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Lok Sabha Debates

Discussion Regarding Problems Being Faced By Farmers. (Not Concluded.) on 12 March, 2001

16.02 hrs. Title: Discussion regarding problems being faced by farmers. (Not concluded.) MR. CHAIRMAN: The House shall now take up Discussion under Rule 193 regarding problems being faced by farmers. Shri Ramjilal Suman to initiate the discussion. The time allotted for this discussion is six hours.

श्री रामजीलाल सुमन (फिरोजाबाद):सभापति जी, मुझे प्रसन्नता है कि नियम १९३ के अधीन माननीय सदन में मुझे किसानों के विषय पर महत्वपूर्ण चर्चा प्रारंभ करने का अवसर मिल रहा है।…( व्यवधान )

श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी (खजुराहो):माननीय सभापति जी, जहां तक मुझे ज्ञात है, आप इसे दिखवा लें, बिजनैस एडवाइजरी कमेटी में यह चर्चा हुई थी कि इस पर दो दिन पूरी बहस हो जाए क्योंकि यह किसानों से जुड़ा हुआ मुद्दा है। किसानों के लिए देश के वभिन्न हिस्सों में अनेक समस्याएं पैदा हुई हैं। इसलिए उनकी समस्याओं पर विस्तार से चर्चा सदन में हो, इसके लिए यदि हमें देर रात तक भी बैठना पड़े, तो हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए। अत: मेरा निवेदन है कि इस विषय पर सदन में विस्तार से चर्चा कराई जाए।

कुंवर अखिलेश सिंह (महाराजगंज, उ.प्र.) : सभापति महोदय, बी.ए.सी. के हम भी सदस्य हैं। उसकी बैठक में जब इस विषय पर चर्चा हुई थी, तब यह निष्कर्ष निकला था कि इस विषय पर पूरे दो दिन चर्चा कराई जाएगी। आज देश के ७० करोड़ किसान परेशान हैं। वे बहुत त्रस्त एवं गंभीर संकटों का सामना कर रहे हैं। इसलिए मेरा निवेदन है कि इस विषय पर विचार-विमर्श के लिए समय-सीमा नहीं बांधी जाए बल्कि विस्तार पूर्वक चर्चा चलनी चाहिए। इसके लिए यदि हमें देर रात तक भी बैठना पड़े, तो हम तैयार हैं।

श्री रामजीलाल सुमन : सभापति महोदय, मुझे प्रसन्नता है कि नियम १९३ के अधीन जो किसानों की परेशानी है. जो किसानों की समस्याएं हैं, उन पर मैं चर्चा प्रारंभ कर रहा हूं। इस सदन में कोई ऐसा सत्र नहीं गया है जबकि किसानों की समस्याओं के ऊपर चर्चा नहीं हुई हो बल्कि यह सम्मानित सदन एक बार नहीं अनेकों बार किसानों की बेबसी, लाचारी और परेशानी पर चर्चा करता रहा है। लोक सभा गरीबों, मजदूरों, आम व्यक्ति और किसानों की वकालत करने के लिए हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी पंचायत है, लेकिन जो बहस यहां होती है, जो चर्चा यहां होती है और चर्चा के बाद समस्याओं के निदान की जो अपेक्षा सरकार से होती है, उस दिशा में कोई सार्थक कदम नहीं उठाया जाता। यदि मैं यह कहूं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस मामले में संसद कुछ हद तक अपनी सार्थकता खोती जा रही है।

सभापति महोदय, आज पूरे देश के किसान परेशान हैं। चारों तरफ त्राहि-त्राहि मची हुई है। आए दिन अखबारों में खुदकुशी के समाचार छपते हैं और कोई भी किसान ऐसा नहीं है, चाहे वह किसी भी प्रकार का उत्पादन करने वाला किसान हो, जिसे खुशहाल कहा जा सके। १९५० में जो हमारा सकल घरेलू उत्पाद था उसमें कृषि का योगदान ५५ प्रतिशत था। में यह योगदान सिर्फ ३० प्रतिशत रह गया। आज सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान सिर्फ २४ प्रतिशत है। इसका सीधा मतलब यह है कि कृषि पर जितनी तवज्जोह दी जानी चाहिए, कृषि को जितना संरक्षण मिलना चाहिए था, नही मिला । हिन्दुस्तान में जो ६५-७० फीसदी लोग खेती करते हैं, उनकी हालत को सुधारने का जो व्यवस्थित प्रयास होना चाहिए था, वह व्यवस्थित प्रयास हमारे देश में नहीं हुआ। १९९५-९६ में हमारे देश में कृषि उत्पाद का मूल्य अंतर्राष्ट्रीय बाजार से कम था लेकिन आज वह ज्यादा हो गया है। उसी का परिणाम है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हमारा उत्पाद बिक नहीं रहा है ।सभापति जी, वर्ष २००१-२००२ के बजट में कृषि पर ३,३८० करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान किया गया है जबकि पूरे देश का बजट ३,७५,२२३ करोड़ रुपये का है। जिन लोगों का संबंध कृषि से है, उनकी संख्या ६५-७० फीसदी है। मैं कह सकता हूं कि निश्चित रूप से उन लोगों की उपेक्षा हुई है। १९७१ से अब तक गेहूं का समर्थन मूल्य आठ गुना बढ़ा है जबकि उत्पादन खर्च १५ गुना बढ़ा है। कोई परस्पर उत्पादन लागत एवं भाव का अनुपात हमारे देश में नहीं है। आज किसान जिन चीजों को पैदा कर रहा है और उन्हें पैदा करने में जिन चीजों का उपयोग कर रहा है, उसमें बेतहाशा वृद्धि हो रही है।

अभी कुछ समय पहले प्रधान मंत्री जी ने मुख्य मंत्रियों का सम्मेलन बुलाया था। उसमें स्वयं प्रधान मंत्री जी का यह सुझाव था कि कृषि पर जो बिजली प्रयोग की जाती है, उसकी कीमत बढ़ाई जाये। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में आपका उत्पाद कोई खरीदने वाला नहीं है। डीजल का दाम आपने बढ़ा दिया, खाद का दाम आपने बढ़ा दिया, ऐसी परिस्थिति में आप किसान पर बिजली के दाम बढ़ाने की बात कर रहे हैं। क्या उनको मार डालने का यह व्यवस्थित प्रयास नहीं है ? सही मायने में बिजली सुधार के नाम पर राज्य विद्युत बोर्डों के घाटे को पूरा करने के अलावा और कोई मकसद नहीं है। राज्य विद्युत बोर्ड के जो घाटे हैं हैं, उनका प्रमुख कारण भ्रष्टाचार, अकुशलता, कुप्रबंधन, उचित और आधुनिक तकनीक का अभाव है। इन सब अभावों से इस देश में ५० प्रतिशत बिजली की हानि हो रही है।

सभापति जी, पिछले चार-पांच वर्षों में यह हानि और बढ़ी है। उड़ीसा में पिछले चार पांच वर्षों में २३ प्रतिशत से बढ़कर ५१ प्रतिशत, आंध्रा प्रदेश में २५ प्रतिशत से बढ़कर ४३ प्रतिशत, हरियाणा में ३२ प्रतिशत से बढ़कर ४७ प्रतिशत और राजस्थान में २६ प्रतिशत से बढ़कर ४३ प्रतिशत हुई है। यहां पर साहिब सिंह वर्मा जी बैठे हुए हैं। वे दिल्ली के मुख्य मंत्री रहे हैं। दिल्ली में भी यह हानि ५० प्रतिशत है। इस प्रकार राज्य विद्युत बोर्डों का जो घाटा है, वह २४,००० करोड़ रुपये से लेकर ३०,००० करोड़ रुपये के बीच में है।

ऐसी परिस्थिति में जब किसान त्राहि-त्राहि कर रहा है, किसान खुदकुशी करने को विवश है, उस समय किसान पर बिजली के बोझ को और डाल दिया जाए, मैं समझता हूं कि इससे ज्यादा शर्मनाक बात कोई दूसरी नहीं हो सकती। हमारे देश में रासायनिक खादों का दाम बढ़ा है जबकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में रासायनिक खादों का दाम घटा है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार की परिभाषा भी हम अपनी सुविधानुसार कर लेते हैं। जब हमने पैट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए थे तब एक ही बात कही थी कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का दाम बढ़ गया है। जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में रासायनिक खादों के दाम घटे हैं फिर हमारे देश में बढ़े हैं, इसका मुझे कोई औचित्य समझ में नहीं आता। यूरिया का दाम हमारे देश में १९९७-९८ में ३,६६० रुपये प्रति टन था जो अब बढ़ कर ४,६०० रुपये प्रति टन हो गया है। डी.ए.पी. का दाम १९९७-९८ में ८,३०० रुपये प्रति टन था जो अब बढ़ कर ८,९०० रुपये प्रति टन हो गया है, एम.ओ.पी. का भी १९९७-९८ में दाम ३७०० रुपये प्रति टन था जो बढ़ कर ४,२५५ रुपये प्रति टन हो गया है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जो खादों के दाम कम हुए हैं - यूरिया १९९७ में १८१ डालर प्रति टन था जो जनवरी, २००१ में घट कर १४० डालर प्रति टन रह गया है। डी.ए.पी. का दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार में १९९७ में २४० डालर प्रति टन था जो अब घट कर १९३ डालर प्रति टन रह गया है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में खादों के दाम गिरे हैं जबकि हमारे देश में बढ़े हैं।

मैं आपके मार्फत एक निवेदन और करना चाहूंगा। जो सबसिडी है, उस सबसिडी का प्रयोग कैसे हो रहा है और फर्टिलाइजर उत्पादकों को दी जाने वाली सबसिडी की क्या स्थिति है, इसकी जांच के लिए खुद भारत सरकार ने डा. वाई.के. अलख के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई थी और उस कमेटी की सिफारिशें आ गई हैं। उस कमेटी ने २७ परियोजनाओं की जांच करके पाया कि निजी क्षेत्र की प्राय: सभी परियोजनाओं ने उत्पादन अधिक दिखाया है और उन्हीं फर्जी आंकड़ों के सहारे सबसिडी ली है। इंडो-गल्फ फर्टिलाइजर, जगदीशपुर, टाटा कैमिकल, बबराला, इनमें उत्पादन की १३५० टन क्षमता है जबकि इन्होंने जो फर्जी आंकड़े प्रदर्शित किए हैं, वह १,७४५ और १,७७८ प्रति टन हैं। मैं कृषि मंत्री जी से जरूर निवेदन करना चाहूंगा कि सबसिडी के नाम पर जो घोटाला हुआ है और जिस समति ने इसकी जांच करके अपनी संस्तुति दी है, जिन लोगों ने फर्जी आंकड़े प्रदर्शित करके सबसिडी हजम कर ली है, उनके खिलाफ अवश्य कार्यवाही होनी चाहिए। विश्व व्यापार संगठन की जो शर्ते हैं, उन शर्तों को सामने रख कर हम रोज एक राग अलापते रहते हैं कि सबसिडी कम की जाए। लेकिन अमेरीका जैसा देश, जो आर्थिक उदारीकरण और खगोलीकरण का पक्षधर है, वह एक साल में अपने किसानों को लाखों-करोड़ों रुपये की सबसिडी दे रहा है। १९९८ में अमेरीका के किसानों को ४,१८,४०० करोड की सबसिडी दी गई।

भारत में सब्सिडी को निरन्तर कम करने की बात कही जा रही है। मैं निवेदन करना चाहूंगा कि पिछली बार जब पैट्रोल और डीजल के दाम बढ़े थे, तब सरकार ने एक ही बात कही थी कि अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का दाम बढ़ गया है, इसलिए पैट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाया जाना हमारी मजबूरी है। उस समय ३७ डालर प्रति बैरल क्रूड ऑयल का दाम हो गया था। जो थोड़ी बहुत मुझे जानकारी है, उसके मुताबिक अब अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का दाम २१-२२ डालर प्रति बैरल हो गया है।

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री (श्री राम नाईक): अब २७ डालर है।

श्री रामजीलाल सुमन : कहां ३७ और कहां २६ डालर है, १०-११ डालर प्रति बैरल कम हुआ है, आपका तेल पूल का घाटा भी कम हुआ है। जब तेल पूल का घाटा कम हो गया और अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का दाम कम हो गया तो फिर आप डीजल पर पैसा क्यों नहीं कम कर देते। खतरा यह लगता है कि ये दाम बढ़ाने वाले हैं। जो बात आपने आधार मानकर कही थी कि हमारी मजबूरी है, अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का दाम बढ़ गया है, इसलिए हमको पैसे बढ़ाने पड़ रहे हैं, जब अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल का दाम कम हो गया तो मैं समझता हूं कि सरकार को उसके दाम घटाने चाहिए, लेकिन इस मामले में यशवन्त सिन्हा जी और राम नाईक जी में परस्पर कोआर्डीनेशन नहीं है, क्योंकि अखबार में जो बयान छपे हैं, वे दोनों के अलग-अलग हैं, विरोधी हैं।

यह भारतीय रिजर्व बैंक का २७ जुलाई, २००० का एक सर्कुलर है। इस सर्कुलर में यह है कि ५ करोड़ रुपये तक के ऋण किसी भी काम के लिए लिया गया हो, चाहे उद्योग के लिए, चाहे कृषि के लिए, ३१ मार्च, १९९७ के पूर्व के ऋण का मूलधन देकर ब्याज देने की जरूरत नहीं है, लोग मूलधन देकर मुक्ति पा सकते हैं। जो लोग तिकड़मबाज हैं, चालाक हैं, पढ़े-लिखे हैं, वे तो जल्दी चीजों को समझ लेते हैं, क्योंकि ये जो खबरें छपती हैं, दिल्ली और देश के बड़े-बड़े अंग्रेजी के अखबारों में छपती हैं, जिससे किसानों का कोई सम्बन्ध नहीं होता। जो ग्रामीण बैंक हैं, क्षेत्रीय बैंक हैं, उन्होंने इस आशय की कोई जानकारी किसानों को नहीं दी, न वहां कोई स्थानीय अखबारों में उनकी भाषा में कोई खबर छपी, न बैंक ने कोई इश्तहार छापा, न तहसीलदार ने किसानों को कोई जानकारी दी, न कलैक्टर के यहां से उनको कोई जानकारी मिली। उसका नतीजा यह है कि रोज किसान तहसील की जेल में बन्द हो रहे हैं, रोज उनके घर पर छापा पड़ता है और रिजर्व बैंक के सर्कुलर का कोई लाभ किसानों को नहीं मिला। इस लाभ की अन्तिम तारीख ३१ मार्च है। किसान भी इससे लाभान्वित हों, उसके पास सही जानकारी पहुंचे, इसलिए मेरा सरकार से विनम्र आग्रह है कि रिजर्व बैंक के सर्कुलर की समयावधि कम से कम छ: महीने किसानों के लिए और बढ़नी चाहिए। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि देश के किसान का बहुत बुरा हाल है और सरकार की तरफ से जो संरक्षण और सहयोग किसान को मिलना चाहिए, वह संरक्षण और सहयोग नहीं मिल रहा है। आलू किसान परेशान है। सरकार ने पिछली बार धान का जो समर्थन मूल्य ५१० रुपये घोषित किया था, खरीद केन्द्र न खोलने की वजह से उसको धान २५०, ३०० और २७५ रुपये क्िंवटल तक बेचना पड़ा। किसान की उत्पादन लागत आसमान को छू रही है।

किसान का उत्पादन नहीं बिक रहा है। गन्ना किसानों का अरबों रुपया सरकार पर बकाया है। इस सदन में बार-बार चर्चा होने के बावजूद भी देश की इस ७०-७५ प्रतिशत आबादी के लिए सरकार की तरफ से जो राहत दी जानी चाहिए, वह नहीं दी जा रही है। हिन्दुस्तान का बजट जब तक कृषि पर आधारित नहीं होगा, तब तक इस देश का भला किसी भी कीमत पर नहीं हो सकता। किसान आज संकट में है, उसका उत्पादन नहीं बिक रहा है। उसके उपयोग आने वाली चीजें खाद, बिजली आदि के दाम बढ़ रहे हैं। यह किसानो को बर्बाद करने के अलावा और कुछ नहीं है। मैं सरकार से पुरजोर निवेदन करूंगा कि अगर हिन्दुस्तान का अर्थतंत्र वाकई में पटरी पर लाना है तो इस देश के किसान की हालत को सुधारने के अलावा और कोई जरिया नहीं है। इस सार्थक चर्चा के बाद भारत सरकार और विशेषरूप से कृषि मंत्री जी किसानों की हालत सुधारने का सार्थक प्रयास करेंगे। यही कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

श्री साहिब सिंह (बाहरी दिल्ली) : सभापति जी, किसान परेशान है, इसमें कोई संदेह की बात नहीं है। यह देश किसानों का देश है, यह देश गांवों का देश है, यह बात सही है। पिछले दिनों प्रधान मंत्री जी ने भी, सरकार ने भी और इस माननीय सदन के सदस्यों ने भी इस पर चिंता जताई है। लगातार किसान के उत्पादन की लागत बढ़ रही है। प्रधान मंत्री जी ने भी आज कहा है कि लागत कम होनी चाहिए। आज भी किसान के पास बिजली की ठीक व्यवस्था नहीं है। उसको खेत में पानी देने के लिए बिजली की जरूरत होती है। कई-कई राज्य तो ऐसे हैं जिनमें दो-तीन घंटे मुश्किल से बिजली मिलती है।

