धन्यवाद।

 

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी): उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे श्री हंसराज अहीर जी के मनरेगा में संशोधन पर बोलने का अवसर दिया।

          महोदय, मैं बहुत ही विस्तार से अपने साथी अर्जुन मेघवाल जी की बातें सुन रहा था। उन्होंने जो बातें यहां रखीं, वह बहुत ही तार्किक और सामयिक हैं और बहुत ही आवश्यक भी हैं।

          महोदय, यह योजना वर्ष 2005 में लागू हुई थी। मेरे ख्याल से इस योजना की शुरूआत आपने त्रिवेन्द्रम से की थी। सौभाग्य से पिछली लोक सभा में मैं ग्रामीण विकास मंत्रालय की कंसल्टेटिव कमेटी में सदस्य था। माननीय रघुवंश प्रसाद सिंह जी इसके मंत्री थे। इसलिए मुझे वहां जाने का अवसर प्राप्त हुआ। वहां जा कर हम लोगों ने देखा कि जिन बिंदुओं पर अभी अर्जुन मेघवाल चिंता व्यक्त की थी, जिन गड़बड़ियों के बारे में कहा, वही गड़बड़ी जहां से उद्घाटन हुआ था, वहां हमने पायी। मैम्बर ऑफ पार्लियामेंट की टीम थी। सब इधर-उधर छिटक गए। कुछ प्रदर्शिनी में चले गए। हम लोगों ने देखा कि प्रधान एक पेड़ के नीचे बैठकर बना रहा था। जो मजदूर वहां काम कर रहे थे उनसे पूछा गया कि तुम्हारा कार्ड कहां है और कहां रहता है तो वह बोले कि वह प्रधान के पास जमा रहता है। जहां से इस योजना की शुरूआत हुई और जहां से उद्घाटन हुआ, अगर वहां बड़े पैमाने पर यह गड़बड़ी पायी गयी तो मेरे ख्याल से इस योजना का सात वर्षों में अब तक क्या हश्र हुआ है, यह आप सोच सकते हैं।

          दूसरी बात पहले इस योजना को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना किया गया। फिर महात्मा गांधी जी का नाम जोड़ दिया गया।

16.00 hrs. मैं कहना चाहता हूं कि वैसे भी महात्मा गांधी जी बेचारे हो गए हैं। तस्वीरें लगी हैं लेकिन उन की बातों पर अमल नहीं होता। मेरे ख्याल से उन का नाम जोड़ने के बाद आप ने इस योजना पर ठीक से अमल नहीं किया। अब आप ने यह कहा कि पूरी दुनिया में रोज़गार का सबसे बड़ा अवसर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार योजना में है। मेरे ख्याल से वह फलीभूत नहीं हुई है। यह योजना तभी फलीभूत होगी जब आप आम आदमी को रोज़गार देते हुए उस को आमदनी से जोड़ेंगे कि अगर वह काम कर रहा है तो उस की आमदनी क्या है। महंगाई दिन-पर-दिन बढ़ रही है। आज जो खेतिहर मजदूर है, कृषक मजदूर है वह महंगाई के बोझ से बिल्कुल दबा जा रहा है। आप ने कहा कि पूरे देश में हमने आठ करोड़ लोगों को रोज़गार दिया जिस में हमने 47 प्रतिशत महिलाओं को रोज़गार दिया। अब आज हम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस भी मना रहे हैं। अगर देखा जाए तो मेरे ख्याल से आज़ादी के साठ-पैंसठ वर्षों के बाद भी हम ने अभी तक उस लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जो हमारे पूर्वजों ने, पूर्व नेताओं ने जो सपना संजोया था। वह सपना पूरे तरीके से फलीभूत नहीं हुआ।

          हंसराज अहीर जी ने जो अमेन्डमेंट दिया है कि मज़दूरी साठ रुपये, कुछ बढ़ाया है आपने। इन का अमेंडमेंट है कि 150 रुपये किया जाए। फिर राज्य सरकार उस में जो जोड़ कर दे सके, वह दे। यह व्यवस्था हो और इसको आप बैलेंस कीजिए। जिस हिसाब से, जिस अनुपात में महंगाई बढ़ रही है उस हिसाब से मज़दूरी के दर को भी आप को बढ़ाना चाहिए तभी यह योजना सफल हो पाएगी। इसमें जो आप ने अनुमान लगाया है कि दस हजार करोड़ रुपये प्रति वर्ष खर्च होगा तो इस को अमली ज़ामा पहनाने की जरूरत है।

          माननीय मंत्री जी, आप तो बुंदेलखण्ड क्षेत्र से आते हैं जहां पर बड़ी गरीबी, बड़ी गुरबत है, जहां पानी नहीं है, खेती नहीं है, किसानी नहीं है तो ऐसे हालात में आप को इस पर गंभीरता से सोचना पड़ेगा। जहां तक इस में गड़बड़ी की बात है तो इसी सदन में मैंने देखा कि चाहे प्रश्न काल हो या डिस्कशन में हमेशा देखा गया है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, राजस्थान, मध्य प्रदेश में गड़बड़ियां पायी गयी हैं। मैं चाहूंगा कि जो गरीब प्रदेश हैं, जहां पर वाकई स्थिति बहुत खराब है, ऐसे राज्यों में स्पेशल टीम भेज कर इस का परीक्षण कराएं कि कहां पर क्या गड़बड़ी हो रही है। इस गड़बड़ी को भी दूर करने के लिए आप को प्रयास करना चाहिए।

          आप इस में एक योजना ला सकते हैं। आप ने अभी इसे कृषि से जोड़ा, आप ने इसे रेलवे से भी जोड़ा। मैं तो चाहता हूं कि मज़दूरी से संबंधित जितने भी विभाग हैं, उन विभागों को इस योजना से बिल्कुल जोड़ दीजिए। दूसरी बात यह है कि उत्तर प्रदेश में मैंने बहुत पहले देखा था, आप को भी याद होगा कि जब कभी सूखा पड़ा या जब कभी इस प्रकार के अकाल की स्थिति आयी है तो हम लोगों ने काम के बदले अनाज योजना लागू किया था। उस योजना को भी आप गंभीरता से देखें। आज समय-समय पर इसी हाउस में हमेशा इस बात की चर्चा हुई कि हम सौ दिनों के रोज़गार की गारंटी देंगे। अब वह परिवार 265 दिन क्या करेगा? एक परिवार से आप एक को 100 दिनों का रोज़गार देंगे तो वह 265 दिन क्या करेगा, यह भी सोचने की जरूरत है। मैं तो चाहूंगा कि अगर रोज़गार गारंटी देना है तो आप उसे साल भर की गारंटी दीजिए। उसे आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।

          दूसरी बात, बहुत शिकायतें आयी हैं। चाहे वह तालाब की खुदाई हो या नहरों की खुदाई हो, अब तो नहरों की खुदाई भी आप ने दे दिया, तमाम पटरियों को पीडब्ल्यूडी को और सड़क विभाग जो आर.ई.एस. देखता है उन को भी आप ने दे दिया कि आप उस से काम कराएंगे। लेकिन बहुत जगहों पर देखा गया है कि लोग जेसीबी मशीन लगा कर काम करते हैं। फर्ज़ी जॉब कार्ड पर पेमेन्ट उठा लेते हैं। ये शिकायतें बराबर आयी हैं। 60-40 का जो रेशियो है, यह तो मेरे ख्याल से आप ने ऐसा बना दिया है, जैसे अर्जुन जी ने कहा कि हम लोगों ने रेलवे की योजना पारित की और किसी तरीके से प्रस्ताव बनाकर उसे कार्य रूप में परिणत करने की योजना बनायी लेकिन वह फलीभूत नहीं हो सकी। दूसरी बात यह है कि इतने क्यूबिक मीटर मिट्टी की खुदाई करनी है तब जा कर वह पूरा हो पाएगा, मेरे ख्याल से वह भी तार्किक नहीं है। उस में भी बहुत सारी भ्रांतियां हैं। मैं चाहूंगा कि जब आप जवाब दें तो इसे बड़े विस्तार से बताएं।

          जिस प्रकार से आप ने ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार की गारंटी दी है उसी प्रकार से इस योजना को शहरी क्षेत्रों में भी दें। आज भी शहरों में बहुत-से ऐसे एरियाज हैं।  इसको शहर की योजना से भी जोड़ने की आवश्यकता है, आप कहेंगे कि हम तो ग्रामीण विकास मंत्रालय देखते हैं, शहर को नहीं देखते। ये मजदूर पलायन करता है, जब उसको रोजगार नहीं मिलता तो वह शहरों की तरफ आता है और मजदूरी कहीं उसको शहर में इससे ज्यादा मिलती है। इस योजना को, चाहे शहरी विकास मंत्रालय से बैठ कर आपको बात करनी पड़े, आप ग्रामीण शहरी रोजगार गारंटी योजना इस प्रकार से बनाएं कि दोनों विभागों में तालमेल हो और लोगों को रोजगार मिल सके।

          आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है। आपने कहा कि पूरे देश में हमने मनरेगा से रोजगार देने की व्यवस्था की है। लेकिन एक-तिहाई नौकरी महिलाओं को देने के लिए आप सुनिश्चित कीजिए। इस योजना में एक-तिहाई महिलाओं को हम रोजगार दे। बहुत सी महिलाएं ऐसी हैं, जो बाहर नहीं जा सकतीं। विधवा हैं, जिनके घर पर कोई देखने वाला नहीं है। यह महत्वाकांक्षी योजना है, इसको अमलीजामा पहनाने के लिए जहां भी गड़बड़ी है, उसमें सुधार करने की आवश्यकता है। न्यूनतम वेतन गारंटी भी हो, खास कर उसको महंगाई से जोड़ कर, आवश्यक वस्तुओं के खाद्यान्न में कितनी वृद्धि हो रही है, इसे देखा जाए। महंगाई बढ़ रही है, समय-समय पर इस सदन में आवाज उठी है, तो उस हिसाब से आपको मजदूरी को भी आगे घटाने-बढ़ानें की आवश्यकता है।

          आज मैं ज्यादा कुछ न कह कर, क्योंकि मेरे ख्याल से मूलभूत सभी बातों पर यहां पर बड़े विस्तार से बातें कही गई हैं। इसको कारगर और अच्छे तरीके से लागू करने की आवश्यकता है। मैं चाहूंगा कि इसे आप गहराई से देखें। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें शिकायतें आती हैं। सतर्कता निगरानी समिति की बैठक में, क्षेत्र पंचायत समिति की बैठकों में हम लोग जाते हैं, जो ब्लॉक पर होती हैं। जिला पंचायतों की बैठकों में ब्लॉक प्रमुख खड़े होकर यह कहता है, गांव पंचायत को डायरेक्ट पैसा आता है, उसके खाते में आता है। लेकिन जो क्षेत्र पंचायत का, ब्लॉक का पैसा है, वह ब्लॉक्स में नहीं जा रहा है। जिला पंचायतों का जो पैसा मनरेगा से जाना चाहिए, वह नहीं जा पा रहा है। प्रस्ताव बना कर ब्लॉक्स के भेजा जाता है, लेकिन उस पर पैसा नहीं मिल पा रहा है। यह बड़े पैमाने पर शिकायत है। मैं चाहूंगा कि तमाम राज्यों के नाम जो मैंने लिए हैं, उनकी आप निगरानी एवं जांच करा कर देखें कि बराबर से जो धनराशि आबंटित की गई है, क्षेत्र पंचायत, ग्राम पंचायत, जिला पंचायत को वह धनराशि जा रही है या नहीं? जो प्रस्ताव बना कर भेजे जा रहे हैं, उसके अनुरूप धन निर्गत हो रहा है या नहीं? ये व्यवस्था आप सुनिश्चित करें तो मेरे ख्याल से यह रोजगार गारंटी योजना और सफल होगी।

          उपाध्यक्ष महोदय, इन्हीं बातों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। हंसराज अहीर जी को मैं पुन: धन्यवाद देना चाहूंगा, जो अमेंडमेंट बिल यहां पर लाए हैं।

प्रो. सौगत राय (दमदम): सभापति महोदय, महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी अमेंडमेंट बिल, 2010 जो हंसराज अहीर जी लाए हैं, मैं उसका समर्थन करता हूं और उनको बधाई देता हूं कि इस बिल के उद्देश्य बढ़ाने के लिए उन्होंने कोशिश की। मुझे यह भी अच्छा लगा कि यह बिल थोड़ा बाइपार्टिज़न है, क्योंकि इस बिल को यूपीए की सरकार, कांग्रेस के लोग लाए थे। बीजेपी के लोग भी चाहते हैं कि इस बिल को रखा जाए और इसका प्रसार किया जाए। मान लिया कि यह बिल का उद्देश्य अच्छा है। यह बाइपार्टिज़नशिप मुल्क के लिए अच्छा है, अच्छा काम सब लोग मिल कर करें। कई माननीय सदस्यों के सुझाव आए कि इस काम को आगे बढ़ाया जाए। महाराष्ट्र में शायद सन् 1972 से इंप्लायमेंट गारंटी स्कीम चालू थी, इसके साथ ही और भी कई प्रांतों में इंप्लायमेंट गारंटी स्कीम चालू की गयी, क्योंकि जब किसान के पास काम नहीं रहता है तो उसे मदद करने के लिए हर प्रांत में यह कोशिश चलती रही है। समस्या थी राशि की, साधन की, तो केंद्रीय सरकार के इस कानून को लाने के बाद राशि की समस्या हल हो गयी। प्रांतों में जो अलग-अलग इंप्लायमेंट गारंटी स्कीम थीं, ये एक साथ हो गयीं। इस कानून को आठ साल हुए हैं। कानून कैसे चल रहा है, इसके बारे में लोगों में एक धारणा बनी है। उसी की बेसिस पर हंसराज गंगाराम अहीर जी यह संशोधन लाए हैं।  उनका कहना है कि broaden the base of the Bill. अभी जॉब कार्ड में एक परिवार के सभी एडल्ट सदस्यों के नाम रहते हैं। उनमें से कोई भी एक आदमी काम कर सकता है। उनका कहना है कि यह रिस्ट्रिक्शन क्यों रहे?  एक परिवार में अगर पांच एडल्ट सदस्य हैं, उनमें से दो काम करें, तीन काम करें, तो उनको काम देना चाहिए।      

          दूसरी बात, वह चाहते हैं कि अभी सौ दिन के काम की बात कानून में है।  वह कह रहे हैं कि सौ दिन क्यों?  जितने वर्किंग डेज साल में होते हैं, साल में 52 रविवार होते हैं ...( व्यवधान) यह आहिस्ता-आहिस्ता होगा।  365 में से 52 दिन हटाइए, 313 दिन हो गए।  वह कहते हैं कि ऑल वर्किंग डेज काम मिलना चाहिए। वह कहते हैं कि अगर कोई भी आदमी वर्किंग डे में काम करना चाहता है, तो उसे काम मिलना चाहिए।  काम न मिले तो बिल में जो प्रावधान है कि उनको बेरोजगारी भत्ता या अनइंप्लायमेंट एलाउंस मिलना चाहिए। 

