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Lok Sabha Debates

Consideration Of The Sugar Development Fund (Amendment) Bill, 2002. (Bill ... on 8 May, 2002

16.30 hrs. Title: Consideration of the Sugar Development Fund (Amendment) Bill, 2002. (Bill Passed) उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री (श्री शांता कुमार): महोदय, मैं प्रस्ताव* करता हूं -

"कि चीनी विकास नधि अधनियम, १९८२ में और संशोधन करने वाले विधेयक पर विचार किया जाए। "सभापति महोदय, यह शुगर डेवलपमेंट फन्ड एक महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक है, जो संसद में विचार करने के लिए लाया गया है। इस संशोधन विधेयक में तीन मुख्य बातें हैं। पहली बात तो यह है कि चीनी के भंडार देश में भरे पड़े हैं, इसलिए एक्सपोर्ट करना अत्यन्त आवश्यक है। यदि एक्सपोर्ट नहीं करेंगे, तो चीनी के अधिक भंडार होने की वजह से उद्योगों को परेशानी होगी। यदि चीनी उद्योग को परेशानी होगी, तो किसानों को गन्ने के मूल्य का भुगतान भी ठीक से नहीं हो पाएगा। हमने कोशिश की और कुछ इन्सैन्टिव दिये। उन इन्सैटिव्स से चीनी का एक्सपोर्ट थोड़ा बहुत शुरु हुआ है। एक तरफ हमने डयुटी लगाकर इम्पोर्ट को बन्द करने की कोशिश की और दूसरी तरफ एक्सपोर्ट करने की कोशिश की। इससे लगभग १२-१३ लाख टन चीनी ही एक्सपोर्ट हुई है। इससे अधिक नहीं हो पा रही है। शुगर डेवलपमेंट फन्ड में से हम चीनी एक्सपोर्ट करने के लिए जो ट्रांसपोर्टेशन का खर्चा है, उसको सब्सिडाइड करने का अधिकार लेने के लिए सदन में उपस्थित हुए हैं। इस बिल के द्वारा जहां भी चीनी मिले हैं, जो चीनी एक्सपोर्ट करेंगी, उन चीनी मिलों द्वारा पोर्ट तक ट्रांसपोर्टेशन का जो खर्चा होगा, उसको सरकार सब्सिडाइज करेगी। विश्व के बाजार में अधिकतर देश चीनी को सब्सिडाइज कर रहे हैं, इसलिए हमारी चीनी बाजार में कम्पीट नहीं कर पा रही है। इस उद्देश्य से इसके अन्दर हम तरमीम करके उसको सब्सिडाइज करेंगे, ताकि एस्पोर्ट में अधिक सुविधा हो सके।
महोदय, दो और संशोधन इस विधेयक के माध्यम से लाए हैं। शुगर डवेलपमेंट फन्ड में से इस समय हम माडर्नाइज करने के लिए और अन्य बातों के लिए लोन देते हैं। इस संबंध में भारत सरकार ने सिद्धान्तत: एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है कि जो मोलैसेस से इथ्नौल बनता है, वह पांच परसेंट पैट्रोल में मिलाया जाएगा। इस संबंध में अन्यान्य सारी औपचारिकतायें पूरी हो गई है। चीनी उद्योग को अधिक सशक्त * Moved with the recommendation of the President.
करने के लिए बाइप्रोडक्ट प्रोडक्शन की अत्यधिक आवश्यकता है। इस द्ृष्टि से इस विधेयक में सरकार यह संशोधन लाई है कि हम शुगर डेवलपमेंट फन्ड में से इथ्नौल बनाने के लिए चीनी उद्योगों को लोन देकर मदद करेंगे, ताकि इथ्नौल का प्रोडक्शन बढे। इथ्नौल का प्रोडक्शन बढ़ेगा, तो वह पैट्रोल में मिलाया जाएगा। इससे एक ओर चीनी उद्योग को फायदा होगा और दूसरी ओर हम पैट्रोल के इम्पोर्ट पर लगभग ८० हजार करोड़ रुपए जो खर्च कर रहे हैं, हमारा फारेन एक्सचेंज बचेगा।
तीसरी बात यह है कि चीनी उत्पादन से जो बगास पैदा होती है, उससे ३,५०० मेगावाट बिजली पैदा कर सकते हैं। एक ओर इससे कोजनरेशन बिजली उत्पादन के खर्च में कमी आती है और दूसरी ओर यह एन्वायर्नमेंट फ्रेंडली है तथा बिल्कुल वेस्ट से बिजली पैदा होगी। इसलिए हम यह भी संशोधन लेकर आए हैं कि शुगर डवेलपमेंट फन्ड में से बिजली जनरेट करने के लिए चीनी उद्योगों को लोन दे सकेंगे।
महोदय, चीनी उद्योग को सशक्त करने के लिए, उनकी वायबलिटी बढ़ाने के लिए, बाइप्रोडक्स प्रोडक्शन को अधिक प्रोत्साहन देने के लिए और शुगर डवेलपमेंट फन्ड को उपयोग करने के लिए - ये तीन संशोधन लेकर सदन में हम उपस्थित हुए हैं। ये संशोधन चीनी उद्योग को प्रोत्साहन देने की द्ृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण विधेयक है और इसके द्वारा चीनी उद्योग के बाइप्रोडक्ट को बढ़ा कर इस उद्योग को और सशक्त कर सकते हैं।
मैं प्रार्थना करता हूं कि इन तीनों संशोधनों को स्वीकृति प्रदान की जाए।
MR. CHAIRMAN: Motion moved:
" That the Bill further to amend the Sugar Develoment Fund Act, 1982, be taken into consideration. "

SHRI K.H. MUNIYAPPA (KOLAR): Mr. Chairman, Sir, I thank you very much for giving me this opportunity. I welcome the amendments and I congratulate the hon. Minister, Shri Shanta Kumar, for having brought these amendments, which are in the interest of the farmers and sugar producers.

It is one of the best things which the hon. Minister is doing. He is taking into consideration the interest of the farmers.

I welcome this Bill which is long overdue. It is an attempt on the part of the Government to provide relief to the sugar mills, more especially the sugar mills which are in the cooperative sector, which are facing a crisis in the wake of decontrol of the sugar industry.

Sir, the proposed new provisions in the Bill will go a long way in rewarding those sugar factories which contribute to power generation without any investment on the part of the Central Government. For example, in my State of Karnataka, there is a cooperative sugar factory at Jamkhandi. It has become the pioneer in power generation with bagasse as feedstock. The Jamkhandi sugar factory is already supplying about 4 MW power to the State supply grid. Like that, there is a factory at Davangere also. So, there are some sugar factories which contribute towards power generation.

Likewise, the proposal to reward the sugar factories engaged in the manufacture of anhydrous alcohol from molasses is laudable. When there is an acute energy crunch in the petroleum sector and much awareness about reducing the pollution, a new trend is developing to blend motor spirit with ethanol, which is a derivative of anhydrous alcohol. This new technique has been tried out in Brazil at commercial levels. Like India, Brazil has a large area under sugar-cane cultivation. Brazil is world’s number one sugar producer. It has large quantities of bagasse to generate additional power and molasses to produce anhydrous alcohol. The Indian sugar industry can draw from the experience of the Brazilian sugar industry.

The last proposal to defray a part of the expenses borne on internal transhipment, transport of sugar for export is a welcome step in the present context of the present crisis faced by the Indian sugar industry on the export front. The world over, sugar prices have crashed but India is also saddled with huge stocks of sugar which have to be disposed of at the overseas markets even at lower margins. Towards this, whatever small help is provided to the sugar industry as subsidy on transport of sugar for export will go a long way.

The ultimate beneficiary of these reliefs granted to the sugar industry would be the sugar-cane growers whose dues for supply of sugarcane to factories can be settled without much delay. By giving these incentives to the sugar industry, the Government should also secure an assurance from the industry that it would settle all the dues of cane suppliers on a priority basis.

I would once again thank the hon. Minister for bringing forward this amendment to help the sugar producers. The Government should give more subsidy and facilities to protect the sugar industry and to encourage the domestic sugar industry in India. The Government has to keep in mind the welfare of the farmers.

Before concluding my speech, I want to make one point. The important point is that payment should be made properly. This is one of the most important amendments. I once again thank the hon. Minister for bringing forward this amendment.

श्री चिन्मयानन्द स्वामी (जौनपुर): माननीय सभापति जी, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी को और अपने प्रतिपक्षी मित्र को भी धन्यवाद देता हूं क्योंकि उन्होंने इस बिल के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करके देश की बहुत बड़ी आवश्यकता को महत्व दिया है। चीनी की मिठास बीच में बड़ी कड़वी हो गई थी। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कुछ अन्य प्रदेश हैं, जो गन्ना उत्पादक प्रदेश हैं। गुजरात गन्ना ज्यादा पैदा नहीं करता है, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में गन्ना ज्यादा पैदा होता है। गन्ना केवल एक कृषि उत्पाद ही नहीं है, मैं उत्तर प्रदेश से प्रतनधि होने के कारण कह सकता हूं कि गन्ना किसानों का संरक्षक है, कमाऊ बेटा है और यह उनकी आमदनी का मुख्य रुाोत है।

कुछ वर्षों पूर्व उत्तर प्रदेश के किसान यह नहीं जानते थे कि उनके घर की रोजी, घर का खर्च, घर की जरूरत गन्ने के अलावा और कहां से पूरी हो सकती है। गन्ने से उनकी सारी जरूरतें पूरी होती थीं और गन्ना जब बिकता था तब घर में शादी होती थी, बच्चों की पढ़ाई का खर्च वहीं से निकलता था, मकान का निर्माण उसी से होता था। घर में जो जरूरत की चीजें होती थीं वे गन्ना बेच कर पूरी की जाती थीं लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह था कि गन्ना १९९२ में बिकता था और उसका भुगतान १९९६ में मिलता था। ४-५ वर्षों तक उन्हें गन्ने की कीमत मिलती थी। वह गन्ना बेचते थे लेकिन उसकी कीमत उन्हें अदा नहीं की जाती थी, उनकी रकम पर ब्याज भी नहीं दिया जाता था। उनकी दुर्दशा यहां तक होती थी कि उन्हें कर्जा चुकाने के लिए अपने खेत तक बेचने पड़ते थे। वह खेतों में खड़ा गन्ना गिरवी रखते थे। उनकी इस तकलीफ के प्रति सहानुभूति तो अनेको बार व्यक्त की गई। सदन में शोर हुआ, आवाजें उठाई गई और बहस भी हुई। मैंने कई बार देखा कि जब आधे-आधे घंटे तक इस पर विशेष चर्चा भी की गई लेकिन इसका कारगर समाधान नहीं निकाला गया कि जिससे उनके गन्ना की कीमत का निरन्तर भुगतान हो सके। १९८२ में जब इस नधि की स्थापना की गई थी तब इसका दायरा सीमित था। केवल जिससे बाजार में चीनी के मूल्य को संतुलित रखने के उपाय निकाले जा सकें और जो चीनी मिलें किसी कारण नहीं चल पा रही हैं उन्हें चलाने के लिए कर्ज दिया जा सके, उनके आधुनिकीकरण के लिए कुछ मदद दी जा सके। अब तक गन्ने में नहित इस ऊर्जा का पता या तो देश को नहीं था, यदि था तो उसके प्रति कोई रचनात्मक द्ृष्टिकोण नहीं अपनाया गया था। ब्राजील में बहुत पहले से शीरे से एथनॉल बनना शुरु हो गया। वह केवल बनता ही नहीं था बल्कि अपनी जरूरत के अलावा दूसरों को बेचा भी गया लेकिन हमारे देश में ऐसा नहीं हो पाया। गन्ने से केवल चीनी, शीरा और गुड़ निकलता है, हम इतना ही जानते थे। इतने तक ही सारी टैक्नॉलोजी आधारित थी। मैं माननीय मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने एक वैज्ञानिक द्ृषिट्कोण अपनाया और गन्ने के उत्पाद को एक देश की जरूरत से जोड़ने का प्रयास किया। केवल चीनी चीनी ही नहीं है क्योंकि आज चीनी से बहुत लोग घबराने लगे हैं। हमारे तमाम मित्रों में ऐसे होंगे जो शूगर के नाम से घबराते हैं और विकल्प ढूंढते हैं कि शूगर के बदले दूसरी चीज मिल जाए जिस का वे प्रयोग करे। अब वह शूगर से इतना नहीं घबराएंगे। चीनी केवल मिठास ही नहीं देगी बल्कि ऊर्जा भी देगी। आज एथनॉल के द्वारा हम शीरे का सही उपयोग कर पाएंगे। अभी तक शीरे का उपयोग केवल अल्कोहल बनाने के लिए किया जाता था। वह वर्षों तक ऐसे ही पड़ा रहता था। उसकी कोई कीमत भी नहीं मिलती थी लेकिन आज जब एथनॉल बनेगा और जैसा कि मंत्री जी ने बताया कि ८० हजार करोड़ रुपए हम पैट्रोल पर खर्च करते हैं अगर पांच प्रतिशत एथनॉल मिलेगा तो स्वाभाविक है कि उससे विदेशी मुद्रा की ही बचत नहीं होगी बल्कि हम एक विकल्प भी देश में निर्मित कर सकेंगे। हम जानते हैं कि तेल के दबाव में हमें किस प्रकार के निर्णय लेने पड़ते हैं। तेल की धमकियो से हमें क्या-क्या झेलना पड़ता है? राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कितनी बार हम तेल के दबाव में आते हैं? तेल का विकल्प खोजने की कोशिश इस संशोधन से निकलती है। यह राष्ट्र को मजबूत करेगी।

