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Lok Sabha Debates

Further Discussion On The Participation Of Gram Sabha In Poverty Alleviation ... on 4 August, 2000

15.32 hrs. Tilte: Further discussion on the participation of Gram Sabha in Poverty Alleviation Programme moved by Shri Raghuvansh Prasad Singh on 12 May, 2000 (Not concluded).

डा. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली) : सभापति महोदय, भारत के संविधान की धारा २४३ में ग्राम सभा की परिभाषा दी गई है कि वोटर लिस्ट में जितने लोगों का नाम है, सभी लोग ग्राम सभा के सदस्य होंगे। फिर २४३ में ग्राम सभा के अधिकार के संबंध में कहा गया है औऱ फिर अभी कहा गया है कि राज्य उसके लिए कानून बना दे कि ग्राम सभा का एमपॉवरमेंट हो। महात्मा गांधी, लोक नायक जयप्रकाश नारायण, डा. राम मनोहर लोहिया, चौधरी चरण सिंह, स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर, स्वामी विवेकानन्द जैसे देश में महान पुरुष हुए हैं। इन्होंने कहा कि देश में विकास का रास्ता शहर से होकर जाता है। गांव जब तक तरक्की नहीं करेगा जब तक गांवों को शक्तियां, ताकत नहीं दी जाएगी और तब तक इस देश का कल्याण नहीं होगा। सारे लोगों ने कहा और स्वर्गीय राजीव गांधी जी ने भी जांच कराई थी और पाया था कि पैसा दिल्ली से चलता है औरं गांव मे जाते-जाते एक रुपये का दस-बारह पैसा हो जाता है। सब बीमारी की जड़ ग्राम सभा की उपेक्षा है औऱ पॉवर का डीसैन्ट्रेलाइजेशन नहीं होना है। ग्राम सभा को ताकत नहीं दी गई, इसलिए ग्राम सभा को पूरी ताकत दी जानी चाहिए। १९९७ में मुख्यमत्रियों का सम्मेलन हुआ था। उस समय देव गौड़ा जी प्रधान मंत्री थे। उस समय भी सभी मुख्य मंत्रियों ने सर्वसम्मति से तय किया था कि ग्राम सभा को अधिकार दिये जाने चाहिए। ग्राम सभा के संबंध में क्या-क्या कहा गया है: Leave selection of beneficiaries to the gram sabha. गांवों में जितनी योजनाएं लागू हो रही हैं, उन सभी में लाभार्थी को कौन तय करे ?

अभी स्थिति कुछ दूसरी ही है। इंदिरा आवास योजना के लिए एमएलए से लिखा लिया या एमपी से लिखा लिया, लेकिन उनके लिखाने की भी कोई वैल्यु नहीं है। जहां एक हजार या दो हजार या तीन हजार घूस दे दी, उनका नाम इंदिरा आवास योजना में आ गया। वास्तव में जो गरीब आदमी है, उसका नाम नहीं आया। जिनका घर पहले से पक्का है और बनना नहीं है, उनका दलान इंदिरा आवास योजना में बन गया। ये सारी गड़बड़ी देखी जा सकती है। मेरे विचार से लिखा-पढ़ी में सरकार के पास कोई रिपोर्ट नहीं है और अखबारों में भी वही रिपोर्ट है। इस पर मुझे कबीर का एक दोहा याद आ रहा है - तू कहता कागज की लेखी, मै कहता आंखन की देखी । जब हम गांवों में जाते हैं, तो गरीब आदमी बोलता है। हाल ही में गांव की एक महिला ने कहा कि हमारा लाल-कार्ड नहीं बना। लाल कार्ड में हमारा नाम नहीं है। लाल कार्ड उसी को दिया जाता है, जो गरीबी की रेखा से नीचे होता है। इस कार्ड के माध्यम से आधी कीमत पर २० किलो अनाज मिलता है। उस महिला का नाम गरीब की रेखा से नीचे रहने वालों में नहीं है। गांव में जाने से सब बातें पता चलती हैं।

जवाहर रोजगार योजना में ठेकेदार बीच में है। वह जाकर एमएलए से लिखा लेता है, एमपी से लिखा लेता है और बीडीओ के पास पावर है, उससे जाकर मंजूरी ले लेता है। इस प्रकार गाड़ी चल रही है। मेरे कहने का मतलब यह है कि ग्राम सभा को मालूम नहीं है कि इस योजना में कितना हिस्सा गांवों को मिलना चाहिए। ऐसा लगता है कि ठेकेदार-उन्मुखी योजना गांव में चल रही है। जहां तक इस योजना में सरकार द्वारा किए गए खर्च का सवाल है, उस ओर मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं। सन् १९९८-९९ में ७८५९ करोड़ रुपए खर्च किए गए, यह राशि १९९९-२००० में घट गई, जब से भाजपा की सरकार आई। हम बार-बार कहते हैं कि यह सरकार गांव की दुश्मन है, गरीबों की दुश्मन है। यह कहने पर उधर से लोग नाराज हो जाते हैं और कहते हैं कि आप कड़ी भाषा बोलते हैं। मैं कहता हूं, हम क्यों मुलायम भाषा बोलें, आप गांव के खर्च को घटा रहे हैं। माननीय वित्त मंत्री, जसवन्त सिंहा जी, सदन से उठकर चले गए हैं। उनका बिल नहीं चल रहा है, इसलिए वे सदन से उठकर बाहर चले गए। उनको सदन में बैठना चाहिए, गांव की बात चल रही है। इसलिए मैं कहता हू कि राशि २०००-२००१ में घटकर ६७६० करोड़ रुपए रह गई। पहले घटकर ७८०० करोड़ रुपए पर आई, फिर एक हजार करोड़ रुपया घटा दिया और ६७६० करोड़ रुपए रह गई। आप पीडीएस में सब्सिडी ८००० करोड़ रुपए दे रहे थे और कहते कि यह सब्सिडी गरीबों को जा रही है। ३५ करोड़ लोग गरीबी की रेखा से नीचे रह रहे हैं और जो सब्सिडी दी जा रही है, वह आपको बर्दाश्त नहीं हो रही है। दूसरी तरफ, ५८ हजार करोड़ रुपया आपका बड़े आदमियों को दिए गए कर्जें में डूबा हुआ है और ५२ हजार करोड़ रुपया आपका इनकम टैक्स का नहीं आया। इसका आपको ख्याल नहीं है, लेकिन ८००० करोड़ रुपए जो सब्सिडी में दिए जा रहे हैं, वह आपको बर्दाश्त नहीं हो रहे हैं। इतना बड़ा अन्धेर, गरीबों के साथ इतना बड़ा जुल्म कहीं नहीं देखा गया है। गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या ३५ करोड़ से ज्यादा ही होगी। इसके संबंध में लाकड़ावाला कमेटी बैठी है। उसको देखना है कि किसको गरीबी की रेखा से नीचे माना जाए और किसको गरीबी की रेखा से ऊपर माना जाए। हम लोग तो मोटा-मोटी देख लेते हैं कि गरीब आदमी को खाने को नहीं मिलता है, देह पर कपड़ा नहीं है, उघाड़े-पगाड़े लूंगी पहने जैसे-तैसे गांव में रह रहा है। गांव में रहने के लिए उसके पास मकान नहीं है। एक झौपड़ी है और उसी झौपड़ी में बाल-बच्चे, बकरी सभी उसमें हैं। उनके लिए पढ़ाई और दवाई की जरूरत है, उसका कोई प्रबन्ध नहीं है। हम लोग ऐसे ही लोगों को गरीबी की रेखा से नीचे मानते हैं। सरकार के लोग, इनके अर्थशास्त्री, जिस आदमी की आमदनी १२००० रुपए प्रतिवर्ष है, उसको आधार मान लेते हैं, जबकि उसके पास रहने को घर नहीं है, जमीन नहीं है। जैसे-तैसे उसने पेट काटकर झौंपड़ी बना ली है। उसके लिए कहते हैं कि उसकी आमदनी होगी।

इसी प्रकार जवाहर रोजगार योजना पर भी इस साल सरकार ने १६५० करोड़ रुपया दिया था, जबकि पिछले साल २०९५ करोड़ रुपए दिया गया था। वास्तविकता यह है कि सरकार ने जवाहर रोजगार योजना का नाम बदल दिया है और नाम बदलकर जवाहर ग्राम समृद्धि योजना रख दिया है यानी ‘रोजगार‘ हटाकर ‘समृद्धि ‘ , लेकिन पैसा घटा दिया।

इसलिए जो ग्राम सभा के संबंध में मुख्य मंत्रियों के सम्मेलन में तय हुआ था -

".. leave the selection of beneficiaries to Gram Sabha."

यानी ग्राम सभा पर सभी बिना चयन किए गए लाभार्थियों का भार छोड़ दिया जाए। उन्हें पावर में लिया जाए -

"Gram Panchayat President is to be accountable solely to the Gram Sabha."

यह भी कहा गया--

"In order to ensure that the Panchayati Raj Institutions function as instruments of local Governments, it is important that their functional and financial autonomy is guaranteed; and transparency and their functioning is ensured. This has to be accomplished in most of the States. The role of the Gram Sabha perhaps is most important in ensuring the success of the Panchayati Raj Institutions at the village level."

यह कहा गया कि ग्राम सभा का सबसे प्रमुख रोल पंचायती राज की व्यवस्था को मजबूत करना और उसका संचालन करना है। फिर कहा गया--

"The role of local people in conducting social audit and fixing responsibility on the Panchayat functionaries will be effectively ensured with the Gram Sabha becoming active. It is essential that the village community perceives meetings of the Gram Sabha as useful. The most important factor for them is the empowerment of the Gram Sabha."
 

केन्द्र सरकार बताए कि जो मुख्य मंत्रियों का सम्मेलन प्रधान मंत्री की अध्यक्षता में हुआ था, जिसमें तय किया गया था कि ग्राम सभा को सभी बेनफिशरी तय करने के लिए पूरी पावर दी जाएगी, इतना ही नहीं यह भी कहा गया कि ग्राम सभा वहां की विधान सभा की तरह होगी, ग्राम सभा को अपार क्षमता तथा ताकत दी गई। विधान सभा भंग हो सकती है, कानून में हो सकती है, लोक सभा भी भंग होती रही ह लेकिन ग्राम सभा कभी भंग नहीं होगी। वह कभी खत्म नहीं होगी, भंग नहीं होगी।

भारत के संविधान के ७३वें संशोधन में धारा ३४३ में ग्राम सभा की परिकल्पना की गई है। इसलिए राज्य सरकार ने कौन-कौन से ग्राम सभा के लिए कानून बनाये और पावर दी या नहीं दी, यह भारत के संविधान में लिखा हुआ था। मुख्य मंत्रियों की सभा में भी यह डिसकस हुआ। किस राज्य सरकार ने ऐसा किया और किस ने नहीं किया, यह आपको बताना पड़ेगा। फिर १७ मार्च, ९९ को चीफ मनिस्टर्स की ग्राम सभा के विषय में कांफ्रेंस हुई। उसमें कहा गया-

"The relationship between the Gram Sabha and the Gram Panchayat may be the same as between the legislature and the Government."

जैसे स्टेटस में विधान मंडल है और सरकार है, केन्द्र में पार्लियामेंट है और केबिनेट है, उसी तरह से वहां ग्राम सभा और पंचायतें है। मतलब यहां देश के पैमाने पर जो पार्लियामेंट का स्थान है, उसी तरह से राज्य स्तर पर विधान सभा का और ग्राम स्तर पर ग्राम सभा का स्थान है। वहां पंचायती राज की व्यवस्था है। इसलिए सभी मुख्य मंत्रियों के सम्मेलन में यह सर्वसम्मति से तय हुआ।

"The Panchayat should be accountable to the Gram Sabha. In unequivocal terms, the members of the Panchayat should hold office only so long as they enjoy the confidence of the Gram Sabha."

मतलब यह कि पूर्ण क्षमता और पूरी ताकत ग्राम सभा को दी गई। "The Gram Sabha should have full powers." उसे पूरा अधिकार है।

"… for determining the priorities for various programmes in the village and approval of Budget. "

कौन सा कार्यक्रम तय होगा, क्या काम होगा, ये ग्राम सभा को पावर दी गई है। फिर उसका एप्रूवल और उसकी मंजूरी भी ग्राम सभा से होनी है। पंचायत के अलावा मुखिया जी अलग कर रहे हैं और हम लोगों के यहां तो मुखिया जी भी नहीं हैं तो बी.डी.ओ. सारा मालिक बना हुआ है। सब लोग देख रहे हैं कि वहां कैसे काम होता है।

"Gram Sabha should be made mandatory. Prior approval of the Gram Sabha should be made mandatory. "

इसे मैनडेट्री बनाया जाए कि ग्राम सभा क एप्रुवल के बिना कोई काम नहीं होगा।

"For taking up any programme in the village, certification of expenditure and also propriety in financial dealings should be made mandatory and the Gram Sabha is responsible for that. "

ये सारे अधिकार ग्राम-सभा को दिये गये हैं और जितना खर्च होगा उसको भी ग्राम-सभा देखेगी।

"Gram Sabha should be vested with full authority. Participation of women, Scheduled Caste and Scheduled Tribe members in the Gram Sabha should be made mandatory with suitable provisions for their presence in the quorum of the Gram Sabha meeting. "

इसमें कहा गया है कि अनुसूचित जाति, जनजाति, महिलाएं तथा वीकर-सैक्शन जब तक उसमें शामिल नहीं होंगे तब तक ग्राम-सभा पूरी नहीं होगी। इसलिए मुख्यमंत्री के सम्मेलन में जो यह निश्चय व्यक्त किया गया है, मैं पूछना चाहता हूं कि उसकी क्या स्थिति है?

मैं सरकार से कहना चाहता हूं कि जब यह फैसला हुआ था कि वर्ष २००० ग्राम-सभा वर्ष होगा तो क्या यह केवल कागजों में लिखने के लिए हुआ था या ग्राम-सभा के महत्व पर जोर देने के लिए किया गया था। इस बात को प्रधान मंत्री जी और मंत्री जी जानते हैं। लेकिन उसका कहीं कोई प्रचार-प्रसार नहीं हुआ। सरकार के पास प्रचार के लिए टीवी है, रेडियो है लेकिन टीवी में तो बेकार की चीजें एडवरटाइजमेंट में दिखाते रहते हैं, एक भी ग्राम-सभा का प्रोग्राम उसमें नहीं दिखाया गया है। सरकार पर यह मेरा आरोप है। अगर वर्ष दो हजार ग्राम-सभा का वर्ष है तो किसी ग्राम-सभा में प्रधान मंत्री जाते, मंत्री जाते, मुख्यमंत्री जाते, जिससे देश के लोगों इस बात को जानते हैं कि यह वर्ष ग्राम-सभा वर्ष है और उसकी क्या ताकत है, क्या महत्व है। लेकिन टीवी में तो बेकार का प्रचार दिखाते रहते हैं, उल्टी-सीधी चीजें दिखाते रहते हैं, अश्लील चीजें दिखाते रहते हैं। लेकिन जो भारत की शक्ति है, जो सुप्रीम पावर है और वह जो गांव में ८० प्रतिशत लोग ६ लाख गांवों में यानि ६ लाख ग्राम सभाओं में रहते हैं उसके बारे में कुछ नहीं दिखाते हैं। मैं पूछना चाहता हूं कि ग्राम सभाओं के बारे में क्या कोई प्रचार है? जाली कामों पर, विज्ञापनों पर करोड़ों रुपया खर्च होता है। वाजिब कामों का शिलान्यास हो तो हम भी उसका स्वागत करेंगे। लेकिन हम देखते हैं कि जनता के दिखाने के लिए शिलान्यास करते हैं और फिर कहते हैं कि उसका पूरा करने के लिए पैसा नहीं है। इसलिए सरकार से मेरा कहना है कि जाली कामों का प्रचार बंद कीजिए और असली जो काम हैं उनका प्रचार कीजिए, ग्राम सभाओं को ताकत देने का काम कीजिए। आज क्या हो रहा है कि सब पार्टी के एम.एल.ए जो हैं उनमें उसकी मशहूरी कराने के लिए एका हो जाता है। अगर भारत सरकार से पैसा जाता है तो भारत सरकार का तो एम.पी. है। लेकिन अगर किसी योजना में, इंदिरा आवास या किसी और योजना में अगर कोई अफसर घूस खा गया तो आपका नाम भी बदनाम हो जायेगा। इसलिए उससे दूर रहना है और ग्राम-सभा की ताकत बढ़ानी है और यह आपका जिम्मा है। पहले तो एमपी और एमएलए का एक साथ चुनाव होता था लेकिन अब वह अलग-अलग समय पर होता है, इस कारण जितने भी छोटे-मोटे जो काम होते हैं वे भी एमपी के यहां आ रहे हैं।

वे हमें लिखते हैं और कहते हैं कि सड़क नहीं बनी, नाला नहीं बना, घर नहीं बना। ऐसे सभी काम एम.पी. के पास रहते हैं। सभी सदस्यों के सामने यह कठिनाई होगी। हम सभी सदस्य इसे भोगते हैं। यदि ग्राम सभा ताकतवर हो जाए, वहां सभी काम होने लगे तभी पूरे काम हो सकते हैं।

