State Consumer Disputes Redressal Commission
Smt. Pushpa vs L I C Of India on 10 July, 2015
Daily Order STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/2001/1152 (Arisen out of Order Dated in Case No. of District State Commission) 1. Smt. Pushpa a ...........Appellant(s) Versus 1. L I C Of India a ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MRS. Smt Balkumari PRESIDING MEMBER For the Appellant: For the Respondent: ORDER राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ। सुरक्षित अपील सं0-1152/2001 (जिला उपभोक्ता फोरम, द्वितीय बरेली द्वारा परिवाद संख्या-२८१/१९९८ में पारित आदेश दिनांक ०८/०५/२००१ के विरूद्ध) श्रीमती पुष्पा उम्र ५४ वर्ष पत्नी स्व0 नरेश चन्द्र निवासी १८१ कटरा मनरई, जिला बरेली यू0पी। ......अपीलार्थी/परिवादी बनाम लाईफ इंश्योरेंस कारपोरेशन आफ इंडिया पेंशन एवं ग्रुप इंश्योरेंस डिपार्टमेंट डिवीजनल आफिस ३० हजरतगंज लखनऊ द्वारा मैनेजर (ग्रुप इंश्योरेंस)। जिला पंचायत बरेली द्वारा अपर मुख्य अधिकारी । जिला पंचायत हरदोई द्वारा अपर मुख्य अधिकारी । जिला पंचायत बुलन्दशहर द्वरा अपर मुख्य अधिकारी। उ0प्र0 पंचायती राज अनुभाग-११ लखनऊ द्वारा सचिव। .........प्रत्यर्थीगण/विपक्षीगण समक्ष:- 1.
माननीय श्री उदय शंकर अवस्थी, पीठा0 सदस्य ।
2. माननीय श्रीमती बाल कुमारी, सदस्या ।
अपीलार्थी की ओर से उपस्थित : श्री धर्मेन्द्र कुमार सिंह विद्वान अधिवक्ता।
प्रत्यर्थीगण की ओर से उपस्थित: श्री वी0एस0 बिसारिया विद्वान अधिवक्ता ।
दिनांक 23/07/2015 माननीय श्री उदय शंकर अवस्थी , पीठा0सदस्य द्वारा उदघोषित निर्णय प्रस्तुत अपील परिवाद सं0-२८१/१९९८ श्रीमती पुष्पा बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम, में जिला मंच द्वितीय बरेली द्वारा पारित निर्णय दिनांक ०८/०५/२००१ के विरूद्ध योजित की गयी है।
संक्षेप में तथ्य इस प्रकार हैं कि परिवादिनी के पति स्व0 नरेश चन्द्र जिला पंचायत बरेली में द्वितीय श्रेणी के पद पर वर्ष १९७९ में नियुक्त हुए थे। अपने सेवा काल के दौरान वह विपक्षी सं0-1 द्वारा संचालित सामूहिक बीमा योजना मास्टर पालिसी सं0-५२४९१ के सदस्य अपने विभाग के माध्यम से बने थे एवं नामाकन पत्र में उन्होंने परिवादिनी का नाम नामिनी के रूप में दर्ज कराया था। इस योजना के अन्तर्गत पालिसी के प्रीमियम (अंशदान) का मासिक भुगतान अपीलकर्ता के पति अपने वेतन से करते थे तथा इस अंशदान को काटने एवं प्रत्यर्थी सं0-1 के पास भेजने का दायित्व विभाग का था। अपीलकर्ता के पति का जुलाई १९८९ में अपर मुख्य अधिकारी के पद पर स्थानान्तरण जिला पंचायत 2 हरदोई प्रत्यर्थी सं0-3 के लिए हो गया था। वह दिनांक ०७/०७/८९ से २५/०७/९३ तक हरदोई जिला पंचायत अपर मुख्य अधिकारी के पद पर रहे । इसके पश्चात अपीलकर्ता के पति का स्थानान्तरण जिला पंचायत बुलन्दशहर हो