आज दिल्ली में क्या दिक्कत है? दिल्ली में थ्री व्हिलर और बसों के किराए रातों-रात बढ़ गए। जो बच्चे दो रुपए में बस से स्कूल जाते थे आज वे पांच रुपए देकर जा रहे हैं। किराए इसलिए बढ़ाए गए क्योंकि पर्यावरण की समस्या पैदा हो गई। आज देश के सामने बिगडता पर्यावरण भी एक समस्या है। सी एन जी चालित बसों की कमी के कारण किराया बढा क्योंकि पेट्रोल अथवा डीजल से पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पडता है ।देश प्रदूषित हो रहा है जिसे कम करने के लिये इस बिल के द्वारा एक रास्ता निकलता दिखाई पड़ता है। इससे जिस पेट्रोल में इथोनॉल मिलाया जायेगा, उससे जो उत्सर्जन होगा, उसमें कमी होगी। जो ज़हरीली गैस निकलेगी, उसमें कमी होगी, उससे वातावरण को शुद्ध रखने में मदद मिलेगी।

सभापति महोदय, आप जानते हैं कि जहां-जहां चीनी मिलें होती हैं, गन्ना पेरा जाता है और उसमें से खोई निकलती है, उसका इस्तेमाल हम नहीं कर पाते हैं लेकिन सब कुछ उसमें होता है। हम उसका इस्तेमाल ऊर्जा के रूप में कर सकते हैं। प्राय: जो क्रेशर चलते हैं, वे ऊर्जा के परम्परागत इस्तेमाल से चलते हैं। चीनी मिलें इसके इस्तेमाल से ऊर्जा बना सकते हैं। इससे ३५०० मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है। हमने गैर-परम्परागत ऊर्जा में बहुत काम किया था। उसके लिये बहुत से रुाोत ढूंढे गये लेकिन इतना बड़ा रुाोत हमारे पास सुरक्षित है, यह हमें पता ही नहीं था। अगर खोई को बिजली बनाने के लिये इस्तेमाल किया जाये तो ३५०० मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है। आज हम इससे केवल २१२ मेगावाट बिजली पैदा कर पा रहे हैं जोकि बहुत कम है। अभी २४५ मेगावाट बिजली के लिये और प्रयास किया गया है लेकिन आर्थिक अभाव के कारण इकाइयां इनका उपयोग नहीं कर पा रही आज भी हम ऊर्जा उत्पादन में आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। आज चीनी मिलों के सामने आर्थिक संकट भी है। मेरे क्षेत्र जौनपुर में एक चीनी मिल है। यह चीनी मिल वर्षों से बीमार चल रही है और केवल ३-४ महीने ही चलती है। किसान अपना पूरा गन्ना नहीं दे पाता है। मैंने मंत्री जी से मिलकर प्रयास किया था कि उन्हे चीनी विकास नधि से पैसा मिल जाये ताकि वह चीनी मिल वर्तमान आर्थिक स्थिति से उबर सकें। उसका आधुनिकीकरण हो सके, यह साधन वे स्वयं जुटा सकते हैं, यदि यहां पर इथोनॉल बन सके तो वे तमाम सारी जरूरतें स्वयं पूरा कर सकते हैं। इस चीनी विकास नधि विधेयक द्वारा अब उन्हें संरक्षण मिलेगा।

सभापति महोदय, मेरा एक निवेदन यह है कि चीनी विकास नधि में एक बात यह भी जोड़ी जानी चाहिये कि जैसे उनको आधुनिकीकरण के लिये, इथोनॉल बनाने के लिये, विद्युत बनाने के लिये कर्जा दिया जायेगा, मैं समझता हूं कि चीनी विकास नधि को यह जिम्मेदारी भी लेनी चाहिये कि चीनी मिलों को तकनीकी जानकारी देने के लिये- जैसे इथोनॉल केसे बनेगी, खोई या बगास से बिजली कैसे बनेगी- इसका अनुसंधान किया जायें और, इस की जिम्मेदारी चीनी विकास नधि को लेनी चाहिये। इसके अलावा विकसित तकनीकी जानकारी किसानों तक पहुंचाने की जिम्मेंदारी भी इस नधि को लेनी चाहिये। गाजियाबाद से मेरठ बल्कि देहरादून तक गन्ना क्रेशर बडी तादाद मे होते हैं जिनके पास खोई या बगास होता है। मैं नहीं समझता हूं कि उनको छोड़कर हम ज्यादा काम कर पायेंगे। उनका भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे हम अंतर्राष्ट्रीय चीनी की कीमतों में भी कम्पीटीशन कर पायेंगे। चीनी मिलों को होने वाली अतरिक्त आय का चीनी की उत्पाद कीमत पर असर पडेगा । आज हमारे चीनी गोदामों में एक करोड़ मीटि्रक टन चीनी पड़ी हुई है। हम उसे बाजार में नहीं ले जा रहे हैं क्योंकि बाजार में चीनी की कीमत कम है और हमारी चीनी की उत्पाद कीमत ज्यादा है। उसे कम करने के लिए आपने एक अच्छा कदम उठाया है। जो चीनी का निर्यात करना चाहते हैं, उन्हें अगर भाड़े में छूट मिले तो निश्चित रूप से वह चीनी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पहुंचकर कीमतों को कम्पीट कर सकते हैं। हमारी चीनी की क्वालिटी अच्छी है लेकिन कीमत ज्यादा होने के कारण हम उसे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बेच नहीं पा रहे हैं। इस विधेयक से बहुत राहत मिली है ।

इससे इस देश के लाखों किसानों को फायदा होगा। क्योंकि आप जानते हैं कि इस देश का ४० प्रतिशत किसान ऐसा है, जिसकी आर्थिक प्रगति केवल गन्ने और चीनी उत्पाद पर आधारित है। मैं समझता हूं कि इन तमाम किसानों के लिए यह संशोधन विधेयक एक वरदान साबित होगा। इन्हीं शब्दों के साथ मैं माननीय मंत्री को धन्यवाद देते हुए इस बिल का समर्थन करता हूं।

श्री महबूब ज़हेदी (कटवा): माननीय सभापति महोदय, मुझे आज बहुत खुशी हो रही है कि बहुत समय के बाद यह संशोधन विधेयक सदन में लाया गया है। लेकिन मैं आपके माध्यम से माननीय मंत्री जी के ध्यान में लाना चाहूंगा कि इस संशोधन विधेयक को लाने में बहुत देरी हो गई है। आप जानते हैं बीते वर्षों में यहां जो बहुत जोरों से चर्चा होती थी, वह किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या की चर्चा होती थी। उसमें कपास, गन्ना और दक्षिण भारत में उत्पादित की जाने वाली तीनों चीजें होती थीं। मैं आपको बताना चाहूंगा कि हिन्दुस्तान में चावल, गेहूं और चीनी ये तीनों चीजें बहुत अधिक मात्रा में पैदा होती हैं। चीनी के आंकड़े अगर देखे जाएं तो देश में २० मलियन टन गन्ना पैदा होता है। पिछले तीन सालों में इसका इतना अधिक उत्पादन हुआ कि कुल मिलाकर आपके पास सौ लाख टन चीनी हो गई, जिसे रखने के लिए आपके पास जगह नहीं है। उसके कारण हालत यह हुई कि इसके भाव गिर गये और इसे बेचने के लिए किसान खुले बाजार में गये। लेकिन फिर भी गरीबी की रेखा से नीचे के लोगों को चीनी नहीं मिलती है। उनके पास काड्र्स भी नहीं हैं। काड्र्स अब ऐतिहासिक चीज हो गई है। चीनी देश में बेचने के हालात नहीं है और बाहर की क्या हालत है। अगर निर्यात का हिसाब देखा जाए तो हमारे यहां जो उत्पादन पर खर्च होता है, उससे २० प्रतिशत कम बाहर के उत्पादन के भाव हैं। बाहर के लोग जब देश में आकर चीनी बेचते हैं तो हमारे किसान मारे जाते हैं।

शांता कुमार जी आपको याद होगा यूनाइटेड फ्रंट सरकार में उस समय जो मंत्री थे, उस समय साढ़े चार सौ करोड़ रुपये सरकार का कर्ज मिल वालों के पास था। उस समय २५० करोड़ रुपये दिये गये। मिल वालों के ऊपर सरकार के अलावा दूसरे कर्जे भी थे। उस समय जो किसान गन्ना पैदा करते थे, उनकी बुरी हालत थी। मैं आपको बताना चाहता हूं कि समस्तीपुर के पास रोसड़ा मैं खुद गया था। वहां मिल गेट के सामने गोली चली थी और उसमें एक किसान की जान चली गई थी। उसका कारण था कि किसानों ने जो गन्ना मिल को दिया था, उसका पैसा मिल के पास बकाया था। मिल उन्हें पैसा नहीं दे रही थीं। मिलों के ऊपर दो किस्म के कर्जे थे - इंस्टीटयूशन का कर्जा, कोऑपरेटिव्ज का कर्जा और महाजन का कर्जा। जिसकी वजह से वे किसानों को उनका पैसा देने की स्थिति में नहीं थे और उसके कारण किसानों को खुदकुशी करनी पड़ी थीं।

अगर चार चीजें ठीक से की जाएं तो यह हो सकता है। एक चीज यह है कि किसान का जो भी माल बिकेगा उसका समय से भुगतान होना चाहिए। दूसरी चीज है कि शीरे का भाव भी ठीक रखना पड़ेगा। अगर नहीं होगा तो वैसे भी किसान की खेतीबाड़ी कम हो गई है, बहुत सी मिलें बंद हो गई हैं। बंगाल में अहमदनगर और पलासी बंद हो रही हैं और यूपी में थोड़ी हैं मगर वह भी बंद हो जाएंगी। I am not talking about remunerative prices लेकिन हम कहते हैं कि अगर डोमैस्टिक प्राइस आप किसान को दे सकते हैं तो गन्ने का उत्पादन अधिक होगा और मिलें भी तरक्की करेंगी। अगर आप बायप्रोडक्ट्स का उत्पादन बढ़ा नहीं सकते तो खाली चीनी उत्पादन करके आप बाहर के देशों से कंपीटीशन में अपनी चीनी को बचा नहीं सकते हैं, मिल वालों को बचा नहीं सकते हैं। एक बात पावर जनरेशन की हमने कही थी। इसके अलावा इंडस्टि्रयल अल्कोहल और इथनॉल आप बना सकते हैं, पेपर इंडस्ट्री बना सकते हैं। मुझे बोलने में गर्व है, हमारे बंगाल में पहले पेपर इंडस्ट्री में बांस का प्रयोग होता था, मगर जो उत्पादन खर्च होता था, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश आदि दूसरी जगह से यहां खर्च कम है। इसको कर सकें तो अच्छा रहेगा। ऑर्गैनिक मैन्योर पर हम ध्यान दे सकते हैं। आजकल हम कैमिकल्स पर नहीं जाते हैं। पार्टिकल बोड्र्ज बना सकते हैं, पेपर बैग्ज़ बना सकते हैं और पॉलिथीन के हम वैसे भी खिलाफ हैं। ज्यादा से ज्यादा थर्मोकोल हो सकता है। अगर इसकी तरक्की हम नहीं करेंगे तो चीनी उद्योग को बचाना मुश्किल है।