जवाहर रोजगार योजना में ग्राम सभा को पूरी पावर्स हैं। आबादी के हिसाब से हर पंचायत को इसका हिस्सा मिलता है। कहीं-कहीं तो १०-१५ गांव हैं। मेरा कहना है कि आबादी के हिसाब से उन्हें हिस्सा मिलना चाहिए। ताकतवर गांव पैसा ले लेते हैं लेकिन कमजोर गांवों को छोड़ दिया जाता है। उन्हें कोई पूछ नहीं रहा है? मेरा निवेदन है कि उसके लिए यहां से एक सर्कुलर जाए और उसमें बताया जाए कि उनका यह हिस्सा है। इसकी माननीय सदस्यों को भी सूचना जानी चाहिए। हर गांव को आबादी के हिसाब से हिस्सा मिलना चाहिए। यह तय हुआ था कि २६ जनवरी. एक मई, १५ अगस्त और २ अक्तूबर को ग्राम सभा अनिवार्य रूप से हो। मंत्री जी बताएं कि वह कहां हुई है? क्या किसी गांव में हुई है? कागज में लिख दिया जाता है लेकिन जमीन पर काम नहीं होता है। इसका कहीं प्रचार नहीं हुआ और कोई जानकारी नहीं दी गई।

सभापति महोदय : आपका बहुत अच्छा संकल्प है। आपने आधा घंटा ले लिया है। दूसरे सदस्य भी आपकी बात का समर्थन करना चाहते हैं।

डा. रघुवंश प्रसाद सिंह: मैं ८० करोड़ लोगों की बात कर रहा हूं। सुनिश्चित रोजगार योजना के बारे में एक सर्कुलर जाना चाहिए। गांव सभा देखे कि वहां कैसे काम हो रहा है? वहां ठेकेदारी चलती है। गांवों में पैसे की लूट हो रही है। बिचौलिया पैसा खा रहा है। सुनिश्चित रोजगार योजना, जवाहर ग्राम समृद्धि योजना और इन्दिरा आवास योजना में भयंकर धांधली हो रही है। ग्राम सभा के पास सही जानकारी नहीं आती। आपने इन्दिरा आवास के लिए गरीब आदमी को साढ़े चौदह हजार रुपाए देने की बात कही थी। उसके दो हजार रुपए घूस में चले गए। उसका १२ हजार रुपए में घर बना। क्या इतनी राशि में घर बन सकता है? मैं जानना चाहता हं कि देश भर में ऐसे कितने घर अपूर्ण बने पड़े हैं? उनके घरों में छत नहीं डाली गई। इससे उनका घर टूट गया। चयन करने में भी गड़बड़ी होती है। इसके लिए साफ निर्देश जाना चाहिए और उसकी जानकारी सभी माननीय सदस्यों को देनी चाहिए। करप्शन को दूर करने के लिए पारदर्शिता का होना आवश्यक है। जब सब लोग सभी बातें जान जाएंगे तब गड़बड़ी रुकेगी। इन्दिरा आवास योजना में चयन करने में भयंकर धांधली हुई। बड़े आदमी के सब काम हो जाते हैं। गरीब आदमी का कोई काम नहीं होता। उसके यहां लेन-देन होता है। सुनिश्चित रोजगार योजना में कहीं काम नहीं होता। यदि एक नम्बर की ईंट लगानी है तो चार नम्बर की ईंट लगाई जाती है। यदि तीन फुट मिट्टी भरनी है तो डेढ़ फुट मिट्टी भरी जाती है। वहां लूट होती है। यदि यहां ग्राम सभा आगे आ जाए तो काम आसान होगा। यदि पारदर्शिता रहेगी, लिखा-पढ़ी सही होगी तो धांधली नहीं होगी। गांव के लोगों को पता होना चाहिए कि कौन सी योजना पहले बननी है और कौन सी बाद में बननी है। ऐसे में योजना सही बनेगी। यदि ठेकेदार चाहेंगे तो काम हो जाएगा। यदि हम किसी काम को करने की अनुशंसा करेंगे तो वह काम नहीं होगा। " एक साधे सब सधे, लाख दुखों की एक दवा, सबसे पहले है ग्राम सभा"

गांवों में लाल कार्ड की योजना चलती है। वहां दो तरह की कठिनाई आती है। गांव के गरीब आदमी का नाम लाल कार्ड में नहीं रहता।
क्यों नहीं है? माना गया था कि आई.आर.डी.पी. में नाम पहले रजिस्टर्ड कराता। जो लोन लेना चाहता है आई.आर.डी.पी. में नाम लिखाता। चूंकि गरीब आदमी लोन लेना ही नहीं चाहता, इसलिये उसका नाम ही नहीं लिखा गया। उसी आधार पर इसके पीछे गांव का ज्यादा आदमी माना गया। गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले ६ करोड़ लोग माने गये हैं लेकिन वास्तव में ८ करोड़ परिवार गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले हैं। इसका मतलब यह हुआ कि दो करोड़ परिवार गरीबी रेखा के नीचे रखे जाने से छूट गये हैं जिनका नाम दर्ज नहीं हुआ। मान लीजिये एक गांव में ५० या १०० या १५० लोग छूट गये और इस कारण से उन्हें गरीबी रेखा से नीचे रहने वाला लाल कार्ड नहीं मिला। यदि मिला तो जो सम्पन्न लोग हैं, उन्हें मिल गया। जिनके नाम हैं, उनको महीनों अनाज नहीं मिलता। सरकार ८ हजार करोड़ रुपया सब्सिडी पर खर्च कर रही है लेकिन अनाज फिर भी गरीब लोगों को नही मिलता। कभी ६ महीने, सालभर में एक दो बार हल्ला हो जाता है। इस प्रकार गड़बड़ी होती है और उसमें भी खराब सामान मिलता है। अब आप देखिये कि लाल कार्ड किसको मिला, यह ग्रामसभा बैठ कर तय करे। उसके बाद देखे कि अनाज आया या नहीं। आफिसर ग्राम सभा की बैठक करे। इसलिये मेरी प्रार्थना है कि ग्राम सभा को पॉवर दीजिये और इसके लिये सर्कुलर भेज दें। यह सब करने के बाद सोशिल ऑडिट करे कि कितना खर्चा हो रहा है, कौन आफिसर आया, कितना खर्च किया और काम ठीक हुआ या नहीं? जब ग्रामसभा कह दे तब उसको मंजूर करें। गरीबी उन्मूलन करने वाली जितनी भी योजनायें हैं, जितने स्पेशल प्रोग्राम्स हैं, उनके लिये ग्राम सभा को पावर दीजिये कि वह तय करे।
सभापति महोदय, अब मैं बिहार के विषय में कहूंगा। वहां पंचायत के चुनाव नहीं हुये हैं। अगर पंचायत का चुनाव हो जाता है तो गांव का मुखिया या सरपंच या सदस्यगण कुछ देखभाल करते हैं। देश के कई राज्यों में पंचायत चुनाव हुये हैं लेकिन वहां भी गड़बड़ी है। बिहार में १९७८ में स्व. कर्पूरी ठाकुर के समय पंचायत के चुनाव हुये थे और उसके बाद से अभी तक नहीं हुये हैं। वहां कांग्रेस दस साल तक सत्ता में थी, उनसे पूछा जाये कि पंचायत चुनाव क्यों नहीं करवाये गये। आज बयानबाजी हो रही है कि पंचायत का चुनाव होना चाहिये। भारत के संविधान में धारा २४३ के तहत संविधान का ७३वां संशोधन हुआ और इसमें प्रावधान किया गया है कि मुखिया, सरपंच, ब्लाक प्रमुख और जिला प्रमुख सभी पदों पर आरक्षण होगा। महिलाओं को एक तिहाई, फिर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़ी जाति के लिये प्रावधान किया गया है कि यदि राज्य सरकार चाहे तो अपने राज्य में कानून बनाकर पिछड़ी जाति को आरक्षण दे सकती है। बिहार में लालू यादव की सरकार ने उस समय एक नया कानून बनाया। उस कानून में कहा गया कि आदिवासी, हरिजन, अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति और महिलाओं को आरक्षण मिले। यह कानून हाई कोर्ट में चैलेंज हो गया। हाई कोर्ट ने कहा कि मुखिया का पद सिंगल पोस्ट है, इस पर आरक्षण नहीं होगा। इस वजह से मुखिया, ब्लाक प्रमुख, जिला प्रमुख एकल पद हैं, इसलिये आरक्षण नहीं हुआ। सभापति महोदय, जो संविधान में प्रावधान किया गया था, उसके खिलाफ हाई कोर्ट का फैसला हो गया। राज्य सरकार के सामने संकट आ गया कि यदि वह संविधान के मुताबिक चलती है तो हाई कोर्ट के आदेश की अवहेलना होती है और यदि हाई कोर्ट के मुताबिक चलती है तो सविधान की अवहेलना होती है। यदि हाई कोर्ट के मुताबिक चुनाव कराता है तो लोग कहेंगे कि यह सरकार हरिजन विरोधी है, आरक्षण विरोधी है और महिलाओं को आरक्षण नहीं दिया है। इसका मतलब यह हुआ कि होई कोर्ट का आदेश न मानने पर हथकड़ी लगवा दें। इस संकट का समाधान सुप्रीम कोर्ट कर सकता है। इसलिये एक अपील सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है। उसमें भारत सरकार के सोलसिटर जनरल पार्टी हैं और वे कोर्ट में हाजिर हुये हैं।

16.00 hrs. लेकिन अभी तक फैसला नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने तब तक हाई कोर्ट के फैसले पर स्टे लगा दिया। निर्णय नहीं हुआ और कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने रोका है, आपको इस रास्ते से आना है, आप रुक नहीं रहे हैं तो आ जाइये, हमने पुल तोड़ दिया है, अब क्या डूबना है। उसी तरह से कानून खत्म किया, इस वजह से वहां चुनाव नहीं हुआ। इस वजह से वित्त मंत्री चले गये। पंचायत राज में सवा छ: सौ करोड़ रुपया दसवे वित्त आयोग ने खर्चा देने को कहा था, लेकिन फिर उसने कहा कि बिहार में चुनाव नहीं हुआ है, इसलिए हम पैसा नहीं देंगे और पांच वर्ष में सवा छ: सौ करोड़ रुपये गरीब प्रदेश को नहीं मिला। मैं कह रहा हूं कि शेडयूल्ड ट्राइब्स के एरिया में पंचायत चुनाव का कानून ही नहीं है। कम से कम आप उसे दसवें वित्त आयोग का पैसा ही भिजवा देते। वहां ग्राम सभा बरकरार है, वह तो भंग नहीं हैं, उसका चुनाव भी नहीं होना है। उस माध्यम से वह पैसा उसकी देख-रेख में खर्च होता। इस तरह से सरकार का कसूर बताकर बिहार की दस करोड़ की आबादी वाले गरीब राज्य को दसवे वित्त आयोग का सवा छ: सौ करोड़ रुपये का हिस्सा नहीं दिया गया।

सभापति महोदय, रूरल डेवलपमैंट विभाग का भी एक काम है। माननीय मंत्री जी जब जवाब दें तो बतायें।

सभापति महोदय : अब आप समाप्त कीजिए।

डा.रघुवंश प्रसाद सिंह : मैं अभी खत्म कर रहा हूं। बिहार के परिप्रेक्ष्य में देखिये, वहां पंचायत की सारी पावर बी.डी.ओ. को चली गई। पंचायत के बदले बी.डी.ओ. सारा फंक्शन करेगा। उसमें ग्राम सभा ताकतवर नहीं होगी, वहां बी.डी.ओ. की अफसरशाही चलेगी और वह मालिक बन जायेगा। वह हेरा-फेरी करेगा। एम.एल.ए. और एम.पी. कुछ नहीं कर सकेंगे। आज जवाहर रोजगार योजना में गलत काम हो रहा है, इंदिरा आवास योजना में गलत काम हो रहा है, सुनिश्चित रोजगार योजना में गलत हो रहा है, लाल कार्ड योजना में गलत हो रहा है, स्वर्ण जयंती रोजगार योजना में सारी गलतियां हो रही है, चूंकि पंचायत नहीं है, बी.डी.ओ. मालिक है, उसकी अफसरशाही है, ग्राम सभा को पावर नहीं है या जानकारी नहीं है या जितनी होनी चाहिए, सफाई से नहीं है। इसका प्रचार केन्द्र सरकार ने नहीं किया। मुख्य मंत्रियों का फैसला लागू नहीं हुआ। इन्हीं सब कारणों से ६,७०० करोड़ और आठ हजार करोड़ रुपया दोनों को मिलाकर लगभग १५ हजार करोड़ रुपया बनता है। लगभग १५ हजार करोड़ रुपया गरीब देश का पैसा गांवों में जा रहा है। लेकिन जो असलियत में वंचित, शोषित, उपेक्षित और डरे हुए ग्रामवासी लोग हैं, जो असली हिन्दुस्तान है, उन तक यह पैसा नहीं जा रहा है। सब लाख दुखों की एक दवा, सबकी दवाई ग्राम सभा, एक साधे सब सधे, इसीलिए ग्राम सभा को ताकतवर बनाया जाए। जिससे कि जो पैसा गांव में जा रहा है, ग्राम सभा जो असली मालिक है, उसकी देख-रेख में ये सब काम हों।

सभापति महोदय, मैं भी सांसद योजना में जो दे रहा हूं, उसमें मैंने गांव सभा को उसका मालिक बनाया है और उसका अच्छा परिणाम सामने आया है। गांव के लोग बोल रहे हैं कि एक नम्बर की ईंट लग रही है, ठेकेदारी गायब है, गड़बड़ी गायब है। इसीलिए ग्राम सभा को ताकतवर बनाना इस संकल्प का उद्देश्य है। इसलिए जब माननीय मंत्री जी इसका जबाव दें तो जो कुछ हमने कहा है यदि वह सब ग्राम सभाओं में लागू हो जाए तो देश तरक्की और मजबूती की तरफ आगे बढ़ेगा, गांवों में असली ताकत आयेगी और गांधी जी और लोहिया जी का सपना साकार होगा। धन्यवाद।

भारी उद्योग और लोक उद्यम मंत्रालय में राज्य मंत्री (डॉ. वल्लभभाई कथीरिया) : गुजरात में ग्राम सभा और ग्राम समति कैसी अच्छी चल रही हैं।

डा.रघुवंश प्रसाद सिंह : किसी राज्य में, किसी जिले में यदि अच्छा हो रहा हो तो यह खुशी की बात है, उनका स्वागत है। वैसा ही सब जगह हो, हम यही चाहते हैं।

श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज, बिहार) : सभापति महोदय, मैं ऱघुवंश बाबू को बधाई देता हूं क्योंकि उन्होंने बहुत ही अच्छा सवाल उठाया, गांवों के लोगों की समस्या, गांवो को नये ढंग से शक्ति देने की सभी की इच्छा है। हमारे नेताओं द्वारा भी यह इच्छा व्यक्त की गई। खासकर गांधी जी द्वारा यह इच्छा व्यक्त की गई। गांवों में शक्ति आयेगी, गांव खुशहाल होंगे, तभी देश खुशहाल हो सकता है। हमारे देश में पांच लाख से ज्यादा गांव है और गांवों को शक्ति मिले इन सबकी भी यही इच्छा है। केन्द्र सरकार राज्यों को पैसा देती है, दिशा-निर्देश तय करती है और राज्य सरकारों की देख-रेख में विकास का काम चलता है।

राज्य सरकारें भी अपने हिसाब से दिशा निर्देश तय करती हैं। दोनों को मिलाकर विकास की रोशनी गांवों की तरफ फैलाने की बात का प्रावधान कानून में है और उसी कानून के तहत विकास का काम भी होता है। देश में बहुत जगह ग्राम पंचायतें बहुत अच्छा काम करती हैं। अभी एक साथी गुजरात की बात बोल रहे थे कि चलकर गुजरात में देख लीजिए। मुझे इसमें कहीं कोई शंका नहीं है कि जहां के लोगों के मन में विकास के प्रति रुचि होगी, श्रद्धा होगी, जहां के लोगों की इच्छाशक्ति होगी, वहां निश्चित तौर पर विकास का काम होगा। अभी रघुवंश बाबू जो बोल रहे थे हमें इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि ५० प्रतिशत बात इन्होंने बिल्कुल साफ-साफ और सही-सही कही है। कुछ चूंकि सही नहीं कहने में इनकी मजबूरी है, …( व्यवधान)

डॉ.रघुवंश प्रसाद सिंह : हमने लिखा बिहार सरकार को कि सही जांच हो जाए तो आपके एक भी बीडीओ और कलेक्टर नहीं बचेंगे, ग्राम सभा नहीं होती और इसका कार्यान्वयन नहीं होता। चिट्ठी लिखी और अखबारों में भी छपी। आप दिल्ली में रहते हैं, वहां के अखबार कैसे पढ़ेंगे?…( व्यवधान)

