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State Consumer Disputes Redressal Commission

Chatra Pal vs Dr Vinod Bhardwaj on 18 September, 2017

  	 Cause Title/Judgement-Entry 	    	       STATE CONSUMER DISPUTES REDRESSAL COMMISSION, UP  C-1 Vikrant Khand 1 (Near Shaheed Path), Gomti Nagar Lucknow-226010             First Appeal No. A/2011/415  (Arisen out of Order Dated  in Case No.  of District State Commission)             1. Chatra Pal   a ...........Appellant(s)   Versus      1. Dr Vinod Bhardwaj   a ...........Respondent(s)       	    BEFORE:      HON'BLE MR. Ram Charan Chaudhary PRESIDING MEMBER    HON'BLE MR. Gobardhan Yadav MEMBER          For the Appellant:  For the Respondent:    Dated : 18 Sep 2017    	     Final Order / Judgement    

राज्‍य उपभोक्‍ता विवाद प्रतितोष आयोग, उ0प्र0, लखनऊ।

(सुरक्षित)                                                                                   अपील संख्‍या :415/2011 (जिला उपभोक्‍ता फोरम, गाजियाबाद द्धारा परिवाद सं0-387/2009 में पारित निर्णय/आदेश दिनांक 19.01.2011 के विरूद्ध) Chatra Pal, S/o Ram Swaroop, R/o Village Katiya Pargna Bhumma Sambha Leda Post Ofifcer Khas, Tehsil Jansath District Muzaffar Nagar.

                                                            ........... Appellant/ Complainant Versus    Doctor Vinod Bhardwaj, S/o not Known to the appellant having its Clinic opposite Ex Rajkiya Mahila Hospital Hasstinapur Road District Meerut.