          मैं नीतिगत रूप में इसका समर्थन करता हूं, लेकिन इस पूरी स्कीम के बारे में दो-चार सवाल हैं।  यह स्कीम पॉलिटिकली एक गेम चेंजर थी।  इसने कांग्रेस को, यूपीए वन को बहुत लाभ पहुंचाया, क्योंकि एक स्कीम जो ग्रामीण क्षेत्रों में सब लोगों की जिंदगी पर एक असर रखती है, इससे कुछ सुधार भी हुआ है।  यह एक अच्छी स्कीम है। मैं समझता हूं कि यह गरीबी विरोधी स्कीम है, इसका समर्थन होना चाहिए।  इस स्कीम के चालू होने के आठ साल बाद हम क्या देखते हैं? मैं माननीय सदस्य से बात कर रहा था, मेघवाल जी बीकानेर के हैं, एक्सपीरियंस्ड आदमी हैं, अहीर जी महाराष्ट्र के हैं, चंद्रपुर जहां शेर निकलता है, एक्सपीरियंस्ड हैं, तो उनको क्या एक्सपीरियंस है?  मैं भी अपने प्रांत पश्चिम बंगाल में देखता हूं कि सौ दिन का काम आप कह रहे हैं, कोई प्रांत ऐसा नहीं है जहां एवरेज सौ दिन का काम हुआ है। हमारे बंगाल में पहले सरकार थी, उस समय एवरेज 12 दिन का काम हुआ करता था।  हमारी सरकार आने के बाद अभी 33 दिन का काम हो रहा है।  हम आशा करते हैं कि इस साल के अंत तक पचास दिन काम हो। हमें यह सोचना है कि सरकार देने के लिए तैयार है, तब भी एवरेज सौ दिन का काम क्यों नहीं होता है? इस पर मंत्री जी की भावना या मिनिस्ट्री ऑफ रूरल डेवलपमेंट की भावना पर यहां प्रकाश डालना चाहिए।

          दूसरी बात, इस स्कीम में क्या हो रहा है?  एक ग्रुप बनता है। ग्रुप को कहते हैं कि तुमको यह टास्क देते हैं कि इतने क्यूबिक फीट मिट्टी खोदना है, उठाना है, तो देखा जाता है कि कोई ग्रुप उसे पूरा नहीं कर पाता है।  सौ क्यूबिक फीट अगर स्टैंडर्ड है, तो लोग चालीस-पचास क्यूबिक फीट पूरा करते हैं, तो उसका पैसा भी वैसे ही घट जाता है।  और क्या होता है कि उसमें जो दादा किस्म का आदमी है वह जा कर कहता है कि अरे, हम काम नहीं करेंगे, हम ग्रुप में है, हमको भी भाग दे दो। कुछ लोग बिना काम किए हुए भी पैसा लेते हैं। ऑफिसर लोग ग्रामीण स्तर पर बहुत खुश होते हैं। एक गरीब आदमी को पैसा मिल गया, बिना काम किए हुए ही वह खुश हो गया, बाकी ऑफिसर कागज पर कर दिया। इस पर जो मॉनिटरिंग होती है, ये मॉनिटरिंग अभी तक अच्छा नहीं है। इसमें कौन-कौन काम हो सकता है - रास्ता बनाना, तालाब खोदना, पेड़ लगाना, ये कुछ काम लिखे हुए हैं। मैं कहता हूं कि ये लिस्ट न बना कर, it should be anything connected with rural development. It is for the local people, या पंचायत पर छोड़ दीजिए कि क्या काम वे कराते हैं। कुछ साल पहले मैं ग्रामीण क्षेत्र से एमएलए था। वहां पर एक नदी पूरा वाटर हाईसिंथ से भरा हुआ था। हम चाहते थे कि मनरेगा से वह साफ कराया जाए लेकिन डीएम साहब ने बताया कि यह हमारे लिस्ट में वाटर हाईसिंथ घटाना नहीं है।  It may be a typical problem of one constituency.  आप इस पर क्यों पाबंदी रखें हैं, मैं चाहता हूं कि काम का जो लिस्ट है यह और भी जनरलाइज फार्म में रखा जाए, स्पेसिफिक लिस्ट नहीं हो। पहले जो टारगेट था, हमारे पंश्चिम बंगाल में सरकार आने के बाद हम ने टारगेट कम कर दिया। क्योंकि शायद 96 क्यूबिक फीट था, हम उसको घटा कर 69 या 70 क्यूबिक फीट किया। क्योंकि राजस्थान के लोग हट्टा-कट्ठा होते हैं। बंगाल के लोग साइज में छोटे होते हैं। हमारे मैन्युअल काम में ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  आप तो पहलवान हैं।

प्रो. सौगत राय :  सर, मैं तो अनटिपीकल हूं। ...( व्यवधान) बंगाल के जो किसान हैं, हम लोग थोड़े अंडर नैरिश्ड है, हाइट में भी कम हैं। ये जो उत्तर और उत्तर पश्चिम भारत के लोग हैं इनका तो एरियन बल्ड ज्यादा हैं। हम लोग तो Dravidian and proto-austroloid  के मिक्स हैं। हिन्दुस्तान में लोगों की बहुत सारी वेरायटी है। सभी जगह आप एक तरह का काम नहीं दे सकते हैं। जैसे, आप यहां खूंटी से हैं, हमारे यहां जो आदिवासी भाई हैं वह हट्टा-कट्टा हैं। वे स्पोर्ट्स में आगे हैं। उसके साथ हम लोग तो बराबरी नही कर सकेंगे। इसलिए हॉकी में वहां लड़का-लड़की सब अच्छा करते हैं। इसमें थोड़ा फलैक्सिबिलिटी होनी चाहिए। इसके बारे में स्कीम में थोड़ा फलेक्सिबिलिटा लानी चाहिए। यह मेरा ख्याल है।

          सर, एक और चीज है। मनरेगा में एक सवाल होता है। मैं जिस क्षेत्र से चुन कर आया हूं, खासकर हमारा शहरी औद्योगिक क्षेत्र है। हमारे यहां काफी जूट मिल्स हैं। छोटा-छोटे कुछ गांव हैं। ये कम हैं। इंडस्ट्रियल एरिया ज्यादा है। चटकल के मजदूर बिहार और उत्तर प्रदेश के गांव से आते हैं। बंगाली लेबर, चटकल का जो लेबोरियस काम है, नही कर पाते हैं। ट्रेडिशनली चटकल के 80 प्रतिशत मजदूर बिहार और यूपी के होते हैं। चटकल के मालिक-मैनेजर ने मुलाकात होने पर बोला कि मजदूर नहीं मिल रहा है। चटकल में वेज बढ़ाना चाहिए। क्योंकि मनरेगा के कारण कोई यहां कोई आना नहीं चाहते हैं। यह देखना है कि मनरेगा लोगों को लेजी न कर दे। वे सोचते हैं कि अपने गांव में रह कर इतना मिल जाता है तो क्यों वह कोलकाता जा कर जूट मिल में हार्ड वर्क करेगा। दूसरी तरह से यह भी एक चिन्ता होती है। हमारी जो सोशियो इकोनॉमिक सिचुएशन है, मेरे ख्याल से मनरेगा में फ्रेश असैसमैंट करने की जरूरत है। यह देखना है कि हमारे गांव में इफ्रास्ट्रक्चर का बहुत काम करना बाकी है। पहले फूड फार वर्क था, उसके बाद सम्पूर्ण ग्राम समृद्धि योजना थी, फिर मनरेगा आया। इससे परमानेंट असैट बियर नहीं होता, बैलेंस होना चाहिए। अभी मेघवाल जी बता रहे थे कि 60 प्रतिशत वेज कॉस्ट, 40 प्रतिशत मेटीरियल कॉस्ट है। क्या हमने कोई असैसमैंट किया है कि मनरेगा से परमानैंट असैट कितना बना है या लोगों को ऐसे ही पैसे दिए गए। हमारा लक्ष्य यह नहीं है कि लोगों को आलसी बनाएं, हमारा लक्ष्य है कि लोगों को काम दिया जाए, पैसा दिया जाए और गांव में कुछ परमानैंट असैट बनाए जाएं। इन तीनों के लिए मौनीटरिंग की जरूरत है।

          श्री जयराम रमेश से पहले जो मंत्री थे, श्री सी.पी. जोशी, उन्होंने हर जिले में डिस्ट्रिक्ट विजिलैंस एंड मौनीटरिंग कमेटी बनाई। मैं जिस जिले से आता हूं, उसका नाम उत्तर 24 परगना है। वह बहुत बड़ा जिला है। वहां पांच एमपीज सीट हैं। मैं उस विजिलैंस एंड मौनीटरिंग कमेटी का चेयरमैन हूं। लेकिन हमें जगह-जगह जाकर काम देखने का मौका नहीं मिलता। डीएम रिपोर्ट देता है और उसके बेसिस पर हम विचार करते हैं। हम मीटिंग बुलाते हैं तो एमएलए या पंचायत समिति के सभापति आते हैं। हम मीटिंग इसलिए बुलाते हैं क्योंकि विजिलैंस एंड मौनीटरिंग कमेटी की मीटिंग नहीं होने से रुपये रिलीज नहीं किए जाते। डीएम बोलते हैं कि रुपये ब्लॉक हो रखे हैं, इसलिए आप मीटिंग कर दीजिए। मैं जाता हैं। कुछ एमएलए आते हैं, कुछ नहीं आते। पंचायत समिति के सभापति आते हैं क्योंकि उनका डायरैक्ट इंटरस्ट है कि वहां काम हो। लोगों को काम मिले, वे इसके पीछे पड़े हुए हैं। हमें देखना है कि लोगों के काम करने के दिनों को कैसे बढ़ाया जाए। जैसे मैंने कहा, पहले हमारे बंगाल में 12 दिन का कार्य था, अब 33 दिन हुए हैं, हम 50 दिन करेंगे, लेकिन 70-80 दिन क्यों नहीं हो रहे हैं? अहीर जी का कहना है कि  लोगों को और काम देना है और सारा साल देना है, यह अच्छा है। हमें असैस करना है कि अभी जो प्रोजैक्ट है, उसमें हम पूरे पैसे का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। पचास दिन के काम का मतलब आधा पैसा इस्तेमाल हुआ। पैसा रहते हुए भी पूरा काम नहीं हो रहा है। बिल के साथ जो फाइनैंशियल मेमोरंडम होता है, उन्होंने असैसमैंट किया है कि इससे 20 हजार करोड़ रुपये एक्सट्रा लगेंगे। मैं नहीं जानता कि उन्होंने किस बेसिस पर यह असैसमैंट किया, शायद अंदाज होगा। चिदम्बरम साहब ने अगले साल के बजट में मनरेगा के लिए एक पैसा नहीं बढ़ाया। 33 हजार करोड़ रुपये इस साल एलोकेट किए गए। मैं मंत्री जी से जानना चाहूंगा, किताब देखने से मिल जाएगा, कितना खर्च हुआ।...( व्यवधान) चिदम्बरम साहब पहले बोलते थे outlay is not important outcome is important, मतलब आप आंकड़ों में जितना दिखाते हैं कि इतना एलॉट किया, अगर खर्च नहीं हो तो क्या फायदा है। यह थियोरिटिकल रह जाता है। क्यों पूरा पैसा खर्च नहीं हो रहा? एक तरफ आप कहते हैं कि हम ग्रामीण गरीबी को दूर करने के लिए महात्मा गांधी के नाम से यह स्कीम लाये हैं। यह गेम चेंजर है। ये सब बातें करके, जैसे मेघवाल जी बता रहे थे कि इस स्कीम के साढ़े सात हजार करोड़  रुपये खर्च नहीं हुए। शायद इसलिए इस बार इसकी राशि   नहीं बढ़ायी गयी, लेकिन यह असेसमैंट हमें करना है। वैसे पैसे की कमी हर स्कीम के लिए रहती है। आप कह रहे हैं कि हम फूड सब्सिडी सब लोगों को देंगे। उसके लिए केवल दस हजार करोड़ रुपये हैं। उसके बारे में हम बजट मे चर्चा करेंगे। दस हजार करोड़ रुपये एक्सट्रा देकर आप कहते हैं कि फूड सब्सिडी हो जायेगी। मैं इस प्रस्ताव का समर्थन इसलिए करता हूं, क्योंकि in principle, it should be the democratic right of any person who wants to work on any day of the year to get work from the Government.  यह डेमोक्रेटिक राइट है। वह करे या न करे, दूसरी बात है।

          मेघवाल जी बीकानेर से आते हैं। वह एरिया पूरा डेजर्ट है। वहां काम करना भी मुश्किल है, क्योंकि वहां बहुत जगह केवल सैंड ही सैंड है। पेड़ लगाना, कुंए खोदना, तालाब खोदना आदि छोड़कर और कोई काम ही नहीं है। वहां लोग बहुत मुश्किल मे रहते हैं। हिन्दुस्तान का जो ह्यूज ह्यूमन रिसोर्स है, उसे कैसे इस्तेमाल करके गांव का चेहरा बदल सकते हैं, यह हमारा लक्ष्य होना चाहिए। केवल एक स्कीम ले आयें और वोट के लिए बोलें कि हमने इतना ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :   अब आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

…( व्यवधान)

प्रो. सौगत राय :   मैं समाप्त ही कह रहा हूं। सर, क्या आपके यहां मनरेगा अच्छा काम कर रहा है? ...( व्यवधान) वहां तो सारे ट्राइबल्स माओवादी बन गये हैं। जयराम जी झारखंड गये थे। वहां बहुत सारे लोग माओवादी हो गये। ...( व्यवधान) मैं प्रिंसिपली इस बिल का समर्थन करता हूं। मैं चाहता हूं कि यह डेमोक्रेटिक हो, लेकिन यह भी चाहता हूं कि आठ साल के बाद नरेगा का प्रॉपर असेसमैंट हो कि इतना असेट क्रिएट हुआ है, खासकर कितने दिन लोगों ने काम किया है? हम क्यों पूरा खर्चा नहीं कर पाते हैं और कैसे इस स्कीम को अच्छा किया जाये? यह पोलिटिकल बातें, गेम चेंजर है, वोट लाता है। गांव के गरीबों के पास पहुंचने का रास्ता है। यह सब वोट का स्लोगन है। असल में मुल्क की कैसे भलाई होती है, यह देखना चाहिए।

          श्री हंसराज गं. अहीर बहुत पिछड़े हुए इलाके चन्द्रपुर से आते हैं। उधर गढ़चिरौली में भी माओवादी लोग पहुंच गये हैं। गांव में बहुत गरीबी है। वे समझते हैं कि गरीबी की समस्या क्या है? महाराष्ट्र में दूसरी जगह अच्छा है, लेकिन विदर्भ का इलाका बहुत ही पिछड़ा हुआ है। अगर हिन्दुस्तान को बदलना चाहते हैं, तो कैसे हम इस कानून की मदद से नरेगा का यूनीवर्सलाइजेशन कर सकते हैं, यह हमें सोचना है।

          इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं।

श्री हुक्मदेव नारायण यादव (मधुबनी):  महोदय, किसानों के लिए संसद की जो स्थायी समिति है, उसने देश भर में दौरा किया। उस कमेटी के सभापति श्री बसुदेव आचार्य जी हैं। जब हम हिन्दुस्तान के आधे से ज्यादा राज्यों में दौरा किया तो सरकारी अधिकारियों के साथ साथ किसान के संगठनों को भी हम साक्ष्य के तौर पर उसमें बुलाते हैं जिसमें एक विषय रहता है कि मनरेगा से किसान को लाभ हुआ या नुकसान। हमने हिन्दुस्तान के दस-बारह प्रांतों, जो देश के मुख्य रूप से बड़े-बड़े राज्य हैं, उनमें दौरा किया। सब जगह किसानों की एक ही राय थी कि मनरेगा के कारण किसान की हालत खराब हुई है और कृषि पर इसका सबसे बुरा प्रभाव पड़ा है, क्योंकि  किसान को मजदूर नहीं मिलते।  मैं किसान होने के नाते, किसानों की भावनाओं से अपने को जोड़ते हुए, कह सकता हूं कि मनरेगा में चाहे जितने भी सुधार किए जाएं, संशोधन किए जाएं, लेकिन मनरेगा का लाभ किसानों को तभी मिलेगा, जब इसको बंद करके इसका रूपांतरण ग्रामीण विकास के लिए किया जाए। इसकी राशि गांव के विकास के लिए खर्च की जाए। लेकिन, इसका रूपांतरण होना चाहिए। शिखर से लेकर सतह तक भ्रष्टाचार का एक तंत्र खड़ा किया जाए, मुख्य रूप से इसके लिए मनरेगा बनाया गया था। जो समय आने पर भ्रष्टाचारियों का अंतर्प्रवाह के द्वारा मिलन हो जाए और भ्रष्टाचारियों का राज देश में सतह से शिखर तक बना रहे। गांव के किसान मरे या गांव उजड़े, इससे कोई मतलब नहीं। मैं भी गांव का हूँ। हम और आप पहली बार सन् 1967 में एम.एल.ए. बनकर आए थे। मैं सन् 1959-60 में ग्राम पंचायत का प्रधान बना तथा दो कार्यकाल तक प्रधान रहा, ब्लॉक का प्रधान रहा और जिला परिषद् का भी अध्यक्ष रहा। मैंने देखा था कि सन् 1962 तथा 1967 में अकाल पड़ा, उस समय श्री कर्पूरी ठाकुर उपमुख्यमंत्री थे। उस अकाल के समय में एक योजना बनी थी, जिसका नाम था- कठिन श्रम योजना (हार्ड मैनुअल लेबर स्कीम)। कठिन श्रम योजना को बाद में काम के बदले अनाज योजना से जोड़ दिया गया। उन्हें अनाज के रूप में पाँच किलो गेहूँ दिया जाता था, तो हम लोगों ने श्री कर्पूरी ठाकुर जी से आग्रह किया था कि जो पाँच किलो गेहूँ दिया जाता है, उसमें से ये एक किलो गेहूँ को दाल और सब्जी खरीदने के लिए बेच देते हैं। इसके बाद उन्होंने पाँच किलो गेहूँ के साथ दो रुपए नकद भी मज़दूरों को देने के लिए योजना में जोड़ा था। उसके साथ-साथ काम की डय़ूटी लगी हुई थी कि दस फीट बाई दस फीट, गहरा एक फीट, इतनी मिट्टी की खुदाई करेंगे, तो इसके बदले में उन्हें पाँच किलो गेहूँ और दो रुपए नकद दिए जाएंगे। लोग मेहनत-मज़दूरी करके, उतना काम करके दिखाते थे। उस समय मैंने अपने गांव में बाढ़ सुरक्षा तटबंध को बनाया था। वह बांध सन् 1967 का बनाया हुआ है। आज भी उसकी मज़बूती बनी है। लोग इसकी जांच करके देखें, तो मालूम होगा कि वे बांध इतने मज़बूत बने हुए हैं कि बाढ़ में भी ध्वस्त नहीं हुए। इसलिए मैं कहता हूं कि मनरेगा का रूपांतरण किया जाए। आज यह जिस रूप में है, उस रूप में इसका नाम है- किसान मरेगा, गांव उजड़ेगा, सामाजिक भ्रष्टाचार बढ़ेगा। ये तीन काम मनरेगा के द्वारा बहुत ज्यादा हुए हैं और किसानों का नाश हुआ है। इसलिए मुझे उन गरीबों के प्रति हमदर्दी है। मैं गरीब किसानों के लिए लड़ते रहा हूं, पसीना बहाते रहा हूं। जिस समय मैं समाजवादी आंदोलन में डॉ. लोहिया के नेतृत्व में जेल में बंद होता था, जेठ की दुपहरिया में जब दीवार और छत गर्मी से तपने लगने थे, चमड़ी झुलसने लगती थी, तो हम लोग आनन्द लेने के लिए उसमें बैठकर गाया करते थे- 

“धूप-ताप में मेहनत करते, बच्चे तड़प-तड़प कर मरते, फिर भी पेट नहीं है भरता, जीवन कटता रो-रो कर, हम चलो बसाएं नया नगर, हम चलो बसाएं नया नगर।

जहां न होवे छोट-बड़ाई, गले मिलें सब भाई-भाई, ऊँच-नीच का भेद न होवे, सुख का होवे डगर-डगर, हम चलो बसाएं नया नगर।”    कहाँ गया वह नया नगर का सपना! हमने अपनी जवानी को उस जेल में सड़ाया, हड्डी गलाया, लेकिन खुशी है कि जो आंदोलन हमने किया, उससे संसद के स्वरूप में बदलाव आया। आज पिछड़े, दलित, शोषित, अनुसूचित जाति के समाज के लोगों को सीना तानकर बैठे देखता हूँ, इस पर चलते देखता हूँ, हमारी संसद की कालीन पर रानी और राजाओं के चप्पल फिसला करते थे, उस पर आज पिछड़े, अनुसूचित जाति और जनजाति के धूल-धुसरित चप्पल से जब इस कालीन की छाती को रगड़ता हूँ, तो मैं कहता हूँ, तब मैं उसे कहता हूं कि एक जमाना था, जब शादी में भी इस पर बैठने का मौका नहीं मिलता था। आज हिन्दुस्तान का इतना रूपांतरण हुआ है कि मैं अपनी जूती से तेरी छाती को रगड़ रहा हूँ। यह परिवर्तन हिन्दुस्तान में हुआ है। आज मैं प्रार्थना करना चाहूँगा कि क्या आप इसका रूपांतरण कर सकते हैं? आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना गांव के लिए है, जिसे श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने चलाया। क्या प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में मिट्टी का काम नहीं होता? बिना मिट्टी के काम के सड़के नहीं बन सकतीं। उसमें ईंट के खड़ंज लगते हैं। यहां ईंट भट्ठे में बनता है, जहां मज़दूर को काम मिलता है। दो सौ-तीन सौ मज़दूर ईंट के भट्ठे में काम करते हैं, वे भी ग्रामीण मज़दूर होते हैं। उनको ईंट के भट्ठे पर काम करने से जितना पैसा मिलता है, उसका आधा पैसा भी उन्हें मनरेगा में नहीं मिलता। इसलिए मेरी आपसे विनम्र प्रार्थना है कि इस सारे पैसे को प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना में डायवर्ट कीजिए, गांव-गांव की सड़कों को पक्की कीजिए, गांव की सड़कें पक्की हो जाएंगी, तो हमारा विकास होगा, किसान को यातायात का लाभ मिलेगा, उनकी फसल की उचित कीमत मिलेगी, बारह महीने वे शहर जा सकेंगे, अस्पताल जा सकेंगे, स्टेशन जा सकेंगे, हमारे गांव के बच्चों को रोजगार मिलेगा।

          जिला योजना के तहत ग्रामीण सड़कों को, गली-गली में ईंट का खड़ंजा लगवाइए, पीसीसी की ढलाई कराइए जिससे गांवों में पानी न लगे, कीचड़ न हो। राजस्थान और अन्य रेगिस्तानी इलाकों की प्राकृतिक बनावट अलग है, लेकिन हम बिहार के, उत्तर बिहार के हैं, नदी के पेट में बसने वाले हैं, जून से लेकर नवंबर तक, इन छः महीनों के लिए सरकार की तरफ से वहां लिखा हुआ होता है कि यह रेनी सीजन है, इस दौरान कोई अर्थवर्क नहीं चलेगा। छः महीने उसी में चले गए, बचे छः महीने, उन छः महीनों में काम चलेगा, तो उसमें धान की कटनी चली गयी, गेहूं की खेती चली गयी, तीन महीने इसमें चले गए। बचे केवल तीन महीने। तीन महीनों में क्या काम होगा। मिट्टी खोदो, बांध बनाओ, फिर उसी मिट्टी से गढ़्ढे को भरो, फिर गढ्ढा खोदकर ऊंचा करो, फिर ऊंचे को गढ्ढा करो। इसके अलावा और कोई काम बचा नहीं है। मिट्टी कहां मिलेगी? मेरे यहां गांव में चलकर मिट्टी लाकर दिखाइए, जो लोग ट्रैक्टर के द्वारा मिट्टी की ढ़ुलाई करते हैं, तो पांच से छः रुपये प्रति मन मिट्टी की कीमत हो रही है। कौन किसान अपने खेत में मिट्टी काटने देगा? किसान खेत में मिट्टी काटने नहीं देता है, तो फर्जी कागज भर दिए जाते हैं कि मिट्टी का काम हो गया, अर्थवर्क हो गया। कहां हुआ अर्थवर्क? किसान खेत में मिट्टी काटने नहीं देता है, उसकी उर्वरा शक्ति नष्ट हो जाती है। अगर तालाब की खुदाई हो, तालाब की उड़ाही हो, आप भी ग्रामीण क्षेत्र से आए हैं, हम भी ग्रामीण क्षेत्र से आए हैं, भोला सिंह जी बैठे हैं, किसी भी तालाब की खुदाई बिना जेसीबी मशीन के कोई करा दे और भारत सरकार के योजना वाले अफसर उस जगह बैठें, वे जितना पैसा कहें, मैं अपने घर से देना चाहूंगा, बिना जेसीबी मशीन के मेरा एक एकड़ तालाब खुदवा दें। खुद नहीं सकता है क्योंकि आज उतनी दूर तक सिर पर मिट्टी ढोने वाला मजदूर नहीं मिलेगा। आज श्रम करने वाला मजदूर नहीं है, हल चलाने वाला मजदूर नहीं है, कुदाल चलाने वाला मजदूर नहीं है, कंधे पर धान का बीज उठाने वाला मजदूर नहीं है क्योंकि आज वह लड़का पढ़ा-लिखा है, मैट्रिक पास है, बीए पास है। किसान का बेटा पढ़-लिखकर भी कोई रोजगार न मिलने से खेत में मजदूर के रूप में काम करता है, लेकिन उसको इस योजना में आप लगाते हैं।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप मनरेगा के बारे में क्या सुझाव दे रहे हैं?

श्री हुक्मदेव नारायण यादव : महोदय, ग्रामीण सड़कों पर खड़ंजा लगाया जाए और पीसीसी कराया जाए। किसानों के लिए राष्ट्रीय कृषि विकास योजना है, जिससे हरित क्रंति आ रही है और अन्न का अधिक उत्पादन हो रहा है। मनरेगा में से पैसा निकालकर इन तीन योजनाओं में पैसा डाल दीजिए, गांव का रूपांतरण होगा, किसान का रूपांतरण होगा, मजदूर को मजदूरी मिलेगी, देश में धन और अनाज की वृद्धि होगी, गांव का कायाकल्प हो जाएगा और गांव से भ्रष्टाचार मिट जाएगा।

          अंतिम बात, जो पैसा पंचायतों को दिया गया है, वह पंचायत को दिया जाए, प्रखण्ड समिति को दिया जाए और जिला समिति को दिया जाए, तीनों जगह बांट दिया जाए। पंचायत स्तर की ग्रामीण योजना पंचायत समिति करे, एक प्रखण्ड से दूसरे प्रखण्ड को जोड़ने वाली सड़कों का क्रार्यान्वयन प्रखण्ड करे और एक प्रखण्ड से दूसरे प्रखण्ड, तीसरे प्रखण्ड जाने वाली लम्बी सड़कों का निर्माण जिला समिति के द्वारा कराया जाए, तो इस पैसे का सदुपयोग होगा। एक बात पर ध्यान दें। सभी माननीय सदस्य जी बोल रहे थे मैं उनकी भावनाओं का समर्थन करता हूं। अर्जुन मेघवाल जी ने बड़े प्रभावकारी ढंग से सुधार की बात की है।  ग्रामीण क्षेत्र में वर्ष 1951 में गांव में बसने वाले लोगों की जनसंख्या 82.7 प्रतिशत थी, वर्ष 2001 में 72.2 प्रतिशत हो गयी, 10.5 प्रतिशत माइनस हो गए।  इतने लोग गांव छोड़कर चले गए, लोग अपने आदमी को खोज रहे हैं। हम किसान हैं, हम खोजते हैं कि हमारे 10.5 प्रतिशत आदमी गांव से कहां चले गए, कहां विलीन हो गए। वर्ष 1951 में किसान थे  71.9 प्रतिशत, जो वर्ष 2001 में घटकर 54.6 प्रतिशत हो गए, 17.5 प्रतिशत माइनस हो गए। खेतिहर मजदूर वर्ष 1951 में 28.1 प्रतिशत थे, जो वर्ष 2001 में 45.6 प्रतिशत हो गए, 17.5 प्रतिशत प्लस हो गए। क्या यह भयावह स्थिति नहीं है? अगर उस गांव का सुधार करना चाहते हैं, तो इस पर ध्यान दीजिए। आप देखें कि साढ़े 17 प्रतिशत किसान कम हो गए और साढ़े 17 प्रतिशत खेतीहर मजदूर बढ़ गए। इस व्यवस्था ने गांवों के अंदर ऐसी योजनाएं चलाई हैं जिसकी वजह से किसान निरंतर निर्धन होकर, शोषित होकर और गरीबी में डूबता तथा टूटता चला जा रहा है। सबसे ज्यादा पिछड़ा वर्ग मर रहा है, जो खेती पर निर्भर है, जो दलित, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग हैं। इसलिए मेरी सदन से विनम्र प्रार्थना है कि इस योजना पर पुनर्विचार किया जाए। इस लूट-खसोट की योजना को बंद किया जाए और किसानोन्मुखी तथा ग्रामोन्मुखी योजना बनाई जाए। उस पर संसद में बहस कराई जाए। विशेषज्ञों के साथ-साथ गांवों के गरीब के प्रतिनिधियों को बुलाया जाए और उनके साथ बहस करके योजना बनाई जाए। सफेदपोश लोगों द्वारा, योजना आयोग में बैठे तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा योजना न बनाई जाए। जिन्होंने न गांव देखा, न किसान देखा, न खेत देखा, न खलिहान देखा, न आरी देखी, न मेढ़ देखी, न सावन-भादों का कीचड़ देखा, न ज्वार देखा, न बाजरा देखा, न धान देखा,  न गेहूं देखा। उनके द्वारा आप योजना बनाते हो और हमारे सिर पर उसे लादते हो। इसलिए इस योजना को बंद करो और ग्रामोन्मुखी, किसानोन्मुखी योजना का निर्माण करो, यही मेरी विनम्र प्रार्थना है।

   

SHRI S. SEMMALAI (SALEM): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I thank you for giving me this opportunity. 

          I welcome the Bill initiated by hon. Shri Hansraj G. Ahir in principle as it seeks to accelerate the rural economy.  The existing Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act needs, no doubt, re-orientation as it does not address the rural people’s need in full.  There are many shortcomings in the implementation of the Programme under the Act.  Many irregularities like delayed payments, short payment of wages, fudging of records, etc. are surfacing in various States.  Muster Rolls are being prepared and fraudulent entries are also made in the records as if the works were done when no actual works were executed. 

          Sir, no tangible assets are being created and what was created is not endurable. In the answer given by the hon. Minister, even though he has stated that State and District level Vigilance Monitoring Committees are entrusted with the responsibility of monitoring the Schemes, the local audit by the District level authorities is not effective because they collude with the implementing agencies.  So, I strongly feel that the flaws in the system should be removed.

