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Lok Sabha Debates

Discussion On The Steps Taken By The Government To Protect The River Ganga From ... on 14 May, 2012

> Title: Discussion on the steps taken by the Government to protect the river Ganga from pollution and the Himalayas from ruthless exploitation (Discussion not concluded).

श्री रेवती रमण सिंह (इलाहाबाद):मान्यवर, मैं आपका बहुत आभारी हूं। आपकी बड़ी कृपा है कि आपने दोबारा इस पर चर्चा लगवायी है। माननीय मंत्री जी यहां हैं। हमने प्रणब दादा, जो स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमैन हैं, उनसे बात की थी। लेकिन, इत्तेफाक़ से उन्हें कहीं जरूरी काम से जाना पड़ा तो आज वह रह नहीं पाएंगे। आपसे एक आग्रह है कि इसमें बहुत-से मेम्बर, चाहे इस पक्ष के हों या उस पक्ष के हों, सभी इस पर बोलना चाहते हैं। ...( व्यवधान) मान्यवर, आपसे इस पर मेरा एक विनम्र निवेदन है कि इसको आप खत्म न कीजिएगा। कल प्रणब दादा आ जाएंगे। कल सभी मेम्बर बोल लें तब इसे समाप्त करें, यह मैं चाहता हूं। यह बहुत ही अहम है। ...( व्यवधान) मान्यवर, यह आपका भी सवाल है, यह मैं जानता हूं। अभी मैं आपकी कविता भी पढ़ूंगा।

          माननीय अध्यक्ष जी, यहां पर माननीय मंत्री जी बैठी हैं। ये बेचारी अपने को बड़ा असहाय महसूस करती हैं। उनसे जब मैं कहता हूं कि इन बांधों को रोकिए तो वे कहती हैं कि मैं क्या करूं, प्रदेश सरकार हमारी बात ही नहीं मान रही है।

पर्यावरण और वन मंत्रालय की राज्य मंत्री (श्रीमती जयंती नटराजन) : वह आपके प्रदेश के चीफ मिनिस्टर हैं ...( व्यवधान)

श्री रेवती रमण सिंह : आप यहां पर्यावरण मंत्री हैं। मैं आपको एक बात बताना चाहूंगा।

श्री शैलेन्द्र कुमार (कौशाम्बी): वह हमारे राज्य में नहीं है, वह उत्तराखण्ड में है। …( व्यवधान)

 

अध्यक्ष महोदया : प्लीज, अभी बैठ जाएं।

…( व्यवधान)

श्री शैलेन्द्र कुमार : यह दूसरे प्रदेश का मामला है। ...( व्यवधान)

श्रीमती जयंती नटराजन :मैं इसे अभी पढ़ती हूं।

श्री रेवती रमण सिंह : आप इसे न पढ़ें। आप इसकी लीपापोती न करिए, आपसे मेरी प्रार्थना है।

श्रीमती जयंती नटराजन :आप मेरे बारे में मत बोलिए, गंगा नदी के बारे में बोलिए।

श्री रेवती रमण सिंह : मैं गंगा नदी के बारे में ही बोल रहा हूं। जब आप गंगा नदी को रहने देंगी तब ही तो बोलूंगा, लेकिन जब आप गंगा को समाप्त कर देंगी तो मैं क्या बोलूंगा? एक बार इस पर चर्चा हो चुकी है। आपने जो जवाब दिया है, मैं उसका भी उल्लेख करूंगा।

          माननीय अध्यक्ष जी, गंगा नदी मात्र एक नदी नहीं है, हिमालय एक पहाड़ नहीं है, बल्कि यह हमारी सभ्यता-संस्कृति से जुड़े हुए हैं। मैं यह बताना चाहूंगा कि हमारी जो पौराणिक कथाएं हैं, उसके अनुसार गंगा का उद्भव शिव जी की जटा से हुआ। भागीरथ ने कई हजार साल तपस्या कर शिव जी की  जटा से उसे निकाल कर धरती पर अवतरित करने का काम किया था। पूरा हिमालय कच्चा पहाड़ है। कच्चे पहाड़ में कोई भी निर्माण कार्य ईको जोन में आता है। अगर कभी भी भूकम्प आया तो पूरे उत्तर भारत का सत्यानाश हो जाएगा। लेकिन, इसमें आप कहती हैं कि मैं क्या करूं और अभी आप कह रही हैं कि मैं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जी का लेटर पढ़ दूंगी। मैं वह लेटर लेकर क्या करूंगा? मैं आपसे कहना चाहता हूं कि गंगा बचनी चाहिए हिमालय बचना चाहिए, अगर यह हिमालय और गंगा नहीं बची तो हमारा देश भी नहीं बचेगा, यह बात मैं पूरे सदन से कहना चाहता हूं।

          चाहे मुगल काल रहा हो, चाहे मुस्लिम काल रहा हो, चाहे अंग्रेजों का काल रहा हो, किसी ने गंगा से छेड़छाड़ नहीं की, जो आज की यहां की सरकार और उत्तराखंड की चाहे भाजपा की सरकार रही हो या अब कांग्रेस की सरकार है, वह बिजली के लिए हमारी सभ्यता को विनष्ट करना चाहती हैं। यह मेरी समझ से बाहर की बात है। आईने अकबरी में अकबर ने अपने सभासदों से पूछा कि यह बताओ कि सबसे ज्यादा अच्छा पानी कहां का है तो एक सभासद ने खड़े होकर कहा कि पानी सबसे शुद्ध और अच्छा पानी गंगा का है तो उन्होंने कहा, यह मैं आईने अकबरी से कोट कर रहा हूं: “अकबर ने कहा-मैंने पानी की बात की थी, गंगाजल पानी नहीं, वह तो अमृत है।” यह अकबर की बात मैं बता रहा हूं। अकबर का पूरा खाना, उसका पूरा भोजन गंगाजल से बनता था और वह गंगाजल पीता भी था। एक मुसलमान भी गंगा का इतना अनन्य भक्त था, लेकिन इसको राष्ट्रीय नदी इन लोगों ने घोषित कर दिया। उसमें से तीन सदस्यों ने इस्तीफा भी दे दिया, लेकिन राष्ट्रीय नदी किस बात की, उसको प्राधिकरण बनाकर पेपर टाइगर आपने बना दिया और उसे कोई पावर नहीं है। It is only a paper tiger. वह कागज का शेर है और उस शेर को आपने बनाकर खड़ा कर दिया और कहा कि गंगा का इतना बड़ा काम हमने कर दिया, जो आज तक किसी ने नहीं किया। लेकिन मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा कि यह भीषण समस्या है, जो पूरे देश से जुड़ी हुई है और इसका अगर निदान तत्काल नहीं किया गया तो It will be too late. फिर कुछ करने से भी यह गंगा नहीं बचेगी। गंगा का अस्तित्व ही खतरे में है। आप बार-बार कहते हैं कि गंगा को निर्मल करना है। मैं कह रहा हूं कि आप उसको निर्मूल ही कर दे रही हो, बजाय निर्मल करने के, जब गंगा रहेगी, तब तो आप उसको निर्मल बनाओगी, जब गंगा रहेगी ही नहीं तो आप किस चीज़ को निर्मल बनाने का काम करेंगी। मैं एक बात कहना चाहूंगा, आपकी अनुज्ञा से पिछले सत्र में मैंने इसको उठाया था और मुझे उम्मीद थी कि इसका कोई हल निकलेगा। आज आप देख लीजिए कि इसमें कितने माननीय सदस्य पूरे सदन के, चाहे इधर के हों, चाहे उधर के हों, बोलना चाहते हैं और इसलिए बोलना चाहते हैं कि गंगा का जब से उद्भव हुआ है, जीवन से लेकर मरण तक हमारी गंगा हमसे जुड़ी हुई है। जो हिन्दू लोग हैं और यहां तक कि मैं जानता हूं कि मुसलमान लोग भी गंगा को भले पूजते नहीं हों, लेकिन गंगा का आदर करते हैं।

          गंगोत्री से गंगा निकलकर नीचे मनेरी भाली बांध बना दिया गया। मनेरी भाली बांध नं. 1 और मनेरी भाली बांध नं. 2 और गंगा को सुंगों में बहा दिया गया। एक बात अभी मैं बाद में कहूंगा कि मेरे जीवन की सबसे बड़ी भूल हुई थी कि मैं उत्तर प्रदेश का सिंचाई और पर्यावरण मंत्री था। मेनका जी यहां नहीं हैं, मैं उनकी तारीफ करना चाहूंगा। वे भारत की पर्यावरण मंत्री थीं, 10 घंटे मीटिंग चली, वे उसकी परमीशन नहीं दे रही थीं, मैंने बहुत समझा-बुझाकर उनसे उसकी परमीशन दिलवाई, लेकिन टिहरी हमको भरमा कर, हमको सही तथ्य नहीं बताकर टिहरी बांध का निर्माण कराया गया।           यह कहा गया कि वहां चौबीस सौ मेगावॉट बिजली पैदा होगी और एक लाख 67 हजार हेक्टेयर जमीन उत्तर प्रदेश और बिहार की सिंचित होगी।  मान्यवर, एक इंच न जमीन सिंचित हुयी और मात्र चार सौ मेगावॉट बिजली भी वहां नहीं बन रही है।  टेहरी झील इतनी बड़ी झील बनायी गयी, मुझे मदन मोहन मालवीय जी की याद आती है, जिन्होंने कहा था कि अगर हम हिमालय के पहाड़ पर इस तरह के बांधों के निर्माण का काम करेंगे, तो पूरा का पूरा उत्तर भारत तबाह हो जाएगा, बर्बाद हो जाएगा, कभी अगर भूकंप आया तो पूरी की पूरी जितनी आबादी इन प्रदेशों की है, यह समाप्त हो जाएगी।

          मान्यवर, अगर आप आगे चलें तो देखेंगे तो हिमालय में ही 115 किलोमीटर गंगा नजर नहीं आती है, अगर आप देखें तो पूरा सूखा है, गंगा वहां कहीं बहती ही नहीं है, 115 किलोमीटर तक सब सुंगों में डाल दी गयी है। जब 46 किलोमीटर पर पहुंचिए तो वहा पर टेहरी बांध बना दिया गया है।  टेहरी बांध सुंगों के द्वारा झील में परिवर्तित कर दिया गया है।  इसका नतीजा यह हुआ है कि जो गाज आते थे, जो औषधीय गुण का पानी आता था, वह सब झील में कैद हो गया और जहां उन पहाड़ों में, टेहरी में कभी मच्छर नहीं लगते थे, कहीं इस तरह का प्रदूषण नहीं था, अब पूरी की पूरी झील प्रदूषित हो गयी और पूरे पहाड़ में आज मच्छर ही मच्छर दिखायी पड़ते हैं।  सड़ने की वजह से उस झील में दुर्गंध आती है, गांव वाले भी वहां रहना पसंद नहीं करते हैं।  

          मान्यवर, जब टेहरी डैम बना तो यह कहा गया कि यहां के विस्थापितों को तत्काल हम लोग बसायेंगे, आज यह नतीजा है कि वहां अस्सी हजार विस्थापित अभी भी हैं और सर्वोच्च न्यायालय ने यह आदेश भी किया है कि उनको तत्काल बसाया जाए।  लेकिन उत्तराखंड की चाहे भाजपा की सरकार रही हो, चाहे अभी कांग्रेस की सरकार जो बनी है, किसी ने उनको बसाने का काम नहीं किया।  टेहरी एक विकसित जिला था।  आज हिंदुस्तान में टेहरी में बीपीएल कार्ड सबसे ज्यादा बने हुए हैं, क्योंकि वहां गरीबी हो गयी, भुखमरी हो गयी।  वहां लोगों को अगर तहसील हेडक्वार्टर जाना होता है, तो उनको बीस किलोमीटर घूमकर जाना पड़ता है।

          मान्यवर, मैं आपके माध्यम से कहना चाहूंगा कि इन लोगों ने एक शब्द निकाला है, रन ऑफ दी रिवर, एक अंग्रेजी भाषा का शब्द ईजाद किया है, रन ऑफ दी रिवर।  सुंगों में से नदी को, गंगा को निकाला है, हम पानी तो बहा ही रहे हैं, लेकिन वह पानी किस काम का है?  वह गंगा का पानी नहीं रह गया है, न उसमें औषधीय गुण हैं।  गंगा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि चालीस किलोमीटर बहने के बाद गंगा स्वतः अपने को शुद्ध कर लेती है।  पूरी दुनिया में एक ऐसी नदी गंगा है, जिसका पानी सालों साल खराब नहीं होता, अगर आप उसे बोतल में रखें।  गीते जी मुंबई ले गए होंगे, उन्होंने इसे रखा होगा।  ...( व्यवधान) शरद जी, आप भी बोलिएगा, कुछ आपके बोलने के लिए भी छोड़ रहे हैं।  गंगा के पानी को बोतल में ले जाइए, वह सालों साल खराब नहीं होता है।  

          मान्यवर, अगर आप गंगा को देखें तो हिमालय में कहीं गंगा दिखायी नहीं पड़ेगी।  आपको सुंग दिखाई पड़ेगी।  सुंग भी ऐसी बना दी हैं कि जिससे उन सुंग का निर्माण किया गया है, वह ईंटा, पत्थर और कंकड़ सब वहीं पड़ा हुआ है।  वे बहते रहते हैं।  जब बरसात का पानी आता है, तो वहीं ईंटा, पत्थर, कंकड़ बहकर आते हैं। गंगा इसलिए शुद्ध मानी जाती थी। आज जहां से गंगा का प्रवाह है, वहां के लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं।  उनको अगर एक बूंद पानी अंतिम संस्कार के लिए भी चाहिए, तो उस पानी के लिए भी उनको अर्जी देनी पड़ती है।  अर्जी देने के बाद जब एसडीएम परमीशन देता है, तो वहां से पानी छोड़ा जाता है, तब उनका अंतिम संस्कार हो पाता है।  वहां पर इस समय साढ़े तीन सौ सुंग बन रही हैं।         साढ़े तीन सौ बांध और सुंगों का निर्माण हो रहा है। अगर यह काम बदस्तुर चलता रहेगा तो मैं आखिरी बार इसे लोक सभा में उठा रहा हूं। हम इसके लिए इलाहाबाद से, प्रयाग से आंदोलन प्रारंभ करेंगे और पूरे उत्तर भारत में इस सरकार के खिलाफ और उत्तराखंड सरकार के खिलाफ एक जन आंदोलन खड़ा किया जाएगा। अब यह बर्दाश्त के बाहर हो गया है। आप गंगा को मनचाहे ढंग से ट्रीटमेंट कर उसको समाप्त करने का काम करें। उसे बांधों में कैद कर दें उसे सुंगों में कैद कर दें। अब यह नहीं होने दिया जाएगा।

