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Lok Sabha Debates

Further Discussion On The Motion For Consideration Of The Constitution ... on 19 August, 2011

> Title: Further discussion on the motion for consideration of the Constitution (Amendment) Bill, 2009 (Insertion of new articles 275 A and 371J) moved by Prof. Ranjan Prasad Yadav on the 11th March, 2011.

 

MR. CHAIRMAN :  The House will now take up further consideration of the motion moved by Prof. Ranjan Prasad Yadav on the 11th March, 2011.

          Shri Dara Singh Chauhan – not present.

          Shri Arjun Roy.

श्री अर्जुन राय (सीतामढ़ी):सभापति महोदय, प्रो. रंजन प्रसाद यादव द्वारा प्रस्तुत किए गए संविधान संशोधन विधेयक, 2009 को अंतःस्थापित किया गया है, इसके समर्थन में बोलने के लिए मैं खड़ा हुआ हूं। बिहार देश का बहुत ऊर्जावान और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देश का महत्वपूर्ण राज्य है। बिहार का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है और देश के निर्माण में हमारा मानना है कि बिहार की जो भूमिका रही है, वह किसी भी स्तर पर कम नहीं रही है। बिहार आज लाचारी और बेबसी के किनारे खड़ा है। एक तरफ बिहार को विशेष दर्जा देने के लिए बिहार में संघर्ष चल रहा है। लोकसभा में बिहार को विशेष दर्जा देने के लिए गैर सरकारी संकल्प पर पिछले शुक्रवार को डिस्कशन हुआ था और आज विशेष आर्थिक सहायता लेने के विषय पर डिस्कशन हो रहा है। मैं बताना चाहता हूं कि जब देश में संघीय ढांचे का निर्माण हुआ, तो राज्य और केंद्र के बीच दायित्वों का जो बंटवारा हुआ, इसमें फाइनेंस और आय की जितनी भी ताकत थी, ज्यादा से ज्यादा ताकत केंद्र को दी गई और सेवा के क्षेत्र में जो काम करना था, वह राज्यों के जिम्मे दिया गया। हमारे देश के लिए बहुत ही दुर्भाग्य का विषय है और हम लोगों के लिए भी चिंता का सवाल है कि आज पूरे देश में क्षेत्रीय विषमता बढ़ती जा रही है।

 

15.44 hrs. (Shri Satpal Maharaj in the Chair)   केन्द्र को जिस तरह से जिम्मेदारी का निर्वहन करना चाहिए कि किस तरह से क्षेत्रीय विषमता देश में कम हो और देश का पूरा विकास हो, जिसमें सभी राज्यों की भागीदारी लगभग बराबर हो।  लेकिन भारत सरकार ने इस दिशा में जो उचित कदम उठाने चाहिए, वे नहीं उठाए। मैं बताना चाहता हूं कि जिस समय बिहार वर्ष 2000 में और उससे पहले जिस समय बिहार और झारखंड एक साथ थे, देश की सर्वाधिक खनिज सम्पदा उसी बिहार में थी। आज के समय में बिहार में ही सबसे अधिक उपजाऊ भूमि है। चूंकि मैं भूगोल का विद्यार्था रहा हूं, दुनिया में जितने फोल्डेड माउंटेन वैल्स से जो नदियां निकलती हैं और उसके जो बेसिन हैं और उसके द्वारा जो मैदानी इलाका बना है, वही सबसे ज्यादा उपजाऊ इलाका है जिसमें जो गंगा का बेसिन है, उससे ज्यादा उपजाऊ जमीन इस धरती पर कोई नहीं है। वह बेसिन बिहार में है।

           लेकिन आज जिस कृषि के क्षेत्र में बिहार में क्रान्ति होनी चाहिए, कृषि से संबंधित उद्योग धंधों में जो तरक्की होनी चाहिए, देश की और भारत सरकार की गलत आर्थिक नीति के कारण, मिसमैनेजमेंट के कारण, बिहार की उपेक्षा किये जाने के कारण आज बिहार कृषि के क्षेत्र में भी देश में अंतिम पायदान पर लटका हुआ है। बिहार के लोग देश ही नहीं दुनिया में सबसे मेहनतकश लोग माने जाते हैं। बिहार के विद्यार्थी चाहे वे बिहार में पढ़ें या बिहार से बाहर पढ़ें, जितनी भी सर्विसेज के लिए जो प्रतिस्पर्धा होती है, चाहे वह रेलवे की परीक्षा हो या एसएससी की परीक्षा हो या यूपीएससी की हो या पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा हो या इंजीनियरिंग या मेडिकल की परीक्षा हो, बिहार के छात्र चाहे बिहार में संसाधन कम हैं, शैक्षणिक संस्थान बिहार में कम हैं, हमारे यहां पठन पाठन की स्थिति ठीक नहीं है, दूसरे राज्यों- कोटा, राजस्थान, दिल्ली, इलाहाबाद और बैंगलोर इत्यादि विभिन्न राज्यों में जाकर बिहार के छात्र पढ़ते हैं और अपना महत्वपूर्ण योगदान देश और दुनिया में देने का काम करते हैं। हमारे पास सबसे ज्यादा उपजाऊ जमीन, मेहनतकश लोग, पर्याप्त जल संसाधन, नेपाल से आने वाली 24 से 28 नदियां बिहार  में बहती हैं, और मैक्सिमम नदियां बारहमासी हैं और आज बिहार जहां विकास की सारी सुविधाएं हैं, जहां विकास का कोई एक भी ऐसा साधन और संसाधन नहीं है जो बिहार में न हो लेकिन फिर भी बिहार विकास के मायने में देश में अंतिम पायदान पर खड़ा है।

          1993-94 से लेकर 2005-06 में जो आंकड़े हमने देखे, बिहार विकास के मामले में देश के अंतिम पायदान पर है। कभी पंजाब  आगे है, अच्छी बात है। कभी महाराष्ट्र आगे है, अच्छी बात है। हमारे देश के  सभी राज्य विकसित हो जाएं लेकिन बिहार जिसमें इतनी ज्यादा ऊर्जा शक्ति है, जिसने देश के निर्माण में सबसे बड़ी भूमिका अदा की है और वह विकास के मामले में अंतिम पायदान पर रहे, बीच में भी नहीं रहे, अंतिम से ऊपर भी नहीं रहे, लास्ट पोजीशन पर ही रहे, यह देश के लिए चिंता का विषय है। केवल बिहार के लिए चिंता का विषय नहीं है। पूरे देश और सरकार के लिए चिंता का विषय है।

           बिहार ने दुनिया को लोकतंत्र दिया, मध्य मार्ग दिया। बिहार ने देश को प्रथम राष्ट्रपति दिया और देश की आजादी के आंदोलन की जो सबसे बड़ी लड़ाई हुई, वह महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में बिहार से शुरु हुई और आज बिहार इस स्थिति में खड़ा है।

           हम आपको बताना चाहते हैं कि इस देश की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। दुनिया के स्तर पर हम कमजोर हैं। हम विकासशील देश कहलाते हैं। इस देश में गरीबी और अमीरी के बीच में जो फासला है, वह बहुत ही चिंता का विषय है। आज देश में जो आंकड़े बताते हैं, विभिन्न समाचार पत्रों के माध्यम से पता चलता है कि देश के लगभग 77 से 80 फीसदी लोग 20 रुपये प्रति दिन की आय पर अपना जीवन निर्वाह करते हैं। लेकिन इस देश में 100 व्यक्ति ऐसे भी हैं जिनके पास देश की पूरी सम्पत्ति का एक चौथाई भाग है। कहने का मतलब है कि इस तरह की आर्थिक गैर-बराबरी कि 100 व्यक्ति देश की पूरी सम्पत्ति का एक चौथाई भाग रखता हो और 80 फीसदी व्यक्ति 20 रुपये से कम पर जीवन यापन करते हों, यह किस तरह का फाइनेंशियल मैनेजमेंट इस देश में है? यह किस तरह की आर्थिक व्यवस्था है और किस तरह  का भारत सरकार ने वित्तीय प्रबंधन किया है? हम इस पर सवाल खड़ा करते हैं।

          सरकार को इस पर विचार करना चाहिए कि आखिर क्या कारण है कि कोई व्यक्ति बाहर से किसी इश्यू पर आवाज देता है, जनता के बीच कोई इश्यू खड़ा करता है तो देश के लोग आंदोलित हो जाते हैं लेकिन सरकार या सदन की तरफ से कोई बात आती है तो देश के लोग खड़े नहीं होते। देश में अमीरी और गरीबी, विचार करने का विषय है। आपने गरीबी के लिए जितनी भी कमेटी बनाई हैं, चाहे तेदुंलकर, सक्सेना या सेनगुप्ता कमेटी हो, किसी में अंतर नहीं है, किसी में बराबरी नहीं है। इनमें एक तरह के आंकड़े और जानकारी नहीं आ रही है, इन सब में मतभिन्नता है। मतभिन्नता और पैरामीटर के आधार पर न तो केंद्र सरकार और न ही योजना आयोग द्वारा कोई ठोस पहल की जा रही है जिससे गरीबी और अमीरी में भारी अंतर को कम किया जा सके और गरीबी कम हो।

          मैं बिहार के संबंध में बताना चाहता हूं कि योजना आयोग कहता है कि 65 लाख परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं। गरीबी के लिए जो पैरामीटर तय किया गया, जब बिहार सरकार ने सर्वे कराया तो उसके मुताबिक बिहार में 1,40,00,000 परिवार गरीबी रेखा से नीचे पाए गए। जब बिहार सरकार ने भारत सरकार से आग्रह किया कि 1,40,00,000 परिवारों को अंत्योदय, अन्नपूर्णा योजना के तहत बीपीएल को खाद्यान्न देना चाहिए तो भारत सरकार ने मना कर दिया। भारत सरकार ने बिहार के गरीबों को भुखमरी की कगार पर छोड़ने का काम किया। भारत सरकार के आंकड़े बताते हैं कि देश में प्रति व्यक्ति 44,000-45,000 रुपए वार्षिक आय है जबकि बिहार में 11,000 रुपए है। हम क्यों विशेष पैकेज की बात कहते हैं? हम क्यों आर्थिक सहायता की बात कहते हैं? क्योंकि हम गरीबी के मामले में देश में अंतिम पायदान पर हैं। हमारी माली हालत सबसे खराब है। भारत सरकार ने गरीबी उन्मूलन के लिए एसजीएसवाई के तहत उपाय किए हैं, यह फेल है, मनरेगा फेल है। आपकी एक भी योजना बिहार में ठीक से चल नहीं रही है।

          जहां तक शिक्षा का सवाल है, बिहार शिक्षा के क्षेत्र में अंतिम पायदान के नजदीक है। यहां 2001 में 47 प्रतिशत लोग शिक्षित थे, मैं बिहार सरकार को धन्यवाद देना चाहता हूं कि बिहार सरकार ने बहुत सी पहल की हैं, आज 74 प्रतिशत से अधिक लिटरेसी रेट है और बिहार 63 प्रतिशत के नजदीक पहुंच गया है। बिहार के माननीय मुख्यमंत्री नीतिश कुमार जी शिक्षा के क्षेत्र में साईकिल योजना, बालिका पोषाक योजना, प्रथम श्रेणी से पास करने वाले बच्चों को खास तौर से बच्चियों के लिए 10,000 रुपए आगे पढ़ाई करने की योजना लाए। दो लाख से अधिक शिक्षकों की बहाली हुई। इस तरह से बिहार में शिक्षा के क्षेत्र में कुछ सुधार हुए हैं। अभी हमें और शिक्षा के क्षेत्र में विशेष काम करने हैं।

          बिहार में आठ ऐसे जिले हैं और आपको इनके बारे में जानकर हैरानी होगी की इनमें अनुसूचित जाति का लिटरेसी रेट 10 प्रतिशत के आसपास है। यह कैसा देश है? कैसी आजादी है? जहां दस प्रतिशत लोग किसी समाज के शिक्षित होंगे वह कैसे विकसित हो  सकता है? हम विशेष पैकेज चाहते हैं ताकि बिहार में शिक्षा के क्षेत्र का विकास हो। जब स्पेशल स्टेट्स के संबंध में चर्चा हुई थी तब इफ्रास्ट्रक्चर की बात आई थी। देश में लगभग 33 लाख किलोमीटर ग्रामीण सड़क है लेकिन बिहार में 87,000 किलोमीटर है। हमें लगभग तीन लाख किलोमीटर ग्रामीण सड़क चाहिए। देश में लगभग 66,000 किलोमीटर एनएच है और बिहार में मात्र 3,600 किलोमीटर बनाया गया। देश के लैवल पर जनसंख्या के अनुपात पर 5,000 किलोमीटर बिहार को चाहिए था।

सभापति महोदय : आपके ही दल के चार-पांच सदस्य हैं इसलिए आप संक्षिप्त में बोलिए।

श्री अर्जुन राय : आप बुंदेलखंड में स्पेशल पैकेज दे सकते हैं। बंगाल और मुम्बई में प्राकृतिक आपदा आती है तो इनको स्पेशल पैकेज देते हैं लेकिन 2007 में बिहार में 23 जिले वाशआउट हो गए और आपने एक रुपए की सहायता नहीं दी।    वर्ष 2008 में कोसी में त्रासदी आई, प्रधान मंत्री राष्ट्रीय आपदा घोषित करते हैं। 14 हजार करोड़ रुपये की मुख्य मंत्री की पुनर्वास के लिए डिमांड होती है, जिसे आप खारिज कर देते हैं। आखिर बिहार कैसे विकास करेगा। यदि बिहार को विकसित करना चाहते हैं तो जो बिहार की मांग है, जो बिहार का हक है, उसे आपको देना चाहिए।

          सभापति महोदय, अब मैं अंतिम बात कहकर अपनी बात समाप्त करना चाहता हूं। मैं भारत सरकार से आग्रह करना चाहता हूं कि समय का अभाव है, बिहार का सवाल है और यह केवल बहस और भाषण से हल नहीं होगा। चूंकि बहस और भाषण होते हैं और सरकार की तरफ से उन पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। इसलिए लोगों में क्षोभ पैदा होता है, अविश्वास पैदा होता है और लोगों में भ्रम पैदा होता है कि भारत सरकार किसी खास इलाके को, किसी खास क्षेत्र को, किसी खास वर्ग को मदद करना नहीं चाहती है। बिहार में दस करोड़ लोग हैं, आंदोलन की धरती है। अगर बिहार को आप स्पेशल स्टेटस और विशेष पैकेज नहीं देते हैं तो अभी आपके खिलाफ देश में संग्राम चल रहा है। लेकिन बिहार से बहुत भारी संग्राम की शुरूआत होगी और तब कहीं आपके कान में आवाज जायेगी।

          सभापति महोदय,       आपने मुझे बोलने का मौका दिया, उसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं। धन्यवाद। ...( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप लिखकर दे दीजिए, सब लोग सम्बद्ध हो जायेंगे।

     