श्री प्रभुनाथ सिंह : कुछ सही नहीं बोलने में इनकी मजबूरी भी है। हालांकि ज्यादा कहेंगे तो हल्ला करेंगे, इसलिए हम ज्यादा नहीं कहेंगे, डरते हैं। …( व्यवधान) ये बोलते रहे और हम सुनते रहे और हमको बोलने ही नहीं देते हैं, क्या करें। मजबूरी है कि अगर सच बात कह देंगे तो ब्लैकलिस्ट में नाम पड़ जाएगा। अकेले में सब बात सही बोलते हैं। सेन्ट्रल हाल में जब हम बैठते हैं तो गांवों के गरीबों के प्रति, गांवों के प्रति इनके मन में दर्द है, यह हम देखते हैं। अभी जो चर्चा चली, खासकर जो इन्होंने अंत में सवाल छेड़ा पंचायत का चुनाव, एक तरफ आप कहते हैं कि गांवों को शक्ति मिलनी चाहिए, ग्राम सभा को ताकत मिलनी चाहिए, बिहार में सरकार तो आपकी है। ठीक है कि दस वर्षों तक कांग्रेस ने चुनाव नहीं कराया। आप भी तो बिहार में ११ वर्षों से राज कर रहे हैं। ११ वर्षों से आपने चुनाव क्यों नहीं कराए? आप कहते हैं कि संविधान की बात नहीं मानें तो हाई कोर्ट की अवमानना होगी, हाई कोर्ट की बात नहीं मानें तो संविधान की अवमानना होगी और १७,००० उच्च न्यायालय के आदेश और निर्देश बिहार सरकार पर लंबित हैं जिन पर आज तक आपने कुछ नहीं किया। हाई कोर्ट के आदेश को आपने गतलखाना में फेंका है और इस बारे में आपको हाई कोर्ट के आदेश और अवमानना की बात याद आ रही है। आपको जो उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि एकल पद पर आरक्षण नहीं किये जा सकते, आप सुप्रीम कोर्ट आए। सुप्रीम कोर्ट ने कहीं भी आदेश नहीं दिया है कि चुनाव मत कराइए जब तक हम निर्णय नहीं कर देते हैं, लेकिन आप चुनाव कराने के पक्ष में नहीं हैं। अभी विधान सभा से लेकर हाई कोर्ट में यह मामला चल रहा है। दो बार सरकार के बयान आ चुके हैं कि फरवरी में हम चुनाव कराने जा रहे हैं। ऐसे बयान जब से हम विधान सभा में थे, तब से उस सरकार के सुन रहे हैं। उसी समय से कह रहे हैं कि कभी नवंबर में करा रहे हैं, जनवरी में करा रहे हैं और चौथा बयान राज्य सरकार का अखबारों में हमने पढ़ा है। रघुवंश जी को हकीकत मालूम होगी कि पहले की तरह यह बयान भी अखबारों में छप रहा है कि इस बयान में कुछ सच्चाई है, कुछ दम है। यदि आपके मन में गांवों के लिए पीड़ा है, खासकर बिहार के विषय में, आप चाहते हैं कि गांव मज़बूत हों तो हम रघुवंश जी से निवेदन करेंगे कि आप राज्य सरकार से अनुरोध कीजिए कि पहले वह पंचायत का चुनाव कराए। जब तक पंचायत के चुनाव बिहार में नहीं होते हैं, तब तक अगर गांवों की मजबूती की बात हम और आप करते हैं तो वह निरर्थक है, बेकार है, इसमें कोई दम नहीं है। पैसा केन्द्र से जाता है। इसका भी निर्देश गया है कि पैसे कैसे खर्च होंगे। आपने कुछ बातें सही कही हैं। सच पूछिये तो जो पहले की जवाहर रोजगार योजना थी आज नाम बदल गया है, यह पैसा आज बिहार में जिस ढंग से खर्च हो रहा है, किन शब्दों में उसका वर्णन किया जाए और क्या उसका हिसाब बताया जाए यह बात अभी तक हम समझ नहीं पाये हैं।

केन्द्र से जो पैसा जाता है, उसका मालिक बी.डी.ओ. है क्योंकि वहां ग्राम पंचायत का चुनाव नहीं हुआ है। हर पंचायत में बी.डी.ओ. के दो-तीन एजेंट होते हैं । उन एजेंटों के माध्यम से गांव के गरीब आदमी के नाम पर इकरारनामा बन जाता है। जो कमजोर जाति के लोग हैं, उनके नाम पर एग्रीमैंट हो जाता है। पंचायत का बिचौलिया पैसा उठाता है और काम कराता है। जब कभी मामला फंसता है तो गांव का गरीब आदमी चिल्लाता है, रोता है लेकिन उसकी सुनने वाला कोई नही होता। पेट का भूखा आदमी मजबूरी में समझता है कि इसमें कुछ मिल जायेगा इसलिए वह दस्तखत कर देता है। वह अशक्षित है, अनपढ़ है इसलिए ठप्पा दे देता है।

मैं एक घटना बताना चाहता हूं। छपरा जिले के गरखा प्रखंड में एक जांच हुई थी। कलैक्टर ने इंदिरा आवास के संबंध में जांच करवाई थी। गांव के लोगों ने शिकायत की कि हमारे यहां जिन लोगों का इंदिरा आवास के तहत मकान बनना चाहिए था, उनका नहीं बनता बल्कि सम्पन्न लोगों का बन जाता है। इसमें मालूम हुआ कि वहां के विधायक, पता नहीं इस बार वे मंत्री हैं या नहीं लेकिन पहले मंत्री हुआ करते थे, मंत्री जी का दालान उस पैसे से बना। इसके अलावा उनके बॉडीगार्ड के जो चार भाई हैं, चारों भाइयों के नाम से एक-एक आवास बना। कलैक्टर ने उन के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज करने का आदेश दिया। सब के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज हो गयी लेकिन मंत्री जी और बी.डी.ओ. के खिलाफ नहीं हुई। हमने टेलीफोन पर कलैक्टर से पूछा कि आखिर आपने बी.डी.ओ. और मंत्री जी के खिलाफ एफ.आई.आर. क्यों दर्ज नहीं की तो उन्होंने कहा कि बी.डी.ओ. के खिलाफ हम बिना राज्य सरकार के आदेश के एफ.आई.आर. दर्ज नहीं कर सकते। हमने राज्य सरकार से परमीशन के लिए लिखा है। कानून तो केन्द्र ने बनाकर भेजे हैं कि चार एजेंट बैठाकर आप पैसे का बंटवारा कर लीजिए। आप बिचौलिये के माध्यम से कर लीजिए। इसका अनुपालन करना तो राज्य सरकार का काम है। अब राज्य सरकार के पदाधिकारियों पर निर्भर करता है कि आखिर वे कैसी व्यवस्था चलाते हैं और केन्द्र में जो सरकार है, उसे देखना है कि उसके पदाधिकारी या अफसर कुकर्म में डूबे हुए और गांव के लिए जौ पैसा जाता है, वह गांव के विकास के लिए खर्च होता है या नहीं । बिहार में इसकी कभी समीक्षा नहीं होती। समीक्षा करना बिहार सरकार अपराध मानती है। वह किसी स्कीम की समीक्षा नहीं करेगी। सुनिश्चित रोजगार का पैसा जो गांव के विकास के लिए आता है, उसका भी दिशा-निर्देश केन्द्र सरकार ने तय किया है। केन्द्र सरकार ने दिशा-निर्देश यहां तक तय किया है कि जो इससे लाभान्वित होंगे, वे सारे कार्य करेंगे। कागज में लाभान्वित काम करते होंगे लेकिन उनको उस काम के दर्शन नहीं होते। बिहार का कहीं का भी काम हो, जो काम पैसे से होना है, वह सब अधूरा पड़ा है। कहीं पूरा नहीं है।

आप आश्चर्य करेंगे कि सांसदों को गांव में खर्च करने के लिए जो मद मिलती है, बिहार के पदाधिकारी उसमें से परसेंटेज लेने में भी नहीं हिचकते। २५ परसेंट पैसा, सासंद की अनुशंसा पर जो काम किये जाते हैं, उसमें होता है। यदि सांसद मद में २५ परसेंट लिये जाते हैं तो आप इसी से अंदाज लगा लीजिए कि जवाहर रोजगार योजना के मद की क्या स्थिति होगी ? जवाहर रोजगार योजना का पैसा १०० परसेंट बी.डी.ओ. और बिचौलिये की जेब में जाता है। यह नहीं कि आज पदाधिकारी है, कुछ दिनों तक मुखिया लोग भी थे। जिस समय से जवाहर रोजगार योजना का पैसा केन्द्र से जा रहा था तभी से थे। वे हर गांव में अपना एक-एक एजेंट रखे हुए थे। पहले पांच-छ: लोग मिलकर उस पैसे को खाते थे लेकिन आज मुखिया का हिस्सा खत्म हो गया है। सारा पैसा बी.डी.ओ. और उसके बिचौलिये आदि सब मिलकर खा जाते हैं। बिहार में पैसा कभी खर्च नहीं होता। हम लोगों को अफसोस है कि केन्द्र सरकार से पैसा नहीं जाता। पंचायत चुनाव न होने के कारण केन्द्र सरकार से वहां पैसा नहीं जाता है। लेकिन अगर पैसा जायेगा तो कहां खर्च किया जायेगा, किस योजना में खर्च किया जायेगा, कौन खर्च करेगा, इस पर चिन्तन करना जरूरी है। बिहार के लोगों को, बिहार के सांसदों को, बिहार की सरकार को इस बात का चिंतन करना चाहिए कि आखिर जो पैसा वहां जाता है, उसका उपयोग कैसे हो। इस पर कभी चिंतन नहीं होता। केन्द्र सरकार पर आक्षेप लगाना कि पंचायत का चुनाव नहीं हुआ तो हमारा पैसा नहीं जाता है। मगर जो पैसा जाता है, उसके खर्चें का हिसाब तो दीजिए। अगर वह पैसा सही ढंग से खर्च हो जाता तो बिहार के बी.ए. पास लोगों को दिल्ली, असम, गुजरात आदि में जाकर १०००, १५०० या २००० रुपये के लिए कटोरा लेकर भीख मांगने की जरूरत नहीं पड़ती।

लेकिन आज बिहार की जो बदतर स्थिति हुई है, बिहार में जो भी पैसे जाते हैं, उसकी लूट होती है। इसलिए हम केन्द्र सरकार से निवेदन करेंगे कि जो भी पैसे बिहार में जाते हैं, राज्यों की स्वायत्तता की बात चलती है, कोई विरोध में नहीं है, लेकिन स्वायत्तता इतनी मत दीजिए कि राज्य सरकारें निरंकुश हो जाए, अंकुश अपने हाथ में रखिए। यदि अंकुश अपने हाथ में नहीं रखेंगे तो वही हाल होगा, आज तो आपने इतनी स्वायत्तता नहीं दी है तो कभी बंगाल के मुख्य मंत्री विदेश जाते हैं कि हम अपने राज्य को अमीर करने के लिए पूंजीपति को लाने जा रहे हैं, कभी बिहार के मुख्य मंत्री जाते हैं। गांव के लोग कहते हैं कि ये किसी को निमंत्रण देने नहीं जाते, * यह गांवों के लोगों की भावना है, गांवों के लोगों के मन में इस तरह की चिन्ता है कि अगर इन लोगों पर अंकुश रखना है तो आपको कानून मजबूती से बनाना पड़ेगा ताकि ये निरंकुश नहीं हो सकें, नहीं तो उन्होंने चारागाह बनाया हुआ है, केन्द्र से जो पैसा जाता है, उस सारे पैसे का लोप हो रहा है।

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*Expunged as ordered by the Chair.

रघुवंश बाबू ने लाल कार्ड की बात उठाई गई थी। उन्होंने सही कहा है। जिन लोगों का लाल कार्ड बनना चाहिए था, मैं देश की बात नहीं जानता लेकिन अपने प्रान्त की बात जानता हूं, जिन लोगों को लाल कार्ड मिलना चाहिए, नहीं मिला है। जब हम क्षेत्र में जाते हैं तो गरीब आदमी और उसकी औरत आकर सामने खड़े हो जाते हैं और कहते हैं कि नेता जी, हमारा लाल कार्ड नहीं बना है। वे चिल्लाते हैं, रोते हैं। अगर हम आवेदन पत्र पर लिख कर भी आते हैं तो भी बनता है या नहीं बनता, भगवान ही मालिक है। उनके सामान का वितरण - हमें लगता है कि बिहार के जो गरीब और कमजोर लोग हैं, गरीब और कमजोरों का मसीहा कहने वाले लोग बिहार की सत्ता की कुर्सी पर बैठे हुए हैं, पता नहीं गरीबों के प्रति कभी चिन्तन करते हैं या नहीं। जो भी सरकारी सामान उनकी सुविधा के लिए, वितरण के लिए जाता है, वह उनको नसीब नहीं होता। वहां पर यदि सरकारी दुकानदार है तो वह और मार्किटिंग अफसर मिलकर उस सामान को हजम कर जाते हैं, बिक्री कर देते हैं, गांव के लोग चिल्लाते रह जाते हैं, एक सामान नहीं मिलता क्योंकि आपके यहां कानून में जांच की जो प्रक्रिया है, अगर कहीं से कम्प्लेंट होती है तो फिर उन्हीं को जांच मिलती है जो उसमें हिस्सेदार होते हैं। फिर यह कैसी जांच होती है। उनको एक लाभ जरूर हो जाता है कि यदि शिकायत जाती है तो पहले बिकवाने में हिस्सा लिया था और बाद में शिकायत की जांच करने में लेते हैं। यह बिहार में गरीबों के प्रति दर्द और पीड़ा है।

माननीय मंत्री जी बैठे हुए हैं। बिहार की पीड़ा को थोड़ा समझना होगा। आज भी बिहार के लोगों के नसीब में गांव की गड्ढे वाली सड़क, गुजरा हुआ छप्पर का स्कूल, चकित्सा की कहीं व्यवस्था नहीं है, यही है। दिल्ली और गुजरात जैसी जगहों में बिहार की बहुत शिकायत होती है। वे कहते हैं कि बिहार के लोग कंगाल हैं, यहां रोजी-रोटी की तलाश में आते हैं। लेकिन केन्द्र ने बिहार के साथ शुरु से नाइन्साफी की है, यह आज की बात नहीं है और मुझे लगता है कि आज भी इन्साफ नहीं हो रहा है। अभी जो बिहार का बंटवारा हुआ और पैकेज की स्पष्ट घोषणा नहीं हुई, मैं मानता हूं कि शेष बिहार के साथ नाइन्साफी हुई है। जब तक शेष बिहार के साथ पैकेज की घोषणा नहीं हो जाती, हमारे जैसे लोग स्पष्ट रूप से यह कहने के लिए तैयार हैं कि बिहार के साथ नाइन्साफी हुई है। हम कहना चाहेंगे कि शेष बिहार की किस्मत को लिखने में आप सहयोग कीजिए। बिहार के लोग तो हर मामले में कंगाल हैं और कंगाल केन्द्र सरकार ने बनाया है। हम कहते हैं कि आपने दिल्ली में जे.एन.यू. बनाया है अगर आप पटना में बनाकर देखते तो पढ़ने के लिए दिल्ली में कोई नहीं दौड़ता। लेकिन आपने जे.एन.यू. का दूसरा रूप पटना और बिहार में कहां खड़ा किया, आपने दूसरे प्रान्तों में खड़ा किया। आपने दिल्ली जैसे शहर और गुजरात जैसे प्रान्त में उद्योग धन्धे लगाए, महाराष्ट्र जैसी जगह में लगाए तो बिहार के लोग रोजी-रोटी की तलाश में वहां जाएंगे। इसलिए केन्द्र ने बिहार के हक और हिस्से के साथ शुरु से ही नाइन्साफी की है। आज केन्द्र बिहार के प्रति थोड़ी सी सहानुभूति का रवैया अपनाए, गांवों की पीड़ा को समझे ताकि गांवों में ज्यादा से ज्यादा सुविधा हो सके।

हम यह भी निवेदन करेंगे कि बिहार में आप जो पैसा देते हैं, उस पर आप निगरानी रखने का काम भी कीजिए, नहीं तो पैसा कहां जायेगा, आपको पता नहीं चलेगा, इसलिए कि वहां पैसे को खाने वाला सिर्फ एक व्यक्ति दोषी नहीं है। वहां नीचे से ऊपर तक एक कड़ी बनी हुई है।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : उसके लिए ग्राम सभा है।

श्री प्रभुनाथ सिंह : उस कड़ी के माध्यम से सारे पैसे की लूट हो जाती है। जहां तक ग्राम सभा की चर्चा ये बार-बार करते हैं तो अभी भी बिहार में अशक्षित लोगों की संख्या ज्यादा है। चूंकि वहां वधि व्यवस्था बहुत ही नाजुक है, जिसके कारण गांवों में जिस व्यक्ति की इच्छाशक्ति भी होती है कि वह सही बात पर बोल सके, वहां के लुटेरे, लम्पट और चोरों की तरफ से सही बात बोलने की आदमी हिम्मत नहीं करता। अगर वह बोलता है तो परेशान होता है और परेशानी का अन्तिम रिजल्ट बिहार में हत्याओं तक होता है। इसलिए जुबान खोलने का प्रयास कोई प्रतिष्ठित, सम्मानित या गरीब व्यक्ति नहीं करता है। केन्द्र सरकार पैसा देती है तो उस पैसे पर आप निगरानी रखिये, उसकी समीक्षा कीजिए कि बिहार में वह कैसे खर्च होने जा रहा है।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। हमें ट्रेन भी पकड़नी है। हमें बात तो बहुत कहनी थी, लेकिन हमारी ट्रेन छूटने में २० मिनट रह गये हैं। हम आपके आभारी हैं कि आपने बोलने का मौका दिया। आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : सभापति महोदय, नियमावली में लिखा है कि कोई भी सदस्य भाषण देकर तुरन्त नहीं जा सकता है।

प्रो. रासा सिंह रावत (अजमेर) : मान्यवर सभापति महोदय, आदरणीय डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह जी के द्वारा प्रस्तुत संकल्प का मैं पुरजोर समर्थन करता हूं। वास्तव में अगर हम गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों को सार्थक बनाना चाहते हैं तो हमारे लोकतंत्र की और स्वायत्त शासन की जो प्रथम इकाई ग्राम पंचायत की ग्राम सभा है, उसको जब तक सुद्ृढ़ नहीं बनाएंगे और वहां पर चर्चा नहीं होगी और चर्चा होकर जिन विषयों का निर्धारण नहींहोगा, तब तक गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम में उतनी सफलता हमें प्राप्त नहीं हो सकती है। आपने जो रेजोल्यूशन प्रस्तुत किया है, उसमें :

"This House urges upon the Government to ensure the participation of Gram Sabha in identifying beneficiaries under Central Government’s various rural poverty alleviation pogrammes such as Public Distribution System and others."

