State Consumer Disputes Redressal Commission
Janak Ball Vidhaly vs U P P C L on 7 April, 2015
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/2000/432 (Arisen out of Order Dated in Case No. of District ) 1. Janak Ball Vidhaly a ...........Appellant(s) Versus 1. U P P C L a ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. Alok Kumar Bose PRESIDING MEMBER HON'BLE MR. Sanjay Kumar MEMBER For the Appellant: For the Respondent: ORDER
(राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0 प्र0 लखनऊ) सुरक्षित अपील संख्या 432/2000 (जिला मंच झॉसी द्वारा परिवाद सं0 30/1999 में पारित निर्णय/आदेश दिनांकित 18/01/2000 के विरूद्ध) जनक बाल विद्यालय झॉसी जरिये प्रबंधक श्री हरचरन लाल शर्मा तनय श्री मुन्नी लाल शर्मा निवासी- 719 सिविल लाइन्स चित्रा चौराहा झॉसी।
...अपीलार्थी/परिवादी बनाम 1- अधिशाषी अभियन्ता विद्युत वितरण खण्ड, उत्तर प्रदेश, राज्य विद्युत परिषद, झॉसी उत्तर प्रदेश।
2- उ0प्र0 राज्य विद्युत परिषद जरिए अधिशाषी अभियन्ता विद्युत वितरण खण्ड झॉसी उत्तर प्रदेश।
.........प्रत्यर्थीगण/विपक्षीगण समक्ष:
1. मा0 श्री आलोक कुमार बोस, पीठासीन सदस्य ।
2. मा0 श्री संजय कुमार, सदस्य।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : विद्वान अधिवक्ता श्री आर0के0 गुप्ता। प्रत्यर्थी की ओर से उपस्थित : विद्वान अधिवक्ता श्री दीपक मेहरोत्रा। दिनांक 24-08-2015 मा0 श्री संजय कुमार, सदस्य द्वारा उदघोषित । निर्णय
प्रस्तुत अपील परिवाद सं0 30/99 जनक बाल विद्यालय बनाम अधिशाषी अभियन्ता विद्युत वितरण खण्ड व अन्य जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष फोरम, झॉसी द्वारा पारित निर्णय/आदेश दिनांक 18/01/2000 से क्षुब्ध होकर प्रस्तुत की गई है। अधीनस्थ जिला फोरम ने दिनांक 18/01/2000 को गुणदोष के आधार पर परिवाद निरस्त किया जिसके खिलाफ अपील योजित की गई है।
संक्षेप में परिवाद का कथन इस प्रकार है कि परिवादी/अपीलार्थी, विपक्षी का उपभोक्ता है। परिवादी श्री कुंदन सिंह से मकान दिनांक 27/09/94 को खरीदा था जिसमें विद्यालय खोला गया है। दिनांक 14/03/95 तक विद्युत बिल जमा किया जा चुका है। भवन गिर गया जिसके कारण विद्युत कनेक्शन स्वत: डिस कनेक्ट हो गया जिसकी सूचना विपक्षी/प्रत्यर्थी को दिया गया। विपक्षी के कर्मचारी शेष तार को उठा ले गये। मीटर जो टूटा हुआ था उसे नहीं ले गये। मकान की मरम्मत कराया गया लेकिन विपक्षी के कर्मचारी मीटर नहीं ले गये। विपक्षी के जूनियर इंजीनियर श्री टी0 एन0 मिश्रा ने मीटर लगाया और विद्युत आपूर्ति मई 1997 में चालू किया। परिवादी के अनेकों बार मिलने के बावजूद भी बिल नहीं भेजा गया। अन्तोगत्वा विपक्षी के 2 कर्मचारी द्वारा दिनांक 09/09/98 को विद्युत कनेक्शन विच्छेदित किया गया। परिवादी ने मिनिमम चार्ज 2,000/ रूप्ये मार्च 1995 से अक्टूबर 1996 तक जमा किया था। पुन: स्थापन फीस मु0 100/ रूपये दिनांक 27/01/98 को जमा किया था तब विद्युत कनेक्शन चालू हुआ। इस कनेक्शन देने के बाद बिल नहीं भेजा गया और दुबारा विद्युत कनेक्शन दिनांक 16/11/98 को विच्छेदित कर दिया गया। परिवादी विपक्षी के कार्यालय में गया तब कर्मचारी द्वारा मु0 48,000/ रूपये का अवैध मांग की गई जिसे देने से इन्कार किया गया। परिवादी सहायक अभियन्ता से मिला जो श्री त्रिपाठी से पूछ-तॉछ किया। जांच के दौरान मु0 10,655/ रूपये आउट स्टैडिंग पाया गया। पूर्व भुगतान मु0 2,000/ रूपये को समायोजित करने के बाद मु0 8,556/ रूपये परिवादी द्वारा दिनांक 16/12/98 को जमा किया गया और पुन: विद्युत कनेक्शन चालू किया गया। परिवादी ने एक बिल मु0 296/ रूपये का प्राप्त किया जो विद्युत विच्छेदन के दौरान का था।
