Lok Sabha Debates
Further Discussion Regarding Increasing Atrocities On Women Raised By Smt. ... on 28 July, 1998
nt> Title: Further discussion regarding increasing atrocities on women raised by Smt. Geeta Mukherjee on the 23rd July, 1998.
MR. SPEAKER: The House will now take up item no. 14, further discussion regarding increasing atrocities on women. Shrimati Kamal Rani.
श्रीमती कमल रानी (घाटमपुर): अध्यक्ष महोदय, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देती हूं और साथ में अपनी बहन गीता मुखर्जी जी को भी धन्यवाद देना चाहती हूं। इन्होंने महिलाओं के संबंध में समय-समय पर इस संसद में अनेक प्रश्नों को उठाया है। उनकी समस्याओं को हल करने के लिए वे अपना वकतव्य देती रही हैं और आज भी उन्होंने इस विषय को यहां उठा कर हम सब लोगों के महत्व को बढ़ाने की कोशिश की है। अध्यक्ष जी, भारत के गौरवपूर्ण अतीत के निर्माण में नारी का बड़ा योगदान रहा है। प्राचीन काल में नारी को देवी और जननी के रूप में पूजा जाता था और समाज में उसको सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त था। चाहे साहित्य हो, संस्कृति हो, कला और कौशल हो या आत्मज्ञान की ही बात कयों न हो, नारी का स्थान सदा आगे रहा है। जिस समाज में नारी को समुचित स्थान और महत्व दिया गया है वह समाज अपने चरमोत्कर्ष को छूता रहा है। गायत्री, अनुसुईया, लक्षमीबाई, सावित्री, जीजाबाई जैसी महान महिलाओं ने अपने दायित्वों का पूर्ण रूप से निर्वाह करते हुए देश के गौरव को बढ़ाया है। आज हमारे समाज में नारी की स्िथति प्राचीन काल से अलग है। आज हमारे यहां पाश्चात्य संस्कृति ने महिलाओं की स्िथति को बहुत दयनीय बना दिया है। हर क्षेत्र में वह अपनी अस्िमता की ही लड़ाई लड़ती रहती है ताकि उसे समता और स्वतंत्रता होते हुए उचित स्थान मिल सके। हमारे समाज में ४८ प्रतिशत महिलाएं हैं लेकिन ५० वषर्ों की स्वतंत्रता के बाद भी उसकी स्िथति में अपेक्षित सुधार नहीं आया है। आज भी वह कार्यालयों और विश्वविद्यालयों में पीड़ा और प्रताड़ना से गुजर रही है। आज भी उसे पुरूषों के मुकाबले में बहुत कम वेतन दिया जाता है और उसका शारीरिक और मानसिक रूप से शोषण किया जाता है। जो महिलाएं शक्षित नहीं हैं उनकी दशा हमारे देश में और भी खराब है। उसको न तो घर में और न बाहर ही सम्मान मिल पाता है। आज देश में बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं और दहेज हत्या इस तरह से बढ़ रही हैं कि लड़की के माता-पिता पहले तो लड़की की शादी के लिए परेशान रहते हैं और शादी के बाद उसकी सुरक्षा को लेकर परेशान रहते हैं। अध्यक्ष जी, सुबह जब हम कोई अखबार या मैग्जीन पढ़ते हैं तो पाते हैं कि कहीं किसी पुलिस वाले ने महिला को प्रताड़ित किया और कहीं उसको निर्वस्त्र घुमाया गया या कहीं अपनों ने या फिर समाज के लोगों ने उसको प्रताड़ित किया। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिस-जिस समाज में नारी का अपमान हुआ है और उसके शारीरिक, मानसिक, भौतिक आत्मविकास की व्यवस्था नहीं की गयी है उस समाज का हमेशा पतन हुआ है। जिस समाज में नारी को महत्व दिया गया है, उसकी मान-मर्यादा की रक्षा हुई है वह समाज हमेशा आगे बढ़ा है। आज हमारे समाज में नारी की अधिकतम समस्याएं सामाजिक और आर्िथक हैं, इसलिए अगर हम उनकी दशा में सुधार लाना चाहते हैं तो हमें महिलाओं के हितों को ध्यान में रखते हुए आज के कानून में संशोधन करना चाहिए तथा महिला शिक्षा की ओर सरकार को अपना अधिक से अधिक ध्यान देना चाहिए। बिना शिक्षा के महिलाओं का विकास संभव नहीं है। कहा जाता है कि माता बच्चे की प्राथमिक पाठशाला होती है। जब मां ही शक्षित नहीं होगी तो समाज कैसे शक्षित होगा, देश कैसे आगे बढ़ेगा। महिलाओं को उद्योगों में व अन्य नौकरियों में भी उचित स्थान मिलना चाहिए। जिस देश की संस्कृति में नारी एक प्रतीक रही हो वहां मीडिया, विज्ञापनों, फिल्मों के द्वारा उसकी देह को निर्वस्त्र करने के बराबर प्रयास चल रहे हैं, मनमाने ढंग से उसको नचाया जा रहा है और उसकी मुकित के नाम पर आज भी षडयंत्र ही हो रहा है। अध्यक्ष जी, नारी आदिकाल से पुरूषों के लिए प्रेरणा का स्रोत रही है लेकिन आज कया कारण है कि १०० महिलाओं को एक तरफ खड़ा कर दिया जाए और एक पुरूष को वहां भेज दिया जाए तो भी महिलाएं भयभीत हो जाती हैं लेकिन १०० पुरूषों में एक महिला को भेज दिया जाए तो महिला में कार्य करने की कुशलता और इच्छा-प्रव्ृात्ित बढ़ जाती है और उसमें कार्य के प्रति प्रसन्नता की लहर आती है। कहीं न कहीं हमारी शिक्षा में दोष है, जिस पर हमें ध्यान देना चाहिए। नारी तो दिव्य-स्वरूपा है, उसमें तो त्याग की अपूर्व भावना विद्यमान है। वह कहीं भाई के लिए, कहीं पिता के लिए तो कहीं अपने बच्चे के लिए त्याग करके अपनी ममता लुटाती है। लेकिन आज नारी की स्िथति ऐसी हो गयी है कि वह प्रत्येक पुरूष में एक अविश्वास सा देखती है। वह किसी पर विश्वास नहीं करता। वह कहीं जाती है तो यह सोचती है कि वह सुरक्षित नहीं है। वह कहां है, कैसे रहे, वह आज कुछ अपने आप सोच नहीं पाती है। उसे हर जगह धोखा और आशंका नजर आता है। जब लड़की थोड़ी बड़ी होती है तो समझने लगती है कि दहेज अभिशाप बन कर आया है, वह कहीं उसको डस न ले। यह सोच कर चिंतित हो जाती है। आज महिलाओं को आनन्द के साधन के रूप में माना जाता है। कोई भी व्यकित यह समझता है कि वह उसके व्यकितत्व में निखार लाएगा। ऐसा सोच कर वह कलबों, जुआघरों और शराबखानों में उसको लेकर जाता है। वह जब उनका पूरी तरह उपयोग कर लेता है तब उसे छोड़ देता है और कलंकनी कह कर अपने से अलग कर देता है। यही कारण है कि आज हमारी महिलाएं दुखी हैं। पुरुष कहता है कि स्त्री मेरे अधीन है, मैं कमाता हूं, मैं उसे खिलाता हूं, वह सिर्फ बच्चा जन्म करने की एक मशीन है। कया यह सच है? मैं यह बात आप लोगों से पूछना चाहती हूं। अगर ऐसी मानसिकता बनेगी तो देश का किसी हालत में कभी कल्याण नहीं हो सकता। नारी समान अधिकार की मांग करती है लेकिन पुरुष ऐसा नहीं चाहता। वह अपने आप को दासी के बराबर नहीं लाएगा। वह जानता है कि उसका समाज में जो सवर्ोच्च स्थान है, वह पुरुष का रूप पाने के बाद है। वह अगर नारी को अपनी बगल में बैठा लेगा और कहेगा कि वह दासी नहीं, उसके बराबर है तो उसका अपना कहीं स्थान समाप्त न हो जाए, इस डर की वजह से वह उसे अपने बराबर बैठने नहीं देता। साधु, सन्यासी की भी यही स्िथति है। वह गुलाम को अपने बराबर नहीं बैठाते। ये तो फिर इन्सान हैं। भारतीय संस्कृति में नारी का उच्चतम स्थान हमेशा रहा है। पुरुष का यह कर्तव्य है कि वह नारी के इस रूप को हमेशा अक्षुण्ण रखें। हम यहां शासन की हर गिरी हरकत देख चुके हैं। हमने ५० वषर्ों में नारी को सम्मान नहीं दिया। मैं इस बात को दो लाइनों में प्रकट करना चाहती हूं।
"शासन की हर गिरी हुई हरकत हम देख चुके हैं, अब खत्म हुई, इस घर की बरकत हम देख चुके हैं, आसन पर धूल जमीं सिंहासन की करतूतों से, विषधर काले सांपों की निराक हम देख चुके हैं।" इससे ज्यादा बदतर स्िथति हमारे देश में और कया होगी? पुराने कवियों ने नारी के बारे में कहा था "अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी" मैं उन लाइनों को अब झुठलाना चाहती हूं :
"नारी हर युग की तू एक नई कहानी, तेरे आंचल की कया बात जिस में राम, ऋषि-मुनि जन्मे हों, फिर आंखों में कयों पानी।" यहां जो ३३ परसैंट आरक्षण के विरोधी हैं, ऐसे सांसदों को जिन्होंने जन्म दिया हो, जिन के आंचल में वे पले हों, ऐसे आंचल की कया बात, अरे महिला फिर तेरी आंखों में कयों पानी? मैं यही प्रश्न कर अपनी बात समाप्त करती हूं।
"> श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज): अध्यक्ष जी, इस सदन में चार दिनों से महिलाओं पर हो रहे अत्याचार, अनाचार और जुल्म के विषय में चर्चा चल रही है। सदन इस बारे में काफी चिंतित भी है। यह बात सत्य है कि देश की महिलाओं पर अत्याचार और जुल्म होते हैं। इस देश में नारी प्रधानता बराबर रही है। मानव जीवन में यदि शकित की आवश्कता होती है तो हम देवी दुर्गा की अराधना मां के रूप में करते हैं, दुर्गा पिता के रूप में कभी नहीं करते। हमें जब धन की जरूरत होती है तो लक्षमी की पूजा मां के रूप में करते हैं, लक्षमी पिता के रूप में कभी नहीं करते हैं। हमें बुद्धि और विवेक की जरूरत होती है तो हम सरस्वती की पूजा मां के रूप में करते हैं, पिता के रूप में कभी नहीं करते हैं। इतना ही नहीं इन आराधनाओं के अलावा हमारे देश का नाम भारत है जिसे भारत माता के नाम से जानते हैं, भारत पिता के नाम से कभी नहीं जानते । इस देश में जो महान् नदियां- गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी हैं, उन्हें मां के रूप में देखते हैं। इस सब के बावजूद देश में जो घटनायें घट रही हैं, वे दुर्भाग्य के सिवाय और कुछ नहीं है। इन घटनाओ पर गंभीरता से चिन्तन और विचार करने की जरूरत है। इस सदन में जो बहस चल रही है, मुझे लगता है कि कई माननीय सदस्यों और माननीय सदस्याओं ने लिंग के आधार पर आरोप लगाना शुरु कर दिया है जबकि मैं कहना चाहता हूं कि नारी पर जो जुल्म और अत्याचार होते हैं- चाहे दहेज के लिये उनकी हत्या की घटना हों या महिला उत्पीड़न की घटना हो, उन सब घटनाओं में ७५-८० प्रतिशत महिलाओ का हाथ होता है। हर घर में सास और ननद होती है। ननद एक दिन बहू भी बनती है और ननद किसी तीसरे घर में सास भी बनती है। लेकिन बहू के साथ अगर उत्पीड़न की घटना घटती है तो हम मानकर चलते हैं कि उसके लिये पुरुष वर्ग कम दोषी है, उसकी दोषी महिलायें ही हैं। महिला पर जुल्म महिला ही करती है, पुरुष नहीं करता है। इसलिये हम यहां माननीय सदस्याओं से अनुरोध करते हैं कि लिंग के आधार पर इस विषय पर विवाद नहीं करना चाहिये। इसमें जो लोग दोषी पाये जाएं उनके प्रति कठोर से कठोर दंड की व्यवस्था होनी चाहिये। लेकिन यह विषय चिन्ता का जरूर है कि इस तरह का वातावरण कैसे बनता जा रहा है? अध्यक्ष महोदय, भारत देश की एक सभ्यता और संस्कृति है। जब-जब भारत की सभ्यता और संस्कृति पर हमला होगा, नश्िचत तौर पर कहीं न कहीं सामाजिक कुरीतियां फैलेंगी। इस देश में हम सीता को मां के रूप में मानते हैं, सावित्री का नाम उदाहरण के रूप में देते हैं लेकिन जिस त्रेता युग में सीता पैदा हुई उसी युग में ताड़का ने भी जन्म लिया। इसलिये केवल नारी, नारी और नारी का हौवा खड़ा करके समाज में विषाकत वातावरण खड़ा करने की जरूरत नहीं है। इसमें दोषी को ढूंढने का जरूरत है। इसमें जो लोग अनाचार, अत्याचार और व्यभिचार में शामिल है, उनको कैसे कठोर से कठोर दंड दे सकें और कैसे कठोर कार्यवाही कर सकें, यह सोचने की आवश्यकता है। अध्यक्ष महोदय, हाल ही में देश में जो घटनायें घटी हैं, वर्ष १९९७ में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश ने रिकार्ड कायम किये हैं। मध्य प्रदेश में रेप की ३४११ घटनायें हैं, अपहरण की ६७६७ हुई जबकि उत्तर प्रदेश में अपहरण की घटनायें २४१७ और दहेज हत्या की घटनायें १८११ हुई हैं। हमें इन सब घटनाओं का विस्तार से विश्लेषण करना पड़ेगा। मैं कहना चाहता हूं कि यहां दहेज और तिलक की चर्चा करके सामाजिक वातावरण विषाकत करने की बात होती है। नश्िचत तौर पर दहेज और तिलक बहुत बुरी चीज़ है। मैं आपको शहर की नहीं, गांव की बात बताना चाहता हूं। गांव का वातावरण बहुत शुद्ध है और बहुत सभ्य समाज है। यदि एक घर में बच्ची पैदा होती है तो शादी करके दूसरे घर में जाती है। यदि उस घर के पुरुष की सम्पत्ित ५० लाख की है तो वह उस घर की मालकिन बन जाती है। कुछ पैसा उसे दहेज में खुशी से दे देते हैं तो कोई अपराध की बात नहीं हो सकती। कयोंकि एक घर से दूसरे घर जाकर वह उसकी सम्पत्ित की हकदार बनती है। इसमें अपराध की बात कहां उठती है? इसलिये यह अपराध की बात हो ही नही सकती। अध्यक्ष महोदय, जहां तक इस सदन में चर्चा चली है कि हरदम कन्याओं का कन्यादान होता है, यह कितनी उत्तम बात है? यहां दान शब्द का अर्थ मतदान नहीं है हमें कन्यादान शब्द का अर्थ समझना होगा। दान शब्द का अनर्थ लगाकर, अर्थ का अनर्थ लगाना, कहीं मुनासिब नहीं हो सकता है। जो घटनाएँ घटती हैं, खासकर नयी बहुएं जलायी जाती हैं, हम यह मानते हैं कि जितनी घटनाएँ घटती हैं और मुकदमे दर्ज होते हैं, हमारे कानून में त्रुटि है। कयोंकि जब घटनाएं घट जाती हैं, चाहे बलात्कार की घटनाएं हों, चाहे दहेज के कारण किसी बहू को जलाकर मारने की घटना हो तो उसकी निष्पक्ष जांच नहीं होती। यह कहा जाता है कि बलात्कार की घटना है, इसमें मॆडिकल रिपोर्ट आ गई है। हम गंभीरता से कहना चाहते हैं कि आज चलकर अस्पतालों में जांच करवाइए कि वैसी भी महिलाएं बाज़ार में घूमती हैं जो पैसा लेकर दूसरों पर झूठे मुकदमे करती हैं और पुरुष उनसे परेशान होते हैं। ऐसे एक नहीं, पचासों उदाहरण मैं दे सकता हूं। जो दहेज की घटनाएं घटती हैं, उनके कारण आज समाज में वातावरण विषाकत हो चुका है। हम यह बात इसलिए कहना चाहते हैं कि लड़की वाले उसके मरने के बाद, भले ही लड़की बीमारी से भी मरी है तो मुकदमा कर देते हैं और कहते हैं कि मुकदमे का कंप्रोमाइज़ हो जाएगा, लेकिन इसके बदले में इतना रुपया देना पड़ेगा, नहीं तो दूसरी बेटी से शादी करनी पड़ेगी। जहां इस तरह से भारत की सभ्यता और संस्कृति पर हमला होने का काम होगा, वहां हम मानकर चलते हैं कि कहीं न कहीं सामाजिक वातावरण विषाकत होगा और इसका अंजाम समाज के हर वर्ग को भुगतना पड़ेगा। इसलिए सबसे आवश्यक बात यह है कि सामाजिक वातावरण को दुरुस्त करें। और जब तक सामाजिक वातावरण दुरुस्त नहीं होगा, यहां की व्यवस्था ठीक नहीं हो सकेगी। इसके लिए यहां का सिनेमा भी दोषी है। इसमें नये-नये अश्लील गानों में अश्लील प्रदर्शन दिखाया जाता है जो गांव-गांव में, घर-घर में देखा जाता है। इन पर प्रतिबंध लगना चाहिए। पता नहीं सेंसर बोर्ड कया करता है? महिलाओं को प्रदर्शन की वस्तु समझकर जिस तरह से टीवी पर प्रदर्िशत किया जा रहा है, वह दुर्भाग्य के सिवा कुछ नहीं है। इस पर नश्िचत तौर पर रोक लगानी चाहिए। परसों के जनसत्ता में लिखा था कि पुरुषों ने एक संगठन बनाया है। उसमें लिखा था कि पुरुषों का शोषण महिलाओं द्वारा किया जा रहा है। हमें पता नहीं कि इसमें कितनी सच्चाई है, लेकिन जनसत्ता का यह समाचार है।
... (व्यवधान)रघुवंश बाबू हंसिये नहीं, यह गंभीर चिन्तन का विषय बना हुआ है।
... (व्यवधान)अध्यक्ष जी, मुझे बोलने दीजिए। हम जनसत्ता का हवाला दे रहे हैं।
MR. SPEAKER: For the last four days we have been discussing it. There is not much time left. You have to conclude now. Another five or six Members are there to speak. Some lady Members are also there. श्री प्रभुनाथ सिंह : हम पांच मिनट में अपनी बात समाप्त करेंगे।
MR. SPEAKER: I will give you only two minutes. श्री प्रभुनाथ सिंह : आपके आदेश से सारी बात समाप्त करते हुए हम सिर्फ महिला आरक्षण पर दो शब्द बोलना चाहते हैं। अध्यक्ष महोदय, यहां बहुत चर्चा की गई है कि आरक्षण का विरोध कुछ पुरुषों ने किया है। मुझे नहीं पता किसने किया है, किसने नहीं किया है, लेकिन मैं अपने विषय में कहता हूं कि मैं मानसिक रूप से इसका विरोधी हूं और मैं कयों विरोधी हूं इसके कारण हैं। मैं विरोधी इसलिए हूं कि हम नारी को मां के रूप में देखते हैं। जहां मां के आंचल से ममता पाते हैं, वहीं बहिन से प्यार और मोहब्बत पाते हैं, पत्नी के रूप में उसे विपत्ती के दिनों का सच्चा साथी और मित्र पाते हैं। इस रिश्ते में कहीं हकदारी और हिस्सेदारी नहीं दिखाई देती है। हकदारी और हिस्सेदारी में जहां भी कमी होगी, वहीं मां का मात्ृात्व कहीं न कहीं सूना हो जाएगा, मां के आंचल से जो ममता मिलती है, उसकी शकित घट जाएगी, बहिन के हाथ से जो प्यार और मोहब्बत मिलती है, वह समाप्त हो जाएगी और विपत्ित के दिनों की जो सहभागिनी बनती है, उसका भी महत्व घट जाएगा। इस देश में ही नहीं, विश्व के अनेक देशों में महिलाओं ने बहुत ऊंचे-ऊंचे पदों पर बैठने का काम किया है। बंग्लादेश में सत्ता और विपक्ष दोनों में महिलाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। श्रीलंका में राष्ट्रपति के पद पर महिला बैठी हैं। इसी देश में स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी प्रधान मंत्री के पद पर बैठी थीं। अभी राज्य सभा में नजमा हेपतुल्ला जी बैठी हुई हैं। यहां वाजपेयी जी के मंत्रिमंडल में सुषमा स्वराज जी बैठी हुई हैं। यहीं हमारे बगल में ममता बनर्जी जी बैठी हैं। यहीं पर गीता मुखर्जी जी बैठी हैं। कया ये किसी आरक्षण पर आई हैं? इसलिए प्रतिस्पर्दधा और कंपीटीशन को समाप्त नहीं होने देना चाहिए। अगर किसी दल में आरक्षण की राजनैतिक व्यवस्था हो, हालांकि जिस दल ने जब भी आरक्षण की बात उठाई है, कुछ दिनों बाद उसका सफाया हो गया है। इतिहास साक्षी है कि यहीं पर वी.पी.सिंह जी ने यह बात उठाई जिनके नाम पर इस देश में कोई रोने वाला नहीं मिल रहा है। इसलिए हम सदन को सतर्क करना चाहते हैं कि कोई गलत डिसीज़न इस सदन से न जाए। इसलिए सोचकर, विचारकर जहां मां और पुत्र का रिश्ता है, जहां भाई-बहिन का रिश्ता है, इस रिश्ते पर कुठाराघात न हो जाए। अगर किसी राजनीतिक पार्टी को आरक्षण देना बहुत अनिवार्य दिखाई देता है तो वह पहले अपनी पार्टी में ३३ प्रतिशत आरक्षण देने का काम करे, ५० प्रतिशत आरक्षण देने का काम करे, लेकिन किसी सीट को आरक्षित करना अन्याय होगा और माता और बहिनों के रिश्तों पर कुठाराघात होगा, भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर हमला होगा।MR. SPEAKER: Shri Prabhunath Singh, please wind up. श्री प्रभुनाथ सिंह : हम समाप्त कर रहे हैं। इसी बात के साथ हम यह भी कहना चाहते हैं कि समाज में महिलाओं के साथ ज़ुल्म और ज्यादती करने वाले लोगों पर कठोर से कठोर कार्रवाई हो, लेकिन यह मामला सिर्फ कानून से नहीं निबट सकता है। जब तक सामाजिक वातावरण पैदा नहीं किया जाएगा, सामाजिक सौहार्द का वातावरण नहीं बनाया जाएगा, समाज सेवी संस्थाओं को लगाकर इन कुरीतियों पर हमला नहीं कराया जाएगा, भारत की संस्कृति और सभ्यता को बरकरार रखने के लिए जब तक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक इसमें सुधार की संभावना नहीं है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं आपका धन्यवाद करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।
"> श्रीमती सतविन्दर कौर धालीवाल (रोपड़): अध्यक्ष जी, मैं आपको धन्यवाद देती हूं कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया। मैं अपनी बहिन गीता मुखर्जी को भी धन्यवाद देना चाहती हूं कि जिन्होंने स्त्रियों से संबंधित इस महत्वपूर्ण प्रश्न को उठाया है। भारत नानक, बुद्ध, राम की भूमि है। यहां की भारतीय संस्कृति पूरे विश्व में इसलिए मान्य है कयोंकि यहां पर स्त्रियों का सम्मान किया जाता है। यहां धर्म के अनुसार यह मान्यता है कि जहां स्त्रियों का मान सम्मान किया जाता है, वहां पर देवता वास करते हैं। कया अब हम कह सकते हैं कि इस देश में देवता वास करते हैं जहां औरतों पर अत्याचार होते हैं? अखबार देखिये तो आये दिन इन बातों से भरे होते हैं कि कहां किसको जला दिया गया, कहां बलात्कार किया गया और कहां किसी को मारा गया। ये बातें ही नहीं, हम कहते हैं कि किसी देश की संस्कृति छिपी होती है वहां के लोकगीतों में, वहां की फिल्मों में, उपन्यासों में और कहानियों में। आज की तस्वीरें, कहानियां या उपन्यास देखिये तो उनमें ज्यादातर कहानियां स्त्रियों पर हो रहे अत्याचारों के बारे में होती हैं। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण बात हमें देखनी है कि स्त्रियों पर अत्याचार कयों हो रहा है और उसे हमें कैसे रोकना है। स्त्रियों पर अत्याचार की बात हम कर रहे हैं और यहां पर बहुत सारी पार्िटयां हैं जो यह दावा करती हैं कि वे स्त्रियों के हकों की रक्षा करती हैं या स्त्रियों की भलाई के बारे में सोचती हैं। मगर मैं बता देना चाहती हूं कि कया हम नैना साहनी को भूल गए जिसे यहां पर नौकरी देने का झांसा देकर लाया गया था और फिर उसे तंदूर में ज़िन्दा जला दिया गया? कया यह स्त्रियों पर अत्याचार रोकने की बात है? मैं आपको पंजाब की एक महत्वपूर्ण बात बताना चाहती हूं। यहां पर करोड़ों रुपये के घोटाले हुए और जो घोटालों में लिप्त लोग थे, उन्हें कचहरियों में पूरी सुरक्षा के साथ ले जाया जाता है, परंतु पंजाब में दो गरीब जेबकतरियों ने जेब काटी -उसमें ५० रुपये निकले या फिर १०० रुपये निकले, परंतु पुरुष प्रधान समाज के अफसरों ने उनके माथों पर लिख दिया कि ये जेबकतरी है। कया यही कानून है? कया यही स्त्री के प्रति हमारा मान-सम्मान है? न्याय तो यह मांग करता है कि उन लोगों के माथों पर भी लिख दिया जाए जिन्होंने इतने बड़े-बड़े अत्याचार किये, इतने ज़ुल्म किये? इससे भी आगे देखिये तो केतिया कांड के बारे में आपने सुना होगा। एक विदेशी लड़की भारत में आई थी। हमारी संस्कृति कहती है कि स्त्री चाहे वह विदेशी हो या देश की हो, हम उसका मान करते हैं, उसका सम्मान करते हैं। परंतु एक बहुत बड़े राजनीतिक परिवार के बेटे ने उसकी बेइज्जती की, उसकी इज्जत को रोला। लेकिन बाद में कया हुआ, उसे डरा-धमकाकर वापस भेज दिया गया, ताकि उस पर कोई केस न बन सके। स्त्रियों को प्रति कया यही हमारा रवैया है? किसी भी व्यकित का मरना, जबकि वह व्यकित बहुत महत्वपूर्ण हो या देश का मुखिया हो, बहुत बुरी बात है। परंतु उसके बाद जो कुछ हुआ, वह उससे भी बुरी बात है। मैं १९८४ के दंगों की बात करना चाहती हूं। उन दंगों में जो कुछ हुआ, लोगों को जिंदा जलाया गया, बच्चों को मां की गोद से छीनकर कत्ल किया गया, उसके बाद बेटियों, बहनों और माताओं की बेइज्जती की गई और चौराहों पर लाकर उन्हें नंगा किया गया - कया यही हमारी संस्कृति है, कया यही हमारा सदाचार है। अगर यही हमारा सदाचार है तो हमें शर्म आनी चाहिए और हमें यह कहते हुए भी शर्म आनी चाहिए कि हम औरतों को प्रति अपना फर्ज निभा रहे हैं या उनका सम्मान करते हैं। भारत की इस भूमिपर स्त्री को सम्मान देने की जरूरत है। अध्यक्ष महोदय, मैं शिरोमणि अकाली दल से संबंध रखती हूं। मैं सिख धर्म से संबंधित हूं। हमारे धर्म में गुरू नानक देव जी ने बहुत पहले कहा था - ठसो कयों मंदा आखिये, जित जमें राजान", अर्थात जिस स्त्री की कोख से बड़े-बड़े ऋषि, मुनि पैदा होते हैं, उसे हम बुरा कयों कहें, कयोंकि वह तो राजाओं की जननी है। इसलिए अर हम उस शिक्षा को लेकर चलें, सीता, झांसी की रानी, या दुर्गावती की बात लेकर चलें, तभी हम अपनी संस्कृति पर मान कर सकते हैं, उनकी इज्जत-आबरू को बढ़ावा दे सकते हैं। अभी हमारे एक सांसद भाई बोल रहे थे कि स्त्री के प्रति अत्याचार स्त्री ही करती है। मैं मानती हूं कि अगर एक स्त्री को जलाया जाता है तो उसकी ननद और सास उसमें शामिल होती हैं। मगर उसमें सबसे बड़ा दोषी उसका पति होता है। कोई भी स्त्री अपनी ससुराल में सुरक्षित होती है, यदि उसका पति उसके साथ रहता है। यदि वह पति ही धोखा कर जाए या अपनी मां, बहनों के साथ मिल जाए तो वह औरत कहां बचेगी, जो अपना घर छोड़कर उसके साथ रहने के लिए आई है। यह हमारी पुरुष प्रधान मानसिकता है, जो यह नहीं चाहती कि स्त्री हमारे बराबर आये, हमारे मुकाबले में आये या हमारे से आगे बढ़े। वे कभी नहीं चाहेंगे कि स्त्रियों के लिए हम कुछ करें। इसलिए मैं आपसे अनुरोध करती हूं कि औरतों पर अत्याचार के संबंध में जो बिल सदन में लाया गया है, उसमें नियमों को इतना कठोर बनाया जाए कि कोई यह सोच भी न सके कि किसी स्त्री से बलात्कार किया जाए। बलात्कारों की घटनाएं रोज होती हैं, बलात्कार नाबालिक लड़कियों तथा स्त्रियों के साथ होती है, परंतु उससे भी बुरी बात तब होती है जब वह कचहरी में जाती है। पहले तो समाज ने उसे दुत्कार दिया, समाज उसे स्वीकार नहीं करता, दूसरे कचहरी में वकील उससे जो प्रश्न करते हैं वे हमेशा के लिए उसे जिंदा जमीन में गाढ़ देने के समान होते हैं। इसलिए ऐसे कानून बनाये जाएं जिससे कि कोई भी पुरुष या व्यकित स्त्री पर अत्याचार न कर सके। यही मेरा आपसे अनुरोध है।