महोदय, इस विधेयक में बहुत सी बातें लिखी हुई हैं मगर सिर्फ लिखने से कुछ होने वाला नहीं है। अगर बाय प्रोडक्ट्स का डैवलपमेंट आप करेंगे, कर्ज़ा खत्म हो जाए, यह बात करेंगे तो अच्छा होगा। शुगर डैवलपमेंट फंड के लिए आपको भी जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी, सिर्फ बैंक्स और दूसरे इंस्टीटयूशंस पर जिम्मेदारी न छोड़ें। सरकार को भी आगे बढ़ना पड़ेगा और एग्रीकल्चर और दूसरी जगह जो फंडिंग की है उसमें और भी ज्यादा फंडिंग करके इसको आगे बढ़ाना चाहिए।

17.00 hrs. सभापति महोदय, मैं कहना चाहता हूं कि अगर ऐसा करेंगे, तो इससे रीजनल एंड डाउन स्ट्रीम डैवलपमेंट होगा, एम्पलायमेंट मिलेगा, किसान, मिल मजदूर और खेत मजदूर सभी लोगों को आगे बढ़ने के अवसर पैदा होंगे। इससे हमारा देश आगे बढ़ सकता है। इसलिए मैं इसका समर्थन करता हूं, लेकिन केवल इतना कहना चाहता हूं कि यह केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि हकीकत में जैसा संशोधन किया जा रहा है उसके अनुसार काम भी होना चाहिए। यदि माननीय शान्ता कुमार जी, जो इसके मंत्री हैं, वे यदि इस बारे में काम कर के दिखाएंगे, तो मैं पहला व्यक्ति होऊंगा जो उन्हें बधाई दूंगा कि आपने वाकई काम कर के दिखाया है और इसे केवल कागजों में ही नहीं रहने दिया है। मैं पुन: आपको इसके लिए बधाई देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।

श्री सुरेश रामराव जाधव (परभनी) : सभापति जी, सर्वप्रथम तो मैं आपके प्रति आभार व्यक्त करता हूं कि आपने मुझे इस बिल पर बोलने का अवसर प्रदान किया। मैं माननीय मंत्री, श्री शान्ता कुमार जी जिन्होंने इस विधेयक को प्रस्तुत किया है, उन्हें अपनी तथा अपनी पार्टी की ओर से धन्यवाद देना चाहता हूं क्योंकि यह समय की पुकार थी। मैं महाराष्ट्र से चुनकर आता हूं। अभी हमारे पूर्व वक्ता बोले, मैं उनसे सहमत हूं। मैं बताना चाहता हूं कि महाराष्ट्र की तो पूरी अर्थनीति ही शुगर और शुगर इंडस्ट्री पर आधारित है। हमारे महाराष्ट्र की जो ग्रामीण अर्थ व्यवस्था है, उसका आधार तो चीनी और चीनी उद्योग ही है, लेकिन महाराष्ट्र में १४०-१४५ चीनी मिलों में से केवल ७० या ७२ चीनी मिलें ही चल रही हैं, यह दुर्भाग्य की बात है। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि जो चीनी मिलें बीमार हैं, उन्हें चलाने के लिए कुछ अलग से सोचने और करने की जरूरत है और उनका सर्वेक्षण करा के उनको तेजी से चलाने की जरूरत है।

महोदय, माननीय मंत्री जी ने चीनी विकास नधि (संशोधन) विधेयक, २००२ प्रस्तुत किया है, इसका मैं पुरजोर समर्थन करता हूं। इस बिल को प्रस्तुत करते समय मंत्री महोदय ने अपने भाषण में स्पष्ट कर दिया था कि इस बिल को लाने का उद्देश्य क्या है। इसके क्लॉज २१ एए में बिजली उत्पादन हेतु फंड से पैसा मिलेगा, यह दिया गया है। एक शुगर इंडस्ट्री में कम से कम ३५० मैगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता है। अगर सही मायने में इसके फंड का उपयोग होगा, तो शुगर इंडस्ट्री वाएबल हो जाएगी, यह एक अच्छा सुझाव है। देश में जो बिजली की कमी है, अगर पावर बनेगी, तो जितनी शुगर इंडस्ट्री को पावर की जरूरत है, वह ले लेगी और बाकी बिजली जो सरप्लस होगी, उसे वह गवर्नमेंट को बेच देगी। इससे सरकार को बिजली के क्षेत्र में बहुत राहत मिलेगी।

शुगर डेवलपमैंट फंड के क्लास २(१) के aaa में लिखा है कि इंडस्टि्रयल अल्कोहल और ऐथानोल के लिए पैसा दिया जायेगा। हमारा कहना है कि चीनी मिल्स में जो मोलेसिस होता है, मोलेसिस ऐसा प्रोडेक्ट है जैसे आजकल हिन्दुस्तान में डीजल और पेट्रोल की समस्या बहुत बड़ी समस्या है।

सभापति महोदय : अब आप समाप्त करिये।

श्री सुरेश रामराव जाधव: सभापति जी, मैंने तो अभी बोलना ही शुरू किया है। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : इस विधेयक के लिए केवल एक घंटा ही एलॉट हुआ है। …( व्यवधान)

श्री सुरेश रामराव जाधव: मुझे बोलते हुए अभी एक मिनट भी नहीं हुआ है।…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: I know that very well. We have to finish within one hour.

श्री सुरेश रामराव जाधव: सभापति महोदय, महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा चीनी मिलें हैं इसलिए मुझे ज्यादा समय मिलना चाहिए। अंतिम क्लाज में लिखा है कि चीनी एक्सपोर्ट करने के लिए ट्रांसपोर्टेशन का जो खर्चा आयेगा, वह एस.डी.एफ. से दिया जायेगा। यह बड़ा क्रांतिकारी बिल है। अगर सही माने में चीनी मिलों को आगे बढ़ाना है, गन्ना उत्पादकों के साथ सही मायने में न्याय करना है, गन्ना काटने वाले जो लेबर हैं, इम्पलाइज हैं यानी शुगर मिल्स से संबंधित जितने भी लोग हैं, उन सबको इस बिल से फायदा होने वाला है, इस बिल से उनको राहत मिलने वाली है। मेरा कहना है कि गन्ना उत्पादक किसान रात दिन मेहनतकरके अपनी फसल खड़ी करता है लेकिन बहुत बार ऐसी नौबत आई है जिससे उनको अपना गन्ना खेत में ही जलाना पड़ा। इस स्थिति को खत्म करने के लिए हमको कुछ न कुछ सोचना पड़ेगा। इस संबंध में मेरे कुछ सुझाव हैं।

वर्ष २००१ तक शुगर डेवलपमैंट फंड में २६०० करोड़ रुपये जमा हैं। आप शुगर मिलों को जो पैसा देने वाले हैं, उसके लिए एक कम्पलशन होना चाहिए कि शुगर की जो कीमत फैक्टरी तय करेगी, वही कीमत किसानों को मिलनी चाहिए जिससे उनको फायदा मिले। इसी तरह जो गन्ना काटने वाले लेबर हैं, उनके पैसों का भी समय से भुगतान होना चाहिए। इसी तरह एफीशेंसी ऑडिट की व्यवस्था हरेक चीनी मिल मे होनी चाहिए। एफीशेंसी ऑडिट का कोई तो प्रावधान होना चाहिए ताकि चीनी मिल्स से संबंधित लोगों को लाभ मिल सके। एक न्यायोचित कोड ऑफ कंडक्ट लागू करने की भी जरूरत है क्योंकि ऐसा कोई रूल या रेगुलेशन चीनी मिल्स में नहीं है जिससे हरेक को न्याय मिल सके। मेरा कहना है कि चीनी उद्योग को आगे बढ़ाने के लिए एक कोड ऑफ कंडक्ट लागू करने की आवश्यकता है।

इसको बजटरी सपोर्ट भी मिलना चाहिए। अगर हम विदेश में चीनी भेज रहे हैं तो हमारी चीनी की क्वालिटी और उसके वहन के लिए बजटरी सपोर्ट देने की बहुत जरूरत है। एस.डी.एफ. फंड रिसर्च के लिए भी मिलना चाहिए। नई टेक्नोलौजी के लिए अगर सही मायने में चीनी विकास नधि का सदुपयोग हर चीनी फैक्ट्री करे तो भविष्य में हमारे देश का चीनी उद्योग, शुगर इंडस्ट्रीज़ पूरी दुनिया में कामयाब इंडस्ट्रीज़ हो जाएंगी।

मैं शांता कुमार जी को फिर से धन्यवाद देता हूं कि चीनी विकास नधि विधेयक लाकर उन्होंने एक क्रान्तिकारी कदम उठाया है। इससे पूरे देश के किसानों, लेबर, इम्प्लाइज़ और पूरे देश की शुगर नीति को राहत मिलेगी।

सभापति महोदय : रघुवंश बाबू, हमारे पास केवल बीस मिनट बचे हैं, अभी दो-तीन सदस्य और बोलने वाले हैं और मंत्री जी का उत्तर भी होना है।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): हमारे यहां की सब मिलें बंद हैं, हम जल्दी कैसे खत्म कर सकते हैं।

सभापति महोदय : आप यहां की व्यवस्था जानते हैं, इसलिए मैंने कहा है।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :सभापति महोदय, मंत्री जी का शुगर डैवलपमैंट फंड, १९८२ में संशोधन का प्रस्ताव है। स्वामी चिन्मयानंद साहब चले गए। जाधव जी कह रहे थे कि बड़ा क्रन्तिकारी और वैज्ञानिक काम हो रहा है। पहले से ही कुछ चीनी मिलों में बगास से बिजली उत्पादन का काम किया जा रहा है। इसलिए यह पहले से वैज्ञानिक है।…( व्यवधान)माननीय मंत्री जी, पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए यह क्रान्तिकारी बिल है, गन्ना किसानों के लिए कौन सा क्रान्तिकारी कदम है, यह बताइए।…( व्यवधान)

श्री सुरेश रामराव जाधव: शुगर डैवलपमैंट प्रोग्राम को यहां से पैसा मिलता है।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : किसानों के फायदे के लिए सबको एकमत रहना है। एस.डी.एफ. से पहले पांच मामलों में लोन दिया जाता था। अब मंत्री जी जो प्रस्ताव लाए हैं, बगास से, इसमें खोई लिखा है, क्या यू.पी. में खोई कहते हैं - खोई से बिजली पैदा करने के लिए लोन दिया जाएगा। यह कल्पना की गई है कि उससे ३२०० मेगावाट बिजली पैदा हो सकती है। यह ठीक बात है, हम इसका समर्थन करते हैं। फिर कहा गया कि शराब, स्पिरिट, ऐल्कोहल बनाते हैं, उसके लिए भी लोन देंगे। इससे क्या समझा जाए। खैर, उससे इंडस्ट्री का विस्तार होगा, इसलिए इसे भी मान लिया। लेकिन इतना बनाने के बाद जो वेस्ट जाता है, जो नदी में बहा दिया जाता है, उससे पर्यावरण दूषित होता है। जिस नदी के बगल में मिल है, उस नदी में रस बहा देने से दुगर्ंध हो जाती है।