............ Respondent/ Opp. Party  समक्ष :- 

मा0 श्री रामचरन चौधरी, पीठासीन सदस्‍य मा0 श्री गोवर्द्धन यादव, सदस्‍य अपीलार्थी के अधिवक्‍ता    :   श्री टी0एच0 नकवी प्रत्‍यर्थी के अधिवक्‍ता     :   श्री आर0के0 मिश्रा दिनांक : 03/11/2018 मा0 श्री रामचरन चौधरी, पीठासीन सदस्‍य द्वारा उदघोषित निर्णय    मौजूदा अपील जिला उपभोक्‍ता फोरम, गाजियाबाद द्धारा परिवाद सं0-387/2009 में पारित निर्णय/आदेश दिनांक 19.01.2011 के विरूद्ध योजित की गई है, उक्‍त निर्णय के द्वारा परिवादी का परिवाद खारिज किया गया है।
संक्षेप में केस के तथ्‍य इस प्रकार है कि परिवादी की पुत्री कु0 अनुराधा उम्र-20 साल को दिनांक 26.02.2006 को रात सांस लेने में तकलीफ होने के कारण उसे अपने गॉव के डॉक्‍टर निर्भय सिंह को दिखाया और उक्‍त डॉक्‍टर द्वारा उसके इलाज में असमर्थता व्‍यक्‍त किए जाने पर उसे प्रतिवादी डॉक्‍टर के नर्सिंग होम भारद्वाज क्‍लीनिक -2- पर उपचार के लिए पुत्री को भर्ती कराया गया एवं प्रतिवादी डॉक्‍टर ने 200.00 रू0 इमर्जन्‍सी फीस के रूप में लिए और इलाज शुरू कर दिया। सुबह 5.00 बजे तक प्रतिवादी ने परिवादी से इलाज के लिए 6500.00 रू0  और लिए तथा लगभग 5.25 बजे रूपये लेने के बाद प्रतिवादी डॉक्‍टर अपने घर आराम करने चले गये और उसने आश्‍वासन दिया कि परिवादी की पुत्री अब ठीक है। प्रतिवादी डॉक्‍टर के जाने के बाद ही पुन: परिवादी की पुत्री को सांस लेने में परेशानी होने लगी और वहॉ पर मौजूद कम्‍पाउन्‍डर ने डॉक्‍टर को बुलाने के लिए टेलीफोन किया, लेकिन प्रतिवादी डॉक्‍टर नहीं आये, प्रतिवादी डॉक्‍टर सुबह 7.30 बजे नर्सिंग होम में आये तब तक परिवादी की पुत्री की तबियत बहुत खराब हो चुकी थी एवं प्रतिवादी डॉक्‍टर ने जॉच करके बताया कि लडकी की मृत्‍यु हो चुकी है। लडकी की मृत्‍यु प्रतिवादी डॉक्‍टर की लापरवाही और समय से उचित इलाज न करने के कारण हुई एवं लडकी की गम्‍भीर हालत होने के बावजूद प्रतिवादी डॉक्‍टर बार बार बुलाने पर देखने नहीं आये, अत: परिवादी द्वारा अपनी पुत्री की मृत्‍यु के फलस्‍वरूप उसके इलाज में हुई लापरवाही के कारण उसकी क्षतिपूर्ति हेतु रू0 3,26,700.00 का अनुतोष दिलाये जाने हेतु जिला उपभोक्‍ता फोरम के समक्ष परिवाद प्रस्‍तुत किया गया है।
जिला उपभोक्‍ता फोरम के समक्ष प्रतिवादी की ओर से अपना प्रतिवाद पत्र प्रस्‍तुत कर यह कथन किया गया है कि दिनांक 26.02.2006 को सुबह चार बजे परिवादी अपनी पुत्री को लेकर आया था, उस समय उसकी हालात काफी गम्‍भीर और मरणासन अवस्‍था में थी। मरीज की हालत को देखते हुए प्रतिवादी ने उसे तुरन्‍त मेरठ ले जाने की सलाह दी, लेकिन परिवादी ने प्रतिवादी से कहा कि उसके पास पैसा नहीं है। मरीज की हालत को देखते हुए प्रतिवादी ने परिवादी की पुत्री का इलाज शुरू कर दिया और तुरन्‍त आक्‍सीजन लगाया और इसी बीच परिवादी अपनी पत्‍नी को वहॉ छोडकर पैसे का इंतजाम करने -3- अपने गॉव चला गया। प्रतिवादी ने परिवादी से कोई इमर्जन्‍सी फीस नहीं लिया एवं परिवादी की पुत्री की सांस लेने में परेशानी थी, इसलिए डॉक्‍टर ने उसे आक्‍सीजन लगाया और उचित चिकित्‍सा दी। डॉक्‍टर पर लगाये गये सभी आरोप बिल्‍कुल गलत है। परिवादी की पुत्री के मरने तक अर्थात 7.30 बजे तक प्रतिवादी डॉक्‍टर तत्‍पर्ता से इलाज करता रहा, लेकिन उचित इलाज करने के बावजूद उसकी मृत्‍यु हो गई, जिसका प्रमाण पत्र प्रतिवादी डॉक्‍टर ने जारी किया एवं यह भी कहा गया है कि परिवादी ने इस मामले में पुलिस में भी शिकायत की थी एवं मुख्‍य चिकित्‍साधिकारी ने भी जॉच की थी और मुख्‍य चिकित्‍साधिकारी ने यह पाया था कि परिवादी की पुत्री के इलाज में कोई लापरवाही नहीं की गई थी।
