Lok Sabha Debates
Combined Discussion On The Budget (General) For 2012-13; Demands For Grants On ... on 26 March, 2012
> Title : Combined discussion on the Budget (General) for 2012-13; Demands for Grants on Account for 2012-13; Supplementary Demands for Grants (General) for 2011-12 and Demands for Excess Grants (General) for 2009-10.
MR. CHAIRMAN: The House shall now take up Item Nos. 15 to 18 together. Shri Shailendra Kumar to speak.
श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी):माननीय सभापति महोदय, आज के विषय ...( व्यवधान) सामान्य बजट पर जो चर्चा हो रही है ...( व्यवधान)
सभापति महोदय : शैलेन्द्र जी की बात रिकार्ड में जाएगी, कोई और बात रिकार्ड में नहीं जाएगी।
(Interruptions) …* श्री शैलेन्द्र कुमार : आपने मुझे बोलने का अवसर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। ...( व्यवधान)
सभापति महोदय : आप लोग बैठ जाइए।
…( व्यवधान)
श्री शैलेन्द्र कुमार : लेकिन मैं आपसे निवेदन करना चाहूंगा कि आप पहले हाउस को आर्डर में लाइए। ...( व्यवधान)
MR. CHAIRMAN: Please go back to your seats.
… (Interruptions)[S1] MR. CHAIRMAN : Please sit down. We are discussing the Budget. Please sit down. Please go to your seats.
… (Interruptions)
*श्री बालकृष्ण खांडेराव शुक्ल (वडोदरा): इस वर्ष का वित्त मंत्री जी का बजट महंगाई के रास्ते, देश को आगे ले जाने वाला बजट है।
यह बजट उपभोक्ताओं के लिए राहत कम और बोझ ज्यादा देगा। खजाना भरने की कवायत में उत्पाद शुल्क में वृद्धि और सेवाकर की दर और ज्यादा बढ़ाकर वित्त मंत्री जी ने आने वाले समय में महंगाई बढ़ाने का रास्ता साफ कर दिया है। बजट में उत्पाद शुल्क की दर को 10 से 12 प्रतिशत करने का असर बाजार में उपलब्ध तमाम उत्पादों पर होगा। इससे सीधा असर तो होगा ही किंतु चीजों के दाम अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ेंगे। ब्रांडेड रेडिमेड गारमेंट से लेकर सोना और रत्नभूषण तक महंगे हो जाएंगे।
एक तरफ देश आर्थिक मंदी से गुजर रहा है और वित्त मंत्री जी ने उसे और मंदी में धकेलने का प्रयास किया है। सरकार खुद मान रही है कि वित्त मंत्री जी के कदम कुछ हद तक महंगाई बढ़ाएंगे। उत्पाद शुल्क में वृद्धि से महंगाई में एक प्रतिशत की वृद्धि होगी।
वित्त मंत्री जी ने आयकर दाताओं को मामूली राहत देते हुए व्यक्तिगत आयकर की सीमा 1.80 से बढ़ाकर 2 लाख रूपये की, जिससे दाता को सालाना 2,000 रूपये का फायदा होगा। दूसरी ओर सेवाकर और अन्य अप्रत्यक्ष करों का दायरा बढ़ाकर आम आदमी की जेब ढीली कर दी है। सेवाकर और उत्पाद शुल्क की दरों में 2 प्रतिशत दरों की वृद्धि से सरकार को 45,940 करोड़ रूपये का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होगा, जोकि सामान्य मानव के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। दैनिक उपयोग में आने वाली लगभग सभी चीजें महंगी होने जा रही हैं।
इस बजट में खेल को संपूर्ण तथा दुर्लक्षित किया गया है। यह वर्ष ओलम्पिक वर्ष है, भारत वर्ष अनेकों खेलों में प्रगति कर रहा है, दुनिया में सबसे ज्यादा युवा धन हमारे पास हैं, परंतु वित्त मंत्री जी ने सिर्फ 31 करोड़ रूपये की बढ़ोतरी के साथ 1152 करोड़ रूपए का प्रावधान किया है, जो बहुत ही निराशाजनक है।
आई टी क्षेत्र के लिए बजट में कुछ खास नहीं है और न ही छोटे शहरों में कौशल विकास को पर्याप्त तवज्जो दी गई है। बजट में ई‑गवर्नेस की जरूरत और कई सरकारी कार्यक्रमों में आधार की भूमिका पर जोर दिया गया लेकिन उद्योग की, एसईजैड, ऑनसाईट सॉफटवेयर सेवाओं से एमएटी को हटाने की मांग की पूरी तरह उपेक्षा कर दी है।
फार्मा और एज्युकेशन क्षेत्र के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। शिक्षा क्षेत्र के लिए 24000 करोड़ का आवंटन रखा गया है किंतु भारत में सबसे आगे गुजरात राज्य में सिर्फ आणंद के इंस्टीटयूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट को 25 करोड़ आवंटित करने की बात रखी गई है जो कि नाइंसाफी है। कैमिकल इंडस्ट्रीज के लिए पर्यावरण के बारे में कोई भी बात रखी नहीं गई है। मेरे संसदीय क्षेत्र में भी पर्यावरण के संबंधित विषयों के कारण गुजरात के अंकलेश्वर, नंदेसरी, पादरा, जम्बुसर के एफल्युऐंंट चैनल का बड़ा प्रश्न है।
औद्योगिक दृष्टि से सबसे ज्यादा विकसित गुजरात को इस बजट से कोई भी फायदा नहीं हो रहा है। टैक्सटाइल इंडस्ट्री गुजरात की पहचान है, उसके ऊपर एक्साइज डयूटी बढ़ने के कारण और ज्यादा नुकसान होने वाला है।
इतने बड़े बजट में गुजरात के लिए किसी प्रकार की कोई योजना नहीं की गई है, जबकि पिछले 6 वर्ष से देश के अर्थतंत्र को मजबूती देने का कार्य गुजरात कर रहा है, और केन्द्र सरकार की सभी योजनाओं का वहन सर्वश्रेष्ठ तरीके से गुजरात में होना है और इसके फलस्वरूप सबसे ज्यादा राष्ट्रीय अवार्ड भी गुजरात को मिले है।
गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा आदरणीय प्रधानमंत्री जी डा0 मनमोहन सिंह जी के पास नर्मदा योजना को कार्यान्वित करने हेतु एवं सीमा सुरक्षा हेतु इंफ्रास्ट्रक्चरल डैवलपमेंट के बारे में मांग रखी गई थी, जो पूर्णतया उपेक्षित की गई है, जिसका हमें खेद है।
इस तरह से वित्त मंत्री जी का यह बजट पूर्णतया दिशाहीन ओर देश के आर्थिक मसलों को पिछड़ा कर महंगाई बढ़ाने वाला है।
*श्री नारनभाई कछाड़िया (अमरेली): इस बार जो सामान्य पेश किया गया उसने गुजरात समेत अन्य राज्यों के किसानों के साथ सीधा रूखा व्यवहार किया है।
मैं आपसे यह कहना चाहूंगा कि हमारा देश जिसके नाम से प्रसिद्ध है, जिसने हमारे देश की शान को बनाए रखा है, जिस पर हमारे देश की तीन चौथाई जनता की रोजी रोटी चलती है, उसी को नजरअंदाज किया जाना या बेदखल किया जाना यह देश के हित में नहीं है।
सरकार ने किसानों को लोन का रास्ता तो दिखाया, परंतु उन्हें खुशहाल व आत्मनिर्भर बनाने के कोइ उपाय नहीं बताये। बेहतर होता कि सरकार किसानों की दशा सुधारने के उपाय करती और कृषि में नई रिसर्च को बढ़ावा देने के प्रयास होते। किसानों एवं देश की खाद्य जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अनाजों के भंडारण क्षमता बढ़ाने एवं सुदृढ़ करने के लिये सरकार को विशेष प्रबंध करने होंगे, जिससे भारत की गरीब जनता तक आवश्यक खाद्य सामग्रियों को आसानी तथा समय पर उपलब्ध कराना संभव हो सके। आने वाले समय में खाद्यान्नों की उत्पादकता बढ़ाने का सारा दारोमदार वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी अनुसंधान पर निर्भर करेगा। अतः बजट में इसके लिए विशेष प्रबंध करना चाहिए था। इसी प्रकार, बजट में कृषि क्षेत्र को सिंचाई हेतु भी प्रबंध करने होंगे।
यदि इस तरह से ऐसा चलता रहा तो एक दिन ऐसा आएगा कि किसान धीरे धीरे खेती को छोड़कर शहर की ओर पलायन करेंगे और जब शहर की ओर पलायन करेंगे तो देश में अनाज की उत्पादन क्षमता कम होगी और शहर में भी गरीबी की स्थिति होगी और जब लोगों को दो वक्त की रोटी नहीं मिलेगी, जब देश में लोग भूखे मरेंगे तो उसम समय सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित होगा और उस समय सरकार के बजट का अधिकांश भाग अनाज को आयात करने में लगाना पड़ेगा।
मैं इस बजट का विरोध करते हुए यह कहना चाहता हूं कि यह सरकार की नीति जनविरोधी है, किसानविरोधी है। शायद सरकार यह नहीं चाहती कि हमारा देश निर्यातक देश बने। यही कारण है कि एनडीए की सरकार जाने के बाद हमारे देश में खाद्य भंडारण में भारी मात्रा में कमी आई है जिसका खामियाजा सारे देश की जनता को भुगतना पड़ रहा है और महंगाई की आग में लोग जल रहे हैं। जिस रफतार से चीनी, दाल एवं अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि हो रही है उससे साफ साबित हो रहा है हमारे देश का उत्पादन यहां की जरूरत को पूरी नहीं कर पा रहा है। देश में कृषि के विकास के लिए गंभीरता से सोचना होगा, और जिस प्रकार रेलवे का बजट अलग से पेश किया जाता है ठीक उसी प्रकार कृषि के हर विभाग को ध्यान में रखकर कृषि के लिए अलग से बजट पेश करना चाहिए तभी इसका विकास संभव है नहीं तो इस लीपापोती से काम नहीं चलने वाला है। प्रत्येक वर्ष सरकार किसान के प्रति एक रूखा व्यवहार अपना रही है और बजट से किसानों में कोई परिवर्तन नहीं हो पा रहा है और बदले में किसानों की वस्तुं जैसे यूरिया, किरोसीन, डीजल, पेट्रोल इत्यादि वस्तुं दिन प्रतिदिन महंगी होती जा रही हैं। यानी सरकार की इस जनविरोधी किसानविरोधी नीति से यह साफ स्पष्ट होता है कि हमारे छोटे‑छोटे किसान भाईयों की भागीदारी को सरकार ने छीन लिया है और सरकार उन मंत्रालयों के पीछे ज्यादा धन आवंटित कर रही है जहां से वोट बैंक को सुरक्षित किया जा सके।
स्वास्थ्य और शिक्षा के लिये यह बजट बेहद निराशाजनक है। स्वास्थ्य और शिक्षा पर (सकल घरेलू उत्पाद) जीडीपी का सबसे ज्यादा हिस्सा मिलना चाहिए था। मगर इस बार भी इसमें मामूली बढ़ोतरी ही हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल खोलने वालों को कोई सब्सिडी नहीं दी गयी है। पहले सरकार ने कहा था कि वो "बी" और "सी" कैटिगरी के शहरों में अस्पताल बनाने वालों को टैक्स में छूट दी जायेगी, परंतु इस केन्द्रीय बजट में ऐसा कोई प्रावधान उपलब्ध नहीं कराया गया है। देश की आम जनता को बेहतर सर्विसेज देने और उन्हें प्राइवेट अस्पतालों के जाल से निजात दलाने के लिये सरकार को हैल्थ सैक्टर के लिये ज्यादा धनराशि उपलब्ध करानी होगी। जिसमें सरकार पूरी तरह विफल रही है। हमारे देश में लगभग 10 लाख लोगों की मौत तम्बाकू के सेवन से होती है। इसके बावजूद इस बार तम्बाकू के खिलाफ अभियान चलाने के लिये पैसे का इंतजाम नहीं किया गया है, जबकि पिछली बार इस मद में 42 करोड़ रूपये आवंटित किये गये थे।
सरकार ने इस बजट में जो खाका पेश किया है, वह आम आदमी पर आर्थिक बोझ और अधिक बढ़ाएगा। सरकार का यह बजट वास्तव में आंकड़ों की बाजीगरी का नमूना भर है। सरकार को प्रत्यक्ष करों में छूट से लगभग 4500 हजार करोड़ का नुकसान होगा जबकि अप्रत्यक्ष करों जैसे उत्पाद एवं सेवा शुल्कों में बढ़ोतरी से तकरीबन 45 हजार करोड़ रूपयों का राजस्व प्राप्त होगा। उत्पाद शुल्क आधारित प्रस्तावों से वस्तुओं एवं सेवाओं के दाम बढ़ने से महंगाई बढ़ेगी क्योंकि कंपनियां अपने प्राफिट मार्जिन से समझौता करने की बजाय इनका सारा भार सीधे तौर पर ग्राहकों पर डाल देगी। इस बजट में स्वर्णकारों के व्यवसाय में सरकार ने सीधा वार किया है। उनके सोने के आयात शुल्क 0.33 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है, जिससे उनके व्यवसाय को गहरा झटका लगा है। आज पूरे देश में स्वर्णकार फैले हुए हैं और वह अपनी कुशल कारीगरी के माध्यम से अपनी रोजी रोटी चला रहे हैं और इस तरह से पूरे देश में एक बडी संख्या में लोग केवल सोने की कारीगरी से रोजगार प्राप्त कर रहे हैं और यूपीए सरकार इस बजट में अचानक उनके व्यवसाय के ऊपर अतिरिक्त कर एवं शुल्क लगाने से पूरे देश में स्वर्णकार आंदोलित हो उठे हैं और 5 दिनों के लिए हड़ताल पर बैठ गए हैं। इसलिए इसे पुनः जल्द से जल्द वापस लेना चाहिए।
वर्ष 2012‑13 के बजट में माननीय वित्त मंत्री जी ने कुछ ऐसा बजट प्रस्तुत किया है जिससे एक मध्यम एवं छोटे वर्ग के व्यापारियों के व्यवसाय के ऊपर एक गहरा प्रभाव पड़ा है। इस बजट फाईल नं.334/3 में पैरा नं.15.8, एवं कॉलम 142 में पॉलिस्टर टेम्पल फाइबर और फिलामेंट यार्न के ऊपर जो प्लास्टिक बोतल एवं वेस्ट कूडे कचरे में से बनता है उसे इम्पलाईज सेक्टर 54वें में समावेश किया है। इस उद्योग पर एक्साइज डयूटी भरने के लिए वह पिछली तारीख 26.6.2010 से लागू किया है।
मैं माननीय मंत्री जी को यह बताना चाहता हूं कि इस उद्योग के लिए प्लास्टिक बोटल, वेस्ट कचरा को बेरोजगार लोग रोड से या रेल की पटरियों से या फुटपाथ से इकट्ठा करते हैं और कबाड़ियों को देते हैं और कबाड़ी लोग उसे अलग अलग करके रिसाइकलिंग करते हैं और उद्योग को देते हैं। रिसाइकलिंग इंडस्ट्री इस प्लास्टिक बोटल, वेस्ट कचरे में से वाशिंग, कटिंग और मेटलिंग प्रोसेस से पॉलिस्टर टेंपल फाइबर और फिलामेंट यार्न बनाते हैं। यह प्लास्टिक बोटल वेस्ट कचरे रिसाइकलिंग इंडस्ट्री को देते हैं और रिसाईकलिंग इंडस्ट्री इसे रॉ मेटेरियल के रूप में उपयोग करते हैं।
रॉ मेटेरियल पर एक्साईज डयूटी लागू होने से इनपुट क्रेडिट नहीं मिलता है और परिणामतः उसमें बनता हुआ पॉलिस्टर टेम्पल फाइबर तथा फिलामेंट यार्न पर उनके पत्र के अनुसार एक्साईज डयूटी भरनी होती है। यह डयूटी की रकम काफी बड़ी हो सकती है और इससे रिसाईकलिंग इंडस्ट्री पर बहुत बड़ा भार हो जाएगा। इस तरह से रिसाईकलिंग इंडस्ट्री बंद होने के कगार पर पहुंच जाएगी और इस प्रकार के छोटे छोटे रिसाईकलिंग उद्योग के बंद होने से बहुत से लोग बेरोजगार हो जाएंगे। जो यह वेस्ट बोटल कचरे से रिसाईकलिंग होता है और यह पर्यावरण के लिए बहुत अच्छी बात है क्योंकि यह प्लास्टिक 500 साल तक भी जमीन में डुबा देते हैं तो यह वैसी की वैसी ही रहती है जो पर्यावरण की दृष्टि से अच्छा नहीं है इसलिए इस उद्योग को सरकार की तरफ से और सहयोग मिलना चाहिए ताकि रोजगार और पर्यावरण की दृष्टि से और उपयोगी बने।