यह भी अनुसंधान हुआ है कि रस से चीनी बनने के बाद जो गंदगी है, उसकी खाद बनती है तो इसमें खाद को क्यों नहीं जोड़ा? आपको जानकारी नहीं है? आपके सदस्य कह रहे हैं कि बड़ा भारी क्रान्तिकारी कदम है। हमारे यहां उंझा चीनी मिल में हराबहार खाद बड़े किसान मांग करते हैं, वह भी जो गंदगी और वेस्टेज है, उसकी खाद भी बनाते हैं और वह खाद गन्ने के लिए और अन्य फसलों के लिए होती है। हमारा सुझाव है कि माननीय मंत्री उस पर भी विचार करें, जानकारी कर लें, समझ लें और वह आइटम बाई प्रोडक्ट सीधे रहता है कि बाई प्रोडक्ट का इस्तेमाल करने के लिए जो एस.डी.एफ. से लोन मिलेगा तो उसमें सब आ जाता है, लेकिन बाई प्रोडक्ट में इन्होंने दो का किया, बैगास का किया और उसका जो रस है, उससे जो शराब बनेगी, स्प्रिट या एल्कोहल या इथेनाल बनेगा, उसका इन्होंने जिक्र किया है, लेकिन उसी से खाद बनेगी, उसका इसमें जिक्र नहीं है। फिर रूल में संशोधन हो सकता है तो रूल में संशोधन करके करें, यह हमारा सुझाव है, जांच-पड़ताल करके माननीय मंत्री जी विचार करें। यह कहा गया था, चूंकि देश में बहुत ज्यादा चीनी मिलें बन्द हो रही हैं, बन्द हो गई हैं, सिक हो गई हैं, हमारे यहां तो १५ चीनी मिलें बन्द हैं। माननीय मंत्री जी ने कृपा की थी और करीब दो बार बैठक हुई थी, राज्य के मंत्री भी आये थे कि उन्हें किस हिसाब से चालू किया जाये, चूंकि जिस एरिया में चीनी मिलें बन्द हो गईं, चाहे उत्तर प्रदेश हो, महाराष्ट्र में भी जहां-तहां चीनी मिलें बन्द हो गईं। अन्य राज्यों में भी यह बड़ी भारी समस्या है। वहां के किसान बड़ी तकलीफ में हैं। वहां जाने पर गन्ना किसान पहली समस्या कहते हैं कि मिल किसी भी हालत में चालू करवा दी जायें, लेकिन पुरानी चीनी मिलें हैं, १९३०-३२ की चीनी मिलें हैं, उनके माडर्नाइजेशन का एस.डी.एफ. में प्रावधान है, लेकिन बन्द चीनी मिलों को रिहैबलिटेट करने के लिए कहा गया है कि रूल ८२ में परिवर्तन किया जायेगा।

"Revival of potentially viable sick sugar mills: The Government is considering to amend the Sugar Development Fund Rules, 1983, for the purpose of giving loans from SDF at a concessional rate of interest to the potentially viable sick sugar mills for their revival."
 

 यह कब होगा, आपने इसमें मूल रिपोर्ट में दिया है, हमने पढ़ा है और जो उद्धरण में दे रहा हूं, लेकिन इस बिल में आ जाता, मान लिया कि बिल में नहीं आया तो रूल में संशोधन होगा। रूल में भी संशोधन कब आयेगा, उसमें आपने क्यों नहीं दिया। चूंकि मैं अपनी पीड़ा से ग्रस्त हूं, हमारे एरिया में दो चीनी मिल हैं। मोतीपुर चीनी मिल बहुत मशहूर है। अब शुगर टैक्नोलॉजी मिशन खत्म हो गया। शुगर टैक्नोलोजी मिशन की एक्सपर्ट कमेटी बनी थी, उसने दोनों चीनी मिलों के सम्बन्ध में जांच की थी। इनकी बहुत खराब कण्डीशन है, वह रिवाइव की जा सकती हैं, रिहैबलिटेट की जा सकती हैं। उसमें १२०० एकड़ कीमती जमीन है, कुछ मशीनें भी हैं, लेकिन पुरानी मशीनें हैं। उसकी क्रशिंग कैपेसिटी १२०० टी.सी.डी. है। उसमें सुझाव दिया था कि इसका एक्सटेंशन किया जाये, इसकी क्रशिंग कैपेसिटी का विस्तार किया जाये, चूंकि अभी विशेषज्ञ लोग बताते हैं कि चीनी मिलें, जो २५०० टन से कम क्रशिंग कैपेसिटी की हैं, वे वायबल नहीं हो सकतीं, लाभकारी नहीं हो सकतीं। अब लोग ५००० टन पर चले गये कि ५००० टन कैपेसिटी की जो आधुनिक चीनी मिलें हैं, ५००० टन पर डे अगर क्रशिंग कैपेसिटी उसकी होगी, तब वह वायबल होगी, इसलिए क्रशिंग कैपेसिटी के विस्तार के लिए माडर्नाइजेशन में एस.डी.एफ. में प्रावधान है, लेकिन सिक चीनी मिलों के लिए कम इण्टरैस्ट पर प्रावधान नहीं है। एक गुरऊ शुगर फैक्टरी हमारे यहां १९३० की है, उसकी ६०० टन क्रशिंग कैपेसिटी है। माननीय मंत्री जी ने एक बार बैठक की थी। बिहार सरकार ने उसे आई.एफ.सी.आई. को दे दिया है कि आप इसको चालू करने के लिए, प्राइवेटाइज करने के लिए काम करिये, चूंकि वह कारपोरेशन के अधीन है, पब्लिक सैक्टर में है।

उसका निजीकरण करने की बात थी, लेकिन किसी हालत में चीनी मिल चालू हो जाए, इस पर उस बैठक में सहमति हुई थी। लेकिन दो बरस से एफ.सी.आई. वाले और राज्य सरकार दोनों के बीच पढ़ा-लिखी और नुक्ताचीनी हो रही है और किसान त्राहि-त्राहि कर रहा है। मैं मांग करता हूं कि इस सम्बन्ध में आपको कुछ उपाय करना चाहिए, भले ही नियमों में संशोधन करना हो तो वह भी करके उन चीनी मिलों को रिहैब्लिटेट करें। स्टेंडिंग कमेटी ने भी अनुशंसा की है कि चाहे वभिन्न प्रकार की छूट दी जाएं, किसानों के हक में उन चीनी मिलों को चालू किया जाए। इन मिलों के बंद होने से उनमें काम करने वाले मजदूर भी काफी बेचैन हैं और उनका भी इन मिलों पर बकाया हो गया है। किसान जो गन्ना पैदा करता है, उसको लेकर अगर वह दूर की चीनी मिलों में जाए, तो उसे आधे दाम मिलते हैं, फिर भुगतान की भी समस्या है। २००१ में चीनी मिलों पर किसानों का २४२ करोड़ रुपया बकाया था। २००२ में तो और बढ़ गया होगा। इसलिए किसानों के भुगतान की समस्या पर भी ध्यान देना चाहिए।

शिव सेना के माननीय सदस्य जान जाएंगे तो अच्छा होगा कि चीनी मिल मालिकों को कितना फायदा हुआ है, क्योंकि उन पर मंत्री जी ने बड़ी कृपा द्ृष्टि की है। पी.डी.एस. में पहले ए.पी.एल. वालों को चीनी मिलती थी। जो मिडल क्लास के लोग थे या बी.पी.एल. के थोड़ा ऊपर लोअर मिडल क्लास के लोग थे, वे चाय वगैरह पीते थे इसलिए उनको कोटो की चीनी मिलती थी, जो बाजार से दो-तीन रुपए प्रतकिलो सस्ती होती थी। लेकिन मंत्री जी ने उसको बंद कर दिया और कहा कि ए.पी.एल. वालों को कोटे की चीनी नहीं मिलेगी। बी.पी.एल. में आने वालों के लिए सरकार ने प्रति व्यक्ति ४५०-५०० ग्राम चीनी का कोटा बढ़ा दिया। मैं यह कहना चाहता हूं कि जो लोग चीनी का इस्तेमाल करने वाले थे, उनको तो चीनी देना आपने बंद कर दिया और जो लोग अनाज तक तो खरीद नहीं सकते, उनके लिए चीनी का कोटा बढ़ा दिया। पी.डी.एस. में लेवी की चीनी शुरू में ६५ प्रतिशत ली जाती थी। जब चीनी मिल मालिकों की लाबी ने दबाव डाला तो उसको कम करके ४० प्रतिशत कर दिया। इस तरह कम करते-करते दस प्रतिशत पर ला दिया। लगता है कि वह भी खत्म कर देंगे। सरकार अपने खजाने से चीनी खरीदेगी और सरकार के खरीदने में कितना घोटाला होता है, यह सभी जानते हैं। इसलिए चीनी मिलों को फायदा पहुंचाने के लिए यह काम किया गया, उपभोक्ताओं को फायदा पहुंचाने के लिए कोई काम नहीं हुआ। यह भी कहा गया चीनी मिलों से कि वे चीनी एक्सपोर्ट करें, इससे पैसा मिलेगा। १९९९-२००० में ११ लाख टन चीनी का हमने आयात किया था। इस बार अभी तक करीब दस लाख टन से ज्यादा निर्यात किया है। निर्यात करने के लिए चीनी की गुणवत्ता भी जरूरी है। चीनी मिल मालिकों के लिए प्रावधान किया है कि वे एस.डी.एफ. से लोन ले सकते हैं और प्रोडक्टिविटी को बढ़ाएं। चीनी का निर्यात तभी हो सकता है जब विदेशों में गुणवत्ता वाली चीनी जाए। अपने यहां तो मिठाई बनाने वालों और बूरा बनाने वालों के लिए ही चीनी तैयार होती है, वह निर्यात नहीं की जा सकती।

सभापति महोदय : रघुवंश प्रसाद जी, अब आप समाप्त करें। आपने बहुत समय ले लिया है।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : मैं अभी समाप्त करता हूं। चीनी एक्सपोर्ट में भी बहुत घोटाला होता है।

"BSMA may suggest steps to check malpractice in sugar exports."शूगर एक्सपोर्ट में भी घोटाला हो रहा है।
Sir, Bombay Sugar Merchants Associations put forwarded a serious of recommendations in the form of letters to the Central Government and the State Government in order to check the prevailing malpractice in the sugar export market. आपको यह कहा है।
 
… (Interruptions)
 
