Legal Document View

Unlock Advanced Research with PRISMAI

- Know your Kanoon - Doc Gen Hub - Counter Argument - Case Predict AI - Talk with IK Doc - ...
Upgrade to Premium
[Cites 0, Cited by 0]

Lok Sabha Debates

Regarding Plight Of Farmers, Youth And Working Class Both In The Organized And ... on 5 February, 2004

14.56 hrs. DISCUSSION UNDER RULE 193 PLIGHT OF FARMERS, YOUTH AND WORKING CLASS BOTH IN THE ORGANISED AND UNORGANISED SECTORS Title : Regarding plight of farmers, youth and working class both in the organized and unorganized sectors.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, we shall take up item No. 32 – Discussion under Rule 193.

Shri Tarit Baran Topdar.

SHRI TARIT BARAN TOPDAR (BARRACKPORE): Mr. Deputy-Speaker, Sir, today is the last day of the 13th Lok Sabha. It was expected that when the Government have placed the Interim Budget, they should have come with the balance sheet of what has been done, what has not been done and what could be done. They have placed the Interim Budget beyond their limit. They have made an economic statement beyond their limit without placing the Economic Survey before placing the Budget. They did not allow the Parliament and the country to know what to their understanding is the condition of the economy of the people at large, the working class, the peasantry and the youth.

14.57 hrs (Shri P.H. Pandian in the Chair) Mr. Chairman, Sir, they have denied the country to know all about this. Therefore, on the last day of this Parliament, I rise here to point out before the House and the country at large that this Government has plundered the economy. As a result, crores of people, crores of youth have become unemployed, lakhs of workers have lost their jobs and laks of workers are not getting their statutory dues.

Sir, only yesterday, our esteemed colleague, Shri Basu Deb Acharia was making points on this issue. The balance sheet of the WTO regime and the balance sheet of surrender before the United States reveal that we have brought down our subsidy in agriculture. America has given bonus points on agricultural subsidy. Japan is paying 72.5 per cent subsidy in agricultural sector. But we have reduced it, almost to zero, and both direct and indirectकुल मिलाकर तीन परसेंट होगा। Under this grim situation, we are discussing about the plight of the workers, both in the organised and unorganised, the peasantry and the youth.

15.00 hrs. This is a class-divided society. I and the like minded persons, such as my colleagues, do believe that in this class-divided society, the Government representing the traders, representing the big capitalists, representing and holding the brief of the multinationals will do little to the people in the course of serving their bosses. That is what has happened. In doing so, not crores of rupees but thousands of crores of rupees have been misappropriated by the bureaucrats, their political bosses and their henchmen. Therefore, the situation has become all the more grim.

इसके बारे में मैं दो-तीन बातें कहना चाहूंगा क्योंकि ज्यादा कुछ कहने के लिए नहीं है। जो सरेंडर कर गये, यूनाइडेट स्टेट के पास जो सरेंडर हो गये, जो १० परसेंट का स्वार्थ देखता है, जो १० से १५ फीसदी लोगों को रिप्रैजैंटेटिव करता है, कई जातियां ऐसी हैं जो २० परसेंट लोगों के पास जितने साधन होंगे, उनकी सेवा करने के लिए, उनकी सर्विस करने के लिए बाकी का इम्प्लायमैंट जनरेट करेंगी। यह आपकी फिलोसफी है। You are all out to do for the 20 per cent and the remaining 80 per cent will serve them. In this way, you will generate employment. This is your philosophy. २० परसेंट की सेवा करो तो ८० परसेंट का होगा। क्या यह कभी हो सकता है ? यह कभी नहीं हो सकता। इसलिए मेरा कहना है कि जो वायदे किये गये थे, उनमें से आज एक भी वायदा पूरा नहीं किया गया लेकिन अखबार में रोज एडवरटाइजमैंट आ रहे हैं। …( व्यवधान)सरकार का पैसा है, स्टेट का पैसा है, उसके बदले में अपना चुनावी एडवरटाइजमैंट शुरू किया हुआ है। लाखों करोड़ों रुपये का एडवरटाइजमैंट शुरू किया हुआ है जबकि एक भी वायदा पूरा नहीं हुआ। अब देखिये कि ४० परसेंट स्मॉल स्केल इंडस्ट्रीज बंद हो गयी हैं। ४० परसेंट स्मॉल स्केल इंडस्ट्रीज बंद करने के बाद क्या कोई इम्प्लायमैंट जनरेट कर सकता है ? सारी की सारी इंडस्ट्रीज बंद हो जायेंगी क्योंकि स्मॉल स्केल इंडस्ट्रीज में फॉरेन कैपिटल का दखल दिया गया है। यह इस गवर्नमैंट ने किया है। अब कोई ऐसी जगह नहीं है जहां पर फॉरेन फंडिंग न हो, फॉरेन इन्वेस्टमैंट न हो। इसलिए स्मॉल स्केल इंडस्ट्रीज अगर कोई इम्प्लायमैंट जनरेट नहीं कर पायी बल्कि पहले जो था, उसे खत्म कर दिया। इसके साथ-साथ जो बड़े-बड़े इंडस्टि्रयलिस्ट हैं, वे भी सारे खत्म हो जायेंगे।

एनजेएमसी की जो छ: मिलें हैं, एनडीएमसी क्यों बनाया गया? In order to protect employmentएनजेएमसी बनाया गया।In order to protect employment छ: जूट मिलों का राष्ट्रीयकरण हुआ था। इस समय तक इम्प्लॉयमैंट कम कर दी गई और मशीनें बंद कर दी गई। जो चंद मजदूर बचे हुए हैं. उनको क्लोज़र के रास्ते पर डालने के बारे में सोचा जा रहा है। अभी उनको कान्ट्रैक्ट बेसेज़ पर चला रहे हैं,next step will be closure. Gradually, the government has reduced employment instead of protecting employment. Ultimately, it is going to close it down. उनको काम से निकाला जा रहा है। आज हमारे देश में बेरोजगार लोगों की संख्या, जो इम्प्लॉयमैंट एक्सचेंज में रजिस्टर्ड हैं, चार दशमलव कुछ करोड़ के आस-पास है। असल में यह संख्या २० करोड़ के लगभग है। देहातों में लोग इम्प्लॉयमैंट एक्सचेंज में नाम रजिस्टर नहीं कराते। वूमेन अनइम्प्लॉयमैंट आदि सब मिलाकर २० करोड़ के लगभग हैं। The number of registered unemployed persons is more than 4 crores. यह देश की हालत है। यह वायदा था कि साल में एक करोड़ लोगों को रोजगार दिया जाएगा। असत्य बात कही जाती है। Incorrect and misleading statements are given that indirect employment has been generated. इनडायरैक्ट इम्प्लॉयमैंट कहां जनरेट की। बहुत लोगों को कम्पलसरी रिटायरमैंट दी गई, not VRS. It is not voluntary retirement but it is compulsory retirement. बहुत लोगों को रिटायर किया गया। क्या आपने उतना काम तैयार किया?

महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा आपने जो भाषण करवाया, उसमें कहा गया है कि करप्शन फ्री इंडिया देखना चाहते हैं।It is ridiculous. आप करप्शन फ्री इंडिया देखना चाहते हैं। सरकार के जो स्कैम केसेज़ हैं, वे करप्शन की रिडक्शन के रास्ते पर जा रहे हैं या करप्शन बढ़ाते जा रहे हैं। मैं बताना चाहता हूं किthe curse of unemployment is one of the grave aspects of the whole problem. Today, more than 18 crore young men and women are said to be unemployed. I am at a loss to understand how they can contribute to the nation’s regeneration when the President of India has asked for the youths to participate in the nation’s regeneration. देश के उत्थान के लिए नौजवानों की जो पुकार है, १८ करोड़ बेरोजगार हैं, चार दशमलव कुछ करोड़ रजिस्टर में हैं। यह कैसे है। रीजुविनेशन, रीकंस्ट्रक्शन ऑफ दी कंट्री में भाग लेंगे। किसानों की प्रॉबल्म में इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट में जो काम किया गया, उसकी क्वानटीटेटिव रिस्टि्रक्शन्स के बारे में जल्दबाजी में जो स्टैंड लिया गया, वह हमारे देश का नुकसान है। जल्दबाजी में यह सिद्धांत लेने के कारणBoth the industry and agriculture are suffering. कॉटन ग्रोअर्स की सिचुएशन खराब है। Jute growers are suffering. It has been referred to just now in the Calling Attention Motion. मनिमम सपोर्ट प्राइस, वह भी वैज्ञानिक आधार पर नहीं किया जाता है। सबसे भयंकर बात यह है किYou see the curve of investment in the agricultural sector – whether the investment in the agricultural sector is on the rise or on the decline. It is declining steeply in the last five years. बड़े-बड़े लोगों के लिए ब्याज दर कम हो गयी। ६ प्रतिशत में आप कार खरीद कर सकते हैं लेकिन एग्रीकल्चर सैक्टर में यदि आप लोन लेना चाहते हैं तो आप पर बारह से चौदह प्रतिशत ब्याज दर लगेगा। But if you want to purchase a car, you can get it at six per cent. किसको बढ़ावा दिया जा रहा है? बयाज-दर आपने डिपॉजीटर्स के लिए कम कर दी लेकिन गरीब के लिए ब्याज-दर अभी भी एग्रीकल्चर सैक्टर में तथा और दूसरे सैक्टर में अगर जाओ तो वहां अभी भी हाइ लैवल है। It was 18 per cent and now it is 14 per cent. But for purchase of a car it is six per cent. … (Interruptions) In the case of housing, it is seven per cent.

बड़े-बड़े लोगों के लिए आप कर रहे हैं। देखिए, बैंक नेशनेलाइजेशन होने के समय में हम लोगों ने खुलेआम सपोर्ट किया था। बहुत सारे कंट्राडिक्शंस थे। इंदिरा गांधी जी और कांग्रेस पार्टी के साथ लेकिन इसके बावजूद भी हम लोगों ने बैंक नेशनेलाइजेशन को सपोर्ट किया लेकिन इसके साथ एक चेतावनी भी हम लोगों ने दी थी। We support the Bank Nationalisation. A lot of friends on that side were against it. कुल मिलाकर एक मोर्चा बन गया लेकिनMany people on that side were against it. But we did support the Nationalisation of Banks but with a caution that the Government should not deprive the poorer sections and impoverish sections. The agricultural sector should not deny them all the facilities and all the advantages of banking facilities. Now, they can avail of all the banking facilities. But there are so many hurdles. If somebody can cross these hurdles, then they will have to pay more than what the rich people pay. एनपीए कितना हुआ?एग्रीकल्चर सैक्टर इंडस्टि्रयल सैक्टर और बड़े-बड़े सरमायेदारों के लिए कितना हुआ? एनपीए के लिए रैस्पांसिबल कौन है ? कितने परसेंटेज के लिए कितने लोग हैं और वे लोग कौन हैं और उनको पकड़ने के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए? पांच सालों में क्या एक भी कदम उठाया गया?

You just cite one example of your having taken a step except that the banks will be able to directly seize the property, without the help of the court. That will not take care of the problem of NPAs. That will never take care of this problem of NPAs. The problem of NPAs has to be addressed with a political will to do that. Who will do that? If the people responsible for NPAs are running this Government and are behind this Government, then how can the problem of NPAs be resolved in the interest of the country?

SHRI MANI SHANKAR AIYAR (MAYILADUTURAI): It is not NDA Government; it is NPL Government. … (Interruptions)

SHRI TARIT BARAN TOPDAR : Yes, it is the NPL Government. It is a non-performing Government. Nobody could feel that there was a Government. … (Interruptions)

SHRI MANI SHANKAR AIYAR : It is NPL Government because they are non-performing liability and not an asset.

THE MINISTER OF LABOUR (DR. SAHIB SINGH VERMA): The only asset is your leader.

SHRI MANI SHANKAR AIYAR : Well said, Dr. Sahib Singh Verma. This is one word of truth from you in this whole Session.

DR. SAHIB SINGH VERMA: Specially for you.

SHRI TARIT BARAN TOPDAR : Can you give an account of what you have done for irrigation? Can you give an account of what you have done for manures and fertilizers except closing down the Indian fertiliser factories. What do you say? I do not find any reason why factories manufacturing ammonium, phosphatic and other fertilizers and urea have been closed down. I do not know what is the ingredient that is necessary for manufacturing urea. Is that ingredient not available in our country? Urea is composed of oxygen, nitrogen and hydrogen and nothing else. It is composed of oxygen, nitrogen and carbon which can be obtained from various sources which are indigenously available almost in all the countries of the world, not to speak of our country only. That urea is being imported. Our fertiliser factories are being closed down and even after closing down these factories, they will boast of fulfilling their responsibility.

You just see the condition of people living in the slums. Sixty per cent of the urban population who live in slums in our country do not get enough employment. You should go and see what the people living in the slums are doing. Their food to eat is not shining at all. You say that India is shining, but 60 per cent of the population living in slums do not get employment and do not get food.

SHRI BIKRAM KESHARI DEO (KALAHANDI): Sir, in West Bengal, most of the organised sector has been disorganised by the Communist friends. … (Interruptions)

SHRI TARIT BARAN TOPDAR : I have cited an example of Jessop. Who has disorganised it? Who has done it? … (Interruptions) After nationalisation, Mundras have done it. Then, Mundras are behind this Government to plunder with the help of this Government. … (Interruptions)

DR. NITISH SENGUPTA (CONTAI): It should not have been taken over by the Government. … (Interruptions)

SHRI TARIT BARAN TOPDAR : Now, you are saying that it should not have been taken over by the Government. Now, you are establishing a new theory.

Then, NJMC has been disorganised and totally dismantled. Who has done this? Are you not responsible for that? … (Interruptions) Do not cite the example of West Bengal. There is not a single State … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : If you want to speak, you may also speak. After him, I will give time to you also to speak.

SHRI TARIT BARAN TOPDAR : There is not a single State that is shining without the help of the Central investments. The States that are thriving are thriving because of central investments. West Bengal has been denied Central investments for a long time. I do not want to go into that point, and let us leave it aside.

This issue is regarding 80 per cent of the rural population. They are impoverished, undernourished, and most of them do not get employment throughout the year. Are they shining? Are they feeling good? According to you they are also feeling good. Yes, 10 per cent of the people are feeling good, and above them, the political bosses and bureaucrats are feeling good. They are feeling very good because of the things that have happened to this economy. Similarly, 80 per cent people cannot get work and food to achieve the minimum nutrition that is required.

I will give one statistical figure. The FAO has given -- to be very precise and before you came --that between 1950-51 and 1997-98 -- the annual foodgrains absorption per head of population rose from 150 kg. to 175 kg. Since the last 50 years till 1998, the consumption of foodgrains increased by 25 kg., namely from 150 kg to 175 kg. By 2000-01, before the drought, it had fallen to 151 kg. and in the current year, namely in 2003-2004, it is likely to be at the same level.

The average Indian family is absorbing nearly 100 kg annually. It is less of foodgrains today than they were having five years ago. This is a dangerous situation that has been described not by us, but by an authoritative organisation. There has been a phenomenal drop, an unprecedented drop, which has never before been seen in the entire last century. ऐसी एक सिचुएशन द्वितीय वल्र्ड-वार के दौरान हुई थी or in 1943, when there was a great famine. Similar symptoms are found now-a- days. Only within a span of five years such a drop in the consumption of foodgrains is seen. How could you do it? I just fail to understand it. How could you allow it to happen? कम से कम १७५ के बराबर रहता। Had it been 175 kg. consumption, it would have been all right. But, इसे घटा दिया गया। हां, एफसीआई ने देश से बाहर गेहूं सब्सिडाइज्ड करके उन लोगों की गाय-भैंसों के खाने के लिए भेजा, जबकि हिंदुस्तान का इंसान उसके बगैर भूखा मर रहा है।

Subsidised foodgrains are being sent to foreign countries. …( व्यवधान)क्या एक भी केस नहीं है? क्या स्टारवेशन डैथ्स के केस नहीं हैं, क्या आत्महत्या के केस नहीं हैं? आन्ध्रा प्रदेश में कितनी आत्महत्या के केस हुए? हिन्दुस्तान के कितने किसानों ने आत्महत्या की? …( व्यवधान)

श्री रतन लाल कटारिया (अम्बाला) :भूख से कोई नहीं मरा। …( व्यवधान)

DR. M.V.V.S. MURTHI (VISAKHAPATNAM): They did not occur because of hunger. The reasons were different. You can blame the debt trap for that. Do not say that it all happened because of lack of food.

श्री तरित बरण तोपदार: यह कह रहे हैं कि भूख से नहीं मरा। उन्हें नक्सलवादियों ने मार दिया। आप आज इस बात को को समझ जाइए किhow are they feeling good? Rome is burning while these Neros are singing.

श्री रतन लाल कटारिया: आप कहां हैं?

श्री तरित बरण तोपदार: हम उधर हैं। जनता के साथ हैं। आज देश में जो बहुत खतरनाक स्थिति बनी है, उसे एनडीए सरकार ने बनाया है। मैं इसे एनडीए सरकार नहीं कहता हूं। इस स्थिति को बीजेपी सरकार ने बनाया है। यह कोई एनडीए सरकार नहीं है।It is only the Prime Minister who is working. No Minister is working.कानून के तहत नेशनलाइजेशन हुआ। उसे डीनेशनलाइज करने के लिए कानून लाना पड़ेगा। यह कानून को भी नहीं मानते। I do not say that what the Supreme Court has said is inadequate. But more has to be said by the Supreme Court. At the time of making those legislations, disinvestment was not on the agenda. When this new phenomenon of disinvestment has come into being, let us discuss the issue so that adequate legislation can be made for either facilitation or stalling of disinvestment. Let the country decide it. Let the Parliament decide it. Parliament had decided and taken over those entities. Now, by referring to a certain speech of a certain Minister the whole thing is sought to be disinvested and the whole thing is going to be handed over to the private sector. In our parliamentary democracy, parliamentary sense dictates me to say that it is not proper. It is an impropriety that has been committed by this Government so long.

MR. CHAIRMAN : Shri Topdar, you have already taken 35 minutes.

SHRI TARIT BARAN TOPDAR : Sir, I conclude by saying that rule of law, sense of democracy, adherence to parliamentary practices, parliamentary democracy, sense of parliamentary traditions - all these have been brushed aside, have been trampled upon.

15.29 hrs (Shri Devendra Prasad Yadav in the Chair) At the dictates of the United States they have surrendered not only in the economic sector but also in the foreign policy sector also, which I am not going to deal with today. As a result of that the minimum growth required could not be achieved. Talking about the foreign currency reserves, it is an absolute hoax. What is the amount of interest you are giving for that purpose?

श्री अनिल बसु (आरामबाग): राजनाथ सिंह जी को कल्याण मिले लेकिन देश का कल्याण नहीं हुआ।

श्री तरित बरण तोपदार (बैरकपुर) : इन लोगो का कल्याण हुआ लेकिन इनके सत्ता में रहने से देश का कल्याण नहीं होगा, यह बात ठीक है। फॉरेन करेंसी रिजर्व के लिए कैश कितना देना पड़ता है? यह किस का पैसा है? क्या सरकार का पैसा है? क्या आपका पैसा है? लेकिन मेरा कहना यह है कि इसके साथ वर्कर्स, पीज़ेंट्स, अनएम्पलायड यूथ्स का कोई ताल्लुक नहीं है, कैपिटल मार्किट, शेयर बाज़ार के उतार-चढ़ाव के साथ इसका कोई ताल्लुक नहीं है। Therefore, the Government which is trying to hoodwink the Parliament and the country should go immediately; and that is destined to go in the coming elections!     SHRI ANADI SAHU (BERHAMPUR, ORISSA): Thank you, Sir. After hearing Shri Topdar, I was just thinking, rather ruminating, to find out as to how West Bengal has been fairing in different aspects of workers, both organised and unorganised.

Going through the Indian Labour Statistics, I immediately got the papers to find out as to what type of work is being done in West Bengal. To my dismay, I did not find any statistics about the wages, compared to other States. You would be nearly astonished to find this out. … (Interruptions)

श्री अनिल बसु : आपUNDP की रिपोर्ट देखिये। … (Interruptions)

SHRI ANADI SAHU : I am coming to that.

In Kerala, a daily labour in agriculture is getting something like Rs.200, whereas in West Bengal, it is something like Rs.60 only. … (Interruptions) Please do not disturb me. I did not disturb you. Please listen to me. … (Interruptions)

श्री तरित बरण तोपदार: अगर किसानों की तरक्की हुई है तो वह बंगाल में हुई है और मज़दूरों के खिलाफ जो काम हुये, वे सैंट्रल गवर्नमेंट ने किये हैं ... (Interruptions)

SHRI ANADI SAHU : That is the impression which the Leftist group is giving. … (Interruptions) They are not allowing us to speak on this issue. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : Nothing will go on record.

(Interruptions) * SHRI ANADI SAHU : Please bear with me. I will also come to some good points of yours.

The organised and the unorganised sectors have been receiving adequate attention from the Government of India and from other State Governments also, *Not Recorded.

   

but it is not adequate. I would like to invite your attention to the facts relating to the organised sector. In the organised sector, the most important one is industry. … (Interruptions)

SHRI TARIT BARAN TOPDAR : Sir, I have left aside that issue. If the regional disparities are to be stated here, then, I am prepared to contest it. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Please take your seat. Nothing should go on record.

(Interruptions)* SHRI ANADI SAHU : Sir, I have the right to say that. Why is he creating problems for me?

In the industrial sector, there is a necessity of having good standing orders to evolve certain principles as to how labourers should be given wages and how other things should be done, etc. I would give the statistics about West Bengal. In West Bengal, 322 standing order issues are pending for years together. In the organised sector, how can he say that we are doing all those things? It is absolutely mandatory that there should be standing orders for different things.

I will come to the organised sector. So far as the organised sector is concerned, it is the concern of the Government as to how they should be regulated and how they should get better amenities, etc. I am not going into the organised sector itself, but I will give a point to say that the din and bustle that is created is absolutely hollow.

I will come to the unorganised sector. So far as the unorganised sector is concerned, the most important is the agriculture sector. I am supporting some of your views; so, please do not go out, Shri Topdar. Please do not go out.

*Not Recorded.

           

श्री डेन्ज़िल बी.एटकिन्सन (नामनिर्दिष्ट) : ये लोग ऐसे ही करते हैं, बोलकर चले जाते हैं।

सभापति महोदय : आप दोनों एक-साथ बोल रहे हैं, आप बैठिये। आपकी पार्टी के माननीय सदस्य श्री साहू बोल रहे हैं।

SHRI ANADI SAHU : Sir, I had fished out certain information about the state of affairs in agriculture. The most-not-looked after or I would say the most neglected part in the unorganised sector is agriculture sector. I have found out that in the rural household, 55.1 million people are working in the agriculture sector in different places.

Many of them are working in the agricultural sector and a very few are working in the non-agricultural sector in the rural areas. Those who are working in the agricultural sector, I would say, get a mere pittance as daily wages.

As I go through the statistics, I find that sowing and ploughing are two different matters to be taken up in the agricultural sector. So far as ploughing is concerned, in many of the States, wages given are good but so far as sowing is concerned wages are very limited. They work for the same eight to ten hours but different types of wages have been indicated. It is the duty of the State Governments to ensure that whosoever goes for the work, whether for ploughing or sowing, should get the same wages. It is also applicable to West Bengal, Orissa, Karnataka, Andhra Pradesh or to all the States in the country. Here, when we are thinking of the unorganised sector, we must think of the agricultural workers to ensure that the male and female workers get the same wages and they get all the benefits that are required.

You would kindly appreciate that recently the Government of India has taken up the matter of unorganised sector and as to how the unorganised sector should be adequately protected and how social welfare measures should be given to them in different ways. The most important one is, the Social Security Scheme for agricultural workers. In 2001, the Krishi Shramik Suraksha Yojana was introduced and it has been working in a very beautiful manner in this country. The only thing is, some of the friends who do not look at the brighter aspect of the things are trying to take a very dim view of the matter. That is deplorable. We must ensure that in our country the agricultural workers who are in the unorganised sector should be slowly brought to the organised sector.

The per-capita income has been increasing and if we want a better status for the agricultural people, they must get better wages and better facilities. The divide between the rural and urban people should go. The hon. President of India in his speech on the eve of the Republic Day had indicated about the Vision 2020. Therein, a provision, as to how the differences between the urban and the rural people should be closed or brought down, has been made so that the people in the rural areas mostly working in the unorganised sector get better wages and better facilities.

It is good that we are discussing this matter under Rule 193 but there are many things to be done. All the State Governments have to do it. The Central Government alone cannot do it. It is the State Government who has to come forward with different legislation and projects and the Labour Welfare Department should work properly. Here, I would like to say that whenever we are thinking of giving compensation for an injury or any such thing, the funds that are being sent from the Government of India are not reaching the people who have to get it. It is for the State Governments to ensure that whenever funds are sent to the State Governments from the Central Government, they are adequately distributed.

These are the things which I thought I should speak here. Since my friend has gone, there is no necessity to speak on West Bengal and I conclude.