          At the same time, I do not discredit the Programme in Tamil Nadu.  The State Administration is implementing the Programme effectively.  The Hindu, a  national newspaper has recently highlighted the efficient way of implementing the Programme by the Tamil Nadu Government.  The credit definitely goes to the hon. Chief Minister of Tamil Nadu, Dr. Puratchithalavi J. Jayalalithaa.  Actually the hon. Chief Minister of Tamil Nadu wants to ensure that any programme be it Central or State intended to benefit should fully reach the beneficiaries.   Recently, hon. Chief Minister of Tamil Nadu has also raised the wage component from Rs.100 to Rs.132 daily and the number of working days has also been increased from 100 to 150 days in a year.  This measure aims to mitigate the sufferings of the poor labourers in the delta region of Tamil Nadu. Their earning capacity was crippled due to drought caused by the non-release of water by Karnataka.

          Now, coming to the Bill, I have a few reservations about the provisions of the Bill.  Linking the provision of providing employment on all working days, except public holidays, has no relevance in the rural scenario.  Public holidays have nothing to do with the execution of work. In fact, the labourers have to work according to the existing provisions of the labour laws. Weekly holidays and no work on festival days are the working norms.  In fact, given the financial resources, no Government will be able to provide employment on all the working days except holidays.  To expect the work force to work on all the days is next to difficult, if not impossible.

          Another issue on which I dissent with the hon. Member relates to providing employment for all the adults in rural areas.  As I have earlier said, our resources are limited and are non-elastic.  We cannot provide employment for all adults in a family.

          No doubt this is a flagship programme and I have no hesitation in praising the programme but certain issues need to be sorted out.  Already due to rapid urbanisation and migration from rural to urban area, getting labourers to perform the work in agricultural fields proves to be a difficult task.  During seasonal agricultural operations, labourers have to be fetched from far away places.  This results in rise of agricultural cost operations.  Labour which is an important input becomes scarce.  Hence, the best modality in implementing the programme under the Act and also to address the labour shortage is to modify the programme from the existing system to the PPP mode.   Under this revised procedure, farm labourers can be hired and allowed to work in private land also during the seasonal time.  Small and marginal farmers can hire the required labourers under the programme and the only obligation for them is to pay 25 per cent of the daily wage to each labourer engaged in this field. The rest 75 per cent of the wage component will be paid by the Government under the programme. 

Similarly, big farmers can hire the required workers to work in their farms and is liable to pay 50 per cent of the wage component to each labourer engaged in his farm and the remaining 50 per cent will be paid by the Government.

I have already moved a draft Bill seeking an amendment to MGNREGA on the lines which I have just stated. 

By adopting this methodology, we can achieve twin objectives.  The first one is that the land owners will get sufficient work force to carry out agricultural operations and he will pay wages according to his ability, either 25 per cent or 50 per cent.  The second one is that the wage bill of the Government will be reduced to a great extent and at the same time it will ensure that work is provided to the needy and willing adult force.  Of course, factors like determining the number of labourers to work in a farm may be worked out.  The greatest benefit which, I feel, flows from the alternative strategy is increasing farm or agricultural productivity.  This will be a great fillip to the rural economy and to the country’s GDP.

I hope this Government will give serious consideration to my suggestions and implement it with the haste with which it needs to be implemented.

                                                                               

श्री महेन्द्रसिंह पी. चौहाण (साबरकांठा): महोदय, हमारे सम्मानीय सांसद श्री हंसराज जी जो प्रस्ताव लाए हैं कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण नियोजन गारंटी अधिनियम 2005 में संशोधन किया जाए, उसका मैं समर्थन करता हूं। वे जो संशोधन लाए हैं, वे बहुत जरूरी है कि केवल सौ दिन ही रोजगार क्यों हो। गांवों में 365 दिन रोजगारी की नहीं मिलती है, इसलिए रोजगारी के दिनों में बढ़ोतरी करनी चाहिए। परिवार में सिर्फ एक व्यक्ति को ही नहीं बल्कि परिवार के अन्य सदस्यों को भी रोजगार देना चाहिए। मिट्टी और सीमेंट के रेश्यो में परिवर्तन करके चालीस मिट्टी का और साठ सीमेंट का करना चाहिए। मनरेगा का उद्देश्य बहुत अच्छा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में अकुशल लोगों के परिवारों को सौ दिन का शारीरिक कार्य का रोजगार उपलब्ध कराना है। यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन दिखाई कुछ और ही देता है। मनरेगा आज भ्रष्टाचार का पर्याय बन गया है। अधिकारियों, पदाधिकारियों तथा दलालों की मिलीभगत से मनरेगा में करोड़ों रुपयों के घोटाले का भ्रष्टाचार हो रहा है। हम जब क्षेत्र का दौरा करते हैं तो हम देखते हैं कि हजारों महिलाएं गर्मियों के दिनों में तालाब खोदती हैं। अपने सिर पर मिट्टी की टोकरी उठा कर तालाब की ढलान चढ़ रही हैं और पसीने से तर-बतर हांफती हुईं कुपोषित महिलाओं को देख कर दया आ जाती है। आज हम यहां महिला अंतर्राष्ट्रीय दिवस मना रहे हैं, लेकिन वहां महिलाओं की बहुत दयनीय स्थिति है। जिन महिलाओं के शरीर में खून नहीं है, ऐसी महिलाएं वहां काम करती हैं। हम उस गर्मी में खड़ा भी नहीं रह सकते, लेकिन उन्हें काम करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। जब वेतन की बात आती है, तो उन्हें पर्याप्त वेतन नहीं दिया जाता है। हम पूछते हैं कि आपको कितना वेतन मिलता है तो वे कहती हैं कि पचास या साठ रुपया मिल रहा है। यह बहुत अन्याय है। यह गरीबों का शोषण हो रहा है।

          हमारे साथी जो संशोधन ले कर आए हैं, उसके अनुसार वेतन में बढ़ोतरी करनी चाहिए। अभी हुक्मदेव जी ने कहा कि तालाब खोदना कोई आसान काम नहीं है। बड़ी मशीनों के बिना तो तालाब खोदा ही नहीं जा सकता है। महिलाओं के हाथों में छाले पड़ जाते हैं, वह कैसे काम करेगी? महिलाओं को अच्छा वेतन मिले, अच्छी खुराक मिले इस बात को भी हमें देखना चाहिए। महिलाएं अपना खून पसीना बहा कर जो काम करती हैं, मिट्टी की सड़क का या तालाब का वह काम एक-दो बारिश में पूरा खराब हो जाता है। इस काम से देश को क्या फायदा है। मनरेगा के माध्यम से जो चीजें बन रही हैं, वे एक-दो बारिश में खत्म हो जाती हैं। बारिश होती है तो मिट्टी की सड़क खत्म हो जाती है। कुछ कंक्रीट काम होना चाहिए। इसके लिए टिकाऊ राष्ट्रीय सम्पत्ति का निर्माण होना चाहिए, जिससे देश को भी लाभ मिले।

          चाइना ने वैज्ञानिक संशोधनों द्वारा लोगों को काम देने की कोशिश की है। 65 सालों से हम गड्ढे खोदते आए हैं, उसमें परिवर्तन ला कर जैसे चाइना ने किया है, उसी वैज्ञानिक ढंग से छोटे उपकरण जैसे वे अपने घरों में बनाते हैं, वैसे कुछ काम करने चाहिए। हम क्यों न अम्बर चरखे का प्रयोग करें। अम्बर चरखा पहले बहुत अच्छी रोजी देता था, आज वह देखने को भी नहीं मिल रहा है। महिलाएं घर बैठ कर भी काम कर सकती हैं। जरूरी नहीं है कि वे गर्मी में मिट्टी का काम करें। अम्बर चरखे का काम करके महिलाओं को उनके घरों में रोजी मिले, ऐसा कुछ होना चाहिए। मनरेगा का साइड इफेक्ट कृषि पर भी पड़ रहा है। कृषि में जितनी जल्दी पहले मजदूर मिलते थे, आज वे मजदूर समय पर और पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहे हैं। मेरा एक सुझाव है कि मनरेगा को कृषि के साथ जोड़ा जाए। जब मजदूर खेत में काम करेगा तो आधा पैसा सरकार देगी और आधा पैसा किसान देगा, तो उससे मजदूर को ज्यादा पैसा मिलेगा और कृषि का काम ज्यादा होगा तथा फसल भी अच्छी हागे। मैंने शून्यकाल में एक प्रश्न रखा था कि जो जंगली जानवर हैं, जैसे नीलगाय वगैरह हैं जो फसल को नष्ट कर देते हैं जो रात को बड़े झुंड बनाकर खेतों में आकर फसल नष्ट कर देते हैं। तब हमारे वन और पर्यावरण मंत्री जी ने हमें जवाब दिया था कि हम मनरेगा के माध्यम से चौकीदार रखकर फसल की रक्षा करेंगे। लेकिन आज तक कुछ नहीं किया गया है।

          मैं आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि यह जो फसल नष्ट हो रही है और किसान खेती करना छोड़ रहे हैं क्योंकि तैयार फसल खेतों में है और किसान अगर रात में घंटा-दो घंटा खेतों में न जाएं तो पूरी फसल ही नष्ट हो जाती है। हमारे क्षेत्र में स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि लोग अपना खेत छोड़कर शहरों में मजदूरी करने के लिए जा रहे हैं। मनरेगा के माध्यम से जो लोग कृषि की चौकीदारी करने में लगे हुए हैं, उनको भी उसमें शामिल किया जाए और मनरेगा में जो भ्रष्टाचार हो रहा है, उस पर रोक लगाई जाए और मजदूरों को अच्छी मजदूरी मिले। वही मेरा कहना है।

   

डॉ. भोला सिंह (नवादा): उपाध्यक्ष महोदय, श्री हंसराज अहीर जी ने जो मनरेगा पर संशोधन रखने का प्रस्ताव रखा है, मैं उसके समर्थन में खड़ा हुआ हूं।

“ अश्कों ने जो पाया है, गीतों मे वह दिया है,                     फिर भी सुना है दुनिया को मुझसे कुछ गिला है।

                    जो तार से निकली है धुन, वह सबने सुनी है,                     पर जो शाक पर गुजरी है, वह किस दिल को पता है।

                    हम औरों के लिए हैं फूल, लाए हैं खुशबू,                     पर अपने को सिर्फ एक दाग मिला है।”   काफी मंथन करने के बाद, काफी चिंतन करने के बाद मनरेगा के रूप में एक अमृत कलश गांव के जीवन में उपस्थित हुआ। लेकिन इस अमृत कलश को जिसका उद्देश्य था कि ग्रामीण जीवन की जो आबादी है, काम के अभाव में जो बेकार पड़े हैं जिनकी गरीबी बढ़ती जा रही है, काम का अभाव है, इसलिए कम से कम सौ दिनों का रोजगार उनको प्राप्त हो। योजना अच्छी थी, विचार अच्छा था, नीति भी ठीक थी, नीयत को भी मैं खोटा नहीं कह सकता हूं परंतु जो योजना जमीन पर उतरी है, वह अपराधबोध से ग्रसित है।

          मैंने प्रेमचंद के ‘गोदान’ को पढ़ा है। उस गोदान में एक बुधिया गर्भवती है। डिलीवरी होने वाली है। वह चिल्ला रही है और उसका पति और उसका बेटा घूरा में आलू पका रहा है। गुरुवा उसका बाप नहीं जा रहा है कि अगर हम बुधिया को संभालने के लिए जाएंगे तो बेटा आलू खा जाएगा। बेटा अपनी मां को बचाने के लिए नहीं जा रहा है कि अगर हम जाएंगे तो हमारा बाप आलू खा जाएगा।

17.00 hrs. मैं जिस रास्ते से जाता हूं और देखता हूं कि नेशनल हाईवे के किनारे कचरे में कुत्ते भी जिंदगी की तलाश में है, गाय भी जिंदगी की तलाश में है, छोटे-छोटे नन्हें बच्चे भी जीवन की तलाश में हैं। कुत्ते रोटी के टुकड़े को खींचते हैं और वहीं इंसान का बच्चा कुत्ते के मुंह से रोटी का टुकड़ा खींचता है। आज यह दयनीय स्थिति है।

          उपाध्यक्ष महोदय, मैं नहीं जानता कि आंध्र प्रदेश की क्या हालत है। मैं नहीं जानता कि कर्नाटक किस स्थिति है। मुझे नहीं मालूम कि राजस्थान की स्थिति क्या है। मैं नहीं जानता कि पश्चिम बंगाल की स्थिति क्या है। मैं बिहार से आता हूं इसलिए मैं कह सकता हूं कि मनरेगा जीवित नहीं है, मर गया है। सच पूछिए तो मैं आज यहां श्रद्धांजलि देने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैं इस बात को इसलिए कहना चाहता हूं कि मैं नवादा लोकसभा क्षेत्र से आता हूं। मैं वहां अनुश्रमण निगरानी समिति का चेयरमैन हूं। कलक्टर उसके सचिव हैं, मैंने उस बैठक में पूछा - हमें बताइए कितने सैंकड़ों रुपए मनरेगा पर खर्च हुए हैं? योजनाएं कितनी हैं? उन योजनाओं का नाम दीजिए, हम उनकी जांच करेंगे। तीन-तीन कलक्टर बदल गए लेकिन आज तक योजनाओं की सूची सामने नहीं आई है। जब मैं कहता था तब कलक्टर जवाब देता था कि अगली बैठक में जवाब दे देंगे। जब वह बैठक होती थी तब कहा जाता था कि आधा तैयार हुआ है और आधा तैयार कर रहे हैं, दूसरी बैठक में दे देंगे। जब तीसरी बैठक में पूछते थे तब कहा जाता था कि बस, आपके सामने प्रस्तुत ही होने वाला है। लेकिन वह कभी प्रस्तुत नहीं हुआ।

        उपाध्यक्ष       महोदय, आज खेती बर्बाद हो रही है। मजदूरों की कई पीढ़ियां बुढ़ापे का शिकार हो चुकी हैं। नई पीढ़ी जिसकी उम्र 18, 20, 22 वर्ष है, उनके पास सर्टिफिकेट हैं, बीए के हैं, एमए के हैं, वे मिट्टी का काम नहीं करना चाहते हैं। किसानों के बेटे भी खेत को नहीं पहचानते हैं। मजदूरों के बेटे भी खेत पर नहीं जाते हैं। बूढा आदमी खेत में काम कर रहा है। मैं बहुत जिम्मेदारी कहना चाहता हूं कि प्रत्येक पंचायत में गिरोह की स्थापना हो गई है। ऐसा गिरोह जो पदाधिकारियों से मिलकर बैठा है। पढ़ेलिखे लड़कों का जाब कार्ड में नाम देकर पैसा लिया जाता है। वे लड़के कहीं भी नौकरी करते हों उन्हें 20, 25, 30, 40 रुपए दे दिए जाते हैं लेकिन काम नहीं हो रहा है। यह विडंबना नहीं है तो और क्या है? मैं इस बात को इसलिए कहना चाहता हूं कि डेमोक्रेसी में जनता ईश्वर है, परमेश्वर है। जब डेमोक्रेसी में जनता वोट बैंक बन जाती है, कमोडिटीज़ बन जाती है, बाजार की वस्तु बन जाती है, बाजार की वस्तु की तरह खरीद और बिक्री होने लगती है तो समाज में कोई भी योजना अच्छी हो, नीयत अच्छी हो, फलवती हो, दृष्टिकोण ठीक हो लेकिन वह कार्यान्वित नहीं हो पाती है।

          उपाध्यक्ष महोदय, ग्रामीण जीवन में हमने गांवों को देखा है, वे वीरान हैं। मजदूर भी नहीं हैं, वे बाहर पलायन कर गये हैं। उनकी बहुं, बेटियां, पत्नियां वहां हैं, लेकिन उनके पति बाहर हैं। इस स्थिति में देखा जाए तो मजदूरी कम है, उसे बढ़ाया जाए। अब तो मजदूरों की मजदूरी 150, 200 और 250 रुपये हो गई है। हरियाणा में मजदूरों की मजदूरी 250 रुपये हो गई है। लेकिन असैट्स क्या क्रिएट हो रही हैं। हमने मजदूरों की मजदूरी तो बढ़ाई, उन्हें अधिकार भी दिया, लेकिन उन्हें कितना काम करना है, घंटे तय किये, कितना उत्पादन करना है, कितना असैट्स क्रिएट करना है, यह शून्य़ नतीजा है। आज गांवों में कौवे भी नहीं रहते। कौंवे भी शहर चले गये हैं। इंसान शहर चले गये, लोग शहर चले गये, कौवे भी शहर चले गये और वे रात को कांव-कांव करते हैं। गांवों में अब कौवे भी नहीं रहते। क्योंकि उन्हें वहां आहार भी नहीं मिलता है।

उपाध्यक्ष महोदय : आपका सुझाव क्या है?