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली):सभापति महोदय, डा.रंजन प्रसाद यादव द्वारा एक अच्छा संविधान संशोधन विधेयक लाया गया है। लेकिन बिहार विधान सभा ने 1 लाख 79 हजार करोड़ रुपये का सर्वसम्मत प्रस्ताव किया था और ये 90 हजार करोड़ पर आ गये। यह घट क्यों गये, इसमें संशोधन होना चाहिए। अब इनके संशोधन में हमारा संशोधन है। 1 लाख 79 हजार करोड़ रुपये का सभी दलों ने बैठकर फैसला किया है कि बिहार को इतने पैसे का पैकेज मिलना चाहिए और इन्होंने उसे 90 हजार और तीस हजार रुपये सालाना कर दिया। बिहार सौ वर्षों में तीन बंटवारों से पीड़ित हुआ है। 1912 में बंगाल से बिहार और उड़ीसा अलग हुए और 1936-37 में उड़ीसा अलग हुआ और तीसरा बंटवारा 15, नवम्बर, 2000 को बिहार से झारखंड अलग हो गया और वर्तमान बिहार बच गया। उस समय भी बहस हुई थी, तब हम लोग उधर थे। इस पर बहुत जद्दोजहद हुई, हम लोगों ने इसकी खिलाफत की कि बिहार नहीं बंटना चाहिए। उधर से श्री आडवाणी जी गृह मंत्री थे, उन्होंने वचन दिया था कि बंटवारे के कारण बिहार का जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई केन्द्र सरकार करेगी और पैकेज देगी। हम लोग खोज रहे हैं कि पैकेज कहां है तो पैकेज का पता नहीं चलता है। ...( व्यवधान) उस समय सरकार में थे तो अभी जो सरकार है, उसे भी तो विचार कराना पड़ेगा। अभी वर्ष 2000 से 11वां साल बीत रहा है, हम केन्द्र सरकार से पूछना चाहते हैं कि उस वचन का पालन क्यों नहीं हुआ। बंटवारे के समय कहा गया था कि यह दे देंगे, वह दे देंगे।

          बिहार में जो सारे इंडस्ट्रीज थे, खान और खनिज थे, वे सब झारखंड में चले गये और इधर बाढ़, सुखाड़, जल जमाव और नदी से कटाव की समस्याएं रह गईं और इन सबसे बिहार की जनता पीड़ित है। हर साल बिहार भारत-नेपाल की नदियों की बाढ़ से, दक्षिण बिहार के सात जिले सुखाड़ से, दस लाख हैक्टेअर जमीन में जल जमाव से और नदियों के कटाव से, जिसमें गंगा, गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती आदि नदियों के कटाव से बिहार के लोग पीड़ित हैं। इन चारों के कारण हम ज्योग्राफिकल डिसएडवांटेजियस पोजीशन में है। बाढ़, सुखाड़, जल जमाव और नदी से कटाव ये चार आपदाएं बिहार में हर साल होती हैं।

 

16.00 hrs.   यह वचन दिया गया कि हम पैकेज देंगे, हम बिहार की सहायता करेंगे। देश में विभिन्न समस्याएं हैं, लेकिन उसमें नम्बर एक समस्या रीजनल डिसपैरिटी है। क्षेत्रीय विषमता घटी नहीं है। यदि क्षेत्रीय विषमता को समाप्त नहीं किया गया तो देश की एकता पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है। क्षेत्रीय विषमता बहुत दिनों तक नहीं रहनी चाहिए। इसलिए पॉलिसी में, नीति में, कार्यक्रम में क्षेत्रीय विषमता दूर करने की तरफ जोर देना चाहिए। क्षेत्रीय विषमता दूर करने के लिए श्री अर्जुन राय जी भी कह रहे थे। हम जानना चाहते हैं कि क्षेत्रीय विषमता दूर करने के लिए क्या हुआ? वर्ष 2000 से वर्ष 2011 तक केंद्र सरकार ने अपना कहा हुआ क्या किया, बिहार को क्या सहायता मिली? सभी लोगों की मांग थी, सभी लोग प्रधानमंत्री जी के यहां गये थे। उस समय नीतीश कुमार जी कन्वेनर थे और रंजन जी उप कन्वेनर थे। सब लोग प्रधानमंत्री जी के यहां गये थे, लेकिन कुछ भी नहीं मिला। उस समय से अभी तक लड़ाई जारी है। इससे पहले वाली, 13वीं लोक सभा में तीन बार सवाल उठा, आठ-आठ घंटे बिहार पर बहस हुई। यह कहा गया कि हम उपाय करेंगे, लेकिन अभी तक कोई उपाय नहीं हुआ। हमारे उस पैकेज का क्या हुआ? हम जानना चाहते हैं कि वर्ष 2000 से वर्ष 2011 तक क्या हुआ? इन 11 वर्षों में बिहार के साथ जो भेदभाव हुआ, सेंट्रल यूनिवर्सिटी, पढ़ाई-लिखाई के मामले में अभी एक बिल पास हुआ है। पटना यूनिवर्सिटी सेंट्रल यूनिवर्सिटी बने, यह मांग बहुत दिनों से है, लेकिन इस पर कोई विचार नहीं हुआ। महात्मा गांधी के नाम पर राज्य सरकार कहती है कि चंपारण में दीजिये, लेकिन भारत सरकार उसमें पेंच लगाती है। बिहार में चार सेंट्रल यूनिवर्सिटी होनी चाहिए। आप हिसाब लगाइये, देश में क्षेत्रीय विषमता दूर करने की आपकी क्या पॉलिसी है? पिछड़े क्षेत्र में सेंट्रल यूनिवर्सिटी, नॉर्थ-ईस्ट में, हर छोटे-छोटे राज्य पांच लाख, दस लाख की जनसंख्या वाले राज्य में सेंट्रल यूनिवर्सिटी हो रही है, लेकिन दस करोड़ की जनसंख्या वाले राज्य में कुछ नहीं है।

          महोदय, हम पूछना चाहते हैं कि हमारा सेंट्रल यूनिवर्सिटी का हिस्सा कहां गया? कम से कम तीन सेंट्रल यूनिवर्सिटी बिहार में होनी चाहिए। पटना यूनिवर्सिटी तो पहले से ही डिजर्व करती है कि उसे सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा मिले। चंपारण में यूनिवर्सिटी और एक और यूनिवर्सिटी होनी चाहिए, कम से कम तीन सेंट्रल यूनिवर्सिटी होनी चाहिए। ऐसा क्यों नहीं हो रहा है? आप हिसाब लगाइये नहीं तो हम हिसाब लगा लेंगे कि और राज्यों में कितनी-कितनी सेंट्रल यूनिवर्सिटी हैं। हमारी दस करोड़ की आबादी है। एमआईटी मुज्जफरपुर में है, क्यों आईआईटी नहीं हो रहा है? हम लोगों ने बीएचयू में मना किया था, वहां परम्परागत इंजीनियरिंग कॉलेज था, उसकी रैपुटेशन थी। उसके बारे में बोला कि इसे हम राष्ट्रीय महत्व का घोषित करते हैं। मदन मोहन मालवीय जी के वक्त से वहां इंजीनियरिंग कॉलेज है। उसे आईआईटी बना दिया। आप हमें यह बताइये कि एमआईटी, मुज्जफरपुर को आप क्यों नहीं बनाते हैं? एमआईटी, मुज्जफरपुर को आई आईटी होना चाहिए। वह पुराना इंजीनियरिंग कॉलेज है, उसकी रैपुटेशन है और उसके पास सारे संसाधन हैं। बिहार में एक भी आईआईएम नहीं है। हम पूछना चाहते हैं कि एक भी आईआईएम बिहार में क्यों नहीं है? सरकार की क्या पॉलिसी है, किस हिसाब से आपकी पॉलिसी चलती है? मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए वहां आप आईआईएम वाला इंस्टीटय़ूट क्यों नहीं खोल रहे हैं? हम सरकार से यह पूछना चाहते हैं। सेंट्रल स्कूल खोलने के क्या मापदंड हैं? बिहार में जितने सेंट्रल स्कूल होने चाहिए, वहां पर उतने सेंट्रल स्कूल नहीं हैं। कहते हैं कि बिहार पीछे छूट गया है, हम पैकेज देंगे, हम हिफाजत करेंगे और हम पढ़ाई-लिखाई में तरक्की करायेंगे। सेंट्रल स्कूल के मापदंड के हिसाब से बिहार का जो हिस्सा है, वह हमें मिलना चाहिए।

मैडिकल कॉलेज के बारे में देखा जाये कि देश के किस हिस्से में कितने मैडिकल कॉलेज हैं, लेकिन बिहार में मैडिकल कॉलेज कहां हैं?  

          आज हमारे देश में डाक्टरों की कमी हो रही है। देश में करीब 9000-10000 लोगों पर एक डाक्टर है और बिहार में 20000 पर एक डाक्टर है। इसलिए 30 मैडिकल कालेज बिहार में खोलने की योजना बनानी चाहिए। बड़े-बड़े जिलों में कम से कम एक मैडिकल कालेज होना चाहिए। इंजीनियरिंग कालेजों की भी कमी है। और जगह से तो हमारे बिहार के लड़के बाहर जाते हैं। देश भर में जो इंजीनियरिंग कालेज और मैडिकल कालेज हैं, वहाँ के 50 प्रतिशत बच्चे बिहार के होते हैं, वे पूना में या और जगह जाकर पढ़ रहे हैं। बिहार में इंस्टीटय़ूशंस ही नहीं हैं। लोग कहाँ पढ़ेंगे। इसलिए 30 इंजीनियरिंग कालेज कम से कम  खुलने चाहिए।  ...( व्यवधान) आप देखिये कि कर्नाटक में कितने हैं, महाराष्ट्र में कितने हैं, और राज्यों में भी गिन लीजिए कि कितने हैं। इसलिए बिहार में इंस्टीटय़ूशन खुलने चाहिए चाहे वे सरकारी हों या गैर सरकारी हों, क्वालिटी इंस्टीटय़ूशन हों, जिसमें पढ़ाई हो, मेधावी लड़के जाएँ, पढ़ें, तरक्की करें, अपनी ज़िन्दगी सुधार करें। इससे समाज, देश और प्रदेश, सबका भला होगा।

          महोदय, यहाँ बिहार के कई माननीय सदस्य बैठे हैं। सब जानते हैं कि सबके यहाँ सप्ताह में चार-पाँच बीमार तो ज़रूर आ जाते हैं। मुजफ्फरपुर अस्पताल में कोई बीमार जाता है, पटना में अस्पताल में जाता है, तो उसको कहते हैं, एम्स जाइए। यहाँ लड़खड़ाता हुआ आता है, बीमार है, मरने वाला है और एम्स वाले कहते हैं कि 2013 में आइए। फिर वह हमारे यहाँ पहुँचता है और बताता है कि इस प्रकार एम्स वाले कहते हैं कि 2013 में आइए, लेकिन हमें लगता है कि दो-चार दिन भी वह रहेगा या मर जाएगा। वहाँ के लोग दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं इसलिए बिहार में कम से कम पाँच एम्स के दर्जे वाले अस्पताल होने चाहिए। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? महोदय, क्या आप जानते हैं कि देश में नये एम्स खोलने की बात हुई है। उत्तराखंड में हुई है, उसका स्वागत है, वहाँ की आबादी 85 लाख है। झारखंड में एक एम्स अपग्रेड करने की बात हुई, वहाँ की दो करोड़ की आबादी है। छत्तीसगढ़ में एम्स के अपग्रेडेशन की बात है, वहां दो करोड़ की आबादी है और बिहार की 10 करोड़ की आबादी है लेकिन एक भी अपग्रेडेशन नहीं है। एक नया खोल दिया जिसका 2004 में भैरों सिंह शेखावत जी ने शिलान्यास किया था। अब सात वर्ष हो गए हैं, लेकिन पता नहीं कि उस एम्स का क्या हुआ। पाँच-सात मरीज़ लोग हर वक्त माननीय सदस्यों के डेरे पर पड़े रहते हैं। किसी को कैन्सर है, किसी को टय़ूमर है, हार्ट की परेशानी है, वॉल्व की खराबी है। गरीब आदमी को हार्ट की वाल्व की खराबी की बीमारी होती है, बड़े आदमी को बीमारी होती है बायपास वाली। यह सभी तरह के बीमार एम्स में आते हैं और दर दर की ठोकरें खा रहे हैं। इसीलिए भारत सरकार ने फैसला किया है कि देश में  19 मेडिकल कालेज और अस्पतालों को एम्स के रूप में अपग्रेड करेंगे, लेकिन बिहार का एक भी क्यों नहीं? सरकार में बैठा हुआ कोई आदमी जवाब दे। ऐसा अंधेर है और कहते हैं कि पैकेज ला रहे हैं, संविधान संशोधन ला रहे हैं। यह पैकेज की बात हम सुन रहे हैं लेकिन इसको देने वाला कोई नहीं है। कोई हमें जवाब दे कि 19 अस्पतालों में से बिहार का एक भी अस्पताल क्य़ों नहीं है? हमने सूची में देखा है। मुजफ्फरपुर मैडिकल कालेज और अस्पताल, दरभंगा मैडिकल कालेज और अस्पताल, भागलपुर मैडिकल कालेज और अस्पताल, गया मैडिकल कालेज और अस्पताल, आईबीएमएस पटना, इन पाँचों के अपग्रेडेशन का हम सवाल उठाते हैं। नहीं तो सरकार बताए कि क्यों नहीं हमारे यहाँ हुआ? 19 पर विचार हो गया लेकिन हमारे राज्य पर कोई विचार करने वाला नहीं है।

          महोदय, बिहार में उद्योग तो हैं ही नहीं, बिजली नहीं है। विभिन्न राज्यों में बीएचईएल के कारखाने हैं, लेकिन बिहार में एक भी नहीं है। प्राइवेट वाले उद्योग भी नहीं रहे और पुरानी जो एग्रोबेस्ड इंडस्ट्री थी, उनमें केवल पाँच-सात चालू हैं, बाकी सब चीनी मिलें बंद हैं। कहते हैं कि वे मिलें चालू होंगी, लेकिन क्यों चालू होंगी। ...( व्यवधान)

          आधी बंद हैं। इसलिए इसे चालू करने के लिए सरकार ने क्या किया, क्या कोई खोज खबर ली है। मैं मांग करता हूं कि हमारे यहां मोतीपुर चीनी मिल की 1200 एकड़ जमीन है, रेल हेड में है, ईस्ट वेस्ट कोरिडोर के बगल में है, उसमें भेल कारखाना खोले। राज्य सरकार भी जमीन दे दे। आप लोगों से कहते हैं कि राज्य सरकार से भी जमीन दिला दीजिए। भारत सरकार वहां भेल का कारखाना खोले। किसी तरह से तो उद्योग लगना चाहिए। कुछ नहीं हुआ है, किसी प्रकार का निवेश नहीं हुआ है। कृषि के क्षेत्र में एमएसपी का हमारे यहां किसान गेहूं अथवा धान पैदा करते हैं, मिनिमम स्पोर्ट प्राइज भी उन्हें नहीं मिलता है। एफसीआई की दुकानें नहीं हैं। किसान डिस्ट्रेस सेल करते हैं। जैसे-तैसे औने-पौने दाम में किसान को अपनी उपज बेचनी पड़ती है, नहीं तो आगे वह खेती कैसे करेगा। जब तक वह अपनी उपज बेचेंगे नहीं और उनके पास गोदाम भी नहीं हैं। सरकार देखे कि कितनी विषमता है। किसानों के पास बेचने के लिए अनाज है, लेकिन उन्हें भाव नहीं मिल रहा है।

          बिजली का भारी संकट है। देश भर में सबसे न्यूनतम बिजली बिहार में है और पर-केपिटा की खपत बहुत कम है, लेकिन मांग बहुत है। सबसे ज्यादा डिमांड बिहार की अन्य राज्यों के मुकाबले में है, इसलिए बिजली के ट्रंसमिशन का मामला, बिजली के डिस्ट्रीब्यूशन का मामला और रूरल इलेक्ट्रीफिकेशन का मामला, जेनरेशन, ट्रंसमिशन, डिस्ट्रीब्यूशन और इलेक्ट्रीफिकेशन, चारों मामले में बिहार बहुत पीछे है। बिजली के लिए लोग त्राही-त्राही कर रहे हैं। सप्लाई भी नहीं है। राजीव गांधी विद्युतिकरण में छोटे-छोटे ट्रंसफार्मर लगा दिए, सिर्फ 16 किलोवाट के, रंजन जी ने कहा है कि पैकेज दो, अब पैकेज की क्या बात करें, कुछ भी नहीं है।

MR. CHAIRMAN :  Hon. Members, the extended time allotted for the discussion on this bill is over.  I have still five more hon. Members who want to speak of this Bill.  So, if the House agrees, the time for the discussion may please be extended by one more hour.