श्री शिवराज वि.पाटील (लातूर) : श्रीमन्, मैं अपने भाषण में आंकड़े नहीं देना चाहता हूं। सारे आंकड़े फाइव ईयर प्लान्स, इकोनोमिक सर्वे ऑफ इंडिया और जो रिपोट्र्स सरकार द्वारा दी गई हैं, उनमें पहले से ही मौजूद हैं। मैं यहां किसी को कोट भी नहीं करना चाहता, क्योंकि दूसरों के विचारों के आधार पर मैं कह रहा हूं, ऐसी बात नहीं है। मैं अपने विचार के आधार पर यहां कुछ कहना चाहता हूं। हम १३वीं लोक सभा के आखिरी दिन यहां पर केवल टीका-टिप्पणी करने के लिए खड़े नहीं हुए हैं। हमसे यह पूछा जाता है कि हमने क्या किया और यह भी कहा जाता है कि पांच साल में इस सरकार ने जो किया, वह पहले की सरकारों ने पचास सालों में नहीं किया।

क्या ऐसा कहना दुरुस्त है या नहीं यह हम बताना चाहेंगे। जो गलतियां पहले हमारे ज़माने में हुई होंगी और इस सरकार के ज़माने में हुई होंगी, वह भी हम बताना चाहेंगे। आने वाले दिनों में हम किस प्रकार से काम कर सकते हैं, यह भी बताने की हम कोशिश करेंगे।

हम समझते हैं कि जो मुद्दे उठाए गए हैं और जो ऐसे मुद्दे हैं जिनका जवाब मिलना चाहिए, उनका जवाब सरकार की तरफ से आएगा। समय की कमी उनको भी हो सकती है, बहुत सारे माननीय सदस्य बोलना चाहते हैं, बहुत से मुद्दे हो सकते हैं, मगर कम से कम जो अहम मुद्दे हम यहां उठाने जा रहे हैं, उनके बारे में सरकार की क्या नीति है, उसे स्पष्ट किया जाए तो अच्छा होगा, ऐसा मुझे लगता है।

आज हम चर्चा कर रहे हैं कि काश्तकार, कामगार और युवाओं की हमारे देश में क्या स्थिति है। पहले हम काश्तकारों की चर्चा करेंगे। असल में हम कहते आए हैं कि हमारा देश कृषि प्रधान देश है। हमारे यहां ७० प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं, इसलिए कृषि का क्या महत्व है, कास्तकारों का इस देश में क्या महत्व है, इसे हम आसानी से समझ सकते हैं। हमारा देश ग्रामीण इलाकों में बसता है। ७० प्रतिशत से अधिक लोग ग्रामीण हिस्सों में रहते हैं और वे सारे के सारे कृषि पर ही निर्भर हैं। जब तक कृषि का सुधार नहीं होगा, खेती में सुधार नहीं होगा, तब तक देश का सुधार नहीं हो सकता, यह मानकर हमें चलना चाहिए। भारत के विकास का मतलब है ग्रामीण हिस्सों में रहने वाले लोगों का विकास। भारत के विकास का मतलब है कृषि का विकास या खेती का विकास या खेती में काम करने वाले लोगों का विकास। यह समीकरण मानकर हम चल सकते हैं। इसके लिए क्या चाहिए? पहली बात यह है कि इसके लिए नीयत चाहिए। इसके लिए यह जानकारी चाहिए कि ये जो लोग कृषि से अपना जीवनयापन करते हैं, उऩकी क्या हालत है। उनकी हालत को समझकर उनकी ओर सह्ृदयता से देखने की ज़रूरत है। अगर कोई समझता है कि हजारों सालों से ऐसी हालत चलती आ रही है, आज भी ये जी रहे हैं और बिना शिकायत के जी रहे हैं, तो ऐसे ही चलने दो, अगर ऐसा कहा गया तो उस व्यक्ति या उस सरकार या उस पक्ष की नीयत ठीक है, ऐसा नहीं कहा जा सकता।

क्या यह बात सही नहीं है कि कांग्रेस पक्ष द्वारा पहली पंचवर्षीय योजना कृषि के लिए बनाई गई थी? क्या यह बात सही नहीं है कि भाखड़ा-नंगल जैसे जलाशय यहां बनाए गए और सिंचाई की व्यवस्था की गई? क्या यह बात सही नहीं है कि हमारे देश को अन्न के क्षेत्र में स्वावलंबी बनाने के लिए श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने कदम उठाए और जब हमारी जनसंख्या ३० करोड़ भी नहीं थी, उस वक्त हमें बाहर से अनाज लाना पड़ता था और आज सौ करोड़ होने के बाद भी अनाज बाहर से लाने की ज़रूरत नहीं है। मगर हमारे पास इतना अनाज है कि वह सड़ रहा है और उपयोग में नहीं आ रहा है। इस प्रकार की शिकायतें सरकार के खिलाफ आने की परिस्थितियाँ निर्माण हो रही हैं। क्या यह बात सही नहीं है कि यहां जितनी भी एग्रीकल्चर युनिवर्सिटीज़ हैं, वे कांग्रेस के ज़माने में बनीं? क्या यह बात सही नहीं है कि नए बीज कांग्रेस की सरकार के ज़माने में दिए गए?

महोदय, क्या यह बात सही नहीं है कि नए प्रकार की खाद और नए किस्म के कीट-नाशक कांग्रेस के जमाने में दिए गए हैं? क्या यह बात सही नहीं है कि बैंकों का नैशनलाइजेशन होने के बाद किसानों को ज्यादा ऋण मिले? पहले बैंकों से किसानों को केवल २०० करोड़ रुपए कर्ज के रूप में मिलते थे, लेकिन बैंकों का राष्ट्रीयकरण होने के बाद काश्तकारों को ८० हजार करोड़ रुपए के ऋण मिले। देश के काश्तकारों को कहां पहले २०० करोड़ रुपए ऋण के रूप में मिलते थे, वहां बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद ८० हजार करोड़ रुपए ऋण के रूप में मिले। यह अपने आप में बहुत बड़ी रकम है। यदि बैंकों का नैशनलाइजेशन नहीं होता, तो यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती। ये सारी चीजें बताती हैं कि पहले की सरकार की यह इच्छा थी कि कृषि उद्योग के लिए इस प्रकार के कदम उठाए जाने चाहिए। अगर कोई यह कह रहा है कि हमने पांच साल में जो किया वह ५० साल में नहीं हुआ, यह कहां तक सही है, इसकी जांच-पड़ताल करने के लिए यह द्ृष्टिकोण काफी है, ऐसा मैं मानता हूं।

महोदय, बदकिस्मती की एक बात यह है कि जब भी कोई नई सरकार आती है, वह यही कहती है कि देश की कृषि की कोई नीति ही नहीं है। अगर हमारी एग्रीकल्चर की कोई पालिसी नहीं होती, तो लैंड टैनेंसी ला कहां से आता, यदि हमारी कृषि की नीति नहीं होती, तो लैंड सीलिंग लॉ कहां से आता और खेत में काम करने वाला जो मजदूर है, किसान है, उसे खेती नहीं मिलती, उसे खेतों का मालिक नहीं बनाया जाता। अगर हमारी कृषि नीति नहीं होती, तो हम देश में सिंचाई की व्यवस्था नहीं करते और अनेक प्रकार की जो मैंने बातें बताई हैं, उस प्रकार के कदम नहीं उठाए जाते।

महोदय, श्री राजीव गांधी जी ने, इसी सदन में इसी प्रकार से जब नौवीं लोक सभा खत्म होने वाली थी, तो एक या दो दिन पहले, वहां से, प्रधान मंत्री के नाते, एग्रीकल्चर नीति इस देश को दी, मगर उसके बाद जो सरकार आई, उसके एग्रीकल्चर मनिस्टर साहब ने कहा कि गवर्नमेंट की आज तक कोई एग्रीकल्चर पालिसी नहीं है, इसलिए हम कुछ नहीं कर सकते। यह सुनकर हमें बड़ा दुख हुआ कि एग्रीकल्चर मनिस्टर ही यह कह रहे हैं कि हमारे देश की कोई कृषि नीति नहीं है। मैं उनका नाम नहीं ले रहा हूं। मेरा उनका नाम लेकर उन्हें बदनाम करने का कोई मकसद नहीं है, लेकिन जिस सरकार के मनिस्टर को लगता है कि हमारे देश की कोई एग्रीकल्चर पालिसी नहीं थी, वे मनिस्टर एग्रीकल्चर को बढ़ाने के लिए क्या कर सकते हैं?उसके बाद उन्होंने एक एग्रीकल्चर पालिसी दी और वह एग्रीकल्चर पालिसी श्री राजीव गांधी जी द्वारा दी गई कृषि नीति के करीब-करीब थी। उसमें कुछ अदला-बदली जरूर की गई थी। कंप्यूटर के बारे में श्री राजीव गांधी ने जो कहा था, वह थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर कहा तथा जैनेटिक इंजीनियरिंग के बारे में जो कहा गया था, वह कुछ कम-ज्यादा करके, दूसरे शब्दों में कह दिया गया।

महोदय, मेरा दूसरा मुद्दा कृषि को बढ़ाने का है। अगर नीति के साथ-साथ नीयत भी साफ और नीति को समझकर अमल में लाने की बात है, यह बहुत जरूरी है। अगर पुरानी नीति काम नहीं आ रही है, तो हम यह नहीं कहते कि उसी को पकड़ कर रखिए। यदि उसमें परिवर्तन की आवश्यकता है, तो परिवर्तन कीजिए। यदि आप ऐसा करेंगे, तो हम उस कदम का स्वागत करेंगे, लेकिन ऐसा मानकर चलना कि ५० साल में एग्रीकल्चर की पालिसी ही नहीं बनी और हमने आकर बनाई, तो ठीक नहीं होगा। यह आज की सरकार ने पिछले पांच सालों में नहीं कहा, बल्कि इस सरकार से पहले जो सरकार थी, उसने ऐसा कहा, उसी के बारे में मैं कह रहा हूं।

महोदय, तीसरा प्रश्न यह है कि एग्रीकल्चर पालिसी बनाई गई, तो उस पर अमल करने की जरूरत है। मैं मानता हूं कि कृषि नीति को अमल में लाने के लिए केवल यूनियन गवर्नमेंट को ही काम करना होगा, ऐसा भी मैं नहीं मानता हूं क्योंकि यह जिम्मेदारी स्टेट गवर्नमेंट्स को भी दी गई है। इसको अमल में लाने के लिए केन्द्र सरकार को प्लान बनाकर पैसे का इंतजाम कर के, राज्य सरकारों की मदद से इस नीति को इम्पलीमेंट कराना जरूरी है। मैं यह पूछना चाहता हूं कि पहले की सरकार ने क्या इस संबंध में को-आपरेशन और को-आर्डीनेशन नहीं किया। मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि जब श्रीमती इंदिरा गांधी जी थीं, तब उन्होंने अधिकारियों को बुलाकर एक मीटिंग ली और कहा कि हम देश को अन्न के मामले में स्वावलम्बी बनाना चाहते हैं। अधिकारियों ने कहा कि तीन सालों में देश स्वावलम्बी बनाने के लिए हमारे पास कोई जादू नहीं है।

महोदय, जब अधिकारियों ने कहा कि तीन साल में कृषि के मामले में देश को स्वावलम्बी बनाने हेतु हमारे पास कोई जादू नहीं है, तो वे रुकी नहीं। उन्होंने कहा कि जिनके पास जादू है, हम यह काम उनसे करा लेंगे। उन्होंने तुरन्त पूरे देश के मुख्य मंत्रियों को बुलाया और उनके साथ चर्चा की कि इस पालिसी को इम्पलीमेंट करने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए। इस बारे में उन्होंने प्रयत्न किया। हमें मालूम है। उस समय महाराष्ट्र में श्री वसन्तराव नाइक चीफ मनिस्टर थे। वे दिल्ली से वहां गए और उन्होंने सदन में कहा कि मैं महाराष्ट्र को तीन साल के अंदर अन्न के मामले में स्वावलम्बी बना दूंगा। यदि ऐसा नहीं कर पाऊं, तो मुझे नजदीक के लाइट पोल पर ले जाकर फांसी दे देना। इस प्रकार की भावना चीफ मनिस्टर के मन में पहुंचाने का काम उस वक्त किया गया। यह बात अलग है कि तीन साल में अन्न के मामले में महाराष्ट्र और देश आत्मनिर्भर नहीं हुआ, बल्कि चार-पांच साल में हुआ। हमें मालूम है और उस समय अपोजीशन में बैठने वाले लोग हमसे पूछते थे कि बताइए हम चीफ मनिस्टर साहब को किस पोल पर ले जाकर फांसी दें। यह मुद्दा मैं इसलिए उठा रहा हूं कि इस गवर्नमेंट के लिए यह जरूरी है कि स्टेट के चीफ मनिस्टर्स, एग्रीकल्चर मनिस्टर्स और कंसन्र्ड मनिस्टर्स को बुलाकर, उनके साथ चर्चा कर के, आपने जो नीति बनाई है, उसके अनुसार पंचवर्षीय योजना में कदम उठाने बहुत जरूरी है। ऐसा आपने किया हो, यह बदकिस्मती है कि हमने ऐसा किसी पेपर में नहीं देखा और न सुना। अगर ऐसा आपने किया है, तो आप हमें बताइए, हम मान लेंगे। अगर नहीं हुआ है, तो यह भी बता दीजिए कि क्यों नहीं हुआ है। अगर यह कहने जा रहे हैं कि आपने जो किया है वह शायद काफी नहीं था, इसीलिए रेट आफ एग्रीकल्चर ग्रोथ नहीं बढ़ा। मैं रेट आफ एग्रीकल्चर ग्रोथ की बात कह रहा हूं, मैं प्रोडक्शन की बात नहीं कर रहा हूं। हमारे एग्रीकल्चर का रेट आफ ग्रोथ कम हुआ है। अगर किसी वर्ष अच्छी वर्षा हो गई, तो एग्रीकल्चर का थोड़ा रेट आफ ग्रोथ बढ़ गया और यदि किसी वर्ष मानसून खराब रहा, तो उस वर्ष रेट आफ ग्रोथ कम हो गया। इस प्रकार से किसी वर्ष कम और किसी वर्ष ज्यादा चलता रहता है, लेकिन यदि रेट आफ ग्रोथ कम हो गया, तो उसके लिए हमें कोसना और यदि रेट आफ ग्रोथ बढ़ गया, तो अपनी पीठ थपथपाना ठीक नहीं है। एग्रीकल्चर का रेट आफ ग्रोथ भी बहुत मायने रखता है और इसके बारे में सोचना बहुत जरूरी है।

महोदय, मैं यह कहना चाहता हूं कि हमारे देश के एग्रीकल्चर को बढ़ाने के लिए हमें आगे चलकर क्या करना चाहिए - इस पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए। मैं यह बताना चाहूंगा कि खेती के लिए बिजली की उतनी ही जरूरत है जितनी इंडस्ट्री के लिए जरूरी है। निजी क्षेत्र में जो खेती चलती है, उसके लिए और गांवों में रहने वाले लोगों को जो बिजली दी जाती है, वह १५ से २० प्रतिशत तक दी जाती है, उससे अधिक नहीं। इसलिए बिजली ज्यादा देने के लिए कदम उठाना बहुत जरूरी है। बिजली का उत्पादन बढ़ाना जरूरी है। कांग्रेस पक्ष ने यही किया था, लेकिन इस सरकार ने वैसा नहीं किया। मैं बहुत जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं कि जब नौवीं पंचवर्षीय योजना में आपने ४८ हजार मैगावाट इलैक्टि्रसिटी बनाने का लक्ष्य रखा था, उसे आप पूरा नहीं कर सकते थे, इसलिए आपने उसे घटाकर २८ हजार मैगावाट किया। उसके बाद नौवीं पंचवर्षीय योजना में ही उक्त घटे हुए लक्ष्य को और घटाकर २० हजार मैगावाट किया लेकिन मुश्किल से १८ हजार मैगावाद इलैक्टि्रसिटी ही आप जनरेट कर सके। मुझे आप बताएं कि इसकी जिम्मेदारी आपकी है या नहीं? ये आंकड़े मैं कोई अपनी तरफ से नहीं दे रहा हूं, बल्कि पंचवर्षीय योजना का जो आपका असैसमेंट है, उसमे से दे रहा हूं। मेरा मुद्दा यह है कि बिजली देने की बहुत जरूरत है।

महोदय, मेरा अगला मुद्दा यह है कि सिंचाई की सुविधा, पानी की व्यवस्था करना बहुत जरूरी है। कतरा-कतरा पानी हमें बचाना पड़ेगा और उसका उपयोग करना पड़ेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे सिंचाई के लिए पानी के जो तालाब हैं, वे बनने बन्द हो गए हैं। हमदो करोड़ से १२ करोड़ तक आज जरूर आ गये हैं लेकिन इनके बनाने का जो रेट है, सिंचाई की जो व्यवस्था है, उसे करना बहुत जरूरी है। केन्द्र सरकार को उसके ऊपर लक्ष्य देना बहुत जरूरी है।

मैं यह जानता हूं कि माइनर और मीडियम इरीगेशन तालाब स्टेट गवर्नमैंट की तरफ से बनाये जाते हैं मगर मेजर इरीगेशन का जो प्रौजैक्ट है, वह आपकी इजाजत के बगैर वह नहीं बना सकते। उसके लिए पैसा आपको देना है, पंचवर्षीय योजना में पैसा देना है। हमारा दुख यह है कि आजकल की जो पंचवर्षीय योजना हमें यहां देखने को मिलती है, उसमें सिंचाई के ऊपर जो पैसा रखा गया है, वह हर साल कम होता जा रहा है। सिंचाई के लिए जो व्यवस्था करनी जरूरी है, वह हर साल कम होती हुई नजर आ रही है। अगर संख्या बढ़ रही है, पानी का उपयोग ज्यादा हो रहा है और सिंचाई पर पैसा कम खर्च कर रहे हैं तो इसका असर किस पर होगा ? वह असर हमारे एग्रीकल्चर सैक्टर पर जरूर होगा।

नये बीज की व्यवस्था करना भी बहुत जरूरी है। इस बारे में मैं ज्यादा नहीं बोलना चाहता। मैं इतना ही बोलना चाहता हूं कि जेनेटिक इंजीनियरिंग आज के जमाने में आपके हाथ में आयी है। आप उसके ऊपर पैसा खर्च कीजिए। आप जेनेटिक इंजीनियरिंग के लिए, जेनेटिक टेक्नोलॉजी के लिए जितना पैसा खर्च कर रहे हैं, मेरी द्ृष्टि से वह काफी नहीं है। आपको एग्रीक्ल्चर यूनीवर्सिटीज में, नैशनल लेब्रोट्रीज में जेनेटिक इंजीनियरिंग का उपयोग करके नये बीज बनाने के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना जरूरी है। यह काम भी आसान नहीं है क्योंकि बीज जब बनता है तब वह एकदम काश्तकारों को नहीं दिया जाता, उसका दुष्परिणाम क्या होता है, उसको भी देखा जाता है और उसको देखना भी जरूरी है।

मेरा तीसरा मुद्दा कर्जे का है। ७० प्रतिशत खेती को सिर्फ हम ८० हजार करोड़ रुपये का कर्ज दे रहे हैं जबकि बाकी २०-२५ परसेंट लोगों को आप ७ से ८ लाख करोड़ रुपये तक का कर्ज दे रहे हैं। यह जो इम्बैलेंस है, उसे भी दूर करना जरूरी है। मैं सरकार से यह पूछना चाहता हूं कि सरकार ने यह तय किया था कि कर्जे का ४० परसेंट गांव में खर्च होना चाहिए तथा १८ परसेंट खेती पर खर्च होना चाहिए। दुर्भाग्य की बात है कि यह पैसा खर्च नहीं हुआ। कल ही फाइनेंस मनिस्टर ने यहां पर बात करते हुए यह कबूल किया है । मैं अच्छी तरह से जानता हूं, फाइनेंस कमेटी ने भी इस पर अपनी रिपोर्ट दी है। हमने तह से जाकर देखा है । निजी बैंक्स और प्राइवेट बैंक्स को कहा गया था कि आप ४० परसेंट गांव में और १८ परसेंट खेती पर कर्जा दीजिए । मगर उन्होंने यह नहीं दिया। यह डायरेक्शन गवर्नमैंट की है। इसके बाद गवर्नमैंट ने समझा और उनसे पूछा कि आपने इसे क्यों नहीं दिया तो उन्होंने बताया कि हमने यह इसलिए नहीं दिया क्योंकि हमारी ब्रांचेज हर तरफ नहीं है। ब्रांचेज हर जगह नहीं होने की वजह से कर्ज का बंटवारा हम नहीं कर सकते हैं। आप कुछ भी डायरेक्शन यहां से दे दीजिए, इस प्रकार की कोई एक प्ली आपके सामने रखी जायेगी और कहा जायेगा कि इस वजह से हमने नहीं किया। आप क्या करेंगे? आप उनके बैंक बंद नहीं कर सकते, उनको कोर्ट में नहीं ले जा सकते, उनको सजा देने का कोई काम नहीं कर सकते।

पहले की सरकारों ने यह तय किया था कि ४० परसेंट की जो रकम है, वह नाबार्ड को दी जाए और नाबार्ड की मदद से खेती में खर्च करने की व्यवस्था की जाये। नाबार्ड को देने के बाद, नाबार्ड गवर्नमैंट के पास है, नाबार्ड के पास देने के बाद भी यह ४० परसेंट का कर्जा नहीं दिया गया तथा १८ परसेंट का कर्जा खेती को नहीं दिया गया। प्राइवेट बैंक ने सात परसेंट से आगे नहीं दिया जबकि गवर्नमैंट के बैंक ने १४-१५ परसेंट तक दिया है। आज आप क्या करने जा रहे हैं ? उदारीकरण के नाम पर जो सरकारी बैंक्स हैं, पब्लिक सैक्टर में बैंक्स हैं, उनका आप निजीकरण करने जा रहे हैं। अगर आप ऐसा करेंगे तो मैं आपको बोलता हूं, हम यहां पर होंगे या नहीं होंगे मगर मैं आपको बोलता हूं कि अगर आप निजीकरण करेंगे तो खेती और दूसरे कामों के लिए कर्ज देने का जो प्रपोशन है, उसके अंदर जमीन-आसमान का फर्क पड़ जायेगा। आप जो अधिकार उनको देना चाहते हैं, उसका कुछ उपयोग नहीं होगा। आपके हाथ में कुछ भी नहीं रहेगा। आज पब्लिक सैक्टर बैंक्स आपके हाथ में हैं। आप ५१ परसेंट तक लाये लेकिन ३५ परसेंट की बात आप करने जा रहे हैं, ऐसा मैंने सुना है।

16.00 hrs. यह ठीक है कि आपने नहीं किया। लेकिन आगे चलकर ऐसा नहीं होना चाहिए। हम उस तरफ आए तो ऐसा नहीं करेंगे और अगर आप वहां आ गए, यह इलैक्शन बताएगा कि क्या होने वाला है, लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए, मैं आपको यही बताना चाहता हूं।

कर्जे का जो मामला है, यह बहुत बड़ा है। यह समझा जाता है कि खेती के लिए पैसे की कोई जरूरत ही नहीं है। बीज लाकर फेंक दो, वह उग जाएगा। यह नहीं माना जाता कि पौधे एक जान हैं, मनुष्य के जैसे नहीं हैं लेकिन उनमें लाइफ है, उन्हें बढ़ाना जरूरी है। ऐसा नहीं माना जाता इसलिए कर्जा नहीं देना चाहते। आप कर्जे की व्यवस्था करने जा रहे हैं। आपने कहा है कि ९ प्रतिशत से कम ब्याज पर खेती के लिए कर्जा देने के लिए कहने जा रहे हैं। आपकी बात कौन मानने वाला है। अगर कोई आपकी बात नहीं मानेगा तो आप क्या करेंगे। यह ठीक है कि चुनाव के मौके पर आपने कह दिया, बाहर जाकर कहेंगे लेकिन आपकी बात कौन मानने वाला है। आपके पब्लिक सैक्टर बैंकों ने जब १८ प्रतिशत कर्जा देने का सवाल था, वह नहीं माना, प्राईवेट सैक्टर ने ४० प्रतिशत का नहीं माना तो ९ प्रतिशत की बात कौन मानेगा। वे पचास हजार रुपये, एक-दो लाख रुपये मांगने वाले लोगों को पैसा नहीं देंगे। वे उन लोगों को ९ प्रतिशत ब्याज पर पैसा देंगे जो ५-१० करोड रुपये लेंगे। वे कहेंगे कि इस पैसे को वापिस लेने पर खर्च ज्यादा पड़ेगा, इसलिए ९ प्रतिशत ब्याज पर नहीं देंगे। हम वार्न कर रहे हैं कि आपको यह पॉलिसी मदद नहीं करेगी। अगर इस पॉलिसी को सही मायने में अमल में लाना है तो आपके हाथ में कुछ यंत्रणा रहनी चाहिए जिसकी मदद से आप जो कहते हैं, वह कर सकें।

आज काश्तकारों की सबसे बड़ी मुश्किल है। आप जानते हैं कि यहां बहुत सारे लोग काश्तकार की फैमिली से आए हुए हैं। आज हिन्दुस्तान में किसी भी काश्तकार की फैमिली ऐसी नहीं है जो जमीन पर अमीर हुई हो। कुछ काश्तकार भूखे नहीं रहेंगे, आधे काश्तकार भूखे रहते हैं और कुछ लोग काम करते हैं। हिन्दुस्तान में कोई काश्तकार जमीन के बलबूते पर अमीर हुआ हो, ऐसा नहीं है। यदि उसका बच्चा डाक्टर है, लॉयर है, उसने इंडस्ट्री बनाई है या क्लैंडैसटाइनली कर्जे पर दूसरे लोगों को पैसा देता है और ब्याज लेता है, वही काश्तकार अमीर है, दूसरा कोई काश्तकार इस देश में अमीर नहीं है। हम आपको उसे ऐसा अमीर बनाने के लिए नहीं कह रहे हैं कि वह लक्ज़री में रहे लेकिन इतना तो कीजिए कि वह साधारण मनुष्य जैसा जीये। अगर ऐसा करना है तो सबसे बड़ा काम हमें यह करना पड़ेगा कि वह जो उपज पैदा करता है, उसके प्रोडयूस को रैमुनरेटिव प्राइस मिलना चाहिए। अगर वह नहीं मिलता तो मुश्किल होती है। यहां आप प्राइस लगा देते हैं, पहले की सरकार भी लगा देती थी और हर साल ५ प्रतिशत, १० प्रतिशत बढ़ाती रही है। दूसरी तरफ एक मोटर जो पहले दस हजार रुपये में मिलती थी, आज उसकी कीमत दस लाख रुपये हो गई है। इसी प्रपोर्शन में देखें तो एक किलो अनाज का भाव कितना बढ़ जाना चाहिए । मैं यह बात अच्छी तरह जानता हूं। मैं आपको अड़चन में नहीं डालना चाहता। आपको सिर्फ काश्तकार को ही नहीं देखना है, आपको खाने वाले लोगों को भी देखना है। इसलिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे उसे प्रोडयूस का रैमुनरेटिव प्राइस मिले और खाने वाले को अनाज कम भाव पर मिलता रहे । ऐसा करने के लिए ही फूड सबसिडी की कल्पना आई थी। लेकिन आपके उदारीकरण में, जिसका फील गुड फैक्टर में कोई जिक्र नहीं है, आपके ही दिए हुए रिकार्ड में कहा गया है कि आपने पिछले साल २५०० करोड़ रुपये की फूड सबसिडी कम कर दी। लोग बढ़ रहे हैं, अनाज की मांग बढ़ रही है, सारी कीमतों की मांग बढ़ रही है और आपने २५०० करोड़ रुपये फूड सबसिडी कम कर दी। फूड सबसिडी २५०० करोड़ रुपये से कम करके आप दूसरों का टैक्स भी कम करना चाहते हैं। इस नीति में गलती है। मंत्रिमंडल में जो लोग बैठते हैं, आप बोलते भी होंगे, शायद आपकी आवाज सुनी भी नहीं जाती होगी और बदकिस्मती यह है कि इस पार्लियामैंट के अंदर ऐसे गंभीर विषयों पर कोई चर्चा नहीं होती। बाहर न्यूजपेपर में इसके बारे में कुछ नहीं कहा जाता, मीडिया इसके बारे में कुछ नहीं कहता। वह हमेशा कहता है कि फूड सबसिडी कम करो। पैंशन के ऊपर जो ब्याज दे रहे हैं, वह भी कम करें, इसकी चर्चा होती है लेकिन गरीब आदमी, जिसके पास उद्योग नहीं है, दुकान नहीं है, जिसके पास दूसरा कोई साधन नहीं है, उसके रैमुनरेटिव प्राइस और वेजेज के बारे में कोई कहने के लिए तैयार नहीं है। वह देखना बहुत जरूरी है, ऐसा मुझे लगता है। ये सारी चीजें मैं कहने जा रहा हूं कि क्या कांग्रेस ने किया, यह हमने बताया और क्या आप नहीं कर सके हैं। हमारा यह मत है कि आपके मन में देहात में रहने वाले कृषि करने वालों के लिए अपनापन है। जो प्रॉफिट करोड़ों मे कमाते हैं और जो दूसरी तरफ रहकर आपको कभी भी कुछ भी करने के लिए मजबूर कर सकते हैं, उनके लिए आपके मन में अपनापन नहीं है और यही एक कारण है जिसकी वजह से ७० प्रतिशत लोगों के जीवन के बारे में आप कुछ नहीं सोच रहे हैं और ८-१० प्रतिशत लोगों के बारे में आप सोच रहे हैं। उनके जीवन में आपको ज़हर फैलाना नहीं है लेकिन इनके जीवन में, इनके खाने में केवल मिट्टी जा रही है, उसके बारे में आपको सोचना बहुत जरूरी है। हम जानते हैं कि यह प्रश्न बहुत बड़ा है और इसका आसानी से हल होने वाला नहीं है। पांच साल में हल होगा, पूरी तरह से ऐसा भी हम नहीं मानते हैं। आपको भी टाइम मिलेगा, जैसे हमको भी टाइम मिलेगा। मगर आपकी नीयत ही नहीं होगी, आपकी नीति इस प्रकार की नहीं होगी, यदि आप मन नहीं बनाएंगे, पैसा नहीं देंगे तो काश्तकारों का बुरा हाल होता रहेगा।