"> श्री रामदास आठवले (मुम्बई उत्तर-मध्य) : महिलाओं को भीख नहीं, महिलाओं को हक दो, महिलाओं पर अत्याचार नहीं, महिलाओं को न्याय दो।
माननीय अटल बिहारी, अटल बिहारी, सुरक्षित नहीं देश की नारी, जाग रही हैं महिला सारी, चली जायेगी तुम्हारी बारी। अटल बिहारी-अटल बिहारी, महिला एकता पड़ गई भारी।
अध्यक्ष महोदय, महिलाओं पर अत्याचार के बारे में आदरणीय गीता मुखर्जी ने जो चर्चा हाउस में शुरू की है और उन्होंने जो बात यहां उठाई है कि महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं, उन अत्याचारों को बंद कराने के लिए इस हाउस में चर्चा हो रही है इस विषय पर हम सभी लोगों का गंभीर होना बहुत जरूरी है। हमारे देश का इतिहास ही ऐसा है जिसमें रामायण में उल्लेख है कि सीता पर राम के द्वारा अन्याय हुआ है। सीता की कोई गलती नहीं थी, उसके बावजूद भी सीता को घर से निकालने का प्रयत्न हुआ है।
15.00 hrs. श्री राम दास आठवले">:अध्यक्ष महोदय, महाभारत में भी नारी पर अत्याचार का उल्लेख है। महाभारत में द्रौपदी पर अन्याय होने का उल्लेख मिलता है। अपने देश में बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान में पूरा न्याय देने की बात कही है, लेकिन गांव और शहरों में महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं। इनमें वासना के नाम पर, जाति के नाम पर और अनेक प्रकार से महिलाओं पर आज भी अत्याचार किए जा रहे हैं, उन्हें गुलाम बनाकर रखा जाता है। मेरी सरकार से मांग है कि वह कानूनों में फेर बदल करे ताकि महिलाओं पर हो रहे अन्याय रुकें। पुलिस द्वारा भी महिलाओं पर बहुत अन्याय होते हैं। इसलिए पुलिस विभाग में महिलाओं की भर्ती ज्यादा से ज्यादा होनी चाहिए। मेरी मांग है कि थाने में एक एस.आई. महिला भी होनी चाहिए। यदि सीनियर आफीसर महिला होगी, तो पुलिस द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों में कमी आएगी कयोंकि महिला ही महिला का दर्द समझ सकती है। इसी प्रकार से मैं कहना चाहता हूं कि महिलाओं को शिक्षा भी ज्यादा से ज्यादा देनी चाहिए और महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा शिक्षा देने के लिए अधिक से अधिक सुविधाएं देनी चाहिए। अध्यक्ष महोदय, मेरा निवेदन है कि सरकार को महिलाओं के ऊपर हो रहे अत्याचारों के संबंध में दायर केसेस का निपटारा शीघ्र करने के लिए सैशंस कोर्ट, हाइ कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अलग जजों की नियुकित करनी चाहिए और उनके लिए एक अलग बैच की स्थापना हो जहां उनके केसेस की सुनवाई होनी चाहिए, तब कहीं महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के केसों का निपटारा जल्दी हो सकता है और इस प्रकार से हम महिलाओं को न्याय प्रदान कर सकते हैं। अध्यक्ष महोदय, दहेज प्रथा पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगना चाहिए। अभी हमारे समता पार्टी के एक मित्र दहेज प्रथा के पक्ष में बात कर रहे थे। हमारी रिपब्िलकन पार्टी दहेज प्रथा के बिलकुल पक्ष में नहीं है। पहले लोग अपनी लड़की की शादी में दान देते थे। दान के रूप में यह प्रथा हमारे देश में प्राचीन काल से चली आ रही है, लेकिन अब समय आ गया है जब इस पर पूर्ण प्रतिबन्ध लागू होना चाहिए। आज हमारे समाज में इकवैलिटी नहीं है, जिसके पास ज्यादा पैसा है, ज्यादा धन है, वह दहेज देता है, तो ठीक है, लेकिन जो गरीब है, जिसके पास धन नहीं है, उससे एक लाख या दो लाख रुपए मांगना, मोटर साइकिल या कार मांगना, कतई ठीक नहीं है और यह प्रथा बंद होनी चाहिए। जब इस पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगेगा, तो जो भी दहेज लेने का प्रयत्न करें उन्हें जेलों में डालना चाहिए और उनकी जमानत भी नहीं होनी चाहिए ताकि वे ज्यादा से ज्यादा समय तक जेल में रहें जिससे दूसरे लोगों को सबक मिले। अध्यक्ष महोदय, आज हमारे देश में हर जगह दहेज प्रथा ने अपने पांव जमा लिए हैं। इसमें कन्या को दान किया जाता है। सबसे बड़ा दान, कन्यादान है। फिर धन आदि देने की कहां जरूरत है और जिनके पास संपत्ित है, वे दें, तो कोई बात नहीं है, लेकिन जिनके पास साधन नहीं हैं, जो गरीब हैं, उससे जबर्दस्ती धन की मांग करनाअपराध है। इसलिए मेरा निवेदन है कि इसके ऊपर हम सबको विचार करने की आवश्यकता है। हमारे देश के पवित्र ग्रंथ रामायण और महाभारत में महिलाओं के साथ अन्याय किए गया जाने का उल्लेख मिलता है, लेकिन बाबा साहब अंबेडकर ने भारत के संविधान में महिलाओं के लिए समान अधिकार देनी की बात का उल्लेख कराया और १९४७ में जब वे कानून मंत्री थे, तो वे सदन में हिन्दू कोड बिल लाए थे ताकि महिलाओं को समान अधिकार मिलें व रिजर्वेशन मिलनी चाहिए कयोंकि मां अगर शक्षित होती है, तो पूरा देश शक्षित होता है और महिलाएं यदि इकनौमीकली साउंड होंगी, तो पूरा देश तरककी करेगा। हिन्दू कोड बिल का इस सदन में उस समय विरोध हुआ जिससे क्षुब्ध होकर बाबा साहेब अम्बेडकर ने अपने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। अगर हमें आगे बढ़ना है और हमें समानता लानी है, तो हमें महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत आरक्षण जरूर देना चाहिए। यह रिपब्िलकन पार्टी की मांग है और हम चाहते हैं यह विधेयक जल्दी से जल्दी सदन में प्रस्तुत हेना चाहिए। जब यह विधेयक सदन में आए तब अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और मायनीरिटी तथा बैकवर्ड कलास की महिलाओं को जितना रिजर्वेशन देना है, उसका समावेश भी इस कानून में करना चाहिए। यदि आप महिलाओं को आरक्षण देना चाहते हैं, तो आपको इस विधेयक को जल्दी से जल्दी सदन में प्रस्तुत चाहिए। यदि आप इसे सदन में प्रस्तुत नहीं करेंगे तो हम समझेंगे कि यह सरकार महिलाओं का रिजर्वेशन नहीं करना चाहती है कयोंकि यह सरकार महिलाओं के लिए आरक्षण करने वाले कानून को प्रस्तुत ही नहीं कर रही है। नाटक तो आपने किया है, यदि हम भी नाटक शुरू कर देंगे तो आपका नाटक बंद हो जायेगा। लेकिन हम ऐसा नाटक नहीं करना चाहते हैं। इस बिल को जल्द से जल्द लाना होगा। महिलाओं के वोटों से ही आप सत्ता में आये हैं किन्तु महिलाओं का बिल लाने के लिए आप आगे-पीछे देख रहे हैं। मैं कहना चाहता हूं कि महिलाओं के रिजर्वेशन का बिल जल्द से जल्द आना चाहिए और इसी अधिवेशन में आप उसे रीड़ाफट करके ला सकते हैं। यह सरकार बोलती है कि हम रिजर्वेशन देने को तैयार हैं लेकिन उधर के लोगों का विरोध है। मेरा कहना है कि इधर के लोगों का कोई विरोध नहीं है। वहां के लोगों का ही विरोध है, समता पार्टी का विरोध है। महिलाओं के रिजर्वेशन के लिए हमारा सपोर्ट है। इसको रीड़ाफट करते हुए जल्द से जल्द लाना चाहिए। अगर यहां हमारी मां-बहनें आ जायेंगी तो इस समाज का परिवर्तन हो जायेगा और समाज का परिवर्तन केवल महिलायें ही कर सकती हैं, दूसरे समाज का परिवर्तन नहीं कर सकते। इसलिए आप लोगों से हमारा कहना है ... (व्यवधान)महिलाओं के बिल को हमारा सपोर्ट है। यह बिल जल्द से जल्द आना चाहिए। अगर सरकार इसके लिए तैयार नहीं है तो हम आपको सपोर्ट करेंगे। तब भी आप यह बिल न लायें तो हम उधर आकर फौरन इसको लाने का प्रयत्न करेंगे। इस तरह यह सवाल हल होने वाला है।
... (व्यवधान) अंत में, हमारी बहन गीता मुखर्जी ने जो सवाल उठाया है कि महिलाओं पर अत्याचार बंद होने चाहिए, मैं उसका समर्थन करता हूं। जब तक उनको ३३ प्रतिशत रिजर्वेशन नहीं मिलता है तब तक महिलाओं पर अत्याचार बंद होने वाला नहीं है। इसके लिए मैं गीता मुखर्जी को धन्यवाद देता हूं। जय भीम, जय भारत। श्री रामानन्द सिंह (सतना): अध्यक्ष महोदय, कृपया आप मुझे पांच मिनट बोलने का समय दीजिए।
... (व्यवधान) श्री शैलेन्द्र कुमार (चैल) : अध्यक्ष महोदय, हमारी पार्टी की तरफ से केवल एक ही मैम्बर बोले हैं।
... (व्यवधान)
">SHRIMATI SANGEETA KUMARI SINGH DEO (BOLANGIR): Mr. Speaker, Sir, I would like thank you for giving me the this opportunity to participate in the Discussion on Atrocities on Women under Rule 193.
It is indeed a matter of great regret, that in a country like ours, with its rich and glorious heritage, where Goddesses are worshipped as Shakti, and where in earlier days women enjoyed a respectable place in society, today society has become so barbaric and decadent and has degenerated to such an extent that we actually have to enact laws to protect women. Atrocities against women should be viewed as one of the most crucial social mechanisms by which they are forced into a position of subordination, in a made dominated society.
Now, we have discussed the various types of atrocities or acts of violence or forms of abuse that are perpetrated on women, day in and day out, for example, kidnapping, rape, molestation, sexual harassment, dowry deaths, etc. I would like to draw the attention of the House to a different aspect on this subject. Firstly, when an atrocity against a woman is committed, the time period between the commission of the crime and the outcome of the trial is too long. It just goes on endlessly. I would request that special courts be set up for speedy dispensation of justice.
Secondly, the ambience in the court room is absolutely deplorable, especially, in the family courst . As it is bad enough that the victim has to suffer and cope with the trauma of the crime. Then, she is being subjected to standing and being interrogated in a packed court room with men sitting with leery expressions on their faces is too much and is just too intimidating. That is why, a lot of cases go unreported. So, I agree with what Mamata Banerjeeji said yesterday that in-camera trials should be held.
Thirdly, we talk so much about atrocities but precious little is done to rehabilitate the victims. I feel that we should have more short-stay homes so that the lady is not completely disoriented, and has time to find her bearings. Also, there is no dearth of laws pertaining to crimes against women but the real problem lies in the correct implementation of the laws. Now we are constantly given these sermons that nobody is above the law and everybody is equal in the eyes of the laws but in reality it so happens that some of us are more equal than others.
For example, in Orissa last year the entire State was rocked by the Anjana Mishra case wherein the lady had alleged that the Advocate-General Shri Indrajit Roy had molested her and attempted to rape her. A case to that effect was filed but nothing at all happened. Despite media attention and protestations held by women's organisations, the gentleman is still continuing in the same office in which he was prior to this case coming up. So, what hope do women have in States like Orissa where the protectors of the law sometimes turn into alleged perpetrators?
Regarding the Women's Reservation Bill, I would like to say that I am a student of Political Science and I studied in college that one of the most important functions of Parliament is legislation. However, after reaching here I have come to the conclusion that some of our senior colleagues are totally confused. In their mind, the most important function of Parliament is obstruction! Because they obstruct new Members from talking, at the risk of sounding rule let me sayparticularly lady Members and they have obstructed the introduction of the Women's Reservation Bill, which I feel is a gross injustice done to womankind.