          मान्यवर, पिछली बार मंत्री जी ने बड़े जोरदार शब्दों में कहा कि हमने इन विनाशकारी बांधों के बारे में सर्वे करवाया है। आईआईटी, रूड़की से सर्वे करवाया है। आईआईटी रूड़की क्या काम करता है? यह मैं माननीय मंत्री जी को बताना चाहूंगा और पूरे सदन को भी बताना चाहूंगा कि आईआईटी रूड़की के  एचईसी (हाइड्रो एनर्जी सेन्टर) की संस्थान का हवाला देते हुए मंत्री जी ने पल्ला झाड़ लिया। हमने जब उस रिपोर्ट को पढ़ा तो मुझे आश्चर्य हुआ कि यह संस्था क्या काम करती है? यह बांध निर्माण करने का काम करती है। यह बांध बनवाने का काम करती है उसकी गुणवत्ता को नहीं देखती है जो फौना और फलौरा है, जो जीव-जन्तु हैं, वहां जो पेड़-पौधे हैं उनके बारे में वह कुछ नहीं करती है वह बांध निर्माण का ही काम करवाती है। यही मंत्री जी ने हमको जवाब दिया था कि हमने वहां से जांच करा ली है। इस संस्था की विशेषता है बांध को बनाना और पर्यावरण के दुप्रभाव को न देखना। इनकी उसमें महारत हासिल है।

          मान्यवर मैं सदन से यह भी कहना चाहूंगा कि इस पूरे षड़यंत्र में विदेशी हाथ हैं। विदेश के लोग यह चाहते हैं कि हमारा हिमालय समाप्त हो जाए। हमारी गंगा समाप्त हो जाए और पचास करोड़ लोगों की जीविका समाप्त हो जाए। उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश से बंगाल की खाड़ी तक पूरा का पूरा जो गेहूं का कटोरा है, आज जो हम को अन्न खिलाता है वह कटोरा ही समाप्त हो जाएगा। अगर गंगा के साथ यही होता रहा तो लोग भूखे मरने लगेंगे और पूरा उत्तर भारत रेगिस्तान में तबदील हो जाएगा ।

          मान्यवर, यहां पर अभी गंगा प्राधिकरण की मीटिंग हुई लेकिन नतीजा जीरो हुआ। बिना नतीजे के वह मीटिंग खत्म हो गई। आईआईटी के एक प्रोफेसर जे. डी अग्रवाल जिन्होंने सन्यास ले लिया, जब उन्होंने अन्न जल त्याग दिया था तो एम्स में कैद कर के रखा गया था, उन्हें हाउस अरेस्ट कर के रखा गया था। ...( व्यवधान) उन्होंने प्रधान मंत्री के कहने पर अन्न तो छोड़ रखा है लेकिन जल ग्रहण कर लिया। बनारस में साधु संत 17 अप्रैल से भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उसमें बच्चे और महिलाएं भी भूख हड़ताल कर रहे हैं लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है। अभी भी सरकार उस पर गंभीरता से संज्ञान नहीं ले रही है। मेरी मांग है कि प्रधानमंत्री जी यहां स्वयं आएं, हमने प्रणब दादा से मांग की थी कि वह आ कर यहां पर स्वयं जवाब दें। उन्होंने कहा कि मैं इंटरविन करूंगा लेकिन उन्हें किसी जरूरी काम से जाना पड़ा।

          मान्यवर, मैं यह कहना चाहूंगा कि उत्तराखंड में हिमालय की सहयोगी नदियां भी हैं, जैसे मंदाकिनी, अलखनंदा, काली धौली, यमुना  इन सब पर बदस्तुर बांध का निर्माण जारी है। एक तरफ तो आपने कह दिया कि 135 किलोमीटर भगीरथी पर इको जोन डिक्लेयर कर दिया है। वहां पर कोई निर्माण नहीं होगा और वहीं बगल में जो गंगा की सहायक नदियां  हैं उन नदियों पर आप बांध का निर्माण जोरों से करते चले जा रहे हैं।यह  सरकार गंगा को क्यों समाप्त करने पर तुली हुई है। उत्तर प्रदेश, बिहार आदि जितने प्रदेश गंगा पर आश्रित हैं, लगभग 50 करोड़ आबादी इससे प्रभावित होने जा रही है।...( व्यवधान) मेरी मांग है कि हिमालय में एक हिमालयी आयोग बनाया जाए। उसमें संसद सदस्य, साइंटिस्ट्स, पर्यावरणविद आदि सब रहें और उनकी परमिशन के बिना वहां कोई निर्माण कार्य नहीं होना चाहिए। हिमालय की घाटियों में मात्र 20-22 लाख की जनसंख्या है, इससे ज्यादा नहीं है। वहां संसाधन व्यापक हैं और जनसंख्या का घनत्व बहुत ही कम है। जल, जंगल और प्राकृतिक उपहार से भरी हुई धरती है। उसी धरती को केन्द्र और प्रदेश सरकार समाप्त करने पर तुली हुई है। इनका कहना है कि हमें बिजली चाहिए। बिजली at what cost? अगर आप टोटल कर लें, इनके सब बांध बन जाएं, तो वहां one percent of the total Indian production बिजली पैदा होगी। मैंने प्रणब दादा से कहा था कि आप सदन में पास करवा लीजिए कि सैंट्रल पूल से एक प्रतिशत बिजली उत्तराखंड सरकार को दे दी जाए और बांधों का निर्माण बंद करवा दिया जाए। आप एक प्रतिशत बिजली के लिए गंगा, हिमालय को समाप्त करना चाहते हैं।  यह कदापि नहीं होने दिया जाएगा। हरीश रावत जी यहां बैठे हुए हैं। ये उत्तराखंड के हैं। ...( व्यवधान) सतपाल जी उसके पोषक हैं। ये अपनी कथा में दूसरी बात कहते हैं और यहां दूसरी बात कहते हैं।...( व्यवधान)

          मैं कहना चाहूंगा कि पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत गंगा बेसिन प्राधिकरण बना हुआ है। लेकिन उसके पत्र व्यवहार करने का पता स्पष्ट नहीं है कि कहां लिखा जाए, किसे लिखा जाए। इनका दफ्तर कहां है, टेलीफोन नम्बर क्या है, वह आम जनता को मालूम नहीं है। वह न नैट पर है और न कोई ई मेल है।

          अध्यक्ष महोदया, आपकी एक कविता भी है। मैं उसे इलाहाबाद लेकर चला गया था। मैंने मंगवाई थी लेकिन अभी मिली नहीं है। उसका नाम है - गंगा उदास है। उसमें आपने लिखा है कि हमारे जीवन से मरण तक हमारा मल-मूत्र धोने वाली गंगा आज उदास है। वह गंगा जो कभी निर्मल थी, अविरल थी, आज उस गंगा का स्वरूप ही बदल गया है। आज वह गंगा मैली हो गई है। बहुत पहले एक फिल्म आई थी। जिस देश में गंगा बहती है, हम उस देश के वासी हैं। गंगा मैली हो गई है, उसमें यह भी था।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप सब क्यों बोल रहे हैं, उन्हें बोलने दीजिए।

…( व्यवधान)

श्री रेवती रमण सिंह : एक आदमी ने एक मुर्गी पाल रखी थी जो सोने का अंडा देती थी। उस आदमी ने सोचा कि इस मुर्गी को मार डालो और एक बार में ही सोने के अंडे निकाल लो। यह सरकार भी वही कर रही है। गंगा जो पूरे देश को पानी दे रही है, जीवन दे रही है, उसी को समाप्त कर दो और देश को समाप्त कर दो। मैं पढ़कर सुनाना चाहूंगा। How to kill a river? यह एक प्रोफेसर ने लिखा है। अगर आपकी इजाजत हो, तो मैं उसे पढ़ दूं, क्योंकि यह अंग्रेजी में है। वैसे तो यह रिपोर्ट बड़ी है, लेकिन आपकी आज्ञा हो, अनुज्ञा हो, तो मैं इसकी चार लाइन पढ़ना चाहूंगा। ...  ( व्यवधान) इनका नाम श्री प्रसन्ना मोहंती है। इसमें इन्होंने लिखा है--

It says: “The first ever Cumulative Impact Assessment (CIA) study of hydro-power projects being built on Bhagirathi and Alakananda, two tributaries of the Ganga, has come as a big disappointment.  Carried out by the Alternate Hydro Energy Centre, AHEC, of IIT, Roorkee, which submitted its Report to the Ministry of Environment and Forests, MoEF recently, the study ignores – which I mentioned earlier – the very raison d’etre of its endeavour – assess cumulative impact of 70 hydro power projects, HPs, commissioned or in various stages of development (three of which were scrapped last year by her predecessor Shri Jairam Ramesh).”           He further writes: “Ecosystems and human habitations along the rivers will be finished.  Of the seventy, 54 are ‘Run of the River (ROR)’ and the rest are storage-based dams.          इसी तरह यह लंबी रिपोर्ट है। जैसा मैंने कहा कि आपने रुड़की से जो रिपोर्ट ली थी, वह रिपोर्ट बकवास है। वह डैम बनाने वाली संस्था है। उसे न तो इको जोन का पता है, न हमारे पर्यावरण का कुछ पता है और न ही उसे गंगा से कुछ लेना-देना है। वह डैम बनाना चाहती है और वही रिपोर्ट देती रहती है।

          इसी के साथ-साथ 34 डैम्स और बनाये जा रहे हैं। यह ग्रीन पैनल की रिपोर्ट है।

A Report commissioned by the Government recommended that 34 dams on the Alakananda and Bhagirathi rivers – the two main tributaries of the Ganga  -- should not be allowed to come up as they will cause irrevocable harm to the bio-diversity.  उत्तराखंड का भी विनाश होगा, जहां से हमारे सतपाल महाराज जी आते हैं। लेकिन आज तो इन्होंने चोला ही बदल रखा है, पता नहीं कौन सा साफा पहन रखा है। ...( व्यवधान) जब सनातम धर्म का पालन करें और वही व्याख्या करें तब तो ठीक है। मैं ‘अमर उजाला’ का 3.4.10 का एक उद्धरण आपकी अनुज्ञा से पढ़ना चाहूंगा। कैट ने अपनी रिपोर्ट में कहा था, कैट ने चिंता जतायी है कि अलकनंदा और भागीरथी पर जितनी योजनाएं प्रस्तावित हैं, उनमें सिल्ट रोके जाने से दूरगामी परिणाम यूपी व बिहार की कृषि पर पड़ेगा। लेकिन इनको समझ में नहीं आता कि वह जो सिल्ट लेकर आती है, उसी से हमारी उपजाऊ जमीन और फर्टाइल होती है। लेकिन इनको किसी की रिपोर्ट से क्या मतलब है। क्या यह उसे मानेंगे? इनको किसी से लेना-देना नहीं है। सूत्रों के अऩुसार रिपोर्ट में सवाल उठाया गया था कि गंगोत्री से देवप्रयाग नदी के 160 किलोमीटर तक 30 प्रोजैक्ट बने हुए हैं। अलकनंदा और भागीरथी पर स्वीकृत 53 परियोजनाओं के निर्माण के बाद आशंका जतायी जा  रही है कि इससे नदियों का अस्तित्व भी समाप्त हो जायेगा। यह मैं नहीं कह रहा हूं या कोई सांसद नहीं कह रहा है। यह कैट की रिपोर्ट है।

मैं एक कविता पढ़ दूं, फिर अपनी बात समाप्त करता हूं:

“बहुत उदास है बहती है गंगा। न रहे रैदास, न रही कठौती में गंगा, न ही रही फकीरी, वह समर्पण, कहां किसका मन है अब गंगा। बहुत उदास है बहती है गंगा।
सहस्रों दिये तैरा दिए हर शाम मां के नाम, तैराए जिसने पत्थर के शालीग्राम।
शायद उसी की सोच में बहुत उदास है बहती है गंगा।
शब्द बेमानी, आरती में मृदु स्वर नहीं, शोर है, पतित पावनी को घेरे मलिनता घोर है।
समेटे यह कलुष तेरा मेरा, बहुत उदास बहती है गंगा।
कर सकूं तेरी आरती, इस लायक कर दे। मां प्राणों के बीहड़ में वसंत के रंग भर दे।
मां उंगली थामे रख, मेले में मत छोड़ अकेले, मेरे संग आ मां गंगा, मेरे संग हो मेरी मां गंगा।”             आपके नाम से है यह। इसे मैं सदन को समर्पित करता हूं। इसी के साथ मैं एक-दो बातें कहकर अपनी बात समाप्त करूंगा क्योंकि मैं अन्य माननीय सदस्यों के विचारों को भी सुनना चाहता हूं।...( व्यवधान) यह चर्चा आज चल रही है और मैंने आग्रह किया है कि इसे कल भी चलाया जाए।           महोदया, हिन्दुस्तान में 9 फरवरी, 2010 को छपा है - "मायके में ही सूख गयी भागीरथी की जलधारा।" जहां से भागीरथी निकलती है, वहीं इन लोगों ने इसे समाप्त कर दिया। जैसे आजकल चला हुआ है लड़कियों की भ्रूण हत्या, वैसे ही जहां से मां भागीरथी निकलती हैं, वहीं इन्होंने उसको समाप्त करने का काम किया। मैं इसे थोड़ा पढ़ देता हूं :
 “मनेरी से तिलौह और जोशियाड़ा से धरासू तक सूखा प्रवाह। मनेरीभाली पहले और दूसरे चरण की परियोजना के निर्माण से 44 किलोमीटर  लम्बे क्षेत्र में भागीरथी सूख गयी है। इससे गंगा के दर्शन और स्नान के लिए पहुंचने वाले श्रद्धालु निराश होकर लौट रहे हैं। इस बार जाड़ों में वर्षा न होने से भागीरथी में नाम मात्र का पानी रह गया। बचा हुआ पानी परियोजनाओं की सुंग में डाल दिया गया। 90 मेगवाट की मनेरीभाली-प्रथम और 304 मेगावाट की मनेरीभाली-द्वितीय चरण की बिजली परियोजनाओं के लिए उत्तरकाशी में भागीरथी के प्रवाह को सुंगों में डाल दिया गया। हालांकि गंगा बेसिन अथारिटी ने भागीरथी नदी की घाटी और नदी से प्रभावित होने वाले लोगों के लिए निर्धारित मात्रा में पानी छोड़ने के निर्देश दिए हैं, लेकिन इसका भी पालन नहीं हुआ है।”             मैं पूरी रिपोर्ट न पढ़कर कहना चाहता हूं कि मैं प्रयाग से आता हूं। प्रयाग में कभी गंगा का जल प्रवाह कल-कल करके बहता था और एक अद्भुत दृश्य वहां पर था। शायद दुनिया में किसी नदी में ऐसा न हो, गंगा एक सफेद, धवल और यमुना ब्लू कलर, काली दिखती थी, दोनों नदियों का संगम वहां होता था, लेकिन आज वहां के लोगों ने उसको नाले में तब्दील कर दिया, वहां पानी ही नहीं रह गया है। कई बार साधु-सन्तों ने कुम्भ मेले में, अर्ध-कुम्भ मेले में इसे कहा। अभी वर्ष 2012 के दिसंबर से जनवरी, 2013 तक वहां कुम्भ मेला लगने जा रहा है। मैं इलाहाबाद का सांसद होने के नाते उसकी अगुवाई करूंगा और कोई साधु-सन्त, कोई आदमी गंगा में स्नान नहीं करेगा, जब तक गंगा में पानी नहीं आएगा। ...( व्यवधान) ये बांध तोड़े जाएं। मैं एक रिपोर्ट और पढ़ना चाहता हूं - "अफसरों की दया पर अत्येष्टि के लिए पानी।" ...( व्यवधान) जितने बांध बन रहे हैं, उनको तोड़ा जाए।...( व्यवधान) रिहन्द बांध वहां नही है।...( व्यवधान) अक्टूबर से अप्रैल तक नदी में जलस्तर कम रहता है, लिहाजा विद्युत उत्पादन भी प्रभावित होता है।     
          महोदया, एक सपना दिखाया गया था हाइड्रोपावर बहुत अच्छी पावर है। मैं एक उदाहरण आपको देना चाहता हूं। टिहरी डैम के बारे में कहा गया था कि 2400 मेगावाट बिजली बनेगी, लेकिन आज 400 मेगावाट बिजली भी नहीं मिल रही है। क्या मंत्री जी यह बताने की कृपा करेंगे कि वहां वास्तव में 2400 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है? शरद जी ने बताया कि वहां केवल 327 मेगावाट ही बिजली पैदा रही है और हमें 2400 मेगावाट का सपना दिखाया गया था।
          मैं सदन में मेनका गांधी जी से क्षमा मांगना चाहूंगा, क्योंकि उसका दोषी मैं भी हूं। जब वह पर्यावरण मंत्री थीं, मैं उन्हें बधाई देना चाहूंगा कि उस समय दस घंटे तक वह इस बात को नहीं मानी थीं और मैंने बहुत अनुनय-विनय करके इसकी मंजूरी उनसे ली थी। लेकिन मुझे क्या पता था कि ये लोग हमें ही धोखे में डाल रहे हैं।
          गंगा के कोने-कोने में औषधियां हैं। गंगा केवल नदी नहीं है कि जो बही चली जा रही है। जब उस औषधि को ही लोग नष्ट करने में लगे हुए हैं, तो फिर क्या किया जा सकता है। भगीरथी में रेडियोधर्मी कणों को टिहरी बांध रोक रहा है। गंगाजल का पानी जो होता है, वह कमाल का पानी होता है, लेकिन हम उन्हीं कणों को समाप्त कर रहे हैं और नाम दे रहे हैं ‘रन ऑफ दि रिवर’। जब गंगा उन औषधियों को लेकर नहीं बहेगी, गाद को नहीं लेकर बहेगी तो वह केवल और नदियों की तरह एक नदी ही कहलाएगी।
          मैं इस सदन में अंतिम बार यह सवाल उठा रहा हूं। इस सवाल को फिर नहीं उठाऊंगा, जन आंदोलन करके ही हम इसका निदान करें।
 
श्री सतपाल महाराज (गढ़वाल):अध्यक्ष महोदया, कुंवर रेवती रमन सिंह और प्रबोध पांडा जी ने नियम 193 के तहत ‘गंगा नदी को प्रदूषण से तथा हिमालय को निर्मम दोहन से बचाने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों पर चर्चा’ विषय पर हम यहां बहस कर रहे हैं। सबसे पहले मैं सभी माननीय सदस्यों का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा, क्योंकि इस सदन में बहुत से सदस्य गंगा के परम भक्त हैं और बहुत से सदस्य गंगा के प्रति श्रद्धा और प्रेम रखते हैं। वैसे भी हमारे महाभारत में भीष्म का एक नाम गंगा पुत्र भी था।
          गंगा के साथ बहुत बड़ा इतिहास जुड़ा हुआ है, भारत की आत्मा जुड़ी हुई है। निश्चित रूप में जो हमारे माननीय सदस्य हैं, वे इसे लेकर चिंतित हैं और उनकी चिंता उचित भी है कि गंगा प्रदूषित हो रही है। हिमालय पृथ्वी का मानदंड है, वह पृथ्वी का नाभि केन्द्र है, हमारा सरताज है। उसका निर्मम दोहन हो रहा है। वास्तव में यह चिंता का विषय है।
          मैं पहले सभी सदस्यों से आग्रह करूंगा कि वे एक बार जरूर हिमालय यात्रा करें और गंगा को करीब से देखें। उन्हें जो स्थिति वहां गंगा की देखने को मिलेगी, आपके सामने बहती हुई गंगा दिखेगी, इसके अलावा जो भी पावर प्रोजेक्ट्स वहां लगाए गए हैं, क्यों लगाए गए हैं, उस चीज का उन्हें पता चलेगा और उनका ज्ञानवर्धन होगा। आज गंगा घाटी कटते-कटते नीचे की ओर जा रही है। उत्तराखंड के अंदर और उससे बाहर जो गंगा की स्थिति देखने को मिलती है, और वह कैसे बनी, इसके बारे में भी हमारे सदस्यों का ज्ञानवर्धन होगा।
          मैं सबसे पहले यह कहना चाहूंगा कि हमारे देश के अंदर जब ऊर्जा की आवश्यकता बढ़ी, तो सोचा गया कि हम कोयले और क्रूड ऑयल से ऊर्जा बनाएंगे और वह बनती थी। फिर यह माना गया कि कोयला और ईंधन ऐसी चीजें हैं, जिन्हें हम रिन्यू नहीं कर सकते, अर्थात् हजारों वर्ष धरती में दबने के बाद यह ईंधन तैयार होता है।  हजारों वर्ष में कोयला तैयार होता है। इसे अगर हम खर्च करते जाएंगे तो इसे हम  दुबारा प्राप्त नहीं कर पाएंगे। कुछ देशों ने सोचा कि हम न्यूक्लीयर एनर्जी बनाएंगे, उसका भी उपयोग किया गया। आइसलैंड के अंदर जो गर्म पानी का स्रोता है जिसे डायजर हम बोलते हैं, होट-वाटर-प्रिंग का उपयोग किया गया। वहां बिजली बनाने के लिए इसका प्रयोग किया गया है। हमारे देश के अंदर पानी को रोक करके टर्बाइन को चलाएं, उसे स्पंदित करें, उस तकनीक को यहां सोचा गया।
          कुंवर रेवती रमन जी जिस बांध के बारे में कह रहे हैं, उसी टिहरी बांध के बारे में इन्होंने स्वीकृतियां दीं और यह उस तकनीक से बना। उसके बाद यह चिंतन हुआ कि पहाड़ों में भूकम्प आते रहते हैं, यह कंटिनेंटल शिफ्ट जो पहाड़ों में होता रहता है उससे ये डेम सेफ नहीं हैं। कुछ लोगों ने भूख हड़ताल करके लोगों का ध्यान इस ओर खींचा, लोग चिंतित हुए। फिर तय किया गया कि डेम पहाड़ों में नहीं बनेंगे परन्तु रन-ऑफ-द-रिवर बनेंगे।
          हिमालय के अंदर बहुत बड़े-बड़े जलाशय हैं। मानसरोवर, राक्षसताल,नौकुचिया ताल, भीमताल, नैनीताल, सहस्त्रताल जैसे बड़े-बड़े ताल हमारे पहाड़ों में हैं। तालों का पानी परकूलेट होकर के हमारे वाटर लेवल को बढ़ाता है। आपने जगह-जगह जो झरने देखें होंगे वे तालों से संबंधित हैं। पहाड़ों में ऐसा नहीं है कि ताल नहीं होते हैं, अनेक ताल होते हैं।
          जब ताल बढ़ गये और पानी रुक गया, तो एक जगह अंग्रेज चूहे लाए और चूहों ने उन्हें खोदा और धीरे-धीरे उसका पानी निकला। पहाड़ों में अनेक प्रकार के परिवर्तन होते रहते हैं। यह तय किया गया कि पहाड़ों के अंदर हम कोई बड़ा डेम नहीं बनाएंगे, पहाड़ों के अंदर रन ऑफ द रिवर बनाएंगे। इसका मतलब यह होता है कि जो नदी का स्लोप है, पहाड़ के अंदर सुंग बनाकर के, उसके पानी को प्रभावित करके, उससे टर्बाइन को चलाएं।
          मैं सभी सदस्यों से कहना चाहूंगा कि आप उत्तराखंड में एक बार जाएं और करीब से देखें। यहां कहने की बात नहीं है आज टीवी और मीडिया बहुत पावरफुल है और एक बात कही जाती है कि     “ अगर कोई कुत्ता किसी आदमी को काट ले तो कोई खबर नहीं है, लेकिन अगर कोई आदमी कुत्ते को काट ले तो बहुत बड़ी खबर है।”  एक खबर बनाई गयी कि साहब टिहरी में पानी रोक दिया गया, गंगा बहनी बंद हो गयी, सारे साधु-संत चिंतित हो गये और यह न्यूज दिन-भर चलती रही कि उत्तराखंड से कोई पानी नहीं बह रहा है, पानी रुक गया है। मैं कहना चाहूंगा कि टिहरी डेम से (6174) क्यूसिक पानी निरंतर पानी निरंतर प्रवाहित होता है उसे रोका नहीं गया है। मैं यह कहना चाहूंगा कि अलकनंदा जो गंगोत्री से आती है और तिब्बत से धौली आती है, विष्णु प्रयाग के अंदर उससे अलकनंदा   मिलती है। एक तरफ से सरस्वती आती है अलकनंदा से मिलती है। वहां पर हमारा बद्रीनाथ धाम है जहां से अलकनंदा बहती है, धोली आती है और विष्णु प्रयाग में दोनों मिलती हैं। आगे कर्ण प्रयाग के अंदर पिंडर आकर अलकनंदा से मिलती है। इसी प्रकार से रुद्रप्रयाग में मंदाकनी आती है अलकनंदा से मिलती है। देव प्रयाग जो सबसे बड़ा प्रयाग है, वहां पर भगीरथ आकर के अलकनंदा से मिलती है। इसी प्रकार से पूर्वी न्यार, पश्चिमी न्यार, पिंडक आदि सभी नदियां अलकनंदा में मिलती जाती हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि सारी नदियां यह बता रही हैं कि अगर आप समुद्र में मिलना चाहोगे, तो आपमें क्षमता नहीं है कि आप समुद्र में मिल सको।
सारी नदियां जब मिलकर गंगा बन गईं, तो गंगा की इतनी क्षमता हो गई कि समुद्र में उसका विलय हो सका। इस प्रकार से देश के लोगों को बताना चाहिए कि अगर अलग-अलग हो कर हम लक्ष्य प्राप्त करना चाहेंगे, तो हम नहीं कर पाएंगे, लेकिन अगर सभी देशवासी गंगा की तरह चाहेंगे, तो हम अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर सकते हैं।
          मैं कहना चाहता हूं कि देवप्रयाग के बाद गंगा बनती है। देवप्रयाग से पहले गंगा नहीं है, बल्कि छोटी-छोटी नदियां हैं और ये सारी नदियां मिल कर गंगा का रूप ले लेती हैं और गंगा वहां से बहती है। जहां तक उत्तराखंड का सवाल है वहां बहुत-से गटर के नाले और बहुत से गंदे नाले उसमें पड़ते हैं, लेकिन गंगा का पानी इतनी प्रचुर मात्रा में है कि वह गंदगी को डायलूट कर देता है। उसके बाद जब गंगा आगे बहती है, तो उसमें से नहर निकल जाती है। इतनी नहरें गंगा में से निकल रही हैं, जिसके कारण आगे जा कर गंगा का पानी कम हो जाता है। इस कारण प्रयागराज इलाहाबाद में पानी की कमी आ गई है और मैं निश्चित रूप से इसे मानता हूं क्योंकि मुझे वहां जाने का मौका मिला है और अध्यक्ष महोदया आप भी वहां गई हैं और गंगा के दृश्य को देखा है कि किस प्रकार से गंगा मढ़ अवस्था को प्राप्त हो गई है। आज गंगा को जागृत करने की जरूरत है। आज प्रत्येक भारतवासी को भगीरथ का अवतार लेना होगा कि पुनः गंगा को जीवित करें और इसके साथ-साथ हमें भारत के निर्माण में ऊर्जा भी चाहिए। हमें शक्ति भी चाहिए और शक्ति की हम उपेक्षा नहीं कर सकते हैं। जहां तक बिजली बनाने का प्रश्न है, यह बिजली निश्चित रूप से बन रही है और आज हाईड्रो इलेक्ट्रीसिटी की आवश्यकता और ज्यादा हो गई है, क्योंकि हम जो नाभकीय ऊर्जा बना रहे थे उसमें अमेरिका ने देखा कि न्यूक्लियर रियेक्टर खतरे की निशानी है। कोई भी आतंकवादी उसे अपना निशाना बना सकता है। फिकुशिमा के बाद जापान में न्यूक्लियर रियेक्टर को बंद करना पड़ा, क्योंकि वहां तो भूकम्प आता ही रहता है। सभी ने माना कि हाईड्रो एनर्जी ही ऐसी एनर्जी है और हाईड्रो इलेक्ट्रीसिटी के जरिए हम अपने देश का निर्माण कर सकते हैं और इसे अन्य देशों ने भी स्वीकार किया है। आज भारत के अंदर डैम बन रहे हैं, उन्हें आप करीब से जा कर देखिए और देखने के बाद  आपको बहुत गौरव होगा कि भारत के वैज्ञानिकों ने इस प्रकार की टेक्नोलोजी को बनाया है।...( व्यवधान) मैं आपको आमंत्रित करता हूं कि आप आइए और देखिए। जैसे घराट होते हैं और घराट से आप पनचक्की चलाते हैं। अब आप कहें कि घराट से भी प्रदूषण हो रहा है, तो इसे बंद कर दो। इससे तो गंगा का अविरल बहना ही बंद हो जाएगा। मेरा निवेदन है कि निश्चित रूप से सांसद वहां जाएं, करीब से देखें और विश्लेषण करें और स्वयं उसके प्रत्यक्षदर्शी बनें। इसके साथ-साथ जो गंगा वाटर बेसिन आथोरिटी है, उसके अंदर बहुत से महानुभाव हैं, लेकिन वहां का सांसद ही उसका मैम्बर नहीं है। जो वहां के क्षेत्र की समस्याएं हैं, जैसे बांध बनता है, श्रीनगर में जीवीके का बांध बना हुआ है और 90 परसेंट कम्प्लीट हो गया है, लेकिन उसे अनुमति नहीं मिल रही है और उसका सारा काम लटका हुआ है। कहने का मतलब है कि उत्तराखंड के निर्माण में जो इतना पैसा निवेश कर चुके हैं, तो ये काम रुकने नहीं चाहिए। योजनाएं दो-दो साल के लिए बंद हो जाती हैं। जबकि सारी फारमैलिटीज चाहे पर्यावरण मंत्रालय की फारमैलिटी हो, चाहे वन विभाग की फारमैलिटी हो या कोई और फारमैलिटी हो, सारी फारमैलिटीज को पूरा करने के चक्कर में दो साल तक योजना बंद हो जाती है और बिना कोई परिवर्तन किए उन्हें अनुमति मिलती है। दो साल के लिए जो योजना का नुकसान होता है, उसकी भरपाई कौन करेगा, यह समस्या हर समय खड़ी रहती है। मैं कहना चाहता हूं कि गंगा का पानी अमृत है, क्योंकि गंगा ग्लेशियर से निकलती है और ग्लेशियर का पानी सबसे साफ और स्वच्छ होता है। ग्लेशियर के पानी से ज्यादा स्वच्छ पानी कोई नहीं होता है।...( व्यवधान) मैं आपको आमंत्रित करता हूं कि आप उत्तराखंड में आइए। पहाड़ों में लकड़ियां काटी जा रही हैं, जड़ी-बूटियां की इल्लीगल माइनिंग हो रही है, वृक्ष काटे जा रहे हैं, ग्लोबल वार्मिंग हो रही है, जिसके लिए निश्चित रूप में सरकार को चाहिए, जैसे कानपुर के अंदर टैनिंग इंडस्ट्री का, लैदर इंडस्ट्री का पानी नदियों में जाता है, उसे स्वच्छ किया जाए। आज तो नैनो टेक्नोलोजी आ गई है कि आप 40 मीटर बॉय 60 मीटर पर गंदे पानी को लेकर उससे दो सौ मेगावाट बिजली बना सकते हैं और इसके साथ-साथ मेडिकल क्रियेट वाटर पैदा कर सकते हैं। इस टेक्नोलोजी का एक यंत्र हम निश्चित रूप से हरिद्वार में लगाएंगे।
          अंत में मैं कविता के माध्यम से कहना चाहता हूं कि " वक्त को जिसने न समझा उसे मिटना पड़ा है, बच गया तलवार से तो फूल से कटना पड़ा है, चाहे जितनी ही कड़ी हो हर नदी की राह से हर चट्टान को कटना पड़ा है। "
 
