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Lok Sabha Debates

Further Discussion On The Motion For Consideration Of The Compulsory Voting ... on 26 July, 2019

Seventeenth Loksabha an> Title: Further discussion on the motion for consideration of the  Compulsory Voting Bill, 2019 moved by Shri Janardan Singh 'Sigriwal' on 12 July, 2019 (Discussion not concluded).

HON. CHAIRPERSON: Now, Bills for consideration and passing.

           Item No. 78 – Further discussion of the following motion:

“That the Bill to provide for compulsory voting by the electorate in the country and for matters connected therewith, be taken into consideration.”          It has already been moved by Shri Janardan Singh Sigriwal on 12 July, 2019. Now, Shri Jagdambika Pal to continue the discussion. 
श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): माननीय सभापति जी, मैं जनार्दन सिंह सीग्रीवाल द्वारा प्रस्तुत प्राइवेट मैम्बर बिल, जो देश के सभी मतदाताओं को अनिवार्य रूप से कम्पलसरी वोटिंग के प्रोवीजन से संबंधित है, के समर्थन में बोल रहा हूं । देश में कई वर्षों से आम मतदाताओं की बात पर लगातार एकेडेमिक डिबेट चल रही है कि कम्पलसरी वोटिंग हो । इस बात के लिए पूरे देश में लगातार इसकी चर्चा होती रही है । यह सदन भी इस बात का गवाह है कि  17वीं लोक सभा के पहले सत्र में ही इस महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा शुरू हुई । 16वीं और 15वीं लोक सभा में भी इस पर चर्चा हुई ।
16.37 hrs                       (Shri Bhartruhari Mahtab in the Chair) इस विषय पर समय-समय पर माननीय सदस्यों द्वारा चर्चा हो चुकी है । आज कम्पलसरी वोटिंग की बात क्यों हो रही है? कम्पलसरी वोटिंग की बात इसलिए हो रही है कि in a democracy, the Government can only be ‘of the people, by the people, for the people’. इस देश की डेमोक्रेसी में प्रजातांत्रिक प्रणाली से चुनाव होता है, सरकार चुनी जाती है जो जनता के लिए होती है, जनता के द्वारा होती है और जनता के हितों की रक्षा के लिए होती है । ऐसा तभी होगा जब कम्पलसरी वोटिंग से सभी लोगों का पोलिटिकल पार्टिसिपेशन हो, सबकी हिस्सेदारी हो । पार्लियामेंटरी डेमोक्रेसी के चुनाव में, जैसे मसल पावर, मनी पावर, कास्ट पोलिटिक्स या रीजन की पोलिटिक्स आदि के बारे में चर्चा होती है, शायद इसका भी समाधान यही है कि अधिक से अधिक या शतप्रतिशत मतदान हो ।

इस बार लोक सभा में अगर अधिक मतदान हुआ है और इसी का नतीजा है कि 2019 के चुनाव में इस बार का टर्नआउट 67.11 परसेंट है, लेकिन इसके बावजूद 29 करोड़ लोगों ने वोट नहीं डाला, जो अन्य देशों की आबादी से भी अधिक है । अब भी 108 देश ऐसे हैं जिनकी वोटिंग परसेंटेज हमसे ज्यादा है । आखिर हम इस दिशा में क्यों नहीं बढ़ सकते हैं?  दुनिया के 22 राष्ट्र कम्पलसरी वोटिंग की तरफ जा चुके हैं और 11 महत्वपूर्ण देश जैसे बेल्जियम, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, सिंगापुर ने सफलतापूर्वक कम्पलसरी वोटिंग का कानून बनाया है ।

बेल्जियम में सबसे पुराना कम्प्लसरी वोटिंग का सिस्टम है, जिसका प्रोविजन वर्ष 1893 से चला आ रहा है । मैं समझता हूं कि आज यहां भी आवश्यकता हो गयी है । हम सबको, इस सदन को और सरकार को इसके लिए विचार करना चाहिए । जब प्रधान मंत्री जी पूरे देश में चुनाव के लिए निकले होंगे तो जहां एक तरफ नए भारत के निर्माण की बात कही होगी, एक बार वोटिंग की बात कही होगी या अपने दल की बात कही होगी तो चुनाव आयोग ने भी लगतार पूरे देश में जागरूकता पैदा करने का प्रयास किया होगा कि अधिक से अधिक मतदान हो, शत-प्रतिशत मतदान हो । शायद पहली बार किसी देश के पोलिटिकल लीडर या श्री नरेन्द्र मोदी जी ने पूरे देश के मतदाताओं से अपनी हर सभाओं में अपील की थी कि अधिक से अधिक मतदान करें । इसके पीछे कारण क्या है? मैं समझता हूं इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कारण होगा । अगर गांधी जी के उस कोट को याद करें-“Rights cannot exist without duty”. आज रोज देश की जनता इस बात की मांग करती है कि हमारे अधिकारों की रक्षा हो । उस अधिकार के लिए जब तक हम अपने कर्तव्य का पालन नहीं करेंगे तब तक यह कल्पना कैसे साकार होगी । भारत की लोक सभा गेट नं. 1 पर, आप तो तीस वर्षों से आ रहे हैं, उस पर अरबी में लिखा है-

“इन्नलाही ला युगय्यरो मा बिकीमिन्  ।

हत्ता युगय्यरो व बिन नफसे हुम ॥”  इसका अर्थ है कि “Almighty God will not change the condition of any people until they bring about a change themselves”.आज हमारी लोक सभा के गेट नं.1 पर जो कार्विंग है, वह यहां आने वाले हम सभी सांसदों और पूरे देश के लिए एक संदेश है  । आज खुशी की बात है कि हमारी पार्टी के लिए 17 राज्यों में 51 प्रतिशत से अधिक मतदान हुए हैं । यह हेल्दी डेमोक्रेसी और पार्लियामेंटरी डेमोक्रेसी को और स्ट्रेंगथन करता है । इस संदर्भ में एक बात रूसों की भी कही जा सकती है-“Men can be forced to be free”. जब कोई किसी चौराहे के रेड लाइट पर गाड़ी रोकता है, तो यह नहीं कह सकता कि हमारी फ्रीडम इन्फ्रिंज हो रही या हमें रेड लाइट कह के रोक दिया गया । अगर मतदान के लिए कम्प्लसरी किया जाए तो इससे फ्रीडम  इन्फ्रिंज नहीं होगा कि मैं वोट डालूं कि न डालूं । आज तो चुनाव में नोटा का प्रावधान है । आप वोटिंग करने जरूर   जाएं  । अगर आप किसी को वोट नहीं देना चाहते हैं तो उसमें नोटा का भी प्रावधान है । जॉन एफ.कैनेडी ने भी कहा था-“Ask not what your country can do for you, but what you can do for your country”. इसका मतलब है कि देश आपके लिए क्या कर रहा है, आपका जो दायित्व और कर्तव्य है, आप उसके लिए क्या कर रहे हैं? ड्यूटी के बारे में ए.पी.जे.अब्दुल कलाम साहब ने भी कहा था- “Where there is righteousness in the heart, there is duty in the character; where there is duty in the character, there is harmony in the whole; where there is harmony in the whole, there is order in the nation; and where there is order in the nation, there is peace in the world”. अगर हम अपने दायित्व का निर्वहन या अपने कर्तव्य का पालन करते हैं तो निश्चित तौर से समाज शांति, सुख, समृद्धि की ओर अग्रसर होता है । जब मैं कम्प्लसरी वोटिंग के समर्थन में कहता हूं तो चाहे गांधी जी, ए.पी.जे.अब्दुल कलाम साहब, रूसो, जॉन एफ. कैनेडी हों या अरबी में लोक सभा गेट पर लिखा हो, मुझे लगता है कि हमारे संविधान निर्माताओं का भी सपना था कि पार्लियामेंटरी डेमोक्रसी में जो गवर्नमेंट बने वह किसी एक वर्ग, सेक्शन या किसी रीजन का प्रतिनिधित्व न करे । 

वह देश के हर नागरिक द्वारा चुनी हुई सरकार हो, तो सरकार की तरफ से वह काम तभी हो सकता है, जब सभी लोगों का पार्टिसिपेशन हो । भारत के संविधान में अनुच्छेद 326 गारन्टी प्रदान करता है कि “Right to vote to every citizen above the age of 18” जो 18 साल से ज्यादा उम्र के लोग हैं, अगर उन्हें भारत का संविधान इस बात की गारंटी देता है कि उनको वोटिंग का अधिकार है तो ठीक है । उस समय के संविधान निर्माताओं ने इसे अनिवार्य इसलिए नही किया होगा, क्योंकि हमारे देश की स्वतंत्रता के बाद कुछ प्रैक्टिकल डिफिकल्टीज रही होंगी । अनुच्छेद 326 का सेंस यह है कि देश में जो भी व्यक्ति18 वर्ष का हो जाए, उसे भारत का नागरिक होने का अधिकार हो, उसे नौकरी का अधिकार हो, वोटिंग का अधिकार हो, यह अपेक्षा हमारे संविधान निर्माताओं ने की थी । चाहे नवयुवक हो या नवयुवती हो उन सभी लोगों को चुनाव प्रक्रिया में मतदान करने का अधिकार होगा और सभी लोगों का शत-प्रतिशत मतदान होगा । आप रिप्रेजंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट 1951 के सेक्शन 62 में देखें तो उसमें भी यही है कि “state that every person who is in the Electoral Roll of the constituency will be entitled to vote” जो मतदाता सूची में होगा, उसको निश्चित तौर पर वोट देने का अधिकार होगा । चाहे चुनाव आयोग हो, सरकार हो, प्रधान मंत्री जी हो या तमाम समाज की मीडिया हो, इलेक्टोरल चैनल हो सभी लोगों ने एक अभियान चलाया और बड़े पैमाने पर पूरे देश में इस बात के लिए प्रयास किया कि मतदान के लिए एक अभियान चलाया जाए, जिससे सभी लोगों का इलैक्ट्रॉल कॉलेज में नाम दर्ज हो सके । यह बात कही जाएगी कि दिनेश गोस्वामी कमेटी 1990 में जो अनिवार्य वोटिंग पर संस्तुतियां थी, वह नहीं दीं । लेकिन मैं समझता हूं कि अगर आजहम अनिवार्य वोटिंग मांग रहे हैं या लोगों को एक अनिवार्य रूप से मतदान करने के अधिकार की बात कर रहे हैं तो इसके पीछे यही कारण है । मैं समझता हूं कि चुनाव में आप और हम सभी चुनकर आते हैं । जब सबसे ज्यादा 100 प्रतिशत वोटिंग होने लगेगी तो जो भी पार्टियां कास्ट के आधार पर राजनीति कर रही है । जातियों के आधार पर किस तरह के नारे दिए जाते हैं, ऐसे ऐसे नारे दिए जाते है ‘तिलक, तराजू और तलवार इनको मारे जूते चार’ इस तरह के नारों के आधार पर भी चुनाव लड़े जाते हों, तो क्या यह किसी सभ्य पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी की बात है । इस तरह के नारे समाज में वैमनस्यता पैदा करते है या लोगों के बीच में एक खाई पैदा करते है । मुझे लगता है कि इसका भी निश्चित तौर पर उत्तर यही है कि आज अगर शत-प्रतिशत लोगों को अनिवार्य वोटिंग का अधिकार होगा तो आने वाले दिनों में कास्ट की पॉलिटिक्स खत्म हो जाएगी । जब बड़े पैमाने पर शत-प्रतिशत मतदान होगा, तो स्वाभाविक रूप से आप किसी मतदाता को प्रलोभन नहीं दे सकते हैं । आप एक सेक्शन में कुछ लोगों को मनी पावर से या मसल पावर से प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन अनिवार्य वोटिंग के बाद जब देश का हर मतदाता वोट देगा तो निश्चित तौर से आने वाले दिनों में लोकप्रियता के आधार पर देश के हित में जागरूकता आएगी । जो मजबूत आधार बनेगा वह भी अनिवार्य वोटिंग से ही बनेगा । नीति आयोग एक महत्वपूर्ण संस्था है, जिसके सी.ई.ओ. श्री अमिताभ कांत है ।

उन्होंने भी यह बात कही है कि आज जो वोटिंग पैटर्न होता है, इलेक्शन्स में देखा जाता है, देश की राजधानी दिल्ली और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के साथ ही, जो लोग गांवों में रहते हैं, पिछड़े क्षेत्रों में रहते हैं, कहा जात है कि उन लोगों मे उतनी अवेयरनेस नहीं है । लेकिन आज भी देश की सरकार बनाने में सबसे ज्यादा भागीदारी उनकी होती है जो सुदूर गांवों में, खेत-खलिहानों में बैठे हुए लोग हैं, किसान हैं, नौजवान हैं, मजदूर हैं, वहां खेतों में काम करती हुई महिलाएं हैं । कश्मीर से कन्याकुमारी तक के हमारे वे मतदाता आज देश के मुस्तकबिल को, भाग्य और भविष्य को निर्धारित करने में, पर्व और त्योहार के तरीके से एक हिस्सेदारी करते हैं । …(व्यवधान) आपके निर्देश का पालन करूंगा । …(व्यवधान) मुंबई में 52 प्रतिशत वोटिंग हुई । …(व्यवधान)

माननीय सभापति: श्री जगदम्बिका पाल जी, आप 20 मिनट बोल चुके हैं । इस बिल के लिए दो घण्टे का समय दिया गया था । मैं सिर्फ आपको बताना चाहता हूं ।

श्री जगदम्बिका पाल (डुमरियागंज): सर, मैं जल्दी खत्म कर दूंगा ।

विधि और न्याय मंत्री, संचार मंत्री तथा इलेक्ट्रोनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री (श्री रवि शंकर प्रसाद): सभापति जी, क्या मुझे इसका उत्तर आज ही देना पड़ेगा?