Now, why is reservation brought about? It is to enable those sections of society which are deprived and which do not have the right opportunities. We do not ask for reservation for people like us. We have come through the regular channel of general elections. But the reason we are asking for reservations is for those deprived women who have not been fortunate enough to have the kind of opportunities we have had.
Another thing I want to bring to the notice of the House is that women play a very important role in moulding the character of the children. In other words, when a woman moulds the character of a child, she is also moulding the character of the future generation, the future citizen and thereby indirectly playing a major role in nation building. So, if they are good enough to play a role in that aspect, then why are they not good enough to sit in Parliament and participate like any other hon. Member? I am fighting for the ladies who are not able to come here.
Secondly, it is said that behind every successful man there is the hand of a woman. Are we to go to our graves just pushing the men? Are we not allowed to live for ourselves and have a place in the sun? Is that still our only duty just to live pushing our children, pushing our men into prominence? And who has empowered men to tell us anyway, whether our role is in the kitchen or the drawing room or in the Parliament House? It is a democratic country and I think we are educated enough to make up our own minds for ourselves. What is the reason behind this anxiety, insecurity this paranoia, this fear psychosis which men suffer whenever the Women's Reservation Bill is talked about after and grave thought I have come to this conclusion that the thing which is really frightening the wits out of them is this and I quote Mr. Speaker from Joan of Are that `The hand rocks the cradle rules the world.' This, I think, is the fundamental problem behind the fear psychosis whenever the topic of the Women's Reservation Bill comes up.
We women are not talking the men that "What you can do we can do better". But we are definitely saying "Live and let live" and a confident man who is doing well himself in life will never act as an obstacle in the path of a woman. I am a married woman. My husband is immensely proud of me and he gives me full support. So where does the problem arise? But a man who is not confident himself and who suffers insecurities, takes it out on the poor wife.
In conclusion,sir, the only cure for this social malady lies in education and awareness, setting up of special courts for speedy dispensation of justice, in-camera trials and stringent implementation of the laws of the land.
">SHRI AMAR ROY PRADHAN (COOCHBEHAR): Mr. Speaker, Sir, first of all, I would like to congratulate Comrade, Shrimati Geeta Mukherjee, for bringing such a motion in the House, that is, the discussion on increasing atrocities on women under Rule 193.
Sir, I would also like to congratulate you because you have allowed this motion to come up in this august House for discussion. श्री रामानन्द सिंह :अध्यक्ष जी, यह बात किलयर हो जाये कि इस पर पुरुष मैम्बरों को बुलाया जायेगा। कुछ लोग कहते हैं कि केवल महिलाएं बोलेंगी। मेरा नाम सूची में है कि नहीं? मैं भी अपने विचार रखना चाहता हूं। मैं तीन दिन से लगातार खड़ा हो रहा हूं और बार-बार कोई न कोई महिला सदस्य बोलने लगती है। अध्यक्ष महोदय : आपका नाम भी यहां है। श्री रामानन्द सिंह : लेकिन हम लोगों के भी कुछ अच्छे विचार हो सकते हैं। ... (व्यवधान) आप लोग ही कोई होशियार नहीं हैं। इस पर हमारे भी विचार हैं, कुछ थिंकिंग है। श्री रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): हम अपनी पार्टी से उनका नाम देंगे। श्री रामानन्द सिंह : महात्मा गांधी ने एक रुपये चार आने में अपने लड़के की शादी की थी। श्री रघुवंश प्रसाद सिंह : हमारी पार्टी का समय उनको दिलवाया जाये।
SHRI AMAR ROY PRADHAN : It is a matter of great regret and shame for all of us that in India alone one million women are being tortured by different types of crimes every year. Out of these crimes, the percentage of kidnapping and abduction is 15.2, dowry deaths 6.2, torture 24.8, molestation 25.6, eve teasing 13.5 and rape 14.7. It is a shame for all of us that in our country, from a three year baby to 90-year old woman, are subjected to rape. Are we living in a civic society? I do not know whom I shall blame for it. (Interruptions). There are dowry deaths every year. Sati daah system is still being praised at length, particularly in Rajasthan. There are laws like Dowry Prohibition Act, 1961 and the Commission of Sati (Prevention) Act, 1987.
Roop Kanwar, a lady had to commit suicide forcibly and she was thrown into the funeral pyre of her husband in 1987. It was discussed in this august House at that time and we also took part in it.
As we all know, Raja Ram Mohan Roy fought against this sati daah system. If he would have been alive today, he would have to commit suicide after seeing all these things.
I fully support the view expressed by Shrimati Sangeeta Kumari Singh Deo and also Kumari Mamata Banerjee that trial of the rape cases should be held in camera court so that women can express more freely and frankly. So, I would like to request the hon. Minister of Home Affairs that all rape cases should be tried in camera.
I have gone through the book, Women and Men in India-1995. I was astonished to see how rapidly male population is going to be more and more in this country.
Whatever may be the advertisements on the TV or on the radio or in the electronic media that daughters are better than sons, nobody cares for those. If we see the sex ratio at birth from the figures maintained by the Registrar General of India, we find the male-female ratio as under:
1951 100:100.8 1961 100:102.5 1971 100:106.4 1981 100:108.9 1991 100:110.1 It means, there will be more law and order problems and more sexual harassment. So, we must take some stringent measures in this regard. If necessary, more work should be done in this respect.
The first thing which strikes me is the cultural heritage. It is the mythological culture that is prevailing today in India, that is, `putrarthe kriyate varjya', which means wife is required just to produce son, not for any other purpose. This is the teaching of our mythology. This is the teaching of our culture - `putrarthe kriyate varjya'. Can you deny it?
SHRI C.P. RADHAKRISHNAN (COIMBATORE): Yes, we are denying it.
SHRI AMAR ROY PRADHAN : You may deny it but the Indian culture has not denied it yet. That is our cultural heritage, that is our mythological culture that is prevailing today.
SHRI C.P. RADHAKRISHNAN : In this culture only the ladies have got the maximum respect. You can easily compare it with all the old cultures of the world.
SHRI AMAR ROY PRADHAN : Sir, this is our cultural heritage and we must stand against this cultural heritage, against this mythological culture. A cultural revolution is necessary and for that, I think not only the Government but we, the Members of Parliament and yourself also, Sir, must ponder over it so that we may come to a conclusion as to how to overcome it.
As regards the Women's Bill, it is the right of the women to have 33 per cent reservation in Parliament and in the Legislatures. I know there is a confusion among different political parties. Some parties are very much agitated over this. There is a confusion in the party in power also. At the time of introduction of the Bill a few days back, the hon. Home Minister, standing there, said that he did not like to introduce the Bill because it would create hangama and the House will be ransacked. If we think it is our job and it is our moral duty to have 33 per cent reservation for women in Parliament and in Legislatures, then it is not the question as to who will create hangama or who will ransack the House. I once again request the Home Minister and the Minister of Parliamentary Affairs to bring the Bill as soon as possible and have 33 per cent reservation for women in the country. It is the job and it is the moral duty of the whole House and the country - because we are the representatives of the people - to get this Bill passed.
"> श्री मधुकर सरपोतदार (मुम्बई उत्तर-पश्िचम): अध्यक्ष महोदय, तीन-चार दिनों से इस सदन में महिलाओं पर अत्याचारों के बारे में चर्चा चल रही है। श्रीमती गीता मुखर्जी जी ने यहां यह बात उठाई तथा साथ ही अन्य बहुत सारी बातें उन्होंने इस सदन में रखीं। उसके बाद विपक्ष के नेता, श्री शरद पवार जी, ने कुछ बातें कहीं। अन्य सभी वकताओं को भी मैंने बड़े गौर से सुना। मैंने महिलाओं को भी पूरे ध्यान से सुना। हमें एक बात माननी पड़ेगी कि हमारे देश में महिलाओं के ऊपर अत्याचार होते हैं, ये बिल्कुल भी नहीं होने चाहिए। इसके लिए आपको कानूनी व्यवस्था करनी होगी और कानूनी व्यवस्था करके सजा की व्यवस्था भी होनी चाहिए। महिलाओं पर जो अत्याचार होते हैं, मैं उनको दोहराना नहीं चाहता हूं। मैं यह कहना चाहता हूं कि सिकके का दूसरा पक्ष भी होता है और उसको पेश करना मेरा फर्ज है। यह हकीकत है कि हमारे देश में महिलाओं पर जो कुछ भी अन्याय होते हैं, उनके लिए मदर्ों को ब्लेम किया जाता है। हमारे एक साथी, सोमनाथ जी, ने कहा कि मदर्ों के ऊपर भी अत्याचार होता है। सैकशन ४९८ को यदि आप देखेंगे, तो स्पष्ट हो जाएगा और इससे संबंधित मेरे पास एक बयान भी आया हुआ है। होम मनिस्टर इस समय सदन में उपस्िथत नहीं है, मैं उस बयान को मंत्रीजी को देने वाला हूं। यह ब्यान एक संस्था का है, जो मुम्बई में है और इस संस्था की प्रैजीडेंट एक महिला एडवोकेट है। ये महिला कह रही हैं कि मदर्ों के ऊपर भी अत्याचार हो रहे हैं। ये अत्याचार किस किस्म के हो रहे हैं, मैं इस बारे में सदन में महिलाओं को बताना चाहता हूं। मैं समझता हूं कि सदन को इस बारे में नोट करना चाहिए।
The PHSS, Purush Hakka Sanrakshan Samiti is a registered organisation. It was formed in 1996 when advocate D. Chavan found in Nasik district that about 90 per cent of the cases slapped under Section 498(a) by married women were false and frivolous. PHSS is now spreading out to all other States in India and firmly believes in saving marriages, families and properties through gender justice, and by diluting Section 498(a) and inducting Section 419(b) mentioning `cruelty against men by women'. This is their demand number one on behalf of the gents. There are a number of demands, but I am not quoting them.
SHRI A.C. JOS (MUKUNDAPURAM): Is this a registered society?
SHRI MADHUKAR SIRPOTDAR : Yes, it is a registered society. यह मेरी ओपीनियन नहीं है। जो मेरे पास शिकायत आई है, वह मैं आपको बता रहा हूं।
SHRI A.C. JOS : Sir, is he endorsing it?
