State Consumer Disputes Redressal Commission
Sunita Devi vs L I C on 6 December, 2024
Cause Title/Judgement-Entry STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010 First Appeal No. A/2012/2481 ( Date of Filing : 30 Oct 2012 ) (Arisen out of Order Dated in Case No. of District State Commission) 1. Sunita Devi Gram Revson Post Saiyad Raja Pargana Narvan Chandauli ...........Appellant(s) Versus 1. L I C Mugal Sarai Chandauli ...........Respondent(s) BEFORE: HON'BLE MR. SUSHIL KUMAR PRESIDING MEMBER HON'BLE MRS. SUDHA UPADHYAY MEMBER PRESENT: Dated : 06 Dec 2024 Final Order / Judgement (मौखिक) राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ अपील संख्या-2481/2012 श्रीमती सुनीता देवी पत्नी स्व0 प्रेम शंकर गुप्ता बनाम शाखा प्रबंधक, भारतीय जीवन बीमा निगम तथा दो अन्य समक्ष:- 1.
माननीय श्री सुशील कुमार, सदस्य।
2. माननीय श्रीमती सुधा उपाध्याय, सदस्य।
दिनांक: 06.12.2024 माननीय श्री सुशील कुमार , सदस्य द्वारा उदघोषित निर्णय
1. परिवाद सं0-57/2008, श्रीमती सुनीता देवी बनाम शाखा प्रबंधक, भारतीय जीवन बीमा निगम तथा दो अन्य में विद्वान जिला आयोग, चन्दौली द्वारा पारित निर्णय/आदेश दिनांक 28.9.2012 के विरूद्ध प्रस्तुत की गई अपील पर अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता श्री ए.के. मिश्रा तथा प्रत्यर्थीगण के विद्वान अधिवक्ता श्री संजय जायसवाल को सुना गया तथा प्रश्नगत निर्णय/पत्रावली का अवलोकन किया गया।
2. विद्वान जिला आयोग ने परिवाद इस आधार पर खारिज किया है कि बीमा प्रस्ताव भरने से पूर्व बीमाधारक की रीढ़ की हड्डी टूटी हुई थी, उसका इलाज कराया जा रहा था, परन्तु इस तथ्य को छिपाते हुए बीमा पालिसी प्राप्त की गई।
3. बीमा निगम द्वारा परिवादिनी के पति प्रेम शंकर गुप्ता के पक्ष में बीमा पालिसी जारी करना स्वीकार किया गया, परन्तु यह अभिवाक लिया गया कि बीमा प्रस्ताव दिनांक 31.3.2003 को भरा गया और बीमाधारक की मृत्यु दिनांक 20.12.2005 को हुई है, इसलिए जांच की गई और जांच में यह पाया गया कि रीढ़ की हड्डी की बीमारी को छिपाकर बीमा पालिसी प्राप्त की गई।
4. अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता ने नजीर, Life Insurance -2- Corporation of India vs. Narinder Kaur Batra and others 2004 (3) TAC 943 प्रस्तुत की है, जिसमें यह व्यवस्था दी गई है कि कान्ट्रैक्ट दो वर्ष के अंदर ही नकारा जा सकता है। प्रस्तुत केस में बीमाधारक की मृत्यु दो वर्ष के पश्चात हुई है, इसलिए दो वर्ष की अवधि के पश्चात किसी प्रकार की जांच कराना और उसके आधार पर बीमा क्लेम नकारने का कोई अवसर प्राप्त नहीं था।
5. उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्ता की बहस सुनने के पश्चात यह तथ्य प्रकट हुआ कि Ombudsman द्वारा अंकन 50,000/-रू0 Ex Gratia परिवादिनी को देने का आदेश पारित किया गया है, जबकि पालिसी अंकन 1,25,000/-रू0 के लिए प्राप्त की गई है। अत: प्रस्तुत केस में अंकन 1,25,000/-रू0 के लिए ही बीमा क्लेम अदा करने का आदेश पारित किया जाना चाहिए था।
6. बीमा निगम की ओर से नजीर, Life Insurance Corporation of India & Ors vs. Nita Bhardwaj I (2014) CPJ 409 (NC) तथा नजीर, Life Insurance Corporation of India vs. Kanchan Devi and ors IV (2013) CPJ 197 (NC) प्रस्तुत की गई है, परन्तु चूंकि प्रस्तुत केस में बीमाधारक की मृत्यु बीमा पालिसी लेने के दो वर्ष पश्चात हुई है, इसलिए बीमा निगम को जांच करने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं था, बल्कि क्लेम अदा किया जाना चाहिए था, इसलिए इन नजीरों का कोई प्रभाव अपीलार्थी के विरूद्ध नहीं है। तदनुसार प्रस्तुत अपील स्वीकार होने योग्य है।
आदेश
7. प्रस्तुत अपील स्वीकार की जाती है। विद्वान जिला आयोग द्वारा पारित निर्णय/आदेश अपास्त किया जाता है तथा परिवाद इस प्रकार स्वीकार किया जाता है कि परिवादिनी को सम्पूर्ण बीमित राशि अंकन -3- 1,25,000/-रू0 देय होगी, परन्तु पूर्व में भुगतान की गई राशि अंकन 50,000/-रू0 समायोजित की जाएगी तथा अवशेष राशि, परिवाद प्रस्तुत करने की तिथि से भुगतान की तिथि तक 06 प्रतिशत प्रतिवर्ष साधारण ब्याज के साथ अदा की जाए।
आशुलिपिक से अपेक्षा की जाती है कि वह इस निर्णय/आदेश को आयोग की वेबसाइट पर नियमानुसार यथाशीघ्र अपलोड कर दे।
(सुधा उपाध्याय) (सुशील कुमार) सदस्य सदस्य लक्ष्मन, आशु0, कोर्ट-2 [HON'BLE MR. SUSHIL KUMAR] PRESIDING MEMBER [HON'BLE MRS. SUDHA UPADHYAY] MEMBER