आने वाले दिनों में चर्चा इस बात की होने वाली है कि यह जो फील गुड फैक्टर है, इस फील गुड फैक्टर में किसान के लिए क्या है ? यह हम पूछना चाहते हैं। शुगर का दाम उनको नहीं मिलता है, टैक्सटाइल इंडस्ट्री काम नहीं करती है, ऑयल इंडस्ट्री काम नहीं करती है, एग्रो-बेस्ड इंडस्ट्री नहीं बनी है। उसको पीने का पानी नहीं मिलता है, उसको खेती के लिए पूरी तरह से पानी नहीं मिलता है। उसको कर्जा भी नहीं मिलता है और उसको माल का दाम भी नहीं मिलता है। कौन सा फील गुड फैक्टर है? यह सारा एडवर्टाइजमेंट में है। उसके मन में कहीं नहीं है। गांव में नहीं है, काश्तकार के मन में नहीं है, यह मैं आपको बताना चाहता हूं। अगर उस एजम्पशन पर आप जा रहे हैं तो जाएं, हम उसको बदल नहीं सकते हैं मगर फील गुड फैक्टर गांवों में रहने वाले, औसत आदमी के मन में नहीं है, यह बात बार-बार हम आपको बताना चाहते हैं।

उसके बाद कामगारों की बात करें, मजदूरों की बात करें। मुझे खुशी है कि मंत्री जी यहां पर बैठे हैं। कुछ समय मुझे उनके साथ चर्चा करने का मौका मिला। एग्रीकल्चर मनिस्टर साहब के साथ चर्चा करने का मौका मुझे नहीं मिला। उनके मन में भी काश्तकारों के लिए अपनापन नहीं होगा, ऐसा मैं नहीं मानता हूं। वह जानते हैं मगर उनकी मजबूरी है, उनकी सरकार की मजबूरी है। आपकी गलती है, आपकी सरकार की गलती है, यह भी मैं उसके साथ-साथ कहना चाहता हूं। कामगार मंत्री के बारे में यही कहना चाहता हूं। उनके मन में अपनापन होगा, मैं जानता हूं। यहां पर एक चर्चा हुई थी और वह इंटरेस्ट रेट मेरे ख्याल से प्रोवीडेंट फंड पर या पेंशन पर कम करने की बात पर हुई थी। हम यहां से चिल्ला-चिल्लाकर बोल रहे थे कि आप कम मत करिए। जो आदमी इतना कष्ट करके, इतना अपना पसीना बहाकर, अपना पेट काटकर आपके पास अपना पैसा रख देता है, उसके पैसे पर इंटरेस्ट रेट एक प्रतिशत कम करके कितना खजाने में पैसा आपने बढ़ाया है? यह हमें बताइए। क्या इस प्रकार का पैसा बढ़ाने का कोई मतलब है ? जो भूखा है, रात-दिन काम करता है, आधे पेट रहता है, जिसके बाल-बच्चों की दवाई की व्यवस्था नहीं है, शिक्षण की व्यवस्था नहीं है, उसकी पेंशन पर आप इंटरेस्ट रेट एक-डेढ़ प्रतिशत घटाकर कितना पैसा खजाने में लाए हैं? यह बताइए। कुछ नहीं है। शायद वह आप भी नहीं चाहते थे। आपकी मजबूरी है। हम लोगों को आपके साथ सहानुभूति है। जो भी लोग कर रहे हैं, उनके साथ हमारी सहानुभूति है मगर यह भी कहना चाहते हैं कि कुछ लोग ऐसे हैं जो इसको करवाना चाहते हं। अगर वह नहीं हुआ तो ठीक है और अगर हुआ है तो वह गलत है। आप उसे होने मत दीजिए। हम आपसे यही कहना चाहते हैं। यहां पर कामगार के बारे में,…( व्यवधान)

श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी (देवरिया) :सभापति महोदय, इस चर्चा के लिए कितना टोटल समय दिया गया है ?…( व्यवधान)

सभापति महोदय : उनकी पार्टी का टाइम है। दो घंटे समय दिया गया है। उनकी पार्टी से एक ही स्पीकर है।

श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी: चर्चा के लिए दो घंटे दिये गये हैं तो क्या किसी और को बोलने का मौका नहीं मिलेगा? …( व्यवधान)

सभापति महोदय : उनका अपना समय अभी है, उसी में बोल रहे हैं। प्राइवेट मैम्बर्स बिल का बिजनैस सस्पेंड हो चुका है। पार्टी की स्ट्रैन्थ के आधार पर सब पार्टीज में बराबर समय बांटा गया है।

श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी: तो क्या हम यह समझें कि सारी पार्टियों का समय खत्म हो गया है।

श्री शिवराज वि. पाटील (लातूर) : मुझे पता नहीं है कि माननीय सदस्य को क्यों कष्ट हो रहा है, जबकि मैंने सभापति जी से पूछकर चर्चा शुरू की है।

सभापति महोदय : लेकिन चेयर ने आपके भाषण में कोई बैल नहीं बजाई। आप अपना समय लें।

श्री शिवराज वि. पाटील: उसके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। मैं माननीय सदस्यों को यह कहना चाहता हूं कि अगर मैं कोई आर्गयूमेंट या बहस करता या गाली देता या चीख-चीखकर अपनी बात कहता तो एक अलग बात होती। आपका इस तरह से मुझे टोकना यही बताता है कि यह नीयत की बात है। मैंने पहले भी कहा कि कृषि को बढ़ावा देने के लिए आपकी नीयत ठीक होनी चाहिए। इस प्रकार से जो टोका-टाकी हो रही है, वह बताती है कि आपकी, सबकी नहीं, नीयत ठीक नहीं है।

श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी: सभापति महोदय, मैं एक बात पूछना चाहता हूं।

SHRI SHIVRAJ V. PATIL : I am not yielding. … (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : He is not yielding. Please take your seat.

… (Interruptions)

श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी: आज जो कुछ हुआ, उसके बाद इस तरह के कमेंट करना ठीक नहीं है।

MR. CHAIRMAN: No, no; I am not allowing you. Nothing should go on record.

(Interruptions)* MR. CHAIRMAN: Now, Shri Shivraj Patil will speak.

श्री शिवराज वि. पाटील: मैं यह कह रहा था कि असंगठित क्षेत्र में कानून बदलने की बात की जा रही है। अगर कानून बदलना जरूरी है तो आप बदलें, लेकिन इस प्रकार से बदले जिससे काश्त करने वाले, काम करने वाले लोगों की मदद हो सके और उनको जो राहत दी गई है, उस पर बुरा असर न हो। अगर इस चीज को साइड में रखकर दूसरों की मदद करने के लिए आप कानून बदलने की बात करते हैं, तो वह गलत होगा। अब यह पूछा जाएगा कि आपने क्या किया। इंडस्टि्रयल डिस्प्यूट एक्ट में पहले ३०० लोगों से ज्यादा पर सरकार की अनुमति से लॉकआउट नहीं किया जा सकता था, उसको बदलकर १०० किया और अब शायद १००० तक की बात चल रही है।

श्री मणि शंकर अय्यर (मइलादुतुरई): फाइनेंस मनिस्टर ने १००० की बात कही है।

श्री शिवराज वि. पाटील (लातूर) : आज १००० तक लोगों की बात की जा रही है। इस प्रकार से कानून बदलेंगे तो असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले जो लोग हैं, उनके कल्याण की बात नहीं होगी। कांट्रेक्ट लेबर की बात चल रही है। कांट्रेक्ट लेबर के कानून में भी बदलाव जरूरी है, ऐसा मान रहे हैं। हम कहते हैं कि जो कानून बदलना है, वह बदलें। हम यह नहीं कहते कि समय रुका हुआ है और बदलाव नहीं होना चाहिए। हम तो यह कहते हैं कि आप वह कीजिए जिसकी वजह से काम करने वालों की मदद हो और उन की रुकावट न हो, ऐसा आपको काम करना चाहिए।

जहां तक असंगठित क्षेत्र की बात है, वहां कानून बनाने की बात कही गई है। आपने कुछ कानून बनाए भी हैं। मैं नहीं मानता कि उसमे कोई बुरी बात है। हमारी नेता श्रीमती सोनिया गांधी जी ने बताया कि कर्नाटक में असंगठित क्षेत्र को प्रोटेक्शन देने के लिए पहले से कानून बना हुआ है। हम दूसरे राज्यों में भी ऐसा कानून बनाने जा रहे हैं। उसी तरह से आप भी कानून बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हमने कर्नाटक का कानून और आपका बनाया हुआ ड्राफ्ट देखा। मैं कहना चाहता हूं कि आपका ड्राफ्ट कमजोर है, कर्नाटक का कानून मजबूत है। यह मैं कोई उनकी तारीफ या आप पर कोई टीका नहीं कर रहा हूं। मैं तो सिर्फ कम्पैरिजन कर रहा हूं। आप भी कर्नाटक का बनाया हुआ कानून पढ़ें तो आपको पता चलेगा क *Not Recorded.

   

उनका कानून अच्छा है और आपका ड्राफ्ट कमजोर है। यह काम अब आप कर रहे हैं, जबकि आपको साढ़े चार साल मिले थे, उस समय करते तो अच्छी बात होती। वह बिल स्टेंडिंग कमेटी में जाता और वहां सदस्य अपनी बात कहते। उसके बाद यहां बैठकर हम एक-एक क्लाज पर चर्चा करते। हम आपका विरोध नहीं करते, आपकी मदद ही करते। लेकिन ऐसा कानून बनाते, जिसमें कम से कम गलतियां होतीं। यह हो सकता था, लेकिन नहीं हुआ। अब कृपा करके आप इस पर आर्डिनेंस न लाएं और चुनाव में फायदा लेने का काम न करें। अगर आप ऐसा करेंगे तो बाहर जाकर बता सकते हैं कि आर्डिनेंस के जरिए हम इसे लाए हैं। मगर वह कानून ठीक नहीं रहेगा। आप ड्राफ्ट लाए हैं, हम मानते हैं और उसका श्रेय आप ले सकते हैं। लेकिन आर्डिनेंस मत बनाइये क्योंकि उसके अंदर बहुत कमियां हैं।

दूसरी बात यह है कि वर्कर्स का उत्साह बढ़ाने की बात लेबर मनिस्टरी से आनी चाहिए। लेबर मनिस्टर ऐसी बात करते हैं लेकिन मनिस्टरी ऐसी बात करती है या नहीं, लेबर मनिस्टर हमें बता दें। लेबर मनिस्टरी वैलफेयर का काम करने वाली नहीं है लेकिन दूसरे को खुश करने वाली है, ऐसा हमारा इम्प्रेशन है। भगवान करे कि हमारा इम्प्रेशन गलत हो। अगर आपको लगता है कि हम गलत हैं तो उसको दुरुस्त कीजिए और हमको बताइये कि हमारा इम्प्रेशन गलत है। लेकिन बिना वजह डिफेंड भी मत कीजिए। हम कोई टीका-टिप्पणी नहीं कर रहे हैं वरन् आपको मदद कर रहे हैं और यह अकेले मनिस्टर साहब का ही काम नहीं है, यह यहां बैठे सारे लोगों का काम है और उसमें राज्यों के मनिस्टर्स भी आते हैं, उसमें केवल आप ही नहीं हैं।

तीसरी बात यह है कि हायर एंड फायर की कल्पना इस देश में लाने की कोशिश हो रही है जो दूसरे किसी देश में है। जापान के अंदर हायर एंड फायर की कल्पना नहीं है। वहां जो आदमी नौकरी पर जाता है वह सारी उम्र वहां रहता है, उसको कोई निकालता नहीं । उस प्रकार की कल्पना भी हम यहां पर कर सकते हैं। लेकिन हमारे पास न हायर एंड फायर की पूरी तरह से कल्पना है न जापान के अंदर जिस प्रकार का कानून बना हुआ है, नीति बनी हुई है वह है। यहां तो सैमी-एम्प्लाएड हैं। कुछ दिन रखने का काम करते हैं और फिर कुछ दिन नहीं रखते हैं। जिन लोगों को कुछ दिन काम नहीं मिलता है, उन्हीं के लिए एम्प्लाएमेंट गारंटी योजना स्टेट गवर्नमेंट ने बनाई है और उन्हीं के लिए आपने प्रधान मंत्री योजना बनाई है। उसको मजबूत करना चाहिए, उसको आप कमजोर मत कीजिए। उसके बाद कामगार के बच्चों की पढ़ाई और सेहत का इंतजाम होना चाहिए। यह इंतजाम पब्लिक सैक्टर में, सरकारी सैक्टर में और प्राइवेट सैक्टर में होना चाहिए।

मैं एक बात फिर से दोहराना चाहता हूं कि हमारे संविधान के डायरेक्टिव प्रिन्सिपल में राइट टू वर्क की बात की गयी है लेकिन हमारे फंडामेंटल राइट्स में राइट यू वर्क की बात नहीं की गयी है। अगर आप राइट टू एजुकेशन दे सकते हैं तो क्या राइट यू वर्क नहीं दे सकते हैं। मैं तो कहूंगा कि जापान में जिस प्रकार राइट यू वर्क का अधिकार दिया गया है उसी प्रकार का अधिकार आप दीजिए। जापान कोई कम्युनिस्ट या सोशलिस्ट देश नहीं है। जापान के संविधान में एक आर्टिकल में जो लिखा है वह मैं आपको बताना चाहता हूं -

"The citizen shall have right and duty to work." Give him the right to work and impose the duty on him also to work. If you give him right to work and duty to work, it becomes easier for you to give right to work to each and every unemployed person in the country because, at the same time, you are imposing duty on him to work. This becomes implementable because of this clause, तो वह कानून बताता है कि मैं पीएचडी होने पर भी मुझे प्रिंसीपल का पद देने की जरूरत नहीं है, एक क्लर्क की जगह दे दो, जिससे मैं ५०० रुपया महीना लेकर जी सकता हूं और मुझे सुसाइड करने की जरूरत न हो। ऐसी परिस्थिति हम इस देश में भी बना सकते हैं। ऐसी आर्थिक स्थिति हमारी हो गयी है। इसे हम कर सकते हैं लेकिन थोड़ी हिम्मत की बात है। आप उधर से करिये और हम इधर से अपनी पार्टी के लोगों को भी तैयार करने की कोशिश करेंगे। हमारी पार्टी में कितने लोग तैयार हैं पता नहीं लेकिन मैं तैयार हूं। मैं यह बात अपनी तरफ से बोल रहा हूं अपनी पार्टी की तरफ से नहीं बोल रहा हूं। लेकिन राइट एंड डयूटी टू वर्क हमारे संविधान के फंडामेंटल राइट के चैप्टर का एक हिस्सा होना चाहिए।
हमारी युवा पीढ़ी है। भारत नौजवानों का देश माना जाता है। इसका क्या मतलब है? जिस का भविष्य है उसका देश है। ऐसे देश में जो पीछे देखने वाले हैं या जिन का भूतकाल बहुत लम्बा है, अगर वह इस सरकार की सारी शक्तियां अपने हाथ में रख कर सरकार चला रहे हैं तो भविष्य का उन्हें कितना आकलन होगा, हमें पता नहीं। हम कहते है कि कांग्रेस पार्टी के सारे नेता नौजवान रहे हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू नौजवान थे। श्रीमती इन्दिरा गांधी कम उम्र में प्रधान मंत्री बनी। श्री राजीव गांधी जी बने। आज हमारी नेता भी उस स्थिति में हैं। भविष्य की ओर देखने वालों को आगे आना चाहिए और वही यहां के नौजवानों का कल्याण कर सकते हैं। मैं समझता हूं कि अगर मैं बहुत संक्षेप में बोलना चाहूं तो मैं यही कहना चाहूंगा कि उनके खाने-पीने का अच्छा इंतजाम होना चाहिए। मीड-डे मील को और स्ट्रौंग करना चाहिए। आपके पास बहुत अनाज है जो सड़ रहा है। वह अनाज जितना ज्यादा दे सकते हैं दे दीजिए।
दूसरी बात खेल की है। पूर्व खेल मंत्री यहां बैठी हैं। खेल के लिए राजीव जी ने कितना किया, हम जानते हैं। एशियाड जब किया तो मैं मनिस्टर था। मुझ से कहा जा रहा था कि हमारे पास खाने के लिए नहीं है और आप खेल कर रहे हैं।
सभापति महोदय : सड़ता हुआ अनाज नहीं, सड़ने से पहले अनाज को डिस्ट्रीब्यूट किया जाए।
श्री शिवराज वि.पाटील: मैं आपकी बात मान लेता हूं। आप उसे सड़ा देंगे लेकिन बच्चों की नहीं देंगे। जब एशियाड के खेल हुए तो मुझे इस हाउस में और उस हाउस में जवाब देना पड़ा था कि हम खेल को बढ़ावा देना चाहते हैं। दवाखाने ज्यादा बढ़ाने की जरूरत न पड़े, ऐसी परिस्थिति यहां निर्माण करनी चाहिए। आज उधर बैठे लोग और आज के मनिस्टर उस समय नहीं थे, दूसरे थे, वे हम से पूछते थे कि यह क्या दीवानापन है? आप सैटेलाइट छोड़ रहे हैं, एशियाड करने जा रहे हैं, हमारे पास खाने-पीने के लिए नहीं है, कम्प्यूटर के बारे में कहते हैं। जो इस प्रकार की बातें करते हैं, उनका द्ृष्टिकोण कितना पुराना है यह हम समझ सकते हैं। खेल का इंतजाम होना बहुत जरूरी है। पढ़ाई का इंतजाम होना भी बहुत जरूरी है। आपने फंडामैंटल राइट टू एजुकेशन की बात कही है। हमने उसका विरोध नहीं किया है। हम उन लोगों में से हैं, जिन्होंने आपकी मदद की। उसके लिए जो कानून बनाना था, वह आपने नहीं बनाया। इसके लिए जो १० हजार करोड़ रुपए देने थे, वे नहीं दिए हैं। स्टेट गवर्नमैंट की जो मदद करनी चाहिए थी, वह नहीं की है। यह प्राइमरी एजुकेशन की बात है। सैकेंडरी एजुकेशन की बात ही दूसरी रह गई। टरशरी एजुकेशन की बात और बेकार हो गई है। एक मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेने के लिए ५०-५० लाख रुपए अगर कोई मांग रहा है तो क्या हमारे बच्चे वहां जा सकते हैं? मेरे बच्चे नहीं जा सकते हैं। दूसरों के बच्चों की क्या हालत होगी? वे ५० लाख रुपए कहां से लाएंगे? उन्हें या तो चोरी करनी पड़ेगी या गबन करना पड़ेगा या ५० लाख रुपए दूसरे किसी तरह देने पड़ेंगे। ऐसे कॉलेजों में अमीरों के बच्चे ही जाएंगे। क्या देश में ऐसी परिस्थिति नहीं है? क्या इसमें सुधार करने की जरूरत है या नहीं? यह देखना बहुत आवश्यक है। नई द्ृष्टि की आवश्यकता है। इसे नई द्ृष्टि की मदद से किया जा सकता है।
मैं समझता हूं कि इससे ज्यादा बोलने की जरूरत नहीं है। मैंने यहां पर मूलभूत प्रश्नों का जिक्र किया है। आपके पास समय कम होगा। जितना जवाब दे सकते हैं, दे दें। अगर जवाब नहीं देते हैं और अगर वह बात रजिस्टर हुई है तो जितने दिन भी आप सरकार में हैं, आप उसका उपयोग करें। इसके बाद जो आएगा, वह कर सकेगा तो करेगा।
श्री रतन लाल कटारिया (अम्बाला) :सभापति महोदय, मेरी समझ में नहीं आ रहा हूं कि विपक्षी पार्टी के साथियों द्वारा कृषि को लेकर, नौजवानों की बात को लेकर और सामाजिक सुरक्षा की बात को लेकर इस प्रकार की चर्चा करने की जरूरत क्यों पड़ी? मैं बताना चाहता हूं कि भारत के प्रधान मंत्री पहले ही इस दिशा में गम्भीर हैं। भारत माता के एक बेटे श्री राजनाथ सिंह जी, जो किसान परिवार से संबंध रखते हैं, उनको कृषि मंत्री बनाया। उन्होंने जब से इसका कार्य भार सम्भाला एक करोड़ नहीं, दो करोड़ नहीं, ५० हजार करोड़ रुपए की योजनाएं भारत के किसानों के कल्याण के लिए बनायी।
सभापति महोदय, दूसरी तरफ देखिये, तो ये लोग सामाजिक सैक्टर पर चर्चा करना चाहते हैं। मेरे पास ही डा. साहिब सिंह वर्मा बैठे हुये हैं जिनकी डायनैमिक लीडरशिप के अंतर्गत लगातार एक के बाद एक उन्होंने कई ऐसे कदम उठाये हैं, चाहे मजदूरों की प्रतदिन मजदूरी ५० रुपये बढ़ाने का प्रश्न हो, चाहे वर्क कम्पेनसेशन के अंतर्गत जो सीमा थी, उसमें डिसबलिटी के लिये २ लाख ३० हजार रुपये से बढ़ाकर २ लाख ७५ हजार रुपये करना, डैथ केस में २ लाख ३० हजार रुपये से बढ़ाकर ४ लाख ५६ हजार रुपये तक की सीमा को करने की बात हो या सीनियर सिटीजन्स को एक लाख ५३ हजार रुपये तक की आय पर छूट देने की बात हो, चाहे डिपौज़िट््स पर ९ प्रतिशत से अधिक ब्याज देने की बात हो, इन सब विषयों पर हमारे मत्रियों ने खुलकर हिन्दुस्तान के लोगों की सेवा की है। आज भारत दुनिया में सब से ज्यादा पी.डी.एस. चला रहा है जिसके अंतर्गत २६ करोड लोगों को १० किलो से लेकर ३५ किलो तक अनाज दिया जा रहा है। इसके अंतर्गत २ रुपये किलो गेहूं और ३ रुपये किलो चावल दिये जा रहे हैं।
सभापति जी, मैं आज कांग्रेस को एक बात की .याद दिलाना चाहूंगा कि जब कांग्रेस पार्टी का शासन होता था, उसकी नेता स्व. श्रीमती इन्दिरा गांधी चुनाव के पहले गरीबों और दलितों की बस्ती में जातीं और कहा करती थीं कि आप एक बार मुझे वोट दे दो, अगली बार आप लोगों के वारे-न्यारे कर दूंगी लेकिन जैसे ही यहां कुर्सी पर बैठती, उन्हें बड़े-बड़े औद्योगिक घराने याद आते थे और गरीबो को कहती कि आप मुर्गी पालन के लिये, सूअर पालने के लिये, मकान बनाने के लिये २००० रुपये ले लो। मैं आज भारतमाता के लाल श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को बधाई देना चाहता हूं कि उन्होंने दलितों के मकान के लिये २२ हजार रुपये कर दिये हैं। क्या आज वे सोशल सैक्टर के अंतर्गत काम नहीं कर रहे हैं?
16.28 hrs. (Dr. Laxminarayan Pandeya in the Chair) सभापति महोदय, आज पहली बार बैंकों द्वारा किसानों को ८५ हजार रुपये का ऋण दिया जा रहा है, ४० हजार करोड़ रुपया प्रायरिटी सैक्टर में दिया जा रहा है,और २० हजार करोड़ रुपया महिला वर्ग के उत्थान के लिये दिया गया है। मैं संसद की वित्त संबंधी स्थायी समति का सदस्य पिछले पांच साल से हूं और उस नाते मुझे हर प्रदेश में जाने का मौका मिला है। हमने किसानों की बातें सुनी।हैं उन्होंने हमें बताया कि किसान क्रेडिट कार्ड ने उनकी जीवन-शैली बदल दी है, उनका आर्थिक और सामाजिक स्तर बदल गया है। इस सरकार ने साढ़े तीन करोड़ किसान क्रेडिट कार्ड जारी किये हैं और जो लक्ष्य रखा गया है, वह इसी वर्ष मार्च तक पूरा हो जायेगा।
सभापति महोदय, किसानों की पैडी जब सड़ने लगी तो पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह जी दिल्ली में श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी से मिलने के लिये आये और बताया कि उनका किसान डूब रहा है, उसे ऊपर उठाने वाला कोई नहीं है। हरियाणा के मुख्य मंत्री श्री ओम प्रकाश चौटाला आये, उन्होंने भी कहा कि उनके किसानों को ऊंचा उठाने वाला कोई नहीं है लेकिन भारतमाता के लाल श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने किसानों को गेहूं और चावल की मनिमम सपोर्ट प्राइस दिलाई। अभी एग्रीकल्चर प्राइस इस कमीशन ने जो रिपोर्ट दी है, उसके मुताबिक देश में अन्न के भंडार भरे पड़े हैं, इसलिये गेहूं के मूल्य कम होने चाहिये, लेकिन कृषि मंत्री जी अड़ गये, साहिब सिंह जी अड़ गये और माननीय वाजपेयी जी से मिलकर न केवल उन रिकमेंडेशंस को धराशायी किया, बल्कि ३० रुपये क्िंवटल गेहूं का रेट बढ़ाकर किसानों के दुख-दर्द को सुना।
सभापति महोदय, आज गन्ने की समस्या देखने में आ रही है। उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों की समस्या है। हरियाणा प्रदेश की कुछ प्राइवेट शुगर मिलों में गन्ने की समस्या है। पहली बार ८८४ करोड़ रुपये का एक पैकेज श्री राजनाथ सिंह जी ने किसानों को दिया और कहा कि पहले जो गन्ना उत्पादक हैं, उनका एक-एक पैसा आप निपटा दें, उसके बाद राज्य सरकार के साथ बातचीत की जायेगी।
आज ये पानी की बात कर रहे हैं। पहली बार हमने नदियों को जोड़ने की योजना बनाई। हरियाणा प्रदेश के साथ इनके समय में कितना बड़ा मजाक किया गया। आज से २४ साल पहले श्रीमती इंदिरा गांधी पंजाब और हरियाणा के बैरियर कपूरी गांव में गई और वहां पर हाथ में कस्सी लेकर कहने लगे की दो महीने बाद ही हरियाणा प्रदेश को एस.वाई.एल. का पानी दे दूंगी। बार-बार सुप्रीम कोर्ट के फैसले आये हैं, लेकिन पंजाब प्रदेश हरियाणा को एस.वाई.एल. का पानी नहीं दे रहा है। ये अपने आपको किसानों के हितैषी समझते हैं। आज से १२ साल पहले श्री नरसिंहराव जी यमुना नगर गये थे। वहां उन्होंने रिमोट कंट्रोल से एक हजार मेगावाट के थर्मल प्लान्ट का शिलान्यास किया, लेकिन अपनी सरकार में एक सुई के बराबर की काम उस थर्मल प्लान्ट ने नहीं किया। आज आप हमसे बिजली का हिसाब मांग रहे हैं कि हमने कितनी बिजली बनाई। यह पहली बार हो रहा है कि जब वर्तमान सरकार हाइड्रो क्षेत्र के अंदर अपनी क्षमता को बढ़ाने जा रही है, चाहे वह आणविक बिजली घर हो या वह थर्मल से चलने वाले बिजली घर हो। पहली बार ५८०० करोड़ रुपया इरीगेशन के लिए खर्च किया गया, जिसके अंतर्गत ८.५ लाख हैक्टेअर जो सूखा क्षेत्र है, उसके अंदर सिंचाई का प्रबंध किया जायेगा। इतना ही नहीं २४५३ माइनर इरीगेशन योजनाएं, जिनके अंतर्गत १ लाख ४ हजार हैक्टेअर भूमि कवर होगी, १७० करोड़ रुपये की लागत से ये छोटी-छोटी योजनाएं हमने बनाई हैं, ताकि इनसे हमारे देश की पानी की समस्या हल हो सके।
सभापति महोदय, मध्य प्रदेश में दस सालों तक महारानी कांग्रेस पार्टी का राज रहा। श्री दिग्विजय सिंह वहां से मुख्य मंत्री रहे।…( व्यवधान)क्योंकि ये बड़े लोग हैं। देश को आजाद हुए…( व्यवधान)
सभापति महोदय : कटारिया जी, आप चेयर को एड्रैस कीजिए।
श्री रतन लाल कटारिया: दस साल तक कांग्रेस पार्टी का मध्य प्रदेश में राज रहा। उससे पहले भी चालीस वर्षों तक इनका राज रहा। लेकिन बड़े शर्म की बात है कि मेरे ख्याल से मध्य प्रदेश हिंदुस्तान में पहला ऐसा राज्य है जिसका २७ प्रतिशत क्षेत्र ही आज तक इरीगेटिड हुआ है। कांग्रेस पार्टी इतने सालों तक सत्ता में रहने के बाद अगर एक परसेन्ट भी एक साल में इरीगेटिड एरिया बढ़ाती तो अब तक लगभग ५० प्रतिशत वहां इरीगेटिड एरिया बढ़ सकता था। लेकिन इन्होंने इस दिशा में कोई काम नहीं किया।
आज ये बेरोजगारी की बात कर रहे हैं। हमने वर्ष २००१ में ७३ लाख ३ हजार लोगों को रोजगार दिया।…( व्यवधान)
श्री रामदास आठवले (पंढरपुर) :क्या केवल तीन हजार लोगों को काम दिया।
श्री रतन लाल कटारिया : तीन हजार नहीं, ७३ लाख ३ हजार लोगों को काम दिया।
श्री रामदास आठवले : मैं समझा तीन हजार लोगों को काम दिया।
सभापति महोदय : कटारिया जी, आप उन्हें उत्तर मत दीजिए, आप चेयर को एड्रैस कीजिए।
श्री रतन लाल कटारिया: हमने वर्ष २००१ में ७३ लाख ३ हजार लोगों को काम दिया। वर्ष २००२ में ७८ लाख ६ हजार लोगों को काम दिया और वर्ष २००३ में ८२ लाख ७ हजार लोगों को रोजगार दिया। हमारे इन पांच वर्षों में रोजगार की जो वार्षिक दर रही है, वह दोगुनी रही है और प्रति वर्ष ८४ लाख लोगों को रोजगार देने वाली भारत की यह पहली सरकार है।
हम चाहते हैं कि जो भारत का युवा वर्ग है, जो इस राष्ट्र की रीढ़ की हड्डी है, वह अपने रास्ते से न भटके और इस राष्ट्र के विकास में अहम भूमिका निभाए। इसीलिए देश के अंदर जो एक लाख इंजीनियर बनते थे, आज सवा तीन लाख इंजीनियर एक साल के अंदर भारत में बन रहे हैं। आज इनफार्मेशन टैक्नोलॉजी का क्षेत्र सारी दुनिया में छाया हुआ है। आज सारी दुनिया भारत की ओर देख रही है। आज ये समस्याओं की बात कर रहे हैं। भारतमाता के लाल श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने हिन्दुस्तान को विश्व की चौथी आर्थिक शक्ति बना दिया है। नहीं तो कांग्रेस पार्टी के ज़माने में तो १९६७ में पीएल४८० का सड़ा गला गेहूँ ये आस्ट्रेलिया और अमेरिका से मँगवाया करते थे। मैं खुद दलित का लड़का हूँ। हमारे घर में भी मेरे पिताजी राशन की दुकान से गेहूँ लेने जाते थे। लाल सड़ा हुआ गेहूँ हुआ करता था और मेरी माँ जब उसकी रोटी का पेड़ा बनाती थी तो सारी गेहूँ परात में उठ जाती थी, उस गेहूँ में कोई गुणवत्ता नहीं थी। आज भारत के अन्न के भंडार भरे पड़े हैं। हमारे गेहूँ का एक्सपोर्ट दुगुना हो गया है। चावल का एक्सपोर्ट पाँच गुना हो गया है और पाटिल जी कह रहे हैं कि किसानों की समस्याएं हैं। बड़ी विडंबना की बात है कि कांग्रेस पार्टी आज कह रही है कि भारत में किसानों की समस्याएं हैं। मैं कह रहा हूँ कि हाँ, समस्याएं तो कंटीन्यूअस प्रोसैस है, लेकिन जितना ध्यान वर्तमान सरकार ने किसानों, गरीबों और युवाओं की ओर दिया है, ऐसी मिसाल और कहीं नहीं मिलेगी।
सभापति महोदय, आज ये हमारे फील गुड फैक्टर का मज़ाक उड़ाना चाहते हैं। यह फील गुड फैक्टर ग्रेट फैक्टर बनने जा रहा है। मुझे भी अपने निर्वाचन क्षेत्र अंबाला के गांवों में घूमने का मौका मिला अटल संदेश यात्रा लेकर, और जब मैंने लोगों से पूछा तो लोगों ने भी अपना मन बनाया हुआ है। एक रुबाई के तौर पर जनता मुझे कह रही है कि --
"कमल के फूल पर मोहर लगाकर हम भी देखेंगे, अटल जी के ज़रा नज़दीक आकर हम भी देखेंगे।
आज लोग कह रहे हैं कि --
" जब से अटल जी का ज़माना आया है, लगे हैं गाँव-गाँव में टेलीफोन, तो सड़कों का जाल बिछाया है।
गांवों में टेलीफोन लगवाकर हम भी देखेंगे, अटल जी के ज़रा नज़दीक आकर हम भी देखेंगे। "