SHRI MADHUKAR SIRPOTDAR : Yes. Because I am fully aware of it. This is my personal knowledge because a number of men had come to me in Mumbai and lodge this complaint. The police by taking bribe, and the ransom parties, are playing havoc in the matter. This is also a fact. लेकिन मानसिकता यह है कि महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं। अभी सदन में माननीय सदस्य रामदास जी ने एक बात कही, मैं केवल इतना ही कहना चाहता हूं कि जब पूरी बात का ज्ञान न हो, तब उस पर कोई बहस नहीं करना, बहुत अच्छी बात है। एक सीतामाई के लिए कितने मदर्ों ने अपनी जान गवाई - यह सवाल मैं पूछना चाहता हूं? एक द्रोपदी के लिए कितने लोगों ने अपनी जानें गवाई, यह भी एक सवाल है। ....( Interruptions) एक द्रोपदी के लिए कितने लाख लोगों ने अपनी जानें गवाई। मेरे विचार से सदन को इस बारे में सोचना चाहिए। इसके बाद रानीलक्षमी बाई, जिनपर हमें गर्व है, जिन्होने हमारे देश में जन्म लिया। अपने बच्चे को अपनी पीठ पर बांध कर दुश्मनों से लड़ाई की और अपनी जान गवाई। ऐसे लोगों को भी साथ करने का काम यहां मदर्ों ने किया। यह कभी नहीं भूलना चाहिए, समाज के अंदर मर्द और औरत दोनों अलग नहीं हो सकते, दोनों की समान जिम्मेदारी है। हमारे देश में करीब सौ करोड़ की आबादी है। अगर हम अत्याचार का प्रतिशत निकालें।
We should try to understand the percentage of crime committed by all the people irrespective of the explanation given by all the parties. If you see comparatively, it is, no doubt, notable, but not much on which one should put more emphasis. I am not justifying it. But it should not happen like that. इसमें हमें एक बात और देखनी है कि हमारा मीडिया कौन से मोड़ पर चलता है। मैं एक अखबार लाया हूं। मैं आपको बता सकता हूं कि रोज हम अखबारों में कया देखते हैं, उसे मैं आपको दिखाना चाहता हूं। मैं आपको बताना चाहता हूं कि जिसकी उम्र १५-२०-२५ साल की है, कया वह आंखें बंद करके बैठेगा। हमारी मीडिया में कया हो रहा है। हमारे देश में जितनी ब्लू फिल्में दिखाई जाती हैं, कया हमारे देश के बच्चे आंखें बंद करके बैठें। यदि भावनावश उनसे कुछ ऐसा हादसा हो जाता है तो हम उन्हें सजा देते हैं लेकिन इन ब्लू फिल्म दिखाने वाले लोगों को, अखबार वालों को हम कोई सजा कयों नहीं देते। कया यही हमारे देश का कल्चर है? मैं इस बारे में महिलाओं से पूछना चाहता हूं कि कया आपने कभी इस बारे में सदन में आवाज उठाई? कया कभी कहा कि किसी भी हालत में अखबारों में ऐसा नहीं आना चाहिए। कया हम लोग इस बारे में कभी सोचते हैं? हमारे देश की संस्कृति नंगी नहीं है, वेस्टर्न वर्लड से नहीं आई है बल्िक हमारे देश की अपनी संस्कृति है और अपनी संस्कृति की इज्जत करना हमारा सबसे पहला फर्ज है। इसलिए इस फर्ज को हमें सबसे पहले निभाना चाहिए। इसको निभाने के बाद अगर किसी के ऊपर कोई अन्याय होता है तो उसके ऊपर हम फूट पड़ेंगे।
... (व्यवधान) महोदय, अगर किसी का पति शराबी है, मैं मानता हूं कि वे अपनी पत्िनयों के ऊपर बहुत अन्याय करते हैं। लेकिन उन्हें शराब कहां से मिलती है? जहां आप शराब पर पाबंदी लगाते हैं वहां ज्यादा शराब की दुकानें मिलती हैं। दिल्ली और मुंबई में अनेक गेस्ट हाउस हैं। जब पुलिस को पता चलता है तब जाकर कोई ढूंढता है कि यहां कया धंधे चल रहे हैं। आफिस में जाने वाले मर्द या औरत ऐसे गेस्ट हाउस में जाते हैं और हमारी संस्कृति को बर्बाद करते हैं। कया इस ओर किसी का ध्यान है? यदि यहां ग्ृाह मंत्री जी होते तो मैं उनको बोलता कि जितने ऐसे गेस्ट हाउस हैं उन सब की तलाश करो। आप जाकर देखो कि वहां कया हो रहा है। महोदय, मैं एक बात सभी मदर्ों और औरतों से कहूंगा कि किसी के ऊपर ऐसी टीका-टिप्पणी करने से पहले अपने आप में जरा झांक कर देखो कि हम कया कर रहे हैं।
... (व्यवधान)महाराष्ट्र विधानसभा में हमारी बात चल रही थी, रामदास जी भी वहां मौजूद थे, मैंने उस समय पूछा था। सदन में बैठने वाले जितने हमारे विधायक हैं उनकी तरफ अगर मैं अंगुली उठा दूं तो उनके लिए मुंह ऊपर करके बात करना मुश्िकल हो जाएगा कि शाम को जब छुट्टी होती है तो ये कया करते हैं, इसे भी देखने की आवश्यकता है। मेरा कहने का मतलब यह है कि अगर हम अपने आप में झांक कर नहीं देखेंगे, अपनी गलतियों को ठीक नहीं करेंगे तब तक यहां किसी भी बीमारी के ऊपर केवल चर्चा करने से उसका इलाज हो जाएगा, ऐसा मेरा विश्वास नहीं है। हम लोग बेकार में सदन का समय बर्बाद कर रहे हैं, ऐसी मेरी भावना है। यहां बहुत सारी बातें बोली जाती हैं। यहां बहुत से माननीय सदस्य बोले।
There is a unilateral attack on all the men. जैसे इस देश के अंदर अगर कोई गुनाहगार है तो वह सिर्फ मर्द है और अन्य किसी का इसमें कोई कसूर नहीं है। यह सही है कि इसमें कसूर मदर्ों का है। इसमें सुधार लाने की आवश्यकता है। इस बारे में हमारे माननीय सदस्य सोमनाथ जी ने भी कहा है। मैं सुमित्रा बहन से पूछता हूं आपके घर में कोई बच्चा पैदा होता है, तो कया खुशी नहीं होती है। यदि घर में लड़कियां पैदा होगीं, तो कया आप खुश होंगी? मुझे बताइए, ऐसा कौन सा घर है, जहां ५-६-७ बच्िचयां पैदा होती हैं, वह खुश होता है। हर परिवार चाहता है कि उसके घर में एक बच्चा पैदा हो, चार बच्िचयां पैदा हो गईं, तो कोई हर्ज नहीं है। मैंने एक औरत को देखा है, जिसके दो बच्िचयां पैदा हो गईं, उसने रोना शुरू कर दिया। यह भी एक मानसिकता है, जिसको बदलना चाहिए। मैं एक दूसरी बात कहना चाहता हूं, जिस परिवार में औलाद नहीं होती है, उस परिवार की औरत का जीना मुश्िकल हो जाता है। यह काम कोई मर्द नहीं करता है, बल्िक पूरी सोसायटी करती है। कहा जाता है कि शादी को चार साल हो गए और तुम्हारे कोई बच्चा नहीं हुआ। यह हमला कौन करते हैं? यह हमला कोई मर्द नहीं करते हैं, बल्िक औरते करती हैं। औरतें जलाई जाती हैं। इस बारे में सदन में एक माननीय सदस्य ने भी कहा, लेकिन इस काम को करने में भी औरत का हाथ होता है और औरत ही अपने ऊपर अंगारे डालती है। इस मानसिकता को भी बदलना होगा। जब तक हम इस मानसिकता को नहीं बदलेंगे, तब तक समस्या का समाधान कैसे हो सकता है। मैं कहना चाहता हूं कि समाज में औरत और मर्द बराबरी के हकदार हैं तथा एक दूसरे को साथ मिलकर आगे ब्रढ़ने की आवश्यकता है।
... (व्यवधान) महोदय, मैं दो मिनट में अपनी बात समाप्त करूंगा। जुआ खानों मे कैब्रे डांस के एडवर्िटजमेंट अखबारों में ओपनली आते हैं। कया ये कैब्रे डांस मर्द करते हैं? लेकिन कया कभी किसी महिला ने कहा है कि ये डांस नहीं होने चाहिए। मैं मानता हूं कि यह मदर्ों की जरूरत है, लेकिन ऐसी मानसिकता दुनिया के किसी भी देश में नहीं है कि ये डांस नहीं होने चाहिए। मैंने बहुत सारे देशों में जाकर देखा है, वहां एजेंट सबसे पहले यही पूछता है कि यदि आपको किसी ऐसे घर में जाना हो, तो बताइए, मैं आपको बढ़िया-बढ़िया लड़कियां बताता हूं। यदि हम इस प्रकार की मानसिका को लेकर आगे बढ़ेंगे, तो कया होगा, यह सोचने की बात है। गैस्ट हाउसेस, ब्रोथल्स को लाइसैंस देने का काम पुलिस द्वारा किया जाता है। इस बारे में भी सोचने की आवश्यकता है।
I am having a number of points. Had you given me half-an-hour to speak, I would have taken care of every aspect. What happens is that we have been discussing the same issues again and again. So, I have not gone into those cases where atrocities on women are increasing. I humbly feel and insist that all such atrocities should be stopped forthwith. Whatever amendments in the Acts are required for doing so, those amendments should be made. But I know that by amending the law, we will not be able to give a peaceful life to the womenfolk. Let us discuss all these problems and take corrective steps by having an open mind. There is no use of just making allegations against each other. After all, we all are members of the same society. We all should enjoy equal rights.
As far as the Women's Reservation Bill is concerned, last year, I rose and opposed that Constitution Amendment Bill only because that was to be passed without having deliberations. I said that without deliberating upon the amendments, no Bill should be passed. After that, all these developments have taken place. At that time also, I had suggested that by making 33 per cent compulsory reservation, the total performance will be nil. So, it is necessary that all the parties should give 33 per cent of their tickets to women and those who are not going to comply with that provision, the recognition of that party should be taken away.
"> श्री रवि प्रकाश वर्मा (खीरी): अध्यक्ष जी, आज आपने इस विषय पर मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं और माननीय गीता मुखर्जी भी धन्यवाद की पात्र हैं जिन्होंने एक ज्वलंत समस्या की ओर हम सभी का ध्यान खींचा है और एक नतीजे पर पहुंचने का प्रयास किया है। माननीय सभापति जी, हम जब सभा भवन में घुसते हैं तो वहां एक श्लोक लिखा हुआ है। "न सा सभा यत्र न सन्ित व्ृाद्धा, व्ृाद्धा न ते यो न वदन्ित धर्मम्। धर्म: स नो यत्र न सत्यमस्ित, सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति"। माननीय अध्यक्ष जी, यह श्लोक, ये शब्द द्रोपदी के मुंह से निकले थे जब इसी आसमान के नीचे, इसी सरजमीन पर, ऐसे ही किसी सभा भवन में एक मौका ऐसा आकर खड़ा हो गया था जिसमें उसने यह सवाल किया था कि मुझे बताया जाए कि मैं अपने पति की सहचरी हूं या सम्पत्ित हूं। आज ही की तरह बड़े-बड़े योद्धा, बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ, बड़े-बड़े संत-महात्मा उस सभा के अंदर बैठे हुए थे लेकिन वह सवाल बिना उत्तर के रह गया। हजारों सालों की इस काल यात्रा में हमारा समाज इसी यक्ष प्रश्न को लेकर भटकता रहा है और आज भी हम उसी प्रश्न पर चर्चा कर रहे हैं तो हमें सोचना पड़ रहा है कि हम कहां तक पहुंचे हैं। मानव की विकास-यात्रा में, प्रागैतिहासिक काल से लेकर आज तक नारियों और पुरूषों में जो सहयोग था उस सहयोग की बदौलत ही हमारी सभ्यता और संस्कृति यहां तक पहुंची है और आगे भी विकास की ओर अग्रसर रहेगी। आज जो विचार हो रहा है और हमारे भाइयों और बहनों ने जो बातें कहीं है उसमें और भी विचार करने की जरूरत है। मैं अपना एक अनुभव बताना चाहता हूं। आज से कई वर्ष पहले मुझे पता लगा कि उत्तर प्रदेश के अपने ही क्षेत्र खीरी में एक रैकेट चलाया जा रहा है जिसमें एक महिला औरतों की बिक़ी कर रही है। मैंने पुलिस की मदद से उस महिला को पकड़वाया। जो लड़की बिकने आई थी उसने मुझसे चंद सवाल किए। उसने कहा कि आपको लग रहा होगा कि आपने कोई महान कार्य कर दिया है, आपने मेरा उद्धार कर दिया है। उसने कहा कि मुझे मालूम है कि मेरे मां-बाप ने मुझे बेचा है लेकिन गरीबी की इंतहा हैं, इस गरीबी में मैं इन बेदर्द लोगों के साथ चलते-चलते यहां तक चली आई हूं कि कहीं तो ठिकाना मिलेगा जहां हम इज्जत की एक रोटी पा सकेंगे। मुझे महसूस हुआ कि हमारे समाज के सामने जो प्रश्न है वह पुन: खड़ा हो गया है और समझदारी के अंदर जो एक कायरता भी नहित रहती है, उसका अहसास मुझे हुआ। एक और उदाहरण मैं लखनऊ का देना चाहता हूं। एक पंसारी की दुकान पर मैं बैठा हुआ था तो एक रिकशे पर एक महिला पर्दे में एक शातिर आदमी के साथ जा रही थी। वह आदमी उस पंसारी की दुकान पर आया और पंसारी से कहा कि मैं एक साल से प्रयास कर चुका हूं, सफल नहीं हुआ, अब तुम भी प्रयास करो। मैंने जानकारी लेने के लिए पता किया तो मुझे पता चला कि अल्पसंख्यक समुदाय की वो महिला थी जिसके कोई बच्चा नहीं हुआ था, इस कारण उसका पति उसको छोड़ देना चाहता था। परिवार की किसी महिला ने उसे सलाह दी और हकीम-मौलवियों के हवाले उसे कर दिया था और कहा था कि कहीं से भी एक बच्चा लाओ वरना तुम्हारा पूरा भविष्य खतरे में है। इस तरह से वह भद्र महिला एक वर्ष से उस ठग के हाथों ठगी जा रही थी। उस महिला ने इस उम्मीद में कि परिवार में उसे सम्मान मिले पता नहीं कितने समझौते किये थे। माननीय अध्यक्ष महोदय, हम जब वर्तमान स्िथति में इसकी गहराई को देखते हैं तो पता चलता है कि यह एक गंभीर सामाजिक समस्या है। लेकिन हमारे जो साथी लोग उसको बहुत हल्के तरीके से ले रहे हैं, उसको मात्र एक राजनैतिक समस्या के रूप में ले रहे हैं, मैं उनको आगाह करना चाहता हूं कि वे ऐसा न करें, नहीं तो यह मानवता के प्रति एक अपराध होगा। एक नया ट्रेंड पैदा हुआ है कि महिला उत्पीड़न को पुरूषों के नाम से संबोधित किया जा रहा है और यह एक बहुत बड़ी भूल है। नश्िचत रूप से नारी और पुरूष हमारे समाज की सभ्यता और संस्कृति के मुख्य अंग हैं और उनका बराबर का सहयोग है। जहां तक उत्पीड़न की स्िथति है, जैसा कि हमारे कई भाई लोग बता चुके हैं, उत्पीड़न नारियों का हुआ है लेकिन उसमें दोनों का हाथ रहा है। मैं यह कहना चाहता हूं कि यह उत्पीड़न मात्र नारी का नहीं है वरन यह उत्पीड़न हर कमजोर और विवश आदमी का उत्पीड़न है, बेबस आदमी का उत्पीड़न है जिसे हम अपनी सामाजिक और आर्िथक व्यवस्था में रोज देखते हैं। जहां तक महिलाओं के विकास की बात आई, भारतीय संस्कृति के अंदर महिलाओं का विकास किसी से छिपा नहीं है। इसमें दोनों का बराबर का सहयोग है। आज हमारे मुल्क की एक बेटी अंतरिक्ष में घूम रही है और हमारे देश की कई बेटियों ने स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में नाम पैदा किया है। राजनीति में, समाज सेवा मे, नौकरी में, हर क्षेत्र में महिलाएं आगे बड़ी हैं और उन्होंने नाम पैदा किया है, हिंदुस्तान का नाम रोशन किया है। महिला उत्पीड़न के ऊपर एक संकीर्ण नजरिया न अपनाया जाए और समस्या के सामाजिक स्वरूप को समझते हुए उसमें विकास की उम्मीद की जाए और विशेष रूप से हमें मानवीय मूल्यों के विकास के प्रति अधिक सजग रहने की आवश्यकता है। एक बात हमें बहुत परेशान कर रही है और वह यह है कि मध्य-युगीन मानसिकता हमारे लोगों के दिमागों में अभी भी भरी हुई है। जैसा कि इस बात की ओर इशारा किया गया कि हिंदुस्तान के अंदर मध्य-युग में जब बाहर से आक़ांता आए, उसके बाद हमारे हिंदुस्तान की संस्कृति में एक प्रदूषण फैला और इस तरह की विचारधारा पनपी, लेकिनऐसा नहीं है। जैसा कि भाई आठवले जी ने कहा कि इसी मुल्क में, इसी आसमान के नीचे महिलाओं को अधिकार-विहीन किया गया, सार्वजनिक रूप से उनको अपमानित किया गया, उनका अपहरण किया गया, उनका परीक्षण किया गया, उनको छल से बनवास दिया गया लेकिन आज हम उन्हें माननीय-सम्माननीय मानते हैं, माता कहकर पुकारते हैं। नश्िचत रूप से मेरी यह मान्यता है कि हमारा समाज सबके सहयोग से आगे उन्नति करेगा।
... (व्यवधान)बहुत से कानून पास हुए हैं जिन्होंने नश्िचत रूप से महिलाओं की स्िथति को बदला है। लेकिन एक बात सबसे महत्वपूर्ण है जो आज तक नजर-अंदाज होती रही है और वह यह है कि हमारी महिलाएं जो हमारे घरों में काम करती हैं, खेतों में काम करती हैं, और क्षेत्रों में लगी हुई हैं उनका आर्िथक मूल्यांकन आज तक नहीं हो सका है। जबकि परिवार के अंदर, समाज के अंदर, राष्ट्र के अंदर उनके इस कार्य का महत्व आज तक उनको मिल जाना चाहिए था जिसकी वे हकदार हैं। आज जब हमारी अर्थव्यवस्था का मूल्यांकन होता है, सर्िवसेज और जी.डी.पी. का असैसमेंट होता है तो उसके अंदर यह कमी बहुत खटकती है कि हमारी महिलाओं के काम का आर्िथक मूल्यांकन नहीं होता है। महिला बिल की बात आई तो यह स्पष्ट है कि मीडिया ने हिंदुस्तान में स्त्री और पुरूष के बीच में एक संघर्ष को जबरदस्ती चन्िहत करने की कोशिश की है।
MR. SPEAKER: You are the second leader from your Party. The time allotted for your speech is over. Nothing will go on record from now onwards.