माननीय सभापति: अगर सेंस ऑफ द हाउस होगा कि इसके लिए टाइम और बढ़ाया जाए तो कर सकते हैं । मंत्री जी को राजीव प्रताप रूडी जी का भाषण भी सुनना है ।

श्री जगदम्बिका पाल : सर, मैं जल्दी ही अपनी बात खत्म कर दूंगा ।

          इसलिए, मैं समझता हूं कि इसके कारण क्या हैं, कम्पलसरी वोटिंग क्यों हो? आखिर सबसे पुरानी डेमोक्रेसी कहां से शुरू हुई? एथेंस से शुरू हुई, जिसे आज फाउंटेन हेड ऑफ आल डेमोक्रेसीज माना जाता है । मैं बहुत विस्तार से उन बातों को नहीं कहूंगा । एरिस्टॉटल ने भी कहा   था:

“If there is injustice in a society, every citizen will go to politics, except two types” मुझे लगता है कि हमारी वोटिंग बहुत महत्वपूर्ण है ।Voting was so important in India that we became a democracy with universal adult franchise from day one of becoming republic. आज दुनिया हमारी तरफ देख रही है । जिस तरह से आज दुनिया में भारत का सम्मान बढ़ रहा है, तमाम इंटरनेशनल फोरम्स पर, चाहे यूनाइटेड नेशन्स हो, चाहे जी-20 हो, चाहे ब्रिक्स हो, जिस तरह से प्रधान मंत्री जी ने देश के सम्मान को बढ़ाया है, आज प्रधान मंत्री जी के नेतृत्व में भारत को एक लीड रोल में देखा जा रहा है । आज हम अगर इस दिशा में भी पहल करेंगे, अगर हम कहते हैं कि लोगों को जो बेनिफिट्स देते हैं, आखिर जिन कंट्रीज ने कम्पलसरी वोटिंग की व्यवस्था की है, उनको देखिए कि उन्होंने किस तरीके से किया है । आज वोटिंग के दिन लोग समझते हैं कि छुट्टी मिल गई है, घर में बैठे हैं और घर में बैठकर टी.वी. देख रहे हैं । यह सोचते हैं कि हॉलिडे हो गया है तो इन्जॉय करें । यह क्या है? अगर इस देश में अब भी यह मानसिकता है तो उन पर कम से कम यह फाइन ही लगाने की बात की जाए । ऐसा बहुत सी कंट्रीज में है । हम कैसे यह एन्श्योर कर सकते हैं कि पूरी वोटिंग हो । आखिर डेमोक्रेसी बेस्ड ऑन मेजॉरिटी होती है । आज हमें जिस तरीके से 303 सीटें मिली हैं, हमें इस बात का कांफिडेंस है कि हमें देश के आधे से अधिक राज्यों में 50 प्रतिशत से अधिक वोट्स मिले हैं । आज सामने ये जो बेंचेज खाली हैं, तमाम राज्यों में उनका खाता भी नहीं खुला है । हम लोग आज इसकी इसलिए वकालत कर रहे हैं कि सबकी हिस्सेदारी होनी चाहिए, चाहे वह व्यक्ति इलीट क्लास का हो, मिडिल क्लास का हो या अपर मिडिल क्लास का हो । मुझे लगता है कि कम्पलसरी वोटिंग से सिर्फ सरकार का चुनाव नहीं होगा । आप वर्ष 2005 की एक रिपोर्ट देखें, इंटरअमेरिकन डेवलपमेंट बैंक का एक पेपर आया था, which shows that there was a correlation between compulsory voting, when enforced strictly and improved income distribution.
यह आर्थिक समानता की ओर ले जाएगा । आज देश में हमारी सरकार है । देश में ऐसी सरकारथी, जो कहती थी कि देश की परिसंपत्तियों पर अल्पसंख्यकों का ही स्वाम‍ित्व है, उन्हीं की सबसे बड़ी प्राथमिकता है । आज हमारे देश में मोदी जी के नेतृत्व में सरकार है । वह कहती है कि देश की जो परिसंपत्तियां हैं, उन पर अगर सबसे पहला अधिकार गांवों में रहने वाले गरीबों, किसानों, महिलाओं और बहनों का है । आज हमारी सरकार की यह प्राथमिकता है, यह नीयत है । यह सरकार का कम्पलशन है । देश वर्ष 1947 में आजाद हुआ और वर्ष 1952 से चुनाव शुरू हुआ और वर्ष 1952 से सरकारें बनती रहीं, लेकिन करोड़ों लोग ऐसे थे, जिन्होंने बैंक के दरवाजे नहीं देखे थे । उनके हाथों में बैंक की पासबुक नहीं थी । आदरणीय मोदी जी ने ‘जन-धन योजना’ की बात की है । हर व्यक्ति का बैंकों में खाता खुले । पहले पांच सौ रुपये से कम में खाता नहीं खुल सकता था, जीरो बैलेंस पर कभी खाता नहीं खुल सकता था । आजादी के बाद देश में मोदी जी की पहली सरकार आई तो मोदी जी ने कहा कि हम देश में सभी लोगों का खाता खोलेंगे, चाहे हमें वह जीरो बैलेंस पर ही खोलना पड़े । जिनके पास एक भी पैसा नहीं होगा, तब भी उनके पास बैंक की पासबुक होगी । इस बात का एहसास तब हुआ, जब मोदी जी सरकार में आए । चाहे वह छत्तीसगढ़, ओडिशा या कालाहांडी हो, उन गांवों में रहने वाले ऐसे लोग भी हैं, जो पांच सौ रुपये से अपना बैंक की खाता नहीं खोल सकते हैं । आज उससे फाइनैंशियल इंक्लूजन हुआ है । बैंकों में केवल उनका खाता नहीं खुला है, बल्कि उनका वित्तीय समावेषण हुआ है । उनके पास भी एक अधिकार के रूप में बैंक की पासबुक है । अभी निर्मला सीतारमण जी ने कहा है कि हमारी एक योजना आई है, जिसके  तहत सेल्फ हेल्प ग्रुप्स की महिलाओं को पांच हजार रुपये ओवर ड्राफ्ट की सुविधा मिलेगी । जीरो बैलेंस पर खाता खुला हो और उस ‘जन-धन’ खाते के माध्यम से गांव की गरीब महिला आवश्यकतानुसार पांच हजार रुपये ओवर ड्राफ्ट की सुविधा ले सकेगी । वित्त राज्य मंत्री जी ने जवाब देते हुए कहा है कि एक लाख करोड़ रुपये जन-धन के खाते में आए हैं ।
16.58 hrs                       (Shri Rajendra Agarwal in the chair)           जब हम आर्थिक समानता की बात करते हैं तो हम निश्चित तौर से उस दिशा में बढ़ रहे हैं । हमें कम्पलसरी वोटिंग के लिए और वोटर्स के फैसिलिटेशन के लिए अवेयरनेस का काम करना चाहिए । इसके लिए चुनाव आयोग है, राष्ट्रीय मतदाता दिवस है कि किस तरह से अवेयरनेस बढ़ाया जाए । मतदाता उदासीन रहते हैं, हमें उनको प्रोत्साहित करना है । मोदी जी जब मुख्यमंत्री थे, तो गुजरात में पहली बार दिसम्बर, 2009 में कम्पलसरी वोटिंग का एक विधेयक पारित हुआ था, लेकिन गवर्नर साहब ने उस पर एसेंट नहीं दिया । ऐसा करने वाला गुजरात पहला राज्य था । उसके बाद देश में एक भूचाल-सा आ गया था । पूरे देश में कम्पलसरी वोटिंग पर चर्चा शुरू हो गई । उसमें Gujarat played a very vital roleऔर एक लीड लिया । वहां पर लोकल बॉडीज के लिए विधान सभा में विधेयक पारित हुआ, उसे भी हाई कोर्ट ने स्टे कर दिया, लेकिन यह कम्पलसरी वोटिंग के लिए पहल थी ।

          चुनाव आयोग ने 25 जनवरी को राष्ट्रीय मतदाता दिवस घोषित किया है ।…(व्यवधान) मैं अपनी बात समाप्त करूंगा, रूडी जी आप बोल कर जाइए । मैं इसी के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूं और जनार्दन सीग्रीवाल जी का समर्थन करता हूं ।

                              

श्री राजीव प्रताप रूडी (सारण): सभापति जी, ‘अनिवार्य मतदान’ विषय अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है और लोकतंत्र से जुड़ा हुआ है । जगदम्बिका जी ने सही कहा है कि सिक्स्थ सैंचुरी बीसी में एथेंस में पहली बार लगभग 2500 वर्ष पहले वोटिंग की व्यवस्था कायम की गई थी । भारत में वैशाली, जो संयोग से हमारे प्रदेश में है और माननीय रवि शंकर जी बैठे हैं, इनका प्रदेश  है और जो पहले लोकतंत्र की हम चर्चा करते हैं, वह हमारे क्षेत्र से लगा है । वैशाली, हाजीपुर, छपरा इसके साथ जुड़ा है । हमें गर्व है कि वहां भी 2400 वर्ष पहले यह व्यवस्था शुरू हुई । इन सभी विषयों पर इतिहास के पन्नों में देखा गया है कि सबसे पहले दुनिया में कहीं इलेक्टोरल कालेज की स्थापना हुई, तो सबसे पहले अमरीका में वर्ष 1788 में हुई । उस समय 1789 में जॉर्ज वाशिंगटन वहां के पहले राष्ट्रपति बने । उस समय राज्यों का वोट्स होता था और वह भी प्रक्रिया थी कि एक राज्य का अपना वोट होगा और यदि बहुमत की 40 सीटें हैं, तो जिसे 21 सीटें मिलेंगी, उसे 40 का वोट मिलता है और वह प्रक्रिया आज भी है । उस समय तक महिलाओं को यूएस में भी वोट देने का अधिकार नहीं था । वह उस समय भी बहुत डेवलप्ड स्टेट था । एथेंस में भी देखा गया था कि जिसके पास जमीन या सम्पत्ति होगी, उसे ही वोट देने का अधिकार था, लेकिन समय के साथ इसमें बड़ा परिवर्तन हुआ । वर्ष 1920 तक वह स्थिति बनी रही थी । भारत के इतिहास में भी देखें, 2500 वर्ष पहले पाला डायनेस्टी थी, चोला एम्पायर था, उस समय भी चुनाव की प्रक्रिया थी, हालांकि वे सभी राजा थे । चुनाव की व्यवस्था बहुत छोटी हुआ करती थी । सबसे पहले अनिवार्य मतदान का विधेयक वर्ष 1893 में बेल्जियम में आया था । विकसित देश होते हुए भी वहां सिर्फ मर्दों के लिए मतदान का अधिकार था । यदि इतिहास को देखें, तो लोकतंत्र की शुरुआत मर्दों से ही की गई, यह सोचने के पीछे पता नहीं क्या कारण है । वर्ष 1948 के बाद बेल्जियम में महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला । उस समय कई तरह की पैनल्टीज लगाई जाती थीं । यदि चार बार से आपने मतदान नहीं किया तो आपको सरकारी नौकरी प्राप्त करने में व्यवधान होगा या कई तरह की सुविधाएं नहीं मिलेंगी । आस्ट्रेलिया में भी वर्ष 1924 तक कम्प्लसरी वोटिंग हुई, लेकिन उससे पहले क्वीन्सलैंड, विक्टोरिया, न्यू साउथ वेल्स आदि कई देशों ने कम्प्लसरी वोटिंग का रास्ता निकाला । उस समय भी था कि महिलाएं वोट नहीं दे सकती थीं, लेकिन धीरे-धीरे पूरे आस्ट्रेलिया में कम्प्लसरी वोटिंग की व्यवस्था की गई । वेनेजुएला में वर्ष 1953 तक कम्प्लसरी वोटिंग थी, उसके बाद उन्होंने डायल्युशन शुरू किया । नीदरलैंड्स में वर्ष 1967 तक कम्प्लसरी वोटिंग थी, उसका भी डायल्युशन शुरू किया । एक रिसर्च यह मानती है कि यदि अनिवार्य मतदान होगा, तो देश का विकास बहुत ज्यादा होगा, लेकिन एक दूसरी रिसर्च कहती है और खास कर इसका रेफरेंस अर्जेनटीना, ब्राजील, आस्ट्रेलिया, इक्वाडोर, पेरू, नार्थ कोरिया का है, यहां ऐसा महसूस किया कि कम्प्लसरी वोटिंग का प्रावधान होने के बाद भी विकास की दर में वृद्धि नहीं होती । यह स्थापित करना कि कम्प्लसरी वोटिंग से विकास दर बढ़ेगी, यह बहुत सारे अध्ययनों में तर्कसंगत नहीं पाया गया है । इंटर अमेरिकन बैंक, जिसकी चर्चा माननीय सदस्य कर रहे थे, उसने तर्क रखा था कि विकास के लिए कम्प्लसरी वोटिंग होनी चाहिए, लेकिन जब आस्ट्रेलिया की रिसर्च हुई और उसने तय किया कि ये दोनों तर्कसंगत नहीं हैं, यह चर्चा बहुत दिनों तक चली । भारत में वोटिंग का सिलसिला, जैसे मार्ले मिन्टो रिफार्म्स वर्ष 1909 का है और उसी समय यह पहली बार देश में तय हुआ कि देश में मतदान की व्यवस्था हो, उस समय अंग्रेजों ने यह तय किया । उनकी व्यवस्था उनके शासन को चलाने के लिए थी और पहली बार भारत में भारतीयों की भागीदारी की व्यवस्था उसी समय से शुरू हुई । गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट वर्ष 1919-20 में आया । यह प्रक्रिया तब शुरू हुई और आज हम सदन में जिस स्थान पर खड़े हैं, पिछले 100 वर्षों में पार्लियामेंट का निर्माण शुरू हुआ ।