SOME HON. MEMBERS: Yes, please.

MR. CHAIRMAN: All right, the time of the ongoing discussion is extended by another one hour. Yes, Dr. Raghuvansh Prasadji, now, please conclude.

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : महोदय, यह विषय बहुत अहम है, इसीलिए शुक्रवार के दिन सदस्य सदन में उपस्थित हैं। लोग उत्साहपूर्वक बैठे हैं।

          महोदय, बिजली का उत्पादन, संचरण, वितरण और ग्रामीण विद्युतिकरण। सभी मायने में राजीव गांधी विद्युतिकरण के तहत कहते हैं कि हम केवल गरीब के यहां केबल लगाएंगे और दूसरे लोगों के यहां नहीं लगाएंगे। वह कहता है कि तार ही काट देता हूं। यह सभी संकट गांवों में है। इन सभी समस्याओं का समाधान केंद्र सरकार को देखना चाहिए। सब कुछ राज्य सरकार पर छोड़ रहे हैं। राज्य सरकार भारत सरकार का नाम लेती है। राज्य सरकार कहती है कि भारत सरकार की ढिलाई है, भारत सरकार कहती है कि राज्य सरकार की ढिलाई है। दोनों सरकारों के बीच में वहां की जनता की पिसाई हो रही है।

          महोदय, सिंचाई का सवाल है। गंगा, गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला, बलान, पुनपुन, सोन नदियां बिहार में बहती हैं। लेकिन वॉटर मैनेजमेंट नहीं है। बाढ़ रोकने, जल और सिंचाई प्रबंधन की व्यवस्था नहीं है। कटाव की वजह से वहां के लोग बहुत तकलीफ़ में हैं। इस बारे में कोई इंतज़ाम वहां भारत सरकार की तरफ से नहीं किया गया है। समय का अभाव है, अन्यथा मैं आपको अक्षर-अक्षर बताता कि कहां-कहां भेदभाव हुआ है, कहां-कहां गलत हुआ है।  

          महोदय, श्री अर्जुन राय जी ने सड़क का सवाल भी उठाया था। जब श्री बालू नेशनल हाईवे के मंत्री थे, उस समय 990 किलोमीटर चार लेन का मंज़ूर हुआ, लेकिन काट दिया। अभी वहां मुज़फ्फरपुर से बरौनी एन.एच.-28 15000 पी.सी.यू. से ज्यादा है, फोर लेन का डिजर्व करता है, वह अभी तक नहीं हुआ है। उसी तरह से खगड़िया से पूर्णिया है, वह भी 15000 के करीब है। उसका नाम भी फोर लेन से काट दिया गया।

सभापति महोदय : अब अपनी बात समाप्त करें।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह : फिर आरा से मलियाबाग़, मलियाबाग़ से मोहनियां, पटना से गया, इन सभी में फोर लेन है, यह स्वर्णिम चतुर्भुज को मिलाने की सरकार की नीति है। उधर बख्तियारपुर से बरही, बीच में टू-लेन, बरही से रांची तक फोर लेन, उधर फोर लेन बीच में टू-लेन, इसलिए ये सभी को फोर-लेन होना चाहिए।

सभापति महोदय : अब अपनी बात समाप्त करें।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :   महोदय, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में जो दूसरी हुकूमत यूपीए-2 की आई, उसमें एक किलोमीटर की सड़क भी मंजूर नहीं हुई है। ऐसा भेदभाव क्यों हुआ?

सभापति महोदय : अब अपनी बात समाप्त करें।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :     महोदय, यह बस अन्तिम बिन्दु है। पर्यटन के बारे में आप जानते हैं। आप आध्यात्मिक रूचि और आध्यात्म के विशेषज्ञ हैं। भगवान बुद्ध की ज्ञान प्राप्ति, भगवान महावीर की जन्मभूमि, श्री गुरू गोविंद सिंह की जन्मभूमि, ये सब ऐतिहासिक धरोहर हैं। लेकिन बौद्ध सर्किट, जैन सर्किट, महात्मा गांधी सर्किट, रामायण सर्किट, जैन-महावीर सर्किट कहां है?

सभापति महोदय : अब अपनी बात समाप्त करें। कई और सदस्य भी बोलना चाहते हैं।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह :   ये सभी स्थल वहां बिहार में हैं। उन सभी की सांस्कृतिक विरासत है, उसका ऐतिहासिक धरोहर है, यह पौराणिक महात्म्य की चीज है। पर्यटन में भी बिहार उपेक्षित है। इसलिए इसकी सभी मामलों में उपेक्षा हुई। बिहार का बंटवारा हुआ। ...( व्यवधान) 

MR. CHAIRMAN :  Nothing will go on record now.

(Interruptions) … *     श्री मंगनी लाल मंडल (झंझारपुर):सभापति महोदय, डॉ. रंजन प्रसाद यादव जी ने बिहार के संदर्भ में विधेयक पेश किया है।

सभापति महोदय : कई और सदस्य बोलने वाले हैं। संक्षेप में बोलें तो बड़ा अच्छा रहेगा।

श्री मंगनी लाल मंडल : महोदय, इसमें पार्टी और समय का बंधन नहीं होता है। मैंने अभी प्रारंभ ही नहीं किया है और आप कहते हैं कि संक्षेप में बोलिए। मैं आगे का कार्यक्रम देख रहा हूं। इस उद्देश्य से मेरी कटौती नहीं होनी चाहिए। मैं खुद संक्षेप में बोलूंगा। लेकिन मैंने बात प्रारंभ ही नहीं की और आप कह रहे हैं संक्षेप में बोलिए।

सभापति महोदय : आपकी पार्टी के चार और सदस्य हैं, वे भी बोलेंगे।

श्री मंगनी लाल मंडल : इसमें पार्टी का बंधन नहीं है। क्या दूसरी पार्टी के लोग बिहार के मामले में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं?

सभापति महोदय : सभी को अवसर मिलना चाहिए।

श्री मंगनी लाल मंडल : मैंने इसी सदन में देखा है कि एक बिल पर चार-चार, पांच-पांच दिन बहस हुई। इसमें समय का कोई बंधन नहीं है।

सभापति महोदय : आप प्रारंभ कीजिए।

श्री मंगनी लाल मंडल : आपको आसन की तरफ से बिहार के साथ उदारता बरतनी चाहिए। आप सरकार नहीं हैं, आप तो आसन हैं।

सभापति महोदय : बोलिए-बोलिए। सभी को बोलना है। सभी बोलना चाहते हैं।

श्री मंगनी लाल मंडल :  डॉ. रंजन प्रसाद यादव जी ने बिहार के संदर्भ में जो गैर-सरकारी विधेयक पेश किया है, जिस पर चर्चा हो रही है, उसमें संविधान के दो अनुच्छेदों का उल्लेख किया गया है कि इन दोनों अनुच्छेदों में संशोधन करके, अपने विधेयक में इन्होंने जो प्रावधान लाया है, उसको इसमें इन्सर्ट करने के लिए इन्होंने बिल लाया है। एक है अनुच्छेद 275-ए और दूसरा है अनुच्छेद 371-जे। अब इसमें डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि हमारी तो मांग 189000 करोड़ रूपए की थी। उससे पहले उस समय के प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री राजीव गांधी जी ने 5000 करोड़ रूपए का ऐलान किया था।  लेकिन विधेयक में  जहां तक वित्तीय ज्ञापन है, उसमें दो अनुच्छेद हैं और तीन खंड है।  

      पहला 90 हजार का है और आवर्ती वार्षिक व्यय के रूप में तीस हजार करोड़ है। खंड तीन में बिहार राज्य के विकास के लिए विशेष प्रावधानों का उपबंध है। इस प्रकार संचित निधि से इसमें भी तीस हजार करोड़ रुपया लगेगा। तीस और तीस साठ, नौ और छ: पन्द्रह, यानी एक लाख 50 हजार करोड़ रुपए सरकार स्वीकार कर लेती है तो एक लाख 50 हजार करोड़ का प्रावधान करना होगा, 90 हजार का नहीं। स्व. श्री राजीव गांधी जी ने जो घोषणा की थी और एक लाख 89 हजार करोड़ रुपए की हमारी जो मांग है, यह तो यथावत है। विशेष योजनाओं के लिए पैकेज यथावत है।

          सभापति महोदय, अभी आदरणीय श्री प्रणब मुखर्जी जी वित्त मंत्री हैं। इन्हें जिस समय बिहार के बारे में ज्ञापन दिया गया था, उस समय ये प्लानिंग कमीशन के डिप्टी चेयरमैन थे। संभवत: उस समय में आज के प्रधान मंत्री, डॉ. मनमोहन सिंह जी वित्त मंत्री थे। उन्होंने उस समय आश्वसन दिया था कि बिहार के मामले में हम विचार करेंगे। स्व. श्री राजीव गांधी जी ने जो घोषणा की थी, उस पर भी विचार करेंगे।  बिहार को विशेष राज्य का दर्जा न हो, लेकिन विशेष पैकेज के बारे में उस समय चर्चा हुई थी, उस पर ख्याल तो करेंगे। आज श्री प्रणब मुखर्जी जी वित्त मंत्री हैं और ये कहते हैं कि बिहार का मामला विचाराधीन है। यह ग्रांट में रियायत करने के मामले में पहला अनुच्छेद है। 2 जुलाई, 2009 अतारांकित प्रश्न संख्या 79 राज्य सभा का है। उसमें सरकार ने कहा था कि बिहार को विशेष श्रेणी का दर्जा देने का मामला विचाराधीन है। पहला जो 275 अनुच्छेद है, उसमें हम ग्रांट की बात करते हैं। उसमें सरकार ने स्वयं कहा है कि सामान्य केन्द्रीय सहायता का आबंटन विशेष श्रेणी राज्यों और गैर विशेष श्रेणी राज्यों के बीच 30:70 के अनुपात में किया जाता है। विशेष श्रेणी दर्जा देने से राज्य के लिए सामान्य केन्द्रीय सहायता 90:10 अनुदान ऋण के अनुपात में अनिवार्य होता है, जब कि गैर विशेष श्रेणी राज्यों के लिए 30:70 अनुदान ऋण के अनुपात के रूप में दिया जाता है, चूंकि सरकार ने विशेष राज्य का दर्जा 11 राज्यों को दिया है और इन 11 राज्यों में अरुणाचल प्रदेश, असम, हिमाचल प्रदेश, जम्मू एवं काश्मीर, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा और उत्तराखंड है। उत्तराखंड आपका है, ये बाद में बना है। हमने पहले भी कहा, जब विशेष राज्य का दर्जा उत्तराखंड को दिया तो हमें कोई एतराज नहीं है। बिहार ने मांग की थी कि हमें स्पेशल पैकेज दीजिए। स्पेशल पैकेज की स्व. श्री राजीव गांधी जी के समय से मांग आ रही है, आपने इस पर विचार नहीं किया। उसके बाद अनुच्छेद 371 के तहत आपने कई राज्यों पर विचार किया है। अनुच्छेद 275 ग्रांट के बारे में है। प्रो. रंजन प्रसाद जी ने अनुच्छेद 371 में संशोधन के लिए जो मांग की है, उसमें नागालैंड से लेकर महाराष्ट्र भी है। महाराष्ट्र के कई इलाकों में स्वशासी बोर्ड बना कर विशेष सुविधा देने की, इस अनुच्छेद के द्वारा संशोधन करके आपने किया है। यह जो अनुच्छेद 371 है, उसमें एक बार ही संशोधन नहीं हुआ है, बल्कि कई बार हुआ है। आपने अलग-अलग राज्यों के लिए विशेष सहायता दी है, विशेष प्रावधान किया है और विशेष रियायत दी है। राज्यों के आधीन, जहां कहीं स्वशासी बोर्ड बना है, उसका भी इस अनुच्छेद के तहत आपने प्रावधान किया है। प्रो. रंजन प्रसाद यादव जी जो विधेयक लाए हैं, इस विधेयक के द्वारा विशेष पैकेज की मांग की गई यही मांग की है। हमें एक बात आश्चर्यजनक लगती है कि जब सरकार ने कहा कि इस विशेष राज्य के दर्जे के लिए कुछ अलग से व्यवस्था होनी चाहिए।