(Interruptions)* MR. SPEAKER: The Speech of Shri N.T. Shanmugham will only go on record.
__________________________________________________________________________ * Not Recorded ">SHRI N.T.SHANMUGAM (VELLORE): Hon'ble Speaker, I thank you for giving me an opportunity to speak on atrocities against women. I share the concern expressed by the members while participating in the discussion mooted by Smt. Geeta Mukherjee in this august House.
Mahakavi Subramania Bharathi who hailed from Ettayapuram dedicated himself to the freedom struggle and spread the spirit of freedom and patriotism through his simple poems. He composed poems on women's emancipation too. He condemned the atrocities committed against women. He made himself a fortness to safeguard the rights of women. He exhorted "we would burn the idiocy of subjugating and humiliating women."
Likewise the people's epic `Silappadhikaram' authored by Ilango Adigal glorified the dignity of women. He portrayed Kannagi as an embodiment of modesty and chastity. She established the truth to disprove the charge against her husband. Shr broke to pieces her bracelet to show that her husband was not a thief. Shr sought for justice in the court of the Ppandya King. It is still a history that she even caused the destruction of that kingdom.
We call our country `Bharat Matha'. We feel proud to call our land as `motherland'. We linked our country to a lady, to that of a mother. We see mother in nature. All the rivers like Ganga, Godavari, Cauvery are seen as women and mothers. We clelbrate mother Cauvery as she flows in to give life to many.
It really pains our herat to note several atrocities against the women of this country which is known for glorigying women both in the form of Goddesses and mothers. We are born to mothers and nursed by them to grow as men. That is why we compare mother, father and teacher to God. We have given first place towomen in that order.
But what is happening today? The moment it is confirmed that the child in the owmb is a girl child, attempts are made to abort its further growth before being born as a baby. In case the girl child is allowed to be bron it is done away with, projecting it to be a postnatal death. Such killings are covered up as stillborn.
In Tamil Nadu, Dr Puratchi Thalaivi brought forth `cradle baby scheme' with the noble aim of saving the unwanted girl child. Several lives have been saved through this scheme.
The country is witnessing several hardships to women and cruelties inflicted against them. Dowry evil is one such. Dowry deaths are rampant here. Kerosene is pured on them and they are burnt to death when women do not bring the demanded dowary. They cover it up as deaths due to stove-explosions. But the irony is that only women become victims to this tove-fires. Husband and in-lawas either burn the brides or force them to suicides. It has become a continuing sad tale. Women do not have safety and security. They are treated as mere commodities.
It happened is Chennai two weeks back that a lady living alone separated from her husband was subjected to sexual violence when seven men gangraped her.
__________________________________________________________________________ * Original in Tamil Likewise, on 17th of this month a college student from Ethiraj College, Chennai became a victim of barbarious eve-teasing. The firl Sarika while coming out of her collece was waylaid by miscreants in borad daylight. She was chased by goons in an auto-rickshaw. They drowsed her using water pistiols. She was so violently pulled and pushed that she suffered grievous head injuries to which she succumbed later on. She died pathetically in the hospital as a victim of eve-teasing.
SHRI T.R. BALLU (MADRAS SOUTH) : Mr Speaker Sir, it is unwarranted. It is a State Government subject. The p[osition is that nine persons have ben arrested and the case is going on against them....(Interruptions)
SHRI N.T. SHANMUGAM : You should not interrupt me like this. I am only referring to that incident.....(Interruptions)
MR SPEAKER : Please do not distrub.
SHRI N.T. SHANMUGAM : I would like to say that women in Tamil Nadu do not have safety and security today. At least for eight days it remained as an accident-case filed on petty charges. Only after the death of the firl Sarika, it was altered to be a criminal murder case. After all these things those nine goondas have been arrested. This is what is happening in Tamil Nadu. This shameless act is reported to have been committed by the volunteers of Youth Congress. Thgis is condemnable and despicable an act. In several parts of India and also in Tamil Nadu we find cases of custodial sexual violence against women. There is no safety to the chastity of women even in police stations. We also read in papers that higher authorities in Government offices sexually exploit and sexually assault women employees. There is no safety to the chastity of women employees.
What we read in a newspaper dated 27.7.98 is quite alarming. A girl was chased by goondas during a midnight and was saved by a good samaritan and had to seek refuge in a safety home. That orphaned girl's narration of her woes is sympathetic. Her uncle aranged to marry her off to an elderly person. Hence she took the course of fleeing from her foster-home.
So women in India are not free even after 50 years of our independence. Le me recall what Mahatma Gandhiji said once. "Only when we could find a lady walks home safety at dusk with all her jewels on, we may accept that we have attained freedom", that is was Gandhiji said. I do not know as to when we would be able to see that dream a reality.
Hence I urge upon the Government to legislate suitable laws with stringent punishment to curb atrocities on women. With this, I conclude.
"> श्री जोवाकिम बखला (अलीपुरदुआर्स) : अध्यक्ष महोदय, माननीय अध्यक्ष जी, मैं सर्वप्रथम श्रीमती गीता मुखर्जी का आभार व्यकत करना चाहता हूं कयोकि उन्होंने इस सदन में एक संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय चर्चा के लिये रखा है। इस देश की आजादी की ५०वीं वर्षगांठ की समाप्ित के अवसर पर इस देश में महिलाओं पर जो अत्याचार हो रहे हैं, उनका सामाजिक, आर्िथक तथा मानसिक शोषण किया जा रहा है, इस विषय को लेकर हम आज इस सदन में चर्चा में भाग ले रहे हैं। हमें इस बात का दुख है कि आज हमारे देश में हर ५४ मिनट में एक बलात्कार और हर १०२ मिनट में दहेज के कारण हत्या होती है। आज हमें सदन में यह सुनकर दुख होता है कि जो माननीय सदस्य इस बहस में भाग ले रहे हैं,आज हमें सदन में यह सुनकर दुख होता है कि दहेज के कारण जो घटनायें होती हैं, उनमें पुरुषों का दोष है। स्त्रियो पर जितने भी अत्याचार होते हैं, जो उत्पीड़न और शोषण होता है, उसके लिये पुरुषों को उत्तरदायी बनाया जा रहा है। इस संदर्भ में हमारा अपना अनुभव यह है कि हमारे देश में दहेज की जो घटनायें होती हैं, उनमें महिलाओं का भी सहयोग रहता है। यह बड़े दुख की बात है। हमारे देश के समाज में जो प्रक़िया और व्यवस्था है, उसमें परिवर्तन लाना चाहिये। हमारी दृष्िट में यह परिवर्तन लाना इसलिये आवश्यक है कयोकि नारी जिसे हमने संविधान में समानता का अधिकार दिया हुआ है, जिनका हम सम्मान करते हैं और बस में भी महिलाओं के लिये कुछ स्थान सुरक्षित रखे हुये हैं, यदि कोई महिला बस में खड़ी होती है तो हम लोग उसके लिये स्थान छोड़कर खड़े हो जाते हैं, लेकिन दुख की बात है कि हमारे अंधविश्वासी समाज की संस्कृति ऐसी है कि बाल-विवाह के कारण यदि किसी पुरुष की म्ृात्यु हो जाती है तो उसका दोष बालिका को दिया जाता है। यहां यह भी देखा गया है कि १२ वर्ष से लेकर ८०-८५ वर्ष की महिलाओं को मथुरा, व्ृान्दावन और वाराणसी में आश्रय लेना पड़ रहा है। किसी १२ वर्ष की बच्ची का विवाह होने पर यदि उसके पति की म्ृात्यु हो जाती है तो उसका दोष लड़की को दिया जाता है। जिनकी उम्र ज्यादा होती है, वे भीख मांगकर अपना जीवन-यापन करती हैं। मंदिर से जो प्रसाद मिलता है, उसे खाकर अपना पेट भरती हैं। जो नौजवान लड़कियां विधवा हो जाती हैं, उनको दैहिक व्यवसाय भी करना पड़ता है। अध्यक्ष महोदय, बाबा साहेब अम्बेडकर ने हम लोगों को तीन बातें बताई थीं कि महिलाओं, दलितों, अनुसूचित जाति और पिछड़ी जाति की महिलाओ शक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो। मैं इन महिलाओं से कहना चाहता हूं कि आप लोग आगे आइये, संगठित होइये, शक्षित होइये और संघर्ष के लिये तैयार होइये, दुर्गा का रूप धारण करो, रणचंडी का रूप धारण करो और तुम लोगों पर जो अत्याचार हो रहा है, उसके लिये संघर्ष करो। हम पुरुष लोग आपका सहयोग करेंगे कयोंकि स्त्री और पुरुष दोनो एक-दूसरे के अभिन्न अंग हैं।
16.00 hrs. इस समाज में आपको अगर महिलाओं के उत्पीड़न की बेड़ी को तोड़ना है तो शिक्षा के क्षेत्र में हमारे देश की सरकार को महिलाओं के लिए अलग मंत्रालय की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि महिलाओं के कल्याण के लिए विशेष सुविधा शिक्षा के क्षेत्र में हो या आर्िथक क्षेत्र में हो। हमारे देश में महिलाओं की बराबरी की संख्या है और उन्नति के पथ पर जिस तरह से वे पुरुषों के साथ हाथ बंटाती हैं, सरकार के इस कदम से देश उसी तरह से उन्नति के पथ पर आगे बढ़ेगा। जहां तक महिला आरक्षण कि बात है, हम लोग उसका समर्थन करते हैं, लेकिन यह भी देखना चाहते हैं कि महिला आरक्षण के साथ साथ जितनी पिछड़े हुए वर्ग हैं, अनुसूचित जाति और जनजातियों के लोग हैं, जितनी माइनॉरिटी के लोग हैं, उनको भी बराबरी का हिस्सा मिलना चाहिए। आरक्षण द्वारा महिलाओं को अपने विकास का पूरा मौका मिलेगा। इतनी बात कहकर मैं आपको धन्यवाद देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।