MR. CHAIRMAN: Please conclude. I am going to call the next hon. Member to speak.
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :महोदय, मैं समाप्त कर रहा हूं। सरकार को किसानों के हक में ध्यान देना चाहिए कि किसानों को उनका बकाया भुगतान मिले और साथ ही चीनी उत्पादन बढ़े। जो चीनी मिलें बन्द पड़ी हैं, उनको रिहैबलिटेट करने के लिए, प्रमोट करने के लिए एक बैठक करके निर्णय लें, ताकि बन्द चीनी मिलें फिर से चालू हो सकें।
MR. CHAIRMAN: You are repeating the same thing. This is too much. You are in the Panel of Chairmen and you are behaving like this.
डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :महोदय, आप जानते हैं, अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग कीमतें हैं। इससे बड़ा भारी उत्पात होगा। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और बिहार आदि राज्यों में अलग-अलग भाद तय होता है। इस ओर मंत्री जी को ध्यान देना चाहिए।
इन शब्दों के साथ जो बिल सदन में प्रस्तुत किया गया है, वह किसानोन्मुखी नही है, लेकिन इसे पास कर दिया जाए, जिससे चीनी मिलों का सुधार हो।
SHRI A.K.S. VIJAYAN (NAGAPATTINAM): Hon. Chairman, Sir, we seek to amend the Sugar Development Fund Act of 1982. The control mechanism on sugar sales in the open market is liberal now. Market trends can make or mar the sugar industry of the country today. To sustain sugar production in a remunerative way and to protect the interests of agriculturists is the need of the hour. So, the relevance of this Sugar Development Fund is felt more now.
Apart from stabilisation of sugar prices, the Fund aims at developing sugar industry. The Fund will provide for inland freight thereby promoting sugar exports. The export of agro-products needs to be encouraged to give a boost to our agro-economy. Our able and dynamic Commerce Minister, Thiru Murasoli Maran in his recently announced Exim Policy has highlighted this. I feel his efforts and the steps like the amendment to Sugar Development Fund Act would provide conducive atmosphere to augment sugar production.
Sir, the Bill also aims at producing power from bagasse and step up ethanol and alcohol production, which would step up industrial production. When capacity remains to be 3500 MW, out of bagasse, we produce only 220 MW which is very very meagre. It is sad that we have been ignoring this all these years. At least from now on, we have to wake up to keep pace with modern world’s industrial growth and power generation.
Care must be taken to avoid the misuse of liberal grant of loans, subsidies and other incentives given by the Government to the sugar industry. I would like to point out what happened in my constituency.
17.29 hrs (Dr. Raghuvansh Prasad Singh in the Chair) A sugar factory called Thiru Aarooran Sugars was at Vadapathi Mangalam for a very long time. It was wound up and shifted elsewhere on the plea that it is not viable. But the fact is to the contrary, as the reports say. In order to avoid ploughing back the profit and to avail of incentives from the Government, the management of that sugar mill closed down that unit. The same is the case with the sugar unit in Nannilam Kollumangudi. Thousands of agricultural labourers and hundreds of factory workers and all their families face great hardship because of the closure of these units.
Hence, I urge upon the Government to ensure that no sugar mill is closed for any reasons. Some mills were facing financial crisis as the Government was not paying for levy sugar. The arrears remain in crores of rupees. Sugarcane growers are also affected by this. Now, crores of rupees accrued towards payment to the farmers for the sugarcane supplied to the mills.
Hence this Bill must correct all the problems pertaining to sugar mills and farmers.
With these words, I conclude.
श्री माणिकराव होडल्या गावीत (नन्दुरबार) : माननीय सभापति महोदय, मैं चीनी विकास नधि संशोधन विधेयक, २००२ पर बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं। आपने मुझे बोलने की अनुमति दी, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश में चीनी कारखाने ज्यादा उत्पादन करते हैं, यह सदन को ज्ञात है। जो गन्ना उत्पादक किसान हैं, वे बहुत दुखी हैं, इस बारे में सभी माननीय सदस्यों ने यहां कहा है।
महोदय, चीनी विकास नधि अधनियम, १९८२ में सुधार लाने के लिए मंत्री जी ने यह बिल रखा है, जिसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूं। जो सिक चीनी मिलें हैं, उन्हें पुनर्जीवित करने की जरूरत है। मैं सुझाव दूंगा कि जो बीमार चीनी मिले हैं, यद्यपि उन्हें एसडीएफ का लोन देने का भी प्रावधान है, लेकिन महाराष्ट्र की चीनी मिलों को अभी तक उस लोन का फायदा नहीं मिला है। इसलिए मैं इस तरफ मंत्री महोदय का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। निर्जल अल्कोहल या अल्कोहल से एथनोल का उत्पादन और उनकी जीवन-क्षमता को सुधारने के लिए जो संशोधन किया गया है, उससे कारखाने को जरूर लाभ होगा। निर्जल एल्कोहल, एथनोल के मोटर ईंधन से सम्मिश्रण के लिए उत्पादन को प्रोत्साहन देने में अपरिष्कृत तेल के आयात से विदेशी मुद्रा में सारभूत् बचत होने की संभावना है - यह बहुत ही अच्छी बात है, लेकिन इसमें एसडीएफ के लोन से जो सिक चीनी कारखाने हैं, केवल उन्हें ही एथनोल बनाने की इजाज़त रहेगी। हमारे महाराष्ट्र में १०--११ युवक एकत्र होकर, प्राइवेट कम्पनी बना कर, पैट्रो केमिकल की युनिट चला रहे हैं। उन्हें इस चीनी विकास नधि का फायदा मिलेगा या नहीं, यह मैं मंत्री जी से जानना चाहता हूं। अल्कोहल से एथनोल बनाने की बात इसमें बताई गई है और चीनी कारखानों द्वारा लगभग ३५०० मेगावाट विद्युत का भी उत्पादन किया जा सकता है, यह अच्छी बात है। लेकिन यहां जो बताया गया है, उस हिसाब से अगर यह सही ढंग से लागू होगा तो आज जहां बीमार कारखानों को फायदा होगा, वहीं गन्ना उत्पादक किसानों को भी इसका लाभ मिलेगा।
महोदय, मैं ज्यादा समय न लेते हुए मंत्री जी को धन्यवाद देता हूं कि यह जो चीनी विकास नधि संशोधन विधेयक लाए हैं, उसका फायदा चीनी मिलों को और किसानों को भी होगा, यह भी मैं मंत्री जी से आशा रखता हूं। आपने मुझे बोलने का मौका दिया, इसके लिए आपको धन्यवाद।
   
श्री मानसिंह पटेल (मांडवी): सभापति जी, माननीय मंत्री श्री शांता कुमार जी चीनी विकास नधि अधनियम, १९८२ संशोधन विधेयक लेकर आये हैं। संशोधन का उद्देशय स्वयं ही स्पष्ट है। मैं अपनी ओर से और समस्त चीनी उत्पादन करने वाले किसानों और मजदूरों की तरफ से उनका हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं। आज चीनी उद्योग इस देश के लिए महत्वपूर्ण उद्योग बन रहा है। चीनी उत्पादन के क्षेत्र में यह देश अग्र-क्रम पर आया है। इस विधेयक के द्वारा मंत्री जी ने जो दो-चार बातें बताई हैं वह स्वयं में स्पष्ट हैं।
माननीय सभापति जी, हम यह भी जानते हैं कि चीनी उद्योग के अंतर्गत ५०० से ज्यादा मिलें हैं जिनमें ५० प्रतिशत से ज्यादा कोओपरेटिव्ज में हैं। पिछले सालों में माननीय मंत्री जी ने कोओपरेटिव्ज मिलों के पदाधिकारियों के साथ तथा इस उद्योग से जुड़े गणमान्य लोगों के साथ विचार-विमर्श करके आगे बढ़ने का प्रोग्राम किया है और उसी के बाद यह विधेयक आ रहा है। माननीय प्रधान मंत्री जी का भी हम आभार व्यक्त करते हैं कि जो इथनोल की बात थी वह बीस साल से पैंडिंग थी। बीस साल की पैंडिंग फाइल निकाल कर, इस देश के चीनी उद्योग और किसानों को समृद्धि की ओर ले जाने के लिए, पांच प्रतिशत इथनोल पेट्रोलियम में मिक्स कर सकें, ऐसा प्रावधान करवाया है। आगे १० प्रतिशत से लेकर ब्राजील की तरह २४ प्रतिशत की ओर भी हम जा सकते हैं। इस क्रांतिकारी कदम के लिए हम सरकार को धन्यवाद देते हैं। सन १९९५ के बाद चीनी का उत्पादन बहुत हुआ है और इस सरकार के आने के बाद आयात-डयूटी लगाकर, जिससे बाहर से चीनी यहां न आ सके, सरकार ने अच्छा निर्णय लिया है। हम यह भी जानते हैं कि चीनी समृद्ध देश सब्सिडी देकर चीनी निर्यात करने की कोशिश कर रहे हैं। आपने यह भी बताया कि बिहार में कई चीनी मिलें बंद पड़ी हुई हैं। इन मिलों का उत्पादन खर्च कैसे कम किया जा सके, इसके लिए उनमें मॉडफिकेशन कैसे कर सकें, इस विधेयक में इस तरह की सारी बातें आ रही हैं। गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक में कोओपरेटिव्ज अपना काम अच्छा चला रही हैं। गुजरात में १०० प्रतिशत चीनी उद्योग कोओपरेटिव्ज में है। माननीय मंत्री जी से गुजरात का एक डैलीगेशन अभी मिला था और माननीय मंत्री जी को उस वक्त भी उसने बतलाया और स्वयं माननीय मंत्री जी को भी जानकारी है कि इस वक्त चीनी उद्योग बहुत मुसीबतों से गुजर रहा है। देश का २० प्रतिशत उत्पादन अगस्त-सितम्बर तक होगा और गोदामों में माल भरा पड़ा है और इस साल का भी पूरा उत्पादन गोदामों में है। गुजरात में ३० प्रतिशत उत्पादित माल गोदामों से बाहर है और मानसून के कारण उनको बाहर पड़े माल की चिंता है। हमने माननीय मंत्री जी से अनुरोध किया था कि जो लेवी-शुगर का अनलमिटेड कोटा राज्यों को दिया था, वे ले नहीं सके हैं और हमारा माल बाहर पड़ा है। इसलिए एक्सट्रा रिलीज देकर पर्मिशन हमको दे दी जाए - ऐसी प्रार्थना हमने की है।
स्टॉक रखने के लिए गोदाम, प्लांट मॉडफिकेशन के लिए और एथनॉल प्लांट के लिए जो लोन की जरूरत पड़ेगी, वह एसडीएफ से कम ब्याज पर और ज्यादा हफ्तों के लिए मिले, ऐसा प्रयास होना चाहिए। एसडीएफ और एनसीडीसी जो लोन देता है उसमें गारंटी स्टेट गवर्नमैंट की लेता है लेकिन कई स्टेट्स में गारंटी मिल नहीं पाती है। जिन चीनी मिलों की स्थिति अच्छी है उनकी मिल्कियत लेकर और एग्रीमैंट करके उन्हें सीधे लोन दिया जाए, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। आप जो बिल लेकर आए हैं उससे चीनी मिलों से जुड़े किसानों, मजदूरों और दूसरे सभी लोगों को फायदा होगा। हमें ऐसा अनुभव उत्तर प्रदेश और बिहार में देखने को मिला है। गुजरात में कई कोआपरेटिव मिलें हैं। वहां आठ मास में अच्छा मुआवजा मिल जाता है। कोजैनरेशन प्लांट से हम सौ प्रतिशत बिजली उत्पादन कर सकते हैं लेकिन पांच परसैंट ही बिजली उत्पादन कर पाए हैं। इस तरफ ध्यान दिया जाए। एसडीएफ से लोन मिलने पर ही एथनॉल की बात, कोजैनरेशन की बात और निर्यात में परिवहन सबसिडी देने की बात पूरी हो सकेगी, हम इसमें सफल हो पाएंगे और देश के किसानों को उसका फायदा होगा। आपने मुझे समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।
DR. V. SAROJA (RASIPURAM): Mr. Chairman Sir, I rise here to support this Bill. The Sugarcane Development Fund Act 1982 was enacted to provide for financing activities for the development of the sugar industry. I welcome the amendments that have been brought forward now. I would request the hon. Minister to include one more amendment by which minor irrigation programmes and projects can also be included. At the time of monsoon failure, the very pressing problem that an agriculturist, particularly a sugarcane grower, faces is that he finds it very difficult to carry on without any water source. Most of the sugarcane growers in India cultivate lakhs of hectares of land.
Not only that, at the present juncture, only the sugarcane industry is generating job opportunities for agricultural labourers. In Tamil Nadu there are about 19 sugarcane industries in the cooperative sector and the private sector. Each industry is creating job opportunities to the tune of seven thousand employees directly and indirectly. Therefore, I would request the hon. Minister to consult the Rural Development Ministry to know whether the Sugarcane Development Fund can also be extended to help these poor agricultural labourers.
Sir, till 31st March, 2001, Rs.2785.66 crore was collected and Rs.2566 crore was transferred to the Sugar Development Fund out of which only Rs.19.76 crore is earmarked for research and development. About 85 per cent of the farmers of India live in the rural areas. Still, we have not learnt the technology from Brazil not only for agricultural production but also for the by-products, associated and allied industries. I would request the hon. Minister to have a special team for research and development work in consultation with Brazil and get the technology transferred to the soil of our rural sugarcane farmers.
Though we are contributing a substantial amount from Tamil Nadu to the Sugarcane Development Fund, in turn, we are getting a very meagre amount for our sugarcane growers. Please consider our request. Honourable Chief Minister of Tamil Nadu has already written to the Government of India to have a blending unit of ethanol as fuel for automobile units in Tamil Nadu. We have all the infrastructural facilities. I appeal to you to kindly consider Tamil Nadu as number one State among the eight States that you propose to have the ethanol blending unit. It is because we have all the infrastructural facilities. We have the man power and the aptitude to make use of this benefit so that the people of Tamil Nadu will be benefited.
In this Bill, it is given that 3500 MW of power can be generated by sugar industry alone using bagasse. Are we not interested and are we not focussing our attention to the fact that poverty is at the highest level? It is a very sorry state of affairs. Our direction and all our efforts should be focussed towards power generation because out of 3500 MW that can be produced, so far we have produced only 210 MW and we have proposed to generate 245 MW of power.
There is one more point to be noted. The cost of production from bagasse waste is relatively lesser than that from conventional power projects. I am so much concerned about this power project. In most of the States, the industry is becoming sick due to interrupted electricity supply. And in those States which the Government of India proposes to have ethanol blending units, I appeal that electricity generated using bagasse, as a co-generation power project, can be distributed to other States as the first phase so that ethanol-blending unit and production of electricity can be linked, and the State Governments will be able to make use of these benefits so that the labourers, the farmers and the country as a whole will develop economically.
With these words, I conclude.
*SHRI M. DURAI (VANDAVASI): Sir, I extend my support to this Bill and thank the Chair for this opportunity.
In our country, Tamil Nadu is one among the foremost states in sugar production. Sugarcane farmers form the backbone of sugar production in the country. But still the sugarcane cultivators in Tamil Nadu are undergoing innumerable problems for the past 20 months. This is due to the non-payment of arrears pending with the sugar mills to be paid for the sugarcane procured. Debt burden and poverty conditions have seriously tormented the sugarcane growers.
In Tamil Nadu sugar mills in the cooperative sector alone owe about Rs 20 crore to the sugarcane agriculturists. The cultivators who have sweated and rendered their labour to grow sugarcane do not find their conditions pleasing and sweet. But they struggle hard as they could not get even the wages for the job they had done. As they could not get the payments from the sugar mills in time, the small farmers are forced to sell away their lands. They are struggling hard for their survival and life has become miserable. Poverty, debt burden and depression force them to the verge of committing suicide. Hence I urge upon the Union Government to intervene and help the sugarcane cultivators to get the money due to them.
This fund may find ways to extend financial assistance either in the form of liberal loan or grants or subsidies to obviate the problems faced by the sugarcane farmers. Lakhs of sugarcane growers and agricultural labourers would be greatly benefited by the boost given to the sugar industry.
This fund seeks to concentrate on to increased power generation from bagasse and enhanced production of ethnol from mollasses which would contribute to our nation’s economy while sustaining the growth of sugar industry. So it is a welcome move.
On behalf of our founder leader Dr S. Ramadoss and on behalf of Puttali Makkal Katchi I extend my wholehearted support to this Bill while reiterating my demand to make use of this fund to alleviate the problems faced by the sugarcane cultivators.
* English translation of speech originally delivered in Tamil.
     