इसी तरह से चाहे सिक्यूरिटी का मामला हो, लौह-पुरुष माननीय आडवाणी जी के बारे में देश की जनता कह रही है कि जब से लौह पुरुष माननीय श्री आडवाणी जी गृह मंत्री बनकर आए हैं, आई.एस.आई. के २५० अड्डे उड़ाए हैं। चाहे अक्षरधाम हो, रघुनाथ मंदिर या चाहे संसद पर हमला हो, सबके सब आतंकी मार गिराए हैं।

"राष्ट्रविरोधी ताकतों पर पोटा लगाकर हम भी देखेंगे, अटल जी के ज़रा नज़दीक आकर हम भी देखेंगे। " …( व्यवधान)
I am not speaking irrelevant. … (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : Now, come to the subject.
… (Interruptions)
श्री रतन लाल कटारिया: सभापति महोदय, मैं हैल्थ पॉलिसी पर कहना चाहता हूँ जो गरीबों के लिए बनाई गई है। बहन सुषमा जी और मैं, दोनों ही एसडी कालेज के छात्र रहे हैं। वे संसदीय कार्य मंत्री भी हैं। मैं कहना चाहता हूँ क "जब से बहन सुषमा जी स्वास्थ्य मंत्री बनकर आई हैं, भारत के अस्पतालों में तब से मिलने लगी दवाई हैं।
पोलियो ड्राप अपने बच्चों को पिलाकर हम भी देखेंगे। "

एक नई पॉलिसी बहन सुषमा जी हमारे लिए लाई हैं। राष्ट्रीय स्तर के छ: एम्स स्तर के अस्पताल सरकार ला रही है और कहा जा रहा है कि हमने इस देश के लिए पिछले पाँच वर्षों में कुछ नहीं किया। आपने नहीं किया, आपके अंतरंग मित्रों ने नहीं किया। एनडीए ने देश की तस्वीर को बदल दिया है। मैं बताना चाहता हूँ कि जब हमारा कोई नेता विदेश जाता है तो उसमें कितना बदलाव या है। पहले हमारे राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री जाते थे …( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Now please conclude.

श्री रतन लाल कटारिया: चेयरमैन साहब, कांग्रेस के जमाने में, जब भी हमारे देश का कोई बड़ा नेता जाता था, तो वहां कांग्रेस का म्युनसिपल कमेटी का अध्यक्ष उसे रिसीव करने आता था, लेकिन अब हमारे देश का कोई मंत्री, प्रधान मंत्री की तो बात छोड़ दीजिए, यदि प्रधान मंत्री के रक्षा सलाहकार श्री बृजेश मिश्र भी जाते हैं, तो जार्ज बुश उनसे मिलने के लिए तीन-तीन और चार-चार घंटे देते हैं - यह चेंज भारत के अंदर आया है। यह भारत का स्वाभिमान है, जो श्रीमान अटल बिहारी वाजपेयी ने जगाया है।

महोदय, १९९८ में, जब पोखरण विस्फोट हुआ, तब वेयर हाउसिंग कार्पोरेशन के एक कार्यक्रम के तहत मुझे स्कॉटलैड जाने का मौका मिला। १६ तारीख को वहां बहुत से देशों के प्रतनधि आए हुए थे। जब उन्होंने मुझसे पूछा कि आप किस देश से आए हो और मैंने बताया कि हम भारत से आए हैं, तो वे सभी आश्चर्यचकित होकर कहने लगे कि भारत ने तो अणु विस्फोट किया है, वह बहुत ताकतवर देश बन गया है। यह सब श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की मेहरबानी से हुआ है। आज सारी दुनिया में भारत की पताका फहरा रही है।

महोदय, हम सब माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में आने वाले समय में फिर लोक सभा में आएंगे और जो सपना हमारे राष्ट्रपति श्री कलाम साहब ने देखा है, जो सपना हमारे प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी और उनके साथियों ने देखा है कि हम २०२० तक भारत को एक विकसित राष्ट्र ही नहीं, बल्कि दुनिया की एक सुपर पावर बनाकर ही दम लेंगे। आज के बाद हम मैदान में जाने वाले हैं। राजनीतिक युद्ध की रेखाएं खिंच चुकी हैं। एक पाले में श्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी सेना होगी और दूसरे पाले में श्रीमती सोनिया गांधी और उनकी सेना होगी। आज मैंने सोनिया गांधी जी और उनके सहयोगियों के जमघट के थके और हारे हुए चेहरे यहां देखे जा सकते हैं। मैं स्पष्ट कहना चाहता हूं कि हम मैजोरिटी लेकर फिर इस महान सदन में आएंगे। इसलिए इस प्रस्ताव की कोई आवश्यकता नहीं है। आपने मुझे बोलने का समय दिया, इसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।

श्री बालकृष्ण चौहान (घोसी): सभापति महोदय, नियम १९३ के अन्तर्गत आज देश में जो संगठित और असंगठित क्षेत्रों में किसानों की दयनीय स्थिति, युवाओं तथा कामगारों की दयनीय स्थिति है, उसके बारे में चर्चा हो रही है। अभी हमारे माननीय सदस्य, जो सरकारी बैंचों के हैं, उन्होंने काफी आंकड़े दिए और बखान किया, जिसके लिए मैं उन्हें बधाई देना चाहूंगा, लेकिन पूरे देश के नागरिकों को अगर देखा जाए और देश के संसाधनों को सांख्यिकी द्ृष्टिकोण से देखा जाए, तो प्रति व्यक्ति एक रूपए के हिसाब से लगभग एक अरब रुपए बनते हैं। हमारे देश में किसानों और मजदूरों की संख्या देश की कुल आबादी की ८० प्रतिशत है, इस द्ृष्टि से यदि देखा जाए, तो इतने धन से उन्हें उतना फायदा नहीं पहुंचा, जितना पहुंचना चाहिए था।

यह बात सही है कि देश में किसानों में भी दो वर्ग हैं। उनमें एक धनी किसान हैं। यदि डाटा के समुच्चय को देखें, तो विसंगति हर ओर नजर आएगी और हमारे किसानों की दयनीय स्थिति स्पष्ट नजर आएगी। किसानों के दो वर्गों में एक संपन्न किसान हैं, जिनको हरित क्रान्ति का लाभ हुआ है। वे १००-१०० और २००-२०० एकड़ वाले किसान हैं, लेकिन जो बहुसंख्यक किसान हैं, उनकी ओर मैं सदन का ध्यान दिलाना चाहता हूं। देश में जो छोटी-छोटी जोतों के किसान हैं, जिन किसानों के पास भंडे, बिस्वे और कड़ियों में जमीनें हैं, उनकी संख्या बहुत ज्यादा है और उन किसानों को कोई लाभ नहीं हुआ है। वे आज भी मुट्ठीभर अनाज के लिए तरस रहे हैं। जो अन्न पैदा करते हैं, उससे ज्यादा खर्च हो जाता है और अनाज उनके खाने के लिए भी नहीं बचता है। हमारे माननीय सदस्य यहां बहुत डींग मार रहे थे कि देश से चावल का निर्यात हो रहा है, अनाज के भंडार भरे हुए हैं, लेकिन देश के अधिसंख्य किसानों की स्थिति ठीक नहीं है। हमें उनकी ओर भी निगाह डालनी चाहिए।

उनके लिए कोई रणनीति तय करनी चाहिए। आज किसान आलू एवं गन्ने का उत्पादन कर रहा है। गन्ना मिलें बंद होती जा रही हैं। साजिश के तहत पूंजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की चाल की वजह से ये फैक्टि्रयां बंद कर दी जाती हैं और किसान अपना गन्ना जलाने के लिए मजबूर है। आलू के किसान को आलू ढो कर ले जाने में इतना खर्च आ रहा है। आलू के किसानों ने पिछले दिनों मंडियों में आलू को छोड़ दिया। पिछले वर्षों में असम में टमाटर के किसानों ने आत्महत्या की थी और महाराष्ट्र में कपास के किसानों ने की थी। ये सब क्यों हो रहा है, इसका क्या कारण है?केमिकल यार्न की वजह से कपास के किसानों की फसल की बिक्री नहीं हुई और जो बहुराष्ट्रीय कम्पनियां चिप्स बनाती हैं वे एक आलू का चिप्स बना कर, २० रुपए के एक पैकेट में हवा भर कर बेच रही हैं तथा हमारा किसान उसी आलू को बहुत कम कीमत पर भी नहीं बेच पा रहा है, सड़कों पर फेंका जा रहा है।

महोदय, सीमांत किसानों की आबादी बढ़ रही है, वे भूमिहीन एवं बेरोजगार होते जा रहे हैं। जो कृषक मजदूर है, उसकी कैसी स्थिति हो रही है? बड़े-बड़े किसान प्लांटेशन के लिए, हारवेस्िंटग के लिए बड़ी-बड़ी मशीनें ला रहे हैं। खेती में काम करने वाले छोटे तबके के जो लोग थे, जो माताएं-बहनें थीं, उन्हें रोज काम करने के बाद दो-ढाई किलो अनाज मिलता है। उनसे उन्हें वंचित कर दिया गया, वे भुखमरी के शिकार हो गए। आज छोटे-छोटे किसान ट्रेक्टर, टयूबवैल, खाद, बीज आदि के लिए कर्ज ले रहे हैं। आप आंकड़े उठा कर देखिए, उनका बैंकों में पैसा जमा नहीं होता है। उनकी जमीनें नीलाम हो जाती है। उनका क्या होगा, इस पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। इसके लिए कोई न कोई रास्ता निकालना पड़ेगा कि उनकी खेत की जमीन किसी भी कीमत पर नीलाम नहीं होनी चाहिए। यहां चर्चा बहुत हो रही है - "दर्द बढ़ता ही गया, ज्यों-ज्यों दवा की।" भारत विकास करता जा रहा है, लेकिन हमारा युवा कुंठित होता जा रहा है। उसके रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं, यह किस तरह का भारत उदय हो रहा है? उन्हें कैसे फील होगा, ये फील-गुड कैसे करेंगे?हमारे भारत की जो युवा शक्ति है, जो बेरोजगार हैं, बेरोजगारी आज क्यों बढ़ रही है, यह जो आटोमेशन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के जरिए हो रहा है और जो छटनी एवं वनिवेश हो रहा है, क्या वे अच्छा गुड-फील करेंगे ? कामगारों के ऊपर वर्क लोड बढ़ रहा है। हमारे देश के जो संसाधन हैं, समय और संसाधन की एक सीमा होती है। आप जब तक समय और संसाधन को पूरे देश के मैनपावर में वितरीत नहीं करेंगे तब तक आप उन्हें काम नहीं दे सकते हैं। डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स में दिया है कि फंडामेंटल राइट काम के अधिकार का होना चाहिए, यह सरकार को देना चाहिए था और अगर नहीं दे सकते हैं तो उन्हें बेरोजगारी का भत्ता मिलना चाहिए।

महोदय, रोजगार का आलम यह है, आप अखबारों में पढ़ें। अखबारों में आए-दिन निकलता है कि नौजवान आत्महत्या कर रहे हैं। मैंने एक अखबार में पिछले दिनों पढ़ा कि एक लड़के ने अपने पिता की इसलिए हत्या कर दी क्योंकि उसे उनकी जगह पर मृतक-आश्रित के आधार पर नौकरी मिलेगी। एक नौजवान ने अपने दोस्त की इसलिए हत्या कर दी ताकि कम से कम मैं जेल में चला जाऊंगा तो वहां मुझे रोटी खाने को तो मिलेगी ही । ऐसी परिस्थितियां हैं। आप परसों का अखबार पढि़ए, उसमें लिखा था कि एक दो साल का बच्चा बकरीद पर कपड़े मांग रहा था। वह रोने लगा तो उसे उसके बाप ने पटक-पटक कर मार दिया, क्योंकि उसने कई बार कपड़े मांगे, यह भयावह तस्वीर है। आप पूरे आंकड़े इकट्ठे करें, आप औसत निकाल कर देश को गुमराह नहीं कर सकते। आप सबको नजरअंदाज नहीं कर सकते। आज स्थिति बहुत ही भयावह है क्योंकि इसके कई कारण हैं। आज अराजकता क्यों बढ़ रही है, नक्सलाइट गतवधियां क्यों बढ़ रही हैं ? आप भूख को बंदूक की नोक से नही रोक सकते। सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों से मैं कहना चाहूंगा कि भूख और अभाव के सामने नैतिकता टिक नहीं सकती। आये दिन सारे प्रदेशों -- उत्तर प्रदेश दिल्ली, पंजाब आदि हर जगह कार्ल गल्र्स रैकेट में महिलाएं एवं लड़कियां अपनी अस्मिता को बेचने के लिए मजबूर हैं। वे कहती हैं कि भाई की दवा के लिए, अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए, अपनी मां के भोजन के लिए मैं इस काम को अख्तियार कर रही हूं। इसलिए भूख नैतिकता को नहीं मानेगी। नैतिकता उसके आगे टिक नहीं सकती।

मैं चाहूंगा कि आपको रोजगार के अवसर सृजन करने के लिए कोई रास्ता निकालना चाहिए था। लेकिन उलटी दिशा में, विलोम अनुपात में काम हो रहा है। हम विकास करते जा रहे हैं लेकिन रोजगार के अवसर घटते जा रहे हैं। रोजगार के अवसरों में कमी की सबसे बड़ी मांग का संवैधानिक अधिकार बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लोगों के लिए नौकरियों में आरक्षण दिया था। आज नौकरियों के अवसर घटते जा रहे हैं इसलिए वे अभी विपन्नता की स्थिति में, तंगहाली और भूखमरी की स्थिति में जा रहे हैं। इसका विकल्प है कि जो भी प्राइवेट सैक्टर है, प्रधान मंत्री जी ने माना है कि प्राइवेट सैक्टर में भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को आरक्षण देने की प्रकिया की हम हिमायत करते हैं, इसलिए मैं सरकार से कहना चाहूंगा कि वे तुरंत इस पर निर्णय ले। वह प्राइवेट सैक्टर में आरक्षण निर्धारित करे और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के नौजवानों को आरक्षण का अधिकार दे और जब तक काम का अधिकार सभी नौजवानों को सरकार न दे सके तो कम से कम उन्हें भुखमरी से बचाने के लिए, आत्महत्या से बचाने के लिए, अनैतिक बनने से रोकने के लिए, चोरी और डकैती से बचने के लिए कुछ न कुछ बेरोजगारी भत्ता निर्धारित करे। दुनिया के सब देशों में बेरोजगारी भत्ता दिया जा रहा है। हमारे देश में धन दौलत की कमी नहीं है। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : कृपया अब आप समाप्त करिये।

...( व्यवधान)

श्री बालकृष्ण चौहान : यहां विकास के बड़े-बड़े द्वीप हैं। अमीरी बहुत ज्यादा है। मैंने पिछले दिनों भी कहा था कि अमीरी रेखा कायम करके उस धन को रोककर हमारे देश के नौजवानों को, गरीबों को समभाव से वितरण की व्यवस्था लागू की जाये।

श्री रामजीवन सिंह (बलिया, बिहार) : सभापति महोदय, आज चर्चा का विषय यह है कि संगठित और असंगठित क्षेत्रों में किसान, युवा, मजदूर की हालत बहुत दयनीय है। दरअसल निष्पक्ष रूप से सोचा जाये तो इसमें वास्तविकता है। इसके बहुत से कारण हैं। किसी एक पर यह कारण थोपा नहीं जा सकता है स्थिति दयनीय है। दोनों क्षेत्रों में असंतोष है। इसके कई कारण हैं। मै यह मानता हूं कि आजादी के बाद और विशेषकर जब योजना काल प्रारंभ हुआ, इस देश में नौ योजनाएं समाप्त हुईं, नौ योजनाओं में खरबों रुपये खर्च हुए, पूंजी का निर्माण हुआ और देश आर्थिक द्ृष्टि से मजबूती की तरफ बढ़ा है। उधर कृषि क्षेत्र में उत्पादन भी बढ़ा है, उत्पादकता भी बढ़ी है। देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर ही नहीं हुआ बल्कि कुछ चीजों में निर्यात करने की स्थिति आयी है। उनका निर्यात भी किया जा रहा है। यह एक हकीकत है। यह भी एक हकीकत है कि आज देश में ३२ करोड़ आदमी हर शाम जब सोने के लिए जाते हैं तो या तो पूर्ण भूखे या अर्द्ध भूख होते हैं या वे जो खाते हैं, उनमें पौष्टिक पदार्थ नहीं होते हैं। परिणाम यह है कि उनके स्वास्थ्य पर, उनके शरीर पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। वे असमय बीमार होते हैं और मरते हैं।

ऐसा क्यों हुआ - इसलिए कि आर्थिक क्षेत्र में जहां पूंजी पैदा हुई किन्तु उसका वितरण समुचित रूप से नहीं हो सका। आज हम कहते हैं कि गरीबी रेखा की संख्या घटी है। यह हकीकत है कि गरीबी रेखा की संख्या घटी है, यह २५-२६ प्रतिशत पर आ गई है लेकिन यह भी हकीकत है कि अमीर और गरीब का अंतर ज्यादा बढ़ा है। एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच असंतुलन भी बढ़ा है। क्षेत्रीय विषमताएं बढ़ी हैं, असंतुलन भी बढ़ा है और उन तमाम चीजों का असर इन पर पड़ रहा है। क्या कभी इस बारे में सोचा गया है कि १९५१ में जिस समय योजनाकाल प्रारंभ हुआ था, सम्पूर्ण वल्र्ड ट्रेड में इंडिया का शेयर २.६ प्रतिशत था और नौ योजनाओं के बाद, बहुत उत्पादन के बाद, आत्मनिर्भरता के बाद भी आज वल्र्ड ट्रेड में हम घट कर ०.६ प्रतिशत पर चले आए हैं। ऐसा क्यों हुआ? ऐसा इसलिए हुआ कि जिस समय योजना का निर्माण हुआ, उस समय वास्तविकता को समझना चाहिए था कि आखिर हमारी समस्याएं क्या हैं, हमारे साधन क्या हैं और हमारा सिस्टम क्या है। हमने रशिया को देखकर योजना बना ली लेकिन वहां भारत की तरह डैमोक्रेसी नहीं थी, वहां डिक्टेटरशिप आफ दी प्रोलेटेरिएट थी। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी कार्यक्रम को जिस तरह लागू किया जाता है, स्वाभाविक है कि वहां पर उसे लागू करने की स्थिति दूसरी होती है। जिस तरह वहां डर और डंडे से काम किया जा सकता है, किसी भी लोकतांत्रिक देश में ऐसा करना संभव नहीं हो पाता। हमने सोचा इंजीनियरिंग के क्षेत्र में, कलकारखाने खोलने का । दूसरी पंचवर्षीय योजना में, राउरकेला, दुर्गापुर, भिलाई, बोकारो के कारखाने बिठाए गए थे। मैं स्वर्गीय पंडित जवाहरलाल जी के प्रति सर नवाता हूं। उनकी ईमानदारी, उनका चरित्र, उनकी देशभक्ति, उनकी विद्वता निश्चित तौर पर सराहनीय थी, मैं इस बात का लोहा मानता हूं। उन्होंने कहा था कि ये कारखाने आधुनिक भारत के मंदिर होंगे। मंदिर बन गया लेकिन देश नहीं बन सका। हमारे यहां कुदरत ने जो स्थिति दी है, भारत एक कृषि प्रधान देश है। कुदरत ने यहां बहुत अच्छी उपजाऊ जमीन दी, बहुत अच्छे जल के रुाोत दिए। ये दोनों चीजें यहां उपलब्ध रहीं और साथ ही बहुत बड़ी आबादी भी रही। हमारे पास जल के रुाोत, जमीन के रुाोत और हमारे संस्कार रहे हैं - उत्तम खेती मध्यम बान - तीनों को हम एक साथ नहीं जोड़ सके। यदि जल और जमीन का रिश्ता संस्कार के साथ जोड़ा गया होता तो निश्चित तौर पर आज हमारी स्थिति दूसरी होती। लेकिन उस तरफ नहीं जा सके । ऐग्रीकल्चर सैक्टर में, फार्म सैक्टर में जो प्राथमिकता देनी चाहिए थी, वह प्रथम पंचवर्षीय योजना के बाद आहिस्ता-आहिस्ता कम होती चली गई। हमने इंडस्टि्रयल क्षेत्र में बढ़ावा दिया।