डॉ. भोला सिंह : उपाध्यक्ष महोदय, मेरे पास सुझाव है। आप तो उसी मिट्टी की काया से आये हैं। आपने उसी पीड़ा को भोगा है। सुझाव यही है कि मनरेगा को आपने क्या बनाया है, लोग आयेंगे, दरखास्त देंगे कि हमें काम चाहिए तो 15 दिन में हम काम देंगे और नहीं देंगे तो 15 दिन का बेकारी का भत्ता देंगे। शायद ही किसी भकुआ को बेकारी का भत्ता मिला हो। वह 15 दिन में दरखास्त देगा, मजदूरों को आपने देखा है, जिसके बदन पर कपड़े नहीं हैं, फटे-चीथड़े कपड़े हैं, वे पदाधिकारी के यहां दरखास्त देंगे। दरखास्त लिखवाने में भी उसे पैसा देना पड़ता है, दरखास्त को स्वीकृत कराने में भी उसे पैसा देना पड़ता है। आपने मुखिया पर विश्वास नहीं किया। मैं यह नहीं कहता हूं कि आपने विश्वास क्यों नहीं किया। आपने पोस्ट आफिस और बैंक को जिम्मेदारी दे दी। क्या वे हंस हैं, क्या बैंक के लोग धर्मराज हैं, क्या पोस्ट ऑफिस के लोग नक्षत्र लोक से आये हैं, क्या वे ईमानदारी के प्रतीक हैं? क्या तमाशा है, समस्या का समाधान करने के बदले आप समस्या से भागते रहे हैं, समस्या को छोड़ते रहे हैं। इसलिए यह मनरेगा जिसका परीक्षण हम कर रहे हैं और जिसके बारे में पीड़ा से कह रहे हैं, तू बड़ा अच्छा था, तू बड़ा सुंदर था, तू गांव की गरीबी को दूर करने के लिए आया था। तुझे लोगों ने मार दिया, लोभ ने मार दिया, भ्रष्टाचार ने मार दिया। मैं तुझे श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। यह आज जो मैं सदन में कह रहा हूं, बड़ी पीड़ा से कह रहा हूं। इसके सुधार के उपाय हैं और सुधार के उपाय ये हैं कि मनरेगा को राज्य की केन्द्र की योजनाओं के साथ जोड़ना होगा। जो मिट्टी के काम हैं, उन कामों के साथ, जैसे प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क सम्पर्क योजना है, जैसे जल संसाधन विभाग की योजनाएं हैं, इनके साथ आपको इसे जोड़ना होगा और कितने पैसे खर्च होंगे, कितना काम होगा, इसकी गारंटी करनी पड़ेगी। जब तक यह नहीं होगा, तब तक हम इस बात की गारंटी नहीं कर सकते हैं।

          उपाध्यक्ष महोदय, महात्मा गांधी ने कहा था कि जब तुम किसी योजना को तैयार करो तो उस आदमी का ख्याल करो, उस आदमी की चिंता करो, उसका चिंतन करो, जिसका पेट पीठ से सटा हुआ है। जिसके बदन पर कपड़े फटे-चिटे हुए हैं। देखो कि तुम्हारी इस योजना में उसके आँसुओं को पोंछने के उपाय हैं या नहीं हैं। देखो कि तुम्हारी उस योजना में उसके लिए कुछ राशि है या नहीं है। अगर नहीं है तो तुम इस पर विचार करो।

          उपाध्यक्ष महोदय, आपकी घंटी हमारे मन के अंदर चेतना पैदा करती है। मैं जानता हूँ कि आपको यह बात अच्छी नहीं लगती है। लेकिन मैं एक बात कह कर अपनी बात को समाप्त करना चाहता हूँ। मैं यह कहना चाहता हूँ कि आज हम आपके सामने इस बात को रख रहे हैं कि एक नया वर्ग पैदा हो रहा है। एक नया मध्यम वर्ग पैदा हो रहा है। नया मध्यम वर्ग, जिसके पास पैसे हैं, वह पुराने मध्यम वर्ग को पीछे धकेल रहा है। जो मध्यम वर्ग है, उसके अंदर मज़दूर भी है और मालिक भी है। वह कुछ काम अपने हाथ से करता है और कुछ काम वह मज़दूरों से करवाता है। उसमें मालिक और मज़दूर दोनों का समन्वय है। आपने उस किसान के मज़दूर और किसान का जो मालिक है, उसके बारे में कोई ख्याल नहीं किया है। अगर आपने मनरेगा को किसानों की खेती के साथ, मनरेगा को किसानों की कृषि के साथ, मनरेगा को ग्रामीण जीवन के साथ नहीं जोड़ा तो मैं बड़ी जिम्मेवारी से कहना चाहता हूँ कि आज ग्रामीण जीवन में और समाज के जीवन में जो बलात्कार हो रहे हैं वे नहीं रूकेंगे। आज शराब की बोतलें जगह-जगह दिखाई पड़ती हैं। ग्रामीण जीवन में 80 प्रतिशत लोग शराब के नशे में चूर हो रहे हैं। संपूर्ण ग्रामीण जीवन शराब के नशे में मस्त हो गया है। ये नाजायज़ पैसे, अकारण पैसे हमारे सामाजिक जीवन को ध्वस्त कर रहे हैं।

          उपाध्यक्ष महोदय, मनरेगा के संबंध में मैं आपके द्वारा केंद्र सरकार से आग्रह करना चाहता हूँ कि तमाम राजनैतिक पार्टियों के नेताओं को बुला कर इसके संबंध में समीक्षा करें। समीक्षा के बाद, इसका जो तत्व उपस्थित हो, उसके आधार पर उसको पुनर्जीवित करें, नहीं तो मनरेगा मर चुका है। हम सभी उसके लिए पैसा बढ़ाते जाएं और उसको देखने वाला कोई नहीं है। क्या गरीबी समाप्त हो गई कि पैसे खर्च नहीं हो रहे हैं।

          उपाध्यक्ष महोदय, मैं अपनी बात को समाप्त करते हुए आपके माध्यम से इस बात का आग्रह करना चाहता हूँ कि मनरेगा को सामाजिक जीवन के साथ, ग्रामीण जीवन के साथ और किसानों के साथ जोड़ कर और भारत की जो ग्रामीण पद्धति है, भारत का जो ग्रामीण जीवन है, उसके साथ इसको लगा कर इसे पुनर्जीवित किया जाए ताकि यह अमृत का कलश सभी के हित में हो, सभी की जिंदगियों में सुधार लाए। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात को समाप्त करता हूँ। 

 

MR. DEPUTY-SPEAKER: Hon. Members, three more members are there to speak on this Bill.  If the House agrees, we can extend the time for this Bill by half-an-hour.

SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.

MR. DEPUTY-SPEAKER: I extend the time for this Bill by half-an-hour.

          Shri Ramen Deka.

 

SHRI RAMEN DEKA (MANGALDOI): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I rise here to support Ahir ji’s Bill.  MGNREGA needs wide amendment and there is wide scope of amendment.  My esteemed colleague, Prof. Saugata Roy said that this was a game changer.  I do appeal to the Government, let it be a changer of the livelihood of the poor. It should not be a game changer for election. I come from a very backward State of Assam.  It is a bottleneck in the communication system.  You all know that.  We have floods regularly. Some people say that it is a festival in Assam because in regular intervals we have flood. The life span of embankments in Assam is over.  It needs repairing.  As a Chairman of the District Vigilance Committee, I urge the District Committee to give the work of repairing of embankment to MGNREGA.  But they refuse because that is not in the scope of MGNREGA. If it is in the scope of MGNREGA then we can repair many embankments.  It will benefit the farmers because floods inundate the ploughing fields due to embankments.

Further, afforestation was under the scope of MGNREGA.  But afforestation was not covered. Recently, the forest cover diminished. Forest cover is diminishing and there is alarming global warming.  We talk in seminars and we talk in meetings that global warming is going on at an alarming rate.  But we cannot give the money of MGNREGA for afforestation.  I am surprised to notice that in Uttar Pradesh only 4 per cent forest cover is there. The largest population of the country is having only 4 per cent forest cover. You just think of it. So, MGNREGA money can be given for afforestation but it was not done.

          The hon. Minister Jairam Ramesh ji, Minister of Rural Development said money is no problem.  It is all right that money is no problem but what about the implementation? In my district Nalbari, a CBI investigation is going on regarding MGNREGA.  Another CBI investigation is going on in Golaghat District. Why?  There is corruption.  We must see the implementation part.  A National Level Monitor goes there but nothing happens. I raised this matter many a times under Rule 377.  From here an NLM goes but they do not do anything. I wrote a letter to the hon. Minister in this regard.  When Assam was inundated by flood – the world knew that there was flood – but an NLM went to the Nalbari District and he submitted a Report.  Roads are inundated, how did he investigate the alleged corruption?  He was sitting in a hotel or a circuit house and he prepared the report.  Then the hon. Minister sent another person there. These things are going on.  You must look into the implementation part. 

          Our Brahmaputra River bed is coming up.  MGNREGA can do something there.  People can work in the river basin so that they can consume more water and flood will not come.  These are the things including village roads to be done under MGNREGA.  As hon. Bhola Singh ji said, that there is corruption there and there is corruption in Panchayats.  It is a fact.  They will choose a road in ploughing fields but they will not choose a route in village. They will not choose a road which connects schools.  They will not choose the road connecting other villages. They will choose a road where people do not go.  In my constituency, in Rangia, one road has been constructed under MGNREGA by spending Rs. 26 lakh and nobody is going through that road.  What is the use of that road?  There is asset building.  How much assets we have created under MGNREGA?  It is worth Rs. 33,000 crore.  Last year, we spent Rs. 28,000 crore.  Just analyse how much assets we have created?  One more amendment is required.  

          Sir, we come from Assam.  Our hon. Member and ex-Minister, Shri Handique is sitting here. He will be very well conversant with this fact that our roads are connecting villages and there is no land.  So, tractor must be used there.  You are not allowing them to use the tractor to carry things.  By head load we cannot prepare roads. 

          So, these are the things to be rectified.  I do support the Bill moved by Shri Hansraj Gangaram Ahir and this amendment should be done with wider scope covering wider network of villages.

                                                                                   

उपाध्यक्ष महोदय : डॉ. किरीट प्रेमजीभाई सोलंकी। उपस्थित नहीं।

          श्री वीरेन्द्र कश्यप।

श्री वीरेन्द्र कश्यप (शिमला):  उपाध्यक्ष महोदय, श्री हंसराज अहीर जी द्वारा महात्मा गांधी ग्रामीण नियोजन गारंटी 2005 में संशोधन पर यहाँ जो विधेयक पेश किया गया है, उस बारे में कुछ बातें मैं भी यहाँ कहना चाहता हूँ। इसमें कुछ संशोधनों की आवश्यकता है।

          महोदय, मैं हिमाचल प्रदेश से आता हूँ जो एक पहाड़ी राज्य है। पहाड़ी राज्य में मनरेगा का जो कार्य है, उसमें मैं देखता हूँ और मैं हिमाचल प्रदेश की स्पैसिफिक बात कर रहा हूँ। वहाँ पर आज मज़दूर मिलते नहीं हैं और मज़दूर न मिलने की वजह से इस योजना को गाँवों में ज़बर्दस्ती गाँव में प्रधान लोग जिस तरह से उसको यूटिलाइज़ करना चाहते हैं, उस पैसे को लगाना चाहते हैं, वहाँ पर गलत तरीके से जॉब कार्ड्ज़ बन रहे हैं।

          दूसरी बात मैं कहना चाहता हूँ कि आज ग्रामीण क्षेत्र की दशा इससे सुधर नहीं रही है खासकर जो हमारे हिली क्षेत्र हैं, उसमें कुछ बातें जोड़ने की ज़रूरत है। मंत्री जी यहाँ बैठे हैं। मैं उनको ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि पिछले दिनों जब जयराम रमेश जी फॉरैस्ट एंड एनवायर्नमैंट मिनिस्टर थे और डॉ.सी.पी.जोशी जी रूरल डैवलपमैंट मिनिस्टर थे तो मैंने दो बातें यहाँ हाउस में भी कई बार उठाईं। ज़ीरो आवर के माध्यम से भी और 377 के माध्यम से भी उठाईं। मैंने मंत्री जी को पत्र भी लिखा था। उसमें मैंने कहा था कि आप हिमाचल प्रदेश और जो हिली स्टेट्स हैं, और दूसरी जगह भी मैं कहना चाहता हूँ कि एक सबसे बड़ी दिक्कत आ गई जिसका रैफरैन्स मेरे सहयोगी डॉ. महेन्द्र सिंह जी कर रहे थे कि आज गाँवों में वहाँ के पशु खेती उजाड़ रहे हैं, जंगली जानवर खेती उजाड़ रहे हैं। मैं हिमाचल प्रदेश की बात आपके ध्यान में लाऊँ कि वहाँ इतनी संख्या में बंदर हो गए हैं कि वे खेती उजाड़ देते हैं। रात में सूअर, हाथी और नीलगाय खेती उजाड़ देते हैं। मैं मंत्री जी के ध्यान में यह बात लाया था और प्रदेश की सरकार ने एक रिजॉल्यूशन केन्द्र की सरकार को भेजा था कि मनरेगा के अंतर्गत आप एक आइटम ला दें कि इसके लिए रखवालों की नियुक्ति की जाए ताकि वहाँ के लोगों को रोज़गार मिल जाए और पहाड़ में हमारी जो खेती है, वह इन पशुओं से और जंगली जानवरों से बच सके। हमारे यहाँ हिमाचल प्रदेश में वैसे भी खेती बहुत कम है। चार-पाँच बीघा से ज्यादा हमारे पास ज़मीनें नहीं हैं और भाइयों में बँटवारा हो गया तो दो-ढाई बीघा ज़मीनें रह जाती हैं। जो लोग खेतों में फसलें लगाते हैं, आलू लगाते हैं, टमाटर लगाते हैं, सब्ज़ियाँ लगाते हैं, बंदर 15 मिनट में आकर उसको उजाड़ देते हैं। कहीं रात को सूअर आकर खेती उजाड़ देते हैं।

उपाध्यक्ष महोदय : आपका सुझाव क्या है?