SHRI MADHUSUDAN MISTRY (SABARKANTHA): Thank you, Mr. Chairman. I support the very idea of using bagasse for producing electricity. But I have my own strong reservations as to whether the sugar mills can produce electricity just because they have a by-product. There is a very big question mark whether the sugar mills have that expertise to produce electricity. If they are that keen to get rid of or to generate income from the raw materials that they have, the best solution would be, the Federation should create a separate company to generate electricity and sell this by-product to them. They can then raise the capital from the market. On the one side, the Government is going in for privatisation and disinvestment and on the other side the Government is proposing to give them loan. I think the Minister should know that there are a large number of sugar co-operative mills which have not paid even the interest for the loan that they have taken from the respective Governments. I also have a doubt whether the money that is earned by selling raw materials or by generating electricity will really go to the sugar growers. There is a very big question mark on that. If they want to get rid of or if they want to generate income out of the by-product that they have, the best option available for the sugar factories is that they can set up a separate company to generate electricity and they can sell the by-product to them. If the Government is that keen to give money or loan, it should give it to that new company.
It is said in the Statement of Objects and Reasons, that 3,500 MW of power can be generated by the sugar factories with bagasse as the feedstock. I have my own doubts about this potential. I have gone through the Infrastructure Development Report, which was prepared by Rakesh Mohan Committee. I do not remember to have read anywhere that such vast potential is available from this by-product and that so much of electricity could be generated from that. If that is not there, again I am very much doubtful. It is said that only about 212 MW generation capacity plants have been commissioned. I do not know at what level they are producing electricity. It would have been better if the Members were, at least, told about the cost-benefit ratio of producing electricity.
In Gujarat, we had a project for generating electricity through tidal wave. It has never taken place. It is one of the costliest projects that we ever had. We had to abandon that in-between.
I do not know about it. I hope that in future, perhaps, we may not have to abandon the same sort of a project simply because it is costlier; we do not have the expertise and that it is not viable to produce electricity by using the bio-product, like bagasse, of sugar-cane.
The third point I would like to make is this. It is, of course, not mentioned here. But what I thought was that the sugarcane cutters, the labourers would be included in this Sugar Development Fund (Amendment) Bill. Mr. Minister, you have seen the plight of the sugarcane cutters. I want to bring to the notice of my friends from Maharashtra that there are thousands and thousands of labourers who come from Bhusawal and Dhulia to Gujarat. They live in appalling conditions. They are not even known by their names. They are known by the name Koytha, which is an instrument through which they cut sugarcane. Until the last few years, it was only Rs.72 per tonne that was given to them. They start the work early morning, at five of the clock. There are no schools. There are no proper living conditions. There are no facilities provided to them. They are simply left to live in the open ground near the banks or canals. In fact, they have to do everything in the open. It is a small kanthan, tadpatri which is provided. It is a kind of a make-shift tent. They have to live in that condition. There is hardly any privacy. The children are not sent to schools by the factories. These factories are making a lot of profits.
What is the share of these labourers in this Fund? I would like to know whether the labourers are included in the Sugar Development Fund or not. There are thousands and thousands of labourers in Gujarat. The High Court has to pass a stricture. In fact, they have to set up a Commission to inquire into the labour conditions, the conditions of the sugarcane workers in Gujarat. A large chunk of the workers come from Maharashtra. So, where are they in this Sugar Development Fund?
This is all I wanted to say. I would request you to take note of this. Again, I express my strong reservations about the claim regarding production and generation of electricity through the sugar mills. I want to know whether that is going to be a viable one or not.
With these words, I conclude.
श्री लक्ष्मण सिंह (राजगढ़): सभापति महोदय, जो विधेयक मंत्री जी लाए हैं, मैं उसका विरोध करने के लिए खड़ा नहीं हुआ हूँ। बहुत कम समय में अपनी बात कहकर मैं अपना स्थान ग्रहण करूंगा।
मंत्री जी ने बताया :
"The carry over stock of sugar as on 30.09.2001 was over 100 lakh tonnes. The holding costs of sugar at such high level adversely affect the viability of sugar factories. This, in turn, affects timely payment of cane price dues to the sugarcane growers. "  

 आपने चिन्ता जताई है शुगरकेन ग्रोअर्स के बारे में, शुगर कारखानों के बारे में। एक कहावत है - देर आयदे दुरुस्त आयद। अगर यही चिन्ता आप पहले दिखाते तो उत्तर प्रदेश में जो आपकी सीटें कम हुई हैं, वे न हुई होतीं। खैर, हम सब आपके इस कदम का स्वागत करते हैं।

सभापति महोदय, हमारे साथी जाधव जी ने इसे क्रांतिकारी कदम बताया और कहा कि १२ लाख टन शक्कर का आपने निर्यात किया है, इससे ऑइल बिल भी कम होगा जो ८० हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। मैं केवल एक सुझाव देना चाहूंगा कि १५ प्रतिशत शक्कर का उत्पादन लेवी में नए कारखानों को - प्राइवेट हों या कोआपरेटिव हों, देना पड़ता है। यह जो लेवी कारखाने सरकार को देते हैं, जो शुगर कंट्रोलर है, जो रिलीज़ ऑर्डर देता है, उसके मिलने के बाद दे सकते हैं। रिलीज़ ऑर्डर समय पर नहीं मिलता है और इसके कारण जो कैरीओवर स्टॉक्स हैं कारखाने के, वह बढ़ते जाते हैं, उनका नुकसान बढ़ता जाता है। इससे लगभग ५०० से ६०० रुपये प्रति क्िंवटल प्रतिमाह प्रति बोरा नुकसान कारखानों को हो रहा है। इसलिए आवश्यक है कि शुगर कंट्रोलर का जो पद है, या तो इसको आप पूरी तरह से समाप्त कर दें या उन कारखानों को छूट दें कि वे लेवी की शुगर जब देना चाहें, तब दे दें। ऐसे राज्यों में जिसमें मध्य प्रदेश भी है, जो बहुत ज्यादा शक्कर उत्पादन नहीं करते हैं, उनमें यह शुरू कर सकते हैं।

18.00 hrs. सभापति महोदय, जैसे मध्य प्रदेश में १३ लाख मीटि्रक टन चीनी का उत्पादन होता है उसमें से १२,०४,४१० टन की हमारी पी.डी.एस. की मांग है। इस प्रकार से केवल १ लाख टन या ९५ हजार टन का फर्क रहता है। अगर आप हमें यह छूट दे दें कि हम इसको शुगर कंट्रोलर की इजाजत के बिना, अपने प्रदेश में उत्पादित चीनी को बेच सकें, तो हमारा सविल सप्लाई डिपार्टमेंट इस १ लाख या ९५ हजार टन चीनी को एक महीने में बेच देगा और कैरीओवर स्टॉक से कारखानों को जो नुकसान होता है वह नहीं होगा।

महोदय, इस संबंध में मेरी एक शिकायत है कि मैंने नियम १९७ के अन्तर्गत ध्यानाकर्षण प्रस्ताव दिया था। मुझे इस बात का अत्यन्त खेद है कि अभी तक मुझे इसका जवाब नहीं मिला है। मैं आपका ज्यादा समय नहीं लूंगा। आपका उत्तर सुनने के लिए हम सभी बेताबी से इंतजार कर रहे हैं।

सभापति महोदय, आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।

श्री प्रकाश वी.पाटील (सांगली): सभापति महोदय, शुगर डैवलपमेंट अमेंडमेंट बिल, २००२ का सपोर्ट करने के लिए मैं खड़ा हुआ हूं। जैसे कि एक्सपोर्ट के लिए ट्रांसपोर्ट इंसेंटिव देने की बात इस विधेयक में कही गई है, मैं बताना चाहता हूं कि लास्ट ईयर २७२ डॉलर प्रति टन एक्सपोर्ट हुआ था। स्लोली-स्लोली भाव कम होते-होते २३० डालर तक आया था और अब २०५ डालर में एक्सपोर्ट हो रहा है। जैसा आपने कहा है कि ट्रांसपोर्ट सबसिडी देंगे, तो वह १० डालर तक दी जाएगी। इस प्रकार से १० डॉलर प्रति टन सबसिडी देंगे। इससे थोड़ी सी राहत मिलेगी, लेकिन दिन प्रति दिन इंटरनैशनल प्राइस इतनी डाउन होती जा रही हैं जिससे उसे बहुत नुकसान पहुंचेगा और गन्ना उत्पादक किसानों को कोई फायदा नहीं होगा। इसलिए शुगर इंडस्ट्री को और अन्य प्रकार की सुविधाएं दी जानी चाहिए क्योंकि भारत में चीनी उद्योग ने देश को पिछले २० वर्षों में २० हजार करोड़ रुपए शुद्ध मुद्रा शुगर डैवलपमेंट फंड में दिलाई है।

महोदय, इस समय हमारे गोडाउन में ११० लाख टन का स्टाक है। हम प्रधान मंत्री जी से मिले थे और निवेदन किया था कि शुगर का १५ लाख टन का बफर स्टॉक बनाना चाहिए। हमने कहा था कि हमारे देश में जिस प्रकार से अन्न का बफर स्टाक है उसी प्रकार से चीनी का बफर स्टाक भी होना चाहिए, लेकिन यह जो विधेयक लाया गया है, इसमें उसकी कोई चर्चा नहीं की गई है। मैं कहना चाहता हूं कि इसके बारे में जरूर सोचना चाहिए।