          वर्ष 1926 में देश के पहले इलेक्टोरल कॉलेज का भाषण इसी जगह किसी ने बैठकर दिया होगा । यह एक विषय है । हम इस सदन में बैठते हैं । वर्ष 1919 में, आज से 100 साल पहले …(व्यवधान)

श्री भर्तृहरि महताब (कटक) : यह दिल्ली असेंब्ली में हुआ था । …(व्यवधान)

श्री राजीव प्रताप रूडी :  Somewhere in Delhi it had happened, दिल्ली में कहीं इसकी डिबेट शुरू हई । यह सचमुच अपने आप में एक बड़ी व्यवस्था है । In 1926 it started coming. यह बड़ा इन्ट्रेस्टिंग विषय है । In 1926, this Parliament got opened and then debate started in this Parliament.  Thank you, hon. Minister of Law and Justice.  I was also right and you have corrected it further.  Mr. Mahtab was also there to correct me.  Possibly, this is the history.  But there is a history. आप जिस स्थान पर बैठे हैं, 100 साल पहले भी आपने ऐसे ही किसी व्यक्ति के बारे में सुना होगा । जिस समय देश आज़ाद नहीं था और वह व्यक्ति वहां बैठा था ।

          यह इस सदन के लिए अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है । इसी प्रकार से टेबल ऑफिस होगा और इस सदन में सुरंग भी होगी । शायद माननीय सांसदों को यह नहीं पता है कि तब अंग्रेज़ों ने सदन में सुरंग भी बनाई थी, ताकि उन पर कभी आक्रमण हो जाए तो वे सुरंग से निकल सकें । …(व्यवधान)

श्री निहाल चन्द चौहान (गंगानगर) : यह सुरंग कहां बनी है? …(व्यवधान)

श्री राजीव प्रताप रूडी : मैं सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह बात नहीं बता सकता हूं, लेकिन कई किताबों में लिखा हुआ है कि इस सदन में और अगले सदन में एक सुरंग भी है । अंग्रेजों को यह महसूस हुआ कि यह लोकतंत्र की एक बड़ी व्यवस्था है, जहां देश के प्रधान मंत्री बैठते हैं और देश के बहुत सारे लोग बैठकर बात करते हैं ।

          महोदय, उस समय 440 सदस्य चुनकर आए थे, जो कि प्रोवेंशियल असेंब्लीज़ के लोग थे । कभी भी हमारा संविधान बनाने वालों ने और महात्मा गांधी ने उस समय नॉन-कोऑपरेशन मूवमेंट में कहा था कि हम यह चुनाव नहीं स्वीकार करते हैं । इसके बाद यह विषय बढ़ता चला गया  । चुनाव आते-जाते रहे, आज हम लोग पूरे भारतवर्ष में चुनाव करते हैं । इस बार 67 प्रतिशत वोट हुआ है । 88 करोड़ वोट मतदाता हैं, 61 करोड़ मतदान करते हैं ।

          जैसा कि माननीय सांसद का प्रस्ताव है कि जो वोट न डाले उसको पीनलाइज़ कीजिए । मैं बताना चाहूंगा कि मैं 26-27 साल की उम्र में विधायक बन गया था । मैं तब से, पिछले 30 साल से चुनाव लड़ रहा हूं, बीच में हारता भी हूं और जीतता भी हूं । महोदय, अब लगभग रिटायरमेंट का समय है । 60 साल के आसपास आते-आते व्यक्ति रिटायर हो जाता है । सरकारी सेवा में तो व्यक्ति रिटायर कर ही जाता है, हम लोग तो सरवाइव कर रहे हैं ।

श्री सुनील कुमार सिंह (चतरा) : आप 75 वालों को डरा रहे हैं? …(व्यवधान)

श्री राजीव प्रताप रूडी : महोदय, मैं डरा नहीं रहा हूं, यह सच्चाई है । …(व्यवधान) एक सीमा के बाद तो रिटायर करना ही चाहिए । …(व्यवधान) यह समय तो आता ही है । …(व्यवधान) मैं वर्ष 1996 से इसी सदन में आकर बैठता हूं । …(व्यवधान) मुझे यहां बैठने का मौका मिला, वहां बैठने का मौका मिला, विश्वास है कि मुझे आगे भी मौका मिलता रहेगा । मैं हमेशा कहता हूं कि मैं जिस क्षेत्र से चुनाव जीतकर आता हूं, लोकतंत्र में कम्पलसरी वोटिंग का जो भी विषय हो, लेकिन लोकतंत्र में इस बार का चुनाव देखने लायक था । वह संदर्भ मैं बाद में लेकर आऊंगा कि कम्पलसरी वोटिंग होनी चाहिए या नहीं होनी चाहिए । इस विषय को कोई क्लोज़ नहीं कर सकता है । इस पर मन्तव्य चलता रहेगा ।

          महोदय, यहां बहुत से लोग नहीं हैं । हमने चुनावों का काउंटरमांड सुना है । भर्तृहरि जी, चुनाव काउंटरमांड तब होते हैं, जब बाढ़ या भूकंप आ जाए, लेकिन देश के इतिहास में एक ही संसदीय क्षेत्र ऐसा है, जहां चुनाव काउंटरमांड हुए बिना वहां के 1200 के 1200 पोलिंग बूथों पर पूर्ण मतदान हुआ । बिहार में बीपीएससी के पेपर में यह प्रश्न आता है कि बताइए बिहार का कौन सा ऐसा संसदीय क्षेत्र है जहां काउंटरमांड हुए बिना पूरे 1200 पोलिंग बूथों पर पूर्ण मतदान हुआ । यह इतिहास रचने का मेरा सौभाग्य है, जो कि अच्छा सौभाग्य नहीं है । यह इसलिए नहीं रचा गया क्योंकि इस लोकतंत्र में उस समय मेरा चुनाव एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ हो रहा था जो दुनिया के सबसे बड़े, क्षमा कीजिए दुनिया नहीं, इसे थोड़ा नीचे ले आता हूं, बिहार के और देश के जाने-माने व्यक्ति थे, मैं पिछले 15-20 सालों से उनसे लड़ता रहा हूं । दुर्भाग्य से आज वे नहीं हैं …(व्यवधान)

श्री रवि शंकर प्रसाद : वे जेल में हैं । …(व्यवधान)

श्री राजीव प्रताप रूडी  : मेरा यह कहना उचित नहीं होगा कि वे जेल में हैं । …(व्यवधान)  वे चुनाव की प्रक्रिया से बाधित हैं । वर्ष 2004 में जब चुनाव हुआ, तो 1200 बूथों में वर्च्युअली कम्पलसरी पोलिंग हो गई थी । सर, 1200 में से 1100 बूथों पर 99.9 परसेंट पोलिंग हुई थी । यह था भारत का लोकतंत्र, जिसकी हम चर्चा कर रहे हैं । हम भी इसके भागीदार और पापी हैं, जितना वे भी थे । चुनाव आयोग ने कहा कि हमने ऐसा चुनाव देखा ही नहीं …(व्यवधान) 

श्री भर्तृहरि महताब : सिग्रीवाल जी वही चुनाव चाहते हैं । …(व्यवधान) 

श्री राजीव प्रताप रूडी  : ऐसा चुनाव देखा ही नहीं, जिसमें 1200 में 1100 बूथों पर 99 परसेंट पोलिंग हुई हो, ऐसा देश में नहीं हुआ । …(व्यवधान)  इसलिए चुनाव आयोग ने तय किया कि आप चार महीने में चुनाव कराइए । …(व्यवधान) 

उस समय मैं सरकार में मंत्री था । हमारे खिलाफ जीतने वाले व्यक्ति दो स्थानों, मधेपुरा और छपरा से जीते । बाद में उन्होंने मधेपुरा छोड़ दिया और छपरा से चुनाव जीत गए । मैं उनका नाम नहीं लेना चाहता हूं । आज उनकी पार्टी का एक भी सदस्य इस सदन में नहीं है । उस समय मैं संघर्ष करता रहा । पश्चिम बंगाल में जो आज हम देख रहे हैं, वह दृश्य हमने बिहार में आज से लगभग 15-20 साल पहले वर्ष 2004 के चुनाव में देख लिया था और बड़ी लड़ाई लड़कर आज हम दोबारा वहां पर हैं और चुनाव जीते हैं । 100 फीसदी वोट कराना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि जब यह तय हो जाएगा कि 100 फीसदी मतदान होगा तो भारत में शायद अभी हम उसके लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हैं । वर्ष 1952 में जब चुनाव हुए तो उस समय के मतदाता 17 करोड़ के आसपास थे और उस समय प्रत्येक वोट पर 60 पैसे खर्च होते थे । मैं यह नहीं कह रहा कि आज हमारी सरकार के पास पैसे नहीं हैं । वर्ष 1984 में जब आबादी 40 करोड़ हुई, तब 2 रुपये खर्च होते थे, वर्ष 1996 में 10 रुपये खर्च होते थे, वर्ष 2009 में वह बढ़कर 15 रुपये हो गए और इस बार वर्ष 2014 और वर्ष 2019 में यह बढ़कर 60 रुपये तक पहुंच गया है ।

          सभापति महोदय, किसी भी व्यवस्था में आज लगभग 4 हजार करोड़ रुपये एक चुनाव में खर्च होते हैं । प्लस, माइनस का हिसाब जोड़ा जा सकता है । कम्पल्सरी वोटिंग कराने में पैसे के खर्च की बात महत्वपूर्ण नहीं है, लेकिन क्या यह व्यवस्था हम कायम कर सकते हैं? वर्ष 1947 में हमें आजादी मिली । इसी में डिबेट हुआ और हम लोगों ने संविधान बनाया । इसी चेयर पर डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद जी बैठे थे, जो बिहार से हैं । हमारा सौभाग्य है कि हम छपरा से हैं, सीग्रीवाल साहब भी वहीं से हैं और इनका ही बिल है । हमें गर्व है कि स्वर्गीय डा. राजेन्द्र प्रसाद जी हमारी धरती से हैं । श्री जय प्रकाश नारायण जी सारण की धरती से हैं । नटवरलाल जी नहीं भाई, गलत बात कर रहे हैं । यह हमारे लिए बहुत सौभाग्य का विषय है ।

श्री रवि शंकर प्रसाद: सर, वह जमीन बहुत उर्वरक रही है । राजेन्द्र बाबू, जय प्रकाश जी, रूडी जी, सीग्रीवाल जी । यह परम्परा बड़ी जोरदार है ।

श्री राजीव प्रताप रूडी : फिर से बोलिए, ठीक से रिकॉर्ड नहीं हो पाया है ।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री अश्विनी कुमार चौबे): यह बड़ा सौभाग्य है हुजूर कि आप राजेन्द्र बाबू के नाम पर वहां बैठे हुए हैं । यहां दो-दो राजेन्द्र जी हो गए हैं ।

माननीय सभापति : धन्यवाद ।

श्री राजीव प्रताप रूडी : मैं दोबारा विषय पर आता हूं । 

श्री भर्तृहरि महताब : एक करेक्शन है । राजेन्द्र बाबू जहां प्रेसाइड करते थे, वह सेंट्रल हॉल था ।