गया था। जहां दिनांक १८/१२/१९९३ को उनका देहान्त हो गया। अपीलकर्ता ने अपने पति के देहान्त के उपरांत जब उपरोक्त सामूहिक बीमा के ८००००/-रू0 के भुगतान के संबंध में प्रत्यर्थी सं0-4 से कहा तब प्रत्यर्थी सं0-4 ने कहा कि बीमा राशि के शीघ्र भुगतान हेतु प्रत्यर्थी सं0-1 से पत्राचार चल रहा है, शीघ्र ही भुगतान कर दिया जाएगा तथा इस संदर्भ में उन्होंने अपीलकर्ता से भी स्वयं प्रत्यर्थी सं0-1 से संपर्क करने को कहा। अपीलकर्ता ने दिनांक १४/०९/१९९४ को रजिस्टर्ड पत्र द्वारा प्रत्यर्थी सं0-1 से अपने मृतक पति की बीमा राशि का भुगतान करने को कहा किन्तु प्रत्यर्थी सं0-1 ने बीमा राशि का भुगतान नहीं किया। उपरोक्त बीमा राशि के संदर्भ में प्रत्यर्थी सं0-4 एवं 5 द्वारा भी प्रत्यर्थी सं0-1 से लगातार पत्राचार जारी रहा। इसके बावजूद भी अपीलकर्ता की बीमा राशि का भुगतान नहीं किया गया। अपीलकर्ता ने दिनांक २९/०१/१९९७ को पंजीकृत नोटिस विपक्षी सं0-1 को भेजी, जिसकी प्रतियां अन्य प्रत्यर्थीगण को भी भेजी गयी, किन्तु प्रत्यर्थीगण ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। दिनांक १०/०८/१९९८ को अपीलकर्ता प्रत्यर्थी सं0-1 के यहां लखनऊ गयी और अपने पति के बीमा राशि का भुगतान करने को कहा तब प्रत्यर्थी सं0-1 ने बीमा राशि का भुगतान करने से इनकार कर दिया। इसके पश्चात अन्य प्रत्यर्थीगण ने भी बीमा राशि देने में असमर्थता व्यक्त की । अत: अपीलकर्ता द्वारा परिवाद जिला मंच बरेली में योजित किया गया।
प्रत्यर्थी सं0-1 ने जिला मंच में प्रस्तुत परिवाद पत्र द्वारा यह अभिकथित किया कि प्रश्नगत सामूहिक बीमा योजना के अन्तर्गत जारी की गयी मास्टर पालिसी की शर्तों के अधीन निगम का करार सीधा बीमा धारक के नियोक्ता से होता है और बीमाधारक का नियोक्ता ही बीमित कर्मचारी के वेतन से कटौती करके प्रति छमाही किस्त के आधार पर माह फरवरी एवं अगस्त में एक साथ प्रीमियम अग्रिम रूप से ६ माह के लिए निगम के कार्यालय को भेजता है। अत: अपीलकर्ता का परिवाद निगम के विरूद्ध पोषणीय नहीं है।
जिला परिषद हरदोई ने पत्र दिनांकित १३/०५/१९९३ के द्वारा निगम को यह सूचित किया था कि अपीलकर्ता के पति की नियुक्ति प्रथम श्रेणी के अधिकारी अपर मुख्य अधिकारी जिला हरदोई के पद पर दिनांक ०८/०७/८९ को हुई थी तथा श्री नरेश चन्द्र के वेतन क्रम में वृद्धि की गई। अपीलकर्ता के पति की श्रेणी परिवर्तित हो जाने एवं उसके वेतन क्रम में वृद्धि हो जाने के फलस्वरूप उसके हरदोई नियोक्ता द्वारा वर्तमान श्रेणी (द्वितीय श्रेणी) के आधार पर ही ४० रू0 प्रति माह की दर से प्रीमियम भेजा जाता रहा है जबकि यह प्रीमियम ८० रू0 प्रतिमाह की दर से प्रेषित किया जाना था क्योंकि मृतक बीमित कर्मचारी की श्रेणी 3 द्वितीय से प्रथम हो गयी थी और ४२ माह का लम्बा अंतरात व्यतीत हो जाने के बाद जब हरदोई नियोक्ता प्रत्यर्थी सं0-3 को अपनी गलती का एहसास हुआ तो उसने बिना