महोदय, विगत पांच वर्षों में हमने महाराष्ट्र और भारत में ज्यादा से ज्यादा शुगर उत्पादन करने के साधन मुहैया कराए हैं और ज्यादा से ज्यादा शुगर पैदा की जा रही है, लेकिन इसका फायदा किसान को नहीं हो रहा है। गन्ना और चीनी का भाव दिन प्रति दिन गिरता जा रहा है। हमने महाराष्ट्र में अधिकतम चीनी उत्पादित की है, लेकिन उसके लिए बायर्स नहीं मिल रहे हैं और उसके दाम दिनोंदिन कम होते जा रहे हैं।

महोदय, हमने महाराष्ट्र में कोआपरेटिव शुगर फैक्टि्रयों में तीन महीने पहले एथनाँल का उत्पादन शुरू कर दिया, लेकिन सरकार की ओर से कोआपरेट नहीं किया जा रहा है। मेरा आग्रह है कि इसकी ज्यादा से ज्यादा खपत हो इसके लिए शुगर मनिस्ट्री और पैट्रोलियम मनिस्ट्री को मिलकर सहयोग करना चाहिए। हमारी ६० करोड लीटर की डिमांड है और हम महाराष्ट्र में ३ करोड लीटर एथनाँल बनाते हैं, लेकिन उसका भी डिस्ट्रीब्यूशन नहीं हो रहा है।

सभापति जी, विद्युत उत्पादन के लिए जो धन देने की बात इस विधेयक में की गई है, वह अच्छी बात है। इसमें जो को-जनरेशन की सुविधा देने की बात कही गई है, वह अच्छी बात है, लेकिन इंडिया गवर्नमेंट ने जो आठ डिमांस्ट्रेशन प्रोजैक्ट लिए थे, for co generation उनमें से सात डिनाई कर दिए जिसके कारण वे बन्द पड़े हैं और एक रह गया है, वह भी आगे जाकर बन्द हो जाएगा। इस दिशा में ध्यान देने की जरूरत है और कोशिश यह होनी चाहिए कि केन्द्र सरकार ज्यादा से ज्यादा प्रोजैक्ट ले, इस हेतु परस्यू करना चाहिए जिससे ३५०० मैगावाट इलैक्टिसिटी जनरेट हो सके।

महोदय, ये जो प्रपोजल हम लाए हैं, ये १० साल पुराने हैं। हमें इनके अलावा नए प्रोजैक्ट भी लेने चाहिए। जैसे बगास से एथनाँल बनाने का प्रोजैक्ट है, एथनॉल बनाने का प्रोजैक्ट है, डिटर्जेंट बनाने का प्रोजैक्ट है या इस प्रकार के अन्य प्रोजैक्ट हैं, उनको भी लेने के लिए इसमें इनकार्पोरेट करना चाहिए, उनको सुविधा देनी चाहिए। गन्ना विकास के लिए भी हम लोगों ने प्रपोजल दिए हैं, लेकिन वे सैंक्शन नहीं हुए हैं। उन्हें स्वीकृति प्रदान करने पर भी ध्यान देना चाहिए। महाराष्ट्र में ३० शुगर मिलें रीहैबलिटेशन के लिए हैं जो बन्द पड़ी हुई हैं। उन्हें रीहैबलिटेट करने के लिए ज्यादा से ज्यादा पैसा उपलब्ध कराना चाहिए। इन्हीं शब्दों के साथ मैं इस बिल का सपोर्ट करता हूं।

श्री रामदास आठवले (पंढरपुर) : सभापति जी, चीनी विकास नधि अधनियम १९८२ में संशोधन करने के लिए मंत्री जी नया चीनी विकास नधि (संशोधन) विधेयक, २००२ लेकर आये हैं। भारत में गन्ने का उत्पादक बहुत बड़ी संख्या में होता है। अभी प्रकाश पाटिल जी ने आपको बहुत अच्छी जानकारी दी। मेरा कहना है कि महाराष्ट्र में १४०-१४५ शुगर फैक्टरीज हैं, जिनमें से कई मिलें बंद हो रही हैं। मंत्री जी इस वक्त यह बिल लेकर आये हैं। मेरा कहना है कि मंत्री जी बहुत अच्छे आदमी हैं और वे बहुत अच्छा काम करने वाले हैं। यह ऐसे मनिस्टर हैं जो सोचते हैं कि इसे करना है तो वह उसे करते हैं। मेरे कहने का मतलब है कि यह बहुत स्ट्रांग मंत्री हैं इसलिए हमें इन पर अभिमान है। बेशक आज वे उधर बैठे हैं।

आप चीनी कारखानों को डेवलप करने के लिए, स्ट्रेन्थन करने के लिए लोन देने वाले हैं तो आप उस लोन पर क्या इंटरैस्ट लेंगे ? मेरा कहना है कि आज उनको विदाउट इंटरैस्ट कर्जा देने की जरूरत है ताकि शुगर फैक्टरीज आसानी से चल सकें। इस पर आपको विचार करने की जरूरत है। इसके अलावा जो कीमत शुगर फैक्टरीज गन्ने की कीमत की तय करे, वही कीमत किसान को मिलनी चाहिए ताकि किसानों को भी इसका फायदा मिल सके।

इसी तरह खेत में गन्ना तोड़ने वाले जो मजदूर हैं, उनके पे स्केल को भी फिक्स करने की जरूरत है। अगर आप कारखाने को चलाने के लिए लोन देने वाले हैं तो उस कारखाने में काम करने वाले मजदूरों के बारे में भी आपको सोचने की आवश्यकता है। मैं एक और बात कहना चाहता हूं कि शुगर फैक्टरीज में एस.सी.एस.टी. के जो लोग काम करने वाले हैं, ज्यादातर लोग गन्ना काटने वाले हैं, उनका भी इसमें रिजर्वेशन रहना चाहिए। श्री विखे पाटिल जी की भी एक फैक्टरी है। मेरा कहना है कि कानूनी तौर पर जब सरकार पैसा देती है तो एस.सी.एस.टी. का रिजर्वेशन भी उसमें होना चाहिए।

जब आप रिप्लाई दें, तब आप इसके बारे में जरूर अपने विचार रखेंगे, ऐसी मुझे उम्मीद है। आप मंत्री पद पर रहने वाले हैं इसलिए हम आपसे अच्छा रिप्लाई चाहते हैं। हम इस बिल का समर्थन करते हैं। किसान को, खेत मजदूर को, गन्ना पैदा करने वाले मजदूरों को, या शुगर फैक्टरीज चलाने वाले जो लीडर हैं, महाराष्ट्र में कोई भी ऐसा नहीं है जिसकी शुगर फैक्टरी न हो। मैं ही अकेला ऐसा एम.पी. हूं जिसकी कोई शुगर फैक्टरी नहीं है। मेरी कांस्टीटूएंसी में १४ शुगर फैक्टरीज हैं और वे फैक्टरीज अच्छी तरह से चल रही हैं। उनको चलाने वाले भी अच्छे हैं। यदि आप उनको भी सहयोग देंगे तो उससे और भी अच्छा फायदा हो सकता है। मैं आपके बिल को सपोर्ट करता हूं।

उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री (श्री शांता कुमार) : सभापति जी, मैं सम्मानीय सदस्यों को बहुत धन्यवाद देता हूं। पूरे सदन ने इस संशोधन बिल का समर्थन किया है और समर्थन करने के साथ-साथ महत्वपूर्ण सुझाव दिये हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह उद्योग बहुत महत्वपूर्ण है और कृषि पर आधारित प्रमुख उद्योग है। भारत आज चीनी के सबसे अधिक उत्पादक देश और सबसे अधिक खपत वाले देश के रूप में उभरा है। लगभग पांच करोड़ किसान और अन्य लोग इस उद्योग पर आधारित हैं।

आज यहां बात कही गयी कि हम कुछ देरी से इस बिल को लेकर आये हैं। यह ठीक है कि एथनोल इत्यादि बात कही गयी कि हम कुछ देरी से इस बिल को लेकर आये हैं। यह ठीक है कि एथनोल इत्यादि बातों में कुछ विलम्ब हुआ, यह बहुत पहले आना चाहिए था। मैं आपसे सहमत हूं लेकिन इस उद्योग के संबंध में सरकार पहले से चिन्तित है। पिछले कुछ वर्षों से सरकार चीनी उद्योग को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए बहुत से कदम उठा रही है।

सरकार ने इस इंडस्ट्री को डी-लाइसैंस कर दिया। लेवी की बाध्यता को ६० प्रतिशत से घटाते-घटाते १० प्रतिशत कर दिया। फ्यूचर फारवर्ड ट्रेडिंग के बारे में निर्णय ले लिया गया है। तीन एक्सचेंजेस आइडैंटीफाई कर दी, उनको अनुमति दे दी, फारमैलिटीज़ कम्प्लीट हो रही हैं और बहुत जल्दी शुगर में फ्यूचर ट्रेडिंग शुरू होने वाला है। स्टॉक होल्िंडग लमिट को समाप्त कर दिया। इस प्रकार के बहुत से प्रतिबंध थे जिनको हमने समाप्त किया है। शुगर के एक्सपोर्ट को बढ़ाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। आज हम बाय-प्रोडक्ट प्रोडक्शन की द्ृष्टि से एक महत्वपूर्ण कदम लेकर आपके पास आए हैं। चीनी से संबंधित जो समस्याएं थीं, उनके संबंध में सरकार को लगा कि हमारे पास काफी भंडार हो गया है। शुगर सर्किल टूट गया। पहले दो वर्ष उत्पादन बहुत अधिक होता था, फिर दो वर्ष उत्पादन कम होता था, अब किसान की मेहनत, लोगों की मेहनत और सरकार की नीतियों का परिणाम यह है कि वह सर्किल टूट गया। अब निरंतर चौथा वर्ष है कि हमारा उत्पादन बढ़ रहा है, रिकार्ड उत्पादन हो रहा है। इस परिस्थिति में हमें कुछ नई चीजें सोचनी थीं तो हमको लगा कि इसमें कुछ और चीजों की आवश्यकता है। सरकार ने क्वांटीटेटिव सीलिंग एक्सपोर्ट भी समाप्त की। ऐपीडा के साथ रजिस्ट्रेशन की शर्त थी, उसे भी समाप्त कर दिया। इसके बाद जो एडजस्टमैंट था डैटरमैंट, उसे भी १८ महीने का कर दिया। एक इनडायरैक्ट इनसैन्टिव एक्सपोर्ट के लिए डी.ई.पी.बी. बैनीफिट ५ प्रतिशत भी हमने दिया। ये सारी चीजें देने के बाद एक्सपोर्ट में कुछ वृद्धि हुई और जहां दिसम्बर, २००० तक २ लाख ११ हजार मी. टन का एक्सपोर्ट हुआ था, वहां २००१ में २ लाख ११ हजार मी.टन से बढ़ कर ११ लाख ८२ हजार टन का एक्सपोर्ट हुआ। यदि इसे वैल्यू में देखना हो तो पिछले वर्ष २७४ करोड़ रुपये की चीनी एक्सपोर्ट हुई और इस साल बढ़ कर १३९४ करोड़ रुपये का एक्सपोर्ट हुआ है। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। हमें और अधिक एक्सपोर्ट करने की आवश्यकता है, इसलिए इस पर विचार किया जा रहा है।

कुछ माननीय सदस्यों ने सिक, बंद मिलों के बारे में चिन्ता प्रकट की है। उन सारी समस्याओं का समाधान करने के लिए ही चीनी उद्योग को सशक्त करने की बहुत सी नीतियां सरकार बना रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि देश में कुल ५२४ मिलें हैं जिनमें से सिक मिलें, जो बी.आई.एफ.आर. को रैफर हो चुकी हैं, ७५ हैं, कोआपरेटिव्ज की ११४ मिलें हैं, बिल्कुल बंद ९९ मिलें हैं। यह चिन्ता का विषय है। इन सारी मिलों को रिवाइव करने के लिए भी सरकार के सामने एक विचार है। हम कोशिश कर रहे हैं और हमारे १९८३ के एस.डी.एफ. रूल्स में the Government is considering to amend the SDF Rules. ताकि पोटैंशियली वॉयबल सिक शुगर मिल्स की हम मदद कर सकें। एक पैकेज तैयार हो रहा है जिसमें बंद मिलें, जिनमें रिवाइव होने का पोटैंशियल है, उनके रिवाइवल की रिकमैंडेशन हो गई है। उन मिलों को भी फिर से रिवाइव करने के लिए हम शुगर डैवलपमैंट फंड रूल्स में संशोधन करके इससे उनकी मदद करेंगे, यह प्रस्ताव भी सरकार के विचाराधीन है।

कुछ और बातें यहां माननीय सदस्यों ने रखी हैं। अगर हमें क्वालिटी शुगर एक्सपोर्ट करना है तो क्वालिटी इम्प्रूव करनी होगी। अन्य सुविधाएं देनी होंगी। कुछ सुविधाएं दी हैं, कुछ आगे भी देंगे लेकिन विश्व बाजार में हमारी चीनी की क्वालिटी बढि़या हो, यह भी आवश्यक है। इस द्ृष्टि से सरकार ने एक निर्णय यह किया है किSugar and sugar products shall be covered under the BIS Voluntary Certification Scheme to get ISI Mark.