       पहले नहीं किया, जब 11 राज्यों के लिए सरकार ने विशेष राज्य का दर्जा दिया। जब 11 राज्यों को घोषित किया और सारी सहायता दी तो बाद में 2009 में सरकार ने कहना शुरू कर दिया कि विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए क्या-क्या मानदण्ड होंगे। मानदण्ड में कहा कि पहाड़ी एवं दुर्गम क्षेत्र, ताकि बिहार कट जाये। झारखण्ड पहले था, पहाड़ी था, दुर्गम था, उस समय भी हमारी मांग थी, लेकिन आपने हमारी मांग नहीं मानी। जब हमने कहा कि 1.89 लाख हमको चाहिए, आपने पहाड़ी एवं दुर्गम क्षेत्र, कम आबादी घनत्व और पर्याप्त जनजाति आबादी, दूसरे पड़ोसी देशों की सीमाओं के साथ सामरिक स्थितियां, वह हमारी है, आर्थिक और अवसंरचना में पिछड़ापन, अव्यवहार्य राज्य भी।  मैं सरकार से जानना चाहता हूं कि सरकार ने एक्जेक्यूटिव ऑर्डर से यह कंडीशन बनाई है कि संविधान में जिन दो अनुच्छेदों को संशोधित करने का विधेयक श्री रंजन प्रसाद यादव जी लाये हैं, उस अनुच्छेद में इसका प्रावधान है कि कंसेशन के साथ जो अनुसूची है, जो शैडय़ूल है, उसमें यह प्रोवीजन है। बाद में सरकार ने शासकीय आदेश से यह प्रोवीज़न किया है, ताकि बिहार को वंचित किया जाये, क्योंकि, बिहार सन् 2000 से मांग कर रहा है। 2009 से अब तक लगातार संसद के दोनों सदनों में ये कह रहे हैं और बाहर भी कह रहे हैं कि बिहार का मामला विचाराधीन है।         

          एक बात और सरकार ने कही है और संसद में कहा गया है कि बिहार के अलावा किसी राज्य ने वेशेष राज्य का दर्जा देने की जो मांग आती है, उसका कोई मैमोरेण्डम सरकार के विचाराधीन नहीं है। जब कोई राज्य नहीं कहता कि हमको विशेष राज्य का दर्जा दीजिए, उनका ज्ञापन सरकार के विचाराधीन नहीं है तो फिर बिहार को क्यों वंचित कर रहे हैं, बिहार से आप मुकर क्यों रहे हैं? यह आपका दिया हुआ वचन है और लगातार है। इसीलिए अब यह जो मानदण्ड, क्राइटीरिया बनाया गया है, पैरामीटर बनाया गया है, यह बिहार के साथ घोर अन्याय है। बार-बार हम कहते हैं, हमारे मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने बिहार विधान मंडल में कहा है कि हम आपसे पैसा नहीं मांगते, आपसे पैकेज नहीं मांगते, आप हमको विशेष राज्य का दर्जा दीजिए।

          इसमें कहा गया है कि बाहर की पूंजी का निवेश बिहार में नहीं हो रहा है। यह विधेयक में कहा गया है। इन दोनों अनुच्छेदों को आप संशोधित करके संविधान में नया प्रावधान करेंगे तो बाहर की पूंजी देश के अन्दर जो दूसरे राज्यों में है, वह भी पूंजी बिहार में जाएगी और देश के बाहर हम अमेरिका में और दूसरे देशों में भी जो एन.आर.आई. हैं, उनको हम प्रोत्साहित करेंगे कि बिहार में आप पूंजी निवेश करिये तो एफ.डी.आई. भी होगा, ये दोनों होंगे और जो एण्टरप्रिन्योर यहां से अर्थात वहां से बिहार जाएंगे, उनको विशेष राज्य का दर्जा देने से, ये दोनों संशोधन करने से उनको कर में रियायत मिलेगी। जब कर में रियायत मिलेगी तो जैसे आपके स्टेट उत्तराखंड में है, जो बाहर के लोग वहां कारखाना लगाते हैं, उनको किसी तरह का टैक्स नहीं देना होता है तो बिहार में भी ऐसे टैक्स से मुक्ति है।

          यह जो विधेयक पेश किया गया है, इसमें गैर-बराबरी की बात की गई है। बेकारी की बात की गई है, गरीबी की बात की गई है, ये बातें बिल्कुल सही हैं। सरकार जानती है कि बिहार में साक्षरता की दर हिन्दुस्तान में सबसे कम है, लेकिन ऑल इंडिया में पिछले 10 वर्षों में आपने जितनी साक्षरता प्रतिशत दर हासिल की है, उससे ज्यादा रफ्तार से बिहार ने हासिल की है। जहां हम पहले 47 परसेंट पर थे, आज 63 परसेंट पर हैं। जब इंडिया की फीगर 75 परसेंट थी तो आप 10 प्रतिशत आगे बढ़े हैं, इसलिए गरीबी, पर कैपिटा इन्कम जहां 80 हजार रुपये किसी राज्य की है, 85 हजार रुपये किसी राज्य की है, ऑल इंडिया की 45 हजार रुपये है, वहीं बिहार की 15 हजार रुपये है। हम सबसे निचले पायदान पर हैं। हमारे यहां पूंजी निवेश नहीं हो रहा है। बिजली के उत्पादन के बारे में हमारे अर्जुन राय जी ने और दूसरे लोगों ने बताया है। मैं समझता हूं कि डॉ. रंजन प्रसाद यादव जी ने जब बिल के इण्ट्रोडक्शन के समय अपना भाषण दिया होगा तो उन्होंने भी कहा होगा। इसलिए पर कैपिटा बिजली के उत्पादन की बात तो दूर, बिहार के बंटवारे के बाद बिजली का उत्पादन ठप्प है और कहलगांव में जो बिजली का उत्पादन होता है, वह सैण्ट्रल पूल में आप लेते हैं और तब वह हमें देते हैं, बिहार को वंचित करते हैं।  बाढ़ में एनटीपीसी का जो कारखाना बन रहा है, उसका धीमी गति से निर्माण कार्य हो रहा है।  बिहार को जो बिजली चाहिए, वह बिजली उसे नहीं देते हैं और जो कोल लिंकेज कारखाने के लिए चाहिए, बिजली के लिए चाहिए, उस पर भी आप विचार नहीं करते हैं।  हमारा प्रस्ताव है कि हमें कोल लिंकेज दीजिए। हमारा प्रस्ताव है कि सेल्फ प्रोडक्शन के लिए हमें सुविधा दीजिए, सहायता दीजिए।  हमारा प्रस्ताव है कि सिंचाई की पोटैंशियलिटी को क्रिएट करने के लिए हमें सहायता दीजिए।  हमारा प्रस्ताव है कि हमारी शुगर इंडस्ट्री बर्बाद हो गयी है, उसके रिवाइवल के लिए हमें पैकेज दीजिए, पैसा दीजिए, लेकिन आप उस पर भी विचार नहीं करते हैं।  इसे स्पेशल स्टैटस नहीं देते हैं।  इसीलिए मैं सरकार से अनुरोध करना चाहूंगा कि डा. रंजन प्रसाद यादव ने जो विधेयक पेश किया है और इस विधेयक के माध्यम से संविधान के दो अनुच्छेद को संशोधन करके, जो व्यवस्था इसमें की गयी है, उसका प्रावधान करने के लिए जो अनुरोध किया है, मैं सरकार से अनुरोध करूंगा कि वह उसे स्वीकार करे।  सरकार क्षेत्रीय अंसतुलन को मिटा दे, बिहार को बर्बाद होने से बचा दे।  अगर बिहार बर्बाद होगा तो उसकी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की होगी।  केंद्र सरकार ने बिहार के साथ हमेशा सौतेलेपन का व्यवहार किया है।

 

श्री जगदानंद सिंह (बक्सर):सभापति महोदय, मैं आपको धन्यवाद देता हूं कि आपने मुझे इस विषय पर बोलने का मौका दिया। मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि मैं कोई बात को नहीं दोहराऊंगा, लेकिन जो बात मैं कहना चाहता हूं, आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया उसके लिए समय दिया जाए।  

          महोदय, बिहार बंटवारे के बाद परेशानी की हालत में नहीं गया।  मैं अलग बात नहीं कह रहा हूं, संशोधन के भीतर जो हमारे मूल उद्देश्य हैं, मैं उसी पर चर्चा कर रहा हूं।  मैं संविधान के अनुच्छेद 275 और 371 की बात कह रहा हूं कि उसमें संशोधन की आवश्यकता है।  बिहार की जो आवश्यकता है, उसके लिए संविधान में संशोधन के लिए यह विधेयक लाया गया है।  आखिर बिहार को परेशानी क्यों हुयी? कहीं यह दिमाग में यदि हो कि बिहार के बंटवारे के बाद बिहार गरीब हुआ है, तो मैं समझता हूं कि अपने आप में यह भ्रम है।  महोदय, वर्ष 1929 में कमीशन के सामने बिहार के उस समय के तत्कालीन नेताओं ने जो बिहार का चित्र प्रस्तुत किया था, उसके बाद आज तक कोई उसमें परिवर्तन नहीं आया।  हम देश के अंतिम पायदान पर थे और आज भी अंतिम पायदान पर हैं।  झारखंड और बिहार के बंटवारे के बाद, मैं वर्ष 1912 और 1935 के बंटवारे की बात नहीं कह रहा हूं, मैं नवंबर, 2000 की बात कर रहा हूं, जिस समय बिहार और झारखंड का बंटवारा हुआ, जिस समय उड़ीसा हमसे अलग हुआ था, तब झारखंड, बिहार की इस भूमि से उसकी पर-कैपिटा इंकम आधी थी।  लंबे समय से हम लोगों ने उस आदिवासी इलाके, पहाड़ी इलाके, जंगल के इलाके में रहने वाले अपने बिहारी भाइयों के लिए बहुत कुछ किया था।  बिहार के लिए जो भी धनराशि मिली, उसका अधिकांश हिस्सा उसी झारखंड में लगाया गया था और जो हमसे आमदनी में आधे थे, उड़ीसा के बंटवारे के वक्त झारखंड का क्षेत्र पर-कैपिटा इंकम में, जब झारखंड हमसे अलग हुआ तो पर-कैपिटा इंकम बिहारवासियों से उनका दोगुना हो चुका था अर्थात बिहार का एक धनाढय़ इलाका जिसे बिहार ने मजबूत ढंग से आगे बढ़ाने का काम किया था, वह हिस्सा हमसे अलग हो गया।

           महोदय, जब पैकेज की बात होती है, वह पैकेज बिहार को बढ़ाने के लिए, आगे ले जाने के लिए एक लाख अस्सी हजार करोड़ रूपए का वह पैकेज नहीं था।  संयोग से उस समय बिहार की विधानसभा में हम लोगों ने इस विषय को आगे बढ़ाने का काम किया था।  बिहार बंटवारे के दिन जहां था, उस यथास्थिति को बनाये रखने के लिए एक लाख अस्सी हजार करोड़ रूपए की मांग की थी।  मैं सदन में बहुत अदब के साथ कहना चाहता हूं कि एक लाख अस्सी हजार करोड़ रूपए की मांग बिहार को हिंदुस्तान के औसत या अन्य राज्यों की बराबरी पर आने के लिए नहीं की गयी थी, बल्कि झारखंड के बंटवारे के दिन बिहार जहां था, उस यथास्थिति रूप में आने के लिए एक लाख अस्सी हजार करोड़ रूपए की मांग की गयी थी।  मैं कहता हूं कि अब क्यों नब्बे हजार करोड़ रूपए की बात है?

       1 लाख 80 हजार करोड़ रूपये एट ए टाइम ग्रांट 90 हजार करोड़ रूपये पर हो गया। मैं दूसरी बात कहना चाहता हूं। बिहार के लोगों ने  बंटवारे  के बाद एक मत हो कर अपन रिप्रेजन्टैशन 12वीं फाइनैंस कमीशन को दिया था। जिस तरह से 1929 में रिप्रेजन्टैशन कमीशन के समय पूरे बिहार के नेताओं ने एक साथ दिया था। उसी तरह से हम 12वीं फाइनैंस कमीशन को जो रिप्रेजेन्टेशन दिए थे, लालू प्रसाद पूर्व मुख्य मंत्री जी का हस्ताक्षर, पूर्व मुख्य मंत्री श्रीमती राबड़ी देवी जी, रामबिलास पासवान जी, शरद यादव जी, नितिश कुमार जी के हस्तासक्षर अर्थात् राजनैतिक मतभेदों को भुला कर हमने 12वीं फाइनैंस कमीशन के सामने एकमत से प्रस्ताव दिया था।  हमारा पिछड़ापन ऐतिहासिक है। हम देश के औसत लोगों के बराबर जाना चाहते हैं। राष्ट्र में जो राज्य सबसे आगे है, हम उसके बराबरी पर जाना चाहते हैं। महोदय, वन टाइम ग्रांट 1 लाख 80 हजार करोड़ रूपये की बात मानी गई। फाइनैंस कमीशन के सामने जो हमने अपना प्रतिनिधित्व किया था वहां हमारी बात नहीं मानी गई थी। वह था वर्ष 2000 में यथास्थिति बनाए रखने के लिए 1 लाख 80 हजार करोड़ रूपये और फाइनैंस कमीशन के सामने हम गए थे कि डेवोल्यूशन से हमें प्रतिवर्ष राशि 38 हजार करोड़ रूपये मिलनी चाहिए। हमें रेवेन्यू खर्च के लिए नहीं, योजना के लिए हमें ये पैसे चाहिए।

          महोदय, मैं आपके सामने इस सदन में कहना चाहता हूं कि 12वीं फाइनैंस कमीशन में पूरा बिहार एक मत हो कर, एक बात कही थी, वह बात नहीं मानी गई और लगातार विशेष राज्य के दर्जें पर, रिजनल इम्बैलेंसेज के नाम पर हम सब एक मत हो कर राष्ट्र के सर्वोच्च सदन में अपनी बात उठाते रहे हैं। बिहार की परेशानी दूर करने के लिए हमारी आवाज नहीं सुनी जा रही है। मैं सबसे महत्वपूर्ण बात कहना चाहता हूं कि 12वीं फाइनैंस कमीशन के सामने हमने स्पष्ट चित्र रखा था। यदि हिन्दुस्तान के अन्य राज्यों की बराबरी पर हमें बीस सालों के अंदर जाना है तो हमें 15 प्रतिशत ग्रोथ रेट सलाना चाहिए। यदि हमें 15 वर्ष में उनकी बराबरी पर जाना है तो हमको 20 प्रतिशत ग्रोथ रेट चाहिए। महोदय, अब क्या इससे भी आसान मांग देश के सामने हो सकती है। हम 15-20 साल इंतजार करने के लिए तैयार हैं। हमारी एक छोटी सी मांग 38 हजार करोड़ रूपये की थी, वर्ष 2000 के मूल्य पर। आज के मूल्य पर वह 50 हजार करोड़ रूपये पर होता। इसमें दूसरी जो बात आई है 30 हजार करोड़ रूपये प्रतिवर्ष की, मैं उसका संसोधन करना चाहता हूं कि जहां बिहार के संपूर्ण पॉलिटिकल इंस्टिटय़ूशंस से जुड़े हुए लोग आज के दिन 50 हजार करोड़ रूपये प्रतिवर्ष की मांग की थी, कृपा कर उसे 30 हजार करोड़ रूपया न कहा जाए। मैं नहीं जानता हूं कि 30 हजार करोड़ रूपया मिलेगा। मैं यह भी नहीं जानता हूं कि शायद 50 हजार करोड़ रूपया भी न मिले। लेकिन बिहार की जो स्थिति हैं, यहां पर जो पिछड़ापन, गरीबी, अशिक्षा, ह्यूमन इंडेक्स है, हम देश के अंतिम पायदान पर हैं उसके लिए हमें उतनी राशि चाहिए।