१६२३ ण्द्ध. (डॉ. लक्ष्मीनारायण पाण्डेय पीठासीन हुए) डीजल के भाव बढ़े, इसमें भी कोई संदेह नहीं है। जब हमारे कांग्रेस के मित्रों की सरकार ने डब्ल्यू.टी.ओ. पर हस्ताक्षर किए थे, उसके बाद से लगातार किसानों की परेशानी बढ़ती चली गई। किसान इतना परेशान हो गया कि उसको उत्पादन लागत भी नहीं मिली। मैं जानता हूं मेरे एक मित्र, जिन्होंने पिछले साल आलू बोया था, उस वक्त उसका बाजार भाव ११० रुपए प्रति क्िंवटल था। उन्होंने सोचा कि सस्ता है, मैं इसको कोल्ड स्टोरेज में रख देता हूं और जब दाम बढ़ेगा तो बेच दूंगा। साल भर में उसका किराया ही ८० रुपए के करीब आया और एक साल बाद बाजार में उसका भाव ८० रुपए प्रति क्िंवटल भी नहीं रहा। इस कारण वह अपना आलू उठाने कोल्ड स्टोरेज में भी नहीं गया, क्योंकि किराया देने के लिए भी उसके पास पैसे नहीं थे। जबकि उसने वहां आलू इस आशा में रख दिया था कि उसको अधिक पैसे मिलेंगे और वह जो पहले मिल रहे थे, उसे भी गंवा बैठा।

देश में किसान बहुत परेशान है। जिस तरह से सरसों का भाव गिरा, वह सब जानते हैं। उसका गेहूं गोदामों में रखा हुआ है। देश में पानी की कमी नहीं है। मैं अपने लोक सभाध्यक्ष जी के साथ उनके क्षेत्र में गया था। उनके क्षेत्र में महानदी बहती है। उन्होंने बताया कि इस नदी का पानी, नदी के साथ वाले खेतों में नहीं मिलता, करीब ८० प्रतिशत पानी समुद्र में जाता है। पिछले ५० साल में इस देश में अगर पानी का ठीक प्रबंध किया होता तो आज कहीं पर जो बाढ़ और सूखा आता है, वह नहीं आता। क्या ५० साल में इंतजाम नहीं हो सकता था, लेकिन गम्भीरता से किसान की समस्याओं के समाधान के लिए प्रयास नहीं किया गया। आज भी ८० प्रतिशत किसानों के खेत में पानी नहीं पहुंचता। मैं एक गांव में गया।

मैं वहां एक गांव में गया था जो पहले मध्य प्रदेश में था लेकिन अब छत्तीसगढ़ राज्य में है। वहां नदी पानी से भरी हुई है और मैंने किसानों से पूछा कि आप पानी क्यों नहीं ले सकते तो उन्होंने कहा कि हमारे पास पंप खरीदने के लिए पैसे नहीं है, टयूबवैल लगाने के लिए पैसे नहीं है। इस तरह की जो समस्याएं हैं, वे पिछले पचास वर्षों से किसानों के साथ रही हैं और जिन्होंने किसानों को बर्बाद करके रख दिया है। किसानों के नाम से जो सरकारें यहां रहीं, वे वोट तो लेती रहीं, ढोंग भी करती रही और अच्छे-अच्छे नारे भी देती रहीं और किसानों के ऊपर राज भी करती रहीं। पिछले दिनों जो मैंने सदन में कुछ बातें कही और जब इस माननीय सदन में विपक्ष की नेता भी थी, उप नेता भी थे, मैंने जब कहा कि किसानों के नेताओं ने कुछ बातें कही हैं, तब बड़ा शोर मचा था और ठीक मचा था। वे अब मानते हैं कि वे किसानों के मित्र नहीं हैं, ये अब मानने लगे हैं कि हमने किसानों के बारे में कभी ईमानदारी से नहीं सोचा, हमने किसानों का साथ कभी नहीं दिया। वे अब मानते हैं कि हमने किसानों के लिए न कभी पानी और न कभी बिजली का इंतजाम किया। किस किसान को कौन सी फसल कब बोनी चाहिए, क्या इसके बारे में कभी किसान को एजुकेट किया गया? जितनी टैक्नॉलोजी और रिसर्च हुई है, क्या वे कभी किसान तक पहुंचाई गई? मैं जानता हूं कि जो किसान सौ वर्ष तक जिस खेत में गेहूं बोता था, आज भी वहीं बोता है, जिस खेत में जवाहर बाजरा बोता था, आज भी वहीं बोता है। आज हमारे देश के अंदर जिन चीजों की आवश्यकता है, वे बाहर से मंगानी पड़ती हैं।…( व्यवधान )मुझे इस बात की खुशी है कि जब से यह सरकार आई है, इस सरकार ने आने के बाद किसानों के लिए जो कभी पचास साल तक किसान नीति नहीं बनी, इस सरकार ने कृषि नीति बनाने का फैसला किया है और उसकी घोषणा की है। जो किसान क्रैडिट कार्ड की बात पचास साल से होती रही, पचास साल के बाद इस सरकार ने किसानों के लिए क्रैडिट कार्ड इश्यू किये। न केवल क्रैडिट कार्ड इश्यू किये हैं बल्कि एक करोड़ से ज्यादा किसानों को कार्ड भी दे दिये गये हैं और तीन साल में जितने और भी किसान इसके लिए एलजिबल होंगे, उन सबको कार्ड दे दिये जाएंगे। न केवल क्रैडिट कार्ड ही दिये गये हैं बल्कि इस बजट में इसके बाद की भी व्यवस्था कर दी है कि अगर वह कार्डधारी, जिसको कार्ड मिला हुआ है, अगर कोई हादसा हो जाता है या किसी दुर्घटना में उसकी मौत हो जाये या वह अपंग हो जाये तो उसके लिए बीमे की भी व्यवस्था की गई है। ऑटोमैटिकली अगर वह अपंग हो जाता है तो उसे २५,००० रुपये मिलेंगे और दुर्भागय् से अगर उसकी डैथ हो जाती है तो ५०,००० रुपये मिलेंगे और उसके लिए उसे अलग से कोई किश्त या कोई प्रीमियम नहीं देना पड़ेगा ताकि अगर कार्ड लेकर यदि किसान के ऊपर कोई कर्जा चढ़ा हो तो वह किसी घरवाले को नहीं देना पड़ेगा बल्कि घर वालों को कुछ पैसा मिलेगा।…( व्यवधान )

श्री अनिल बसु (आरामबाग):बैंक के प्राइवेटाइजेशन के बाद क्या होगा? किसान को क्या मिलेगा?

…( व्यवधान )

श्री साहिब सिंह : मैं यह निवेदन कर रहा था कि अगर किसी ने किसानों की चिंता की है तो वह अब किसानों की चिंता शुरु हुई है। आपमें से कोई बता दें, यहां सभी पार्टी के सदस्य बैठे हैं, किसानों के नेता और किसानों के हमदर्द भी बैठे हैं, कुछ सच्चे और कुछ मिथ्या बैठे हैं, यहां एक बात भी बता दें कि क्या कभी किसी ने किसानों के लिए क्रैडिट कार्ड और फसल बीमा योजना के संबंध में कभी कोई प्रस्ताव पास किया है या कभी आज तक किसानों के बोर में कोई कार्यवाही की है या कृषि नीति की घोषणा की है? कोई भी एक काम किया हो तो बता दें। आज हमने गरीबों के लिए, खेतिहर मजदूरों के लिए बीमा योजना बनाई है और खेतिहर मजदूरों के लिए तो यह भी किया है कि यदि उसका बच्चा स्कूल नहीं जाता तो तीन बच्चों तक सौ रुपये महीना दिया जाएगा ताकि किसान के बच्चे पढ़ सकें। यह बात सही है कि इस देश में साक्षरता नहीं है। इस देश में अगर तरक्की नहीं है तो पढ़ाई के कारण से नहीं है और पढ़ाई इसलिए नहीं हो रही है कि देश में गरीबी है। अगर गरीब के बच्चे को पढ़ा दिया जाये और वह स्कूल जाने लगे तो खेती में कंट्रोल आ जाएगा और कृषि की जानकारी उसे ज्यादा होगी। इस सरकार ने बहुत कुछ काम किया है, मैं इसके लिए सरकार को बधाई देना चाहता हूं और मैं अपने मित्र को कहना चाहता हूं कि जितनी भी योजनाएं हैं, यह बात सही है कि पिछले पचास सालों के अंदर, समाज में, गरीबी, असमानता और बेरोजगारी बढ़ी है।

गरीब भी बढ़ी है, असमानता भी बढ़ी है, बेरोजगारी भी बढ़ी है । क्यों बढ़ी है? क्योंकि उसके अन्दर भ्रष्ट राजनीतिक थे, बेईमान आफिसर थे और समाज विरोधी व्यापारियों को पैदा किया । इस कारण ये सारी चीजें बढ़ी है । अगर भ्रष्ट राजनीतिक नहीं होते, तो बेईमान आफिसर नहीं होते और समाज विरोधी व्यापारी भी नहीं होते । ये सारी समस्यायें पैदा हुई हैं । गरीब और गरीब होता चला गया है, अमीर और अमीर होता चला गया है । …( व्यवधान )अगर आपने कोई दोष नहीं किया है, आपका कसूर नहीं है, तो आप क्यों बोल रहे हैं । आप शान्त रहिए…( व्यवधान )कुछ दिन पहले आप कह रहे थे कि भारत के अन्दर बहुत सारी चीजें आती हैं और इस कारण किसान परेशान हैं। आपने इस बजट में देखा होगा कि किस तरह से चाय, काफी, कोकोनट, सोयाबीन, सनफ्लावर और आयल आदि चीजों पर इतनी ज्यादा डयुटी बढ़ा दी गई है कि कोई व्यक्ति इन चीजों को बाहर से लाने की हिम्मत नहीं कर सकता है। इससे किसानों को उनके उत्पादन की कीमतें मिलेंगी। यह बात सही है कि जो सपोर्ट प्राइस दी जाती है, उसको चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत है, क्योंकि किसानों को दिक्कते पैदा होती हैं । राज्यों में वभिन्न दलों की सरकारें हैं, कांग्रेस दल की भी सरकारें हैं, सीपीआई और सीपीएम की मिली-जुली सरकारें भी हैं, राज्यों को अधिकार दे दिया गया है कि वे सामान को प्रोक्योर करें, गोडाउन्स में डालें और बांटें । इसमें कोई सन्देह नहीं है कि पिछले पचास वर्षों में पीडीएस द्वारा जितनी धांधली हुई, उसके लिए पिछली सरकारें दोषी हैं, जहां बेईमानी के बगैर काम ही नहीं चलता था । उसको ठीक करने के लिए यह बात जरूर है, हम जिस किसान को, जिस गरीब को राशन देते हैं, वह उसको नहीं मिलता है । कैरोसिन आयल २५ प्रतिशत ही गरीब आदमी के पास पहुंच पाता है और ७५ प्रतिशत कैरोसिन आयल इधर-उधर चला जाता है और मिलावट पैदा कर दी जाती है। इससे बहुत सारी दिक्कतें पैदा होती हैं, जिनको चुस्त-दुरुस्त करने की आवश्यकता है ।

महोदय, मैं एक बात और कहना चाहता हूं, पिछले काफी दिनों से किसान परेशान रहा है, किसान दुखी रहा है, इसके पीछे कारण यह रहा है कि नेताओं ने किसानों के कभी संगठित नहीं किया, बल्कि किसानों को बांट दिया । अगर किसानों को संगठित किया होता और स्टेट के अन्दर जो संगठित रहते हैं, वे सब चीजों का लाभ ले लेते हैं, किसान संगठित नहीं रहे, तो उनको भी कोई लाभ नहीं मिला । मैं एक शेर अर्ज करना चाहता हूं - शिकवा सैयाद का ए बुलबुले नौशाद न कर, तू गिरफ्तार हुई है अपनी सदा के बाइस । किसान अपनी शराफत के कारण, अपनी ईमानदारी के कारण, अपने भोलेपन के कारण किसान परेशान हुआ है । हम सभी सांसदों को चाहिए कि किसानों को संगठित करें । उनको उनके अधिकारों के बारे में बतायें । जिस बिल पर सदन में चर्चा हो रही थी, उस बिल के माध्यम से किसानों को पहली बार अधिकार दिया गया है । उस बिल के माध्यम से पूरे अधिकार दिए गए हैं। किसानों के अधिकारों को कोई छीन नहीं सकता है । यह बात सही है कि टि्रप एग्रीमेंट के कारण अगर जांच की जाए, अगर ठीक प्रकार से कानून बनायेंगे, तो कोई किसान को मार नहीं सकेगा । प्रधान मंत्रीजी ने ठीक कहा है कि हमें पलायन नहीं करना है, बल्कि हमें चेलेंजेज का मुकाबला करना है । चैलेंज का मुकाबला करने के लिए, जो WTO से एग्रीमेंट हुआ है, टि्रप एग्रीमेंट हुआ है, जो कानून बनाने जा रहे हैं, उन सबको हमें देखना होगा। हमने कस्टम डयुटी बढ़ाई है, उससे आयात नहीं होगा, लेकिन हमें इस स्थिति को रोज-रोज देखना होगा । हमारे वित्त मंत्री जी ने कहा है कि स्थिति को रोज देखेंगे और हमें कोई मैकेनिज्म बनाना होगा । जब मैकेनिज्म बन जाएगा, व्यवस्था बन जाएगी, जहां कहीं भी किसानों के साथ नुकासन हुआ है, डयुटी बढ़ाने का काम करना है, तो हम तुरन्त करेंगे । किसानो को ठीक प्रकार से शक्षित करने के लिए मैं चाहता हूं कि टेलीविजन में किसान चैनल होने की आवश्यकता है, ताकि किसानों को पता चले कि क्या बोना चाहिए और क्या नहीं बोना चाहिए । कहीं कोई बीमारी पैदा होती है, तो उसको ठीक करने के लिए किस चींज की आवश्यकता है ।

महोदय, मैं कहना चाहता हूं कि हमने फसल बीमा योजना की बात भी कही है ।

किसान का पशु भी किसान के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, जितनी फसल महत्वपूर्ण है। जो किसान डेरी फार्मिंग वगैरह करते हैं, उनके लिए पशु बहुत महत्वपूर्ण है और जो बैलों से खेती करते हैं, उस किसान के लिए पशु महत्वपूर्ण है। हमने जो यह बात की है कि हम फसल का बीमा करेंगे, उसके साथ-साथ हमें पशुओं का बीमा करने की योजना भी बनानी चाहिए। आज देश में जो लैंड एक्वीजिशन एक्ट है, वह १८९४ का है। आजादी से ५०-५५ साल पहले का कानून है, जो अंग्रेजों के बनाए हुए कानून थे, उन्हें बदलने की जरूरत है। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि आज हिन्दुस्तान की राजधानी में डीडीए के पास जो हजारों-करोड़ों रुपए हैं, वे किसान के पैसे हैं। आज किसान की जमीन एक-दो रुपए गज में डीडीए ने एक्वायर की, उसे एक्वायर करके हजारों-लाखों रुपए गज बेचा, उससे हजारों-करोड़ों रुपए प्राप्त हुए। उस पर किसान का कोई हक नहीं है लेकिन जिस प्लाट को किसान से एक्वायर करके डीडीए ने लिया था, अगर वह प्लाट किसी दूसरे को बेचता है तो उस पर जो मुनाफा होता है, उसमें ५० फीसदी डीडीए लेता है। हालांकि जमीन आर्जिनली किसान की थी, लेकिन किसान को एक पैसा भी नहीं मिलता। किसान को एक बार दिया, उसके लिए भी किसान को धक्के खाने पड़े थे। एक बार देने के बाद किसान को पैसा नहीं दिया जाता, इसलिए ऐसे कानून में परिवर्तन करने की आवश्यकता है।

महोदय, दिल्ली की सरकार, जिसकी सरकार के नुमाइंदे, जिनकी पार्टी की सरकार हमारे सामने विपक्ष में बैठी है, आप ताज्जुब करेंगे कि जब से सरकार बनी है यह घोषणा की गए, एक सम्मेलन किया गया और उसे किसान सम्मेलन का नाम दिया गया। किसानों के विरोधियों ने किसानों का सम्मेलन किया और वहां मुख्य मंत्री ने घोषणा की कि हमारी पार्टी के नेता ने कहा है इसलिए मैं किसान का मुआवजा २३ लाख रुपए एकड़ घोषित करती हूं। उस दिन से अभी तक फाइल नहीं बनी। मुख्य मंत्री को किसान का मुआवजा बढ़ाने की पावर नहीं है। लेफ्टिनेंट गवर्नर को प्रपोज़ल पुटअप करना होता है। जिस दिन घोषणा की, मैं दावे के साथ कहता हूं कि तब से कोई प्रपोज़ल पुटअप नहीं किया और २३ लाख रुपए का जो हमने प्रोविजन किया था, जब मैं मुख्य मंत्री था तो हमने यह प्रोविजन किया था कि किसानों को धक्के नहीं खाने पड़ेंगे। हर साल १२ प्रतिशत मुआवजा पहली अप्रैल से अपने आप बढ़ जाएगा। जब तक मैं मुख्य मंत्री रहा तब तक बढ़ा, उसके बाद नहीं बढ़ा। सन् २००१ में कहा गया है कि हम २३ लाख रुपए कर देंगे, जब कि १२ प्रतिशत बढ़ाने से २४ लाख बनता है। वे कहते हैं कि हमने २३ लाख रुपए मुआवजा कर दिया। उन्हें जानकारी नहीं है या गिनती नहीं आती। इस तरह के अन्याय किसानों के साथ हो रहे हैं।