माननीय वित्त मंत्री जी से मैं निवेदन करता हूं कि पैरा नं.15.8 एवं कॉलम ‑142 में सुधार कर रिसाईकलिंग पॉलिस्टर फाइबर और फिलामेंट यार्न पर जो पिछली तारीख से डयूटी लगाई गई है वह उसे या तो रद्द कर दी जाये या उसे फिर 2012 से लगाया जाये।
इस समय देश के सामने कई चुनौतियां हैं, जैसे बढ़ता राजकोषीय घाटा तथा गिरती विकास दर। वर्तमान में विकास दर सात प्रतिशत है, इसको किस तरह आगे बढ़ाया जायेगा, इस बारे में सरकार ने स्थिति साफ नहीं की है। इसी तरह, बढ़ते राजकोषीय घाटे पर किस तरह काबू पाया जायेगा, इस पर भी सरकार का रूख साफ नहीं है। स्पष्ट है सरकार को आर्थिक सेक्टर के प्रबंधन पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, जिसका बजट में साफ अभाव नजर आता है। देश में सेवा सेक्टर सही काम कर रहा है परंतु कृषि सेक्टर की विकास दर में आशातीत बढ़ोतरी नहीं हो पा रही है, जिसको बढ़ाये बिना देश का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है।
विदित हो कि सरकार सन 2005 से लगातार जेंडर आधारित बजट की सुविधाओं का स्वाद लेती आ रही देश की आधी आबादी की दृष्टि से भी यह बजट एक सामान्य ही माना जायेगा। हाल में ही आये आर्थिक सर्वेक्षण में जिस तरह से यह सामने आया है कि रोजगार और वर्कफोर्स के तौर पर महिलाओं की भागीदारी घटी है, उसे देखते हुये माना जा रहा था के सरकार महिलाओं को प्रेरित करने के लिये बजट में कुछ खास प्रावधान करेगी परंतु ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। अगर सरकार अपने बजट को जेंडर आधारित नहीं रखती है तो आने वाले वक्त में महिलाएं अर्थव्यवस्था की दौड़ में पिछड़ सकती हैं।
सरकार अभी तक आधार कार्ड को विभिन्न आवश्यक सेवाओं के साथ जोड़ने की कोई ठोस योजना नही बना पायी है। जैसे आधार कार्ड को मनरेगा की मजदूरी के भुगतान तथा पासपोर्ट बनाये जाने के साथ लिंक करना। इसके अलावा आधार कार्ड बनवाये जाने के लिये आवश्यक कागजात की जांच भी एक महत्वपूर्ण विषय है, जिस पर सरकार ने अभी तक कोई ध्यान नहीं दिया है। जिसके फलस्वरूप कोई भी अन्य देश का व्यक्ति आसानी से आधार कार्ड पाकर भारतीय नागरिकता का दावा कर सकता है। इसके लिए भी सरकार को धनराशि आवंटित कर विशेष ध्यान देना होगा।
… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : The House stands adjourned to meet again at 2.p.m. 12.05 hrs The Lok Sabha then adjourned till Fourteen of the Clock.[k2] उपाध्यक्ष महोदय : जो माननीय सदस्य बजट के ऊपर अपना लिखित भाषण सदन के पटल पर देना चाहते हैं, वे दे सकते है।
…( व्यवधान)
*श्री राम सिंह कस्वां (चुरू): देश में आज भी आधी से अधिक आबादी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है, लेकिन लम्बे समय से खेती करने वाले किसान की हालत चिंताजनक बनी हुई है। जी.डी.पी. में कृषि का हिस्सा लगातार घटता गया है। पिछले दो दशक में जी.डी.पी. में कृषि का योगदान तीस फीसदी से घटकर साढ़े चौदह फीसदी रह गया है। यही नहीं, प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता में कमी आई है। सकल राष्ट्रीय आय में कृषि का हिस्सा बीस सालों में आधे से ज्यादा घट जाना अर्थव्यवस्था के इस क्षेत्र में गहरे संकट की ओर ही इशारा करता है। खेती लगातार घाटे का धंधा बनती जा रही है। खेती, सिंचाई और सड़क जैसी चीजों के लिए किए गए प्रावधान निराश करने वाले हैं। फसल बीमा योजना के तहत नुकसान का आंकलन तहसील स्तर पर होने से आम किसान को राहत नहीं मिली। कृषि क्षेत्र और ग्रामीण विकास के लिए विशेष ध्यान देने की बात कही गई है। कृषि मंत्रालय का बजट 18 प्रतिशत बढ़ाकर 20,208 करोड़ किया गया है। बजट में कृषि क्षेत्र के उत्थान की दिशा में जो कदम उठाए गए हैं वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है, कृषि क्षेत्र के लिए बेहतर होता, इस दिशा में और साहस दिखाया जाता। कृषि ऋण वितरण एक लाख करोड़ रूपयों से बढ़ाकर 5,75,000 करोड़ किया गया है, नाबार्ड के लिए भी 10000 करोड़ का आवंटन किया गया है, किसान क्रेडिट कार्ड को नया रूप देकर ए.टी.एम. के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। के.सी.सी. का लोन लेते समय किसान के साथ जो व्यवहार किया जा रहा है, बिचोलियों के बिना किसान को लोन लेने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इस पर अंकुश लगना चाहिए। कृषि शोध एवं विकास को इस साल में खास महत्व देने के लिए 200 करोड़ का आवंटन किया गया है। यह राशि काफी कम है। आज बीज की नई किस्मों को विकसित करना आवश्यक है। किसान अच्छे बीज के अभाव में खुले बाजार से घटिया बीज खरीदने को मजबूर हैं।
आयकर छूट में सीमा बहुत कम बढ़ाई गई है, जो छूट दी गई है, उससे शायद ही कोई वास्तविक लाभ हो, क्योंकि सर्विस टैक्स और केन्द्रीय एक्साइज की दरों में इजाफे से उपभोक्ता सामानों के दाम बढ़ेगे, जिससे होने वाली बचत से ज्यादा रकम उसकी जेब से निकल जायेगी। बजट से जनता में ज्यादातर हिस्सों में मायूसी महसूस की जा रही है। करीब हर सेवा पर 12 फीसदी टैक्स देना होगा। एक्साइज डयूटी भी 10 से 12 प्रतिशत हो गई है और पैट्रोल के दाम भी बढ़ेंगे, यानि महंगाई का पूरा इंतजाम किया गया है। इस तरह से महंगाई में जो बढ़ोतरी होगी, उसकी तुलना में यह छूट खास नहीं कही जा सकती, वित्त मंत्री जी ने बजट को बैलेंस करने की कोशिश की है, लेकिन इससे महंगाई जरा भी कन्ट्रोल नहीं होगी, सारा बोझ सरकार ने आम आदमी पर डाल दिया है। घर कैसे चलेगा। इस प्रकार की वृद्धि अभूतपूर्व है।
कुल बजट खर्च में भारी वृद्धि के बावजूद रक्षा बजट में मामूली वृद्धि की गई है। यह स्थिति तब है जब चीन और पाकिस्तान दोनों ही देश अपने रक्षा बजट में भारी वृद्धि करते जा रहे हैं। बजट आर्थिक सुधारों के संदर्भ में पूरी तरह खामोश है। गिरती विकास दर को तेज करने और बढ़ती महंगाई को रोकने के लिए बजट से कुछ उम्मीद की जा रही थी, लेकिन वित्त मंत्री जी ऐसा नहीं कर पाए। वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने सरकार को योजनाओं की संख्या कम करने की अनुशंसा की है, सरकार को स्वास्थ्य, शिक्षा ग्रामीण सड़क, पीने का पानी, सिंचाई, कृषि आवास, ऊर्जा आदि महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक ही इन योजनाओं को सीमित रखना चाहिए। मनरेगा, एनआरएचएम, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना और इस प्रकार की अन्य अनेक योजनाओं में भ्रष्टाचार जग जाहिर है। इन योजनाओं से लोगों को बहुत कम लाभ हुआ है। देश आर्थिक संकट का सामना कर रहा है, फिर भी वित्त मंत्री जी इस तूफान से पूरी तरह बेपरवाह नजर हैं। बजट में राजस्थान को विशेष रूप से कुछ नहीं मिला। यह लगातार तीसरा साल है, जिसमें केन्द्रीय बजट की घोषणाओं में राजस्थान का नाम तक नहीं लिया गया, बल्कि केन्द्रीय करों की वसूली कम होने से चालू वित्तीय वर्ष में राजस्थान को 466.55 करोड़ का घाटा हो गया। रिफाइनरी, पेयजल के लिए विशेष पैकेज, डूबती बिजली कम्पनियों को बचाने का इंतजाम, किसानों को पाला व शीत लहर पर सहायता जैसी राजस्थान की उम्मीदें बजट में धूमिल हो गई हैं। वित्त मंत्री जी ने राजस्थान के लिए कोई बड़े निवेश या रोजगार परियोजना की घोषणा नहीं की। 1981 में पंजाब हरियाणा व राजस्थान के हिस्से का 8.6 एमएएफ पानी राजस्थान कैनाल को मिलना था, आज भी 0.60 एमएएफ पानी पंजाब राजस्थान को नहीं दे रहा है। 1982 के समझौते के अनुसार रावी व्यास का 0.17 एमएएफ पानी नौहर और सिधमुख क्षेत्र को नहीं मिल रहा है। ताजेवाला हैड वर्क्स से यमुना नदी का जल राजस्थान को आवंटित नहीं किया जा रहा है। उक्त पानी राजस्थान का हिस्सा है, लेकिन पंजाब व हरियाणा राजस्थान का पूरा हिस्सा देने को तैयार नहीं है। प्रदेश के लिए कोई खास घोषणा नहीं होने से केन्द्रीय बजट में अब राजस्थान सिर्फ योजनाओं में बजट बढ़ाने की हिससेदारी का ही लाभ उठा पायेगा। सरकार ने काला धन पर संसद में श्वेत पत्र लाने का वायदा किया है और ऐसे लोगों पर मुकदमा चलाने की भी बात कही है, लेकिन यह तभी कारगर होगा जब देश के भीतर भ्रष्टाचार की समस्या पर भी सरकार ध्यान दे और कठोर कानून बनाए। वित्त मंत्री जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजकोषीय घाटे को काबू करना, मुद्रा स्फीति को नीचे लाना और तेज आर्थिकवृद्धि के लिए बेहतर माहौल बनाना, इस मोर्चे पर वित्त मंत्री जी विफल रहे हैं। खेती, सिंचाई और सड़क जैसी चीजों के लिए किए गए प्रावधान निराश करने वाले हैं। कुल मिलाकर यह एक निराशाजनक बजट है ।
*श्री देवजी एम. पटेल (जालौर): माननीय वित्त मंत्री जी ने वित्तीय वर्ष 2012‑13 के लिए जो आम बजट प्रस्तुत किया उसके लिए मैं उनको धन्यवाद देता हूं। लेकिन साथ ही यह भी कहना चाहूंगा कि इस बजट से आम जन की उम्मीदें टूटी हैं उनमें उत्साह कम हुआ है और महंगाई का बोझ बढ़ा है।
मैं कोई अर्थशास्त्र का ज्ञाता नहीं हूं और ना ही इस प्रकार का कोई दावा करता हूं लेकिन बजटका अध्ययन करने के बाद एक लोकसभा क्षेत्र का जनप्रतिनिधि होने के नाते यह तो साफ तौर पर देख और समझ पाता हूं कि इस बजट के माध्यम से भारतीय जनमानस जो अपेक्षा कर रहा था वो पूरी होती नजर नहीं आती।
इस बजट के तमाम विषयों पर सदन का ध्यान आकृष्ट किया जा सकता है जो जन विरोधी है और जिन पर एक बेहतर पॉलिसी या पैकेज बनाकर आम जन को राहत पहुंचाई जा सकती थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ बल्कि करों का अतिरिक्त बोझ उन पर लाद दिया गया।
सेवा और उत्पाद कर में बढ़ोतरी कर एक झटके में ही आम आदमी पर 40,000 करोड़ रूपए का अतिरिक्त बोझ डाला गया है। बजट में रोजगार को लेकर किसी तरह की कोई ठोस योजना नहीं है, न ही इसमें आर्थिक मंदी को लेकर कुछ किया गया है। बजट में खुदरा व्यापार को मल्टी ब्रांड के लिए खोलने की बात कही गई है जो आम लोगों के हितों के खिलाफ है। बजट में रोजगार को लेकर किसी तरह की कोई ठोस योजना नहीं है, न ही इसमें आर्थिक मंदी को लेकर कुछ किया गया है। बजट में खुदरा व्यापार को मल्टी ब्रांड के लिए खोलने की बात कही गई है जो आम लोगों के हितों के खिलाफ है।
ऐसे तमाम कदम इस आम बजट में उठाए गए हैं जिससे आम जन को राहत नहीं बल्कि परेशानी होनी वाली है। लेकिन मैं आज सदन का ध्यान देश की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ कृषि क्षेत्र की तरफ ले जाना चाहता हूं। इस बार के बजट में किसान हितों की बिल्कुल अनदेखी की गई है। प्रणव दादा इतिहास और राजनीति के जानकार हैं लेकिन वो अपने बजट में किसानों के योगदान का इतिहास भुला बैठे । उन्हें यह सोचना चाहिए कि आखिर क्यों एक किसान का बेटा खेती करने से भागता है। खेती को किसी वक्त सम्मान का काम समझा जाता था। पर किसानों को अब बाबुओं के रहमो करम पर छोड़ दिया गया है।
नवम्बर, 2007 में संसद में राष्ट्रीय किसान नीति पेश की गई थी। इसकी दो मुख्य बातों में पहली यह थी कि खेती किसानी की आय से जोड़ा जाए, यानि किसानों की आय को कृषि विकास मापने का आधार बनाया जाए। इस नीति की दूसरी बड़ी बात युवाओं को खेती के लिये प्रोत्साहित करने की थी। ऐसी सोच थी कि अगर खेतों की उत्पादकता और खेती से आय बढ़ाई जाए तो हमारे युवा खेती के प्रति आकर्षित होंगे और इसे जीविकोपार्जन का आधार बनाएंगे। प्रोफेसर एम एस स्वामीनाथन पहले ही देश का ध्यान इस ओर आकृष्ट कर चुके हैं कि युवाओं को खेती से जोड़ने के लिये सरकार कोई ठोस नीति नहीं बना रही है। ज्यादातर युवा शहर आकर नौकरी की तलाश करते हैं और अपने गांव वापस नहीं जाना चाहते।
सरकार ने इस बजट में भी कृषि अनुसंधान को बढ़ावा देने की बात कही है पर चिंता का विषय वही है कि इसका फायदा सिर्फ बडे किसानों को मिल रहा है। इसकी एक बडी वजह यह भी है कि इन शोधों में छोटे किसानों की जरूरतों का ध्यान ही नहीं रखा जाता। छोटे किसानों को तो पता भी नहीं होता कि उनके खेतों की क्षमता बढ़ाने के लिए सरकार शोध कराने पर करोड़ों रूपये खर्च करती है। यह न भूलें कि छोटे किसानों का कृषि उत्पादन में योगदान भले ही 35 फीसदी ही हो लेकिन 70 फीसदी किसान इसी दायरे में आते हैं।
किसान क्रेडिट में एक लाख करोड़ का इजाफा करने की बात कही गई है। इस कदम से किसानों को बहुत लाभ नहीं होगा। विद्वानों का मानना है कि इससे सिर्फ उन पर ऋण का बोझ बढ़ेगा। किसानों पर पहले से ही बहुत सा ऋण है।
आज किसान 13 फीसदी की ब्याज दर चुका कर ट्रैक्टर और दूसरी कृषि मशीनरी खरीद सकता है। जिस देश में कार लोन की ब्याज दर 12 फीसदी और होम लोन की ब्याज दर 10 फीसदी के करीब हो वहां किसान के लिए कृषि उपयोगी उपकरणों के खरीद पर ब्याज दर कम की जानी चाहिए थी। ऐसे नहीं किया जाना इस सरकार की जन‑विरोधी नीतियों को दर्शाता है।