माननीय सभापति: संविधान सभा के अध्यक्ष के नाते वहां चेयर करते थे । मेरा विचार है कि हमारे सामने यहां सीनियर पटेल जी बैठै हैं, वे यहां बैठते थे ।

श्री राजीव प्रताप रूडी : कांस्टीट्यूएंट असेंबली का डिबेट सेंट्रल हॉल में हुआ और पार्लियामेंट वर्ष 1950 में यहां हुआ ।

माननीय सभापति: राइट ।

श्री राजीव प्रताप रूडी : हम लगभग नजदीक ही हैं ।

माननीय सभापति: वेरी करेक्ट ।

श्री राजीव प्रताप रूडी : वहां पर लिखा भी हुआ है । भवन एक ही है । स्थान पर सही बता रहे हैं । हमें गर्व है कि देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद जी यहां बैठे थे और उन्होंने भी सेंट्रल हॉल में सदन को चलाया था, लेकिन यहां नहीं ।

माननीय सभापति: पहले स्पीकर मावलंकर साहब थे ।

श्री राजीव प्रताप रूडी : मैं वापस विषय पर आता हूं । संविधान निर्माताओं के मध्य यह तय हुआ कि हमें किस प्रकार की सरकार लेनी है । क्या हमें वेस्टमिंस्टर फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट लेनी है या प्रेसिडेंशियल फॉर्म लेनी है? इसी विषय पर आने के लिए ही मैं यहां पर बैठा हूं, क्योंकि जहां तक मैं समझता हूं, मैं इस बात की चर्चा पिछले 20-25 वर्षों से कर रहा हूं । यह भी तय है कि केशवानन्द भारती केस में हम बेसिक स्ट्रक्चर चेंज नहीं कर सकते हैं, लेकिन जिस लोकतंत्र में वेस्टमिंस्टर फॉर्म ऑफ गवर्नमेंट की बात कर रहे हैं, हम लोगों ने ब्रिटिशर्स का मॉडल अडॉप्ट किया है और उसे अडॉप्ट करने के बाद हमने इसे बनाया है और यही इसका बेसिक स्ट्रक्चर है । लेकिन यही बेसिक स्ट्रक्चर न होने के बाद जो भी कमियां हों, सरकार की मंशा के हिसाब से या सरकार की दृष्टि के हिसाब से, हम लोगों ने संविधान को अभी तक 108 बार संशोधित किया है । यह सैक्रोसैंक्ट है, हमको विश्वास है कि संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर में हम कोई चेंज नहीं ला सकते हैं, लेकिन इस देश को आवश्यकता पड़ी, क्योंकि संविधान के प्रति हमारी आस्था है । मैं अगर इस कुर्सी पर हूं, तो वह संविधान की ही ताकत है, आप उस कुर्सी पर हैं, रवि शंकर जी अपने पद पर हैं, तो वह भी संविधान की ताकत से हैं । सरकारी कार्यालय में जाकर मैं सांसद होने के बावजूद उसकी कुर्सी पर नहीं बैठ सकता, वह  मेरी कुर्सी  पर नहीं बैठ सकता । मैं किसी थानेदार का रोल नहीं कर सकता हूं । यह संविधान में एक बेसिक स्ट्रक्चर है, जिसके कारण हम लोग वहां पर हैं । लेकिन संविधान में भी हमने स्वीकार किया । हमने कास्ट के नाम पर आरक्षण दिया, हमने माइनॉरिटीज को भी रिकगनाइज किया, हमने रिलीजन को, ज्योग्रफिकल रीजन को रिकगनाइज किया । आज भी इस देश में बहुत सारे भाग हैं जहां पर जन्म लेने पर आपको उस भौगोलिक क्षेत्र में जन्म लेने का लाभ मिलता है । यह आरक्षण भी हम लोगों ने दिया । …(व्यवधान)

लाहौल स्पीति, कांगड़ा ऐसे ही बहुत से स्थान हैं, जहां आप जन्म लेंगे तो आपको आरक्षण का अधिकार है । हम लोगों ने संविधान में इसके लिए प्रावधान किए हैं । लोकतंत्र में लोग जीतकर आते हैं । आज  मुझे थोड़ी  सी तकलीफ होती है । हम लोग मेहनत करके इस पार्लियामेंट में बैठते हैं । महोदय, आपका भी इस समय मन कर रहा होगा कि हम तुरंत क्षेत्र में जाएं । राज्य सभा में जो हैं, वे नहीं । अब तो रविशंकर जी भी लोक सभा में हैं, आपको बधाई । राज्य सभा की व्यवस्था अलग है, लेकिन लोक सभा के जितने लोग हैं, उनको होता है कि छुट्टी हो तो क्षेत्र में चलते हैं । इस भारत देश की Parliamentary form of Government में यह तय हो गया है कि अगर हम आपको वोट देंगे, जो गांव का व्यक्ति है, हमारे देहात का व्यक्ति है, उसके पास हम जाते हैं और कहते हैं कि भईया हमें जिता दो, हम तुम्हारा बड़ा कल्याण करेंगे । वह हमें देखता है और फिर दो लोगों के बीच में से तय करता है । इस बार तो स्थिति ही अलग थी । सभी ने तय किया कि हमें देश में नरेन्द्र मोदी जी को ही रखना है । तय करने के बाद जब यह होता है तो वह कहता है, तुम को मैंने वोट दिया, नित्यानंद जी को वोट दिया, फलां को वोट दिया, आप बीजेपी के हैं आपको भी हमने वोट दिया है । उसके बाद आप बड़े आदमी बन जाते हैं । आपके पास सिक्योरिटी आ जाती है । आप सरकार में चले जाते हैं । आपका फोटो आता है, पहले पार्लियामेंट में आता है, फिर आप राष्ट्रपति भवन में शपथ लेते हैं । आपके बगल में राष्ट्रपति जी होते हैं, प्रधान मंत्री जी होते हैं, स्पीकर महोदय होते हैं और वह कहता है कि हमने इसको जिताया है और यह अब बड़ा आदमी हो गया है । तुमने हम से वोट मांगा था और अब तुम बड़े आदमी हो गए हो तो मेरा हिस्सा कहां है, मेरे बेटे की नौकरी कब लगवाओगे, कब परीक्षा में मेरे बेटे को पास करवाओगे? उसके बेटे का सेन्ट्रल स्कूल में एडमिशन हो गया है, मेरे बेटे का सेन्ट्रल स्कूल में कब एडमिशन करवाओगे? उसके बाद वह जनप्रतिनिधि, जो वोट मांगने गया था । इस व्यवस्था में आप चुने हुए प्रतिनिधि को सत्ता से जोड़ देंगे, अथॉरिटी दे देंगे, क्योंकि कल मैं मंत्री था, आज नहीं हूं । वह समझता है कि यही सरकारी तंत्र में सबसे आगे बैठा है, यही मंत्री बनता है या मंत्री से हटता है या दूसरे लोग बनते हैं तो इसके अधिकार का हिस्सा मेरे पास कहां है । लोकतंत्र में आपने यह व्यवस्था कायम कर दी है और आज मत डालने वाला हर आदमी आपसे अपना हिस्सा मांग रहा है । आप किसी सांसद से पूछ लीजिए कि वह मांग रहा है या नहीं । वह कह रहा है कि तुम तो बड़े आदमी हो गए । तुम को मैंने वोट दिया था, अब बताओ कि मेरा हिस्सा इसमें कहां है? यह संकट बनता जा रहा है और इसीलिए लोकतंत्र में यह बहुत जरूरी है । मैं चुनाव जीतकर आता हूं और मेरी इच्छा है कि मैं सुबह नौ बजे से शाम के छ: बजे तक यहां रहूं । लेकिन यहां जितने सांसदों से बात हुई, वे सब बेचैन हैं कि हमें अपने क्षेत्र में जाना है, जनता के पास जाना है, उससे मिलना है, यह करना है । My primary duty to make legislation is lost in the process. हम दिनभर परेशान हैं । वहां जा रहे हैं, यहां आ रहे हैं । हमारा बेसिक परपज़ लेजिस्लेशन बनाने का है, हमें सत्ता से बाहर कर दीजिए । इसीलिए कई बार देश में यह तय करने की बात आती है । इस बार हमने एकतरफा चुनाव देखा, लेकिन पहले भी हम लोगों ने चुनाव देखे हैं । बिहार में लालू यादव जी और नीतीश कुमार जी के बीच में चुनाव देखा है । एक तरफ लालू यादव जी और दूसरी तरफ नीतीश कुमार जी । उत्तर प्रदेश में एक तरफ मायावती जी और दूसरी तरफ मुलायम जी, लेकिन अब वे खत्म होते जा रहे हैं, यह दूसरी बात है । ओडिशा में कांग्रेस और बीजेडी के बीच में, अब वह भी खत्म हो रहा है । पश्चिम बंगाल में कम्यूनिस्ट और कांग्रेस के बीच में, फिर बदलकर कम्यूनिस्ट और टीएमसी के बीच में और अब बदलकर टीएमसी, कांग्रेस और बीजेपी के बीच में है । बाइपोलर पोलिटिक्स तो भारत में हो ही गयी है । जिस तरह से इस बार के चुनाव हुए हैं, हम लोग भारतीय जनता पार्टी से हैं, लेकिन देश में एकदम प्रत्यक्ष तौर से राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था का स्वरूप पूरे भारत में उभर कर आ चुका है और यह मेंडेट देश के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के प्रति था । मैं कभी भी छपरा से 15-20 हजार से अधिक मतों से नहीं जीता था । कोई कारण ही नहीं था कि मैं सवा-डेढ़ लाख वोट से जीत जाऊं । वहां से इस तरह से जीतने का किसी का इतिहास ही नहीं है । कहीं न कहीं देश के लोगों ने व्यवस्था से हटकर यह तय करना शुरू कर दिया है कि हमें मोदी जी को जिताना है या राहुल जी को जिताना है । हमें कांग्रेस को जिताना है या बीजेपी को जिताना है । आपने फैसला नहीं किया है, सदन ने फैसला नहीं किया है, कांस्टीट्यूशन ने फैसला नहीं किया है, लोगों ने मेरिट के आधार पर देश की व्यवस्था में बाइपोलर पोलिटिक्स को स्थापित करने का परिणाम इस देश में दे दिया है ।

हमारा कुछ रेलिवेन्स नहीं है, हम तो लेजिस्लेटर के रूप में जीतकर आएंगे और लेजिस्लेटर के रूप में रहेंगे, यही ताकत हम चाहते हैं । यह अधिकार देना चाहिए कि साहब आपको तय करना है, जैसे यूएस में है । सही है या गलत है, मैं यह सिर्फ डिबेट के तौर पर बोल रहा हूं । लेकिन यह तय करना पड़ेगा कि मेरिट, सरकार, लोग और डिलीवरी हमको उससे डीलिंग करनी चाहिए । मैं चुनाव जीतकर आया हूं और मैं सरकार का पार्ट नहीं हूं, तो मुझे लेजिस्लेटर का पार्ट बना दीजिए । लेकिन मैं लेजिस्लेटर भी हूं और इग्जिक्यूटिव भी हूं और मैं लोगों की पीड़ा लेकर मंत्री जी के पास भी जाऊं, इसलिए हम एक ट्रिपल रोल अदा कर रहे हैं । इसलिए, कहीं न कहीं सेग्रीगेशन की बहुत बड़ी जरूरत है, जो हम लोग इस देश में महसूस कर रहे हैं ।

          सभापति महोदय, मैं इस बात पर क्यों आपत्ति जाहिर कर रहा हूं? हम लोकतंत्र में जीतकर आते हैं, तो फिर एंटी डिफेक्शन लॉ किसलिए? जब लोगों का विश्वास था, भारत में यह डर क्यों लगा रहता है कि हम इसको चुनाव जिताकर भेजेंगे और वह भाग जाएगा? यह कौन-सा संविधान है? आप उस संविधान का संरक्षण करने के लिए एक और संवैधानिक संशोधन करते हैं कि एंटी डिफेक्शन लॉ कर देते हैं । वह क्यों करते हैं? क्योंकि लगता है कि अगर वह मंत्री नहीं बना, तो वह भाग जाएगा, सरकार नहीं बनी, तो भाग जाएगा । आप फिर व्हिप का प्रोविज़न करते हैं कि आप व्हिप नहीं करेंगे, तो इन सब कानूनी व्यवस्थाओं को इसलिए व्यवस्था में लाया गया है, क्योंकि लोकतंत्र में जो ये सब खतरे थे, उनको रोका जाए । हम स्वतंत्र होकर जीतकर आते हैं । उसके बाद एंटी डिफेक्शन लॉ के लिए पहले यह क्यों था कि इतने नहीं भाग सकते हैं, फिर हुआ कि दो तिहाई जा सकते हैं, फिर हुआ कि पूरे के पूरे भाग सकते हैं । आखिर सांसदों या विधायकों को इस स्थिति में रखने का औचित्य क्या है? इसकी क्लैरिटी आज नहीं है । महोदय, आज मैं सदन में बोलकर जा रहा हूं । इसकी क्लैरिटी देश में कभी न कभी लेकर और डिसकस करके तय करनी होगी । मेरा संविधान के प्रति कहीं कोई आक्षेप नहीं है । लेकिन देश के लोगों की मानसिकता बदल रही है । वे डिलीवरी चाहते हैं, वे शासन चाहते हैं, वे लेजिस्लेशन चाहते हैं । हम लोग जूडिशियरी को अलग मानते हैं और इग्जिक्यूटिव को अलग करना चाहते हैं । यह जो इग्जिक्यूटिव और लेजिस्लेशन का मिश्रण है, यह बड़ा खतरनाक है । इसको कहीं न कहीं अलग करना पड़ेगा । इस पर कभी न कभी विचार करना पड़ेगा । जब यह संभव हो जाएगा, तो संभवतः अनिवार्य मतदान की भी व्यवस्था अगर हम लोग उस चरण में प्रारंभ करें, तो इस पर विचार किया जा सकता है ।