किसी विलम्ब शुल्क के इकट्ठे ४२ माह का प्रीमियम राशि का अन्तर ४० रू0 प्रति माह की दर से १६८०/-रू0 निगम के कार्यालय को प्रेषित कर दिया जो कि अनियमित हो जाने के कारण निगम के कार्यालय के उच्चन्त (सस्पेंस) खाते में रखा गया। निगम ने अपने पंजीकृत पत्र दिनांकित ३०/०५/१९९४ जो अपर मुख्य अधिकारी जिला परिषद हरदोई को संबोधित था, के द्वारा बीमित के नियोक्ता से स्पष्ट जानकारी चाही कि निगम को जुलाई ८९ से दिसम्बर ९२ तक कुल ४२ माह का जो १६८०/-रू0 बकाया प्रीमियम भेजा गया उस पर १२ प्रतिशत ब्याज क्यों नहीं दिया गया जो कि नियमानुसार देय था। इसके अतिरिक्त इस अवधि तक का प्रीमियम न भेजे जाने का कारण स्पष्ट रूप से बताने को कहा गया था, क्योंकि मृतक बीमित हरदोई नियोक्ता के यहां जुलाई ९३ तक कार्यरत था, किन्तु स्व0 बीमा धारक के विभाग से कोई उत्तर निगम के उपरोक्त पत्र का नहीं दिया गया।
मृतक बीमित प्रत्यर्थी सं0-3 के यहां ०७/०७/८९ से २५/०७/९३ तक कार्यरत रहा । इसके बाद प्रत्यर्थी सं0-4 के यहां बुलन्दशहर स्थानान्तरित हो गया और वहां लगभग ४ माह बाद दिनांक १६/१२/१९९३ को उसकी मृत्यु हो गयी। मृत्यु की सूचना प्रत्यर्थी सं0-४ नियोक्ता बुलन्दशहर द्वारा पत्र दिनांकित ३१/१२/९३ के माध्यम से निगम के कार्यालय में प्रेषित की गयी जो निगम में दिनांक ०६/०१/१९९४ को प्राप्त हुआ। नियोक्ता बुलन्दशहर प्रत्यर्थी सं0-4 ने दिनांक ०७/०२/१९९४ को मु0 ४००/-रू0 प्रश्नगत मास्टर पालिसी के अन्तर्गत प्रीमियम के मद में मृतक बीमित के निगम के कार्यालय को प्रेषित किए गए जो दिनांक ०७/०३/१९९४ को निगम के कार्यालय में प्राप्त हुआ। यह धनराशि भी दिनांक ०९/०३/१९९४ को निगम के उच्चन्त (सस्पेंस) खाते में रखी गयी, चूंकि प्रीमियम की यह धनराशि अनियमित रूप से मृतक बीमित की मृत्यु के बाद प्रेषित की गयी थी। अत: प्रश्नगत मास्टर पालिसी की अदायगी नियमानुसार न किए जाने के कारण मृतक बीमित के जीवन का रिस्क कवर नहीं था जिसके लिए मृतक बीमित के हरदोई एवं बुलन्दशहर के नियोक्ता प्रत्यर्थी सं0-3 व 4 उत्तरदायी हैं।
प्रत्यर्थी सं0-3 व 4 ने अपने-अपने प्रतिवाद पत्रों में यह कहा है कि मृतक बीमित जिस अवधि में उसके कार्यालय में कार्यरत रहे हैं उस अवधि से संबंधित बीमा का प्रीमियम प्रत्यर्थी सं0-1 के कार्यालय को भेजा गया। उनके द्वारा सेवा में कोई त्रुटि नहीं की गयी । प्रत्यर्थी सं0-4 द्वारा यह भी अभिकथित किया गया कि उसके द्वारा प्रत्यर्थी सं0-1 को बीमा की धनराशि के भुगतान हेतु कई पत्र लिखे गये किन्तु प्रत्यर्थी सं0-1 द्वारा बीमा की धनराशि का भुगतान नहीं किया गया।
विद्वान जिला मंच बरेली ने अपीलकर्ता के पति द्वारा प्रश्नगत बीमा के प्रीमियम की धनराशि की अदायगी में कटौती न कराने के कारण अपीलकर्ता को 4 बीमा लाभ के अन्तर्गत ८००००/-रू0 प्राप्त करने का अधिकारी नहीं माना किन्तु अपीलकर्ता के पति द्वारा प्रश्नगत बीमा के अन्तर्गत जमा धनराशि को १२ प्रतिशत ब्याज सहित प्राप्त करने का अधिकारी पाते हुए अपीलकर्ता का परिवाद उक्त धनराशि की १२ प्रतिशत ब्याज के साथ अदायगी हेतु आज्ञप्त किया है।