आपने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को तो गिना दिया है और दूसरों को चाहे जवाहर रोजगार योजना हो अथवा ग्रामोदय योजना हो, स्वर्ण जयन्ती स्वरोजगार योजना हो या अन्यान्य भूमि सुधार के कार्यक्रम हो, राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम हो, उन सारे कार्यक्रमों को आपने अन्यों में सम्मिलित कर लिया है और सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विशेष उल्लेख किया है, क्योंकि उसके माध्यम से गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों को जो प्रतिमाह राशन का अनाज मिलता है, उन बेचारों की अगर भागीदारी सही नहीं होगी, उसमें सही व्यक्ति का चयन नहीं होगा तो शायद उनको रात को घुटनों के बीच में अपने पेट को दबाकर सो जाना पड़ेगा और राशन की दुकान से खाली हाथ लौटना पड़ेगा, उनका राशन कार्ड भी नहीं बन सकेगा। इसलिए ग्राम सभा की भागीदारी तय करती है कि गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम के जितने भी ग्रामीण क्षेत्र में हैं, केन्द्रीय सरकार के द्वारा प्रवर्तित, उनका लाभ उठाने वाले जो लोग हैं, उनकी पहचान करने में ग्राम सभा की भागीदारी अधिकाधिक होनी चाहिए, यह आपका प्रस्ताव है। मैं समझता हूं कि प्रस्ताव काफी महत्वपूर्ण है।

भारत गांवों का देश है और पूरे देश में छ: लाख से अधिक लगभग गांव हैं। राष्ट्र की अधिकांश आबादी गांवों के अन्दर रहती है। महात्मा गांधी ने कहा था कि गांव विकसित होंगे तो भारत विकसित होगा और अगर गांवों की उपेक्षा की गई तो भारत की उपेक्षा होगी। किसी कवि ने कहा है कि भारत माता ग्रामवासिनी, गांवों के अन्दर निवास करने वाली है। इसलिए गांवों के विकास की ओर ध्यान दिये जाने की अत्यधिक आवश्यकता है।

वैसे तो पंचायत सिस्टम हमारे देश में नया नहीं है। अत्यन्त प्राचीन काल में भी देश के अंदर पंच परमेश्वर की कल्पना की गई थी कि पांच व्यक्ति ईश्वर के तुल्य हैं, वे न्याय प्रदान करेंगे। इनका चयन भी ग्राम सभा के द्वारा होता था। आजादी के बाद पंचायत व्यवस्था में कई उतार-चढ़ाव आए। जब लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई, उसमें भी ग्राम पंचायतों को प्रमुखता प्रदान की गई। लेकिन गांवों में जो विकास के कार्यक्रम उनसे सम्बन्धित होते थे, जैसे भूमि सुधार का कार्यक्रम था, इनको संवैधानिक अधिकार जो प्राप्त होना चाहिए था, वह नहीं था। वह संविधान में ७३वां संशोधन करके हुआ। तब सच्चे अर्थों में ग्राम पंचायतों को संवैधानिक अधिकार प्रदान हुए। लेकिन उसके बावजूद भी देश में आबादी की द्ृष्टि से दूसरे सबसे बड़े राज्य के अदर अभी तक पंचायतों का चुनाव नहीं होना और ग्राम पंचायतें स्थापित न होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। माननीय रघुवंश प्रसाद सिंह जी ने कई कारण इस सम्बन्ध में बताएं, उनमें कुछ वजन होगा। लेकिन मैं समझता हूं जब वास्तव में हम ग्राम स्वराज और ग्राम विकास के प्रति जागरूक हैं तो संविधान के द्वारा जो स्टेचुटरी पावर्स दे दी गई हैं, उसके बाद भी ग्राम पंचायतों के चुनाव न हो तो मैं वहां की ग्रामीण जनता के लिए इसको दुर्भाग्यपूर्ण मानता हूं। मैं वहां की सरकार में सत्तासीन लोगों से प्रार्थना करना चाहता हूं कि शीघ्रातीशीघ्र संविधान के प्रावधानों को लागू करें और केन्द्र सरकार को इसके लिए न कोसें। केन्द्र सरकार तो उन्मुक्त हस्त से सारे देश के गांवों का विकास करने को तत्पर है और खजाना खोल रखा है। प्रधान मंत्री जी ने ग्राम स्वरोजगार योजना और ग्रामोदय योजना लागू की है। उसके तहत कई राज्यों को अग्रिम राशि भी दे दी गई है। लेकिन ग्राम पंचायतें नहीं होंगी तो फिर हम कौन सी पंचायतों की बात करते हैं, यह मेरी समझ में नहीं आता। जिन राज्यों में पंचायतें हैं, वहां ग्राम सभा को मजबूत बनाया जाए। जिनमें नहीं है वहां इनके चुनाव होने चाहिए। उसके बाद ग्राम पंचायतों को ग्राम सभा बैठ कर बुलाएगी।

सभापति जी, बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि संविधान के आर्टिकल २४३ में भी वर्णन है, ७३वां संविधान संशोधन भी लागू हो गया, ग्राम पंचायतों के चुनाव भी हो गए, त्रि-स्तरीय व्यवस्था, पंचायत समति, ग्राम पंचायत और जिला परिषद, लेकिन इनको अधिकार देने के नाम पर कुछ राज्यों को छोड़ कर बाकी राज्यों में वही तोता रटंतु की बात ही हो रही है। जिला परिषदों को, पंचायतों को और पंचायत समतियों को यह अधिकार दे दिया, लेकिन वास्तव में स्थिति इसके विपरीत है। पंचायत समति के सदस्यों का चुनाव हो गया, लेकिन उनका काम प्रधान का चुनाव कर लेना और पंचायत समति की बैठक में भाग लेने के अलावा और कोई काम नहीं है। इसी तरह से जिला परिषद में सदस्यों का चुनाव हो जाता है, जिला प्रमुख को चेयरमैन चुन लिया जाता है, लेकिन अधिकार कलेक्टर के हाथ में हैं। पंचायत समति में बी.डी.ओ. ज्यादा पावरफुल हो गया है। ग्राम सभा में ग्रुप सचिव या ग्राम सेवक की सरपंच के साथ सांठगांठ हो जाती है और सरपंच जैसा रिकार्ड चाहे बनवा सकता है। मैंने स्वयं अपनी आंखों से ऐसा देखा है। जब हम कुछ ग्राम सभाओं में गए, स्वाभाविक है हमारे आने से उपस्थिति अच्छी होगी, लेकिन होता क्या है कि सरपंच अपने पक्ष के लोगों को जो वार्ड पंचायत होती हैं, उसका समर्थन करने वाले लोग हैं, उनको कह देता है कि अपने साथ दो-चार लोगों को ले आना। वे सारे इकट्ठे हो गए और कहा कि पाठशाला खोलनी है। उन्होंने पाठशाला का नाम राजीव गांधी पाठशाला कर दिया। राजस्थान के अंदर निरक्षरता उन्मूलन करने के लिए और शत-प्रतिशत साक्षरता का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए भारत सरकार ने, माननीय प्रधान मंत्री अटल बिहार वाजपेयी जी के नेतृत्व में, सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत करोड़ों रुपया दिया, लेकिन वहां जाकर देखा कि उन पाठशालाओं का नाम राजीव गांधी पाठशाला रख दिया, जबकि राजस्थान प्रदेश की स्वर्ण जयंती मनाई जा रही थी। एक पार्टी विशेष का शासन होने के कारण और पूर्व प्रधान मंत्री थे इसलिए उनके नाम से राजीव गांधी पाठशाला नाम कर दिया, उचित नहीं है, स्वर्ण जयंती पाठशाला भी होता तो अच्छा था।

स्वर्ण जयन्ती पाठशाला है। ग्राम सभा को अधिकार दे दिया कि वहां पर यदि कोई मैटि्रक पास हो या नहीं भी हो तो उसको अध्यापक बना दें। जो लोग ग्रामीण क्षेत्रों के अंदर एस.टी.सी. और बी.एड. किये हुए बैठे हैं और वर्षों से बेरोजगार बैठे हैं, उनको अवसर नहीं दिया गया। जो सरपंच के रिश्तेदार और उनकी पार्टी के लोग हैं, उनको मौका दिया गया। गरीबी की रेखा से नीचे के लोगों का चयन १९९३ में हुआ था और मैंने सरकार से कुछ दिन पहले आंकड़े पूछे तो बताया गया कि सर्वेक्षण हो रहा है और उसके बाद गरीबों की संख्या बता दी जाएगी। उस समय सरकार के जो लोग थे, मुझे एक कहावत याद आ रही है : " मीठी-मीठी हतां और कड़वी-कड़वी थू। " अपने आदमी को वह चाहे गरीब हो या न हो, उन्हें गरीब घोषित कर दिया औऱ जो वास्तव में गरीब थे, जिनका कोई बोलने वाला नहीं था, वे बेचारे गरीबी की रेखा से नीचे वालों की सूची में आने से वंचित रह गये। उनको रोजगार नहीं मिलता है और उनकी उपेक्षा होती है।

आदर्श रूप मे ग्राम सभा औऱ ग्राम पंचायत बहुत अच्छी है लेकिन व्यावहारिक रूप में जब देखते हैं तो मुझे कबीर का दोहा याद आता है :

" कथनी थोथी जगत में, करनी उत्तम सार, कहे कबीर करनी सबल, उतरे भवजल पार। "

गांव से लेकर शहर तक मानव का सही निर्माण हो। सारे देश के अंदर जो नागरिक हैं, अगर आजादी के बाद लोगों में देशभक्ति के संस्कार पैदा किये जाते। द्ृढ़ता, सदाचार, प्रामाणिकता औऱ विश्वसनीयता पैदा की जाती, अगर लोगों के अंदर देश के प्रति समर्पण की भावना पैदा की जाती तो मेरा देश, मेरा विकास साकार होता। मेरे देश की सेवा, भारत की सेवा, यह मान्यता होती। मैं जो अक्सर दोहराता हूं, वही कहना चाहूंगा :

"जैसा होगा संग, वैसा चढ़ेगा रंग, जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन, जैसा पिओगे पानी, वैसी होगी वाणी, जैसी होगी द्ृष्टि, वैसी होगी सृष्टि, जैसी होगी शिक्षा, वैसी मिलेगी दीक्षा, जैसी करनी, वैसी पार उतरनी, जैसा होगा विचार, वैसा बनेगा अचार जैसी होगी मति, वैसी होगी जीवन की गति, जैसी जीवन की नीति, वैसी जीवन की रीति, जैसा श्रेष्ठ धर्म, वैसा श्रेष्ठ कर्म, जितनी करोगे भक्ति, उतनी बढ़ेगी शक्ति, जितना जानोगे योग, उतना दूर होगा रोग, और कभी नहीं भोगोगे भोग। "

प्रामाणिकता और व्यक्तित्व निर्माण की बात ग्रामीण पंचायतों मे की जाती तो वहां का व्यक्ति भी सोचता कि जहां ग्राम है, वहां राम है। ग्राम सेवा, ईश्वरीय सेवा है। निष्पक्षता के आधार पर सही गरीब का चयन किया जाये। यदि गांव का सरपंच सही है तो वहां का विकास हो जायेगा। वहां स्कूल भी बन जाएंगे, सड़कें, नाली भी बन जाएंगी, लाइट भी वहां आ जाएगी। लेकिन जो बाकी जगह हैं, उनमें कुछ नहीं होगा अगर सरपंच वहां का सही नहीं है। फिर अगला चुनाव होता है और वे कहते हैं कि हमारा सरपंच बनाओ। फिर जाति औऱ धर्म के नाम पर लड़ाई होती है। मैं इस प्रस्ताव का समर्थन करता हूं, यह बहुत अच्छा प्रस्ताव है। गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के अन्तर्गत ग्राम सभा को महत्व दिया जाना चाहिए।

राजस्थान में एक घोर अकाल पड़ा था। केन्द्र सरकार ने जो पैसा सूखे का सामना करने के लिए भेजा था लेकिन वहां की सरकार कहती रही कि पैसा नहीं है। गांवों के अंदर गरीबी की रेखा से नीचे के लोगों का सही चयन होना चाहिए ताकि वे लोग काम पर लगे। गांवों के अंदर हमने कहा कि गरीबी की रेखा से नीचे जो लोग हैं, उन सबको काम पर लगाओ। केवल एक पंचायत में आबादी यदि ३००० की होती है और उसमें ६०० गरीबी की रेखा से नीचे हैं तो ६० या ७० को काम मिलता है। उसमें भी कहा जाता है कि एक सप्ताह इन्हें लगाओ और एक सप्ताह इन्हें लगाओ। उसमें ग्राम सभा और ग्राम पंचायत किसी की नहीं चलती। अपने-अपने आदमी अपने-अपने को दें, यह स्थिति होती है जो कि ठीक नहीं है। ग्राम सभा तो बुला लेते हैं, निर्णय भी कर लेते हैं लेकिन निर्णय में क्रियान्विति सरपंच पर निर्भर होती है औऱ सरपंच पूर्वाग्रहों से युक्त हो, उसमें काम करने की शक्ति, निष्ठा यदि उसमें नहीं है, काम करने की, आगे बढ़ने की तमन्ना नहीं हैं, लेकिन . * पर या और किसी कारण से बन गए, तो गांव का विकास कैसे होगा। Man is the major factor - मनुष्य सबसे बड़ा प्रमुख कारण है। इसलिए ग्राम सभाओं के अन्दर अच्छे पंच और अच्छ लोग चुनकर जायें। अच्छे लोग बैठेंगे तो निश्चित रूप से ग्राम सभाओं को न्याय मिलेगा और वे विकास भी कर सकेंगी।

इस बिल का मैं समर्थन करते हुए, अपनी बात समाप्त करता हूं और आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया।

सभापति महोदय : माननीय सदस्य ने जिन असंसदीय शब्दों का प्रयोग किया है, वे रिकार्ड में नहीं जांएगे।

_________________________________________________________________ *Not Recorded.

श्री रामजी लाल सुमन (फिरोजाबाद) : सभापति महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने माननीय सदस्य, डा. रघुवंश प्रसाद जी, द्वारा प्रस्तुत संकल्प पर बोलने के लिए समय दिया। उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण संकल्प इस सदन में रखा है। इस संकल्प के माध्यम से उन्होंने इच्छा प्रकट की है कि ग्राम पंचायतें मजबूत हों और लाभार्थियों को पहचानने की प्रमुख भूमिका पंचायतों की हो।

भारत सरकार की वभिन्न गरीबी उन्मूलन की योजनायें हैं और उनमें ग्राम सभाओं का अहम रोल है। उन सब पर विचार करने के लिए निश्चित रूप से यह सामयिक संकल्प है। ग्राम सभाओं को ज्यादा अधिकार देने की बात, महात्मा गांधी का चाहे ग्रामीण स्वराज कहिए या डाक्टर लोहिया का चौखंभा राज या फिर सत्ता का विकेन्द्रीकरण - इन सब चीजों के पीछे वही मकसद है कि ग्राम सभाओं या ग्राम पंचायतों को अधिक से अधिक शक्ति मिलनी चाहिए। यह भी सही है कि ग्राम पंचायतों को शक्तियां मिली हैं, लेकिन व्यावहारिक बात यह है कि हमारे देश में जो अफसरशाही का ताना-बाना है और इस देश में जो काम करने का ढर्रा है, उसमें ग्राम पंचायतों के साथ जो इन्साफ होना चाहिए, वह नहीं हो पाता है। मिसाल के तौर पर उत्तर प्रदेश की ग्राम पंचायतें हैं। गांवों में शिक्षा समति का अध्यक्ष गांव का प्रधान होता है और प्रधानाध्यापक उस शिक्षा समति का मंत्री होता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से देखने में आता है कि २५०-३०० बच्चों के लिए एक अध्यापक है। सरकार ने बच्चों के हिसाब से अनुपात सुनिश्चित कर रखा है, उस अनुपात में शिक्षकों का आवंटन प्रधान द्वारा किए जाने के बावजूद भी विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो पाती है। कोई भी अध्यापक समय से नहीं आता है। ग्राम प्रधान द्वारा की गई शिकायतों को गम्भीरता से नहीं लेते हैं।