          सभापति महोदय, मैं छपरा से सांसद हूं और मुझे भी लौटना है । समय की भी सीमा है । आज सीग्रीवाल साहब ने जो विषय रखा है, मैं इसके पक्ष में नहीं हूं । मैं आज की तारीख में अनिवार्य मतदान के पक्ष में नहीं हूं । अगर मत होगा, तो मैं इसके खिलाफ मत दूंगा । लेकिन साथ ही साथ हमें इस प्लेटफार्म पर एक बड़े विमर्श को शुरू करना होगा । मैं देश के प्रधान मंत्री जी के प्रति कृतज्ञ हूं, जिन्होंने अपने विवेक से एक बड़े डिलीवरी का मैकेनिज्म शुरू किया है । वह पार्टी के प्रत्याशी के रूप में प्रधान मंत्री बने हैं, लेकिन देश के लोगों ने उन्हें व्यक्ति के रूप में, उनकी योजानओं के बारे में, उनके कमिटमेंट के बारे में, उनके डिटर्मिनेशन के बारे में, उनकी ऑनेस्टी के बारे में, उनके विज़न के बारे में उनको पहचाना है । अगर कहीं न कहीं इस प्रकार से होगा, तो देश में अच्छा शासन आएगा । हम लोग प्रत्येक दिन राजनेताओं के बारे में टिप्पणी सुनते हैं, उससे वंचित होने का लाभ हमें मिल सकेगा । आज सदन में इतनी बड़ी संख्या में सभी सदस्य उपस्थित होकर मेरी बात को सुन रहे हैं । मैं आप सबका आभार व्यक्त करना चाहता हूं । मैं विशेष रूप से सारण की जनता का भी आभार व्यक्त करना चाहूंगा, जिन्होंने रिकार्ड ब्रेक करके मुझे दोबारा जिताकर भेजा है । यह शायद तब तक संभव नहीं होता, जब तक देश के प्रधान मंत्री जी का मुझे सानिध्य प्राप्त नहीं हुआ होता ।

          सभापति महोदय, मुझे आपने बोलने का अवसर प्रदान किया है, इसके लिए मैं आपका भी विशेष रूप से आभार व्यक्त करना चाहता हूं ।

   

माननीय सभापति  : मुझे माननीय सदस्यों को यह सूचित करना है कि इस विधेयक पर पहले ही दो घंटे की चर्चा हो चुकी है । इसका आबंटित समय लगभग समाप्त हो चुका है । लेकिन अभी इस विधेयक पर 12 और सदस्यों को बोलने की इच्छा है और वह इस पर बोलना चाहते हैं । इसलिए समय को बढ़ाना पड़ेगा । क्या सभा सहमत है कि इस पर 2 घंटे का समय और बढ़ा दिया जाए?

अनेक माननीय सदस्य : हां-हां ।

माननीय सभापति : इस पर 2 घंटे का समय और बढ़ाया जाता है ।

 

श्री निहाल चन्द चौहान (गंगानगर) : आदरणीय सभापति जी, आपने मुझे इस अनिवार्य मतदान विधेयक, 2019 पर बोलने का अवसर प्रदान किया है, इसके लिए मैं आपको धन्यवाद देना चाहता हूं । अभी रूडी साहब ने बहुत ही विस्तार से इस विषय पर चर्चा की है कि मतदान अनिवार्य होना चाहिए या नहीं होना चाहिए । मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मतदान लोकतंत्र की नींव है और अगर  लोकतंत्र की नींव को मजबूत करना है, तो मतदान होना बहुत ज्यादा जरूरी है ।

मतदान को हम किसी भी तरीके से ले सकते हैं । देश में मतदान हो, इसके लिए हम हर परीक्षा की कसौटी पर खरे उतरते हैं । अगर मतदान अधिक होगा तो देश में लोकतंत्र और ज्यादा मजबूत होगा । यह देश युवाओं का देश है । इस देश के अंदर 65 प्रतिशत युवा हैं और मैं समझता हूँ कि इस देश में जब 65 प्रतिशत युवा हैं तो मतदान और ज्यादा हो । हमारे लिए मतदान एक महत्वपूर्ण लाइन है । मतदान और ज्यादा बढ़े, इसके लिए हम सब लोग कोशिश करते हैं । हम लोग जब चुनावों में जाते हैं हमें गाँवों में जाकर वोट माँगने पड़ते हैं, जिस तरीके से गाँवों में हम मतदाताओं के बीच में जाते हैं, आप अच्छे तरीके से जानते हैं, क्योंकि आप भी लोक सभा से आते हैं, इस देश के अंदर जिस तरीके से मतदान हो रहा है, जिस तरीके से मतदान की प्रक्रिया और परम्परा चली है, वह मतदान बहुत अधिक नहीं हुआ । मैं अपने संसदीय क्षेत्र की बात करूँ तो अब की बार 75 प्रतिशत मतदान हुआ है । इस देश के अंदर अगर मोटे तौर पर देखें तो इस देश के अंदर 60 करोड़ लोग हैं । अगर मतदाता 60 करोड़ गिने जाएं, जिसमें 10-15 करोड़ मात्र वोट देकर जो सरकार बना लें, वह सरकार इस देश में किस तरह से चली होगी, कैसे विकास हुआ होगा, यह मुझे कहने की जरूरत नहीं है । मैं समझता हूँ कि यह देश एक विशाल देश है । हर स्टेट में अलग-अलग मतदान की प्रक्रिया है । अगर हम पंचायती राज की बात करें, मुझे मेघालय जाने का सौभाग्य मिला, वहाँ पर थ्री टियर व्यवस्था ही नहीं है । वहाँ सिर्फ कबायली के आधार पर चुनाव होता है और वह वहां का सरपंच बनता है । फर्स्ट टियर है और सीधे एडीसी बैठता है । मतदान की परम्परा और मतदान की प्रक्रिया वहाँ पर नहीं है । मैं आपसे आग्रह करूँगा कि मतदान होना इस देश के लिए बहुत जरूरी है । दुनिया के 33 ऐसे देश हैं, जहाँ पर मतदान की प्रक्रिया बहुत पहले से स्टार्ट हुई थी । मैं समझता हूँ कि बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, आस्ट्रेलिया,‍ सिंगापुर, अर्जेंटीना, आस्ट्रिया और पेरू ऐसे कई देश हैं, जहाँ पर मतदान कम्पलसरी है । मैं मतदान के कम्पलसरी होने के पक्ष में खड़ा हुआ हूँ । मैं चाहता हूँ कि इस देश के अंदर मतदान कम्पलसरी होना चाहिए । बेल्जियम के अंदर वर्ष 1893 में जब यह कानून बना था, उन्होंने सोच कर बनाया था, यह देश के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगा । अगर इसको हम कानून बनाएँगे तो मैं समझता हूँ कि जो व्यक्ति वोट नहीं देता है, जो व्यक्ति वोट देने नहीं जाएगा, उस दिन के लिए वह अवकाश मनाता है, उस दिन के लिए वह टूर पर जाता है, उस दिन वह अपने परिवार को लेकर बाहर घूमने के लिए चला जाता है, लेकिन उस दिन उसके लिए वोट देना जरूरी हो, यह इस देश के अंदर कानून होना चाहिए । अगर हम लोग मतदान कम्पलसरी बनाएं, मैं समझता हूँ कि वह किसी भी चुनाव में वोट नहीं देता है तो उसको वोट देने के अधिकार से वंचित करना चाहिए या फिर उसके ऊपर कुछ जुर्माना लगाना चाहिए । हमने ऐसे कई देश देखे हैं, जहाँ पर अगर वोट नहीं देंगे तो वहाँ पर जुर्माना लगता है । जुर्माना छोटा लगा दीजिए, उसका लाइसेंस सस्पेंड कर दें । उसको अगले साल के लिए मतदान कम्पलसरी करने से मना कर दें । हम ऐसे कई तरह के जुर्माना लगा सकते हैं । मैं समझता हूँ कि वर्ष 2009-10 में गुजरात में तत्कालीन मुख्य मंत्री आदरणीय मोदी जी जब लेकर आए थे, एक माननीय सदस्य बता रहे थे कि हाई कोर्ट ने मना कर दिया था । हाई कोर्ट का स्टे हो गया था । मान्वयर, हाई कोर्ट का स्टे नहीं हुआ था । गुजरात के तत्कालीन राज्यपाल ने अनुच्छेद 21 के अंतर्गत उसको वापस लौटाया था । उन्होंने माना नहीं था कि कम्पलसरी मतदान होना चाहिए । इसलिए वह कानून नहीं बन पाया था । वह सिर्फ म्यूनिसिपेलिटी के लिए कानून बनाया था, कोई पार्लियामेंट और विधान सभा के लिए थोड़े ही कानून बनाया था । मैं समझता हूँ कि कम्पलसरी मतदान होना बहुत जरूरी है । हम लोग गाँव में रहते हैं । गाँव में जिस तरीके से चुनाव होते हैं और चुनाव की प्रक्रिया को आप अच्छी तरह से जानते होंगे, हमें वोट माँगने के लिए गाँवों में जाना पड़ता है । जिस तरीके से रूडी साहब बता रहे थे, मैं वे सारी बातें नहीं दोहराना चाहूँगा, लेकिन ऐसे कई चुनाव हैं, जिसको हम लोग कम्पलसरी सैकेंड बार भी कर दें, उसका टर्म बढ़ा दें तो उसका बहुत बड़ा बेनिफिट मिलेगा ।

मैं राजस्थान प्रदेश से आता हूँ, वहाँ पर हमने 50 प्रतिशत महिलाओं के लिए आरक्षण रख रखा है । महिलाओं के लिए जब आरक्षण होता है तो वह एक टर्म के लिए होता है जैसे ग्राम पंचायत का चुनाव होता है । अगर एक ग्राम पंचायत में एक महिला एक बार चुनी जाती है तो दूसरी बार उसको मौका नहीं मिलता है । कई ऐसी महिलाएँ हैं, जो अनपढ़ हैं, जिनके लिए हमारी तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने, वसुंधरा जी ने कुछ एजुकेशन कम्पलसरी की थी, लेकिन उसको मना कर दिया । एक टर्म में वह महिला सरपंच बन कर आएगी, अगर दूसरा टर्म उसको नहीं मिलेगा, काम करे या नहीं करे तो उसके बाद में 10, 15, 20 साल के बाद में उसकी लॉटरी निकलेगी, तब जाकर उसकी रिजर्वेशन में सीट आएगी ।

एक बार वह सीट एससी के लिए आरक्षित होती है, अगली बार वह सीट महिला (सामान्य) आ जाएगी, अगली बार पुरुष के लिए वह सीट होगी, उसके अगली बार पुरुष (सामान्य) के लिए सीट आ जाएगी, फिर उसके अगली बार वह सीट ओबीसी के लिए आरक्षित हो जाएगी ।