इस निर्णय से क्षुब्ध होकर यह अपील योजित की गयी है।
हमने अपीलकर्ता के विद्वान अधिवक्ता श्री धर्मेन्द कुमार सिंह एवं प्रत्यर्थी सं0-1 बीमा निगम की ओर से श्री वी0एस0 बिसारिया विद्वान अधिवक्ता को सुना एवं पत्रावली का अवलोकन किया। अन्य प्रत्यर्थीगण की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ।
प्रत्यर्थी सं0-1 के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि प्रस्तुत मामले में सामूहिक बीमा योजना की संविदा प्रत्यर्थी सं0-1 एवं अपीलकर्ता के नियोक्ता के मध्य निष्पादित हुई थी। अपीलकर्ता के पति स्व0 श्री नरेश चन्द्र इस बीमा योजना में सदस्य थे, संविदा में पक्षकार नहीं थे, अत: अपीलकर्ता को प्रत्यर्थी सं0-1 के विरूद्ध परिवाद योजित करने का कोई अधिकार नहीं था।
अपीलकर्ता के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि अपीलकर्ता के पति निर्विवाद रूप से प्रश्नगत सामूहिक बीमा योजना की संविदा में पक्षकार नहीं थे, किन्तु वह तथा अन्य सदस्यगण इस योजना के लाभार्थी थे। अपीलकर्ता को इस योजना के अन्तर्गत उसके स्व0 पति द्वारा नामित किया गया था । अत: यह नहीं माना जा सकता कि अपीलकर्ता को प्रत्यर्थी बीमा कम्पनी के विरूद्ध परिवाद योजित करने का कोई अधिकार नहीं है।
उल्लेखनीय है कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम १९८६ की धारा २(iv) (घ) में उपभोक्ता को परिभाषित किया गया है। इस धारा के अनुसार:-''उपभोक्ता'' से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जो-
किसी ऐसे प्रतिफल के लिए जिसका संदाय किया गया है या वचन दिया गया है या भागत: संदाय किया गया है, और भागत: वचन दिया गया है, या किसी आस्थगित संदाय की पद्धति के अधीन किसी माल का क्रय करता है, और इसके अंतर्गत ऐसे किसी व्यक्ति से भिन्न, जो ऐसे प्रतिफल के लिए जिसका संदाय किया गया है या वचन दिया गया है या भागत: संदाय किया गया है या भागत: वचन दिया गया है या आस्थगित संदाय की पद्धति के अधीन माल का क्रय करता है या ऐसे माल का कोई प्रयोगकर्ता भी है, जब ऐसा प्रयोग ऐसे व्यक्ति के अनुमोदन से किया जाता है किंतु इसके अंतर्गत ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो ऐसे माल को पुन: विक्रय या किसी वाणिज्यिक प्रयोजन के लिए अभिप्राप्त करता है, और किसी ऐसे प्रतिफल के लिए जिसका संदाय किया गया है या वचन दिया गया है या भागत: संदाय किया गया है और भागत: वचन दिया गया है, या किसी आस्थगित संदाय की पद्धति के अधीन सेवाओं को (भाड़े पर लेता है या उपभोग करता है) और इसके अंतर्गत ऐसे किसी व्यक्ति से भिन्न जो ऐसे किसी प्रतिफल के लिए जिसका संदाय किया गया है और वचन दिया गया है और भागत: संदाय किया गया है और भागत: वचन दिया