महोदय, १९७२ में लैंड मनेजमेंट में अध्यक्ष प्रधान को बनाना निश्चित हुआ। प्रधान पंचायत की भूमि को आबंटित सीमित करने के लिए प्रधान पट्टा देता था और वह पट्टा वैध माना जाता था। १९७२ के बाद उसमें तबदीली आ गई और यह हुआ कि गांव का प्रधान सिर्फ प्रस्ताव करेगा और उसको अंतिम रूप उप जिला अधिकारी देगा। अब प्रोसैस कैसे चलता है, वह मैं आपको बताता हूं। ग्राम प्रधान के प्रस्ताव के बाद लेखपाल, फिर कानूनगो, फिर नायब तहसलीदार, फिर तहसीलदार और तब जाकर उप जिला अधिकारी। मुझे इस बात को कहने के लिए माफ करेंगे, जिसको लाभ मिलने वाला है, लाभार्थी है, उससे कहीं ज्यादा दाम दक्षिणा में चला जाता है और वह परेशान होकर शांत बैठ जाता है। हालत यह है कि जो इंदिरा आवास बनते हैं, उसमें पात्रता की श्रेणी है, जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, भूमिहीन या दस्तकारी का काम करने वाले या सवर्ण जाति के ऐसे लोग। जो भूमिहीन है या जिनके पास मकान नहीं है, उनको प्राथमिकता मिलती है।

ग्राम प्रधान प्रस्ताव पास करता है। मैं नहीं जानता कि उसके प्रस्ताव पर कोई इंदिरा आवास बनता हो या उसके प्रस्ताव का कोई अर्थ हो। वह जब ब्लाक में जाता है तो वहां उसे सूची दे दी जाती है कि आपके गांव में ये आवास बनने वाले हैं, आप मेहरबानी करके हस्ताक्षर कर दीजिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जो हक उसे मिले हैं, वह उनका सही इस्तेमाल नहीं कर रहा है, चाहे आवास या पट्टे देने की बात हो या दूसरी चीजें हों। इस अवसर पर मैं आपसे एक निवेदन अवश्य करना चाहूंगा, हम लोग इसलिए चाहते हैं कि ग्राम सभा को अधिक से अधिक अधिकार मिलें, क्योंकि सांसदों की बड़ी व्यावहारिक दिक्कतें हैं। आज समाज की मनोवृत्ति यह हो गई है कि वे जिसे वोट देते हैं उसी से दुनिया का हर काम लेना है, ऐसा समझते हैं।

आप जानते हैं कि जनजीवन से जुड़ा हुआ जो सवाल है, आदमी की रोजमर्रा की जिन्दगी से ताल्लुक रखने वाला जो सवाल है, उनका संबंध सूबे की सरकार से होता है। बिजली, पानी, सड़क, नहरें, अस्पताल, इन सब चीजों का संबंध राज्य सरकार से होता है। अब हालत यह हो गई है कि अगर गांव का खडंजा खराब है, किसी का राशन कार्ड भी नहीं बना है, जब वहां सांसद दौरे पर जाएगा तो सबसे पहले उसे शिकायत की जाएगी कि आप लोक सभा के सदस्य हो गए और हमारे गांव का खडंजा ठीक नहीं करवाया, हमारे गांव के राशन कार्ड नहीं बने। इससे हम लोगों के सामने व्यावहारिक दिक्कतें पैदा हो गई हैं। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि हमें जो सांसद नधि के रूप में दो करोड़ रुपया मिलता है, यह जानलेवा बीमारी है। अगर हमारे हल्के में पांच विधान सभा क्षेत्र हैं तो एक विधान सभा क्षेत्र में ४० लाख रुपया एक वर्ष में आया। इंजीनियर एस्टीमेट बना कर देता है कि एक किलोमीटर सड़क बनाने में आठ लाख रुपए का खर्चा होगा तो सांसद एक वर्ष में अपनी सांसद नधि से एक विधान सभा क्षेत्र में सिर्फ पांच किलोमीटर सड़क बनवा सकता है। अगर वह गांव में दौरे पर जाता है, रासा सिंह जी जानते हैं कि गांव के लोग मांग करते हैं कि हमारा तीन किलोमीटर का टुकड़ा है, इसे आप ठीक करवा दें, बनवा दें। गांव में विद्युतीकरण हो जाना चाहिए, स्कूल बनवा दीजिए और कम से कम दस हैंड पम्प तो गांव के लिए दे ही जाओ।

महोदय, मोटे तौर पर सही मायनो में सांसद को जो नधि मिलती है वह एक विधान सभा क्षेत्र में एक गांव की हालत को ठीक कर सकता है, ऐसी हालत हमारे देश में है। हमसे अच्छी हालत विधायकों की है। उत्तर प्रदेश में विधायक नधि बढ़ा कर ७५ लाख कर दी गई है और हमें एक साल में एक विधान सभा क्षेत्र में ४० लाख रुपए मिलते हैं, विधान परिषद के सदस्य को और विधायकों को ७५ लाख रुपए मिलते हैं। रघुवंश जी बता रहे थे कि बिहार में डेढ़ करोड़ कर दिया गया है।…( व्यवधान)

महोदय, ये सब व्यावहारिक दिक्कते हमारे सामने हैं। यहां भी हम लोग अपनी बात नहीं कर पाते हैं। हम जब सुबह शून्य काल के लिए नोटिस देते हैं तो ७५ फीसदी नोटिसों पर इसलिए विचार नहीं होता क्योंकि वह राज्य सरकार का सवाल है। हमारे जो समर्थक और शुभचिन्तक हैं उनमें किसी की परेशानी है, तो वह अपेक्षा रखता है कि हम इन सवालों को लोक सभा में उठाएं लेकिन हम अपने मन की बात भी यहां नहीं कह सकते। महोदय, अगर ग्राम पंचायत मजबूत हो तो उनके मजबूत होने से हम लोगों को भी कुछ निज़ात मिलेगी और लाभ मिलेगा। मंत्री जी बैठे हैं, एक परम्परा रही है कि जब कोई मुख्य मंत्री बनता है तो दलगत भावना से ऊपर उठ कर प्रदेश के सभी सांसदों को बुला कर उनसे बात करता है। पिछली लोक सभा में जो उत्तर प्रदेश के सदस्य थे, उन्हें २०-२० गांव विद्युतीकरण के लिए दिए गए और इस बार एक भी गांव सांसद को विद्युतीकरण के लिए नहीं दिया गया तथा न ही कोई बैठक हुई है। रघुवंश जी ने जो प्रस्ताव पेश किया है, मैं उसके हक और समर्थन में हूं।

हम लोग यह चाहते हैं कि ग्राम-पंचायतें और ज्यादा बलशाली बनें। लेकिन इसके साथ-साथ खासतौर से यह भी देखने की आवश्यकता है कि ग्राम-पंचायतों को प्रदत्त अधिकारों का क्या वे सही उपयोग कर पा रही हैं या नहीं। इस बात को भी आज देखने की आवश्यता है और यही मुझे निवेदन भी करना था। धन्यवाद।

श्री खारबेल स्वाइं (बालासोर) : सभापति महोदय, मैं आज बहुत खुश हूं कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया। मैं बहुत सारे विषयों पर संसद में बोल चुका हूं लेकिन मुझे इस विषय पर बोलने में जितना आनंद आता है और किसी भी विषय पर बोलने में नहीं आया था ।

जब मैं अपने क्षेत्र के किसी गांव में जाता हूं तो ४०-५० लोग मेरे पास आ जाते हैं और कहते हैं कि हमें इंदिरा आवास का एक घर दीजिए। माननीय रघुवंश प्रसाद सिंह जी, जो इस प्रस्ताव को लाए हैं वे कहते हैं कि सांसद लिख देने से, विधायक लिख देने से उनके प्रदेश में घर मिल जाता है।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : सांसद के लिख देने से नहीं, घूस देने से मिलता है।

श्री खारबेल स्वाइं : लेकिन उड़ीसा में जब मेरे पास कोई ऐसा व्यक्ति आता है, मैं तो हाथ खड़ा कर देता हूं और कहता हूं कि मेरे पास कुछ नहीं है, तुम सरपंच के पास जाओ। आपने कहा है कि ग्रामसभा को मजबूत कीजिए। उड़ीसा में आईआरडीपी लोन, वृद्धा-अवस्था पेंशन, विधवा पेंशन ग्राम सभा के माध्यम से दी जाती है। लेकिन महोदय, मेरा कहना है कि उड़ीसा में ग्राम सभा होती ही नहीं, बल्कि सरपंच सभा होती है। अधिकांशत: आप वहां देखेंगे कि लोग आकर कहेंगे कि हम बहुत गरीब हैं और हमारा नाम इस योजना में नहीं है। आप कहेंगे कि फलां व्यक्ति का नाम कैसे आया तो कहेंगे कि ग्राम सभा में पास हुआ। आप गांव में जायेंगे तो पायेंगे कि वहां ग्राम सभा अक्सर होती ही नहीं है, वहां सरपंच सभा होती है। प्रो. रासासिंह रावत कह रहे थे कि अपनी ही पार्टी के लोगों को बुलाकर सभा होती है, लेकिन मेरा कहना है कि वह भी होता नहीं है। केवल दस्तखत करने के लिए कहा जाता है और कहा जाता है कि अगर इस बार आप दस्तखत करोगे तो अगली बार आपको घर मिल जायेगा।

इसमें मेरे दो सुझाव हैं। एक सुझाव यह है कि पहले ब्लॉक ऑफिस से हर गांव के लिए कहा जाये कि महीने में जिस दिन ग्राम सभा बैठे, उसकी तारीख निर्धारित की जाये। मान लो कि महीने की ५ तारीख को मीटिंग बैठेगी और इस स्कूल या गांव में फलानी जगह होगी। कम से कम लोगों को जानकारी तो होगी। माननीय मंत्री जी बैठे हैं इनको मैं निवेदन करना चाहता हूं कि हमारी जो गाइडलाइन्स जा रही हैं उनमें आप इस बात को निर्दिष्ट करें कि कब सभा बैठेगी, इसकी तारीख बलॉक औफिस निर्धारित करें।

दूसरा सुझाव यह है कि सिर्फ ग्राम सभाओं को यह क्षमता दे देने के काम नहीं चलेगा। उड़ीसा में ग्राम-सभाओं में जिनको विलेज कमेटी कहते हैं इस बात का दायित्व दिया गया है लेकिन हर बैठक में खून-खराबा होता है। वहां पर इसके लिए लड़ाई हो जाती है क्योंकि सरपंच का पक्ष कुछ होता है और विपक्ष का कुछ होता है। हम आराम से सोच लेते हैं कि गांव में राम-राज्य है, सब लोग मिलकर काम करते हैं।

भारतवर्ष के गांव ऐसे नहीं है इसलिए ग्राम सभा को यह दायित्व देना उचित नहीं है। मेरा सुझाव है कि ग्राम सभा से जितने प्रस्ताव आते हैं, उसे सांसद, विधायक, पंचायत समति के चेयरमैन तीनों मिल कर देखें और उनकी एक कमेटी बनाई जाए। वे ओल्ड एज पेंशन, विधवा पेंशन, आई.आर.डी.पी., इन्दिरा आवास योजना को देखकर बताएं कि किन को इसका लाभ मिलेगा। ये तीन-चार लोग अलग-अलग पार्टी के होंगे। इससे मनमानी नहीं होगी। कोई न कोई इसे रोक लेगा।

गरीबी सीमा से नीचे कौन लोग रहते हैं? मेरा जिला बालेश्वर उड़ीसा के दूसरे क्षेत्रों के मुकाबले सम्पन्न इलाका है। वहां से कितने लोगों का नाम बी.पी.एल. के लिए रिकमैंड होकर आया है? ७३ प्रतिशत लोगों का आया है। एक ब्लाक से ८४ परसैंट आया। मैंने कलैक्ट से डी.आर.डी.ए. की एक मीटिंग में पूछा कि किन लोगों को बी.पी.एल. लिस्ट में लिया जाएगा क्योंकि हर रोज लोग आकर कहते हैं कि मेरा नाम छूट गया। इतने लोगों का नाम आने के बाद भी कहा जाता है कि हमारा नाम छूट गया इसमें आपका क्या क्राइटीरिया है? उन्होंने बताया कि जिस के घर में फैन, रेडियो, टेलीफोन और टेलविजन नहीं है, वह उसमें आएगा। मैंने कहा कि और कुछ और भी बताइए। इस पर उन्होंने कहा कि जिस परिवार की महीने की आय २५० रुपए से कम हो उनको बी.पी.एल. लिस्ट में रखा जाएगा। उड़ीसा में एक आदमी आधा किलो चावल प्रतदिन कम से कम खाता है। यदि एक परिवार में पांच आदमी हुए तो एक दिन में ढ़ाई किलो चावल खाएंगे। यदि उसने कुछ भी नहीं खाया, पहना और कहीं नहीं गया फिर भी उसे हर रोज २५ रुपए खर्चा करना पड़ता है। ऐसे में उसे सिर्फ चावल के लिए महीने में साढ़े सात सौ रुपए खर्चा करना पड़ता है। जिस की ढ़ाई सौ रुपए से कम इनकम होगी, उसे ही बी.पी.एल. लिस्ट में लिया जाएगा। हर आदमी बराबर कोशिश करता है कि उसका नाम इस लिस्ट में किसी तरह येन केन प्रकारेण आ जाए। यदि उसका बी.पी.एल. लिस्ट में नाम नहीं होगा तो उसे कुछ नहीं मिलेगा। उसे इन्दिरा आवास योजना के तहत घर नहीं मिलेगा, लोन नहीं मिलेगा, पेंशन नहीं मिलेगी, पी.डी.एस. से राइस नहीं मिलेगा। आप प्राइमरी टीचर को कहते हैं कि ऐसे लोगों की लिस्ट बना कर लाई जाए। वे इस काम को नहीं कर पाते। यदि वह किसी का नाम नहीं लिखता तो मार खाता है। मेरा सुझाव है कि किसी गैर सरकारी संस्था से इस काम को करवाया जाए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ३३ परसैंट लोग बिलो पावर्टी लाइन हैं लेकिन उड़ीसा से ऐसे लोग ७३ परसैंट और ८४ परसैंट तक आते हैं। इसमें से अधिकांश जाली नाम हैं। मैं स्वयं कहना चाहता हूं कि मेरे जिले से जाली नाम आए हैं। हमारे वित्त मंत्री ने इस वर्ष के बजट भाषण में कहा था कि इनकम टैक्स पे करने वालों को पी.डी.एस. से चीनी नहीं मिलेगी। पहले उन लोगों को चीनी मिलती थी। उन लोगों को वहां से क्यों चीनी मिलती थी? भारत सरकार हजारों करोड़ रुपए सबसिडी पर खर्च करती है। वह किस के पास जाती है? सब को इसका फायदा मिलना चाहिए, क्या वह उसके पास जाती है? हिन्दुस्तान में जिस के पास पैसा है, उसे ही सबसिडी का फायदा मिलता है। उसे चीनी और कैरोसिन पी.डी.एस. में मिलता था। इसमें वैस्टिड इंटरेस्ट है। इसके लिए प्राइवेट एजेंसी कुछ करे। इससे समस्या नहीं होगी।

आप इन्दिरा आवास योजना के लिए गरीब लोगों को पैसा देते हैं।

जो गरीब लोग के पैसा नहीं है उसे बारी बारी से किश्त में पैसा दिया जाना हैं। यह कहा जाता है कि पहले मकान बनाकर दो, फिर पैसा मिलेगा। उन गरीब लोगो के पास पैसा कहां से आयेगा ? पिछले साल उड़ीसा में समुद्री चक्रवात आया था। मकान बनाने के लिये हर आदमी को बीस हजार रुपया दिया गया। अब कोई बताये कि क्या घर बीस हजार रुपये में बनता है। वह बेचारा ठेकेदार को पैसा दे देता है जिसमें पांच हजार रुपया ठेकेदार ले लेता है। इसलिये माननीय मंत्री जी से निवेदन है कि वह गरीब को ५० परसेंट रुपया एडवांस में दे ताकि वह अपना घर बना सके।

श्री सुकदेव पासवान (अररिया): सभापति महोदय, डा. रघुवंश बाबू सही मायने में यह संकल्प लाये हैं। गांव में रहने वाले ८० प्रतिशत लोगों के लिये बहुत ही उपयोगी है। हम से बहुत से लोग नहीं जानते कि ग्रामसभा वर्ष २००० मना रहे हैं। लोगों को इसकी जानकारी नहीं है। मैं मंत्री जी से पूछना चाहता हूं कि इसमें आपको क्या कठिनाई थी कि इसकी जानकारी न सांसदों को और न गाँव में रहने वालों को दे सके। सरकार को निश्चित रूप से इस ओर ध्यान देना चाहिये था। यदि ग्रामसभा का विकास हो जायेगा तो निश्चित रूप से इस देश का विकास हो सकेगा। चाहे इस सब के पीछ जो भी कारण रहा हो, यदि हम गांव का विकास नहीं कर पाये तो देश का विकास कैसे कर पायेंगे? मेरी सबसे अपील है कि राज्य सरकारों को इस ढंग से सोचना चाहिये कि गांव का समुचित विकास होना चाहिये। अभी हमारे एक मित्र बता रहे थे कि कई राज्यो में पंचायत चुनाव हुये हैं और कहीं नहीं हुये हैं। जहां चुनाव हुये भी हैं, वहां पंचायतों को मान्यता से वंचित किया जा रहा है। इसीलिये मैंने कहा कि जब तक ग्रामों का विकास नहीं होगा, हम अपने देश को समृद्धिशाली नहीं बना सकते।