श्री वीरेन्द्र कश्यप : हमारा सुझाव यह है कि आप इसमें रखवाले नियुक्त करवाएँ ताकि वह पैसा ठीक जगह पर लगे और वहाँ के लोगों को रोज़गार भी मिल जाए और वहाँ की खेती भी बच जाए। इसका एक दुष्परिणाम यह हो रहा है कि वहाँ ज़मीनों के रेट गई गुना बढ़ गए हैं। जो ज़मीन पाँच हज़ार रुपये बीघा थी, वह पाँच लाख रुपये बीघा हो गई है। लोग उन ज़मीनों को बेच रहे हैं और बेचने के बाद भूमिहीन होते जा रहे हैं। दूसरा, हिमाचल प्रदेश के जंगलों के बारे में मेरा एक सुझाव था। अभी हमारे असम के सहयोगी रमेन जी भी कह रहे थे।

           मैं कहना चाहता हूं कि वहां पर फायर वॉचर अप्रैल से लेकर जून तक रख दिए जाएं तो जहां-जहां जंगल में आग लगती है, क्योंकि वह चीड़ के जंगल हैं। मैडम चन्द्रेश कुमारी जी यहां बैठी हैं, इनको ज्यादा पता है, तीन महीनों में आग लगती है और अरबों-खरबों के जंगल जल जाते हैं, उसके लिए फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के पास कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है, जिससे वहां के जंगल बच सकें। इसलिए मेरा सुझाव है सरकार के लिए कि यदि वहां फायर वॉचर रख दिए जाएंगे तो अवश्य ही वहां के लोगों को रोजगार भी मिलेगा और हमारे अरबों-खरबों रुपये के जंगल, जिनको हम बच्चों की तरह पालते हैं, वह 10-12 साल के होने के बाद वह आग में नष्ट हो रहे हैं। इससे बड़ी बात यह है कि वहां का फ्लोरा और फोना टोटली खत्म हो रहा है। उसका भी हम बचाव कर सकते हैं। मैं यही कहना चाहता हूं कि मनरेगा में यह जो सौ दिन की बात कह रहे हैं, सौ दिन से काम चलने वाला नहीं है। कई जगह पर कहा जा रहा है, इसमें कोई दो राय नहीं है कि जब यहां मनरेगा पर कोई प्रश्न उठता है तो सारा हाउस और सभी सांसद कहते हैं कि भ्रष्टाचार हो रहा है। इसमें हो सकता है कि बहुत से राज्यों में भ्रष्टाचार हो रहा होगा। मैं यह कह सकता हूं कि पिछले पांच वर्षों में हिमाचल प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार रही है, प्रोफेसर धूमल की सरकार रही है, जिसका लाभ वहां के लोगों को मिला है। भ्रष्टचार वहीं पर होगा, जहां के मुखिया के द्वारा उसकी इम्पलीमेंटेशन ठीक ढंग से नहीं हो रही होगी। मैं यह कह सकता हूं कि भ्रष्टचार के अड्डे तो यह बन गए होंगे, परंतु इस पर यदि प्रोपर मॉनीटरिंग अगर होगी तो यह लोगों के लिए लाभदायक हो सकता है। यह मैं आपको कहना चाहता हूं। इसलिए इसे सौ दिन की जगह दो सौ दिन किया जाए ताकि 365 दिन में कम से कम आधा साल अगर आप लोगों को रोज़ी-रोटी देना चाहते हैं तो उसके माध्यम से वह मिल सकती है।

          इसी तरह से पहाड़ों में जब आपने इसकी शुरूआत की थी तो कहा था कि 60-40 की रेश्यो होगी। 60 प्रतिशत लैबर कम्पोनेंट है और 40 प्रतिशत मैटीरियल कम्पोनेंट है। परंतु पहाड़ी राज्यों के बारे में मैं कहना चाहता हूं कि हमने वहां छोटे-छोटे रास्ते बनाए, क्योंकि हमारे पास सड़कें नहीं हैं। इसलिए हमने उन रास्तों को सीमेंटिड बनाने का प्रयास किया था और गांव-गांव को पक्के रास्ते के साथ जोड़ने का प्रयास किया था। उसमें पैसा ज्यादा लगता है। इसलिए मंत्री महोदय आप इसकी उलटी रेश्यो कर दें, 60 प्रतिशत मैटीरियल और 40 प्रतिशत लैबर कम्पोनेंट या पचास-पचास प्रतिशत करेंगे तो इससे हमारे पहाड़ी राज्यों को बड़ा लाभ मिल सकेगा।

          इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे बोलने का समय दिया। मुझे पूर्ण विश्वास है कि जंगली जानवरों से हमारी फसलें बच जाएं, उसके लिए रखवाले इसके अंतर्गत लाएंगे और साथ ही साथ हमारे जंगल बच सकें, उसके लिए फायर वॉचर को केवल तीन महीने के लिए एड करेंगे तो मैं समझता हूं कि यह बड़ा काम मनरेगा के अंतर्गत होगा। इसी के साथ श्री अहीर जी जो यह रेज़ोल्यूशन लाए हैं, मैं उसका समर्थन करते हुए अपना स्थान ग्रहण करता हूं।

 

श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि कांग्रेस और यूपीए के द्वारा एक अत्यन्त महत्वकांक्षी योजना जो देश के खेत-खलिहान, चौपाल में गरीब नौजवान जो वहां किसी रोजगार के अभाव में देश के मुख्तलिफ़ हिस्सों में पलायन करते थे, हम तो उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, उस क्षेत्र की नुमाइंदगी करते हैं, जिस इलाके में न आज कोई इंडस्ट्री है और हमारा जो परम्परागत उद्योग था शुगर केन इंडस्ट्री, वह भी एक-एक करके चाहे उत्तर प्रदेश की शुगर फेडरेशन की इंडस्ट्री हो, चाहे कार्पोरेशन की इंडस्ट्री हो, आज एक-एक करके सिक हो गयी हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश जो सबसे बड़ा मैनचेस्टर कहलाता था, जो कि चीनी का सबसे बड़ा उत्पादक था, आज वह सबसे पीछे हो रहा है। कहीं न कहीं इस महत्वकांक्षी योजना ने देश के हर गांव में लोगों की मांग के सापेक्ष जो भी 18 साल से ऊपर हों, उनको रोज़गार देने की गारण्टी दी। इसको केवल एक गारण्टी योजना के रूप में ही नहीं बनाया, कांग्रेस और यूपीए सरकार को मैं बधाई दूंगा कि इसको कानून बनाकर देश की जनता को अधिकार दिया है कि आपको रोज़गार मिलेय। अभी तक यह मांग होती थी कि हर हाथ को काम मिले लेकिन पहली बार हिन्दुस्तान में किसी सरकार ने इस पर कानून बनाने का काम किया। लोगों को रोज़गार देने की बात उठती थी कि इसको फंडामेंटल राइट की तरह ट्रीट किया जाए, काम नहीं मिले तो बेरोज़गारी भत्ता दिया जाए। मैं किसी का नाम नहीं लूंगा पर यह बात सारी मुख्तलिफ सियासी पार्टियां अपने मैनिफैस्टो में रखती थीं लेकिन वह अतीत का दस्तावेज़ बन जाता था, वह केवल भविष्य के गर्त्त में रह जाता था। अगर वास्तविकता के धरातल पर उसे उतारने का काम किया कि किसी भी गांव का नौजवान, नवयुवती अगर रोज़गार मागेंगे तो उस देश की कल्याणकारी सरकारों की जवाबदेही होगी उस नौजवान को, उस युवती को रोज़गार देने की अन्यथा उसे बेरोज़गारी भत्ता दिया जाएगा। इसे अगर किसी ने मूर्त्त रूप से कानून बनाया है तो कांग्रेस-यूपीए की सरकार ने बनाया है। इस के लिए मैं डॉ. मनमोहन सिंह और श्रीमती सोनिया गांधी को बधाई दूंगा।

          अभी मेरे साथी कश्यप जी बड़ी गंभीरता से बहुत अच्छी बात कह रहे थे कि यह जो सौ दिनों का काम है यह नहीं चलने वाला। इसे सौ दिनों के जगह पर 365 दिन किया जाए। इसी तरह से भ्रष्टाचार की बात हमारे माननीय हुक्मदेव नारायण यादव जी ने भी कही। मैं कहता हूं कि वर्ष 2005 में इसका एक्ट बना कि हिन्दुस्तान के गांवों में मनरेगा लागू किया जाए। 5 फरवरी, 2006 से यह मनरेगा देश के तमाम गांवों में कन्याकुमारी से कश्मीर तक लागू है।

          उपाध्यक्ष महोदय, मैं आप के माध्यम से पूरे सदन का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं कि आज तक 146 लाख वर्क टेक-अप हुआ है और उस 146 लाख में से केवल 60औ काम पूरा हुआ है जिसमें 20औ रूरल कनेक्टिविटी बनी, 25औ काम में गांवों में जैसे कुंओं का, तालाब का निर्माण हुआ। आज कितनी कठिनाई है कि जब सूखा पड़ता है तो गांव में तालाब सूख जाते हैं। उस बुंदेलखण्ड की कल्पना कीजिए जहां से माननीय मंत्री जी आते हैं। वहां कई-कई वर्ष सूखा पड़ता है। लोग भुखमरी के कगार पर आ कर आत्महत्या तक कर लेते हैं। मैं विस्तार में नहीं जाना चाहता हूं। चौदह प्रतिशत काम इंडीविडुअल बेनेफिशियरीज को मिला।

          माननीय कश्यप जी, इस साल सरकार ने 39,000 करोड़ रुपये बजट का परिव्यय रखा। पिछली बार 41,000 करोड़ रुपये था। उसके पिछले साल 40,000 करोड़ रुपये का परिव्यय था लेकिन खर्च कितना किया? आज तक राज्यों में औसतन 42 दिनों से ज्यादा खर्च नहीं हुआ। वे 42 दिनों से ज्यादा का काम नहीं जेनरेट कर पाए। यह किस की जिम्मेदारी है? अगर हम सौ दिनों के काम की गारंटी दे रहे हैं तो आज मनरेगा में यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि लोगों को कम से कम सौ दिनों का काम मिले। अब तक केन्द्र सरकार द्वारा जो 2,18,000 करोड़ रुपये राज्यों को दिया गया है, उस 2,18,000 करोड़ रुपये का उपयोग कितना हुआ? इसका उपयोग 70औ हुआ और वह भी 70औ ऐसे नहीं हुआ। जब उस में मैटेरियल कॉम्पोनेंट के नाम पर खरीदारी हो गयी, स्टेशनरी की खरीदारी हो गयी, अन्य चीजें जैसे आलमारी की खरीदारी हो गयी, कुर्सी-मेज की खरीदारी हो गयी तो मान्यवर अब इसे भ्रष्टाचार कहा जा रहा है। यही बात तो हम कहते हैं कि भ्रष्टाचार बिल्कुल हो रहा है लेकिन भ्रष्टाचार अगर गांवों में हो रहा है तो उसे रोकने की जिम्मेदारी बीडीओ की है, सीडीओ की है, अधिकतम डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट की है। हम पैसा भी दे रहे हैं और हमारे ही ऊपर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया जाता है। हम तो कहते हैं कि अगर आज इस महत्वाकांक्षी योजना को पारदर्शी बनाना है तो राज्य सरकारों को इच्छाशक्ति जाग्रत करनी होगी कि वह राज्य सरकार उस भ्रष्टाचार को रोके। इसमें संलिप्तता है। यह नेक्सस बन गया है। आज जॉब कार्ड अपने पास रख लिया जाता है।

उपाध्यक्ष महोदय : आपका सुझाव क्या है?

श्री जगदम्बिका पाल : महोदय, मेरा सुझाव तो बहुत अच्छा है कि कोई भी राज्य सीबीआई की जांच करा दे। जयराम रमेश जी ने बयान दिया कि हम ने राज्यों को सीबीआई जांच के लिए लिखा कि भ्रष्टाचार है।

          मान्यवर, आज एक-एक तालाब को बनाने में एक-एक, डेढ़-डेढ़ करोड़ रुपये लग गए। नेता, प्रतिपक्ष के विदिशा में मनरेगा के अंतर्गत छः-छः लाख के टॉयलेट बन रहे हैं। अगर हम इस सदन में ही बैठ कर इस बात को गंभीरता से नहीं सोचेंगे कि अगर आज सैनिटेशन डिपार्टमेंट का मानक क्या है? पहले इंडीविडुअल बेनेफिशियरी को देने के लिए यह 4500 था, अब यह साढ़े नौ हजार हो गया।

श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन (भागलपुर): ये गलत इल्ज़ाम लगा रहे हैं।

श्री जगदम्बिका पाल : महोदय, मैं जो बात कहता हूं वह बड़ी जिम्मेदारी के साथ कहता हूं।

उपाध्यक्ष महोदय : संक्षेप में बोलिए।

श्री जगदम्बिका पाल : मान्यवर, मैं बहुत संक्षेप में कहूंगा। ...( व्यवधान) शाहनवाज़ साहब बहुत विद्वान हैं, बहुत काबिल हैं। इस में कोई दो राय नहीं है। इसलिए उनको पार्टी ने प्रवक्ता बना रखा है।

उपाध्यक्ष महोदय : यह विषय मनरेगा का नहीं है।

श्री जगदम्बिका पाल : महोदय, ये जान रहे हैं कि जगदम्बिका पाल जो कह रहे हैं, वे सच्चाई कह रहे हैं। अब कहीं न कहीं उन्हें प्रतिवाद करना है और उन्हें अपने दायित्व का निर्वहन करना है। लेकिन, वे मुस्कुरा इसलिए रहे हैं कि वे दिल से समझ रहे हैं कि जगदम्बिका पाल सच कह रहे हैं।

उपाध्यक्ष महोदय : आप मनरेगा के बारे में बोलिए।

श्री जगदम्बिका पाल : महोदय, मैं एक सुझाव देना चाहता हूं।         उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से बड़ी गंभीरता से जानना चाहता हूं कि मंत्री जी ऐसा कोई मेकेनिज़्म तैयार करेंगे कि आप केवल यह कहेंगे कि हमने मनरेगा में सभी राज्यों को रोजगार की गारंटी देने के लिए कानून बना करके आपकी आवश्यकताओं के अनुसार जिस दिन सोशल ऑडिट कर लेंगे, यूसी सर्टिफिकेट भेज देंगे, उस दिन हम आपकी फिर से डिमांड ड्रिवन स्कीम है, अगर डिमांड ड्रिवन स्कीम है, उस स्कीम में इसको इम्प्लीमेंट करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है और राज्य सरकार अगर इम्प्लीमेंटेशन में, हुक्म नारायण जी कहें कि बिहार का कलेक्टर नहीं सुन रहा है,...( व्यवधान) मैं बहुत गंभीर बात कह रहा हूं, मैं समझता हूं कि इस पर पूरा सदन सहमत होगा। यह कोई पार्टी का सवाल नहीं है, मैं किसी राज्य की आलोचना करने के लिए नहीं खड़ा हुआ हूं। इसको कौन सा मेकेनिज़्म हम बनाएंगे। हम संसद सदस्य सोचें कि इसका क्या रास्ता होगा। जिस तरीके से आज मनरेगा के नाम पर इरीगेशन डिपार्टमेंट को दे दिया जाएगा, फॉरेस्ट को दे दिया जाएगा। जून में जहां मानसून नहीं आता, पहली जुलाई से फॉरेस्ट का मानसून सत्र शुरू होता है। वन महोत्सव में वन मंत्री रहा हूं, एक से सात जुलाई होता है और करोड़ो रुपए फॉरेस्ट डिपार्टमेंट मनरेगा का फॉरेस्टेशन में खर्च कर देता है। आज इसीलिए 14 परसैंट कुल फॉरेस्ट है, रिमोट सेंसिंग से 21 परसैंट कह दीजिए। आज इकोलोजिकल बैलेंस भी बिगड़ रहा है। ये मेकेनिज़्म, कि आज मनरेगा हम रोजगार की गारंटी के लिए पैसा दे रहे हैं। किसी का दबाव पड़ गया।...( व्यवधान) बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी।...( व्यवधान) जिला परिषद अध्यक्ष कलेक्टर से दबाब डाल करके डेढ़-डेढ़ करोड़ रुपए उन्होंने इरीगेशन को दिला दिया। तीन बार कम से कम पांच करोड़ रुपया दिलाया। क्या उसकी सीबीआई जांच होगी? मैं शैलेन्द्र जी से कहता हूं कि उसकी जांच कराइए, दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा। ये जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा है। हम रोजगार देने की गारंटी देते हैं कि हिन्दुस्तान के एक-एक नौजवान को रोजगार मिलेगा। ...( व्यवधान) धनंजय जी, मैं सत्य कह रहा हूं। ...( व्यवधान) नाम नहीं लेना चाहिए, जिसने यह काम किया। लेकिन मैं कह रहा हूं,...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय: आप सुझाव दीजिए।