महोदय, हमने दिल्ली में तय किया था, क्योंकि किसान की होर्डिंग छोटी होती जा रही है और आबादी बढ़ती जा रही है तो किसान खेत पर निर्भर रहता है। वह भूखा मरता है। आधे काम करते हैं और आधे बेकार हो जाते हैं। हमने यह तय किया था कि किसान को एक ३०० गज इंडस्टि्रयल प्लाट, उसी की अपनी जमीन में से ३०० गज के प्लाट को इंडस्ट्री के लिए मार्क करेंगे। जहां किसान के बच्चे छोटे-मोटे उद्योग-धंधे करेंगे। कॉटेज इंडस्ट्री बनाएंगे। इस सरकार ने आने के बाद उस ३०० गज के प्रोविजन को पूरी तरह से खत्म कर दिया और ये कहते हैं कि हम किसानों के हितैषी हैं। हम उन्हें रहने के लिए और पशुओं के लिए २२ सौ गज का प्लाट देते थे, इन्होंने उसे खत्म करके एक हजार गज कर दिया। दिल्ली की सरकार की एक भी नीति ठीक नहीं है। आप दिल्ली की सरकार की नीतियां देख लो तो आपको पता चल जाएगा कि कांग्रेस क्या चाहती है और क्या कहती है। कांग्रेस के दांत खाने के ओर हैं और दिखाने के ओर हैं। ये लोग किसान के नाम पर सम्मेलन करते हैं, लेकिन ये सारी किसान विरोधी नीतियां बनाते हैं। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि जो पार्टियां कहती हैं कि हम किसान की, मजदूरों की पार्टियां हैं, जो कम्युनिस्ट या किसी दूसरे के नाम पर प्रदेशों में राज करती रही हैं, आज वे नहीं बता सकते कि उन्होंने कौन सा चमत्कार करके दिखाया कि उस प्रदेश के किसान फले-फूलें हों, उनकी तरक्की की हो। इस देश के शहरों के विकास का अगर कहीं से रास्ता होकर गुजरता है तो वह गांवों से होकर गुजरता है। अगर गांवों में विकास होगा तो शहरों में लोग नहीं आएंगे, इसलिए हमें गांवों में विकास करने की जरूरत है।…( व्यवधान )

अगर वहां छोटे-मोटे उद्योग-धंघे चलाएंगे तो गांवों से शहरों में कोई नहीं आएगा। इसलिए शहरों की समस्या का समाधान करना है तो गांवों, किसानों और मजदूरों का विकास करना होगा। दुनिया में इन चीजों की बहुत अच्छी मार्केट है।

दुनिया के अंदर कॉटेज इंडस्ट्रीज, हैंडीक्राफ्ट्स, हाउस होल्ड इंडस्ट्रीज की चीजों की बहुत डिमांड है।

सभापति महोदय, आज इस बात की आवश्यकता है कि इसके लिए सरकार को और कदम उठाने पड़ेंगे, चूंकि यह कृषि और ग्रामीण विकास का मामला है। केन्द्र सरकार ने इसके लिए बहुत पैसे का प्रावधान किया है। सब राज्यों को पैसा दिया जा रहा है। जिस-जिस की भी सरकार जिस प्रदेश में हैं, उन्हें उसमें अधिक काम करने की आवश्यकता है, वहां के गांवों के लिए काम करने की आवश्यकता है। अगर वे इनके लिए काम करेंगे तो किसानों की समस्या हल होगी। निश्चित रूप से हम सब सोचें, विचार करें, हम पार्टीबाजी की बात छोड़ दें। जहां किसान की बात आती है वहां सबको मिलकर किसान के विकास की बात सोचनी चाहिए। आज तक किसान जिस वजह से मरता रहा, उसके बारे में हम सबको गंभीरता से सोचना चाहिए।

सभापति महोदय, इकबाल ने एक शेर कहा था -

"जिस खेत से दहकां तो मयस्सर न हो रोटी, उस खेत के हर गोशा-ए-गंदुम को जला दो।" यह बात अगर कहने की नौबत आई थी तो इसलिए आई थी क्योंकि किसानों की हालत बहुत खराब थी और आज भी किसानों की हालत बहुत खराब है। हालांकि उसमें बहुत सुधार किये गये हैं, उनके लिए बहुत काम किये गये हैं। यह सरकार किसानों के लिए बहुत काम कर रही है। आज प्रधान मंत्री जी ने भी स्वीकार किया है कि अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है, किसानों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। यदि किसानों की हालत ठीक होगी तो देश की हालत ठीक रहेगी। किसान स्वस्थ रहेगा तो देश स्वस्थ रहेगा। किसान मजबूत होगा तो देश मजबूत होगा। यदि किसान अच्छे होंगे तो देश अच्छा होगा। इसलिए हम सब इस पर मिलकर विचार करें औऱ इसके लिए काम करें।
श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी :माननीय सभापति महोदय, किसानों की समस्याओ को लेकर आज हम यहां चर्चा करने के लिए उपस्थित हुए हैं। मुझे स्मरण आता है कि यह वही देश है जहां चंद्रगुप्त मौर्य के जमाने से लेकर सारा इतिहास गवाह है कि इस देश को दुनिया के लोग सोने की चड़िया मानते थे और तब इस सम्पन्न भारत के लिए किसी अम्बानी, किसी टाटा, किसी बिरला किसी उद्योगपति की जरूरत नहीं पड़ी थी। उस समय इस देश का कर्णधार अगर कोई था तो वह इस देश का किसान था। रात-दिन मेहनत, मजदूरी करके उसने अपना खून और पसीना लगाकर इस देश को बढ़ाया था। किसान इस देश का संबल था।…( व्यवधान )
श्री दिलीप संघाणी (अमरेली):कांग्रेस ने पूरा नष्ट कर दिया।…( व्यवधान )
सभापति महोदय : आप डिस्टर्ब मत करिये, बैठे-बैठे रनिंग कमेन्ट्री मत करिये।
कुंवर अखिलेश सिंह: आप लोग तो देश को बेच रहे हैं।
सभापति महोदय : आप डिस्टर्ब मत करिये, उन्हें बोलने दीजिए। बैठे-बैठे रनिगं कमेन्ट्री करना ठीक नहीं है, इस तरह से बोलना ठीक नहीं है।
श्रीमती भावनाबेन देवराजभाई चिखलिया (जूनागढ़) : कांग्रेस की गलत नीतियों के कारण किसानो की यह हालत हुई है।…( व्यवधान )
श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी :माननीय सभापति महोदय, १९४७ में यह देश आजाद हुआ। मैं अपेक्षा कर रहा था वर्मा जी अपनी बातें कह गये हैं तो जरा सुनने के लिए भी बैठते, परंतु उनकी कोई मजबूरी रही होगी। मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं, इस नाते नहीं कि वर्मा जी मुख्य मंत्री रहे हैं, बल्कि इसलिए कि वे किसान परिवार से आये हैं, किसान के बेटे हैं, इसलिए मेरे मन में उनके लिए बहुत सम्मान है। यह बात अलग है कि उनकी मजबूरी थी और उनकी मजबूरी को हम सब समझ सकते हैं। ह्ृदय के भीतर वह इस पीड़ा को महसूस कर रहे हैं। लाख छिपाने के बावजूद उनकी भाषा से भी यह छलक पड़ा कि वह महसूस करते हैं कि इस देश के किसान दुखी हैं, पीड़ित हैं, आहत हैं।
सभापति महोदय, १९४७ में जब देश आजाद हुआ था तो इस देश की आबादी ३६ करोड़ थी।
३६ करोड़ की आबादी का पेट भरने के लिए इस देश में जिस दुर्दशा में हमें अंग्रेज़ छोड़कर गए थे, इस देश की जो दशा थी -- किसानों की, खेत की, लैन्ड रिफ़ॉम्र्स की, उन सबका यह परिणाम था कि पेट भरने के लिए हमें बाहर के देशों से अनाज मंगाना पड़ा। वर्मा जी ने यहां पर ऐसे सब कुछ कहा जैसे कांग्रेस ने ही किसानों का सत्यानाश किया हो।…( व्यवधान )
श्री प्रहलाद सिंह पटेल :अगर बुंदेलखंड का हिसाब देखें आज़ादी के बाद का तो मुझे लगता है कि वर्मा जी ने गलत नहीं बोला।
श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी : आप कृपया विराजें। जब आपका बोलने का अवसर आए तो पूरी तरह से अपनी बात कहें। सभापति जी, मैं अनुरोध करूंगा कि मैं अमूमन दूसरों के बोलने में हस्तक्षेप करने का आदी नहीं हूं। थोड़ा सा कृपा करके मुझे बोलने दें।
माननीय सभापति महोदय, इसी देश में आज सौ करोड़ की आबादी है और इस सौ करोड़ की आबादी में आज भी इस देश के अंदर…( व्यवधान )
माननीय सभापति महोदय, १९७० के दशक में इस देश के अंदर हरित क्रांति लाने का एक सपना देखा गया। योजनाबद्ध तरीके से इस देश के अंदर नए रिफॉम्र्स लाए गए और अनुसंधान को बढ़ावा दिया गया। नई तकनीकों को लाया गया, नए बीजों को लाया गया, किसानों के लिए सिंचाई के साधन उपलब्ध कराए गए, विद्युत पहुंचाने का काम गांव-गांव में व्यापक पैमाने पर किया गया और इन सब कृषि विस्तार के कामों को गांवों तक पहुंचाने के लिए पूरा तंत्र विकसित किया गया। यह एक रात में, एक दिन में, एक साल में या दो साल में नहीं हुआ, लेकिन कुछ वर्षों के अंदर ही हुआ और यह वही देश था जो पी.एल.४८० के लिए दूसरों के सामने कटोरा लिए खड़ा होता था। इस देश में आज सौ करोड़ की आबादी होने के बावजूद भी एफ.सी.आई. के गोदामों में अनाज इतना भरा पड़ा है कि हमारे पास नए साल की फसल रखने के लिए जगह नहीं है। …( व्यवधान )लाखों टन अनाज हमारे गोदामों में सड़ रहा है। आज ही प्रधान मंत्री कह रहे थे और ठीक बात कह रहे थे तथा मैं उनकी बात से सहमत हूं कि आज क्राइसेज़ इस बात का नहीं है कि कमी है। आज समस्या इस बात की है कि इफरात से हम कैसे निपटें। और यह सब केवल दो सालों में हो गया, भारतीय जनता पार्टी की सरकार के जमाने में हो गया? अगर ऐसा क्लेम आप करना चाहते हैं, अगर ऐसी खुशफहमी में आप रहना चाहते हैं तो मुझे उस पर कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि सारा विश्व और सारा देश जानता है कि इन दो वर्षों में यह सब कुछ नहीं हुआ। जो कुछ भी अच्छा हुआ पिछले पचास वर्षों में चाहे वह कृषि के क्षेत्र में, विज्ञान के क्षेत्र में, विकास के क्षेत्र में, शिक्षा के क्षेत्र में, जो कुछ भी अच्छा हुआ, वह पिछले दो साल के अंदर हो गया और जो कुछ भी नहीं हो पाया, वह सारे का सारा दोष कांग्रेस का है, ऐसी मान्यता अगर कुछ लोगों की है तो उस मान्यता को सुधारने में उनकी कुछ सहायता मैं कर पाऊंगा, मुझे नहीं लगता। क्योंकि सोते को जगाया जा सकता है लेकिन जागे हुए जो सो रहे हैं, उनको नहीं जगाया जा सकता। मैं आज की स्थिति के बारे में यह कह रहा हूं।
माननीय सभापति महोदय, हम विरोधी दल के सदस्य होने के नाते कुछ कहें तो शंका उठाई जा सकती है कि मुमकिन है कि राजनीतिक कारणों से हम कोई बात कर रहे हैं, लेकिन इस देश का मीडिया जो निष्पक्ष रूप से सारे देश के वभिन्न घटनाक्रमों की जांच करता है, नज़र रखता है और एक स्तंभ माना जाता है हमारे लोकतंत्र का, आज इस देश का मीडिया किसानों की स्थिति के बारे में कहता है, मैं चंद उदाहरण आपके सामने पेश करता हूं। एक राष्ट्रीय पत्रिका है, मैं उससे उद्धरण देना चाहता हूं।
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): उसके मुखपृष्ठ पर क्या लिखा है, वहां से शुरू करें।
श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी : इसके मुखपृष्ठ पर लिखा है ‘ खेती करे सो मरे।’ …( व्यवधान )
माननीय सभापति महोदय, मैं कोट करता हूं-
"पिछले कछ महीनों में स्वतंत्र भारत को सबसे बड़े और रहस्यपूर्ण कृषि संकट का सामना करना पड़ा। सबसे बड़ा इसलिए कि पंजाब से केरल और गुजरात से असम तक हर प्रदेश को ही नहीं बल्कि अनाज, तिलहन और फलों तक की फसलों को अपनी चपेट में लिया है और रहस्यपूर्ण इसलिए कि अप्रत्याशित रूप से लगातार १२ सामान्य मानसूनों के बाद यह स्थिति बनी है और उपज में गिरावटों के साथ कीमतों के गिरने से यह विकट स्थिति उत्पन्न हुई है। "यह इस देश का मीडिया कह रहा है।
माननीय सभापति जी, राष्ट्रीय सहारा नाम का एक अखबार है। उसके कुछ उद्धरण मैं देना चाहता हूं। उन्होंने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। वह अखबार कहता है कि "यह बजट उद्योगपतियों का, उद्योगपतियों द्वारा, उद्योगपतियों के लिए लाया गया बजट है। इसलिए उद्योंगों के अलावा कृषि की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया है।" मैं चन्द और उद्धरण अथवा देश के वभिन्न हिस्सों की कुछ झलकियां आपके सामने रखना चाहता हूं- आंध्राप्रदेश के वल्लभनेनि वेंकटेश्वरराव, गांव का नाम जम्मल मुडुगू ने कर्ज चुकाने के लिए एक साथ सात एकड़ जमीन बेच दी। फिर भी ४०,००० रुपए बिजली के बकाया रहे। ५० वर्षीय श्री राव ने तंग आकर २ जनवरी को फांसी लगा ली। आत्महत्या कर ली। पंजाब में लुधियाना जिले के श्री ज्वाला सिंह जी ने साफ तौर पर कहा कि हर फसल के साथ हम कर्ज लेते हैं। श्री एस.एस. जवाहर नामक कृषि वैज्ञानिक का कहना है कि धान का संकट एक बड़ी त्रासदी की चेतावनी मात्र है॥ लुधियाना में कृषि विश्वविद्यालय के अध्यापक श्री जोगेन्द्र सिंह का कहना है कि बढ़ती लागत और स्थिर उपज के कारण अनाज किसानों का मुनाफा मारा जा रहा है।
माननीय सभापति महोदय, गुजरात के गामा भाई कर्जन भाई की स्थिति यह है कि वे १० साल से सात एकड़ में अपने फॉर्म पर खेती कर रहे हैं। पिछले तीन सालों में लगातार उनकी खेती की लागत चार गुनी बढ़ी और मुनाफे में केवल दो गुना इजाफा हुआ है। यह जो अन्तर बढ़ता जा रहा है यह उनकी दुर्दशा का कारण है। दक्षिण भारत के प्रान्त की स्थिति बताऊं । केरल के चेरूवरकोन्नम के ७३ वर्षीय जैकब का कहना है कि उन्हें उनके नारियल के ५ रुपए से १० रुपए प्रति नग के हिसाब से मिलते थे, लेकिन अब वे कहते हैं कि उन्हें ढाई रुपए प्रति नग के हिसाब से मिल रहे हैं। यह स्थिति आज नारियल की है। चाय की हरी पत्ती की कीमत १९९८ में एक दिन १८ रुपए प्रति किलो थी और आज ५ रुपए प्रति किलो है।
…( व्यवधान )
माननीय सभापति महोदय, मैने ये बातें इसलिए कही हैं कि सारे देश में, चाहे असम हो, दक्षिण भारत हो, उत्तर भारत हो, किसानों की यही स्थिति है। किसान पर दो तरफा मार पड़ रही है। वह दो पाटों के बीच में पिस रहा है। एक तो उसे मौसम की मार का सामना करना पड़ रहा है। बंगाल, बिहार और असम में बाढ़ के कारण उसकी करोड़ों रुपए की फसल नष्ट हो रही है, तो दूसरी तरफ लगातार तीन साल से राजस्थान, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और झारखंड में सूखा पड़ रहा है। आन्ध्रा प्रदेश के कुछ हिस्सों में लगातार दो-तीन साल से सूखा पड़ रहा है। उसके कारण उनकी फसलें नष्ट हो रही हैं। एक तरफ तो उसे मौसम की, प्रकृति की मार, प्राकृतिक आपदाओं की मार, अल्पवर्षा, सूखे की मार झेलनी पड़ती है …( व्यवधान )
श्री रामानन्द सिंह (सतना):सभापति महोदय, मध्य प्रदेश में वहां की सरकार ने किसानों के ऊपर गोली चलवा दी। उसका भी उल्लेख माननीय सदस्य करें और उसकी भी चर्चा यहां करें, तो बेहतर रहेगा।
…( व्यवधान )
सभापति महोदय : रामानन्द जी, आप बैठिए।
श्री रामानन्द सिंह : सभापति महोदय, मध्य प्रदेश की सरकार का भी उल्लेख आवश्यक है।
…( व्यवधान )
श्री लक्ष्मण सिंह (राजगढ़):यदि मध्य प्रदेश में ऐसी गड़बड़ी होती, तो वहां दूसरी बार कांग्रेस की सरकार नहीं बनती।…( व्यवधान )
श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी :सभापति महोदय, मैं सारे देश के किसानों की स्थिति यहां सदन के सामने रखना अपना कर्त्तव्य मानता हूं। हिमाचल प्रदेश में पिछले वर्ष बाढ़ के कारण इतना नुकसान हुआ कि धान और सेब जो कि वहां की मुख्य पैदावार है खासकर कालपा घाटी, सांगला घाटी और किन्नौर के क्षेत्र में विश्व प्रसिद्ध सेब पैदा होते हैं, उस क्षेत्र से सेब का आवागमन नहीं हुआ। १० लाख से लेकर १२ लाख तक सेब की पेटी हर वर्ष वहां से निकलती थी, उसका आवागमन नहीं हुआ और वह वहां पर पड़ा-पड़ा सड़ गया। इस संबंध में बार-बार सरकार का ध्यान आकर्षित किया गया लेकिन यह सरकार कोई रास्ता नहीं निकाल पाई। पिछले दिनों हमने और कई माननीय सदस्यों ने पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, आंध्रा प्रदेश, उड़ीसा आदि इन सारे राज्यों के बारे में यहां चर्चा की थी कि एफ.सी.आई. उनकी फसल को खरीद नहीं रही तथा उसने वहां कोई केन्द्र नहीं खोले। जब उनकी खरीद नहीं हुई तब किसान मजबूर होकर उन्हें औने-पौने दामों में बड़े व्यापारी को बेचने के लिए मजबूर हो गये। उनकी धान और अन्य फसलों की लागत भी नहीं निकल पाई। नतीजा यह हुआ कि उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई, उसकी कमर टूट गई। राजस्थान और खासकर मध्य प्रदेश क्योंकि आप मध्य प्रदेश के बारे में पूछ रहे थे, वहां सोयाबीन की सर्वाधिक पैदावार होती है। कुछ हिस्से महाराष्ट्र और राजस्थान के भी हैं जहां सोयाबीन की फसल पैदा होती है। इस सरकार के आने से खाद्य तेलों के आयात के ऊपर ६० से ६३ प्रतिशत तक आयात शुल्क होता था लेकिन आज वह घटकर १० प्रतिशत कर दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि मलेशिया, इंडोनेशिया, ब्राजील और अन्य देशों का सस्ता तेल, जो वहां के किसान को २०० प्रतिशत सबसिडी मिलती है, उनके सस्ते खाद्य तेल हमारे देश के अंदर आकर डम्प होने शुरू हो गये और हमारे देश का जो तिलहन किसान है, वह टूट गया। सोयाबीन, सरसों, तिल, अरण्डी और अन्य जितने भी तिलहन के जिन्स हैं, उन सबका किसान पूरी तरह से टूट कर सड़क पर आ गया। यह स्थिति वहां की हुई। १३ वर्षों में न्यूनतम कीमतें आज जिसकी मिल रही हैं, वह सोयाबीन की मिल रही हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र की आज यह स्थिति है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश आदि ये सारे क्षेत्र गेहूं उत्पादक क्षेत्र माने जाते हैं। हरियाणा में गेहूं उत्पादन की लागत में भारी वृद्धि हुई। उसी के साथ-साथ हमने बिजली की कीमतें बढ़ा दीं, डीजल की कीमतें बढ़ा दीं। उसके बाद रासायनिक खादों की कीमतें बढ़ा दीं। आज इन तमाम चीजों पर सबसिडी विदड्रा करने पर परिणाम यह हुआ कि किसान की लागत बढ़ती जा रही है और उसकी लागत के अनुपात में आज उसको मार्केट में जो मूल्य मिल रहा है, वह लाभकारी मूल्य नहीं मिल रहा है। यही कारण है कि आज किसान आत्महत्या करने पर उतारू है। केरल, कर्नाटक, तमिलनाडू आदि दक्षिण भारत राज्यों में नारियल, काफी, रबड़, सुपारी और चाय काफी मात्रा में पैदा होती है। आयात शुल्क में भारी कमी होने की वजह से बाहर के देशों से सस्ते दामों पर फसल यहां आने लगी। उसका नतीजा यह हुआ कि नारियल और चाय से लेकर हर चीज की कीमत आज नीचे चली गयी। आज दक्षिण भारत का किसान बिल्कुल सड़क पर आने की स्थिति में खड़ा हो गया है।
सभापति जी, यही हालत गन्ना किसानों की है। मैं हर चीज के बारे में बताऊंगा। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में गन्ने की पैदावार होती है। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में भी होती है। शक्कर मिलों ने किसानों का गन्ना औने-पौने दामों में खरीद लिया। इससे उनकी लागत भी नहीं निकलती थी। आप स्वयं जानते है, बहुत से माननीय सदस्य भी जानते हैं कि इससे किसानों ने अपनी खड़ी फसलों पर आग लगा दी क्योंकि इससे किसानों की कटाई भी पूरी नहीं पड़ती थी। शुगर मिल वालों ने गन्ना लेकर उन्हें पर्चियां दे दीं। वे पर्चियां छह महीने या साल भर से लेकर फिर रहे हैं लेकिन उनके पैसों का भुगतान नहीं हो रहा। उनकी बेटी का विवाह होने को है और वे पर्चियां लेकर घूम रहे हैं। उनकी इन पर्चियां को इनकैश नहीं किया गया, पैसा नहीं दिया गया। करोड़ों-करोड़ रुपये किसानों के उन शुगर मिलों के पास पड़े हुए हैं और शुगर मिल वाले किसानों का पैसा वापिस नहीं दे रहे। एक तो सस्ते दाम पर दिया, उस पर वह पैसा भी उनको नहीं मिल रहा। इसकी चर्चा यहां इस सदन में भी हुई। इस प्रश्न को यहां एक बार नहीं बल्कि अनेक बार उठाया गया लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ।