योगी आदित्यनाथ (गोरखपुर): माननीय अध्यक्ष महोदया, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे इस महत्वपूर्ण विषय पर बोलने का मौका दिया। मैं इसलिए भी आपका आभारी हूं कि आपकी उपस्थिति में इस मुद्दे की गंभीरता और बढ़ी है और केवल गंगा रक्षा के लिए नहीं बल्कि गंगा के माध्यम से भारतीय संस्कृति और भारतीयता पर संकट वर्तमान में आया है, उससे उभरने के लिए सरल स्वभाव के कारण हम सबको एक नई ताकत प्राप्त हुई है। गंगा की पवित्र धारा की निर्मलता और  अविरलता  को लेकर देश के विभिन्न भागों में आंदोलन चल रहा है। अगले वर्ष प्रयागराज में महाकुंभ भी है। यह अनुमान है कि आठ से दस करोड़ लोग देश और दुनिया से श्रद्धालुजन इस अवसर पर आकर प्रयागराज में स्नान करेंगे और दर्शन करके आस्था तो प्रकट करेंगे ही साथ ही राष्ट्र की एकात्मता को मजबूती प्रदान करने में योगदान भी देंगे। पवित्र गंगा नदी और सहायक नदियों की वर्तमान स्थिति को देखिए, दिल्ली में यमुना की स्थिति को देखिए। मुझे दिल्ली से गोरखपुर अक्सर ट्रेन से जाने का अवसर प्राप्त होता है। मैं रास्ते में उन नदियों की दुर्दशा देखता हूं कि जो नदी प्राकृतिक जल की शुद्ध धारा होकर जीव और जगत के अस्तित्व का आधार बन सकती थीउसे अवैज्ञानिक और अनियोजित विकास ने गंदे नाले के रूप में बदलकर भारत की नदी संस्कृति पर ही बल्कि राष्ट्र की संस्कृति और भविष्य पर गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है, संकट खड़ा कर दिया है। प्रत्येक देशभक्त, राष्ट्रभक्त और भारतीय का चिंतित होना स्वाभाविक है क्योंकि भारतीय मनीषा ने जल को जीवन का आधार माना है लेकिन आप देखिए कि जीव और जगत के आधार जल को किस प्रकार से प्रदूषित कर दिया गया है। गंगा एक माध्यम हो सकती है।
          हम देश में कहीं भी जाते हैं तो देखते हैं कि स्थानीय निवासी अपने गांव की छोटी नदियों को गंगा का नाम देकर पूजा करते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की काफी आबादी मारीशस में निवास करती है, उन्होंने एक नदी का नाम गंगा रखा है, ताल का नाम गंगा के नाम पर रखा है। गंगा भारतीयता की प्रतीक है इसलिए गंगा के खिलाफ किया जाने वाला षडय़ंत्र और साजिश भारतीय संस्कृति और भारतीयता के खिलाफ साजिश है। मुझे कभी-कभी इकबाल की वह पंक्तियां याद आती हैं - “यूनान, मिश्र और रोमा मिट गये जहां से, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी”। यूनान, मिश्र और रोम भौगोलिक रूप से नहीं मिटे, उनकी संस्कृति मिटी थी और सैकड़ों वर्षों की गुलामी में जो कार्य विदेशी आक्रंता नहीं कर पाये, दुर्भाग्य से आज इस देश के अंदर विकास के नाम पर साजिश हुई, भारत की नदी संस्कृति, भारत की इन पवित्र नदियों के साथ षडय़ंत्र करके उन्हें अवरुद्ध करके उस षडय़ंत्र को एक अमलीजामा पहनाने का प्रयास हो रहा है, इसलिए इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर इस देश की संसद चर्चा नहीं करेगी और उसके समाधान का कोई ठोस रास्ता नहीं निकालेगी तो मुझे नहीं लगता है कि किसी और से कोई उम्मीद की जा सकती है। इसलिए मैं आपका हृदय से धन्यवाद देना चाहूंगा कि आपने इस महत्वपूर्ण मुद्दे को स्वीकार भी किया बल्कि स्वंय उपस्थित होकर इसकी गंभीरता को स्वीकार किया और इस पूरी चर्चा में हम कोई ठोस नतीजे पर पहुंचे, इस दृष्टि से इस पर विचार करने के लिए आप स्वयं भी उपस्थित होकर अपना मार्ग निर्देशन दे रही हैं।
          महोदया, सन् 1985-86 में इस देश की गंगा नदी को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए गंगा एक्शन प्लान की घोषणा हुई थी। लेकिन गंगा एक्शन प्लान पर मुझे लगता है कि प्रथम और द्वितीय चरण में 1045 करोड़ रुपये खर्च हुए, लेकिन गंगा की धारा गंगा एक्शन प्लान की परियोजना प्रारम्भ होने से पहले जितनी प्रदूषित थी, दूसरे और तीसरे चरण के कार्य को सम्पन्न करने के बाद भी गंगा का प्रदूषण तब से ज्यादा आज है और यह स्थिति यमुना नदी की भी है। दिल्ली में यमुना नदी बहुत सारे स्थानों पर गंदे नाले के रूप में बदल चुकी है और इसकी स्थिति बड़ी खराब है। गंगा के बारे में इस सदन में एक प्रश्न पूछा गया था, जिसमें माननीय मंत्री जी ने स्वयं इस बात को स्वीकार किया था, यानी गंगा एक्शन प्लान और यमुना एक्शन प्लान लागू होने के बाद की स्थितियां क्या हैं कि पहले और द्वितीय चरण के कार्य पूरे होने के बाद भी जो नदियों में सीवेज का गंदा पानी गिरता है, उसमें 38254 मिलियन लीटर प्रतिदिन जो अनुमानित सीवेज गिरता है, उसमें मात्र 11787 मिलियन लीटर प्रतिदिन के ही ट्रीटमैन्ट की व्यवस्था है, बाकी की व्यवस्था नहीं है। आखिर नदी शुद्ध कैसे रहेगी। हम ये सब जिम्मेदारियां प्रदेश के ऊपर डालना चाहते हैं कि यह प्रदेश की जिम्मेदारी है और प्रदेश की सरकारें धन का रोना रोकर अपनी जिम्मेदारियों से बचना चाहती हैं और यह सब इसलिए हो रहा है कि अगर गंगा माता वोटदायिनी होती तो संभवतः मोक्षदायिनी गंगा इस प्रकार से आज भारत की वर्तमान पीढ़ी से अपने अस्तित्व के लिए नहीं रो रही होती, जो वर्तमान में इसकी दुर्दशा है, इस प्रकार की त्रासदी वह झेल नहीं रही होती। हम पूरे देश में देखें तो देश का जो चालीस प्रतिशत सिंचित क्षेत्र है, वह केवल गंगा का जो दोआब है, गंगा को जो क्षेत्र है, यही चालीस प्रतिशत सिंचित क्षेत्र पूरे देश में हैं और इसमें देश की लगभग 47 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। लेकिन उस सबके बावजूद आज तक कोई भी प्रभावी कार्यवाही नहीं हो पाई है। गंगा एक्शन प्लान की जो घोषणाएं हुई थीं, जिनमें 270 परियोजनाएं बनी थीं, उनमें उत्तर प्रदेश में 43, पश्चिमी बंगाल में 170 और उत्तराखंड में 37 में से एक भी परियोजना आज तक पूरी नहीं हुई। इसी प्रकार से इस देश के अंदर गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए जो आंदोलन हुए, उन्हें लेकर फरवरी 2009 में माननीय प्रधान मंत्री जी ने राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन किया। प्राधिकरण की तीन बैठकें हुईं, लेकिन प्राधिकरण अभी तक किसी भी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाया है।
     
17.00 hrs. इसी अकर्मण्यता के नाते पूरे देश में आंदोलन हो रहा है। वाराणसी में पिछले कई दिनों से भूख हड़ताल पर इस देश के धर्माचार्य बैठे हुए हैं, संतगण बैठे हुए हैं और आम जन बैठे हुए हैं। वाराणसी के अंदर लगातार भूख हड़ताल चल रही है लेकिन सरकार ने अभी तक कोई ठोस कार्य योजना तैयार नहीं की है और सरकार इस पर कुछ करना भी नहीं चाहती है। माननीय रेवती रमन जी कैग की चर्चा कर रहे थे। यमुना सफाई की जो योजना है उसके बारे में कैग ने अपनी जो रिपोर्ट दी है, उसमें भी उन्होंने इस बात को कहा है कि 19 सालों में 1300 करोड़ रूपये खर्च हुए, लेकिन नतीजा ज़ीरो। केंद्र सरकार ने यह बात यमुना सफाई और सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने ताजा शपथ-पत्र में भी कही है।

          महोदया, माननीय उच्चतम न्यायालय 18 वर्षों से यमुना सफाई की निगरानी स्वयं देख रही है, तब तो यह दुर्गति दिल्ली के अंदर यमुना जी की है तो अन्य जगह क्या स्थिति होगी।

          महोदया, कैग की रिपोर्ट और भी गंभीर संकट हम सब के सामने प्रस्तुत करता है कि सन् 2011-12 में कैग ने उत्तर प्रदेश में कानपुर, गाजियाबाद और लखनऊ की परियोजनाओं को नाकाम बताया है। गोमती, गंगा और हिण्डन के पानी को बीमारियों का एक अड्डा बताया है। गाजियाबाद शहर में प्रतिदिन 290 मिलियन लीटर सिवर निकलता है। जिसमें से मात्र 129 मिलियन लीटर के ही शोधन की व्यवस्था है बाकी जैसे है वैसे ही नदी में उंडेल दिया जाता है। इसी प्रकार से लखनऊ शहर में प्रतिदिन 410 मिलियन लीटर सीव्रेज निकलता है, उसमें से 300 मिलियन लीटर के शोधन की ही व्यवस्था है, बाकी 110 गोमती नदी में वैसे ही उंडेल दिया जाता है। लखनऊ शहर के जो 26 नाले हैं, उनमें केवल 9 में ही शोधन संयत्र लगे हुए हैं। यह केवल लखनऊ और गाज़ियाबाद का ही हाल नहीं है। गंगोत्री से ले कर गंगा सागर तक या फिर गंगा की जितनी सहायक नदियां हैं, उन सभी नदियों के अंदर प्रदूषण की स्थिति इसी प्रकार है। महोदया, इसीलिए देश के अंदर वर्तमान में जो आंदोलन चल रहा है, इसमें स्वाभाविक रूप से आम जनता में बड़ा भारी आक्रोश है। जब हम लोग गंगा या गंगा की सहायक नदियों के बारे में देखते हैं, गंगा या गंगा की सहायक नदियों के प्रवाह को वर्तमान में अवरूद्ध करा दिया गया है। गंगा की निर्मलता और अविरलता के बारे में जो प्रश्न और शंकाएं उठ रही हैं, उसके दो प्रमुख कारण हैं। एक तो नदियों में बना स्थानीय     पारिस्थितिकी का अध्ययन किए बगैर बन रही और प्रस्तावित पनविद्युत परियोजनाएं। दूसरा, अपने उद्गम स्थल से लेकर के गंगा सागर तक छोटे-बड़े नगर और कस्बों का सीव्रेज और औद्योगिक इकाइयों का कचरे का बिना शोधन के ही नदियों में गिराना। ये दो प्रमुख कारण इसके हैं। यहां पर अभी माननीय रेवती रमन जी कह रहे थे और मैं माननीय सदस्य सतपाल महाराज को भी सुन रहा था। मुझे ताज्जुब होता है।