इस सम्‍बन्‍ध में जिला उपभोक्‍ता फोरम के प्रश्‍नगत निर्णय/आदेश दिनांकित 19.01.2011 तथा आधार अपील का अवलोकन किया गया एवं अपीलार्थी की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री टी0एच0 नक्‍वी तथा प्रत्‍यर्थी की ओर से विद्वान अधिवक्‍ता श्री आर0के0 मिश्रा की बहस सुनी तथा पत्रावली पर उपलब्‍ध अभिलेखों एवं लिखित बहस का भी अवलोकन किया गया है।
आधार अपील में यह कथन किया गया है कि जिला उपभोक्‍ता फोरम ने परिवादी का परिवाद खारिज करके गलती की है एवं अपीलार्थी की ओर से प्रतिवाद पत्र के कथनों से इंकार किया गया है और प्रत्‍यर्थी ने फीस लेकर इलाज किया था और रफ़ तरीके से परिवादी की पुत्री को देखा गया और इलाज के अभाव में उसकी मृत्‍यु हो गई और यह कहा गया है कि रात में डॉक्‍टर मरीज को देखने के लिए उपस्थित नहीं हुए और न ही उसकी सही देखभाल की गई है।
इस सम्‍बन्‍ध में प्रत्‍यर्थी की और से प्रतिवाद पत्र के पैरा-6 की ओर पीठ का ध्‍यान दिलाया गया और यह कथन किया गया है कि प्रतिवादी ने जिस समय से परिवादी की पुत्री का इलाज शुरू किया है, -4- उस समय से लेकर उसकी मृत्‍यु तक सम्‍पूर्ण समय परिवादी की पुत्री को निर्धारित चिकित्‍सा के अनुसार उपचार करते रहे और अपने क्‍लीनिक पर ही उपलब्‍ध रहे और प्रतिवाद पत्र के पैरा सं0-3 में यह कहा गया है कि परिवादी का मरीज दिनांक 26.02.2006 को सुबह 4.00 बजे प्रतिवादी के क्‍लीनिक जो कि हस्तिनापुर रोड मवाना जिला मेरठ पर स्थित है, काफी गम्‍भीर हालत में लगभग मरणासन्‍न की अवस्‍था में लेकर थे और प्रतिवादी के कम्‍पाउण्‍डर ने प्रतिवादी के घर पर टेलीफोन पर सूचना दी जिस पर प्रतिवादी अपने आवास से तुरन्‍त क्‍लीनिक आया और प्रतिवादी ने मरीज की स्थिति को देखते हुए परिवादी को मरीज को तुरन्‍त मेरठ ले जाने की सलाह दी, लेकिन परिवादी प्रतिवादी से बिनती करने लगा तथा कहने लगा कि रात्री के समय पैसे का इन्‍तजाम नहीं है और मरीज की स्थिति को देखते हुए प्रतिवादी ने परिवादी की बिनती पर उसका इलाज करना शुरू कर दिया और उसे तुरन्‍त आक्‍सीजन लगाया गया तथा बराबर के मेडिकल से सिरिज इत्‍यादि लिया और जब परिवादी की पुत्री का इलाज शुरू हो गया तो परिवादी अपनी पत्‍नी को वहॉ छोड़कर पैसे का इंतजाम करने अपने गॉव चला गया तथा प्रतिवादी के गॉव के डॉक्‍टर निर्भय सिंह द्वारा जो इलाज किया गया था, उसके पर्चें भी मॉगे थे, जिनको देने में परिवादी और डॉ0 निर्भय सिंह ने असमर्थता जाहिर की और न ही किसी दवाई का नाम ही बताया और न ही पहले किए गए इलाज के सम्‍बन्‍ध में कोई बात भी प्रतिवादी को बतायी एवं प्रतिवादी को परिवादी ने कोई धनराशि अदा नहीं की थी। यह तथ्‍य असत्‍य है कि परिवादी के पुत्र के पास केवल 200.00 रू0 थे जो प्रतिवादी को बराबर के स्‍टोर से दवाऍ आदि के