17.00 hrs. आज भी वही पर्ची लिए किसान घूम रहा है।…( व्यवधान )मैं अपनी पार्टी की तरफ से इनीशिएट कर रहा हूं।

सभापति महोदय : आपके दल से काफी लोग बोलने वाले हैं। मुझे कोई आपत्ति नहीं है अगर आप पूरे दल का समय ले लें। आपके बीस मिनट हो चुके हैं।

श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी : अभी दस मिनट हुए हैं।

सभापति महोदय : मैंने नोट किया है।

श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी : दस मिनट तो हो-हल्ले में निकल गए।…( व्यवधान )

कारण क्या हुआ। यह गिरावट क्यों आई? को राजनैतिक बात नहीं करना चाहता है। जरा ठंडे दिमाग से सोचें। हुआ यह कि केन्द्र सरकार ने एक फैसला लिया कि हम जो पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के माध्यम से सस्ता गल्ला गांवों में किसानों, छोटे वर्ग के लोगों, मजदूरों को देते थे, हमने उसकी कीमत बढ़ा दी। उस गल्ले की कीमत नौ रुपये किलो हो गई। ...(व्यवधान)

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : वह महंगा गल्ला हो गया, सस्ता गल्ला नहीं है।

श्री सत्यव्रत चतुर्वेदी : जो पी.डी.एस. से मिलता था, वह तो महंगा हो गया और बाजार में किसान का गल्ला सस्ता हो गया। जब बाजार में सस्ता है तो आपके पी.डी.एस. से कौन खरीदेगा। नतीजा यह हुआ कि एफ.सी.आई. के गोडाउन में पिछले साल का जो भंडार भरा था, वह भरा रहा, उठा नहीं वर्ना हर साल वह भंडार पी.डी.एस. के माध्यम से बिक जाता था। जब वह नहीं उठा तो एफ.सी.आई. ने इस साल, उनकी कैपेसिटी पूरी थी, खरीद नहीं की। यह विसंगति चक्र है। जब खरीद नहीं की तो किसान का गल्ला फिर सस्ता हो गया। अब आप पी.डी.एस. के माध्यम से कीमतें बढ़ाए रहेंगे। बाजार में कीमतें कम होंगी तो स्वाभाविक है कि एफ.सी.आई. कभी गल्ला नहीं खरीद पाएगा। मैं तो यह सुन रहा हूं कि एफ.सी.आई. से यह सरकार गल्ले की खरीद पूरी तरह बंद कराने वाली है। यह तो सीधा-सीधा किसान के सिर पर चोट करने वाली बात होगी।

आयात शुल्क कम कर दिया गया, क्वान्टीटेटिव रिस्टि्रक्शन्स हटा दी गईं। उसकी वजह से पिछले साल यह सारी स्थ्ित बनी। गेहूं के समर्थन मूल्य में १९७१ से २००० तक आठ गुना इजाफा हुआ। लेकिन गेहूं के लागत मूल्य में पन्द्रह गुना इजाफा हुआ। समर्थन मूल्य और लागत मूल्य के बीच में जो अंतर है, अगर उस अंतर को नहीं घटाया गया, अगर कोई निश्चित लाभांश सुनिश्चित नहीं किया गया तो यह अंतर इस देश के किसान के लिए घातक सिद्ध होने वाला है, मैं इस बात को कहना चाहता हूं।

१७.०३ ण्द्ध. (श्री पी.एच. पांडियन पीठासीन हुए) मैं चंद चीजों के उदाहरण देना चाहता हूं। इससे स्थिति बिल्कुल साफ हो जाएगी, दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। यह आंकड़े हैं जो मैंने इकट्ठे किए हैं। अक्टूबर १९९८ में चावल की कीमत ९६८ रुपये प्रति क्िंवटल थी, अक्टूबर १९९९ में ९६८ से ८६२ हो गई और अक्टूबर २००० में ८६२ से ८०० रुपये प्रति क्िंवटल हो गई। यह किसान की फसल की कीमत है। गेहूं - अक्टूबर १९९८ में ७५९ रुपये प्रति क्िंवटल, अक्टूबर १९९९ में ७४० रुपये हो गई और सितम्बर २००० में ६०५ रुपये रह गई। यह स्थिति गेहूं की बनी है। अरहर - अक्टूबर १९९८ में २,३८० रुपये प्रति क्िंवटल थी जो अक्टूबर १९९९ में घट कर १,९२५ रुपये रह गई, सितम्बर २००० में १,४०० रुपये प्रति क्िंवटल रह गई। और जनवरी २००१ में १,३३० रुपये प्रति क्िंवटल रह गई। २,३८० से १,३३० पर आ गई। नारियल - १९९७ में ५१० रुपये प्रति सौ नग, १९९८ में ४१७ रुपये प्रति सौ नग, १९९९ में ५५५ रुपये बढ़ा और सन् २००० में २५० रुपये प्रति सौ नग की कीमत रह गई है। ५५५ रुपये से २५० रुपये पर आने पर मजबूर हुआ। यह नारियल के किसान की हालत है। चाय - १९९९ में ६१.६ रुपये प्रति किलो औसत कीमत है। १९९८ में ७३.४ रुपये प्रति किलो बढ़ी है, १९९९ में घट कर ६२ रुपये पर आ गई और २००० जनवरी में ५१.५ रुपये रह गई है।

यह फिर घटकर नीचे पहुंच गया है। रबड़ १९९७ में ४९ रुपये प्रति किलो थी, १९९८ में ३८.०६ रुपये, १९९९ में २९.०२ रुपये और २००० में २८०० रुपये प्रति क्विटल रह गई। ४९ रुपये से घटकर २९ रुपये पर आ गई। इसकी कीमत में यह गिरावट इस तेजी से हुई। यही हाल काफी का है। सुपारी की स्थिति तो यह थी कि १९९७ में १५ से लेकर १८ हजार रुपये प्रति क्िंवटल इसका बाजार भाव था और आज की स्थिति में घटते-घटते यह ४५०० से लेकर ५५०० रुपये के भाव पर आ गई है। वही हाल आलू का है, आलू १८० से २०० रुपये प्रति क्िंवटल इसकी कीमत होती थी और अब ९३ रुपये प्रति क्िंवटल और उससे से नीचे अब ८० रुपये प्रति क्िंवटल पर आ गया। नतीजा यह हो रहा है कि आलू सड़कों पर फिंका है। आलू सूअर खा रहे हैं, किसान उसको लेकर मंडी तक ले जाने की स्थिति में नहीं रह गया। सरसों की भी १९९० में प्रति हैक्टेयर मुनाफा सवा लाख रुपये था और आज २००० में प्रति हैक्टेयर मुनाफा घटकर केवलमात्र २५ हजार रुपये रह गया, वह भी अगर सामान्य मानसून और फसल हो जाये। वही स्थिति टमाटर की है, वही हालत फलों की, वही हालत सब्जी की, किसान की हर जिंस की यह दुर्दशा है। उसका आर्थिक ग्राफ कहां जा रहा है, उस तरफ मैं आपका ध्यान दिलाना चाह रहा हूं कि यह सब क्यों हुआ। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि, इस सरकार ने किसान पर नीतियां लागू करनी शुरू किया। मैं कोई गैरजिम्मेदार इल्जाम नहीं लगा रहा हूं, मैं फैक्ट के आधार पर आपके सामने कहना चाहता हूं, चुनौती देकर कह रहा हूं। इस बात से इन्कार किया जाये, इसमें अगर एक बात भी गलत हो। इस बजट के अन्दर विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक और मुद्रा कोष के दबाव में आकर और जो स्थानीय बड़े-बड़े व्यापारी हैं, उनके दबाव में आकर जो नीतियां अपनाई गईं, उसका परिणाम यह है कि कृषि के क्षेत्र में इस साल के बजट में जो साधन जुटाये गये हैं, वे २८.७६ करोड़ से २९ करोड़ किये गये हैं, २८.७६ करोड़ से २९ करोड़ राउंड फीगर कर दिया गया है, वही स्टेगनेशन है। अगर पैसे का अवमूल्यन लगायें तो दरअसल यह निगेटिव ग्रोथ है, पोजटिव ग्रोथ नहीं है। दूसरी बात सहकारिता के क्षेत्र में आप स्वयं जानते हैं कि सहकारिता एक बहुत बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर है, बहुत बड़ी आधारभूत संरचना है, जिसके माध्यम से कृषि के तमाम कामों को अंजाम देने में मदद मिलती है। सहकारिता के क्षेत्र में…( व्यवधान )सभापति महोदय, यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। पिछले वर्ष के १२८.३५ करोड़ रुपये से १३२.७५ करोड़ किया गया। मात्र चार करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है और अगर उसमें भी मुद्रास्फीति का अवमूल्यन है, अगर उसका मान जोड़ लिया जाये तो यह भी निगेटिव ग्रोथ है, पोजटिव ग्रोथ नहीं है।

आगे देखिये, सहकारी साधनों के माध्यम से कृषि क्षमता के लिए कपूर समति का गठन किया गया था। डिप्टी गवर्नर, आर.बी.आई. ने लागू करने के लिए अपनी सिफारिशें दीं। वित्त मंत्री के पास बार-बार कोआपरेटिव सैक्टर के लोग गये, सारी चर्चा हुई, येरननायडू जी आज याहं मौजूद नहीं हैं, उनके साथ हमने कोआपरेटिव सैक्टर की एक पूरी मीटिंग की थी।…( व्यवधान )

MR. CHAIRMAN : There are 13 more Members from your side, and one-hour time has been allotted for your Party.