          महोदया, माननीय सतपाल महाराज उत्तराखण्ड की बात कह रहे थे। मेरा जन्म भी उत्तराखण्ड में हुआ है और मेरा बचपन भी उत्तराखण्ड में बीता है। मुझे लगता है कि उत्तराखण्ड को, वहां की नदियों को, वहां के घाटों को और वहां की पूरी परिस्थियों को मैंने बहुत नज़दीक से देखा है। गंगा की निर्मलता और अविरलता को ले कर सन् 2009 में जब आंदोलन शुरू हुए थे, मैंने इलैक्शन के बीच में ही उत्तराखण्ड का दौरा प्रारंभ किया था और उत्तराखण्ड में मैं चुनावों की वजह से नहीं गया था। मैं केवल इस बात को देख रहा था कि गंगा की निर्मलता और अविरलता पर जो प्रश्न उठा रहे हैं, आखिर ये कितने सच हैं।

          महोदया, मुझे आपको बताते हुए बहुत अफसोस हो रहा है कि गंगोत्री से लेकर उत्तरकाशी तक, जो भागीरथी की मूल धारा है, लगभग 103 किलोमीटर की, जिसे पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने हाई-इको जोन भी घोषित किया है। माननीय श्री जयराम रमेश जी ने किया था और मैं उसके लिए उन्हें धन्यवाद भी दूंगा। आपको आश्चर्य होगा कि बहुत सारे स्थान ऐसे थे, जहां पर भागीरथी में एक बूंद पानी नहीं था। पूरी नदी को सुंगों के अंदर डाल दिया गया था और सुंगों के अंदर डालकर फिर अगर, महाराज जी तो कम से कम एक धार्मिक व्यक्ति हैं और उनका आज का जो साफा है, वह तो स्वयं उनकी धार्मिकता को और भी प्रदर्शित करता है। मैं इस बात के लिए मॉफी चाहूंगा कि गंगा की शुद्धता, गंगाजल में अमृत का जो गुण है, वह एक दैवीय नदी तो है ही, इसमें कोई संदेह नहीं, लेकिन उसके साथ-साथ, नदी की धारा के साथ-साथ नदी के उस गुण के लिए दो बातें बहुत आवश्यक होती हैं। वह होती है एक भूमि और दूसरी भूमा। नदी की धारा जब तेजी के साथ चलती है तो भूमि उसकी गन्दगी को अवशोषित करती है। हम धरती मां को मां अचानक नहीं कहते हैं क्योंकि मां अपने बच्चे के साथ जिस प्रकार से बचपन से ही उसकी गन्दगी के साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करती, यह धरती माता उस जल के साथ करती है। उस जल के शोधन में जब आसमान से ऑक्सीजन का उसमें, जब वह नदी का जल पत्थरों से, चट्टानों से टकराता हुआ आगे बढ़ता है, ऑक्सीजन के साथ उसका एक-साथ समन्वय होता है, तो वह जल के प्रदूषण को दूर करके उसकी शुद्धता को बढ़ाता है, उसमें ऑक्सीजन की मात्रा को बढ़ाता है। इसलिए भूमि और भूमा नदी के प्रदूषण को मुक्त करने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। जब हम नदी को सुंगों के अंदर डालने का प्रयास करते हैं तो हम भूमि से उसका सम्बन्ध तोड़ देते हैं और भूमा से भी उसका सम्बन्ध तोड़ देते हैं। इससे तो वह स्वाभाविक रूप से प्रदूषित होगा ही होगा और आज यही उत्तराखंड में हो रहा है। सुंगों के अंदर पूरी गंगा को उड़ेल दिया गया, अब भागीरथी में एक बूंद पानी नहीं। इससे गंगा प्रदूषित होगी।

          दूसरी, बात मैं कहना चाहता हूं कि बांध बनाये जा रहे हैं, एक बांध नहीं, महोदया, कुछ बांधों की चर्चा यहां पर हुई, मैं बांधों की चर्चा आपके सामने करूंगा। जो कार्यरत परियोजनायें हैं, उसमें चिल्ला है, टिहरी की है, मनेरीभाली-1 है, मनेरीभाली-2 है और विष्णु प्रयाग है। ये पांच कार्यरत परियोजनायें हैं। जो निर्माणाधीन परियोजनायें हैं, उनमें कालीगंगा-1, कालीगंगा-2, कोटेश्वर, कोटली भेल-1ए, कोटली भेल-1बी, कोटली भेल-2, तपोवन विष्णुगाड, पाला-मनेरी, मद्महेश्वर, लोहारीनाग-पाला, श्रीनगर और सिंगोली-भटवाड़ी हैं। जो प्रमुख प्रस्तावित परियोजनायें हैं, जो 10 मेगावाट से ऊपर की हैं, उनमें अलकनंदा है, अस्सीगंगा-1 है, अस्सीगंगा-2 है, अस्सीगंगा-3, उत्यासू बांध, ऋषि गंगा, ऋषि गंगा-1, ऋषि गंगा-2, ककोरागाड, करमोली, कोसा, गौरीकुंड, गोहाना ताल, चुन्नी सेमी, जाडगंगा, जालनधरीगाड, झेलम-तमक, टिहरी पीएसएस, देवली, देवसारी बांध, दुना गिरी, तमक-लता, नंदप्रयाग लंगासू, न्यार, फाटा, बुआरा, बोवाला नंदप्रयाग, बंगरी, भिलंगना-1, भिलंगना-2, भिलंगना-3, भुंदर गंगा, भैंरोघाटी, मलारी, मांदनीगंगा, मिंग-नलगांव, मेलखेत, रामबारा, लता-तपोवन, वनाला और विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजनायें हैं।

अध्यक्ष महोदया :  अब आप अपनी बात समाप्त कीजिये।

योगी आदित्यनाथ : महोदया, इतनी परियोजनायें प्रस्तावित हैं और ये तो मैंने कुछ 10 मेगावाट से ऊपर की बतायी हैं। 350 अन्य प्रस्तावित परियोजनायें हैं, जिन्हें टेलीविजन चैनल ने एक बार दिखाया भी था कि किस प्रकार से इनमें भ्रष्टाचार है। यानी गंगा मैया को केवल उसके मायके में ही कैद करके और रेवती रमण सिंह जी ने ठीक कहा कि उसकी भ्रूण हत्या करने का प्रयास हो रहा है। इस देश की संस्कृति की भ्रूण हत्या करने का प्रयास हो रहा है। विकास के नाम पर यह सब हो रहा है। विकास के नाम पर इस प्रकार की स्थिति को बंद किया जाना चाहिए। महोदया, शरारत किस रूप में है, श्रीनगर के पास एक परियोजना बन रही है, धारी देवी प्रोजेक्ट श्रीनगर के पास बन रहा है।  वहाँ पर सिद्धदेवी का स्थान है धारीदेवी। मैं तो उम्मीद करता था कि महाराज जी इस बारे में बोलेंगे। 1986 में उस प्रोजैक्ट को स्वीकृति मिली थी और मात्र 63 मीटर ऊँचा उठाने के लिए मिली थी। लेकिन उनका मनमानापन देखिये कि उसको  95 मीटर ऊँचा कर दिया गया। आस-पास के दर्जनों गाँव और सैकड़ों हैक्टेयर भूमि को उसमें डुबा दिया गया और ऐतिहासिक सिद्धदेवी के स्थान को भी डुबाने की कोशिश हो रही है। जब इस मामले को यहाँ संसद में मैंने उठाया था, तो अगले दिन उस प्रोजैक्ट  का एक अधिकारी मेरे पास गोरखपुर में पहुँच गया था। मैंने कहा कि कैसे आए, तो उसने कहा कि मैं वहाँ से आया हूँ। मैंने कहा क्या मामला है? मैंने सुना कि वह उत्तराखंड से आया है। उत्तराखंड मेरी जन्मभूमि है। मैंने उसे बड़े प्यार से बैठाया। उसने कहा कि मैं धारीदेवी के प्रोजैक्ट से आया हूँ, उस पर कुछ बात करनी है। मैंने पूछा कि क्या बात है। उन्होंने कहा कि धारीदेवी का जो प्रोजैक्ट है, हम चाहते हैं कि  धारी देवी के उस स्थान को हम किसी पिलर से ऊँचा उठा देंगे और स्थान तो वैसे ही रहेगा, पिंडी स्थापित होनी है धारीदेवी की, उसमें कौन सी बड़ी बात है? आप लोग आंदोलन बंद करवा दीजिए, हम लोग वहाँ पर जैसे लोग कहेंगे, उस ढंग से वहाँ की योजनाओं को बना देते हैं। मैंने कहा कि मुझे एक बात बताइए। अगर तुम्हारे सिर को तुम्हारे धड़ से अलग करके तुम्हारे सिर को एक बड़े से डंडे पर टांगकर खड़ा कर दिया जाए तो क्या यह कहा जाएगा कि तुम यही हो? उसने कहा कि क्या बात कर रहे हैं? मैंने कहा, यही बात है। वह स्थान धारीदेवी का सिद्धपीठ पिन्डी है, जिसकी पूजा होती है और वह पूजा वहीं पर होगी, स्थान नहीं बदला जा सकता है। तुम अनावश्यक रूप से विकास के नाम पर यहाँ विनाश लाना चाहते हो। इसलिए मैं आपसे अनुरोध करना चाहूँगा कि यह आंदोलन अचानक नहीं हो रहा है। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : योगी आदित्यनाथ जी, अब आप समाप्त करें। आपका समय समाप्त हो गया है। आपकी पार्टी से और माननीय सदस्य भी बोलने वाले हैं।

योगी आदित्यनाथ :  मैं अंतिम मुद्दे पर आ रहा हूँ।

अध्यक्ष महोदया : फिर वे नहीं बोल पाएँगे। अब आप समाप्त करिये। आप उनका समय ले रहे हैं।

योगी आदित्यनाथ :  महोदया, मुझे केवल यह कहना है कि जिस कार्य को अंग्रेज़ नहीं कर पाए थे, हरिद्वार में 1916 में अंग्रेज़ों ने गंगा की धारा को मोड़ने और रोकने का प्रयास किया था। लेकिन उस समय देश के धर्माचार्यों ने आंदोलन किया था, देश के राजा-महाराजाओं ने उस आंदोलन में सहयोग किया था और पंडित मदनमोहन मालवीय जी के नेतृत्व में अंग्रेज़ों को बातचीत करने के लिए सामने आना पड़ा था और यह तय हुआ था कि गंगा की अविरलता और निर्मलता को बाधित नहीं किया जाएगा, लेकिन आज गंगा की अविरलता और निर्मलता को क्यों खंडित किया जा रहा है? क्या इसके पीछे साजिश नहीं है? इसलिए मैं आपसे अनुरोध करना चाहूँगा कि गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक जितने भी हमारे तीर्थ स्थल हैं, इन सारे तीर्थ स्थलों की महत्ता गंगा के कारण है। गंगा नहीं रहेगी तो ये तीर्थ स्थल नहीं रहेंगे, भारत नहीं बचेगा, भारत की संस्कृति नहीं बचेगी। ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : अब हो गया। आप कितना सुन्दर बोले हैं। अब आप समाप्त कीजिए।

योगी आदित्यनाथ :  महोदया, मैं अंतिम बात बोल रहा हूँ। आप केवल दो मिनट का समय दीजिए।  ...( व्यवधान)

          मैं आपसे अनुरोध करना चाहूँगा कि यह नदी केवल हमारे लिए जल का ही स्रोत नहीं है, अपितु इससे हमारा एक आत्मीय संबंध है। यह हमारी आस्था है, हमारी संस्कृति है, हमारे जीवन और इस देश की आजीविका का आधार भी है। आज गंगा का अस्तित्व संकट में है। देश का धार्मिक जगत ही नहीं, देश का कृषि जगत भी इसके लिए आंदोलन कर रहा है, इसके खिलाफ लगातार आंदोलन हो रहे हैं। हम माननीय प्रधान मंत्री से इस संबंध में प्रभावी कदम उठाने की अपील करते हैं। हमारी मांग है कि हम विकास की किसी योजना के विरोधी नहीं हैं, लेकिन गंगा की अविरलता और गंगा की निर्मलता या उसकी सहायक नदियों की अविरलता और निर्मलता में जो भी विकास बाधक बनेगा, हम उस विकास के विरोधी हैं। इसलिए हम अनुरोध करना चाहेंगे कि सरकार प्रभावी कदम उठाकर इस सदन को और देश को अवगत कराए कि गंगा की अविरलता और निर्मलता में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ की अनुमति सरकार किसी को नहीं देगी। इस विश्वास के साथ मैं एक बार पुनः आपका आभार व्यक्त करता हूँ कि आपने इस विषय को यहाँ पर चर्चा के लिए लिया और इस महत्वपूर्ण विषय पर अपने मार्गदर्शन में ही चर्चा करा रही हैं। मैं यह आशा करता हूँ कि इस विषय का ठोस परिणाम सामने आएगा, इस विश्वास के साथ मैं आपका धन्यवाद करता हूँ।

अध्यक्ष महोदया : श्री विजय बहादुर सिंह।

श्री विजय बहादुर सिंह (हमीरपुर, उ.प्र.): महोदया, मेरा संख्या 295 है, कृपया मुझे यहाँ 290 से बोलने की अनुमति दी जाए।

अध्यक्ष महोदया : यहाँ क्या खासियत है?