सभापति महोदय, केन्द्र सरकार की ओर से जवाहर रोज़गार योजना के लिये जो पैसा दिया जाता है, उसके लिये निश्चित रूप से गाइडलाइन्स बनी हुई हैं। इस योजना के अंतर्गत जो पैसा जाता है, उसके लिये आम सभा से स्वीकृति होनी चाहिये। यदि हम यह कहें कि देश के किसी भी प्रदेश में सरकार द्वारा निर्धारित गाइडलाइन्स के अनुसार काम नहीं होता तो गलत नहीं होगा। इसलिये हम लोगों को सोचना चाहिये कि सही मायने में ग्रामसभा के क्या अधिकार हों। आज ग्रामसभा के सारे विकास कार्यों के लिये बी.डी.ओ. उत्तरदायी है। वह अपने पंचायत कर्मचारियों को कह देता है कि अपनी आम सभा करके लिस्ट बनाकर दे दो कि कौन सी योजना लेनी है और कौन सी नहीं लेनी है। मैं यही कहूंगा कि ऐसा काम करने से विकास के कार्य संभव नहीं। जब तक ग्रामसभा नहीं होगी तब तक सही बात निश्चित रूप से सामने नही आती। ग्राम सेवक मुखिया, एम.एल.ए. या नेता के कथनानुसार काम करते हैं।

सभापति महोदय, यही स्थिति इन्दिरा आवास योजना की है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मैं जिस जगह का रहने वाला हूं, वहां इस योजना के तहत २० हजार रुपया जिसको मिलता है, उससे ५-७-८ हजार रुपया पहले ही कमीशन के रूप ले लिया जाता है।

17.00 hrs. उसमें वहां पर नेता पैसा लेता है, बी.डी.ओ. पैसा लेता है। बी.डी.ओ. के खिलाफ एफ.आई.आर. भी दर्ज हुई। लेकिन आज ऐसी स्थिति बनी हुई है कि लोगों की मनोवृत्ति इस तरह से नीचे गिर गई है कि लोग चाहते हैं कि जो कोई मरा हुआ व्यक्ति भी हो, उसकी लाश के कफन का पैसा भी खा जाएं। हम लोगों में इस स्तर तक गिरावट आ गई है। इस विषय में जितना भी कहा जाए, कम है।

सभापति महोदय, इंदिरा आवास योजना में यह होना चाहिए कि ग्राम सभा में हम अपने जिलों में सभी बी.डी.ओज. को सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दें कि आप गांवों में जाओ और वहां जो सबसे गरीब और निरीह व्यक्ति हैं, वहां आम सभा करके उनका नाम लो। वृद्धावस्था पेंशन, विकलांग पेंशन या गर्भवती महिलाओं की जो पेंशन है, वह सब भी आप ग्राम सभा से पास करवा कर दो। निश्चित रूप से ग्राम सभा एक भी ऐसे गलत आदमी की सूची पास नहीं करेगी। लेकिन ऐसा नहीं होता है। बी.डी.ओ. अपनी मनमानी करता है, वहां के कर्मचारी मनमानी करते हैं। इसलिए जो काम वहां होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है।

सभापति महोदय, लाल कार्ड योजना की आपके प्रदेश में क्या स्थिति है, वह मैं नहीं कह सकता, लेकिन हमारे प्रदेश में लगभग ७५ प्रतिशत व्यक्ति गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले हैं। हमने प्रबंध समति की बैठक की थी। युवा खेल विभाग के मंत्री, श्री शाहनवाज जी हमारे जिले के हैं और हम जिला प्रबंध समति में रिजोल्यूशन लाये कि अररिया संसदीय क्षेत्र और बिहार के ६१ प्रतिशत व्यक्ति जिनके नाम गरीबी की रेखा से नीचे वाली सूची में होने चाहिए, वे नाम उस सूची में दर्ज नहीं हैं और जिले की प्रबंध समति को हम लोगों ने लिखकर दिया कि यहां केन्द्रीय मंत्री श्री शाहनवाज जी हैं और आप है। इसका पून: पूरे बिहार तथा अररिया संसदीय क्षेत्र में सर्वेक्षण हो। जो लोग गरीबी की रेखा के नीचे जीवन की गुजर-बसर कर रहे हैं उन बहुत सारे व्यक्तियों का नाम उस सूची में नहीं है। मैं पूरे सदन से आग्रह करना चाहूंगा कि पूरे बिहार में निश्चित रूप से पुन: सर्वेक्षण हो। अगर ग्राम सभा करके सर्वेक्षण हो तो निश्चित रूप से गरीबी की रेखा के नीचे का एक भी आदमी नहीं छूटेगा। हम लोगों को इस पर ध्यान देने की जरूरत है।

सभापति महोदय, आज गांवो में शिक्षा की क्या स्थिति है। अनुसूचित जाति और जनजातियों के ७० प्रतिशत बच्चे अभी भी गांवों में स्कूल नहीं जाते हैं। कहीं पर स्कूल दूर होते हैं। छोटे-छोटे बच्चे दो-तीन किलोमीटर दूर नहीं जाना चाहते हैं, कहीं उनके मां-बाप उन्हें स्कूल जाने से रोकते हैं कि हमारे बच्चे को कुछ हो न जाए। कहीं स्कूल नहीं हैं और अगर स्कूल हैं तो शिक्षक स्कूल नहीं आते हैं। वहां के जो स्कूल इंस्पैक्टर या संबंधित अधिकारी हैं, उनका उन स्कूलों के शिक्षकों से मासिक रुपया बंधा हुआ है, आप इतना रिश्रुवत के रूप में रूपया दो और स्कूल मत आओ। ऐसी स्थिति में गांव का विकास कैसे संभव है। चाहे केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार हो, निश्चित रूप से इस पर ध्यान देने की जरूरत है। जब तक यह सब ठीक नहीं होगा, देश मजबूत नहीं हो सकता है। गांवों में आज प्राइवेट स्कूल खुल गये हैं। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई बिल्कुल नहीं होती है। प्राइवेट स्कूल गांव-गांव में खुल गये हैं और उन स्कूलों में आवास की भी व्यवस्था है। लोग प्राइवेट स्कूलों में पैसा देते हैं। चूंकि सरकारी स्कूलों की व्यवस्था अच्छी नहीं है। इसलिए मैं अंत में कहना चाहता हूं कि जब हम लोग अपने क्षेत्र में जाते हैं तो एम.पी., एम.एल.ए., वार्ड कमिश्नर, मुखिया और ब्लाक प्रमुख का भी काम हमें ही करना पड़ता है। महोदय आपके पास बहुत सारे लोग आते होंगे, कई प्रदेशों में कई वर्षों से चुनाव नहीं हुए हैं, इसलिए हम लोगों को ही ये सारे काम करने पड़ते हैं।

जब तक ग्राम सभा, ग्राम पंचायत और ब्लॉक सुखी-सम्पन्न नहीं होंगे, खुशहाल नहीं होंगे, तब तक भारत देश कभी खुशहाल नहीं हो सकता। इसलिए मैं आपके माध्यम से सरकार से कहना चाहूंगा कि ग्राम सभा को, ग्राम पंचायत को सभी द्ृष्टिकोणों से, शिक्षा के माध्यम से या हॉस्पिटल के माध्यम से उसको और मजबूत करें ताकि हिन्दुस्तान उन्नति कर सके। यह कहकर मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

     

DR. V. SAROJA (RASIPURAM): Hon. Chairman Sir, thank you very much for giving me this opportunity. I congratulate Dr. Raghuvansh Prasad Singh for moving such an important and vital resolution. Sir, the dream of the hon. former Prime Minister of India, Shri Rajiv Gandhi, to my knowledge, is totally defeated even after the passing and implementation of 73rd Constitution Amendment.

17.06 hours (Shrimati Margaret Alva in the Chair) Sir, in Tamil Nadu, though the Panchayati Raj is in action, the public have not enjoyed the fruits and the benefits that they should have enjoyed. If I analyse where we went wrong, how we can modify things and how we can take the schemes to the poor people, I find that there is no syllabus available. There is a Panchayati Raj Awareness Programme in the Indira Gandhi Open University. That syllabus can be translated into regional languages and circulated to all the States. The District Administration can be instructed to give proper training to the general public as well as Panchayats for making them aware of the various schemes and also about sensitisation of the members of the Gram Panchayat to know their responsibilities, accountability, duties and the way these functions should be discharged.

Sir, without people’s participation, no scheme can be successfully implemented. This is one aspect which the Government machinery as well as the Panchayati Raj have forgotten. I was in the Government service for 18 years. I could easily demarcate that the Government machinery is going parallel to the Panchayati Raj. There is no understanding and there is no discussion between the District Administration and the official machinery at the local level as well as the district level as to how to solve the problems of the local Panchayat. Before deciding the schemes, there is absolutely no consensus reached between the Panchayati Raj and the official machinery of the local area.

Above all, the public representatives, the MLAs and the MPs are totally neglected. You may say that all the MLAs and the MPs were asked to take part in the district administration and also in the implementation of all the schemes sponsored by the State as well as Central Governments. It is unfortunate that in no State, the official machinery is taking into consideration the opinion of the elected representatives of the public. It is only the information that we get.

PROF. UMMAREDDY VENKATESHWARLU (TENALI): It is not so in all the States.

DR. V. SAROJA (RASIPURAM): Sorry. I am talking about Tamil Nadu.

In the Employment Assurance Scheme and also in selecting the beneficiaries, not even the District Administration is being consulted and the officials are taking law into their hands. Before selecting the beneficiaries, they have to have a consensus. Also, the local self-help groups of the Empowerment Committee should have a role to play in the Panchayati Raj.

Seventy-five per cent of the population lives in rural India. Our great leader Perarignar Anna has said, "Go to the villages, be with the villagers, plan and implement, then only you will see a India which was visualised by Mahatma Gandhi".

In this respect, I would like to draw the attention of this august House to the increase in our population. We have now reached the 100 million figure, and that is a worrying problem. I would only suggest one simple thing. If all the pregnant mothers are registered, then it would become the sheet-anchor for controlling the population under the family planning programme. Even after 50 years of our Independence, I am sorry to say that no State has implemented this programme. We do not know how many mothers are to be brought under this family planning programme because we do not know their history, and other details like the number of children, type of delivery, the number of living children etc. In this respect, I feel, the Gram Panchayat and the local officials can play their role in achieving our goal of stabilising the population growth.

Regarding the poverty alleviation programme, as Shri Swain has rightly pointed out, the definition is still in a fluid state. Nobody is able to identify a beneficiary, who is actually below the poverty line. It should be thoroughly demarcated, properly understood, and the same scale should not be there for every State because economic power or status varies from State to State. It should be individualised, and it should be properly demarcated.

Madam, I feel, there should be a critical evaluation of all the schemes through which we have given money to the State Governments. We, the Members of Parliament, do not know as to what is happening to the schemes. Eighty per cent of the financial support that we are giving to the State Governments is not being properly utilised. In fact, it is being diverted to some other schemes; especially, the money meant for the Tribal Development Programme is not being utilised properly. In the SC/ST areas, there are reports that even the Gram Panchayats were not taken into account. In the Gram Sabhas, most of the time, the people are not even allowed to sit; they have to simply stand and given the replies in front of the district administration. This is really a pathetic situation. Above all, whenever the Gram Panchayats discuss anything, it should be above party lines. Politics should not come in the way. If politics play a role, then selecting the real beneficiary would become difficult.

As far as the land reforms and the revenue department are concerned, whenever they are issuing pattas to the SC/ST people and the poor people, it is not being done properly. The village administrative authority thinks that he is the king or the boss. He is not able to give the classification of the revenue land either to the Panchayat people or to the general public or to the MPs or the MLAs who wanted to know as to what type of Government land it is and whether it can be given as pattas. When people approach us for the pattas, we are not able to give them a proper reply. My suggestion is that a social worker should be posted in the BDO as well as in Taluka headquarters. When the public approaches the officials, they are not in a receptive mood; they do not receive the public properly, and they do not give them a patient hearing. So, my suggestion is that a social worker should be posted in all the Government offices so that the people can air their grievances properly.

Madam, the Indira Awas Rozgar Yojana is meant for constructing group houses for the rural people. The concept of town Panchayats has been done away with after the implementation of the Panchayati Raj thinking that the Nagarpalikas would take care of the Town Panchayats. Most of the people, the poor people, come under the jurisdiction of the Town Panchayats. In the State of Tamil Nadu, there are more than 600 Town Panchayats. A similar scheme of constructing group houses, as is available for people in the villages, could also be formulated for the Town Panchayats so that the interest of the poor people and the socially backward people could also be taken care of.

Madam, the issuance of birth certificates, death certificates and corrections in the voters’ list must properly be evaluated and should be given to the people on time. I feel, the Gram Panchayats and the social welfare organisations would be able to do this job better than the teachers or the official machinery. It is because they correct the voters’ list by sitting at their homes. This should definitely be taken care of.

Madam, as far as the social sector is concerned, the beneficiaries are not selected by the Gram Panchayats. They are selected by the Mukhya Sabikas who sit in the Block Development Offices. When we go to the people we find that the real beneficiaries are not getting the benefits but the rich people are getting the benefits. The Forest Conservation Act of 1980 is coming in the way of our trying to provide the basic amenities to the tribal people.

Madam, through you, I would like to have a clarification from the hon. Minister on the following point. Even after the implementation of the Panchayati Raj, the MPs have to provide for the drinking water, electricity and other facilities from their MPLAD funds. Then, what is the role of the Panchayats? I would like to have clarification on this point. I have my own worry on this because funds from the MPLADS could be allotted for areas where the Panchayati Raj institutions or the District Administration is not able to take up jobs. But, even basic amenities like drinking water, electricity and other such facilities are not being provided by the Panchayati Raj Institutions. I do not know as to what is the aim of having these Panchayati Raj Institutions.

Madam, I would like to request through you that at least a sum of Rupees five lakh, out of the MPLADS funds, should be allocated to MPs for allocation of work, selection of schemes and all other such things. Basic amenities should be provided by the Panchayati Raj Institutions. More powers should be given to them. It should be educative and informative training may be given and before that powers are given to them.

SHRI ANADI SAHU (BERHAMPUR, ORISSA): Madam, with your permission, may I speak in Oriya? I have given a notice for this.

MR. CHAIRMAN : Yes.

*SHRI ANADI SAHU (BERHAMPUR- Orissa): Madam Chairperson, I would like to speak a few words on the resolution related to participation of Gram Sabha in poverty alleviation programme which has been moved by Dr Raghuvansh Prasad Singh. Hon’ble Member Dr Singh has moved a timely resolution. While moving his resolution Dr Singh perhaps wanted to speak on Bihar. He has raised certain financial matter on which I do not want to comment. Rather I would like to draw your attention to the last line of last stanza of Rigveda which has found place in the form of inscription in Room No. 53 and 62 of Parliament House. It is written there as follows:

"Samana Mantrah Samiti Samani Samanha Akuti Sahachittamesha".

Dr Singh is perhaps able to follow the meaning of Akruti. It is being used both in his mother tongue Bhojpuri and my mother tongue Oriya. The English meaning of Akuti is imploration. Then, Sahachitta Mesham means working in one mind and one intention by the Gram Sabha and all other assemblies. The Gram Sabha should work in union and one mind while performing the work entrusted to it. But it is regrettable that the Gram Sabha has been given so much power and importance without any insult. The Gram Sabha is not able to implement all these objects and reasons. If you look at the present situation in the villages you will find that there is growing difference and anguish among the villagers. The members of Gram Sabha are divided on every issue. There is growing difference and lethargy everywhere. Everything is seen from political angle. That is why the provision made under Article 243 of our Constitution and again the provision made in the 73rd amendment of our Constitution are not being properly implemented. This is because the persons who should have done the work are being involved in wrong things and disputes.

*Translation of the speech originally delivered in Oriya.

MR. CHAIRMAN : Shri Sahu, please sit down for a little while.

Hon. Members, the two hours’ time allotted for this discussion is finished. There are a lot of members who would like to participate in this debate. If you all agree, we could extend the time for the discussion by an hour.

SEVERAL HON. MEMBERS: We agree.

MR CHAIRMAN: Okay. The time for this discussion is extended by an hour.

SHRI ANADI SAHU : Madam Chairperson, I was telling you that the Gram Sabha is not able to perform its duty. The sitting of the Gram Sabha is required to be held once in a month. The implementation of schemes like Employment Assurance Programme, the Jawahar Rozgar Yojana, widow and old aged pension, the identification and rehabilitation of people below the poverty line, connectivity of roads, development of wasteland and maternity welfare centre are to be monitored by the Gram Sabha. Particularly the Gram Sabha should make sincere efforts in effective implementation of Employment Assurance Scheme on priority basis. The people in several villages are going to far off places as migrant workers. Why are they leaving their native villages? The Gram Sabha should think of such people and see to it that these people get job under the Employment Assurance Scheme and do not leave the village. But it is regrettable that the Gram Sabha is not able to do so. It is fully controlled by some people in power. The Panchayat Secretary and V.L.W. are mainly controlling the Gram Sabha. You will be surprised to know as to how the Gram Sabha is being terrorised by these powerful people. The Gram Sabha functions as per the desires of these people want. Going by the wishes of VLW and Panchayat Secretary it is losing it’s separate identity. Thus the Gram Sabha is cutting it’s tongue in its own hand. In this connection I would like to quote a line from Bhagavat, I quote the English rendering which reads-

"If you cut off your tongue yourself, how do you speak to others.
That is the thing which is happening in these Gram Sabhas."