बजट में कृषि का प्रावधान करते समय इन छोटी‑छोटी चीजों का ध्यान रखा जा सकता था जिनसे बड़ा हित सध सकता था और देश के एक बड़े वर्ग को फायदा पहुंचाया जा सकता था।
इस बजट से पता लगता है कि केन्द्र की कांग्रेस सरकार का हाथ आम आदमी के साथ नहीं बल्कि उसके गले पर शिकंजे की तरह है जो किसी भी तरह महंगाई कम नहीं होने देना चाहती और साथ ही महंगाई बढ़ने के पीछे दुनिया भर के तर्क ढूंढ लाती रहती है।
यह एक ऐसा बजट है जिसमें मोबाइल तो सस्ता होता है लेकिन फोन बिल महंगा होता है। पिछले करीब आठ साल से चल रही इस सरकार की जनविरोधी नीतियों का ही नतीजा है कि इस देश में मोबाइल फोन अधिक और शौचालय कम हो गए हैं। होना ये चाहिए था कि शौचालय भी अधिक होते और मोबाइल फोन भी।
सरकार ने कृषि और सहकारिता के क्षेत्र में बजट प्रावधान में 18 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी करने की घोषणा की है। कृषि क्षेत्र ने पिछले साल बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना और पूर्वी भारत में हरित क्रंति की योजनाओं के लिए भी धनराशि बढ़ा दी गई है। लेकिन जो क्षेत्र पहले से कृषि में लाभ दे रहे थे उनके लिए कोई नया प्रावधान नहीं किया गया है। उनके लिए नए प्रावधान किए जाने चाहिए थे।
ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी और स्वच्छता की एक बड़ी समस्या है। अगर बजट में इस मद में किए गए प्रावधान को देखें को पाएंगे इसे 11 हजार करोड़ से बढ़ाकर 14 हजार करोड़ करने की घोषणा की गई है यानि कि तीन हजार करोड़ की बढ़ोत्तरी। अध्यक्ष महोदय, देश में करीब 6 लाख गांव हैं यानि हर गांव के लिए कुछ हजार रूपए की बढ़ोत्तरी। इतनी बढ़ोत्तरी से किसका भला होने वाला है। गांव के आम आदमी का तो कोई भला होता नहीं दिखता।
इस सरकार ने बजट में सब्सिडी घटाने पर जोर दिया है। कहा गया है कि कुछ सब्सिडी गैरजरूरी है। सब्सिडी को घटाकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का दो प्रतिशत करने की घोषणा की है।
गांव का गरीब किसान मिट्टी का तेल यानि केरोसीन, पीडीएस के तहत मिलने वाले अनाज से अपना गुजारा करता है। सरकार ऐसी नीति बनाने जा रही है जिसमें अब उसे बैंक के माध्यम से सब्सिडी का आधा पैसा मिला करेगा और जिसका बैंक अकाउंट नहीं होगा, वो क्या करेगा। देश में ऐसे करोड़ों किसान परिवार जिनका अकाउंट नहीं है इस योजना से दलाली बढ़ने के अलावा और कुछ न होगा। वित्त मंत्री ने बजट में विभिन्न क्षेत्रों में निवेश के लिए बहुत से तरीके बताए हैं और उनमें पहले से भी देशी विदेशी निवेश हो रहा है लेकिन कृषि क्षेत्र में निवेश कैसे होगा, इस बजट में कुछ स्पष्ट तरीके से नहीं कहा गया है। बजट में ऐसे प्रावधान होने चाहिए थे जिससे निवेशक को इसमें लाभ के अवसर दिखाई देते और वो इस क्षेत्र में बड़ा निवेश करता जिससे किसान और सरकार दोनों को भारी लाभ मिलता।
अंत में मैं इतना कहूंगा कि जब हम कृषि क्षेत्र के बारे में सोचें तो ये सिर्फ ये ना देखें कि जीडीपी में इसका कितना योगदान है बल्कि खेती को भारत देश की जीवनदायिनी धुरी के रूप में देखना होगा जिसका भारत के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक उत्थान में उल्लेखनीय योगदान है। अगर ये क्षेत्र पिछड़ा या कमजोर हुआ तो देश कमजोर होगा, ये सोचकर हमें कृषि क्षेत्र के लिए प्रावधान करने होंगे। रेलवे बजट की तरह अब कृषि बजट भी पेश हो, और मनरेगा को कृषि से जोड़ा जाए।
*SHRI SHIVARAMA GOUDA (KOPPAL):I would like to share a few points while participating in the discussion on the general Budget presented by our hon. Finance Minister, Shri Pranab Mukherjee in this House.
When UPA Government took over in 2004, India had high growth, low inflation and fairly consolidated public finances. The NDA Government had enacted the Fiscal Responsibility and Budget Management Act and there was expectation that the revenue would rise by the years. But what is happening today, our economic growth has fallen back. Fiscal deficit is already high at 5.6 per cent of the GDP. This year the hon. Minister of Finance has presented the Budget that Gross Tax Recepits are estimated at Rs.10,77,612 crore. That is their receipts. On the expenditure side, he said that the total expenditure for 2012-13 is budgeted at Rs. 14,90,925 crore. This is the Budget which he had presented. Our GDP has come down to 6.9 percent. It is because of the faulty policy of the Government.
As far as fertilizers are concerned, I would earnestly request the hon. Minister is to take urgent steps to ensure availability of decontrolled fertilizers to all farmers including small and marginal farmers with price support. I am of the view that it would result in encouraging balanced use of nutrients and enhance the agriculture productivity. If the trend of non availability of fertilizers continued, situation in the agriculture sector would be worsened. Every year, there are incidents of non-availability of fertilizers reported in the country particularly from the state of Karnataka. The Union Government should take steps to prevent such things to happen this year. Otherwise, it would further distress the poorer sections of the farming community.
My next point is about basic infrastructure. As far as rural areas are concerned, the census of India report say that nearly 40 per cent of our rural people live in some sort of thatched houses. Fifty per cent of the population of our country have no drainage and toilets. Fifty per cent of our people still use fire wood for their cooking. Then, how can we say that their purchasing power is increasing? This is not my report. This is Census Report of India. So, I would like to point out that government of the day should take effective steps to provide minimum basic facilities to our rural people. It is unfortunate that after over six decades of Independence, still large part of population remains under poverty line.
I would like to mention an example about how the union government is ignoring our poor farmers, particularly paddy growers in the State of Karnataka. Karnataka produces so many varieties of paddy. “Jyothi” variety of paddy is also one among them. This paddy is grown in about 25,000 hectares in my parliamentary constituency, Koppal district and other districts like, Shiomoga, Davanagere, Chamarajanagar and Mysore in the state of Karnataka. Since there is no proper arrangement for procurement of “Jyothi” variety of paddy, our farmers are facing great difficulty. Farmers are not getting their due share as Food Corporation of India is not coming forward to purchase through Procurement Centres. Therefore, I would like to urge the government to set up additional paddy procurement centers for the benefit of farmers.
Further, I would like to point out that the warehouses of the Food Corporation of India at various major procurement centre, should be constructed and used for storing the grain. This would also avoid delay in procurement. Farmers are selling their produce to middlemen because they cannot afford the expense of transporting foodgrains to the procurement centers. So, I would also request the government that arrangement for setting up of the procurement centers and transportation facilities should be provided to them.
The most important issue that we are discussing is about the food security. The Government claims much about the food security. We are going to discuss the Food Security Act. We give relief to the poor people by way of subsidy. When we reduce the subsidy, that is Rs.25,000 crore as fuel and Rs.6,000 crore as fertilizers, how is it possible to attain the target of food subsidy? The latest Global Hungry index has come. India’s position is 67 among the 128 countries. Many African countries and Sri Lanka, Nepal, Ghana are above India.
After attaining food security now we need to give emphasis on nutritional security. To achieve this, we need to promote horticultural crops. But we are all aware that arable land in our country is shrinking due to urbanization and industrial growth. It is a big challenge for us to meet demand of nutritional security. In my parliamentary constituency, a large number of farmers grow promegranate. But due to natural calamities and lack of governments support the farmers are suffering huge losses. Their bank credit is becoming a big burden for them. On the other hand, it is unfortunate that in our country our farmers are suffering huge loss as fruits and vegetables are perishing. There is a need to set up more and more food processing industries with proper infrastructure in the country, particularly in rural areas. Another thing I would like suggest is that bank loan of pomegranate growers should be waived off with immediate effect.
I would now like to come to the issue of food inflation. Our food production has increased, but distribution has failed. Many of the parties in this House have been demanding for a Universal Public Distribution System which will help in solving the problem of food inflation. So, I would request the Government to implement the Universal Public Distribution System immediately so that distribution of food articles is uniform which will help the poor people.
In the state of Karnataka, 75% of the land holdings are the small and marginal farmers. Therefore, the government of Karnataka has intiatied a programme like Suvarna Boo Chetana to extend financial assistance of rupees upto 10,000/- to encourage small and marginal farmer to take agriculture in an effective and serious manner. So, I would like to suggest that the Government of India should take similar steps to encourage small farmers all over the country, including Karnataka.
My next point is about power shortage. Karnataka is passing through 27 per cent power shortage mainly due to sudden spurt in demand from the irrigation sector and reduction in power generation due to coal shortages.
Currently, power generation from coal and hydel projects and renewable energy sources such as wind energy are also under severe strain. Due to non-availability of coal from Singareni Colleries and Coal India, the State is facing hurdles to operate thermal power plants located in Raichur and Bellary.
As far as hydel power generation is concerned, the state is cannot overdraw from hydel projects since water in the reservoirs and dams has to last till summer months.
Therefore, I would like to impress upon the Union Government to consider the genuine problem of the state of Karnataka in solving power shortage by allocating more coal blocks and adequate power from Central Grid to the State.
As far as subsidy to various sectors is concerned the hon. Finance Minister in his budget speech said, “ It would be my endeavour to restrict the expenditure on Central subsidies to under 2 per cent of GDP in 2012-13. Over the next three years, it would be further brought down to 1.75 per cent of the GDP”.
This means, he is going to reduce the subsidy. In this connection, I would like to say that subsidy is very important now-a-days because most of the Government programmes, even that of the State Governments need subsidy. Therefore, the government should come forward with some other welfare schemes for farmers and othe social sectors.