जब एक बार वनिवेश के बारे में यहां चर्चा हुई थी, तब मैंने कहा था कि वह कौन सी परिस्थिति थी जिस हुकुमत ने एक समय मश्रित अर्थव्यवस्था चलाई थी। उस पार्टी को मजबूर होकर १९९१ में उदारीकरण की नीति अपनानी पड़ी। कहीं न कहीं भूल हुई जिसके चलते फिर से गाड़ी को विपरीत गियर में चलना पड़ा। इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा, देश के संतुलन, देश के विकास पर पड़ा। आज जो संगठित क्षेत्र है, उसमें जो लोग काम करने वाले हैं, निश्चित तौर पर उनके वेतन काफी बढ़े हैं लेकिन उसी अनुपात में उपभोक्ता संस्कृति में खर्चे भी बढ़ गए, बाजार में वस्तु के दाम भी बढ़ गए और, जब वस्तु के दाम बढ़ते हैं तो हम जितना वेतन बढ़ा पाते हैं, वह सब खपत हो जाता है। आज की उपभोक्ता संस्कृति में रहन-सहन बढ़ा है, तौर-तरीके बढ़े हैं, आवश्यकता बढ़ी है और इन सबका असर उस पर भी पड़ा है। इसलिए वेतनभोगी जो संगठित क्षेत्र में हैं उसके ऊपर असर पड़ा है और, आज वहां भी असंतोष है।

17.00 hrs वेतन बढ़ाने की एक सीमा होती है। उसको कम नहीं किया जा सकता है। उसी तरह से असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले जो लोग हैं, जो हमारे किसान हैं, खेतों में काम करने वाले जो मजदूर हैं, आज उनकी स्थिति भी बहुत ज्यादा खराब हो गई है। इसी सदन में बार-बार मांग होती है, मैं भी एक किसान हूं। मैं भी मांग करता था कि किसानों को उनके उत्पादी सामान का लाभकारी मूल्य नहीं मिल पाता है। हर सरकार आती है औऱ सपोर्ट प्राइस को बढ़ाती चली जाती है। हर सरकार समर्थन मूल्य बढ़ा देती है। मैं कहता हूं कि समर्थन मूल्य बढ़ता है लेकिन जिसके लिए बढ़ता है, उसको उस अनुपात में नहीं मिल पाता है जिस अनुपात में वह बढ़ता है। इसलिए मैंने यह सुझाव दिया था कि समर्थन मूल्य आप बढ़ाइए या नहीं बढ़ाइए लेकिन किसानों को उत्पादी सामान का जो आप दाम देते हो, उसको खऱीदने की व्यवस्था तो करो लेकिन वह नहीं हो पाता है। इसलिए बड़ा अच्छा किसी ने कहा क "सरकार ने कीमत बढ़ा दी थी धान की, फिर भी बेब्याही बेटी रह गई किसान की। "

उसका लाभ उनको नहीं मिल पाता है। आज कृषि के क्षेत्र में मैकेनाइज्ड खेती आई है लेकिन इसको औऱ व्यापक बनाना चाहिए। यह उतनी व्यापक नहीं हो रही है। चूंकि अपने देश में एक परम्परा रही है कि अगर बाप के पास सौ एकड़ जमीन हो औऱ उसके चार लड़के हुए तो उनको २५-२५ एकड़ चली गई और उनके कहीं चार-चार लड़के हो गये तो घटकर ६-६ एकड़ चली गई। बाप को सौ एकड़ और उसके पोते को ६ एकड़ मिली। इसीलिए बिहार से ट्रेन में बैठकर वे सीधे पंजाब और हरियाणा की तरफ मजदूरी करने के लिए चले आते हैं।
कृषि के क्षेत्र में भी कुछ इस तरह के काम किये जाएं । कृषि मंत्री जी यहां बैठे हैं, मैं कहता हूं कि जब इन चीजों पर चर्चा हो मैंने पहले भी कहा था कि यहां पर वित्त मंत्री जी को भी रहना चाहिए। अकेले में, आइसोलेशन में अगर ये निर्णय नहीं होंगे, अगर किसान कहता है कि हमें गन्ने का दाम बढ़ा दो। गन्ने का दाम बढ़ गया, तो उससे चीनी की कीमत बढ़ जाती है। चीनी की कीमत बढ़ने पर फिर उपभोक्ता हल्ला करता है कि चीनी का दाम बढ़ गया। दूसरे, जब इन चीजों के दाम बढ़ते हैं तो फिर पांच वर्ष पर एक वेतन आयोग बनता है औऱ वेतन आयोग इन्हीं एसेंशियल कमोडिटीज की जो प्राइस-इंडैक्स होती है, उसी आधार पर दाम निर्धारित करता है। फिर जैसे पांचवें वेतन आयोग की अनुशंसा थी, उसको लागू करने पर अकेले भारत सरकार पर उस साल १८००० करोड़ अतरिक्त खर्चा बढ गया था। इसलिए जरुरत इस बात की है कि एक समेकित रूप से इस पर सोचें । पीस मील में न सोचें । किसान अगर कुछ मांग रहा है, उपभोक्ता कुछ मांग कर रहा है तो उसके लिए अलग कर देंगे और देश की इकोनॉमी को, देश की अर्थ-व्यवस्था को छोड़कर उसके साथ समेकित रूप से नहीं देखेंगे, खंडश: देखेंगे तो फिर असंतुलन बना रह जाएगा और लाख कागज पर चीज बना लें, लेकिन जमीन तक यह चीज नहीं पहुंच पाती है।
सभापति महोदय : अब आप समाप्त करिए।
   
श्री रामजीवन सिंह : महोदय, मैं एक-दो मिनट में अपनी बात कह देता हूं। इसीलिए मेरा सुझाव यह है कि अब इन तमाम चीजों पर एक राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर सोचें क्योंकि यह किसी सरकार का मुद्दा नहीं है। हकीकत को देखें। मैं बार-बार यह कहता हूं कि आज की स्थिति क्या है ? जितनी भी मान्यता प्राप्त पार्टीज हैं, सभी सरकार में भी हैं और सभी प्रतिपक्ष में भी हैं। २०-२२ दलों की सरकार जो केन्द्र में है, वे सरकार में हैं और जो केन्द्र में नहीं हैं, वे राज्यों की सरकार में हैं । लेकिन, आज स्थिति यह होती है कि एक-दूसरे को जहां हम सरकार में रहते हैं तो सरकार की भाषा में बोलते हैं और जहां हम प्रतिपक्ष में रहते हैं तो वहां प्रतिपक्ष की भाषा में बोलते हैं। लेकिन जो देश की आवश्यकता है, उसकी भाषा में नहीं बोल पाते हैं। जरूरत इस बात की है कि आज सारे राजनीतिक दल, पिछले पचास वर्षों में जो नकारात्मक राजनीति करती रही है, उसको छोड़कर सकारात्मक राजनीति करने के लिए सोचें और सोचकर देश के सामने जो बुनियादी सवाल हैं, जैसे गरीबी है, बेरोजगारी है, महंगाई है, इन चीजों के बारे में सोचें कि कैसे इन समस्याओं का हल किया जा सकता है। जब इस दिशा में सोचेंगे तभी समस्याओं का निदान होगा।
निश्चित तौर पर अगर ऐसा नहीं करेंगे तो यह ज्यादा दिन तक नहीं चलेगा। बर्टेन्ड रसेल ने भूख की ज्वाला में जलने वाले किसी आदमी से पूछा था कि तुम पहले रोटी लोगे या लोकतंत्र, तो उस आदमी ने कहा कि निश्चित तौर पर वह पहले रोटी लेना स्वीकार करेगा, बाद में लोकतंत्र लेना स्वीकार करेगा। पेट में जब अन्न का दाना जाता है, उसके बाद दूसरी बातों के बारे में मनुष्य सोचता है। कहा भी गया है कि भूख न बूझे जूठा भात, यानी जब भूख लगती है, जूठा भात भी आदमी खाने के लिए तैयार है। यह कहा गया है कि भूखे भजन न होए गोपाला, लीजिए अपनी कंठीमाला। इसका मतलब है कि जब व्यक्ति भूखा होता है, तो उस समय कंठीमाला भी काम नहीं करती है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि आर्थिक स्थिति सुधारी जाए। जाति और धर्म से कोई व्यवस्था नहीं चल सकती। व्यवस्था चलती है बुनियादी चीजों पर । जाति और धर्म से न तो गरीबी मिटती है और न ही बेरोजगारी मिट सकती है। ये चीजें नीतियां बनाकर दूर की जाती हैं कि हमारी आर्थिक नीति कैसी होगी, हमारी श्रम नीति कैसी होगी, हमारी कृषि और योजना नीति कैसी होगी। इसलिए समेकित रूप से हमारी नीति क्या होगी, जिस पर गरीबी घटती है और बेरोजगारी दूर होती है, सोचे अन्यथा कुछ नहीं होगा । मैं एक दल और एक सरकार से नहीं, सभी से कहना चाहता हूं कि इस दिशा में गम्भीरता से सोचें, नहीं तो देश में विकट समस्याएं पैदा होंगी, जैसे एक साल पहले नागालैंड में हुई थी। वहां पर एक महीने तक सभी राजनीतिक दलों के कार्यालय जलाए गए थे, सभी के झंडे जलाए गए थे। वहां आग नहीं लगी थी, उस समय भी मैंने कहा था कि वहां एक चिंगारी उठी थी। राजनीतिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास की चिंगारी उठी थी। उस चिंगारी को रोकें। उससे एक सबक सीखें कि यह क्रोध कहां जा रहा है। ऐसा ही कुछ मणिपुर में भी हुआ था। अगर क्रोध को समेटने के लिए कोई व्यवस्था नहीं करेंगे, तो लाख कानून मजबूत कर लो, कुछ नहीं होगा। मैं इस बात से सहमत हूं कि जब वोट तंत्र की राजनीति से मामला नहीं सुलझता, तो वही हाथ बंदूक की तरफ बढ़ जाता है। इसलिए इस पर सारे राजनीतिक दलों को सोचने के लिए मजबूर होना चाहिए ।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं और आपको धन्यवाद देता हूं।
DR. V. SAROJA (RASIPURAM): Hon. Chairman, Sir, thank you very much for giving me this opportunity to place my views on behalf of my Party and my leader, who has given me this position of Leader of the All India Anna DMK Parliamentary Party. I take this opportunity to thank hon. Madam, hon. leaders and my senior colleagues. I learnt many things from them and need to learn more things from them.
Sir, I rise here to record my disappointment that on the last day of the Thirteenth Lok Sabha, this House should have discussed a very important subject of Private Members’ Bill. It was slated for discussion at 3.30 pm. During that time I was in the Parliament library preparing for my speech. To my surprise I was informed that the Private Members’ Business has been suspended. I am really not able to digest because it was a subject of national importance. It was about drinking water. It is not an easy subject. It is a subject of common people; and it is a subject which affects one’s life right from birth to death. Water plays an important role in the healthy life of an individual.
Such an important topic should have been discussed in this House. Through the deliberations of this House, we should have sensitised the community, the individuals, the policy-makers, the Press and also the entire world. The entire world should have learnt a lesson from this House, through our deliberations and observations. Having said that, I am happy that the hon. Minister of Health and Family Welfare has made an assurance to the Members of this House.
MR. CHAIRMAN : Dr. Saroja, we are discussing another issue.
DR. V. SAROJA : Thank you, Sir. I would only go on record that the Government has accepted my suggestion contained in my Bill. I would substantiate this.
Shrimati Sushma Swaraj assured the Members that the Government has already initiated steps to amend the Prevention of Food Adulteration Rules to upgrade the mechanism as per the ‘Capillary Method’ which is the international standard for checking impurities in water.… (Interruptions)
MR. CHAIRMAN : What is the relevance of it to this subject? Please come to the subject.
DR. V. SAROJA : I am recording this that based on my Private Members’ Bill, the Government has taken note of this. It has already taken steps to amend the Prevention of Food Adulteration Act.
Having said this, I am going to discuss about three important areas. The first one is about the farmers’ plight, the second one is about the youth and the third one is about the plight of the labourers in the organised and the unorganised sectors. We have discussed these subjects individually many times in the same House. We have deliberated upon them. The hon. Minister had also given the reply.
The hon. Finance Minister has presented the Interim Budget for the year 2004-05. I feel it is appropriate for me to draw the attention of the Government to some important issues. The future plans are there. How are we going to find solution for all those problems? Now, we are discussing those problems.
So far as the plight of the farmers is concerned, we should do something. Before that, I would like to say that the hon. Finance Minister has presented the Interim Budget. In this, the Government has focussed attention on six areas which are: enhanced employment, eradication of poverty, green revolution in agriculture, infrastructure development, fiscal consolidation and greater manufacturing sector’s efficiency. These are the six areas of their priority. When the Budget allocation was made, of course, he has made the allocation based on the problems and also the set goals before the Government. The Small Scale Industries and also the agro-based Small Scale Industries will create more job opportunities. It is not only for the labourers in the organised and the unorganised sector but also for the educated technocrats, veterinary doctors, agricultural scientists. They can also be involved in this. For the agro and the rural industries, the hon. Minister has made an allocation of Rs.164 crore for the Prime Minister’s Rozgar Yojana to assist the educated unemployed youth. Again, I have my own doubts. What are the projects that are there? Mr. Minister, have you got any specific scheme whereby you will spend Rs.164 crore to provide jobs to the unemployed youth? How will you create job opportunity? I would like to have a categorical reply in this regard. Have you got any scheme specifically so that I will take it up with my people in my constituency? If there is any scheme, people will be benefited.
A sum of Rs.248 crore has been provided for the Rural Employment Generation Programme to generate additional employment in the rural industries/sectors through the development of Khadi and Village Industries. Also, you have allocated Rs.176 crore to provide Credit Guarantee Fund to the SSI units, to provide collateral free loan to the SSIs. Apart from this, there is the Budget allotment for Agriculture as well as Cooperation. You have allocated Rs.350 crore to provide crop insurance and Rs.719 crore to provide macro management in agriculture. So also, you have allocated Rs.300 crore to cover an additional area of 12 lakh hectares under the Drought Prone Area Programme. By allotting Rs.300 crore and by bringing 12 lakh hectares of land, how many people in the organised sector as also the unorganised will benefit? How are you going to create job opportunities? On what basis would it be done? Is it a sustainable scheme that you are having?
Has the Government got any definite programme for which they have made this allocation?
Then, the Government has provided Rs. 448 crore for wasteland development in the Interim Budget. I would like to submit, through you, to the hon. Prime Minister that even after making so much allocation of money, things are moving in parallel way and there is no proper coordination between various departments of the Government. That is why, we are not able to find any definite solution to the problems faced by not only the individual States, but the country, as a whole. I would like to say that problems vary from State to State, problems vary from tribal areas to non-tribal areas and they vary also from North India to South India. We cannot apply the same yardstick throughout the country and think of making India a developed nation.
Sir, this morning we received this book explaining about the achievements of the NDA Government. I would like to quote a few lines from this book. It says:
"India is marching towards a bright future. We have our share of problems. But this cannot hide the brightness that has arisen. It will be a future free of poverty and other vestiges like unemployment…"Sir, this book quotes our Prime Minister Shri Atal Bihari Vajpayee as having said as follows:
"Unemployment problem must be addressed. The day is not far off when every region, every community, every citizen of our country shall enjoy the fruits of India’s prosperity and progress. If we act unitedly to get what we want, this energising goal can be achieved within the span of a generation. Is it a dream? Yes. Is it an impossible dream? No, it is not." We have the goal before us and we have the money also, but we do not have proper coordination among the various Ministries. The officials of all the allied Ministries should sit together, discuss, find out the problems and make need-based allocations. I would like to say without any hesitation that all the Ministries do not work towards a common goal. Every Ministry is working in a different direction. The Agriculture Ministry is working in a particular direction and the Labour Ministry is working in another direction. So, the need of the hour is proper coordination among various Ministries.
Sir, we have created Self Help Groups for the empowerment of women. So, the services of these Self Help Groups should be utilised properly. I would like to cite an example in this regard. Our dynamic leader, hon. Madam instructed me to coordinate with the Self Help Groups in my parliamentary constituency, Rasipuram in Tamil Nadu. I have collected 6,000 small and marginal farmers and formed 600 Self Help Groups. We have invited the officials of the district administration, NGOs, Self Help Groups of women, all the elected representatives of the local bodies, MLAs and MPs to a meeting at the District Collectorate. We all sat together and we collected all the statistics from all the concerned departments. We had three meetings and finally we had drawn up a project to the tune of Rs. 15 crore for starting a small-scale industry with tapioca, which is the main agricultural product of that area, as the raw material and 300 agricultural families will get benefited out of this unit.
Similarly, we have formed another 200 Self Help Groups for the development of horticulture and animal husbandry. Our leader, hon. Madam has directed the Self Help Groups of men to coordinate with the Self Help Groups of women in this effort. Then, we are giving loans to individual entrepreneurs belonging to the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes. We have also involved the agricultural, horticultural and animal husbandry graduates from the locality in this effort.
I would like to go on record that having done all these studies, we had a meeting with the industrialists from Japan on 26th January. Based on the information available with regard to sugarcane, tapioca and maize, hon. Madam is going to inaugurate one industry with foreign investment to the tune of Rs. 300 crore. As a result of that, the people from my constituency, including labourers and also other persons from the agricultural farming community, women’s self-help groups, that is, everybody would be benefited. Thus, we are able to find a solution.
Like that, every parliamentary constituency would benefit from the availability of agricultural products and small-scale industries. The Department of Agriculture is asking for statistics in so far as the technocrats and educated unemployed youth are concerned. They must be taken into confidence. Thus, we would be able to find a solution not only for the unorganised sector but also for the agricultural labourers and the youth. With these few lines, I would conclude.
               
प्रो. रासा सिंह रावत (अजमेर): सभापति महोदय, मुझे आश्चर्य हो रहा है कि इस लोक सभा के अंतिम दिवस और इस अवसर पर हमारे विपक्ष के माननीय सदस्यों को केवल आलोचना के नाम पर किसानों, मजदूरों और देश के नौजवानों की याद आयी। अगर यह मामला कुछ समय पहले आया होता तो शायद हमारा रचनात्मक द्ृष्टिकोण देश के सामने जाता और देश को एक नई दिशा प्राप्त होती। इन्होने आलोचना के लिये "All is well that ends well." वह नहीं देखा लेकिन जिन लोगों ने इस विषय को उठाया ,आज उनकी क्या स्थिति है, इसका आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं। यह विषय नियम १९३ के अंतर्गत लाया गया है। विषय उठाने वाले ही यहां नहीं हैं । वे कितने गंम्भीर हैं, वह इसी से पता चलता है।
सभापति महोदय, भारत एक कृषि प्रधान देश है। अगर किसानों की दशा सुधरेगी तो गांव की दशा सुधरेगी। अगर गांव सुधरेगा तो देश सुधरेगा। भारत माता गांवों में रहती है। अगर देश का हर गांव खुशहाल होगा तो हमारा देश खुशहाल होगा। अगर गांव का किसान खुशहाल होगा तो उसका विकास भी होगा। इस प्रकार सब विकास होगा। इसी प्रकार अगर श्रमिक वर्ग की राष्ट्र की खुशहाली जुडी हुई है। आज देश की भावी पीढ़ी, जिसके बारे में कहा जाता है - निकले हैं कहां जाने के लिये, पहुंचेंगे कहां यह मालूम नहीं इन राहों में भटकने वालों को, मंजिल की दिशा मालूम नहीं । आज के युवाओं की महत्वाकांक्षा को नेताओं ने जगा दिया है लेकिन उनके साथ क्या सुलूक किया गया , यह कहने की आवश्यकता नहीं। अभी हमारे पूर्व स्पीकर महोदय अपने दिल की गहराइयो से किसानों की वेदना की अभिव्यक्ति सदन में कर रहे थे। मैं जानना चाहता हूं कि पहले की सरकार ने क्या किया और अब की सरकार ने क्या किया? सब कुछ कर रहे हैं लेकिन उसका जो परिणाम सामने आना चाहिये, वह नहीं आ रहा है। इसलिये मैं कहना चाहूगा कि ‘ न सूरत बुरी है न सीरत बुरी है’ बुरा वही है, जिसकी नीयत बुरी है । पहले एक हरित क्रान्ति देश में हुई थी और दूसरी हरित क्रान्ति एन.डी.ए. की सरकार ने की है। इस सरकार में आने के बाद हमारे प्रधानमंत्री जी ने देश की स्थिति का जायजा लेने के बाद जो कुछ कहा है, वह मैं बतलाना चाहूंगा।
‘भारत एक सुनहरे भविष्य की ओर अग्रसर हो रहा है। हमारी कुछ ऐसी समस्यायें हैं लेकिन ये समस्यायें क्षतिज पर फैले प्रकाश को रोक नहीं सकती। भविष्य में गरीबी एवं अल्प विकास का नामोनिशां नहीं होगा। वह दिन दूर नहीं जब हमारे देश का प्रत्येक क्षेत्र, प्रत्येक समुदाय, प्रत्येक नागरिक नये भारत की समद्धिरूपी फल का रसास्वादन करेगा। इसलिये हम चाहते हैं और हम चाहेंगे कि उसके अनुसार एकजुट होकर कार्य करें। एक स्फूर्तिदायक उद्देश्य इस पीढ़ी के दरमियान प्राप्त किया जा सकता है। क्या यह सपना है,- जी हां। क्या यह असम्भव है, नहीं। यह सम्भव किया जा सकता है।’ सभापति महोदय, माननीय प्रधान मंत्री जी ने एक वज़िन दिया है। महामहिम राष्ट्रपति जी ने वजिन-२०२० दिया है कि हमारे देश के किसान कैसे बन जायेंगे, मजदूर कैसे हो जायेंगे और युवाओं की स्थिति क्या हो जायेगी और भारत का विश्व में क्या स्थान हो जायेगा?
भारत कितना समृद्धिशाली राष्ट्र बन जायेगा, विज्ञान के क्षेत्र में भारत कितना आगे बढ़ जायेगा, इस क्षेत्र में कितना स्वावलम्बन आ जायेगा, ये सारी बातें चल रही हैं। ऐसे अवसरों पर जीवन के प्रति एक सकारात्मक द्ृष्टिकोण होता है और एक नकारात्मक द्ृष्टिकोण भी होता है। मैं समझता हूं कि विपक्ष की हालत खसियानी बिल्ली खम्भा नोंचे जैसी हो गई है। देश में जो फील-गुड फैक्टर व्याप्त है, उस फील-गुड फैक्टर को देखते हुए और चारों तरफ उसके वातावरण को देखते हुए क्या करे और क्या न करें वाली स्थिति विपक्ष की है और सिर्फ आलोचना करने के लिए ऐसे विषय यह लेकर आते हैं।
मैं आंकडों में नहीं जाना चाहता, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि आज भारत चावल की द्ृष्टि से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश बन गया है। आज गेहूं की द्ृष्टि से भारत दुनिया का पांचवा सबसे बड़ा निर्यातक देश बन गया है। आज भारत में अन्न के भडांर भरे हुए हैं। हमारे कृषि मंत्री जी यहां बैठे हैं। इन्होंने पिछले दिनों किसानों के लिए किसान विकास कोष, किसानों के लिए सिंचाई के साधन, किसानों के ऋण पर ब्याज दर में कमी की व्यवस्था की। किसान क्रेडिट कार्ड की घोषणा की। यह कहने की बात नहीं है कि कांग्रेस के जमाने में अमीर लोगों के क्रेडिट कार्ड बनते थे, जो पैसे वाले लोग होते थे या जो देश-विदेश में घूमने वाले लोग होते थे, उनके लिए क्रैडिट कार्ड बनते थे। लेकिन भारत के किसानों के लिए बैंकों के क्रैडिट कार्ड बनाने वाली केवल वाजपेयी जी की एन.डी.ए. सरकार है, जिसने अब निश्चय कर लिया है कि ३१ मार्च, २००४ तक देश के सारे किसानों के लिए क्रेडिट कार्डों का वितरण करेंगे। इससे किसान क्रेडिट कार्ड लेकर बैंकों से फसल के समय या अन्य समय ऋण प्राप्त कर सकता है। ब्याज की दरें कम कर दी गई हैं। किसानों की फसल पर आधारित खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज की स्थापना की जा रही है। आज चारों तरफ सुविधाओं का जाल बिछ रहा है और किसान खुशहाल नजर आ रहा है। हर किसान के चेहरे पर रौनक दिखाई देती है। पहले गांवों में राशन की दुकानें होती थी, आज वे दुकानें बंद हो गई हैं। मैं किसान का बेटा हूं, मैं गांव का रहने वाला हूं। मैं जानता हूं कि पहले गांव में क्या हालत थी और आज किसानों की गांवों में क्या हालत है।
प्रधान मंत्री ग्राम सम्पर्क सड़क योजना को देखिये, किसानों की फसल सही समय पर मंडी में पहुंचे और तैयार फसल का सही समय पर मूल्य मिल सके, उसकी फसल खराब न हो, उसके फल और सब्जी खराब न हों, उसे उसका नकद पैसा मिल जाए। आज डामर वाली पेवर रोड्स बन रही हैं। एक हजार पांच सौ की आबादी वाले गांव आज सड़कों से जुड़ रहे हैं। उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम सारा हिंदुस्तान एक सूत्र में बंध रहा है। कितना सुन्दर काम हो रहा है। गांवों में पहली दफा डामर की पेवर पक्की सड़के दिखाई दे रही हैं, अन्यथा इससे पहले चमक-दमक दिल्ली जैसे शहरों में थी और गांव अंधकार में डूबे हुए थे। लेकिन आज गांवों का किसान भी समझता है कि कौन सरकार सड़कें बना रही है।
स्वजलधारा पेयजल योजना में दस कदम तुम बढ़ो, नव्वे कदम यह सरकार बढ़ेगी, कितनी गंभीरता से पेयजल की समस्या को दूर करने की बात हो रही है। यहां साहिब सिंह जी बैठे हैं, पहले जो बिल्िंडगें बनती थीं अंसल/बंसल/कंसल और पता नहीं कौन-कौन सी किस किसकी बिल्िंडगें बनती थीं, जो इन लोगों कों चंदा देती थीं। लेकिन उनमें काम करने वाले जो श्रमिक थे, जो झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाले श्रमिक और मजदूर थे, उनके भविष्य की तरफ कोई नहीं देखता था। उनके लिए कानून बनाकर उन्हें सुरक्षा प्रदान करने और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का काम केवल एन.डी.ए. की सरकार ने किया है और कोई सरकार यह काम नहीं कर पाई। इस सरकार ने कानून बनाकर सारे राज्यों में जहां भी काम करने वाले लोग हैं, जो संस्थाएं हैं, चाहें फैक्टरी हैं, उनके लिए १२% पी.एफ. कर दिया था। पर अब कई राज्य सरकारों ने उसे घटाकर ८.३३ कर दिया। मजदूरों और किसानों के हित में काम करना और खेलकूद के बारे में राष्ट्रीय युवा नीति का निर्माण इस सरकार ने किया है। अभी अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतिस्पर्धाएं हुईं, उनमें तथा क्रिकेट में भारत ने जीत हासिल की। ये सारी चीजें ऐसी दिखाई दे रही हैं कि आने वाले समय में भारत ओलम्पिक के अंदर भी कीर्तिमान स्थापित करेगा।
सभापति महोदय : कृपया समाप्त कीजिए।
प्रो. रासा सिंह रावत : महोदय, मैंने अभी बोलना शुरू किया है।
सभापति महोदय : कृपया सहयोग करें, अभी कई माननीय सदस्यों ने बोलना है।
प्रो. रासा सिंह रावत : मान्यवर, गांवों में जो किसान है, आज वह अपने बेटे से सीधे बात कर सकता है जो सीमा पर देश की रक्षा कर रहा है। आज एनडीए की सरकार ने गांव-गांव में टेलीफोन पहुँचा दिये हैं। बिना केबल के WLL के फोन आ गए हैं जिनसे घर बैठे किसान अपने बेटे से बात कर सकता है। अब ऐसा संपर्क कायम हो गया है कि सीधे गांवों का किसान मुख्य मंत्री और देश के बड़े-बड़े मंत्रियों से भी बात कर सकता है। टेलीफोन का जाल पूरे देश में बिछ गया है। गांवों में पांच किलो के गैस सिलेन्डर गरीबों के लिए दिये हैं ताकि गरीब लोग भी रसोई गैस का लाभ उठा सकें। यह तो मैंने संकेतमात्र दिया है लेकिनcoming events cast their shadows before. आने वाला समय कैसा होगा, उज्ज्वल भविष्य अटल जी की सरकार का होगा। फिर उनकी एनडीए सरकार बनेगी और खुशहाली के रास्ते पर जो देश तेज़ी से बढ़ रहा है, वह और आगे बढ़ेगा। नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी के शब्दों में --
" कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा, ये ज़िन्दगी है कौम की, तू कौम पर लुटाए जा। "

इन्हीं शब्दों के साथ मैं कहना चाहता हूँ कि आज सबको देश के प्रति समर्पित भाव से कार्य करने की आवश्यकता है। देश का हर वर्ग और समुदाय उन्नति के अनछुए पहलुओं और ऊँचाइयों की तरफ बढ़े, यही हमारी कामना है।

सभापति महोदय : श्रीमणिशंकर अय्यर।

माननीय मणिशंकर अय्यर जी से मैं अनुरोध करूँगा कि चूँकि समय बहुत कम है और आपके दल का समय भी समाप्त हो चुका है, आप आठ-दस मिनट में अपनी बात समाप्त कर दें यद्यपि मैं जानता हूँ कि आपको दिक्कत होगी।

श्री मणि शंकर अय्यर: कोई दिक्कत नहीं है।

       

SHRI MANI SHANKAR AIYAR (MAYILADUTURAI): Mr. Chairman, Sir, I am deeply grateful to you for giving me this opportunity to deliver my last speech from the opposition benches because I am certain that my next speech in this Parliament will be from the other side.