The Gram Sabha is doing work at the behest of the VLW and Panchayat Secretary. It is not able to go by the listed items. There are three stages in which the Local Self Administration function. First of all at the lowest level it is Gram Sabha and then the Gram Panchayat, then block and after that it is Zila Parishad. The Member of Parliament and the Member of the Assembly do not have much say in the day to working of the local self administration. They can only comment on the Central allocation made under different centrally sponsored schemes like Indira Awas Yojna, Jawahar Rozgar Yojna and Food for Work, etc. There are some States who take interest on the implementation of centrally sponsoored schemes. These schemes are implemented effectively in those States only. In other states MPs will beat their breasts, shed tears or shout but nobody care for them. For example in Orissa these Gram Sabhas are not paying any attention to the implement of various programmes being implemented through them. There is clear demarcation on the basis on which these schemes are to be funded by the Centre and the States. The State has to bear 20% of the total allocation in some schemes and 25% in some other Centrally sponsored scheme. The Central Government bears 100% of the total fund in some other scheme. The State Government does not have to pay anything in those schemes. But all these schemes are being implemented by Gram Sabha.

Madam, there is corruption everywhere. Somewhere it is less and somewhere it is more. I say it is the lowest common factor (LCF). But there is wide spread corruption in Gram Sabha. For example the Gram Sabha’s sitting should be held every month. But it is not actually held on the plea that there was no quorum. In the next month quorum is not being insisted upon. If somebody shows the knife or lathi and terrorise the people nobody will attend the meeting next month. Then it was said that there was no quorum as only nine people as in the last month attended the meeting and with the same number of attendance in the next month the quorum strength is fulfilled. For allotment of houses under Indira Awas Yojana, the VLW, Gram Sabha and the village headman take Rs 1,000/- each. When the second instalment comes, the BDO and overseer who is designated as Junior Engineer now take Rs 2000/-. In the third and last instalment another Rs 2000/- is paid by the beneficiary to the persons involved in the allotment of houses from below to the top level. A sum of Rs 18,000/- was paid to the beneficiary for constructing houses under IAY which has been enhanced to Rs 20,000/- and subsequently to Rs 22,000/-. The beneficiary will not get house unless he pays bribes to the tune of Rs 3000/- to Rs 5000/-.

Madam, I have an Assembly constituency where 80% of the total population are Scheduled Tribes and Scheduled Castes. Out of them 70% are ST and 10% are SC. That is a Naxalite affected area. Since the Gram Sabha is not performing its work properly no development scheme is implemented there in a systematic manner. This leads to the rise of naxalism. Non-implementation of Centrally sponsored programmes and wide spread corruption are encouraging naxal activities in that Assembly constituency. Whether it is Bihar or southern Orissa the situation is the same. A few days ago I had visited that Assembly constituency. A group of people gheraoed me and directed me to follow them to an unknown place. I did not agree to go with them. Then they said that we will not leave me. I said, OK, do not leave me. I am ready to sit with you here. I sat with them. Then they took pity on me and allowed to go on some conditions. They said, ‘When you come here next time a particular road must be constructed and drinking water supply should be ensured to that village’. Otherwise, they threatened me with dire consequences by saying, ‘Unless you do this and come next time, you will not be able to go back, only your dead body will go’. They threatened me in this way. Why it is so? It is because no development work is being done in those rural areas by the local self administration and the persons who are to oversee ancallens..

Madam, take the case of drinking water. Now it has become a practice to entrust the work of the installation of tube wells to the NGOs. They installed the tube wells. Water started coming. But supply does not go on like this. After a period of six months it is seen that the tube wells became defunct. No water is lifted, air is lifted. Once the tube wells are installed the duty of the NGOs are over. Nobody is there to monitor their maintenance. If you approach the water supply department or the public health department they will say that they are not responsible for the repair of the tube wells as they have not installed them. A number of tube wells were installed in the State of Orissa under Danida projects. The NGOs have also now installed a number of tube wells. These tube wells are functioning for a maximum period of six, eight to nine months. The maintenance should have been ensured the Gram Sabha. But the persons involved in giving the tube well work to someone are not working with one mind and sincerity. Everybody is politically motivated. How then the work will be done. So time has come to think over the matter rather than boast of development through Gram Sabha. Let us look at the situation in the village. The duty of the Gram Sabha is to identify the poor people who are living below the poverty line. The norms are prescribed for identifying such people. But who cares for the norms. Unless bribe is given a name will not be included in the BPL list. The people who have loud voice are only able to get enlisted in the BPL and get work from the Gram Sabha. The same practice is prevailing in this House. Those who shout and speak in loud voice are getting more time to speak here. The persons who speak in loud voice get the people of their choice listed in BPL prepared by Gram Sabha.

Madam, I would like to say a word about kerosene. It is sold in black market. I appeal to all of you to decontrol kerosene if we want to stop the black marketing. Madam, Hon’ble Member Shri Yerran Naidu is not present here now. He represents my neighbouring constituency in Andhra Pradesh. He knows it very well how one third of kerosene coming to Andhra Pradesh and Orissa on subsidised rate is being sent to the inter-state check gate for mixing with diesel. The adulteration of kerosene with diesel is taking place in those areas on large scale. This adulterated diesel is being extensively used as fuel in the trucks. These days a kind of engine is used in motorcycles which runs on kerosene. The Government is giving kerosene on subsidy with a view to provide light in the villages which is directly going to the black market. The Gram Sabha, Gram Panchayat and a handful of officials are involved in this kind of activity. We are making plan and say grandiose things on how to uplift the poor people from below the poverty line. But Madam, nothing has been done in that direction. Dr Raghuvansh Prasad Singh has moved the resolution for participation of Gram Sabha in poverty alleviation programme. But his resolution will fail to achieve success. We are making plans and we are not planning to achieve the target. Due to lack of proper planning and sincerity in implementation all our schemes are not able to provide the desired result.

Madam, take the case of minor irrigation projects and drinking water supply. The watershed development projects are planned. How there will be water sheds when there is no sincere attempt to prevent the unabated felling of trees. There is large scale deforestation. How can the watershed development projects achieve success? A huge amount is being allocated to implement watershed development projects and social forestry projects. Similar is the case of water harvesting projects. All end in fiasco.

Water harvesting structure was implemented in Gujarat. I had been to Gujarat the other day. Thousands of crores of rupees were spent for the last 10 to 15 years but where is water? Had there been a water harvesting structure with the Rs 2,000 crore that were spent in Gujarat within the last 10 to 15 years, it would have been a green area. But there was nothing of the sort and the scarcity of water in Gujarat area is deplorated.

Madam, we are allocating fund to the Gram Sabha for implementing watershed development projects. This money will not be properly utilised and Gram Sabha will not be able to implement the watershed development projects as they are planned. I have already spoken on Indira Awas Yojna. Now I would like to speak on Employment Assurance Programme. Under the programme it is decided to provide job for 100 days to the agricultural workers. Farm activity is not done throughout the year. The agricultural workers remain busy at the time of transplantation, weeding out unwanted plants and at the time of harvest. After that they sit idle at home. It is during this period that jobs for 100 days are provided to the agricultural workers under the Employment Assurance Programme. There is a provision to maintain a list and a roster. As per the roster, the Employment Assurance Programme should be implemented. The Gram Sabha is not strictly going by the roster and the programme is not implemented in a systematic manner.

I was saying about migrant workers. When they do not get any scope of employment, there is exodus in search of jobs. These workers should be given employment. The Gram Sabha takes the benefit of their absence, puts thumb impression against their names shown in the list and take the money. This kind of malpractice is going on in the Gram Sabha. Therefore we have to be united and work unitedly if we have to implement these programmes and to achieve the target and ameliorate the conditions of the persons below poverty line.

Take the case of Maternity Welfare Centre. The pregnant women are supposed to be given Rs 500/- every month for a period of 3 months. How many pregnant women are getting this amount? I am citing an instance of Phulbani District which is of course not in my constituency. It is the constituency of Hon’ble Member Shri Padmanav Behera who is not present here at the moment. A few days ago I had been to a historical place called Lankagarh in his constituency. It is located in an inaccessible area where mostly tribals are living. I saw a number of pregnant women there and some of them were standing there with babies in arm. I asked whether they are getting Rs 500/- every month. They queried as to what is this Rs 500/-. They count money in unit of twenty.

They know only the units of twenties. They do not know hundreds. That is the poverty line of those people.

I had to explain them how much is Rs 500/- with Rs 20/- as a unit. They said that they are not getting anything. But there is a Maternity Welfare centre, Anganwadi Workers are there. But the amount released by the Government is not paid to the pregnant women. They said that nobody has come to pay them. On the other hand we are asking Gram Sabha to perform this work. There are Anganwadi workers who are supposed to look after the pregnant women. The expectant mothers to be given nutritious food and medicine. Their state of health should be enquired into and the needful was to be done. But no such work is being performed by either Anganbadi workers, the Maternity Welfare Centre or the Gram Sabha.

Madam, Dr Raghuvansh Prasad Singh is laying emphasis on allocation of funds. Very high sounding words are being uttered about giving power to Gram Sabha. It is said here that there was allocation of Rs 15000/- crores. But what is the use of making such huge allocation? What is going on in DRDA and Zila Parishad? When they meet to discuss various issues we find that they are only shouting at each other and exchanging blows. They are discussing everything from the political angle. They are not taking decision on the recommendation of Gram Panchayat. Every recommendation of Panchayat is altered there. They are only worried about their percentage. As I had said earlier, it is lowest common factor and on that basis share is divided.

How much percentage of money each elected representative will get is the main criterion and not how much benefit the poverty stricken people in the villages get.

Therefore we have to make a self assessment on the various rural development programme. We have to oversee the implementation of each programme. If the fund is really spent for the purpose it is allocated then the entire nation will become prosperous be it in road communication, agriculture or any other rural upliftment. But nothing is going to happen. We only cry in the wilderness. So after crying in the wilderness, I am concluding my speech.

श्री नवल किशोर राय (सीतामढ़ी) : सभापति महोदय, प्रस्तुत निजी संकल्प पर चर्चा में आपने मुझे बोलने के लिए समय दिया, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। मैं श्री रघुवंश प्रसाद सिंह जी को भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूं कि उन्होंने गांवों को मजबूत करने वाले संकल्प पर सदन में विचार करने का अवसर दिया।

ग्राम पंचायतों को मजबूत करने के लिए संविधान में ७३वां संशोधन किया गया था। उसी के आधार पर अधिकतर राज्यों में चुनाव हुए और पंचायती राज कागज पर कायम हुआ। जमीन पर जो सही ढंग से कार्य होना चाहिए था, वह कार्य नहीं हो पा रहा है। मुझ से पहले बोलने वाले वक्ताओं ने इस पर सहमति व्यक्त की है कि ग्राम सभा में जो सरपंच होता है, प्रधान होता है, मुखिया होता है, वह सभा को अपने रूप में परणित कर देता है। अपने लोगों को हिसाब लगाकर, प्रस्ताव बनाकर, जो योजनायें केन्द्र द्वारा भेजनी होती हैं, उन योजनाओं में अधिक से अधिक घाल-मेल करता है। यह संवेदनशील विषय है। ७३वें संविधान संशोधन से गांवों को शक्ति प्रदान की गई और इस शक्ति का मजबूतीकरण करने के लिए रघुवंश जी ने इस संकल्प पर विचार करने के लिए अवसर प्रदान किया है। सदन में ग्रामीण विकास और रोजगार मंत्रालय के राज्य मंत्री उपस्थित हैं। मैं कहना चाहता हूं कि इस संकल्प पर विचार करने की सीमा को बढ़ाया जाए और स्वयं मंत्री जी सभी पक्षों से बातचीत करके, सोच-समझकर, व्यावहारिक द्ृष्टिकोण वाला संकल्प सदन में प्रस्तुत करें।

इस देश में ग्राम सभा को जो ७३वें संविधान संशोधन विधेयक के अंतर्गत शक्ति दी है उसे अमलीजामा पहनाने का काम हो सके। वैसे तो कई राज्यों में चुनाव नहीं हुए। संकल्प पेश करने वाले डा. रघुवंश जी ने भी इस बारे में चर्चा की है। राज्य सरकार की ओर से बचाव पक्ष की भी वकालत उन्होंने इस सदन में बिहार के चुनाव के बारे में की है, मैं उनकी बात से सहमत नहीं हूं। मैं बिहार से आता हूं, वहां चुनाव २५ वर्षों से नहीं हुए। ग्राम सभा की धज्जी उड़ाई जा रही है। इस प्रकार अन्य जगहों पर भी चुनाव नहीं हुए होंगे, लेकिन उनमें बिहार अव्वल दर्जे पर है। वहां माननीय न्यायालय का बहाना बनाया जाता है। हमारे यहां जब शादी होती है तो उस समय दान-दहेज देते वक्त दोनों समधियों के बीच में वार्तालाप होती है। मैं उसका एक उद्धरण देना चाहता हूं। एक समधी दूसरे समधी से कहता है कि आप मुझे भैंस दो तो वह जवाब देता है कि भैंस दूंगा मगर भैंस कीचड़ लगी हुई है, इसलिए हम नहीं देना चाहते हैं। वही कहावत हमारे राज्य बिहार की है। बचाव पक्ष से इतना अच्छा संकल्प लाने वाले, इतना अच्छा निजी विधेयक लाकर देश का ध्यान ग्राम सभाओं की ओर खींचने वाले विद्वान रघुवंश जी, जब राज्य में जान-बूझ कर लोकतंत्र का गला घोंटा जाता है, न्यायालय के बहाने जो पुराने कानून हैं उनके हिसाब से चुनाव हो सकता है, चुनाव न कराने वाले का जब पक्ष लेते हैं, बचाव करते हैं, बचाव पक्ष की वकालत के रूप में अपनी बात रखते हैं तो वह उन्हें शोभा नहीं देता।

हम आपके माध्यम से अपील करेंगे कि जैसे बिहार में हिम्मत करके, प्रैस वक्तव्य देकर राज्य सरकार को सलाह देते हैं कि जल्दी चुनाव कराया जाए, वैसे ही इस फोरम पर भी कहें कि केन्द्र सरकार राज्य सरकार से बात करे। बिहार में लोकतंत्र व्यवस्था चरमरा गई है, बिलकुल बंद हो गई है। उसे खुलवा कर इसी वित्तीय वर्ष में चुनाव हो। हम चूंकि बिहार से आते हैं, इसलिए बिहार में जो ३० साल तक चुनाव नहीं हुए हैं उस ओर आपका ध्यान खींचना चाहते हैं। हमारे केन्द्रीय मंत्रीगण भी इस बात को काफी मजे में लेते हैं। हम उनसे भी कहेंगे कि इस देश के लोकतंत्र में, जो गांव का लोकतंत्र है वह आज मर रहा है। बिहार में बीमार पड़ गया है। आप भारत सरकार के मंत्री हैं और बिहार से चुन कर आए हैं, आपके ऊपर भी अंगुली उठती है। इसलिए आपको भी कड़ा रूख लेना चाहिए। भारत सरकार को इस कानून को और लोकतंत्र को बचाने के लिए कड़ा रूख लेकर बिहार में चुनाव कराने चाहिए, न कि उसे ठंडे बस्ते में रखना चाहिए। जहां चुनाव हो गए हैं वहां भी व्यावहारिक रूप से चुनाव के नतीजों के बाद, जो ग्राम सभा को काम करना है वह सही मायनो में नहीं होता है। ग्राम सभा, सरपंच सभा, मुखिया सभा और प्रधान सभा के रूप में व्यवहार में बन गया है। अपने लोगों को बुला कर हस्ताक्षर करवा कर, जाली दस्तखत करवा कर, न केवल एक-दो अंगूठे से, बल्कि हाथों और पांवों की अंगुलियों से निशान लगवा कर अलग-अलग तरह से प्रस्ताव बना कर धज्जियां उड़ाई जाती हैं। यह बड़ा संवेदनशील विषय है।

हम आपसे अनुरोध करेंगे कि जब ७३वां संविधान संशोधन हुआ था तो उसे ठीक से जमीन पर उतारने वाले लोगों में से राजीव गांधी जी के विचार को सहयोग देने वाले प्रमुख लोगों में आप भी थीं। इस समय संयोग से आप चेयर पर बैठी हैं। जो ग्राम सभा है, उसमें व्यवहार में सही लोकतंत्र नहीं आ पा रहा है। सब तरफ के माननीय सदस्यों ने अपनी-अपनी राय रखी है और मैं भी उस पर अपनी सहमति व्यक्त करता हूं कि सदन को इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए और सरकार को कोई रास्ता निकालना चाहिए। संयोग से यह वर्ष ग्राम सभा वर्ष है।