"> श्री रामानन्द सिंह (सतना): अध्यक्ष महोदय, इस सदन की अत्यंत वरिष्ठ तथा इस सदन और देश में बहुत ही सम्मानित आदरणीय गीता जी ने नियम १९३ के अधीन महिला उत्पीड़न पर जो चर्चा उठाई है, वह बहुत ही सामयिक है। अध्यक्ष महोदय, यथार्थ यह है कि चाहे हम अतीत की भारतीय नारियों के कितने ही गुणगान करें, यह सत्य है कि यहां गार्गी हुई, मैत्रेयी हुई, सीता, सावित्री, अहल्या हुई, झांसी की रानी, बद्मावती, दुर्गावती हुई। भारतीय इतिहास नारियों की गौरव गाथा से भरा पड़ा है। उनकी विदुषी होने की, उनकी विद्वता की स्वरगाथाएं हैं लेकिन यह सत्य है कि प्रकाश के साथ अंधकार का युग भी हमेशा रहा और मध्य युग में जो पर्दा प्रथा का चलन हुआ और जिस तरह से नारियों को उनके अस्ितत्व की रक्षा के लिए घरों की चारदीवारी में बंद किया गया, मध्य युग से जो चलन चला है, वह आज़ादी के ५० वर्ष बाद भी समाप्त नहीं हुआ है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने आज़ादी के आंदोलन में इतना बड़ा संघर्ष करने के साथ-साथ भी हमें प्रेरणा और मार्गदर्शन दिया था। सभापति महोदय, आज इस सदन में दहेज की चर्चा हुई। दहेज का दानव आज इस समाज को निगलता जा रहा है। हर व्यकित परेशान है चाहे वह कर्मचारी हो, सांसद हो या विधायक हो। लेकिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने बेटे रामदास गांधी की शादी सिर्फ एक रुपये चार आने में की थी। यह एक उदाहरण था। आज हम पूछना चाहते हैं कि हमारे कितने सांसद, चाहे पुरुष हों या महिलाएं, कितने विधायक बिना दहेज की सस्ती शादी के लिए तैयार हैं? अध्यक्ष महोदय, राष्ट्रपिता बाबू ने एक और उदाहरण रखा था जब उनसे कहा गया कि आप अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहन देते हैं। गांधी जी ने कहा कि बहुत दिया, लेकिन अब मैं चाहता हूं कि प्रतिलोम विवाह हो, यानी ऊंचे वर्ण की लड़की हो और छोटे वर्ण का लड़का हो तो मैं आशीर्वाद दूंगा। तब गांधी जी के छोटे बेटे देवदास गांधी की शादी चक़वर्ती राजगोपालाचारी जो भारत के गवर्नर जनरल बने और जो ब्राहमण थे, उनकी बेटी लक्षमी से हुई और इस प्रकार अंतर्जातीय विवाह शुरू किया। लेकिन आज दुर्भाग्य है कि हम यह चर्चा यहां नहीं कर रहे हैं। हम केवल उथली चर्चाओं से इस बहस को समाप्त करना चाहते हैं। किसी एक महिला के साथ अन्याय हो गया। अन्याय तो नश्िचत रूप से बुरा है, लेकिन इस समाज में कितनी अभागिनें हैं जो सारी ज़िन्दगी रो-रो कर अपने भाई या बूढ़े मां-बाप के यहां बिता रही हैं। कया विधवा विवाह के लिए यह लोक सभा प्रोत्साहन देने के लिए ग्ृाह मंत्री कोई फैसला करेंगे कि अगर कोई विधवा का विवाह करेगा तो उस पुनर्िववाह में जो खर्च आएगा, उसको भारत सरकार या राज्य सरकार उठाएगी? मैं यह सवाल उठाना चाहता हूं जो बहुत मौलिक सवाल है। मैं मध्य प्रदेश शासन में स्वायत्त शासन मंत्री थी। मैंने इंदौर में उन लोगों को बुलाया जिन्होंने अंतर्जातीय विवाह किया। उन्हें भारतीय सामाजिक व्यवस्था में अपमान का जीवन जीना पड़ता है कि तुमने अंतर्जातीय विवाह किया है। एक ब्राहमण की लड़की ने हरिजन डाकटर के लड़के से शादी की, लड़की के मां-बाप ने उसका तिरस्कार कर दिया। मैंने वह अंतर्जातीय विवाह करने वाले जोड़े को बुलाकर सम्मानित किया, उन्हें पुरस्कृत किया और यह फैसला भी किया कि मध्य प्रदेश की नगरपालिकाओं में अंतर्जातीय विवाह करने वाले जोड़े में से एक को हम नौकरी देंगे। मैं भारत सरकार से जानना चाहता हूं कि कया वह भी इस संबंध में कुछ करेगी? मैं चाहता हूं कि अंतरधार्िमक संबंध भी हों। श्रींमती इंदिरा गांधी से मेरे अनेक मतभेद थे, उनकी इमरजेन्सी का मैं बहुत कटु आलोचक रहा हूं, इमरजेन्सी पर एक महीने बाद मेरी एक पुस्तक प्रकाशित होने वाली है, लेकिन अध्यक्ष महोदय, उन्होंने अपने बेटों का अंतरधार्िमक संबंध स्थापित करके एक उदाहरण देश के सामने पेश किया। लेकिन आजादी के ५० वषर्ों के बाद भी कया हम आज इस दिशा की ओर अग्रसर हो रहे हैं या वही पुराने अतीत को दोहराते जायेंगे। अध्यक्ष महोदय, महिलाओं पर अत्याचार के संबंध में यह बिल आया है, जिससे महिलाएं बहुत व्यथित हुई हैं। यह बिल बहुत पहले आना चाहिए था। भारतीय समाज को यह मंजूर करना चाहिए कि महिलाओं की स्िथति आज चूल्हे-चौके में है। संसद में आज कितनी महिला सांसद हैं। हमारी पत्नी बेचारी खेती संभालती है, लेकिन हम यहां संसद में पहुंच गये, लेकिन ऐसे कितने सांसद हैं। आज लालू प्रसाद जी की पत्नी मुख्य मंत्री बन गई। भले ही वह पढ़ी-लिखी नहीं हैं, लेकिन शानदार काम कर रही हैं। आप आलोचना करिये। वह पढ़ी-लिखी नहीं हैं लेकिन बड़ी दमदार महिला हैं। जो पढ़ी-लिखी नहीं होती, लेकिन दमदार महिला होती हैं। अध्यक्ष महोदय, मैं दो मिनट में अपनी बात समाप्त करूंगा। शादी के बारे में शारदा एकट बना। मैं विंध्य प्रदेश में विद्यार्थी था, वहां गवर्नर के बंगले की बगल से तीन साल के बच्चे की शादी की पालकी जा रही थी। यह सब कैसे रुकेगा। इन विवाहों को हम देखते हैं, इनमें पार्टीसिपेट भी करते हैं, हमें शर्म आनी चाहिए। बाल-विवाह को रोकने के लिए शारदा एकट में कया सुधार किया जाए? विधवा विवाह को प्रोत्साहन देने के लिए कया कार्यवाही की जाए? दहेज विरोधी कानून को बहुत सख्त बनाने की जरूरत है। पीपुल्स रिप्रजेंटेशन एकट में यह व्यवस्था होनी चाहिए कि दहेज मांगने और लेने वाला आदमी लोक सभा या विधान सभा का चुनाव नहीं लड़ सकता। दहेज लेने और देने वाला व्यकित कदापि सरकारी नौकरी नहीं पा सकता है। इस तरह के फैसले अब सरकार को करने पड़ेंगे, खाली चर्चा करने से इस समस्या का समाधान नहीं होगा। उत्तराधिकार कानून को ही लें। जब मैं मंत्री था, मेरे पास विधवाएं आकर रोती थीं कि हमारे ससुर ने हमें निकाल दिया, हमारे पति के बड़े भाई ज्येष्ठ ने हमें निकाल दिया, हमारी ननद हमें तंग करती हैं। भारत में जितनी बाल-विधवाएं हैं उतनी विश्व में कहीं नहीं हैं। कया इन बाल विधवाओं के लिए अपने समाज को बदलने के बारे में हम सोचेंगे। बलात्कार की घटनाएं अतीत में भी होती रही हैं, लेकिन इस समय तो स्िथति और भी भयावह हो गई है, बलात्कार के बाद जला देना, मार देना आम बात हो गई है। इस बारे में बहुत ही कठोर दंड का प्रावधान करना चाहिए। सी.आर.पी.सी. में अमेंडमेंट लाने की जरूरत है। इन कानूनों को नये संदर्भ में देखने की जरूरत है। महिलाओं को पति छोड़ देते हैं। हमारे देश में बहुत परित्यकताएं हैं। अध्यक्ष महोदय, बस्तर में एक कलकटर थे। वहां जितने अधिकारी जाते थे, आदिवासी लड़कियों से बर्तन मंजवाते थे, उन्हें फिर रखैल बना लिया, बच्चे पैदा करे और फिर छोड़कर भाग आये। जो बच्चे अनाथ हैं, जिनकी माताएं पापड़ बेलती हैं, उनके बच्चे पापड़ बेचते हैं, लाटरी बेचते हैं, इन सब पर एक नये दृष्िटकोण की आवश्यकता है। मैं श्रीमती गीता मुखर्जी का बहुत आभारी हूं कि उन्होंने इस बिल को लाकर देश तथा सदन में इस पर चर्चा करने का हम सभी को मौका दिया। ऐसी चर्चाएं लोक शिक्षण का काम करती हैं, देश को एक दिशा देती हैं। भले ही उनका फल आज न निकले, लेकिन इन चर्चाओं से कल का अच्छा भारत जरूर बनेगा। इसका एक उजला पक्ष जरूर निकलेगा। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
SHRI SANSUMA KHUNGGUR BWISWMUTHIARY (KOKRAJHAR): Mr. Speaker, Sir, I have also given my name.
MR. SPEAKER: No. I have already called the hon. Minister of Home Affairs.
SHRI SANSUMA KHUNGGUR BWISWMUTHIARY : Then, are we not interested in having a discussion on the atrocities on the Bodo girls and women that are going on in the Bodoland area?
"> ग्ृाह मंत्री (श्री लाल कृष्ण आडवाणी): अध्यक्ष महोदय, संसद के पिछले सत्र और इस सत्र में कई विषयों पर चर्चा हुई है, लेकिन महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार के विषय पर जो चर्चा इस सदन में हुई है, मैं समझता हूं कि वह सर्वाधिक महत्वपूर्ण और बहुत परिणामकारक रही है। मैं उसका बहुत स्वागत करता हूं और मैं श्रीमती गीता जी, जिन्होंने इस विषय को उठाया उनके प्रति बहुत आभार प्रकट करता हूं। यद्यपि यह शार्ट डयूरेशन डिसकशन है और इसके लिए केवल दो घंटे का समय नियत किया गया था, लेकिन इस विषय की गंभीरता को देखकर और सदन की दिलचस्पी को देखकर यह चर्चा दो घंटे की बजाय साढ़े छ: या पौने सात घंटे तक हुई, चार दिनों तक यह चर्चा लगातार चलती रही। आज जब मैं इस बहस का उत्तर देने के लिए खड़ा हुआ हूं, तो इतना ही कह सकता हूं कि जितनी बातें कही गई हैं, उन्होंने इस बात को उजागर किया है कि जिस देश में गार्गी, मैत्रेयी, सीता, सावित्री और जिन-जिन देवियों का नाम लेकर हम गर्व का अनुभव करते हैं उस देश में अध:पतन इतना हुआ कि ९० साल की व्ृाद्धा के साथ बलात्कार हो, तीन-चार साल की मासूम लड़की के साथ बलात्कार हो, यह शोचनीय है। अध्यक्ष महोदय, मैं उस दिन सुनकर दंग रह गया जब किसी ने बताया कि किसी एक महिला ने चूंकि किसी दूसरे व्यकित के साथ शादी की थी या उसके साथ चली गई थी इसलिए पंचायत ने तय किया कि उसका पति और उसके रिश्तेदार उसके साथ सामूहिक बलात्कार करें और पंचायत के निर्णय के अनुसार वह सामूहिक बलात्कार हुआ। देश में इतना अध:पतन हो जाए, नश्िचत रूप से यह पूरे देश के लिए चिन्ता का विषय है। चिन्ता का विषय केवल शासन के लिए नहीं, केवल सरकार के लिए नहीं बल्िक पूरे देश के लिए चिन्ता का विषय है। इसलिए मैं इस बात को कहना चाहूंगा- यहां पर सभी सदस्यों ने बहुत सहज रूप से कहा कि यदि कोई अपराधी पाया जाए, तो उसे म्ृात्यु दंड दिया जाए, लेकिन शायद मैं और गीता जी भी उसी समति की सदस्य थीं, जिसने इस बलात्कार के मामले पर विचार किया था। हमने कस्टोडियल रेप को सीरियसली लेकर यह निर्णय किया कि जो कस्टोडियल रेप का दोषी पाया जाए, उसे आजन्म कैद दी जाए और यदि कोई बलात्कार का दोषी पाया जाए, तो उसे १० साल की सजा दी जाए। यदि कोई जज उसे दोषी पाए, तो कम से कम इतनी सजा तो देनी ही पड़ेगी। अध्यक्ष महोदय, मैं सदन को बताना चाहता हूं कि हमारी सरकार बलात्कार के मामले को अतिगंभीर अपराध मानती है। एक महिला की हत्या करने से भी बड़ा अपराध बलात्कार को मानती है कयोंकि महिला की हत्या करने के बाद तो वह लाश हो जाती है, लेकिन बलात्कार के बाद वह जिन्दा लाश बनकर जीवित रहती है। हम यह भी मानते हैं कि हिन्दुस्तान में या तो म्ृात्युदंड हो ही नहीं, वह अलग बात है, लेकिन यदि हो, और हत्या के लिए धारा ३०२ के तहत म्ृात्यु दंड दिया जा सकता है, तो कोई कारण नहीं कि यदि बलात्कार प्रमाणित हो जाए, हालांकि वह आसानी से प्रमाणित नहीं होता कयोंकि जिस प्रकार के हमारे कानून हैं उनमें जिस प्रकार से गवाही होती है, जिसमें महिला को बहुत तकलीफ भुगतनी पड़ती है, इसलिए वह प्रमाणित नहीं होता, लेकिन यदि प्रमाणित हो जाए, तो उसे म्ृात्यु दंड कयों न दिया जाए। अध्यक्ष महोदय, हमारा मंत्रिमंडल इस पर विचार करेगा। अलबत्ता यह बात सही है कि क़मिनल लॉ कनकरंट सब्जैकट है और इसके लिए हमें स्टेट से भी सलाह करनी होगी। मैं अपनी तरफ से अपनी सरकार की इच्छा प्रकट कर रहा हूं, अगर सदन सहमत होगा तो मुझे लगता है कि हिन्दुस्तान भर में जितने राज्य हैं, उनकी सरकारें भी इस बात की गंभीरता को स्वीकार करके बलात्कार के लिए म्ृात्युदंड का प्रावधान क़मिनल लॉ में करने की हमको इजाजत देगी। मैं इस कारण भी इस बहस से प्रसन्न हूं कि इसे गीता जी ने शुरू किया और इस बात पर बल दिया कि यह विषय ऐसा नहीं है जिसमें हम राजनीति लायें। इस विषय को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देखें और गीता जी ने उसी लहजे में अपनी बातें कहीं। उसके बाद विपक्ष के नेता खड़े हुए। उन्होने भी इसी बात पर बल दिया। यहां तक कि मैं देख रहा था कि जब उन्होंने राज्यों का नाम लिया कि किन-किन राज्यों में महिलाओं के साथ अत्याचार की बड़ी दुखद घटनायें हुई हैं तो ऐसा नहीं कि कांग्रेस के शासित राज्य को छोड़ दो और गैर कांग्रेसी राज्य ले लो, उन्होंने ऐसा नहीं किया और सबका नाम लिया। जहां-जहां भी घटनायें होती हैं चाहे राजस्थान में हो, चाहे महाराष्ट्र में हो, चाहे उड़ीसा में हो या कहीं भी हो, उन्होंने सबका उल्लेख किया। मैं भी चाहूंगा कि इन मामलों में हम दलगत राजनीति से नहीं सोचेंगे। महिलाओं के साथ अत्याचार के बारे में श्री रामानंद सिंह जी ने ठीक ही कहा कि यह केवल अत्याचार का ही सवाल नहीं है, यह मूलत: अन्याय का सवाल है, असमानता का सवाल है। हमको अपराध बोध नहीं होना चाहिए कि यहां हमेशा यही होता रहा है, मैं इसे नहीं मानता हूं। हां, इन्होंने सही कहा कि हर समय दोनों पक्ष रहे हैं, सब प्रकार की बातें रही हैं, जहां तक वूमैन रिजर्वेशन बिल का सवाल है, तो इस बिल का संबध पोलटिकल एम्पावरमैंट से है। उसका संबंध अन्याय, अत्याचार से नहीं है। मैं तो यह मानता हूं कि पोलटिकल एम्पावरमैंट भी जाये तो भी बलात्कार शायद नहीं रुकेगा। उसके बाद भी नहीं रुकेगा कयोंकि मूलत: अन्याय समाज मे नहित है, असमानता समाज में नहित है। यदि ८ परसेंट की बजाय २० परसेंट, ३३ परसेंट महिलायें भी आ जायें तो उसके कारण भी बलात्कार नहीं रुकेगा। हां, उससे महिलायें निर्णय की व्यवस्था में अधिक योगदान देंगी। अगर उनका योगदान अधिक होगा तो मैं मानता हूं कि व्यवस्था अधिक अच्छी बनेगी।