          महोदय, बिहार को स्पेशल स्टेट्स कैटेगरी यह अलग विषय है। मुझे लगता है कि थोड़ा समय आगे बढ़ चुका है। रिजनल इम्बैलेंसेज है, मैं यही बात कहना चाहता हूं।

सभापति महोदय :   कृपया संक्षिप्त करें।

श्री जगदानंद सिंह : सदन में सभी वरिष्ठ लोग बैठें हैं। यह भारत सरकार की संवैधानिक जिम्मेवारी है। थ्रू फाइनैंस कमीशन इस देश में रिजनल इम्बैलेंस नहीं होने दिया जाएगा। यदि आज रिजनल इम्बैलेंसेज हैं, बिहार आज अंतिम पायदान पर है तो केन्द्र सरकार की संवैधानिक जिम्मेवारी पूरा नहीं करने का नतीजा है। हमारी जो प्लानिंग कमीशन है, उस प्लानिंग कमीशन के लिए मैन्डेट है, इस पार्लियामेंट का, इस भारत के संविधान का, भारत के विधान का कि इस हिन्दुस्तान के प्रत्येक क्षेत्रों का, चाहे वे राज्य हों या व्यक्ति हो सब का समरूप विकास हो। महोदय, व्यक्ति के इनक्लुसिव ग्रोथ की बात हो रही है। बिहार जैसे राज्य का क्यों नहीं होगा? मैं थोड़ी सी बात कह कर अपनी बात को समाप्त करूंगा कि बिहार कहां है? मैं इसकी चर्चा इसलिए करना चाहता हूं कि बिहार की सबसे बड़ी परेशानी का कारण है, 12वीं फाइनैंस कमीशन में लगा कि हम लोगों को बहुत पैसा मिला। लोंगों ने कहा कि बिहार को 80 हजार करोड़ रूपये पांच साल के लिए मिला। लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि बिहार को प्रति व्यक्ति के हिसाब से केवल 1838 रूपये मिले थे जबकि हिन्दुस्तान के अन्य राज्यों को औसत 1895 रूपये मिले थे। हम गरीब हैं। हम अंतिम पायदान पर हैं।    

       इस देश में फाइनैंस कमिशन द्वारा अन्य राज्यों के औसत व्यक्ति को 1895 रुपये से 1900 रुपये मिलते हैं और बिहार को 1838 रुपये मिलते हैं। हम तो पीछे जाएंगे। हमारी स्थिति उस समय क्या थी। बिहार का अपना रिवैन्यू केवल 536 रुपये प्रति व्यक्ति और पूरे देश का 2856 रुपये था। जिनका रिवैन्यू कलैक्शन 2856 रुपये प्रति व्यक्ति था, उन्हें 1895 रुपये मिले और जिनका रिवैन्यू कलैक्शन 536 रुपये था, उन्हें केवल 1888 रुपये मिले। आखिर बिहार किस बलबूते पर अन्य की बराबरी पर जाएगा।...( व्यवधान)

सभापति महोदय :  अब आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

…( व्यवधान)

श्री जगदानंद सिंह : मैं थोड़ी बात और कहना चाहता हूं। यह कहा जाता है कि बिहार काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है। मुझे उसकी चर्चा नहीं करनी है, लेकिन मैं आपसे कहना चाहता हूं कि इलैवन्थ फाइनैंस कमिशन की असैसमैंट द्वारा बिहार का पर कैपिटा रिवैन्यू 2122 रुपये था और पूरे भारत में प्रति व्यक्ति रिवैन्यू 4488 रुपये था, अर्थात् बिहार के लोगों का राष्ट्रीय औसत का प्रति व्यक्ति रिवैन्यू का 48 प्रतिशत था। लेकिन वही 2005-2010 के बीच, जहां बिहार का प्रति व्यक्ति रिवैन्यू 2122 रुपये से 2364 रुपये हुआ, पूरा राष्ट्रीय औसत 6787 रुपये हुए और हम राष्ट्रीय औसत के 48 प्रतिशत से घटकर 34 प्रतिशत पर आ गए। आखिर बिहार के निवेश का प्रतिफल क्या हो रहा है। बिहार में निवेश कहां से हो रहा है? जहां फिसकल फैड्रलिज़्म है, हिन्दुस्तान के खजाने की रखवाली केन्द्र सरकार की है और उसमें से निकला हुआ पैसा राज्यों के विकास के लिए जाता है। प्लानिंग कमिशन पूरे हिन्दुस्तान को समरूप विकास देने की सबसे बड़ी संस्था है। यदि यह दोनों संस्थाएं काम नहीं करेंगी तो बिहार के साथ यह अन्याय कब खत्म होगा।...( व्यवधान)

सभापति महोदय : कृपया समाप्त कीजिए।

…( व्यवधान)

श्री जगदानंद सिंह  : मैं कहना चाहता हूं कि पूरे राष्ट्र स्तर पर हमसे ऊपर उड़ीसा है अर्थात् हम उड़ीसा से भी पीछे हैं। मैं केवल दो बातें कहकर अपना वक्तव्य समाप्त करूंगा। जहां राष्ट्रीय स्तर पर  प्रति व्यक्ति आय आज 42 हजार है, वहीं बिहार में 14,654 या 15,000 रुपये है। बिहार की प्रति व्यक्ति आय की स्थिति राष्ट्रीय औसत से केवल 36 फीसदी है। वहीं देश की औसत राशि के उड़ीसा की प्रति व्यक्ति आमदनी 80 प्रतिशत है। हम फर्स्ट लोएस्ट हैं और उड़ीसा सैकिंड लोएस्ट है।...( व्यवधान) यदि हम उड़ीसा की बराबरी पर जाने का प्रयास कर रहे हैं, तो हमें आज के दिन प्रति वर्ष 38 हजार करोड़ रुपये से अधिक चाहिए।...( व्यवधान)

सभापति महोदय : अब आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

…( व्यवधान)

श्री जगदानंद सिंह : हमारी कोसी का पानी खेतों को नहीं मिल पा रहा है। हमें गंगा का पानी लेने से मना कर दिया गया। वन सागर समझौते के चलते सोन का पानी सोन के कमांड में मिलना बंद हो गया। कोसी का जो बांध टूटा, उससे आज पूरे इलाके में हमारी सिंचाई बंद है।...( व्यवधान)

सभापति महोदय : श्री महाबली सिंह, अब आप बोलिए।

…( व्यवधान)

श्री जगदानंद सिंह : वह शायद दस-बारह साल तक बंद रहेगी। हमें उसका स्टोरेशन चाहिए, हमारी हिस्सेदारी का पानी चाहिए और यदि गंगा का पानी  बिहार को नहीं मिला तो हमारे थर्मल पावर नहीं लगेंगे, उद्योग नहीं लगेंगे।...( व्यवधान)

सभापति महोदय : अब आप समाप्त कीजिए।

…( व्यवधान)

श्री जगदानंद सिंह : हमें देश के खजाने से पर्याप्त निधि मिले। दूसरा, हमारे जो नैचुरल रिसोर्सेज़ हैं, वे हमारे अधिकार हैं। हम निश्चित रूप से नेपाल की नदियों का पानी झेलते हैं।...( व्यवधान)

सभापति महोदय : अब माननीय सदस्य की कोई भी बात रिकार्ड में नहीं जाएगी।

                    ...( व्यवधान)*                                                                                                       सभापति महोदय : महाबली सिंह जी, आप बोलिए।

…( व्यवधान)

       

श्री महाबली सिंह (काराकाट):सभापति महोदय, माननीय सदस्य प्रो. रंजन प्रसाद द्वारा बिहार को विशेष पैकेज देने के लिए जो संविधान संशोधन विधेयक लाया गया है, उस पर कई माननीय सदस्यों ने चर्चा की है और चर्चा के दौरान सभी ने बिहार के पिछड़ेपन की बात बतायी है, बिहार की उपेक्षा की बात की है। इसलिए मैं पुनः उस बात को दोहराना नहीं चाहता हूं।     मैं एक बात सदन को जरूर  बताना चाहता हूं कि अगर सरकार इस देश को विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा करने की सोच रही है, तो बिहार की उपेक्षा करके हम इस देश को विकसित देशों की श्रेणी में नहीं ले जा सकते।

          महोदय, बिहार का गौरवमयी इतिहास रहा है। बिहार की धरती से महावीर महात्मा बुद्ध जैसे लोग पैदा हुए, जिन्होंने पूरे विश्व को संदेश दिया। उनके बताये हुए रास्ते पर चलकर विश्व के कई देशों ने तरक्की की। यही कारण है कि आज विश्व के कई देशों के लोग बिहार की धरती को नमन करने के लिए  वहां साल में लाखों की तादाद में पहुंचते हैं।

          महोदय, मैं आपको बता देना चाहता हूं कि श्रीलंका, चीन, जापान, थाइलैंड से लाखों की संख्या में लोग बिहार की धरती को नमन करने के लिए पहुंचते हैं। यह बिहार का इतिहास रहा है। बिहार में नालंदा विश्वविद्यालय है, जहां विश्व के लोग शिक्षा ग्रहण करने के लिए आया करते थे।  इसका यह इतिहास रहा है। बिहार को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था, लेकिन केन्द्र सरकार के सौतेलेपन व्यवहार के चलते आज बिहार का सम्मान देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी गिरा है।

          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से सरकार और सदन को बताना चाहता हूं कि आज बिहार अपने खोये हुए इतिहास को, खोये हुए मान-सम्मान को पाने के लिए आगे बढ़ रहा है। बिहार की खोई हुई प्रतिष्ठा आज वापस आ रही है। अगर केन्द्र सरकार इसमें सहयोग करती है, तो माननीय मुख्य मंत्री श्री नीतीश कुमार जी की अगुवाई में आज जो बिहार अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को प्राप्त करने की तरफ बढ़ रहा है, खोये हुए मान-सम्मान को पाने की तरफ बढ़ रहा है, वह और बढ़ेगा। आज बिहार का सम्मान देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी बढ़ा है। अगर बिहार का सम्मान बढ़ रहा है, तो देश का सम्मान बढ़ रहा है। अगर बिहार का अपमान होगा, तो देश का अपमान होगा, क्योंकि बिहार का इतिहास और बिहार का नाम देश में ही नहीं विदेशों में भी है।

          सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से सरकार और सदन को बताना चाहता हूं कि अगर इस देश को आप विकसित देशों की श्रेणी में ले जाना चाहते हैं, तो बिहार की उपेक्षा करना बंद कीजिए। अभी सभी माननीय सदस्यों ने कहा कि बिहार को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जा रहा है। जब बिहार से झारखंड अलग हो रहा था, तो उस समय केन्द्र सरकार ने कहा था कि हम बिहार को विशेष   पैकेज देंगे। झारखंड अलग हो गया, लेकिन केन्द्र सरकार ने बिहार को विशेष  पैकेज नहीं दिया।

          महोदय, बिहार की ऐसी बनावट है कि हर साल बिहार को आपदाएं झेलनी पड़ती हैं। उत्तरी बिहार बाढ़ से प्रभावित रहता है और मध्य एवं दक्षिणी बिहार सूखे से प्रभावित हैं। हर साल  उत्तरी बिहार में बाढ़ आती है, जिसके चलते हजारों गांव तबाह हो जाते हैं एवं लाखों लोग घर से बेघर हो जाते हैं, लोग एक-एक दाना खाने के लिए मोहताज हो जाते हैं। विगत वर्षों में जब बिहार में बाढ़ आई, तो बड़े पैमाने पर लोग बेघर हो गए। प्रधानमंत्री जी ने हेलीकॉप्टर से दौरा किया, उन्होंने कहा कि बिहार में बाढ़ नहीं आपदा आई है। उन्होंने उसे आपदा घोषित किया और उसके लिए पैकेज देने की बात की, प्रभावित लोगों को राहत देने की बात की, लेकिन प्रधानमंत्री जी ऐसा कहकर भी अपनी बात से मुकर गए और उन बाढ़ पीड़ितों को उन्होंने कोई राशि उपलब्ध नहीं कराई। मैं यह बातें इसलिए सदन को बता रहा हूं जिससे पता चल सके कि केन्द्र सरकार  क्यों बिहार के साथ भेदभाव और उपेक्षा हो रही है।

          महोदय, बिहार में जो नेशनल हाइवेज हैं, उनको बनाने की जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की है, लेकिन आज करीब सात साल से केन्द्र की सरकार बिहार के नेशनल हाइवेज को बनाने के लिए राशि मुहैया नहीं करा रही है। राज्य सरकार अपनी निधि से बिहार के नेशनल हाईवेज को चलने लायक बनाने का काम किया है और बनाने के बाद जब केन्द्र सरकार से पैसा मांगा जा रहा है, तो केन्द्र सरकार वह पैसा भी नहीं दे रही है।

          महोदय, मैं बताना चाहता हूं कि बिहार में प्रधानमंत्री सड़क योजना कई वर्षों से बंद पड़ी है। केन्द्र सरकार कहती है कि हम 1000 गांवो की, आबादी वाले सभी गांवों को सड़क से जोड़ेंगे, लेकिन आज तक उसके लिए बिहार को राशि नहीं मिल रही है। इससे सारे काम बंद पड़े हुए हैं। इसलिए मैं आपके माध्यम से सरकार से कहना चाहता हूं कि आप बिहार की उपेक्षा करना बंद कीजिए क्योंकि यदि बिहार की उपेक्षा होगी, तो देश की उपेक्षा होगी। आपको फिर बिहार के लोगों को पास जाना होगा।

          बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए एक करोड़ 25 हजार लोगों ने हस्ताक्षर करके सरकार के पास भेजा है। यह मत समझिए कि वे सिर्फ हस्ताक्षर हैं, वे स्याही से लिखे हुए हस्ताक्षर नहीं हैं, बल्कि खून से लिखे हुए हस्ताक्षर हैं। सब लोगों की इज्जत, मान-सम्मान और स्वाभिमान का वह हस्ताक्षर है। अगर बिहार के लोगों की इज्जत, मान-सम्मान और स्वाभिमान के साथ खिलवाड़ हुआ, तो मैं बता देना चाहता हूं, आप तो महराज हैं, आसन पर विराजमान हैं, बिहार में अभी आपने अपनी हालत देख ली है, बिहार के एक व्यक्ति की आवाज नहीं है कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के लिए जन-जन की आवाज है। अगर आप नहीं देते हैं, तो आने वाले वर्ष 2014 के चुनावों में बिहार की जनता आपको बिहार में घुसने नहीं देगी।

          मैं  आपके माध्यम से सरकार से निवेदन करना चाहता हूं कि माननीय नीतीश कुमार की अगुवाई में जो बिहार आगे बढ़ रहा है, उसका मान-सम्मान देश और विदेश में बढ़ रहा है, आप इनको सहयोग कीजिए, विशेष पैकेज दीजिए जिससे बिहार का नाम रोशन हो। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