          मेरा आपके माध्यम से यह निवेदन है कि इसे भी अनिवार्य किया जाए और आरक्षण का जो टर्म है, उसे डबल किया जाए ताकि एक बार मैं एक चुनाव क्षेत्र से जीतकर आऊँगा, तो अगली बार के लिए मुझे चिंता रहेगी कि मुझे अगली बार भी चुनाव लड़ना है, तो मैं काम ठीक से करूँगा । मैं नरेन्द्र भाई मोदी जी की सरकार को धन्यवाद देना चाहूँगा कि पहली बार 14वें वित्त आयोग का पैसा सीधे गाँव की ग्राम पंचायत को दिया गया है । आज इतना पैसा गाँव की ग्राम पंचायत में गया है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं । एक-एक ग्राम पंचायत के लिए 30-40-50 लाख रुपया गया है । यह 14वें वित्त आयोग, स्टेट फाइनेंस कमीशन का पैसा था । यह पैसा ग्राम पंचायतों को सीधे गया है । 70 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है । वर्ष 1952 में जब चुनाव हुआ था, अगर ऐसा तभी से हुआ होता, तो आज गाँवों की दशा और दिशा में फर्क होता । आजादी के 65-70 साल बाद पहली बार नरेन्द्र भाई मोदी जी की सरकार ने सीधे ग्राम पंचायतों को पैसा दिया है । मैं आपसे निवेदन करना चाहूँगा कि जब सीधा ग्राम पंचायतों के लिए पैसा जाएगा, वह पैसा गाँव के विकास की योजनाओं में खर्च होगा और उसका बहुत बड़ा लाभ हमारे गाँवों को होगा । हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं । आज गाँव में हर व्यक्ति पढ़ा-लिखा, समझदार है । वह चाहता है कि गाँव का विकास हो । हम जिस पवित्र मंदिर में खड़े हैं, रूडी साहब बता रहे थे कि यह वर्ष 1921 में बना था, उस समय यहाँ पर दिल्ली की नगर परिषद बैठा करती थी । पहली बार यहाँ पर नगर परिषद बैठी, फिर दिल्ली की विधान सभा यहाँ पर लगी और वर्ष 1947 के बाद जब वर्ष 1952 में पहला आम चुनाव हुआ, तो पहली बार यहाँ पर सभी लोगों ने बैठकर इस देश के लिए कानून बनाने की योजना बनाई । इस देश में अच्छे कानून बनें, गरीब लोगों के लिए कानून बनें, अगर इसकी शुरुआत हुई है, तो वर्ष 1952 से इसकी शुरुआत हुई है ।

          महोदय, मैं इस मौके पर सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि भारत में गरीब व्यक्ति मतदान करता है और अमेरिका में अमीर व्यक्ति मतदान करता है । अगर हम इस परम्परा को चैलेंज करें कि भारत में अमीर व्यक्ति भी मतदान करे, अगर सभी लोग मतदान सही तरीके से, सही टाइम पर करने लग जाएं, तो मैं समझता हूँ कि सही सरकार बनेगी । मुझे यह कहने में कोई शंका नहीं है । पहली बार इस देश के अंदर इतना बड़ा मतदान हुआ है । नरेन्द्र भाई मोदी जी के नेतृत्व में हम सब लोग यहाँ पर चुनाव जीतकर आए हैं । अगर मैं बात करना चाहूँ तो भारतीय जनता पार्टी, जिस पार्टी से मैं आता हूँ, नरेन्द्र भाई मोदी जी के सानिध्य में हम लोग चुनाव जीते हैं, जब हम लोग अपने निर्वाचन क्षेत्र में वोट माँगने के लिए गए थे, तो गाँव का हर व्यक्ति, गरीब व्यक्ति, गरीब महिला हमसे कह रही थी कि मोदी जी के नाम पर हम इस देश को विकास के पथ पर आगे बढ़ाना चाहते हैं । मोदी जी के नाम पर हम यह वोट देंगे । हमने इतनी बड़ी परीक्षा पास की है, तो मैं कह सकता हूँ कि इस कसौटी पर यह सरकार खरा  उतर  रही है और विकास की योजनाओं में यह सरकार भागीदारी जता रही है । मैं कह सकता हूँ कि आज अनिवार्य मतदान इस देश के लिए बहुत अनिवार्य है । जो व्यक्ति मतदान न करे, उसके लिए जुर्माना लगना चाहिए, चाहे वह जुर्माना बहुत छोटा ही क्यों न हो, ताकि आने वाले समय में वह मतदान करने के प्रति जागरुक रहे ।

          महोदय, जब हम लोग एक सामान्य नागरिक के रूप में टैक्स दे रहे हैं, जब सामान्य नागरिक के रूप में हम लोग शिक्षा ले रहे हैं, हम लोग न्याय की प्रक्रिया कर रहे हैं, तो हम लोगों को चाहिए कि हम एक नागरिक कर्तव्य निभाते हुए मतदान करें । मैं समझता हूँ कि चुनी हुई संसद और सरकार की अत्यधिक मतदान की इच्छा के कारण लोकतंत्र मजबूती का एक सहारा है । अगर इस लोकतंत्र को मजबूत करना है, तो मतदान करना बहुत जरूरी है । अनिवार्य मतदान से लोकतंत्र और ज्यादा मजबूत होगा । जब हम चुनाव में जाते हैं तो हमारी सारी की सारी ऊर्जा मतदाताओं को लुभाने में लग जाती है । मैं समझता हूँ कि अगर हम अपनी सारी ऊर्जा को मुद्दों पर लगायें, तो यह लोकतंत्र और ज्यादा मजबूत होगा ।

          मैं आपके माध्यम से सिर्फ इतना कह सकता हूँ कि इससे सभी राजनीतिक दलों को आर्थिक बचत भी होगी और कार्यकर्ताओं को हर मतदाता को बूथ पर लाने के लिए, उनको रिझाने के लिए अनाप-शनाप खर्चा भी नहीं उठाना पड़ेगा । अनिवार्य मतदान होना चाहिए । अनिवार्य वोटिंग से लोकतंत्र सफल होगा और सबकी भागीदारी से सरकारें बनेंगी । मैं समझता हूँ कि मतदान पर सबसे ज्यादा खर्च हमारे देश में होता है । रूडी साहब बता रहे थे कि मतदान पर 4-5 हजार करोड़ रुपये का खर्चा इस देश को चुनाव में उठाना पड़ता है । इसलिए देश में अनिवार्य मतदान करना चाहिए ताकि यह पैसा हमारे देश के विकास में लग सके । देश का विकास तभी संभव हो पायेगा, जब भारत के गरीब व्यक्ति, अंतिम छोर पर बैठे हुए व्यक्ति को यह समझ आ जायेगा कि मतदान करना हमारे लिए कितना जरूरी है और तब जाकर यह देश विकास के पथ पर पहुँचेगा ।

          सभापति महोदय, मैं अपनी बात को खत्म कर रहा हूं । मैं जानता हूं कि यहां पर भी समय की पाबंदी है । मैं आपके माध्यम से कह सकता हूं कि हमारे देश में मतदान जरूरी होना चाहिए, मतदान अनिवार्य होना चाहिए । देश मजबूत करने के लिए हम लोगों को मतदान करना चाहिए । मतदान 99 परसेंट हो, चाहे वह पंचायत का, नगरपालिका का, विधान सभा का या लोक सभा का चुनाव हो । अगर इन चुनावों में ज्यादा से ज्यादा मतदान होगा, तब जाकर यह लोकतंत्र मजबूत होगा, हमारा देश मजबूत होगा, विकास के मामले में हम लोग आगे निकलेंगे ।

          नरेन्द्र भाई मोदी ने भारत को विश्व गुरु बनाने का जो फैसला किया है, यह तभी हो पाएगा जब प्रत्येक व्यक्ति मतदान करेगा और तब जाकर यह देश मजबूत होगा ।

          सभापति महोदय, मैं इस विधेयक का समर्थन करता हूं । आपने मुझे बोलने का समय दिया, मैं आपको भी अपनी तरफ से धन्यवाद दूंगा ।

          बहुत-बहुत धन्यवाद । जय हिन्द ।

 

श्री भर्तृहरि महताब (कटक): महोदय, धन्यवाद । This is not the first time that we are discussing this topic, ‘compulsory voting’. This will be the third time in this House that I am speaking on this subject. Of course, for the second time, Shri Sigriwaliji has moved this Bill in the 17th Lok Sabha. Firstly, in the 16th Lok Sabha, he moved it.

          Before that, the then representative from Delhi, Shri Jai Prakash Aggarwal had also moved a Bill relating to compulsory voting. At that time, jokingly, I told him: “You have the Government in Delhi State.  Why do not you try this compulsory voting in Delhi State itself?” If it is successful in Delhi State Assembly, it will be an example for rest of the country and of course, the Election Commission and other respective political parties may think over it.

          During that period, an attempt was being made in Gujarat also. A unanimous resolution or Bill was passed by the Gujarat Assembly to have municipal elections in a compulsory mode so that every voter of respective municipal corporations or urban bodies will be asked to vote compulsorily.

          I will come to that aspect later. In this Bill, other than enforcing the compulsory voting, hon. Member has also mentioned about the special arrangements for senior citizens और उसके साथ पनिशमेंट । अगर कोई वोट न दे तो उसे क्या पनिशमेंट हो सकती है, इसके बारे में इन्होंने लिखा है – fine of Rs.500, two-days imprisonment, forfeiture of ration card वगैरह-वगैरह बाकी सारी बातें लिखीं हैं । इसके साथ इन्होंने लिखा है - Incentive for voting, जिसके बारे में Shri Rajiv Pratap Rudy has also mentioned that a little bit of incentive is required.

          Before coming to the issue of compulsory voting, very interestingly, I would like to say that एक माननीय सदस्य अमर शंकर साबले जी ने राज्य सभा में एक प्रश्न इसी महीने में 11 जुलाई को पूछा था । हमारे लॉ एण्ड जस्टिस मिनिस्टर ने बड़े अदब से उसका रिप्लाई दिया था । The question was, whether the Government has taken any action to implement compulsory voting in the country. The answer was that no such proposal is under the consideration of the Government”. यह  वर्ष  2019 का है । Earlier In 2010, a similar question was also put forth by Shri Prabhat Jha in Rajya Sabha. The question was, whether the Government has received any suggestion from a few States as regards making voting compulsory. The then Law Minister, Dr. Veerappa Moily replied that no proposal for making voting compulsory has been received from any State Government. इसी तरह का एक प्रश्न गुजरात के बारे में आया और उसमें कहा गया था कि that the matter is pending before the court. हमने आज भी सुना कि किस तरह गवर्नर साहब ने उसे एक्सेप्ट नहीं किया ।

Here, I would just like to mention this. नीति आयोग ने एक प्रस्ताव के हिसाब से बताया था कि इसे किया जाए । The CEO of NITI Aayog had suggested compulsory voting is worth a try. सरकार के पास कोई प्रस्ताव नहीं है । नीति आयोग हमारे देश का सबसे बड़ा थिंक टैंक है और उनकी तरफ से यह प्रस्ताव आया । I think that it is a loud thinking. जिसके हिसाब से उन्होंने फरवरी 2019 में इस बारे में कहा । इस हिसाब से हम देखते हैं कि what was the position in 2014? वर्ष 2014 के जेनरल इलेक्शन में the largest democracy, that is, India at that time had 81,40,00,000 people who were eligible to vote in that election. In 2019, it was around 91 crore. जिसका हिसाब आपने अपने इनिशियल रिमार्क्स में दिया था । Out of this, 66.40 per cent had voted in 2014. I have those figures with me. आपने 19 फिगर दे रखी थी । In the face of it, if you quantify 66.4 per cent, it is a high number. पूरे विश्व में इतने सारे लोग मतदान केन्द्र पर आकर अपना वोट डालें, ऐसा कहीं नहीं हुआ है । इसके साथ एक लिस्ट भी जुड़ी हुई है । इस लिस्ट में कहा गया है कि किस-किस देश में कितनी पोलिंग हुई है और इसमें सबसे आगे वियतनाम है । अब तक इसके नाम की किसी ने चर्चा नहीं की है । यहां 99.26 परसेंट वोटिंग हुई है ।

मेरा एक पर्सनल एक्स्‍पीरिएन्स है, विश्व में एक एशियन पार्लियामेंट्री असेम्बली है । खुशी की बात है कि In the 16th Lok Sabha, I was asked by the hon. Speaker to represent our Parliament in the Asian Parliamentary Assembly. जब मैं वहां पहुंचा, तो I was totally astonished because I had an impression about the Parliamentary democracy keeping India, Britain and some other Commonwealth countries in my mind. मैंने वहां देखा कि ईरान की मज़लिस है । It has a Parliament. सऊदी अरब की पार्लियामेंट है । तुर्कमेनिस्तान की पार्लियामेंट है । रूस की भी पार्लियामेंट है । जो एकात्मक शासन है, जिसको हम समझ पाते हैं कि इस तरह की ऑटोक्रेटिक गवर्नमेंट वहां है । उनका भी एक पार्लियामेंट है । उनके यहां भी पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी है । उसमें इराक और पाकिस्तान भी हैं । एशिया की जितनी भी पार्लियामेंट्स हैं, उनके रेप्रिजेन्टेटिव्स वहां होते हैं । We had a limited agenda from our country’s or Parliament’s point of view. Our Foreign Affairs officers were also guiding us on how to deal with the issues that were coming up before us.

हम जो लिस्ट देख रहे हैं, जैसे इसमें वियतनाम है । Vietnam also has a Parliament. Rwanda, which was next to Vietnam, had a figure of 98.80 per cent polling. सबसे नीचे के पायदान, यानी 109वें स्थान पर इंडिया आता है । यहां 66.40 वोटिंग हुई है । इसके ठीक ऊपर वर्जिन आईलैंड है, जिसका वोटिंग परसेंट 66.58 है । मैं कोई पुरानी लिस्ट नहीं पढ़ रहा हूं । This is the position, if we go into the percentage of voting. इसमें आता है कि क्वालिटी ऑफ वोटर्स क्या है?