*श्री रामसिंह राठवा (छोटा उदयपुर): माननीय वित्त मंत्री जी ने जो बजट पेश किया है वह आम आदमी का बजट नहीं है । मैं एक आदिवासी क्षेत्र से आता हूं और हमारे यहां आदिवासियों की बहुत सी समस्यायें हैं। हमारे संविधान में आदिवासियों और पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए आर्टिकल 46 के तहत इन वर्ग के लोगों को खास रियायतें दी गई हैं उनका मंत्री महोदय ने ध्यान नहीं दिया है। यूपीए सरकार ने इन पिछड़े वर्गो के बारे में बजट में कोई प्रावधान नहीं किया है। मैं अनुरोध करूंगा कि हमारी आदिजाति समाज की स्वास्थ्य, शिक्षा एवं निवास निशुल्क देने का प्रावधान इस बजट में किया जाए।
4 नवम्बर, 2009 को राज्य जनजातीय कार्य मंत्रियों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने आदिवासियों की सुरक्षा के लिए राज्यों से निवेदन किया था। माननीय प्रधानमंत्री जी ने नक्सलवाद और माओवादियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने का जिक्र भी किया था। नक्सलवाद और माओवादियों के अतिरिक्त इस देश में कुछ बाहर के देशों की कुछ संस्थाएं जनजातीय क्षेत्र में काम कर रही हैं। इनके नाम Amnesty International, Survival International और Action Aid है। ये संस्थाएं आदिवासियों के क्षेत्र में कोई भी विकास का कार्य नहीं होने देगी, जिससे आदिवासी पिछड़े के पिछड़े रह जाते हैं। यह बाहर की संस्थाएं गैर‑कानूनी ढंग से अपना कार्य करती हैं। मैं माननीय मंत्री जी से यह अनुरोध करूंगा कि वह इन तीन संस्थाओं का पूरा ब्यौरा गृह और वित्त मंत्री जी से मांगे, ताकि यह पता चल सके कि सरकार ने इन संस्थाओं को Security Clearance दी है। यह भी पता लगाने की कोशिश की जाए कि क्या ये संस्थाएं हमारे देश में पंजीकृत हैं या नहीं। कुछ समय पहले दांतेवाड़ा में माओवादियों द्वारा हमारे सुरक्षा कर्मचारियों पर हमले के बाद इन संस्थाओं का ब्यौरा लेना बहुत आवश्यक हो गया है। कुछ अन्य बिन्दु हैं, मैं बताना चाहता हूं :-
देश की आजादी के बाद जिस पार्टी ने अधिकांश समय केन्द्र एवं राज्यों में शासन किया हो, उस पार्टी के कार्यो की उपलब्धियों की एक लम्बी श्रृंखला होनी चाहिए, वह नहीं है। मुख्यतः वर्तमान की ज्वलंत समस्या भ्रष्टाचार और काले धन पर सरकार को निर्णायक भूमिका निभानी चाहिए और जिसको निभाने की सरकार की घोषणाएं हैं। लेकिन दो वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद भी इस दिशा में कोई सार्थक कदम नहीं उठाया गया है।
केन्द्र सरकार की नीतियां कितनी भ्रामक हैं, इसका एक उदाहरण वर्तमान कपास नीति है, जिसमें निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया है जो किसान विरोधी है। इससे रोजगार के अवसर कम होंगे, किसानों को भारी नुकसान होगा और वे आत्मदाह की ओर अग्रसर होंगे। जबकि यही सरकार गऊ माता के मांस के निर्यात पर तरह‑तरह की सुविधाएं दे रही है। यह विरोधाभास राष्ट्र विरोधी है। विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए ऐसा किया गया है।
वर्तमान सरकार की नीतियों की सच्चाई को देखा जाए तो यूं समझना चाहिए कि आम जनता ने जीने का सही अर्थ ही खो दिया है। गुजरात और बिहार के विकास और उसकी कालवधि की तुलना में कांग्रेस ने जितने लम्बे समय शासन किया है उसकी उपलब्धियां नगण्य हैं। कांग्रेस के सुदीर्घ शासनकाल में जो कुछ उपलब्ध हुआ है और जितने नये रास्ते बने हैं उनकी तुलना में माननीय अटल बिहारी वाजपेयी सरकार की एक ही शासनकाल की उपलब्धियां अधिक कारगर और दूरगामी हैं। ऐसा लगता है कि कांग्रेस की नीति और दृष्टि दोनों की भ्रामक हैं और भटकाने वाली हैं। गांव‑गांव तक बिजली पहुंचाने के लक्ष्य में कुछ कदम बढ़ायें हो, फिर भी न जाने कितने अंधेरों में डूबे हैं। भौतिक समृद्धि का बखान करने वाली सरकार यह क्यों नहीं देखती कि कितने लोगों के लिए उनकी शिक्षा, चिकित्सा,सुरक्षा, पानी‑बिजली, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था नहीं है। गरीब अधिक गरीब होता जा रहा है और अमीर अधिक अमीर। हिंसा, आतंक, अन्याय, शोषण, संग्रह, झूठ, चोरी जैसे अनैतिक अपराध पनपे हैं। आजादी के बाद पहली बार इस सरकार के अनेक मंत्रियों ने भ्रष्टाचार के आरोपों में तिहाड़ जेल की यात्राएं की हैं। धर्म, जाति और प्रांत के नाम पर नये संदर्भो में समस्याओं ने पंख फैलाएं हैं।
धर्म के आधार पर आरक्षण को भारतीय संविधान में मान्यता नहीं है। मगर राष्ट्रपति के अभिभाषण में इसका जिक्र आने का मतलब है कि मनमोहन सरकार की यह नीति है। पिछले लम्बे अरसे से चुनाव प्रणाली में सुधार के लिए व्यापक चर्चा चल रही है और स्वयं कांग्रेस पार्टी के कई महारथी इस बारे में जिक्र करते रहे हैं। चुनाव प्रणाली का सीधा संबंध भ्रष्टाचार से जुड़ा है। गौर से देखा जाए तो वर्तमान चुनाव प्रणाल ही भ्रष्टाचार की मूल जड़ है। अतः भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करने के लिए हमें चुनाव प्रणाली में सुधार की तरफ ध्यान देना ही होगा।
बहुत कठिन है तूफानी नदी में नौका को सही दिशा में ले चलना और मुकाम तक पहुंचाना। तेजी से बढ़ता हिंसक दौर किसी एक प्रांत का दर्द नहीं रहा। इसने हर भारतीय दिल को जख्मी बनाया है। अब इसे रोकने के लिए प्रतीक्षा नहीं, प्रक्रिया आवश्यक है। यदि इस आतंकवाद को और अधिक समय मिला तो हम हिंसक वारदातें सुनने और निर्दोष लोगों की लाशें गिनने के इतनी आदि हो जायेंगे कि हमारी सोच, भाषा और क्रियाशीलता जड़ीभूत बन जायेगी। नए समाधान के लिए ठंडा खून और ठंडा विचार नहीं, क्रंतिकारी बदलाव की लगन चाहिए।
सत्ता और स्वार्थ ने अपनी आकांक्षी योजनाओं को पूर्णता देने में नैतिक कायरता दिखाई है। इसकी वजह से लोगों में विश्वास इस कदर उठ गया है कि चौराहे पर खड़े आदमी को सही रास्ता दिखाने वाला भी झूठा सा लगता है। आंखे इस चेहरे पर सच्चाई की साक्षी ढूंढती हैं।
कोई भी ऐसी समस्या नहीं है कि जिसका समाधान न खोजा जा सके। हर आफत इसलिए बंधन बन जाती है कि हमें न तो उसे सहना आता है और न उन्हें खोलना आता है। बचाव के लिए हर बार उसे आगे खिसकाते रहते हैं। यह टालने की मनोवृति पलायन है। निर्णय के लिए अदालत में आगे से आगे सरकती तारीखें क्या कभी निर्दोष को सही फैसला दे सकती हैं?
इसमें कोई शक नहीं कि प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह की छवि निजी तौर पर एक ईमानदार व्यक्ति की है। मगर दुर्भाग्य देखिए कि उनका शासनकाल आज भ्रष्टतम सरकार के राज के रूप में जाना जा रहा है। इससे बड़ा इस देश का दुर्भाग्य क्या हो सकता है।
*श्री वीरेन्द्र कुमार (टीकमगढ़): बजट ने आम आदमी के मन में निराशा को ही बढ़ाया है। भले ही वित्त मंत्री ने कुछ लोक लुभावन घोषणायें की हों, लेकिन उनका कोई विशेष लाभ आम आदमी को शायद ही मिले क्योंकि उन्होंने एक हाथ से दिया कम है और दूसरे हाथ से ज्यादा लेने के प्रबंध अधिक किए हैं। वित्त मंत्री के सामने अर्थव्यवस्था को पटरी पर ले आने की चुनौती है, उसका सामना करना चाहिए था। किंतु वित्त मंत्री ने चुनौतियों से मुंह मोड़ लिया। वह न तो सब्सिडी कम करने के कोई ठोस उपाय कर सके और न ही आम जनता को कोई राहत दे सके और यह बजट महंगाई बढ़ाने वाला साबित हुआ।
आर्थिक विकास की दर भी चिंतनीय है। कहा गया है कि आगामी वर्ष में 7.6 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर ली जायेगी। पिछले वित्तीय वर्ष में 8.5 प्रतिशत विकास दर हासिल करने की बात कही थी लेकिन आज हमारी विकास दर 6.9 प्रतिशत है। इफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के विकास के लिए बजट में लगभग 60 हजार करोड़ रूपये खर्च किए जाने की बात कही है, लेकिन विनिर्माण क्षेत्र के विकास के लिए बजट में कुछ खास नहीं है। कृषि क्षेत्र के लिए भी जितना किया जाना चाहिए था उतना नहीं किया गया। रोजगार बढ़ाने के उपायों की चर्चा नहीं की गई। विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए सरकार ने विदेशी कंपनियों को छूट देने की बात कही है, लेकिन सभी जानते हैं कि विदेशी निवेश अपनी शर्तो पर आता है। जब हमारा बाजार अच्छा होगा इसमें सुधार होगा तभी विदेशी निवेशक यहां आने के लिए सोचेंगे।
खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के संदर्भ में कोई चर्चा नहीं की गई, क्योंकि सरकार को मालूम है कि उसके सहयोगी दल इसके लिए शायद ही तैयार होंगे आयकर की सीमा को भी एक लाख 80 हजार से बढ़ाकर सिर्फ 2 लाख किया गया है। यह वृद्धि 20 हजार की है जबकि संसदीय समिति ने आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर तीन लाख रूपये करने की सिफारिश की थी। बजट से एक दिन पूर्व कर्मचारियों की भविष्य निधि पर ब्याज दर साढ़े नौ प्रतिशत से धटाकर सवा आठ प्रतिशत कर दी है, जिससे कर्मचारियों में काफी निराशा पैदा हुई है। उत्पाद शुल्क और सेवा कर की दर में बढ़ोत्तरी महंगाई को हवा देगी और पेट्रोलियम उत्पादों के दाम में वृद्धि से मुद्रास्फीति तेजी से बढ़ेगी।
काले धन पर श्वेत पत्र लाने का वायदा किया है और ऐसे लोगों पर मुकदमा चलाने की भी बात की गई है लेकिन यह कैसे होगा। यह तभी कारगर होगा जब विदेशों में जमा काले धन को वापिस लाने के गंभीर प्रयत्नों के साथ ही देश के भीतर भ्रष्टाचार की समस्या पर भी सरकार ध्यान दे और कठोर कानून बनाये। भारत की 70 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है जो मुख्यतया कृषि पर ही निर्भर है जहां मजदूरों को पूरे समय कृषि से रोजगार न मिलने पर वे शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हो जाते हैं। मनरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण यह कृषि मजदूरों को ज्यादा आकर्षित नहीं कर पाता। कृषि ऋण वितरण के आंकड़े दूसरी ही कहानी कहते हैं। बहुत सारा कृषि ऋण फार्म हाऊस मालिकों और ऐसे लोगों को मिलता है जो कृषि पर निर्भर नहीं है। इस गोरखधंधे को रोकने का कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
एक तरफ खाद्य सुरक्षा कानून बनाने और इसे क्रियान्वित करने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत बनाने की बात की जाती है, दूसरी तरफ बजट कहता है कि पीडीएस के तहत मिलने वाली सब्सिडी सीधे लोगों के बैंक खाते में डालने के प्रयोग का विस्तार किया जायेगा। खाद्यान्नों एवं उर्वरकों पर सब्सिडी सीधे दुकानदारों को देने की वकालत कर रही है, यह उचित नहीं है। इससे कहीं अधिक अच्छा होगा कि लोगों के स्वास्थ्य शिक्षा और कौशल विकास पर ध्यान दिया जाना चाहिए। टीकमगढ़, छतरपुर में मिनरल्स, हीरे, लोहा, सोना, रॉकफासफेट, गोरा पत्थर आदि प्रचुर मात्रा में है, जिन पर आधारित संयंत्र लगाकर क्षेत्र में रोजगार के अवसरों का सृजन किया जाना चाहिए।
बुन्देलखण्ड की केन‑बेतवा नदियों को जोड़ने के कार्य को प्राथमिकता से लेकर अधिक राशि आवंटन करनी चाहिए। क्षेत्र के राष्ट्रीय राजमार्गो क्रमांक 75‑76 एवं 34 का शीघ्र नवीनीकरण करना चाहिए, ताकि खजुराहो, ओरछा, जटाशंकर, कुन्डेश्वर ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों पर सैलानी ज्यादा संख्या में पहुंच सकें तथा रोजगार के अवसर भी बढ़ सकें। बजट ने कुल मिलाकर आम आदमी किसान, कर्मचारी, उद्योगपति सभी को केवल निराशा ही दी है।
*SHRI BHARTRUHARI MAHTAB (CUTTACK):Sir the Finance Minister has termed the Union Budget for 2012-13, is eighth one as “consumption-led growth Budget, but there is a big question mark whether his gamble will pay off. He is banking heavily on increased consumer spending, both from urban and rural areas, which he expects to happen due to larger government expenditure on subsidy, infrastructure and many welfare schemes. The most significant aspect of Budget 2012 is not what it did but what it did not do. Coming as it did right after the recent assembly election debacle, one almost expected the Government to use the budget platform to dole out huge subsidies and other fiscal prolifigacies in a bid to woo back the electorate. That the Finance Minister refrained from doing so, is in itself the best news in Budget 2012.
Last year the Finance Minster had made some lofty promises during his budget speech. For the most part, the Government has been unable to keep its word. In part owing to the inability to pass reform in Parliament, but also exacerbated by an economic slowdown and high oil and food prices. The Finance Minister expected the economy to grow by 9 per cent plus or mines 0.25 per cent in the fiscal year 2011-12. This estimate were revised down to 8.2 per cent in last July and further reduced to 7.1% by the Prime Minister’s Economic Advisory Council.
The 2011 Budget forecast inflation for the fiscal year at 5 per cent. Inflation has stayed at around 10% for the 22 months preceding October 2011. The inflation dropped to 9.1% last November and fell further to 7.5% in December and 6.5% in January before rising marginally to 6.95 per cent in February. This is according to a report by the PM’s advisory council. The Finance Minister projected the fiscal deficit at 4.6%. Analysts have revised this estimate to between 5.8 per cent and 6.1 per cent. The Union Government projected its total subsidy bill at R.s1.44 trillion for 2011-12. Fertilizers make up about a third of the total of the Government’s subsidy bill at Rs.500 billion but judging by previous years’ records, where subsidy bills have been revised upwards this year will be no different. The Union Government budgeted Rs.605 billion to fund food subsidies. As of last December, the Government had released Rs.451 billion or about 75 per cent of its budgeted allocation for the year toward food subsides. This check is likely to increase by 50 per cent over the next year if the food security bill is through. Petroleum subsidies were estimated at Rs.236 billion for 2011-12. Analysts have predicted that this bill will nearly triple and be billed at Rs.600 billion owing to volatility in oil prices world wide.
How serious the budget numbers are to be taken can be gauged from a quick look at the subsidy bill. Major subsidies are set to go down by 14 per cent in the coming year 2012-13 when in the current year 2011-12, they have gone up by 27 per cent. This miracle is going to be achieved mainly by lowering petroleum subsidy by 36 per cent when it has gone up by 78 per cent this year. Is this realistic when global oil prices are riding high at the moment?
The fiscal subsidy bill has gone up by 14 per cent in the current year. Yet in the next year, it is projected as rising by only 3 per cent despite the impact that the food security bill could have on the amount. So also the subsidy scenario in fertilizer. This is no all. The budget has made a major assumption on inflation. It expects that it will go down a little from present levels to a little over six per cent.
The scenario painted in the budget is wholly speculative mainly because the government has little control over it.
The Union Government allocated Rs.520 billion to the education sector for 2011-12. Though the right to Education Act has been passed, Government’s allocation to education have increased, these have not improved learning outcomes. The Sarva Sikshya Abhiyan, the Government’s flagship elementary education programme, accounts for 65 per cent of the Union Government’s education budget, the teachers received the largest portion of funding which is 44% covers salaries, teaching inputs and training while children receive only 10 per cent, which covers uniforms, text books and bringing the unschooled into formal schooling.
The Union Government targeted revenue of Rs.400 billion from reducing its stake in public sector companies. The Government has only been able to achieve a fraction of its disinvestment target earning Rs.130 billion from broadband wireless auctions.
It is true that a Union Budget is a limited plan. It is a plan for the next financial year. The time period is too short. Even so, a financial budget is the right place where the problem of hunger and malnutrition of young children and mothers, basic healthcare issues should get addressed. The real test of intent is in providing funds for a vital activity. An allocation has to be used and properly implemented and the performance noted or monitored and evaluated.
The second green revolution found a mention in the budget as a big achievement for the government. But, while paddy production went up manifold in Eastern India, did it help its produces? In West Bengal, there was agony everywhere in the last few months, as paddy and potatoes were selling cheap and pauperized cultivators were killing themselves. The Government was nowhere to procure the unsold food grains or vegetables. The cost of fertilizers went unaddressed. The Budget gives Rs.17,000 crore to agriculture, but takes away Rs.7000 crore from villages through MGNREGA. The service tax increase on mobile phones would be another below to rural citizens. The Budget does promise low-interest loans for farmers. Farmers are to get loans at seven per cent and on prompt payment, further loans at 4 per cent. States are already offering lower rates. Odisha provides subvention to farm loans upto 3 per cent. Maharashtra, gives farmers loans of Rs.50,000 at zero interest and one lakh at two per cent interest. Karnataka gives loans at one per cent interest. While Madhya Pradesh gives at 3 per cent interest. But these fail to help the majority of farmers because this excludes defaulters. There is a need to extend the payment term of defaulters to bring them back into the formal banking fold. However, no state has so far done that.