 

सभापति महोदय :  श्री भूदेव चौधरी ।

श्री भूदेव चौधरी (जमुई): महोदय, मैं सर्वप्रथम इस स्थान से बोलने की अनुमति चाहता हूं।

सभापति महोदय:  ठीक है, बोलिए।

श्री भूदेव चौधरी : सभापति महोदय, प्रो0रंजन प्रसाद यादव द्वारा प्रस्तुत संविधान संशोधन विधेयक पर बोलने के लिए मैं खड़ा हुआ हूं और आपने मुझे इसके लिए समय दिया है, इसलिए मैं अंतःकरण से आपके प्रति आभार अभिव्यक्त करता हूं।

          महोदय, इस सन्दर्भ में विगत दिनों से लेकर अभी तक लगभग 13 माननीय सांसदों ने अपनी बात रखी है जिनमें से जो सात माननीय सदस्य बिहार से बाहर के हैं, उन्होंने भी बड़ी गंभीरता से अपनी बात को रखने का काम किया है।  उन्होंने बिहार की बेबसी, लाचारी, बेरोजगारी, भुखमरी, बिगड़ते स्वास्थ्य और शिक्षा के अभाव के बारे में बड़े दर्द से अपनी भावनाओं को प्रस्तुत किया है। मैं उन बातों का जिक्र नहीं करना चाहता, जिन बातों का जिक्र मेरे से पूर्व वक्ताओं ने किया है। मैं थोड़ा अतीत की ओर आपको ले जाना चाहता हूं।

          पूज्य बापू महात्मा गांधी जब अफ्रीका से लौटकर हिन्दुस्तान की धरती पर आए तो उन्होंने 1916 में अपने गुरु गोखले से मुलाकात कर यह कहा कि इस देश की हवा और देश के नौजवान जंगे आजादी की लड़ाई लड़ना चाहते हैं। गुरु गोखले को बहुत आश्चर्य हुआ कि अभी चंद महीने पहले पूज्य बापू अफ्रीका से लौटकर यहां आए हैं और उस शक्तिशाली हुकूमत से, साम्राज्य से लड़ना चाहते हैं, जिसका सूरज दुनिया में कहीं डूबता नहीं है। अगर भारत में डूबता है तो अफ्रीका में उदय होता है और अगर अफ्रीका में डूबता है अमेरिका में उदय होता है। वैसी शक्तिशाली सत्ता से बगावत करने की हिम्मत यह कैसे कर रहे हैं। फिर भी उन्होंने कहा कि गांधी अगर तुम इस ब्रिटिश हुकूमत से जंगे आजादी की लड़ाई लड़ना चाहते हो तो जाओ, भारत के तमाम शहरों में घूमकर आओ। अगर लोगों की इच्छा होगी, आकांक्षा होगी, फिर जंगे आजादी की लड़ाई लड़ी जा सकती है। पूज्य बापू जी ने अपने गुरु की आज्ञा का आलिंगन करके पूरे देश का भ्रमण किया।

          एक साल बाद जब महात्मा गांधी 1917 में फिर अपने गुरु गोखले के सामने उपस्थित हुए तो गुरु गोखले ने मजाकिया लहजे में कहा कि क्या गांधी आज भी तेरे मन में जंगे आजादी की लड़ाई लड़ने की तमन्ना है, तो इस पर महात्मा गांधी ने उद्दात स्वर में कहा कि मेरी सोच अटल है और जंगे आजादी की लड़ाई लड़ी जा सकती है। उन्होंने बताया कि मैंने पूरे देश का भ्रमण किया, लेकिन जब मैंने बिहार की धरती पर पांव रखा तो चम्पारण की वह भूमि जहां से नौजवान की ताकत और क्षमता को देखकर मुझे अनुभूति हुई कि जंगे आजादी की लड़ाई लड़ी जा सकती है। आज उसी बिहार का बखान हम  लोग यहां कर रहे हैं।

          देश और दुनिया में आज से हजारों साल पहले जब किसी मां-बाप के बेटे का नामांकन नालंदा विश्वविद्यालय में होता था, तो वह अपने को बहुत गौरवान्वित महसूस करते थे कि उनके बेटे का ज्ञान के संस्थान, विद्या के जगत में नामांकन हुआ है। जब बिहार राज्य से झारखंड राज्य अलग नहीं हुआ था, अखंड बिहार था, मैं उस दिन का बड़े दर्द भरे दिल से बयान कर रहा हूं। वहां से देश की आधी दौलत केन्द्र सरकार को मिलती थी। वहां का लोहा, कोयला, अभ्रक दूसरे राज्यों में जाता था, परिणामस्वरूप दूसरे राज्य तो विकसित होते गए, लेकिन बिहार जिस स्थिति में 1947 से पूर्व था, उससे भी बद से बदतर होता गया।

          मुझे इस बात का दर्द है कि आज के समय में भी बिहार का लगभग एक करोड़ नौजवान, जिसके शरीर में ताकत है, जिसके बाजुओं में क्षमता है, वह अपने बूढ़े मां-बाप, छोटे बच्चों और नई दुलहन को बिलखता छोड़कर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात आदि प्रदेशों की सड़कों पर दर-दर की ठोकरें खा रहा है।

          सभापति जी, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इसी दिल्ली में लगभग 40 से 50 लाख बिहार के नौजवान दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। पंजाब, हरियाणा, गुजरात और यहां तक कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में भी करीब 50,000 नौजवान काम कर रहे हैं। बिहार में नदियों का कोई अभाव नहीं है। देश को आजाद हुए 63 वर्ष हो गए हैं। पांच वर्षों को छोड़ दें तो बिहार में बाकी 58 सालों में कांग्रेस पार्टी और उसके द्वारा समर्थित एक दल की सरकार काबिज रही है।  

 

17.00 hrs.   मैं उन बातों का जिक्र करना नहीं चाहता हूं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बिहार की प्रकृति, बिहार की भौगोलिक स्थिति सामरिक दृष्टि से अति-महत्वपूर्ण है, परन्तु दुर्भाग्य से यह अत्यधिक पिछड़ेपन से ग्रस्त है। बिहार के सामाजिक पिछड़ेपन का कारण केन्द्र सरकार द्वारा उपेक्षा है। मैं केन्द्र सरकार पर आरोप लगाना नहीं चाहता हूं लेकिन कहना चाहता हूं कि बिहार भी हिंदुस्तान का एक अंग है, एक भाग है और यह केन्द्र सरकार का दायित्व है कि हमारे सभी राज्य जो इस देश के हाथ, पांव, आंख आा्र आत्मा हैं, वही निश्चित तौर पर बिहार भी है। आज यदि क्रंतिकारियों की आत्मा देश के और राज्यों को देखती होगी तो मुस्कराती होगी, लेकिन बिहार की धरती पर जब उन शहीदों की आत्मा पड़ती होगी तो विलाप करती होगी, बिलखती होगी कि आज भी बिहार वहीं है जहां आजादी से पहले था। लेकिन मैं बिहार के माननीय मुख्यमंत्री जी का शुक्रगुजार हूं कि इन पांच वर्षों में उन्होंने बिहार को प्रगति के पथ पर लाकर खड़ा किया है, लेकिन द्रूत-गति लाने के लिए केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है। केन्द्र सरकार को, बिहार को आर्थिक पैकेज देने की नैतिक जिम्मेदारी है और राजनैतिक कर्तव्य भी है। निश्चित तौर पर अभी जो विकास के रूप में बिहार खड़ा हुआ है उस गाड़ी को एक्सप्रेस बनाने के लिए केन्द्र की सहायता की अति-आवश्यकता है।

 

17.02 hrs. (Dr. Raghuvansh Prasad Singh in the Chair)             मैं विनम्रता पूर्वक कहना चाहता हूं और स्मरण दिलाना चाहता हूं कि एनडीए के शासनकाल में नदियों को जोड़ने की बात हुई थी, वह बहुत ही सुखःद संदेश था। आज बिहार इस बात को महसूस कर रहा है कि बिहार में नदियों को जोड़ा जाए और उसके पानी का संरक्षण किया जाए।

          आज बिहार की स्थिति क्या है, आधी जगह बाढ़ है तो आधी जगह सुखाड़ है। आधे लोग सुखाड़ से निजात पाने को तरस रहे हैं और आधे लोग पानी में डूब कर भुखमरी के शिकार हो रहे हैं। विगत् दिनों की बाढ़ माननीय प्रधान मंत्री जी भी देखने गये थे और उन्होंने क्या कहा था, उसकी चर्चा हो चुकी है।

          सभापति महोदय, मैं निश्चित तौर पर कहना चाहूंगा कि बिहार पर आपकी दया-दृष्टि की आवश्यकता है। बिहार के एक करोड़ पच्चीस लाख लोगों के हस्ताक्षर हैं और वहां के जन-जन की आपसे अपेक्षा है। इसलिए मैं सरकार से मांग करता हूं कि माननीय रंजन प्रसाद यादव जी जो विधेयक लाए हैं वह मानने योग्य है और उसे निश्चित तौर पर माना जाए।

          मैं अपने क्षेत्र जमुई के बारे में बताना चाहता हूं जिसके नाम से ही लोग सिहर जाते हैं। अगर बिहार के किसी कोने में जमुई की चर्चा होती है तो लोगों के अंदर सिहरन पैदा होती है क्योंकि जमुई नक्सलाइट एरिया है। ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता है जब कोई घटना वहां न घटती हो। दुर्भाग्य से वहां पानी का स्तर बहुत नीचे चला गया है। आज भी वहां लोग उन नदियों और तालाबों से पानी पीते हैं जहां जानवर भी पानी पीते हैं। सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से केन्द्रीय सरकार का ध्यान जमुई एरिया की ओर दिलाना चाहता हूं जोकि एक संवेदनशील इलाका है। वहां पर अगर एक केन्द्रीय विद्यालय का निर्माण हो जाए, एक इंजीनियरिंग कालेज का निर्माण हो जाए, एक आईटीआई का इंस्टीटय़ूशन खुल जाए, एक मेडीकल कालेज खुल जाए, एक पावर सब-स्टेशन बन जाए तो वहां की भुखमरी, बेरोजगारी, लाचारी और बेबसी निश्चित तौर पर दूर हो सकती है। मैं इन्हीं बातों के साथ पुनः डा. रंजन प्रसाद यादव जी द्वारा लाए गये संशोधन विधेयक का दिल से समर्थन करता हूं। आपने मुझे समय दिया, बहुत-बहुत धन्यवाद।

                                                                                                     

डॉ. मोनाज़िर हसन (बेगूसराय):सभापति महोदय, मैं आपके प्रति आभार प्रकट करता हूं।  डा. रंजन प्रसाद यादव जी के द्वारा बिहार से सिलसिले में जो विधेयक पेश किया गया है, उसके समर्थन में हम यहां बोलने के लिए खड़े हुए हैं।

          सभापति महोदय, बहुत से माननीय सदस्यों ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपने विचार रखे, जिसमें से अधिकांश लोग बिहार से बाहर के प्रदेश के थे और उन्होंने इस बात से अपना इत्तेफ़ाक़ और सहमति व्यक्त की।

          महोदय, प्रो. रंजन प्रसाद यादव बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने एक महत्वपूर्ण मुद्दे को, बिहार की ज्वलंत समस्या को सदन के सामने प्राइवेट मैम्बर बिल के रूप में सदन के सामने रखने का काम किया है। हमारे विद्वान माननीय सदस्यों ने अपने बहुमुल्य विचारों को रखने का काम किया है। मैं उन बिंदुओं को दोहराना नहीं चाहता हूं, क्योंकि मैं जानता हूं कि समय कम है और इससे पहले आपकी तरफ से कोई इशारा हो, मैं अपनी बातों को विराम देना चाहूंगा।

          महोदय, 24 नवम्बर, 2005 में नीतीश कुमार जी ने बिहार के मुख्यमंत्री की हैसियत से शपथ ग्रहण की थी। उसके बाद जब उन्होंने बिहार के खजाने का जायज़ा लिया। उसी वक्त उन्होंने महसूस किया कि बिहार के लिए सपना जो बिहारियों के मन में है या उनके मन में है और बिहार को जिस स्तर तक वे ले जाना चाहते हैं, उसके लिए बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देना अनिवार्य है। उसी समय से वह प्रधानमंत्री से वक्त की मांग कर रहे हैं कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए समय देकर बुलाने का काम कीजिए। यह बात इसलिए कह रहा हूं क्योंकि केन्द्र के मन में बिहार के प्रति घृणा का महौल और सौतेलापन का सुलूक़ है, उससे वह ऊपर उठने का काम करे। आज़ादी के 64 साल बीत जाने के बाद भी बिहार जहां था, वहीं खड़ा है। बिहार के अंदर प्रतिभाएं हैं, बिहार के अंदर लोग स्वस्थ हैं, बिहार दुनिया को रास्ता दिखा सकता है। इतिहास साक्षी है कि बिहार ने दुनिया को रोशनी देने का काम किया था। मंडल मिश्र जैसे विद्वान को भी अपनी विद्वता का परिचय देने के लिए पहुंचना पड़ा था। शंकराचार्य जी को भी मंडल मिश्र के दरबार में पहुंचने की ज़रूरत पड़ी थी। नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय इसकी मिसाल है। अभी हम चर्चा कर रहे थे कि बिहार को कम से कम 10 विश्वविद्यालय और एम्स मिलने चाहिए। बिहार के अंदर कई प्रस्तावित यूनीवर्सिटियां हैं। बंगाल के अंदर अलीगढ़ यूनीवर्सिटी, केराला के अंदर अलीगढ़ यूनीवर्सिटी और बिहार के अंदर अलीगढ़ यूनीवर्सिटी के लिए प्रावधान किया गया था। बंगाल के चूंकि प्रणब दादा थे, वहां यूनीवर्सिटी बन गई, केराला में शुरू हो गई, लेकिन बिहार में शुरू नहीं हुई। मैं बिहार के मुख्यमंत्री को धन्यवाद देता हूं कि उसने किशनगंज के अंदर 280 एकड़ जमीन अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी के आबंटित कर दी, लेकिन केंद्र सरकार अपनी आंख पर पट्टी बांध करके उस पर विचार करना नहीं चाहती है।   लेकिन केन्द्र सरकार अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर उस पर विचार करना नहीं चाहती। जब वोट मांगने का समय आता है तो गरीब, अकलियत, पिछड़ों तथा दलितों की बात करते हैं, नारा लगाने का काम करवाते हैं, उन तबकों से पोस्टर छपवाने का काम करवाते हैं लेकिन सत्ता के अंदर, विकास के अंदर जब सांझेदारी और भागीदारी देने की बात आती है तो उनसे नज़रें मोड़ने का काम यह केन्द्र सरकार करती है। केन्द्र सरकार के सौतेलेपन का ज्वलंत उदाहरण इससे ज्यादा नहीं मिल सकता है।