SHRI SATYAVRAT CHATURVEDI : There are two full days for discussion. I will try to complete my speech in a few minutes. उन सिफारिशों को सरकार को लागू करना चाहिए। फसल बीमा नधि की अभी यहां पर वर्मा जी बहुत बात कर रहे थे, अब वे यहां पर नहीं हैं। इस साल के बजट में २७९ करोड़ से घटाकर इसे २६१ करोड़ कर दिया गया है, बढ़ाने के बजाय घटाया गया है। २८ करोड़ रुपये की कटौती की गई है। कृषि विकास कार्यक्रमों के लिए १०० करोड़ रुपये की कटौती पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष की गई है। आप अपने बजट को देख लीजिए, मैं आपको चुनौती देता हूं, यह बात गलत निकलती हो तो मुझे बताइयेगा।

मृदा एवं जल संरक्षण, जो एक सबसे महत्वपूर्ण कम्पोनेंट है, उसके अन्दर ३२ करोड़ से घटाकर, एक तो वैसे ही यह कम था, और ज्यादा होना चाहिए था, लेकिन उसे ११ करोड़ कर दिया गया।

इस वर्ष उसमें २१ करोड़ रुपए यानी दो तिहाई की कटौती की गई है। कृषि मंत्रालय ने शरद जोशी जी की अध्यक्षता में एक समति बनाई थी। शरद जोशी जी ने सुझाव दिया कि देश के वभिन्न राज्यों के बीच जो कृषि उत्पाद है, उसकी आवाजाही के ऊपर पूरी तरह से नियंत्रण समाप्त कर देना चाहिए। सारा देश एक है, अगर एक क्षेत्र में बहुत उपज हुई है तो वहां का किसान दूसरे राज्य में मुनाफे में अपना उत्पाद बेच सकता है। यह एक यूनीफार्म पालिसी बनाने की बात कही थी, लेकिन उनकी इस सिफारिश पर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। कोआपेटिव सेक्टर को भी बंद करने की योजना है। साहिब सिंह जी क्रेडिट कार्ड की बात कर रहे थे। इस देश में दस करोड़ किसान परिवार हैं, आपकी सरकार ने सिर्फ १.१० करोड़ को ही ये कार्ड दिए हैं यानी कुल दसवां हिस्सा बनता है। इस पर भी आप बहुत जोरशोर से इस बात को कह रहे हैं।

मैं अंत में दो-तीन सुझाव देकर अपनी बात समाप्त करूंगा। मेरा एक निवेदन है कि आपका जो समर्थन मूल्य घोषित करने की प्रक्रिया है, वह दोषपूर्ण है। जिस तरह आपने तेल पूल घाटे को खत्म करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मूल्यों से तेल पूल को जोड़ दिया, उसी सिद्धांत के आधार पर लागत मूल्यों से समर्थन मूल्य को जोड़ने का काम किया जाना चाहिए। उसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि कम से कम २० प्रतिशत लाभांश किसान को अपनी उपज और पैदावार का जरूर मिले। यह सबसे जरूरी है। जब तक यह नहीं होगा, उसकी लागत बढ़ती चली जाएगी। बिजली की लागत, सिंचाई की लागत, मजदूरी की लागत, पम्प की लागत करीब १५ गुना तक बढ़ गई है। पैदावार की लागत चार-पांच गुना बढ़ गई है। उसका नतीजा यह हुआ है कि वह आर्थिक रूप से कमजोर होता चला जा रहा है।

यह सरकार उद्योगपतियों के बजट बनाना बंद करे। इस देश का किसान भी आदमी है, उसके हित में बजट बनाया जाए। अगर यह नहीं हुआ तो किसान और गांव कमजोर होगा। अगर किसान और गांव कमजोर हुआ तो देश मजबूत किसी भी हालत में नहीं हो सकता। इसलिए जरूरी है कि सरकार अपनी प्राथमिकता को बदले और वास्तव में हकीकत तथा ईमानदारी से किसान की भलाई के लिए प्रयास करे।

श्री महबूब ज़हेदी (कटवा):सभापति महोदय, मैं आपका शुक्रगुजार हूं कि आपने मुझे इस बहस में भाग लेने का मौका दिया। यह कोई मामूली चर्चा नहीं है। यहां हम पूरे हिन्दुस्तान के किसानों की आंखों में आए आंसुओं के हिसाब की चर्चा कर रहे हैं। यहां केवल बातें ही नहीं की जा रही हैं, किसान की हकीकत बताई जा रही है। इस देश में ७५ फीसदी किसानों की आबादी है। किसानों के साथ ही देश की और हमारी जिंदगी जुड़ी हुई है। हमें आजाद हुए ५४ साल हो गए। पहली बार देश में १६२ किसानों ने खुदकशी की। हमारे यहां ६५ प्रतिशत वर्क फोर्स है, वह काम करती है। उनकी हालत बहुत खराब है। प्रधान मंत्री जी ने भी आज बोला है। अगर १०० करोड़ आदमियों को दो वक्त खाना खिलाना है तो ३० करोड़ टन अन्न हमें चाहिए, चावल चाहिए।

हम आत्मनिर्भर हो गए हैं- ये आंकड़े मेरे नहीं हैं, सरकारी हैं। वह ही बात करते हैं कि १९ से २१ करोड़ टन हो गया है। बाहर के भाव और राशन के भाव एक कर दिये गये हैं और करीब-करीब तीस से ३५, ३५ से ३६ प्रतिशत गरीबी रेखा के नीचे किसान और गांव के आदमी रह रहे हैं। चार करोड़ टन अनाज या गेहूं गोदामों में सड़ रहा है। एक बार उसे कम दाम में भी कहीं बाहर बेचने की कोशिश भी की गई थी और फिर वह कोशिश पूरी नहीं हुई, फिर एक बार कोशिश की गई कि इसे यहीं बेच दें लेकिन वह कोशिश भी पूरी नहीं हुई तब फरमान आया कि उसे समुद्र में फेंक दें और जरा गोदाम खाली कर लें ताकि बाजार में जो अनाज आ रहा है,उसके रखने के लिए जगह हो सके। अभी प्रधान मंत्री जी ने कहा है कि दो-तीन रुपये में अनाज दिया जाये और उसे ‘अन्तयोदय अन्ना’ योजना का नाम दिया था। एक जगह ३५-३६ प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के लिए खाना नहीं है और एक जगह चार करोड़ टन खाना मौजदू है और सड़ रहा है। ऐसी हालत क्यों हुई? भाव कहां है और बेचने की तथा रखने की जगह कहां है? वर्मा जी अभी बोल रहे थे और वह चले गये हैं नहीं तो हम उनसे पूछते कि वह कौन सी जगह है? चावल ६५० रुपये क्िंवटल है और बाहर ४५० रुपये क्िंवटल बिक रहा है। ग्राउंड-नट, मूंगफली १५०० रुपये है और ४६० रुपये अभी बिक रही है। सूखी मिर्ची ६००० से २००० रुपये है। कॉफी जो केरल या सब जगह होती है, ५८ रु. कि.ग्रा. से ३० रु. कि.ग्रा. है। कोकोनट दस रु. से दो रुपये और रबड़ ६० रुपये कि.ग्रा. से २२ रुपये कि.ग्रा. और कच्ची पत्ती चाय दस रुपये से पांच रुपये कि.ग्रा. है। बाकी जूट. पोटैटो, टोमैटो, सोयाबीन काजू और गोल मिर्ची है। उस दिन माननीय वित्त मंत्री जी ने मजाक किया था और शायद मुलायम सिंह जी ने बोल दिया था कि मेरे आलू का क्या होगा तो वित्त मंत्री जी ने बोला था कि आलू का चोखा बना देंगे। नहीं नहीं, वित्त मंत्री जी, आपका बजट आलू का चोखा नहीं बनाएगा, आलू पैदा करने वाले का चोखा बनेगा। आगे कैसे करेंगे?

नेशनल पालिसी को देखिए । कहते हैं कि उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन हम पीछे हट रहे हैं । कहते हैं कि डब्िंलग होगा, तो उत्पादन इतना ज्यादा हो जाएगा कि डबल हो जाएगा । मैं आपके समक्ष कुछ आंकड़े प्रस्तुत करना चाहता हूं । हालत यह है कि १९९० में घाटा ०.७ प्रतिशत था, जो २०००-२००१ में ३.६ प्रतिशत का घाटा हुआ है । एग्रीकल्चर में मछली है, फारैस्ट है, १९९१-९२ में ३.९ प्रतिशत था, जो घट कर २०००-२००१ में ३.७ प्रतिशत हो गया । खरीफ में १९९१-९२ में उत्पादन ३.४ प्रतिशत था, जो अब २.२ प्रतिशत हो गया है। इसके लिए मंत्री जी ने कहा है कि हम इसको ४.५ प्रतिशत करेंगे । मैं पूछना चाहता हूं कि कैसे करेंगे? फूडग्रेन्स की स्थिति भी यही है । १९९६-९७ में १९९.४ मी. टन था, अब यह घटकर १९९मी. टन है । इसमें भी घाटा हो गया है । अभी खरीफ की पैदावार १०३.९ मटि्रक टन पैदावार थी, जो घट कर १०२ मटि्रक टन रह गई है । गन्ने का उत्पादन बढा है । पूरा हिसाब देखा जाए, कुल मिलाकर २.३५ प्रतिशत से ३.७२ प्रतिशत एवरेज डिक्लाइन हुआ है । डब्ल्यू.टी.ओ. ने कहा कि आप ऐसा अनाज उगायें जो खाने लायक न हो और उसके स्थान पर फूल उगायें, मगर गेहूं छोड़ दें, धान छोड़ दें। जमीन में आप ऐसी चीजें पैदा करें जो पैसा कमाने वाली हों। फूड ग्रेन्स क्रॉप शिफ्िंटग की हालत यह है कि १९५०-५१ में उत्पादन ९७.३ मलियन हैक्टेअर था जो अब १२३.१ हैक्टेअर हो गया है। आप ऐसी चीजें पैदा करें, जिन्हें बाहर भेजा जा सके और मुनाफा भी ज्यादा हो। कमर्शियल क्रॉप १९९६-९७ में. २४.४ मटि्रक टन थी, जो अब १८.६ मटि्रक टन है।

खाली शुगरकेन में २७७.६ से ३००.६ होगा, थोड़ा सा बढ़ेगा। मेरा यह कहना है कि केपिटलाइजेशन की बात आपने बोली थी कि और भी करो। उसकी क्या हालत है। १९९३-९४ में १३,५२३ करोड़ रुपए लगते थे, उसका एक-तिहाई पब्लिक इनवेस्टमेंट था, वह प्राईवेट इनवेस्टमेंट नहीं था। १३,५५३ में एक-तिहाई पब्लिक इनवेस्टमेंट था। अब क्या हालत हुई कि १९९९-२००० में १८,६९७ करोड़ रुपए इनवेस्ट हो रहा है।… पब्लिक इनवेस्टमेंट में २५ प्रतिशत घटा है । ( व्यवधान )

महोदय, इन्होंने कहा है कि बड़ा-बड़ा फार्मिंग होगा, भूमि सुधार नहीं होगा। हम एक टुकड़ा जमीन गरीब को दे नहीं पाएंगे। आपने दूध के बारे में कहा है। हम दूध का सबसे ज्यादा उत्पादन करते हैं, लेकिन यह बाहर से आ रहा है। हमने पहले दूध का उत्पादन ९८ हजार मीटि्रक टन किया था, उसकी अब क्या हालत है। आज ४० हजार टन दूध बाहर से आता है।…( व्यवधान )

MR. CHAIRMAN : Please conclude.

SHRI MAHBOOB ZAHEDI : Mr. Chairman, Sir, I have a request to make. I am not participating in every discussion. I have been participating very rarely in discussions in Parliament. So, please give me the chance to make my points.

This is the cry of the peasantry. हम आपसे कहना चाहते हैं कि ४० हजार टन दूध बाहर से आ रहा है। मक्खन, दूध और अन्य कई चीजें हैं, जो बाहर से आ रही हैं। मंत्री जी ने बजट में कह दिया कि हम जरा सी डयूटी बढ़ाते हैं- राइस में ८०, गेहूं में ५०, सोयाबीन में ६५, पाम ऑयल में ४५, शुगर में ६० और खोपरा में ८० डयूटी बढ़ाते हैं। इनकी सब्सिडी कितनी है। किसान का खाद का सब्सिडी जा रहा है, बिजली का डबल होगा। प्रधान मंत्री जी ने कहा कि बिजली का रेट डबल होगा और खाद में दूसरी जगह भी यही हो रहा है, जहां से हम ले रहे हैं। जहां हमने डब्ल्यूटीओ का दरवाजा खोल दिया है, वहां क्या हालत है। युनाइटेड, यूरोपियन कंट्री और अमेरिका में ७६० डालर पर टन, ७०६ डालर पर टन, ये सब्सिडी दे रहे हैं और वे लोग कम दाम में यहां अनाज भेज रहे हैं तो क्या हम रहेंगे, किसान रहेगा? किसान मर नहीं जाएगा, खत्म नहीं हो जाएगा? इसलिए हमने कहा है कि इस तरफ ध्यान देना चाहिए। उस तरफ भी भाई साहब बैठे हैं। All of you are representing the peasantry. आप किसान हैं, आपका मिट्टी के साथ संबंध है। आपको समझना पड़ेगा कि हम कितनी खतरनाक जगह पहुंच गए हैं।

यह इनकी पालिसी है। मैं रवीन्द्र नाथ टैगोर की बंगाली में लिखी कुछ पंक्तियों सुनाना चाहता हूं :

हेथाय बिथा कान्दा, देवा लेते बाधा, कांदन फिर आसे आपन धरे।
इसका मतलब यह है कि मेरे दर्द भरे टपकते हुए आंसू यहीं बेदर्दी दीवाल में धक्का खाकर फिर मेरे पास वापस न आ जाएं।
मैं यहां किसान के बारे में बोल रहा हूं। आप किसान को बचा लीजिए और उसकी जिन्दगी को बचाइए, नहीं तो सदन भी नहीं बचेगा और यह भी नहीं बचेंगे। बहुत धन्यवाद।
           