श्री जगदम्बिका पाल : उपाध्यक्ष महोदय, आप झारखंड की स्थिति को जानते हैं कि कंवर्जन के नाम पर जो मनरेगा का पैसा जा रहा है, वह सीधे मजदूर को भी नहीं मिल रहा। जेसीबी मशीन से राज्यों में काम हो रहा है। आज ठेकेदार काम कर रहे हैं, शैलेन्द्र जी, इसको कैसे रोका जाए, यह चिन्ता का विषय है। हम लोगों को जनता चुन कर भेजती है, हमारी जनता के प्रति जवाबदेही है। क्या आप कोई मेकेनिज़्म बनाएंगे? राज्य सरकार को हमने पैसा दे दिया, ये राज्य सरकार का दायित्व हो गया। आपसे हम कहते हैं तो आप कहते हैं कि यूसीओ भेजें।...( व्यवधान) सोशल ऑडिट कराएं। ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय: उसको ठीक करने के लिए क्या होना चाहिए, यह आप एक लाइन में बता दीजिए।

श्री जगदम्बिका पाल : मैं समझता हूं, आपने कहा कि जो चीजें हो रही हैं, उससे हम सब सहमत हैं। आज मनरेगा पर जो सवालिया निशान लग रहा है, इस सवालिया निशान को हटा करके, इस महत्वाकांक्षी योजना, चाहे हम किसी पार्टी से ताल्लुक रखते हों, हम सब की प्रतिबद्धता है कि देश के गांवों के उस बेरोजगार को, नौजवान को सौ दिन का रोजगार मिल सके। मैं कहता हूं कि एक ऐसा मेकेनिज्म,  कि हम डेढ़ सौ दिन की माग करें, उसके बजाए सौ दिन के काम का, इस तरीके के प्रोजेक्ट तैयार हों, कि वह सौ दिन का काम हो। जिस तरह से 60-40 की बात हो रही है, बेसिकली बुनियादी तौर से ये बना था कि हम मजदूरी देंगे। इसलिए 60 परसैंट मजदूरी था और 40 परसैंट मेटिरियल कम्पोनेंट था। लेकिन गांव में कितनी बार तालाब खुदवाएंगे, कुंआ बनवाएंगे।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय: जगदम्बिका जी, आप सुझाव देकर अपनी बात को खत्म कीजिए।

…( व्यवधान)

श्री जगदम्बिका पाल : धनंजय जी, मैं आपकी बात से सहमत हूं, आप मेरी बात से सहमत हों कि आज उन स्थाई परिसम्पत्तियों को सृजन करने का काम करना चाहिए, यह मेरा सुझाव है। राज्य सरकार को जो दोषी हैं, जिस तरह से नेक्सस हो गया, उनको जिलों में एक एकाउंटेबल नोडल ऑफिसर बना करके, स्टेट पर टॉस्क फोर्स बना करके, इसकी चैकिंग करा कर जो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, उनके खिलाफ कठोर से कठोर कार्यवाही करनी चाहिए। ...( व्यवधान) कुछ जनपदों की सीबीआई जांच करा दीजिए। यही मेरा सुझाव है।

                                                                                                                                     

श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन (भागलपुर): उपाध्यक्ष जी, मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे बोलने का अवसर दिया।  मैं लंबी तकरीर नहीं करूंगा, क्योंकि मैं कम शब्दों में बड़ी बात कहने के लिए खड़ा हुआ हूं। ...( व्यवधान) पाल साहब, कई बार मुझे टेलीविजन पर मिल जाते हैं, उनसे सवाल-जवाब होता है।

          उपाध्यक्ष जी, मैं अपनी कांस्टीच्युंसी में जब मनरेगा की योजना देखने जाता हूं तो दुख होता है।  मनरेगा योजना जो बनी है, जिसकी पाल साहब बहुत तारीफ कर रहे थे, वह कह रहे थे कि पहली बार इस सरकार ने किया।  जो काम नेहरू जी ने नहीं किया, इंदिरा जी ने नहीं किया, राजीव जी ने नहीं किया, वह काम मनमोहन सिंह जी ने कर दिया। ...( व्यवधान) राहुल जी के लिए भी कुछ छोड़ नहीं रहे हैं। पाल साहब बोल रहे थे, तो जब किसी भी सरकार के लिए कहते हैं तो यह भूल जाते हैं कि इंदिरा जी जैसी वरिष्ठ नेता इस देश की प्रधानमंत्री रही हैं।  राजीव गांधी जी ने देश के लिए सपना देखा। ...( व्यवधान) मनमोहन सिंह जी आपको मंत्री भी नहीं बना रहे हैं और आप उनकी इतनी तारीफ किए जा रहे हैं। ...( व्यवधान)  इतने सीनियर आदमी की उपेक्षा अलग से हो रही है।

उपाध्यक्ष महोदय : मनरेगा पर कहिए।

श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन : उपाध्यक्ष जी, जो मनरेगा योजना बनी, यह चुनाव के पहले बनी, यह बहुत अच्छी योजना है।  इस पर बड़ी जांच की भी बात हो रही है। सीबीआई इंक्वायरी की बात हो रही है।  जब सीबीआई की खुद ही क्रैडिबिलिटी नहीं है तो वह इंक्वायरी क्या करेगी?  सीबीआई इंक्वायरी अब एक फैशन हो गया है।  हर बात में सीबीआई इंक्वायरी की बात होती है। सीबीआई इंक्वायरी तो आप करायेंगे।  सीबीआई आपके कंट्रोल में है, यह तो हमें मालूम हैं, कैसे कंट्रोल करते हैं, यह बताने का समय नहीं है। ...( व्यवधान) सवाल यह है कि जो मनरेगा योजना बनी थी, वह नौजवानों को रोजगार देने के लिए बनी थी। उनको रोजगार तो मिल नहीं रहा है, रेलवे में नौकरी देनी थी, वह नहीं दे रहे हैं, सरकारी नौकरियों में दस लाख पोस्ट्स खाली हैं। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लोगों की नौकरी खाली है, वह उनको नहीं दे रहे हैं। मनरेगा की योजना बनायी, देश की इकॉनामी की हालत क्या है, उस पर अलग से चर्चा बजट में हुकुम देव बाबू करेंगे।  मैं आपके सामने कहने के लिए खड़ा हूं कि जो मनरेगा योजना है, मैं भागलपुर में गया था, दियारा के क्षेत्र में, बाखड़पुर, खवासपुर एरिया में देखा कि जो प्रधानमंत्री सड़क योजना से रोड बनी है, उसके बगल में नाली खोद दिया और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क की रोड पर मिट्टी लाकर रख दिया। वह बना हुआ रोड भी चलने लायक नहीं है।  आप मनरेगा को पॉजीटिव काम में जोड़िए।  आपने कहा कि इसे रेलवे से जोड़ेंगे।  मनरेगा में जो मिट्टी का काम है, सांसद निधि से हम अगर पांच लाख रूपए की कोई रोड बनाते हैं तो उसके अंदर मिट्टी डालनी पड़ती है, फिर ईंट डालनी पड़ता है, फिर उस पर सी.सी. रोड डालना पड़ता है। बिहार में पी.सी.सी. कहते हैं, यूपी में शायद सी.सी. रोड कहते हैं।  ...( व्यवधान) हम लोग उसको थोड़ा अपग्रेड कर देते हैं।  हमारे यहां भी योजना का टेंडर होता है। जब एस्टीमेट बनता है, तो मिट्टी का एस्टीमेट बना देता है, फिर ईंट का बना देता है।  प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से जो रोड बन रही है, क्या उसमें भी मनरेगा को जोड़ सकते हैं?  एमपीलैड में अगर मिट्टी और ईंट का काम मनरेगा से हो जाए और उसके ऊपर हम छः इंच का सी.सी. रोड डाल दें, तो इस योजना का बहुत अच्छा उपयोग हो सकता है। 

          सांसद को आपने अधिकार दे दिया। आपने कहा कि सांसद अनुश्रवण समिति का अध्यक्ष है।  इतना बड़ा पद दे दिया, इससे यह लगा कि इसे लिखकर चलना चाहिए कि वह अनुश्रवण समिति का अध्यक्ष है। कोई उसकी बात सुनने को तैयार नहीं है। पाल साहब की बात कोई और नहीं सुनता होगा, क्योंकि इनकी सरकार को समाजवादी पार्टी समर्थन दे रही है, तो यह वहां हल्ला भी नहीं कर सकते है। ...( व्यवधान) यह वहां हल्ला करेंगे तो यहां गड़बड़ होगी। ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : मनरेगा पर बोलिए।  इधर-उधर क्यों चले जाते हैं?

…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप बैठ जाइए।

…( व्यवधान)

श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन : उपाध्यक्ष महोदय, बिना रस का क्या कोई भाषण होता है?  मैं थोड़ा-थोड़ा रस इसमें डाल रहा हूं। ...( व्यवधान) मैं बड़ी जिम्मेदारी से कहता हूं कि मैं ठोस सुझाव देने के लिए खड़ा हुआ हूं। मैंने देखा कि इस पर चर्चा हो रही है और आप आसन पर हैं। ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप पांच मिनट में समाप्त कीजिए।

…( व्यवधान)

श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन : महोदय, मैं बड़ी जिम्मेदारी से कहता हूं कि मनरेगा की योजना ऐसी नहीं है कि कांग्रेस के दफ्तर से कोई चंदा का पैसा आप बांट रहे हैं। यह देश के टैक्स पेयर की मनी है। आप सरकार में आए हैं। आपको उसे खर्च करने का अधिकार मिला है।  इसका मतलब यह नहीं है कि आप उसे देश में औने-पौने बहा देंगे, भ्रष्टाचार हो जाएगा।  इसमें जिम्मेदारी आपकी है।  ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप इधर देखकर बोलिए।

…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : दोस्ती इतनी गहरी नहीं होनी चाहिए।

…( व्यवधान)

श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन : महोदय, मैं चाहता हूं कि वह ग्रामीण विकास मंत्री बन जाएं, उनको चांस ही नहीं मिल रहा है।  आज मैं बड़ी जिम्मेदारी के साथ कहना चाहता हूं कि मनरेगा कि योजना बनाई गई, आज वाटर लेबल नीचे जा रहा है, हम अपने क्षेत्र में जाते हैं, वहां कुआं सूख रहा है, टय़ूब वेल सूख रहा है, तालाब सूख रहा है। आप कुआं और तालाब बनाइए। मिट्टी में नाली खोदने की योजना पर तुंत पाबंदी लगनी चाहिए, नाली का निकास नहीं है। गांव में नाली खोद देते हैं और गंदा पानी जमा हो जाता है जिससे बीमारी हो जाती है। मैं आपके माध्यम से यह अनुरोध करना चाहता हूं कि आप बड़े-बड़े तालाब खोदिए, कुआं खोदिए। जो नदी है उस नदी के अंदर पानी कहीं से कहीं बह कर जा रहा है। हमने देखा है कि आज हमारे यहां बालू का उठान हो जाता है। हमारे यहां भागलपुर में बालू का उठान हो गया। नदी में पानी कम है। मैं भागलपुर की भाषा में कहूं तो लोग कहते हैं कि छिटका बनवा दीजिए। यदि मनरेगा के पैसा से छोटे-छोटे चेक डैम्स बना दिए जाएं तो उसका उपयोग होगा। मनरेगा के अंदर आप उपलब्धि मत मानिए। देश के इतिहास में आपको माफ नहीं किया जाएगा। आप मनरेगा पर हजारों करोड़ रुपया देने का यहां पर नारा दे रहे हैं और देश का हजारों करोड़ रुपया बर्बाद करने के लिए, इतिहास में लिखा जाएगा कि एक ऐसी सरकार थी जिसने ऐसी योजना बनाई जिसमें देश का हजारों करोड़ रुपया इधर-उधर बर्बाद हो गया। अगर आप योजना बना रहे हैं तो हमलोगों से थोड़ा सलाह ले लीजिए। आप सत्ता में हैं। आपको तो सुझाव ही नहीं चाहिए।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  कृपया आप अपना सुझाव दीजिए।

श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन :  मैं अपनी बात दो मिनट में समाप्त कर रहा हूं। आप इस योजना का सदुपयोग कीजिए। इस योजना को देश के हित में काम करने के लिए कीजिए। जो सुझाव यहां पर आएं हैं, पाल साहब सरकार में हैं, फिर भी इतना सुझाव देते रहते हैं। आप पाल साहब की भी बात मान लें। क्योंकि कांग्रेस में अब वह डेमोक्रेसी नहीं है कि वह अपने सांसदों से पूछे कि क्या-क्या करना चाहिए। आप मंत्री लोग बैंठते हैं तो सांसदों से भी फीड बैक लीजिए कि क्या सलाह चाहिए। हम सरकार कैसे चलाएं? हमारी हालत ऐसी खराब क्यों हो रही है? इतनी बड़ी-बड़ी योजना बनाते हैं फिर गुजरात में चुनाव क्यों हारते हैं। इस पर ये लोग सही-सही सलाह देंगे। बढ़िया-बढ़िया काम करिए तो राजनीति में आपको आगे बढ़ने का मौका मिलेगा। देश के लोगों ने आपको सत्ता दिया है और अगर आप लोगों को जो सत्ता मिला है उसका सदुपयोग नहीं किया, आपने देश के हित में काम नहीं किया तो वर्ष 1991 के बाद आप वर्ष 2004 में सरकार में आए हैं, फिर लंबा सूखा पड़ने वाला है। आप सत्ता में आने वाले नहीं हैं। मैं यह बात आपको बता देना चाहता हूं। सत्ता में कौन आएगा, यह जनता तय करेगी। इसका आप सही उपयोग करेंगे। ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  कृपया आप अपनी बात समाप्त करें।