           बिहार में बिजली की स्थिति, सड़कों की स्थिति और दूसरी चीजों की स्थिति पर हमारे दोस्तों ने बहुत बातें रखी हैं। आज का बिहार अपनी तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ चुका है। बिहार में एक ऐसा मुखिया बैठा है जो बिहार को ही रास्ता दिखाने का काम नहीं कर रहा है बल्कि देश को रास्ता दिखाने का काम कर रहा है। आज बिहार में राजनीति करने के लिए बहुत लोगों ने अकलियत, दलितों, पिछड़ों के नाम पर राजनीति करने का काम किया है लेकिन आज बिहार में आप देखेंगे कि हुनर जैसे कार्यक्रम अकलियतों के लिए है जिसमें मैट्रिक पास करने के बाद उनको स्कॉलरशिप देने का कार्यक्रम, उनके लिए उच्च शिक्षा, मौलाना मदन उल्हक मृतप्राय यूनिवर्सिटी को जीवित करने का काम इस हुकूमत द्वारा किया गया। शिक्षा के क्षेत्र में जो बिहार पिछड़ गया था, आज नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने का काम बिहार सरकार ने किया है और पूर्व राष्ट्रपति डा, अब्दुल कलाम उसके विजिटर मुकर्रर किये गये हैं। आज बिहार में चाणक्य लॉ यूनिवर्सिटी, नेशलन फैशन टैक्नोलॉजी की यूनिवर्सिटी और चंद्रगुप्त मैनेजमेंट जैसी यूनिवर्सिटीज खोली गई हैं। नीतीश कुमार जैसे बिहार के मुख्य मंत्री के नेतृत्व में बिहार में काम हो रहा है।           इसीलिए मैं यह आश्वासन देना चाहता हूं कि आप जो पैसा देंगे और डा. रंजन प्रसाद यादव जी, यह जो 90 करोड़ रुपये बिहार को एकमुश्त देने की बात कही गई है और 30,000 करोड़ रुपया सालाना जो देने की बात कही गई है, यह मांग शत प्रतिशत जायज है। इसीलिए देश के अंदर आज ऊहापोह की स्थिति है।

          आज अन्ना हजारे जैसे लोग देश के अंदर सड़कों पर उतर गये तो पूरे मुल्क के लोग उनके पीछे खड़े हो गये क्योंकि भ्रष्टाचार में पूरी तरह से यह सरकार डूबी हुई है। इसीलिए मैं कहना चाहता हूं कि बिहार के लिए आप जो पैसा देंगे, उसका सदुपयोग होगा। बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के बारे में आपने देखा कि जब बिहार से काफिला चला तो हजारों की संख्या में, लाखों की संख्या में लोग यहां पर पहुंचे और 16 करोड़ लोगों के दस्तखत लेकर यहां पर आए और प्रधान मंत्री जी ने हमारे नेताओं को समय दिया और इस बात का आश्वासन भी दिया कि हम इस बात को एनडीसी में रखने का काम भी करेंगे। आज तक ऐसा नहीं हुआ कि प्रधान मंत्री जी ने कोई बात एनडीसी में रखी हो और वह पास न हुई हो। इसलिए वह पास हो जाए तो अति उत्तम है लेकिन जब तक वह पास नहीं हो रहा है, मैं इस बिल को पास करने के लिए सदन से आग्रह करूंगा कि डा. रंजन प्रसाद यादव जी जो बिल सदन के पटल पर लाए हैं, उसे पारित करने की इजाजत सदन दे और सरकार उसको मानने का काम करे। धन्यवाद।

                                                                     

सभापति महोदय : सभा की अनुमति है तो बिल के समाप्त होने तक सदन का समय बढ़ाया जाए।

   

चौधरी लाल सिंह (उधमपुर): महोदय, मैं सिर्फ एक बात बिहार के बारे में कहना चाहता हूं। बिहार के इस देश में बहुत नेता रहे हैं, उनमें आप भी शामिल हैं। इस समय आप हमारे आदर्श हैं, आप सभापति हैं। मैं कहना चाहता हूं कि बिहार की जो हालत की गई है, दुर्गति की गई है, बिहार के लीडरों ने लेबर बनाने के सिवाय बिहारियों का क्या किया है? पूरी दुनिया में लेबर बनाई है। मैं पूछना चाहता हूं कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है? मेरा प्रश्न है कि वे नेता हिसाब दें जो तकरीरें करते हैं कि हमने बहुत कुछ बिहार के लिए किया, हम ये कर रहे हैं, वे कर रहे हैं। आप बिहार की हालत देखिए। मुझे कहते हुए शर्म आती है कि गरीब छोटे, नन्हें बच्चे दूरदराज खेतों में मजदूरी कर रहे हैं, बिल्डिंग बना रहे हैं। वे ट्रेनों में जाते हैं, सफर करते हैं। इतने मंत्री रहे, दो-दो मंत्री रहे, चीफ मिनस्टर भी हैं और रहें भी। मैं जानना चाहता हूं कि उन्होंने बिहार का क्या किया? मेरी आपके माध्यम से विनती है कि वे जवाब दें कि बिहार की यूनिवर्सिटी क्यों बर्बाद हुई? क्यों नहीं बनाई गई? धन्यवाद।

                                               

THE MINISTER OF STATE IN THE MINISTRY OF FINANCE (SHRI NAMO NARAIN MEENA): Sir, the Bill moved by Prof. Ranjan Prasad Yadav proposes to insert Article 275A after Article 275 and Article 371J into the Constitution of India with the objective of providing special financial assistance to the State of Bihar for accelerated development of the State.  Sixteen hon. Members have participated in the debate. I am grateful to them for their valuable suggestions and observations.

          Sir, before I come to the specific replies to the questions raised by hon. Members, I would like to state that Bihar receives sufficient Central assistance through the Finance Commission grants in Plan assistance and from various Central Ministries. As the hon. Members are aware, the Finance Commission transfers are made to States on the basis of recommendations made by the Finance Commission on assessment of each States’ requirement. The Finance Commission normally finalises their recommendations after consultations with the States. At present we are in the 13th Finance Commission award period which runs from 2010 to 2015.

          The 13th Finance Commission has recommended a total devolution for the State of Bihar amounting to Rs. 1,72,944 crore during this award period between 2010 to 2015 as against Rs. 75,646 crore under the 12th Finance Commission award period between 2005-10. This is an increase of 129 per cent. The 13th Finance Commission has also recommended State-specific grant of Rs. 333 crore to Bihar for inter-linking of rivers for prevention of floods. Under the National Disastar Response Calamity Fund, the 13th Finance Commission has recommended  a grant which is double the share of Bihar from Rs. 592 crore in the period between 2005-10 to Rs. 1386 crore in the period between 2010-15. In connection with the Kosi floods, cyclonic disturbances and drought, funds have also been provided to the State of Bihar from National Calamity Contingency Fund now known as the National Disaster Response Fund for immediate relief in recent years. The grant of Central assistance to support the State Plan of Bihar amounted to Rs. 12,992 crore in the period between 2005-10. The Central assistance of Rs. 4815 crore was provided for State’s Annual Plan for 2010-11 as a grant from the Ministry of Finance alone.

 

A provision of assistance of Rs. 7,119 crore has been made to support the Annual Plan for 2011-12. In addition:

a.    Substantial Central assistance is released to the States under Central Sector Schemes and Centrally-Sponsored Schemes by various Central Ministries/Departments for employment generation and creation of assets.  I have been informed that the total releases from Central Government to Bihar for various Centrally Sponsored and State Sector Schemes amounted to Rs. 12,206 crore in 2009-10, which increased to Rs. 20,000 crore in 2010-11.  This is again an increase of about 65 per cent over one year alone.
b.    Specific assistance has been provided to mitigate the impact of floods in Bihar.  The Flood Management Programme, which is a State Sector Scheme, covers flood protection works.  Central grant of 75 per cent is provided for projected selected by the States under this Programme.  Under this programme, Central assistance of Rs. 544 crore has been provided to Bihar in the 11th Plan so far.  I hope that this will reassure Prof. Ranjan Prasad Yadav, Shri Adhir Chowdhury, Shri Vishwa Mohan Kumar and Shri Ghanshyam Anuragi, Shri Mahabali Singh and others who had expressed particular concern regarding the flood situation in Bihar.
c.     Further, the State has also been accessing external aid for infrastructure development.  In 2010-11, Bihar received external assistance, comprising both grant and loan, of Rs. 941 crore, while a provision for Rs. 2,550 crore of similar assistance is there for 2011-12.
Special Central Assistance for a new Special Plan for Bihar was included in the Rashtriya Sam Vikas Yojana in 2003-04.  The original cost of all the projects under the Special Plan for Bihar was estimated at Rs. 5,568 crore. RSVY was subsumed in the Backward Regions Grant Fund Scheme in 2006-07 and the Special Plan for Bihar was brought within its ambit, with a provision of Rs. 1,000 crore per year.  In 2011, enhanced support of Rs. 8,753 crore was approved for the Special Plan for Bihar; with the balance amount of Rs. 3,468 crore to be released during 2010-11 and 2011-12 of which Rs. 2,000 crore was released in 2010-11.  An amount of Rs. 1,470 crore has been provided in 2011-12.  Projects under the Special Plan for Bihar include strengthening of sub-transmission systems, renovation and modernization of thermal power stations, renovation of a major canal, development of State Highways, etc. Under the new Integrated Action Plan for identified districts, seven districts of Bihar were provided a grant of Rs. 25 crore each in 2010-11 to meet assessed development needs for social sector services and rural infrastructure.  This provision has been increased to Rs. 30 crore per district in 2011-12, against which Rs. 10 crore per district has already been released.
          Now, I would like to address some of the issues raised in the debate. A request was made by Shri Vishwa Mohan Kumar, Shri Arjun Ram Meghwal, Shri Mahabali Singh, Shri Arjun Roy and several other  hon. Members also  to categorise Bihar as a Special Category State. Any change in the categorisation of States for Central Assistance would require a decision of the National Development Council, which accorded Special Category status to the eight North-Eastern States and the three hill States.
           Planning Commission has  informed that, in the case of Bihar, two of the important criteria for classification as a Special  Category State, hilly and difficult terrain and low population density and/or sizeable share of tribal population, do not apply. Further, it receives substantial Central Assistance and is not debt-stressed. Therefore, it has not been accorded Special Category status. As such, Additional Central Assistance is being provided for State Plans on a  case to case basis considering State-specific problems.
          Sir, here I would like to bring to the notice of the hon. Members, mostly from Bihar and others also that Bihar had made a request for Special Category State status again last month and an Inter-Ministerial Group is being constituted by the Planning Commission to look into this request.
          Shri Hukmadeo Narayan Yadav, Shri Shailendra Kumar, Dr. Raghuvansh Prasad Singh, Shri Ghanshyam Anuragi and other Members raised the issue relating to the poor power situation of the State. The Ministry of Power has given the following information:
          The Government of India is concerned with planning and policy formulation for overall development of power sector in the country.  Government of India supplements the efforts of States by establishing generating units for supply of power to States/Union Territories in the Central Sector through concerned Central Public Sector Companies.. Bihar has  been allocated from 1727 to 1773 MW from the Central Generating Stations, which is the highest among the States of the Eastern Region. Bihar is expected to get additional allocation of 1637 MW from the future projects of NTPC in the State at Muzaffarpur and Nabinagar.  Bihar is also expected to get allocation from Barh-I and Barh-II Thermal Power Projects as per prevailing guidelines for allocation of power.
          The Government of India has also launched two schemes, that is, Rajiv Gandhi Grameen Vidyutikaran Yojana (RGGVY) for rural electrification and the Restructured Accelerated Power Development and Reforms Programme (R-APDRP) for strengthening of sub-transmission and distribution system in the country, including Bihar.
          Under the Special Plan for Bihar, assistance is being extended for renovation and modernisation of Barauni and Muzaffarpur Thermal Power Stations.
          Hon. Members Shri Adhir Chowdhury,  Shri Ghanshyam Anuragi and other hon. Members also referred to Bihar’s irrigation needs.  During the Eleventh Plan, so far, Central grant amounting to about Rs.305. crore has been released to support irrigation projects under the Accelerated Irrigation Benefits Programme under Bihar’s Annual State Plans.
          Sir, Shri Bhartruhari Mahtab pointed out that more powers have devolved on the Union of India under the Constitution and that the Union needs to give attention to under-developed States to correct the regional imbalance.
          I would like to tell the hon. Member that a wide range of schemes, including BRGF Scheme, are being implemented with this objective.  He had also asked that special attention to be given to Kalahandi-Bolangir-Koraput region that covers eight districts of Odisha. I would like to inform Shri Mahtab that a Special Plan for this region is being funded with 100 per cent Central grants under the BRGF Scheme with Rs.130 crore being released every year. In addition, 15 districts in Odisha, including seven out of eight KBK region districts are covered under the Integrated Action Plan.
          Shri Ramashankar Rajbhar has raised the point that States of Uttar Pradesh, Odisha, Chhattisgarh and Madhya Pradesh also require Special Packages. Several States are seeking Special Packages.  Their requests would be best considered through existing mechanism of the Finance Commission and the Planning Commission in the interest of equity. Shri Adhir Chowdhury had brought out details of critical debt situation in West Bengal, which has necessitated intervention by the Centre. The issue of Bihar’s high debt was also raised  and it was stated that the Centre needs to intervene.
          The Government of India is monitoring the debt situation of all States. Bihar is managing its debt quite well. West Bengal is a highly debt-stressed State.  The request for a Special Package from West Bengal is still under consideration.
          Shri Semmalai  suggested amendments in the 7th Schedule of the Constitution  and made various demands for Tamil Nadu during the discussion. The suggestions are outside the scope of discussion. As such, Tamil Nadu is in a comfortable fiscal situation.
          Shri Arun Roy has raised about the Special Category Status, which I have already answered.  For education, State-specific needs of Bihar are being met through the 13th Finance Commission. Sir, Rs.4,018 crore  for elementary education is being provided.  I have covered about Kosi floods.
          Sir, you have raised the issue of Special Package. Bihar is a very poor State with regional disparity. You have also mentioned that regional disparities are addressed through the Backward Region Grant Fund and the Integrated Action Plan.  When you were the Minister this was introduced and you know about this.   I have already discussed power problems. The Government of India is making all out efforts to help Bihar. 
          About irrigation issues, I would like to say that during the last year, under the AIBP scheme, a provision of Rs.700 crore was made but only Rs.230 crore was drawn. During the current year also Rs.700 crore has been allocated. It is a question of State Government utilising the funds provided by the Centre.
          Shri Mangani Lal Mandal raised the issue of Special Package, which I had already answered. Along with Shri Yadav, Shri Mandal has raised the issue of insertion of Article 371J. Other hon. Members have also raised, including Prof. Yadav. Sir, the existing Articles 371  to 371 (I) contain enabling provisions for preservation of religious and social practices and customs, law and order.  Provisions relating to representation on committees and strength of Legislative Assemblies, special responsibility of Governor are also defined in some of these provisions. The purposes of new Article 371(J) proposed to be inserted through this Bill are entirely different from the existing Article 371. 
          Therefore, if it is inserted, it would not in keeping with the convention. The insertion of the proposed article relating to implementation of schemes for a wide range of developmental activities in Bihar would be discriminatory to other States. However, adequate mechanism already exists for transfer of resources to Bihar. The State is receiving substantial funding through the constitutional mechanism of the Finance Commission Awards and through various sources of the Plan funds. Therefore, insertion of Article 371J is not justified.
          Sir, Shri Jagadanand Singh has made a demand for financial assistance to the State of Bihar to achieve higher growth rate. Under the 13th Finance Commission Awards, Rs. 1,72,000 crore has been awarded to Bihar. Bihar is the second fastest growing State as mentioned by Prof. Ranjan Prasad Yadav himself. He referred to inclusive growth, There is funding under Backward Region Grant Fund and Integrated Action Plan.
          Shri Mahabali Singh mentioned about the rich cultural heritage of Bihar and its tourism potential. The 13th Finance Commission Award includes Nalanda Heritage Development Plan for Rs. 50 crore and another Rs. 50 crore for 29 more archaeological sites.
          Shri Bhudev Choudhury has raised the issue of inter-linking of rivers to prevent flood and drought. I have already mentioned in my speech that the 13th Finance Commission Award of Rs. 33 crore is being provided to Bihar for interlinking of rivers for  prevention of floods.
          Sir, some hon. Members have raised issues that are not relating to Bihar. They have raised relevant and pertinent issues regarding the development needs of their own States. As I have already stated at the beginning, there are two routes through which States receive funds. It would be appropriate to raise these issues before the Planning Commission during the Annual Plan discussions and also during consultations with the Finance Commissions.
          There already exist adequate mechanism for transfer of resources to Bihar. Therefore, there appears to be no need for the present Bill for providing special financial assistance to the State of Bihar through an amendment of the Constitution. In Bihar’s case, there is an additional substantial assistance flowing through the special plan under the Backward Region Grant Fund. The proposed mechanism would be outside the present constitutional mechanism of the Finance Commission and the time tested mechanism of the Annual Plan finalised by the Planning Commission. The proposed Bill seeks to bring Bihar into a category by itself with assured recurring funding in addition to the existing funding. It does not factor any estimation of the fund requirements of other States or the resources available with the Centre. Evidently the Bill is discriminatory against other States.
          Sir, in the end, in view of the above facts and circumstances and the reasons that there exists adequate channels for transfer of funds to the State to support their development needs, I would request hon. Member Prof. Ranjan Prasad Yadav to kindly withdraw the Bill.
सभापति महोदय : प्रो. रंजन प्रसाद यादव।
श्री मंगनी लाल मंडल (झंझारपुर): सभापति जी, प्रो. रंजन प्रसाद यादव जी के कहने से पहले मैं मंत्री जी से एक क्लैरिफिकेशन चाहता हूँ। ...( व्यवधान) मैं एक ही बिन्दु पर क्लैरिफिकेशन चाहता हूँ।
सभापति महोदय : राइट टु रिप्लाई तो प्रो. रंजन प्रसाद यादव जी का है।
श्री मंगनी लाल मंडल :  महोदय, एक मामला है जिसका जवाब सरकार ने दिया है। माननीय मंत्री जी ने कहा है कि योजना आयोग ने पिछड़ा राज्य के लिए तीन पैरामीटर्स का उल्लेख किया है।   कम आबादी घनत्व, दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र और आदिवासी का बहुसंख्यक होना। इन्होंने कहा कि इन तीनों में बिहार नहीं आता है। फिर उन्होंने कहा कि इस मामले को देखने के लिए ग्रुप आफ मिनिस्टर्स कांस्टीटय़ूट किया गया है। मैं सरकार से जानना चाहता हूं कि एक तरफ तो सरकार ने संशोधन स्वीकार कर दिया और कहा कि देखने के लिए जीओएम कांस्टीटय़ूट किया है, मैं जानना चाहता हूं कि संविधानिक व्यवस्था है, तो किस अनुच्छेद में इसका उल्लेख है या किस अनुसूची में इसका उल्लेख है या यह जो पैरामीटर है, सरकार ने शासकीय आदेश के द्वारा निकाला है या योजना आयोग ने निर्णय करके सरकार से इस पर सहमति ली है।
 