विपक्षीगण ने संयुक्त रूप से प्रतिवाद पत्र जिला फोरम के समक्ष प्रस्तुत किया जिसमें कहा गया कि विद्युत से संबंधित विवाद नहीं है। परिवादी विपक्षी का उपभोक्ता नहीं है। विद्युत कनेक्शन श्री कुन्दन सिंह के नाम से दिया गया था। परिवादी द्वारा कोई ट्रांसफर अप्लीकेशन नहीं दिया गया था कि अब वह मकान क्रय करने के बाद मकान का मालिक हो गया है। विद्युत विच्छेदन कभी भी नहीं हुआ था न कभी परिवादी ने प्रार्थना पत्र ही दिया था। विच्छेदन हेतु वांछित चार्ज ही जमा किया था। इस प्रकार विद्युत विच्छेदन का प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होता है न ही तार ले जाने का। फलस्वरूप विद्युत कनेक्शन मई 1997 में कभी विच्छेदित नहीं किया गया था न ही पुन: विद्युत जोड़ने का प्रश्न उत्पन्न नहीं होता है। परिवादी को पुन: विद्युत कनेक्शन जोड़ने हेतु खर्च जमा करना चाहिए था जो कभी भी नहीं जमा किया गया जिससे यह स्पष्ट है कि विद्युत कनेक्शन कभी भी डिस कनेक्ट नहीं किया गया था। परिवादी के ऊपर बिल बकाया है इसलिए परिवादी ने कहा कि विद्युत डिस कनेक्ट होना चाहिए। फरवरी 1998 में मु0 2000/ रूपये जमा किया शेष भुगतान जल्दी कर दिया जायेगा लेकिन परिवादी द्वारा कभी भी भुगतान नहीं किया गया। विद्युत कनेक्शन दिनांक 18/11/98 को डिसकनेक्ट किया गया। बकाया एवं पुन: विद्युत कनेक्शन जोड़ने का चार्ज का भुगतान किया गया। इसके पश्चात विद्युत कनेक्शन पुन: दिनांक 16/12/98 को चालू किया गया अन्य आरोप से इन्कार किया जाता है। विपक्षी की सेवा में किसी भी प्रकार की कमी होने का कोई विवाद नहीं है।
3अपीलार्थी एवं प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्तागण की बहस को विस्तार पूर्वक सुना गया। अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क दिया कि वर्तमान में अपीलार्थी उस मकान का मालिक के रूप में काबिज है। मकान में काबिज होने के आधार पर विद्युत का उपभोग करने का अधिकारी है। अपीलार्थी को उपभोक्ता नहीं माना है जो गलत है। इस प्रकार जिला फोरम का निर्णय/आदेश सही नहीं है जो निरस्त होने योग्य है।
प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अपीलार्थी ने भवन खरीदने के बाद अपना नाम विद्युत विभाग में दर्ज (पुराने मालिक के स्थान पर) कराने के लिए कोई प्रार्थना पत्र नहीं दिया था न ही उसके नाम से विद्युत कनेक्शन जारी किया गया था। जिला फोरम का निर्णय/आदेश सही एवं उचित है। अपील निरस्त होने योग्य है।
आधार अपील एवं संपूर्ण पत्रावली का परिशीलन किया गया जिससे यह प्रतीत होता है कि किरन शर्मा पत्नी बृज मोहन ने मकान द्रोपती देवी पत्नी कुन्दन सिंह से खरीदा था। मकान का विद्युत कनेक्शन कुन्दन सिंह के नाम से था। परिवादी/प्रबंधक हरचरन लाल शर्मा के नाम से विद्युत कनेक्शन नहीं था। नए मकान मालिक ने अपना नाम विद्युत विभाग में दर्ज कराने के लिए कोई आवेदन नहीं किया था और न ही परिवादी का नाम पत्रावली में अंकित किया गया था। विद्युत उपभोक्ता के रूप में नाम न दर्ज होने के कारण जिला फोरम ने परिवादी को विपक्षी का उपभोक्ता नहीं स्वीकार किया। अपीलार्थी का तर्क है कि पुराने मकान मालिक द्रोपती देवी पत्नी कुन्दन सिंह से मकान क्रय किया गया था। द्रोपती देवी के पति श्री कुन्दन सिंह के नाम से विद्युत कनेक्शन होने के कारण श्री कुन्दन सिंह विपक्षी के उपभोक्ता थे जब मकान कुन्दन सिंह से क्रय कर लिया गया तो किरन शर्मा विपक्षी की उपभोक्ता हो गई जिसके आधार पर परिवाद दाखिल किया गया। किरन शर्मा ने मकान खरीदा इसलिए मकान का मालिक किरन शर्मा को माना जा सकता है लेकिन विद्युत विभाग का उपभोक्ता नहीं माना जा सकता है जब तक कि पुराने मकान मालिक का नाम हटाकर नये मालिक का नाम दर्ज न कर लिया जाय। प्रश्नगत प्रकरण में नए मकान मालिक किरन शर्मा का नाम विद्युत विभाग में दर्ज नहीं है इसलिए विपक्षी का उपभोक्ता नहीं माना जा सकता है। जनक बाल विद्यालय एवं प्रत्यर्थी विधुत विभाग के बीच कभी उपभोक्ता-सेवाप्रदाता का संबंध स्थापित नहीं हुआ। जिला फोरम ने सभी तथ्यों पर सम्यक विचार करते हुए निर्णय/आदेश दिया है वह सही एवं उचित है, विधि अनुकूल है। इसमें हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं है। अपील सार हीन है, निरस्त होने योग्य है।
4आदेश अपील निरस्त की जाती है। पक्षकार अपना-अपना अपीलीय व्यय भार स्वयं वहन करेंगे। उभय पक्ष को इस निर्णय की प्रमाणित प्रति नियमानुसार उपलब्ध कराई जाय।
(आलोक कुमार बोस) पीठासीन सदस्य (संजय कुमार) सदस्य सुभाष चन्द्र आशु0 कोर्ट नं0 3 [HON'BLE MR. Alok Kumar Bose] PRESIDING MEMBER [HON'BLE MR. Sanjay Kumar] MEMBER