Sir, in the debate on the Motion of Thanks, at the beginning of last year, almost exactly a year ago, the Prime Minister made the following statement on the floor of this House, and I would like you to listen to it very carefully. He said in English – reading from a text that had been passed to him from the official gallery – that the net employment increase in the year 2002-03 was 84 lakh. When I asked the hon. Minister of Labour and Employment towards this, a few months later, he was unable to give me the answer as to how this 84 lakh figure had been arrived at. But when subsequently in the Winter Session there was yet another discussion on this issue, he read out to us the categories which would add up to 84 lakh jobs.

Now, in the English language, we make a very useful distinction between the net increase in employment and the gross increase in employment. The Prime Minister was very clear that he meant the net employment increase. The hon. Minister did not use the word ‘net’ then, he just added up those figures. But now, the hon. Minister of Disinformation, Shri Ravi Shankar Prasad, has circulated this tissue of untruths and mistruths called ‘stability, prosperity, etc.’ which has come to all our hands, and I find that in two different places, there is this game with words going on because right at the beginning they say, "additional employment opportunities were 84 lakhs"; then later on it says on page 59, "that the net employment creation is computed under the following heads: …". In other words, for the same figure of 84 lakh, one, we have now got a computation given by the Minister of Labour; second, we have got an expression called ‘additional employment opportunities’; and third, we have got the expression of the Prime Minister, which is, ‘that there is a net employment addition’. Now, what are we talking about is really what we are concerned with here.

Because, if what we are talking about is 84 lakhs net addition to employment, then we have to know where are the jobs that have got lost, because it is by minusing the jobs lost from the jobs created that you get the net employment addition. At page 59 of the document circulated by the Government, the total job loss is calculated at 80,000. That is all. Where has this job loss occurred? They say it occurred in the Central PSUs due to closure and retrenchment in the organised sector. The organised sector accounts for approximately seven per cent of India’s total labour force. Sir, 93 per cent of our labour is employed in the unorganised sector. They have not given us the figure here of what has been the net job loss in the unorganised sector of which agriculture is the single most important component.

Now, Sir, the Finance Minister has only, day before yesterday, taken the credit for the rate of growth this year having increased to eight per cent because the rate of growth last year has been reduced to four per cent. He has taken this credit. In the Economic Survey, we were told that in 2002-03, the rate of growth of GDP was 4.3 per cent. It has now been further reduced by the Central Statistical Organisation to a mere four per cent. Now, tell me how has this miracle occurred that in the year of the lowest growth of GDP since 1991-92, we have the highest job rate creation? How can the job rate creation be 42 lakhs, according to page 49, in the year 2002-03 which is the lowest performing year in the history of the Indian economy over the last decade and more? I want to know how he could possibly have arrived at this figure. In the previous year, that is, in 2001-02, you had a recovery of the economy. You were growing at six per cent. But according to you, the number of new jobs created at six per cent was 36 lakhs but the number of new jobs created when your growth rate goes down to four per cent, is 41 lakhs. Whom is cheating whom?

I think the answer simply lies in the fact that in the second category at page 59, they have said that the number of jobs in their employment generation programmes is 41 lakhs. Now, why would anybody go to an employment generation programme if he is working on his farm or if he is working on his handloom? He goes to these special Government programmes because the normal work has come to a standstill.

There was a drought in this country right across from Kashmir to Kanyakumari, but especially acute in Western and Central India. Naturally, the employment available in agriculture fell very sharply owing to this drought. They had not taken that into account in calculating their sum. Their own figures show that both in the silk handloom sector and in the cotton handloom sector, there is a complete collapse. My friend, Dr. Saroja will bear me out because she and I both represent constituencies where handloom matters enormously. The second largest employer in India is the handloom sector. The largest employer in India is the agriculture sector. In the year 2002-03, there was a collapse in agriculture and there was a collapse in handloom. But, they say, there was an increase in employment jobs. How do they calculate the increase in net employment? It is by only netting the 80,000 jobs lost in the Central public sector undertakings? They have not netted the job loss involved in poor agricultural performance and poor handloom performance. All the literatures show that in what is technically called ‘NFRE’, Non-Farm Rural Employment, the employment has totally collapsed. What is the figure they are talking of?

There is in technical literature you have the labour force, you have the workforce. There is no such expression as employment opportunities.

It is an invention that they have got over here.

After Dr. Sahib Singh Verma spoke here, the NSSO’s Fifty-seventh Round results were published. He is familiar with them. The Fifty-seventh Round establishes that the downward trend in employment which has been in evidence for the last five or six years has been sustained. In other words, unemployment has been increasing but we are told here that we should feel good because we are going to hide the truth.

It is not by reading this tissue of mistruths that the voter is going to decide what he is going to do. Every young man in India knows that he does not have employment opportunity. Every farmer, more importantly every khet mazdoor knows that he is not getting a job. Every weaver knows that his opportunities are being denied to him. Every Government servant knows that he is being downsized or right-sized. Every single public sector industry knows that it is under threat of privatisation, which after two years would always mean job loss. There is a complete investment starvation in agriculture. There is a complete investment starvation in irrigation. There is a boom in investment in synthetic yarns. There is a boom in investment in petrol refining. There is a boom in investment in refining in the petrochemical industry. These are not creating jobs.

If there was a riot in Gujarat in 2002, it was because, notwithstanding the fact that Gujarat is the State which has received the largest amount of foreign exchange since the reforms process began and notwithstanding the fact that Gujarat is the State which has had the only rate of growth at the State level comparable to South-East Asia and comparable even to China, there has been such a shrinkage of employment opportunities particularly in the textile industry in Ahmedabad and such other places that there was a lumpen proletariat available for exploitation by the fascist masses.

We need to have an employment policy that says we would measure the welfare of this country not by the growth of the GDP but by the growth of employment. It is only this Government’s Economic Survey, 2002-2003 based on the Fifty-fifth NSSO Round which has repeatedly pointed out that the army of the unemployed is increasing whereas the number of those with some kind of employment or self-employment opportunities is hardly increasing at all. In fact, the net employment in this country has come down. It has not increased as stated here. If you take into account the total net employment, the net employment increase was about 30 lakh to 30 lakh until this Government came to power. It has now declined even further. Approximately, we would have a crore people come on the labour market every year. The net job creation, that is people being thrown out of their jobs, is 30 lakh. So, only one out of five new entrants gets a job or is facilitated in employing himself. This is the grievous employment situation in this country.

Since the Government of the NDA is determined to hide the truth about the employment situation from its middle-class supporters and the editors who are blind to anyone other than their readers, we do not need this tissue of untruths to determine who this country is going to vote in a few months from now. Every single young man, every single young woman, every single previously employed labourer who has been thrown out of a job for no fault of his own and every single working person in this country who had an assured job in the public sector and is now being threatened by the right wing economics of this Government knows that they do not have work and therefore they are going to vote against them. Finally, the picture in this country is not going to be of this man smiling.

The picture of this country is that last year when the Railways advertised for 20,000 posts of Khalasis, there were 55 lakh applicants which includes doctors, engineers, MBAs and graduates. The poor of this country know that they are being befooled with these kinds of remarks made by the Government in its propaganda. India for them is not shining and their prospectus is dimming. The only shine we have is on the bold face of the hon. Minister of Agriculture and forehead of the hon. Minister of Labour. There is no shine anywhere else. This country is being led into an abyss of darkness from which rescue is possible only when we switch sides. In a few months from now, you will find us on that side and find them on your left.

श्री अरुण कुमार (जहानाबाद): माननीय सभापति महोदय, आज १३वीं लोक सभा का अन्तिम दिन है और नियम १९३ के तहत बड़े ही गम्भीर सवाल पर चर्चा शुरू हुई है। तीन सवाल, जिन पर हम चर्चा कर रहे हैं, ये निश्चित तौर पर राष्ट्र के सामने मूल समस्याएं हैं।

किसान, मजदूर और युवाशक्ति, देश की जो आर्थिक संरचना है, निश्चित तौर से उसका निर्माण ही गांवों से शुरू होता है। जब हम सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में चीजों को देखेंगे तो निश्चित तौर से आजादी के ५६ वर्षों के बाद जो गांवों की स्थिति बनी, वह अच्छी तस्वीर नहीं है। लेकिन सिर्फ हम कोसते रहें, किताब से आंकड़ों का जाल फेंकते रहें कि इन्होंने नहीं किया, उन्होंने नहीं किया तो यह ठीक नहीं है। निश्चित तौर से इससे समस्या का निदान नहीं होगा। लम्बे दिनों तक किसी तरह सरकार चलती रही, सरकार आती रही और जाती रही। पहली बार माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में एन.डी.ए. ने जो गांवों की तस्वीर बदलने का संकल्प लिया, मात्र इस एक घटना से किसानों को यह अहसास हुआ, खेत-खलिहानों में यह एहसास हुआ कि जो पूर्ववर्ती सरकारों ने गलती की, किसानों की उपेक्षा हुआ, खेत-खलिहानों की उपेक्षा हुई, उसका एकाएक तीव्र गति से विकास नहीं किया जा सकता, लेकिन एक संकल्प है, जो संकल्प उभरकर आया, जब केनकन सम्मेलन में तीसरी दुनिया के लोगों ने भारत के खेत-खलिहानों में रहने वाले लोगों में भी यह विश्वास पैदा हुआ कि डब्लू.टी.ओ. के माध्यम से जिस तरीके से समृद्ध राष्ट्र अपने इशारे पर दुनिया की इकोनोमी को चलाना चाहते हैं, निश्चित तौर पर भारत उसके सामने घुटने टेकने वाला नहीं है। यह संकेत इसलिए है कि एन.डी.ए. की सरकार में प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में यह संकल्प लिया गया और यह सोचा गया कि जब तक गांवों की तस्वीर नहीं बदलेगी, जब तक गांवों में खेत-खलिहानों की तस्वीर नहीं बदलेगी, तब तक राष्ट्र की तस्वीर नहीं बदल सकती है। यही कारण है कि जहां आबादी ४० करोड़ से लेकर आज १०० करोड़ से ऊपर चली गई, उससे जो हमारा शिक्षा का प्रबन्ध था, जो सिंचाई का प्रबन्ध था, जो सड़कों का प्रबन्ध था, जो सम्पर्क के पूरे साधन थे, वे सिर्फ शहरों तक सिमटे हुए थे। लेकिन चाहे आज टेलीफोन के क्षेत्र में हो, सङक के क्षेत्र में हो, दूर संचार के क्षेत्र में हो या शिक्षा के क्षेत्र में हो, आमूल परिवर्तन करने का संकल्प लिया गया है। यही कारण है कि प्रधान मंत्री सड़क योजना से लेकर सर्वशिक्षा अभियान जैसे सारे सवालों पर सरकार ने एक योजनाबद्ध तरीके से इन्फ्रास्ट्रक्चर को स्ट्रैन्थैन करने का संकल्प लिया है।

यदि हम संगठित और असंगठित क्षेत्र की चर्चा करते हैं तो निश्चित तौर से सभी क्षेत्र में रोजगार के अवसर कम हुए हैं। लेकिन एक बड़ी आबादी जो असंगठित क्षेत्र में काम कर रही थी, इस सरकार ने एक क्रान्तिकारी निर्णय लिया और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए जिनको रोजगार सृजित हुआ, मिले चाहे स्वजलधारा हो, सर्वशिक्षा अभियान हो, दूर संचार का विस्तार हो, रेल का विस्तार हो, स्वर्ण चतुर्भुज योजना हो या डेरी डेवलपमैंट हो--इन सारी योजनाओं के तहत जो विकास सैल्फ इम्प्लायमैंट के क्षेत्र में हुआ है या असंगठित क्षेत्र में हुआ है, उनके संरक्षण का जो प्रबंधन किया गया, यह एक क्रान्तिकारी कदम है। इसलिए हम नुक्ताचीनी नहीं करना चाहते कि क्या हुआ और क्या नहीं हुआ? लेकिन हम एक सलाह देना चाहते हैं। अभी मणि शंकर अय्यर जी बोल रहे थे कि गुजरात की घटना सिंक्रोनाइजेशन ऑफ इम्प्लायमैंट की वजह से हुई। लेकिन भागलपुर की घटना क्यों हुई? गुजरात की घटना को मैं वाजिब नहीं ठहराता लेकिन भागलपुर की घटना क्यों हुई थी ?

अब ऐसे सवालों को हम इस तरह के वातावरण में डालने का प्रयास करेंगे तो हम समझते हैं कि इन समस्याओं का सकारात्मक हल ढूंढने की हमारी मंशा नहीं है। इसलिए मैं सरकार से अऩुरोध करना चाहता हूं हालांकि अभी इतना गंभीर विषय है और ऐसे सवालों पर सदन में पहले भी कई बार चर्चा हो चुकी है। कई तरह की योजनाएं हैं जिसके तहत गांव के विकास के लिए भारत सरकार काफी धन दे रही है, तथापि लेकिन उस धन का सही उपयोग नहीं हो रहा है। हम चाहेंगे कि सरकार इसका आगे ऐसा प्रबंधन करे जिससे सिंचाई, शिक्षा और एग्रीकल्चर बेस्ड इकोनोमीक को स्ट्रैन्थैन करना और हम जो धन देते हैं, उसका सही-सही उपयोग हो सके।

सभापति महोदय, दो चीजें हमारे सामने हैं जिसमें कोई सेचुरेशन प्वाइंट नहीं है --डेरी और फूड प्रौसेसिंग। आज भी गांवों में हम जो सब्जी पैदा करते हैं, फल पैदा करते हैं, अब इनका प्रबंधन हो। जिस तरह से ग्लोबल विलेज आज हो गया है और मार्केट का सिस्टम बदला है, ऐसी परिस्थिति में एक साइंटफिक तरीके से हमें गांव से शहर तक, शहर से राजधानी तक और राजधानी से देश के बाहर भी हम इसके मार्केटिंग सिस्टम को स्ट्रैन्थैन करने के लिए यहां आये हैं।

हमारे सामने यहां बड़ी सूझ-बूझ वाले एग्रीकल्चर मनिस्टर बैठे हुए हैं। हम उनको सलाह देना चाहते हैं कि अधिक से अधिक धन यदि डेरी और फूड प्रौसेसिंग सिस्टम पर लगाया जाये तो निश्चित तौर से इम्प्लायमैंट जेनरेशन का बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर हमारे सामने खड़ा हो सकता है जिससे युवा पीढ़ी के लिए एक नयी दिशा तय हो सकती है। लेकिन इसके साथ-साथ हमें आबादी पर भी नियंत्रण करना होगा। जिस तरीके से आज देश की आबादी बढ़ रही है, हम चाहे २० साल की योजना बनायें यदि आबादी का दर यही रहेगी तो हम फिर घूम फिरकर वहीं पहुंचेंगे। इसलिए कठोरता के साथ हमें यह भी निर्णय लेना होगा। जो स्थिति, जो आर्थिक संरचना गांव की कल तक रही है, हमारी सांस्कृतिक विरासत है, जब हम अपने बचपन की बात याद करते हैं तो हम देखते हैं कि गांव में एक समृद्ध किसान का भी खर्च बहुत कम था।

17.55 hrs. (Mr. Speaker in the Chair) आज हमारे भोजन का प्रबंध हो या न हो, स्वास्थ्य का सही प्रबंध हो या न हो, आज हमारी सांस्कृतिक विरासत में जो बदलाव हुआ है, रहन-सहन में जो बदलाव हुआ है, मैंटल सैट-अप में जो बदलाव हुआ है, उसकी वजह से हमारे गांवों में अंकल चिप्स से लेकर तमाम खर्चीली चीजें दी गई हों, जिनकी पहले किसान को जरूरत नहीं हुआ करती थी, इसलिए हम चाहते हैं कि जिस तरह हमारे गांवों में किसानों का खर्च बढ़ा है, उसी तरह हमें कुछ ऐसा प्रबंधन करना चाहिए ताकि हम जो धन खर्च करते हैं, उसका सही उपयोग हो और वहां की आर्थिक संरचना भी मजबूत हो। किसानों और मजदूरों को गांव के बाहर नहीं जाना पड़े, वहीं ऐग्रीकल्चरल बेस्ड इंडस्ट्री हो। उसके माध्यम से रोजगार का सृजन हो ताकि शहरों पर जो खर्च हो रहा है, शहरों की आबादी पर जो खर्च हो रहा है, वह अनावश्यक रूप से उन्हें न ढोना पड़े। इस सरकार ने जो बड़ा फैसला लिया है, वह गांव की मजबूती के लिए, उसके इन्फ्रास्ट्रक्चर, उसके डैवलपमैंट के लिए लिया है। गावों में जिस तरह डेरी या फूड प्रोसैसिंग की बात की जा रही है, मेरा सुझाव है कि वहां एक मकैनिज़्म डैवलप किया जाए ताकि वहां जो पैदा होने वाली वस्तुएं हैं, उनका शेष भाग से कम्पीटिशन हो। इसके लिए ऊर्जा भी सबसे आवश्यक रुाोत है। हमारे पास ऊर्जा के बड़े सोर्स हैं। इसलिए सरकार को गांवों की समृद्धि के लिए ऊर्जा का भी सही प्रबंधन करना चाहिए। दूरसंचार क्रान्ति, रोड के लिए जो योजना बनी है, उसी तरह ऊर्जा प्रबंधन के लिए भी प्लान्ड वे में हमें प्रबंध करना चाहिए। यदि हम स्वास्थ्य, शिक्षा, ऐग्रीकल्चर गुड्स की सही मार्केटिंग का प्रबंधन करते हैं तो निश्चित तौर पर गांवों में रहने वाले लोगों की क्रय शक्ति बढ़ेगी, राष्ट्रीय समृद्धि होगी और देश का जीडीपी बढ़ेगा।

सरकार का गांवों की ओर जो बढ़ता हुआ कदम है, गांवों में क्रान्ति लाने, आर्थिक समृद्धि लाने का जो कदम है, उससे निश्चित तौर पर असंगठित, संगठित और युवा शक्ति को भी नया बल मिलेगा और हम मजबूत भारत की ओर आगे बढ़ेंगे।

   

श्री रामदास आठवले (पंढरपुर) : अध्यक्ष महोदय, आज का दिन इस लोक सभा का अंतिम दिन है। मैं आपको और सब माननीय सदस्यों को इस अंतिम दिवस पर बधाई देता हूं। आप और हम यहां दुबारा मिलेंगे, मैं ऐसी उम्मीद करता हूं। तेरहवीं लोक सभा के बाद किसका अंत होने वाला है, यह मालूम नहीं है।…( व्यवधान)हमारा अंत होने का सवाल ही नहीं होता, अगर अंत होगा तो आपका ही हो सकता है।

हम एक महत्वपूर्ण विषय पर यहां चर्चा कर रहे हैं। देश के किसान, युवा और श्रमजीवी लोगों की दयनीय स्थिति के बारे में यहां चर्चा हो रही है कि पचास सालों में कुछ नहीं हुआ, पांच साल में सब कुछ हुआ है। अभी हम कहीं भी जाते हैं तो लोग कहते हैं कि पांच साल में सब कुछ हुआ है। आपका जो फील गुड फैक्टर है, उसमें किसका फील गुड है और किसका बैड है, यह देखना है। हम सिर्फ सवाल उठाने वाले नहीं है।

18.00 hrs. हम तो खाली सवाल उठाने वाले नहीं हैं, हम तो उन सवालों को मिटाने वाले हैं।

हम तो किसानों, युवाओं और श्रमिकों को ऊपर उठाने वाले हैं, और आपकी सरकार को दिल्ली के तख्त से हम हटाने वाले हैं।

जब से अटल जी का राज आया है, सब लोग बोल रहे हैं, हमने कुछ भी नहीं पाया है।

आज हम सब विपक्षी दलों ने बैठकर, आपको हटाने का गीत गाया है, इसलिए एनडीए के माहौल में अन्घेरे का साया है।

अध्यक्ष महोदय, सवाल इतना ही है कि सरकार जिसकी भी हो मगर ५६ सालों में हम कहां आये हैं? हम अपने देश की गरीबी को हटाने में कहां तक सफल हुए हैं ? सरकार किसकी भी हो मगर आज भी देश में २६ प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे बसते हैं। अगर हम गांवों में जाते हैं तो वहां रास्ते नहीं हैं। किसानों, युवाओं और खेती, मजदूरी करने वाले लोगों की स्थिति भी खराब है। इसीलिए पूरे सिस्टम को बदलने के बारे में हम सभी लोगों को विचार करने की आवश्यकता है। आप लोग बोल रहे हैं कि आज आखिरी दिन है और आखिरी दिन यह सवाल नहीं उठना चाहिए क्योंकि यह सवाल देश की नब्बे प्रतिशत आबादी से जुड़ा है और यह विषय आज ही चर्चा में आ जाता है तो आपकी खटिया खड़ी होने वाली है। इसलिए आपको लगता है कि यह विषय आज क्यों आया है ? हमारा इतना ही कहना है कि यह जो विषय है, जो असंगठित कामगार हैं और संगठित मजदूर लोग हैं, काम ठीक करना है मगर भूमिहीन लोगों को जिनके पास जमीन नहीं है, राजनाथ सिंह जी, आपके पास तो आपका डिपार्टमेंट है, आप तो किसान हैं। हम मजदूर के बेटे हैं और आप किसान के बेटे हैं मगर मजदूर का बेटा और किसान का बेटा एक होना चाहिए। अगर खेती का विकास करना है तो मजदूर का बेटा और किसान का बेटा एक होना चाहए। मजदूरों और किसानों को न्याय देने की आवश्यकता है। गांव में भूमिहीन लोगों को जमीन मिलनी चाहिए और तीन साल तक जिन लोगों के नाम एम्पलॉयमेंट एक्सचेंज में रहते हैं, उनको नौकरी देने की जिम्मेदारी सरकार की है। अपने देश के संविधान के मुताबिक तीन साल जिन लोगों के नाम अगर एम्पलॉयमेंट एक्सचेंज में रहते हैं तो उनको नौकरी मिलनी चाहिए। अगर उनको आप नौकरी नहीं दे सकते हैं तो हर महीने तीन हजार रुपये उनको बेरोजगारी भत्ता मिलना चाहिए। यह क्षेत्रीय कानून है। साहिब सिंह वर्मा जी क्षेत्रीय कानून के बारे में जानते हैं कि जो लोग असंगठित मजदूर हैं, खेतों में मजदूर हैं, उन लोगों को, जो ३७ करोड़ लोग हैं, वे खेती पर डिपेंड हैं। जो बीमा योजना है, उनको सुविधा देने के बारे में आपको क्षेत्रीय कानून को जल्दी से जल्दी लाने की आवश्यकता है।

मनिमम वेजेज का विचार हम करते हैं तो महंगाई का विचार करते हैं और रुपये का मूल्य १६, साढ़े १६ पैसा तक है। इसीलिए हर मजदूर को २०० रुपया मजदूरी मिलनी चाहिए। अगर बेरोजगारी को हटाना है तो मेरी मांग है कि ८ घंटे की डयूटी जो कारखानों में होती है, जो तीन शिफ्ट होती हैं, तीन शिफ्ट की जगह चार शिफ्ट होनी चाहिए। आठ घंटे की डयूटी की बजाए ६ घंटे की डयूटी होनी चाहिए। अगर ८ घंटे की जगह पर ६ घंटे की डयूटी होती है तो और भी लोगों को ज्यादा रोजगार मिलेगा।

इसी तरह से पुलिस की डयूटी १२ घंटे की होती है। पुलिस के लिए ८ घंटे की डयूटी होनी चाहिए ताकि हजारों लाखों लोगों की पुलिस में भर्ती की जा सकती है। इसके बारे में आपको अपनी सरकार में विचार करना चाहिए।

कांट्रैक्ट सिस्टम को बंद करने की आवश्यकता है। जितने भी मजदूर मुनसिपैलिटी में हैं तथा और भी कांट्रैक्ट लेबर के माध्यम से जो काम करते हैं लेकिन उनको पूरी सुविधा नहीं मिलती है और जो कंपनी कांट्रैक्ट देती है तो उस कांट्रैक्टर को पांच हजार रुपये उसके देती है लेकिन वह कांट्रैक्टर उसे २००० रुपये या २२०० रुपये देता है। इसलिए उस लेबर को पूरी सुविधा देने से हटने के लिए इस तरह के कांट्रैक्ट सिस्टम को कानून से हटाने की आवश्यकता है। यह भी हमारी एक मांग है। हमारी एक मांग यह भी है कि दो साल के बाद हर मजदूर स्थाई होना चाहिए। अभी तक हमने देखा है कि रेलवे में एक आदमी खलासी के पद पर नियुक्त होता है, तो वह रिटायर हो जाता है, लेकिन स्थाई नहीं किया जाता है। इसलिए इस बारे में भी विचार करने की आवश्यकता है। प्रधान मंत्री जी ने निजी क्षेत्र में आरक्षण देने के सम्बन्ध में कहा है। हमारी मांग है कि निजी क्षेत्र में भी आरक्षण होना चाहिए। विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से विदेशों से सारा सामान यहां आ जाएगा, हमारे कारखाने बंद हो जाएंगे, अभी भी बंद हो रहे हैं। आपने कहा कि ८४ लाख लोगों को रोजगार दे दिया है, लेकिन कम्पनीज और मिलें बंद होती जा रही हैं और बाहर का सामान यहां आ रहा है। जनवरी २००५ में डब्ल्यू.टी.ओ. के अनुसार विदेशों का सारा सामान यहां आ जाएगा और तब तक नई सरकार भी हमारे देश में आ चुकी होगी। हम आपसे वादा करते हैं कि अगर हमारी सरकार आई तो हम बहुत कुछ करेंगे।