There has been much discussions on the adverse impact of a ballooning fiscal higher inflation and crowding out of private investment are some of the problems arising out of fiscal profligacy. It could be argued that deterioration in the budgetary performance during 2011-12 was due to a combination of lower economic growth leading to lower tax collections and rigidity in the economy resulting in inflexibility in expenditures reductions. Reducing deficits by raising taxes or reducing unproductive government expenditures would freeze up resources for use by private sector. Revenue deficit predominates and pre-empts capital spending with adverse growth implications. In the present milieu, a relevant policy option would be to have cut backs in subsidies. This requires further deregulation of the prices of petroleum products. Capital expenditure should be self-financing and self-limiting. At present, there is no rule governing the financing of fiscal deficit, particularly on borrowing from the Reserve Bank of India. Therefore, there is a need to announce a working group to look into the financing of fiscal deficit with terms of reference extending to usage of small savings, ways and means advances and cash surplus.
One had expected that Finance Minister would reduce expenditure. Next year drastically in order to rein in fiscal deficit. This he could have achieved by consolidating the over 200 schemes run by the Government. The State Governments are in the best position to design schemes to meet their special requirements. Government officials sitting in Delhi and far removed are ill-equipped to design such schemes. The MGNREGA Schemes, National Rural Health Mission, the Rajiv Gandhi Viduntikaran Yojana are nothing but centres of corruption in rural areas. They have done very little good to the people.
On the taxation side, the Finance Minister has done the unthinkable. He has imposed a burden of Rs.45,950 crore on the common man by raising the indirect tax. A tax effort of this kind is unprecedented. This is coupled with Rs.20,000 crore burden imposed on freight by the Railways are going to put a massive burden on our people.
The Budget is silent on economic reforms. If the LIC had not been robbed to pay the Government through the ONGC, the receipt from disinvestment would have been pittance. The worst part of this Budget is the credibility gap it has created. Budget estimates have lost their relevance. Finance Minister has not made any major provision for central sales tax (CST) compensation in the Budget. It is only Rs.300 crores towards CST compensation.
One of the provisions of this Budget is the proposal that the Income Tax Act, 1962 be amended with retrospective effect from April 1 1962. The proposed insertions .are explanations that clarify, for example that the definition of “property” includes rights in an Indian company. The introduction of these common sense provisions serves to invalidate the Supreme Court’s Judgment against the Government in the Vodafone income tax case. The concern is understandable. Indeed a natural sense of justice is outraged at the thought of retrospective legislation of the State’s demand. Yet, intuition is sometimes ill-served by facts, and this could be one of those occasions. I would say Finance Minister has argued correctly that the Supreme Court in its judgment had stated that the words of the statue could do with come clarification. The purpose of this amendment is to clarify. It is not illegal nor unconstitutional. It is not even rare. It serves to invalidate a judgment, true, but in order to make the subsequent legal proceedings more institutionally sound.
The idea that foreign investors will necessarily be scared off by a Government determined to participate in the global effort against tax havens and untaxed income cynically misreads the intentions of most investors in India. A mindset that accepts that no active or retrospective efforts can be made against tax havens is backward looking out of step with the world major economics determination to fix the holes in the global financial system.
The bitter medicine that the Finance Minister has courageously administered is to raise indirect taxes across the board in both service tax and excise, by two per centage points. This is bound to have an inflationary impact through the economy and puts a further question mark against the assumption that is made about the moderation of inflation. The Finance Minister while reading part B of the Budget dealing with tax proposals had quoted the lines that Hamlet delivers to his Mother Queen Gertrude in Act 3, scene 4 “I must be cruel, only to be kind:. Wisely he did not quote the run-on line from Hamlet “ Thus bad begins and worse remains behind”.
The political message of this Budget is that a crippled Government does not have the courage to deal with the problems the country faces. The nation expected that this Government would lead but they have proved woefully inadequate for the task.
*श्री जोसेफ टोप्पो (तेज़पुर) : माननीय वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने अपने इस बजट 2012‑13 में बहुत ही होशियारी से जहां एक ओर एक हाथ से भारत की आम जनता को कुछ लाभ देने की कोशिश की है वहीं दूसरे हाथ से लगभग सभी प्रकार के टैक्स में बढ़ोत्तरी कर आम आदमी पर महंगाई का बोझ और बढ़ा दिया है। यह बेहद खेदजनक है कि इस पूरे बजट में पूर्वोत्तर राज्यों के औद्योगिक तथा आर्थिक विकास के लिए कोई योजना माननीय वित्त मंत्री जी के बजट में नहीं है तथा देश के हिस्से में जहां 8 प्रदेश हैं, इन प्रदेशों खासकर असम राज्य के विकास के लिए, यहां के चाय उद्योग को बढ़ावा देने के लिए या चाय बागान में काम करने वाले लाखों गरीब मजदूरों के विकास पर वित्त मंत्री जी ने कोई ध्यान नहीं दिया।
आज असम के करीब 700 से अधिक चाय बागानों में 60 लाख से जयादा चाय मजदूर काम करते हैं जिनमें से आधे से भी कम स्थायी मजदूर हैं बाकि आधे से ज्यादा चाय मजदूर अस्थायी कर्मचारी के रूप में काम कर रहे हैं जिन्हें ना तो रोजगार का भरोसा है और ना ही इनके रहने, खाने तथा स्वास्थ्य देखभाल का कोई इंतजाम है। इन चाय मजदूरों के बच्चों की उचित शिक्षा तथा विकास के लिए राज्य सरकार के पास कोई योजना नहीं होती और राज्य सरकार के पास चाय उद्योग मंत्रालय तो है, पर यह मंत्रालय केवल केन्द्रीय सहायता पर ही निर्भर है और इस पूरे बजट में ना तो देश के चाय उत्पादन को बढ़ाने का कोई जिक्र या उल्लेख है और ना ही लाखों चाय बागान मजदूरों के विकास की कोई योजना है, ना ही ESI जैसी कोई केन्द्रीय योजना मिलती है जिसके अंतर्गत इन मजदूरों को उचित स्वास्थ्य चिकित्सा सुविधा मिल सके।
वित्त मंत्री जी ने अपने बजट में महंगाई कम होने की उम्मीद तो जताई पर उसे कम करने का कोई काम या योजना उनके पास नहीं थी। इसका देश की 70 प्रतिशत गरीब जनता पर क्या प्रभाव होगा इस पर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। देश की विकास दर की चिंता तो सरकार को है पर देश की गरीब जनता के विकास का कोई उपाय या योजना सरकार के पास नहीं है।
वित्त मंत्री जी ने अपने बजट में उत्तर पूर्व में औद्योगिक विकास की ओर तो कोई ध्यान ही नहीं दिया है। सरकार को असम राज्य में मिलने वाले तेल को निकालने की तो चिंता है लेकिन इस पैट्रोलियम से होने वाली आमदनी को उत्तर पूर्व में उद्योग लगाने की ओर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया है। यहां के युवा बेरोजगार लोगों के लिए उत्तर पूर्व राज्यों में ही केन्द्रीय उद्योग स्थापित करने में सरकार की कोई रूचि नहीं है। सरकार उत्तर पूर्वी राज्यों खासकर असम जो कि उत्तर पूर्व में प्रमुख स्थान राज्य है, वहां किसी प्रकार की केन्द्रीय औद्योगिक इकाई की स्थापना करने की कोई योजना बनानी चाहिए जिससे यहां के बेरोजगार युवाओं को रोजगार का कुछ अवसर मिलता। इस पूरे क्षेत्र में रोजगार का कोई साधन नहीं होने के कारण हर साल लाखों युवा बेरोजगार उत्तर पूर्वी राज्यों से आकर देश के विभिन्न हिस्सों में काम करने को मजबूर हो रहे हैं, इस संबंध में मेरी मांग है कि सरकार इस संबंध में कुछ कदम उठाये तथा उत्तर पूर्वी राज्यों में उद्योग तथा कारखाने लगाने की योजना बनाये या यहां के लोगों के लिए जो भी अपना खुद अपना रोजगार करना चाहते हों उनके लिए खास योजना बनाकर बिना ब्याज आर्थिक सहायता उपलब्ध कराये, जिससे इस पूरे क्षेत्र में बेरोजगारी कुछ कम हो सके।
वित्त मंत्री जी ने अपने बजट में सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी को राजस्व घाटे का एक बड़ा कारण बताया है। लेकिन अगर सरकार इस सब्सिडी के नाम पर होने वाले कालाबाजारी, जमाखोरी तथा हर सरकारी विभाग में फैले भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अगर कोई कदम उठाये तो इस भारी राजस्व घाटे को भी कम किया जा सकेगा तथा गरीबों के नाम पर जिस सब्सिडी को दिया जा रहा है वह सहायता इन गरीबों तक पहुंच भी सकेगी।
देश में ग्रामीण पेयजल योजना, मनरेगा, आंगनबाड़ी, समाज कल्याण विभाग, इंदिरा आवास योजना, किसान क्रेडिट कार्ड, मिड डे मील, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, राजीव गांधी पेयजल योजना तथा ऐसी बहुत सारी योजनायें सरकार द्वारा चलाई जा रही हैं। लेकिन इन सभी योजनाओं में कितना भ्रष्टाचार फैला हुआ है इस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए।
अंत में इन सभी समस्याओं का उचित समाधान केवल एक ही है कि सरकार देश में हर तरफ फैले भ्रष्टाचार को रोकने के लिए उचित कदम उठाये और इससे निपटने के लिए कड़े कानून बनाये। वर्तमान में, विदेशी बैंकों में भारत का लाखों करोड़ रूपया काले धन के रूप में जमा है। अगर वित्त मंत्री इस बजट में इस धन को वापस भारत लाने का कोई उपाय करते, तो अगले कुछ ही वर्षो में इस देश की स्थिति सुधर जाती तथा यह इस सरकार का एक ऐतिहासिक कदम होता।
*श्री राकेश सचान (फतेहपुर): माननीय वित्त मंत्री द्वारा वर्ष 2012‑13 के लिए प्रस्तुत बजट दिशाहीन, निराशाजनक, महंगाई को बढ़ाने वाला तथा विकास की गति को पीछे धकेलने वाला है। इस बजट से सभी वर्गो पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा।
पिछले तीन वर्षो से आसमान छूती महंगाई गत दिसम्बर माह से कुछ नीचे आने लगी थी। लेकिन मौजूदा बजट में सर्विस टैक्स और एक्साइज डयूटी बढ़ाने से सभी वस्तुं महंगी हो जायेंगी। इस पर भी पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतें बढ़ाने पर महंगाई और भड़केंगी क्योंकि बजट में पेट्रो सब्सिडी के मद में करीब 25 हजार करोड़ रुपये की कमी की गयी है।
सरकार ने बजट से एक दिन पहले कर्मचारी भविश्य निधि का ब्याज दर घटाकर 9.50 प्रतिशत कर दिया। इससे देशभर में काम करने वाले करोड़ों नौकरीपेशा लोगों को आर्थिक नुकसान होगा। आयकर सीमा की छूट का इन्हें कोई लाभ नहीं मिलेगा।
आयकर की सीमा में केवल 20 हजार की छूट देकर और सर्विस टैक्स बढ़ाकर जनता को ठगा गया है। इतना ही नहीं जेंडर बजट को ताक पर रखकर महिलाओं को दी जाने वाली छूट को भी समाप्त कर दी गई है। वित्त मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति ने आयकर की सीमा 3 लाख रुपये तय करने का सुझाव दिया था जिसे नजरअंदाज कर दिया गया है।
इस बजट से रोटी‑कपड़ा‑मकान‑दवाई और पढ़ाई सभी महंगे हो जायेंगे। जहां किचन का बजट गड़बड़ायेगा वहीं सीमेंट और स्टील की कीमत बढ़ने से गरीब आदमी का पक्के मकान में रहने का सपना अधूरा रह जायेगा। इसी तरह सेवाकर के दायरे में लाये जाने से मरीजों को अस्पताल का शुल्क 12.36 प्रतिशत अधिक देना पड़ेगा।
हम लोग बचपन सेही बंगाल के काला जादू के बारे में सुनते थे लेकिन पहली बार इसका वास्तविक रूप देखने को मिला है। माननीय वित्त मंत्री ने इसका प्रयोग करके आम जनता की नजर बांधने की कोशिश की है। इन्होंने जनता की एक जेब में जहां प्रत्यक्ष करों के रूप में 4500 करोड़ रूपये की राहत को डाला है वहीं बड़ी सफाई के साथ दूसरी जेब से अप्रत्यक्ष करों के रूप में 41 हजार 440 करोड़ रूपये निकाल लिया है।
माननीय वित्त मंत्री जी ने खुद कई बार इस बात का जिक्र किया है कि उन्हें सोने में भी सब्सिडी का भूत सताता है लेकिन उनकी नजर केवल गरीबों को सब्सिडी कम करने पर ही टिकी हुई है जबकि उद्योग जगत आम आदमी से दोगुनी अधिक सब्सिडी ले रहा है।
वर्ष 2011‑12 का सरकारी आंकड़ा
आम आदमी को सब्सिडी उद्योग जगत एवं कारपोरेट घराने
1. उर्वरक कुल मिलाकर 1 सीमा शुल्क कुल मिलाकर 5 लाख
2. खाद्यान्न 2 लाख 50 हजार 2. उत्पादक शुल्क लाख 39 हजार 532 करोड़
3. पेट्रोलियम 723 करोड़ रुपये 3. कारपोरेट रुपये की सब्सिडी
की सब्सिडी
4. आयकर
मौजूदा बजट में भी सरकार ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कारपोरेट घरानों पर तो मेहरबानी दिखाई है लेकिन छोटे कारोबारियों, किसानों, मजदूरों यहां तक कि आम आदमी पर भी नजरे इनायत नहीं की हैं।
बारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान स्वास्थ्य क्षेत्र में की गई नीतिगत प्रतिबद्धता इस आम बजट में कहीं दिखाई नहीं देती। सरकार ने इस क्षेत्र के खर्च पर जीडीपी का केवल 0.34 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। आज भी देश के एक लाख से अधिक गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र एवं मातृ‑शिशु कल्याण केन्द्र नहीं हैं। जहां हैं वहां डाक्टर कर्मचारी नहीं। सरकारी दवाइयां नदारद हैं।
शिक्षा क्षेत्र पर भी विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद का यह पहला बजट है लेकिन सर्व शिक्षा अभियान का आवंटन भी मामूली है। शिक्षा क्षेत्र के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल 0.73 प्रतिशत राशि आवंटित किया गया है। ध्यान देने की बात यह है कि विश्व के 35 फीसदी निरक्षर भारत में हैं।
वर्ष 2012‑13 के मौजूदा बजट में सामाजिक क्षेत्र की घोर उपेक्षा की गयी है। राशि आवंटन को लेकर सामाजिक क्षेत्र की कुल प्राथिमिकता गत वर्ष के 1.9 प्रतिशत की तुलना में इस वर्ष घटकर 1.8 प्रतिशत रह गया है।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क परियोजना मद में गत वर्ष की तुलना में 20 प्रतिशत की वृद्धि जरूरत की गयी है लेकिन निगरानी तंत्र को मजबूत करके इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने के उपाय की बजट में कोई चर्चा नहीं की गई है।
प्रधानमंत्री सड़क परियोजना में विगत 3 वर्षो से उ.प्र. में धन रिलीज नहीं किया गया है।(500 से 1000) आबादी वाले ग्रामों को पक्की सड़क से जोड़ना है। माननीय मेरे निर्वाचन क्षेत्र फतेहपुर के अभी 108 ग्राम 2002 की जनगणना के आधार पर अभी भी पक्की सड़क से वंचित है। मैंने कई बार लोक सभा में यह बात कही है, स्टीमेट मागें गये हैं लेकिन धन रिलीज नहीं किया गया है।
माननीय अध्यक्ष जी आपके माध्यम से मैं वित्त मंत्री से मांग करता हूं कि इस बजट में उ.प्र. को धन दें जिससे मेरे क्षेत्र की सड़कों का निर्माण हो सके।
इस योजना के अंतर्गत बनने वाली सड़कों में मानकों का ध्यान नहीं रखा जाता। घटिया सामग्री का प्रयोग होता है।
शुरू में इस योजना के अंतर्गत जो सड़कें बनती थीं वे कुछ वर्षो तक ठीक ठाक चलती थी। अब हालत यह है कि आगे सड़क बनती जाती है और पीछे से उखड़ती जाती है। कारण? इस मद का आधे से अधिक पैसा ठेकेदारों, कार्यदायी संस्था के अधिकारयों और स्थानीय प्रशासन की जेब में चला जाता है।
केन्द्रीय योजना होने के बावजूद सड़कों के निर्माण के बारे में न तो स्थानीय सांसदों से प्रस्ताव मांगा जाता है और न ही उनकी शिकायतों पर ध्यान दिया जाता है।
राजीव गांधी विद्युत योजना एक अच्छा कार्यक्रम है और माननीय मंत्री ज ने इस बजट में वृद्धि की है लेकिन 3 वर्षो से हमारे निर्वाचन क्षेत्र फतेहपुर में एक भी गांव ऊर्जीकृत नहीं हुआ है न ही केन्द्र सरकार ने पैसा दिया है। मेरा अनुरोध है और सौतेला व्यवहार किया है। माननीय मंत्री जी से मांग करता हूं कि उ.प्र. में पैसा निर्गत करें। छुटे हुए ग्रामों का विद्युतिकरण हो सके। एक बात मैं और कहना चाहता हूं कि जो गांव इस योजना के तहत ऊर्जीकृत किये गये हैं वे भी अधूरे पड़े हैं। बड़ी कंपनियों को ठेके दिये गये थे उनके द्वारा बड़े पैमाने में घपला किया गया है उसकी जांच हो और आगे के ग्रामों को जिले स्तर से विद्युतिकरण कराने की व्यवस्था कराये और पूर्व के किये गये कार्यो की जांच कराई जाये।
खाद्य सुरक्षा कानून विधेयक संसद की स्थायी समिति के समक्ष है लेकिन इसे जल्द से जल्द लागू करने के लिए सरकार जितना उतावलापन दिखा रही है उसे आसानी से समझा जा सकता है। इसे यूपीए अध्यक्ष सोनिया जी को "ड्रीम प्रोजेक्ट" कहके प्रचारित किया जा रहा है जिसका मकसद गरीबों का पेट भरना है।
कृषि क्षेत्र की बुनियादी दिक्कतों और राशन प्रणाली की खामियों को दूर किये बगैर आनन‑फानन में लाये जा रहे इस कानून के राजनीतिक निहितार्थ निकालना स्वाभाविक है।
कई संकटों से घिरी कांग्रेस पार्टी आगे होने वाले विधान सभा चुनावों और 2014 के लोक सभा चुनावों में इस कानून का चुनावी लाभ लेने से चूकना नहीं चाहती। जैसा कि पिछले लोक सभा चुनाव में "मनरेगा" योजना इस पार्टी की खेवनहार बनी थी। ऐसे में गरीबों के कल्याण का दिखावा करते हुए केवल राजनीतिक स्वार्थ के लिए उठाया गया यह कदम वास्तव में एक छलावा मात्र है।
यह कानून लागू भी हो जाता है तो 5 लोगों के एक परिवार को महीने में 35 किलो सस्ता अनाज मिलेगा प्रति सदस्य 7 किलो अर्थात् एक व्यक्ति को दो जून के भोजन के लिए 230 ग्राम अनाज मिलेगा।
ध्यान देने योग्य बातें इस प्रकार हैं :
1. भारतीय चिकित्सा शोध समिति की 2003 की रिपोर्ट
2. प्रत्येक वयस्क व्यक्ति को प्रतिदिन 480 ग्राम से लेकर 690 ग्राम अनाज की जरूरत पड़ती है।
3. 4 से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिये प्रतिदिन 210 ग्राम अनाज चाहिए।
जाहिर है कि देश की आधी से अधिक आबादी के लिये पेट भरने का संकट जस का तस बना रहेगा।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून की सफलता के मार्ग में आने वाली संभावित बाधायें निम्न प्रकार हैं :-
1. जिस सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से गरीबों को अनाज दिया जायेगा वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी हुई है। खुद योजना आयोग ने अपनी 2005 की रिपोर्ट में कहा था कि पीडीएस केतहत खर्च किये जाने वाले प्रत्येक चार में से केवल एक रूपया गरीबों तक पहुंचता है। इस योजना के अंतर्गत जारी किये जाने वाले खाद्यान का 57 फीसदी जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाता।
2. बड़ी संख्या में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवार पंजीकृत नहीं हैं जिससे उनके पास राशन कार्ड नही है। बड़ी संख्या में अपात्र व्यक्तियों ने बीपीएल कार्ड बनवा लिया है। ऐसे में कई मामले सामने आये हैं जिनमें कार्ड तो सही लाभार्थी का बना है लेकिन उसका फायदा कोई दूसरा उठा रहा है। कार्ड बनाने में भी व्यापक स्तर पर हेराफेरी किया गया है। कहीं बीपीएल को एपीएल का कार्ड तो कहीं एपीएल को बीपीएल का कार्ड बनाया गया है।
3. सबको रियायती अनाज देने के लिये जितने अनाज की जरूरत पड़ेगी उसके लिये विधेयक में कोई ठोस प्रावधान नहीं है। इस कानून के लागू हो जाने के बाद 5.5 करोड़ टन से लेकर 6.10 करोड़ टन अनाज की जरूरत पड़ेगी। इस कानून की राह में उस वक्त गंभीर संकट पैदा होगा जब देश में सूखा, बाढ़ और अन्य दैवी आपदाओं के आने से फसलों का उत्पादन प्रभावित होगा। एक आंकलन के मुताबिक 2.5 करोड़ टन अतिरिक्त खाद्यान के उत्पादन के लिये खेती में 1.10 लाख करोड़ रूपये के निवेश की जरूरत है। पैसा कहां से आयेगा, बजट प्रस्ताव में इसका कोई उल्लेख नहीं है।
जब तक भारत में नीर‑नदी और नारी का सम्मान था तब तक भारत विश्व का गुरू था। जबसे इन तीनों की उपेक्षा/अपमान शुरू हुआ तबसे हम आर्थिक प्रगति की बात करने के बावजूद असल में नीचे गये हैं। यहां की नदियां जब तक शुद्ध और पवित्र रही तब तक हमारा स्वास्थ्य ठीक रहा और दवाइयों पर खर्च बहुत कम था। आजादी के बाद से अभी तक हमारे देश में कोई नदी नीति नहीं बन पाई। यही कारण है कि आज तक कोई भी नदी विवाद स्थायी रूप से हल नहीं हो सका। आज हमारी अधिकतर नदियां नाले का रूप धारण कर चुकी हैं।
तेजी से गिर रहे भू‑जल स्तर से गंगा‑जमुना का मैदानी इलाका भी गंभीर जल संकट की ओर फंसता चला जा रहा है। अनाज उत्पादक बड़े राज्यों में जल संकट के कारण खाद्य सुरक्षा की नई चुनौती खड़ी हो गई है। सूखा और पानी के अंधाधुंध दोहन से देश के 35 प्रतिशत विखंडों में जमीन का पानी तेजी से सूख रहा है। उत्तरी राज्यों में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आधे से अधिक ब्लाक डार्क एरिया में तब्दील हो चुके हैं।
विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन और अंधाधुंध जल दोहन का हाल यही रहा तो अगले एक दशक में भारत के 60 फीसदी ब्लाक सूखे की चपेट में होंगे। ऐसी हालत में फसलों की सिंचाई तो दूर, पीने के पानी के लिए भी मारामारी शुरू हो सकती है।
देश के 5723 ब्लाकों में से 1820 में जल स्तर खतरनाक हदें पार कर चुका है। जल संरक्षण नहीं होने और लगातार दोहन के चलते 200 से अधिक विखंड ऐसे हैं, जिनके बारे में केन्द्रीय भूजल प्राधिकरण ने संबंधित राज्य सरकारों को तत्काल प्रभाव से जल दोहन पर पाबंदी लगाने के सख्त कदम उठाने का सुझाव दिया है। सर्वाधिक पैदावार देने वाले राज्यों पंजाब, हरियाणा में पाबंदी लगाने के बजाए पहले से अधिक गहरी बोरिंग वाले नलकूपों से पानी खींचा जा रहा है।
सिंचाई की 60 प्रतिशत जरूरत और पेयजल की 80 प्रतिशत भूजल पर निर्भर है।
उत्तरी राज्यों में हरियाणा के 65 प्रतिशत पंजाब के 81 प्रतिशत, राजस्थान के 86 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश के 30 प्रतिशत विकास खंडों में भूजल का स्तर चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है। लेकिन वहां की सरकारें आंख बंद किये हुये हैं।
देश की आधे से अधिक आबादी की रोजी‑रोटी आज भी खेती के सहारे चल रही है।
‑®É]ÅÉÒªÉ नमूना सर्वेक्षण संगठन की रिपोर्ट के अनुसार प्रति एक हजार रोजगारशुदा लोगों में 750 लोग कृषि से जुड़े हुए हैं। लेकिन समूची राष्ट्रीय आय का 20 प्रतिशत भी उनके हिस्से में नहीं आता। इसका कारण यह हे कि खेती लगातार घाटे का धंधा बनती गई है।
आज हमारी खेती गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। फिर भी सरकार इसे उबारने क प्रति कितनी गंभीर है यह इसी से पता चलता है कि मौजूदा बजट में ट्रैक्टरों पर भी उत्पाद शुल्क बढ़ाकर उन्हें महंगा कर दिया गया है जो कि आज खेती के अभिन्न अंग बन गये हैं।
पिछले साल के बजट में कृषि क्षेत्र के विकास की दर 7 प्रतिशत रहने का सब्जबाग दिखाया गया था, लेकिन वह 2.5 प्रतिशत के आसपास भटक रही है। इसके बावजूद कृषि और सहकारिता क्षेत्र के लिए मौजूदा बजट में केवल 3000 करोड़ रूपये का इजाफा किया गया है जबकि खाद्य सुरक्षा कानून भी लागू किया जाना है।
कृषि मंत्रालय की मौजूदा वित्त वर्ष के बारे में तैयार की गई रिपोर्ट बताती है कि लम्बे समय से खेती किसानों की हालत चिंताजनक बनी हुई है; पिछले 20 वर्षो में जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 30 प्रतिशत से घटकर 14.5 प्रतिशत रह गया है; किसी कारण से जब फसल चौपट होती है तब किसान संकट में तो होता ही है, लेकिन जब उपज अच्छी होती है तब भी वह वाजिब दाम नहीं मिलने से घाटा उठाता है; कुछ वर्ष पूर्व कृषि मंत्रालय की पहल पर एक सर्वेक्षण कराया गया जिसमें यह तथ्य उभर कर सामने आया था के खेती पर निर्भर लोगों में 40 प्रतिशत इसे मजबूरी का काम मानते हैं। यदि विकल्प मिल जाये तो इसे एक मिनट में छोउने को तैयार हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 1995 से गत वर्ष तक अर्थात 16 वर्षो में 2.50 लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है। पहले यह कुछ राज्यों तक ही सीमित था, लेकिन इसका दायरा पूरे देश में बढ़ता जा रहा है।
खेती के लिए मूलभूत चीज है जमीन जो सीमित है। पिछले चार दशाक से खेती के तहत उपयोग वाली जमीन का रकबा 14 करोड़ हेक्टेयर के आसपास बना हुआ है। इस दौरान हमारी आबादी दो गुनी हो गयी है।
घटती जमीन, सिंचाई की कमी, घटती उर्वरा क्षमता, जलवायु परिवर्तन से घटली उत्पादकता और बढ़ती लागत के चलते खेती घाटे का सौदा बनकर रह गयी है।
पिछले कुछ वर्षो से जो दो खास कदम उठाये गये हैं उनसे किसानों का कुछ खास भला नहीं हो सका है। फसल बीमा योजना का विस्तार पूरे देश तक नहीं हो सका है। दूसरे फसल के नुकसान का आंकलन तहसील का तालुका स्तर पर होता है। यह प्रावधान अक्सर किसानों के लिए हर्जाने का दावा करने में बाधक साबित हुआ है ।
रियायती कृषि ऋण का आवंटन लगातार बढ़ाया जाता रहा है। इस बजट में भी इसमें एक लाख करोड़ का इजाफा किया गया है। लेकिन वास्तविकता यह है कि कृषि ऋण का एक बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों के पास पहुंच जाता है जिनका खेती से कुछ लेना देना नहीं है। बैंकों के नियम जटिल होने के कारण छोटे किसान इसका लाभ नहीं उठा पाते जिनकी संख्या अधिक है। फार्म हाऊसों के मालिक और बड़े किसान ही इसका लाभ उठा पाते हैं।
इस बार के बजट में उर्वरकों पर दी जाने वाली सब्सिडी में भरी कटौती की गयी है। वर्ष 2010 में मिट्टी की सेहत सुधारने के बहाने उर्वरकों के संतुलित प्रयोग के नाम पर फास्फोरस और पोटास आधारित 22 प्रकार की मिश्रित खादों को नियंत्रण मुक्त कर दिया गया जिसके चलते एक वर्ष के भीतर उनकी कीमत दो गुने से अधिक हो गयी। जाहिर है कि खेती की लागत बढ़ेगी। गत 10 वर्षो में खाद का एक भी कारखाना नहीं लगा।
*श्री गणेश सिंह (सतना): आर्थिक बजट 2012‑13 वित्त मंत्री के इस बजट में कुछ भी नयापन नहीं है। वास्तविकता में आर्थिक बजट में "आम‑आदमी" को पूरा नजर अंदाज किया है जो सर्वथा निंदनीय है। दादा ने एक हाथ से थोड़ा आयकर दाताओं को 20 हजार की छूट देकर नए करों के माध्यम से 41 हजार करोड़ रूपये दूसरे हाथ से खींच लिया।
हर व्यक्ति इस बजट से आस लगाये बैठा था कि दिन ब दिन बढ़ती जा रही महंगाई से निजात मिलेगी परंतु वित्त मंत्री ने अपने प्रस्तुत बजट भाषण की शुरूवात करने हुए कहा कि विश्व के संकट के परिप्रेक्ष्य में भारत डटकर खड़ा है। लेकिन यह भी समझना पड़ेगा कि इस में सरकार का कोई प्रयास नहीं है। वह तो भारत की स्वाभाविक व्यवहार पद्धति, परम्परा एवं संस्कृति के कारण आज भारत खड़ा है। वित्त मंत्री के दिए प्रस्तुत बजट भाषण में हिन्दुस्तान खड़ा रहे इसलिए कोई अत्यावश्यक कदम उठाये हो ऐसा कहीं भी नहीं लगता। साधारण पद्धति से ही गंभीर परिस्थिति से निपटने की बात हो रही है।
उद्योग एवं बुनियादी सुविधाओं को मजबूती प्रदान करने की बात करते समय खेती को लाभदायक बनाने की कोई योजना नहीं बनाई गई है। आवश्यक वस्तुओं के बढ़ते दामों से आज हर वर्ग का आदमी परेशान हो रहा है। महंगाई को तुंत कम करने की चिंता बजट में कहीं भी नहीं झलकती है। साथ ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर गरीबों को मिलने वाले खाद्यान्न की मात्रा बढ़ाने की भी कोई विशेष योजना आर्थिक बजट में नहीं की गई और न ही उसे सुदृढ़ बनाने की कोइन योजना का उल्लेख इस बजट में किया गया है।