गया है या किसी आस्थगित संदाय की पद्धति के अधीन सेवाओं को (भाड़े पर लेता है या उपयोग करता है) ऐसी सेवाओं का कोई हिताधिकारी भी है जब ऐसी सेवाओं का उपयोग प्रथम वर्णित व्यक्ति के अनुमोदन से किया जाता है (लेकिन इसमें कोई ऐसा व्यक्ति शामिल नहीं है, जो ऐसी सेवाओं को किसी वाणिज्यिक प्रयोजन के लिए उपाप्त करता है) यह तथ्य निर्विवादित है कि प्रश्नगत सामूहिक बीमा योजना के अन्तर्गत अपीलकर्ता के पति के वेतन से उसके नियोक्ता द्वारा बीमा के अन्तर्गत अंशदान/प्रीमियम काटा जाता रहा है। यह योजना, योजना के सदस्यगण के लाभार्थ है। उपभोक्ता की अधिनियम के अन्तर्गत वर्णित परिभाषा के आलोक में अपीलकर्ता के पति उपभोक्ता की श्रेणी में माने जाएंगे और इस योजना के अन्तर्गत निश्चित रूप से प्रत्यर्थी सं0-1 की भूमिका सेवा प्रदाता की है। अत: प्रत्यर्थी सं0-1 के विद्वान अधिवक्ता का यह तर्क स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है कि अपीलकर्ता को प्रत्यर्थी सं0-1 के विरूद्ध परिवाद योजित करने का कोई अधिकार नहीं है।
प्रत्यर्थी सं0-1 के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क भी प्रस्तुत किया गया कि बीमा की शर्तो के अधीन प्रीमियम की अदायगी अग्रिम प्रत्येक छमाही माह फरवरी एवं अगस्त में की जानी थी। प्रीमियम की अदायगी बीमा योजना के सदस्यगण के वेतन से उनके नियोक्ता द्वारा की जानी थी। प्रीमियम की अदायगी अग्रिम न किए जाने की स्थिति में सदस्यगण बीमा पालिसी के अन्तर्गत लाभ प्राप्त करने के अधिकारी नहीं थे। प्रस्तुत मामले में अपीलकर्ता के पति जिला पंचायत हरदोई प्रत्यर्थी सं0-3 के यहां दिनांक ०७/०७/८९ से २५/०७/९३ तक कार्यरत रहे । प्रत्यर्थी सं0-3 ने प्रत्यर्थी सं0-1 बीमा निगम को अपने पत्र दिनांकित ३१/०५/१९९३ द्वारा यह सूचित किया कि अपीलकर्ता के पति दिनांक ०८/०७/८९ से प्रथम श्रेणी अधिकारी के रूप में अपर मुख्य अधिकारी के पद पर कार्यरत थे और शासनादेश सं0-४७७६वी/३३-०२-९२-५६वी/९० दिनांक १८/०९/१९९२ के अनुसार उनके प्रीमियम की धनराशि ४०/-रू0 प्रति माह के स्थान पर ८०/-रू0 प्रतिमाह हो गयी थी। अत: प्रत्यर्थी सं0-3 ने १६८०/-रू0 चेक सं0-२१३५०४ दिनांकित १३/०५/१९९३ के द्वारा जुलाई ८९ से दिसम्बर ९२ तक कुल ४२ माह का अवशेष प्रीमियम प्रत्यर्थी सं0-1 को भेजा गया जो निगम के कार्यालय में रसीद सं0-बीओसी-६२७८८ दिनांक ०२/०७/१९९३ द्वारा उच्चन्त (सस्पेंस) खाते में रखा गया। निगम ने अपर मुख्य 6 अधिकारी जिला परिषद हरदोई को संबोधित अपने पत्र दिनांक ३०/०५/१९९४ द्वारा यह जानकारी चाही कि उपरोक्त ४२ माह के बकाया प्रीमियम पर १२ प्रतिशत ब्याज क्यों नहीं दिया गया जो नियमानुसार देय था और विलम्ब का कारण स्पष्ट करने की अपेक्षा की गयी किन्तु अपीलकर्ता के पति के नियोक्ता द्वारा कोई उत्तर नहीं भेजा गया । दिनांक २५/०७/१९९३ के उपरांत अपीलकर्ता के पति का स्थानान्तरण बुलन्दशहर प्रत्यर्थी