          Here we come to know as to what is the quality of voters. इसके बारे में थोड़ी-बहुत चर्चा यहां भी हो चुकी है । In quality of voters, sense of participation in Government making, in law making,  हमारे सिटीजनरी कितने इक्विप्ड हैं, इसके बारे में चर्चा होनी चाहिए, जब हम कंपल्सरी वोटिंग को एनफोर्स करना चाहते हैं, मैं यही इनसिस्ट कर रहा हूं कि कंपल्सरी वोटिंग सिर्फ वोट पर्सेंटेज बढ़ाने के लिए नहीं होनी चाहिए । इसके बारे में जब वर्ष 1951 में रिप्रजेंटेटिव ऑफ पीपुल्स एक्ट पर चर्चा हुई थी, तब डॉ. बी.आर.अंबेडकर ने स्पष्ट स्वर में कहा था ।

Therefore, I would insist that  in democracy, that too in parliamentary democracy, every adult has a legal right to cast his or vote, and elect  a representative of his or her choice. Once you make voting compulsory, it will no more remain voluntary. The right of a citizen to make a choice is the right of liberty and that gets suspended once you make it compulsory.

 Globally, as many as 29 countries have experimented with compulsory voting. Presently, there are only around 11 countries which enforce these rules. For example, Australia, and Belgium levy fines. While Brazil and Peru restrict access to State benefits and social security if one does not vote. But Chile, Fiji, Netherlands, and Venezuela have abandoned compulsory voting. Even in Australia, one can say it is not enforced so strictly. Why should we think it is important? Compulsory voting improves voters turn out. But is that the end of it?  It prevents disenfranchisement of socially disadvantageous through bribe or covert threats. But do we not have a right to abstain from voting on a Bill, or even not to participate in a vote?

          Then, why can a citizen not have the same right? मैं यहीं बताना चाहता हूं कि यहां हाउस में राइट टू वोट है या नहीं, अगर हमारे ऊपर व्हिप नहीं है, तो we are free either to cast a vote or not cast a vote. मैं उस दिन का इंतजार करूंगा, अगर रवि शंकर प्रसाद जी के टेन्योर में if he comes out with a Bill that every Member or every Bill should be voted,  not by voice vote. We should press our electronic button, which should be displayed in the monitor. Our electorate will know whether I am present in this House or not; whether I have participated in the vote or not, through the media, and also through direct channel. My participation in the law making should be recorded. If that is not happening in the House itself, how can we enforce a proposed law that all eligible citizens who are entitled to vote should cast their vote? Otherwise, they would be penalised. Otherwise, the benefit which is being provided by the State should be withdrawn and they should be asked to explain.

Once I would rather insist that this Government can come up with some idea on how to ensure the full presence of the Members in this House and they should also cast their vote, and that should be recorded; and it should be displayed so that not only the constituency but also the whole country knows it.

Yesterday, there was voting.  We read in the papers today that these are the political parties who have supported the Bill; and these are the parties who have opposed the Bill. These are the parties which have walked out. How many Members were actually there inside the House? How many of them were not there? Let the country come to know.

          Let us make that compulsory first inside the House of elected Members who are representatives of the people of this country.

DR. NISHIKANT DUBEY (GODDA): What is your opinion on NOTA?

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : ‘None Of The Above’ button in the EVM is also a way of abstaining from giving an opinion.

DR. NISHIKANT DUBEY : Is it not the violation of article 324?

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : I leave it to our learned Law Minister to give an opinion on that. But NOTA has been accepted by all political parties. That is how the Election Commission is enforcing it.

17.50 hrs                       (Hon. Speaker in the Chair)           It is not only about giving an opinion on the above candidates, but also alerting the respective political parties that we are not choosing the above candidates which you have put forth before us to choose. That is why it is None Of The Above. Rather, you select someone else, we do not support this person as a candidate.

After the Tenth Schedule became a part of the Indian Constitution, party came into existence. Once party came into existence, then only NOTA became an addition to that which means the party candidate is not supported. But it is also an opinion. Not giving an opinion, as it was said by the famous former Prime Minister, is also an opinion.

DR. NISHIKANT DUBEY : But it was not Parliament.

 

SHRI BHARTRUHARI MAHTAB : It was in this country. It was said by our former Prime Minister. As article 326 guarantees the Right to Vote to every citizen above the age of 18, Section 62 of the Representation of People’s Act states that every person who is in the electoral roll of that constituency will be entitled to vote. This is not discriminatory but voluntary. So, in that respect, I would say that compulsory voting in itself is somewhat anti-democratic in the country because the freedom to speak necessarily includes the freedom of not to speak.

There is also a concern over enforcement of this rule on account of sheer number of voters in India. For example, in Australia, an amount of 5000 Australian Dollars is spent on defaulter to levy a simple fine of 50 Australian Dollar for not voting. What would be the situation in India? How much money has to be spent on that? I hope the initiator of this Bill has calculated that amount. Laws are made to be enforced but here is a case as in Australia where this piece of legislation is in the books but is rarely implemented. Should we have such a law in our statute which may not be implemented and if implemented, will be implemented in a very shabby way?

Let us recollect a piece of history. In 1951, as I was saying, during the discussion on the Representation of People’s Bill in Parliament, the idea of including compulsory voting was mooted by a Member. I am not naming that Member; I think, Nishikant Babu must be remembering him. However, it was rejected by Dr. B. R. Ambedkar on account of practical difficulty. Over the decades, various committees have discussed electoral reforms and a name that comes to my mind is of our learned Law Minister, Shri Dinesh Goswami. The Committee headed by Shri Dinesh Goswami in 1990 briefly examined the issue of compulsory voting. This was rejected on the ground that there are practical difficulties involved in its implementation.

Again, in July 2004, the Compulsory Voting Bill was introduced as a Private Member Bill by Shri Bachi Singh Rawat in the Lok Sabha. The Bill did not receive the support of the House and was not passed. As I mentioned, another Private Member Bill was rejected by Shri J. P. Aggarwal in 2009. The then Law Minister argued that active participation in a democratic setup must be voluntary, not forced. But a major thrust, as I was telling, was to increase the percentage of voting which has been happening, at least, during the last three elections.

Voting percentage this time has gone up to 71. Last time, it was 66.4 per cent, and before that in 2009 it was around 61 per cent or something like that. This shows that consciousness among people is rising. Especially, the younger electorate are coming in large numbers to the polling booths. They want to see a change in the country, change for the betterment of their own living standards and to get better opportunities.

The manner in which our political parties in this country involve themselves in electioneering, it does not happen in that large numbers even in the United States. I think the Law Minister can come up with that figure. Percentage of voting in the United States is not above 52. They have never said that they need a compulsory voting system in their country. Why should we insist on compulsory voting here when the percentage of voting is high and increasing?

As I said, freedom is something which is enshrined in our Constitution. It is a right. It is a right to cast vote and it is a right not to cast vote. I would, therefore, say compulsory voting in India is a bad idea.

          An interesting petition was filed in 2015. I do not know whether the mover of this Bill has been very much influenced by that petition which was filed by Mr. Satya Prakash who wanted mandatory voting to be enforced in India. The NDA Government then said that exercising one’s franchise is the fundamental right of every citizen but it is not a duty. Last time Nishikant babu was mentioning about it. It is a right; it is not a duty. Once you make it a duty, you can make it compulsory. One can argue on both sides. To enforce your right, make it a duty. But once you make it a duty, the right of every citizen will come down. The 25th Law Commission Report said that electoral rights of the voter include the right to vote or refrain from voting.

          In 1951-52, the voting took place for three months. In 2019, it took eight weeks. Should it be so long? This is a question I think the Government should answer. We have heard of ‘One Nation, One Election’. Can this Bill stand the scrutiny of law? First, compulsory voting has to be a duty, not a right.

          With these words I would say that compulsory voting may be a good idea but it is very difficult to enforce it. Once we recognise the right and the freedom that is enshrined in our Constitution, let us not make it compulsory. Let us create more awareness in the country so that many people come to the polling stations and cast their vote and form a new India.

          Thank you.

   

श्री राजेन्द्र अग्रवाल (मेरठ): माननीय अध्यक्ष जी, यह बहुत ही सुखकर है कि प्राइवेट मैम्बर्स बिल चल रहा है और आप स्वयं सदन की अध्यक्षता कर रहे हैं । मैंने कभी प्राइवेट मैम्बर्स बिजनेस में ऐसा नहीं देखा, इसके लिए आपका अभिनंदन है ।

          आपने मुझे जनार्दन सीग्रीवाल जी द्वारा प्रस्तुत अनिवार्य मतदान विधेयक पर बोलने का अवसर प्रदान किया, इसके लिए मैं आपका बहुत आभारी हूं । जब भी इस बिल पर चर्चा करने का अवसर आया, बहुत विद्वता के साथ सम्मानीय सदस्यों ने अपने विचार रखे । यहां उदाहरण भी दिया गया ‍कि आस्ट्रेलिया और अन्य देश जहां अनिवार्य मतदान एक विषय है, मैं उन देशों का नाम लेना आवश्यक नहीं समझता हूं । भारत जैसा विशाल देश, जहां डाइवर्सिटी भी है, जहां का साइज़ बहुत बड़ा है, जहां अभी भी असाक्षरता है, जहां अभी भी दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में लोग बसते हैं ।

18.00 hrs वहां मुझे नहीं लगता है कि उस अनुभव के आधार पर हिन्दुस्तान जैसे देश के अंदर अनिवार्य मतदान की व्यवस्था सफल हो सकती है । यह ठीक है कि अनिवार्य मतदान बिल के माध्यम से मतदान का प्रतिशत क्रमश: बढ़ता रहे, इस विषय में और भी उपाए किए जाएं, मतदान का प्रतिशत क्यों कम हुआ है, इसकी चिंता भी की जानी चाहिए ।

माननीय अध्यक्ष: छ: बज गए हैं । राजेन्द्र अग्रवाल जी आप अपना भाषण अगली बार जारी रखेंगे ।

डॉ. निशिकांत दुबे : अध्यक्ष महोदय, प्राइवेट मेम्बर बिल के 45 मिनट बर्बाद हो गए हैं । मेरा आग्रह होगा कि आप 15 मिनट प्राइवेट मेम्बर बिल के लिए दे दीजिए । राजेन्द्र अग्रवाल जी के बाद दुष्यंत सिंह जी इनीशिएट कर देंगे और उसके बाद जीरो आवर ले लिया जाए ।

माननीय अध्यक्ष: अगर हाउस की सहमति है तो मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है । माननीय मंत्री जी से सलाह ले लीजिए ।

संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री तथा भारी उद्योग और लोक उद्यम मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री अर्जुन राम मेघवाल): जब बिल पास कर रहे थे तो यह तय हुआ था कि इसको थोड़ा बढ़ाया जा सकता है ।

माननीय अध्यक्ष: 10 या 15 मिनट के लिए । आप बताइए, यदि आपकी इजाजत हो तो ।

श्री रवि शंकर प्रसाद: सर, मित्रों के लिए मुझे कोई आपत्ति नहीं है । लेकिन उत्तर आज नहीं होना चाहिए । …(व्यवधान)

डॉ. निशिकांत दुबे : उत्तर आज है ही नहीं । अभी तो 8 स्पीकर्स बचे हैं । …(व्यवधान)

माननीय अध्यक्ष: 15 मिनट प्राइवेट मेम्बर बिल के लिए बढ़ाया जा रहा है । श्री राजेन्द्र जी के बाद श्री दुष्यंत जी बोलेंगे, आज आप बोलेंगे न, आप के लिए समय बढ़ा रहे हैं । केवल 15 मिनट, फिर 15 मिनट जीरो आवर भी है ।

श्री राजेन्द्र अग्रवाल: अध्यक्ष जी, मुझे ऐसा लगता है कि इन विषयों के ऊपर मैं माननीय सदन का अधिक ध्यान दिलाना चाहूंगा, राजनीतिक नेतृत्व के प्रति और कुछ सीमा तक सदन और सांसदों के प्रति भी आचरण के परिणामस्वरूप अनास्था का वातावरण पैदा हुआ है, उससे मतदान प्रतिशत प्रभावित हुआ है । अभी हमारे आदरणीय रूडी जी अपना भाषण देकर चले गए, उन्होंने एक बात कही कि हम मत मांगने के लिए जाते हैं और मत मिलता है । मत मिलने के पश्चात् आम मतदाता यह देखता है कि हम एक बड़े स्थान पर पहुंच गए हैं, उच्च स्थान पर पहुंच गए हैं, हमारा मंत्रियों से संपर्क है, हम प्रधान मंत्री के साथ बैठते हैं, हम स्पीकर महोदय के साथ बैठते है । उसको लगता है कि हमने जिसको मत दिया, जो मेरे यहां मत मांगने के लिए आया था, वह एक उच्च स्थान पर पहुंच गया और इसमें मुझको हिस्सेदारी नहीं मिल रही है । वह अपनी हिस्सेदारी की डिमांड करता है । वह जब देखता है कि एक व्यक्ति सत्ता पर अधिष्ठित हो गया, उसका सुख बढ़ गया तो उसके अंदर जरूर डिमांड करेगा ।