श्री विजय बहादुर सिंह : नहीं, यहाँ ये बैठे हैं, ये भी बोलना चाहते हैं। हम लोग हाफ-हाफ टाइम देना चाहते हैं। ...( व्यवधान)

MADAM SPEAKER: I do not understand. You go back to your seat. Which is your seat? You please go back to your seat.

…( व्यवधान)

श्री विजय बहादुर सिंह : मैडम एक मिनट का टाइम लगेगा। ...( व्यवधान)

श्री कीर्ति आज़ाद (दरभंगा):आप वकील होकर ऐसा करते हैं? ...( व्यवधान)

श्री विजय बहादुर सिंह : हम क्या हैं, हम अभी बताएँगे । ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : अब ठीक है। उनको बोलने दीजिए। आप बोलिये।

श्री विजय बहादुर सिंह (हमीरपुर, उ.प्र.): अध्यक्ष महोदया, मैं इसका कॉम्पलीकेटिड विशलेषण नहीं करना चाहता हूं, लेकिन मैं इलाहाबाद में वकालत करता था और पिछले 30-40 साल से गंगा का हाल देख रहा हूं। गंगा के प्रदूषित होने के तीन रीज़न मुझे समझ में आते हैं। पिछले पचास साल में बड़ी संख्या में अर्बनाइजेशन और इंडस्ट्रीलाइजेशन हुआ है। इसके कारण सारा सीवेज गंगा में जा रहा है। इसके कारण गंगा देश की भोली नदी न होकर देश का सबसे बड़ा ड्रैनेज बन गई है। मैंने इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक पीआईएल फाइल की थी, वह पिछले आठ साल से चल रही है। कानपुर से जब गंगा आती है तो फतेहपुर के बाद गंगा में 80 प्रतिशत पानी कानपुर की टैनरी से आता है। इसके कारण मछलियां जिंदा नहीं रह पाती हैं। कई पोइट्स ने लिखा है कि गंगा का कलर व्हाइट था और जमुना का कलर ब्लू था। Blue stands for romanticism and white stands for spiritualism. लेकिन अब व्हाइट प्रीचुअलिज्म ब्लैक प्रीचुअलिज्म हो गया है। इस पर मैं जायसी की एक पोयटरी भी बताऊंगा। हमने कल आपका भाषण प्रारम्भ और अंत में सुना। पिछले तीस साल में इतना बढ़िया भाषण मैंने नहीं सुना। यह सही बात है।

MADAM SPEAKER: Thank you.

श्री विजय बहादुर सिंह : हम हकीकत बता रहे हैं। इतना बढ़िया आपने विश्लेषण किया है, अगर उसका पांच परसेंट भी कोई समझ जाए तो भारत की संस्कृति और पार्लियामेंट ठीक हो जाए।...( व्यवधान) अब बोलने नहीं देंगे।...( व्यवधान) वर्ष 1985 में गंगा एक्शन प्लान बना। 418 करोड़ रुपए खर्च किए गए। उसके बाद जीएपी-2 बना और अब तक साढ़े दस सौ करोड़ खर्च हुए, जैसा कि योगी जी ने कहा। वर्ष 1985 से यह रिपोर्ट आ रही है कि गंगा और डर्टी गई है। नेशनल गंगा रीवर बेसिन एथॉरिटी बनी, जिस पर 22 सौ करोड़ रुपए का खर्च आया। लेकिन गंगा की पोजीशन लगातार खराब होती गई। इसके तीन कारण हैं। पहला, सरकारी उपेक्षा; दूसरा कारण, सामाजिक और तीसरा, व्यक्तिगत। आजकल गांवों में दशहरा नहीं होता है, सिर्फ दुर्गा पूजा होती है। हजारों मूर्तियां दुर्गा पूजा की समाप्ति पर गंगा में बहा दी जाती हैं। किसी समाज ने, न हमने, न किसी ने अपना हाथ उठाया कि इन सामाजिक कुरीतियों को समाप्त किया जाना चाहिए। जितने जानवर मरते हैं, सब उसमें बहाए जाते हैं। लेकिन समाज उसके खिलाफ खड़ा नहीं होता है। एक नया फैशन अपने भारत में आ गया है कि हर बुराई को भारत सरकार या प्रदेश की सरकार पर डालना। इसको छोड़ना पड़ेगा।  

          जब कुम्भ मेला आता है तो हम लोग रिट फाइल करते हैं। रिट फाइल में क्या होता है? इसमें यह होता है कि दो-चार डैम का जो सिंचाई का पानी है, उसे छोड़कर उसका जल स्तर ऊपर कर देते हैं। लेकिन, भारत में किसी साधु-सन्त ने यह आवाज नहीं उठायी कि कोई भी मरा हुआ जानवर हम गंगा में नहीं फेंकेंगे, कोई भी फूल-पत्र जो फेंकते हैं, वह नहीं फेंकेंगे, और कोई शव नहीं फेंकेंगे। ऐसी कोई आवाज उठती ही नहीं है। अगर उठती भी है तो समाज का उस पर रिएक्शन नहीं आता।

          मैं यह चाहता हूं कि यह थ्री-एक्शन प्लान होना चाहिए, सिर्फ़ रुपया दे देने से नहीं होगा। अब जैसे इलाहाबाद की बात मैं बताता हूं। जब मैं इसमें अधिवक्ता के रूप में नहीं था तो गंगा की ऑथोरिटी का कोई दफ्तर ही नहीं मिलता था। रेवती रमण सिंह जी बिल्कुल सही बता रहे थे कि उनका कार्यालय ही नहीं मिलता था। वह तो नयी-नयी गाड़ियां दिखाई पड़ती हैं, तब लगता है कि गंगा प्रदूषण की कोई ऑथोरिटी जा रही है। उसके बाद फिर गायब हो जाते हैं। मैं यह कहना चाहता हूं कि जब तक समाज व्यक्तिगत रूप से और सरकारीकरण का सामंजस्य नहीं होगा, तब तक यह नहीं होगा।

          महोदया, वर्ष 1910 से आई.आई.टी. को यह प्रोग्राम दिया गया। हिन्दुस्तान की सबसे इंटेलेक्चुअल संस्था आई.आई.टी. है। पर, इसके तीन-चार साल हो गए हैं, मगर, अभी आई.आई.टी. की कोई रिपोर्ट ही नहीं आयी है। अगर आयी भी है तो हमें नहीं मालूम। हो सकता है कि मंत्री जी को मालूम हो। यह टेक्नीकल बात है।

          मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि अगर इसको ठीक करना है तो समाज को भी आगे आना होगा। अब जैसे आज रिपोर्ट में आया है कि 3000 बिलियन लीटर सीवेज कानपुर में आ रहा है और अभी तक एक हजार मिलियन लीटर सीवेज का ट्रीटमेंट हो रहा है। दो हजार मिलियन प्रदूषण रोज गंगा में जा रहा है।

          महोदया, मैं आपको बताना चाहता हूं कि कुंवर साहब गवाह है, इलाहाबाद में अगर पानी प्लेट या बीकर में रखें तो यह बिल्कुल ब्लू वाटर है। इतना गंदा पानी है कि वह क्लियर दिखाई पड़ता है। हमारे हाई कोर्ट में रिट पेंडिंग पड़ी हुई है, अभी उसमें डेट लगी हुई थी। उसमें यह रिपोर्ट आयी है कि 87 प्रतिशत पानी गंदा और प्रदूषित है, उसका ट्रीटमेंट ही नहीं होता।

          मैं अपना समय कम कर रहा हूं क्योंकि हमारे सांसद श्री गोरख नाथ पांडेय गंगा जी के किनारे रहते हैं तो इन्होंने कहा कि मैं बोलूंगा। इनके गांव से गंगा बहती है। मैडम, यह सुन लीजिए, शायद आप इसे अप्रेशिएट करें।

उम्र भर गालिब यह भूल करते रहे, कि धूल चेहरे में थी और आईना साफ करते रहे             अगर गलती है तो इस प्रदूषण की गलती समाज की है, समाज के व्यक्ति की है। अगर हम लोग अपने यहां का सीवेज प्लांट और अपने यहां की गंदगी गंगा में न डालें तो 80 प्रतिशत गंगा प्रदूषण मुक्त हो सकती है। धार्मिक श्लोक पढ़ने से यह प्रदूषण दूर नहीं हो सकता है।

          मैं ज्यादा बात न करके यह कहना चाहता हूं कि इन तीनों स्ट्रैटजी को देखा जाए। आप एक टास्क फोर्स बना दीजिए। उस टास्क फोर्स की रिपोर्ट में छः महीने के अन्दर जो भी गंगा के लिए एक्शन हो, यहां पार्लियामेंटरी कमेटी में दाखिल कर दिया जाए और फिर उस पर बहस की जाए।

          इसी के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं और मेरा बाकी समय श्री गोरख नाथ पांडेय जी को दे दिया जाए।

 

श्री शरद यादव (मधेपुरा):अध्यक्ष जी, यह बहस गंगा की जो दुर्दशा है, उससे शुरू हुआ है। मैं आपसे यह निवेदन करूंगा कि इस देश में दो हिस्से हैं। एक विंध्य के नीचे हैं जहां कृष्णा, कावेरी, सरस्वती और तुंगभद्रा है। जो विंध्य के नीचे नदियां हैं वहां भी आबादी रहती हैं और वहां के जो घाट हैं, वे सभी आज भी दर्शनीय हैं। विंध्य के ऊपर जो भाग है, उसमें नर्मदा और दक्षिण की कुछ नदियों को छोड़ कर सबका पानी अरब सागर में ही जाता है।चम्बल का हो, यमुना का हो और जो हिमालय है, सतपाल महाराज जी, वह दुनिया का सबसे ज्यादा कम उम्र का पहाड़ है। हिन्दुस्तान की सारी बड़ी नदियां पाकिस्तान से लेकर बंगलादेश तक सब को अगर आप मिला देंगे तो लगभग 90 करोड़ से कम आबादी नहीं होगी, इन सारी नदियों का स्रोत हिमालय है। अगर मैं आपसे यह कहूं कि जो प्रकृति है और एनवायर्नमेंट पर जो बहस चली हुई है, यह दुनिया खतरे में है। इतने खतरे में है कि जब सतपाल महाराज जी बोल रहे थे, मुझे तो रेवती रमण सिंह जी ने आज बताया कि ये प्रवचन करते हैं, कथा करते हैं तो इन्होंने जिस तरह से अभी बोला, यह तरक्की, विज्ञान और आविष्कार, इनसे दुनिया बढ़ी जरूर है, इन्सान के सुख जरूर बढ़े हैं, लेकिन आने वाली दुनिया बचेगी नहीं। जो आप कह रहे हैं, हिमालय तो कच्चा पहाड़ है, यह पूरा का पूरा पाकिस्तान से लेकर बंगलादेश तक सारा हिमालय का इरोज़न है, हमने यह अध्ययन किया हुआ है, हम राजनीति में तो थे नहीं, हम तो बेसीकली इंजीनियर हैं तो हमको मालूम है कि यह कैसे बना है और कब बना है, लेकिन वह आज की बहस का मुद्दा नहीं है, लेकिन हिमालय का सीना ही रास्ता है, तभी 90 करोड़ लोग, यानि छठा हिस्सा आबादी दुनिया की हिमालय के गर्भ से निकले पानी पर पलती है। चीन की तरफ कितना पानी जाता है, इसका कोई हिसाब मेरे पास नहीं है, लेकिन अभी रेवती रमण जी ने और योगी जी ने जो बात कही, गंगा के साथ उन्होंने काफी जूझने का काम यहां किया है।

          मैं आपसे कहना चाहता हूं कि इन्सान की सबसे बड़ी जरूरत पल-पल की सांस है, पानी की भी जो तासीर है,  उसे  भी प्राणवायु चाहिए उसके बगैर वो नहीं है, सतपाल महाराज जी। उसकी जो निर्मलता बढ़ती है, वह धरती से भी और आकाश से जो आक्सीजन है, उन दोनों के मेल से बढ़ती है। बड़े पैमाने पर गंगा, चम्बल, यमुना और बाकी नदियों का नाम योगी आदित्यनाथ जी ले रहे थे, आपके उत्तर भारत की बहुत सी नदियां हैं, लेकिन नर्मदा जो है, वह आज भी सारी नदियों से ठीक है। बिल्कुल ठीक है, वह नहीं है। हां, वह गंगा और हिमालय से भी पुरानी है, वह अमरकंटक से निकलती है, लेकिन बिल्कुल ठीक है, मैं यह नहीं कह रहा हूं, लेकिन बाकी जो सब नदियां हैं, आपकी सिन्धु और कुछ नदियां साउथ की हैं, जो आपकी अरब की खाड़ी की तरफ जाती हैं, हिन्दुस्तान तो अरब सागर की तरफ टिल्टेड है। इन्सान की पल-पल की जरूरत सांस है, लेकिन दिल्ली में वह सांस भी खराब हो गई है और प्रकृति जल्दी किसी को छोड़ती नहीं है। आप सासाराम चले जाइये, मैं जब मधेपुरा जाता हूं तो मेरी भूख बढ़ जाती है, सब्जी का स्वाद बढ़ जाता है और जब मैं दिल्ली में आता हूं तो पूरा का पूरा स्वाद बदल जाता है।...( व्यवधान) पेट खराब नहीं, खाने की तबियत ही नहीं होती। प्रकृति से बड़ी कोई चीज़ नहीं है। गांधी जी का कोई अर्थ नहीं है, एक ही अर्थ है, वे कहते थे कि जो प्रकृति है, नेचर है, उसके साथ दोस्ती रखो, वही दुनिया बनाएगी, वही दुनिया बढ़ाएगी।