उत्पादन बढ़ा है लेकिन किसान के उत्पाद को गलत निर्यात नीति से दबाया जा रहा है जैसे मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र राज्य के किसानों को कपास उत्पादन का उचित मूल्य न मिलने की नीति को देखा जाये तो उस परिप्रेक्ष्य में कोई विशेष योजना न कोई विशेष प्रावधान प्रस्तुत बजट भाषण में नहीं किया गया है। किसान महिला सशक्तीकरण योजना लायी जा रही है। उसका मैं स्वागत करता हूं लेकिन इसका भविष्य वतमान में चल रही विभिन्न परियोजनाओं जैसा न हो।
बीपीएल लाभार्थियों हेतु चल रही इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन स्कीम तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय नःशक्त स्कीम में पेंशन राशि 200 से बढ़ाकर 300 कर दी गई है लेकिन वर्तमान मेडिकल चेकअप, दवाओं के चौगुना बढ़ते दामों को देखते हुए यह राशि भी अत्यंत कम है। साधारणतः केवल शिक्षा, स्वास्थ्य इसका जिक्र करते हुए उन मदों में आवंटन बढ़ाया गया है लेकिन रूपयों की कम होती कीमत को देखते हुए वह पर्याप्त नहीं है।
महिला स्वसहायता समूह के लिए 3 लाख रूपए तक के ऋण की योजना स्वागत योग्य है। लेकिन यह बढ़कर 5 लाख होनी चाहिए थी तथा ब्याज दर भी कम होना चाहिए थी तो ही महिलाओं के लिए लाभदायक होता। परंतु इस हेतु कोई विशेष उल्लेख प्रस्तुत बजट भाषण में नहीं किया गया है।
भारत निर्माण कार्यक्रम की धनराशि बढ़ाई गई है लेकिन वह धनराशि बढ़ोतरी के हिसाब से खर्च नहीं की जाती है तथा राज्यों को समय समय पर यह राशि नहीं पहुंच पाती है जिसके लिए ठोस नीति बनाए जाने का उल्लेख प्रस्तुत बजट में नहीं किया गया है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की राशि मजदूरों को समय पर मिलने हेतु विशेष नीति बनाने का कोई उल्लेख इस बजट में नहीं किया गया है। वर्तमान मनरेगा में हो रहे भ्रष्टाचार की दृष्टि से देखा जाए तो यह आवश्यक था लेकिन उसे अनदेखा किया गया है। लघु उद्योग जो सबसे ज्यादा रोजगार देते हैं उनकी दृष्टि से भी किसी नई योजना का उल्लेख आर्थिक बजट में नहीं किया गया है।
सामान्य श्रेणी के वैयक्तिक आयकरदाताओं के लिए 20000 हजार की कर राहत देते हुए कर छूट में केवल 1,80,000 से 2 लाख की गयी है। उस में भी महिलाओं के लिए अलग से स्लैब नहीं बढ़ाई गयी है। अलग‑अलग योजनाओं में आवंटन जरूर बढ़ाया है परंतु इस चौगुनी बढ़ती हुई महंगाई के हिसाब से रूपए के कम मूल्य को ध्यान में रखकर देखें तो सब जैसे थे रहने वाला है।
योजना आयोग ने अभी हाल ही में, देश में 6 करोड़ 30 लाख लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठ चुके हैं, ऐसा आंकड़ा पेश किया है जो पूर्णतः निराधार है। एक तरफ सर्वोच्च न्यायालय में केन्द्र सरकार शपथपत्र देकर ग्रामीण क्षेत्र में 26 रूपये तथा शहरी क्षेत्र में 32 रूपये से कम खर्च करने वाले ही गरीबी रेखा में रह सकते हैं, दूसरी तरफ जो योजना आयोग ने मापदंड दिए गए हैं जिसमें ग्रामीण क्षेत्र में 22 रूपये तथा शहरी क्षेत्र में 28 रूपये जो खर्च करेगा उसके नीचे आने वाले लोग ही गरीबी रेखा के नीचे होंगे। ये आंकड़े जमीनी हकीकत से अत्यंत दूर हैं। एक तरफ श्री अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट कहती है कि देश में 70 प्रतिशत लोग 20 रूपये से कम में प्रतिदिन अपने परिवार का भरण‑पोषण करने पर मजबूर है। किसकी रिपोर्ट सही है? यह देश का दुर्भाग्य है कि आजादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी वास्तविक गरीबी रेखा में कितने लोग हैं यह पता नहीं लगाया जा सका। केन्द्र सरकार, तत्काल योजना आयोग के इन पेश किए आंकड़ों को रद्द करें तथा देश की जमीनी हकीकत जानने के लिए देश के सभी दलों को विश्वास में लेकर नया निर्धारण करें।
बजट में लगातार मध्य प्रदेश राज्य की उपेक्षा हुई है। देश के अन्य राज्यों की तुलना में तो कोयला दिया जाता है, आवास में कटौती, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क में कटौती, यूआईडीएसएसएमटी योजना के तहत तो राज्य सरकार ने शहरी क्षेत्रों पेयजल आपूर्ति के प्रस्ताव भेजे थे उनमें मात्र छिंदवाड़ा जो शहरी समिति मंत्री जी का क्षेत्र है वहां के प्रस्ताव को स्वीकृति कर दी गई जबकि सतना नगर निगम जोकि मेरे लोक सभा क्षेत्र में आता है, प्रथम स्थान पर प्रस्ताव होने के बाद भी स्वीकृत नहीं किया गया। स्वयं मंत्री जी ने मेरे प्रश्न पर लोक सभा में मौखिक रूप से स्वीकार किया कि राज्य सरकार पहले क्षेत्र की अल्प योजनाओं को प्राथमिकता दे, तभी हम स्वीकृति भेजे। इससे स्पष्ट हो रहा है कि केन्द्र सरकार में मंत्री जो मध्य प्रदेश के हैं, वे राज्य सरकार के विकास की योजनाओं पर रोक लगा रहे हैं। मेरी मांग है कि तत्काल प्रस्तावित योजनाओं की जिसमें सतना नगर निगम में पेयजल की योजना है उसे स्वीकृति दी जाए।
इसी तरह विगत 3 वर्षो से सिंचाई मंत्रालय में म0प्र0 की वरगी बांधा की दामोदर नहर को राष्ट्रीय परियोजना में शामिल करने की क्षेत्र में सभी शर्तो को पूरा करते हुए विचाराधीन है, उसकी तत्काल स्वीकृति इसी बजट में दिखाई जाए।
वित्त मंत्री जी ने इस बजट में सोने के आयात में आयात शुल्क 2 प्रतिशत से बढ़ाकर 4 प्रतिशत कर दिया है। इसके अलावा गैर‑स्टैण्डर्ड सोने पर 5 फीसदी से बढ़ाकर 10 फीसदी कर दिया गया तथा गांव‑देहात व शहरों में धंधा कर रहे सुनारों के बनाए आभूषण भी अब एक फीसदी उत्पाद शुल्क के दायरे में लाए जाएंगे। इसके साथ‑साथ जो सोने के आभूषण बनाने वाले कारीगर हैं उन्हें अब 12 प्रतिशत सर्विस टैक्स देना होगा।
उक्त फैसले आदेश भर से भारी विरोध हो रहा है। सभी व्यवसायी हड़ताल पर है। इसे तत्काल वापिस लिया जाए।
* श्री मोहम्मद असरारुल हक़ (किशनगंज): मैडम स्पीकर साहिबा, मैं आपका शुक्रगुजार हूँ कि आपने मुझे जनरल बजट पर बहस में हिस्सा लेने का मौका दिया है। मैं अपने फाइनेंस मिनिस्टर के जरिए पेश किए गए बजट के समर्थन में खड़ा हुआ हूँ और तीन-चार बातें कह कर जल्दी बैठ जाउंगा।
मैडम, इस वक्त जब कि पूरी दुनिया इकनॉमिक स्लो डाउन का शिकार है। हमारे मुल्क ने इसके प्रभाव से निबटने के लिए काफी हिम्मत जुटाई है। ऐसे किसी भी क्राइसिस से हर मुल्क प्रभावित होता है। उस पर असर पड़ता है। हम भी उससे प्रभावित हुए हैं। ऐसे क्राइसिस जब-जब आते हैं तो सबसे ज्यादा आम शहरी और मिडिल क्लास तबके पर उसका असर पड़ता है। इसलिए इसका इकनॉमिक स्लो डाउन का असर झेलने के लिए इस ऐवान को मुल्क के गरीब तबकों का भी शुक्रगुजार होना चाहिए। इस हिसाब से यूपीए सरकार ने एक अच्छा और मुतवाज़िन और फॉरवर्ड लुकिंग बजट पेश किया है। इस बजट में गरीबों का ख्याल रखा गया है। वर्ल्ड क्राइसिस का मुकाबला करने के लिए कुछ कड़े कदम उठाने पड़ते हैं। उसका असर भी सीधे गरीब लोगों पर पड़ता है। लेकिन हमारी सरकार ने उसका ख्याल रखा है कि आम आदमी के इस्तेमाल की रोजमर्रा की चीजों के दाम काबू में रहें।
मैडम, वजीरे आज़म की कयादत में हमारी सरकार की सबसे ज्यादा तवज्जो तालीम के मैदान में दी है। आरटीई एक्ट इसका सबसे बड़ा सबूत है। दुनिया के कई छोट- और बड़े मुल्कों में ऐसा कानून पहले से ही चल रहा है और उसके फायदे सामने आ रहे हैं। हमें उम्मीद है कि हिन्दुस्तान में भी उसके फायदे अगले चंद सालों में आने लगेंगे। मूल्क का बहुत बड़ा तबका जो गरीब है वह अपने बच्चे को पढ़ाना चाहता है लेकिन तालीम के कार्मशियलाइजैशन के इस दौर में वह स्कूल के दरवाजे पर पहुंचने की हिम्मत नहीं कर पाता था। मगर, अब उन्हें मुकम्मल तौर पर तालिमयाफ्ता होने का भरपूर मौका मिलेगा लेकिन मैडम मुझे इस ऐक्ट के ताल्लूक से इस मूल्क के करोड़ों लोगों के कुछ अंदेशों को आपके जरिए से अपनी सरकार के सामने रखना है। इस ऐक्ट मे इस बात का ख्याल नहीं रखा गया है कि इसका कोई प्रावधान आईन की दफा 29 और 30 से न टकराय। इस ऐक्ट के लागू होने के बाद मदरसों, पाठशालाओं और गांवों में फैले हुए छोटे-छोटे तालिमी इदारों में बेचैनी फैल गई है उनकी बेचैनी बेबुनियाद नहीं है। उनकी तरफ से सरकार को बहुत से अंदेशों से पहले ही वाकीफ करा दिया गया है। हमारी गुजारिश है कि सरकार उस ऐक्ट के उन प्रावधानों को निकाल दे जो दस्तूर की दफा 29 और 30 से टकराते हैं। वरना, आजादी की * Speech was laid on the Table जंग में जियाले पैदा करने वाले ये मदरसें ये पाठशालाएं और छोटे-छोटे तालिमी इदारें बंद हो जाएंगे और हमारी कदीमी तहजीब हमारी प्राचीन सभ्यता का ताना-बाना बिखर जाएगा।
मैडम, आला तालीम को सबके दरवाजे पर पहुंचाने के लिए हमारी हुकूमत ने मूल्क की कदीम-ओ-तारीखी यूनिवर्सिटी एएमयू के कई सेन्टर मुख्तलिफ रियासतों में कायम कर दिए हैं उनमें एक सेन्टर बिहार के किशनगंज में भी खुलना है। बिहार सरकार ने 224 एकड़ जमीन मुहैया करा दी है। बिहार सरकार और एएमयू के बीच इस जमीन का एग्रीमेन्ट भी हो गया है।
मैडम, पूरे बिहार ने और खासतौर पर पुर्णिया और उत्तर दिनाजपुर ने इस सेन्टर के ख्वाब को पूरा करने के लिए बड़ी कुर्बानियां दी हैं उनके अंदर खुशी की जबर्दस्त लहर है। वह टकटकी बांधें केन्द्र की तरफ देख रहे हैं। इस सेन्टर का काम अब शुरू हो जाना चाहिए। आपके जरिए मेरा और बिहार के करोड़ों लोगों का यह मुतालबा है कि इसे जल्द से जल्द मजूर दी जाए और इसके लिए फंड एलोकेट किया जाए। फंड देने में देरी होगी तो उनका यह ख्वाब चकनाचूर हो सकता है और उनमें जबर्दस्त मायूसी फैल सकती है। एक और मामला मुसलमानों के रिजर्वेशन का है। हाल ही में अकलियतों को जो साढ़े चार फीसद रिजर्वेशन ओबीसी के रिजर्वेशन से दिया गया है वह उनको लिए काफी नहीं है। मंडल कमीशन के हिसाब से यह उनके लिए आटे में नमक के बराबर नहीं है लिहाजा उस पर गौर किया जाए और उनको कम से कम साढ़े आठ फीसद रिजर्वेशन दिया जाए।
समुंदर से मिल प्यासे को शबनम बखेली है ये रजाकी नहीं है इसी तरह हमारे उन दलीत भाइयों को जो अपना मजहब तब्दील कर के ईसाई, सिख या बौद्ध हो जाते हैं उनको रिजर्वेशन मिलता है लेकिन जब मुसलमान हो जाते हैं तो दफा 341 के तहत उन्हें रिजर्वेशन नहीं दिया जाता। मैडम, यह इंसान की मजहबी आजादी की बुनियादी हक के खिलाफ है। मजहब बदलने से उसकी मुआशी हालत नहीं बदल जाती। यह बात खुद गांधी जी कह चुके हैं। दफा 341 में कोई बड़ी तरमीम करने की जरूरत नहीं है बल्कि उस कमी को उसी तरह सदारती हुक्मनामें के लिए पूरा किया जा सकता है जिस तरह 1950 में सदारती हुक्मनामें के जरिए यह कमी पूरी कर दी गई थी।
स्पीकर साहीबा, इस मुल्क का एक और अह्म मसला वक्फ जायदादों का है उन पर नाजायज कब्जे होने की वजह से इस मुल्क के मुसलमानों का बड़ा भारी नुकसान हो रहा है उसके वक्फ ऐक्ट 1995 मौजूद है और यह 1996 से लागू भी है लेकिन उस पर भरपुर अमलदरआमद के लिए यह जरूरी है कि वक्फ ज्वाइंट पार्लियमेंट्री कमेटी की सिफारिशों और मुसलमानों मांगों को सामने रख कर अमेन्डमेंट बिल को कानूनी शक्ल दी जाए। अगर वक्फ जायदादों का तहफूज और तरक्की का सही इंतजाम कर लिया जाए और उसके लिए मुनासिब फंड दे दिया जाए तो उससे बारह हजार करोड़ रूपये की सलाना इनकम हो सकती है। मैडम, यह इतनी बड़ी रकम है कि उससे मुसलमानों की तालीमी और मुआशी पसमानदगी दूर हो सकती है।
मैडम, हमारे मुल्क का बड़ा मसला करप्शन भी है। हमारी सरकार ने करप्शन को जड़ से उखाड़ फेकने के लिए बहुत से कदम उठाए हैं। एक और बड़े मसले की तरफ तवज्ह रह गई है वह है फिरकापरस्ती का मसला। इसके खिलाफ सख्त कदम उठाने चाहिए। हमारा मुल्क दहशतगर्दी की लानत से निबटने के लिए मजबूत और कामयाब कदम उठा रहा है लेकिन फिरकापरस्ती से कुछ कम खतरात नहीं है उससे निबटने के तरीकों पर भी मुसलसल अमल की जरूरत है। इसलिए हमारा मुल्क सैक्यूलर बुनियादों पर खड़ा है। फिरकापरस्ती उन बुनियादों को खोखला कर रही है।
सड़क पर लाश अहिंसा की पड़ी है किनारे एकता रोती खड़ी है भरा है जहर अब गंगोजमन में वतन बेआबरू है अब वतन में।
हुआ है नफरतों का बोलाबाला दिलों से प्यार घटता जा रहा है ।
इसी तरह मुल्क में खासतौर से बिहार में दहसतगर्दी के इल्जाम में जिन बेकसूर लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं उन पर फौरी तवज्ह देने की जरूरत है। मुल्क के बहुत से तबकों को प्रपोज्ड डायरैक्ट टैक्सेज कोड से भी काफी अंदेशें हैं। धार्मिक संस्थाओं, इबादतगाहों और चैरिटेबल ट्रस्टों को टैक्स से इग्जैम्पट किया जाना चाहिए। यह जगह हिन्दुस्तान की कदीमी तारीखी तहजीब और उसकी जिन्दगी का हिस्सा है। उनके टैक्स लेना मुनासिब नहीं है। उनको ज्यादा से ज्यादा टैक्स छूट दी जानी चाहिए। ये लोगों के भले का काम करते हैं। लोगों को अच्छाई के लिए आमादा करते हैं। उन्हें कॉमर्शियल इन्स्टिच्यूट समझना ठीक नहीं होगा। इससे उनकी कम टूट जाएगी और करोड़ों लोग भलाई से महरूम हो जाएंगे।
मैडम, मैं अपनी बात यह कह कर खत्म करता हूं कि हमारी सरकार ने बड़ी अच्छी-अच्छी स्कीमें हर तबके की भलाई के लिए बनाई है लेकिन असल मसला उनके इम्प्लिमैंटेशन का है। उन पर ईमानदारी के साथ अमलदरआमद की जरूरत है। ऐसा कोई मैकेनिज्म बनाने की जरूरत है कि उनके अमलदरामद पर नजर रखी जा सके।
नक्शों को तुम न जांचों, आंखों से जा कर देखों क्या चीज जी रही है, क्या चीज मर रही है।
जिसे फिजुल समझ कर बुझा दिया तुमने वही चिराग जलाओ तो रौशनी होगी।
*श्री महेन्द्रसिंह पी. चौहाण (साबरकांठा): आदरणीय वित्त मंत्री प्रणव जी ने जो बजट पेश किया है, वह काफी निराशाजनक बजट है। आम आदमी की बात करने वाली सरकार ने आम आदमी को हैरान‑परेशान करने वाला बजट पेश किया है। यह बजट लोगों के लिए तमाम मुसीबतों की सौगात लेकर आया है। यह एक भारी कर बोझ बढ़ाने वाला, महंगाई बढ़ाने वाला, दिशाहीन, निराशाजनक बजट है, जिसका मैं विरोध करता हूं।
माननीय वित्त मंत्री जी ने सिर्फ 4500 करोड़ की मामूली सी राहत दिखा कर सभी स्तरों पर उत्पाद शुल्क के नाम पर आयात शुल्क के नाम पर व सेवाकरों के नाम पर 45,940 करोड़ रूपये के अतिरिक्त कर बोझ डाल कर लोगों को परेशानी में डाल दिया है।
सेवाकरों की बात करूं तो 117 सेवाओं से बढ़कर अब 219 सेवाओं को कर के दायरे में लाकर, 2 प्रतिशत की वृद्धि करके 18,660 करोड़ की आय का लक्ष्य रखा है जिसका नकारात्मक (नेगेटिव) असर होगा। प्रवासन जैसे कई उद्योग इसके शिकार बनेंगे।