श्री अनंत गंगाराम गीते (रत्नागरि) :सभापति महोदय, इस सदन के हर सत्र में हम एक बार किसानों की समस्याओं के बारे में चर्चा करते हैं। हर साल किसी न किसी प्राकृतिक आपदा की समस्या किसानों पर पड़ती है। कभी ज्यादा वर्षा से फसल नष्ट होती है और कभी कम वर्षा के कारण फसल जल जाती है। आज हमारे देश के किसानों को प्रकृति के ऊपर निर्भर रहना पड़ता है।
आज सुबह सदन में राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के समय प्रधान मंत्री जी जवाब दे रहे थे। उस समय उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि देश में अनाज काफी मात्रा में है। गेहूं और चावल की आज देश में कमी नहीं है, इसलिए किसान अनाज की खेती करने की बजाय फल, सब्जी, दलहन और तिलहन की खेती करें। किसान चाहे फल, अनाज, दलहन या तिलहन की खेती करें उनकी तरफ से सबसे पहली मांग समर्थन मूल्य की आती है। जब तक हम किसानों को उनकी उपज का समर्थन मूल्य नहीं देंगे, उसे तय नहीं करेंगे, तब तक किसान हर वर्ष घाटे में रहेंगे और उन्हें सारी मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा।
देश के अलग-अलग राज्यों में ज्यादातर अलग-अलग फसलें होती हैं। पश्चिमी महाराष्ट्र में गन्ने की खेती ज्यादा होती है।
महाराष्ट्र में कपास की खेती ज्यादा होती है और मैं जिस क्षेत्र से आता हूं, वह तट क्षेत्र है। वहां पर चावल की खेती ज्यादा होती है। मेरे कोंकण क्षेत्र में किसान बागबानी की ओर बढ़ने लगे हैं। मेरे क्षेत्र में आम और काजू की खेती सबसे ज्यादा होती है। हम अखबारो में पढ़ते रहते हैं कि जो किसान गन्ना पैदा करते हैं, उन्होने गन्ना जला दिया। महाराष्ट्र में गन्ना भी इतना ज्यादा पैदा होता है कि यदि किसानों को उनके गन्ने का उचित दाम मिल जाये तो अच्छा हो। गन्ना ज्यादा होने के कारण वहां चीनी का उत्पादन भी ज्यादा होता है। गत कई वर्षों से महाराष्ट्र में यह मांग होती रही है कि चीनी निर्यात करने का अधिकार राज्य को मिलना चाहिये। यदि राज्य को यह अधिकार मिल जाये तो किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिल सकता है। इसके साथ ही कपास का उत्पादन अधिक होने के कारण इसके निर्यात की बात आती है। कुछ हद तक राज्य को यह अधिकार दिया जाता है लेकिन आज गोदामों में कपास और चीनी का भंडारण जमा किया हुआ पड़ा है। यदि इसके लिये भी निर्यात का अधिकार राज्यों को दे दिया जाये तो किसानों को बहुत फायदा मिल सकता है। केन्द्र सरकार को इस बारे में गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है।
सभापति जी, जब हम बागबानी की बात करते हैं तो फल-सब्जी का जिक्र किय़ा जाता है। फल और सब्जी के हमारे पास भंडारण नहीं हैं जिससे हम फल और सब्जियों को कई महीनों तक जमा कर सकें। इसके अलावा सब्जी और फल का बाजार भी नहीं है। मेरे क्षेत्र कोंकण में अलफांजो आम बहुत होता है जिसे दुनिया के कई देशों में निर्यात किया जाता है। चाहे यह आम महंगा है लेकिन फिर भी किसानों को परेशानी होती रहती है। जब कभी बेमौसम की बरसात हो जाती है तो सारी आम की फसल नष्ट हो जाती है। जब आम की पैदावार अधिक हो जाती है तो उसके दाम गिर जाते हैं। बीच में जो दलाल होते हैं, वे किसान को चूस जाते हैं। ज्यादा पैदावार होने से किसान का नुकसान है और कम पैदावार से भी किसान का नुकसान है।
सभापति जी, मेरा केन्द्र सरकार से अनुरोध है कि वह इस जिम्मेदारी को उठाये और किसानों को सलाह दे कि अनाज की ज्यादा खेती न करके बागबानी को बढ़ावा दे।
जब हम देश के किसानो को इस सदन के माध्यम से संदेशा देने जा रहे हैं तो इस जिम्मेदारी को हमें उठाना चाहिए। उसके लिए हमें नये रास्ते ढूंढने चाहिए। मैं यह कहना नहीं चाहता हूं कि इसके लिए ज्यादा सब्सिडी देनी चाहिए। मैं यह भी नहीं कहना चाहता हूं कि किसान का सारा उत्पादन भारत सरकार को खरीदना चाहिए। लेकिन इसके लिए मार्केट कहां से मिलेगा, उसकी तलाश तो करनी चाहिए। किसान की फसल को रखने के लिए भण्डारण की आवश्यकता है तो भण्डारण खड़े करने के लिए जो भी सहायता है, उसे ज्यादा करने की आवश्यकता है। जो बीच के एजेन्ट्स हैं, वे किसानों को चूस लेते हैं। उन एजेन्ट्स को हम हटा सकते हैं। यदि उन एजेन्ट्स को भी हम हटा पायेंगे तो भी हम किसानों को राहत दे पायेंगे।
सभापति महोदय, हम सहकारिता को बढ़ावा दे सकते हैं। यदि हम सहकारिता को बढ़ावा देते हैं तो भी किसानो को उससे फायदा हो सकता है। इसलिए सदन के माध्यम से हम देश के किसानों को संदेशा दे रहे हैं तो कुछ जिम्मेदारियां तो हमें उठानी पड़ेंगी। कुछ रास्ते हमें इसके लिए ढूंढने पड़ेंगे और ज्यादा से ज्यादा राहत हम किसानों को कैसे दे सकते हैं, चाहे सहकारिता के माध्यम से हो या सरकार के माध्यम से हो, किसानो को हम उसके उत्पाद का समर्थन मूल्य कैसे दे सकते हैं, किस प्रकार उसे उचित प्रकार से तय कर सकते हैं। यदि हम ऐसा करने की कोशिश करते हैं और किसानों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं यदि दे सकते हैं तो देश का किसान सरकार को धन्यवाद देगा। यदि देश का किसान खुशहाल होगा तो देश खुशहाल होगा। मैं यहां ज्यादा भाषण नहीं करना चाहता, लेकिन मैंने जो यहां सुझाव दिये हैं, उनके तहत यदि सरकार की ओर से किसानों को राहत देने का प्रयास होता है तो वह हमें जल्दी से जल्दी करना चाहिए। यही कहते हुए मैं अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं॥ श्रीमती रमा पायलट (दौसा) : आदरणीय सभापति जी, मुझसे पहले सदन के बहुत से माननीय सदस्यों ने किसानों की हालत पर अपने विचार व्यक्त किये हैं और इससे पहले भी पिछले तीन सालों से हर बजट सैशन में किसानों के ऊपर, कृषि के ऊपर चर्चाएं होती रही हैं। आज भी हम उसी संदर्भ में चर्चा कर रहे हैं। मैं सब माननीय सदस्यों की बातें सुन रही थी। लेकिन मुझे समझ में नहीं आया कि इन्हीं सब बातों को पिछले सैशन के दौरान सभी माननीय सदस्यों ने कहा और अब फिर से इसी बात पर चर्चा हो रही है और मैं समझती हूं कि आगे जो मांगे आयेंगी, तब भी शायद कृषि पर चर्चा होगी। वही शब्द, वही दुख, वही किसानों की हालत, वही कृषि के लिए हम सबकी चिंता या तो यूं कहिये कि दिल से सिर पीट-पीट कर सभी रो रहे हैं या यूं कहिये कि उसका राजनीतिकरण कर रहे हैं। हर माननीय सदस्य सदन के बाहर और अंदर दोनों तरफ किसानों के लिए कभी आंदोलन कर रहे हैं और कभी किसानों की बात कहकर मीडिया के साथ वार्तालाप कर रहे हैं और कभी यहां इन सब बातों को दोहराया जाता है। मैं समझ नहीं पा रही हूं कि इतनी बार इन सब चीजों को दोहराने के बावजूद क्या कोई ऐसा आश्वासन सरकार की तरफ से आया, या कोई ऐसी नीति या कोई आशा की किरण नजर आती है कि इन सब बातों पर गौर करके एक नई बात लाई जाए।
सभापति महोदय, अभी हाल ही में और आज भी प्रधान मंत्री जी ने हाउस में कहा, मैंने टी.वी. पर भी देखा, लेकिन उन्होंने खुद भी कहा पंजाब और हरियाणा में उन्होंने किसान सम्मेलन किये और किसान सम्मेलन में उन्होंने वहां किसानों से कहा कि वे अपनी खेती, अपना चावल और अपना गेहूं उगाना कम कर दें। मैं प्रधान मंत्री जी की बहुत इज्जत करती हूं और प्रधान मंत्री जी से बहुत आशाएं भी रखी थीं, जब उन्होंने इस पद को ग्रहण किया था। लेकिन यह बात सुनकर अफसोस हुआ कि प्रधान मंत्री जैसे पद पर आसीन रहते हुए श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐसा कहा। पिछले सत्र के दौरान जब उन्होंने अपने आपको अटल कहा तो इस तरफ आगे से आवाज आई कि मैं बिहारी भी हूं और मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि आज बिहार के किसानों की हालत सबसे ज्यादा बदतर है।
फिर वह कहते हैं कि आप गेहूं और चावल उगाना बंद कर दीजिए। अगर किसान गेहूं और चावल उगाना बंद कर दे तो किसान के पास या सरकार के पास कोई ऐसा ज़रिया है कि वह किसी दूसरे साधन से अपने बच्चों का पेट पाल सके? क्या कृषि को इस तरह से बंद किया जा सकता है कि कोई व्यवसायी है कि वह चावड़ी बाज़ार जाएगा और वहां बड़े-बड़े गल्ले और आढ़तियों की दुकानों से कुछ उठा लेगा और छोटे बाज़ारों में बेच देगा और अपने बच्चों का पेट भरेगा।…( व्यवधान )व्यवसायी लोग दो महीने में या एक महीने में और दस दिन में अपना व्यवसाय जमा लेते हैं लेकिन किसान खेती के साथ ऐसा नहीं कर सकता। आयात-निर्यात के दौरान अगर कृषि मंत्री जी या सरकार की तरफ से कोई नई खोज हुई हो जैसे आजकल नए-नए बीज आ रहे हैं तो मेरा मानना यह है कि हो सकता है कि ऐसा कोई रिसर्च करके इनके पास कोई पॉइंट आया हो कि उसमें बीज डालते ही फसल एकदम पैदा हो जाती हो। आज विदेशों से जो बीज लेकर हम अपनी ज़मीन में उगा रहे हैं, हमने उसमें सुना है कि भौतिक तरीके से भी उसकी ग्रोथ को बढ़ाया जाता है। हो सकता है कि ऐसा कोई पॉइंट सरकार के पास आया है, इसी वजह से प्रधान मंत्री जी ने कहा है कि गेहूं और चावल की खेती बंद कर दें और तरकारी उगाएं, फल उगाएं, लेकिन मैं नहीं समझती कि तरकारी और फल दस दिन या एक दिन में उग जाएंगी। पहले खेत को तैयार करना पड़ेगा जिसमें महीनों लग जाते हैं। उसमें मेहनत-मशक्कत करनी पड़ेगी क्योंकि फिर उऩको बेचकर गोदाम में जाना है। खाद के लिए जाना है, फिर पानी की तरफ देखना होगा, नहरें तो खत्म हो गई हैं। फिर बिजली की तरफ देखेंगे। सब इस बात से परचित हैं कि बिजली की हालत हमारे देश में क्या है। खुद प्रधान मंत्री जी ने भी इस बात पर चिन्ता जताई। ऐसा कोई बीजमंत्र कृषि मंत्री जी के पास आया हो तो कृपया मुझे भी बताएं क्योंकि मैं भी किसान हूं और मैं भी गेहूं और चावल की खेती को बंद करके उस बीज को जहां कहीं वह मिलता हो, वह कृपया इस सदन को बताएं ताकि हम सब लोग बाहर जाकर अपने किसान भाइयों को बताएं और वह उस तरह के बीज को ले लें ताकि वह बीज ज़मीन में डालें और एकदम से फसल उग जाए और वह बाज़ार में बिक जाए। लेकिन बावजूद इसके उसकी बिक्री के लिए प्रावधान करने पड़ेंगे। आपको बाज़ार में ले जाने के लिए कुछ ऐसे साधन जुटाने पड़ेंगे जहां किसान अपने माल को लेकर जाए और उसको आगे ऐसे केन्द्र मिलें जहां उसको खरीद लिया जाए। ऐसा नहीं करना पड़े कि उसको केन्द्र में जाकर रख दिया और किसान परेशान है। मैंने खुद भी अपने गोदाम में आलू डाल दिया लेकिन इतनी कीमत उसकी नहीं मिल रही है कि हम उसका किराया दे सकें और आलू को निकालकर अपने आप प्रयोग कर लें या बाज़ार में बेच दें। ऐसा कोई केन्द्र होना चाहिए ताकि उसकी खपत उसमें हो जाए। यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हर किसान की फसल की खरीद की जिम्मेदारी ले और हर किसान को ऐसा आश्वासन दे कि अगर उसकी फसल को किसी तरह से प्राकृतिक आपदा से नुकसान होता है या उसको कीड़ा खा जाता है तो किसान को उसको इतना प्रतिशत मुआवज़ा मिल जाएगा।
सभापति जी, बीमा योजनाएं तो हैं, ऋण योजनाएं तो हैं और योजनाएं तो और भी अच्छी हैं लेकिन दुख इस बात का है कि इन योजनाओं का कार्यान्वयन नहीं हो रहा है। अगर व्यक्तिगत रूप से आप देखने जाएं तो हर तरह से किसान मरता है -- कृषि में, बीज में, खाद में और पानी में मर रहा है। और तो और उसके पास जो थोड़ी बहुत ज़मीन होती है उस ज़मीन पर अगर कोई सरकार अपने देश में विकास करना चाहती है तो उसी गरीब की ज़मीन जाएगी। बिजली का कोई कारखाना लगता है, कोई पुल बनता है, कोई सड़क बनती है तो उस गरीब किसान की ज़मीन जाती है। एन.टी.पी.सी. ने नौएडा में किसनों की ज़मीन ली थी और उसका मुआवज़ा उसे नाममात्र के लिए मिला था। लोग चिल्ला रहे हैं। पहले भी चिल्लाए। मेरे पास लोग अभी भी आ रहे हैं कि मुआवज़ा बढ़े। पायलट साहब ने भी बढ़वाने की कोशिश की थी और मात्र कुछ प्रतिशत बढ़ाकर उनको मुआवज़ा दिया गया। ५० रुपये ४३ रुपये प्रति गज के हिसाब से उनकी ज़मीन ली गई थी।
सभापति महोदय, अभी साहब सिंह जी वर्मा बहुत जोर-जोर से भाषण कर रहे थे। मैं उनके भाषण को बहुत ध्यान पूर्वक सुन रही थी। मैं पूछना चाहती हूं कि किसान की जमीन जब ली जाती है, तो उसको ५० रुपए प्रति गज का मुआवजा दिया जाता है और जब उद्योगपति की बात आती है, तो उसे करोड़ों रुपए दे दिए जाते हैं। इस प्रकार से सरकार दोहरा व्यवहार करती है। किसानों को किसी और नजर से तथा व्यवाइयों को किसी दूसरी नजर से देखती है। प्रधान मंत्री जी कह रहे थे कि उनकी सरकार सबको समान द्ृष्टि से देखती है, लेकिन मैं समझती हूं कि ऐसी बात नहीं है। मुझे तो सरकार के व्यवहार को देखकर ऐसा प्रतीत होता है और शंका होती है कि सरकार किसानों को टेढ़ी नजर से देखती है और व्यवसाय को उच्च दर्जा तथा खेती को निचला दर्जा देती है।
सभापति महोदय, मैं कहना चाहती हूं कि जब तक किसानों और व्यवसाइयों को समान द्ृष्टि से नहीं देखा जाएगा, तब तक देश तरक्की नहीं कर सकता है। किसान और व्यवसाई एक गाड़ी के दो पहिए हैं और उन्हें सरकार को ऐसा समझकर दोनों को समान द्ृष्टि से देखना पड़ेगा। व्यवसाय को ऊपर रखकर और कृषि को निचले तले पर रखकर यदि सरकार चलेगी, तो देश प्रगति नहीं कर पाएगा। हमारा देश कृषि प्रधान देश है। बिना किसानों को तरजीह दिए यदि इस देश की उन्नति की बात सोची जाती है, तो वह मेरी समझ से बाहर की बात है। मैं मंत्री महोदय से उस मंत्र को जानना चाहती हूं जिससे किसानों की तरक्की किए बिना देश की तरक्की की जा सके।
सभापति महोदय, आज हर तरफ किसानों के ऊपर मार पड़ रही है। बरसात तो देश में जैसे खत्म ही हो गई है। उसका कारण है कि पेड़-पौधे नहीं लगाए जा रहे हैं। बिजली की चोरी हो रही है, वनों की कटाई हो रही है, पानी की चोरी हो रही है। जब नहर निकलती है, तो उसे बीच में ही काट दिया जाता है। जो नहर के टेल पर रहने वाले किसान हैं, वे पानी से वंचित रह जाते हैं। जो जबर लोग हैं वे पानी ले लेते हैं और गरीब किसानों को पानी नहीं मिलता। स्थिति यह हो गई है कि जैसे अजगर छोटों को निगल जाता है, वैसे बडे लोग छोटे किसान को निगल रहे हैं। छोटा किसान हर तरफ से मारा जा रहा है।
सभापति महोदय, कृषि मंत्री महोदय, यहां बैठे हैं। मुझे मालूम है कि मेरी बातें उन्हें अच्छी नहीं लग रही होंगी, लेकिन मैं उनसे चाहती हूं कि मेरे द्वारा उठाई गई बातों का वे अपना जवाब देते समय अवश्य उल्लेख करें। यदि वे ऐसा करेंगे, तो मैं उनकी आभारी रहूंगी। मैं उनसे यह भी जानना चाहूंगी कि चकित्सा एवं बीमा का जो प्रावधान किसानों के लिए किया गया है, उसका कितना फायदा उनको मिल रहा है। मैं कहना चाहती हूं कि किसानों को फायदा पहुंचाने के लिए जो भी नीतियां अपनाई जाती हैं उनका उन्हें फायदा नहीं पहुंच रहा है। यहां से जो एक रुपया किसानों को जाता है उसका ग्रामों में एक पैसा पहुंचता है और उसके लिए भी दलाल बीच में बैठे रहते हैं। वे हड़प जाते हैं किसान को कुछ भी नहीं मिलता है क्योंकि किसान अशक्षित है। सबसे पहले सरकार को किसानों को शक्षित करने की योजना चलानी चाहिए। बिना किसानों को शक्षित किए देश प्रगति की राह पर नहीं बढ़ सकता। मैं कहना चाहती हूं कि देश में चाहे कोई भी बड़ी से बड़ी ताकत आ जाए, बिना किसानों को शक्षित किए देश उन्नति नहीं कर सकता है। इसलिए किसानों को शक्षित करने के लिए सरकार को विशेष कदम उठाने चाहिए।
सभापति महोदय, कृषि में अनुसंधान के लिए बड़े-बड़े अनुसंधान केन्द्र कार्य कर रहे हैं, लेकिन क्या कभी किसी डायरैक्टर ने जाकर देखा है कि कृषि अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिक वाकई अनुसंधान कर रहे हैं या किसी किसान के घर जाकर भैंस का दूध पीकर दिन बिताकर शाम को घर चले जाते हैं। सूखे पर सरकार का कोई वश नहीं है, यह मैं मानती हूं। इसके लिए सरकार जिम्मेदार नहीं है, यह भी मैं समझ सकती हूं, लेकिन इसके अलावा किसान को पानी, बिजली, बीज, खाद एवं अन्य अनेक प्रकार की सुविधाएं देना सरकार का दायित्व बन जाता है। मैं तो कहना चाहती हूं कि जिस प्रकार से सरकार विदेशों के साथ अपने हर प्रकार के संबंध सुधार रही है, उस प्रकार से किसी देश से जल मुहैया कराने के साधन अपनाने हेतु साइंटिस्ट्स, एक्सपट्र्स या टैक्नीशियन्स भी हमारे देश में बुलाए जो हमारे देश में आकर देख सकें कि हमारे यहां किस प्रकार से अंडरग्राउंड वाटर को ऊपर लाया जा सकता है और किस प्रकार से हमारे देश में पानी की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है। आज इतने साल बीतने के बाद भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं हुई है और राजस्थान में ऐसी स्थिति बनी हुई है कि वहां हर साल अकाल पड़ता है।
उससे हर साल अकाल पड़ता है और उस अकाल में कितने व्यक्ति और जानवर मरते हैं, उसका कोई हिसाब किताब नहीं है। इस साल जनसंख्या की गणना की जा रही है। मैं समझती हूं कि अगर वह गणना पिछले साल से कम निकले तो उसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं है।
इसी के साथ मैं यह भी कहना चाहती हूं कि आपने किसानों के ऊपर रिस्ट्रक्शन लगाई हुई है कि किसी जानवर को गोली से मत मारो क्योंकि यह पर्यावरण को गंदा करता है। मैं मानती हूं कि देश के लिए पर्यावरण बहुत आवश्यक है लकिन यह भी देखना चाहिए कि यहां ऐसे कुछ जानवर पैदा हो गये हैं जो किसानों की फसलों को खराब करते हैं। मेरा कहना है कि वहां नीलगायों की संख्या बढ़ती जा रही है। वह एक गुणा से १० गुणा हो जाती हैं। वे नीलगाय हर किसान की फसल को नष्ट कर देती हैं लेकिन किसान बेचारा हाथ बांधकर बैठा है क्योंकि सरकार के आर्डर हैं कि आप उनको मार नहीं सकते। वे अगर आपकी फसल को खा रही हैं तो खा जायें, उजाड़ रही हैं तो उजाड़ दें लेकिन आप उनको मार नहीं सकते। यहां पर श्रीमती मेनका गांधी जी नहीं हैं। मै चाहूंगी कि वे अगर थोड़ा सा ध्यान इस तरफ दें तो अच्छा होगा। वे जानवरों की रक्षा कर रही हैं, उसके लिए मैं उनकी तारीफ करती हैं और मैं उनकी इज्जत भी करती हूं लेकिन मैं यह भी उम्मीद करती हूं कि वे जानवरों से पहले इंसानों की रक्षा करें, इन गरीब किसानों की रक्षा करें, तो बहुत अच्छा होगा। यदि इन नीलगायों को जिनको रोजड़ी भी कहते हैं, को मारने का प्रावधान सरकार कर दे तो किसानों को इससे बहुत राहत मिलेगी। महाराष्ट्र सरकार ने सबसे पहला कदम इन नीलगायों को मारने के लिए उठाया है। मैं चाहूंगी कि देश के अन्य राज्यों में भी इस बात को लागू किया जाये।
इसी के साथ मैं यह भी कहना चाहती हूं कि ऐसे कुछ बीज बाहर से आ रहे हैं जिनको अगर खेती में इस्तेमाल किया जाये तो पहले जहां किसान की पांच मन फसल एक बीघे में होती थी, वही अब १० से १५ मन होने लगी है। उनको यह देखकर लालच होने लगा है और सरकार ने भी उनको यह बीज देना शुरू कर दिया है। कृषि मंत्री जी से मैं कहना चाहूंगी कि यह वही हाल होगा जिस तरह से अंग्रेजों ने हमको मुफ्त में चाय पिलाकर आज उसका एडिक्ट कर दिया है। कोई भी हिन्दुस्तानी चाहे वह गांव में रहता हो, पहले जब हम वहां जाते थे, तो वह दूध के लिए पूछते थे लेकिन आज वे कहते हैं कि चाय का कप चाहिए। हम चाय के इसलिए इतने आदी हो गये हैं क्योंकि वह पहले हमें मुफ्त में मिलती थी। आज वही हाल किसानों का है। उनको इस किस्म के बीज कम पैसे में दिये जा रहे हैं जिससे उनकी फसल पांच मन के बदले १५ मन हो रही है।…( व्यवधान )इसलिए इन बातों पर हमें ध्यान देना है कि जो बीज हम खेती में प्रयोग करके ज्यादा पैदावार कर रहे हैं, वह कल हमारे लिए काम नहीं आ सकते। यह बहुत ही सीरियस मैटर है। इस बीज के लिए हमें विदेशों के ऊपर डिपेंड करना पड़ेगा। अगले साल जब हमें खेती के लिए उन बीजों की जरूरत होगी तब वे बीज हमें नहीं मिलेंगे। इसके लिए हमें विदेशों पर डिपेंड करना पड़ेगा। इस तरह की व्यवस्था की जाये जिससे अपने देश का गेहूं अपने देश में रखें और उसी का बीज हम प्रयोग में लायें। …( व्यवधान )
अभी प्रधान मंत्री जी ने आत्मविश्वास की बात कही है। मैं इस बात से सहमत हूं लेकिन किसान का आत्मविश्वास तब होगा जब उसका पेट भरेगा।…( व्यवधान )
श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज, बिहार) : सभापति जी, छह बजने वाले हैं।…( व्यवधान )
कुंवर अखिलेश सिंह:आप सदन का समय दो घंटे और बढ़ा दीजिए।
…( व्यवधान )
MR. CHAIRMAN : The Business Advisory Committee has decided to have the discussion till 9 p.m. If there is any revised programme, let it be informed. As it stands, the discussion will go upto 9 p.m. श्री रघुनाथ झा (गोपालगंज):सभापति जी, इतने महत्वपूर्ण सवाल पर आप रात में बहस करा रहे हैं। न तो इसकी न्यूज जाती है और न ही लोगों को इसके बारे में कुछ पता चलता है इसलिए आप इस पर आज बहस न कराकर कल कराइये। …( व्यवधान )
श्री प्रभुनाथ सिंह : आप आज की बहस यहीं समाप्त करके तीन दिन तक लगातार इस पर बहस कराइये।…( व्यवधान )
कुंवर अखिलेश सिंह:इस सवाल पर बहुत सदस्य बोलने वाले हैं इसलिए आप इसे दो घंटे और चलने दीजिए।…( व्यवधान )
श्री प्रभुनाथ सिंह : आप इस पर कल १२ बजे से फिर बहस शुरू कराइये। रात के नौ या दस बजे तक चलाकर क्या होगा ?इतने महत्वपूर्ण सवाल पर रात को बहस कराने का कोई मतलब नहीं है इसलिए आप इस बहस को यहीं समाप्त करके कल १२ बजे से फिर शुरू कराइये। …( व्यवधान )
THE MINISTER OF ENVIRONMENT AND FORESTS (SHRI T.R. BAALU):
Sir, the Minister for Parliamentary Affairs has gone to meet the hon. Speaker. He will come and intimate the House on this point.
MR. CHAIRMAN: If there is any fresh intimation, I will inform the House.
श्रीमती रमा पायलट:सभापति जी, मैं एक बात बहुत दुख के साथ कहना चाहती हूं कि इस सदन की एक गरिमा होती है। मैं कृषि मंत्री जी से अपील करती हूं, करबद्ध प्रार्थना करती हूं कि आप अपनी गरिमा को कृपया बनाये रखें और अगर मंत्री जैसा व्यवहार हमें दिखायेंगे तो हम जो नये आने वाले सदस्य हैं, वे आपसे कुछ सीखेंगे। इस सदन में बहुत अव्यवस्था होती है। मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगी कि उसके ऊपर गौर किया जाये।

