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Lok Sabha Debates

Need To Inter-Link Rivers In The Country. on 3 May, 2016

Sixteenth Loksabha an> Title:    Need to inter-link rivers in the country.

 

कर्नल सोनाराम चौधरी (बाड़मेर) ः ""बढ़ती जनसंख्या घटता पानी"" देश ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए चिन्ता का विषय बना हुआ है। जो सही भी है। नास्त्रदेम की घोषणा के अनुसार तीसरा विश्वयुद्ध पानी पर होगा। जिस समय से ये घोषणा की गई थी, लोगों का मानना था कि यह कैसे संभव है? लेकिन हालत तो यही बयां कर रहे हैं। हमारे देश के 91 जल भण्डारों में सिर्फ 22 प्रतिशत पानी रहा है। देश में झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, तेलंगाना कई अन्य राज्यों में लगातार सूखा पड़ा है। पीने के पानी का संकट उत्पन्न हो गया है। इधर जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश एवं पूर्वांचल प्रदेशों में बाढ़ ने भीषण तबाही मचा रखी है। इधर सूखा-उधर बाढ़। यह हालत है। यदि देश की मुख्य एवं प्रदेश की मुख्य नदियों को आपस में जोड़ दिया जाता है तो कुदरती पानी को विनाश से विकास की दिशा में मोड़ा जा सकता है। भीषण तबाही मचाने वाली नदियों को इन पर बांध बनाकर अन्य सूखी नदियों में पानी को डाला जाता है तो उसे पीने के लिए ही नहीं बल्कि खेती के लिए भी उपयोग में लिया जा सकेगा। उससे उत्पादन एवं रोज़गार दोनों मिलेंगे। इतिहास गवाह है कि सृष्टि निर्माण से सभी सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित एवं फलीभूत हुई हैं। यदि युद्ध का इतिहास देखें तो युद्ध में सबसे पहले वाटर पाइंट पर ही कब्जा किया जाता है। इस दिशा में देश में आज़ादी से पूर्व भी विचार प्रारंभ किया गया था। ब्रिटिश इंडिया सरकार में बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर, लॉर्ड लिनलिथगो तथा लॉर्ड वेवल के समय श्रम सदस्य थे। उन्होंने नदियों को जोड़ने से संबंधित कार्य के लिए विश्व की पुस्तकों का अध्ययन कर टेनिसी वेली ऑथोरिटी की तरह नदी घाटी योजना बनाई और अमेरिका की नदियों के बांधों के विशेषज्ञ बुरूडीन की सेवाएं ली। 8 जनवरी, 1945 को इसी दिशा में कृषि भूमि की सिंचाई एवं मरू प्रदेश के वासियों की प्यास बुझाने के लिए भाखड़ा बांध परियोजना बनाई एवं राजस्थान नहर जो मरू गंगा एवं इंदिरा गांधी नहर के नाम से जानी जाती है, उसे मूर्तरूप दिया गया। एक लम्बे अन्तराल के बाद हमारे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी ने नदियों को जोड़ने की योजना बनाई। लेकिन अभी तक योजना को मूर्तरूप देने के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाए गए हैं। मेरा निवेदन यह है कः-

1.       जो पानी प्रबंधन के अभाव में बहकर समुद्र में जा रहा है, उसको रोक कर नदियों या झीलों में संग्रहित किया जाए।

2.       जैसे यमुना में नरोडा के आस-पास का पानी बहकर समुद्र में जा रहा है, उसको रोक कर मरू प्रदेश के जिले अलवर/भरतपुर से होते हुए जोधपुर-बाड़मेर तक एवं झुंझनु, सीकर, चुरू एवं नागौर को खुशहाल किया जा सकता है।

3.       सरस्वती जैसी पौराणिक नदी जो राजस्थान से होकर अरब सागर में जाती है, उसको पुनर्जीवित किया जाए। जिससे यमुना, कुरुक्षेत्र, यमुना सागर के आस-पास से सिरसा, नोहर, भादरा, सरदारशहर, डूंगरगढ़, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, जालौर से बहता कच्छ की खाड़ी में पहुंचने वाले हिमालय के शुद्ध पानी को त्रस्त लोगों तक पहुंचाने की योजना बनाई जाए।

          यदि सम्पूर्ण देश की नदियों को आपस में जोड़ा जाता है तो वह दिन दूर नहीं जब भारत पुनः ""सोने की चिड़िया"" कहलायेगा। जरूरत है महज दृढ-इच्छाशव्ति की।