सं0-४ के यहां हो गया । वहीं लगभग ४ माह बाद दिनांक १८/१२/१९९३ को अपीलकर्ता के पति की मृत्यु हो गयी। अपीलकर्ता के पति नियोक्ता प्रत्यर्थी सं0-4 ने अपने पत्र दिनांकित २६/०२/१९९४ द्वारा ४००/-रू0 चेक दिनांकित ०७/०२/१९९४ से प्रश्नगत पालिसी के प्रीमियम के मद में मृतक बीमित की मृत्यु के उपरांत निगम के कार्यालय को प्रेषित किया जो निगम के कार्यालय में दिनांक ०९/०३/१९९४ को प्राप्त हुआ । यह धनराशि निगम द्वारा उच्चन्त (सस्पेंस) खाते में रखी गयी क्योंकि प्रीमियम की यह धनराशि नियोक्ता द्वारा अनियमित रूप से बीमित की मृत्यु के उपरांत प्रेषित की गयी थी। इस संबंध में प्रत्यर्थी सं0-1 द्वारा नियोक्ता बुलन्दशहर को पंजीकृत पत्र दिनांकित ३०/०५/१९९४ प्रेषित किया गया तथा इस संदर्भ में स्पष्टीकरण चाहा गया कि ०८/१९९३ से १२/१९९३ तक का ५ माह का प्रीमियम ४००/-रू0 अन्य कर्मचारियों के प्रीमियम के साथ क्यों नहीं भेजा गया, जबकि पालिसी की शर्तों के अनुसार अग्रिम रूप से दिनांक ०१/०८/१९९३ से ३१/०१/१९९४ तक कुल ६ माह के लिए जुलाई १९९३ में ही धनराशि निगम को प्रेषित की जानी चाहिए थी। प्रत्यर्थी यी। -५६ साथ प्रत सं0-1 को भेजी सं0-1 के विद्वान अधिवक्ता का यह भी तर्क है कि अपीलकर्ता के पति के नियोक्ता द्वारा प्रीमियम की धनराशि पालिसी के अन्तर्गत समय से जमा न किए जाने के कारण मृतक बीमित के जीवन का रिस्क कवर नहीं था। ऐसी स्थिति में अपीलकर्ता बीमा की शर्तों के अनुसार बीमित धनराशि को प्राप्त करने के अधिकारी नहीं थे। अत: प्रत्यर्थी सं0-1 द्वारा बीमा की शर्तो के अनुसार बीमे की धनराशि का भुगतान अपीलकर्ता को नहीं किया गया। प्रत्यर्थी सं0-1 द्वारा सेवा में कोई कमी नहीं की गयी है, बल्कि अपीलकर्ता के पति के नियोक्ता द्वारा बीमे की प्रीमियम की धनराशि की नियमित अदायगी में त्रुटि की गयी।
अपीलकर्ता की ओर से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि प्रस्तुत मामले में यह तथ्य निर्विवाद है कि प्रश्नगत सामूहिक बीमा योजना के पालिसी के अन्तर्गत प्रीमियम धनराशि की अदायगी का दायित्व अपीलकर्ता के पति का नहीं था बल्कि यह धनराशि अपीलकर्ता के पति के वेतन से नियमित रूप से काटी जानी थी और यह धनराशि अपीलकर्ता के पति के वेतन से नियोक्ता द्वारा काटी भी जाती रही । अत: प्रीमियम की धनराशि की कटौती में हुई किसी अनियमितता का दायित्व अपीलकर्ता के पति का नहीं माना जा सकता और इस आधार पर बीमा की धनराशि प्राप्त करने का अपीलकर्ता का अधिकार अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
7अपीलकर्ता के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क भी प्रस्तुत किया गया कि विद्वान जिला मंच ने पालिसी के अन्तर्गत प्रीमियम की धनराशि की अदायगी का दायित्व अपीलकर्ता के पति का मानकर त्रुटि की है।