मेरा निवेदन है कि इस ग्राम सभा वर्ष में राज्य सरकार एक काम यह कर दे जिससे हर गांव में एक रोस्टर बन जाये कि इस दिन इस गांव में और इस दिन इस गांव में ग्राम सभा होगी। ऐसा हो जाये कि पांच तारीख, दो तारीख या एक तारीख को ग्राम सभा होगी। साथ ही साथ सूचना एवं जनसम्पर्क के माध्यम से चाहे लाउड-स्पीकर द्वारा, चिट्ठी द्वारा, सिनेमाघरों, अखबारों के विज्ञापनों या माइक या डुगडुगी पिटवाकर ब्लॉक के हर गांव में उस तारीख का प्रचार हो। जिससे हर व्यक्ति को पता चल जाए कि अमुक तारीख को बैठक होगी। इससे जो नहीं चाहते हैं वे भी आ जायें और जो चाहते वे भी आ जायें। इस ओर हम सरकार का ध्यान आपके माध्यम से खींचना चाहते हैं।

इस वित्तीय वर्ष को ग्राम सभा वर्ष के रूप में रखा गया है और यहां पर इतने वधिवेत्ता और विद्वान बैठे हैं। अगर हम सही मायने में ग्राम सभा को मजबूत करना चाहते हैं तो यहां बैठे सभी माननीय सदस्यों को बहुत सोचकर अपनी राय देनी चाहिए और सरकार को जमीन पर, आम आदमी तक उतारने का काम करना चाहिए। यही हम आपके माध्यम से सरकार के अर्ज करना चाहते हैं।

इस विधेयक के लिए, डॉ. रघुवंश प्रसाद जी के संकल्प पर चर्चा के लिए दो घंटे का समय निर्धारित है। मेरा कहना यह है कि भारत के ८० प्रतिशत लोग गांव में रहते हैं और इस चर्चा के लिए महज दो घंटे ही रखे गये हैं। मैं अर्ज करूंगा कि इस समय को बढ़ाया जाये और आने वाले शुक्रवार के दिन भी इसको चलाया जाये और इस पर गंभीर और गहन चर्चा करने के पश्चात निर्णय लिया जाए और सबको इस चर्चा में भाग लेने का मौका दिया जाये। जिससे इस पर अच्छा फैसला हो सके। इसलिए हम अर्ज करेंगे कि इस पर चर्चा के लिए कुछ समय और दिया जाए।

हम लोग बिहार राज्य से आते हैं और वहां पर कोई योजना इस बारे में किसी प्रकार की नहीं है। आज वहां पर स्थिति यह है कि अगर भारत सरकार की योजनाओं का पैसा वहां पर न जाए तो ब्लॉक में, अनुमंडल में और तहसील में लिखने के लिए कागज-पत्र तक नहीं मिलेंगे।

भारत सरकार की उस पैसे को खर्च करने की गाइड-लाइन्स हैं कि गांव को आधार बनाना है, ग्राम सभा को इकाई बनाना है और ग्राम सभा के फैसलों पर ही मोहर लगानी है। लेकिन हमारे यहां इसके ठीक विपरीत होता है। सुनिश्चित रोजगार योजना आज गांव की योजना नहीं रह गयी है वह तो कलक्टर योजना बनकर रह गयी है। बिहार में जो जवाहर ग्राम समृद्धि योजना है वह बीडीओ योजना बनकर रह गयी है। बीडीओ की पोस्िंटग राज्य सरकार के स्तर पर घूस लेकर की जाती है। वह एक रुपया लगाता है तो १४ रुपये ग्राम समृद्धि योजना से कमाता है और जमीन पर काम नहीं होता है। इसी तरह से वृद्धा पेंशन योजना है, सामाजिक सुरक्षा योजना है। राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा योजना में ७५ रुपये मासिक दिये जाते हैं । इंदिरा आवास योजना में गरीबों के लिए आवास बनाने की योजना है। लाल कार्ड से लक्षित सार्वजनिक प्रणाली के तहत २० किलो अनाज प्रतिमाह देने की योजना है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत आम लोगों को राशन देना है। इसके बाद जो बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं उनको सुनिश्चित रोजगार योजना के तहत गेहूं और चावल देने की योजना है। पढ़ने वाले बच्चे जो बीपीएल के अंदर आते हैं उनको एक रुपया प्रतदिन प्रोत्साहन छात्रवृत्ति देने की योजना है। गर्भवती माताओं के लिए पेंशन देने की योजना है, बाल-बालिका समृद्धि योजना है। ये सारी योजनाएं दिल्ली से, भारत सरकार से जाती हैं।

मैं समझ रहा हूं कि समय की सीमा है लेकिन विषय व्यापक है। इन सभी योजनाओं पर चर्चा चली तो भारत सरकार ने एक कमेटी बनाने का फैसला किया। उस कमेटी का नाम केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं की निगरानी और मॉनिटरिंग कमेटी थी । वह कमेटी कागज में बनाई गई। हम लोगों को सूचना दी गई लेकिन कहीं कोई समति काम नहीं कर रही है। ग्राम सभा ध्वस्त है। इस बारे में भारत की संसद में चिंता की जा सकती है। इस पर सम्यक रूप से चर्चा करके उसे ठीक करने की जरूरत है।

इन्दिरा आवास योजना में घपला है। आज सब कुछ महंगा हो गया है। इन्दिरा आवास में २० हजार रुपए से राशि बढ़ा कर ५० हजार रुपए की जाए।

सभापति महोदय : २० हजार रुपए भी नहीं मिल रहे हैं।

श्री नवल किशोर राय : राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना में ७५ रुपए दिए जा रहे हैं। उड़ीसा के एक माननीय सदस्य हिसाब बता रहे थे कि आधा किलो चावल खाने पर कितना खर्च करना पड़ता है? आज आप जिस असहाय व्यक्ति को ७५ रुपए देना चाहते हैं, उसे आखिर क्या संदेश देना चाहते हैं? उसे ७५ रुपए से बढ़ा कर १५० रुपए करने का काम करिए।

यह अगस्त का महीना है। हम बिहार के सीतामढ़ी इलाके से आते हैं। वहां बागमती का बांध टूट गया है। बेलसण्डु, रूनी - सैदपुर और बाजपट्टी तीन प्रखंड मुख्यालयों में पानी घुस गया है, सारी सड़कें ध्वस्त हो गई हैं। हम वहां जाने वाले हैं। हम इसके प्रति चिन्ता प्रकट करते हैं। वहां हर वर्ष बाढ़ आती है। लोग त्राहिमाम करते हैं। वहां की ग्राम सभा ध्वस्त है। यहां से जो राशि जाती है. वह जमीन तक पहुंच नहीं पाती। स्वर्गीय राजीव गांधी जी ने इसी सदन में कहा था कि यहां से यदि एक रुपया जाता है तो उसमें से १५ पैसे ही पहुंचते हैं। यही स्थिति आज भी है। ग्राम सभा को मजबूत करना जरूरी है। ११ अगस्त १९९८ को सीतामढ़ी में प्रदर्शन किया गया था। ब्लाक को घेरने के लिए गरीबों की ओर से ४० हजार लोग जुटे थे। वहां भी लाल कार्ड और इन्दिरा आवास योजना का सवाल था, गेंहू का सवाल था, वृद्धावस्था पेंशन का सवाल था। लोगों को गोली मार दी गई। स्वतंत्रता सेनानी राम चरित्र राय यादव जो चार बार एम.एल.ए. रह चुके हैं, डा. अयूब जो पंचायत समति के अध्यक्ष थे उनको और महंथ मंडल, मुनीफ नदाफ, रामपरी देवी को मौत के घाट उतार दिया गया। अब तक वह समस्या वहीं की वही हैं। ११ अगस्त आने वाला है। गांव का सवाल है। हम उन्हें स्मरण करते हैं। उनके शाहदत पर हम विनती करना चाहते हैं कि ग्राम सभा को मजबूत करने के लिए कठोर कदम उठाए जाएं और इन सभी योजनाओं को जमीन पर उतारने की कृपा की जाए। धन्यवाद।

सभापति महोदय: आप बहुत अच्छा बोल रहे थे, इसलिए मैंने आपको डिस्टर्ब नहीं किया ।

डा. लक्ष्मी नारायण पांडेय (मंदसौर) : सभापति महोदय, माननीय रघुवंश जी ने एक अच्छे संकल्प के जरिए सरकार का ध्यान आकर्षित किया है। सरकार की जो वभिन्न योजनाएं हैं, उनका लाभ गांवों के गरीबों तक पहुंच सके जिससे विषमता की खाई को पाटा जा सके। सरकारी दावों और आंकड़ों में कहा जाता है कि देश में गरीबी कम हुई है, क्षेत्रीय असंतुलन कम हुआ है लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ है। कुछ विशेष क्षेत्रों को इसका लाभ पहुंचा होगा लेकिन आज भी विषमता है, निर्धनता है और गांवों की जो स्थिति है, वह दयनीय है इस दयनीय स्थिति से उबरने के लिये इस सत्ता के विकेन्द्रीयकण के प्रश्न को लेकर हमने संविधान में संशोधन का प्रस्ताव स्वीकार किया और ७३वां एवं ७४वां संशोधन इस आशय से लेकर आये कि हमारे प्रशासन में विकेन्द्रीयकरण की व्यवस्था हो ताकि हम गांव तक अपनी बात पहुंचा सकें। यह बात ठीक है कि जिस पंचायती राज की स्थान स्थान पर व्यवस्था बनी, जिस प्रकार से राज्य सरकारों ने पंचायती राज को अंगीकार किया, उससे कुछ लाभ पहुंचा। लेकिन आज भी उस में कुछ खामियां हैं, गड़बड़ियां हैं, उसमें इतनी विसंगतियां हैं, इतनी विकृतियां हैं जिनका निराकरण करना आवश्यक है। स्वयं प्रस्तावक महोदय ने इस बात को स्वीकार किया है कि सामान्य जनता तक जो सुविधायें जानी चाहिये, वे नहीं पहुंच पाती हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के द्वारा जनता को जो मिलना होता है, वह नहीं मिल पाता है। इसलिये ग्रामसभा को उसका माध्यम बनाना चाहिये. मैं इस प्रस्ताव से सहमत होते हुये भी निवेदन करना चाहता हूं कि जिन बातों का यहां उल्लेख किया गया है और गांवों की जो स्थिति है, यह सब अशिक्षा के कारण हो रहा है। जिस प्रकार से ग्रामसभा का आयोजन होता है, या तो होता नहीं और यदि होता भी है तो एक पक्षीय होता है। ऐसे में उन गांवों के व्यक्ति इक्ट्ठे होते हैं, उनके हस्ताक्षर करवा लिये जाते हैं। उन्हें ग्रामसभा या ग्राम पंचायतों में अंगीकार नहीं किया जाता है । इस तरह से सारी व्यवस्थायें जो अच्छी प्रजातंत्र की व्यवस्था बनाना चाहते हैं, उनके अंदर कई खामियां रह जाती हैं। इसलिये आवश्यक है कि हम ऐसी पारदर्शी व्यवस्था कायम करें।

सभापति महोदय, हम लोगों ने वर्ष १९९९-२००० ग्रामसभा वर्ष अंगीकार किया था । प्रस्तावक महोदय जानते है कि हमने स्थान स्थान पर अनेक राज्यों के अंदर उक्त वर्ष के संदर्भ में ये सभायें कराई हैं। बिहार के बारे में नहीं जानता कि वहां हुआ या नहीं? लेकिन हमारे राज्य में ग्रामो में ऐसे कई कार्यक्रम आयोजित किये गये हैं। मंत्रीगण पहुंचे, लोगो से सम्पर्क किया और कठिनाइयां पूछीं। अब समय पर पंचायतें लगती हैं या नहीं, वहां कोई सचिव है या नहीं, ये बातें मंत्रीगण पूछकर चले गये लेकिन उसके बाद उसका निराकरण हुआ या नहीं, पता नहीं? केवल ग्रामसभा वर्ष मनाने से काम नहीं चलेगा। लोगों की कुछ शिकायतें जाकर सुन लें , केवल इससे काम चलने वाला नहीं है। जब तक उनकी समस्या का निराकरण नहीं होगा तब तक कोई काम नहीं बनता।

सभापति महोदय, कुछ दिन पहले ग्रामीण विकास मंत्री ने स्वयं स्वीकार किया कि पत्रकारों का एक सम्मलेन हुआ जिसकी रिपोर्टिंग भी हुई है। उसमें कहा था कि गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम होने के बावजूद गरीबी बढ़ी है। यह मेरी उक्ति नहीं, अपनी सरकार की उक्ति है। फिर सरकार गरीबी हटाने की द्ृष्टि से काफी प्रयास कर रही है। सरकार वभिन्न प्रकार की योजनाओं में धनराशि खर्च कर रही है। मैं कई स्थानों पर स्वयं गया हूं। एक स्थान पर मुझे यह बताया गया है कि एक तालाब का निर्माण करवाया गया। जब मैं देखने गया तो पत्रकारों की पूरी टीम मेरे साथ थी। वहां एक गड्ढा बना हुआ था, कोई तालाब नहीं था। यदि ऐसे कार्यक्रम होते हैं तो गरीब हमेशा गरीब ही रहेगा और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम केवल दिखावा मात्र रह जायेगा। इसके अंदर पारदर्शिता होनी चाहिये। ये बातें सदन में बार बार कही जाती हैं लेकिन इन सब के लिये मानिटरिंग की व्यवस्था होनी चाहिये।

सभापति महोदय, हम जवाहर रोजगार योजना के लिये पैसा देते हैं जिसे सरपंच खर्च करता है लेकिन उसका ऑडिटिंग करने का कोई सिस्टम नहीं है। चाहे जैसे अपनी मर्जी से खर्च कर ले। इसके लिये कोई व्यवस्था बननी चाहिये ताकि उसमें पारदर्शिता रहे। इस सब के लिये किसकी जवाबदेही है? इसी तरह से इन्दिरा विकास योजना के लिये पैसा जाता है, स्व-रोजगार योजना के लिये पैसा जाता है। इसके अलावा कई ऐसी योजनाएँ भी हैं जिनके अंदर निश्चित रोजगार देते हैं तो उसके लिये केन्द्र सरकार की तरफ से ७० प्रतिशत पैसा दिया जाता है। जे.आर.वाई. के लिये ७५ प्रतिशत, इन्दिरा आवास योजना के लिये ७५ प्रतिशत केन्द्र सरकार से पैसा जाता है। राज्य सरकारे उसमें कुछ अंश अपना मिलाती हैं। कभी कभी तो राज्य सरकार वह अंश भी नहीं मिलाती है। इस कारण से केन्द्र सरकार से जाने वाला पैसा वहां नहीं पहुंच पाता है। फलत: गरीब आदमी लाभान्वित नहीं हो पाता है।

 

18.00 hrs. दूसरी तरफ इस बात की जानकारी मिली है कि राज्य सरकारों को जो पैसा जाता है, राज्य सरकारें वह पूरा पैसा खर्च नहीं कर पाती हैं। अगर हम पिछले आंकड़ों को देखें तो केन्द्र सरकार ने जो गरीबी उन्मूलन के लिए, वभिन्न योजनाओं के लिए जो पैसा बजट में आबंटित किया था, उस बजट का लगभग ७० प्रतिशत पैसा ही खर्च हुआ, ३० प्रतिशत पैसा खर्च नहीं हो सका। चूंकि राज्य सरकार उस प्रकार की योजना ही नहीं बना सकीं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम इस प्रकार की कोई व्यवस्था दें, इस प्रकार की कोई निश्चित रूपरेखा या कार्यक्रम तैयार करें जिससे कि वभिन्न योजनाओं में जो हमारा पैसा जाता है, वह ठीक समय पर जाए, ठीक से खर्च हो और उसकी मानीटरिंग की व्यवस्था भी ठीक से होनी चाहिए। कई बार कुछ कार्यों के लिए यहां पर कहा जाता है कि इनमें सांसदों की भागीदारी होनी चाहिए, कभी कहा जाता है कि इसमें विधायकों की भागीदारी होनी चाहिए, यह ठीक है। लेकिन सांसदों और विधायकों की भागीदारी होने के बाद भी आज जो हमारा प्रेजेन्ट सिस्टम है, जो वर्तमान प्रशासन व्यवस्था है, उस व्यवस्था के अंदर न तो सासंद ही मौनीटरिंग के लिये समर्थ हो सकता है और न विधायक हो सकता है। कही न कहीं हमें उस प्रशासकीय व्यवस्था के ऊपर निर्भर रहना पड़ेगा। इसलिए मैं निवेदन करना चाहूंगा कि इसके बारे में अगर हम ठीक से नीति अपनाये, ठीक से कार्यक्रम बनायें तो निश्चित रूप से इसका लाभ हो सकता है। इस प्रस्ताव में ग्राम सभा को अधिक सक्षम बनाने की बात कही गई है। मैं मानता हूं कि ग्राम सभाओं को अधिक सक्षम बनाना चाहिए। इसलिए कुछ राज्यों ने यह प्रयोग किया था और ग्राम सभाओं को सक्षम बनाने की द्ृष्टि से नीचे स्तर पर ग्रामीण सचिवालयों की स्थापना की थी।

सभापति महोदय : पांडेय जी, छ: बज गये हैं, आप नैक्स्ट टाइम कांटीन्यू कीजिए।

अब सभा सोमवार ११.०० बजे पुन : समवेत होने के लिये स्थगित होती है ।

18.01 hours The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock on Monday, August 7, 2000/Sravana 16, 1922 (Saka).

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