लिए दिए गए थे तथा पैसे का इंतजाम करने के लिए परिवादी घर चले गये। प्रतिवादी ने बड़ी मेहनत व लगन से परिवादी की पुत्री का इलाज किया जो सांस लेने में परिवादी की पुत्री को परेशानी हो रही थी, इसलिए व आक्‍सीजन लगायी गई और -5- चिकित्‍सा की दृष्टि से सर्वमान्‍य उपचार किया जो मरीज के जीवन के लिए अत्‍यन्‍त आवश्‍यक था। यह भी कहा गया है कि प्रतिवादी ने इलाज का पर्चा जो परिवादी को दिया था वह परिवादी ने छिपाया है, जबकि परिस्थिति का ध्‍यान रखते हुए प्रतिवादी ने उस पर्चे की फोटो स्‍टेट अपने पास रख ली थी और उसकी नकल अपने नोटिस के साथ दी गई थी, जिसे भी परिवादी ने अपने परिवाद में छिपाया है।
प्रतिवाद पत्र में यह भी कहा गया है कि परिवादी ने जे0एम0 मवाना, मेरठ के समक्ष प्रर्कीण चतरपाल बनाम डॉ0 विनोद भारद्वाज, धारा-156 (3) सी0आर0पी0सी0 के अन्‍तर्गत प्रार्थना पत्र दिया था और परिवादी ने वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक के यहॉ भी एक प्रार्थना पत्र दिनांक 30.6.2006 को दिया था तथा मानवाधिकार आयोग नई दिल्‍ली को भी प्रार्थना पत्र दिया था तथा मुख्‍य चिकित्‍साधिकारी मेरठ को भी प्रार्थना पत्र दिया था और बहस के दौरान यह भी कहा गया है कि जॉच में सी0ओ0 एवं सी0एम0ओ0 ने प्रतिवादी की कोई कमी या लापरवाही नहीं पायी और परिवादी ने पोस्‍ट मार्टम नहीं कराया था।
केस के तथ्‍यों व परिस्थितियों तथा आधार अपील को देखते हुए तथा जिला उपभोक्‍ता फोरम के प्रश्‍नगत निर्णय को देखते हुए यह बात स्‍पष्‍ट है कि पुलिस में शिकायत परिवादी ने की थी और मुख्‍य चिकित्‍साधिकारी ने यह पाया कि परिवादी की पुत्री के इलाज में कोई लापरवाही नहीं की गई एवं प्रतिवादी ने अपने साक्ष्‍य के प्रमाण पत्र के रूप में एम0बी0बी0एस0 प्रमाण पत्र की फोटो प्रति, एम0डी0 प्रमाण पत्र की फोटो प्रति और इलाज से सम्‍बन्धित पर्चों की फोटो कापी और पुलिस द्वारा की गई जॉच रिपोर्ट तथा सी0एम0ओ0 द्वारा की गई जॉच रिपोर्ट पेश की और जिला उपभोक्‍ता फोरम ने सारे अभिलेखों को देखते हुए यह पाया है कि डॉक्‍टर द्वारा इलाज में कोई लापरवाही नहीं की गई है और मुख्‍य चिकित्‍साधिकारी द्वारा दी गई रिपोर्ट इस मामले में दी गई एक्‍सपर्ट की राय है, जिसे ठुकराने का कोई आधार नहीं है -6- और जिला उपभोक्‍ता फोरम ने यह पाया है कि परिवादी की पुत्री की मृत्‍यु के लिए प्रतिवादी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। अत: केस के सम्‍पूर्ण तथ्‍यों व परिस्थितियों को देखते हुए हम यह पाते हैं कि जिला उपभोक्‍ता फोरम द्वारा पारित प्रश्‍नगत निर्णय/आदेश सारे साक्ष्‍यों व अभिलेखों को देखते हुए पारित किया गया है और विधि सम्‍मत और तर्क पूर्ण है, जिसमें किसी प्रकार के हस्‍तक्षेप की कोई गुनजाइश नहीं है। तद्नुसार अपीलार्थी की अपील खारिज किए जाने योग्‍य है।
आदेश अपीलार्थी की अपील खारिज की जाती है।
उभय पक्ष अपीलीय व्‍यय भार स्‍वयं वहन करेगें।
 
     (रामचरन चौधरी)                (गोवर्धन यादव)

 

     पीठासीन सदस्‍य                     सदस्‍य

 

हरीश आशु.,

 

कोर्ट सं0-4

 

              [HON'BLE MR. Ram Charan Chaudhary]  PRESIDING MEMBER 
     [HON'BLE MR. Gobardhan Yadav]  MEMBER