अपीलकर्ता के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क भी प्रस्तुत किया गया है कि उसके पति के वेतन से नियोक्ता द्वारा प्रीमियम के मद में की जा रही कटौती निगम के अभिकर्ता के रूप में मानी जाएगी। इस संदर्भ में उनके द्वारा दिल्ली इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई अन्डरटेकिंग बनाम बसन्ती देवी एवं अन्य (१९९९) ८ सुप्रीम कोर्ट केसेस २२९ के मामले में मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय पर विश्वास व्यक्त किया गया है ्ल्ीर्भ में उनके द्वारा दिल्। अपीलकर्ता के विद्वान अधिवक्ता द्वारा संदर्भित उपरोक्त निर्णय का हमने अवलोकन किया। मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्णीत उपरोक्त मामले में बीमा पालिसी भारतीय जीवन बीमा निगम की सैलरी सेविंग स्कीम के अन्तर्गत थी जिसमें संविदा संबंधित कर्मचारीगण एवं जीवन बीमा निगम के मध्य निष्पादित की गयी थी। नियोक्ता द्वारा मात्र कर्मचारीगण (सदस्यगण) के वेतन से प्रीमियम की धनराशि की कटौती की जाती थी। ऐसी परिस्थिति में मा0 सर्वोच्च न्यायलय द्वारा यह अवधारित किया गया कि भारतीय संविदा अधिनियम की धारा १८२ के अन्तर्गत नियोक्ता की स्थिति बीमा कम्पनी के अभिकर्ता की मानी जाएगी। यदि नियोक्ता द्वारा प्रीमियम की धनराशि कटौती संबंधित कर्मचारी के वेतन से किए जाने के बावजूद बीमा की प्रीमियम की अदायगी हेतु जमा नहीं की जाती है। तब नियोक्ता द्वारा कारित की गयी त्रुटि का लाभ बीमा कम्पनी को नहीं मिल सकता। बीमा कम्पनी बीमित धनराशि की अदायगी के लिए उत्तरदायी होगी।
जहां तक प्रस्तुत मामले का प्रश्न है। इस मामले में प्रश्नगत बीमा सैलरी सेविंग स्कीम के अन्तर्गत नहीं किया गया है बल्कि सामूहिक योजना के अन्तर्गत किया है। यह तथ्य निर्विवादित है कि प्रश्नगत बीमा की संविदा में संबंधित कर्मचारीगण पक्षकार नहीं थे, बल्कि यह संविदा उनके नियोक्ता एवं जीवन बीमा निगम के मध्य निष्पादित की गयी थी और बीमा की शर्तों के अन्तर्गत प्रीमियम की धनराशि की अदायगी का दायित्व नियोक्ता का संबंधित कर्मचारी के वेतन से काटकर करने का था। ऐसी परिस्थिति में इस मामले में नियोक्ता की स्थिति प्रश्नगत संविदा के संदर्भ में जीवन बीमा निगम के अभिकर्ता के रूप में नहीं मानी जा सकती है। यह भी उल्लेखनीय है कि प्रस्तुत मामले में यह तथ्य निर्विवादित है कि अपीलकर्ता के पति की मृत्यु से पूर्व की ५ किस्ते नियोक्ता द्वारा अपीलकर्ता के बीमा के प्रीमियम के भुगतान हेतु उसके जीवन काल में नहीं काटी गयी। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि प्रस्तुत मामले के तथ्य मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्णीत उपरोक्त मामले के तथ्यों से भिन्न है। अत: मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए उपरोक्त निर्णय का लाभ इस मामले में अपीलकर्ता को नहीं दिया जा 8 सकता। यह तथ्य निर्विवाद है कि प्रश्नगत पालिसी में प्रीमियम की निगम को अदायगी का दायित्व अपीलकर्ता के पति का नहीं था, बल्कि नियोक्ता का था, किन्तु मात्र इसी आधार पर प्रीमियम की निगम को यथा-समय नियमानुसार अदायगी का दायित्व स्वत: पूर्ण नहीं माना जा सकता, नियोक्ता द्वारा इस दायित्व की पूर्ति संविदा की शर्तों के अधीन सिद्ध होना आवश्यक होगा।