अध्यक्ष महोदय, आपने हम लोगों के साथ बहुत अच्छा सहयोग किया। अगर आप दोबारा अध्यक्ष बनना चाहते हैं तो आपको हमारे साथ आना होगा। आपने सदन को बहुत अच्छी तरह से चलाया है। इसलिए हम लोक सभा के इस अंतिम सत्र के अंतिम दिन आपसे कहना चाहते हैं कि आप हमारे साथ आ सकते हैं, लेकिन आपके लीडर साहब यहां नहीं आने देंगे।

अध्यक्ष महोदय : रामदास जी, मैं सभी के साथ हूं।

श्री रामदास आठवले : अध्यक्ष जी के नाते आपको सभी के साथ होना चाहिए। मैं ज्यादा समय नहीं लूंगा। १३वीं लोक सभा में बहुत बार मैंने सदस्यों को हंसाया था, मगर हंसाते-हंसाते मैंने सरकार को फंसाया भी था।

अटल जी, श्रमजीवियों, किसानों, युवाओं के खिलाफ अगर आपका चलता रहेगा खेल, तो आने वाले चुनाव में यही लोग आपको कर देंगे फेल।

इसलिए हम सब दलितों, आदिवासियों, किसानों, मजदूरों के अधिकारों को आप कर देंगे सेल, तो आपको एक दिन होगी जेल।

प्रधान मंत्री जी सदन में आ रहे हैं। वैसे तो इस वक्त मेरा भाषण होना चाहिए था, लेकिन मुझे पहले ही बुला लिया गया। आज इस लोक सभा का अंतिम दिन है। लेकिन मेरा अंतिम सत्र नहीं है, मैं दोबारा आने वाला हूं और उधर आऊंगा। अध्यक्ष जी, आप भी चुनकर आएंगे। लेकिन सरकार में कौन आते हैं, यह देखने वाली बात होगी।…( व्यवधान) आपको टिकट मिलेगा भी या नहीं, यह भी देखने वाली बात होगी, मैं तो आऊंगा ही। आज हम सब लोगों को जो खाना खिलाया गया, वह बहुत अच्छा था। आने वाले चुनाव में अगर हम ठीक ढंग से वन-टू-वन केंडीडेट खड़ा करेंगे तो आपके लिए यह ठीक नहीं होगा। अगर हम ऐसे ही करेंगे तो आपके लिए ठीक होगा, यह सब लोग जानते हैं। इसके बावजूद हमारी कोशिश यह होगी कि युवाओं को, आदिवासियों को, दलितों को, मजदूर-किसानों को न्याय देने के लिए हमारे ऊपर जिम्मेदारी आती है तो हम आने वाले दस सालों में देश को चमकाने का प्रयत्न करेंगे और देश के हर वर्ग की भलाई के लिए कार्य करेंगे। आपने थोड़ी-बहुत कोशिश की है इसलिए आपको थोड़ी सफलता मिलेगी। हम ज्यादा कोशिश करेंगे तो हमें ज्यादा सफलता मिलेगी। ऐसा भी नहीं है कि आपने कोई काम नहीं किया, लेकिन आपने कुछ काम किया है। आपने जिन बेरोजगारों को काम दिया है, उनके वोट आपको मिलेंगे और जिनको नहीं दिया है उनके वोट नहीं मिलेंगे। आपने साढ़े चार साल तक जो किया, अब जो आपने जंग छेड़ी है, हम उसका मुकाबला करेंगे।

मैं अंत में यह कहना चाहता हूं कि प्रधान मंत्री अटल जी ने २४ पार्टियों को सम्भालने का जो काम किया, वह अच्छा काम किया है। २४ पार्टियों में से कोई भी इधर-उधर नहीं गईं, लेकिन आखिर में डी.एम.के. वाले इधर आ गए। इसलिए यह मैडम उधर चली गई हैं। यह ठीक है कि आपने २४ पार्टियों को बहुत अच्छी तरह से सम्भाला है, हम लोगों को सम्भालने में मुश्किल है। आज भी हमारी कोशिश चल रही है। जब हमारी सरकार आएगी तो कितने दिन रहेगी, यह मालूम नहीं है, यह स्थिति है, लेकिन फिर भी हम कोशिश कर रहे हैं।

जैसेआपने २४ पार्टियों को संभालने का काम किया है उसी तरह से हम भी एक साथ रहने वाले हैं। माननीय सोनिया जी और शरद जी नजदीक आ गये हैं, लालू प्रसाद यादव जी और पासवान जी भी नजदीक आ गये हैं तथा हमारे आरपीआई वाले भी नजदीक आ गये हैं। मैं इस १३वीं लोक सभा के अवसर पर इतनी उम्मीद करता हूं कि गरीबों, किसानों, दलितों और आदिवासियों को न्याय मिले तथा उनमें आर्थिक और सामाजिक बराबरी आ जाए। साथ ही अपने देश की इज्जत पूरी दुनिया में बढ़नी चाहिए और हमें अपने देश के लिए काम करना चाहिए। कोई आयेगा, कोई जाएगा, यह सिलसिला तो चलता रहेगा, लेकिन हम सभी को देश की उन्नति के लिए काम करना चाहिए। मैं बाबा भीमराव अम्बेडकर जी को अभिवादन करते हुए यह उम्मीद करता हूं कि उन्होंने जो संविधान हमें दिया, उसके अनुसार देश चले और मजबूत बने तथा दुनिया में हमारा देश एक नम्बर पर रहे। पिछले ५० सालों में हमने क्या किया, इसकी चर्चा न करते हुए, जो इश्यु देश के सामने हैं उन्हें हम कैसे हल कर सकते हैं इस बात की चर्चा होनी चाहिए। अध्यक्ष जी, एक बार फिर आपको धन्यवाद कि आपने मुझे बहुत बार मौका दिया है। माननीय अटल जी ने मेरी कविता सदन में बहुत बार सुनी है, लेकिन उनकी कविता हाउस में मैंने नहीं सुनी है। इसलिए उनकी कविता हम हाउस में सुनना चाहते हैं। हम चाहे कहीं भी जाए लेकिन हम देश को मजबूत करेंगे।

______ 18.15 hrs. DISCUSSION UNDER RULE 193 PLIGHT OF FARMERS, YOUTH AND WORKING CLASS BOTH IN THE ORGANISED AND UNORGANISED SECTORS – contd.

कृषि मंत्री (श्री राजनाथ सिंह) : अध्यक्ष महोदय, आज इस सदन में बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा हुई है। मैं देख रहा हूं कि माननीय तोपदार जी और माननीय बसुदेव आचार्य जी, जिनका यह प्रस्ताव था सदन में मौजूद नहीं है। मैं तो अपने उत्तर का सिलसिला उन्हीं के द्वारा उठाये गये मुद्दों से प्रारम्भ करता, लेकिन इस समय वे सदन में मौजूद नहीं हैं। इसलिए माननीय शिवराज जी पाटिल जिन्होंने उनके पश्चात अपने विचार व्यक्त किए हैं और कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए हैं, उन्हीं से अपनी बात प्रारम्भ करता हूं। मैं माननीय पाटिल जी की इस बात से पूरी तरह से सहमत हूं कि अगर हम इस देश का सुधार करना चाहते हैं तो जब तक कृषि में सुधार नहीं होगा, तब तक देश का सुधार नहीं होगा।

हम जानते हैं और हमारी सरकार भी जानती है कि देश का सबसे बड़ा उत्पादक, सबसे बड़ा उपभोक्ता, सबसे बड़ा ग्राहक यदि कोई है तो हिन्दुस्तान का किसान है। आपने कहा कि सबसे मूलभूत बात यह होनी चाहिए कि जो भी सरकार हो, उसकी नीयत किसानों, गरीबों और कामगारों के प्रति साफ होनी चाहिए। हमारी नीयत कैसी है, मैं खुद अपने मुंह से कुछ कहूं, कहना उचित नहीं होगा लेकिन मैं यह कहना चाहूंगा कि आपने कहा कि प्रथम पंचवर्षीय योजना में गावों के विकास के लिए, कृषि क्षेत्र के विकास के लिए, सबसे अधिक एलोकेशन था। मैं इस बात को स्वीकर करता हूं। आपने यह सिलसिला वहां से निश्चित रूप से प्रारम्भ करने की कोशिश की। प्रथम पंचवर्षीय योजना के बाद, द्वितीय पंचवर्षीय योजना, तृतीय पंचवर्षीय योजना, चौथी पंचवर्षीय योजना में बराबर रूरल सैक्टर के लिए जो एलोकेशन होना चाहिए, जो प्लान आउट-ले होना चाहिए, निरन्तर उनमें कमी आती गई। मैं इनके आंकड़े भी दे सकता हूं कि इनमें निरन्तर कैसे कमी आती गई - चाहे पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधान मंत्री रहे हो, चाहे स्वर्गीय श्रीमती इन्दिरा गांधी रही हों या राजीव गांधी जी प्रधान मंत्री रहे हों या जो भी प्रधान मंत्री रहा हो, मैं किसी की नीयत पर सवालिया निशान नहीं लगाना चाहता हूं। मैं निश्चित रूप से नीति के ऊपर सवालिया निशाना लगाना चाहता हूं।

आपने कहा कि प्रथम पंचवर्षीय योजना के दौरान हमने किसानों को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए बाकायदा भाखड़ा डैम बनाए, बड़ी-बड़ी सिंचाई परियोजनाएं स्थापित कीं लेकिन मैं समझता हूं कि आज आप यह महसूस कर रहे होंगे कि बड़ी-बड़ी सिंचाई परियोजनाओं से ही देश के किसानों के खेतों की सिंचाई पूरी तरह से सम्भव नहीं है। उस समय भी आवश्यकता थी। उस समय रूस दुनिया का सबसे ताकतवर देश था। रूस उस रास्ते पर चलकर दुनिया का सबसे ताकतवर देश बना था। जिस प्लान इकॉनमी को रूस ने स्वीकार किया था, हमने सीधे रूस की वकालत करनी शुरु कर दी। हमने भारत की प्रकृति, स्वभाव को नहीं पहचाना। हम भारत में कैसे विकास करें,, यह नहीं देखा। मैं समझता हूं कि नकल करके अपनी अक्ल बढ़ाने का जो सिलसिला प्रारम्भ हुआ, यही कारण रहा कि हमारे देश की शक्ल बिगड़ती गई।

यह बात सच है कि केवल ४० परसैंट लैंड इस समय सिंचित है। ६० फीसदी भूमि पूरी तरह वर्षा पर आश्रित है। प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने जिम्मेदारी संभालने के बाद कहा कि छोटी-छोटी सिंचाई परियोजनाओं पर ध्यान देना चाहिए। हमने आन्ध्रा प्रदेश के मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एक टास्क फोर्स का गठन किया। उन्होंने अपनी रिपोर्ट भी प्रस्तुत कर दी है कि माइक्रो इरिगेशन यानी बूंद-बूंद पानी का देश में कैसे उपयोग होना चाहिए? हम इस सच्चाई को जानते हैं कि जल का स्तर कितना नीचे गिरता जा रहा है? जल के संकट को लेकर आज हर बुद्धिजीवी चिंतित है। हमने सिंचाई की दूसरी परियोजनाएं भी प्रारम्भ की हैं। जहां तक सिंचाई के लिए एलोकेशन का प्रश्न है, हमारी जो एक्सलरेटिड इरिगेशन स्कीमें हैं, उनके अतरिक्त इस समय हमारे पास आंकड़ा नहीं है लेकिन मैं कह सकता हूं कि इसके लिए पर्याप्त धनराशि एलोकेट की गई है।

आपने कहा कि कांग्रेस के जमाने में नए बीज, नई खाद ये सब पैदा हुए। सचमुच अगर इसका श्रेय किसी को जाता है तो भारत के कृषि वैज्ञानिकों को जाता है। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस की हुकूमत में नए बीज पैदा हुए। ऐसी बात नहीं है कि कांग्रेस की हुकूमत में ही खाद्यान्न का उत्पादन कैसे बढ़े, इसकी चिन्ता की गई। मैं कहना चाहूंगा कि कैमिकल फर्टिलाइजर का यूज आपने बढ़ाया है। कैमिकल पैस्टिसाइड्स का यूज अधिक हुआ जिस का खामियाजा आज हिन्दुस्तान और यहां के किसान भुगत रहे हैं। भले ही उत्पादन बढ़ गया है लेकिन कौन इस सच्चाई को नहीं जानता कि आज किसानों के खेत की उत्पादकता की शक्ति, उसकी प्रोडक्टिविटी कम हुई है। कौन नहीं जानता कि कैमिकल फर्टिलाइजर और कैमिकल पैस्टिसाइड्स के लगातार प्रयोग के कारण भू-जल का स्तर निरन्तर गिरता जा रहा है। कांग्रेस ने संभवत: उस समय बायो फर्टिलाइजर के बारे में चिन्ता नहीं की। हमारी सरकार ने पांच वर्षों में बायो फर्टिलाइजर, ऑर्गेनिक फार्मिंग इन सब चीजों की चिन्ता की। लगभग १८२ ऐसी बायो फर्टिलाइजर की यूनिट्स जिन की कैपेसिटी १८ हजार मीटि्रक टन बायो फर्टिलाइजर पैदा करने की है, वे हमने स्थापित की हैं।

दसवीं पंचवर्षीय योजना में हम बॉयो-फर्टिलाइजर के इस्तेमाल को बढ़ावा देना चाहते हैं। हम औरगैनिक फार्मिंग के लिये तरह-तरह के प्रोत्साहन देने का काम कर रहे हैं। अभी जैनेटिकली मोडिफाईड सीड्स की बात कही गई। इसके लिये हमें जितनी धनराशि चाहिये, उतनी धनराशि आई.सी.ए.आर. के लिये एलोकेट की है। इसलिये धन की कोई कमी नहीं है। जैनेटिकली मोडिफाइड सीड्स तैयार करने का काम चल रहा है। पहले कुछ इस प्रकार के बीज तैयार किये गये थे जिसके बारे में एक-दो शिकायतें आई थीं। वे बीज जितने ईको-फ्रेंडली और हैल्थ-फ्रैंडली होने चाहिये थे उतने नहीं थे। लेकिन हम जो जैनटिकली मोडिफाईड सीड्स तैयार कर रहे हैं, वे सभी ईको-फ्रैंडली और हैल्थ-फ्रेंडली हैं। इस बात पर ध्यान दिया जा रहा है।

अध्यक्ष महोदय, यह कहा गया कि यदि बैंकों का राष्ट्रीयकरण न किया गया होता तो किसानों को जितना कर्जा मिल रहा है, उतना नहीं मिल पाता। हम बैंकों के राष्ट्रीयकरण का विरोध नहीं कर रहे हैं। बैंकों का राष्ट्रीयकरण ठीक ही किया गया लेकिन उसके बाद किसानों को कितना कर्जा दिया गया, उसके बारे में मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूं कि उसे भी माननीय सदस्य देखने का प्रयास करें। एन.डी.ए. की सरकार और माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के प्रधानमंत्री पद पर आने के बाद सरकार ने किसानों के लिये ८० हजार करोड़ रुपये की धनराशि ऋण के रूप में दी है जिसे माननीय सदस्यो ने स्वीकार भी किया है…( व्यवधान)

श्री शिवराज वि.पाटील (लातूर) : यह अभी नहीं हुआ है। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद यह राशि २०० करोड़ रुपये थी और श्री वाजपेयी जी के प्रधान मंत्री बनने से पहले यह ७० हजार करोड़ रुपये थी जो बढ़कर ८० हजार करोड़ रुपये हुई है। इस प्रकार केवल १० हजार करोड़ रुपये ही बढ़े हैं।

श्री राजनाथ सिंह : नहीं, बिलकुल नही.।

श्री शिवराज वि.पाटील: यह केवल पांच साल में नहीं हुआ है।

श्री राजनाथ सिह : अध्यक्ष महोदय, माननीय सदस्य आंकड़े देख सकते हैं। मैं बहस नहीं करना चाहता हूं लेकिन वे इस बात को स्वीकार करेंगे कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में पिछले पांच वर्षों में किसानों को जितना ऋण दिया गया, उतना पहले कभी नहीं दिया गया था। क्या आप इस सच्चाई को नकार सकते हैं? बैंकों के राष्ट्रीयकरण होने के बाद हमारे देश के किसानों को बराबर १४ से १८ प्रतिशत तक ब्याज दर पर कर्जा मिलता रहा है। दूसरे सैक्टर में इससे कम रेट ऑफ इंटरेस्ट पर लोन मिलता रहा है। यह हमारे प्रधानमंत्री जी की देश के किसानों और गरीबों के प्रति संवेदनशीलता थी जिन्होंने यह फैसला किया कि आज देश के किसानों को ऋण पर ब्याज १४ से १८ प्रतिशत नहीं देना होगा बल्कि अधिकतम ब्याज की दर ९ प्रतिशत देनी होगी। लेकिन स्टेट बैंक और सैंट्रल बैंक ऐसे हैं जो ९ प्रतिशत ब्याज दर से भी कम पर ऋण दे रहे हैं। यह ब्याज दर और कम होनी चाहिये।

अध्यक्ष महोदय, नाबार्ड को हमने ५० हजार करोड़ रुपया दिया है ताकि इंनफ्रास्ट्रक्चर का डेवलेपमेंट हो सके। बंजर जमीन की उत्पादकता बढ़ाने के लिये अधिक से अधिक किसानों को कर्ज मुहैय्या करा सकें। यहां यह कहा गया कि जितना कर्जा किसानों को सरकार द्वारा दिया जा रहा है, उसका १८ प्रतिशत दे पा रहे हैं। हमने प्रायरिटी पर दिया है जिसे भाषणों में स्वीकार किया गया है। हम चाहते हैं कि किसानों और गरीबों के लिये कर्ज का प्रतिशत और बढ़ना चाहिये। आज इस लोक सभा का अंतिम दिन है और इस अंतिम दिन इतने महत्व का प्रश्न चर्चा के लिये यहां आया है, मैं माननीय सदस्यो को आश्वस्त करना चाहता हूं कि अगली बार हमारी सरकार बन रही है, आने के बाद निश्चित रूप से लैंडिंग का परंसटेज बढ़ायेंगे।

अध्यक्ष महोदय, यहां पर ए.पी.सी. मार्किटिंग के बारे में कहा गया कि कृषि मंत्रियो की कांफ्रेंस बुलानी चाहिये। मैंने एक माह पहले ही राज्य के कृषि मंत्रियों की एक कांफ्रेंस बुलायी थी जिसमें मैंने कहा था कि मार्किटिंग सिस्टम को मजबूत किया जा सकता है। हमने यह प्रस्ताव तैयार कर लिया था जिस पर चर्चा हुई है। सभी कृषि मंत्रियो ने उस पर सहमति जतायी है। हम किसानों के लिये मार्किटिंग कम्पीटीटिव बनाना चाहते हैं। हम यह भी चाहते हैं कि किसान मंडी में अपना उत्पाद बेचने के लिये मजबूर नहीं हैं बल्कि को-आपरेटिव सैक्टर में किसी मार्किट में बेचना चाहें तो जाकर बेच सकते हैं। यदि एन.जी.ओज. ने कोई मार्किटिंग इस्टेब्लिश की है तो वे वहां जाकर अपना माल बेच सकते हैं यह स्वाभाविक है कि हमारे किसानों को उसकी उपज का दाम उचित रूप से मिल सके। इसलिये हमने ए.पी.सी. के लिये एक मॉडल एक्ट तैयार करने का काम किया है।

श्री प्रियरंजन दासमुंशी: मंत्री जी, जूट के किसानों के लिए जूट खरीदने के सैन्टर्स की संख्या को आधा कर दिया गया है। आज जूट कारपोरेशन बंद करने के लिए सहमति हो रही है। इससे जूट के किसानों को बहुत चोट पहुंचेगी। क्या आपने कभी इसके बारे में सोचा है।

श्री राजनाथ सिंह : मैं आपकी बात समझ नहीं पाया।

श्री प्रियरंजन दासमुंशी (रायगंज) : जो जूट के किसान है, जो जूट पैदा करते हैं, उनके सामान बेचने के जो सैन्टर्स थे, उनकी संख्या को आधा कर दिया गया है, यानी पचास परसेन्ट कर दिया गया। आप ऐसे ही बोलेंगे तो बोलते रहिये, सदन के अंतिम दिन में जो मर्जी कहिये। लेकिन यह सच्चाई है कि उन्हें आधा कर दिया गया है और जो जूट कारपोरेशन बना हुआ था, उसे बंद करने पर सहमति हो रही है। उसके बारे में भी आप कुछ कहिये। पूर्वी भारत के सबसे बड़े जूट उद्योग से बहुत सारे किसान जुड़े हुए हैं।

श्री राजनाथ सिंह : जूट का उत्पादन, जूट का उद्योग भी प्रभावित नहीं होना चाहिए, उस पर कोई एडवर्स इफैक्ट नहीं होना चाहिए। लेकिन आपने आकस्मिक रूप से इस प्रश्न को सदन के सामने उठाया है, इसलिए मैं इसका सीधा उत्तर फिलहाल आपको नहीं दे सकता। लेकिन मैं निश्चित रूप से इसकी जानकारी आपको पत्र के माध्यम से दूंगा।

माननीय पाटिल जी ने बिजली के उत्पादन के संबंध में कहा है कि बिजली का उत्पादन बढ़ाया जाना चाहिए और आपने इसे स्वीकार किया है कि इस सरकार ने १८ हजार मेगावाट की जो नई बिजली परियोजना स्थापित की थी, उसने उत्पादन प्रारम्भ कर दिया है। यह आपने खुद ही स्वीकार किया और इसके अतरिक्त भी कई बिजली परियोजनाएं स्थापित की जा रही हैं।…( व्यवधान)

श्री शिवराज वि.पाटील: मंत्री जी, मैंने कहा कि नौवीं पंचवर्षीय योजना में जो टारगेट आपने रखा था, वह ४८००० मेगावाट का था लेकिन आपने नौवीं पंचवर्षीय योजना में सिर्फ १८ हजार मेगावाट बिजली पैदा की है।

श्री राजनाथ सिंह : जो कुछ भी हो, आपने यह स्वीकार किया है कि जो बिजली परियोजनाएं हमने स्थापित की थीं, उन बिजली परियोजनाओं ने बिजली का उत्पादन प्रारम्भ कर दिया तथा और भी बिजली परियोजनाएं हमारे यहां स्थापित की जा रही हैं। भविष्य में उनका भी उत्पादन प्रारम्भ होगा। मैं सचमुच आपके सुझाव की सराहना करना चाहूंगा, जो आपने कहा कि छोटे-छोटे तालाबों के रख-रखाव की व्यवस्था की जानी चाहिए। इन तालाबों के माध्यम से भी सिंचाई हो सकती है। आपने माइक्रो इरीगेशन की भी बात कही। आपके ये सारे सुझाव स्वागत योग्य हैं। मैं आपको यह भी जानकारी देना चाहूंगा, और मैं समझता हूं कि आपको इनकी जानकारी होगी कि किसानों को अपना उत्पादन अधिक बढ़ाने के लिए प्रमुख रूप से दो चीजों को आवश्यकता है - प्रथम धन की और दूसरी सूचना एवं ज्ञान की और मैं यह मानता हूं कि किसान की इनवैस्टमैन्ट की कैपेसिटी व्यक्तिगत रूप से बढ़नी चाहिए। किसान की व्यक्तिगत रूप से पूंजी निवेश की क्षमता बढ़नी चाहिए। इसीलिए पहली बार स्वतंत्र भारत के इतिहास में रेट ऑफ इंटरेस्ट लोअर डाउन करने का हमने काम किया है। यदि किसी किसान ने पचास हजार रुपये का कर्ज लिया है तो केवल रेट ऑफ इंटरेस्ट कम होने के कारण उसे ढाई से तीन हजार रुपये की बचत हो जायेगी। स्वाभाविक रूप से यह रेट ऑफ इंटरेस्ट कम करने से मैं नहीं कहता कि किसान की इनवैस्टमैन्ट कैपेसिटी पूरी बढ़ जायेगी, लेकिन किसी न किसी सीमा तक उसकी इनवैस्टमैन्ट कैपेसिटी अवश्य बढ़ जायेगी।

आज सारे किसान चाहते हैं कि वे आधुनिक खेती करें। जो नई तकनीक किसी क्षेत्र में विकसित हो रही है, वे चाहते हैं कि उसकी जानकारी उन्हें मिले। मौसम कैसा हो, हमें कैसे बीज बोने चाहिए, इन सब आवश्यक चीजों की सहज और सरल जानकारी उसे नहीं मिल पाती है। अभी ३१ जनवरी को माननीय प्रधान मंत्री जी ने किसानों को कृषि से संबंधित ज्ञान और सूचना को उपलब्ध कराने के लिए किसान कॉल सैन्टर्स का शुभारम्भ किया है। हिन्दुस्तान के किसी भी कोने से चाहे वह मेघालय, इम्फाल और मणिपुर हो, वहां बैठा हुआ किसान यदि कृषि से संबंधित कोई जानकारी प्राप्त करना चाहता है तो वह १५५१ डायल करके नि:शुल्क, टोल-फ्री जानकारी प्राप्त कर सकता है। देश में पहली बार यह व्यवस्था की गई है।…( व्यवधान)

SHRI N. JANARDHANA REDDY (NARASARAOPET): You had just now mentioned that previous Governments went for big projects like Bhakhra dam and other things which did not help the country. Therefore, the micro level planning was planned.

The Ganges should be linked up with the Cauvery and that is going to be the biggest ever project in the country.