          इंसान को हवा पल-पल चाहिए, पानी के बिना भी आदमी दो-तीन घंटे से ज्यादा नहीं रह सकता है।  यह जो धरती है, इसे बड़े पैमाने पर हिमालय ने बनाया। जिसे आप कह रहे हैं कि सबसे उपजाऊ जमीन है, यह हिमालय के गर्भ से ही निकली है।  5-6 घंटे से ज्यादा की भूख हड़ताल मत करो, गांधी जी करते थे, वह छोड़ दो, भूख हड़ताल करोगे, तो पांच-दस दिन बाद हर चीज बिगड़ जाएगी।  आदमी को हर 6 घंटे में पेट पूजा चाहिए।  जल, जंगल और धरती, इनके लिए बहुत लोगों ने आंदोलन किए।  गंगा का यह हाल है। आप कहते हैं कि इसे मिलाकर करना चाहिए, मैं योगी जी की बात सुन रहा था और कुंवर साहब की बात सुन रहा था, आज इन्होंने मुझसे आग्रह किया कि मैं जरूर उपस्थित रहूं।  इस मामले में इन दोनों का ज्यादा गहरा अध्ययन है।  मेरा इसमें ज्यादा गहरा अध्ययन नहीं है।  यह पहाड़ के आदमी हैं और यह संगम के स्थान प्रयाग के हैं, ये दो गंगा के बड़े ठिकाने हैं।  फिर काशी का नंबर आता है, फिर पटना का नंबर आता है और फिर गंगा सागर में बिला जाती है। ...( व्यवधान) साउथ में सरस्वती अभी जीवित है। साउथ में सरस्वती बड़ी नदी है।  यह मेरी विनती है कि जिन लोगों ने चिंता व्यक्त की है तो मैं सोचता हूं कि इस पर बहुत विवाद हो चुका।  जो कई सूबे बने, वह लोगों की इच्छा थी, इसलिए बने।  भाषाई सूबे बन गए।  उत्तर भारत में तो कोई सूबा बनने का सवाल नहीं था, यहां तो हमने बंटवारा किया।  बंटवारा हो गया, उस पर मैं ज्यादा नहीं जाता।  मैं इतना कहना चाहता हूं कि सारे देश में कई समस्यायें हैं, कई चुनौतियां हैं, लेकिन यह बड़ी चुनौती हो गयी है, क्योंकि नदी कोई सीमा नहीं पहचानती है, उसके खंड-खंड नहीं किए जा सकते हैं।  दुनिया भर में यह प्रचालन है लेकिन हमारे देश में ऐसी हालत है, पाकिस्तान-हिंदुस्तान के बीच में जो झगड़ा है, उस पर तो मैं नहीं जाता, लेकिन बहुत बड़ा हिस्सा हमारे पास, हमारे पीछे है और सबसे बढ़िया इस देश की कोई चीज मुझे पसंद आती है, तो नदियों के नाम इतने खूबसूरत हैं, स्वर्णरेखा, कावेरी, गंगा, आदि ये नाम इतने अच्छे हैं, जिन नामों को लेकर ही आदमी के अंदर स्फूर्ति आ जाए, ऐसे इनके नाम हैं।  ...( व्यवधान) मैं आपसे निवेदन करूंगा, यहां सब सूबों के लोग बोल रहे हैं, सतपाल महाराज जी आपके सूबा जो है, वह बन तो गया, लेकिन उसकी इकॉनामी का बड़ा भारी काम पानी से जुड़ा हुआ है। इसके कारण आप चिंतित हैं।  नदी जो है, उसका कोई उत्तराखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल से वास्ता नहीं है, उसमें बहुत बड़ा हिस्सा बाकी लोगों का भी है।  चंबल जो है, वहां आप जाएंगे तो देखेंगे, वह आपके पास भी जाती है, चंबल में पैसा डाल देंगे, तो उस पैसे की झलक दिखायी पड़ती है।  जो मगर है, उसे देखने का मजा ही चंबल में अलग है।  लोग कहते हैं कि चंबल का पानी पीने के बाद आदमी पुरूषार्थी हो जाता है।      

          मैं यही निवेदन करना चाहता हूं कि बहुत सी बातें, बहुत से सूबे के लोग बोल रहे हैं।  मैं आपसे कहता हूँ कि जल जीवन है, इससे बड़ा सत्य कोई नहीं है, जो हवा है, आक्सीजन से बड़ा सत्य कोई नहीं है और धरती से बड़ा कोई सहारा नहीं है, जो हर चीज देती है।  हमने जंगल काट दिए। हमने सारे देश की जमीन को, जो सबसे उपजाऊ है, उसको कंक्रीट का जंगल बना दिया।   नदियां जिनके लिए लोगों का पूजा और इबादत का मन है। यदि नदियों का राष्ट्रीयकरण नहीं होगा तो मैं आपको कहता हूं कि इन नदियों को कोई बचाने वाला नहीं है। इस देश को आगे कोई तारने वाला नहीं है। हाथ  में शक्ति होनी चाहिए। कुछ चीजें हैं जो दुनिया बचा कर रखती हैं उनमें से नदी एक चीज है। हमारे यहां तो नदी किनारे ही सभ्यता  और संस्कृति हैं। जितनी तरह की चीजें हैं सब नदी के किनारे हैं। आप के सारे लोक गीत नदियों से ही खड़े हुए हैं। वे नदियों के किनारों से ही बने हैं। मैं आप से अंत में यही निवेदन करना चाहता हूं।...( व्यवधान) *जयराम रमेश जी थोड़ा-बहुत काम किए थे। यानी थोड़ी-सी हवा फेकी थी। उस हवा से बाल भी नहीं छुए गए थे। बाजार के प्रति ऐसी मोह-माया है, अब इस जमाने में लोग कहते हैं कि मेट्रो में बड़ी ईमानदारी होती है। मैं आपसे यह कहूं कि मेट्रों में इसलिए ईमानदारी है कि हम तो सारी सभ्यता, मक्का-मदीना और सारी चीज यूरोप को मान रहे हैं। आक्सफोर्ड तो ऐसा लगता है कि इस देश के जो पढ़े-लिखे लोग हैं जिनकी जिंदगी अजीब तरह की हो गई है वे मानते हैं कि वह हमारा तीर्थ है। वहां मेट्रो है तो यहां का आदमी मेट्रो के लिए ठीक भी हो जाता है क्योंकि मेट्रो की ललक इस सभ्यता की ललक नहीं है। बाकी चीज आप कह रहे हैं कि ये बहुत ठीक बनेंगे। सतपाल महाराज आप भ्रष्टाचार को जानते हैं कि देश में कदम-कदम पर पानी है और कदम-कदम पर सब चीज है। कदम-कदम पर भ्रष्टाचार है। यह ऐसी चीज है कि इस पर आज बहस करने की जरूरत नहीं है। कोई डैम ठीक नहीं बनेगा। जो डैम बने भी हैं वे अजीब-अजीब बने हैं। हिमालय कच्चा पहाड़ है उसमें डैम बनाना और उसको छेड़ना अच्छा नहीं होगा। इसको छेड़ने में गंगा सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही है। उत्तराखंड में इतनी सहायक नदियां हैं, आपने ठीक कहा कि प्रयाग पर और आप जो नाम ले रहे थे वहां गंगा बनती है। मैं इतनी गहराई से गंगा के पूरे इलाके को नहीं जानता हूं। मैं आपसे यही कहना चाहता हूं कि सदन में जो एक राय है, रेवती रमण जी सभी नदियां एवं गंगा बचाना है तो पानी का राष्ट्रीयकरण होना चाहिए तभी सदन के हाथ में आएगा और तभी बात बनेगी ऐसे बात नहीं बनेगी। गंगा ऐक्शन प्लान सफल नहीं होगा। भारत सरकार कहेगी कि राज्य सरकारें कर रही हैं और राज्य सरकारें कहेंगी कि भारत सरकार कर रही है। कहीं एक जगह एकाउंटिबलिटी करनी पड़ेगी। एक जगह शक्ति हाथ में देनी पड़ेगी, पावर देना पड़ेगा। इससे भी बड़ा कोई सवाल है। इस सवाल के लिए सब लोग तैयार हो कि इसका राष्ट्रीयकरण होना चाहिए। हमने रेल का राष्ट्रीयकरण कर दिया। हमने बहुत-सी चीजों का राष्ट्रीयकरण किया है। यह कंक्रीट लिस्ट में और सुबों के हाथ में नहीं रहना चाहिए। तब तो आपके भाषण का मतलब है। वह कर्म से जुड़ता है और नहीं तो गाल बजाओ, खुब चिल्लाओ, कुछ नहीं होगा। जब गंगा ऐक्शन प्लान बन रहा था तो मैंने बड़े इंजीनियर, जो मेरे साथ पढ़ता था से कहा था कि तुम्हारी ये सब बकवास नहीं चलेगी इससे कुछ नहीं होगा। कुछ ऑफिसर नियुक्त हो जाएंगे और दफ्तर खुल जाएंगे। ये दफ्तरों के बारे में पोल बताएं। गंगा को बचाने वाले कुछ लोग घूम रहे हैं। आप आंदोलन कह रहे हैं। आप कह रहे हैं कि साधु बैठे हैं। ...( व्यवधान) इस देश के आदमी हैं। आपको पता नहीं है। इसमें आपकी जो खराबी है उसको बोलने का काम करो तो कान खड़े हो जाएंगे जैसे हिरण के कान खड़े होते हैं। लेकिन अच्छी बात करो तो इनके कान लंबे हो जाते हैं। यदि आपको इस देश की नदियों को बचाना है तो सीधी-सीधी बात है कि इसका राष्ट्रीयकरण होना चाहिए।

          अध्यक्ष महोदया जी, ...( व्यवधान)*  जयराम रमेश जी थोड़ा-बहुत हलचल वाला आदमी था।..( व्यवधान) यह भली महिला हैं। प्रधानमंत्री, गंगा प्लान की जो मीटिंग हुई थी उसमें आपको पता नहीं है कि जो लोग गंगा के लिए गए थे वे चुप ही बैठे रहे।...( व्यवधान) वे मौन बैठे रहे।...( व्यवधान)

श्रीमती जयंती नटराजन :इन्हें बोलने दीजिए। He is anti-women....( व्यवधान)

श्री शरद यादव (मधेपुरा):उन बेचारी का कोई दोष नहीं है। उनकी जगह बहुत मजबूत आदमी रख दीजिए, कुछ नहीं होगा।...( व्यवधान) मैं आपसे यही निवेदन करूंगा कि यदि इस देश की सारी नदियों को बचाना चाहते हैं तो राष्ट्रीयकरण के सिवाए कुछ नहीं होगा। उसके बाद यह सदन के हाथ में जाएगा और सदन उसकी रक्षा करने का काम करेगा।

अध्यक्ष महोदया : मंत्री जी पर जो टिप्पणी की गई है, वह रिकार्ड में नहीं जाएगी।

     

 लालू प्रसाद (सारण): मैडम, मैं रेवती बाबू को धन्यवाद देना चाहता हूं कि इन्होंने गंगा की पवित्रता, और गंदगी के मामले में बहुत पहले सवाल उठाया था। आपने उसका संज्ञान लिया और सदन को आश्वस्त किया था कि हम इस पर अलग से बहस करवाएंगे। आज आप स्वयं यहां बैठी हैं। कल आपका यहां, वहां जो भाषण हुआ, आपसे अनुरोध है कि आप आगे से हिन्दी में बोला कीजिए। जहां कलाकारों में मुद्गल जी फर्स्ट हुईं, वहां बोलने में आप फर्स्ट हुईं। इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देना चाहता हूं।

अध्यक्ष महोदया : बहुत-बहुत धन्यवाद।

…( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद : मैं आपको चैम्बर में धन्यवाद देने गया था, लेकिन आप आई नहीं थीं। आप सबकी बात सुन रही थीं।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  लालू जी, आपका बहुत धन्यवाद। मगर वहां हमारी महामहिम राष्ट्रपति जी उपस्थित थीं, उप राष्ट्रपति जी थे।

…( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद : वे तो राष्ट्रपति हैं। लेकिन आपका जो भाषण हुआ, हम इसमें कोई भेदभाव नहीं कर रहे हैं। आपने काम शुरू किया, इसलिए सबने हिन्दी में बोलना शुरू किया।

          गंगा को हम मां बोलते हैं। आप हमारे राज्य से आती हैं और गंगा मैया की आराधना खासकर महिलाएं, ईस्टर्न यूपी से लेकर दक्षिण भारत के लोग भी हरिद्वार आते हैं। गंगा नैशनल रिवर है। गंगा दुनिया में लॉगैस्ट है।...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया : आप बोलिए। इसमें कोई बात नहीं है।

…( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद : महोदया, हमारे धर्म ग्रंथों में देवताओं के महादेव, उत्तर दिशा में सब देवी-देवता हैं, शंकर भगवान की जटा से गंगा निकली है। यह मामूली बात नहीं है। गंगा को हम मां बोलते हैं। यह सबके लिए जीवन धारा है। यह अमृत जल है और हमने गंगा मां को क्या बना दिया है। गंगा को हमने तीन खंड में खंडित कर दिया। गंगा नदी उपनी गंगा हिमालय और मध्य और निचली में फरक्का, बिहार से लेकर हम गंगा मां को तीन खंड में देखते हैं। हमने मां को तीन जगह बांट दिया है। जल को बांधकर रख दिया है।        हमारे राज्य में एक कलाकार श्री रामायण तिवारी थे। शत्रुघ्न सिन्हा जी जानते होंगे। आपको याद होगा। उन्होंने गंगा मां पर एक फिल्म बनाई थी - गंगा मैया तोहे पिहरी चढ़इबो। सैंया से कब रे मिलनवा  हो रहा।  मायने यह है कि महिला का पति कहीं गायब हो गया, तो उसने मां गंगा से प्रार्थना की कि आपको हम पियरी चढ़ायेंगे। आप हमारे पति से मिलन करा दीजिए, खोज कर पहुंचा दीजिए और उस महिला की सब इच्छा पूरी हुई। ...( व्यवधान)

श्री शत्रुघ्न सिन्हा (पटना साहिब):  श्री विश्वनाथ शाहबादी जी ने वह फिल्म बनायी थी कि हे गंगा मैया तुहे पियरी चढ़ावे। ...( व्यवधान) श्री रामायण तिवारी उसमें काम कर रहे थे। ...( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद :   वे काम कर रहे थे, तो हम उन्हीं का नाम लेंगे। ...( व्यवधान) डायरेक्टर कोई भी हो, लेकिन काम तो तिवारी जी ने किया।...( व्यवधान) ठीक है, काम किया था। गंगा और यमुना, दोनों  तीज की हम बात करते हैं, लेकिन आज गंगा को तीन खंड में बांटकर रखा गया है।  ऊपर की गंगा को हिमालय रीजन  में बांध लिया। एकदम ऊंचा स्थान बना दिया, बांध बना दिया। रेवती बाबू बोल रहे थे कि कई बांध फिर नीचे नरोढ़ा तक बन गये। उत्तर प्रदेश के नरोढ़ा तक गंगा के पानी को बांध कर रखा गया है। हम कहना चाहते हैं कि शरद जी, आपको जयंती नटराजन जी को कम आंकना नहीं चाहिए कि यह हलचल नहीं करेंगी। ...( व्यवधान) जयंती नटराजन जी हलचल से पैदा हुई हैं। ...( व्यवधान) हम लोगों की जो अपेक्षा है कि गंगा मैया को ...( व्यवधान) I  am appreciating you Madam.