प्रत्यर्थी सं0-1 के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि यदि बीमा की शर्तों के अन्तर्गत देय प्रीमियम की धनराशि की अग्रिम अदायगी नहीं की जाती है तो बीमित धनराशि की अदायगी का दायित्व बीमा कम्पनी का नहीं माना जा सकता है। इस संदर्भ में मा0 राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग द्वारा रिवीजन पिटीशन सं0-९७१/१९९८ दि सेक्रेट्री क्रुशी उतापन्ना बाजार समिति बनाम एलआईसी आफ इंडिया एवं अन्य के मामले में दिए गए निर्णय दिनांकित ०४/०२/२००४ पर विश्वास व्यक्तकिया गया। इस मामले में मा0 राष्ट्रीय आयोग ने प्रीमियम की धनराशि बीमा की शर्तों के अधीन अग्रिम नहीं जमा किए जाने की स्थिति में बीमित धनराशि की अदायगी का दायित्व बीमा कम्पनी का नहीं माना है। प्रस्तुत मामले में प्रीमियम की धनराशि की नियमित अदायगी प्रत्यर्थी बीमा कम्पनी को अपीलकर्ता के पति क नियोक्ता प्रत्यर्थी सं0-3 एवं 4 द्वारा नहीं की गयी है। अत: बीमा की धनराशि की अदायगी का दायित्व प्रत्यर्थी सं0-1 का नहीं माना जा सकता।
जहां तक प्रत्यर्थी सं0-3 व 4 का प्रश्न है। प्रत्यर्थी सं0-3 व 4 क्रमश: जिला पंचायत हरदोई द्वारा अपर मुख्य अधिकारी एवं जिला पंचायत बुलन्दशहर द्वारा अपर मुख्य अधिकारी उ0प्र0 राज्य के अधीनस्थ कार्यरत है तथा राज्य सरकार की सेवा शर्तों के अधीन कार्य कर रहे हैं। अपने कार्य के लिए कोई धनराशि उनके द्वारा प्राप्त नहीं की जा रही थी। अत: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों के अन्तर्गत उनकी स्थिति सेवा प्रदाता की नहीं मानी जा सकती । तदनुसार इस अधिनियम के अन्तर्गत उनके विरूद्ध कोई अनुतोष प्राप्त नहीं किया जा सकता है। जहां तक प्रश्नगत बीमा पालिसी के अन्तर्गत अपीलकर्ता के पति द्वारा जो धनराशि जमा की गयी है, की अदायगी का प्रश्न है। इस धनराशि की वापसी हेत अपीलकर्ता का परिवाद प्रश्नगत निर्णय द्वारा इस धनराशि की १२ प्रतिशत ब्याज सहित वापसी हेतु आज्ञप्त किया गया है।
संभत: लिपिकीय त्रुटि के कारण १६८०/-रू0 के स्थान पर १६४०/-रू0 टाईप हो गया है। अत: प्रश्नगत निर्णय में १६४०/-रू0 के स्थानपर १६८०-रू0 पढ़ा जाएगा। तदनुसार अपील निरस्त किए जाने योग्य है।
आदेश अपील निरस्त की जाती है। प्रश्नगत निर्णय के आदेश में उल्लिखित १६४०/-रू0 के स्थान पर १६८०/-रू0 पढ़ा जाएगा।
9उभयपक्ष अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।
उभयपक्षों को निर्णय की सत्यापित प्रति नियमानुसार उपलब्ध कराई जाए।
(उदय शंकर अवस्थी) (बाल कुमारी) पीठा0सदस्य सदस्य सत्येन्द्र कोर्ट-४ [HON'BLE MRS. Smt Balkumari] PRESIDING MEMBER