... (व्यवधान) आवाज तो आज भी उठती है लेकिन उससे कुछ नहीं होता। मैं इस बात पर बल दे रहा हूं कि पोलटिकल एम्पावरमैंट के संदर्भ में मैंने चुनाव सुधार का बहुत अध्ययन किया और अध्ययन करते हुए पाया कि पश्िचम जिसको बहुत आगे बढ़ा हुआ माना जाता है और जहां महिलाओं के बहुत अधिकार माने जाते हैं वहां महिलाओं को मतदान का अधिकार प्राप्त करने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा। उन्हें मतदान का अधिकार सहज रूप से नहीं मिला। इसके लिए उनको बहुत संघर्ष करना पड़ा, बलिदान करना पड़ा। इस कारण बहुत सारी महिलायें भी मरीं। पहली बार शायद १९१७-१८ में बड़ी मुश्िकल से हाउस ऑफ कामन्स ने कहा कि वोट देने का अधिकार चार महिलाओं को दे दो। आपको सुनकर ताज्जूब होगा कि जो कानून पेश किया गया उसमें पुरुषों के मतदान की उम्र २१ साल थी। पहले २१ साल थी, बाद में चलकर इसे १८ साल किया गया लेकिन उसमें महिलाओं के लिए लिखा गया कि ३० साल की उम्र होनी चाहिए कयोंकि उनमें तब कुछ अकल आती है, समझ आती है कि वह वोट दे सकें। आगे चलकर बड़ी मुश्िकल से उन्हें बराबरी का अधिकार दिया गया। यूरोप के कुछ देश ऐसे थे जिनमें आज से कुछ साल पहले तक यह अधिकार महिलाओं को नहीं दिया गया था। मैं इसका उल्लेख इसलिए कर रहा हूं कयोंकि हिन्दुस्तान में इस प्रकार का रवैया कभी नहीं रहा। अगर कभी रहा तो उसके खिलाफ संघर्ष किया गया। धार्िमक नेताओं ने संघर्ष किया। स्वामी दयानंद जी सबसे पहले व्यकित थे जिन्होंने कहा कि यह बिल्कुल गलत बात है। महाराष्ट्र में महर्िष कर्वे हुए थे जिनके खिलाफ बहुत आंदोलन हुआ था। उन्होंने कहा कि मैं महिलाओं को पढ़ाऊंगा, शक्षित करूंगा और गांधी जी ने कहा कि यदि एक लड़के को पढ़ाते हैं तो हम एक शक्षित व्यकित और पैदा करते हैं लेकिन जिस समय लड़की को पढ़ाते हैं तो एक शक्षित परिवार पैदा करते हैं, यह सारी बातें कहीं। हिन्दुस्तान में महिला के प्रति यह दृष्िटकोण सदैव से रहा है और उस देश में यह स्िथति जो आज आई है, मैं इसको समाज के चारों ओर से पतन का लक्षण मानता हूं। किसी एक पार्टी को दोष देने की जरूरत नहीं है कि यहां पर उसकी सरकार है, इसलिए ऐसा हो रहा है। यह सरासर गलत बात है। मूलत: समाज में अगर ऐसी बात हो तो उसका प्रतिकार सब तरफ से होगा और हम चाहते हैं कि इसके खिलाफ सब मिलकर संघर्ष करें। सरकार का जितना दायित्व है, हम संभालेंगे, पुलिस को इसके बारे में जितना सचेत करना पड़ेगा, हम करेंगे। अलबत्ता मैं जानता हूं कि बहुत कोशिश करने के बाद भी पुलिस में महिलाएं भर्ती नहीं होतीं। देशभर में उनका परसैंटेज बहुत कम है, मैंने हर स्टेट में देखा है, वे बहुत कम हैं। चाहते हुए भी कि पूर्ण महिलाओं द्वारा संचालित थाने हों, कम प्रदेशों में यह संभव हो सका है और कुछ प्रदेशों में इस प्रयोग के कई दुष्परिणाम भी निकले हैं, उनको बहुत परेशान किया जाता है। मैं फिर भी चाहता हूं कि इस दिशा में बढ़ा जाए। मैं इस बारे में हरेक स्टेट से जानकारी करता रहता हूं। लेकिन आज से कुछ दिन पहले मैंने हैदराबाद जाकर, जिन ४-५ प्रदेशों में नकसलवाद की समस्या है, उन प्रदेशों के मुख्य मंत्रियों से चर्चा की और उसी समय निर्णय किया था कि संसद के इस अधिवेशन के बाद कम से कम हिन्दुस्तानभर के ग्ृाह मंत्रियों और हिन्दुस्तानभर के डी.जी. पुलिस का एक सम्मेलन आयोजित करूंगा जिसमें महिलाओं के विरुद्ध जो अत्याचार हो रहे हैं, उसकी विशेष रूप से चर्चा की जाएगी। मैं इस दिशा में आगे बढ़ूंगा कयोंकि मैं मानता हूं कि यह एक कसौटी है कि हिन्दुस्तान में कानून और व्यवस्था की स्िथति कैसी है, कयोंकि यह समाज का कमजोर वर्ग है, कमजोर वर्ग ही नहीं लेकिन यदि उनके ऊपर अत्याचार होता है तो वह समाज के सारे मूल्यों को प्रभावित करता है, खराब करता है। मेरे मित्र श्री शरद पवार जी ने कानून के संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण बातें कही थीं। उन्होंने कहा था कि यदि आज कोड ऑफ क़मिनल प्रोसीज़र के अधीन किसी महिला का तलाक हो जाए तो उसे ५०० रुपये ऐलाउंस मिलता है। १९९४ में एक विधेयक यहां पेश किया गया था जिसके अनुसार ५०० रुपये को बढ़ाकर १५०० रुपये किया गया। वह बिल पेश तो हुआ लेकिन पारित नहीं हुआ, लैप्स हो गया। इस सरकार का मत है कि अब उस बिल में ५०० रुपये की बजाए ५००० रुपये का प्रावधान किया जाए। ऐसा हम करने वाले हैं। उसी प्रकार अनेक सदस्यों ने सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय का उल्लेख किया जिसमें कामकाजी महिलाओं को दफतर में अधिकारी परेशान न करें, उनके साथ दुर्वयवहार न करें, उनका शोषण न करें, सैकसुअल ऐकसप्लॉयटेशन न करें, इस दृष्िट से गाइडलाइन दी गई थी। मैं इतना ही बताना चाहूंगा कि इस संबंध में सारे दफतरों में केवल गाइडलाइन ही नहीं भेजी गई है बल्िक कंडकट रूल फार सैंट्रल गवर्नमैंट इम्प्लाइज़ को भी अमैंड किया गया है to define sexual harassment as a specific act of misconduct. उसे भी किया गया है।
As far as setting up of complaint committees is concerned, many Central Ministries and Departments and the State Governments have been requested to set up such committees. इसी प्रकार पुलिस में भी इसके प्रति जाग्ृाति और सावधानी पैदा करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। लॉ कमीशन ने महिलाओं के संदर्भ में एक रिकमैंडेशन दी है। उन्होंने कहा है कि अगर बलात्कार का कोई मुकदमा आता है तो उस मुकदमे को as far as possible and as far as practicable, it should be done by women. उनकी दूसरी सिफारिश है -
In an evidence of rape, the investigation shall be conducted only at the residence of the woman by a woman police officer; and if the victim is less than 18 years of age, she should be questioned only in the presence of her parents and relatives. तीसरी चीज उन्होंने कही है -
The medical examination of the victim of rape should be preferably done by a female medical practitioner. हम चाहेंगे कि इन तीनों बातों को हम कानून का हिस्सा बना दें। लेकिन जो बात मैंने पहले आपसे कही कि क़मिनल लॉ में कन्करेंट सबजैकट होने के कारण हमारे ऊपर एक ऑब्लीगेशन है कि हम राज्य सरकारों से सलाह करें और राज्य सरकारों से इस संदर्भ में सलाह करने की प्रक़िया शुरू हुई है, उसके आधार पर हम आगे निर्णय लेंगे। अनेक और बातें कही गई हैं, मैं एक-एक बात का उल्लेख नहीं करना चाहूंगा, लेकिन यह जरूर कहूंगा कि जितने सुझाव दिये गये हैं, उन पर हम पूरी गम्भीरता से विचार करेंगे। साथ-साथ होम मनिस्ट्री का यह दायित्व होगा कि हर राज्य सरकार से इस संदर्भ में पूरी जानकारी करते रहें और मोनीटर करते रहें कि वे इस संदर्भ में कया-कया करती हैं, कयोंकि सैण्ट्रल गवर्नमेंट का काम तो वैसे लमिटेड है।
It is limited towards the UTs and in that regard, we shall see that all these things are implemented. But, even in other matters, I am sure that the State Governments would be forthcoming and give us all the necessary assistance.
SHRI SOMNATH CHATTERJEE (BOLPUR): You have to confirm that the entire House is one on this issue.
SHRI L.K. ADVANI: I am sure that the entire House is with me. I would like that all the wings of the establishment including the judiciary to take note of the feelings of this House. After all, if an atrocity is committed on a woman and that case lingers on for years on age, it is really another infliction on that woman. Let that not happen. The person who may have inflicted that crime may be a criminal. Let the judiciary take this into account that a prolonged litigation in relation to crimes against women becomes another infliction on women और इसीलिए ज्यूडीशियरी, लैजिस्लेचर एग्जीकयूटिव, सब का इस मामले में जो दायित्व है, मुझे विश्वास है कि वे उसे निभाएंगे। अनेक सदस्यों ने वूमेन रिजर्वेशन बिल की बात कही है। मैं इस बारे में इतना ही कहना चाहूंगा कि हमारे मन पर इस का उतना बोझ नहीं है कि सदन में कन्सेंसस नहीं है। वह इतनी बड़ी बात नहीं है। यह ठीक है कि कन्सेंसस हो तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन मैं जानता हूं कि जिस समय इस सदन में पहले ही दिन यह बिल पेश किया जाने वाला था, तब प्रधान मंत्री जी के पास एक दल के नेता गये और कहा कि मेरा आपसे अनुरोध है कि आज इसे पेश न करें, सब दलों की एक बैठक बुलायें और उनसे राय करके उसके बाद पेश करें। वैसे उस समय हमारे कुछ सदस्यों ने कहा कि नहीं, पेश हो जाना चैहिए, लेकिन प्रधान मंत्री ने उनकी राय मान ली और कहा कि अध्यक्ष जी को कह दीजिए कि इसे आज पेश नहीं करते हैं, मैं सर्वदलीय बैठक बुलाऊंगा और अगले ही सप्ताह सर्वदलीय बैठक बुलाई गई, जिस सर्वदलीय बैठक में यद्यपि अलग-अलग मत दिये गये, लेकिन अलग-अलग मत दिये जाने के बाद भी प्रमुख ५-६ पार्िटयों ने कहा कि पहले इस विधेयक को इसी रूप में पेश किया जाये, जिस पर कह सकते हैं कि कन्सेंसस था, that the Bill in its present form must be introduced. There was no unanimity but it was a very broad consensus. It was such a broad consensus that we knew that this was a matter on which two-thirds majority was needed as it was an amendment to the Constitution. It was more than two-thirds. It was nearly three-fourths of the House taking into account the strength of those parties and the strength of those spokesmen. लेकिन सदन को पता है कि उसके बाद कया हुआ। जो कुछ हुआ, उसमें मैं मानता हूं कि संसद की गरिमा दुनिया के सामने जिस रुप में गई, हमको लगा कि हम अपराधी हैं, हम इसके लिए दोषी हैं। उसके बाद हमने सोचा कि शायद स्िथति में परिवर्तन आये, कुछ लोगों ने कहा कि हमसे गलती हुई, नहीं होनी चाहिए। लेकिन बाद में जिस प्रकार से लगा लेकिन हमारे सामने महिला आरक्षण के प्रति हमारी प्रतिबद्धता कम नहीं हुई, लेकिन उस प्रतिबद्धता साथ-साथ इस संसद की गरिमा, इस संसद की महिमा यहां पर ठीक प्रकार से हो, उसके प्रति हमारी प्रतिबद्धता कम नहीं है और हमारे सामने डिलेमा हो गया, कयोंकि कहा गया अभी आपने कुछ नहीं देखा है, अगर आप फिर से लाएंगे तो उसके परिणाम आपको भुगतने पड़ेंगे। इसी कारण हमारे कदम कुछ ठिठक गए। मैं आज भी कहता हूं और चाहता हूं, हमारी सरकार भी चाहती है कि विधेयक को प्रस्तुत किया जाए, बल्िक मैं तो चाहूंगा कि यह पारित किया जाए। कुमारी ममता बनर्जी (कलकत्ता दक्षिण) : लेकिन नेशनल एजेंडा में तय हुआ था कि पारित होना चाहिए। अगर कंसेंसेस नहीं है, तो महिला आरक्षण विधेयक के बारे में कंसेंसेस की कया जरूरत है। श्री लाल कृष्ण आडवाणी: लेकिन वह दृश्य फिर से खड़ा न हो, ऐसा कोई नहीं चाहेगा। श्री बसुदेव आचार्य (बांकुरा) : इंट्रोडयूस कर दें।
SHRI SOMNATH CHATTERJEE (BOLPUR): Shri Advani, in view of the very strong opinion of the different political parties and in spite of our best wishes, we did not expect unanimity on this. Therefore, there is a very serious discussion on presenting a different Bill for which the Government should take steps. But I am not in favour of that. It has to be presented. Otherwise, a few hon. Members - how honourable they may be in their intentions - to their own liking, can stall the entire proceedings of this House and even important legislative business. How can we accept that position?
SHRI L.K. ADVANI: I do want to spell out the details of the difficulty that I have. I have merely mentioned the difficulty. मैं कलेम नहीं कर रहा हूं कि कंसेंसेस या युनेनमिटी जब तक न हो तब तक नहीं करना चाहिए।
After all, even in that meeting, there was no unanimity. But it was a consensus.
SHRI SOMNATH CHATTERJEE (BOLPUR): Sir, we are obliged to the hon. Prime Minister and the hon. Minister of Home Affairs. He called me. I believe, Shri Sharad Pawar was also there who was known to be supporting this measure. We said, even if there were unfortunate disturbances, we have to get it through. That was our request. You please remember that.
SHRI L.K. ADVANI: As I said, you will appreciate why I cannot go into the details. I do not want to cast a blame on anyone. I have merely tried to explain what are the limitations of the Government. The Government is still of that view.
I had deviated from my main theme only because this was mentioned by many Members. Almost all the women Members did refer to it. Therefore, I have tried to explain the Government's viewpoint so far as the basic issue is concerned. महिलाओं पर अत्याचार रोकने के लिए यह सरकार किसी भी प्रकार से कसर नहीं छोड़ेगी। मुझे आज के अवसर पर बहुत खुशी है कि सदन के सभी सदस्यों ने और सभी वगर्ों ने इस मामले में सरकार का साथ देने का संकल्प प्रकट किया है।