18.00 hrs. इस सदन की गरिमा जैसी थी वैसी ही रखी जाए। माननीय सदस्य और मंत्रिगण इस तरह आपस में बातें करते हैं तो हम पर तो बुरा अफैक्ट पड़ता ही है लेकिन विदेशों में भी खबर जाती है। प्रधान मंत्री जी उस दिन खड़े होकर बहुत गुस्से में बोल रहे थे और कह रहे थे कि आप लोगों ने जो विरोधी बातें कही हैं, वह मीडिया ने पिक-अप की हैं और मीडिया में विदेशों में उसकी हैडलाइन आई है। क्या इस बात की हैडलाइन नहीं जाती होगी, क्या यह बात मीडिया में नहीं जाती होगी कि हम किस तरह सदन की गरिमा में सहयोग देते हैं? बहुत अफसोस के साथ कहना पड़ता है और सच मानिए तो इस सदन के अंदर आने की तबियत नहीं करती जब हमारे माननीय सदस्य इस तरह व्यवहार करते हैं। बहुत अफसोस है इस बात का।

…( व्यवधान )

श्री प्रभुनाथ सिंह : नए-नए आए हैं, सब जान जाएंगे।…( व्यवधान )

श्रीमती रमा पायलट:मैं अपनी बात खत्म करना चाहूंगी क्योंकि कोई भी माननीय सदस्य शायद सुनने में रूचि नहीं ले रहे हैं। मैं हाउस में चैलेंज करती हूं कि अगर हाउस में इस तरह चर्चा होगी, …( व्यवधान )

कृषि मंत्री (श्री नीतीश कुमार):आप समझ नहीं रही हैं। चेयर कह रही है कि हाउस नौ बजे तक चलना है, कुछ माननीय सदस्य कह रहे हैं कि छ: बज रहे हैं, इसे खत्म किया जाए। …( व्यवधान )

श्रीमती रमा पायलट:इस बात को बी.ए.सी. में पहले रखा जाए।…( व्यवधान )इस बात को पहले से तय करके चेयर के सामने रखना चाहिए। बीच-बीच में जो कह रहे हैं, वह गलत है।…( व्यवधान )

श्री नीतीश कुमार : मैं आपकी बात सुन रहा हूं।…( व्यवधान) Shrimati Rama Pilot, why are you accusing me?… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : The point is that the Business Advisory Committee has already decided to have it till Nine of the Clock. If there is any revision of programme, I will inform you.

… (Interruptions)

श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव (झंझारपुर) : हम हाउस के विषय में बोल रहे हैं।…( व्यवधान )मेरी आपसे रिक्वैस्ट है कि इतने गंभीर इश्यू पर चर्चा हो रही है, फार्मर्स की प्रौब्लम्स पर चर्चा हो रही है और यदि सदन इसे गंभीरता से नहीं लेगा,…( व्यवधान )यह समय नहीं है गंभीरता से लेने का।…( व्यवधान )

MR. CHAIRMAN: The Leaders of the Parties have discussed it in the Business Advisory Committee.

श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव:हम बी.ए.सी. में हैं। यदि सब लोग सहमत हैं तो इस पर गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए।…( व्यवधान )

MR. CHAIRMAN: They discussed it with the hon. Speaker. The hon. Speaker has taken a decision to have it till Nine of the Clock.

देवेन्द्र प्रसाद यादव:सदन जो चाहेगा होगा, सदन सर्वोपरि है।…( व्यवधान )यदि आपकी पार्टी तैयार है तो हम सब तैयार हैं। बी.ए.सी. के हम लोग ही मैम्बर हैं।

MR. CHAIRMAN: Shri Yadav, the Business Advisory Committee cannot meet in the House. It meets inside the Chamber of the hon. Speaker.

श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव:मैं चाहता हूं कि डिस्कशन को गंभीरता से लिया जाए।…( व्यवधान )

MR. CHAIRMAN: The hon. Speaker will come and he will inform you about this.

कुंवर अखिलेश सिंह:अगर तीन दिन की चर्चा स्वीकार कर ली जाए तो हमें कोई आपत्ति नहीं है वर्ना जो समय निर्धारित हुआ है, तब तक सदन चले।…( व्यवधान )

श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव:आप व्यवस्था दीजिए। आपकी रूलिंग होनी चाहिए। सदन की भावना को समझें।…( व्यवधान )

MR. CHAIRMAN: If the Committee agrees, we will have it for three days. It all depends on the decision of the Committee.

कुंवर अखिलेश सिंह:संसदीय कार्य मंत्री अपने विचार सदन के समक्ष रख दें।

…( व्यवधान )

श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव:रख दें कि सरकार का क्या स्टैंड है।

MR. CHAIRMAN: We have taken a decision in the BAC. If it has to be revised, the BAC has to meet again. We cannot take a decision.

कुंवर अखिलेश सिंह:मेरा व्यवस्था का प्रश्न है। सदस्यगणों ने कहा है कि देश में बहुसंख्यक वर्ग किसानों का है। किसानों के सवाल पर सदन में चर्चा चल रही है।…( व्यवधान )

MR. CHAIRMAN: If the House is agreeable to any further change in the programme, we will take it up. We will change it.

कुंवर अखिलेश सिंह:हम चाहते हैं कि संसदीय कार्य मंत्री से पूछ लिया जाए कि क्या वे चर्चा करने के लिए तैयार हैं।

MR. CHAIRMAN: Everybody is interested in the farmers’ issue. All Parties are interested in the farmers’ issue.

… (Interruptions)

DR. SUSHIL KUMAR INDORA (SIRSA): Sir, this is a national issue. So, you can take a decision.… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: I know about it. The farmers’ issue is a national issue.

… (Interruptions)

श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव:संसदीय कार्य मंत्री आकर इस बारे में बता सकते हैं।…( व्यवधान )

MR. CHAIRMAN: Till the decision is announced, till such time, we will go on with our business. Let the business continue. Shrimati Rama Pilot, will you conclude?

… (Interruptions)

PROF. UMMAREDDY VENKATESWARLU (TENALI): Sir, I would request you to look at the sentiment, the spirit and the mood of the House.

MR. CHAIRMAN: I know of it.

PROF. UMMAREDDY VENKATESWARLU : Even if a decision has been taken by the BAC, looking at the mood of the House, you can decide about it.… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Now, the House is going to conduct the business till Nine of the Clock. Why are you in a hurry?

… (Interruptions)

SHRIMATI RENUKA CHOWDHURY (KHAMMAM): Sir, I do not understand the sense of what is being discussed in the House. … (Interruptions) It is not enough that we reduce it to a black and white decision of the BAC.

MR. CHAIRMAN: Your party’s representative is also there.

SHRIMATI RENUKA CHOWDHURY : That is all right. But I am expressing my opinion on the floor of this House. I wish to draw your attention to this issue. This is a crisis of a phenomenal magnitude. We do not want to discuss it because it has to be discussed.… (Interruptions) I would like to express my opinion also.… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Let it not be made an issue. If the House is agreeable, we will take it up further. Now, the business is going to be conducted till Nine of the Clock.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : Why are you troubling?

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: The business of the House would be conducted till 9 o’ clock.

… (Interruptions)

SHRIMATI RENUKA CHOWDHURY : If the House conducts the business till 9 o’ clock because it must be conducted till 9 o’ clock, then it defeats the purpose for which we want to speak. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: We would see the mood of the House at 9 o’ clock to proceed further. But do you want to see the mood of the house at 6 o’ clock?

कुंवर अखिलेश सिंह:माननीय सभापति महोदय, माननीय सदस्यगण ने यह गम्भीर प्रश्न खड़ा किया है। अभी संसदीय कार्य राज्य मंत्री सदन के अन्दर थे और अभी चले गये। सदन यह चाहता है कि लगातार तीन दिन तक इस गम्भीर विषय पर चर्चा कराई जाये। …( व्यवधान )

MR. CHAIRMAN: You allow the business to go on till 9 o’ clock. We will decide at 9 o’ clock. You allow them to take the agenda.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Please conclude now.

श्रीमती रमा पायलट:माननीय सभापति जी, प्रधान मंत्री जी ने आज सदन को बताया कि वे मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन बुलाने जा रहे हैं। मैं आशा करती हूं कि उसमें वे कोई ऐसा हल निकालेंगे, जिससे देश के किसानों को कुछ राहत मिलेगी, मोहलत मिलेगी।

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: You be here till 9 o’ clock. You can participate in the proceedings. The Parliamentary Affairs Minister would come. All the Members are interested in the welfare of the farmers, not this party or that party. All the parties are being represented in the farming community. Nobody can take an individual credit.

   

SHRI A.K.S. VIJAYAN (NAGAPATTINAM): Mr. Chairman, Sir, on behalf of my party, the Dravida Munnetra Kazagham, I rise to put forth the achievements of the Central Government for the past one and a half years and the achievements of the Tamil Nadu Government for the past five years in the field of agriculture.

Farmers are the backbone of our country. Keeping this in mind, the Central Government under our hon. Prime Minister, Shri Atal Bihari Vajpayee has already announced the first ever National Policy in Agriculture. It has also decided to reduce the interest rate charged by NABARD from 11.5 per cent to 10.5 per cent. It has also introduced the Kisan Credit Cards. The Central Government has provided a subsidy of Rs.78 crore for setting up cold storages during 2000-2001. These would, no doubt, help farmers to step up the production and would give much needed relief to produce more.

Tamil Nadu Government under the eminent leader of Dr. Kalaignar M. Karunanidhi has introduced a lot of programmes and schemes for the upliftment of agricultural farmers. It has set up `Vegetable Marketing Centres’ (Uzhavar Sandhai) in all major Municipalities and Town Panchayats of the State to help farmers to sell their produce at a particular place and at a particular price without the intervention of intermediaries. This is definitely an innovative step taken by the Government of Tamil Nadu keeping in view the problems and difficulties faced by the farmers of the State. This has certainly made a break-through in the field of marketing of vegetables in the State. This has helped the farmers to reduce the time, right from the initial stage to the marketing stage. Instead of going from pillar to post and for being at the mercy of the intermediaries, the Government of Tamil Nadu has helped them to sell at a particular place and without any intermediaries. Other State Governments and the Central Government should emulate the innovative efforts taken by the Government of Tamil Nadu in regard to setting up of `Vegetable Marketing Centres’.