श्री राजनाथ सिंह : रिवर लिंकेज का जहां तक प्रश्न है, आपने अच्छा प्रश्न यहां पर खड़ा किया है। यह बात सही है कि रिवर लिंकेज की परियोजना सरकार ने अपने हाथ में ली है। एक बहुत बड़ा संकट जो हमारे देश में पैदा होता था कि समय-समय पर थोड़ी सी भी अधिक वर्षा होने पर बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती थी, उस संकट से निजात पाने के लिए भी रिवर लिंकेज की योजना हमने प्रारंभ की है। साथ ही जो पानी बाढ़ का होगा, उसको हम सिंचाई के लिए उपयोग कर सकें, उसी उद्देश्य से हमने रिवर लिंकेज की परियोजना अपने हाथ में ली है।

पाटिल साहब ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया। मैं उनसे पूरी तरह सहमत हूँ कि खेती के सहारे कोई किसान कभी खुशहाल नहीं बन सकता, अमीर नहीं बन सकता। मैं मानता हूँ कि खेती के अतरिक्त रोज़गार का कोई दूसरा साधन यदि किसान के पास नहीं होगा तो किसान सचमुच अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करने में कठिनाई का अनुभव करता है। किसान को रेन्यूमरेटिव प्राइस उसकी उपज का मिलना चाहिए, इसकी भी कोशिश हमारी सरकार कर रही है और जैसे मैंने कहा कि मार्केटिंग सिस्टम को मज़बूत बनाने की दिशा में हमने क्या-क्या प्रभावी कदम उठाए हैं। मार्केट इंटरवैन्शन स्कीम आज भी हमारी चल रही है। मनिमम सपोर्ट प्राइस हमने प्राय: अधिकांश आइटम्स का बहुत अधिक बढ़ाया है। डाइवर्सफिकेशन ऑफ एग्रीकल्चर को ध्यान में रखते हुए प्रधान मंत्री जी ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि मैं चाहता हूँ कि आइल सीड्ज़, दालें और तिलहन, इन सब के मनिमम सपोर्ट प्राइसेज़ को हाई जम्प दिया जाए और इस देश के इतिहास में पहली बार किसी आइटम पर २०० से लेकर २७५ रुपये का मनिमम सपोर्ट प्राइस में हाई जम्प दिया है। बहुत सारी ऐसी आइटम्स हैं, जिनका उल्लेख मैं नहीं करना चाहता हूँ। शुगर इंडस्ट्रीज़ को स्ट्रैन्थैन करने के लिए भी उनको पैकेज दिया गया है। आगे भी सरकार, जैसे माननीय वित्त मंत्री जी ने घोषणा की है कि एक दूसरे पैकेज के संबंध में भी वह विचार कर रहे हैं। एग्रो-बेस्ड इंडस्ट्रीज़ को वे बढ़ावा देना चाहते हैं। अध्यक्ष महोदय, यहां चर्चा के दौरान एक सम्माननीय सदस्य द्वारा …( व्यवधान)

SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : For other problems, the hon. Minister need not reply and waste the time of the House. The kisan can dial that number and get the required information.

श्री राजनाथ सिंह : वह उससे केवल सूचना प्राप्त कर सकता है। श्री तोपदार द्वारा जो प्रस्ताव लाया गया है, उन्होंने कहा कि प्रति व्यक्ति खाद्यान्न की खपत कम हुई है। मेरे पास आंकड़े हैं। मैं उन आंकड़ों को देना चाहता हूँ कि सन् १९५०-५१ में जहां १५४.१ किलोग्राम पर कैपिटा पर ईयर कंजम्पशन फूडग्रेन्स का था, वह बढ़कर १७९.३ किलोग्राम पर कैपिटा पर ईयर हो गया है। इसलिए यह कहना कि प्रति व्यक्ति खाद्यान्न का उत्पादन घटा है, ठीक नहीं है।

अध्यक्ष महोदय : मंत्री जी, आप कितना समय और लेंगे?

श्री राजनाथ सिंह : दस मिनट में समाप्त करूँगा।

अध्यक्ष महोदय : जल्दी समाप्त करें।

श्री राजनाथ सिंह : अध्यक्ष जी, यहाँ पर डब्लू.टी.ओ. की चर्चा की गई और कहा गया कि भारत डब्लू.टी.ओ. का सदस्य बन गया और भारत ने डब्लू.टी.ओ. के सामने अपने घुटने टेक दिये। लेकिन मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि जब से एन.डी.ए. की सरकार आई है, चाहे वह सियाटैल में डब्लू.टी.ओ. की कॉनफ्रेन्स हुई हो या २००१ में दोहा में डब्लू.टी.ओ. की कॉनफ्रेन्स हुई हो, या २००३ में कैनकन में डब्लू.टी.ओ. की कॉनफ्रेन्स हुई हो, भारत को जितनी मज़बूती के साथ डब्लू.टी.ओ. के सामने अपने पक्ष को प्रस्तुत करना चाहिए था, भारत ने अपना पक्ष प्रस्तुत किया। हमने भारत के किसानों के हितों के साथ कोई समझौता नहीं किया। मैं बताना चाहता हूँ कि किसी चीज़ की सब्सिडी हो, डब्लू.टी.ओ. के दबाव में आकर जो किसानों के लिए कल्याणकारी और हितकारी है उसमें कहीं कोई कमी नहीं की है, यह मैं विश्वास दिलाना चाहता हूँ।

अध्यक्ष महोदय, सरकार की तरफ से बराबर यह प्रयास किया जा रहा है कि सारी दुनिया के विकसित देशों द्वारा जो डोमैस्टिक सपोर्ट और जो एक्सपोर्ट सब्सिडी दी जाती है, हमारा बराबर आग्रह है कि इसमें सबस्टैन्शियल रिडक्शन होना चाहिए।

महोदय, जितनी एक्सपोर्ट सबसिडी उनके द्वारा दी जा रही है, उन्हीं आइटम्स पर सबसिडी दी जानी चाहिए जिन आइटम्स पर डैवलपिंग कंट्रीज में दी जाती है। यदि इसके अतरिक्त दूसरे आइटमों पर सबसिडी दी जाती है, तो उसे पूरी तरह से समाप्त करना चाहिए। भारत की तरफ से यह दबाव बराबर बनाया गया। एक तर्क यह दिया गया कि डब्ल्यू.टी.ओ. की शर्तों के दबाव में हमने इम्पोर्ट ज्यादा करना शुरू कर दिया है, लेकिन ऐसा नहीं है। मैं इम्पोर्ट के कुछ आंक़ड़े देना चाहूंगा, जिनसे स्पष्ट होगा कि हमारा इम्पोर्ट का हिस्सा बराबर कम हो रहा है। वर्ष १९९९-२००० में यह शेयर ७.४५ प्रतिशत था, वह घटकर वर्ष २००२-२००३ में ५.७७ प्रतिशत रह गया। यानी डब्ल्यू.टी.ओ. के सामने इस सरकार ने घुटने नहीं टेके। दूसरी ओर हमारा जो एक्सपोर्ट है वह भी बढ़ रहा है। वर्ष १९९०-९१ में जहां १,२०५ करोड रुपए का एक्सपोर्ट था वह बढकर अब १७,१०० करोड़ रुपए हो गया है। यानी यह कहना कि डब्ल्यू.टी.ओ. के सामने हमने घुटने टेके हैं, यह कदापि उचित नहीं होगा।

महोदय, हमारे आदरणीय श्री शिवराज वी. पाटिल जी ने यह भी कहा कि हमें मिलजुल कर काम करना चाहिए। यह बात सही है कि हमें मिलजुल कर काम करना चाहिए। २१ दलों की सरकार चलाकर हमने दिखा दिया है कि कैसे मिलजुल कर काम किया जाता है। मैं समझता हूं कि जहां तक इस देश के विकास का प्रश्न है, वहां हमने, हमारी सरकार ने और हमारे प्रधान मंत्री जी ने मिलजुल कर विकास करने का अभ्यास किया है। इसलिए जो बातें आपने कहीं और जो महत्वपूर्ण सुझाव आपने दिए हैं, चूंकि अगली सरकार भी अपनी ही निश्चितरूप से आ रही है इसलिए इन सारे सुझावों पर हम पूरी तरह से अमल करने की कोशिश करेंगे।

महोदय, श्री मणि शंकर अय्यर जी ने एम्पलायमेंट से संबंधित सारे प्रश्न उठाए हैं, लेकिन एग्रीकल्चर से रिलेटेड एक महत्वपूर्ण बात उन्होंने कही है कि इनवैस्टमेंट स्टार्वेशन इन एग्रीकल्चर हुआ है। यह बात सही है कि जितना इनवैस्टमेंट होना चाहिए उतना इनवैस्टमेंट नहीं हो पा हा है, लेकिन पांच वर्षों के अंदर कोई सरकार आकर एकाएक एग्रीकल्चर में कई गुना वृद्धि कर दे, यह किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है, लेकिन मैं इतनी बात विश्वास के साथ कह सकता हूं कि हमारे शासनकाल में पब्लिक इनवैस्टमेंट इन एग्रीकल्चर बढ़ा है और फार्मर्स का इंडीविजुअल इनवैस्टमेंट भी हमारे शासनकाल में बढ़ा है। श्री मणि शंकर अय्यर जी ने कहा कि आपका अंतिम भाषण है। …( व्यवधान)

श्री मणि शंकर अय्यर : महोदय, मैंने यह कहा था कि मेरा इस तरफ से अंतिम भाषण है और अगला भाषण उस तरफ से होगा।

श्री राजनाथ सिंह : मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि हम भी अटल रहें और आप भी अटल रहें। अध्यक्ष महोदय, इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

   

श्रम मंत्री (डॉ. साहिब सिंह वर्मा) : अध्यक्ष जी, समय का अभाव है। माननीय राजनाथ सिंह जी ने बहुत सी बातों का उत्तर दे दिया है। मैं आर्गेनाइज्ड और अनआर्गेनाइज्ड सैक्टर में जो हमारे वर्कर्स की स्थिति है, उसके बारे में थोड़ी सी जानकारी देना चाहता हूं। अपने इस पांच वर्षों के कार्यकाल में जो सबसे बड़ी चिन्ता इस सरकार, मेरी और प्रधान मंत्री जी की रही, वह यही रही कि किस प्रकार से हम देश के कानून में सुधार करें, किस प्रकार से असंगठित क्षेत्र में जो लोग काम करते हैं, उनकी दशा में सुधार करें, किस तरह से जो वर्कर्स काम कर रहे हैं, उनकी स्थिति में सुधार करें। अनेकों द्ृष्टियों से जहां-जहां भी कहीं पर किसी बात की आवश्यकता पड़ी, वह हमने किया। हमने देखा कि बन्दी और छंटनी पहले जितनी होती थी, अब उसमें कमी आई है। हमारी सरकार आने से पहले ढाई लाख उद्योग बन्द हुए हैं। बन्द होते उद्योगों को हमने बन्द होने से रोकने का प्रयास किया है। जहां छंटनी की बात आती थी, जहां वी.आर.एस. दिया गया था, लेकिन उसमें बहुत कठिनाई आ रही थी। इसलिए हमने उसमें इतना सुधार किया कि अब यह स्थिति हो गई है कि हम लोगों से कहते हैं कि काम करो, लोग कहते हैं कि हमें वी.आर.एस. चाहिए। आज इसमें बहुत सुधार हुआ है। इतना सुधार हुआ है कि जहां भी इनवैस्टमेंट की बात आई, उसमें वर्कर्स के इंटरैस्ट की बात आई है, हमने हमेशा अपने वर्कर्स का ध्यान रखा और इनवैस्टमेंट की। हमने सारी बातों का ध्यान रखा। हमने त्रिपक्षीय वार्ता-परामर्श कर के सब काम किए। पहले एक दिन की इंडियन लेबर कान्फ्रेंस होती थी, उसे हमने बढ़ाकर दो दिन किया ताकि विस्तार से जर्चा हो सके। जब श्रमिकों ने मांग की कि दो दिन नहीं, तीन दिन होनी चाहिए, हमने उसे बढ़ाकर तीन दिन किया ताकि सभी मामलों पर विस्तार से चर्चा हो सके।

ईएसआई के अंदर हमारे होस्पिटल्स की स्थिति अच्छी नहीं थी। हमने पांच सालों में १६ नये मॉडल होस्पिटल खोल कर उसमें अनेकों सुविधाएं बढ़ाईं और उस पर ३०० करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किया। राज्य सरकारों को पैसे की कमी रहती थी, वे कहते थे कि हमें और पैसा दीजिए, हम इन्हें सुधारना चाहते हैं। हम ६०० रुपए पर-इंश्योर्ड परसन देते थे, जिसे हमने ७५० रुपए किया। हमने मॉडल होस्पिटल्स पर अलग से खर्चा किया। हम श्रमिकों के जो क्लेम्स देते थे, उसे तत्काल उन्हें देने की व्यवस्था की। हमारे एम्प्लाइज़ प्रोविडेंट फंड में, यानी लो इंटरस्ट रेट रिज़ीम के अंदर भी हमने पिछले कई वर्षों से लगातार साढ़े नौ प्रतिशत ब्याज पर हम अपने एम्प्लाइज़ को प्रोविडेंट फंड पर दे रहे थे और इस साल भी दे रहे हैं। यह कोई छोटी बात नहीं है। यही नहीं, पहले छ:- सात-आठ महीने तक भी उन्हें क्लेम नहीं मिलते थे, हमने बिज़नेस प्रोसेस री-इंजीनियरिंग करके उनके क्लेम ३० दिन में सेटल करने का काम किया। जब हमारा यह काम पूरा हो जाएगा तो २४ घंटे में उन्हें अपने क्लेम मिल जाएंगे। वे टेलीफोन पर भी उसके बारे में पता कर सकेंगे। इसके अतरिक्त हमारे जो तीन करोड़ ९४ लाख एम्प्लायमेंट की बात हो रही थी, महोदय, मैं एक जानकारी माननीय सदस्यों को देना चाहूंगा कि सन् २००१-०२ में एम्प्लाइज़ प्रोविडेंट के हमारे मेम्बर दो करोड़ ७४ लाख थे, ये २००२-०३ में तीन करोड़ ९४ लाख हो गए, यानी एक करोड़ २० लाख की सदस्यता एक वर्ष में बढ़ी है। कहीं एम्प्लायमेंट जेनरेट हुआ होगा तभी तो बढ़ी है। उसका सर्वे चार साल में एक बार होता है। उसके बाद जो लेटेस्ट सर्वे की रिपोर्ट आएगी तो सब को पता चलेगा कि कितनी एम्प्लायमेंट जेनरेट हुई है। जब ग्रोथ रेट आठ प्रतिशत हो सकता है तो ग्रोथ रेट आसमान या हवा में नहीं होता। लोग काम करते हैं तभी तो ग्रोथ रेट इतना बढ़ता है, उसके साथ-साथ एम्प्लायमेंट भी जेनरेट हुई है। ये सारी चीजें हुई हैं। हम अपने श्रमिकों को जो ट्रेनिंग देथे थे, उनके ट्रेनिंग की संख्या हमने बढ़ाई है। उनके बच्चों की शिक्षा के लिए हमने पैसा बढ़ाया है। मेंडेट्री मेटरनिटी के लिए हम ५०० रुपए देते थे, उसे हमने बढ़ाया है। हम जो मकान बीड़ी वर्कर्स के लिए बनाते थे, हमने एक ही वर्ष में २०,००० मकान बनाए हैं। हमने एक ही जगह पर १०,००० मकान बनाए हैं, हर तरह की सुविधा वर्कर्स को देने का प्रयास किया है - चाहे आर्गनाइज़ सैक्टर में वर्कर्स काम करते हों या अनआर्गनाइज्ड सैक्टर में करते हों। मैं एक सबसे बड़ी बात असंगठित क्षेत्र के बारे में कहना चाहता हूं।…( व्यवधान)

SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN (CHIRAYINKIL): Now, there is a strong feeling and there is a confusion amongst the working class that their right to collective bargaining is being curtailed. That is number one. Secondly, their right to strike work is also being curtailed by the recent judgement of the Supreme Court. You have not made your position clear till date. Are you going to face the workers in elections in this background?

MR. SPEAKER: The hon. Minister is replying. Please sit down.

… (Interruptions)

SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN : It is a barbarous decision. … (Interruptions)

SHRI RAMDAS ATHAWALE (PANDHARPUR): Sir, there is no good feeling.

SHRI VARKALA RADHAKRISHNAN : Please explain your position. … (Interruptions)

डॉ. साहिब सिंह वर्मा : माननीय अध्यक्ष जी, मैं माननीय सदस्यों की जानकारी के लिए यह भी बताना चाहता हूं कि हड़ताल करने का अधिकार है। इंडस्टि्रयल डिस्प्यूट एक्ट के अंतर्गत जो भी कर्मचारी आते हैं, उन्हें आज भी हड़ताल करने का पूरा अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से किसी तरह से प्रभावित नहीं होते हैं। आज भी उन्हें हड़ताल करने का पूरा अधिकार है, मैं आपकी जानकारी के लिए बताना चाहता हूं।…( व्यवधान) There is no confusion. They still have the right to go on strike. … (Interruptions) The Supreme Court has not said anything about the Industrial Disputes Act. Those who are covered under the Industrial Disputes Act have the right to go on strike. They can go on strike. There is nothing against them in the Supreme Court decision.

अध्यक्ष महोदय, मैं यह भी बताना चाहता हूं कि किस तरह से हमारे यहां इनवेस्टमेंट बढ़ा, इस बात की हमने बहुत चिन्ता की। एसईजैड में जिस राज्य ने भी हमें कहा कि हमें इसमें कुछ परमीशन चाहिए, कुछ रियायतें चाहिए, तो हमने रियायतें दी हैं ताकि देश के करोड़ों नौजवान अंडर एम्प्लायमेंट या अनएम्प्लायमेंट जो हैं, उन्हें अच्छा रोजगार मिल सके। हमने उन्हें ट्रेनिंग भी दी है और रियायतें भी दी हैं, जो नये-नये उद्योग हमारे सामने स्थापित होते जा रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जो देश के ऊपर, विदेश के लोग जिसकी बहुत चर्चा करते थे, वह बालश्रम की बात थी। बाल श्रमिक इस देश में बहुत पहले बढ़े थे, उनकी संख्या हर साल घटती जा रही है। प्रधानमंत्री जी ने दसवीं पंचवर्षीय योजना में २४९ करोड़ से बढ़ा कर ६०२ करोड़ रुपए किए हैं और उसमें हम जो सौ डिस्टि्रक्ट में काम करते थे, अब २५० डिस्टि्रक्ट में काम करेंगे।

इसी तरह से हमारा संकल्प है और माननीय प्रधानमंत्री जी का यह आदेश है कि २००७ तक इस देश से बाल श्रम पूरी तरह खत्म हो जाना चाहिए। उसके लिए हमारी योजनाएं चल रही हैं और मैं सदन को विश्वास दिलाता हूं कि २००७ के बाद इस देश में कोई भी बाल श्रम नहीं होगा। हम सब को शिक्षा दे रहे हैं, हमारे हजारों विद्यालय चल रहे हैं, एन.जी.ओज. को हमने अपने साथ जोड़ा है।

डॉ. सरोजा ने एक बात बिल्कुल सही कही कि अगर हमें समाज की रचना का काम करनी है, श्रमिकों की मदद करनी है, अनएम्पलायड लोगों को सैल्फ हैल्प ग्रुप के माध्यम से काम देना है, सारी स्वयंसेवी संस्थाएं और हम लोग भी इस तरह के लोगों को आर्गेनाइज करके उन लोगों को काम दे सकते हैं।

जो सबसे महत्वपूर्ण इस सरकार ने अभी काम किया है, वह असंगठित क्षेत्र के लोगों के बारे में है, जिनकी संख्या लगभग ३७ करोड़ है। उन लोगों को सोशल सिक्योरिटी देने का काम किया गया है। पहले उनके लिए कोई सोशल सिक्योरिटी नहीं थी। देश की आजादी को ५६.५ साल हो गये, मुझे ताज्जुब है कि एक बार भी यह प्रयास क्यों नहीं हुआ कि इस देश के अन्दर इस सदन के माध्मय से या सरकार के माध्यम से कोई इस प्रकार की योजना चले। पहली बार माननीय प्रधानमंत्री जी के आदेश से हमने असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा देने का फैसला किया है। हम ५० डिस्टि्रक्ट्स में इसी साल से यह काम शुरू कर चुके हैं, कुछ लोगों को इसका सदस्य बना चुके हैं। अब जो भी असंगठित क्षेत्र में मजदूर काम करते हैं, उनको ५०० रुपये कम से कम महीने की पेंशन, उनको एक साल में ३० हजार रुपये तक का मेडीकल हॉस्पीटलाइजेशन का खर्चा, इन केस ऑफ डैथ बाई एक्सीडेंट सवा लाख रुपये का बीमा और उसके बाद फैमिली पेंशन, यह काम पहली बार हुआ है। हमने असंगठित क्षेत्र के लिए न केवल सामाजिक सुरक्षा की इस तरह से बात की है, बल्कि रोटी, कपड़ा और मकान, ये तीन महत्वपूर्ण बातें होती हैं। एक तो उनकी रोजी-रोटी की बात है, रोजी वे रेहड़ी पटरी लगाकर, खोमचा लगाकर स्वयं कमाते थे।

माननीय प्रधानमंत्री जी ने, अपनी सरकार ने उनके लिए भी एक फैसला किया है कि देश में इन गरीबों को जोड़ा इस योजना में जाये, जो अपनी रोजी कमाने का काम खुद करते हैं, जो खोमचा लगाते हैं, हाकर्स के रूप में काम करते हैं। इस तरह से उनको भी सम्मान और इज्जत के साथ बैठने का अधिकार हो। इस प्रकार का एक प्रस्ताव पास करके हमने सब राज्य सरकारों को इसके लिए कहा है कि उनके लिए वे काम करें। उनके लिए न केवल सामाजिक सुरक्षा की बात है, जैसा मैंने कहा कि मकान की भी बात है। ज्यादातर असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोग अभी अनोथराइज्ड कालोनीज में रहते हैं। उनके सिर पर तलवार लटकी हुई थी, अकेले दिल्ली में ३५ लाख लोग रहते हैं, उनके लिए भी केबिनेट ने यह फैसला किया है कि उनके मकान गिराये न जायें, उनको सुविधा दी जाये लेकिन आगे अनौथराइज्ड मकान बनने न दिये जायें। उनको मकान बनाने के लिए सुविधा दी जाये और ज्यादातर असंगठित क्षेत्र के मजदूर जहां काम करते हैं, जहां वे रहते हैं, उनकी सुरक्षा की योजना भी इस सरकार ने बनाई है।…( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह (महाराजगंज, उ.प्र.) : ये गलतबयानी कर रहे हैं। दिल्ली के अन्दर यह हुआ है। ये कितनी गलतबयानी करने का काम कर रहे हैं।…( व्यवधान)

डॉ. साहिब सिंह वर्मा : मनिमम वेजेज ३५ रुपये नेशनल फ्लोर लेवल पर था, जब यह सरकार आई थी तो मनिमम वेजेज ३५ रुपये नेशनल फ्लोर लेवल था। पांच साल के अन्दर-अन्दर इसे ३५ रुपये से बढ़ा दिया है। बीच-बीच में हम बढ़ाते गये हैं, अब हमने इसे ६६ रुपये कर दिया है, यानी मनिमम वेजेज करीब डबल कर दिया है, जो पहले ३५ रुपये था। जब हम सरकार में आये, तब से आज तक वह मनिमम वेजेज ६६ रुपये हो गया है।

इस प्रकार से खास तौर से जो गरीब लोग हैं, खास तौर से जो वीकर सैक्शन के लोग हैं, इस सरकार ने श्रमिकों की बहुत चिन्ता की है, उनके लिए बहुत काम किया है। हमने सब राज्यों से कहा था कि आप अपने राज्य के अन्दर अपने एग्रीकल्चर वर्कर्स के लिए कानून बनायें। दुर्भाग्य से एक राज्य कानून बना पाया। केरल में, अभी एक ही राज्य में पूरे देश में कानून चल रहा है, लेकिन अब उन सभी एग्रीकल्चर वर्कर्स को हमने अनआर्गेनाइज्ड सैक्टर के अन्दर शामिल कर लिया है। सारे के सारे एग्रीकल्चर क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों को अब हमने असंगठित क्षेत्र में शामिल कर लिया है, खेत वर्कर्स को भी शामिल कर लिया है, हमने मोची, धोबी, तेली जैसे जितने गरीब लोग हैं, सब लोगों को शामिल कर लिया है। १२२ कैटेगरीज ऐसी हैं, जिन लोगों की किसी ने सुध नहीं ली थी, जिन लोगों की कभी चिन्ता नहीं की थी, हमने उन लोगों को इसमें शामिल किया है। उन लोगों को सामाजिक सुरक्षा दी है। ये बातें हुई हैं।

ये राइट टू वर्क की बात करते हैं कि राइट टू वर्क मिलना चाहिए। मैं कहता हूं कि राइट टू वर्क और राइट टू डयूटी होना चाहिए। शिवराज जी ने ठीक कहा था कि जापान के अन्दर जिस प्रकार का माडल है - राइट टू वर्क और राइट टू डयूटी - उसी प्रकार की व्यवस्था यहां भी हो सकती है। उसके लिए यह सरकार प्रयास करेगी। जब हम दोबारा सरकार में आयेंगे तो राइट टू वर्क और राइट टू डयूटी पर भी हम विचार करेंगे। यह जरूरी है कि जहां कोई राइट टू वर्क मांगता है, राइट टू डयूटी भी उसे मिलनी चाहिए।

यहां से जो लोग बाहर जाते हैं, जो इस देश से दूसरे देश में काम करते हैं, हमने उन प्रवासियों की भी चिन्ता की है। पहले उनको बहुत दिक्कतें होती थीं। हमने प्रवासियों के लिए भी २५ दिसम्बर से एक बीमा योजना शुरू की है। अगर किसी प्रवासी को कोई दिक्कत होती है, उसे एम्पलायमेंट ठीक नहीं मिलता है, तो वे वापस यहां आ सकते हैं, उसका खर्चा हम देंगे। अगर वे बीमार होते हैं तो किसी आदमी के साथ वापिस आ सकते हैं। उसका खर्चा बीमा कंपनी की तरफ से मिलेगा। अऩेकों सुविधाएं हमने उन लोगों को दी हैं। श्रमिक, जो संगठित क्षेत्र में काम करते हैं, उनके रोजगार को बचाने के लिए, उनको सुरक्षा देने के लिए और असंगठित क्षेत्र में जो श्रमिक काम करते हैं जिनको आज तक सुरक्षा नहीं मिली थी, उनको सुरक्षा देने का काम पहली बार इस सरकार ने किया है।

मैं समझता हूं कि जिस रफ्तार से यह सरकार काम कर रही है …( व्यवधान)हमने अभी ५० डिस्टि्रक्ट्स में संगठित क्षेत्र के श्रमिकों के हित में काम किया है। …( व्यवधान)

SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI (RAIGANJ): Mr. Speaker, Sir, I am sorry, this is not correct. In the State of West Bengal alone, 50,000 people have lost their jobs. Many public sector units have been closed in West Bengal. … (Interruptions)

डॉ. साहिब सिंह वर्मा: अब यह संकल्प है।…( व्यवधान)हम दो वर्ष तक इसका एक्सपीरियेंस करेंगे। …( व्यवधान)उसके अगले वर्ष देश के ३७ करोड़ श्रमिक, जो असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, उन तमाम ३७ करोड़ लोगों को, जब यह सरकार दुबारा आयेगी, हम सामाजिक सुरक्षा देंगे और गरीबों की इस तरह से मदद करेंगे। …( व्यवधान)माननीय दीन दयाल उपाध्याय जी ने एक सपना अन्त्योदय का देखा था। …( व्यवधान)पिछली पंक्ति में, जो व्यक्ति सबसे पीछे बैठा है, उसको बराबर बैठाने का काम अगर किसी ने किया है, माननीय दीन दयाल उपाध्याय के उस सपने को साकार करने का काम इस एनडीए की सरकार ने किया है। सारे देश के श्रमिक इस बात से बेहद प्रसन्न हैं, देश की सरकार से प्रसन्न हैं, देश के काम से प्रसन्न हैं। वे माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी को दुबारा इस देश का प्रधान मंत्री बनाकर जो उनके सपने बच गये हैं, उनको साकार करेंगे।

________