यह भी एक महत्वपूर्ण निर्णय सरकार ने किया है ताकि विश्व के बाजार में हमारी चीनी की गुणवत्ता बढ़े और आई.एस.आई. मार्क उसको दिया जा सके।

यहां पर एक बात यह कही गई है कि एल्हकोहल बनाने के लिए लोन दिया जायेगा, हम इथेनोल बनाने के लिए यह लोन देंग, यह लोन एल्कोहल बनाने के लिए नहीं दिया जायेगा। मोलेसिस से एल्कोहल बनाया जाता है, उसे डिस्टीलरीज बनाती हैं। कोई नई डिस्टीलरी बनाने के लिए, शराब बनाने के लिए एस.डी.एफ. से किसी प्रकार का लोन देने का प्रावधान नहीं है। इस एमेंडमेंट के द्वारा डिस्टीलरी के लिए कोई लोन नहीं दिया जायेगा। जहां डिस्टीलरी लगी है, वह यदि उसमें से इथेनोल बनाने का प्रयत्न करती है और उसमें से इथेनोल बनाने के लिए मशीनरी लगाना चाहती है तो हमारा जो लोन होगा, केवल इथेनोल बनाने के लिए होगा, एल्कोहल बनाने के लिए नहीं होगा।

मैं पुरानी मिलों के रिवाइवल का जिक्र कर रहा था, मैंने बिहार का भी जिक्र किया है। बिहार में १५ चीनी मिलें बन्द हैं। उस प्रकार का यदि कोई प्रपोजल बिहार सरकार की तरफ से आयेगा तो हम उस पर विचार करेंगे। अभी तक बिहार सरकार की तरफ से इन १५ बन्द मिलों को रिवाइव करने के लिए एस.डी.एफ. से किसी प्रकार की सहायता का कोई प्रपोजल हमारे पास नहीं आया है।

माननीय स्वामी चिन्मयानन्द जी ने एक बात यह कही कि टैक्नोलॉजी के लिए, रिसर्च के लिए भी इसमें कोई प्रावधान होना चाहिए। इसमें ग्राण्ट देने का प्रावधान है, रिसर्च के लिए शुगर डवलपमेंट फंड में यह प्रावधान पहले से ही है। इस समय तक हम लगभग २६ केसेज में ३६ करोड़ रुपया रिसर्च के लिए सैंक्शन कर चुके हैं, यह प्रावधान है। रिसर्च के लिए ग्राण्ट दी जाती है और आगे भी दी जाती रहेगी। एक बात यहां यह कही गई है, मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि जो लोन दिया जायेगा, वह शुगर फैक्टरी या उस यूनिट को दिया जायेगा, जो शुगर फैक्टरी की होगी। किसी इंडिपेंडेंट कम्पनी को लोन नहीं दिया जायेगा, क्योंकि शुगर डवलपमेंट फंड में पैसा शुगर इंडस्ट्री द्वारा ही एक सैस के द्वारा दिया जाता है, इसलिए इसका उपयोग शुगर इंडस्ट्री के द्वारा उनके लिए ही किया जा सकता है। हम इसका उपयोग उनके लिए ही करेंगे।

डॉ. वी सरोजा ने एक बात कही कि केन डवलपमेंट लोन इत्यादि इर्रीगेशन के लिए भी होना चाहिए। मैं उनको बताना चाहता हूं कि एस.डी.एफ. के अन्दर केन डवलपमेंट लोन और इर्रीगेशन फैसलिटीज के लिए, जैसे इन्स्टालिंग ऑफ टयूबवैल्स, बोरवैल्स और लिफ्ट इर्रीगेशन के लिए देने का प्रावधान है। उसके लिए इसमें से लोन दिया जाता है।

मैं माननीय सदस्यों को बहस में भाग लेने के लिए धन्यवाद देता हूं। ३५०० मैगावाट बिजली का जो पोटेंशियल है, उसमें एक महत्व की बात यह है कि यह बिजली यदि बैगास से बनती है तो उसका खर्च कम आता है। एक मैगावाट पर लगभग २.५ से ३.५ करोड़ रुपये का व्यय आता है, जबकि कन्वेंशनल बिजली पैदा करने में चार से पांच करोड़ रुपये का व्यय आता है। यदि ३५०० मैगावाट बिजली हम बैगास से बनाते हैं, जो कन्वेंशनल बिजली के मुकाबले सस्ती पड़ती है तो देश को ४५०० करोड़ रुपये की बचत होने वाली है। देश में बिजली की आवश्यकता है। अगले दस सालों के अन्दर हमें एक लाख मैगावाट बिजली की आवश्यकता होगी, उसमें से ३५०० मैगावाट बिजली केवल शुगर इंडस्ट्री पैदा कर सकती है।

आपने कहा कि यह सुझाव बहुत अच्छा है, लेकिन एक्ट बन जायेगा तो यह केवल कागज पर ही न बना रहे। मैं माननीय सदस्यों को विश्वास दिलाता हूं कि हम तो बहुत जल्दी संशोधन लाना चाहते थे, पिछले अधिवेशन में संशोधन तैयार था, लेकिन पिछली बार समय के अभाव के कारण यह संशोधन नहीं आ सका। अब यह संशोधन होने के बाद इस सम्बन्ध में जो रूल्स इत्यादि बनने हैं, वे सारे रूल्स विभाग ने तैयार कर लिए हैं। हम इस पर बहुत जल्दी अमल शुरू करेंगे और इस संशोधन से शुगर इंडस्ट्री को एक नई दिशा मिलेगी। इन तीन चीजों के कारण हम इस दिशा में बहुत आगे बढ़ेंगे और जैसा कहा गया कि दुनिया के अन्दर टैक्नोलॉजी है तो हमने तो सिर्फ पांच प्रतिशत इथेनोल मिलाने की बात की है।

ब्राजील में २० से २४ प्रतिशत इथानोल मिलाया जाता है। इतना ही नहीं, वहां तो अब शूगर बायो प्रोडक्ट हो रहा है। उनको लगता है कि यदि विश्व में चीनी की मांग न रहे तो गन्ने के रस से सीधे इथानोल बनाया जाए। इतनी बड़ी टेक्नोलॉजी है, भारत जैसे देश में उसका बहुत बड़ा उपयोग होगा, क्योंकि बाहर से पेट्रोलियम पदार्थ मंगाने पर हमारा ८०,००० करोड़ रुपया खर्च होता है। यदि गन्ने का उत्पादन बढ़ रहा है, उसके रस से सीधे इथानोल बनाने की टेक्नोलॉजी को एडाप्ट करके काफी विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है और इससे शूगर इंडस्ट्री की वायबलिटी बढ़ेगी।

कुछ माननीय सदस्यों ने चिंता प्रकट की है कि जो किसान गन्ना पैदा करता है, उसका भुगतान समय पर नहीं होता है। समय पर भुगतान करने के लिए सरकार ने बहुत से कदम उठाए हैं। यहां तक भी कर दिया है कि यदि उसका बकाया है, उसकी अदायगी एज एरियर्स आफ लैंड रिवेन्यू हो गई है। यह हमने बहुत बड़ा निर्णय किसानों के हक में किया है। जब से यह निर्णय किया है, तब से बकाया की अदायगी होनी शुरू हो गई है। जब तक चीनी उद्योग स्वस्थ नहीं होगा, उसकी चीनी नहीं बिकेगी, निर्यात नहीं होगी और उनके पास धन नहीं आएगा, इस कारण वे समय पर बकाया का अदायगी नहीं कर पाएंगे। हमने जो इस बारे में किया है, उससे चीनी उद्योग स्वस्थ होगा, हमारा निर्यात बढ़ेगा। इथानोल की जो बात है, उससे चीनी उद्योग को बल मिलेगा।

इसके अतरिक्त जो सुझाव आए हैं, चूंकि उनका इससे सीधा सम्बन्ध नहीं है, फिर भी मैं उन माननीय सदस्यों को विश्वास दिलाता हूं कि उनके सुझावों पर सरकार विचार करके उचित कदम उठाएगी। आपने एकमत से जो समर्थन इस विधेयक पर दिया है इस नए रचनात्मक कदम के लिए, उसके लिए मैं सदन के सदस्यों का धन्यवाद भी करता हूं।

आपके समर्थन से हमारी जिम्मेदारी और बढ़ गई है कि आपने जो समर्थन दिया है, जो विधेयक पास हो रहा है, उसको इम्प्लीमेंट करने में देरी न हो। मैं विश्वास दिलाता हूं कि इसके अमल में सरकार अतिशीघ्र कदम उठाएगी।

इन्हीं शब्दों के साथ आप सबको मैं पुन: धन्यवाद देता हूं।

   

MR. CHAIRMAN : The question is:

"That the Bill further to amend the Sugar Development Fund Act, 1982, be taken into consideration."
 

  The motion was adopted.

 

MR. CHAIRMAN: The House will now take up clause by clause consideration of the Bill. The question is:

"That Clause 2 stand part of the Bill."

The motion was adopted.

 

  Clause 2 was added to the Bill.

Clause 1, the Enacting Formula and the Long title were added to the Bill.

 

श्री शांता कुमार : मैं प्रस्ताव करता हूं :

"कि विधेयक को पारित किया जाए।"

MR. CHAIRMAN: The question is:

"That the Bill be passed."
 

The motion was adopted.

 

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MR. CHAIRMAN: Now we shall take up item No.15 – consideration of the General Insurance Business (Nationalisation) Amendment Bill, 2001.

 

… (Interruptions)

 

श्री रामदास आठवले (पंढरपुर): अभी ६ बजकर २५ मिनट हो रहे हैं, इस बिल को कल लिया जाए, क्योंकि सभी लोग इस पर बोलना चाहते हैं।… (Interruptions)

SHRI K.H. MUNIYAPPA (KOLAR): This is an important Bill, Sir. We have to have a detailed discussion on this.

SHRI S.S. PALANIMANICKAM (THANJAVUR): Sir, it was decided by the Business Advisory Committee that the House will sit upto 8 p.m. SHRI PRABODH PANDA (MIDNAPORE): Sir, this is an important Bill. Detailed discussion is needed.

SHRI RAMDAS ATHAWALE: Sir, this Bill is a very important Bill. We need more time to discuss it.

SHRI S.S. PALANIMANICKAM : The Standing Committee has examined it and recommended it. … (Interruptions) It was decided in the Business Advisory Committee.

SHRI K.H. MUNIYAPPA : Sir, it can be taken up tomorrow morning.

SHRI MADHUSUDAN MISTRY (SABARKANTHA): Sir, this is a very important Bill. Detailed discussion should be there in the House. We can take it up tomorrow.

SHRI KHARABELA SWAIN (BALASORE): It is only 6.25 p.m. We can sit upto 8 p.m. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : Please wait, there is another item of work. Secretary-General to lay the papers.

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