After the Chola Dynasty, only the present Tamil Nadu DMK Government has desilted rivers and canals. This is a Herculean task and the Government of Tamil Nadu has done it commendably. It has helped to conserve water and the farmers have benefited with this act of the Government by getting water for cultivation and irrigation all through the year. This too can be taken up in other States.

Recently, the NDA Government has instructed the State Governments to stop supplying free electricity. But the Tamil Nadu Government has expressed strong reservations against this instruction and urged the Central Government to reconsider this announcement.

Tamil Nadu Government has waived the dues of the farmers and this has helped the farmers of Tamil Nadu to a great extent. Unlike in other parts of the country, Tamil Nadu farmers are better placed. Tamil Nadu Government has done a lot of work for easing the tension by extending reliefs at appropriate times.

Tamil Nadu Government under Dr. M. Karunanidhi, with the intervention of the Central Government, found a lasting solution to the Cauvery water dispute that has been there for a long time. Dr. Karunanidhi and Shri Vajpayee have settled this vexed problem with persistent and frequent talks with the respective States, and with the result Tamil Nadu has been getting Cauvery water for a couple of years.

The Government of the day has announced, in 1989-90, a waiver of Rs.10,000 to the farmers. This year, I would plead with the Central Government to enhance this amount to at least Rs.20,000 for the benefit of the farmers of the country in this hour of grief. Under the present circumstances, the farmers will get the much-needed relief by this kind gesture of the Government of India.

The Tamil Nadu Government has released Rs.13 crore for waiving the penal interest. It also gave incentives to the tune of Rs.20 crore to the farmers to safeguard the interests of the farmers of Tamil Nadu.

With this high note and expectation from the Central Government, I conclude.

       

श्री रघुनाथ झा : सभापति महोदय, इस सदन में अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर जो खेत और किसानों के सम्बन्ध में है, चर्चा हो रही है। इस सदन में पहले भी कई बार इस विषय पर चर्चा हो चुकी है। सरकार की ओर से भी उसका समुचित उत्तर दिया गया है। लेकिन इतने महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा हो रही है और सदन की उपस्थिति, चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, को देखकर इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितनी रुचि किसानों के बारे में माननीय सदस्यों के बीच है। न सिर्फ सदस्यों के बीच, कृषि से सम्बन्धित जो सिंचाई का विभाग है, बिजली का विभाग है, फूड मनिस्टरी है और अन्य विभाग हैं, अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि सरकार की उपस्थिति भी ठीक नहीं है। यह ठीक है कि कृषि मंत्री जी सक्षम हैं, केबिनेट की जाइंट रिसपांसबलिटी है, वे इस बहस का उत्तर देंगे। लेकिन जितनी जागरूक सरकार इसके प्रति होनी चाहिए, उतनी नहीं है। मैं कृषि मंत्री जी को बधाई देना चाहूंगा कि पहली बार ५० वर्षों की आजादी के बाद देश में कृषि नीति की घोषणा इन्होंने की है।

श्री शिवराज वी. पाटील (लातूर) : अगर आप मुझे बोलने की इजाजत दें तो मैं एक मिनट लूंगा। है कि हम भी कृषि मंत्री जी को कृषि नीति लाने की बधाई देते हैं। लेकिन यह पहली कृषि नीति नहीं है। जाखड़ साहब ने इसी सदन में कृषि नीति की घोषणा की थी। बैंकों से कर्जा दिलाने के लिए भी हमने नीति की घोषणा की थी, जमींदारी खत्म करने के लिए भी नीति की घोषणा हमने की थी और सिंचाई के लिए भी नीति लाने की घोषणा हमने की थी।

श्री रघुनाथ झा : समेकित रूप से कृषि नीति लाने की पहले हमारे कृषि मंत्री जी ने की है। आप लोगों ने ५० सालों में कृषि का नाश कर दिया।

श्री शिवराज वी. पाटील: मैं आपको तारीख दे रहा हूं। १२ अक्तूबर, १९८९ को राजीव गांधी जी ने वहां से कृषि नीति की घोषणा की थी।

डा. रघुवंश प्रसाद सिंह : उस समय ये कांग्रेस में थे।…( व्यवधान )

श्री रघुनाथ झा : इस सरकार ने और कृषि मंत्री जी ने पहली बार समेकित ढंग से कृषि नीति रखने का काम किया है। आपने अपनी सुविधा के मुताबिक कृषि नीति बनाई थी। ५० वर्षों में इस देश में कृषि का और किसानों का आपकी सरकार ने जितना बंटाधार किया, उतना आज तक किसी सरकार ने नहीं किया। यह बात ठीक है कि सारे किसानों की समस्याओं का निदान नहीं हो रहा है। बहुत सी बातें हैं, जिनके लिए कृषि मंत्री जी को और भारत सरकार को काफी मेहनत करने की आवश्यकता है।

आगे किसानों को और सुविधा देने की आवश्यकता है लेकिन जिस बात को डब्ल्यू.टी.ओ. में जाकर, आपने अंगूठा लगाकर, निशान लगाकर देश के किसानों की अनदेखी की है, …( व्यवधान )आपने देश के किसानों के हित को ताक पर रखने का काम किया है। इसके लिए कृषि मंत्री जी को, भारत सरकार को उसमें लगना पड़ेगा और किसानों के हित को देखना पड़ेगा। कृषि मंत्री जी से मैं कहना चाहूंगा कि आप सभी दलों के लोगों को विश्वास में लीजिए और किसानों के हित को, डब्ल्यू.टी.ओ. के कारण से जो नुकसान हो रहा है, आप देखिए कि उसकी कैसे भरपाई हो सकती है, उसके लिए आगे बढि़ए और पूरा सदन आपके साथ है।

मैं बिहार से आता हूं और मुझे गर्व है कि कृषि मंत्री जी भी बिहार से है। जब झारखंड का बंटवारा हो गया और झारखंड के बंटवारे के बाद बिहार की जो स्थिति है, हमारे यहां भोजपुरी में गाना बना दिया गया।"बटगिल, झारखंड और अब खाइए शकरकंद।"आज हमारी स्थिति बिल्कुल दयनीय हो गई है और माननीय कृषि मंत्री जी अच्छी तरह से जानते हैं कि नेपाल से आने वाली नदियों के कारण बाढ़ से भयंकर नुकसान होता है। नेपाल से आने वाली नदियों से पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार का बहुत बड़ा भू-भाग प्रतिवर्ष बर्बाद होता है। सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर सब समाप्त हो जाता है, खेती बर्बाद हो जाती है। इस चीज की भरपाई आज तक नहीं हो सकी। उसे रोकने के लिए नेपाल की सरकार से सार्थक बातचीत नहीं हो सकी जिसके कारण पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों का कल्याण नहीं हो सकता। इसलिए हम चाहते हैं कि जो नुकसान होता है, उसकी भरपाई चाहे भारत सरकार करे या फिर नेपाल की सरकार पर दबाब डालकर वहां समुचित व्यवस्था करे। आज बिजली के बारे में स्वयं प्रधान मंत्री जी ने चिंता व्यक्त की है और इस बात को स्वीकार किया है कि आज बिजली की व्यवस्था ठीक नहीं है और बिहार में बिजली नदारद है। हमारे रघुवंश बाबू जी कह रहे थे कि बिहार बचाओ, देश बचाओ। पटना में रैली हुई थी। रैली तो सुपर-फ्लॉप हो गई। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में गन्ने की कीमत में बहुत जमाने से, पचासों वर्षों से एक रुपये का फर्क होता रहा है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसानों की तुलना में बिहार के किसानों को गन्ने की कीमत में एक रुपया ज्यादा मिलता रहा है लेकिन बिहार की सरकार गन्ने की कीमत लागू नहीं कर सकी, गन्ने की कीमत का फैसला नहीं कर सकी। मैं गोपालगंज जिले से आता हूं। वहां का गन्ना यू.पी. की फैक्टरियों में जाता है। यू.पी. वाले अपने इलाके के लोगों को पाच रूपया अधिक देते हैं और बिहार के लोगों को गन्ने की कीमत कम देते हैं। इस तरह से बिहार के गन्ने के किसानों का शोषण होता है। बिहार में आलू के किसानों का एक बहुत बड़ा इलाका है लेकिन इस बजट में मुझे प्रसन्नता है कि अब उसके भंडारण की व्यवस्था करने की घोषणा वित्त मंत्री जी ने की है और कोल्ड स्टोरेज बनाने की व्यवस्था की है। एक करोड़ किसानों को क्रैडिट कार्ड देने की बात की है और तीन करोड़ लोगों के क्रैडिट काड्र्स अगले तीन साल तक पूरा करने की बात कही गई है, इसके लिए मैं सरकार को बधाई देना चाहता हूं। हमारे यहां बहुत बड़ा फलों का इलाका है। लीची बहुत बड़े एरिया में होती है, केले का बहुत बड़ा एरिया है. आम के फलों का भी बहुत बड़ा इलाका है। इन फलों के रख-रखाव, भंडारण, वितरण और मार्केटिंग की व्यवस्था ठीक नहीं है और न ही बाहर ले जाने की व्यवस्था है। माननीय कृषि मंत्री जी के नेतृत्व में, बिहार के बंटवारे के बाद माननीय प्रधान मंत्री जी को हम लोगों ने मैमोरेंडम दिया था और उसमें मांग की थी कि बिहार से कारगो की सुविधा दी जानी चाहिए ताकि बिहार की फसल को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने की व्यवस्था हो सके लेकिन अभी तक इस संबंध में सरकार की ओर से कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया है।

हम चाहते हैं कि इस बात की व्यवस्था की जाए। धान की खरीद जारी करने के बारे में सदन में कई बार चर्चा हो चुकी है। फूड मनिस्टर सदन में उपस्थित नहीं है। बिहार में गत वर्ष धान का उत्पादन १२३ लाख मटि्रक टन हुआ है। लेकिन एफ.सी.आई. के द्वारा सिर्फ पांच हजार मीटि्रक टन ही प्रोक्योर किया गया। इस बात में बिहार के साथ भेदभाव हुआ । कहा गया कि आंध्रा प्रदेश से लिया गया है, पंजाब से लिया गया है, मुझे इस पर कोई शिकायत नहीं है। किसानों को उनके उत्पादन का मूल्य मिलना चाहिए, लेकिन बिहार में एफ.सी.आई. के अधिकारी इनकी बात को मानने के लिए तैयार नहीं है। कहा गया कि वहां ४० केन्द्र खोल दिये गये हैं, जवाब देते रहे, कहते रहे और बार-बार इस सदन में चर्चा की कि बिहार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, बिहार के पास साधन नहीं हैं कि वह इस दिशा में कदम उठा सके। हमने कृषि मंत्री जी से अनुरोध किया, उन्होंने इसमें रुचि भी ली कि बिहार का धान खरीदा जाए, लेकिन उसकी खरीद नहीं हो पाई। इस विषय में माननीय मंत्री जी पटना बात करने के लिए गये, हम लोग इस सदन के सदस्य हैं, इनके इलाके में विरोधी दल की बात तो छोड़िये, सहयोगी दलों के लोगों को भी नहीं पूछा गया और ये अपने पार्टी दफ्तर में जाकर कार्य करते रहे। लेकिन हम लोगों से बात करना भी इन्हें गवांरा नहीं हुआ। इसलिए इस बात की आवश्यकता है कि हम इन सारी बातों पर ध्यान दे। हम लोगों के नेता डा. राम मनोहर लोहिया जी बार-बार कहते थे कि अनाज का उत्पादन, करखनिया माल का उत्पादन, इन सबकी समुचित रूप से व्यवस्था होनी चाहिए। हमारा अनाज का उत्पादन का मूल्य कछुवे की गति से चल रहा है, जबकि कारखानों का उत्पादन मूल्य खरगोश की चाल से चल रहा है। कारखाने में बना हुआ सामान जैसे ट्रैक्टर, कुदाल, पावर टिलर आदि किसान खरीदते हैं, जो महंगा मिलता है। इसके बीच में भी आज व्यवस्था करने की आवश्यकता है। बीज के दाम, कीटनाशक दवाओं के दाम, जो किसानों की आवश्यकता है, बढ़ रहे हैं। खाघ पर आपने सब्सिडी हटा दी है। डीजल का दाम बढा दिया है ।

जहां तक बी.पी.एल. का प्रश्न है, गत वर्ष इसके अंतर्गत आठ हजार करोड़ रुपये खर्च करते थे और इस साल आप १२ हजार करोड़ रुपया खर्च करने जा रहे हैं। बी.पी.एल.का अनाज जिन लोगों को मिलना चाहिए, मैं पूछऩा चाहता हूं कि क्या वह उन लोगों को तक पहुंच पाता है। स्थिति यह है कि वह सारा सामान चोर-बाजार में चला जाता है। किसानों को डिस्ट्रैस सेल के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, इस पर भी विचार करने की आवश्यकता है और इसकी जाँच होनी चाहिये।

भंडारण के विषय में भी आपने घोषणाएं की हैं, इसके लिए मैं आपको बधाई देता हूं, लेकिन भंडारण व्यापक रूप से करने की जरूरत है। बिहार में जमीन की स्मॉल होल्िंडग की सीमा अधिकतम है, जिसे हम अलाभकर खेती कहते हैं। इस खेती से कोई फायदा नहीं होता है। किसान ठीक से खेती नहीं कर पाते हैं। मेरा सुझाव है कि सरकार किसानों को पम्प सैट आदि की सुविधाएं दे, ताकि चार-पांच किसान मिलकर आपस में एडजस्टमैंट करके, ५-१०-१५ एकड़ के किसान, अपने तरीके से खेती कर सकें और खेती की तकनीक को विकसित कर सकें। प्रधान मंत्री जी ने आज भी और पहले भी अपने भाषण में खेती की तकनीक को बदलने के लिए कहा है। श्रीमती रमा पायलट जी की बात से मैं सहमत हूं, यह ठीक है कि धान, चावल, गेहूं के उत्पादन के बदले में दूसरी तरह की खेती करना चाहते हैं।

आप कौन सी खेती कराना चाहते हैं। इसका एक सर्वे करके, कि कौन से इलाके में कौन सी खेती हो सकती है, कृषि विभाग से एक बुलेटिन निकाल कर, वहां लोगों को प्रशक्षित करके, उन लोगों के बीच में ले जाकर उन्हें बताने की आवश्यकता है ताकि वे लोग ठीक से अपनी खेती कर सकें। आपने कोई अल्टरनेटिव व्यवस्था नहीं की और किसानों को छोड़ दिया। कभी-कभी गन्ने का उत्पादन लोग ज्यादा कर देते हैं और जब गन्ने का उत्पादन ज्यादा कर देते हैं तो फैक्ट्री वाले उसका मूल्य घटा देते हैं। फिर जब उसका मूल्य बढ़ जाता है तो दूसरी तरफ दूसरे साल में वे दूसरी खेती करने लगते हैं। इसलिए एक समुचित विकास के हिसाब से खेती करने की आवश्यकता है। भारत सरकार ने ठोस कदम उठाया है। पहली बार बजट में भी किसानों के ऊपर ध्यान दिया गया है और आगे भी किसानों को मजबूत किया जाए, क्योंकि हमारे देश में ८० प्रतिशत आबादी किसानों और मजदूरों की है, लेकिन किसानों और मजदूरों की आवाज जिस तरह संसद, विधानसभाओं या दूसरी जगहों पर उठनी चाहिए, उस तरह नहीं उठती है, चूंकि हम में एकता नहीं है। हम वोट भी देते हैं तो जाति और पार्टी के आधार पर देते हैं। किसानों की समस्या समझ कर अगर हम इस सवाल को उठाएं तो हम आगे किसानों की मदद कर सकते हैं।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

MR. CHAIRMAN : Now, the hon. Member, Shrimati Renuka Chowdhury.

… (Interruptions)

श्री प्रभुनाथ सिंह : महोदय, अभी रघुनाथ जी कह रहे थे कि किसानों का सवाल मजबूती से नहीं उठता है और इसलिए नहीं उठता है क्योंकि सदन में सब लोग उपस्थित नहीं रहते हैं। इसलिए हमने आपसे कहा कि आज इसे स्थगित कर दिया जाए और कल सब लोग रहेंगे तो उस समय मजबूती से इस सवाल को उठाया जाए।…( व्यवधान )

MR. CHAIRMAN: Is it the sense of the House to continue this discussion tomorrow?

SHRIMATI RENUKA CHOWDHURY : Mr. Chairman, Sir, I will become the first speaker tomorrow. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: If the sense of the House is to continue this discussion tomorrow, then we can take it up tomorrow. If the House agrees, then we can continue it tomorrow. Is it the sense of the House to continue this discussion tomorrow?

SEVERAL HON. MEMBERS: Yes.

MR. CHAIRMAN: Okay. We will continue this discussion tomorrow.

Now the House stands adjourned to meet again tomorrow, 13th March 2001 at 11 a.m. 1828 hrs. The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Tuesday, March 13, 2001 / Phalguna 22, 1922 (Saka).

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