 

मैं ऐसा समझता हूं कि उस आम मतदाता  को हिस्सा इसलिए नहीं मिल सकता क्योंकि जो प्रतिनिधि चुन कर आया है, उसने सादगी और सेवाव्रत का पालन नहीं किया, जिसकी अपेक्षा थी । वह अपना अधिकार मांगता है, सत्ता में भागीदारी मानता है । सत्ता में उसको भागीदारी मिलना संभव नहीं थी इसलिए उसको एक प्रकार का डिस्‍अपाइंटमेंट हुआ, इसीलिए सत्ता का स्वरूप बना, जनप्रतिनिध का स्वरूप बना । उसको ऐसा लगता है कि जिसको मैंने चुना है वह सेवा भाव से काम नहीं कर रहा है । वह सत्ता उपभोग की दृष्टि से काम कर रहा है । इसके कारण से अनास्था का निर्माण हुआ है ।

सदन के अंदर कई बार होता है । आज ही जो घटना घटी, मैं उसके बारे में ज्यादा विस्तार से नहीं कहूंगा, जब कोई सांसद बोलते हैं तो हमेशा बोलते हैं कि यह अगस्त हाउस है, माननीय सदन है, सर्वोच्च पंचायत है । इसके बाद भी यहां किस प्रकार की बातें हो जाती हैं । संसद के विषय में मीडिया और कवि सम्मेलनों में ऐसी टिप्पणियां होती हैं, जो बड़ी चिंताजनक होती हैं । यह व्यवहार भी अनास्था पैदा करता है । इस अनास्था ने भी सामान्यजन को मतदान प्रतिशत अधिक न रखने के लिए विवश किया है । हम जब यहां खड़े हैं, मैं समझता हूं कि सदन के सदस्यों और राजनीति में काम करने वाले व्यक्तियों की बड़ी जिम्मेदारी है कि इस प्रकार का प्रभाव पैदा न करे जिससे सामान्य जन को मतदान के प्रति रुचि कम हो । इस दृष्टि से माननीय प्रधान मंत्री जी का विशेष अभिनंदन करना चाहूंगा । जब वे पहली बार संसद में आए थे, तो उन्होंने लोकतंत्र की इस मन्दिर को प्रणाम करके संसद में प्रवेश किया था । हम यह भी देखते हैं कि संसद के अंदर वे सभी सदस्यों से अपील करते हैं कि इस संसद की व्यवस्था को देखिए, समझिए और इसकी गरिमा को बढ़ाइए । हम अनुभव कर रहे हैं कि उसके कारण संसद के अंदर स्तर में सुधार आया है ।

हमारे प्रधान मंत्री कहते हैं कि जब बच्चा 18 वर्ष का होता है, वह 18 वर्ष की आयु पूर्ण कर लेता है तो वह देश का निर्माता बन जाता है, भाग्य विधाता बन जाता है । आज हमारे यहां 16 संस्कार तो प्रचलित नहीं है, चार-पांच संस्कार ही प्रचलन में हैं । लेकिन कई बार उन्होंने कहा है कि जब बालक की 18 वर्ष की आयु पूरी होती है तो एक मताधिकार प्राप्त करने का कार्यक्रम भी होना चाहिए । यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण है और मैं इस बात का इसलिए उल्लेख कर रहा हूं क्योंकि इस प्रकार का कार्यक्रम होने से शायद इस बात की जिज्ञासा होगी और एक कर्तव्य का निर्माण होगा कि अब मैं 18 वर्ष का हो गया हूं । मैं देश के लोकतंत्र में भागीदार हो गया हूं । मुझे देश के शासन का निर्णय करने का अधिकार हो गया है । इसलिए मैं अब सक्रिय रहूं । प्रधान मंत्री जी का विषय बहुत महत्वपूर्ण है । हमें इस बात को चैतन्य में लाना चाहिए । हमारे व्यवहार के कारण या राजनीतिक क्षेत्र में रहने वाले लोगों से अनास्था का निर्माण होता है, जिसकी हमें चिंता करनी चाहिए । मैं एक छोटी सी बात कहना चाहता हूं । मैंने देखा है कि प्रत्येक चुनाव के अन्दर ऐसी बहुत सी शिकायतें आती है कि मतदाता सूची से उनका नाम हट गया है । ऐसी शिकायतें प्रत्येक क्षेत्र से आती हैं । मैं बहुत से चुनावों में देखता आ रहा हूं । मैंने तीन चुनाव लड़े हैं । अनेक चुनाव उससे पहले लड़ाए भी हैं । शिकायतें आती हैं कि कहीं मोहल्ले के मोहल्ले गायब हो गए, कहीं पर मतदाता सूची में परिवर्तन हो गया और अंतिम सूची, जो आई, उसमें उनका नाम नहीं है । ये समस्याएं सामने आती हैं । मेरा ऐसा अनुमान है कि इस समस्या के कारण भी दो या तीन प्रतिशत का मतदान कम हो जाता है । इसकी कुछ व्यवस्था हो भी सकती है जैसे यदि आधार से सभी चीजें जुड़ जाएं तो ये समस्याएं कम हो सकती हैं । रविशंकर जी, जो कानून के मंत्री हैं, वे आधार के विषय को भी देखते हैं । आधार के साथ मतदाता को जोड़कर सूची बनाते हैं । दूसरी बात यह है कि कोई भी मतदान हो, चाहे लोकल बॉडीज का हो, विधान सभा का हो, संसद का हो, जिला पंचायत का हो या किसी भी प्रकार का मतदान हो, यदि मतदाता सूची एक हो सकती है तो यह जो दोष है कि सूचियों में से कुछ के नाम हट जाते हैं तो इस पर बहुत अधिक नियंत्रण हो जाएगा । अभी स्थिति यह है कि नगर निगम की सूची अलग होती है, जिला पंचायत की सूची अलग होती है, विधानसभा की सूची अलग होती है । यह ठीक है कि हर बार नए मतदाता जुडेंगे, लेकिन सूची की सूची को दोबारा से बनाने की जरूरत नहीं रहेगी । ऐसी व्यवस्था अगर की जा सके तो मतदान को बढ़ाने में इसकी भूमिका हो सकती है । मतदान का विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सहभागिता के बिना लोकतंत्र यशस्वी नही हो सकता । हमारे प्रधान मंत्री जी जो अभियान चला रहे हैं, चाहे स्वच्छता का अभियान हो, चाहे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का अभियान हो, उन्होंने सभी को एक नई बात कही है कि हम लोग वृक्षारोपण के साथ जुड़ें, जल के साथ जुड़ें, तो यह जन सहभागिता के बिना संभव नहीं है । इसमें कोई संदेह नहीं है कि सिग्रीवाल जी जिस विषय को लाए है, वह जन सहभागिता के माध्यम से लोकतंत्र को यशस्वी करने की ओर इशारा जरूर करता है । मैं उनके बिल का स्वागत भी करता हूं, परन्तु मुझे जरूर लगता है कि अनिवार्य मतदान का विषय भारत में शायद व्यवहारिक नहीं है । हां, उसके माध्यम से अधिक से अधिक लोग मतदान करें, अपनी भूमिका निभाए, यह बहुत आवश्यक है, यह आज हो भी रहा है । मैं इतना कहकर अपनी बात समाप्त करता हूं ।

 

श्री दुष्यंत सिंह (झालावाड़-बारां): स्पीकर महोदय, धन्यवाद । आज मुझ से पहले आदरणीय सांसद जो मेरठ से हैं, उन्होंने अभी कहा कि पहली बार देखा है कि हमारे माननीय स्पीकर साहब आज खुद प्राइवेट मैम्बर्स बिल पर इतनी रुचि लेकर सभी युवाओं को और सभी पार्टियों के लोगों को प्रोत्साहित कर रहे हैं ।

मुझे इतना गौरव का आभास होता है कि आप हमारे हड़ौती क्षेत्र से पधारते हैं,  हमारे क्षेत्र से आपके अच्छे ताल्लुकात हैं और वहीं से आपने अपना पूरा राजनीतिक जीवन व्यतीत किया है, इसलिए आपको वहां देखते हुए हमें बहुत अच्छा लगता है कि आप और उंचाई तक पहुंचें, हमारे क्षेत्र का नाम, हड़ौती और राजस्थान का नाम ऊपर ले जाएं । आज आपने मुझे, आदरणीय सीग्रीवाल जी द्वारा लाए गए कम्पलसरी वोटिंग बिल, 2019, पर बोलने का मौका दिया है । मैं देश के पूर्व प्रधान मंत्री आदरणीय वाजपेयी जी को कोट करना चाहता हूं, उन्होंने अपने वोट ऑफ कांफिडेंस के समय यह बात कही थी :

“पार्टियां आएंगी, जाएंगी । सरकारें बनेंगी,‍ बिगड़ेंगी, लेकिन देश रहेगा । यहां देश रहना चाहिए और इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए ।” वर्ष 1952 से चुनावों की शुरुआत हमारे देश में हुई है । पहली लोक सभा के चुनाव से हम देश में चुनाव देख रहे हैं, लेकिन वोटिंग का परसेंटेज बहुत कम होता था । आज आदरणीय मोदी साहब को देखते हुए, उनके नेतृत्व को देखते हुए, उनके अच्छे कामों को देखते हुए, उनके द्वारा किए जा रहे प्रगति के कार्यों को देखते हुए, देश का युवा, देश हर नागरिक, दलित वर्ग, पिछड़ा वर्ग, किसान, माताएं-बहनें, युवा, बुजुर्ग आदि सब लोग लगे हुए हैं । वे जानते हैं कि यह सरकार उनकी है और उनकी सरकार प्रगति की तरफ आगे बढ़े । उनको देखते हुए, इस बार पहली बार वोटिंग परसेंटेज 65 प्रतिशत से 70 प्रतिशत रही, जो पिछले कई सालों में कभी हो नहीं पाया । यह हमने इसलिए  देखा है, क्योंकि इलेक्शन का प्रबंधन इलेक्शन कमीशन ने बहुत अच्छा करने का प्रयास किया है । उन्होंने बूथ को छोटी-छोटी जगह बनाने की व्यवस्था की । चाहे अरुणाचल प्रदेश हो या कश्मीर का क्षेत्र हो या दक्षिण भारत का क्षेत्र हो या हमारे बाड़मेर का क्षेत्र हो या दीमापुर का क्षेत्र हो या कोई भी मुश्किल क्षेत्र हो, पूरे देश में उन्होंने इलेक्शन कमीशन की टोलियां भेजकर काम करने का प्रयास किया । जब हम कश्मीर  में  चुनाव देखते हैं तो लगभग चार से पांच प्रतिशत पोलिंग हुई है । आज हम देखते हैं कि जो अर्बन क्षेत्र है, शहरी क्षेत्र में मतदाता जब वोट देने जाता है, उसमें जितना जोश होना चाहिए, कभी-कभी वह हमें देखने को नहीं मिलता है । मेरा संसदीय क्षेत्र – बारां-झालावाड़ क्षेत्र हैं, वहां हम पहली बार लगभग 72 प्रतिशत वोटिंग कर पाए हैं । वह इसलिए कर पाए हैं, क्योंकि माननीय इलेक्शन कमीशन की व्यवस्था और माननीय मोदी साहब को देखते हुए लोगों ने वोट दिया है ।
माननीय अध्यक्ष : आप आज तक झालावाड़ सीट से अधिकतम वोटों से जीते हैं, यह भी बताइए ।
श्री दुष्यंत सिंह : आदरणीय मोदी साहब को देखते हुए, उनके अच्छे कामों को देखते हुए, हमने यह काम करने का प्रयास किया है । इसको देखते हुए एक खुशहाली का मौका आता है, जब पांच साल बाद हमारे माननीय कार्यकर्तागण गांव-गांव, घर-घर, टोलियां बनाकर जाते हैं, उस समय एक उत्साह का वातावरण होता है, एक फेस्टिव सीजन की तरह होता है, क्योंकि हमारे संविधान निर्माताओं ने यह मौका दिया है कि हर पांच साल में आकर हम सरकार बनाएं ।
मुझे यह बात कहने की बहुत जरूरत है कि अगर हम वोट को कम्पलसरी करेंगे तो यह हमारे डेमोक्रेटिक राइट का इनफ्रिन्जमेंट है । हमारा फंडामेंटल राइट और लिबर्टी है ।
माननीय अध्यक्ष : माननीय सदस्य, क्या आप अगली बार कंटीन्यू करेंगे?
श्री दुष्यंत सिंह : सर, हम यह अगली बार कंटीन्यू करेंगे ।
   
माननीय अध्यक्ष : आप सभी एक-एक मिनट में अपनी बात सदन में रखें ।