प्रो. रंजन प्रसाद यादव (पाटलिपुत्र):सभापति महोदय, अपने विधेयक पर हुई चर्चा का उत्तर देने से पहले मैं सर्वप्रथम उन सभी सदस्यों का, जिनमें माननीय श्री अधीर रंजन चौधरी, हुक्मदेव नारायण यादव जी, श्री शैलेन्द्र कुमार, श्री रमाशंकर राजभर, श्री महताब, श्री एस. सेम्मलई, श्री विश्व मोहन कुमार, श्री अर्जुन मेघवाल, श्री घनश्याम अनुरागी, श्री दारा सिंह चौहान, श्री अर्जुन राय, श्री रघुवंश प्रसाद, श्री मंगनी लाल मंडल, श्री महाबली सिंह,  श्री भूदेव चौधरी और श्री हसन हैं, इनका मैं दिल से धन्यवाद करता हूं, जिन्होंने हमारे विधेयक पर हुई चर्चा में भाग लिया और अपने विचार सदन के सामने रखे, जिससे यह पता चलता है कि संसद में बिहार को विशेष आर्थिक सहायता देने के प्रति सभी पक्षों में आम सहमति है।
          मैं जानता हूं कि मेरा विधेयक सरकार के सहयोग के बिना पास नहीं हो सकता है, लेकिन विधेयक लाने के पीछे मेरा उद्देश्य यह है कि बिहार के विभाजन के बाद जो समस्याएं राज्य में आई हैं, उन्हें सबके सामने रखा जाए और समस्याओं के उपायों को सदन के समक्ष लाया जाए तथा इस संबंध में केंद्र सरकार के क्या विचार हैं, उससे देश तथा राज्य की जनता को अवगत कराया जाए।
          महोदय, अभी आपने कहा कि बिहार की वित्तीय स्थिति या बिहार की आर्थिक स्थिति खराब नहीं है, इसकी चर्चा की है। मैं आपको बताना चाहता हूं कि जब बिहार एक था, 54 जिलों का बिहार था, जिसका क्षेत्रफल लगभग 1 लाख 79 हजारस्कवैयर वर्ग किलोमीटर का था। यह देश का दूसरा सबसे बड़ा प्रदेश था, लेकिन बिहार के बंटने के बाद जो हालात हुए कि पूरे एरिया का 46 प्रतिशत तो झारखण्ड राज्य में चला गया। जिसमें 18 जिले, पूरी खनिज सम्पदा, पूरा फॉरेस्ट, लेकिन जनसंख्या केवल डेढ़ करोड़। दूसरी तरफ बिहार में 38 जिले, 54 प्रतिशत एरिया, लगभग साढ़े नौ करोड़ जनसंख्या और जो एरिया है, उसमें से 70 प्रतिशत फ्लड प्रोन एरिया है। 13 बड़ी-बड़ी नदियां, जिनकी साथियों ने चर्चा भी की। 30 प्रतिशत बचे हुए क्षेत्रफल में से 27 प्रतिशत ड्रॉट प्रोन एरिया है। यह बहुत ही गंभीर मामला है। इसके अलावा राज्य की वित्तीय स्थिति अच्छी नहीं है। बिहार में प्रति व्यक्ति राजस्व मात्र 536 रुपए है, जबकि देश के अन्य राज्यों का प्रति व्यक्ति औसत  राजस्व 2856 रुपए है।   इसका मतलब यह हुआ कि यदि राज्य के पूरे राजस्व को मात्र विकास कार्यों में खर्च कर दिया जाए तब भी अन्य राज्यों की तुलना में प्रति व्यक्ति 1700 रूपए की कमी होगी। इससे यह पता चलता है कि राज्य का संसाधन आधार यानि रिसोर्स बेस कितना कम है और इन्हीं कारणों से हमें केन्द्र सरकार की मदद की आवश्यकता है।
          महोदय, दूसरा बिन्दु है कि बिहार को एक और प्रकार के भेदभाव को झेलना पड़ता है। अन्य राज्यों को बैंकों के माध्यम से कृषि, औद्योगिक विकास के लिए जो सब्सीडाइज्ड ऋण दिया जाता है, उसमें बिहार का हिस्सा बहुत कम है। इसका मतलब यह हुआ कि राज्य के लोगों का पैसा जो बैंक में जमा होता है, वह दूसरे राज्यों के विकास में खर्च होता है।  
          महोदय, तीसरा बिन्दु यह है कि केन्द्र सरकार की स्पेशल इकॉनॉमिक जोन की नीति से भी राज्य को काफी नुकसान हो रहा है। इससे उन राज्यों को ज्यादा फायदा हो रहा है जहां इंफ्रास्ट्रक्चर पहले से ही विकसित है। इस तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर बिहार जैसे पिछड़े राज्यों में स्थापित नहीं किए जाते हैं, इन क्षेत्रों को जो कर राहत केन्द्र सरकार की ओर से दी जाती है उससे बाकी राज्यों के हिस्से में आने वाले कर राजस्व में कमी आती है।
          मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि मेरे विधेयक को सदन में सभी पक्षों का समर्थन मिला है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि आज के बिहार राज्य को बिना विशेष आर्थिक सहायता दिए हुए उसका विकास संभव नहीं है। राज्य में विधि व्यवस्था की स्थिति आज काफी बेहतर है। राज्य में सड़कों की स्थिति भी काफी अच्छी हुई है। लेकिन आर्थिक विकास तभी हो सकता है जब केन्द्र सरकार उसे विशेष आर्थिक सहायता दे।
          महोदय, अभी-अभी वर्ष 2000 में तीन प्रदेश बंटे- बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड बना। उसको स्पेशल स्टेटस दिया गया। मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ बना। उसकी भी हालत बहुत अच्छी है। इसके पहले भी वर्ष 1953 में मद्रास बंटा, आंध्र प्रदेश बना। वहां भी काफी अच्छा विकास हो रहा है। बराबरी का बंटवारा हुआ। वर्ष 1960 में बॉम्बे से महाराष्ट्र और गुजरात प्रदेश बने। वे बराबरी में बंटे। आज देखिए, उन तीनों प्रदेशों की क्या स्थिति है? वर्ष 1966 में पंजाब से हरियाणा बना। फिर पंजाब से हिमाचल प्रदेश बना। हिमाचल प्रदेश को भी आपने स्पेशल स्टेटस दिया। वर्ष 1969 में आसाम से मेघालय और उधर जो सेवेन सिस्टर्स स्टेट्स हैं- मणिपुर, नागालैंड, त्रिपुरा, अरूणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम। उनको भी आपने बांटा, इन्हें स्पेशल राज्य का दर्जा दिया। लेकिन वर्ष 2000 में जो बिहार बंटा और बंटने के बाद जो जमीन मिली और जो हालात हैं, इसकी कमर टूट गयी है। आप इसको गंभीरता से लें।
          महोदय, इसलिए मैंने अपने विधेयक में राज्य को वित्त आयोग द्वारा दिए गए वार्षिक आवंटन और ऐसी अन्य वित्तीय सहायता जो भारत सरकार द्वारा इस राज्य को प्रदान की जाती है, के अतिरिक्त अनुदान के रूप में एकमुश्त 90000 करोड़ रूपए और अतिरिक्त 30000 करोड़ रूपए प्रति वर्ष बिहार राज्य के समग्र विकास के लिए आवंटित किए जाने की मांग रखी है। आपने चर्चा की कि इस फंड से, उस फंड से, विभिन्न फंडों से राज्यों को जो मिलता है, वह तो आपको देना ही है।  इसके अतिरिक्त अनुदान के रूप में अलग से एकमुश्त पैकेज की बात मैंने की है।  इसलिए मैं माननीय मंत्री जी से पुनः आग्रह करूंगा कि वे सदन को आश्वासन दें कि राज्य को यथाशीघ्र आर्थिक विकास सहायता दी जाएगी।
 
Member.  I have replied to most of the queries that he has raised but I would like to tell one or two things.
          As I mentioned in my reply, an Inter-Ministerial group would be constituted by the Planning Commission.  Everything will be discussed and the hon. Member will be able to represent to it but finally the National Development Council will need to endorse the recommendations. 
          Shri Yadav has raised the issue of C.D. Ratio.  Since I am dealing with the banks, I agree with him that C.D. Ratio in Bihar is one of the lowest.  There are many other States also.  But, as you know, the financial inclusion programme is going on.  We are expanding the network of the banking facilities. Our banks would be able to give more and more loans to the entrepreneurs so that more money can be utilized in the States. Similarly, I have mentioned that several schemes are there, and funds are being sent but they should be utilized timely and fully. 
          Sir, I appreciate the views expressed by several Members about the history, religion, heritage and the role of the people of Bihar in the development of the nation.  We cannot think India without Bihar.  We understand that. I can assure you that your concerns will be looked into.  I have noted them, and we will see to it that Bihar, along with other States, should get more funds under various schemes.  As you know, several schemes are going on.
          Shri Mahtab raised about the BRGF funds. The BRGF funds are going to Bihar more than any other States. It is better to utilize these funds for better schemes.
श्री अर्जुन राम मेघवाल (बीकानेर): सी.डी. रेश्यो को नेशनल एवरेज़ तक लाने का काम आपके हाथ में है।
श्री नमोनारायन मीणा:  पहले आपके यहां करेंगे, आपका भी तो कम है।
Along with the Finance Minister, I went to Bihar and discussed the issue with all the Chief Ministers of the Eastern States including Bihar. We had a meeting in Patna.  This issue was again raised by the hon. Chief Minister of Bihar, and the Finance Minister asked the bank CMDs to look into this matter. We want to improve the C.D. Ratio of the backward States. 
          With these remarks, I would against request the hon. Member to withdraw the Bill.
 प्रो. रंजन प्रसाद यादव (पाटलिपुत्र):आपने एश्योरेंस दिया है न, आपका आश्वासन है न?
श्री नमोनारायन मीणा : आपके लिए पूरा बन रहा है।
प्रो. रंजन प्रसाद यादव : मैं माननीय मंत्री जी के आश्वासन पर फिलहाल इस बिल को वापस लेता हूं।
          महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूं कि भारत के संविधान में और संशोधन करने वाले विधेयक को वापस लेने की अनुमति दी जाये।
सभापति महोदय : प्रश्न यह है::
  “कि भारत के संविधान में और संशोधन करने वाले विधेयक को वापस लेने की अनुमति दी जाये।” प्रस्ताव स्वीकृत हुआ।
प्रो. रंजन प्रसाद यादव : महोदय, मैं विधेयक वापस लेता हूं।