श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन :  उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपका धन्यवाद भी करना चाहता हूं कि इतने बढ़िया विषय पर चर्चा हो रही है। मुझे आपको आसन्न पर देख कर प्रोत्साहन मिला। मैंने हुकुमदेव जी से वादा किया है कि बगल में घर है, शाम में आ कर यहां पर बैठा करेंगे। बढ़िया विषय पर बोलने के लिए जो मौका मिलता है इसे याद रखूंगा और मैं आपके जरिए मंत्री जी को सुझाव देना चाहता हूं कि मनरेगा कि योजना में ज्यादा कुछ नहीं करना है। ये जो अधिकारी हैं इनको ज्यादा कुछ पता नहीं होता है। ये अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं, आप इप्रेस हो जाते हैं। सांसदों से पूछिए जो जमीन से चुनाव जीत कर आते हैं। दादा जी की भी अंग्रेजी अच्छी है लेकिन वे जमीन वाले आदमी हैं। कुछ हम लोगों से सुझाव लीजिए और सांसदों के सुझाव के आधार पर ग्रामीण विकास मंत्री एक मीटिंग बुलाएं, हम लोगों से सुझाव लें। सुझाव हमारा और राज्य आप करेंगे। अगर आप सुझाव भी नहीं सुनेंगे तो कुछ होने वाला नहीं है।

          उपाध्यक्ष जी मैं फिर से आपको धन्यवाद करते हुए, उम्मीद करता हूं कि मनरेगा में भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए यह सरकार कोई काम करेगी और हमारी बात इधर से सुन कर उधर नहीं निकलेगी। बात निकली है तो दूर तक जाएगी। यह मैं आपसे उम्मीद करता हूं।

 

ग्रामीण विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री प्रदीप जैन):  माननीय उपाध्यक्ष जी, एक बहुत अच्छा विषय है। इस पर हमारे साथी हंसराम गंगाराम अहीर जी ने विधेयक रखा है, जिस पर हमारे 12 माननीय सदस्यों ने विचार रखे। विचार ब्रह्माण्ड की सबसे बड़ी ताकत है। निश्चित रूप से मैंने देखा कि चाहे हमारे सत्ता पक्ष के लोग हों या विपक्ष के लोग हों, सारे लोगों ने इस अधिनियम की तारीफ की है।  उस समय हम लोगों की प्रसन्नता और बढ़ जाती है जब हमारे देश के विपक्षी दल के नेता, भारतीय जनता पार्टी के आडवाणी जी यूएनओ जाकर महात्मा गांधी नरेगा की तारीफ करते हैं।...( व्यवधान) निश्चित रूप से यूपीए चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी और प्रधान मंत्री डा. मनमोहन सिंह ने...( व्यवधान)

श्री सैयद शाहनवाज़ हुसैन :  आडवाणी जी कंट्री के बिहाफ पर गए थे।...( व्यवधान)

श्री प्रदीप जैन : उपाध्यक्ष जी, मैं कोई भी बात गलत नहीं बोल रहा हूं और यह पूरा रिकार्ड में है।...( व्यवधान) हम चाहे हिमाचल से आए हुए कश्यप जी को देखें, चाहे दूसरे साथियों को देखें, कश्यप जी ने कहा, प्रश्न का जवाब भी हमारे साथियों ने दिया। उन्होंने कहा कि फैडरल स्ट्रक्चर में अगर स्टेट का चीफ मिनिस्टर स्टेट को सही ढंग से चला रहा है तो उस स्टेट में महात्मा गांधी नरेगा गांव के अंतिम परिवार को मुख्य धारा से जोड़ने का कार्य कर रहा है। यह बहुत सारे मंथन मैंने इसी सदन में सब सदस्यों से सुने। वहीं जब भोला सिंह जी ने यह बात कही तो मेरे मन में विचार आया कि बिहार के अंदर सुशासन का दावा करने वाले मुख्य मंत्री जी को चाहिए, क्योंकि हमारा देश फैडरल स्ट्रक्चर से चलता है, हमारा संघीय ढांचा है, एक केन्द्र की ताकत है और दूसरी राज्य की ताकत है। जिस राज्य का मुख्य मंत्री अपने सांसद को इतनी शक्ति नहीं दे सकता कि वह उन्हें वह सारी जानकारी उपलब्ध कराए जो महात्मा गांधी नरेगा में कार्यों से संबंधित है, तो यह विचारणीय प्रश्न है।

          भारत सरकार, यूपीए चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी, प्रधान मंत्री डा. मनमोहन सिंह ने जब वर्ष 2006 में इस कानून को देश के दो सौ जिलों में लागू किया था, तो उसका प्रभाव हुआ। उसके पश्चात् वर्ष 2007 और 2008 में 130 जिलों में उसे लागू किया गया और अब देश के पूरे जिलों में, जहां ग्रामीण आबादी है, यह कानून लागू है। इस कानून के अंदर हमारे देश के सात लाख से ज्यादा गांव, दो लाख पचास हजार से ज्यादा ग्राम पंचायतों के ग्यारह करोड़ परिवारों को रोजगार मिल रहा है।...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :  मंत्री जी को बोलने दीजिए।

…( व्यवधान)

श्री प्रदीप जैन : हमारे साथी हंसराज गं. अहीर जी ने जो विधेयक रखा, क्योंकि यह एक डिमांड ड्रिवन स्कीम है, इस स्कीम के अंदर देश में जो अतिरिक्त रोजगार है, हमारे देश के अधिकांश लोग कृषि पर निर्भर हैं, गांव के लोग माइग्रेट नहीं करें, गांव में रहकर ही उन्हें ग्राम पंचायत के माध्यम से काम मिले, बेरोजगारी भत्ता मिले, सोनिया जी और प्रधान मंत्री डा. मनमोहन सिंह ने उसके लिए इस कानून का निर्माण किया। इसमें बहुत सारे सुझाव आए हैं। राय साहब ने बहुत अच्छा सुझाव दिया, शैलेन्द्र भाई ने बहुत अच्छा सुझाव दिया, असम के सिंह साहब ने बहुत अच्छा सुझाव दिया। ...( व्यवधान) इसके बाद आपका और शाहनवाज भाई ने जो कहा, हमने प्रयास भी किया। निश्चित रूप से जो प्रश्न और उत्तर है, बहुत से उत्तर हमारे एक सांसद ने दूसरे सांसद को दिए। इस एक्ट की जो मूलभूत भावना है, इस एक्ट में बहुत सारी धाराएं नहीं हैं, केवल 34 धाराएं हैं। इसका प्रीएम्बल है कि किसी भी गांव के अर्ध कुशल श्रमिक को सुनिश्चित रूप से रोजगार मिले। जब रोजगार मिलना है तो बहुत से विचारों के मंथन के बाद सामग्री और श्रमिक की मजदूरी में एक परसेंटेज फिक्स की गई। जैसे आपने अभी अपने बीकानेर की समस्या उठाई। चूंकि भ्रष्टाचार की बहुत सारी शिकायतें आती थीं। कई राज्यों में सीबीआई जांच हुई। कई राज्यों में हम लोग मांग कर रहे हैं और हमें उम्मीद है। उत्तर प्रदेश में भी पिछली सरकार के समय कुछ जिलों के अंदर जो गड़बड़ी थी, उस संबंध में हमारे माननीय मंत्री जी ने पत्र लिखा था। चाहे राज्य हो या केन्द्र, दोनों की ही जिम्मेदारी है कि योजनाएं पारदर्शी रूप से, ईमानदारी से प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचे और हमें उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश से भी हमें वह अनुमति मिलेगी। मैं इसलिए यह बात कहना चाहता हूं कि हमारे मेघवाल जी का आशय था कि जो आरयूवी बने, क्योंकि हम लोगों ने जो परसेंटेज मेनटेन किया है, वह ग्राम पंचायत लैवल पर इसलिए किया है, ताकि गांव के व्यक्ति अपनी जो योजना बनायें, उनके  ऊपर कोई बंदिश न हो कि हम बाहरी दबाव से करें, क्योंकि पूरे राज्यों ने आज पंचायती राज्य को स्वीकार किया है। हम जितने भी सांसद हैं, हम सबका लक्ष्य है। अगर हम देखें, हम देश की सबसे बड़ी महापंचायत में हैं, तो ग्राम प्रधान भी देश की सबसे बड़ी महापंचायत में है। उसे सशक्त करना, हमने और आप सबने पढ़ा होगा कि हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने सुप्रसिद्ध जंतर में कहा था कि जब भी मैं किसी पीड़ित अंतिम व्यक्ति की आंखों की तरफ देखता हूं, उसके चेहरे की बेबसी और उदासी की तरफ देखता हूं, मेरे मन में एक समाधान के भाव उत्पन्न होते हैं और यह योजना उस अंतिम व्यक्ति के समाधान के लिए बनी थी। वह अंतिम व्यक्ति ग्राम पंचायत के अंदर रहता है। वह परसेंटेज गांव में निर्माण के लिए आरयूवी में नहीं हो सकता।        

          माननीय उपाध्यक्ष जी, निश्चित रूप से बहुत सारे सुझाव आये हैं। मैं कहना चाहता हूं कि हमारे पूर्व मुख्य मंत्री सम्मानित श्री जगदम्बिका पाल जी ने भी मौनीटरिंग की बात की। उन्होंने कुछ उदाहरण दिये जहां करप्शन हुआ। मैंने बताया, क्योंकि इम्प्लीमैंटेशन की भारत सरकार गारंटी देती है। आज कई राज्य ऐसे हैं, राजस्थान सरकार ने अपने राज्य के अंदर 50 दिन के अतिरिक्त रोजगार की व्यवस्था की है। हमारे महाराष्ट्र से साथी आते हैं, महाराष्ट्र की सरकार, भारत सरकार सौ दिन की गारंटी देती है। आज भी हम देखें, तो आठ फीसदी परिवारों  ने सौ दिन का कार्य किया है। ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :   आप संक्षेप में अपनी बात कहिए।

…( व्यवधान)

श्री धनंजय सिंह (जौनपुर):  उपाध्यक्ष महोदय, सभी सांसदों ने एक ही बात कही थी। ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :   आप बीच में इंटरप्ट मत कीजिए। उन्होंने जवाब दे दिया है।

…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :   वे बोल रहे हैं कि सबकी सलाह मान रहे हैं।

…( व्यवधान)

श्री धनंजय सिंह :  उपाध्यक्ष महोदय, वे सलाह कहां मान रहे हैं। ...( व्यवधान) जो काम लोगों ने कहा, कच्चा-पक्का काम का रेशियो था, उस रेशियो में बढ़ोतरी की बात थी। पक्के काम को बढ़ाने की बात थी। उस पर आप कोई एश्योरेंस सदन में दे ही नहीं रहे हैं। ...( व्यवधान)

श्री प्रदीप जैन : हमारे सम्मानित साथी ने जो बात रखी है, चूंकि यह एक एक्ट है और इस एक्ट में संशोधन नहीं हो सकता। यह एक अच्छा विषय है जिससे सब लोग जुड़े हैं। मैं अपने सम्मानित साथी से आग्रह करूंगा कि वे अपना विधेयक वापिस लेने की कृपा करें।

                                                                                                   

श्री हंसराज गं. अहीर (चन्द्रपुर):    उपाध्यक्ष महोदय, मैं जिस विषय पर संशोधन विधेयक लाया था, उस पर मंत्री जी ने जवाब नहीं दिया। आपने आरोपों का जवाब देते समय बिल के मुख्य उद्देश्य पर जवाब नहीं दिया। मैं कह रहा था कि सौ दिन के रोजगार को साल भर में बदला जाये। हम एक दूसरा प्रस्ताव भी लाये थे कि परिवार के एक सदस्य को काम दिया जा रहा है, वह गलत है। जो सदस्य काम मांगेगा, उसे काम दिया जाये। उस पर आपने कुछ नहीं कहा। मैं इस बारे में थोड़ा बताना चाहता हूं कि इसमें भ्रष्टाचार कम होने के आसार हैं। गांव में हर परिवार काम पर नहीं जाता। एक गांव में 20-25 मकान होते हैं, जिनके सदस्य मजदूरी पर  जा सकते हैं, मनरेगा पर काम में जाते हैं। उस परिवार में अगर आप एक व्यक्ति को काम देते हैं, तो 20-25 लोग ही काम पर जाते हैं। अगर अधिक से अधिक लोगों को काम दिया जाएगा तो ऐसे बोगस रजिस्टर नहीं बनेंगे। रजिस्टर पर बोगस नाम नहीं लिखे जायेंगे। असली आदमियों को काम मिलेगा और उसमें भ्रष्टाचार नहीं होगा। आप इस पर गहराई से नहीं सोच रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र का हर व्यक्ति काम नहीं मांग रहा है। इसलिए एक परिवार से एक ही व्यक्ति को काम दिया जायेगा, उसे आप रोकिए। हम उसके लिए मना कर रहे हैं। हमारा कहना है कि यह नहीं होना चाहिए. ...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय :   आप संक्षेप में अपनी बात कहिए।

…( व्यवधान)

18.00 hrs. श्री हंसराज गं. अहीर  : दूसरी बात यह है कि मनरेगा में सौ दिन के रोज़गार में गारंटी शब्द क्यों दिया? गारंटी मत दो। महात्मा गांधी रोज़गार गारंटी योजना कैसे बन सकती है? इसमें सौ दिन के रोज़गार में गारंटी नहीं होनी चाहिए। इसलिए ये सौ दिन की जो शर्त है, वह निकाली जाए। इसमें आप बार-बार कह रहे हैं कि किसानों के प्रति भी ध्यान दिया है।

उपाध्यक्ष महोदय :  संक्षेप में कीजिए।

श्री हंसराज गं. अहीर :    मैं कह रहा हूं कि गांव में जो स्किल्ड वर्कर्स रहते हैं, उन्हें भी काम मिलना चाहिए। उनको काम नहीं मिल रहा है। इसलिए ज्यादा दिन का रोज़गार मिले और भ्रष्टाचार पर रोक लगाएं। इस बात को आप स्पष्ट करें, तो इस बात को मैं मान लूँगा।

श्री प्रदीप जैन :  हमारे सम्मानित सदस्य की जो भावना है, उनकी जो नीयत और नीति है, उसको मैंने समझा है। मैं यह बताना चाहता हूं कि आपने दो बातों पर विधेयक लाया था। आज देश के सात लाख से ज्यादा गांव और ढाई लाख से ज्यादा ग्राम पंचायतों का, हम हर राज्य का यदि सारांश देखें, तो किसी भी राज्य ने पचास दिन से ज्यादा का रोज़गार नहीं दिया है।

उपाध्यक्ष महोदय :  संक्षेप में बोलिए।

श्री प्रदीप जैन :   देश में आठ फीसदी ही ऐसे लोग हैं, जिन्होंने उसके अंदर सौ दिन का काम किया है। जब 92 फीसदी लोग सौ दिन का काम नहीं कर रहे हैं, तो हम सौ दिन से ज्यादा इसे नहीं बढ़ा सकते। दूसरा जो जॉब-कार्ड है, उसमें परिवार में जितने व्यस्क सदस्य हैं, वे सारे उसमें कार्य कर सकते हैं। उसमें कोई प्रतिबंध नहीं है। मैं माननीय सदस्य से आग्रह करूँगा कि वे इसे वापस लें।

 

श्री हंसराज गं. अहीर :   महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूं कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण नियोजन गारंटी अधिनियम, 2005 का और संशोधन करने वाले विधेयक को वापस लेने की अनुमति दी जाए।

MR. DEPUTY-SPEAKER: The question is:

 “That leave be granted to withdraw the Bill to amend the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act, 2005.”   The motion was adopted.
श्री हंसराज गं. अहीर :   मैं विधेयक वापस लेता हूं।