आम बजट के पूर्व जारी आर्थिक सर्वे में यह स्वीकार किया गया है कि विकास का लाभ सभी लोगों तक नहीं पहुंचा है, लेकिन इस कमी को दूर करने का कोई प्रावधान या संकल्प नहीं किया गया है।
विकास दर में भी गिरावट आयी है, 8 से 9 प्रतिशत की अपेक्षा थी लेकिन 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है जो चिंता का विषय है। राजकोषीय घाटा जो 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान था वो बढ़ाकर 5.9 प्रतिशत जो 1.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी को दर्शाता है। आंकड़े में देखा जाए तो 2010‑2011 में राजकोषीय घाटा 3,74,00 करोड़ था, जो अब 2011‑12 में बढ़कर 5,22,000 करोड़ हो गया है, जो चिंताजनक है। इसे कम करने के लिए बिना जरूरी सरकारी खर्च में कटौती करनी चाहिए, आर्थिक स्थिति के लिए कदम उठाने चाहिए लेकिन वो नहर में नहीं आते।
जब लोक सभा में बजट पेश होने वाला होता है तो आम आदमी आस लगाये बैठा रहता है कि इस बजट में हमें कुछ न कुछ राहत मिलेगी, जिसकी मदद से अपना जीवन शांतिमय बने। लेकिन दुख की बात यह है कि बजट ही करों से भरा है। इससे मुद्रास्फीति बढ़ेगी, महंगाई और बढ़ेगी, लोगों का जीना दुश्वार होगा, "जब पानी ही आग लगाये तो उसे कौन बुझाये" जैसे परिस्थिति का निर्माण हुआ है।
महोदय, कृषि जो हमारे देश की धरोहर है, करोड़ रज्जु है, देश की 67 प्रतिशत लोग कृषि एवं पशुपालन आधारित जीवन जीते हैं, उसका विकास दर भी कम हो रहा है, जो चिंता का विषय बन गया है। इस क्षेत्र में ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। अगर "हर हाथ को काम और हर खेत को पानी" सूत्र को स्वीकार करके इस दिशा में सही कदम उठाया जाये तो देश आर्थिक महासत्ता बन सकता है।
*SHRI HASSAN KHAN (LADAKH): I support the General Budget 2012-13. I have also some submission to the hon. Finance Minister in respect of my area. Ladakh remains cut off from rest of the country for more than six months in a year. During this period, all economic and developmental activities including the well planned MNREGA scheme for rural employment also come to a standstill. In such situation, all type of businesses started on bank loans are the worst sufferer as these businesses also freeze with the freezing cold, yielding no income during this period but repaying the bank loans with interest regularly. Business started with similar loans in other parts of the country yield income throughout the year. Most of the loan holders especially unemployed youths and tourism related traders become bank defaulters, resulting in to closure of their business.
During the last few years, Ladakh has become one of the most important tourist destination and the number of tourists are growing on a very high rate, for instance the number of tourist visited in 2009 was 50,000 and in 2010 it was 70,000 but the same number rose to 179,000 in 2011, registering the increase more than double in the last two years. This number is expected to increase further in the coming year.
To meet the increasing demand of infrastructure in tourism sector and other business run on Bank loans, my submission is that the Government must find out some ways and means in respect of repayment of loans and interest during the freezing winter months. For tourism development it is suggested that instead of providing subsidy to hotel construction, the government must provide interest free loans to the locals for a fixed time with a fixed upper limit of loans for construction of hotels, guest houses, tourist camps and running of taxi cabs in the region.
On the connectivity side, as I mentioned above that Ladakh remains land locked for more than six months in a year, during this period the area gets cut off from the main land from all sides. Full time connectivity to the region from the main land is necessary for economic benefits of the people, but now it has become more vital for the defence of the country. Strategic partnership and alliances in connectivity and deployment in Gilgit Baltistan and Tibet Plato between China and Pakistan bordering India in that region is increasing day by day and in this direction we are far behind from those partner countries.
NH No.1 from Srinagar to Leh is under construction through BRO for the last three years, but its progress is still low as compared to the money, man and machines said to have been provided by the Government for early completion. There is no better change in the improvement of road between Baltal and Gomri on this Highway. The Highway Authority of India needs to monitor the progress and standard of this highway from all angles.
Under Prime Ministers Reconstruction Package for J&K, a tunnel in Zojila was approved and the task of survey was allotted to an Agency in 2009 with a target time of 18 months for submission of the report, but the report is still awaited. The Ministry of Road Transport and Highways is said to have decided to start the first part of the Tunnel from Gagangirt to Sonamarg, 4 Kms called the Z Mod through the BRO. In this connection, the Hon’ble Minister of Road Transport and Highways also gave an assurance to the House on 19 March 2012 on my Supplementary Questions on Highways in the Lok Sabha. The Finance Minister is requested to kindly provide suitable funds for this project as no funds is reflected in the General Budget for this purpose. However funds for the main Zojila Tunnel (12 Kms.) depending on the DPR is also expected to be allotted in due course of time.
An airport constructed by the Civil Aviation Ministry at a cost of Rs.66 crores is complete since 2002. No air service was started from this airport stating that the length of runway is shorter for big aircrafts and medium transport aircrafts are not capable of landing at 9000 fts. Height. This airport has now been handed over to the Air Force. The Civil Aviation Department has been giving assurances to start Air Service with medium aircrafts and the Defence Ministry is giving assurances to extent the runway to required size for bigger commercial aircrafts. Nothing has come up on ground as yet.
Pashmimina is found only in Changthang Area of Ladakh in the country and the famous Kashmiri Shawls are made of Pashmina. Unfortunately, Pashmina production is on declining due to various circumstances. Firstly, the Pashmina growing areas are along the Chinese border of Tibet Plato. During the last few years Chinese Nomades have started encroaching on our side of grazing areas along the border. This act has resulted in to squeezing the grazing areas of our shepherds. Secondly, the population of Rikyangs (Wild Ass) have increased in huge numbers because these wild animals are poached on the other side, with the result their migration have completely stopped and these animals live on our side throughout the year, destroying the traditional grazing areas reserved for seasonal changes. The number of Pashmina goats registered was more than 2 lakh some years back which has now come down to around one lakh. This number is most likely to decrease further if something concrete is not done in time to improve the pastures in the Changthang areas to feed more pashmina goats.
*SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): Let me start with a quotation from ‘Hamlet’ which is referred by Hon’ble Finance Minister in course of his presentation. “I must be cruel only to be kind”. He quoted that to step up to the next line. Thus bad begins, and worse remain behind. Yes worse remains behind even then the bad regime which may lead to the worst.
The worse remain in inflation price-hike of essential commodities, in farmers plight, high magnitude of farmers suicide, miserable jobless condition of around 40 lakh workers, job seeker around 10% of the population, high pauperization of rural households, widening the gap and disparity of wealth, increasing poverty and so on and so forth. In short this is such painful and gloomy condition of around 80% of the population. In the global hunger index (HDI) Report, India ranks 67th amongst 122 countries.
But in spite of talking too much about Am admi, he could not address the worse, rather kills up the 1st year of 12th Plan with extremely bad proposal.
Madam, just look at the approach towards rural development. Allocation has declined to Rs.73,175 crore from Rs.74,100 crore. Talking about MGNREGA, it has dipped to Rs.33,000 crores from Rs.40,000 crore (2011-12) BE. About backward region grant (BRGF) for the state component it is reduced to Rs.6990 BE.
In Agriculture, the total expenditure in the rural economy (Agriculture & allied activities, Rural Development, Special area programme, irrigation and flood control and village and small industries) has declined from 2.6% of GDK to 2.3%.
* Speech was laid on the Table As a proportion of total expenditure, the expenditure on Agriculture and allied activities as a proportion of the GDP also slipped from 1.75% in 2010-11 to 1.41%. If we look at the total allocation recommended by the Planning Commission for the 11th Five Year Plan period, a short fall of allocation of 10 to 40% across various schemes is observed. The decline allocation of crop insurance is a set back for the farming community.
Madam, this is the first Budget of 12th plan period. The working group on 12th plan proposed the allocation of Rs,45,353.18 crore, 29,685.04, Rs.4,328 for MGNREGA, NRLM, IAY respectively. But the allocations are less than the recommendations. Thus Finance Minster starts with a bad ignoring the recommendations.
In pursuance to provide adequate wages for agriculture labour, it was proposed to link it with Consumers’ Price Index. Nothing has been said this time with regards to that.
The Government’s apathy towards implementation of National Food Security Bill. The amount earmarked for food subsidy is meager.
The amount earmarked for subsidy was Rs.79,800 crores. But Budgetary allocation is only Rs.75,800 crores.
Now I am coming to the Tax proposal. The philosophy of this Government is less taxation will result more recovery. This is the wrong thinking. India’s tax system which collects two third of the revenue from indirect taxes and one third from direct taxes.
The income tax which affects the rich and the poor alike are considered to be regressive while the direct tax, which takes into account the tax payer’s ability are considered widely to be progressive. The Government is increasing regressive taxes while decreasing the progressives. That policy gives sops to the high sections, the corporates and puts the burden on Am Admi. What is the revenue foregone. In 2009-10, that was Rs.4,82,432 crore. Last fiscal year that goes up to Rs.5,29,432 crore, On the other side, indirect tax proposed Rs.45,940 crore on Am Admi.
To be noted that total expenditures as proportion to GDP fall 14.8% in 2011-12 RE to 14.7% in 2012-13 B.E. Net revenue loss is 4,500. How to meet it.?
Hon’ble Finance Minister indicated more privatization, FDI in retail trades. Pension regulatory Bill and so on that is in the way of economic liberalization. He wants it but not in a position to go in this way smoothly. The principal opposition party is ready to extend their support for that. But I thank he is hesitant to do so.
So at the end, it may be quoted from Hamlet for our Finance Minister as he is in a state of:
“To be or not to be, that is the question:
Whether its Nobler in the mind to suffer; The Slings and Arrows of outrageous Fortune, Or to take Arms against a Sea of troubles. And by opposing end them.” I oppose this Budget.
… (Interruptions)
14.0 ½ hrs At this stage, Shri K. Chandrasekhar Rao and some other hon. Members came and stood on the floor near the Table. 14.01 hrs At this stage, Dr. Manda Jagannath and some other hon. Members came and stood on the floor near the Table.
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : शरद यादव जी, आप क्या बोलना चाहते हैं।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : सुषमा जी, आप बोलिए।
…( व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : सिर्फ सुषमा जी की बात रिकार्ड में जाएगी।
…( व्यवधान)