SHRIMATI JAYANTHI NATARAJAN: He does not like women. I know he is anti-women.

SHRI LALU PRASAD : I am a convenor of women. ...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया :  लालू जी, आप गंगा मैया पर बोलिये।

…( व्यवधान)

श्री लालू प्रसाद :   अध्यक्ष महोदया,  हमने आज दो संतों का भाषण सुना--एक गोरखपुर वाले सांसद योगी आदित्यानाथ जी का और दूसरा सतपाल महाराज जी का। वे कल दूसरी पगड़ी पहने हुए थे, आज केसरिया रंग की पहन कर आये हैं। ...( व्यवधान) भारत का रंग है, तो अच्छा है। ऐसे रंग आप बदलते रहिए। ...( व्यवधान)

          महोदया, दोनों संतों से हमें उम्मीद थी कि गंगा के विषय में इन्होंने अध्ययन किया होगा, लेकिन ये कहीं से कहीं चले गये। पता नहीं ये लोग क्या प्रवचन देते हैं?

          मैडम, आज हमारी गंगा मां सूख रही है। आज युमना मां, कंस की राजधानी मथुरा, ‘कंस मार विध्वंस किया, गोकुल-मथुरा राज किया’। कृष्ण की भूमि मथुरा में चले जाइये, आज यमुना हमारी मां, जब वासुदेव जी का आठवां पुत्र पैदा हुआ, तो यमुना हमारी मां इंतजार कर रही थी कि कब कृष्ण के चरण यहां पधारेंगे। वह इंतजार कर रही थी। जब कृष्ण को छिपाने के लिए ले जाया जा रहा था, तो कृष्ण भगवान ने हंसते हुए अपना पैर आगे कर दिया, तो यमुना धन्य-धन्य हो गयी। आज उसकी क्या हालत है? देश भर से हिन्दू धर्म को मानने और समझने वाले लोग यहां आते हैं। मैं कई बार गया। उसके अंदर नौ-नौ नाले बह रहे हैं। आप यहां से लेकर 22 किलोमीटर तक जाकर देखिये कि यमुना की क्या स्थिति है? उसे देखकर हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। आपको मालूम होगा कि अगर यमुना का पवित्र जल नहीं होता, तो शाहजहां उस किनारे पर ताजमहल नहीं बनाते। हमारे जो पुराने राजे-महाराजे थे, वे गंगा-यमुना का जल पीते थे। लेकिन जब औरंगजेब, शहजहां के चार बेटे--दारा, शुजा, औरंगजेब, मुराद--जब शाहजहां बुजुर्ग हुए, तो वहां पर उन्हें गद्दी के लिए कैद कर लिया। उनका बेटा औरंगजेब, जिसे हम भारतीय इतिहास में निर्दयी कहते हैं। उसने बाप को कैद किया और यमुना के पानी के लिए भी तरसता रहा। हम लोग विद्यार्थी रहे हैं। हमने पोलिटिकल साइंस और हिस्ट्री को पढ़ा है। यमुना के पवित्र जल की खातिर औरंगजेब तड़पा रहा था। शाहजहां ने क्या कहा था, उसने कहा था हिन्दू लोग गंगा का जल पीते हैं और एक मेरा बेटा औरंगजेब है कि जिस यमुना के पानी को सियार और कूकुर पीकर अघाते हैं, पेट भरते हैं, मेरा बेटा यमुना के एक बूंद पानी के तरसा रहा है। यह इतिहास है, यमुना-गंगा का इतिहास है। आप बक्सर से आती हैं, लोगों की अपेक्षा है। बिहार के बाद सारी गंगा सूख गई है। मैंने यही मांग की है और माननीय प्रधानमंत्री जी ने घोषणा की थी कि गंगा  राष्ट्रीय नदी है, गंगा पर सबका हक है, उसके इर्द-गिर्द में रहने वाले लोगों का, इस पानी का इस्तेमाल मछुआरे से लेकर सब कोई करते हैं। जब बांग्लादेश से पानी का बटवारा हुआ, उस समय कहा गया था कि बिहार को पानी के लिए हम तकलीफ नहीं होने देंगे। लेकिन बिहार में, गंगा पर आप जाइए। जहां दुनिया में दुर्लभ है, सिंगापुर हम जाते हैं देखने, डॉलफिन फिश को देखने जाते हैं, आपके यहां पटना में हजारों सैलानी दुनिया से आए, पटना कॉलेज के सामने डॉलफिन मछली का स्टॉक हमारे पास है। भागलपुर में है। आज वहां नाले बह रहे हैं जिससे आज हमारा डॉलफिन धीरे-धीरे खतरे में हैं। यह दुर्लभ प्राणी हमारे बीच से खत्म हो रहा है। हम लोगों ने क्या इंतजाम किया, क्या हालत बना दी है? यह कहा गया था कि फरक्का बांध के बाद बिहार को हम तकलीफ नहीं होने देंगे। इस गंगा में बागमती, अघवारा, गण्डक आदि विभिन्न नदियां पहाड़ों से आकर मिलती हैं। ...( व्यवधान) वह पानी गंगा मैया कंज्यूम करके आगे देती थीं और मछली आती थी। हजारों-लाखों मछुआरे हैं। आज लोग आंदोलन कर रहे हैं, हमारे देहात के मछुआरे आंदोलन कर रहे हैं। जब फ्लड सीजन में यह फिश उल्टा चढ़ती है, क्रॉस करती है, ब्रीडिंग करती है, करोड़ों अंडे देती है, मछली से भरा रहता था और अंतरार्ष्ट्रीय पक्षी आते थे हमारे यहां, गोता लगाते थे गंगा में। आज हालत क्या है? पैदल जाइए, कहीं से हिल जाइए। आज हमारी मां गंगा सूख रही है। यह राष्ट्रीय नदी है, पानी का बंटवारा सही ढंग से होना चाहिए, बिहार को भी हक है और हमको रोका नहीं जाना चाहिए। पहले जो पानी आता था, सब चला गया बांग्लादेश में। हमने रोका था मुख्यमंत्री को, हमने कहा था कि बिहार के पानी का क्या होगा, कहा गया था कि हम बिहार को तकलीफ नहीं होने देंगे। हम यह नहीं कहते, हमारी ही सरकार थी, देवगौड़ा जी थे, उस समय यह हुआ। इन चीजों को देखना चाहिए। हमने पवित्र जल को दे दिया, मछुआरों के पेट पर लात मार दिया और डॉलफिन का हम नाश कर रहे हैं। नाले हर-हर करके नदी में जा रहे हैं, जितना मल-मूत्र है, यह सब वहां पहुंचा रहे हैं। ठीक कहा हमारे साथी ने, साधु-सन्त बोलते रहते हैं। यह इन्हीं का बनाया हुआ है।

           गंगा के किनारे जब हम लाश को लेकर जाते हैं, प्रवाह करने जाते हैं, यमुना के किनारे जाते हैं, तो हमारे शरीर का यह जो पोर्शन है - हार्ट और लीवर, यह जलता नहीं है जल्दी। इसको कफन में बांधकरके नदी में प्रवाहित कर देते हैं। यह हम लोग करते हैं। जहां गंगा है, यमुना है, यह सारा बिल्कुल आज नरक हो गया है। इलाहाबाद में नरक हो गया है और उसी में साधु-सन्त, नागा, साउथ इंडिया से आने वाले लोग, मथुरा में हमारे कृष्ण भगवान का स्थान है, जहां कंस को मारकर, भगाकर अपनी राजधानी कायम की थी यमुना मां की कृपा से। आज वहां नौ-नौ नाले बह रहे हैं, कोई उसे देखने वाला नहीं है। लगता है कि इस देश में कोई सरकार ही नहीं है। ग्लैशियर गल रहा है।  पहाड़ गल रहे हैं और पानी को रोक कर रखा जा रहा है। शरद जी, यह बहुत बड़ा खतरा हम मोल ले रहे हैं। समय-समय पर प्रकृति का मन और मिजाज़ बिगड़ रहा है, थ्रैट होता है। टिहरी बांध इतनी ऊंचाई पर बना दिया, अगर किसी दिन वह टूटेगा तो उस दिन न जाने कितने लोगों का विनाश हो जाएगा और आप कंट्रोल नहीं कर पाएंगे। अगर हम यह नहीं समझेंगे कि क्यों प्रकृति का मन और मिजाज़ बिगड़ रहा है, क्योंकि हम लोग ही उसके लिए जिम्मेदार हैं और उसे नष्ट करने में लगे हुए हैं तो बहुत नुकसान हमें उठाना पड़ेगा, उठा भी रहे हैं। जब स्कूल में पढ़ते थे तो मालथस थ्योरी पढ़ते थे। वह चीज यहां भी लागू होती है। प्रकृति खुद अगर कार्यवाही करने लगेगी तो सब सोते के सोते रह जाएंगे, लोग छिपकली की तरह बराबर हो जाएंगे। ऐसे हालात पैदा हो सकते हैं। इसलिए हम लोगों को सब काम छोड़ कर, सरकार को प्राथमिकता देकर गंगा के पानी को सही ढंग से बंटवारा करना चाहिए। साधु,संत, गोरखपुर वाले लोग, प्रवचन करने वाले लोग भी इसके बारे में बात करने लगे हैं। इन लोगों की रोजी-रोटी भी गंगा की पवित्रता से चलती है। इसलिए साधु-संतों के हितों का भी ध्यान रखना होगा...( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदया: आप बीच में क्यों बोल रहे हैं, बैठ जाएं। लालू जी, अब आप अपनी बात समाप्त करें।

श्री लालू प्रसाद : हम सही कह रहे हैं। रंजन जी ने शायद कान ठीक से साफ नहीं कराए होंगे। उत्तराखंड के बाद गंगा में पानी है ही नहीं, बिहार में तो और भी हालत खराब है। गंगोत्री से लेकर हावड़ा और गंगा सागर तक पानी जाना चाहिए। गंगा में इसलिए गंदगी है, क्योंकि करंट ही नहीं है, पानी रोक दिया गया है ऊपर ही तो फिर बहाव कैसे आएगा। हम मानते हैं, हम नमन करते हैं और सभी धर्मों का आदर करते हैं। हमारे हिन्दू भाइयों के कई मंदिर गंगा किनारे हैं। हम वहां जाते हैं और स्वाभाविक है कि साधु-संत जब फूल-पत्ती और मिठाई से पूजा कराते हैं तो देवता को चढ़ाकर ये लोग भी पान करते हैं। गंगा हमारी मां है और गंगा सूख रही है इसलिए इसे बचाने का उपाय करना चाहिए। रेवती रमन सिंह जी ने जो यहां विषय रखा है, हम लोग उसका समर्थन करते हैं।

   

अध्यक्ष महोदया: पूरे सदन की यह भावना है कि गंगा को बचाया जाए। उसकी निर्मलता, उसकी पवित्रता, उसकी स्वच्छता और उसकी अविरल धारा को अक्षुण्ण रखा जाए। हमें पूरा विश्वास है कि जयंती नटराजन जी इस कार्य को अंजाम देंगी। मेरा विश्वास इसलिए भी इतना प्रबल है, क्योंकि हम गंगा माता की बात कर रहे हैं और यह स्त्री शक्ति का प्रतीक है।

17.58 hrs                         (Dr. M. Thambidurai in the Chair)     DR. RATNA DE (HOOGHLY): Sir, I would like to express my thanks for giving me the opportunity to speak on the discussion under Rule 193 to prevent river Ganga from pollution and Himalayas from ruthless exploitation.

          There cannot be two opinions about making Ganga, the lifeline of our country, pollution-free. It is our major river. We cannot afford to destroy this irreparably. We have to protect and safeguard it for our own benefit.

          Ganga and Himalayas have been exploited beyond imagination. In spite of efforts taken by the Government, exploitation is going on unabated. For example, a Memorandum of Agreement has been signed on July 6, 2010 by the Ministry of Environment and Forests with seven IITs for the development of Ganga River Basic Management Plan. There is no dearth of efforts from time to time.

          The only reason behind over exploitation of Ganga and Himalayas is that we take them for granted.

18.00 hrs.   In spite of numerous losses, polluters and exploiters are at large and mostly go scot-free. This has been the situation over the decades. There is an urgent need for planning conservation of Ganga and Himalayas. Mission Ganga should be taken seriously by each one of us; each Member of Parliament should ensure that he or she brings awareness among their constituents about the ill-effects of over-exploitation of Ganga and Himalayas. Areas around Ganga and Himalayas should be declared eco-sensitive zones and the same should be implemented very strictly.

          We often find in the newspapers that Ganga is being polluted by industrial waste which is being dumped, in spite of the tall claims by the Government.

MR. CHAIRMAN : Please wait.

          The discussion on this subject may be continued later. You can continue later. We are now taking up ‘Zero Hour’.

… (Interruptions)

DR. RATNA DE : Sir, let me finish this.

MR. CHAIRMAN: You can continue this later. There is no problem.

DR. RATNA DE : When?

MR. CHAIRMAN: They will let you know afterwards.

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF HEALTH AND FAMILY WELFARE (SHRI SUDIP BANDYOPADHYAY): Sir, let us be clear. Are we continuing this after ‘Zero Hour’?

MR. CHAIRMAN: Not today, after the ‘Zero Hour’. About tomorrow, it is not yet finalized. The date will be announced later. She could continue whenever this is taken up.                                ____________